वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 201–210
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 201–210
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वेदार्थपारिजातः { अनादिकालप्रवृत्तैः पथिभिर्मार्गः, हे मत्पितः, तत्स्थान प्रेहि शीघ्र गच्छ । गत्वा च स्वघयात्नेन मदन्त । मदन्ती तृप्यन्तो राजानौ उभौ यमं देवं वरुणं च पश्यामि पश्य । तथैव 'स गच्छस्व पितृभिः स यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन् । हित्वायावद्यं पुनरस्तमेहि स गच्छस्व तन्वा सुवर्चा ||' ( ऋ ० सं० १०६१४८) । हे पितः परमे व्योमन् स्वर्गाख्ये स्थाने स्वभूतैः पितृभिः सह सङ्गच्छस्व, इष्टापूर्तेन श्रौतस्मार्तकर्मफलेन च सङ्गच्छस्व । तत इष्टापूर्ते सहागम्य अवद्य पापं हित्वा अस्तं व्रियमाणाख्य गृहमेहि । तत सुवर्चा सुवर्चसा शोभनदीप्तियुक्तेन तन्वा स्वशरीरेण सङ्गच्छस्व ॥ तत्रैवानेकैर्मन्त्रैः परलोकसम्बन्धिनोऽनेके भावा वर्णिताः । तथैवाथर्ववेदेऽपि परलोके दण्डभोगस्थानानि वर्णितानि । रथप्रभृतयस्तु - कुत्सितभावनया प्रेरितास्तत्सर्व मपलपन्ति । अत एव मैकडानलः स्वीकरोति ऋग्वेदे पितृमार्गदेवमार्गों वणितो (पृ० १०४) । पितॄणां प्रमुखो यमः प्रेतात्मना शासको राजा त्रिभिः सूक्तं वर्णितः । 'अति द्रव सारमेयो श्वानौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा । अथो पितृन् सुविदत्रां उपेहि यमेन ये सधमादं मदन्ति ||' (ऋ० स० १० १४।१० ), उरूणसा- वसुतृपा उदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनों अनु । तावस्मभ्य दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम् ॥ ' (ऋ० स० १०।१४।१२ ) इत्यादिषु यमस्य श्वानो दूतो च प्रतिपादिता: । ' परेयिवास प्रवतो महीरनु बहुभ्यः पन्थामनु पस्प- शानम् । वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं राजान हविषा दुवस्व || ' (ऋ० सं ० १०।१४।१ ) । हे यजमान, त्वं राजान पितॄणां स्वामिनं हविषा दुवस्व परिचर । कीदृशं तम्? प्रवतः प्रकृष्टकर्मवतां भूलोकवर्तिभोगसाधन पुण्यमनुष्ठितवत: पुरुषान् मही: तत्तद्भोगोचितदेशविशेषान् अनुपरेयिवास क्रमेण मरणादूर्ध्वं प्रापितवन्त तथा बहुभ्यः स्वर्गार्थिभ्यः पुण्यकृतामर्थे पन्थां स्वर्गस्योचितं मार्गम् अनुपस्पशानं आबाधमानं पापिन एव पुरुषान् स्वर्गमार्गबाधेन नरक प्रापयति न तु पुण्यकृतः । वैवस्वतं सूर्यस्य पुत्रं जनानां पापिनां सङ्गमनं गन्तव्यस्थानरूपम् । यदपि यमयमीसंवादे -' न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति । अन्यमू षु त्वं यम्यन्य उ त्व परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ॥ ' (ऋ० स ० १० १० ८, १४ ) । यम्या प्रख्यातो यमः पुनराह -इह लोके देवानां सम्बन्धिनः और वहाँ जाकर स्वघा रूपी अन्न से तृप्त हो रहे यम और वरुण दोनो देवताओ को देखिये । इसी तरह से 'संगच्छस्व पितृभि:' इस मन्त्र में कहा गया है कि हे पिता, उस परम आकाश में स्थित स्वर्गलोक में आप अपने पूर्व पुरुषों से मिलिये और इस जन्म के किये इष्टापूर्त श्रोत-स्मार्त कर्म का फल भोग कीजिये । तब इष्टापूर्त के साथ आकर पाप को अलग छोड़कर अपने वरणीय गृह में प्रवेश कीजिये और सुन्दर कान्ति वाले शरीर से सयुक्त होइये । वहाँ पर इसी तरह के अन्य मन्त्रो से भी परलोक सम्बन्धी अनेक बातो का वर्णन किया गया है । इसी तरह से अथर्ववेद मे भी परलोक मे इस जन्म मे किये गये अपराधो का दण्ड भुगतने के लिये बने हुए स्थानो का वर्णन है । कुत्सित भावना से प्रेरित होकर ही रॉय प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् इस तरह की बातो का अपलाप करते रहते हैं । किन्तु मैकडानल को यह स्वीकार करना पड़ा है कि ऋग्वेद में पितृमार्ग और देवमार्ग का वर्णन है ( पृ० १०४) । पितरों मे प्रमुख यम है, जो प्रेतात्माओं पर शासन करते हैं । इनके नाम पर ऋग्वेद में तीन सूक्त है । 'अति द्रव सारमेयो', 'उरूणसावसुतृपा' इत्यादि मन्त्रो में यम के दूतो का और कुत्तों का वर्णन मिलता है । 'परेयिवास ' इत्यादि मन्त्र में कहा गया कि हे यजमान, तुम पितृगणों के स्वामी यम की हविप्रदान द्वारा परिचर्या करो । वह यम कैसा है? प्रकृष्ट कर्म वाले अर्थात् भूलोक- वर्ती भोग के साधनभूत पुण्य कर्मों का अनुष्ठान करने वाले पुरुषों को वह यम मृत्यु के उपरान्त क्रम से उन उन भोगों के लिये उचित रूप से निर्धारित स्थानो में पहुंचा देता है तथा स्वर्ग चाहने वाले अनेक पुण्यवान् पुरुषों को वह स्वर्ग का उचित मार्ग दिखाता है । वह पापी ,,पुरुषों को ही स्वर्ग जाने वाले मार्ग में रोकता है पुण्यवानो को नही । वह पापियों को नरक में पहुंचा देता है जिसको कि सूर्यपुत्र वैवस्वत ने पापियों के गन्तव्य स्थान के रूप में ही निर्मित किया है । यमयमीसंवाद में 'न तिष्ठन्ति' इस मन्त्र में यम यमी से कहता है कि इस लोक में देवताओं के चर, जासूस रात और दिन के रूप में सदा घूमते रहते हैं और वे सभी प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्मों को देखते रहते हैं । वे बिना पलक झपकाये प्राणी
