वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 191–200

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 191–200

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बेदार्थपारिजातः १०६१ पितृत्वेन मुख्यदेवतारूपेण प्रजापति कल्पितः । सूत्रेषु प्रजापतिर्वेदोत्तरयुगे चतुर्मुखब्रह्मरूपेण कल्पित । दशममण्डले यथा -- ' येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्व स्तभित येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमान कस्मै देवाय हविप विधेम ॥ ' अत्र चतुर्थ्या पङ्क्तौ प्रजापतिमज्ञात मत्वा प्रश्नवाचिना सर्वनाम्ना सङ्केतित स । वैदिकसाहित्यीय क परवर्तिकाले सृष्टिकर्तु. प्रजापतेरेव केवल पर्यायवाचको जात, किन्तु प्रजापते ' स्वातन्त्र्येण नामैव सम्पन्नम्' ( पृ० ८ ९ ९० ) इति, तदपि न मन्त्रे सूक्तं चात्र प्रजापतिरूपस्य परमात्मनो विवक्षितत्वात् । येन द्यौरन्तरिक्ष उम्रा उद्गूणं विशेषाद् गहनरूप वा । पृथिवी भूमिश्च दृढा येन स्थिरीकृता स्वः स्वर्गश्च येन स्तभित स्तब्ध कृत यथा द्यौर्न पतति तथोपर्यवस्थापितं तथा नाक आदित्यश्च येन अन्तरिक्षे स्तभित, य अन्तरिक्षे रजस उदकस्य विमानो निर्माता तस्मै कस्मै अविज्ञातस्वरूपाय परमात्मने हविषा विधेम परिचरेम । ' कस्मै ' इत्यत्र कः शब्दोऽनिर्ज्ञातस्वरूपत्वात् प्रजापती वर्तते । यद्वा सृष्ट्यर्थ कामयत इति कः, कमेर्ड: प्रत्यय. । एवमेव सूर्याग्नीन्द्रादिदेवतानामपि भावदेवतात्वमेव । नहि केवल दृश्यस्वरूपाणा भौतिकपदार्थानामेव देवतात्व तेषा स्तुतिहविरादिभाक्त्वायोगात्, किन्तु सूर्यादिगतशक्तिविशेषविशिष्टानाममूर्तचेतनानामेव देवतात्वम् । तेषां चैश्वर्यविशेषवत्त्वेन स्तुत्यत्वादिसम्भवात्। न च दृश्यमानभौतिकरूपाण्येव तेषा मूर्तरूपाणि तत्रैश्वर्यवत्त्वा योगात् । तेषा लीलाविग्रहवत्त्व त्वैच्छिक विशिष्टैश्वर्यवच्च । मन्त्रब्राह्मणपुराणेतिहाससिद्धत्वात् श्रद्धा मन्यु- कामादयश्च , समष्टिरूपेणैव देवताः व्यष्टिरूपेण तु परिच्छिन्नत्वदर्शनम् । प्रजापतेः श्रद्धा रुद्रस्य मन्युर्जगत्सिसृक्षोः कामश्च ,देवताभावेन पूज्यन्ते तदधिष्ठातृचेतनाना विशिष्टैश्वर्यवत्त्वात् । सवितरि सूर्ये च तदधिष्ठातृचेतनरूपेणैव प्रजापतित्वम् । देवानां जनकः कश्यपोऽपि तदभेदभावनयैव प्रजापतिः । चतुर्मुखो ब्रह्मापि तदभिव्यक्तिविशेषत्वेन वेदोत्तर युग के ब्रह्मा एक रूप माने गए है । दशम मंडल के एक सूक्त मे हमे एक ऐसा रोचक निदर्शन मिलता है, जिससे पता चलता है कि भावस्वरूप देवताओ की मान्यता क्यो कर हुई । एक मन्त्र है-' येन द्यौरुग्रा०' । यहाँ की चौथी पंक्ति आगे आने वाले नो मन्त्रो का ध्रुवपद है, जिसमे प्रजापति को अज्ञात मानकर प्रश्नवाचो सर्वनाम ' क ' के द्वारा उन्हे संकेतित किया है । वैदिक साहित्य का यह 'क ' आगे चलकर न केवल सृष्टिकर्ता प्रजापति का पर्याय हो गया, अपि तु वह प्रजापति का एक स्वतन्त्र नाम ही बन गया ( पृ ० ८ ९- ९ ० ) । यह कथन भी गलत है, क्योंकि इस मन्त्र में और पूरे सूक्त मे प्रजापतिरूप परमात्मा ही विवक्षित है । मन्त्र का अर्थ यह है - जिसने इस गहन रूप अन्तरिक्ष को चारो तरफ फैला दिया, इस भूमि को दृढ आधार दिया और जिससे स्वर्ग को स्थिर कर दिया कि वह अपने स्थान से गिरता नही है, जिसने केवल स्वर्ग को ही नही, सूर्य को भी अन्तरिक्ष मे ऐसा ठहरा दिया है कि जो अन्तरिक्ष मे रहकर वृष्टि के जल का निर्माण करता है, उस अज्ञात स्वरूप परमात्मा को हम हवि प्रदान करते हैं । 'कस्मै' यहां का ' क:' शब्द अनिर्ज्ञात स्वरूप प्रजापति का निर्देशक है । अथवा जो सृष्टि की कामना करता है, उसको 'क ' कहा जाता है । यहाँ पर कम धातु से ड प्रत्यय होता है । इसी तरह से सूर्य, अग्नि, इन्द्र प्रभृति भी भाव देवता ही है । केवल दृश्य स्वरूप भौतिक पदार्थों को ही देवता नही माना जा सकता, क्योकि उनमे अपनी स्तुति सुनने अथवा उनके निमित्त दी गई हवि को ग्रहण करने की सामर्थ्य कहाँ से आवेगी? अत्तः सूर्यादिगत शक्तिविशेष से संपन्न अमूर्त स्वरूप ही चेतन देवताओं को मानना पडेगा । ये ऐश्वर्यविशेष से संयुक्त है । अतः इनमे स्तुति को सुनने और हवि को ग्रहण करने की भी सामर्थ्य है । दृश्यमान भौतिक रूप ही मूर्तरूप नही माने जा सकते, क्योकि उनमे वह ऐश्वर्य नही है । ये जो लीलाविग्रह धारण करते है, वह उनकी अपनी इच्छा है । वह उनके विशिष्ट ऐश्वर्य का ही द्योतक है । मन्त्र, ब्राह्मण, पुराण, इतिहास प्रभृति ग्रन्थो से यह ज्ञात होता है कि श्रद्धा, मन्यु, काम प्रभृति समष्टि देवता है, व्यष्टिरूप मे तो ये किसी न किसी जीव से परिच्छिन है । प्रजापति की श्रद्धा, रुद्र का मन्यु और जगत्स्रष्टा ईश्वर का काम देवता के रूप मे पूजनीय है । क्योकि इनके अधिष्ठाता चेतन विशिष्ट ऐश्वर्य से संयुक्त है । सविता और सूर्य में उनके अधिष्ठाता चेतन को ही प्रजापति कहा जाता है । देवताओ के जनक कश्यप को इस प्रजापति से अभिन मानकर ही प्रजापति कहते हैं । चतुर्मुख ब्रह्मा भी विशिष्ट अभिव्यक्ति के कारण

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२०६३ वेदार्थपारिजातः प्रजापतिः । विश्वस्रष्टा परमेश्वरस्तु कस्याश्चिद्विचारधाराया न विकास, किन्तु वस्तुस्थितिमूलकः सर्वविधकल्पनाना-!. ', ' ' माधारभूतः अपौरुषेयोऽनादिश्च वेदस्तनि श्वासभूत अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः इति श्रुतेः । विकासवादस्तु तिलशः खण्डितोऽस्माभिः ' मार्क्सवाद और रामराज्य' इति ग्रन्थे । अत एवानादिकालादेव वैदिका देवाः प्रजापतिः कश्यपश्चतुर्मुखो ब्रह्मा विष्णू रुद्रः शिवश्च । विष्णुसूक्तेऽप्यग्निवायुसूर्यपृथिव्यन्तरिक्ष- द्युलोकादिस्रष्टृत्वेन विष्णोः परमेश्वरत्वमुक्तम् । आश्चर्यमेतद्यद् वैदिका मन्त्राणा ब्राह्मणानामारण्यकोपनिषदां सूत्राणां धर्मशास्त्रेतिहासपुराणाना समन्वयेनैकवाक्यतया तात्पर्यं निर्धारयन्ति परं पाश्चात्त्यास्त्वेकस्यापि ग्रन्थस्यैकरूपता- मेककर्तृकतामेकपर्यवसायिता च नाङ्गीकुर्वन्ति, विकासवादसंस्कारेण तैरेकस्मिन्नपि देहे ऐकात्म्याभ्युपगमासम्भवात् । वैदिकाना रीत्या परमेश्वरोऽनाद्यनन्तः सर्वज्ञस्तच्छासनात्मक मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्रमप्यनादि । तच्चरणाश्रितं पौरुषेयमप्यार्षशास्त्रमानुपूर्वीभेदवत्त्वेऽपि मूलतोऽनाद्येवात समन्वयेनॅव मीमांसापद्धत्याऽर्थो ज्ञातव्यः । पाश्चात्त्यास्तु न केवलमृक्संहितायां किन्त्वैकस्मिन्नपि मण्डले सूक्तेष्वपि प्रक्षिप्तता भिन्नकालतां चाभ्युपयन्ति । तेन तद्रीत्या समन्वय- कथापि दूरे । तथैव तदीयबायविलादिग्रन्थेऽपि दुष्कल्पनाः सम्भवन्त्येव । तस्माद्वैदिकाना दृष्ट्या कस्मै देवायेत्यत्रापि न प्रश्नवाची कस्मैशब्दः, किन्तु प्रजापतिबोधक एव । यदपि- 'ऋग्वेदस्य सर्वप्राचीने तथा पाश्चात्त्येऽशे' भावस्वरूपा बृहस्पतिदेवता लभ्यते । सा प्रार्थना- पतिरुच्यते ॥ राथप्रभृतिभिर्भक्तेर्मूर्तस्वरूपो बृहस्पतिरभ्युपेयते । प्रस्तुतलेखकस्य सम्मत्या तु बृहस्पतिरग्निदेवस्य , याज्ञिक क्रियाणां पारम्परिकरूपे दैवीकरणरूपः यतो बृहस्पतेरग्नेश्च पर्याप्त सौसादृश्यम् ॥ बृहस्पतेर्मुख्य कार्यं पौरोहित्यम् । अग्नेरिवेन्द्रोपाख्याने बृहस्पतेरपि सन्निवेशः । स तत्र स्थायिस्थान प्राप्तवान् । बृहस्पतिना वलं प्रजापति कहा जाता है । विश्वस्रष्टा परमेश्वर किसी विचारधारा का विकास न होकर वस्तुस्थितिमूलक है । सारी कल्पनाओ का आधार यह परमेश्वर ही है । अपौरुषेय और अनादि वेद उस परमेश्वर का ही निःश्वास है । श्रुति ने स्पष्ट कहा है कि 'ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि इस महान् भूत के निःश्वास स्वरूप है' । विकासवाद का हमने विस्तार से अपने ग्रन्थ ' मार्क्सवाद और रामराज्य' में खण्डन किया है । इसीलिये अनादि काल से प्रजापति, कश्यप, चतुर्मुख ब्रह्मा, विष्णु और शिव वैदिक देव है । विष्णु सूक्त में अग्नि, वायु, सूर्य, पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक प्रभृति के स्रष्टा के रूप में विष्णु को परमेश्वर माना गया है । आश्चर्य की बात यही है कि वैदिक विद्वान् मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषद्, सूत्र, धर्मशास्त्र, इतिहास-पुराण प्रभृति ग्रन्थो का समन्वय कर इनकी एकवाक्यता के आधार पर तात्पर्य का निर्धारण करते है, किन्तु पाश्चात्य विद्वान् एक भी ग्रन्थ की एकरूपता, एककर्तृकता और एक अर्थ की प्रतिपादकता नही सिद्ध कर पाते । विकासवाद के संस्कार के कारण ही वे एक देह में एक आत्मा को नहीं स्वीकार कर पाते । वैदिक विद्वानो के मत से परमेश्वर अनादि, अनन्त, सर्वज्ञ है । परमेश्वर का शासनस्वरूप मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र भी अनादि है । उस परमेश्वर की चरणो को कृपा से प्राप्त आर्षशास्त्र यद्यपि पौरुषेय है और इनमे आनुपूर्वी का भेद भी विद्यमान है, तो भी मूलतः यह अनादि है, अत समन्वय के आधार पर ही मीमांसा की पद्धति से इनका अर्थ जानना चाहिये । पाश्र्चात्य विद्वान् न केवल ॠग्वेद संहिता में, किन्तु एक एक मण्डल और सूक्तों में भी प्रक्षेप और कालभेद को सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं । इसलिये इनकी पद्धति से समन्वय की बात करना ही कठिन है । इस तरह की गलत कल्पनाएं उनके बाइविल प्रभृति धर्मग्रन्थो के सम्बन्ध मे भी की जा सकती है । वस्तुतः वैदिको की दृष्टि से 'कस्मै देवाय' यहां पर भी ' कस्मै' शब्द प्रश्नवाची न होकर प्रजापति का ही बोधक है । ' वेद के सबसे प्राचीन तथा पिछले अंशो में एक और भावस्वरूप देवता पाये जाते है, जिनका नाम है बृहस्पति, अर्थात् प्रार्थनाओ के स्वामी । राथ तथा अन्य प्रसिद्ध वैदिक विद्वानो ने बृहस्पति को साक्षात् भक्ति का मूर्तरूप माना है । परन्तु प्रस्तुत लेखक की सम्मति में वह अग्निदेव की यज्ञिय क्रियाओ का पारम्परिक रूप से देवीकरण है । कारण बृहस्पति और अग्नि में पर्याप्त सौसादृश्य है । बृहस्पति का मुख्य कार्य पौरोहित्य है । अग्नि की भांति इन्द्र के उपाख्यान में बृहस्पति का भी समावेश हुआ और उन्होंने वहाँ एक स्थायी पद पा लिया । अनेकधा यह वर्णन मिलता है कि बृहस्पति ने बलासुर को जीतकर गो ग्रहण किया । यज्ञ में ब्रह्मा नामक 1

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वेदार्थपारिजातः १०६३ विजित्य गावो गृहीताः । यज्ञे ब्रह्माख्यश्चक ऋत्विग् बृहस्पतिस्तत्कार्यं करोति । एतद्रूपेण हिन्दूनां त्रिमूर्तिषु मुख्यस्य ब्रह्मदेवस्य पूर्वरूपम् । स वेदोत्तरपुराणेषु ऋषिरूपेण वर्तमानः सुरगुरुः सन् बृहस्पतिग्रहस्याधिष्ठातृदेवत्वेन पूज्यते' (पृ० ९ ० - ९ १ ) इति, तदपि न सङ्गतम्, यतो 'वाग्वै वृहती तस्या. पतिबृहस्पति' इत्यादिछान्दोग्योपनिषद्रीत्या वेदलक्षणाया वाचः परिबृहस्पतित्वेनोक्तः, ऋग्वेदस्यापौरुषेयत्वेन तत्र पौरस्त्यपाश्चात्त्यकल्पनायोगात्, पुराणेति- हासयोर्वेदव्याख्यानत्वात् । वेदोक्तबृहस्पतेः स्वरूपजिज्ञासायां तद्विवरणरूपाभ्या ताभ्या तस्य सुरगुरुत्वेन वर्णनात् । , यज्ञेषु तु ब्रह्मा बृहस्पतिस्थानोयस्तत्कार्यकरत्वात् । त्रिमूर्तितो ब्रह्मा तु ततोऽन्य एव तस्य सृष्ट्यधिकारित्वात् ॥ ऋषिरूपतापि सुरगुरावेव सम्भवति, नारदस्येव तस्य देवषित्वोपपत्तेः । यदपि -'अदितिर्मुक्तिमाता ॥ सा चादित्यानां माता । वरुणवत् सापि शरोरकष्ट निवारयित्री तापबन्ध- मोचयित्री । मोचयित्रीत्वादेव स्वतन्त्रता रूपा सा । क्वचित्सूक्ते कश्चिदृषिस्तस्याः सकाशादसीम वरं वृणोति । आदित्येषु मुक्तिपुत्रार्थेऽदितिशब्दः प्रयुक्तः । ऋग्वेदशब्देषु तादृशो व्यत्ययो बहुधा दृश्यते । अत्र प्रकरणे स्त्रीलिङ्गमिदं पदं क्रमेण कस्याश्चिद्देवमूर्तेर्बोधक जातम् । सस्कृतभाषायामेवममूर्तस्य मूर्तरूपप्रदानपद्धतिः प्रचलति । एव भारतीय- देवीरूपेणोद्गमवती सा ऐतिहासिक क्रमेण स्वस्याः केषुचित्पुत्रेष्ववश्य कनिष्ठा या प्राग्भारतीये प्रचलति स्म ( १० ९ १ ) इति, तदपि निर्मूलम्, प्रमाणानुपन्यासात् । 