वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 181–190

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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वेदार्थपारिजातः १०८१ 'समानो अध्वा स्वत्रोरनन्तस्तमन्यान्या चरतो देवशिष्टे । न मेथेते न तस्थतुः सुमेके नक्तोषासा समनसा पे ॥' ( ऋ ० स० १।११३.३ ) । स्वस्रोर्भगिन्यो. रात्र्युषसोः अध्वा सञ्चरणसाधनभूतो मार्ग: समान एक एव । आकाशमार्गेणोषा निर्गच्छति तेनैव रात्रिरपि 1। अनन्तोऽवमानरहितः । त मार्ग देवशिष्टे देवेन द्योतमानेन सूर्येणानु- हे सत्यो अन्याऽन्या एकैका चरतः क्रमेण गच्छतः । अपि च सुमेके शोभनमेहने सर्वेषामुत्पादकत्वात् शोभनप्रजनने पासा रात्रिरुषाश्च विरूपे तमःप्रकाशलक्षणाभ्या विरुद्धरूपाभ्या युक्ते अपि समनसासमानमनस्के ऐकमत्यं प्राप्ते न मेथेते परस्पर न हिस्तः । तथा न तस्थतु क्वचिदपि न तिष्ठतः । सर्वदा लोकानुग्रहार्थं गच्छतः । अन्यान्येति व्यतिहारे सर्वनाम्नो द्वे भवत इति वक्तव्यम् समासवच्च बहुलम् ( पा ० सू० ८1१ ) अभ्यशब्दस्य द्विर्भावः । सुष्ठु ययोस्ते सुमेके व्यत्ययेन हस्य ककारः । 'भास्वती नेत्री सूनृतानामचेति चित्रा वि दुरो न आव ॥ प्राय जगद्यु नो रायो अख्यदुषा अजीगर्मुवनानि ॥ (ऋ० स ० १।११३ | ४ ) । भास्वती विशिष्टप्रकाशनयुक्ता सूनृतानां वाचा नेत्री उत्पादयित्री । उषसः भवानन्तरमेव पशुपक्षिमृगादय. शब्द कुर्वन्ति । एवभूता उषा अचेति अस्माभिरज्ञायि । चित्रा चायनीया ज्ञाता । : दुर: द्वाराणि तमसा तिरोहितानि वि आवः व्यवृणोत् । यथास्माभिर्दृश्यन्ते तथा तमो निवार्य प्रकाशयतीत्यर्थः । च, जगत् सर्वं भुवन प्राप्यं प्रकाश गमयित्वा नः रायः धनानि वि अख्यत् विशिष्टप्रकाशयुक्तान्यकरोत् ॥ सैषा वा भुवनानि तमसा तिरोहितत्वेन अविद्यमानकल्पानि अजीगः उद्गिरति स्वमुखान्निर्गमयति स्वकीयेन प्रकाशन निःसार्य पुनरुत्पन्नानीव करोति । नेत्रीति प्रतीत्यभिप्रायेणोक्तिः । एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि व्युच्छन्ती युवतिः शुक्रवासाः । विश्वस्येशाना पार्थिवस्य वस्व उषो अद्येह व्युच्छ । ' (ऋ० सं ० १।१ ९ ३।७ ) । दिवो दुहिता दुहितृस्थानीया । तस्य हि पूर्वार्धे उषा उत्पद्यते । युवतिः 'समानो अध्वा० ' । रात्रि और उषा इन दोनो बहनो का चलने का रास्ता एक ही है । जिस आकाश मार्ग से उषा ती है, उसी मार्ग पर रात्रि भी चलती है । यह मार्ग अनन्त, अवसान रहित है । इस मार्ग पर ये दोनो देदीप्यमान स्वभाव सूर्य के सन पर ही एक-एक कर क्रम से चलती है । अपि च, ये उषा और रात्रि सभी वस्तुओं की प्रकाशिका, उत्पादिका मानी जाती सीलिये अपने परस्पर विरोधी तम और प्रकाश रूपी स्वभाव से युक्त हाती हुई भी ये अपनी समान मन स्थिति के आधार पर कभी को हानि नही पहुँचाती । हिंसक रूप में वे कही भी नही रहती । वे सदा लोककल्याण मे ही लगी रहती है । 'अन्यान्य ' यहाँ पर प्रतिहार में सर्वनाम का द्वित्व हो जाता है और वह प्राय समस्त पद माना जाता है । इस तरह से सूत्र और वार्तिक के आधार हाँ पर अन्य शब्द का द्विर्भाव हो जाता है । ' सुमेके ' इस पद की व्युत्पत्ति ' सुष्ठु मेह वाले' यह है । व्यत्यय के आधार पर यहाँ ह' के स्थान में ककार हो जाता है । ' भास्वती नेत्री०' । विशिष्ट प्रकाश से युक्त, मीठी वाणी की उत्पादयित्री उषा को हमने जान लिया है । उषा के प्रादुर्भाव द ही पशु, पक्षी, मृग आदि की ध्वनियाँ सुनाई पडती है । उस उषा को जब हम इस रूप में जान लेते है तो वह हमारे तम से द्वारो को खोल देती है । अर्थात् वह जब जगत् के सारे अन्धकार को दूर कर देती है, तो हम उन सब पदार्थों को देखने में समर्थ ते है । अपि च, यह उषा सारे जगत् को प्रकाशित करके हमारे लिये धन प्राप्ति के साधनों को भी विशेष रूप से बतला देती वह उषा तम, अन्धकार से ढके होने के कारण हमारे लिये न होने के बराबर विद्यमान विश्व के समस्त पदार्थों को प्रकाशित कर है, मानो अपने मुह मे से उनको निकाल रही हो । अपने प्रकाश से अन्धकार को दूर कर मानों यह उनको पुनः उत्पन्न कर देती नेत्री पद का अर्थ यहां प्रतीति है । 'एषा दिवो दुहिता०' । यह उषा आकाश की पुत्री के समान है, क्योंकि इसी आकाश के पूर्वार्ष में उषा उत्पन्न होती यह उषा पुरुषों को उनके किये हुए कर्मों का फल देने वाली है, अथवा नित्य योवन से युक्त है । यह श्वेत वस्त्र धारण किये हुए है, १३६

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वेदार्थपारिजातः १०८२ यावयित्री फलानां प्रापयित्री पुरुषः नित्ययोवनोपेता वा शुक्लवासाः श्वेतवसना निर्मलदीप्तिर्वा तथा विश्वस्य सर्वस्य पार्थिवस्य पृथिव्याः सम्बन्धिनो वस्वः घनस्य ईशाना ईश्वरी हे सुभगे शोभनधने उषः, अद्य अस्मिन् काले इहास्मिन् देवयजनदेशे व्युच्छ तमांसि विवासय वर्जयेत्यर्थः । 'उदीध्वं जीवो असुर्न आगादप प्रागात्तम आ ज्योतिरेति । आरेक् पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्त ( ) | आयुः ॥ ऋ ० सं ० १।१ ९ ३।१६ हे मनुष्या उदीर्ध्व शयनं परित्यज्योद्गच्छत । न अस्माकं असुः शरीरस्य प्रेरयिता जीव: आगात् तम अप प्रागात् अपक्रान्तम् । उषसः प्रकाशे सति सर्वजीवनव्यापारयोगः । तस्मात्परमात्मरूपतया स च जीवस्तदेव ज्योति: आ एति आगच्छति । सूर्याय सूर्यस्य पन्थां मार्ग आरैक् विविक्तीकरोति यातवे गमनाथ तस्मिन् देशे अगन्म गच्छामः, यत्र आयुरन्न प्रतिरन्ते उदारा दानेन वर्धयन्ति । प्रपूर्वस्तरतिर्वर्धनार्थः । यदपि - 'अश्विनोर्युगलदेवतारूपेण वर्णनम् । तावपि दिव पुत्रौ तरुणी सुन्दरो रथारूढी सूर्यकुमार्याः सूर्यायाः सहचरौ स्वर्णमयौ सुन्दरीकन्यकारूपे अरुणोदयवेलाया तो व्यज्येते । तदीयस्थे सज्जे उषसः प्रादुर्भावः । लोकरक्षकयोस्तयोरनेका गाथाः प्रसिद्धाः । आपत्काले विशेषतः समुद्रे नौयातॄणा रक्षको वैद्यौ अन्धपवो रक्षिचरण- दातारौ विश्पलाला लोहचरणसन्धातारौ पौत्रग्रीकपुराणवर्णित 'दिआस - क्यूरीझेउस' पुत्रेण तथा हेलनसम्बन्धिना प्रसिद्धाश्वारोहिभ्यां तुल्यौ अन्धकारप्रकाशवत्प्रदोषप्रतीको प्रातःसायगतनक्षत्रद्योतको' ( पृ० ७२-७३) इति, तदपि बाह्यार्थानुवादमात्रमेव, सिद्धान्ते तयोर्देवविशेषत्वेन कर्माङ्गत्वात् । आर्तजनोपास्यत्वाच्च परमात्माशभूतावेव, प्रातः- सवनेऽधंरात्रोत्तरवेलामारभ्याश्विनसूक्तैः प्रातर्यावत् स्तूयमानत्वात् ॥ च्यवनस्य वृद्धस्य यौवनदानेन तुग्रस्य भुज्योमहा+ जलयानस्य समुद्रात् स्वीयान्तरिक्षगामिन्या शतारित्रया दिव्यनावा परित्राणेन च प्रख्यातमाहात्म्यो । अथवा निर्मल दीप्ति वाली है । यह सम्पूर्ण पार्थिव धन की स्वामिनी है । ऐसी शोभन धन वाली हे उषे, आज इस समय इस यज्ञ स्थल में तुम सारे अन्धकार को दूर दो ॥ , ' ', उदी जीवो ० । हे मनुष्यो शय्या का परित्याग कर अब उठो । हमारे शरीर में प्राणो का संचार करने वाला अब आ गया है, अन्धकार दूर भाग गया है । उषा के प्रकाश होने के उपरान्त सारे प्राणियों में जीवन का संचार हो जाता है । इसलिये इसको परमात्मस्वरूप माना गया है । तो भी है यह जीव हो, किन्तु यह जीव ज्योतिर्मय है । उस ज्योतिर्मय जीव के आगमन का यहाँ वर्णन है । यह उषा आगे आकर सूर्य के आगमन के पथ को प्रशस्त करती है । हम भी उसी स्थान पर चलें, जहाँ पर उदार प्रकृति के दानी पुरुष दान के द्वारा अन्न की वृद्धि करते है । यहाँ पर प्र उपसर्ग पूर्वक तिरति धातु वर्धन के अर्थ में प्रयुक्त है । ' अश्विनी कुमार भी प्रात काल के युगल देवता है । वे भी द्यौ: के पुत्र है । वे सदा तरुण एवं सुन्दर रहते हैं । वे भी रथा-रूढ रहते है और सूर्यकुमारी सूर्या के सहचर है । उनका रथ सदा भास्वर है, जिसके अंग स्वर्णमय है । बड़े सबेरे ये देवता प्रकट होते है, जब कुछ अन्धेरा अरुण की किरणो में विद्यमान रहता है । उनका रथ तैयार होते ही उषा का आविर्भाव होता है । लोकरक्षक देवता के नाते अश्विन के सम्बन्ध में कई गाथाएँ प्रचलित है । वे सामान्य रूप से आपत्ति के समय सुरक्षा करते है, विशेष कर उनकी जो जहाजो पर समुद्र में यात्रा करते है वे देवताओ के वैद्य माने जाते है 1। वे अन्धे को आँख और पंगु को पैर देते है । एक अद्भुत कहानी इस सम्बन्ध में कही जाती है । उन्होंने विश्पला को लोहे का पैर लगा दिया था,, जब वह किसी द्वन्द्व में कट गया था । वे बहुत कुछ ग्रोक पुराणों में वर्णित डिऑक्सक्यूरी नामक झेउस के पुत्र तथा हेलन के दो प्रसिद्ध अश्वारोहियों से मिलते-जुलते हैं । युगल देवता की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दो सिद्धान्त संभावित है । एक यह कि ये युगल देवता कुछ अन्धकार और कुछ प्रकाश वाले प्रदोष के प्रतीक है । दूसरा यह कि प्रात' और सायंकाल के नक्षत्र के द्योतक है' (पृ० ७२-७३ ) । यह केवल ऊपरी अर्थं का अनुवाद मात्र है । सिद्धान्त में वे युगल देवता यज्ञ के अंग के रूप में स्वीकार किये गये है । आर्त जन इनकी उपासना करते है, अतः ये परमात्मा के अंशस्वरूप हैं । प्रातःसवन में अर्धरात्रि के उपरान्त प्रातःकाल पर्यन्त आश्विन सूक्तो से इनकी स्तुति की जाती है । च्यवन ऋषि को यौवन दिलाने के कारण तथा तुम भुज्यु के समुद्र में फँसे हुए महान् जलयान को अपनी अन्तरिक्षगामिनी सौ डांडे वाली दिव्य नाव से 'बचा लेने के कारण इनकी महिमा सर्वत्र प्रसिद्ध है ।

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वदार्थ पारिजात. १०८३ यदपि —' इन्द्रो वैदिकयुगे भारतवासिना राष्ट्रियदवतासीत्, ऋग्वदस्य चतुर्थाशभागंस्तस्य स्तूयमानत्वात् तन्माहात्म्यातिशयः स्फुट एव । स च पुरातनयुगादेव मानवरूपेण वर्णित । वायुमण्डलस्य सर्वप्रथम स पर्जन्यदेवः, अनावृष्टेरन्धकारस्य मूर्तरूपो यो वृत्रासुरस्त विजित्य स प्रख्याति लब्धवान् । इय कथा वैदिकमहर्षिभ्यः स्तुति-गाथाभ्योऽमितसामग्री प्रदत्तवती । वज्रमादाय प्रचुरमात्रया सोममापोय मरुद्भिः सहेन्द्रो दानवैर्युद्धयते । भीषणदेव-दानवसङ्ग्रामे वज्रेण वृत्र प्रहरति । तेन द्यावापृथिव्यौ प्रकम्पते । तस्थामाख्यायिकायामन्तनिहित भौतिकतत्त्वमेव वर्ण्यते । इन्द्रपराक्रमवर्णनप्रसङ्गे वात्याया भौतिक रूप क्वचिदेव वर्ण्यते । वर्षत इन्द्रस्य वर्णन नोपलभ्यते, किन्त्ववरुद्ध-जलस्य नदीनाच प्रवाहयितृत्वेनैव तच्छक्तिवर्णन दृश्यते । विद्युता प्रपात एव वज्रपातः । मेघाना गर्जनं गवा हम्भारवोऽसुराणा चोत्कारः । मेधानामनेकैर्नामभिरुल्लेखः क्वचिद् गवा क्वचिदूधसा क्वचिन्निर्झराणा क्वचिज्जल- पात्राणा क्वचित् पर्वतानां रूपेण वर्णनं दृश्यते । एते मेघपर्वता दानवाना पुराणि । दानवाना सख्यापि क्वचिन्नव तिरेकोन-शतं शतं वा । क्वचित् शारदरूपाणि क्वचिल्लोहमयानि पाषाणमयानि च मेघस्वरूपाणि पुराणि वर्ण्यन्ते । दशमे मण्डले तासामाख्यायिकाना संग्रहो लभ्यते । इन्द्रो वृत्र जघान, दुर्गाणि विभेद, नदीधाराः प्रवाहयामास पवतान् भित्त्वा स्वसहकारिभ्योऽनेका धेनूर्दत्तवान्, वृत्रकथागौरवादेवेन्द्रो वृत्रहोच्यते ' ( पृ ० ७३-७४ ) इति, तदपि बाह्यार्थज्ञानमात्र-विजृम्भितम् निरुक्तकारस्त्वाष्ट्रो वृत्रइत्येतिहासिक पक्षस्यापि वर्णनात् । यथा प्रकाशाधिष्ठातप्रकाशाधिष्ठातृचैतन्यात्मकोचैतन्यात्मको दव इन्द्रम्तथैवान्धकारावरोधाद्यधिष्ठातृशक्तिविशिष्टश्चेतनो वृत्रः । तयोश्च रोमहर्षण तुमुल युद्ध वेदेषु पुराणेतिहासादौ च बहुधा वर्णितम । तत्सम्बन्धिनोऽनेके मन्त्रा भूमिकायां व्याख्याता एव । 