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११०२ वेदार्थपारिजाता ये स्पशः अहोरात्रादयश्चरन्ति सर्वेषां शुभाशुभलक्षणकर्म प्रत्यवेक्षण रहिता न तिष्ठन्ति न निमिषन्ति । शुभमशुभं वा यः करोति तं निरीक्षन्ते । हे आहनः मामपहन्त्रि, असह्यभाषणेन दुःखयित्रि, त्वं मत् मत्तः अन्येन त्वत्सदृशेन तूप क्षिप्रं याहि 1। तेन विवह धर्मार्थकामानुपयच्छ । तत्र दृष्टान्तः - रथ्येव चक्रा यथा रथावयवभूते चक्रे रथमुद्यच्छतः । संवादसूक्तेषु वृषाकपि— इन्द्रेन्द्राणीसंवादे वृषाकपि पति कुपिता सतीन्द्राणीन्द्रस्य स्वस्य चोत्कर्षं वर्णयति । अन्यत्र दूत्या सरमया पृथिभिरपहृताना गवामन्वेषण कृतम् । उर्वशीपुरूरवसोः सवादश्च । यत्तु - 'यमयमीसंवादोर्वशीपुरुरवः संवादसम्बन्धीनि गीतानि कल्पितानि परवर्तियुगीयमहाकाव्यनाटक- पूर्वाभासरूपाणि' इति, तदपि यत्किञ्चित्, सिद्धान्तरीत्या सर्वासामाख्यायिकानां कल्पितत्वाविशेषात् । प्रमाणान्तरा- विरुद्धप्रमाणान्तरासिद्धविषयकत्वेन भूतार्थवादित्वेऽपि बाधाभावाच्च । यत्तु - 'यन्त्रमन्त्रादिविषयका मन्त्रा अथर्ववेदसम्बन्धिन ' इति, तदपि भ्रान्तिमूलकमेव, ऋग्वेदीयपरम्प- रायामपि तदुपलम्भात् । यक्ष्मनिवृत्ति निद्राप्राप्ति पुत्रप्राप्ति तत्प्राप्तिप्रतिबन्धनिवृत्तिसम्बन्धिनां मन्त्राणामृग्वेदे ' दर्शनादेवाथर्ववेदस्येमे विषया इत्यपास्तमेव । अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्या कर्णाभ्यां छुबुकादधि । यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते ॥ ' (ऋ ० स ० १० १६३।१ ), 'य आस्ते यश्च चरति यश्च पश्यति नो जनः । तेषा सं हन्यो अक्षाणि यथेदं हम्यं तथा ॥' निद्रामन्त्र.-'अपश्य त्वा मनसा दीध्याना स्वीयां तनू ऋत्व्ये नाधमानाम् 1॥ उप मामुवा युवतिर्बभूयाः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकामे ॥ ' (ऋ० सं ० १०।१८३।२ ), 'प्रजां यस्ते जिघासति तमितो नाशयामसि (ऋ० स० १० १६२। ५) । १०।४५ सपत्नीमर्दनसूक्तम्, १०।१५ ९ विजयगीतम् । यदुक्तम्- 'सप्तममण्डले १०३ तमसूक्तस्य लौकिकसाहित्यशैलीदर्शनात् तस्य मौलिकत्वे सन्देहो भवति' इति तदपि बालचापलमेव, अपौरुषेये वेदे तादृश्या अपि शैल्या दर्शनात् । पाश्चात्त्यानां वेदशैलीनिर्धारणपद्धतिरसाध्वी । तस्य जो कुछ अच्छा या बुरा काम करते हैं, उनको देखते रहते हैं । इसलिये हे असा वाणी को बोलने वाली और मुझे उससे पीडित करने वाली यमी, तुम मेरे सिवाय तुम्हारे जैसे किसी दूसरे व्यक्ति के पास शीघ्र चली जाओ और उसी के साथ रहकर घर्म, अर्थ और काम का उपभोग करो । इसमें दृष्टान्त दिया गया है - -जैसे कि रथ के अवयवभूत चक्र के सहारे रथ चलता है । एक अन्य संवाद सूक्त में ( इन्द्र-इन्द्राणी सवाद) इन्द्राणी अपने पति वृषाकपि इन्द्र पर कुपित होकर इन्द्र के और अपने उत्कर्ष का वर्णन करती है । एक दूसरे सूक्त मे इन्द्र सरमा दूती के माध्यम से पणियो के द्वारा अपहृत गायो का पता लगाते है । इसी तरह का संवाद सूक्त उर्वशी और पुरूरवा का भी है । 'वस्तुत. यम यमी संवाद, उवंशी- पुरूरवा संवाद संबन्धी गीत कल्पित है, जो कि परवर्ती काल के महाकाव्य एवं नाटक साहित्य के पूर्वाभास है ' ( पृ ० १०६ १०७) । यह कथन भी गलत है, सिद्धान्ततः वेद में सभी आख्यायिकायें कल्पित मानी जाती हैं । इसके साथ ही प्रमाणान्तर से अविरुद्ध और प्रमाणान्तर से असिद्ध विषय का प्रतिपादन करते समय इनको भूतार्थवादपरता मानने में भी कोई बाधा नही है । ' यन्त्र, मन्त्र आदि से संबद्ध मन्त्र केवल अथर्ववेद में हो है' यह मानना भी भ्रान्तिमूलक है, क्योकि ऋग्वेद की परम्परा में भी ये समान रूप से मिलते हैं । क्षय रोग की निवृत्ति के लिये, निद्रा प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति के लिये और इनकी प्राप्ति के बीच आने वाले विघ्नों की निवृत्ति के लिए अनेक मन्त्र ऋग्वेद में भी उपलब्ध होते है, अतः यह विषय केवल अथर्ववेद से हो संबद्ध है, यह कथन सर्वथा भ्रामक हो माना जायगा । 'अक्षिभ्या ते ', 'य आस्ते यश्च चरति', ' अपश्यं त्वा', 'प्रजा यस्ते ' इत्यादि मन्त्र उक्त विषयों से ही संबद्ध है । सपत्नीमर्दन सूक्त, विजयगीत प्रभृति को भी निदर्शन के रूप में उपस्थित किया जा सकता है । इस प्रसंग में मैकडानल ने कहा है- ' सप्तम मंडल में सूक्त संख्या १०३ की शैली लौकिक साहित्य जैसी है । इसी कारण इसकी मौलिकता में सन्देह होता है ' (पृ० ११० ) यह बच्चों की सी बात है, अपौरुषेय वेद में इस तरह की शैली के होने में
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वेदार्थपारिजातः ११०३ सूक्तस्य केचिन्मन्त्रा उद्धियन्ते -' सवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः 1। वाचं पर्जन्यजिम्विता प्र मण्डूका अवादिषुः ॥ ' ( १ ), ' वसिष्ठो वर्षकामः पर्जन्य तुष्टाव । त मण्डूका अन्वमोदन्त । स मण्डूकाननु मोदमानान् तुष्टाव' ( नि० ९ ।६ ) व्रतचारिणः सवत्सरसत्रात्मकमाचरन्तो ब्राह्मणा, लुप्तोपममेतत्, एवभूता ब्राह्मणा इव संवत्सर शरत्प्रभृति आवर्षोंरेकं सवत्सर शिश्याना वर्षणार्थं तपश्चरन्तो विल एव सन्तो मण्डूकाः पर्जन्यजिन्विता पर्जन्येन प्रीता यया वाचा पर्जन्यः प्रीतो भवति तादृशी वाचमवादिषुः प्रवदन्ति । ' यदेषामन्यो अन्यस्य वाचं शाक्तस्येव वदति शिक्षमाणः । सर्वं तदेषा समृधेव पर्व यत्सुवाचो वदथनाध्यप्सु (ऋ० सं ० ७।१०३।५ ) । एनो: एनयो, मण्डूकयोरन्योऽन्यमनुगम्य गृभ्णाति गृह्णाति । अपामुदकाना प्रसर्गे प्रसर्जने वर्षणे सति यद् यदा अमन्दिषाताम् हृष्टावभूताम्, यद् यदा च अभिवृष्टः पर्जन्येनाभिषिक्तः कनिष्कन् भृशं स्कन्दन्नुत्प्लवं कुर्वन् पृश्निः पृश्निवर्णो मण्डूको हरितेनान्येन वाचं संपृक्ते संयोजयति, उभावप्येकविधं शब्दं कुर्वाते, तदानीमन्योऽन्यमनु-गृह्णाति । हे मण्डूकाः, यदा युष्माक मध्येऽन्योऽन्यस्य वाचमनुवदति शिक्षमाणः शिक्ष्यमाणः शिष्यः शाक्तस्येव शक्तिमत: शिक्षकस्य वाचं यथानुवदति तद्वत् । यदा सुवाचो यूयमप्सु अधि उपरि प्लवन्तः वदथन वदत तदा एव युष्माकं सर्वं पर्व परुष्मच्छरीरं समृधे समृद्धमेवाविकलावयवमेव भवति ॥ धर्मकाले मृद्भावमापन्ना मण्डूका: पुनर्वर्षणे सत्यविकलाङ्गाः प्रादुर्भवन्ति । रामचरितमानसे -'दादुर धुनि चहुँ ओर सुहायी । वेद पढे जिमि वटु समुदायी ॥ ' यदपि -- ऐहिक सूक्तषु विवाहसूक्तमस्ति । तत्र सोमरूपस्य चन्द्रस्य सूर्यया विवाहो वर्णितः । अस्यत्र यद्यपि अश्विनौ तत्प्रियो परमत्र सहचरसाधारण्येनैव तयोर्वर्णनम् । सूर्यायाः पिता सविता सोम्यैः सूर्यायाः पाणिग्रहणार्थं प्रार्थितः । स चाङ्गीकृत्य शाल्मलीवृक्षनिर्मिते द्विचक्रे रथे सूर्यामारोप्य पतिगृह प्रेषयामास । स च रथः किंशुक- पुष्पविभूषितः श्वेतवृषभयुग्मेनोद्यते स्म । सूर्यचन्द्रो मानवविवाहप्रतीको 'पूर्वापरं चरतो माययैतो शिशू क्रीळन्तो बाधा क्या है । पाश्चात्यो की वेद की शैली के निर्धारण की पद्धति सर्वथा गलत है । उस सूक्त के कुछ मन्त्रो को हम यहाँ उद्धृत करते है— ' संवत्सरं शशमाना' । इस सूक्त मे वर्षा की कामना लिये वसिष्ठ पर्जन्य की स्तुति करता है । उसका अनुमोदन मेंढक करते है । तब अपनी बात का अनुमोदन करने वाले मेढको की भी वह स्तुति करते है कि संवत्सर सत्र के व्रत का आचरण करने वाले ब्राह्मण की तरह ये मेंढक शरत् ऋतु से लेकर वर्षा ऋतु के आरंभ होने तक लगभग एक वर्ष तक वर्षा के लिये मानों तपस्या कर कर रहे हैं, वे सोये नही है 1। अपने बिल में रहते हुए ही वे पर्जन्य को प्रिय लगने वाली वाणी बोलते हैं । ' यदेषामभ्यो अन्यस्य ० ' । ये दो मेढक एक दूसरे का पीछा कर आपस में एक दूसरे को पकड़ते है । जब जल बरसने लगता है तो ये दोनो परम प्रसन्न हो उठते हैं और जब जल बरस चुकता है और ये जब जल से खूब अच्छी तरह से नहा लेते है तो ये एक दूसरे के ऊपर कूदते है । पृश्नि वर्ण, चित्तीदार मेढक हरे रंग के मेंढक से बोली मिलाता है, अर्थात् दोनो एक ही तरह की बोली बोलते है । तब ये दोनो एक दूसरे की सहायता करते हैं । हे मेंढको, जब आप लोग एक दूसरे की बोली का अनुसरण करते है, तब ऐसा मालूम होता है कि शिष्यगण अपने शक्तिमान् शिक्षक की वाणी का अनुसरण कर रहे हो । जब आप मधुर वाणी बोलते हुए जल के ऊपर तैरने लगते हैं, तो आपका यह शरीर सर्वावयवसंपूर्ण हो जाता है । ग्रीष्म ऋतु में मिट्टी के रूप में परिवर्तित हो गया मेंढकों का शरीर वर्षाकाल में पुनः पूर्ववत् हो जाता है । इसी तरह का वर्णन रामचरित मानस में भी मिलता है— दादुर घुनि चहुं ओर सुहायो । वेद पढ़ें जिमि बटु समुदायी । 'ऐहिक सूक्तों में हम विवाह सूक्त को रख सकते हैं । इसमे सोमरूप चन्द्र का सूर्यकुमारी सूर्य के साथ विवाह प्रसंग वर्णित है । यद्यपि अन्यत्र अश्विनीकुमार उनके प्रिय बताये गये है, पर इस सूक्त में उनकी स्थिति बहुत साधारण सहचरो में दी गई है । वे सोम की ओर से सूर्या के पिता सविता देव से सूर्या के पाणिग्रहण की प्रार्थना करते हैं । इस प्रस्ताव को सविता देव स्वीकार करते हैं और उक्त विवाह के लिए संस्तुत अपनी कन्या को शाल्मली वृक्ष से निर्मित द्विचक्र रथ में बिठाकर अपने पतिगृह के लिये बिदा करते हैं । वह रथ किंशुक के रक्त पुष्पों से विभूषित तथा सफेद बैलों की जोड़ी से प्रेरित है । सूर्य-चन्द्र, जो मानव जगत् में विवाह के
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वेदार्थपारिजात ११०४ परि यातोऽध्वरम् । विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतू रन्यो विदधज्जायते पुनः ॥ गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः । भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः || ' (ऋ० सं० १० ८५।१८,३६ ) 'तुभ्यमग्रे पर्यंवहन् सूर्यां वहतुना सह । पुनः पतिभ्यो जाया दा अग्ने प्रजया सह ॥ इहैव स्त मा वियोष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् 1। क्रीळन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानी स्वे गृहे || समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ । सम्मात- रिश्वा संघाता समु देष्ट्री दधातु नौ । ' पश्चात् वरयात्रार्थ मङ्गलकामना प्रस्तुता ततो विवाहवर्णनम्' इत्यादिकम्, तत्तु सत्यमेव, भारतीयानामास्तिकाना वेद एव यद्यपि सर्वविधानमूलम्, तथापि विधानानि ब्राह्मणे वर्णितानि" संहितायां तु तदुचिता मन्त्रा उपदिष्टाः । मन्त्रार्थास्तु - पूर्वापरं कचित्पूर्व गच्छति, अन्यचन्द्रस्तमनुसरति । एवं पौर्वापर्येण मायया स्वप्रज्ञानेन एतौ दिवि चरतां तस्मात् पाश्चात्त्यानामिव न जडो चन्द्रसूर्यौ, चेतनाधिष्ठितत्वात् । तौ शिशू शिशुवद् भ्रमणाज्जाय- मानत्वाच्च क्रीडन्तो विहरन्तावन्तरिक्षेऽध्वर प्रति यात • । तयोरन्य आदित्यो विश्वानि भुवनान्यभिचष्टे अभिपश्यति ऋतून् वसन्तादीन् अन्यश्चन्द्रो विदधत् मासानर्धमासाश्च पुनर्जायते । यद्यप्युभयोरपि जनिरस्ति, तथापि सूर्यस्य सर्वदा प्रवृद्धेरुदयो नाभिप्रेत, चन्द्रस्य तु ह्रासवृद्धिसद्भावात् पुनर्जायत इत्युक्तिः । हे वधु, ते तव हस्त गृह्णामि किमर्थ सौभाग्याय मया पत्या त्व यथा जरदष्टिः प्राप्तवार्धका असः भवसि भग अर्यमा सविता पुरन्धि • पूषा एते देवास्त्वां मह्यमदुः । किमर्थं गार्हपत्याय यथाहं गृहपतिः स्याम् । हे गन्धर्वा, तुभ्यमग्रे पर्यंवहन् प्रायच्छन् काम सूर्यां वहतुना सह त्वच वहतुना सह सोमाय प्रायच्छः । तद्वदिदानीमपि हे अग्ने, पुनः पतिभ्योऽस्मभ्यं जायां प्रजया जनयित्र्या शक्त्या सह दाः देहि । इहैव लोके स्तं भवत मा वियोष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् । पुत्रादिभिर्मोदमानी स्वे गृहे भवतम् । विश्वेदेवाः सर्वे देवाः, नौ हृदयानि मानसानि समञ्जन्तु सम्यगञ्जन्तु अपगतद् खादिक्लेशानि कृत्वा लौकिकवैदिकविषयेषु प्रतीक है, सदा सहचर ( साथी ) बताये गये है- 'पूर्वापरं चरतो ', 'गृभ्णामि ने सौभगत्वाय', 'तुभ्यमग्रे', ' इहैव स्तं मा', 'समञ्जन्तु' इत्यादि मन्त्रों में वैवाहिक कर्मकाण्ड का विधान है । इस सूक्त में वर यात्रा के लिये मंगलकामना की गई है और विस्तार से विवाह का वर्णन किया गया है' ( पृ० ११२- ११५ ) यह सारा कथन सही है । आस्तिक भारतीयो के लिये यद्यपि वेद ही सब विधि विधान का मूल है, तथापि इनकी विधिया ब्राह्मणो में ही वर्णित है और संहिताओ मे उन विधियों में प्रयुक्त होने वाले मन्त्र उपदिष्ट है । उक्त मन्त्रो का अर्थ इस प्रकार है - ये चन्द्र औरसूर्य पूर्वापरभावपूर्वापरभाव सेसे चलतेचलते है । पहले सूर्य चलता है, चन्द्रमा उसका अनुसरण करता है । इस तरह से पूर्वापरभाव से अपनी प्रज्ञा के अनुसार चलते हुए ये सूर्य पाश्चात्यों की पद्धति के अनुसार जड नही मावे जा सकते, क्योंकि इनमें चैतन्य विद्यमान है । ये दोनो शिशु