वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 171–180
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 171–180
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दार्थपारिजातः १०७१ मुपगच्छति सः । सूर्य एव दिनस्य परिणामम् स एव जीवननियामको व्याविनाशको दु स्वप्ननाशकः । उदयकाले स स्तूयते यत्स मित्रावरुणयो: समक्षे मानवस्य निर्दोषत्वमुद्द्द्घोषयेत । प्राणिजातं तदाश्रितमतः स विश्वस्रष्टोच्यते' ( पृ० ६५) इति । तदप्यापातरमणीयम्, वैदिकानां रीत्या सूर्यस्य हिरण्यगर्भरूपेण सर्ववेदमयत्वात् सर्वान्तर्यामिरूपत्वाच्चा- नितरसाधारणत्वात् । सूर्यस्यैव ग्रीकैरन्यैश्च स्वस्वभाषायामनेकानि नामानि निर्दिश्यन्ताम्, तथापि वेदप्रामाण्यमन्तरा तस्य हिरण्यगर्भान्तर्यामिरूपत्व न ज्ञातु शक्यते । सम्पूर्णो मन्त्रश्चेत्थम्-' तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोविततं सञ्जभार । यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मे ॥ ' (ऋ० स० १।११५ / ४ ): तदर्थस्तु सूर्यस्य सर्वप्रेरक- स्यादित्यस्य तद्देवत्वमीश्वरत्वं स्वातन्त्र्य महित्वं माहात्म्य च । तत एव अत्र मन्त्रे तत्पदश्रवणाद् यत्पदमध्याहृत्य व्याख्येयम् । यत् कर्तोः ( कर्मनामैतत् ) प्रारब्धापरिसमाप्तस्य कृष्यादिलक्षणस्य कर्मणो मध्येऽपरिसमाप्त एव तस्मिन् कर्मणि विततं विस्तीर्णं स्वकीय रश्मिजालम् अस्तं गच्छन् सूर्यः सञ्जभार अस्माल्लोकात् स्वात्मन्युपसंहरति, कर्मकरश्च प्रवृत्तमपरिसमाप्तमेव विसृजति अस्तं यन्तं सूर्यं दृष्ट्वा । ईदृशं स्वातन्त्र्य महिमा च सूर्यव्यतिरिक्तस्य कस्यास्ति? न कस्याप्यस्तीत्यर्थः । सूर्य एवेदृश स्वातन्त्र्य महिमान चावगाहते । अपि च, इत् इत्यवधारणे यदेतस्मिन्नेव काले हरितः रसहरणशीलान् रश्मोन् हरिद्वर्णानश्वान् वा सघस्थात् सहस्थानाद् अस्मात्पार्थिवाल्लोकादादाय आयुक्त अन्यत्र संयुक्तान करोति । यद्वा युजिः केवलोऽपि वियुक्तो द्रष्टव्यः । तथा च यदेवासी स्वरश्मीनश्वान् वा सघस्थाद् रथात्, सह तिष्ठन्त्यस्मिन्निति सधस्थो रथ, अयुक्त अमुञ्चत्, आत् अनन्तरमेव रात्री निशा दासः आच्छादयितृतमः सिमस्मै, सिमशब्दः सर्वशब्दपर्यायः सप्तम्यर्थश्च सर्वस्मिन् लोके तनुते विस्तारयति । यद्वा वासः वासरं महः तत् सर्वस्मात् लोकादपनीय रात्री तमस्तनुते । ( नि० ४। ११ ) इत्यत्रायमर्थः समर्थितः । सूर्य दिन का परिणाम है, जीवन का नियामक है, आयु का वर्षक है । वह व्याधि को दूर करता है और दुस्वप्न को मिटाता है । उसके उदय होते ही उससे प्रार्थना की जाती है कि वह मानव को मित्रावरुण के समक्ष निर्दोष घोषित करे । समस्त प्राणी सूर्य पर ही निर्भर रहते है । इसी कारण वह विश्व का स्रष्टा कहलाता है' ( पृ०६५ ) । ऊपर- ऊपर देखने से ही यह कथन अच्छा लगता है कि वैदिक पद्धति से तो सूर्य हिरण्यगर्भ स्वरूप है, यह सर्ववेदमय और सर्वान्तर्यामी है, अतः इसका अपना वैशिष्ट्य है । सूर्य के हो ग्रीक तथा अन्य भाषाओं में अनेक नाम हो सकते हैं, तथापि वेद के प्रमाण के बिना उसकी हिरण्यगर्भता और अन्तर्यामिता का बोध नही हो सकता । पूरा मन्त्र मूल में उद्धृत किया गया है और उसका अर्थ यह है–' सूर्य, सर्वप्रेरक आदित्य का हो यह देवत्व. ईश्वरस्व, स्वातन्त्र्य और माहात्म्य है, इस मन्त्र में ' तत्' पद के श्रवण से ' यत्' पद का अध्याहार कर उसकी व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिये कि मनुष्य कृषि प्रभूति अपने कार्यों को प्रारम्भ करके बीच में ही उसको बिना पूरा किये ही, जब सूर्य अस्त होते समय चारों तरफ फैली हुई अपनी किरणो को समेट लेता है, तो उसको वह कार्य अधूरा ही छोड़ देना पड़ता है । अस्ताचल की ओर जाते हुए सूर्य को देखकर ही व्यक्ति अपने अधूरे काम को छोडता है, अन्यथा नही । इस, तरह का स्वातन्त्र्य और महिमा सूर्य को छोड़कर और किसमें है? अर्थात् किसी की भी नही है । केवल सूर्य में ही इस तरह की स्वतन्त्रता और महिमा विद्यमान है । 'इत्' शब्द यहाँ अवधारण के अर्थ में प्रयुक्त है कि इसी समय यह सूर्य पृथ्वी से रस को ग्रहण करने का जिनका स्वभाव है, ऐसी अपनी किरणों को अथवा हरित वर्ण के घोडो को इस पार्थिव लोक से उठा ले जाकर अन्यत्र नियुक्त कर देता है । अथवा यहाँ पर 'युजि' धातु का केवल प्रयोग होते हुए भी उसको 'वि' उपसर्ग के सहित माना जाना चाहिये । इस तरह से जब यह सूर्य अपनी किरणो अथवा घोड़ो को अपने रथ से विमुक्त कर देता है, तो उसके बाद ही रात्रि तप से इस सारे जगत् को ढँक देती है । यहाँ पर सधस्य शब्द रथ का और सिम शब्द सर्व शब्द का पर्यायवाची है । अथवा 'वासः' शब्द का अर्थ है दिन का तेज, उसको सारे जगत् से हटाकर रात्रि सब जगह तप का विस्तार कर देती है । निरुक्तकार ( ४| ११ ) ने भी इस अर्थ का समर्थन किया है ।
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वेदार्थपारिजातः १०७२ यदपि - ' सौरमण्डलस्यान्यो देवः सविता प्रेरयिता स सूर्यस्य गति त्वरयते । अयं च स्वर्णमयः, स्वर्णमय अस्य भुजा, सौवर्णश्च रथः । स च सुदृढैः स्वर्णभुजैर्भुजानुत्थाप्य प्राणिनः प्रबोधयति सद्भावनाश्च वर्धयते । अस्य बाह भूतल स्पृशन्ति, कनकरथारूढः परिभ्राम्यति, प्राणिनश्च निरीक्षते । अस्योर्ध्वमधश्च पन्थानौ वर्तेते । उषसः पन्थान मनुसरति । सोरैर्भास्वरैर्मयूखैर्देदीप्यमानः पीतकेशः सविता प्राच्याः स्वद्युती: सातत्येन प्रसारयति । सोऽपि दुःस्वप्ना दानवान मायाविनश्च नाशयति । स देवानमृतान्मनुष्यांश्चायुष्मतः करोति, प्रेतात्मन सयमनी पुरीं नयति । अन् देवास्तमनुसरन्ति । इन्द्रवरुणादयोऽपि तदिच्छां नातिक्रामन्ति । प्रदोषवेलाया स सूर्यसहचरो भवति । एकस्मि सूक्तेऽस्तं गच्छतः सूर्यस्य रूपेण तस्य वर्णनम् । 'आशुभिश्चिद्यान् विमुचाति नूनमरीरमदतमान चिदेतो. । अह्यर्षण चिन्न्ययाँ अविष्यामनु व्रतं सवितुर्मोक्यागात् ॥ ' (ऋ० स० २ | ३८| ३), 'पुनः समव्यद् वितत वयन्ती मध्या कर्तोन्य धाच्छुक्म धीरः' (ऋ ० स ० २ | ३८| ४ ), 'विश्वो मार्ताण्डो व्रजमा पशुर्गात् स्थशो जन्मानि सविता व्याक:' (ऋ० स २१३८८) 'तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्' (ऋ० स० ३१६२।१० ) । नद्रीत्या मन्त्राण मयमर्थः - वेगवद्भिस्तीव्रगतिभिरश्वैः परिभ्राम्यन् सवितेदानी विश्राम्यति । शीघ्रगामिनामश्वाना रश्मोनाचकर्ष सर्पवत्सर्पतामश्वानां गति रोधयति । सवितुरादेशाद् रात्रेरुपस्थितत्वात् । वस्त्र वयन्ती नारीव रात्रिः पूर्वधुरद्या प्रकाश तमसाच्छादयति । धीराः कर्मकरणसमर्था अपि सर्वे स्वस्वकार्यमवरुद्ध कृतवन्तः । यावद्दिन परिभ्राम्यन्त पक्षिणः स्वस्वनीडमुपागम्यावस्थितवन्तः । समस्तपशुवृन्दोऽपि स्वस्वगोष्ठमुपजगाम । सर्वनियन्त्रा सवित्रा सकलभूता यथास्थान पृथक्कृतानि । अहमोजस्विनः सवितुर्देवस्य तत् श्रेष्ठोजः प्रप्सया ध्यायामि । स नो घियः प्रचोदयात् प्रेरकत्वात्तस्य स्मरणं वेदारम्भसमये प्राचीनकालेषु क्रियते स्म । अद्यापि हिन्दवोऽस्य मन्त्रस्य सन्ध्याकाले जपं कुर्वन्ति सावित्रीनाम्नास्य मन्त्रस्योपास्यदेवता प्रसिद्धा' इत्यादिकम्, तदपि यत्किञ्चित् सवितुः सूर्यस्य चाभेदेन सूयगति सौर मण्डल के दूसरे देवता सविता प्रेरणिता है, जो सूर्य की गति को स्वरित करता है । यह देवता स्वर्णम्य है सोने की भुजाएँ और सोने का इसका रथ है । यह सुदृढ स्वर्णभुजाओं को उठाकर प्राणिवर्ग को प्रबोधित करता है और उन सद्भावनाओं से संबंधित करता है । इसकी बाँह भूतल तक स्पर्श करती है । यह कनक रथ में आरूढ होकर परिभ्रमण करता । और प्राणिवर्ग का निरीक्षण करता है । इसका पथ ऊर्ध्व एवं अधः दोनो ओर है । उषा के चल पड़ने पर सविता भी उसी पथ क अनुसरण करता है । सूर्य की भास्कर मयूखो से देदीप्यमान पीतकेश सविता अपनी द्युति को प्राची से सन्तत फैलाता है । यह दुस्वप्न को दूर करता है, दानवो और मायावियों का नाश करता है । यह देवताओ को अमर करता है और मानव की आयु को बढाता है यहाँ सविता प्रेतात्माओं को धर्मराज की पुरी मे ले जाता है । अन्य देवता सविता का ही अनुसरण करते है । इन्द्र, वरुण जैसे अत्यन्त प्रभावशाली देवता भी इसकी इच्छा का अतिक्रमण नही कर सकते और न इसके स्वतन्त्र शासन का ही उल्लंघन कर सकते हैं । सवित को बहुधा प्रदोष वेला मे सूर्य का सहचर माना है । एक सूक्त में उसका वर्णन अस्तंगत होने वाले सूर्य के रूप में किया है । इस सून के तीन मन्त्र ऊपर मूल मे उद्धृत है, साथ ही प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र भी उद्धृत है । इन मन्त्रो का अर्थ यह है—'वेगवान् घोडों पर तीव्र गति से परिभ्रमण करता हुआ सविता अब विश्राम करता है, उसने अपने शीघ्रगामी घोड़ों की रास खींच ली है, वह सर्प की तरह भागते हुए घोडो की गति को रोक रहा है । कारण, सविता का आदेश पाकर रात्रि उपस्थित हो गई है । वस्त्र को बुनती हुई नारी के समान यह रात्रि कल को तरह फिर आज भी प्रकाश को तम से आच्छादित कर रही है । धीर और काम करने में समर्थ होते हुए भी सब लोग अपने- अपने काम को बन्द कर चुके हैं । सारे दिन चक्कर करते हुए सब पक्षी अब अपने-अपने घोसलों पर जा बैठे हैं । समस्त पशुवृन्द भी अपनी-अपनी गोशाला में पहुँच गये है' । सर्वनियन्ता सविता देवता ने सकल भूतप्राणियों को यथास्थान पृथक् पृथक कर दिया है | हम ओजस्वी सविता देवता के उस सर्वश्रेष्ठ ओज को प्राप्त करने की लालसा से उसका ध्यान करते हैं । वह हमारी बुद्धि को प्रेरणा प्रदान करे ।' प्रेरक के नाते उसका स्मरण वेदारम्भ के समय प्राचीनकाल में किया जाता था । इस मन्त्र का जाप आज भी प्रत्येक आस्तिक हिन्दू सन्ध्या-वन्दन के समय करता है । यह मन्त्र आराध्य देवता के नाम पर 'सावित्री' कहलाता है' ( पु० ६६-६७ )
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चपाचपाणात प्रेरकत्वायोगात् । तस्य च रश्मय एव कराः । तैरेव स प्राणिन प्रवोधयति । स च सत्तामात्रेण प्रेरकः । न च कञ्चनोत्थापयति स्वापयति वा । तस्मात्मैव रथः । आत्मैवाश्वाः । माहाभाग्याद्देवतायाः । तथापि तस्य लीलाविग्रहोऽपि भवति । ' ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥' इति पुराणैर्गीयमानत्वात् । मन्त्रार्थस्तु -यान् गच्छन् सविता आशुभिश्चित् शीघ्रगामिभिरपि रश्मिभिः विमुचति विमुच्यते 1। नूनम् अतमानं चित् गच्छन्तमपि जनम् एतोः गमनात् अरोरमत् उपरमयति । किञ्च, अहर्षूणाम् अहिमाहन्तार शत्रुमर्षन्त्यभि- गच्छन्तीत्यध्वर्षवः, तेषामपि अविष्यां गमनेच्छा न्ययान् नियच्छति । सवितु प्रेरकस्य सूर्यस्य व्रतं कर्म अनु पश्चात् । मोकी रात्रिः ( नि ० १| ७| १८), रात्रिनामसु पाठात् । भगात् सवितुश्चेष्टापरतो रात्रिरागच्छतीत्यर्थः ॥ पूर्वोक्तो मैकडानलाभिप्रेतस्त्वर्थोऽशुद्ध एव मन्त्रेऽश्वादिबोधकपदाभावात् । रश्मीनाचकर्ष इत्यस्यापि बोधक पदं नास्ति मूले । सर्पवत्सर्पतामश्वानां गतिं रुरोध इत्यस्यापि बोधक पद नास्त्येव, पूर्वेणैव गतार्थत्वाद् व्यर्थत्वाच्च । अहर्षूणामित्यस्य तु अहिमाहन्तारं शत्रुमृषन्ति अभिगच्छन्ति ये शत्रवस्तेषामपि अविष्या गमनेच्छां न्यायाद् नियच्छतीत्येवार्थः । सवितुरादेशां प्राप्य रात्रिरागतेत्यपि निर्मूलम्, आदेशार्थकपदाभावात् । द्वितीयमन्त्रार्थस्तु - वयन्ती वस्त्र वयन्ती नारीव विततमालोकं पुनः समव्ययत सवेष्टयते । पुनः शब्दः पूर्वेद्युरप्येवमेवाकार्षीदिति द्योतयति । धीरः प्राज्ञोऽपि सर्वो लोकः कर्तोः क्रियमाणं कर्म शक्यकर्तुः शक्यमपि मध्या मध्ये उपक्रान्तं कर्मासमाप्य न्यधात् निहितवान् । सवितर्युपरते इति शेषः । ' उत्संहायास्थाद् व्यूतूंरदर्घररमतिः सविता देव आगात्' इति मन्त्रार्थः, तस्यायमर्थ. सर्वो लोकः सहाय शय्या विहाय उत् अस्थात् । अवशिष्ट कर्म कर्तुं यह कथन भी सर्वथा निरर्थक है । सविता और सूर्य दोनो एक ही हैं, अतः सविता को सूर्य की गति का प्रेरक नही माना जा सकता । किरणें ही उसके हाथ है । उन्ही की सहायता से वह प्राणियो को जगाता है । अपनी उपस्थिति