'इन्द्र वैदिक युग के भारतवासियो के लोकप्रिय एवं राष्ट्रीय देवता है । उनका महत्व इसी से स्पष्ट है कि ऋग्वेद की एक चतुर्थाश से अधिक भाग उनकी ही स्तुति में निबद्ध है । पुरातन युग से प्रचलित यह देवता क्रमश. अधिकाधिक मानव रूप को लिये हुए वर्णित है । सर्व प्रथम तो यह वायुमण्डल के पर्जन्य देव है, अनावृष्टि और अन्धकार के मूर्तरूप वृत्रासुर पर इन्होने विजय पाई है । इस कथा ने वैदिक ऋषियो को अपनी स्तुति गाथा के लिये अधिक सामग्री दो है । अपना वज्र लेकर, सोम रस का प्रचुर मात्रा मे पान कर, मरुत देवता का साथी इन्द्र सदा दानवों से युद्ध करने के लिये उद्यत हो जाता है । यह देव- दानव का संग्राम बड़ा भीषण होता है । जब इन्द्र अपने वज्र से वृक्ष की भाति वृत्र पर प्रहार करता है, तब स्वर्ग और पृथ्वी भय से प्रकम्पित हो जाते हैं । उनका वर्णन अनेक बार ऐसे युद्ध को करते हुए किया गया है । इस आख्यायिका मे जो प्राकृतिक तथ्य अन्तर्निहित है, उसका शाश्वत सन्दर्भ हमें मिलता है । इन्द्र के पराक्रमो का वर्णन करते हुए ऋषियों ने आंधी के समय भौतिक तत्त्वो का क्वचित् ही उल्लेख किया है । इन्द्र को वर्षा करते हुए बहुत ही कम बताया है । परन्तु अवरुद्ध जल अथवा नदियों को प्रवाहित करने की उनकी शक्ति का बहुधा वर्णन है । बिजली का कड़कना ही उसका वज्रपात है 1। मेघो की गर्जना गायो का रम्भाना अथवा असुरो का चीत्कार है । मेघो का नये नामो से उल्लेख है - कही गाय, कही ऊधस्, कही झरना और कही जलपात्र के रूप मे । अद्वियों ( पर्वत) का भी वर्णन है, जो इन्द्र के द्वारा विमोचित गायो को घेर लेते हैं । ऐसे पर्वतो का वर्णन पाया जाता है, जिनके शिखर से वहाँ के निवासी दानवों को इन्द्र नीचे गिराता है । वास्तव में ये पर्वत दानवो के पुर है । इन दानवो की संख्या ९ ०, ९९ या १०० है । उनका वर्णन विविध रूप में किया है । कही वे सदा गतिशील है, कही शारद रूप, तो कही लोहमय या पाषाणमय । ऋग्वेद के दशम मण्डल में उक्त आख्यायिका की सब बातो का संग्रह मिलता है । ' इन्द्र ने वृत्र को मारा, दुर्गों को तोडा, नदियों की धारा बहाई, पर्वतो का भेदन किया और अपने साथियो को अनेक गौ का दान दिया' । वृत्रकथा के गौरव के कारण इन्द्र का प्रमुख नाम वृत्रहण रक्खा गया' ( पृ० ७३-७४) । यह सब बातें भी केवल ऊपरी अर्थ को जानकर ही कही गई है । निरुक्तकार ने स्वष्टा के पुत्र वृत्र की ऐतिहासिक कथा की भी व्याख्या की है । जैसे प्रकाश के अधिष्ठाता चैतन्यात्मक देवता के रूप में इन्द्र का वर्णन है, उसी तरह से अन्धकार, अवरोध आदि शक्तियों से विशिष्ट चेतन के रूप में वृत्र वर्णित हैं । इन दोनों का रोमहर्षण, तुमुल युद्ध वेदो में और पुराणेतिहास ग्रन्थो में बहुधा वर्णित है । इन कथाओ से सम्बद्ध अनेक मन्त्रो को हम व्याख्या कर चुके है ।

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वेदार्थपारिजातः१०८४ -' यदपि अधिकाधिकमानवरूपेणेन्द्रस्य चरित्रचित्रणाद् यत्र तत्रानैतिकतालक्षणानि दृश्यन्ते । इन्द्रः क्वचित् स्वच्छन्दमाचरति । तेन पितरो हताः, उषसो रथो भग्नः, यश्च सोमपानव्यसन सोममदेनैव वीरविक्रमणायो-तेजितो भवति स्म । एकस्मिन् सूक्त सोमपानमदोन्मत्ततया स्वशौयं स्वयं वर्णयति । यद्यप्यत्र काव्यगुणा अत्यल्पा एव, तथापि मदोन्मत्तोन्मादस्य काव्यमय वर्णनसम्बन्ध्याद्योदाहरणत्वात् सविशेष रोचकम् । एतादृशोदाहरणाना नैतिकतां विचारयद्भिरेतत्तथ्यं न विस्मर्तव्यं यद्वैदिकैर्ऋ षिभिः सोमपानस्य धार्मिकमहत्ता स्वीकृता' ( पृ ० ७५-७६ ) इति, तदपि प्रमत्तप्रलपितम् त्वन्मतेन कस्यचिच्चेतनस्येन्द्रस्याभावेन वायुमण्डलीयवात्यादिरूपत्वे तस्य सोमपातृत्व- पितृहन्तृत्वाद्यसम्भवात् । सिद्धान्तरीत्या तु परमैश्वर्यशालिनो देवराजस्य ब्रह्मविद्वरिष्ठत्वेन लोकानुग्रहार्थ युद्धोपकरण- वत्त्वेन तज्जन्यमदस्य वर्णनीयत्वात् । सोमश्च लताविशेषो न मद्यमुपटीकते । कथञ्चित्तु मादकत्वस्यान्नादावपि दर्शनात् । पितृवधस्तु निर्मूल एव । इन्द्रस्य गोत्रमित्त्व तु पक्षवता पर्वताना पक्षभेतृत्वेन न तु पितृहन्तृत्वेन । यत्तु 'त्रिशीर्षत्वाष्ट्रवधोऽरुन्मुखयतीन् हत्वा शालावृकेभ्य प्रदानम्, यानि चाहल्यागमनादीनि कार्याणि तानि ब्रह्मविज्ञान-स्तुत्यर्थवादरूपाण्येव, ब्रह्मसूत्रे शास्त्रदृष्ट्यधिकरणे 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्', 'एष महिमा नित्यो ब्राह्मणस्य न हवं केन कर्मणाऽस्य लोको मोयते' इत्यादिवत् । क्वचित्विन्द्रपदेन मुख्य एवेश्वरोऽभिधीयते, 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' ( २।५।१५) इति बृहदारण्यकादी । देवराजः शतक्रतुरिन्द्रः परमैश्वर्यवान् वृत्रहन्ता नमुचिहन्ता ब्रह्म-विद्वरिष्ठो जीवन्मुक्तो यथेष्टचेष्टोऽपि मुक्त एव, युगपदनेकत्र यज्ञेषु रथेन सोमादिहविर्भागार्थं गच्छति । प्रमाणान्तरा- विरुद्धप्रमाणान्तरासिद्धार्थबोधकमन्त्रब्राह्मणादीना भूतार्थवादित्वेन ' वज्रहस्तः पुरन्दरः', ' इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' इत्यादिभिरिन्द्रस्य विग्रहवत्त्वं वज्रधरत्व च देवताधिकरणादौ साधितम् । इह ग्रभ्येऽपि च तन्निरूपितम् । ' इन्द्र की प्रकृति को अधिकाधिक मानव रूप देने के कारण उसके चरित्र मे यत्र -तत्र अनैतिकता के लक्षण प्रवेश कर गये हैं । कभी-कभी इन्द्र स्वच्छन्द अत्याचार करने में प्रवृत्त होता है - उसने पितृवध किया तथा उषस् के रथ को तोड़ डाला । उसे सोमपान का व्यसन है । वह अत्यधिक मात्रा में सोमरस का पान करता है, जिसके मद से वह वीर विक्रमो के करने मे उत्तेजित होता है । ऋग्वेद में एक समग्र सूक्त है, जिसमें इन्द्र सोम के नशे में चूर होकर अपने शौर्य एवं प्रताप का उल्लेख स्वयं ही करता है । यद्यपि इस सूक्त में काव्य-गुण बहुत ही कम है, तथापि यह मानव के मनोभाव - विशेष कर मदिरामत्त उन्माद के काव्यमय वर्णन का आद्य उदाहरण होने के नाते सविशेष रोचक है । इन्द्र के इस तरह के अतिक्रमणो की नैतिकता को तोलते समय इस तथ्य को नही भूलना चाहिये कि वैदिक ऋषियो को दृष्टि में सोमपान की धार्मिक महत्ता स्वीकृत हो चुकी थी' (पृ० ७५-७६) यह भी प्रमत्त का प्रलापमात्र है । आपके मत में जब कोई चेतन इन्द्र नहीं है, वह यदि केवल वायुमंडलीय वात्या प्रभृति का ही एक रूप है, तो उस पर सोमपान, पितृ-हत्या आदि दोषों का आरोप कैसे किया जा सकता है? हमारे मत से तो परम ऐश्वर्यशाली देवराज इन्द्र ब्रह्मवेत्ताओ में सर्वश्रेष्ठ है । लोक के कल्याण के लिये वह युद्ध भी करता है, अतः उसके युद्धजन्य उन्माद का वर्णन स्वाभाविक है । सोम एक लता है । उसको मद्य की कोटि मे नही रखा जा सकता | थोडी- बहुत मादकता तो अन्न मे भी विद्यमान है । पितृवध की बात सर्वथा निर्मूल है । इन्द्र को 'गोत्रभित्' कहा गया है । इसका अर्थ है पंख वाले पर्वतों के पंखों को काट लेने वाला । इसका अर्थ पितृहन्ता नही है । तीन शिर वाले त्वष्टा के पुत्र का वध करना, अरुन्मुख यतियो को मारकर भेडियो को खिला देना, अहल्या के साथ व्यभिचार