वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 211–220

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 211–220

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वदार्थ पारिजातः ११११ तदपि भारतीयवैदिकपारम्पर्य वैधुर्य मूलकमेव, समन्वयपद्धत्यनवगनात् । वेदस्य 'अनुश्रव' इति नामान्तरम् । गुरोर्मुखादनुश्रूयत इत्यनुश्रवो वेद इति तदर्थ । तस्मान्न वेदानामुत्पत्ति' क्वचिदप्यभिप्रेता । श्रूयत एव पर न केनापि क्रियते । यत्र यज्ञात्तदुत्पत्ति श्रूयते, सापि सम्प्रदायप्रवर्तनारूपैव विज्ञातव्या, नित्यत्वश्रवणात् । नहि नित्यस्य सम्भवत्यन्यादृशी उत्पत्तिः । तस्मादन्तिमरचना पुरुषसूक्तमित्यपाक वचनम् । पुरुषसूक्तस्य नागदीयसूक्तानां च समन्वय एवास्ते, सायणादिभिस्तथैव व्याख्यातत्वात् । नहि वैदिकात् सिद्धान्तात् प्राचीनं किमपि मतमासीत्, तस्यानादि-त्वात् । तस्मात् प्राचीनमते प्रकृतेर्जगदुत्पत्तिर्मन्यते स्मेति कथनमपि निर्मूलम् । वैदिक सिद्धान्तरीत्यापि शक्तिविशिष्टस्यैव ब्रह्मणो जगदुपादानत्वम्, कूटस्थस्य ब्रह्मणस्तदसम्भवात् । सा शक्तिरेव कैश्चित् प्रकृतित्वेनाभिप्रेता । वैदिकानां रीत्या सा तत्त्वान्यत्वास्या निर्वक्त, मनहऽनिर्वचनीया, सांख्यरीत्या तु सा स्वतन्त्रेत्येतावान् विशेषः । सोपाधिकं ब्रह्मव मूलतत्त्वमुपाधिरपि तच्छक्तिरेव । शक्तिदृष्ट्या जगत् तत्परिणामभूतम् । कूटस्थब्रह्मा-पेक्षया विवर्तात्मकम् । पुरुषशब्देनान्यत्र कूटस्थ आत्मा विवक्षितः । यथा - 'पुरुषान्न पर किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः' ( कठो ० ३।११ ) । पूर्षु शयनात् पूर्णत्वाद्वा पुरुषः । तादृश एवं पुरुषः सांख्यैरप्यभ्युपगम्यते । नानात्वेन वस्तु-परिच्छित्तिस्तु तत्राधिका । हिरण्यगर्भोऽपि पुरुषशब्दवाच्यः, तस्यापि पूर्णत्वात् । समष्टिसूक्ष्मशरीराभिमानी चेतनो हिरण्यगर्भः, सूक्ष्मशरीरेषु प्राणस्य बुद्धेश्च प्राधान्यात् । प्राणप्राधान्येन सूत्रात्मा बुद्धिप्राधान्येन हिरण्यगर्भश्चोच्यते । विश्वकर्म प्रजापत्यादिशब्दाश्च तत्र प्रयुज्यन्ते । यद्यपि प्रजापतिशब्दः कश्यपादौ चतुर्मुखे ब्रह्मणि च प्रयुज्यते, हिरण्यगर्भे यह सब भारतीय वैदिक परम्परा के अज्ञान के कारण है, क्योकि वैदिक वाक्यों का परस्पर समन्वय कैसे किया जाता है, इसको पाश्चात्य विद्वान् समझ नही पाते है । वेद को अनुभव भो कहा जाता है । उसका अर्थ यह है कि जिसको गुरु के मुख से उच्चारित होने के बाद सुना जाता है । इस तरह से वेदो की उत्पत्ति किसी भी तरह से अभिप्रेत नही है, क्योकि वेद केवल सुना जाता है, उसकी कोई रचना नही करता । जहाँ पर यज्ञ से वेद की उत्पत्ति मानी गई है, उसका अभिप्राय केवल वैदिक सम्प्रदाय की प्रवृत्ति से है, क्योंकि वेद तो सर्वथा नित्य है । सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के सिवाय अन्य किसी तरह की उत्पत्ति नित्य की नही मानी जा सकती । इसलिये पुरुष सूक्त को ऋग्वेद की अन्तिम रचना मानना सर्वथा निरर्थक बात है । पुरुष सूक्त और नासदीय सूक्त एक समन्वित ब्रह्म के ही बाधक है, इनमें परस्पर कोई विरोध नही है, सायण प्रभृति आचार्यों ने इनकी व्याख्या इसी पद्धति से की है । वैदिक मत से प्राचीन अन्य कोई सिद्धान्त नही था, क्योकि उसको अनादि माना जाता है । इसलिये प्राचीन मत मे प्रकृति से जगत् की उत्पत्ति मानी जाती थी, यह कथन निराधार है । वैदिक सिद्धान्त के अनुसार भी शक्तिविशिष्ट ब्रह्म ही जगत् का उपादान माना जाता है, क्योकि कूटस्थ ब्रह्म सृष्टि मे प्रवृत्त नही होता । उस शक्ति को ही कुछ दार्शनिक प्रकृति मान लेते है । वैदिको की पद्धति से ब्रह्म की वह शक्ति तत्त्व तथा अम्यत्व के रूप मे नही समझाई जा सकतो, अतः अनिर्वचनीय मानी जाती है और साख्य दर्शन की पद्धति से वह स्वतन्त्र है | वेदान्त और साख्य मे शक्ति या प्रकृति के स्वरूप में मात्र इतना ही भेद है । सोपाधिक ब्रह्म हो इस जगत् का मूल तत्व है । उपाधि उसकी शक्ति ही है । शक्ति की दृष्टि से जगत् उसका परिणाम है और कूटस्थ ब्रह्म की दृष्टि से विवर्तात्मक है । एक अन्य मन्त्र में पुरुष शब्द से कूटस्थ आत्मा विवक्षित है । जैसे कि कठोपनिषत् में कहा गया है कि 'पुरुष से आगे और कोई वस्तु नही है, यहाँ तक आकर तत्त्वो की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और संसारी जीवो के लिये यही परम गति है' । इसको पुरुष इसलिये कहा जाता है कि वह इन्द्रिय नाम की पुरियो मे अथवा पुरीतत् नाडी में जाकर सो जाता है, अपने स्वरूप को भूल जाता है अथवा इसलिये कहते है कि यह स्वयं अपने से पूर्ण है । इसी तरह के पुरुष को साख्य दर्शन स्वीकार करता है । उसमें इतनी विशेषता है कि वह नाना है और उसी आधार पर वस्तु की परिच्छित्ति में भेद माना जाता है । हिरण्यगर्भ को भी पुरुष कहा जाता है, क्योंकि वह भी पूर्ण है । समस्त सूक्ष्म शरीरों का अभिमानी चेतन हिरण्यगर्भ कहलाता है । सूक्ष्म शरीर में प्राण और बुद्धि का प्राधान्य होता है । जब प्राण का प्राधान्य होता है तो सूत्रात्मा और बुद्धि का प्राधान्य होने पर हिरण्यगर्भ कहलाता है । विश्वकर्मा, प्रजापति प्रभृति शब्दों से भी उसका बोध होता है । प्रजापति शब्द का प्रयोग कश्यपादि के लिये और चतुर्मुख