मात्र से वह प्रेरणा प्रदान करता है । न तो वह किसी को जगाता है और न सुलाता ही है । वही अपने रथ और घोडे के रूप में भी परिणत होता है, क्योकि देवता महान् ऐश्वर्यशाली होते है । इसीलिये वह लोला करने के लिये शरीर भी धारण करता है । पुराणो मे इसकी इस तरह से स्तुति - ',,,,की गई है सूर्यमण्डल के मध्य में निवास करने वाले कमल के आसन पर विराजमान केयूर मकरकुण्डल किरीट और हार को धारण करने वाले, सुवर्ण के समान देदीप्यमान शरीर वाले, शंख और चक्र को धारण किये हुए नारायण का सदा ध्यान करना चाहिये । ' उक्त मन्त्रो का अर्थ यह है-'जब सूर्य चलने लगता है, तो वह अपनी तीव्र गतिवाली रश्मियो को भी पीछे छोड जाता है । यह चलते हुए मनुष्य की गति को भी रोक देता है और हिंसक मनोवृत्तिवाले शत्रुओ की गति को भी रोक देता है । सारे जगत् के प्रेरक इस सविता के इन क्रियाकलापो के बाद ही रात्रि का आगमन होता है' । मैकडानल के द्वारा किया गया पूर्वोक्त अर्थ सर्वथा गलत है, क्योकि मन्त्र में अश्व प्रभृति के बोधक पद विद्यमान नही है । 'अपनी किरणो को खीच लिया' इस अर्थ के बोधक पद भी उस मन्त्र मे नहीं है । 'सर्प के समान सरपट भागते हुए घोडो की गति को अवरुद्ध कर दिया' इस अर्थ के बोधक पद भी वहीं नहीं है । इस अर्थ की प्रतीति पूर्वपद से ही हो जाती है, अतः पुनः इस तरह का अर्थ करना व्यर्थ भी है । ' अहर्षूणाम्' इस पद का अर्थ यही हो सकता है कि ' सब तरह से हिंसा करने के लिये उद्यत शत्रु की गति को रोक देने वाला है' । 'सविता का आदेश पाकर रात्रि आ गई' यह अर्थ भी सर्वथा निर्मूल है, क्योकि यहाँ पर कोई आदेशार्थक पद नही दिखाई पड़ता । दूसरे मन्त्र का अर्थ इस तरह से किया जाता है-'वस्त्र को बुननेवाली नारी जैसे तन्तुओ का विस्तार करती है, उसी तरह से यह सूर्य भी कल की तरह आज भी सारे संसार पर अपनी किरणो के द्वारा फैलाए गए प्रकाश को पुनः समेट लेता है । यह देखकर सभी समझदार मनुष्य हाथ में लिये अपने काम को बीच में अधूरा ही छोडकर बैठ जाते हैं, क्योंकि सूर्य अब अस्ताचल की ओर चला गया है' । 'उत्संहायास्थाद्' यह मन्त्र का आधा भाग है । इसका अर्थ यह है-' संपूर्ण प्राणी वर्ग अब शय्या को छोड़कर उठ खडा १३५
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१०७४ वेदार्थपारिजातः पुनरुत्तिष्ठति । सपूर्वी जहातिः शय्यापरित्यागे वर्तते । यथा- 'कलिः शयानो भवति सजिहानस्तु द्वापर:' ( ऐ० ब्रा ० ७। १५ ) । सविता सर्वस्य प्रसविता सूर्यः अरमति: अनुपरतिः देवः द्योतमानः आगात् आगच्छति, उदेतीत्यर्थः । . ऋतून् कालविशेषाश्च वि अदर्दः विदारयति । विश्वः सर्व मार्ताण्ड मृताद्भिन्नादण्डादुत्पद्यमानः पक्षी आगात् आगच्छति । आकाशान्नोडमिति शेषः 1। विश्व • पशुरपि व्रजं गोष्ठमागात् । सविता प्रेरकः रथश. स्थाने स्थाने जन्मानि जातानि भूतानि व्याकः पृथगकार्षीत् । ततः पूर्वार्धो मन्त्र: 'याद्राध्य वरुणो योनिमध्यमनिशित निमिषि जर्भुराण:' (ऋ० स० २२३८८) तदर्थस्तु -यातां गच्छता राध्य संराधनीयम्, अप्यम् आप्तु योग्यमनिशितमतीक्ष्ण सुखकरं योनि स्थान निमिषि निमेषे सवितुरस्तमये सति विश्रामार्थं प्राणिभ्यः प्रयच्छति, वरुणस्य रानिर्वाहकत्वात् । जर्गुराण: भृशं गच्छन् । पूर्वोक्तोऽर्थस्तु काल्पनिक एव । यः सविता नः अस्माकं धियः कर्माणि धर्मादिविषया बुद्धीर्वा प्रचोदयात् प्रेरयेत् । तत् तस्य देवस्य सवितुः सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगत्स्रष्टुः परमेश्वरस्य वरेण्य सर्वेरुपास्यतया ज्ञेयतया च संभजनीय भर्गः अविद्या- तत्कार्ययोर्भर्जनाद् भर्गः स्वयज्योतिः परब्रह्मात्मक तेज: धीमहि व्यायामः । यद्वा तद् इति भर्गो विशेषणं सवितु- देवस्य तादृशं भर्गो धीमहि । किं तत् इत्यपेक्षायामाह-य इति । अत्र लिङ्गव्यत्ययः । यद्भर्गः धियः प्रचोदयात्, तत् ध्यायेमेति । यद्वा यः सविता सूर्यो धियः कर्माणि प्रचोदयात् । तस्य सवितुः सर्वस्य प्रसवितुः देवस्य द्योतमानस्य सूर्यस्य तत् सर्वेदृश्यमानतया प्रसिद्धं वरेण्य सर्वे. सभजनीय भर्गः पापान्तं तापकं तेजोमण्डल घोमहि ध्येयतया मनसा धारयेम । यद्वा यः सविता धियः प्रचोदयति तस्य प्रसादात् भर्गोऽन्नादिफल धीमहि धारयाम: । भर्गशब्दस्यान्नपरत्वे धीशब्दस्य कर्मपरत्वे आथर्वणम्--'वेदांश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयोऽन्नमाहुः । कर्माणि धियस्तदु ते प्रब्रवीमि 1। प्रचोदयात् सविता चाभिरेति' ( गोपथ ० १ ३२ ) इति सायणाचार्यः । हुआ है कि अब कल के बचे हुए कार्य को पूरा कर दिया जाय । संपूर्वक 'हा' धातु का अर्थ ' शय्या का परित्याग' होता है । जैसे कि ऐतरेय ब्राह्मण के इस वाक्य में कि 'कलि सोया रहता है और द्वापर जागता रहता है' । सविता अर्थात् सभी प्राणियो को उत्पन्न करने वाला यह सूर्य बिना विश्राम किये सारे जगत् को प्रकाशित करते हुए उदित होता है । यह सभी ऋतुओ को तहस नहस कर देता है । यह विश्वमय मार्तण्ड सविता सुवर्णमय अण्ड से उत्पन्न पक्षी की तरह यहाँ पर उसी तरह से आता है, जैसे कि आकाश में विचरण करने बाला पक्षी अपने घोंसले में आ जाता है । सारा पशु समुदाय भी इस समय अपने बाड़े में आ जाता है । यह प्रेरक सविता स्थान -स्थान पर उत्पन्न प्राणियो को पृथक् करता है । ' याद्राध्यं' इत्यादि मन्त्र का पूर्वार्ध है । इसका अर्थ इस तरह से किया जाता है- 'सविता जब अस्ताचल की ओर चलता है, तो वह यात्रा करनेवाले पथिको के विश्राम के लायक, अनुद्वेजक, सुखकर स्थान की व्यवस्था करता है । यहाँ पर वरुण रात्रि का निर्वाहक माना जाता है, अर्थात् रात्रि में वरुण सब प्राणियो की देखभाल करता है । 'जर्भुराण:' पद का अर्थ 'बहुत चलने वाला' होता है । पूर्वोक्त मैकडानल प्रदर्शित अर्थ कोरा काल्पनिक है । 