'दोऽवखण्डने' इति धातोर्निष्पन्नस्यादितिशब्दस्य स्त्रीलिङ्गस्याखण्डनीया पूज्या देवमाता वाच्या, तदुपलक्षिता अखण्डनीया चितिस्तुपलक्षणीया, तस्याः सर्वात्मतावर्णनात् । अदितिद्यरन्तरिक्ष-, मित्यादिमन्त्रवर्णात् । इन्द्रोपेन्द्रमातृत्वादपि सा समर्हणीया । नहि विकासक्रमेण शब्दानामर्थाः परिवत्र्त्यन्ते शब्दार्थ- एक ऋत्विक् होता है । बृहस्पति इस कार्य को करते है । इस रूप में उत्तरकालिक हिन्दू त्रिमूर्ति के मुख्य देवता ब्रह्मा के वह पूर्व रूप है । वेदोत्तर पुराणो मे बृहस्पति ऋषि के रूप में वर्तमान है । वह सुरगुरु कहलाते है और बृहस्पति नामक ग्रह के अधिष्ठाता के रूप में पूजे जाते हैं' ( पृ ० ९ ० - ९ १ ) । यह कथन भी संगत नही है, क्योकि 'वाग बृहती कहलाती है, उसका पति बृहस्पति है' इस छान्दोग्य श्रुति के अनुसार वेदस्वरूप वाणी के पति को बृहस्पति कहा जाता है । ऋग्वेद तो अपौरुषेय है, अतः उसमे पूर्वकाल और उत्तरकाल का आरोप नही किया जा सकता । पुराण और इतिहास भी वेद मे प्रतिपादित बात की ही पुष्टि करते है । वेदोक्त बृहस्पति के स्वरूप को जब जानने की इच्छा होती है, तो वेदो के विवरण स्वरूप इन इतिहास-पुराण ग्रन्थो से ही बृहस्पति का सुरगुरु के रूप मे वर्णन मिलता है । यज्ञो में ब्रह्माका पद बृहस्पति का ही प्रतिनिधि माना जाता है, क्योकि यज्ञ का ब्रह्मा वहाँ पर बृहस्पति के हो सारे कार्य करता है । ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति में परिगणित ब्रह्मा इससे भिन्न है, क्योकि त्रिमूर्तिगत ब्रह्मा सृष्टि का अधिकारी है । बृहस्पति की ऋषिरूपता उसको सुरगुरु मानने पर ही सम्भव हो सकती है, क्योंकि नारद की तरह बृहस्पति भी देवर्षि माने जाते है । ' अदिति देवताओं के एक छोटे से वर्ग की माता है, जो आदित्य कहलाते है और जिनमे वरुण मुख्य है । अदिति अपने पुत्र वरुण की तरह मानव को शारीरिक कष्ट एवं ताप के बन्धन से मुक्त करा देने की शक्ति से सम्पन्न है । बन्धन से मुक्त करा देने के कारण ही यह स्वतंत्रता के रूप में मानी गई है । ऋग्वेद के एक सूक्त मे कोई ऋषि अदिति से असीम वरदान माँगता है । 'अदिति पुत्र ' यह संज्ञा कई बार आदित्यो को दो गई है । संभवतः इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ' मुक्ति के पुत्र' इस अर्थ में हुआ होगा । ऋग्वेद की भाषा में इस प्रकार तोड मोड बहुधा पाया जाता है । इस प्रकरण में प्रयुक्त ' अदिति' यह स्त्रीलिंग पद क्रमशः किसी देवमूर्ति का बोधक बन गर्यो । संस्कृत भाषा में इस प्रकार के अमूर्त को मूर्त रूप देने का प्रकार बहुत कुछ प्रचलित है । यो अदिति, जिसका उद्गम भारतीय देवी के रूप में है, ऐतिहासिक क्रम में अपने कुछ पुत्रों से अवश्य कनिष्ठ हैं, जो प्राग्भारतीय युग में प्रचलित थे" (१० ९ १ ) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि इसके लिये कोई प्रमाण नही दिया गया है । 'दोऽवखण्डने इस धातु से निष्पन्न स्त्रीलिंग अदिति शब्द का अर्थ अखण्डनीया पूज्या देवमाता है । इससे द्योतित होती है - अखण्डनीय चिति, क्योकि उसका सर्वात्मक रूप में वर्णन मिलता है । जैसा कि ' द्यो अदिति है, अन्तरिक्ष अदिति है' इत्यादि मन्त्र मे है । इन्द्र और उपेन्द्र की माता होने के कारण भी वह विशेष रूप से पूजनीय है । विकास क्रम से शब्दो के अर्थ में परिवर्तन नही हो सकता, क्योंकि मीमांसा की दृष्टि से शब्द, अर्थ और उनका

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१०६४ वेदार्थपारिजातः सम्बन्धानां मीमासकनये नित्यत्वावगमात् । ' औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्वन्ध:' ( मी ० सू० १ | १ | ५ ) इति जैमिनीय- न्यायात् । तदर्थमेव मीमासकैर्जातौ शक्तिरङ्गीक्रियते, व्यक्तीनामनित्यत्वेऽपि तस्या नित्यत्यात् । अत एव मैकडानलादि- पाश्चात्त्याना कल्पना सर्वथा वेदविरुद्वैव । अनेकार्थबोधकत्व तू लक्षणाभिरेव । तु यदपि - ' वैदिकसम्प्रदाये देवीनामत्यन्त गौणमेव स्थानम्, जगदनुशासने तासामत्यल्पभाग, उषस एकस्या एव महत्त्वपूर्ण स्थानमस्ति । द्वितीयं स्थान सरस्वत्याः । पृथिवीमपहायात्यल्पा एव देव्यः सन्ति यासा स्तुती समग्रमेक सूक्तमुक्तं स्यात् । रात्रिसूक्ते स्वभगिन्योषसा सार्धमेव रात्रेर्वर्णन दृश्यते । तत्र रात्रिर्न सर्वथा तमस्विनी, किन्तु ताराङ्कितोज्ज्वलैव सा । एका ताराभिः सुशोभिता, अन्यादित्यप्रभयोद्दीपिता' ( पृ० ९ १ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, भावानववोधात् । सर्वैरपि सूक्तैर्वेदेश्च यावानर्थ उच्यते, तावानेकया सावित्र्या गायत्र्योच्यते तावानेवैकेन प्रणवेन निरूप्यते । तथैवादितिमन्त्रेण अखण्डचिद्रूपाया भगवत्याः सर्वात्मताप्येकेनैव मन्त्रेणोक्ता | देवीसूक्तेऽपि न रात्रिसामान्य वर्ण्यते । तत एवास्य सूक्तस्य भूमिकायां सायणाचार्योक्तम् - अहमित्यष्टर्च त्रयोदशं सूक्तम् । अम्भृणस्य महषेर्दुहिता वाङ्नाम्नी ब्रह्मविदुषी स्वात्मानमेवानेनास्तीत् । अतः 'संवर्षिः । सच्चित्सुखात्मक सर्वगत परमात्मा देवता । तेन ह्येपा तादात्म्यमनुभवन्ती सर्वजगद्रूपेण सर्वस्याधिष्ठानत्वेन चाहमेव सर्वं भवामीति स्वात्मान स्तौति । द्वितीया जगती शिष्टास्त्रिष्टुभः । ' अह रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिद्राग्नी अहमश्वि-नोभा ॥ ' ( ऋ ० सं ० १० १२५1१ ) । एतदर्थस्तु - अह सूक्तस्य द्रष्ट्री वागाम्भृणी यद् ब्रह्म जगत्कारण तद्रूपा भवन्ती रुद्रेभिरेकादशभिश्चरामि । इत्थभावे तृतीया । तदात्मना चरामि । एवमेव वसुभिरित्यादौ तत्तदात्मना चरामीत्यर्थ' । सम्बन्ध, ये सभी नित्य है । 