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वेदार्थपारिजाता १११२ विराजि परमेश्वरे चापि विश्व कर्म यस्येति व्युत्पत्त्या प्रयोक्तुं शक्यते । पुरुषसूक्तं देवतानामुपकरणत्व च यदुक्तम्, न तम्मुख्यकारणत्वेन, किन्त्ववान्तरकारणत्वेनैव । तच्चान्यत्राप्यभ्युपगतम् । पुरुषशवीरं तु न जगदुपादान सम्भवति, तच्छरीरस्यापि सावयवत्वेनोपादानसापेक्षत्वात् । यथा घटादीना क्षित्युपादानकत्वं तथाऽवान्तरोपादानकत्व पुरुषस्यापि सम्भवत्येव, तथापि सहस्रशीर्षापुरुषस्तु परमात्मैव विवक्षितः । सहस्रमिति त्वनन्तस्योपलक्षणम्, सर्वप्राणिशिरआदीना ' ' ( ): तस्यैव शीर्षादित्वात् । सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् भ ० गी० १३।१३ इति गीतोक्त । प्रकरणी पुरुषः परमात्मैव, तज्ज्ञानस्यैवामृतत्वसाधनत्वोपपत्तेः । प्रकृते च 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था ' ( ) विद्यतेऽयनाय वा० सं० ३१।१८ इति प्रकरणिज्ञानेनैवामृतत्वप्राप्तिरुक्ता । हिरण्यगर्भविराजावपि तदुपाधि- भूतावेव । नैतावदेव तयोरुपादानभूता मायाप्रकृत्यादिशब्दव्यवहार्या शक्तिरपि तदुपाधिरेव केवलस्यैव तस्य निरुपाधिकत्वात् । तदेव सर्वाधिष्ठानभूतं वस्तु सर्वमावृत्य दशाङ्गुलमतिक्रम्य तिष्ठति । दशाङ्गुलमित्यप्यनन्तोपलक्षणम्, अनन्ताकाशस्यैकदेशे मेघखण्डस्येव परमात्मैकदेश एव प्रपञ्चस्य स्थितत्वात् । अत एव सहस्रशीर्षेति षोडशच षष्ठं सूक्तम् । नारायणो नामर्षिरन्त्या त्रिष्टुप् शेषा अनुष्टुभः । अव्यक्तमहदादिविलक्षणश्चेतनो यः पुरुषः 'पुरुषान्न पर किञ्चित्' ( कठो ०३।११ ) इत्यादिश्रुतिषु प्रसिद्धः, स देवतेति सायणाचार्यः । तस्यैव पुरुषस्य ' पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम्' इति भूतभव्यादिसर्वप्रपञ्चरूपत्वम्, तस्यैवामृतत्वेशानत्वम्, तस्यैव प्राणिनां कर्मफलभोगाय कारणावस्थामति- क्रम्य जगदवस्थास्वीकारेण विरारूपत्वमपि । एतावान् सर्वोऽपि प्रपञ्चः तस्य पुरुषस्य महिमा सामर्थ्यविशेष एव । ब्रह्मा के लिये भी होता है, उसी तरह से ' यह सारा विश्व जिसका कर्म है ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विश्वकर्मा शब्द का प्रयोग भी हिरण्यगर्भ, विराट् और परमेश्वर के लिये हो सकता है । पुरुषसूक्त मे देवताओ का उपकरण के रूप में वर्णन है । ये देवगण मुख्य कारण के रूप में न होकर अवान्तर कारणता के आधार पर इस जगत् के उपकरण माने जाते हैं । इस बात को अन्यत्र भी स्वीकार किया गया है । पुरुष का शरीर तो जगत् का उपादान नही हो सकता, क्योकि पुरुष का यह शरीर भी सावयव है | अतः इसके लिये उपादान की आवश्यकता है । जैसे घटादि का उपादान क्षिति को माना है, उसी तरह का अवान्तर उपादान पुरुष को भी माना जा सकता है । सहस्रशीर्षा पुरुष तो परमात्मा ही है । यहा पर सहस्र शब्द अनन्त संख्या का बोधक है, क्योकि सभी प्राणियो के शिर आदि अवयव उसी के तो शिर आदि है । गीता मे कहा भी गया है कि 'वह परमात्मा सब तरह से हाथ पैर वाला आँख- शिर वाला है' । इस प्रकरण में स्थित पुरुष परमात्मा ही है, क्योंकि इस पुरुष का ज्ञान ही अमृतत्व की प्राप्ति का साधन है । यहाँ पर उसी परमात्मा को जानकर व्यक्ति मृत्यु से दूर चला जाता है, अमृतत्व प्राप्ति का इसके सिवाय और कोई मार्ग नही है' इस प्रकार से परमात्मा के ज्ञान से ही अमृतत्व की प्राप्ति बताई गई है । हिरण्यगर्भ और विराट् भी उसी की उपाधियाँ है । केवल इतना ही नही, इन दोनों की उपादानभूत माया अथवा प्रकृति शब्द से व्यवहृत होनेवाली शक्ति भी उस परमात्मा की ही उपाधि । केवल ब्रह्म ही निरुपाधिक माना जाता है । यह सर्वाधिष्ठानभूत वस्तु हो सारे जगत् को अपने में समेटे रहती है और इनसे दस अंगुल बढकर रहती है । यहाँ दशागुल पद अनन्त का उपलक्षक है । अनन्त आकाश के एक कोने में जैसे कोई बादल का टुकड़ा रहता है, उसी तरह से इस परमात्मा के एकदेश में यह सारा प्रपंच अवस्थित है । इसी परमात्मा की स्तुति के लिये 'सहस्रशीर्षा ' प्रभृति सोलह ऋचाओं वाला यह छठा सुक्त है । इसके ऋषि नारायण है । अन्तिम ऋचा का छन्द त्रिष्टुप् तथा अन्य का अनुष्टुप् है । अव्यक्त, महान् आदि से विलक्षण चेतन पुरुष, जिसका कि वर्णन 'पुरुषान्न परं किंचित्' इस अभी अभी उद्धृत काठक वाक्य में है, वही इस सूक्त का देवता है । यह सायणाचार्य का कथन है । यही पुरुष 'पुरुष एवेदं' इस मन्त्र के अनुसार भूतभव्यात्मक सारे जगत् के रूप में दिखाई पड़ता है, वही अमृतत्व पद की देने में समर्थ है और वही प्राणियों को उनके कर्मों का फलोपभोग कराने के लिये कारणावस्था को छोड़कर जगदवस्था को स्वीकार कर विराट् रूप हो जाता है । यह सारा प्रपंच उस पुरुष की ही विशेष सामर्थ्य का सूचक है । वह पुरुष तो उसकी इस महिमा के सूचक

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वेदार्थपारिजात १११३ पुरुषस्तु अतो महिम्नोऽपि ज्यायानतिशयेनाविक । विश्वानि कालत्रयवर्तीनि भूतानि प्राणिजाताभ्यस्य पादश्चतुर्थांश: । अवशिष्टमस्य त्रिपात् स्वरूपममृतमविनाशि दिवि स्वप्रकाशस्वरूपे व्यवतिष्ठते । अत्रापि न प्रपञ्चस्य तच्चतुर्थांशत्वं न वाऽवशिष्टम्य पादत्रयात्मकत्वं विवक्षितम्, 'सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म' ( तै० आ० ८1१ ) इत्याम्नातस्य ब्रह्मण इयत्तासम्भवात् । किन्तु जगदिदं ब्रह्मस्वरूपपुरुषापेक्षयात्यल्प ब्रह्म चानन्तमित्येव विवक्षितम् । त्रिपादूर्ध्व उदैदित्यनयापि त्रिपात् पुरुष. ससाररहितोऽज्ञानतत्कार्यमयात् प्रपञ्चाद् वहिर्भूतस्तदीयैर्गुणदोषैरसस्पृष्टः । तस्य पादो लेश इह मायाया पुनरभवत् सृष्टिसहाराभ्यां पुनः पुनरागच्छति । 