है, शिशु की तरह भ्रमण करते है, अतः ये अन्तरिक्ष में खेलते हुए यज्ञस्थल मे जाते हैं । इनमे से एक आदित्य सारे भुवनों को देखता है और वसन्त प्रभृति ऋतुओ का निर्माण करता है तथा दूसरा चन्द्रमा मास और पक्ष का विधान करता रहता है एवं बार बार उत्पन्न होता रहता है । यद्यपि उत्पत्ति दोनो की हो होती है, तो भी सूर्य की प्रवृत्ति सदा बनी रहती है, अतः यहां पर उसके उदय का उल्लेख नही किया गया है । इसके विपरीत चन्द्रमा तो सदा घटता-बढ़ता रहता है, अतः उसके पुनः उत्पन्न होने की बात का यहाँ उल्लेख है । हे वधू, मैं तेरा हाथ पकड़ता हू । किसलिये? सौभाग्य के लिये कि मुझ पति के साथ तुम वृद्धावस्था पर्यन्त रहो । भग, अर्यमा, सविता, पूषा, इन सब देवगणो ने तुमको मुझे सौंपा है कि मैं गृहस्थधर्म का ठीक से निर्वाह कर सकूँ । है गन्धर्वो>, तुम लोगो के सामने जैसे सूर्या को सोम के लिये सौंपा गया था, उसके आप लोग साक्षी थे । हे अग्नि, तुम भी हमको प्रजनन शक्ति के साथ इस पत्नी को हमारे लिये देने के साक्षी बनो । तुम दोनों इसी लोक में रहो, कभी तुम्हारा वियोग न हो, तुम दोनो पूरी आयु का उपभोग करो, पुत्र -पौत्रादि के बीच सदा आनन्द- पूर्वक गृहस्थाश्रम का उपभोग करो । सभी देवगण हम
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बेहार्थपारिजातः ११०५ प्रकाशयुक्तानि कुर्वत्वित्यर्थ । आपं च समञ्जन्तु । तथा मातरिश्वा से हृदयानि सन्दधातु आवयोर्बुद्धी: परस्परानु- कूला: करोत्वित्यर्थः । घाता च सन्दधातु । देष्ट्री दात्री फलानां सरस्वतीत्यर्थः, सा च सन्दधातु सन्धान करोतु । यदपि -'दशम मण्डले अन्त्येष्टिसस्कारसम्बन्धीनि पञ्च सूक्तानि सन्ति । तानि च प्रायेण भाविजन्म- सम्बन्धिदेवप्रार्थनायुक्तानि यमपित्रग्निपूषसरस्वतीसम्बद्धानि । वस्तुतस्त्वन्तिममेव सूक्तमन्त्येष्टिसम्बन्धि । तस्य रचनाशैली विषयश्च लौकिकौ । देवतायास्तत्र वर्णन नास्ति । भाषा प्रौढा भावोद्बोधिका गम्भीरोदात्ता च । अत्रैव सूक्त सर्वाधिकप्राचीनाया अन्त्येष्टिपद्धतेः परिचयो भवति । तैः सूक्त रेव ज्ञायते यत्तदानीमग्निदाहभूप्रवेशरूपौ द्विविधो शव्यौ सस्कारी भवतः स्म । सप्तममण्डलीये वरुणसूक्त मृतार्थे मृत्तिकानिर्मितगृहनिर्माणोल्लेखो दृश्यते, तथापि शवदहनपद्धतिरधिकैवासीत् । वैदिकसस्कारे दाह एव विहितः । यतीनां द्विवर्षन्यूनायुषां बालानामेव भूसस्कार. । शवदाहसमयेऽजस्य वलिर्भवति । अथर्वानुसारमजः प्रेतात्मन: पुरतश्चलति । तथैव ऋग्वेदे मध्यस्याश्वस्य पुरतो बलिदानाय दत्तोऽजोऽग्रदूतो भूत्वा देवान् सूचयति । प्राचीनपारम्पर्येण प्रेतात्मनां भाविजन्मन्युपभोगार्थमाभूषणानि वासांसि च समर्प्यन्ते । ऋग्वेदानुसारेणान्त्येष्टिसमये मृतव्यक्त: स्त्री मृतेन सार्धं सतीत्वमुपगच्छति । मृतस्य वीरस्य हस्ताद्धनु- रपसार्यते । प्राचीनकालादेवोभौ प्रेतात्मना सार्धं जन्मान्तरीयसंसार गच्छतः । अथर्ववेदीयेन चैकेन मन्त्रेण विधवायाः सतीत्वप्रथापुरातनत्व घोषितम् । मानवविकासशास्त्रमिद सतीप्रथा सेनानायकानामन्त्यसस्कारसमये प्रचलति स्म । प्रथा चेय भारोपीययुगादागच्छति । अन्त्येष्टि सूक्तस्याष्टमो मन्त्रः सती सम्बोद्धय चिताया उत्थाप्य नव्यपतिना सह दोनो के मन को दुःख आदि क्लेश से दूर रखकर लौकिक और वैदिक कार्यों के लिये प्रकाश भर दें । तथा मातरिश्वा पवन देवता, हम दोनो की बुद्धि को परस्पर अनुकूल कर दे । घाता अर्थात् ब्रह्मा और सभी फलो को देनेवाली सरस्वती भी हमारे हृदय को परस्पर मिला दे | 'ऋग्वेद के दशम मंडल मे ५ सूक्त है, जो अन्त्येष्टि संस्कार से सम्बन्ध रखते हैं । एक को छोडकर शेष सभी भावी जन्म से सम्बन्ध रखने वाले देवताओ की प्रार्थनाओ से युक्त है । पहला सूक्त यम को, दूसरा पितरो को, तीसरा अग्नि की, चौथा पूषा को और अन्तिम सरस्वती को सम्बोधित है । वास्तव में अन्तिम सूक्त ही सचमुच अन्त्येष्टि सूक्त है । इसकी रचनाशैली और विषय दोनो ही लौकिक है । इसमें किसी देवता का वर्णन नही है । इसकी भाषा प्रौढ, भावोद्बोधक तथा गम्भीर एवं उदात्त है । इस सूक्त में सर्वाधिक परिचय उस युग की अन्त्येष्टि-पद्धति के सम्बन्ध मे मिलता है । इन सूक्तो से ऐसा लगता है कि वैदिक काल में भारतीयों में अग्निदाह तथा भूप्रवेश दोनो ही तरह राव बर्ताया जाता था । सप्तम मंडल में वरुणसूक्त के निर्माता ने मृत्यु के सम्बन्ध मे मृत्तिका निर्मित गृह का उल्लेख किया है । तथापि अधिकतर प्रचलित प्रथा शवदहन की ही थी । आगे चलकर वैदिक सस्कार में अग्निदाह ही विहित है । केवल यतियो और दो वर्ष से कम आयु के बच्चो के लिये भूमि संस्कार बताया है । शवदाह के समय एक बकरे का बलिदान किया जाता था । अथर्ववेद के अनुसार वह बकरा प्रेतात्मा के आगे-आगे चलता है, ठीक उसी तरह जैसे ऋग्वेद के मेध्य अश्व के आगे -आगे बलिदान में दिया गया बकरा अग्रदूत बनकर देवताओ को सूचना देता है । प्राचीन-काल से चली आ रही परम्परा के अनुसार आज भी प्रेतात्मा के अगले जन्म मे उपयोगार्थ कुछ आभूषण तथा परिधान अर्पित किये जाते है । ऋग्वेद के अनुसार अन्त्येष्टि के समय मृत व्यक्ति की स्त्री अपने पति के साथ सती हो जाती थी । मृत वीर के हाथ से उसका धनुष हटा लिया जाता था । ये दोनों प्रथाएँ इस ओर संकेत करती हैं कि प्राचीन काल में ये दोनो प्रेतात्मा के साथ दूसरी दुनियाँ तक जाते थे 1। अथर्ववेद में तो एक ऐसा मन्त्र है, जो विधवा के सती होने की प्रथा को पुरातन घोषित करता है । मानव विकास शास्त्र यह प्रमाणित करता है कि सती प्रथा प्रायः सर्वत्र सेनानायको के अन्त्य संस्कार के समय प्रचलित थी । यह सिद्ध किया जा सकता है कि यह प्रथा भारोपीय युग से चली आ रही है । अन्त्येष्टि सूक्त का आठवाँ मन्त्र सती को सम्बोधित करता है, जिसमें उसे १३६