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्ध:० ' इस सूत्र में जैमिनि ने इसी बात को प्रदर्शित किया है । इसीलिये मीमासक जाति में शक्ति मानते है, क्योकि व्यक्तियो के अनित्य होने पर भी व्यक्तिगत जाति नित्य ही मानी जाती है । फलत. मैकडानल प्रभूति पाश्चात्य विद्वानो की इस तरह की कल्पनाएं सर्वथा वेदविरुद्ध है । शब्दो से अनेक अर्थो की अवगति लक्षणा के द्वारा सम्भव होती है । ' वैदिक सम्प्रदाय मे देवियो को बहुत कुछ गौण स्थान दिया गया है । जगत् के शासन मे वह बहुत कम भाग लेती है । एक ही देवी उषस् है, जो महत्त्व की कही जा सकती है । गौरव का दूसरा स्थान सरस्वती को प्राप्त है, जो अप्रधान देवताओ के मध्य रक्खी गयी है । पृथ्वी को छोडकर बहुत कम ऐसी देवियाँ है, जिन पर एक सारा सूक्त कहा गया हो । उनमे से एक रात्रि है । रात्रिसूक्त मे अपनी बहिन उषस के साथ-साथ उसका वर्णन द्यौः की पुत्री के रूप मे किया गया है । रात्रि के स्वरूप का कल्पना में वह एकदम तमस्विनी नही है, परन्तु तारकित उज्ज्वल रात्रिरूप है । इन युगल देवियो की तुलना करते हुए ऋषि ने कहा है कि इनमे एक ताराओ से सुशोभित है तो दूसरी सूर्य की आभा से' ( पृ० ९ १ ) यह कथन भी निःसार है, क्योंकि वक्ता को प्रकरण का अभिप्राय हो ठीक से समझ में नही आया है । सभी सूक्तो और वेदो से जितनी बात कही जाती है, उतनी बात एक सावित्री, गायत्री मन्त्र से कह दी जाती है और उतनी ही प्रणव, ओकार से भी । इसी तरह से एक ही अदिति मन्त्र से अखण्ड, चिद्रूपा भगवती की सर्वात्मकता का प्रतिपादन हो जाता है । देवी सूक्त में भी केवल सामान्य रात्रि का वर्णन नही । इसलिये इस सूक्त की भूमिका मे सायणाचार्य ने कहा है- 'अहम्' इत्यादि आठ ऋचाओ वाला यह तेरहवां सूक्त है । इसमे अम्भृण महर्षि को वाक् नाम की दुहिता ने अपनी ही स्तुति की है, अतः वही इसकी ऋषि है । सत्, चित् सुखात्मक, सर्वगत परमात्मा इसके देवता है । उस परमात्मा से तादात्म्य का अनुभव करने वाली इस सारे जगत् के रूप में और सबके अधिष्ठान के रूप में मैं ही सर्वत्र विद्यमान हूँ, इस तरह से वह वाक् अपनी ही स्तुति करती हैं । इस सूक्त के द्वितीय मन्त्र का जगती तथा वाकी मन्त्रो का छन्द त्रिष्टुप् है । ' अहं रुद्रेभिः०' इस मन्त्र का अर्थ यह है - इस सूक्त की द्रष्ट्री अम्भृण महर्षि की पुत्री मैं वाक् इस जगत् के कारणभूत ब्रह्म के स्वरूप में अवस्थित होकर एकादश रुद्रो के साथ विचरण करती हूँ । यहाँ पर इत्थंभाव में तृतीया है, अर्थात् मैं एकादश रुद्र बनकर ' 'विचरण करती हूँ । इसी तरह वसुभिश्चरामि इत्यादि स्थलो पर भी उस उस देवता का स्वरूप धारण कर मैं हो विचरण

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ददार्थपारिजातः १०६५ तथा मित्रावरुणा मित्र च वरुण च 'सुपा मुलुक' ( पा० सू० ७।१।३ ९ ) इनि द्वितीयाया आकार । उभा उभी अहमेव ब्रह्मीभूता विश्रमि धारयामि । इन्द्राग्नी अपि अहमेव धारयामि । उभा उभी अश्विनौ अपि अहमेव धारयामि । मयि सर्वं जगत् शुक्तौ रजतमिवाध्यस्त मद् दृश्यते । माया च जगदाकारेण विवर्तते । तादृश्या मायाया आधारत्वेन अनङ्गस्यापि ब्रह्मण उक्तस्य सर्वस्योत्पत्तिः । सर्वत्रैव वेदेषु पूर्व कर्मकाण्डस्य विस्तरेण वर्णनं तदनन्तर चित्तशुद्धी समासेनोपासनादिवर्णनम्, ततोऽपि त्रिपनिवृत्तौ अतिसक्षेपेण ज्ञानकाण्डस्य वर्णनं दृश्यते । यजुर्वेदेऽप्यन्तिमेनाध्यायेन ईशावास्यमित्यादिना परमतत्त्वं वर्णितम् । तथैवान्तिमे दशमे मण्डले नामदीयसूक्तरात्रिसूक्तादिभि परमतत्व निख- पितम् । दुर्भाग्यहताः पाश्चात्त्यास्तु दशमं मण्डल प्रक्षिप्तमर्वाचीन वा मन्यन्ते । पूर्वतनैबहुभिः सूक्ते रुद्रा वसव आदित्या विश्वेदेवा मित्रावरुणौ उभावश्विनौ इन्द्राग्नी च वर्णिताः । ब्रह्मात्मिका रात्रिस्तु सर्वात्मभूता सर्वेषा मुत्पादयित्री स्फूर्तिदात्री सर्वैरपि च तत्तत्सूक्तः संस्तुता भवति । नहि रात्रिसामान्यस्य तद्रूपत्व सम्भवति । एवमेवोत्तरत्र मन्त्रेषु आहन्तव्यस्याभिषोतव्यस्य सोमस्य दिव्यस्य चन्द्रात्मकस्य सोमस्य त्वष्टुः पूष्णो भगस्य धारयित्वेन रात्रिः स्तूयते । तस्या एव हविर्दातुः सोमाभिषवकर्तुर्यजमानस्य फलदातृत्वमुक्तम् । नहि परमेश्वरादन्यः फलप्रदाता सम्भवति, ' फलमत उपपत्ते:' ( ३१२/३२ ) इति ब्रह्मसूत्रे तथा साधितत्वात् । 'अह राष्ट्री सङ्गमनी वसूना चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ॥ तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥ ' (ऋ० सं ० १० १२५/३ ) । अह राष्ट्री ईश्वरी सर्वस्य जगत:, तथा घनानां संगमनी गमयित्री कर्मोपासनादिनिष्ठाना चिकितुषी यत्साक्षात्कर्तव्यं ब्रह्म तज्ज्ञातवती अत एव यज्ञियाना यज्ञार्हाणां मुख्या तां मां भूरिस्थात्रा बहुभावेन प्रपञ्चात्मनाऽवतिष्ठमाना भूरि भूरीणि बहूनि भूतजातानि आवेशयन्ती जीवभावेनात्मानं करती हूँ, ऐसा अर्थ करना चाहिये । तथा मित्र और वरुण इन दोनो को भी मैं ही ब्रह्मस्वरूप में अवस्थित होकर पालती हूँ । ' मित्रावरुण' यहाँ पर ' मित्र और वरुण' इस द्वन्द्व समास के होने पर 'सुपा सुलुक्' इत्यादि पाणिनि सूत्र से आकार हो जाता है । इन्द्र और अग्नि का पालन मै ही करती हूँ । दोनो अश्विनीकुमारो की भी रखवाली मैं ही करती हूँ । मुझ में ही यह सारा जगत् उसी तरह से अध्यस्त दिखाई पडता है, जैसे कि शुक्ति में रजत का आभास होता है । माया ही जगत् के रूप में बदलती है । यद्यपि ब्रह्म असग है, किन्तु जब वह इस तरह को माया का आधार बनता है, तभी इस पूरे जगत् की सृष्टि होती है । वेद मे सर्वत्र पहले कर्मकाण्ड का विस्तार से वर्णन मिलता है । उससे चित्त की शुद्धि हो जाने पर सक्षेप में उपासना की विधि बताई जाती है और इससे भी जब चित्त के त्रिक्षेप की निवृत्ति हो जाती है, तो अतिसक्षेप मे ज्ञानकाण्ड का वर्णन मिलता है । यजुर्वेद मे भी अन्तिम अध्याय मे ईशावास्य उपनिषद् के द्वारा परम तत्त्व का वर्णन मिलता है । उसी तरह से ऋग्वेद के अन्तिम दशम मंडल मे नासदीय सूक्त, रात्रिसूक्त प्रभृति मे परमतत्त्व का निरूपण मिलता है । यह पाश्चात्य विद्वानो के लिये दुर्भाग्य की बात है कि वे इस दशम मंडल को प्रक्षिप्त तथा अर्वाचीन रचना मानते है । इससे पहले विद्यमान अनेको सूक्तो मे रुद्र, वसु, आदित्य, विश्वेदेव मित्रावरुण, अश्विनीकुमार युगल और इन्द्राग्नी का वर्णन किया गया है । ब्रह्मात्मिका रात्रि इन सब की आत्मा है, उसी से इन सबकी उत्पत्ति होती है और सबको स्फूर्ति मिलती है । अतः इन सभी सूक्तो से इसकी स्तुति की जा सकती है । सामान्य रात्रि का यह स्वरूप नही हो सकता । इसी तरह से आगे के मन्त्रो में अभिषवणीय ( जिसका रस निकालना है ) सोम, दिव्य चन्द्रमात्मक सोम, त्वष्टा, पूषा और भग देवताओं की धारयित्री के रूप में रात्रि की स्तुति की गई है और यह रात्रि ही हवि को अर्पित करने वाले तथा सोम का रस निकाल कर उसको अर्पित करने वाले यजमान को फल भी देती है, ऐसा वर्णन किया गया है । परमेश्वर के सिवाय अन्य किसी में फलदान की सामर्थ्य नही है । 'फलमत उपपत्ते ' इस बादरायण सूत्र में इसको सिद्ध किया गया है । 'अह राष्ट्री० ' इस द्वितीय मन्त्र अर्थ है -' मैं सारे जगत् की स्वामिनी हूँ तथा मैं उनको धन की प्राप्ति कराने वाली हूँ, -जो कि कर्म और उपासना में लगे हुए है । मुझे साक्षात्करणीय ब्रह्म का भी ज्ञान है । इसीलिये यज्ञीय विधि विधान में मेरी ही प्रमुखता है । इस तरह से नाना स्वरूपों मे प्रपंचात्मना विद्यमान होकर जब मैं सभी प्राणियों में जीवभाव से प्रवेश करती हूँ, तो मुझे अनेक व्यक्ति देवता के रूप में पूजते है । इस तरह से जब मैं ही इन सारे परिदृश्यमान रूपों में अवस्थित हूँ, तो अन्य देवगण जो