'विष्टाहमिदं कृत्स्नमेकाशेन स्थितो जगत्' (भ० गी ० १० १४२ ) इति गीतोक्तः । ततो मायामागत्यानन्तरं विष्वङ्देवमनुष्यतिर्यगादिरूपेण व्यक्रामत् साशनानशने चेतनाचेतने प्राणिजात गिरिनद्यादिकं चाभिलक्ष्य तदुभय यथा स्यात्तथा स्वयमेव विविधो भूत्वा व्याप्तवान् । ' ' तस्माद्विराडजायत इत्यनया तदेव प्रपञ्चितम् । तस्मादादिपुरुषाद् विराड् ब्रह्माण्डदेहोऽजायत । विराजोऽधि विराड्देहस्योपरि पुरुषस्तद्देहाभिमानी कश्चित्पुरुषोऽन्योऽजायत । स च पुरुषो वेदान्तवेद्यः परमात्मैव । मायया ब्रह्माण्डदेहं विराज सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत् । ' स वा एष भूता- नीन्द्रियाणि विराजं देवताः कोशांश्च सृष्ट्वा प्रविश्यामूढी मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव' ( नृसिंहोत्तरतापनीय० २।१ ९ ) इत्याथर्वणिकश्रुतेः । स जातः विराट् पुरुष अत्यरिच्यत विराड्व्यतिरिक्तो देवतिर्यङ्मनुष्यादिरूपोऽभवत् । पश्चाद् देवादिजीवभावादूर्ध्वं भूमि ससर्जेति शेषः । अथो भूमिसृष्टेरनन्तर पुरः तेषां जीवानां शरीराणि ससर्जेति । यत्पुरुषेण हविषेति मन्त्रेऽपि यद् यदा पूर्वोक्तक्रमेण शरीरेषूत्पन्नेषु देवा उत्तरसृष्टिसिद्धयर्थं बाह्यद्रव्यस्यानुत्पन्नत्वेन व्रीह्मादिद्रव्यान्तराभावाद विराट्पुरुषस्वरूपमेव मनसा हविष्ट्वेन सङ्कल्प्य पुरुषेण पुरुषाख्येण हविषा यज्ञ मानसं यज्ञमतन्वत, तदानीं यज्ञस्य वसन्त ऋतु: आज्यं घृतमासीत् । वसन्तमेवाज्यत्वेन सङ्कल्पितवन्तः । ग्रीष्म ऋतुः इष्मः प्रपंच से ऊपर है । तीनो कालो मे पैदा हुए प्राणी समुदाय उसके एक चतुर्थाश है । इसके अवशिष्ट तीन पाद अविनाशी है । उनकी स्थिति स्वर्गलोक मे स्वयंप्रकार स्वरूप में रहती है । यहा पर भी प्रपंच की चतुर्थाशता और अवशिष्ट भाग की पादत्रयात्मकता विवक्षित नही है, क्योकि ' ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है' इस श्रुति के अनुसार ब्रह्म की इयत्ता का अवधारण नही हो सकता । किन्तु यहा पर केवल इतना ही विवक्षित है कि यह जगत् ब्रह्मस्वरूप पुरुष की अपेक्षा से बहुत थोडा सा है और ब्रह्म अनन्त है । त्रिपादूर्ध्व उदैत्' इस मन्त्र से भी यही अभिप्रेत है । त्रिपात् पुरुष संसार से रहित अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यस्वरूप प्रपंच से बाहर है, उसके गुण और दोष से असंपृक्त है । उसका एक पाद, एक अंश यहाँ माया मे पड जाता है, अतः वह जन्म और मृत्यु के चक्कर मे पडकर बार बार पुनर्जन्म लेता रहता है । गीता में कहा भी गया है कि 'मैं इस सारे प्रपंच को अपने अधीन रखकर एक अश मे जगत् के रूप मे अवस्थित होता हूँ' । तब माया में अवतरित होकर देव, मनुष्य और तिर्यक् के रूप में, चेतन और अचेतन, पर्वत नदी आदि के रूप मे सब तरह से वह स्वयं ही विविध रूपो में व्याप्त हो जाता है । ' तस्माद्विराडजायत' इत्यादि से इसी प्रपंच को बताया गया है । उस आदिपुरुष से विराट् अर्थात् ब्रह्माण्डदेह उत्पन्न हुआ । इस ब्रह्माण्डदेह के उत्पन्न होने के बाद उस देह का अभिमानी कोई पुरुष पैदा हुआ । यह पुरु वेदान्तवेद्य परमात्मा ही है । माया से ब्रह्माण्ड देह विराट् की सृष्टि करने के बाद वह उसमें जीव रूप से प्रविष्ट होकर ब्रह्माण्ड का अभिमानी देवता अर्थात् जीव बन जाता है । 'वह परमात्मा भूत, इन्द्रिय, विराट् देवता और कोशो की सृष्टि कर उन्ही मे प्रविष्ट हो जाता है और तब माया के कारण अमूढ होता हुआ भी अज्ञानी का सा आचरण करने लगता है' यह आथर्वणिक श्रुति इसमे प्रमाण है । वह विराट् पुरुष उत्पन्न होते ही देव, मनुष्य, तिर्यक् आदि अनेक रूपों को धारण कर लेता है । जब वह देवादि जीवभाव मे अवस्थित हो जाता है, तो बाद मे पृथ्वी की सृष्टि करता है । अब पृथ्वी को सृष्टि के बाद उन जीवों के नाना प्रकार के शरीरो की सृष्टि की । 'यत्पुरुषेण हविषा' इस मन्त्र में भी बताया गया है कि जब पूर्वोक्त क्रम से शरीरो की उत्पत्ति हो गई, तो देवताओ ने आगे को सृष्टि करने के लिये बाह्य द्रव्य की उत्पत्ति न होने से व्रीहि प्रभृति द्रव्यान्तर के अभाव में विराट् पुरुष के स्वरूप को हो मन से हवि के रूप में संकल्पित कर उस पुरुष रूपी हवि से ही मानस यज्ञ का अनुष्ठान आरंभ किया । उस समय वसन्त ऋतु यज्ञ का घृत था, अर्थात् वसन्त ऋतु को घृत के रूप में सकल्पित १४०

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१११४ वेदार्थपारिजातः समित् आसीद् तमेवेध्मत्वेन सङ्कल्पितवन्त । तथव शरद हवि. तामेव पुरोडाशादिहविष्ट्वेन कल्पितवन्तः । पूर्वं पुरुषस्य तु हविः सामान्यत्वेनैव पश्चाद् वसन्तादीनामाज्यादिविशेषरूपत्वेन सङ्कल्प इति भेदो द्रष्टव्यः । तं यज्ञं बर्हिषि । तमग्रतो जात पुरुष पशुभावनया यूपे बद्ध बर्हिषि मानसे यज्ञे प्रौक्षन् प्रोक्षितवन्तः । तेन पुरुषेण पशुना साध्याः सृष्टिसाधनयोग्याः प्रजापतिप्रभृतयो देवा अयजन्त मानसं यज्ञं कृतवन्तः, ऋषयो मन्त्रद्रष्टारश्चा- यजन्त । तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सर्वात्मकः पुरुषो यस्मिन् यज्ञे हूयते तादृशात् सर्वहुतः मानसाद्यज्ञात् पृषदाज्यं सभृतम् । दधि चाज्यं चेत्येवमादिभोग्यजात ततः सम्पादितवन्तः । तथा वायव्यान् वायुदेवताकाल्लोकप्रसिद्धान् ' ' ( ), ', आरण्यान् हरिणादीन् ग्राम्यान् गवाश्वादीन् चक्रे । वायव स्थ वा ० स ० १1१ वायुर्वाऽन्तरिक्षस्याध्यक्षः अन्तरिक्षदेवत्याः खलु वै पशव ' इति श्रुतिभ्यः । तस्मादेव सर्वहुतो यज्ञात् ऋच. सामानि गायत्र्यादीनि छन्दासि जज्ञिरे यजुश्च । तस्मादश्वा इति पशुविशेषा उत्पन्ना इत्युक्तम् । ब्राह्मणादिसृष्टिः प्रश्नोत्तररूपेणोच्यते -प्रजापतेः प्राणरूपा देवा यद् यदा पुरुष विरारूप व्यदधुः सङ्कल्पे- नोत्पादितवन्तः, तदानी कतिधा व्यकल्पयन्? अस्य मुख किमासीत्? कौ बाहू को पादी उच्येते? प्रश्नोत्तराणि- ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् । बाहू राजन्यः । ब्राह्मणत्वा दिजातिविशिष्टः पुरुषो मुखादुत्पन्नः । क्षत्रियत्वादिजातिमान् पुरुषो बाहुभ्यामुत्पादितः । अस्य यद् ऊरू तद्रूपो वैश्यः सम्पन्न. ऊरुभ्यामुत्पन्नः । तस्यास्य पद्भ्या शूद्रत्वजातिमान् पुरुष उत्पन्नः । 