'जो सविता हमारे क्रिया कलाप को अथवा धर्मादि विषयक बुद्धि को प्रेरित करता है, उस सविता, सर्वान्तयामी होने से सबके प्रेरक, जगत् के स्रष्टा परमेश्वर के सबके उपास्य, ज्ञेय और संभजनीय स्वयंज्योतिःस्वरूप परब्रह्मात्मक तेज का हम ध्यान करते हैं' अथवा ' तत्' शब्द भर्ग का विशेषण है, उस सविता देव के उस तरह के तेज का हम ध्यान करते हैं । वह किस तरह का है? इस तरह की आकाक्षा होने पर बताया गया है - य इति । यहाँ लिङ्ग में परिवर्तन हो जाता है । जो भर्ग हमारी बुद्धि का प्रेरक होता है, ,उसका हम ध्यान करते है । अथवा जो सविता अर्थात् सूर्य हमको कार्य में प्रवृत्त कराता है सब प्राणियो के प्रसविता द्योतमान सविता देव के सभी प्राणियों से परिदृश्यमान, प्रसिद्ध, सबके लिये वरणीय, पापो के नाशक, भर्ग अर्थात् तेजोमण्डल काहम मन से ध्यान करते हैं । अथवा जो सविता हमारी बुद्धि को अच्छे कामो में लगाता है, उसके ही प्रसाद से हम अनादि लक्षण करते है । भर्ग शब्द का अर्थ अन्न है और घी शब्द का अर्थ कर्म है, इसके प्रमाण में अथर्ववेद के गोपथ ब्राह्मण के ऊपर उद्धृतफल कीवचनप्राप्ति को सायणाचार्य ने उद्धृत किया है ।
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वेदार्थपारिजात १०७५ यदपि - 'ऋग्वेदस्याष्टसु सूक्तेषु पूष्णो देवस्य स्तुति । पूषाभ्युदयहेतुः सूर्यान्तर्हिता पशुपालिनी शक्ति सङ्केतयति । तस्य रथे अजा युज्यन्ते । सोऽङ्कुशधर गगनमार्गपरिचितः प्रेतात्मनः पितॄणां पार्श्व प्रापयति 1। मार्गाणां संरक्षको मर्त्यान् लोकान्तरेषु सुखमयानि स्थानानि प्रापयति । , विष्णुस्तुरीयश्रेणीगतो देवः ऋग्वेदे तत्स्तुतेः सूर्य सवितृपूषस्तुत्यपेक्षयाप्यल्पत्वात् । तथाप्यैतिहासिक- दृष्ट्या सौरमण्डले स सर्वापेक्षया महत्त्वपूर्णो देव । स त्रिविक्रमत्वेन निःसंशय लोकत्रयसञ्चारिणः सूर्यस्य प्रतीको भवति । तस्य सर्वोत्कृष्ट पदक्रमः स्वर्ग, यत्र पितृगणा निवसन्ति । यस्य स्थानस्य प्राप्तये निम्नोक्तशब्देऋ षिभिः स्वाभिलाषो व्यञ्जितः -'तदस्य प्रियमभिपाथो अश्या नरो यत्र देवयवो मदन्ति | उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥ ' (ऋ० १।१५४।५ ) मूलतो विष्णुकल्पना सूर्यरूपेण प्रचलति । तस्येदं लाक्षणिकं रूप येन स उरुभिः पदक्रमैस्त्रिलोक्यां द्रुतगत्या भ्राम्यति । मानवहितार्थं तस्य त्रयः क्रमाः । ब्राह्मणग्रन्थेष्वेकस्मिन्नाख्याने विष्णुर्वामनरूपं घृत्वा त्रिभिः पदक्रमैः पृथिवीं दानवाधिकारान्मोचयामास । ससारपालको विष्णुर्वेदोत्तरे पुराणेऽवतारवादाघाररूपेण विकासमुपगतः । मानवकल्याणार्थंमनेकधाऽवततार' (पृ० ६७-६८ ) इति । तदपि न युक्तम्, सूर्यान्तर्यामिणः परमेश्वरस्यैव वेदे विष्णुरूपेण वर्णनात् । तस्यैव ब्राह्मणग्रन्थैविवृतत्वेन सूर्यस्यैव विष्णुप्रतीकत्वोपपत्तेः । यद्यपीन्द्रादिस्तुतिसूक्तसंख्यापेक्षया विष्णुस्तुतिसूक्तसंख्याल्पीयसी, तथापि यथैकयैव सावित्र्या तिसृभिरेव व्याहृतिरेकेनैव प्रणवेन परमार्थतत्त्वं निरूप्यते, तथैव कतिचिद्भिरेव सूक्तः कतिपयैरेव मन्त्र- विष्णोः सर्वदेवापेक्षया परमोत्कर्षो वर्णितः । तथाहि -' विष्णोर्मुकं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । 'ऋग्वेद के कोई आठ सूक्तों में पूषा को स्तुति है । उसका नाम ' अभ्युदय कारक' इस अर्थ का वाचक है । उसके स्वरूप मे अन्तहित सूर्य की उस उपकारक शक्ति की ओर संकेत है, जो मुख्यतः पशुपालन सम्बन्धी देवता के रूप मे अभिव्यक्त होती है । उसके रथ में बकरे जोते जाते हैं और वह अंकुश धारण किये हुए होता है । गगन मार्ग से परिचित होने के कारण वह प्रेतात्माओ को पितरो के पास पहुंचाता है । वह मार्गों का सरक्षक है, वह कल्याणमयी शक्ति का परिचय देता है और वहो मर्त्य प्राणियो को लोकान्तर में सुखमय स्थानों पर पहुँचने के लिये पथ प्रदर्शित करता है । संख्या की दृष्टि से निर्णय किया जाय तो विष्णु तुरीय श्रेणी के देवता प्रतीत होते है । कारण, ऋग्वेद में उनकी स्तुति सूर्य, सविता और पूषा की अपेक्षा कम की गई है, किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से वह सौर मण्डल में सबसे अधिक महत्त्व के देवता है । वर्तमान हिन्दू धर्म के दो बडे देवताओ मे उनकी गणना है । उनके स्वरूप की यह एक विशेषता है कि वे त्रिविक्रम है, जो निःसन्देह विश्व के तीन लोको मे संचरण करने वाले सूर्य का प्रतीक है । इसका सबसे ऊँचा पदक्रम स्वर्ग है, जहाँ देवता और पितृगण निवास करते है । इस स्थान की प्राप्ति के लिये ऋग्वेद के ऋषि ने निम्नलिखित शब्दों में अपनी अभिलाषा प्रकट की है— 'तदस्य प्रियमभि ० ' । मूलतः विष्णु की कल्पना सूर्यरूप में ही प्रचलित हुई थी । यह उसका सामान्य रूप न था, परन्तु वह रूप लाक्षणिक था, जिसके द्वारा अपने लम्बे-लम्बे पदक्रमो के बल पर वह त्रिलोकी में द्रुत गति से परिभ्रमण करता है । कई सूक्तो में तो यह भी कहा है कि उसने मानव हित के लिये तीन कदम उठाये थे । इसी स्वरूप को लेकर ब्राह्मण ग्रंथों में एक आख्यान कहा है, जिसमें विष्णु ने वामन का रूप धारण कर तीन पदक्रम के द्वारा पृथ्वी को दानवो के अधिकार से मुक्त किया था । संसार के पालनकर्ता विष्णु का यह रूप वेदोत्तर पुराणो में अवतारवाद का आधार बनकर विकसित हुआ । भगवान् विष्णु मानव कल्याण के लिये अनेक बार भूमि पर अवतार लेते हुए बताये गये है ' (पृ ० ६७-६८) । यह कथन भी ठीक नही है, सूर्य के अन्तर्यामी परमेश्वर को ही वेद में विष्णु के रूप में वर्णित किया है । इसी का विस्तार ब्राह्मण ग्रंथों ने भी किया है, अतः सूर्य ही विष्णु के प्रतीक माने जाते है । यद्यपि इन्द्रादि की स्तुति करने वाले सूक्तों को अपेक्षा से विष्णु की स्तुति करने वाले सूक्तो की संख्या थोडी है, तो भी जैसे एक ही सावित्री मन्त्र से तीन ही व्याहृतियो से और एक ही प्रणव से परमार्थ तत्त्व का निरूपण सम्पूर्ण हो जाता है, उसी तरह से कुछ ही सूक्तों से और कुछ ही मन्त्रो से विष्णु का अन्य