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वेदार्थपारिजातः १०३६ प्रवेशयित्री मा पुरुत्रा बहुषु व्यदधुः देवा विदधति कुर्वन्ति । उक्तरूपेण वैश्वरूप्येणावस्थानाद् यद् यत् कुर्वन्ति देवा मामेव कुर्वन्ति । नहि तादृश्या ब्रह्मरूपाया रात्रिदेवताया महत्त्वपूर्ण स्थान नास्ति । 'मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति य प्राणिति य ई शृणोत्युक्तम् । अमन्तवो मा त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुतश्रद्धव ते वदामि ॥ ' योऽन्नमत्ति स भोक्त शक्तिरूपया मयैवात्ति, यो विपश्यति यश्च प्राणिति सोऽपि मयैव । यश्वोक्तं शृणोति सोऽपि मयैब 'येनेक्षते शृणोतीति जिघ्रनि व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादू विजानाति' इति काठकश्रुतेः । ईदृशीमन्तर्यामिरूपेणावस्थितो येन जानन्ति ते अमन्तव एव अजानन्तस्ते उपक्षियन्ति उपक्षीणा भवन्ति । श्रुत विश्रुत साधक, श्रुधि श्रृणु । श्रद्धिवं श्रद्धिः श्रद्धा तया युक्तं श्रद्धया लभ्य ब्रह्मात्मकं वस्तु तुभ्यं वदामि अहमेव । 'अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः । यं कामये त तमुग्र कृणोमि त ब्रह्माण '?, तमृषि तं सुमेधाम् ॥ अह स्वयमेव ब्रह्मात्मक तत्त्व वदामि । कीदृश तत्त्वम् देवेभिर्देवैरिन्द्रादिभिर्जुष्टम् उतापि मानषेभिर्मनुष्यैरपि जुष्ट सेवितम् ॥ ईदृग्वस्तुरूपाह यं कामये रक्षितु वाञ्छामि तं पुरुषमुत्र सर्वेभ्योऽप्यधिक करोमि । तमेव ब्रह्माण स्रष्टारं कृणोमि करोमि । तमृषिमतीन्द्रियार्थदर्शिन करोमि । तमेव सुमेधा शोभनप्रज्ञं करोमि, 'एष उ साधु कर्म कारयति त यमेभ्य उन्निनीषते ' इति श्रुतेः । ' अह रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अह जनाय समद कृणोमि..." 1। अहं पुरा त्रिपुर- विजयसमये रुद्राय रुद्रस्य महादेवस्य धनुः चापं आतनोमि । किमर्थमिति चेत्, ब्रह्मद्विषे ब्राह्मणाना द्वेष्टार शरवे शरूं हिंसकं त्रिपुरवासिनमसुरम् हन्त वै हन्तुं हिंसितुम्, 'तुमर्थे सेसेन० ' ( पा ० सू० ३।४।९ ) इति वैप्रत्ययः । अहमेव समद समानं माद्यन्त्यस्मिन्निति समत् सग्रामः त स्तोतृजनरक्षार्थं शत्रुभिः शुम्भनिशुम्भमहिषासुरादिभिः सग्राम करोमि ॥ तथा द्यावापृथिवी चान्तर्यामितया अध्याविवेश प्रविष्टवती । नह्यतादृश्या रात्रिसूक्तप्रतिपाद्याया ब्रह्मात्मिकाया भगवत्या अनितरसाधारण रूपमन्यदेवेषु सम्भाव्यते । कुछ करते है, वह मेरी सहायता से ही करते है । इस तरह की ब्रह्मस्वरूपिणी रात्रि देवता का महत्त्वपूर्ण स्थान न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? ' मया सो०' व्यक्ति जो अन्न खाता है, उसको वह मेरी भोक्तृ शक्ति की सहायता से हो पचा पाता है । वह जो प्राणियो को देखता है, उसमें भी मेरी सहायता रहती है । जो सुनता है, उसमे भी मैं ही सहायक हूँ । काठक श्रुति मे भी कहा गया है कि 'जिससे देखता है, सुनता है, सूंघता है, विवेचन करता है और स्वाद तथा अस्वाद को जानता है । इस तरह से अन्तर्यामी स्वरूप में अवस्थित मुझ वाणी को जो नही जानते, वे कुछ भी नही जानते । अपने इस अज्ञान के कारण वे नष्ट हो जाते है । हे विश्रुत साधक, तुम सुनो, श्रद्धा से संयुक्त, श्रद्धापूर्वक उपासना करने से प्राप्य ब्रह्मात्मक वस्तु का मै तुमको उपदेश करती हूँ' । ' अहमेव० ' | मै स्वयं ही ब्रह्मात्मक तत्व का उपदेश करती हूँ । यह तत्त्व कैसा है? इन्द्र प्रभृति देवगण और मनुष्य भी इसी तत्त्व की उपासना करते है । इस स्वरूप मे अवस्थित होकर मैं जिसकी रक्षा करना चाहती हूँ, उसको मैं सर्वोच्च स्थान पर बिठा देती हूँ । उसको मैं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा बना देती हूँ, अतीन्द्रिय अर्थ का द्रष्टा ऋषि बना देती हूँ । उसको मैं भली बुद्धि प्रदान करती हूँ | श्रुति में कहा भी गया है कि 'परमेश्वर जिसको यम की बाधा से उठा लेना चाहता है, उसको भले कार्यों में लगाता है ।' 'अहं रुद्राय ० ' । मैं पहले त्रिपुरासुर पर विजय प्राप्त करते समय रुद्र महादेव के धनुष को तानती हूँ, जिससे कि ब्राह्मणो के द्वेष्टा हिसक स्वभाव के त्रिपुरासुर का वध किया जा सके । 'हन्तवै' यहाँ पर 'तुमर्थे सेसेन ० ' इस पाणिनि सूत्र से 'तवै' प्रत्यय होता हैं । मैं ही स्तुति करने वाले मनुष्यो की रक्षा करने के लिये मदमत्त शुम्भ, निशुम्भ महिषासुर प्रभृति दैत्यों के साथ युद्ध करती हूँ । तथा मैं ही अन्तर्यामी के रूप मे आकाश और पृथ्वी में प्रवेश करती हूँ । रात्रिसूक्त की प्रतिपाद्य ब्रह्मात्मिका भगवती का यह अत्यन्त दुर्लभ माहात्म्य किसी अन्य देवता मे नही मिल पाता ।