'स मुखतस्त्रिवृत निरमिमोत' ( तै ० स० ७| १ | १| ४ ) इत्यादिश्रुतेः । 'पद्भ्या शूद्रो अजायत' इति वाक्यशेषानुसारेणैव ब्राह्मणादीनामपि मुखादिम्य उत्पत्तिरेवाभिप्रेता । चन्द्रमा मनसो जात इति । ब्राह्मणादिवदेव चन्द्रादयो देवा अपि तस्मादेवोत्पन्नाः । प्रजापतेर्मनस. चन्द्रमा चक्षुषः सूर्यो जातः । मुखादग्निरिन्द्रश्च देवावुत्पन्नो | अस्य प्राणाद्वायुः । तथैव तस्य नाभ्या अन्तरिक्ष शीष्र्णो द्यो· पद्भ्यां भूमिः श्रोत्राद्दिश उत्पन्नाः । किया । इसी तरह ग्रीष्म ऋतु को समिधा के रूप में तथा शरद् ऋतु को पुरोडाशादि हवि के रूप में कल्पित किया । यहाँ पर पहले पुरुष का सामान्य हवि के रूप में तथा बाद में वसन्त आदि की आज्यादि हविविशेष के रूप में कल्पना की गई है । यही दोनो की विशेषता है । 'त यज्ञं बर्हिषि' | उस सर्वप्रथम पैदा हुए पुरुष को देवताओ ने पशु के रूप में कल्पित कर यज्ञीय यूप मे बाघ दिया और मानस यज्ञ में मानस बहि से उसका प्रोक्षण किया । उस पुरुष रूपी पशु से साध्यगण अर्थात् सृष्टि के साधन मे समर्थ प्रजापति प्रभृति देवगण और मन्त्रद्रष्टा ऋषिगण मानस यज्ञ करने लगे । उस यज्ञ से जिसमे कि सर्वात्मक पुरुष को मानसिक हवि के रूप में अर्पित किया जाता है, देवताओं ने पृषदाज्य, दही और घृत की तथा वायु देवना को अर्पित किये जाने वाले लोक प्रसिद्ध आरण्य हरिणा आदि की तथा ग्राम्य अश्व प्रभृति पशुओ की सृष्टि की । 'वायवः स्थ' इस वाजसनेय श्रुति तथा ' अथवा वायु अन्तरिक्ष का अध्यक्ष है, पशु अन्तरिक्ष के देवताओं को अर्पित किये जाते है' इस शतपथ श्रुति के अनुसार भी उक्त श्रुति का समर्थन होता है । इसी सर्वहुत यज्ञ से ऋचाएं, साम, गायत्री प्रभृति छन्द तथा यजु की उत्पत्ति हुई और उसी से अश्व नामक पशुविशेष भी उत्पन्न हुए । यही पर प्रश्नोत्तर के रूप में ब्राह्मणादि की सृष्टि बताई गई है -प्रजापति के प्राणरूप देवताओं ने जब उस विराट् को संकल्प से उत्पन्न किया, तब उसके कितने भेद किये??,? पुरुष इसका मुह क्या था बाहू ऊरू और पाद क्या थे ब्राह्मण इसका मुह था और राजन्य बाहू थे अर्थात् ब्राह्मणत्वं जातिविशिष्ट पुरुष मुह से और क्षत्रियत्व जातिविशिष्ट पुरुष भुजाओं से उत्पन्न हुआ । इस पुरुष का ऊरू स्वरूप वैश्य का था, अर्थात् ऊरू से वैश्य उत्पन्न ' हुआऔर पैरों से शूद्र की उत्पत्ति हुई । मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत' इत्यादि श्रुतियां उक्त अर्थ का समर्थन करती है । 'पद्भया शूद्रो अजायत' इस अन्तिम वाक्य के अनुसार पूर्व वाक्यों में भी ब्राह्मणादि की उत्पत्ति ही अभिप्रेत है । 'चन्द्रमा मनसो जात:' । ब्राह्मणादि की तरह ही इस पुरुष से ही चन्द्र आदि देवताओं की भी उत्पत्ति हुई । प्रजापति के मन से चन्द्रमा, चक्षु से सूर्य, मुख से अग्नि और इन्द्र देवता की उत्पत्ति हुई । इसके प्राण से वायु, नाभि से -अन्तरिक्ष, सिर से आकाश, पैर से भूमि ओर श्रोत्र से दिशाओं की उत्पत्ति हुई ।

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' वेदार्थ पारिजात १११५ सप्तास्यासन् । अस्य सङ्कल्पितस्य यज्ञस्य सप्त छन्दासि परिचय ऐषिकस्याहवनीयस्य त्रयः परिघय. उत्तरवेदिकास्त्रयः आदित्यश्च सप्तमः परिधिप्रतिनिधिरूपः । तथा त्रिःसप्त त्रिगुणीकृतमप्तसंख्याका एकविंशतिः द्वादश मासाः पञ्चर्तव ' त्रय इमे लोका असावादित्य इति पदार्था एकविंशतिदारुमयेध्मत्वेन भाविताः । यद्य पुरुषो वं राजोऽस्ति त पुरुषं देवाः प्रजापतिप्राणेन्द्रियरूपा यज्ञ तन्वाना पशुमबध्नन् विराट्पुरुषमेव पशुत्वेन भावितवन्त. । पूर्व प्रपञ्चेनोक्तमर्थं संक्षिप्य यज्ञेन यज्ञमयजन्त इत्यत्र देवा प्रजापतिप्राणरूपा यज्ञेन मानसेन सङ्कल्पेन यज्ञ यथोक्त- यज्ञरूपं प्रजापनिम् अयजन्त पूजितवन्त । तस्मात् पूजनात् तानि प्रसिद्धानि धर्माणि जगद्रूपविकाराणा धारकाणि प्रथनानि मुख्यानि आसन् । अथोपासनतत्फलानुवादभागार्थ नङ्गृह्यते ॥ यत्र विराट्प्राप्तिरूपे नाके पूर्वे साध्याः पुरातना विराडनास्तिसाधका देवाः सन्ति तन्नाकं विराट्प्राप्तिरूपं स्वर्ग ने महिमानः महात्मानः सचन्त समवयन्ति प्राप्नुवन्ति । यद्यपि यज्ञस्वरूप ब्राह्मणग्रन्थेषूक्तम्, तथापि जगदुत्पत्तिर्न यज्ञियविधित्वेनोक्ता | विराट्पुरुषस्तु न बलित्वेन स्थापितः, किन्तु यज्ञपशुत्वेन भावित एव यज्ञस्य मानसत्वेन पशोरपि मानसत्वात् । अत एव तस्य विभिन्नावयवाः आलम्भनानन्तर जगतो विभिन्नभागरूपतामुपजग्मुः । मस्तकमाकाशम्, नाभिर्वायु, पादौ पृथ्वीत्यादिकम् ॥ तदसत्, मानसे यज्ञे प्रत्यक्षालम्भनायोगात् । शीष्ण द्यौः समवर्ततेत्यादिना न शीर्षादीनामेवाकाशत्वादिकम्, किन्तु शीर्णो दिव उत्पत्तिश्रवणेन प्रकृतित्वावगमाद् ब्राह्मणग्रन्थानामुपनिषदां पुरुषसूक्तस्य च समन्वय एव पूर्वोक्तरीत्या । बहुदेववादस्य , कश्चित् कालविशेषो न नियतः अद्यापि बहुदेववादस्य सत्त्वात् । वेदे चैकेश्वरवादेन बहुदेववादस्याविरोधात् । ,ते चानेके देवा न स्वातन्त्र्येण जगत्कारणतामुपगच्छन्ति किन्तु मानसिकयज्ञद्वाराऽवान्तरजगत्कारणत्वमेव भजन्ते । परमात्माव्यक्तहिरण्यगर्भविराजामेव कारणत्वात् । ते तु प्रजापतेः प्राणरूपत्वात् तदन्तर्गता एव । 'सप्तास्यासन्' । इस सकल्पित यज्ञ की परिधियाँ सात छन्द बने । सात परिधियो में ऐषिक आहवनीय की तीन परिधिया, तोन उत्तर वेदिका और सातवी परिधि के रूप मे सूर्य उसका प्रतिनिधि माना जाता है । उसी यज्ञ की बारह मास, पाच ऋतु, ये तीन लोक और वह आदित्य यह सब मिलकर इक्कीस समिधाएं बनी । अर्थात् इन देवताओ को यज्ञिय समिधा के रूप में कल्पित किया गया । उस विराट् पुरुष को ही इस मानसिक यज्ञ का अनुष्ठान करते समय प्रजापति, प्राण, इन्द्रिय रूप देवताओ ने पशु के रूप में भावित किया । ' यज्ञेन यज्ञमयजन्त' यहा पर प्रपंचित अर्थ को ही सक्षेप में बताया गया है कि प्रजापति, प्राण प्रभृति देवगण ने अपने मानस संकल्प से यथोक्त यज्ञरूप प्रजापति का पूजन किया । उस पूजन के कारण ही वे देवगण इस प्रसिद्ध धर्मों के अर्थात् जगत् रूप विकारो के मुख्य धारणकर्ता हा गये । यही पर उपासना और उसके फल के अनुवाद भाग का अर्थ संक्षेप में वर्णित है— उस विराट् के प्राप्ति स्थान स्वर्ग मे पूर्व के साध्यगण, अर्थात् विराट् स्वरूप के पुरातन उपासक देवगण निवास करते है, अर्थात् विराट् पुरुष की प्राप्ति स्वरूप उस स्वर्ग को वे महात्मागण प्राप्त करते है । यद्यपि यज्ञो का स्वरूप ब्राह्मण ग्रन्थो में वर्णित है, तथापि यज्ञ को विधि से जगत् की उत्पत्ति का वर्णन वहाँ नही है । यहाँ पर विराट् पुरुष को बलि के लिये कल्पित नही किया है, किन्तु यज्ञीय पशु के रूप में केवल उसकी भावना की गई है । यहाँ का यज्ञ मानस है, तो पशु भो मानस ही माना जायगा । इसीलिये उसके विभिन्न अवयव आलम्भन के अनन्तर जगत् के विभिन्न भागो मे परिणत हो जाते हैं । मस्तक आकाश बन जाता है, नाभि वायु बनता है और पैर पृथ्वी बन जाता है, इत्यादि । यह कथन भी ठीक नही है, क्योंकि मानस यज्ञ मे प्रत्यक्ष आलम्भन का कोई प्रश्न ही नही उठता । शिर से आकाश की उत्पत्ति हुई, इसका अर्थ यह नही है कि उस विराट् पुरुष का शिर ही आकाश बन गया, किन्तु शिर से आकाश की उत्पत्ति होने के कारण वह विराट् पुरुष का शिर आकाश की प्रकृति मानी जाती है । इस तरह से पूर्वोक्त पद्धति से ब्राह्मणग्रन्थ, उपनिषद् और पुरुषसूक्त की समन्वय के आधार पर एक-वाक्यता ही माननी पड़ती है । बहुदेववाद की सृष्टि का कोई कालविशेष निश्चित नही किया जा सकता, क्योकि वह तो आज भी विद्यमान है । वेद में एकेश्वरवाद के साथ बहुदेववाद का कोई विरोध नही माना गया है । ये अनेक देवता स्वतन्त्र रूप से जगत् के कारण नही माने जाते, किन्तु मानसिक यज्ञ के आधार पर ये जगत् के अवान्तर कारण ही बनते हैं । परमात्मा, अव्यक्त, हिरण्यगर्भ और

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वेदार्थपारिजातः १११६ सूर्योऽपि प्रजापतिरूपेणैव जगतः कारणमात्मा च भवति । नासदीयादिसूक्तानामपि पूर्वोक्तरीत्या समन्वय एव युक्तः । 'कि स्विदासीदधिष्ठानमारम्भण कतमत्स्वित्कथासीत् । यतो भूमिं जनयन् विश्वकर्मा विद्यामोर्णोन्महिना विश्वचक्षा ||' (ऋ ० स ० १० ८१ । २ ), 'विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥ ' (ऋ० स ० १० ८१।३ ), 'किस्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ॥ ' (ऋ० स ० २०१८१।४ ) इत्यादयो मन्त्रा अपि पुरुषसूक्तेन समन्वितमेवार्थं वदन्ति । 'य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यसीदत पिता नः' ( ऋ ० स० १०।८ ९।१ ) इति पूर्वोक्तमन्त्रोक्तरीत्या ' विश्वकर्मा सर्वमेधे सर्वाणि भूतानि जुहवाञ्चकार स आत्मानमप्यन्ततो जुहवाञ्चकार । तदभिवादिन्येषगर्भवति' ( नि० १० २६ ) इति निरुक्तरीत्या च विश्वकर्मनामकर्षिता विश्वानि भुवनानि जुह्वत् होमं कुर्वन् प्रथम सर्वं जगद्धुत्वा पश्चादग्नौ न्यषीदत । पिता जनकः । आत्मकृतेन कर्मणा देहोत्पत्तेस्तस्य पितृत्वमपि । न चैकस्य जन्यजनकभावो विरुद्धयते तपोबलेन शरीरद्वयस्वीकारात् । अध्यात्मप्रसिद्धया तु यो विश्वकर्मा परमेश्वर इमा भुवनानि जुह्वत् प्रलयकाले पृथिव्यादीन् सप्तलोकान् स्वात्मन्याहुतिप्रक्षेपवत् संहरन्तृषिरतीन्द्रियद्रष्टा सर्वज्ञो होता संहाररूपस्य होमस्य कर्ता नोऽस्माकं पिता जनको निषसाद स्वय स्थितवान् संहृत्य पश्चात् सिसृक्षायां सर्व सृष्ट्वा तत्र प्रविष्ट इत्युक्तम् 1। तत्राय प्रश्नः --तत्र द्वितीयस्याधिष्ठानजगदुपादानकारणाद्यसम्भवात् सृष्टिः कथमुपपद्यत इत्याक्षिपति किस्विदासीत् । यथा कुलालो घटचिकीर्षुर्गृहादिकमधिष्ठाय मृद्रूपेणारम्भकद्रव्येण चत्रादिरूपैरुपकरणैर्घटं निष्पादयति, तद्वदीश्वरस्य जगदाश्रयद्यावापृथिव्योरुत्पादनवेलायामधिष्ठानं किस्विदासीत् किं नामाभूत्, न किञ्चि- विराट् ये ही वस्तुतः जगत् के कारण है । ये सब भी प्रजापति के प्राणस्वरूप है, अतः इनका भी अन्तर्भाव प्रजापति में हो जाता है ॥ सूर्य भी प्रजापति के रूप में ही जगत् का कारण और आत्मा माना जाना है । नासदीय सूक्त का भी पूर्वोक्त पद्धति से समन्वय के आधार पर अर्थ करना चाहिये । 