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वेदार्थपारिजात: १०७६ यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥' (ऋ० स० १।१५४१ १ ), (प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥ ' (ऋ० सं ० १।१५४।२) हे नराः, विष्णोर्व्यापनशीलस्य देवस्य वीर्याणि वीरकर्माणि नुक अतिशीघ्र प्रवोच प्रब्रवीमि । यद्यप्यत्र 'नु कम्' इति - पदद्वयम्, तथापि यास्केन नवोत्तराणि पदानि ( नि ० ३।१३ ) इत्युक्तत्वात् शाखान्तरे एकत्वेन पाठाच्च न इत्येतस्मिन्नर्थे नुकम् इति पदद्वयम् 1। कानि तानि वीर्याणीति तत्राह -यः विष्णुः पार्थिवानि पृथिवीसम्बन्धीनि रजासि रञ्जनात्म- कानि क्षित्यादिलोकत्रयाभिमानीन्यग्निवाय्वादित्यरूपाणि रजांसि विममे विशेषेण निर्ममे । अत्र त्रयो लोका अपि पृथिवीशब्दवाच्या: । 'यदिन्द्राग्नी अवमस्यां पृथिव्या मध्यमस्या परमस्यामुत स्थ. ।' (ऋ ० सं ० ११०८/ ९ ) योऽस्यां पृथिव्यामस्या इत्युपक्रम्य 'यो द्वितीयस्यां तृतीयस्यां पृथिव्या' ( तै ० स ० १ २ | १२ | १ ) इति मन्त्रयोः पृथिव्यामेव अवमो मध्यमः परम इति लोकत्रयमन्तर्भवति । तस्माल्लोकत्रयस्य पृथिवीशब्दवाच्यत्व युक्तमेव । यश्च विष्णुः उत्तरम् उद्गततरम् अतिविस्तीर्णं सधस्थं सहस्थानं लोकत्रयाश्रयभूतमन्तरिक्षम् अस्कभायत् तेषामाघारत्वेन स्तम्भितवान्, निर्मितवानित्यर्थः । अनेनान्तरिक्षाश्रित लोकत्रयमपि सृष्टवानित्युक्तं भवति । यद्वा यो विष्णुः पार्थिवानि पृथिवी- सम्बन्धीनि रजांसि पृथिव्या अधस्तात् लोकान् विममे विविधं निर्मितवान् । रजःशब्दो लोकवाची, 'लोका रजांस्युच्यन्ते' इति यास्कोक्तेः । किञ्च यश्चोत्तरम् उद्गततरम् उत्तरभाविनं सधस्थं सहस्थानं पुण्यकृतां सहनिवासयोग्यं भूरादि- लोकं सप्रजम् अस्कभायत् स्कम्भितवान्, सृष्टवानित्यर्थः । स्कम्भेः 'स्तम्भुस्तुम्भु' इति विहितस्य रन: 'छन्दसि शायजपि', इति व्यत्ययेन शायजादेश: । अथवा पार्थिवानि पृथिवीनिमित्तकानि रजासि लोकान् विममे भूरादिलोकत्रयमित्यर्थः । भूम्यामुपार्जितकर्मभोगार्थत्वादितरलोकानां तत्कारणत्वम् । किञ्च यश्चोत्तरमुत्कृष्टतरं सर्वेषां लोकानामुपरि-,, भूतम् अपुनरावृत्तेस्तस्योत्कृष्टत्वम् । सधस्थम् उपासकानां सहस्थानं सत्यलोकमस्कभायत् स्कम्भितवान् ?, ध्रुवं स्थापितवानित्यर्थः । किं कुर्वन् त्रेधा विचक्रमाण त्रिप्रकारं स्वसृष्टान् विविधं क्रममाणः ॥ विष्णोस्त्रे- सभी देवताओं की अपेक्षा उत्कर्ष बोधित हो जाता है । जैसा कि 'विष्णोर्मुकं ० ' और 'प्र तद्विष्णु:० ' इन दो मन्त्रो से सूचित होता है । ---- इनका अर्थ यह है -' हे मनुष्यों, विष्णु अर्थात् व्यापनशील देव के पराक्रम से भरे हुए कार्यों का मैं अतिशीघ्र वर्णन कर रहा हूँ । यद्यपि यहाँ पर ' नु कम्' ये दो पद है, तो भी यास्क ने इनको एक ही माना है और शाखान्तर मे भी इनको एक ही माना है, अतः ' नहीं' इस अर्थ मे यहाँ पर ' नुकम्' इस पदद्वय का प्रयोग माना गया है । विष्णु के ये पराक्रम के कार्य क्या है? इसके उत्तर में कहा गया है— जो विष्णु पृथिवी संबन्धी रंजनात्मक, पृथिवी प्रभृति लोकत्रय के अभिमानी अग्नि, वायु और आदित्य रूप रज को विशेष रूप से निर्मित करता है । यहां पर पृथिवी शब्द से तीनो लोकों का बोध होता है । 'यदिन्द्राग्नी० ' इस ऋग्वेद की ऋचा में वर्णित पृथिवी को उपक्रम में रखकर तैत्तिरीय श्रुति के दो मन्त्रों मे पृथिवी मे ही मध्यम और उत्तम लोक का भी अन्तर्भाव माना गया है । इस तरह से पृथिवी शब्द को लोकत्रय का वाचक मानना ठीक ही है । जो विष्णु अति विस्तीर्ण लोकत्रय के आश्रतभूत सहस्थान अन्तरिक्ष को उनके आधार के रूप में बनाता है । इससे यह अर्थ निकलता है कि विष्णु ने अन्तरिक्ष के आश्रित तीनों लोको की सृष्टि की है । अथवा इस मन्त्र का यह अर्थ भी हो सकता है -जिस विष्णु ने पृथिवी सम्बन्धी रजों को, पृथिवी के नीचे विद्यमान नाना लोकों की नाना प्रकार की सृष्टि की । यहीं पर रज शब्द का अर्थ लोक है । यास्क ने यह निरुक्ति स्वीकार की है । जिस विष्णु ने उत्तर, उद्गततर अर्थात् उत्तरभावी सहस्थान, प्राणवान् पुरुषों के निवास योग्य भू प्रभृति लोकों की, उनमें निवास करने वाली प्रजा के साथ सृष्टि की है । यहाँ पर स्कम्भ धातु से 'स्तम्भुस्तुम्भु० ' इस सूत्र से विहित श्र प्रत्यय का ' छन्दसि शायजपि' इस सूत्र के द्वारा व्यत्यय और शायच् आदेश हो जाता है । अथवा पृथिवी निमित्तक लोक, भूरादि लोक की सृष्टि विष्णु ने की, यह इसका अर्थ होगा । भूमिलोक में उपार्जित कर्मों के भोग के लिये ही अन्य लोको की सृष्टि की जाती है, अतः उनकी कारणता मानी गई है । अपि च, जो उत्कृष्टतर अर्थात् सभी लोकों के ऊपर विद्यमान है । यह विष्णुलोक इसलिये उत्कृष्टतर है कि वहाँ गया व्यक्ति पुनः लौटकर नही आता । यह विष्णुलोक उपासको का सहस्थान, सत्यलोक है, विष्णु ने इसको निश्चल स्थान के रूप में स्थिर किया है । ऐसा उसने कब किया? उस
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वेदार्थपारिजातः १०७७ ' ( ), धाक्रमणम् इदं विष्णुर्विचक्रमे ऋ ० सं ० १।२२।१७ इति श्रुतिप्रसिद्धम् । अत एवोरुगायः उरुभिर्महद्भिर्गीयमानः अतिप्रभूतं गीयमानो वा । य एवं कृतवान् तादृशस्य विष्णोर्वीर्याणि प्रवोचम् । एवमनेन मन्त्रेण विष्णोः सर्वकारणत्वम्, , तत्प्राप्ते पुनरावृत्तिहेतुत्वात् । निरतिशयमहत्त्व व्यापकत्वं च विष्णोरेव सम्भवति अग्निवाय्वादिपृथिव्यन्तरिक्ष- लोकादिनिर्मातृत्वात् । तदेतदविज्ञायैव मैकडानलादयः पाश्चात्त्या विष्णोः साधारण्य प्रलपन्ति । यस्येति वक्ष्यमाणत्वात् स इत्यध्याहर्तव्यम् । स महानुभावो वीर्येण स्वकीयेन वीरकर्मणा पूर्वोक्तन स्तवते स्तूयते सर्वैः । कर्मणि व्यत्ययेन शप् । वीर्येण स्तूयमानत्वे दृष्टान्तः -मृगो न सिंहादिरिव यथा स्वविरोधिनो मृगयिता सिंहो भीमो भीतिजनकः कुचरः कुत्सितहिसाकर्ता दुर्गमप्रदेशगन्ता वा गिरिष्ठाः पर्वताद्युन्नत प्रदेशस्थायी सर्वेः स्तूयते, तद्वदयमपि मृगोऽन्वेष्टा शत्रूणा भीमो भयानकः, 'भीषास्माद्वात. पवते भीषोदेति सूर्य:' ( तै ०आ ० ८| ८| १ ) इति श्रुतेः । कुचरः शत्रुवधादिकुत्सितकर्मकर्ता, कुषु सर्वासु भूमिषु लोकत्रये सञ्चारी वा । तथा गिरिष्ठाः गिरि मन्त्रादि- रूपायां वाचि सर्वदा वर्तमान. । ईदृशोऽयं स्वमहिम्ना स्तूयते । किञ्च यस्य विष्णोः, उरुषु विस्तीर्णेषु त्रिसंख्याकेषु विक्रमणेषु पादप्रक्षेपेषु विश्वा सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि अधिक्षियन्ति आश्रित्य निवसन्ति स विष्णुः स्तूयते । 