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वेदार्थपारिजातः १०६७ ' अह सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । ततो वि तिष्ठे भुवनानि विश्वोतामू द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ॥' अहमेव पितरं दिवं सुवे प्रसुवे । 'आत्मन आकाशः सम्भूतः' ( तै० आ ० ८1१ ) इति श्रुते. |। कुत्रेति तदाह- अस्य परमात्मनः मूर्धन् मूर्धन्युपरिभागे कारणभूते । तस्मिन् हि वियदादिकार्यजात तन्तुषु पट इव वर्तते । मम च योनिः कारण समुद्रे समुद्रवन्त्यस्माद् भूतजातानीति समुद्रः परमात्मा तस्मिन् । अप्सु व्यापनशीलासु चित्तवृत्तिषु , अन्तर्मध्ये यद् ब्रह्म चैतन्य तन्मम कारणम् समष्टिचैतन्यस्यैव प्रत्यक्चैतन्यरूपेणावस्थानात् । यत ईदृग्भूता अहमस्मि ततो देवो विश्वा विश्वानि सर्वाणि भूतजातानि अनुप्रविश्य वितिष्ठे विविध व्याप्य तिष्ठामि । उत अपि अमू द्यां उपलक्षणमेतत् । एतदुपलक्षित कृत्स्नं विकारजात वर्ष्मणा कारणभूतेन मायात्मकेन मदीयेन देहेनोपस्पृशामि । यद्वा अस्य भूलोकस्य मूर्धन् मूर्धन्युपरि अहं पितरमाकाशं सुवे समुद्रे जलधावप्सूदकेष्वन्तर्मध्ये मम योनिः करण- भूतोऽम्भृणाख्य ऋषिर्वर्तते । यद्वा समुद्रेऽन्तरिक्षेऽप्स्वम्मयेषु देवशरीरेषु मम कारणभूत चैतन्य ब्रह्म वर्तते । ततोऽहं कारणात्मिका सती सर्वाणि भुवनानि व्याप्नोमि । ' अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा । परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव ॥ ' विश्वा विश्वानि भूतानि कार्याणि आरभमाणा कारणरूपेणोत्पादयन्ती अहमेव परेणानविष्ठिता स्वयमेव प्रवामि वात इव । उक्तं सर्वं निगमयति- दिवः परः परस्तात् । द्यावापृथिव्योरुपलक्षणम् । सर्वस्माद्विकारजातात् पर-स्ताद्वर्तमानाऽसङ्गोदासीनकूटस्थब्रह्मचैतन्यरूपाहं महिना महिम्ना एतावती सम्बभूव । सर्वजगदात्मनाहं सम्भूतेत्यर्थः । रात्रिसूक्तेऽपि रात्र्यधिष्ठात्री मायाविशिष्टा चिच्छक्तिरेव स्तूयते । ' रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभिः । विश्वा अधि श्रियोऽधित || ' (ऋ० स० १०।१२७।१ ) । आयती आगच्छन्ती अक्षभि: अक्षिस्थानीयैः प्रकाशमाननक्षत्रः, यद्वा अक्षभिरञ्जकैस्तेजोभिः पुरुत्रा बहुषु देवी देवनशीला 'देवमनुष्य पुरुषपुरुमत्येभ्यः ' ( पा ० सू० ५।४।५६ ) इति पुरुशब्दात् त्राप्रत्ययः । रात्री इथं रात्रिदेवता व्यख्यद्' विशेषेण पश्यति विश्वाः सर्वाः श्रियः शोभा अति । ' अहं सुवे ० ' । मैं ही सबके पिता आकाश को उत्पन्न करती हूँ । ' परमात्मा से आकाश की उत्पत्ति होती है' ऐसा अन्य श्रुति में भी कहा गया है । कहाँ उत्पन्न करता हूँ? इस परमात्मा के मूर्घस्थानीय कारणभूत भाग में, क्योकि उसी परमात्मा में यह सारा आकाशादि प्रपच विद्यमान है, जैसा कि तंतुओ में पट विद्यमान है । वह परमात्मा मेरा भी कारण है । समुद्र शब्द से यहाँ परमात्मा अभिप्रेत है, क्योंकि उसी मे से यह सारा जगत् निकलता है । अप् का अर्थ है व्यापनशील चित्तवृत्तियाँ | इन वृत्तियो में ही ब्रह्म चैतन्य की अवस्थिति रहती है, जो कि मेरी भी जननी है । समष्टि चैतन्य ही प्रत्यक् चैतन्य के रूप में भी अवस्थित रहता है, क्योकि मैं इस तरह की हूँ, इसीलिये मैं सभी प्राणियों में प्रविष्ट होकर देवस्वरूप में अवस्थित रहती हूँ । मैं इस आकाश को ही नही, किन्तु इस समस्त विकारात्मक प्रपंच को अपने मायात्मक शरीर से धारण करती हूँ । अथवा इस भूलोक से ऊपर मैं इसके पिता आकाश की सृष्टि करती हूँ । समुद्र की ओर दौड़ रहे जल के मध्य में मेरे जनक अम्भृण नामक ऋषि रहते है । अथवा समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष में स्थित जलमय देवशरीर में मेरा कारणभूत ब्रह्मचैतन्य निवास करता है । तब मैं कारणाश्मिका बन कर सारे भुवनो मे व्याप्त हो जाती 1 ' अहमेव वात इव ० ' जगत् के सभी कार्यों को मै ही उत्पन्न करती हूँ । मैं ही जगत् की कारणात्मिका प्रकृति हूँ । मैं स्वयं ही बिना किसी की सहायता से पवन की तरह प्रवाहित होती रहती हूँ । अब उपसंहार करते समय ऊपर की सारी बातो को संक्षेप मे इस तरह से कहा गया है - इस द्यावापृथिवी से, विकारात्मक जगत् से बहुत दूर रहनेवाली असंग, उदासीन, कूटस्थ, ब्रह्म, चैतन्य स्वरूपिणी मैं अपनी हो महिमा से जगत् के रूप में उत्पन्न होती हूँ । रात्रिसूक्त में भी रात्रि की अधिष्ठात्री मायाविशिष्ट चिच्छक्ति की ही स्तुति की गई है । जैसे कि 'रात्री व्यख्यदायती० ', इस मन्त्र में वर्णित है कि प्रकाशमान नक्षत्रों के साथ आती हुई अथवा अपने रमणीय तेज से अनेक प्रकार से देदीप्यमान देवी रात्रि विशेष रूप से सबकी देख भाल करती हुई शोभा को प्राप्त करती है । पुरुत्रा पद में ' वेदमनुष्य ' इत्यादि पाणिनि सूत्र से पुरु शब्द से त्राप्रत्यय होता है । १३८

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वेवार्थपारिजातः १०२८ यदपि - 'देवतानां पत्नीरूपाणा देवीना तु ततोऽपि गौण स्थानम्' ( पृ० ९ ३ ) इति, तदपि न, ब्रह्म- विष्णु-शिवपत्नीनां भारती -लक्ष्मी -गौरीणा श्रीसूक्तादौ वर्णनात् । श्रीसूक्तं तु परिशिष्टे विद्यते । शाखान्तरीयपाठ ' 'एव खिलपरिशिष्टादिशब्दैरुच्यते । युगलदेवतावर्णनं तु कर्माङ्गतयैव भवति । यथा अग्नीषोमीयं पशुमालभेत इत्यत्र मिलितयोरेव देवतात्वम् । एवमेव 'अश्विनी, इन्द्राग्नी' इत्यादिषु द्रष्टव्यम् । तथैव द्वादशादित्या एकादश रुद्रा अष्टौ वसव इत्यादिसमूहानामेव देवतात्वात् तथैव तेषां स्तवः । वसवस्तु पृथिव्यादीनामधिष्ठातारः । एवमेव विश्वेदेवादिसम्बन्धेऽपि पाश्चात्त्यानां भ्रमः । तथैव ऋभवोऽपि देवविशेषाः । अप्सरसश्च उर्वश्यादयः सूक्तेषु वर्ण्यन्ते । तेषां स्वरूपाणि पाश्चात्यविकृतरूपेण वर्ण्यन्ते । ब्राह्मणेतिहासपुराणव्याख्यानरीत्या तेषा रूपमधिगन्तव्यम् । यदुक्तम्-'ऋग्वेदेऽतिप्रारम्भिकयुगादेव भारतीयजीवनेषूपयोगितावशाद् गवां महत्तासीत् । उषःकालीनेषु किरणेषु मेघेषु गोपदानि प्रयुज्यन्ते । पृष्णिरूपा पर्जन्यदेवता गोरूपा, सा च मरुतां जननी । प्रचरवृष्टिमतां मेघानामुपरि , भारतीया समृद्धिर्निर्भरा आसीत् अथर्ववेदे सर्वकामपूरका मेघा गोपदेन व्यपदिष्टाः । तत एव दोग्ध्री गौः परिकल्पिता । उर्वी चापि गोरूपोक्ता । गौश्वादितिरूपेणोक्ता । ऋग्वेदे अघ्नियाशब्देन गोरुक्ता । तन्नाम्नापि तस्या अवध्यता बोध्यते । अवेस्तारीत्यापि सा पूज्या । अथर्ववेदे सर्वत्र गोपूजा स्वीकृता । शतपथे गोमासभक्षणेन महापातकमुक्तम् । अद्ययावत् सा श्रद्धा उत्तरोत्तरं दृढा भवति' ( पृ० ९ ७- ९ ८) इति, तत्सत्यम्, तथापि नोपयोगिता- मात्रेण गौः पूज्यते, किन्तु गवा देवतारूपत्वमपि विज्ञायते । वैदिकाना समेषामेव कर्मणा गोदुग्धदधिघृतपञ्च-गव्यादीनामुपयोगात्, गोदानस्य लोकोत्तरमाहात्म्याच्च सर्वत उत्कर्ष सिद्धः । ' देवताओ की पत्नी रूप