करना, इस तरह की बातें इन्द्र के विषय में कही जाती है, किन्तु ये सब ब्रह्मविद्या की स्तुति के लिये अर्थवादमात्र है । ब्रह्मसूत्र के 'शास्त्रदृष्टि' अधिकरण में बताया गया है कि ब्रह्मवेत्ता किसी भले- बुरे कार्य को करके न तो बढ़ता है और न घटता है । ब्रह्मवेत्ता की यह विशिष्ट महिमा है कि उसको किसी भले-बुरे कार्य के आधार पर नही नापा जा सकता । बृहदारण्यक प्रभृति उपनिषदो मे तो इन्द्र पद से मुख्य परमेश्वर का ही ग्रहण किया गया है । देवराज, शतक्रतु इन्द्र परम ऐश्वर्यशाली है । इसने वृत्र और नमुचि का वध किया है, तो भी यह ब्रह्मवेत्ताओ में श्रेष्ठ है । जीवन्मुक्त होने के कारण यह नाना प्रकार की चेष्टा करते हुए भी उनसे मुक्त है । यह एक साथ अनेक यज्ञो में अपने सोमादि हविर्भाग को ग्रहण करने के लिये रथ पर चढ कर जाता है । प्रमाणान्तर से अविरुद्ध, प्रमाणान्तर से असिद्ध अर्थ के बोधक मन्त्र और ब्राह्मण ग्रन्थों के वाक्य भूतार्थ के प्रतिपादक माने जाते हैं, अतः ' इन्द्र वज्रधर है', इन्द्र ने वृत्र को मारने के लिये वज्र को उठाया इस तरह के वाक्यों से इन्द्र की विग्रहवत्ता और वज्रधारिता की सिद्धि देवताधिकरण में की गई है, जिसका कि प्रतिपादन इस ग्रन्थ में भी हुआ है ।

पृष्ठ 185

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वेदार्थपारिजाता १०८५ यत्तु -'अवेस्ताग्रन्थे इन्द्रः कस्यचिदसुरस्य नाम' इति, तस्य तु भाषाभेदेन समाधेयत्वात् । तद्रीत्याऽसुर- शब्दस्य प्राणवत्त्वबलबोधकत्वेनोत्कृष्टार्थबोधकत्वात् । वेदेऽपि क्वचिदिन्द्रस्यासुरत्वमुक्तमेव । अशोमनेऽनात्मनि असुषु प्राणेषु प्राणोपलक्षितेषु देहादिषु वा रमणादसुरशब्दस्तु निकृष्टार्थबोधकः । यदपि - 'भारतीय ईरानीयुगे इन्द्रापेक्षया वरुणस्याधिक महत्त्वमासीत् । वैदिकयुगे त्विन्द्रस्य माहात्म्या- तिशयो जातः । पुराणकाले तस्य त्रिमूर्त्यधीनता जाता' इत्यादिकम्, तत्तुच्छम्, वेदस्यापौरुषेयत्वनित्यत्वाभ्यां तदसङ्गतेः । इन्द्रस्य देवराजत्वेनोपेन्द्राग्रजत्वेन प्रख्यातमाहात्म्यवत्त्वाच्च । सर्वे देवाः परमेश्वरांशत्वेन माहात्म्यातिशयवन्त एव । त्रितोऽवैदिकदेवः । नारायणीयोपाख्यानेऽपि द्वितत्रितसज्ञो महर्षी वर्णिती । तदनुकरणेन ग्रीक - द्रीरोज प्रतिमादिकमपि सङ्गच्छते । एवमपान्नपात् मातरिश्वादिदेवता अपि भारतीया एव क्वचिदन्यत्रापि तदपभ्रष्टपदैः स्मर्यन्ते । वेदे परवर्तिता पूर्ववर्तिता च बाह्यानामेव भासते, नित्यत्वानवगमात् । 'यस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति' इत्यत्र तु मातरिश्वपदेन सूत्रात्मा हिरण्यगर्भो विवक्षितः । 'अत एव ऋग्वेदे रुद्रदेवतायाः स्थान परवर्तिसाहित्ये वर्णितरुद्रात् सर्वथा भिन्नमेव, विष्ण्वपेक्षया तन्ना- मोल्लेखः किञ्चिदल्पः, स धनुर्बाणधरः क्वचिद् वज्रविद्युन्मयैरस्त्रेव सज्जितो वर्ण्यते । वन्यश्वापदवत्तदीय रूप भीषण घातकं च । वस्तुतोऽन्तरिक्षस्य लोहितवराहः स उच्यते । रुद्रसूक्तेषु तस्य दारुणान्यस्त्राणि तथा भीषणकोपाद् भयमुपवर्णितम् । तस्य भयावहमुग्रं रूपं संहारकमंत्र व्यज्यते । वेदोत्तरयुगे तस्य शिवः कल्याणकरः स्वभावो विकास मुपगतः । शङ्करूपमपि परवर्तिनि वेदेऽपि विकसितमिति । तथापि दानवानामिव तस्य रूपं न केवलं भयकारकम्, किन्तु ' अवेस्ता मे ' इन्द्र' यह नाम किसी असुर का है' ( पृ० ७६ ) । इसका समाधान भाषाभेद के आधार पर किया जा सकता है । अवेस्ता की भाषा के अनुसार असुर शब्द प्राणवान् और बलवान् व्यक्ति का बोधक होने से उत्कृष्ट अर्थ का ही वाचक है | वेद में भी कही पर इन्द्र को असुर कहा गया है । असुर शब्द की जब यह निरुक्ति की जाती है कि वह अशोभन अर्थात् अनात्मा मे, अथवा असु अर्थात् प्राण, प्राणोपलक्षित देह प्रभृति में रमण करता है, तभी वह निकृष्ट अर्थ का बोधक होता है । ' भारत- ईरानी युग मे इन्द्र की अपेक्षा वरुण की महत्ता कही अधिक थी, परन्तु वैदिक युग के उत्तरार्ध मे इन्द्र की महत्ता अपेक्षाकृत वरुण से अधिक हो चली थी । पुराणकाल मे उसकी सत्ता त्रिमूर्ति ( ब्रह्मा, विष्णु, महेश ) के अधीन हो गई ' ( पृ० ७६ ) यह कथन भी सर्वथा निरर्गल है, क्योकि वेद की अपौरुषेयता और नित्यता के कारण इस कथन की कोई मगति नही बैठ सकती । इन्द्र की देवराज के रूप मे और विष्णु के अग्रज के रूप मे महिमा प्रख्यात है । सभी देवगण परमेश्वर के अंशभूत है, अतः ये अतिशय माहात्म्य वाले है । त्रित भी वैदिक देवता है । नारायणीय उपाख्यान मे द्वित और त्रित नाम के महर्षियों का वर्णन है । इसी के अनुकरण पर ग्रीक 'ट्रिटोज ' की प्रतिमा वर्णित है ( पृ० ७६ ) । इसी तरह से अपान्नपात् मातरिश्वा प्रभूति देवता भी भारतीय ही है, कही अन्यत्र भी इनका स्मरण इनके अपभ्रंश पदों से हो सकता है (पृ ० ७७) । वेद में परवर्तिता और पूर्ववर्तिता बाह्य दृष्टिप्रधान पाश्चात्य विद्वानों को ही प्रतीत होती है, क्योंकि वे वेद की नित्यता को नही जान पाते । ' यस्मिन्नपो मातरिश्वा' इस श्रुति में मातरिश्वा पद सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ का बोधक है । इसलिये 'ऋग्वेद में रुद्र देवता का स्थान परवर्ती युग के साहित्य में वर्णित रुद्र से बिलकुल भिन्न है । ॠग्वेद में रुद्र का नामोल्लेख विष्णु की अपेक्षा कुछ कम ही मिलता है । रुद्र देवता प्रायशः धनुष-बाण लिये हुए वर्णित हैं, कहीं कही अवश्य उन्हें वज्ञ तथा विद्युन्मय अस्त्र से भी संबद्ध बताया है । उनका स्वरूप वन्य श्वापद की तरह भीषण एवं घातक है, वस्तुतः वह 'अन्तरिक्ष के लोहित वराह' कहे जाते है | रुद्र-सूक्तों में प्रधानतः उनके दारुण अस्त्र तथा भीषण कोप से भय ही वर्णित है । परवर्ती वैदिक साहित्य में तो उनका उग्र रूप और अधिक भयावह तथा संहारकारी प्रकट होता है । यह तो वेदोत्तर युग में ही उनका शिव अर्थात् कल्याणकारी रूप विकसित हुआ है । यद्यपि ऋग्वेद में भी 'शिव' यह नाम रुद्र के विशेषणों में पाया जाता है और उनसे शंकर रूप का आविर्भाव परवर्ती वेदों में हो चुका था, यह निश्चित है कि रुद्र का रूप दानव की तरह केवल अपकारी कही नहीं हैं । उनकी स्तुति न केवल अरिष्ट