'प्र विष्णवे शूषमेतु मन्म गिरिक्षिते उरुगायाय वृष्णे । य इदं दीर्घं प्रयतं सधस्थमेको विममे त्रिभिरित्प- देभिः ॥' (ऋ० स ० १।१५४| ३ ) विष्णवे सर्वव्यापकाय शुषम् अस्मत्कृत्यादिजन्यं वलं महत्त्वं मन्म मननं स्तोत्रं मननीयं शूषं बल वा विष्णुमेतु प्राप्नोतु । कर्मणः सम्प्रदानत्वाच्चतुर्थी । कीदृशाय विष्णवे? गिरिक्षिते वाचि गिरिव- दुन्नतप्रदेशे वा तिष्ठते, उरुगायाय बहुभिर्गीयमानाय, वृष्णे वर्षित्रे कामानाम्, एवं महानुभावं शूषं बलं प्राप्नोतु । तथा समय किया, जब कि वह अपनी सृष्टि को तीन पैरो से नाप रहा था । विष्णु का यह तीन उग से संसार को नापना ' इदं विष्णुर्विचक्रमे' इस श्रुति में प्रसिद्ध है । इसीलिये इस विष्णु की स्तुति हृदय से निकलती है, अथवा इसकी प्रभूत स्तुति की जाती है । जिसने ऐसा किया, उस विष्णु के पराक्रम का मैं वर्णन कर रहा हूँ । इस तरह से इस मन्त्र से विष्णु की सर्वकारणता प्रतिपादित है, क्योकि उसकी एक बार प्राप्ति हो जाने पर प्राणी की पुनरावृत्ति नही होती, पुनः जन्म नही लेना पड़ता । इस तरह से निरतिशय महत्त्व और व्यापकत्व विष्णु में ही संभव हो सकता हैं, क्योकि वही अग्नि, वायु प्रभृति और पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक प्रभूति का निर्माता है । इन सब बातों को जाने बिना ही मैकडानल प्रभृति पाश्र्वात्य विद्वान् विष्णु को साधारण देवता मानने लगते है । 'प्र तद्विष्णु:० ' इस मन्त्र मे ' यस्य' पद कहा गया है, अतः यहाँ पर 'सः' पद का अध्याहार करना पड़ता है । वह महानुभाव विष्णु अपने पूर्ववणित पराक्रम के आधार पर सबकी स्तुति का पात्र बनता है । यहीं पर व्यत्यय के द्वारा कर्म में यप् प्रत्यय का विधान माना जाता है । अपने पराक्रम के कारण इसकी स्तुति कैसे होती है, इसको दृष्टान्त के द्वारा समझाया गया है— जैसे अपने विरोधियो को ढूंढने वाला सिंह बडा भयंकर होता है, वह बडी निर्दयता से किसी को भी मार डालता है, दुर्गम स्थानों में भी पहुंच जाता है और पर्वत आदि उन्नत स्थानों में गुफा आदि मे रहता है, इसीलिये उसकी सब स्तुति करते है, उसी तरह से यह विष्णु भी दुष्ट जनो को ढूंढता रहता है और उनके लिये भयजनक माना जाता है, ' इसी के डर से पवन नित्य प्रति बहता रहता है और सूर्य प्रति दिन उगता है' यह श्रुति इस बात मे प्रमाण है । यह विष्णु कुचर इसलिये कहलाता है कि शत्रुवध जैसे कुत्सित कार्य को वह करता है, अथवा सभी भूमियों में, सभी लोकों में यह संचरण करता है । यह गिरिष्ठा इसलिये कहलाता है कि मन्त्रादि के रूप में विद्यमान वाणी में यह सदा निवास करता है । इस तरह की अनेक महिमाओ से मण्डित इस विष्णु की स्तुति की जाती है । अपि च, इस विष्णु के विस्तीर्ण तीन पदक्रमों से यह सारा विश्व, सारे भुवन और उनमें निवास करने वाले प्राणी वर्ग नाप लिये जाते है, अर्थात् उन तीन पदक्रमों में ये सब अवस्थित हैं, इसलिये इस विष्णु की स्तुति की जाती है । 'प्र विष्णवे ० ' विष्णु की स्तुति में कही गई यह तीसरी ऋचा है । इसका अर्थ यह है-'हमारे द्वारा किये गये सत्कार्यो से उत्पन्न बल, महत्व, मननीय स्तोत्र आदि उस सर्वव्यापक विष्णु को प्राप्त हो । कर्म का सम्प्रदान होने से यहाँ चतुर्थी विभक्ति का विधान हुआ है । यह विष्णु कैसा है? वह वाणी अथवा पर्वत सदृश उन्नत प्रदेश में निवास करता है । उसकी सब लोग स्तुति करते हैं ।
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१०७८ वेवार्थपारिजातः च रामायणं 'प्रव्याहरत विश्रब्धं बलं विष्णोः प्रवर्धताम्' ( वा० रा ० ७ ) । कोऽस्य विशेष इत्युच्यते-यः विष्णुः इदं प्रसिद्धं दृश्यमान दीर्घम् अतिविस्तृतं प्रयतं नियतं सधस्थं लोकत्रय एकः इत् एवाद्वितीयः सन् त्रिभिः पदेभिः पादैः विममे विशेषेण निर्मितवान् । 'यस्य त्री पूर्णा मधुना पदान्यक्षीयमाणो स्वधया मदन्ति ॥ य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यासेको दाधार भुवनानि विश्वा ॥ ' (ऋ० सं० ११ १५४ । ४ ) यस्य विष्णोः मधुना मधुरेण दिव्येनामृतेन पूर्णा पूर्णानि त्रीणि पदानि पादप्रक्षेपाणि, अक्षीयमाणा अक्षीयमाणानि, स्वधया अन्नेन मदन्ति मादयन्ति तदाश्रितजनान्, य उ य एव पृथिवी प्रख्याती भूमिं द्यां द्योतनात्मकमन्तरिक्षं विश्वा भुवनानि सर्वाणि भूतजातानि चतुर्दश लोकांश्च यद्वा पृथिवीशब्देन अधोवर्तीन्यतलवितलादिसप्तभुवनानि शब्देन तदवान्तराणि एवं चतुर्दशलोकान् विश्वा भुवनानि सर्वाण्यपि तत्रत्यानि भूतजातानि त्रिधातु त्रयाणां धातूनां समाहारस्त्रिधातु पृथिव्यप्तेजोरूपधातुत्रयविशिष्टं यथा भवति तथा दाधार ,, ' ' घतवान् तुजादित्वादभ्यासस्य दीर्घत्वम् उत्पादितवान् त्रिवृतं कृतवान् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि (छा० उ० ६।३।२) इति श्रुतेः । 'तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति' ( ऋ० सं ० १ । १५४।५) । अस्य महतो विष्णोः प्रियं प्रियभूतं तत् सर्वं सेव्यत्वेन प्रसिद्धं पाथः अन्तरिक्षनामैतत् । पाथोऽन्तरिक्षम्, पथा व्याख्यातत्वात् ( नि ० ६।