'किस्विदासीत्०', ' विश्वतश्चक्षु०', किस्विद्वनं०' इत्यादि मन्त्रो का भी पुरुष सूक्त से मिलता-जुलता ही अर्थ किया ' ' गया है । य इमा विश्वा० इस पूर्वोक्त मन्त्र का आशय यह है कि विश्वकर्मा ने सर्वमेध यज्ञ में सभी प्राणियो की आहुति देने के बाद स्वयं अपने को अन्ततः समर्पित कर दिया । इसी बात का वर्णन इस मन्त्र मे किया गया है । निरुक्त के अनुसार विश्वकर्मा नाम का ऋषि होता के रूप में पहले इस सारे जगत् को और बाद मे स्वय अपने शरीर को भी यज्ञीय अग्नि को समर्पित कर देता है । यहा पर वह स्वयं अपना जनक माना गया है, क्योकि अपने द्वारा संपादित इस यज्ञीय कर्म से उसका नवीन देह उत्पन्न हुआ था । एक ही व्यक्ति जन्य और जनक भी हो, इसमें कोई विरोध नही पड सकता, क्योकि अपनी तपस्या के बल से वह इस तरह के दो शरीर धारण कर सकता है । आध्यात्मिक प्रसिद्धि के अनुसार तो विश्वकर्मा परमेश्वर ही है । वह प्रलय बेला में पृथिवी प्रभृति सात लोको को अपने में ही आहुति दे देता है, अर्थात् अग्नि मे जैसे आहुति लीन हो जाती है, उसी तरह से इस परमात्मा के शरीर में यह सारा जगत् लीन हो जाता है । अपने में सारे जगत् को लीन करने वाला यह ऋषि अतीन्द्रियार्थं द्रष्टा सर्वज्ञ परमात्मा इस संहार रूप होम का कर्ता होने से पिता है । अर्थात् संहारावस्था मे यह सारे जगत् को अपने में समेट कर रखता है, किन्तु जब इसकी पुनः सिसृक्षा होती है तो इस सारे जगत् की यह पुनः सृष्टि करता है और स्वयं उसी मे प्रविष्ट हो जाता है । इम अवस्था में यह प्रश्न उठता है कि जब कोई इस जगत् का अधिष्ठाता या कारण विद्यमान नही है, तब सृष्टि की उत्पत्ति कैसे होती है? इसी प्रश्न को 'किश्विदासीत्' इत्यादि मन्त्रो में उठाया गया है । जैसे कुम्हार जब घडा बनाना चाहता है, तो घर में बैठकर मृद्रूप (मिट्टी ) सामग्री को सामने रखकर चक्र प्रभृति उपकरणो की सहायता से घट का निर्माण करता है, उसी तरह से

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वेदार्थपारिजात. १११७ दित्यर्थः । तथा तयोरारम्भणं कतमत्स्वित् आरम्भतेऽनेनेत्यारम्भणमुपादानम् तदपि कतमत्, नेत्यर्थः । तत्सत्त्वेऽपि कथासीत् कथमभूत् किं स्वयं सदसद्वाभवदित्यर्थः 1। नोभयमपि । सच्चेदद्वैतभङ्ग, असच्चेत् तस्य सदात्मकयोर्द्यावा- पृथिव्योरुत्पादनानर्हत्वात् । 'नान्यत् किञ्चन मिषत्' ( ऐ० आ ० २/४ | १ ) इति श्रुतेश्व । यतो यस्मादधिष्ठाना- दारम्भणाच्च विश्वचक्षा सर्वद्रष्टा विश्वकर्मा परमेश्वरो भूमिं जनयन् वर्तते । तथा द्या दिवं वि और्णोत् व्यवणोत् सृष्टवान् महिना स्वमहत्त्वेन किंस्विदासीत् । द्वितीयया तुत्तरम् -- सर्वात्मकत्वेन कुलालादिविलक्षणत्वादधिष्ठानाद्यभावेऽपि स्रष्टुं शक्नोतीत्याह- विश्वतश्चक्षुः सर्वतो व्याप्तचक्षुः उत अपि, विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुः उत विश्वतस्पात् स एवविध: परमेश्वर: स्वस्मिस्त्रैलोक्यमुत्पादयति । सहस्रशीर्षादिवदयमपि । कथमिति तत्राह—बाहुभ्यां दिव सधमति । धमतिर्गतिकर्मा | | सम्यक् प्रेरयति । तथा पतत्रैः गमनशीलैः पादः पृथिवी सन्धमति । द्यावापृथिव्योः प्राधान्याभिप्रायेण वचनम् । एवं द्यावाभूमी जनयन् देवः स्वयप्रकाशः एकः असहाय एव वर्तते । स मायामयेन सङ्कल्पेन स्वात्मानमेव द्यावापृथिव्यादि- रूपेण विवर्तयति । प्रजापतेः प्राणात्मका देवास्तु मानसयज्ञद्वाराऽवान्तरकारणत्वमुपगच्छन्ति, कर्मद्वारा च ते कारणम् । जीवादृष्टानां सृष्टे साधारणकारणत्वात् । तदभावे विषमसृष्टिनिर्माणेन परेशस्य वैषम्यनैघेण्यापातात् । 'वैषम्यनैर्घुण्ये इति चेन्न कर्मसापेक्षत्वात्' ( ब्र० सू० २।१।३४ ) इति न्यायात् । पूर्व ब्रह्मैव भूम्यादिकारणमित्युक्तम्, तदेवानया प्रश्नव्याजेनोच्यते । लोके हि प्रौढ प्रासाद निर्मिमाणः कस्मिश्चित् प्रौढे वने कञ्चिन्महान्तं वृक्षं छित्वा तक्षणादिना स्तम्भादिक सम्पादयति । इह तु परमेश्वरप्रेरिता जगत्स्रष्टारो यस्माद्वनाद्यं वृक्षमादाय द्यावापृथिवी निष्टतक्षुस्तक्षणेन द्यावापृथिव्यौ निष्पादितवन्तस्तद्वनं किस्वित् जब ईश्वर इस जगत् के आश्रयभूत आकाश, पृथ्वी आदि की सृष्टि करता है, तो वह कहाँ बैठता है, उसका क्या नाम है? वास्तव में ऐसा कोई पदार्थ उस समय विद्यमान नही है, जिस पर कि वह बैठकर इस सृष्टि की निष्पत्ति करे । इसी तरह से पृथ्वी और आकाश के निर्माण के लिये उसके पास सामग्री क्या थी? वास्तव में ऐसी सामग्री भी उस समय विद्यमान न थी । उसकी विद्यमानता में भी वह सब कैसे हुआ, अर्थात् वह स्वयं क्या सत् अथवा असत् रूप में उत्पन्न हुआ? यह दोनो बातें नही हो सकती । क्योंकि यदि वह सत् है, तो अद्वैत नष्ट हो जायगा और यदि वह असत् है, तो वह सदात्मक द्यावापृथिवी की उत्पत्ति कैसे कर सकता है? श्रुति भी इस बात का समर्थन करती हैं कि 'उस समय कुछ भी हलचल नही थी' । जिस अधिष्ठान और कारण सामग्री की सहायता से सर्वद्रष्टा परमेश्वर ने भूमि और आकाश की उत्पत्ति की, उसकी अपनी क्या महिमा थी? इस प्रश्न का उत्तर दूसरी ऋचा में दिया गया है— परमेश्वर सर्वात्मक है अतः इसकी कुम्हार प्रभृति से विलक्षणता माननी पड़ेगी । वह अधिष्ठान आदि के न रहने पर भी सृष्टि कर सकता है । उस परमेश्वर के चक्षु, मुख, बाहु और पाद सारे विश्व में व्याप्त हैं । इस विराट् स्वरूप वाला यह परमेश्वर 'सहस्रशीर्षा ' इत्यादि के रूप में वर्णित पुरुष के समान सारी त्रिलोकी को उत्पन्न करने में समर्थ है । वह किस तरह से सृष्टि करता है? इसीको बताया गया कि वह अपनी भुजाओ से और पैरो से आकाश और पृथ्वी को गति प्रदान करता है । वह इस तरह से सारी सृष्टि को गति प्रदान करता है, इसमें प्रधान पृथिवी और आकाश है । अतः यहाँ पर केवल दो प्रधान पदार्थों की सृष्टि सारे जगत् की सृष्टि का ज्ञान कराने में समर्थ हैं । इस तरह से द्यावापृथिवी की सृष्टि करते समय यह स्वयंप्रकाश परमात्मा बिना किसी की सहायता लिये अकेला रहता है । वह अपने मायारूपी संकल्प से अपने आप को द्यावापृथिवी के रूप मे बदल लेता है । प्रजापति के प्राणस्वरूप देवगण मानस यज्ञ के द्वारा अवान्तर कारण और कर्म के द्वारा कारण बनते हैं । जीवो के अदृष्ट सृष्टि के साधारण कारण है । इसके अभाव में विषम सृष्टि का निर्माण होने से परमेश्वर पर विषमता और निर्दयता का आरोप हो सकता है, जिसका कि परिहार ' वैषम्यनैर्घुण्ये ' इस बादरायण सूत्र में किया गया है । पहले ब्रह्म को ही पृथिवी प्रभूति का कारण बताया गया है । उसी बात को तीसरी ऋचा में प्रश्नों के बहाने समझाया गया है । लोक में यह देखा गया है कि यदि कोई व्यक्ति विशाल प्रासाद खड़ा करना चाहता है, तो वह किसी विशाल वन में जाकर

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वेदार्थपारिजातः १११८ कि नाम स्यात् । तथा क उ वृक्ष आस । हे मनीषिणः मनस ईश्वराः, तदुभयं मनसा जिज्ञासायुक्तेन पृच्छतेदु पृच्छतैव ॥ किञ्च, ईश्वरः भुवनानि धारयन् यत्स्थानमध्यतिष्ठत् तदपि पृच्छत । एतस्य सर्वस्योत्तर ब्रह्म स वृक्ष आसीदित्यादिकम् । यदपि १०५८२ सूक्त' – 'अद्भय' सर्ववस्तूना बीजमुत्पन्न तदेव जगतो देवताना च मूलम्' इति, तदपि यत्किञ्चित्, तदर्थानवगमात् । तथाहि-'यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानां ( ), ' नामधा एक एव तं सप्रश्न भुवना यन्त्यभ्या ॥ ऋ० सं ० १०/८२१३ परो दिवा पर एना पृथिव्या परो देवेभि- रसुरैर्यदस्ति । क स्विद्गभं प्रथमं दध आपो यत्र देवाः समपश्यन्त विश्वे ॥' (ऋ० स० १० ८२/५ ), ' तमिद्गभं प्रथम दध्र आपो यत्र देवा समगच्छन्त विश्वे । अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थु || (ऋ ० सं० १० ८२ ६) 'न तं विदाथ य इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव । नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशास- श्चरन्ति || ' (ऋ ० सं ० १०१८२/७ ) । यो विश्वकर्मा नः पालयिता जनिता न केवलमस्माक किन्तु यो विधाता सर्वस्योत्पादक, यश्चास्माकमुत्पन्नानि धामानि तेज स्थानानि वेद, किंबहुना विश्वानि भुवनानि भूतजातानि वेद, यश्व देवानामग्निवाय्वादीनां नामघा नाम्ना धाता इन्द्रादिदेवान्निर्माय तेषा नाम कृत्वा तत्पदेषु स्थापयिता एक एव तं देवम् अन्या अन्यानि भूतजातानि प्रश्न कः परमेश्वर इति पृच्छा यन्ति प्राप्नुवन्ति । यदीश्वरतत्त्व देवा द्यलोकादपि पुरस्ताद् वर्तमानं तथा एना अस्याः पृथिव्याः परः परस्ताद्वर्तमानं तथा देवेभि देवेभ्य. असुरेभ्यश्च परस्ताद्वर्तमानं यदस्ति तद्गुहायामवस्थितं कंस्विद्गर्भ गर्भवत्सर्वस्य ग्राहक तत्त्वम् आप प्रथमं दधे धृतवत्यः । यत्र गर्भे देवा इन्द्रादयो विश्वे सर्वेऽपि समपश्यन्त सङ्गता परस्परं पश्यन्ति । एवं जानन्नेव कश्चित्तत्त्ववित् प्रश्नं करोति । तमिदित्यनया तदुत्तरमाह - तमित् तमेव विश्वकर्माण गर्भ गर्भस्थानीयं प्रथममितरसृष्टे. प्राग् आप दधे घृतवत्यः । यत्र गर्भे विश्वेदेवा इन्द्रादय. समगच्छन्न संगता भवन्ति । तस्य अजस्य नामावधि अधीति सप्तम्यर्था- किसी बड़े वृक्ष की खोजकर और काट लेने के बाद छील छालकर पहले मजबूत खम्भे बनाता है । यहीं पर भी, प्रकृत स्थल में भी परमेश्वर से प्रेरित होकर जगत् की सृष्टि में लगे हुए देवगण जिस बन से जिस वृक्ष को लेकर और उसका तक्षण कर द्यावापृथिवी का संपादन करते हैं, उस वन का नाम क्या है? और वह वृक्ष कौन सा है? हे मनीषियो, इन दोनो की मानसिक जिज्ञासा आप लोगों मे होनी चाहिये । ईश्वर ने इन भुवनो की सृष्टि करते समय किस स्थान का आश्रय लिया, इसकी जिज्ञासा भी आपके मन में उठनी चाहिये । इन सबका उत्तर यही है कि ब्रह्म ही वह वृक्ष था, इत्यादि । ' अगले सूक्त ( १० ८२ ) में कहा है कि आप (जल) से समस्त वस्तु का बीज उत्पन्न हुआ और वही जगत् का और देवताओं का मूल है' (पृ० १२ ९ ) । यह भी गलत बात है, क्योंकि उस सूक्त का अर्थ मैकडानल ठीक से समझ नही पाये है । यहाँ पर 'यो न पिता' इत्यादि चार ऋचायें उद्धृत हैं । उनका क्रमशः यह अर्थ है-- 'जो विश्वकर्मा केवल हमारा जनक और पालक हो ,,नही है किन्तु जो सारे जगत् का विधाता है और जो हमारे लिये उत्पन्न हुए सभी दिव्य तेजोमय स्थानो को जानता है इतना ही नहीं, वह सभी लोकों और उनमें निवास करने वाले प्राणियों को जानता है और जो अग्नि, वायु प्रभृति देवताओं के नाम और कर्म का निर्धारक है, अर्थात् जो इन्द्र प्रभृति देवताओ की सृष्टि कर उनके नाम का निर्धारण कर उचित स्थान पर उनको प्रतिष्ठित करता है, वह देव एक हो है । उसी देव को अन्य प्राणी प्रश्नप्रणाली से जानकर जान पाते है । 'परो दिवा' । वह ईश्वर तत्त्व द्युलोक से परे वर्तमान है, यह पृथ्वी लोक से भी परे वर्तमान है तथा देवताओ और असुरों से भी यह बहुत दूर है । यह किसी गुहा, अत्यन्त गुप्त स्थान में छिपा हुआ है । वहीं पर यह सबसे पहले सभी पदार्थों के संग्राहक किसी तत्त्व को जल गर्भ के समान धारण करता है, जिसमें कि इन्द्र प्रभृति सभी देवगण परस्पर एक दूसरे को देखते है? कोई जानकार ऋषि यह प्रश्न करता है । 'तमिद्गर्भ' यहाँ पर उसका उत्तर दिया गया है - जल अन्य पदार्थों को सृष्टि से पहले इस विश्वकर्मा को ही गर्भ के रूप में सबसे पहले धारण करते है । इसी गर्भ में इन्द्र प्रभृति सभी देवगण संगत हो जाते हैं । उस अजन्मा जल की नाभि में एक