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वेवार्थपारिजातः १०८६ तदीयस्तुतिरनिष्टशमनार्थमिष्टप्राप्त्यर्थं मानवाना पशूनां च कल्याणार्थं प्रस्तुता । रोगहन्त्र्याः स्वास्थ्यप्रदाया शक्तेस्तु बहुधोल्लेखो दृश्यते । अत एव वैद्येषु श्रेष्ठो वैद्यनाथरूपेण स एव वर्ण्यते' ( पृ० ७७ ) इति, तदपि वैदिक संस्कारवैधुर्य- मूलकम्, वेदानां समेषा मन्त्रब्राह्मणरूपाणां नित्यत्वात् तत्र विकासकल्पना सर्वथैव पराहना वेदितव्या । रुद्रस्य परमे- श्वरत्वेन शुभाशुभकर्म फलदातृत्वेनाशुभफलदानसमये तस्य घोरं रूपमेवानुभूयते । शुभकर्मोपासनादिफलदानकाले तस्याघोर- शिव- शङ्कर- भवरोगवैद्य वैद्यनाथादिरूपमेवानुभूयते । स्वतस्तु तस्याशेषविशेषातीत ब्रह्मरूपत्वमेव । 'भीषा - स्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः', 'महद्भयं वज्रमुद्यतम्, न त्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य ' इत्यादिश्रुतेः । 'एको रुद्रोऽवतस्थे ', ' असंख्याता रुद्राः' इत्यादिमन्त्रं रुद्रस्यैवाद्वितीयपरमेश्वरत्वम, तस्यैवानेकरूपत्वं चोक्तम् । - मरुतामपि प्रसिद्धविविधवा यूनामधिष्ठातृचेतनत्वेन देवत्वमैश्वर्यवत्त्वं च तत्र तत्र श्रूयते । समणि सूत्राभिमानिनस्तु हिरण्यगर्भरूपत्वमेव । यज्ञेषु ' वायव्यं श्वेतमालभेत' इत्यादिवचनैर्वायव्य श्वेतविधानम् ॥ वायोश्च शीघ्रगामित्वं शीघ्रमेव भूतिगमयितृत्वमुक्तम् । एवं पृथिवीदेवतापि तत्र तत्र वर्ण्यते । यदपि -' अग्निदेवस्य पार्थिवदेवेषु सर्वतः प्राधान्यमेव । तस्य स्तुत्यर्थमृग्वेदे द्विशतसख्यानि सूक्तानि सन्ति, तस्यापि पुरुषाकारत्वमुपकल्पितम् । लैटिनभाषाप्रचलित इग्निसशब्दस्तत्तुल्यः । घृतेन प्रज्वलितस्याग्निदेवस्य , घृतपृष्ठ घृतमुख घृतकेशादिसंज्ञाभिनिर्देशः । तस्य मुखमतीव देदीप्यमानम् यत्र कठोराः किन्तु शुभ्रसुवर्णतुल्या दीप्तायसोपमा दन्ताः । क्वचिदेकाः क्वचिदनेकाश्च जिह्वा वर्णिताः । देवेभ्यो हविर्नयनाय स गरुडवद्वेगेन देवान् प्रति संयाति । अरणिद्वयात्तस्योत्पत्तिरुक्ता । तादृशः शिशुः स य उत्पन्नः सन्नेव पितरौ संहरति । दशकुमारीभ्योऽपि शमन के लिये है, अपितु वर प्राप्ति लिये भी तथा मानव एव पशु वर्ग के कल्याण के लिये भी प्रस्तुत की गई है । विशेषकर उनकी रोगहन्त्री एवं स्वास्थ्य प्रदायिनी शक्ति का तो बहुधा उल्लेख मिलता है और उन्हे वैद्यो में श्रेष्ठ ' वैद्यनाथ' कह कर भी संबोधित किया है' (पृ० ७७) । वैदिक संस्कारो के न होने से ही इस तरह की बाते कही जाती है । मन्त्रब्राह्मणात्मक सारा वैदिक साहित्य नित्य अपौरुषेय है, वहीं पर विकासवाद की बात कहना सर्वथा निष्प्रमाण है । रुद्र परमेश्वर हैं । वे शुभ और अशुभ सभी कर्मों का फल देते है । जब वे अशुभ कर्मों का फल देते हैं तो उनको घोर और जब वे शुभ कर्मों का फल देते है तो उनको अघोर, शिव, शकर, भवरोग का वैद्य और वैद्यनाथ आदि नामो से पुकारा किया जाता है । वे स्वतः समस्त विशेषताओं से रहित केवल ब्रह्मस्वरूप है । ' भीषाऽस्माद्वातः पवते प्रभृति श्रुतियां इसमें प्रमाण है । ' एको रुद्रोऽवतस्थे ' इत्यादि श्रुतियो मे रुद्र की ही एकमात्र परमेश्वर के रूप मे और उनकी अनेकरूपता का भी वर्णन है । पवन भी प्रसिद्ध विविध वायुओं के अधिष्ठाता चेतन देव है । इसीलिये उनके ऐश्वर्य का श्रुतियो में जहाँ-तहाँ वर्णन है सूत्रात्मा की समष्टि का अभिमानी तो हिरण्यगर्भ स्वरूप ही है । यज्ञों में ' वायव्य श्वेतमालभेत' इत्यादि श्रुतिवचनों से वायुदेवता के लिये। श्वेत छाग का विधान है । वहां पर वायु को अतितीव्र गति वाला, पृथ्वी पर शीघ्र पहुँचाने वाला कहा गया है । इसी तरह से पृथिवी देवता का भी वर्णन जहाँ-तहाँ है ( पृ० ७८-८३) । 'भूलोक के पार्थिव देवताओं मे सबसे प्रधान अग्नि है । ऋग्वेद मे अग्निदेव को संबोधित लगभग २०० से अधिक , किन्तु लेटिनहैं । अग्निदेव के स्वरूप मे पुरुषोचित आकार की कल्पना करना ऋषियों को अत्यधिक आवश्यक प्रतीत होना चाहिये था सूक्तभाषा में प्रचलित ' इग्निश' शब्द के तुल्यरूप 'अग्नि' शब्द ऋग्वेद में केवल अग्नि का ही वाचक है । घृत से प्रज्वलित होने देव का घृतपृष्ठ, घृतमुख, घृतकेश आदि सज्ञा से निर्देश किया है । अग्निदेव के मुख देदीप्यमान है, जिनमें कठोर परन्तु शुभ्रवाले अग्नि-, -अथवा चमकीले इस्पात की तरह दांत शोभायमान है । अग्निदेव के मुख में एक जिह्वा की कही कही अनेक जिह्वाओं सुवर्ण जैसेगई है । वह देवताओं के समीप हवि ले जाते हुए गरुड की गति से पहुँचता है । दो अरणियों के परस्पर की भी कल्पना की - है । उसका प्रसव दस कुमारियोंउत्पत्ति मानी गई है । यह ऐसा शिशु है जो उत्पन्न होते ही अपने जनक जननी का संहार कर देता घर्षण से अग्नि की प्रतिदिन

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बेवार्थपारिजातः १०८७ तस्योत्पत्तिरुक्ता ताश्च दशाङ्गुलिरूपा एव । बलपुत्रत्वेनापि स उक्त ७ अग्निप्राकट्यायारणिमन्थने बलस्यावश्यक- त्वात् । प्रातर्जागरणात् स उषर्बुध उच्यते । तत एव स देवेष्ववमोऽन्यत्र सर्वश्रेष्ठ उच्यते । एकस्मिन्नेव सूक्ते तस्य कनिष्ठता श्रेष्ठता चोक्ता । आकाशप्रभूताज्जलात्तदुत्पत्तिरुक्ता । स्वर्गात्तस्यागमनं चोक्तम् । तस्य सर्वप्रथममाकाश-, - जन्यत्वमुक्तम् पश्चाद् भूतले तृतीयं तज्जन्म जले । सवितृ मरुदग्निरूपेण सूर्येन्द्राग्निरूपेण वा तस्य त्रिरूपता प्रकल्पिता । संव ब्रह्म-विष्णु -रुद्रत्रिमूर्तिकल्पनावीजत्वमुपगता । त्रिमूर्तिरेव यज्ञियाग्नेस्त्रयो भागाः कल्पिताः । त एव पौरोहित्य सम्प्रदायस्याङ्गतामुपगता', अग्नेविविधरूपाणा दर्शनात् । बहुदेववादे व्याप्तस्यैकेश्वरवादस्य भावना प्रसूता । अग्निरमरो गृहस्थगृहेष्वतिथिरूपेण पूज्यते । गृहपतिशब्देन च सम्बोध्यते । देवानां यज्ञियभागप्रापणात् स दूत उच्यते । स चाहुतिं दत्तवन्तं यजमानं सहस्रनयनैः पश्यति ॥ वृक्षेषु विद्युदिवापकारिणोऽमित्रान् हन्ति ॥ ऐहिकानामुष्मिकाश्च मनोरथान् पूरयति । अग्निपूजासम्प्रदाये भूतप्रेतापसारणपरतन्त्रमन्त्राणां नैरर्थक्यापादनम्..' ( पृ० ८३-८६ ) इत्यादि, तदपि यत्किञ्चित् सिद्धान्तेऽग्निशब्दस्य लोकप्रसिद्धाग्निबोधकत्वेऽपि तद्द्वारा दिव्यैश्वर्यसम्पन्नदेवताबोधपारम्पर्येण सर्वान्तर्यामिब्रह्मपर्यवसायित्वात् । 