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११०६ वेदार्थपारिजातः ' ' पाणिग्रहणायादिशति । स च नव्यपतिर्मृतस्य भ्रातैव भयति । एतादृशी प्रथाऽप्यत्यन्तपुराणी उदीर्ष्वत्यादिना (पृ० ११५- ११७ ) इति । तदपि तुच्छम्, वेदार्थानवबोधात् । किञ्च, साम्प्रत त्वयैव ऋग्वेदे परलोकगमानुगुणा • क्रिया अभ्युपेताः । तेन पुनर्जन्मचर्चा वेदे नास्तीति पूर्वोक्तकथनमपास्तमेव । मृतस्य सकाशात् पत्नीमुत्थाप्य तस्या. पत्यन्तरस्वीकार- खण्डन तु दयानन्दीयमतखण्डनप्रसङ्गे पूर्वमुक्तमेव । सायणाचार्यरीत्या देवरः प्रेतपत्नीम् ' उदोर्ध्व नारि' इत्यनया भर्तृसकाशादुत्थापयेत् । ' तामुत्थापयेद्देवरः पतिस्थानीयोऽन्तेवासी जरद्दासो वोदावं नार्यभि जीवलोकम्' ( आश्व०गृ ०सू० ) - ' ४।२।१८ इति । मन्त्रस्तु उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोक गतासुमेतमुप शेष एहि । हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं यत्पत्युर्जनित्वमभिसम्बभूथ ||' (ऋ० स० १०।१८।८) । अथ मन्त्रार्थ: - हे नारि, मृतस्य पत्नि, जीवलोक जीवादीना पुत्रपौत्रादीना लोक स्थान गृहमभिलक्ष्य उदीर्ष्व अस्मात् स्थानादुत्तिष्ठ । गतासुमपक्रान्तप्राणमेत पतिमुपशेषे तस्य समीपे स्वपिषि । तस्मात्त्वमेहि आगच्छ । हस्तग्राभस्य पाणिग्राह कुर्वतः दिधिषोर्गर्भस्य निधातुस्तव अस्य पत्युः , सम्वन्धादागतमिद जनित्वं जायात्वमभिसम्बभूथ सभूतासि अनुमरणनिश्चयमकार्षीः तस्मादागच्छ । एतेन प्राचीनकालादेवानुमरणनिश्चयाद् देवरादयस्ता मृतपत्नीमुत्थापयन्ति । सत्या जीवनेच्छाया जीवेदन्यथाऽनुमरणेन पतिसहगमनमेव कुर्यात् । अन्त्येष्टि सम्बन्धिनोऽन्तिम-, सूक्तस्य शैलीभेदाद्विषयभेदाच्चामौलिकत्वकथनमपि साहसमात्रमेव सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वेन तस्याप्यपौरुषेयत्वाविशेषात् । एवमेव यद् दानस्तुति सम्बन्धिसूक्तसम्बन्धेऽर्वाचीनत्व शङ्कितम्, तत्तु पौभागित्वमेव, अनुपदमपौरुषेयत्वेन समाहितत्वात् । चिता से उठकर अपने नये पति के साथ पाणिग्रहण के लिये आदेश है । यह नया पति निश्चित ही मृत पति का भाई होता था । इस प्रकार की प्रथा बहुत पुरानी है' इत्यादि । यह सारा कथन वेदार्थ का ठीक से परिज्ञान न होने के कारण है । यह भी आश्चर्य हो है कि अभी यहाँ पर तो आप ऋग्वेद मे परलोक गमन के अनुगुण क्रियाकलापो की सत्ता स्वीकार करते है, किन्तु इससे पहले आप ही कह आये है कि वेद मे कही भी पुनर्जन्म की चर्चा नही है । आपका यह मत इस तरह की परस्पर विरुद्ध उक्तियो से अपने आप खडित हो जाता है । मृत व्यक्ति के पास से पत्नी को उठाकर उसका पत्यन्तर को स्वीकार कराना जैसी बातो का खण्डन हम दयानन्द के मत का खण्डन करते समय कर चुके है | सायगाचार्य के अनुसार इस प्रसंग का विवरण इस प्रकार से है - देवर प्रेत को पत्नी को 'उदीर्ध्व नारि' इस मन्त्र से अपने पति के पास से उठावे । आश्वलायन गृह्यसूत्र मे कहा गया है कि 'उदोर्ध्व नारि' इस मन्त्र से पतिस्थानीय देवर, अन्तेवासी अथवा कोई वृद्ध दास उस प्रेत की पत्नी को उठावे । मन्त्र का अर्थ यह है -हे नारि, हे मृत व्यक्ति की पत्नी, जोवलोक अर्थात् पुत्र-पौत्रादि के लोक निवासस्थान अपने घर को जाने के लिये इस स्थान मे तुम उठो । तुम इस गतासु, प्राणरहित अपने पति के पास सोई हुई हो । इसलिय तुम आ जाओ । पाणिग्रहण करने वाले, तुममे गर्भ का स्थापना करने वाले इस पति के सम्बन्ध से आये हुए इस जायात्व का निर्वाह तुमने अनुमरण का निश्चय करके सफल कर दिया है, इसलिये अब तुम आ जाओ । प्राचीन काल से ही इस तरह का अनुमरण का निश्चय करने वाली मृतक की पत्नी को इसी तरह से उठाते चले आ रहे है । इससे यही सिद्ध होता है कि यदि मृतक की पत्नी को जीने की इच्छा है, वह इनके कहने से उठ जाय, अन्यथा अनुमरण से द्वारा पति के साथ जाने का निश्चय करे । अन्त्येष्टि सम्बन्धी अन्तिम सूक्त की शैली और विषयभेद के आधार पर उसको अमौलिक अर्थात् नवीन सिद्ध करना भी दुःसाहसमात्र है, क्योंकि सम्प्रदाय की अविच्छिन्नता और अस्मयं माणकर्तृकता अपौरुषेयता के प्रयोजक है, ये दोनों लक्षण इस सूक्त में भी समान रूप में विद्यमान है । इसी तरह से दानस्तुति से संबद्ध सूक्तों को नवीन मानना भी ( पृ० ११८- ११ ९ ) स्वेच्छाचार मात्र है । अपौरुषेयता के आधार पर अभी हमने उसका समाधान कर दिया है ।
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वेदार्थपारिजातः ११०७ - - — ' यदपि हितोपदेश सूक्तसम्बन्धे द्यूतकृद्विलाप म्बन्धे चोकम् नीचा वर्तन्त उपरि स्फुरन्त्यहस्तासो हस्तवन्त सहन्ते ॥ दिव्या अङ्गारा इरिणे न्युप्ता शीता सन्तो हृदय निर्दहन्ति ॥ स्त्रिय दृष्ट्वाय कितव ततापान्येपा जाया सुकृत च योनिम् । ' (ऋ० स० १०।३४ ९, ११ ) यच्च तद्रचनासु प्राचीनत्वार्वाचीनत्वादिकं कल्पितम्(पृ० ११ ९- १२० ), तदपि न किञ्चित्, साम्प्रदायिकत्वेन समस्तस्य ऋग्वेदस्यानादित्वात् | 'अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः । तत्र गावः कितव तत्र जाया तम्मे वि चष्टे सविताऽयमर्थ्य ॥ ' इत्यादयो वैदिका - उपदेशास्तु प्रसिद्धा एव । मन्त्रार्थस्तु एते अक्षा नीचा नीचीनस्थले वर्तन्ते तथापि उपरि पराजयात् भीतानां द्यूतकाराणा हृदयस्योपरि स्फुरन्ति । अहस्नासो अध्यक्षा हस्तवन्तं किनव सहन्ते पराजयकरणेनाभिभवन्ति । दिवि भवा अपकृता अङ्गारास्तत्सदृशा अक्षा इरिणे इन्धनरहिते आस्फारे न्युप्ताः शीताः सन्तो हृदय निर्दहन्ति पराजय- जनितेन सन्तापेन भस्मीकुर्वन्ति । - यदपि – जगदुत्पत्तिबोधकसूक्तानां विचारा स्पष्टा न सन्तीति, तदपि यत्किञ्चित् वैदिकपारम्पर्य- मन्तरा वेदार्थावगमासम्भवात् । यदुक्तम्-'प्राचीनर्षीणां मतेन देवताभिर्मिलित्वा जगदुत्पादितम्, परमिय दृष्टिर्द्यावा- पृथिव्योर्जगन्मातापितृत्वोक्त्या विरुद्धयते । ऋषिगणाः परस्परं विरुद्धानर्थानुक्तवन्तः । यथा पुत्रो मातापित्रोर्जनक ' । उदाहरणार्थमिन्द्रस्य मातापितरौ तद्देहादुत्पन्नौ । पुरोहितैविषयाणा रोचकत्वाय तादृश्यः कल्पनाः कृताः । कथञ्चित्तदा- कर्षण विकर्षणस्तेषा मन्त्राणामर्था लाप्यन्ते । अदितेर्दक्षोऽजनिष्ट, अदितिश्च दक्षादुत्पन्नेति ( पृ ० १२५ ), तदपि व्यामोह- मूलकमेव, पारम्पर्येण वैदिकैस्तत्स्वारस्यवर्णनात् । तथाहि- क उ नु ते महिमनः समस्याऽस्मत् पूर्व ऋषयोऽन्तमापुः । यन्मातरं च पितरं च साकमजनयथास्तन्वः स्वायाः ॥ ' (ऋ० सं० २०३५४ ३ ) । अस्यायमर्थ: --हे इन्द्र, ते महिम्नः समस्य सर्वस्यापि अन्त पार अस्मत् अस्मत्तः पूर्व ऋषय के आपु आप्नुवन्? न केऽपीत्यर्थः । यद्यपि अद्यापि महत्त्वं प्रख्यापयन्ति तथापि न कार्त्स्न्येन । तत्र कारणमाह -यत् यस्मात मातरं च 'द्यौ पिता पृथिवी माता' (तै ० ब्रा० ३| ७| ५| मैकडानल ने हितोपदेश सूक्तो के सम्बन्ध में ' द्यूतकार का विलाप' नामक सूक्त की चर्चा की है और ' नीचा वर्तन्त' इस मन्त्र को उद्धृत कर इनकी प्राचीनता- अर्वाचीनता का विचार किया है ( पृ० ११ ९-१२० ) । यह कथन भी गलत है । साम्प्रदायिक रूप से समस्त ऋग्वेद अनादि है । 'अक्षेर्मा दोव्य. ' इत्यादि मन्त्रो से निर्दिष्ट वैदिक उपदेश सर्वसाधारण में प्रसिद्ध है । उक्त मन्त्र का ---- अर्थ यह है – ये अक्ष, जुआ खेलने के साधनभूत पासे यद्यपि नीचे रहते है, तो भी ये पराजय से भयभीत जुआडी के हृदय पर पैर घरे रहते हैं । यह पासे बिना हाथ के है, तो भी हाथ वाले जुआडी को पराजित कर देते हैं । आकाश में उत्पन्न उल्का के समान ये पासे जब इन्धन रहित चौसर पर गिराये जाते हैं, तो उस समय शीतल रहते हुए भी ये पराजय से उत्पन्न सन्ताप से जुआडी के हृदय को जला डालते है | मैकडानल ने यह भी कहा है कि जगत् की उत्पत्ति के बोधक सूक्तो में विचार स्पष्ट नही है (पृ० १२५ ) । यह कथन भी गलत है, वैदिक परम्परा के बिना वेदार्थ की अवगति सही रूप से नही हो सकती । 'प्राचीन महर्षियो के मत से समस्त देवताओ ने मिलकर जगत् को उत्पत्ति की, परन्तु यह दृष्टि उस धारणा के साथ असमंजस लगती है, जिसमे द्यावापृथिवी को देवताओं के माना- पिता बताया है । यो कहना होगा कि इस विषय में ये ऋषिगण कुछ परस्परविरोधी ऐसी बातें कह गये हैं, जैसे पुत्र अपने पिता का जनक हो । उदाहरणार्थ, स्पष्ट शब्दो में बताया गया है कि इन्द्र के माता-पिता स्वयं इन्द्र के शरीर से प्रादुर्भूत हुए है । इस प्रकार की उत्प्रेक्षाएँ पुरोहितो की कल्पना के लिये एक रोचक विषय बन जाता था । इनमें बडी खीचातानी से अर्थ निकालने पडते है । वहाँ यह भी कहा गया है कि दक्ष अदिति से पैदा हुए और अदिति दक्ष से पैदा हुई ( पृ० १२५) यह सारा कथन अज्ञानमूलक है, वैदिक विद्वानो ने इन सब स्थलों का परम्परागत अभिप्राय बताया है । जैसे कि 'क उ नु ते ' इस मन्त्र का अर्थ यह है-हे इन्द्र, तुम्हारी सारी महिमा को हमसे पहले उत्पन्न हुए ऋषिगण भी कहाँ जान सके है? यद्यपि वे आज भी आपकी महिमा का वर्णन करते हैं, किन्तु वे आपकी पूरी महिमा को नही बता पाते । इसमें कारण यह है कि तुमने अपने माता और पिता को तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार आकाश और पृथ्वी को, दोनों को एक साथ
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११०८ वेदार्थपारिजातः ४-५ ) ते उभे अपि साकं सहैव स्वायास्तन्वाः स्वकीयाच्छरीरात् अजनयथा उदपादयः । अतो नापुरिति । अस्मिन्नेव सूक्त' 'चत्वारि ते असुर्याणि नामादाभ्यानि महिषस्य सन्तीति मन्त्रं इन्द्रस्य चत्वारि नामान्युक्तानि । तत्रैव ५५ सूक्त' 'महत्तन्नाम गुह्यं पुरुस्पृग् येन भूतं जनयो येन भव्यम् । प्रत्न जात ज्योतिर्यदस्य प्रिय प्रियाः समविशन्त पञ्च ॥ इत्युक्तम् । हे इन्द्र, तद् गुह्यं गोपनीयमन्यैरविज्ञातं पुरुस्पृक् बहुभिर्वृ ष्टथिभिः स्पृहणीयमाकाशात्मक नाम शरीर महत् अत्यन्तं प्रवृद्ध येन नाम्ना भूत भव्यं च पूर्वं जनयः उत्पादितवानसि । आकाशात्मकाद्धि परमेश्वरस्वरूपाद् भूतभव्यात्मकं जगदुत्पद्यते । 'आकाशाद्वायु:' ( तै ० आ० ८1१ ) इति श्रुतेः । किञ्च 9 प्रत्न पुराण पूर्वकालीनं यज्ज्योतिः द्योतमान - मादित्याख्यमुदकाख्यं वा अस्य इन्द्रस्य प्रिय प्रियभूतं तत्त्व जातम् । प्रियाः प्रीयमाणाः पञ्चजना इति शेष 1। भीमसेन- भीमवदेकदेशलक्षणा निषादपञ्चमाश्चत्वारो वर्णाः समविशन्त स्वनिर्वाहार्थ भजन्त इत्यर्थः । तथा चेन्द्रस्याकाशात्म- कात् परमेश्वररूपाद् भूतभव्यात्मक सर्वं जगदुत्पद्यते । आसमन्तात् काशते इत्याकाशं ब्रह्म । ' आकाशस्तल्लिङ्गात्' ' 'इति न्यायात् । तस्मादेवेन्द्रशरीरान्मातापितृरूपी द्यावापृथिव्या उत्पद्येते इति ॥ इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ( ऋ० सं ०६।४७।१८ ) इत्यनेन्द्रपदेन परमेश्वरस्य ग्रहणात् परमेश्वरस्य सर्वदेवात्मकत्वात् । परमेश्वरात् प्रपञ्चोत्पत्तिः सर्वदेवेभ्योऽपि जगदुत्पतिः सिद्धयति ॥ त्रयस्त्रिशत्सख्याकानां देवाना प्राणेऽन्तर्भाव उक्तो बृहदारण्यके ॥ प्राणश्च परब्रह्मरूपमेव । परब्रह्मणः परमकारणत्वेऽप्यवान्तरकाणत्व तु तत्तद्देवतानामेव । तत एव द्यावापृथिव्योरपि सर्वमातापितृत्व सङ्गच्छते । ' भूजंज्ञ उत्तानपदो भुव आशा अजायन्त । अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि ॥' (ऋ० सं० १०।७२।४ ) अत्र सायणाचार्यः – भूः उत्तानपदोऽजायत । ततः पूर्वं देवाना युगे प्रथमेऽसतः सदजायत तदाशा अभ्वजायन्त तदुत्तान-पदस्पयि । पूर्वे युगे नामरूपवजितत्वेनासत्समानाद् ब्रह्मणः सकाशात् सत् नामरूपविशिष्टं देवादिकम् अजायत । ही अपने शरीर से उत्पन्न किया है । इसलिये वे आपकी महिमा का पार नही पा सके हैं । उसी सूक्त के 'चत्वारि ते' इस मन्त्र में इन्द्र के चार नाम बताये गये है । ऋग्वेद में ही दशम मण्डल के ५५वें सूक्त में एक मन्त्र है-' महत्तन्नाम गुह्यं । इसका यह अर्थ है - हे इन्द्र, आपका अत्यन्त गुह्य नाम, जिसको कोई जान नही पाता, किन्तु जो सबके लिये स्पृहणीय इसलिये है कि आप ही वृष्टि करने वाले आकाश हैं । यही आपका शरीर है । आपका यह अत्यन्त तेजस्वी नाम ही भूत और भव्य सारी सृष्टि का जनक है । 