७ ) इति यास्कोक्त: । अविनश्वरं ब्रह्मलोकमित्यर्थः । अस्यां व्याप्नुयाम् । तदेव विशेष्यते -यत्र स्थाने देवयवः देवं द्योतन-स्वभावं विष्णुमात्मन इच्छन्तो यज्ञदानादिभिः प्राप्तुमिच्छन्तः नरो मनुष्या मदन्ति तृप्तिमनुभवन्ति, तदश्या-मित्यन्वयः । पुनः कीदृशम्? उरुक्रमस्यात्यधिकं सर्वं जगदाक्रममाणस्य तत्तदात्मना अत एव विष्णोर्व्यापकस्य परमेश्वरस्य परमे उत्कृष्टे निरतिशये केवलसुखात्मके पदे स्थाने मध्वः मधुरस्य उत्सः निष्यन्दो वर्तते तदश्याम् । यत्र क्षुत्तृष्णा- वह सबकी कामनाओ को पूरा करनेवाला है । इस तरह के उस महानुभाव को बल प्राप्त हो । इस बात को रामायण मे भी कहा गया है - ' विष्णु का बल बढे इस बात को आप लोग विश्वास पूर्वक, निश्चिन्तता से कहे' । इसकी ऐसी क्या विशेषता है? यह है कि इस विष्णु ने परिदृश्यमान इस प्रसिद्ध, अतिविस्तृत, नियत स्थानवाली त्रिलोकी को अकेले ही, बिना किसी की सहायता से तीन डग से भलीभांति नाप लिया है । ' यस्य श्री पूर्णा० ' जिस विष्णु के मधुर, दिव्य अमृत से परिपूर्ण तीन डग अक्षय स्वधा, अन्न के रूप में उसके आश्रित जनों को सदा सन्तुष्ट रखते हैं और जो इस प्रसिद्ध पृथिवी को, द्योतनात्मक अन्तरिक्ष को तथा सभी प्राणियों और चौदह भुवनों को; अथवा पृथिवीपद से अतल, वितल आदि अधोवर्ती सात भुवनो का और खुशब्द से ऊपर के सात भुवनों का ग्रहण करना चाहिये, इस तरह से चोदह लोक और उनमें रहनेवाले समस्त प्राणियों को तीन धातु अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन धातुओ की विशिष्ट निर्मिति धारण करता है, तुजादि में पाठ होने से यहाँ ( दाधार ) अभ्यास का दीर्घ हुआ है, त्रिवृत्करण प्रक्रिया के आधार पर उत्पादित करताके रूप हैमें, 'तासा त्रिवृतं ० ' यह छान्दोग्य श्रुति इसमे प्रमाण है' । 'तदस्य प्रियमभि पाथो० ' इस महान् विष्णु का प्रिय वह सर्वजन सेवनीय प्रसिद्ध मार्ग, 'पाथ' यह अन्तरिक्ष का नाम है, यास्क ने इसी अर्थ में इसकी व्याख्या की है, अर्थात् अविनश्वर ब्रह्मलोक है, उसको मैं प्राप्त कर सकूं । उसी स्थान का विशेष वर्णन इस तरह से किया जाता है - उस स्थान में द्योतन स्वभाव विष्णु की प्राप्ति की इच्छा से यज्ञ दानादि का अनुष्ठान करनेवालेरूप से मनुष्य आनन्दपूर्वक रहते हुए तृप्ति का अनुभव करते हैं । यह स्थान पुनः कैसा है? इस सारे जगत् के तत्तदात्मना अधिष्ठाता,,,परमेश्वर विष्णु के इस परम उत्कृष्ट केवल निरतिशय सुखात्मक स्थान में मधुर रस सदा बहता रहता है व्यापकइसका अभिप्राय यह है कि इस विष्णुलोक में क्षुधा तृषा, जरा-मरण, पुनरावृत्ति आदि का कोई भय नही है,, संकल्पउसको मैं प्राप्त कर सकूँ । अमृत की नहरें आदि भोग सुलभ है । इससे बढ कर और कोई स्थान नही है, इस बात को इस तरह से कहा गया हैके अनुसार यहाँ पर - इस तरह से वह
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वदामपारिजातः , " १०७६ जरामरणपुनरावृत्त्यादिभयं नास्ति सङ्कल्पमात्रेणा मृतकुल्यादिभोगाः प्राप्यन्ते तादृशमित्यर्थः । ततोऽधिकं नास्तीत्याह - इत्था इत्थमुक्तप्रकारेण स हि बन्धुः स खलु सर्वेषां सुकृतिना बन्धुः बन्धुभूतो हितकरः, तस्य पद प्राप्त- वतामपुनरावृत्तेः । 'न च उ स पुनरावर्तते ' इति श्रुतेः । हिशब्दः सर्वश्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासादिप्रसिद्धिद्योतनार्थः । 'ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ||' (ऋ० सं० १।१५४।६ ) | सोमवाजपेययज्ञे बिनियुक्तत्वाद् हे पत्नीयजमानो, वा युष्मदर्थं तानि गन्तव्यत्वेन प्रसिद्धानि वास्तूनि सुखनिवासयोग्यानि स्थानानि गमध्ये युवयोर्गमनायोश्मसि कामयामहे तदर्थं विष्णुं प्रार्थयामहे | तानि कानि? यत्र येषु वास्तुषु गावो घेनवो रश्मयो वा भूरिशृङ्गा अत्यन्तोन्नत्युपेता भूरिभिराश्रयणीया वा अयासः अयना गन्तारोऽतिविस्तृताः । यद्वा यासो गन्तारः अतादृशा अत्यन्तप्रकाशयुक्ताः स्थिराः । अत्राह - अत्र खलु वस्त्वा- धारभूते द्युलोके उरुगायस्य महात्मभिर्गातव्यस्य स्तुत्यस्य वृष्णः सर्वकामप्रदस्य विष्णोस्तत्तादृश पुराणेषु गन्तव्यत्वेन प्रसिद्धं परमं निरतिशय पदं स्थान भूरि अतिप्रभूतमवभाति स्वमहिम्ना स्फुरति । किं बहुना, एकैकेन मन्त्रेणानितर- साधारणेन विष्णोः परमेश्वरत्वमेव स्फुटमुक्तम् । सर्वप्रपञ्चजन्मस्थितिलयकारणत्वमेव ब्रह्मणो लक्षणं वेदान्तेषु ' ' ( | | ), ' ' ( | | ) प्रसिद्धम् । आकाशस्तल्लिङ्गात् ब्र० सू० १ १ २२ प्राणस्तथानुगमात् ब्र ० सू० १ १ २८ इत्यादिषु तद्ब्रह्मलक्षणयोगित्वेन आकाशप्राणादिशब्दानामपि भूतभौतिकाकाशप्राणपरत्वमपनोद्य ब्रह्मपरत्वमुपपादितम् । तथंव शिवविष्ण्वादिशब्दानामपि ब्रह्मपरत्वमेव मन्तव्यम्, तल्लिङ्गन्यायात् । यदपि च - 'उषसूदेवताया लैटिनभाषागतेन अरोराशब्देन ग्रीकशब्देन ' ई ओस' इत्यनेन च पर्यायत्वमुक्तम्, तदपि न किञ्चित्, लैटिनग्रीकभाषागतयोस्तयोः कालविशेषपरत्वेऽपि देवताविशेषपरत्वाभावेन पर्यायत्वायोगात् । ' सुन्दरीकन्यकारूपेण उषसुदेवताया वर्णनम्, सा च दिवः पुत्री । श्यामाया रजन्याः भगिनी, सा प्रणयिसूर्यप्रभया देदीप्यमाना सूर्येणानुगम्यमाना गोरथेनाश्वरथेन वा गच्छति । सा चान्धकारं भूतप्रेतादीश्चापस्तरयति । सा च प्रत्येकं विष्णु सबका बन्धु है, सभी पुण्यकर्मा व्यक्तियों का हित - संपादक है," क्योकि जो व्यक्ति उस स्थान तक पहुँच जाता है, उसकी पुनरावृत्ति नही होती । 'न च उ स पुनरावर्तते' इस श्रुति में भी यही बात कही गई है । यहाँ पर हि शब्द इस बात को सूचित करने के लिए दिया गया है कि यह बात श्रुति, स्मृति पुराण, इतिहास आदि में सर्वत्र प्रसिद्ध है ' । 'ता वा वास्तू० ' यह मन्त्र सोम वाजपेय में विनियुक्त है । यहाँ पर यजमान और उसकी पत्नी को संबोधित करके कहा जाता है कि हम ऋत्विग् गण आप लोगो को उन प्रसिद्ध सुखपूर्वक निवास करने योग्य स्थानो की प्राप्ति हो, इसके लिये कामना करते हैं, विष्णु से प्रार्थना करते है । वे लोक कैसे हैं? वहाँ, उन लोको में बडे-बडे सींग वाली गायें अथवा अनेक व्यक्तियों के द्वारा आश्रयणीय ज्ञान की किरणें चारो तरफ विचरण करती रहती है । अथवा 'अयासः' पद का अर्थ गाये स्थिर रूप में और ज्ञान की किरणें अत्यन्त प्रकाश के साथ वहां रहती है । सभी भुवनो और प्राणियो के आधारभूत इस द्युलोक मे महात्माओं के द्वारा स्तवनीय, सभी कामनाओं को पूरी करने वाले उस विष्णु का पुराण-प्रसिद्ध वह निरतिशय उत्कृष्ट स्थान अपनी महान् महिमा से प्रकाशित होता रहता है । अधिक उद्धरण देने से क्या लाभ है? यहाँ उद्धृत प्रत्येक मन्त्र में विष्णु का अनितर साधारण, ( अन्यत्र दुर्लभ ) पारमैश्वर्य स्पष्ट प्रतीत होता है । सारे प्रपंच के जन्म, स्थिति और लय का कारण ही ब्रह्म का लक्षण वेदान्त शास्त्र मे प्रसिद्ध है । 