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' इत्यादिमन्त्रवर्णात् । नहि वैदिका जडमेवाग्नि यजन्ति स्तुवन्ति च तस्य फलदातृत्वायोगात् । तत्तदुद्दिष्टदेवताभ्यो हविःप्रापकत्वमपि जडे न सम्भवति । अत एव सूक्तेषु क्वचिल्लौकिकाग्निरूपेण क्वचिद्देवविशेषरूपेण क्वचित्परमात्मरूपेणाग्नेर्वर्णन दृश्यते । द्वारा भी माना गया है, जो वास्तव में दस अंगुलियाँ है । अग्नि को बल का पुत्र ( सहसस्पुत्र ) माना है । कारण, ज्वाला को प्रज्वलित करने में बल हो अरणि का मन्थन कर अग्नि को प्रकट करता है । प्रतिदिन प्रातः अग्नि के प्रज्वलित किये जाने से कहा जाता है कि अग्निदेव सुबह जगते है और उनका नाम ' उषर्बुध' है । इसी कारण अग्नि को देवताओं में कनिष्ठ माना जाता है । कही कहीं अग्नि को सबसे श्रेष्ठ भी बताया है, क्योंकि उनके द्वारा सर्व प्रथम यज्ञ की प्रसूति हुई है । अग्नि आकाश के जल से प्रसूत होता है, यह भी कहा गया है । बहुधा कहा जाता है कि स्वर्ग से अग्नि को लाया गया । पृथ्वी पर उत्पन्न, वायु से प्रसूत तथा आकाश में वर्तमान होने के नाते बहुषा अग्नि त्रिरूप माना जाता है । कहा जाता है कि 'सर्व प्रथम अग्नि का जन्म आकाश मे हुआ, दूसरी बार हमारे लिये भूतल पर और तीसरी बार जल में हुआ' । सविता, मस्तु और अग्नि के रूप मे अथवा सूर्य, इन्द्र और अग्नि के रूप में त्रिमूर्ति की कल्पना ऋग्वेद में विद्यमान है । संभवतः यही त्रिमूर्ति की कल्पना ऐतिहासिक परम्परा मे आगे चलकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप हिन्दू त्रिमूर्ति की जननी हो । अग्नि की इस त्रिमूर्ति ने ही शायद यह सुझाया हो कि यज्ञिय अग्नि के तीन भाग कल्पित किये जाय, जो पौरोहित्य सम्प्रदाय का एक मुख्य अङ्ग है । अग्नि की बहुरूपता के कारण अग्नि के अनेक जन्म कल्पित किये गये है । यहाँ हम इस तत्व को पाते है कि अग्नि के विविध रूपो की उक्त कल्पना ने बहुदेववाद में व्याप्त एकेश्वरवाद की भावना को प्रसूत किया है । अग्नि अमर है । गृहस्थो के घर उसका रूप अतिथि के समान पूज्य माना जाता है । वही एक देवता है, जिसे गृहपति कह कर संबोधित किया गया है । यज्ञिय बलि को अग्निदेव ले जाते है, अत एव उन्हें दूव की संज्ञा भी दी गई है । वह आहुति देने वाले यजमान की तरफ सहस्र नयन से दृष्टिपात करते है । अपकारी पर तो वह ऐसे टूट पड़ते है, जैसे वृक्ष पर बिजली टूटती है । इस लोक के और परलोक के समस्त मनोरथो को यह पूरा करते है । अग्निपूजा के संप्रदाय में अग्नि का मुख्य कर्म भूत-प्रेतादि को भगाना और उन्हें भस्म करना तथा विपक्षियों में द्वारा प्रयुक्त मन्त्र- तन्त्र को व्यर्थ करना रहा है' ( पृ० ८३-८६ ) | यह सारा कथन व्यर्थ की बकवास है । हमारे मत में भी यद्यपि अग्नि शब्द लोक में भी प्रसिद्ध अग्नि का भी बोधक है, तथापि इस लौकिक अग्नि के द्वारा परम्परा से दिव्य, ऐश्वर्य सम्पन्न देवता का भी बोध होता है और इस तरह से अन्ततः यह शब्द सर्वान्तर्यामी ब्रह्म में पर्यवसित हो जाता है । 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' इस तरह की श्रुतिय प्रमाण हैं । वैदिकगण केवल जड़ अग्नि का ही यजन अथवा स्तवन नही करते, क्योकि जड़ अग्नि उनको इनका फल कैसे दे सकता है । उन-उन देवताओं के निमित्त दी गई हवि को भी जड अग्नि उनके पास कैसे पहुँचा सकती है? इसीलिये } सूक्तो में कही पर लौकिक अग्नि के रूप में, कही देवविशेष के रूप में और कही परमात्मा के रूप में अग्नि का वर्णन दिखाई पडता है ।

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बंदार्थपारिजाता १०८८ यदपि च सोमसम्बन्ध उक्तम्-'ऋग्वेदस्य सम्पूर्णे नवमे मण्डले यत्र तत्र कतिपयस्थले प्रकीर्णरूपेण सोमस्तुतिपराणि सुक्तानि दृश्यन्ते । बहुघोल्लेखदृष्ट्या तु वैदिकदेवतासु सोमस्य तृतीयं स्थानम् । सोमलतायाः पेषणे ऊर्णामयीभिर्गालिनीभिः क्षालनेन तत्तद्ग्रहेषु तत्प्रवहणे बहूनि सूक्तान्युपयुज्यन्ते । रहस्यमयै रूपकैश्च तत्र सोमस्तवनम् । विवस्वतो दक्षस्य वासोदरीभिः कुमारीभिः सोमस्य पवित्रीकरणे दशाङ्गुलीभिः शोधनं लक्षितम् । चर्ममय आस्तरणे ग्रावभिः सोमाभिषवणम् । मेषोर्णाभिः क्षालितस्य सोमस्य भाण्डेषु निगलनविषयो नैकधा महर्षिभिर्वणिताः । भाण्डेषु गच्छन्ती सोमधारा वनेषु वेगेन धावन्त्या महिष्योपमिता । देवाः सोमभाण्डोपरि पक्षिण इव संहता भवन्ति । सोमरसे जलमपि पात्यते I। तस्योपमानं स्वयूथं महानादेन प्रविशता वृषभेण कृतम् । उद्गातृणां सामगानप्रेरणया जलपरिधानेन सोमरसो भाण्डे नृत्यति । दारुमयेषु ग्रहेषु क्रीडमानः सोमो दशकुमारीभिः शोध्यते । सोऽपां पुत्रो दुग्धमिश्रणेन गोपरि- धानेन परिहितो भवति । सोमरसस्य ग्रहप्रवहणध्वनियोंद्धनादेर्घनगर्जनैर्गवा हम्भारवैविद्युतां पातशब्देरुपमितः । सोमपानमानन्द- दायकमुत्तेजकममरत्वप्रदं च भवति, यः ग्रीक 'एम्ब्रोसिया' समकक्षतयोच्यते । सोमसुरा देवतानाममरत्व प्रदायिका । सा यजमानं स्वगं गमयति । सोमः सर्वरोगान्नाशयति, अन्धेभ्यो दृष्टि प्रयच्छति । इन्द्रस्तवनप्रसङ्गे सोमगुणाः प्रायेण वर्ण्यन्ते । याजका घोषयन्ति ' अपाम सोमममृता अभूम' (ऋ० सं ० ८१४८/३ ) इति । सोमलता पर्वतश्रेणीषु ॥ निवसति ॥ अवेस्ताग्रन्थे होमानां वर्णनेन तत्प्रमीयते । वस्तुतस्तु स्वर्ग एव तत्स्थानम् । तत एव सोमलता पृथिवीमानीतेति श्येनकथातोऽवगम्यते । विद्युतां पर्जन्यानां वर्षणस्य प्राकृतिकं यद् दृश्यं तस्यैवेदं पौराणिक रूपम् 1 सोम के सम्बन्ध में मैकडानल ने कहा है— ऋग्वेद का पूरा नव मण्डल और यत्र-तत्र कतिपय प्रकीर्ण सूक्त सोम के स्तुतिपरक है । यो बहुधा उल्लेख के माप दण्ड से निर्णय किया जाय तो वैदिक देवताओ मे तीसरा प्रधान स्थान सोम को दिया जा सकता है । नवम मण्डल में वे अधिकाश मन्त्र है, जो सोम की उस अवस्था का वर्णन करते है, जब वह पत्थरो पर पीसा जाता है और उसका रस ऊन के छन्ने से लकडी के पात्रो में बहता है । यहाँ पर सोम की स्तुति रहस्यमय रूपको के द्वारा की गई है । विवस्वान् की पुत्रियों अथवा दक्ष को सोदर कुमारियो द्वारा सोम के पवित्रीकरण का वर्णन करते समय ऋषियों का आशय दस अंगुलियों से है । सोमवल्ली को चर्म के आस्तरण पर रख सिल पर घिसने और भेड़ के ऊन के छन्ने से छानकर सोम रस के भाण्ड में गिराने की विधि का ऋषियो ने अनेक प्रकार से वर्णन किया है । सोम रस की धारा को वनो मे वेग से दौड़ती हुई महिषी की भाति बताया है । देवता सोम-भाण्ड पर पक्षियों की भांति जमा होते हुए बताये गये है । पात्र में सोम रस के साथ पानी मिलाया जाता है । इसकी तुलना अपने झुण्ड से वेग से घुसते हुए, जोर से ध्वनि करते हुए वृषभ से की है । सोम-साम के गायको द्वारा प्रेरित वह सोम रस जल का परिधान पहने भाण्ड में नृत्य करता है । उस दारुमय पात्र में क्रीडा करता हुआ वह सोम- रस दस कुमारियो के द्वारा शुद्ध किया जाता है । वह 'आपस्' (जल ) का पुत्र है, जो उसकी जननी है । जब पुरोहित सोम को दूध से मिश्रित करता है, तब उसे गो-परिधान से परिहित बताया है । पात्रो में बहते हुए सोमरस को ध्वनि का वर्णन कही योद्धाओं के निनाद के रूप में, कही बादल के गर्जन के रूप में, कहीं गायों के रम्भाने के रूप में, तो कही बिजली के कडकने के रूप में किया है । सोमपान आनन्ददायक एवं उत्तेजक होता है । अत एव उसे अमरत्व प्रदान करने वाला देवी मेघ बताया है । उसे अमृत भी कहा है, जो ग्रीक ' एम्ब्रोसिया ' का समकक्ष है । सोम वह सुरा है, जिसने देवताओं को अमर बनाया । सोम यजमान को अक्षय लोक मे पहुंचा देता है । सोम हर रोग को दूर करता है, अन्धे को दृष्टि देता है और पंगु को गति । इन्द्र की स्तुति के प्रसङ्ग में प्रायः सोम के गुणो का वर्णन मिलता है । याजक घोषणा करते हैं कि 'हमने सोम पान किया है, हम अमर हो गये है, हम दिव्य ज्योति में मिल गये हैं और हमने देव का साक्षात्कार किया है' । सोमलता का निवास स्थान पर्वत श्रेणी है । यह बात अवेस्ता ग्रन्थ में होमा के वर्णन से प्रमाणित होती है । वास्तव में इसका स्थान तो स्वर्ग है, जहाँ वह उत्पन्न होती है । वह पृथ्वी पर स्वर्ग से ही लाई जाती हैं, यह धारणा स्वर्ग से सोम को लाने वाली श्येन कथा में वर्णित है । संभवतः यह कथा विद्युत् और उसके साथ हो पर्जन्य ( वर्षा) के सामान्य प्राकृतिक दृश्य का एक पौराणिक रूप है ।

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{ III शेक्षा रिजात ऋग्वेदस्य पश्चाद्भवेषु सूक्तेष्वधर्ध्ववेदसूक्तेषु च सोमशव्दश्चन्द्रवाचत्वेन । यजुर्वेदे नक्षत्ररूपा ओषधयः सोमपत्नीत्वेन वर्णिता । सर्वत्र ब्राह्मणग्रन्थेषु सोगश्चन्द्ररूपेण वर्णितः । तस्यैकस्मिन् पक्षे एकैककलाक्षयात् ह्रासोऽपरपक्षे कलापूरणाद् वृद्धिर्जायते । सोमचन्द्रमसोस्तादात्म्य सोमस्य दिव्यतायास्तिमिरभेदशक्त रत्युक्तिपूर्णाद् वर्णनाद् व्यज्यते । जले क्लेदनात् सोमवल्ली प्रफुल्लिता भवति । ततो विन्दवो निपतन्ति तस्मादेव तस्येन्दुत्वोक्ति. । सूक्त षूक्तम्- भाण्डे निहित सोमो जलप्रतिविम्वितचन्द्रवद् भाति । अवेस्ताया वेदस्य च तुलनात्मकेनाध्ययनेन भारतीय- इरानी-युगे पौराणिकीषु गाथासु सोमस्य विशिष्टं स्थानमासीत् । तत्रोभयत्रोक्तम् -सोमः पर्वतेषूत्पद्यते । त पक्षिणो नयन्ति । सोमोऽमरतामापादयति । उभयत्र तद्रस निश्चोत्य दुग्धे मिश्रणमुक्तम् । स्वर्गस्तज्जन्मस्थानम्, ततः पृथिव्या- मानीतः । तस्य स्वल्पमपि पान शक्त्याधायक भवति । उभयत्र दिव्यः सोमो देवतारूपोऽत्रत्यो रसरूप । एवमत्यन्तं साम्य दृश्यते ' ( पृ० ८६-८९ ) इति । - तदपि यत्किञ्चित् वेदस्यानादित्वेन तदुक्तसोमव्यवहारस्य वैदिकाना सहवासवशात् पारसीकेष्वपि कैश्चिदशैः साम्येऽपि सोमयागविधायकमन्त्रब्राह्मणाना तत्रासत्त्वेन स्वर्गप्रापक वैदिकज्योतिष्टोमादीनां तत्रासम्भवेन वैषम्यात् । सिद्धान्ते तु न दृश्यचन्द्ररूप एव सोम, किन्त्वग्नीषोमात्मकस्य जगतः कारणत्वेन सोमस्य परमात्मरूप- त्वमपि । प्रकृतिपुरुषौ शक्तिशिवो जगतः । यथा शीतोष्णतन्त्रीभ्यां विद्युद्विद्योतते तथैव ताभ्या जगदुत्पद्यते । प्रकृति- पुरुषयोः शक्तिशिवयोरिवाग्नीषोमयोरपि व्यापकत्वात् तद्रूपत्वम् । यथाग्निव्यपिकस्तथैव सोमोऽपि व्यापकः । अग्नेः प्रतीकोऽन्तरिक्षे सूर्यस्तथैव सोमप्रतीकश्चन्द्रोऽपि । सोमाहुत्यैव सूर्यः प्रज्वलति 1 तथा घृतसोमादिहोमार्दाग्निः । तत्रापि ऋग्वेद के पिछले कुछ सूक्तो मे सोम स्पष्टतः चन्द्र रूप वर्णित है । अथर्ववेद में सोम कई स्थान पर चन्द्रवाचक है । यजुर्वेद मे सोम का ऐसा वर्णन है, जिसमे ओषधियां ( नक्षत्र ) उसकी पत्तियां बताई गई है । चन्द्र रूप सोम की यह कल्पना ब्राह्मण- ग्रन्थो में सर्वत्र है । जिसके एक पक्ष मे क्षय का कारण बनाया गया है कि देवता और पितर उसके अमृत का पान करते है । अपर पक्ष में सूर्य पुन. अपने तेज से उसे परिपूर्ण कर देता है । सोम के चन्द्रमा से इस तादात्म्य की कल्पना का ऋषियो द्वारा सोम के दिव्य स्वरूप और तिमिर- भेदन की शक्ति के अत्युक्तिपूर्ण वर्णन से उद्गम हुआ है । ऋग्वेद में कई स्थानो पर ऐसा वर्णन पाया जाता है कि पानी मे भिगोने से सोमवल्ली फूल उठती है और उससे बूँद टपकतो है, अत एव उसे ' इन्दु' कहा जाता है । ऋग्वेद के सूक्तो मे कहा गया है कि भाण्ड मे रखा सोम ऐसा सुभग लगता है, जैना जल मे प्रतिविम्बित चन्द्र । अवेस्ता और वेद की तुलना करने पर यह स्पष्ट है कि भारतीय ईरानी युग मे और पौराणिक गाथाओ में सोम का विशेष स्थान था । ऋग्वेद मे और अवेस्ता में कहा है कि सोम पहाडो पर उगता है, उसे पक्षी ले जाते है, यह वह वनस्पति है, जो दीर्घायु और अमरता प्रदान करती है । दोनो ही ग्रन्थो मे कहा कि उसका रस निचोड कर दूध में मिलाया जाता है । इसका जन्मस्थान स्वर्ग है, जहाँ से वह पृथ्वी पर लाया जाता है । दोनों ग्रन्थो में बताया गया है कि उसका एक घूँट व्यक्ति को शक्तिशाली देवता बना देता है, दोनो जगह दिव्य सोम भौमिक सोम से भिन्न माना गया है । दिव्य सोम देवता रूप है और यहाँ का सोम रसरूप है । दोनो में साम्य इतना अधिक है कि सोम और होम के नाम और गुण तथा विशेषण भी इकसार है' ( पृ ० ८६-८९) । यह कथन