'आकाशाद्वायुः' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति के प्रमाण से यह सिद्ध है कि परमेश्वर के आकाशात्मक स्वरूप से ही भूत और भव्यात्मक यह सारा जगत् उत्पन्न होता है । अपि च, इस इन्द्र का अत्यन्त प्रिय तत्त्व, जो कि बहुत प्राचीनकाल से द्योतमान आदित्य के रूप में अथवा उदक के रूप में अवस्थित है, इसी से उत्पन्न हुआ है । प्रिय अर्थात् प्रीयमाण पचजन अपने निर्वाह के लिये आपकी ही स्तुति करते हैं । यहाँ पर जैसे भीमसेन पद का बोध उसके एक देश भीम से भी हो जाता है, उसी तरह से पंचजन पद से निषाद सहित चार वर्णों का बोध होता है । इस मन्त्र से स्पष्ट है कि इन्द्र के आकाशात्मक परमेश्वर स्वरूप से भूत और भावी सारे जगत् की उत्पत्ति होती है । जो चारो ओर प्रकाशित होता है, इस व्युत्पत्ति के आधार पर यहाँ पर आकाश ब्रह्म को ही कहा गया है । 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' इस ब्रह्मसूत्र मे इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है । इसी आकाशात्मक ब्रह्मस्वरूप इन्द्र के शरीर से सबके पिता और माता स्थानीय द्यौ और पृथिवी का जन्म होता है । 'इन्द्रो मायाभिः' यहाँ पर भी इन्द्र पद से परमेश्वर का ही ग्रहण किया गया है । परमेश्वर सर्वात्मक है । परमेश्वर से प्रपच की उत्पत्ति होती है, तो यह भी कहा जा सकता है कि सभी देवताओं से जगत् की उत्पत्ति होती है । बृहदारण्यक उपनिषद् में ३३ देवताओ का प्राण में अन्तर्भाव बताया गया है । यह प्राण भी परब्रह्म स्वरूप ही है । परब्रह्म यद्यपि सारे प्रपंच का परम कारण है, तथापि उन उन देवताओ की अवान्तरकारणता भी मानने मे कोई बाधा नही है । इस तरह से द्यो और पृथिवी को सबके माता-पिता माना हो जा सकता है । ' भूर्जज्ञ' इत्यादि मन्त्र अदिति से दक्ष की और दक्ष से अदिति की उत्पत्ति बताता है । इसका सायणाचार्य संमत अर्थ यह है- पृथ्वी की उत्तानपाद से उत्पत्ति हुई । यहाँ पर प्रसंग यह है कि पुराकाल में देवयुग में पहले असत् से सत् की उत्पत्ति हुई, उसके बाद दिशाएं और तब वृक्षादि की सृष्टि हुई । इसका अभिप्राय यह है कि यह पूर्वयुग नाम और रूप से रहित होने से असत् के बराबर
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वेवार्थपारिवदतः ११०६ ' ' ( ),. असद्वा इमग्र आसीत् ततो वे सदजायत तै ० उ० २७ कयमसत सज्जायेतेत्यसत्कारणत्वमाक्षिप्य ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छा ० उ० ६ २ २ ) इत्यवधारितत्वात् । तहि कथमदितेर्देवाद्युत्पत्तिरिति चेन्न, अदिते- रवान्तरकारणत्वोपपत्ते । एवमसत उपादानकारणाद् ब्रह्मणो देवादिक सदजायत । तत उत्तानपदो वृक्षा अजायन्त । यद्वोत्तानपाद्राजा य ऐतिहासिक सोऽजायत । तस्माद् भूस्तद्वदचलो ध्रुवोऽजायत । तस्माद् ध्रुवाद् आशा अजायन्त । तस्य निःसाधनस्य बालस्यापि तपोबलाद् ध्रुवपदप्राप्तिदर्शनेन जनेष्वाश सञ्चारात् । ध्रुवतारायाः स्थिरत्वात् तद- उत्तानमूर्ध्वतानं पेक्ष्यैव दिक्परिज्ञानसम्भवाद्वा । आशा दिशस्तस्मादजायन्त इत्यौपचारिको व्यवहारः ॥ पद्यन्ते इत्युक्त्तानपदो वृक्षाः । तथा चोत्तानपदो वृक्षाद् भूरजायत । भुवः सकाशादाशा अजायन्त । तथा अदितेर्दक्षोऽजायत दक्षादु दक्षादपि अदितिः परि अजायत । ननु न स्वोत्पन्न कार्यं स्वस्यैव कारणमिति विप्रतिषिद्धमिति चेन्न, माहा- - भाग्येन देवेषु परस्परप्रकृतित्वेन दोषाभावात् । तदुक्तं यास्केन –' समानजन्मानौ स्यातामित्यपि वा, देवघर्मेणेतरेतर. जन्मानो स्यातामितरेतरप्रकृती' (नि ० ११।२३ ) । समनन्तरजन्मानौ समानजन्मानो । महदात्मना हिरण्यगर्भात्मनाऽदितेः कारणत्व दक्षस्य च कार्यत्वम् । अथवा महदात्मना दक्षमपेक्ष्यादितेः कार्यत्वम् । यदुक्तम्—'ऋग्वेदप्रतिपादितधार्मिकविचारविकासपरिणामवशात् सर्वदेवताभ्यः श्रेष्ठस्यैकपुरुषस्य कल्पना प्रसूता । नासदीय सूक्तेषु पुरुषविश्वकर्महिरण्यगर्भप्रजापतिनामभिः स एव सङ्केतितः । प्राचीनमतेषु जगत्सृष्टेरुत्पत्तिः प्रकृतेः सकाशादधिगता । जायत इति क्रियया जगदभिधानम् । परम्त्वेतेषु सूक्तेषु जगत् कस्माच्चिन्मौलिकात्तत्त्वात् प्रादुर्भूतं विकास वोपगतम् । पुरुषसूक्ते देवताः केवलमुपकरणभूता एव । यस्मादुपादानाज्जगदुत्पद्यते तत्पुरुषशरोरमेव । था । उस ममय असत्स्वभाव ब्रह्म से सत्स्वभाव अर्थात् नाम और रूप से विशिष्ट देवादि की सृष्टि हुई । तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है कि पूर्वयुग मे सब कुछ असत्स्वभाव था, उससे सत् की उत्पत्ति हुई । छान्दोग्य उपनिषद् में असत्कारणता पर यह आक्षेप किया है कि असत् से सत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? फिर उसका समाधान किया गया है कि हे सोम्य, पूर्वयुग में भी यह सब कुछ सत्स्वभाव ही था । जब सत् से सब कुछ उत्पन्न हुआ है तो फिर अदिति से देवादि की उत्पत्ति की बात का क्या होगा? उत्तर है कि यहा पर अदिति को अवान्तर कारण माना जायगा । इस तरह से उक्त मन्त्र के असत् पद का अर्थ सारे जगत् का उपादानकारण ब्रह्म है, उस ब्रह्म से सत् अर्थात् देवादि की उत्पत्ति होती है । देवताओ से वृक्षो की अथवा उत्तानपाद नाम के ऐतिहासिक राजा की उत्पत्ति हुई । तथा इससे पृथ्वी के समान अचल ध्रुव की उत्पत्ति हुई । उस ध्रुव से दिशाएं पैदा हुईं । दिशाओ का नाम आशा इसलिये है कि इस बिना साधन सहायता वाले ध्रुव नाम के बालक को अपने तपोबल से हुई ध्रुव स्थान की प्राप्ति को देखकर साधारण मनुष्यों के मन में भी आशा का संचार हुआ था । ध्रुव तारा स्थिर है, अथवा उसको देखकर ही दिशाओ का सही परिज्ञान होता है, इसलिये दिशाएं ध्रुव से पैदा हुईं, यह औपचारिक व्यवहार किया जाता है । जो ऊपर की ओर अपना विस्तार करते है, इस व्युत्पत्ति के अनुसार वृक्ष उत्तानपाद कहलाते है । इस व्युत्पत्ति के आधार पर वृक्षो से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई । पृथ्वी से दिशाएं पैदा हुईं तथा अदिति से दक्ष तथा दक्ष से अदिति उत्पन्न हुए । प्रश्न है कि अपने