'आकाशस्तल्लिङ्गात्', 'प्राणस्तथानुगमात् इत्यादि सूत्रों मे ब्रह्म के लक्षण का अनुगम होने से ही आकाश, प्राण प्रभूति शब्दों में भूत, भौतिक आकाश, प्राण आदि की वाचकता न मानकर उनकी ब्रह्मपरता का प्रतिपादन किया गया है, उसी न्याय से शिव, विष्णु प्रभूति शब्दो के विषय में भी समझना चाहिये । मैकडानल ने उषा देवता की लैटिन भाषा के ' अरोरा' तथा ग्रीक ' ईमोस' से तुलना की है ( स ० ६८ ), यह भी गलत है, क्योंकि लैटिन और ग्रीक भाषा के उक्त दोनो शब्द केवल कालविशेष के वाचक है, देवताविशेष के नही, तब उनकी पर्यायता कैसे मानी जा सकती है? द्योः की पुत्री उषा देवी एक परम सुन्दरी कन्या है ॥ उसका जन्म आकाश में हुआ और वह श्याम रजनी की भास्वर भगिनी है । वह अपने प्रणयी सूर्य की प्रभा से देदीप्यमान होती है । सूर्य उसी के मार्ग का अनुसरण करता है और किसी
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१०८० वेदाय पारिजातः वस्तुनो जीवनं प्राणश्च । तत्सत्तयैव पक्षिणो नीडेभ्य आहारार्थमुत्पतन्ति । मानवा भोजनार्थं मुपगच्छन्ति । मधुर- स्वराणां रम्यगीतानां जनयित्री सा प्रतिदिन सङ्केतितस्थानेष्वेव व्यज्यते । सा दैवीशक्तिपरिचिता प्राचीनकाल- बदद्य द्योतते, भविष्यकाले च द्योतिष्यते । अत्रैवानेके सुक्तमन्त्रा उद्धृताः । मन्त्राणां तु बाह्या उत्ताना एवार्था अवगताः । तेषु केचन मन्त्रा व्याख्यायन्ते । ' इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागात् चित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विभ्वा । यथा प्रसूता सवितुः सवाय एवा रात्र्युषसे योनिमारैक् ॥ ' (ऋ० सं ० १।११३।१ ) प्रातरनुवाके उषस्ये ऋतो त्रष्टुभे छन्दस्येतत् सूक्तम् । ज्योतिषां ग्रहनक्षत्रादीनां मध्ये इदं उषआख्यं ज्योतिः प्रशस्यतमम् । अस्य कोऽतिशय इत्याह -नक्षत्रादिकं ज्योतिः स्वात्मानमेव प्रकाशयति नान्यत् । चन्द्रस्तु यद्यप्यन्यदपि प्रकाशयति, तथापि न विस्पष्टप्रकाशः । औषस तु ज्योतिर्युगपदेव सर्वस्य जगतोऽन्धकारनिराकरणेन विशेषेण प्रकाशकम् । अतः प्रशस्यतमम् । तादृश ज्योतिरागात्, पूर्वस्यां दिशीति शेषः । आगते च तस्मिन् चित्रः चायनीयः प्रकेतः अन्धकारावृतस्य सर्वस्य पदार्थस्य प्रज्ञापकः, तदीयो रश्मिः विस्वा विभुर्व्याप्तः सन् अजनिष्ट । किच, यथा रात्रिः स्वयं सवितुः सूर्यसकाशात् प्रसूत उत्पन्नः । सूर्यो हि अस्तं यत् रात्रि जनयति तस्मिन्ननस्तमिते रात्रेरुत्पत्त्यभावात् । एवमेव रात्रिरपि उषसे सवाय उषस उत्पत्तये तदर्थं योनि स्थानं स्वकीयापरभागलक्षणम् आर्रक् आरेचितवती कल्पितवती । यद्वा प्रसूता रात्रिसकाशादुत्पन्नोषा सवितुः सूर्यस्य सवाय प्रसवाय जन्मने यथा भवति, एवं रात्रिरप्युषसो यज्जन्म तदर्थं स्वापरभागलक्षणं स्थानं कृतवती । यत्तु 'सा कालत्रये देदीप्यमानत्वादजरामरा च' इति, तदसत् प्रवाहरूपेण नित्यत्वेऽपि व्यक्तिशः क्षणभङ्गुरत्वाविशेषात् । तदधिष्ठातृचैतन्यरूपेण त्वजरामरत्वमेव । नवयुवा की भांति उस कन्या के पीछे लग जाता है । वह एक चमकीले रथ में बैठकर निकलती है, जिसमें लाल घोडे या बैल जोते जाते है । वह रजनी के अन्धकार को दूर करती है और भूत-प्रेत आदि नीच योनि के जीवो को भगाती है । संक्षेपतः, वह प्रत्येक वस्तु का जीवन एवं प्राण है । उषा के उदित होने पर पक्षी अपने- अपने घोसलो से उडते हैं और मानव अपने भोजन की तैयारी के लिये उद्यत होता है । वह मधुर स्वरों को छेडतो है । वह रम्य गीतो की जननी हैं । वह दिन-प्रतिदिन संकेतित स्थान पर प्रकट होती है । वह देवी शक्ति से भली -भांति परिचित है । जिस तरह वह प्राचीनकाल मे चमकती थी, उसी तरह आज भी चमकती है और भविष्य में भी चमकती रहेगी' ( पृ ० ६ ९-७० ) । यही पर अनेक सूक्त-मन्त्र उद्धृत है । उनके अर्थ भी पहले के जैसे ही ऊपरी सतह के एवं अस्त-व्यस्त हैं । उनमें से कुछ मन्त्रों की सही व्याख्या यहाँ प्रस्तुत की जाती है- 'इद श्रेष्ठं ज्योतिषा ज्योति०' इत्यादि मन्त्र प्रातरनुवाक मे उषा सम्बन्धी क्रतु मे विनियुक्त है । पूरे सूक्त मे त्रिष्टुप् छन्द है । यह, नक्षत्र आदि ज्योतियों के बीच में यह उषा नामक ज्योति सबसे अधिक प्रशस्य है । इसकी क्या विशेषता है? यह कि नक्षत्र आदि ज्योति केवल अपने को प्रकाशित करती है, दूसरे को नही । चन्द्रमा यद्यपि अन्य वस्तुओं को भी प्रकाशित करता है, किन्तु वह उनको स्पष्ट प्रकाशित नहीं कर पाता । इसके विपरीत यह उषा का प्रकाश एक साथ ही सारे जगत् के अन्धकार को दूर कर सभी वस्तुओं को भलीभांति प्रकाशित कर देता है । इसलिये इसको प्रशस्यतम कहा जाता है । इस तरह का यह प्रकाश पूर्व दिशा में आ गया है । इसके आ जाने से इसकी चित्र- विचित्र रश्मिय अन्धकार में डूबे सब पदार्थों को प्रकाशित कर देती है, ये रश्मियाँ सब जगह व्याप्त हो जाती है । ये रश्मिय स्वयं सूर्य से उत्पन्न होती है । सूर्य जब अस्त हो जाता है, तो वह रात्रि को पैदा करता है, क्योकि सूर्य के अस्त न होने तक रात्रि का आगमन नही हो सकता । इसी तरह से रात्रि भी उषा की उत्पत्ति के लिये अपने एक भाग के रूप में स्थान को परिकल्पना करती है । अथवा रात्रि से उत्पन्न हुई उषा सूर्य के प्रसव की जैसे सूचना देती है, उसी तरह रात्रि भी उषा के जन्म की सूचना देने के लिये अपने एक भाग को, स्थान को अलग कर देती है । 'वह उषा तीनों कालों में प्रकाशमान, अजर और अमर है ' ( पृ० ७० ) पर यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि उषा सम्बन्धी उक्त वर्णन में प्रवाहनित्यता की विद्यमानता में भी व्यक्तिशः प्रत्येक उषा क्षणभंगुर होती है । उस उषा की अधिष्ठातृ देवता में ही, जो कि चैतन्य स्वरूप है, अजरत्व और अमरत्व माना जा सकता है ।