भी गलत है । वेद अनादि है, अत उनमे बताये गये सोम के उपयोग की विधि को वैदिको के सहवास के कारण पारसीक जन भी जान सकते है और इसीलिये उनमें कुछ अशो मे परस्पर समानता भी मिल सकती है, किन्तु सोमयाग के विधायक मन्त्रों और ब्राह्मण वाक्यों के अभाव में स्वर्ग के प्रापक वैदिक ज्योतिष्टोम प्रभृति यागो को सम्पन्न करने की सामर्थ्य वहाँ नही है | यही वेद और अवेस्ता में सबसे बडी विषमता है । हमारे सिद्धान्त से तो सोम इस दिखाई पडने वाले चन्द्रमा को नही कहते, किन्तु अग्नीषोमात्मक इस जगत् के कारणभूत सोम साक्षात् परमात्मा ही है । इस जगत् के प्रकृति और पुरुष शिव और शक्ति से अभिन्न है । जैसे ठण्डे और गरम तार की सहायता से विद्युत का प्रकाश होता है, उसी तरह से शिव और शक्ति के सहयोग से ही यह जगत् उत्पन्न होता है । प्रकृति और पुरुष, शिव और शक्ति की तरह अग्नि और सोम भी सर्वत्र व्यापक है, अत • ये परब्रह्म स्वरूप है । जैसे अग्नि व्यापक है, उसी तरह से सोम भी व्यापक है । जैसे अन्तरिक्ष में सूर्य अग्नि का प्रतीक है, उसी तरह से चन्द्र भी सोम का १३७

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 190 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजात) १०५० यथा साधिष्ठाना प्रकृतिः प्रकृतिविशिष्टश्चेतनो वाऽनर्थान्तरम्, केवलायाः प्रकृतेः केवलस्य पुरुषस्य च कारणत्वायोगात्, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । सोमस्य गवादिभिरुत्तमोत्तमद्रव्यै. समन्त्रकं क्रयण तत्स्तवनदृष्ट्या तद्यजनम्, गायत्र्या स्वर्गा- दानयनम् । तत्पतितपर्णैः पवित्रपलाशवृक्षोत्पत्ति । सोमेन देवाना तर्पणम् । सोमस्य किञ्चिन्मादकत्वेऽपि न सुरारूप- त्वम्, तस्य परमपावनत्वात् । ब्राह्मणाना कृते सुरा सर्वथा निषिद्धा । सोमपानं तु ब्राह्मण्यापादकम् । यस्य पित्रा पितामहेन सोमपान न कृत स दुर्ब्राह्मणः, दुर्ब्राह्मणतानिवृत्त्यै हविर्विशेषविधानात् । चन्द्रवत् सोमस्यापि शुक्लपक्षे पत्राणि वर्धन्ते कृष्णपक्षे तु क्षीयन्ते । सोमकल्पानुष्ठानेन देहस्याभिनवत्व सम्पाद्यते । अद्यत्वे तु कलिप्रभावात् सोमो नोपलभ्यते । तत्प्रतिनिधिभूता पूतिका लता सोमयागादावुपयुज्यते ॥ नित्यापौरुषेय वेदवणितमाहात्म्यस्य सोमस्य तत्साध्ययागस्य वेदैकसमधिगम्यत्वमेवेति न तस्यावेस्तागम्यत्व सम्भवति । प्रत्यक्षाद्यगम्यानां ज्योतिष्टोमतत्फलाना कार्यकारणभावस्य पुरुषमूलकपौरुषेयवचनमूलकत्वासम्भवेना पौरुषेय वेदमूलकत्वस्याभ्युपगन्तव्यत्वात् । श्येनकथापि मानान्तराविरोधान्मानान्तराप्राप्तार्थबोधकत्वात् स्वार्थपर्यवसायिन्येव । यदपि -'ऋग्वेदीयविचारधाराया विकासाद् भारतीयमूर्तदेवतापेक्षया भावात्मकदेवताः परिकल्पिताः । दशममण्डले श्रद्धामन्योरथर्ववेदे च कामदेवताया अपि वर्णनं दृश्यते कुसुमशरस्य रतीशस्य पूर्वरूपम् । ततः कर्तृत्वशक्तेः प्रतीकतया धाता प्रजापतिश्च वर्णितः । मूलतः प्रजापतिः सूर्यस्य सवितुश्च नामान्तरमासीत् । अन्तिममण्डले विश्वसृष्टि- भारग्रहणाय पृथग् देवतारूपेण प्रजापतिरुपस्थितः । वाजसनेयिस हितायामथर्ववेदे विशेषतो ब्राह्मणेषु देवाना प्रतीक है | सोम की आहुति को प्राप्त करके ही सूर्य तपता है, जैसे कि घृत आदि के होम से अग्नि । जैसे अधिष्ठान सहित प्रकृति अथवा प्रकृति से युक्त चेतन एक ही वस्तु है, क्योकि केवल प्रकृति अथवा केवल पुरुष मे किसी कार्य को करने की सामर्थ्य नही है, उसी तरह से अग्नि और सोम के सम्बन्ध मे भी समझना चाहिये । सोम को गो प्रभृति उत्तम द्रव्यों से मन्त्रोच्चार पूर्वक खरीदा जाता है, उसकी स्तुति की जाती है और इष्टि के द्वारा उसका यजन किया जाता है । गायत्री उसको स्वर्ग से ले आती है । उसके गिरे हुए पत्तो से पलाश वृक्ष की उत्पत्ति हुई है । सोमरस से देवताओ को तृप्त किया जाता है । यद्यपि सोम कुछ मादक है, तो भी उसको सुरा नही कहा जा सकता । वह परम पवित्र वस्तु है । ब्राह्मणो के लिये सुरा का पान सर्वथा निषिद्ध है । इसके विपरीत सोमरस के पान से ब्राह्मण पुष्ट होता है । जिसके पिता-पितामह आदि ने सोमपान नही किया, वह खरा ब्राह्मण नही है । इस दोष की निवृत्ति के लिये भी यज्ञ मे हवि दी जाती है । चन्द्रमा के समान सोमलता के भी शुक्ल पक्ष मे पत्ते बढ़ते है और कृष्ण पक्ष मे घटते है । सोमकल्प का अनुष्ठान करने से शरीर एकदम नया हो जाता है । आजकल तो कलि के प्रभाव से सोमलता उपलब्ध नही होती । उसके स्थान पर आजकल सोमयाग में पूतिका लता काम में लाई जाती है । नित्य और अपौरुषेय वेद में वर्णित माहात्म्य वाली सोमलता की और उसकी सहायता से सम्पन्न होने वाले याग की अधिगति केवल वेद से ही हो सकती हैं, अत उसकी अनधिगति का कोई प्रश्न ही नही है । प्रत्यक्ष प्रभृति प्रमाणो के अगम्य ज्योतिष्टोम याग और उसके फल के कार्यकारणभाव की अवगति पुरुषमूलक पौरुषेय वचनो से भी नही हो सकती, अतः यह मानना पड़ेगा कि इस कार्यकारणभाव की अवगति केवल अपौरुषेय वेद वचनो से ही हो सकती है । श्येन की ऊपर सूचित कथा को यथार्थ मानने में कोई बाधा नही है, क्योकि इसका किसी प्रत्यक्ष आदि प्रमाण से कोई विरोध नही है और विधिवाक्य की तरह यहाँ पर भी किसी अन्य प्रमाण से अप्राप्त नई बात का प्रतिपादन है । 'ॠग्वेदीय विचारधारा का विकास यह प्रमाणित करता है कि क्रमशः भारतीय लोग मूर्त देवताओं की अपेक्षा भावरूप देवताओ की कल्पना करने लगे । ऋग्वेद के दशम मण्डल में श्रद्धा और मन्यु ( रोष, अमर्ष ) को तथा अथर्ववेद मे काम को देवता माना है । वस्तुतः लौकिक साहित्य मे सुपरिचित कुसुमशर रतोश का यह काम पूर्वरूप है | कर्तृत्व शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले अनेक भावप्रधान देवता है, जैसे घाता और प्रजापति । मूलतः प्रजापति सविता और सूर्य देवताओ का नामान्तर था । परन्तु ऋग्वेद के अन्तिम मंडल मे विश्वसर्जन का भार लिये प्रजापति पृथक् देवता के रूप में उपस्थित होते हैं । यह अथर्ववेद में, बहुधा वाजसनेयी सहिता में और अधिक नियमित रूप से ब्राह्मण-ग्रन्थो मे देवताओ के पिता के रूप में एक मुख्य देवता मान लिये गये हैं । सूत्रों में प्रजापति और