से उत्पन्न हुआ कार्य अपना ही कारण कैसे हो सकता है? यह तो परस्परविरुद्ध बात है? इसका उत्तर है कि देवता महान् भाग्यशाली, ऐश्वर्यवान् होते है । इनमे परस्पर एक दूसरे के कार्यकारणभाव को मानने में भी कोई दोष नही है । यास्क ने ' समानजन्मानो ' इत्यादि से देवताओ के इस माहाभाग्य का ही विवरण दिया है । यहा पर ' समानजन्मानो' का अभिप्राय समनन्तर जन्म से है, अर्थात् अदिति और दक्ष की अपने अपने महदैश्वर्य के कारण एक दूसरे के बाद उत्पत्ति होती है । महत् अर्थात् हिरण्यगर्भात्मक अदिति से दक्ष की उत्पत्ति होती है । इस तरह से अदिति कारण और दक्ष कार्य होते है और जब दक्ष को महदात्मक स्वीकार किया जाता है तो दक्ष कारण और अदिति कार्य हो जाती है । ऋग्वेद में प्रतिपादित धार्मिक विचारों के विकास को परिणाम यह हुआ कि सब देवताओ से श्रेष्ठ एक परम पुरुष की कल्पना प्रसूत हुई । उसका वर्णन नासदीय सूक्त में पुरुष, विश्वकर्मा, हिरण्यगर्भ और प्रजापति के नाम से दिया है । प्राचीन मत में जगत् की सृष्टि एक प्राकृतिक उत्पत्ति मानी गई है । जगत् का अभिधान ' जायते ' इस क्रिया पद से किया है । परन्तु इन सूक्तों में जगत् को किसी आधारभूत मौलिक तत्त्व से विकसित अथवा प्रादुर्भूत माना है । पुरुष सूक्त में देवता केवल सहायक उपकरण है और
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१११० वदार्यपारिजातः स च सहस्रशीर्षा सहस्रपात् । स च समस्तपृथिवी व्याप्यापि ततोऽतिरिच्यते । एतस्मात् पुरुषाज्जगत्सर्गभावना , वस्तुतोऽतिप्राचीना ॥ प्राचीनकथास्वनेकासु तदुल्लेखः । तथाप्यस्मिन् सूक्ते यथा सा भावनाऽभिव्यक्तिमुपगता सात्यन्तमर्वाचीनैव । ब्राह्मणग्रन्थेभ्यो यज्ञो विष्णुरवगम्यते, जगदुत्पत्तिश्च यज्ञियविधि । मूलपुरुषस्तत्र बलिरूपेणाव - स्थापितः । तस्यावयवा आलम्भनानन्तर जगतो विभिन्नभागाः सम्पन्नाः । तस्य शीर्षा आकाशो नाभिर्वायुः पादौ पृथिवी । मनसश्चन्द्रस्य चक्षुषः सूर्यस्य निःश्वासात् पवनस्योत्पत्ति । अनया रीत्या देवताभिस्त्रिलोकी निर्मिता । उत्तरकालीना पुरुषसूक्तस्य रचना । वहुदेववादस्तल्लिङ्गम् । पुरुष एव जगत् । यद् भूतं यच्च भव्य तस्यैकचतुर्थांशे मर्त्यप्राणिनस्तिष्ठन्ति । त्रयोऽशाः स्वर्गवासिनाममराणां लोकाः । ब्राह्मणग्रन्थेषु प्रजापतिरेक. । उपनिषत्सु स एव जगद्रूपः । तदनन्तर द्वैतवादिसांख्यशास्त्रे आत्मनः पुरुष इत्याख्या । स च प्रकृते. पृथक् । पुरुषसूक्ते विरारूप एक आत्मा यस्योत्पत्तिः पुरुषाज्जाता । स एव पुरुष उत्तरमीमासाया सोपाधिको जगत्स्रष्टा भवति । स च सर्वव्यापिनो ब्रह्मणो भिन्नो भवति । तस्मात् पुरुषसूक्त भारतीय बहुदेववादिसाहित्यस्य सर्वप्राचीनः कल्पः, ऋग्वेदस्यान्तिमरचना च । वेदत्रय्याः परिचितोऽय ग्रन्थो यतस्तत्र तेषामुल्लेखः । अस्मिन्नेव सूक्ते सर्वप्रथममन्तिम च यत्तत्र कण्ठतश्चातुर्वर्ण्य- स्योल्लेखः । पुरुषस्य मुखाद् ब्राह्मणो बाहुभ्यां राजन्यो वैश्य ऊरूभ्या पद्द्भ्यां शूद्रोऽजायत । सृष्टिसम्बद्धेषु सर्वेष्वेव ., सूक्तेषु प्रजापतेरेव सृष्टिरुक्ता । देवाना समष्टे कर्तृत्वं तत्र नाभ्युपगतम् । क्वचित्सूर्यो मुख्यः कर्ता स एव च सकलस्य जगत आत्मास्ति । एक. सन्नपि सोऽनेक । तेन तदानी प्रजापतिरूपेण सवितुः सूर्यस्य कल्पना निर्माण- प्रक्रियायामासीत्' (पृ० १२६ - १२८ ) इति । उपादान कारण, जिससे जगत् की उत्पत्ति हुई, वास्तव में पुरुष का शरीर है । वह सहस्रशीर्ष तथा सहस्रपात् है । यह समस्त पृथ्वी को व्याप्त करने पर भी शेष है । इस महापुरुष से जगत्सर्ग की मूलभावना वास्तव में बहुत पुरातन है । इसका उल्लेख कई प्राचीन कथाओ मे मिलता है । तथापि इस सूक्त में जिस तरह इस भावना को अभिव्यक्त किया है, वह बहुत कुछ अर्वाचीन प्रतीत होती है । ब्राह्मण ग्रन्थो में विष्णु यज्ञस्वरूप है और जगदुत्पत्ति यज्ञिय विधि है । मूल पुरुष यहाँ बलि के रूप में स्थायी है । उसके विभिन्न अवयव आलम्भन के पश्चात् जगत् के विभिन्न भाग बन गये है ॥ कहा जाता है कि उसका मस्तक आकाश बना, उसकी नाभि वायु, उसके चरण पृथ्वी बने । उसके मन से चन्द्रमा की 3 चक्षु से सूर्य की तथा निश्वास से पवन की सृष्टि हुई । इस प्रकार देवताओ ने त्रिलोकी का निर्माण किया । यह सूक्त एक उत्तरकालीन रचना है । उसका एक चिह्न बहुदेववाद है । इस सूक्त में कहा है- पुरुष ही जगत् हैं, जो पहले था और भविष्य में होगा; उसके एक चतुर्थाश मर्त्यलोक के प्राणी है और उसका तीन चतुर्थांश स्वर्गवासी अमरो का लोक है । ब्राह्मण ग्रन्थो मे पुरुष और प्रजापति एक हैं । उपनिषदो मे वह जगत् स्वरूप है और आगे चलकर द्वैतवादी साख्यदर्शन मे पुरुष आत्मा का ही नाम है, जो प्रकृति से पृथक् है । पुरुष सूक्त में एक आत्मा विराज रूप है, जिसकी उत्पत्ति पुरुष से मानी गई है । यही पुरुष उत्तर मीमासा अर्थात् वेदान्त दर्शन मे उपाधि रूप से जगत् स्रष्टा है, जो सर्वव्यापी ब्रह्म से भिन्न है । अत एव पुरुष सूक्त भारतवर्ष के बहुदेववादी साहित्य का सबसे प्राचीन कल्प है । साथ ही साथ यह भी सिद्ध है कि ऋग्वेद की यह सबसे अन्तिम रचना ,,, । कारण यह वेदत्रयी से परिचित है जिनका नामोल्लेख इसमें मिलता है । यही एक ऐसा सूक्त है जिसमे पहले पहल और अन्तिम बार चार वर्णों का कण्ठतः उल्लेख है । कहा है-ब्राह्मण पुरुष के मुख है, उसके बाहु राजन्य, वैश्य उसके ऊरु, और शूद्र उसके चरण है । जगत्सृष्टि से संबद्ध लगभग सभी सूक्तो में प्रजापति को ही प्राय. कर्ता बतलाया गया है । देवताओ की समष्टि को कर्तृरूप नही माना है । अन्य सूक्तों में कई सन्दर्भ ऐसे है, जिनमें ऋषियों ने जगदुत्पत्ति का मुख्य कर्ता सूर्य को बताया है । उसे सकल जगत् की आत्मा कहा है और यह भी कहा है कि वह एक होते हुए भी उसके नाम अनेक है । यह उक्ति इस बात को प्रकट करती है कि उस समय प्रजापति के रूप में सविता सूर्य की कल्पना निर्माण की प्रक्रिया में थो ' (पृ० १२६-१२८ ) ।