देवियों का और भी गौण स्थान है ( पृ० ९ ३ ) । यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश की क्रमशः भारती, लक्ष्मी और गौरी नाम को पत्नियो का वर्णन श्रीसूक्त प्रभृति में विशिष्ट रूप में मिलता है । श्रीसूक्त ऋग्वेद के परिशिष्ट में विद्यमान है । दूसरी शाखा के पाठों का ग्रहण खिल अथवा परिशिष्ट के नाम से किया जाता है । युगल देवता का वर्णन भी कर्माग के लिये आवश्यक होता है । जैसे कि ' अग्नोषोमीयं पशुमालभेत' यहाँ पर अग्नि और सोम दोनो मिलकर ही देवता माने जाते है । इसी तरह ' अश्विनी', 'इन्द्राग्नी' इत्यादि में भी समझना चाहिये । इसी तरह से बारह आदित्य, एकादश रुद्र, आठवसु ये सब मिलकर ही देवता होते हैं, अतः उनकी एक साथ स्तुति की जाती है । आठ वसु पृथिवी प्रभृति के अधिष्ठाता माने जाते है । इसी तरह से विश्वेदेव प्रभृति के सम्बन्ध में भी पाश्चात्य विद्वान् भ्रम में ही पडे हुए है 1। इसी तरह से 'ऋभुगण' भी देवता विशेष ही है । उर्वशी प्रभृति अप्सराएं सूक्तो में वर्णित है । उनका स्वरूप पाश्चात्य विद्वान् विकृत रूप मे उपस्थित करते हैं । ब्राह्मण, इतिहास, पुराण इत्यादि में ही वेद की व्याख्यानपद्धति के आधार पर इनका सही स्वरूप जाना जा सकता है । 'ऋग्वेद में अति प्रारम्भिक युग से ही गाय की महत्ता अपनी सर्वोत्कृष्ट उपयोगिता के कारण सिद्ध थी । उस काल में किरणों तथा मेघो को गोरूप माना है । पृश्नि नामक पर्जन्य देवता गोरूप है और वह मरुत् नामक देवों की जननी है । प्रचुर वर्षा करने वाले मेघों पर ही भारत की समृद्धि निर्भर थी । मेघो को अथर्ववेद में स्वर्ग में सफल कामना को पूर्ण करने वाली गो कहा है । वास्तव में यही धारणा वेदोत्तर काल में प्रचलित कामदुधी की पुरोगामिनी है । ऋग्वेद के ऋषियों ने बहुधा उर्वी को भी गोरूप माना है । वहाँ पर गौ का अदिति के रूप में भी वर्णन है । ऋग्वेद में गो को बार-बार ' अध्निया' कहा है । यह नाम भी उसकी अवध्यता को ही प्रमाणित करता है । अवेस्ता से भी यही प्रमाणित होता है कि गौ के प्रति पूज्यभाव हिन्द-ईरानियन युग में भी प्रचलित था । अथर्ववेद में तो गोपूजा पूर्ण रूप से स्वीकृत हो चुकी थी और शतपथ ब्राह्मण में गोमांस भक्षण को महापातक माना गया है । गौ के प्रति यह प्रीतिभाव न केवल आज तक चला आ रहा है, अपि तु कालक्रम से वह अत्यन्त दृढ और रूढ हो चुका है' ( पृ० ९ ७- ९ ८) । यह कथन एकदम सही है, किन्तु गौ की पूजा केवल उपयोगिता के आधार पर न होकर उनमें देवता-बुद्धि होने के नाते की जाती है । सभी वैदिक कर्म गाय के दूध, दही, घृत, पंचगव्य आदि की सहायता से निष्पन्न होते हैं । गोदान का लोकोत्तर माहात्म्य शास्त्रों में वर्णित है । इससे भी गाय का सर्वाधिक उत्कर्ष सिद्ध होता है ।

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वदार्थपारिजातः १०६६ यत्तूक्तम् — ' अस्मिन् भारतवर्षेऽत्रत्यैरादिवासिभिर्नागाः पूज्यन्ते स्म । तत एवार्यैरपि नागपूजा गृहीता' (पृ० ९८ ) इति, तदपि तुच्छम्, आर्याणामन्यत आगमनासिद्धेरुक्तत्वात् । बेदानां च कालभेदोऽपि निराकृत एव । अथर्ववेदे नागानां महत्त्ववर्णनान्नागपूजापि वैदिक्येव । यदुक्तम्-'अतिप्राचीनयुगे मानवैः स्वरचितेष्वपि वस्तुषूपयोगितावशाद्देवत्वं प्रदत्तम् । यथा यज्ञियोप- करणेषु देवत्वकल्पना । तृतीयमण्डलस्याष्टमे सूक्ते यूपो वनाधिपतित्वेन सम्बोधितः । दशमे सोमरसनिश्च्योतनाय ग्राव्णां देवत्व कल्पितम् । केषुचिन्मन्त्रेषु हलस्यापि देवत्वमुक्तम् । एकस्मिन् समग्रे सूक्ते शस्त्रास्त्राणि स्तुतानि । अथर्ववेदे पटहगुणगानमपि दृश्यते' ( पृ० १०० ) इति तदपि यत्किञ्चित् वेदरहस्यानवगमात् । यथा प्रमाणा- नामज्ञातज्ञापकत्वेनैव प्रामाण्यम्, तथैव प्रत्यक्षानुमाना दिभिरज्ञातार्थज्ञापकत्वेनैव वेदानां प्रामाण्यमभ्युपेयते वैदिकं । तेनैव तत्तदभिमानिदेवानां सम्बोधनेन तत्र संस्तवो दृश्यते । तत एव दृषद्-मुसल- व्रीहि - यव-पुरोडाशादीनां सम्बोधनं जीवदानं पूजनं च तत्र तत्र वेदेषु दृश्यते, जडमात्रस्य चेतनाधिष्ठितत्वेन सर्वत्र देवत्वसम्भवात् । असुरशब्दसम्बन्धे तु पूर्वमेवोक्तम् । बलप्राणवत्त्वेन निगूढशक्तिमत्त्वेन चेन्द्रवरुणादयोऽप्यसुरा उच्यन्ते । असुषु प्राणेषु तदुपलक्षितेषु देहादिषु, अशोभनेऽनात्मनि वा रमणाच्च दानवादिष्वसुरशब्दः प्रयुज्यते । यदपि -' गगन-चारिषु दानवेष्वेको वर्ग पणिनाम्नोच्यते । सोऽपीन्द्रस्य शत्रुरासीत् । पणिशब्देन कृपण उच्यते । तस्मिन्नेवार्थे दानवशब्दोऽपि' ( पृ० १०१ ) इति, तदपि तुच्छम्, पणिशब्दस्य कृपणार्थत्वे प्रमाणाभावात् । 'पण व्यवहारे' इति प्रयोगात् । क्रयविक्रयादिव्यवहारपरा वञ्चका लुण्ठका एव धर्मविमुखाः पणय उच्यन्ते । दानवास्तु दनोरपत्यान्यु- ' भारतवर्ष मे यहाँ के आदिवासी नागो की पूजा करते थे । उन्ही से आर्यों ने नागपूजा सीख ली' ( १० ९ ८) यह कथन भी गलत है, क्योकि आर्य कही बाहर से यहाँ आये, यह बात किसी तरह से भी सिद्ध नही की जा सकती, इस बात को हम पहले ही कह चुके हैं । वेदो के प्रति कालभेद की दृष्टि का भी हम खण्डन कर चुके है । अथर्ववेद में नागो के महत्त्व का वर्णन मिलता है, अतः नागपूजा भी वेदसम्मत ही है । 'अतिप्राचीन युग की एक विचित्र धार्मिक धारणा यह है कि मानव ने स्वरचित वस्तुओं को भी उपयोगिता के कारण पूज्य भाव प्रदान किया है और उनमे देवत्व की कल्पना की है । ऐसी वस्तुओ मे मुख्यतः यज्ञिय उपकरण है । उदाहरणार्थ, तृतीय मण्डल के अष्टम सूक्त मे यूप को वनाधिपति कह कर सम्बोधित किया है । दशम मण्डल के तीन सूक्तो में सोम रस को निकालने वाले पाषाणो की देवरूप में गणना की है । कुछ मन्त्रो में हल को भी देवरूप कहा है । एक समग्र सूक्त मे युद्ध के विविध शस्त्रास्त्रो को स्तुति है । में पटहपटह काका भीभी गुणगान किया है' ( पृ० १०० ) ॥ वेदो का गूढ अभिप्राय न समझ पाने के कारण अथर्ववेद के एक सूक्त ऐसा कहा गयाहै । जैसे प्रमाणो की प्रमाणता इसी में है कि वह अज्ञात का ज्ञापन करे, इसी तरह से वैदिक गण वेदो का प्रामाण्य इसी लिये मानते है कि वेद से प्रत्यक्ष, अनुमान प्रभृति प्रमाणो से अज्ञात वस्तु का ज्ञान प्राप्त होता है । इसीलिये उस- उस वस्तु के अभिमानी देवता की स्तुति वहाँ मिलती है । इन अभिमानी देवताओं को उपलक्षित करके ही दृषत्, मुसल, व्रीहि, यव, पुरोडाश प्रभृति द्रव्यो को सम्बोधित कर इनमें प्राणप्रतिष्ठा, पूजन आदि की विधि वेद में बताई गई है । इस जगत् में जडमात्र चेतन से अधिष्ठित है, अतः सर्वत्र देवता में पूज्य-बुद्धि रखना उचित ही है । असुर शब्द के सम्बन्ध में हमने पहले ही बताया है कि बल और प्राणवत्ता के कारण तथा अपनी निगूढ शक्तियों के आधार पर इन्द्र, वरुण प्रभृति देवता भी असुर कहे जाते हैं और प्राण अर्थात् प्राण से उपलक्षित होने वाले देह, इन्द्रिय प्रभृति में अथवा अशोभन कार्य या अनात्मा में मन लगाने से दानव भी असुर कहलाते है । ऐसी स्थिति में यह कहना कि -'गगनचारी दानवों का एक वर्ग पणि नामक दानवो का है, जो कि इन्द्र के शत्रु हैं । पणि शब्द वस्तुतः कृपण के अर्थ में प्रयुक्त होता है । इसी अर्थ में दानव शब्द का भी प्रयोग होने लगा' ( पृ० १०१ ), इसलिये गलत है कि पण शब्द कृपण के अर्थ में प्रयुक्त होता हो. इसमें कोई प्रमाण नहीं है । पण का प्रयोग व्यवहार के अर्थ में प्रयुक्त है । खरीद- बिक्री के काम में लगे हुए दूसरों को ठगने वाले धर्मविमुख लुटेरे ही पणि के

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 200 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः११०० च्यन्ते । एवमेव वृत्र - बलि- शुष्णादिसम्बन्धिन्यो ब्राह्मणादिव्याख्या एवादरणीयाः । भूतपिशाचराक्षसादयस्तु विशिष्ट-शक्तयोsपि भवन्ति, इत्यप्यन्यत्रोक्तमेव । -' यदपि ऋग्वेदे कतिपयसूक्तेषु मृत्युजन्मसम्बन्धी स्वल्पोल्लेखो दृश्यते । अन्तिममण्डले यमसूक्ते तूक्त यदग्निः शरीरमेव दहति मृतस्यात्मा त्वमर एव । आत्मा देहात् पृथगेव । न केवल मृत्योः पश्चात्, किन्तु समष्टिसुषुप्ता ( प्रलये ) वपि तत्सत्ता भवत्येव । ऋग्वेदे वान्यत्र वा वेदेषु पुनर्जन्मसङ्केतो नास्ति । यद्यपि बौद्धधर्म-प्रादुर्भावात्पूर्वम् ईसवीपूर्वषष्ठ्यां शत्यां पुनर्जन्मसिद्धान्तो वद्धमूलतामुपगत आसीत् । ऋग्वेदस्यैकोऽशो यत्रात्मनो जल वनस्पतीन् वाभिलक्ष्य प्रमाणमुक्तम्, पुनर्जन्मसिद्धान्तस्य बीज वक्तु शक्यते' ( पृ ० १०२ ) इति, तदपि न सङ्गतम्, नासदीय सूक्तदेवीसूक्तादिषु प्रपञ्चातीतस्य प्रलयकालेष्वपि सत्त्वाभ्युपगमवर्णनात् । तथाहि—ऋग्वेदे दशममण्डले ५७ तमे सूक्ते पितर उपस्थेया:-'आ त एतु मनः पुनः ऋत्वे दक्षाय जीवसे । ज्योक् च सूयं दृशे ॥ पुनर्नः पितरो मनो ददातु देव्यो जनः । जीव व्रात सचेमहि ||' इत्यादिषु पुनर्जीवनप्राणादीन्द्रियसङ्घातदानप्रार्थना दृश्यते । ५८ तमे सूक्तं च-' यत्ते यमं वैवस्वत मनो जगाम दूरकम् । तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥ इत्यत्र वैवस्वतं गतस्य मनसः चिरजीवनायावर्तनमुक्तम् । यत्ते दिवं यत्पृथिवी मनो जगाम दूरगम्, यत्ते चतस्रः प्रदिशः, यत्ते भूतं च भव्यं च मनो जगाम दूरगम् । तत्त आवर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ' इत्यादिभिः पुनर्जन्मप्रपञ्चन दृश्यते । श्राद्धवर्णनं यजुर्वेदेऽथर्ववेदे च दृश्यते । पुनर्जन्मवर्णनं च स्पष्टमुक्तम् । तच्चेहैव ग्रन्थेऽन्यत्र स्फुटमेव । अत एव दार्शनिकतत्त्वप्रसङ्गे मैकडानलेनापि पितृसूक्ते प्रेतात्मानः सम्बोध्यन्त इत्यभिमतमेव । यथा - 'प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः । उभा राजाना स्वधया मदन्ता यम पश्यामि वरुणं च देवम् ॥ ' ( ऋ ० सं ० १०।१४।७ ) । यत्र नः पूर्वे पुरातनाः पितरः पितामहादयः परेयुः पूर्वस्मिन् काले भवैः पूर्व्येभिः नाम से प्रसिद्ध है । दानव तो दनु को पुत्रों को कहा जाता है । इसी तरह से वृत्र, बलि, शुष्ण प्रभृति शब्दों की ब्राह्मणादि ग्रंथों मे वर्णित व्याख्या ही स्वीकार करनी चाहिये, मैकडानल को नही (पृ ० १०१ ) । भूत, पिशाच, राक्षस प्रभृति भी विशिष्ट शक्तियो से सम्पन्न होते है, यह बात हमने अन्यत्र बताई है । 'ऋग्वेद के कतिपय सूक्तो में मृत्यु और पुनर्जन्म के सम्बन्ध में बहुत थोडा सा उल्लेख मिलता है । ऋग्वेद में अन्तिम मण्डल के यमसूक्तों में कहा गया है कि अग्नि शरीरमात्र का दाह करती है, पर मृत की आत्मा तो अमर है । आत्मा शरीर से पृथक् है । इसका अस्तित्व केवल मृत्यु के पश्चात् ही नही, अपि तु सुषुप्ति अवस्था में भी माना गया है । ऋग्वेद मे अथवा अन्य वेदों में कही भी पुनर्जन्म के सिद्धान्त की ओर संकेत नही मिलता । यद्यपि बोद्ध धर्म के प्रादुर्भाव के पूर्व, ईसापूर्व छठी शताब्दी में यह बद्धमूल हो गया था । ऋग्वेद का एक मात्र अंश, जहाँ आत्मा को जल अथवा वनस्पतियों की ओर प्रयाण करते हुए बताया गया है, पुनर्जन्म के सिद्धान्त का बीज कहा जा सकता है ( पृ ० १०२) । यह कथन भी युक्तिसंगत नही है, क्योकि नासदीयसूक्त, देवीसूक्त प्रभृति में प्रपंचातीत ब्रह्म की प्रलय काल में भी सत्ता स्वीकार की गई है । इसी तरह से ऋग्वेद के दशम मण्डल के ५७ वें सूक्त में पितरों का उपस्थान किया जाता है । 'आ त एतु मनः', 'पुनर्न: पितरो' इत्यादि मन्त्रो में पुनः पुनः जीवन, प्राण, इन्द्रियसंघात को देने की प्रार्थना की गई है और ५८ वें सूक्त में ' यत्ते यमं वैवस्वत' इस मन्त्र मे वैवस्वत यम के पास गये मन के चिरकाल पर्यन्त जीवित रहने के लिये पुनः लौटने की प्रार्थना की गई । ' यत्ते दिवं', यत्ते चतस्रः' इत्यादि मन्त्रो में भी पुनर्जन्म का प्रपंच वर्णित है । यजुर्वेद और अथर्ववेद में श्राद्ध का वर्णन मिलता है । वहाँ पर पुनर्जन्म का भी स्पष्ट प्रतिपादन है । इस बात को हमने इसी ग्रंथ में अन्यत्र विस्तार से बताया है । } इसीलिये ऋग्वेद में दार्शनिक तत्त्व का प्रतिपादन करने वाले प्रकरण में ( पृ० १०३ ) मैकडानल ने भी यह स्वीकार किया है कि पितृसूक्त में प्रेतात्माओं को संबोधित किया गया है । जैसा कि 'प्रेहि प्रेहि' इस मन्त्र में है । इसमें कहा गया है कि जहाँ पर हमारे पितामह प्रभूति पूर्वपुरुष अनादिकाल से प्रवृत्त मार्ग के द्वारा पहले गये हुए है, वही पर हे पिता, आप भी शीघ्र चले जाइये