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वेदार्थपारिजात! १११६ नुवादी । एकमण्डमर्पितम् । अण्ड हि प्राक्सर्गाद् नाभिस्थाने तिष्ठति । यस्मिन्नण्डे विश्वानि भुवनानि तस्थुः तिष्ठन्ति । यद्वा अजस्य जन्मरहितस्य ब्रह्मण. स्वसृष्टे जले शयानस्य नाभी सर्वं जगद्बन्धक उदक एकं ब्रह्माण्डमर्पित स्थापितम् । शिष्टं समानम् । अर्थाद् आपः परमात्मरूपमेव गर्भं गर्भवत्सर्वस्य ग्राहक घृतवत्य । स एव दिव पृथिव्या देवादिभ्यश्च परस्ताद्वर्तते । तस्य परमात्मरूपगर्भस्य नाभी एकमण्डमर्पितम् । यत्राण्डे भुवनानि तिष्ठन्ति । अजस्य ब्रह्म वा स्वसृष्टे जले शयानस्य नाभौ सर्वजगद्बन्धने उदके एकमण्डमर्पितमित्यादि । हे नराः, तं विश्वकर्माणं न विदाथ न जानीथ य इमानि भुवनानि जजान उत्पादितवान् । यत्तु–'वयमात्मानं विश्वकर्माण जानीमः' इति, तदसत् नह्यहप्रत्ययगम्य जीवरूपं परमेश्वरस्य तत्त्वम्, किन्तु युष्माकमहप्रत्ययगम्यानां जीवानामन्तरन्यत् अहप्रत्ययगम्यादतिरिक्त सर्ववेदान्त- बेद्यमीश्वरतत्त्वं बभूव विद्यते । ननु तदपि कुतो नि विद्य इति चेत् तत्राह -नीहारतुल्येनाज्ञानेनाच्छन्ना अतोन जानीथ । यथा नोहारो नात्यन्तमसन्, दृष्टेरावरकत्वात् । नाप्यत्यन्तं सन्, काष्ठपाषाणादिरूपान्तरेण सम्बन्धुमयोग्य- त्वात् । एवमज्ञानमपि नाम्यन्तमसत्, परमेश्वरतत्त्वावरकत्वात् ॥ नापि सत्, बोधमात्रनिवर्त्यत्वात् ॥ न केवलं प्रावृता किन्तु जल्या देवोऽहं मनुष्योऽहमित्याद्यनृतजल्पनेन प्रावृता असुतृपः कथञ्चित् प्राणास्तृप्यन्तो न तु परमेश्वर विचारयन्तः, उक्थशास• नानायज्ञेषूक्थ प्रउगनिष्केवल्यादिकं शंसन्तः परलोकगतभोगवासनया चरन्ति वर्तन्ते, अतो विश्वकर्माण न जानीथेति नात्र मन्त्रेषु अद्द्भ्यः समस्तबीजमुत्पद्यत इत्युक्तम् । यदप्युक्तम् — 'परमसुन्दरं सूक्तं हिरण्यगर्भस्य तात्पर्यं सुवर्णबीजमुदीयमानं सूर्यमानृत्य तत्कल्पितम् अत्राग्नि जनकस्य जलतत्त्वस्यैव जीवनाधारत्वमुक्तम्' ( पृ ० १३० ) इति, तदप्यसत्, भावार्थानवगमात् । तथा हि-' हिरण्यगर्भः अण्ड अर्पित होता है, बनता है । सृष्टि से पहले नाभि में अण्ड की स्थिति रहती है, जिस अण्ड में कि यह सारा विश्व विद्यमान रहता है । अथवा अज अर्थात् जन्मरहित ब्रह्मा जब अपने द्वारा सृष्ट जल में सोया रहता है, तब उसकी नाभि में उस सारे जगत् के बन्धकभूत जल में एक ब्रह्माण्ड की सृष्टि होती है । इसका अभिप्राय यह है कि जल गर्भ के समान सभी पदार्थों को अपने में समेटे परमात्मा को ही सबसे पहले गर्भ के रूप में धारण करता है । वही आकाश, पृथिवी और देवादि से भी पहले विद्यमान रहता है । उस परमात्म- स्वरूप गर्भ की नाभि में एक अड बनता है, जिसमे कि ये मारे भुवन विद्यमान रहते हैं! अज अथवा ब्रह्मा जब अपने द्वारा सृष्ट जल मे सोये रहते हैं, तब उनकी नाभि मे सारे जगत् को बाँध लेने वाले उदक में एक अण्ड बनने लगा । 'न तं विदाय० ' । 'हे मनुष्यों, तुम उस विश्वकर्मा को नही जानते, जिसने कि इन सारे भुवनो को बनाया ' 'हम अपने को विश्वकर्मा के रूप मे जानते हैं ' यह व्याख्या गलत है, क्योकि अहम्' इस प्रतीति से ज्ञात होने वाला जीवरूप परमेश्वर तत्त्व नही हो सकता, किन्तु तुम लोगो के लिये अपने अपने स्वरूप में जीवरूप में अहंप्रत्ययगम्यता से भिन्न सर्ववेदान्तवेद्य ईश्वरतत्त्व सर्वथा भिन्न है । प्रश्न होता है कि उस ईश्वरतत्त्व को हम क्यों नही जान सकते? उत्तर है कि तुम लोग कुहरे के समान सब जगह छाये हुए अज्ञान के कारण उस ईश्वरतत्त्व को नही जान पाते । जैसे कुहरा अत्यन्त असत् नही माना जा सकता, क्योकि वह दृष्टि की शक्ति को अवरुद्ध कर देता है; और न उसको अत्यन्त सत् ही मान सकते है, क्योकि काष्ठ, पाषाण आदि के समान उसको किसी से संबद्ध नही किया जा सकता । इसी तरह से अज्ञान भी अत्यन्त असत् नही माना जा सकता, क्योंकि वह ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को ढक देता है और इसी तरह से यह सत् भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि ज्ञानमात्र से उसकी निवृत्ति हो जाती है । इन जीवों को दृष्टि अज्ञान से आवृत ही नही है, किन्तु ये मैं देव हूँ, मैं मनुष्य हूँ, इस तरह की असत्य जल्पनाओं से भी आवृत हैंहैं ॥ ये केवल अपने प्राणों को किसी तरह से तृप्त करने में लगे रहते है, परमेश्वर का चिन्तन नही करते । केवल नाना प्रकार के यज्ञों में उक्थ, साम आदि का उच्चारण करते हुए परलोक को भोग-वासनाओं में लीन होकर रहते हैं । इन्हीं सब कारणों से सभी जीवस्थानीय तुम लोग विश्वकर्मा को नही जान पाते' । इस प्रकार इन मन्त्रों में जल से समस्त वस्तुओं के बीज की उत्पत्ति का वर्णन नही है । 'परमसुन्दर सूक्त है हिरण्यगर्भ का । हिरण्यगर्भ का तात्पर्य है सुवर्ण का बीज", जिसकी कल्पना निश्चय उदीयमान सूर्य के आधार पर की गई है । यहाँ भी अग्नि के जनक जल तत्त्व को ही जीवनाधार बताया है' ( पृ० १३० ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 220 का मूल पृष्ठ
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११२० वेदार्थपारिजातः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवी द्यामुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ' (ऋ ०१०।१२१।१ ) हिरण्यगर्भः हिरण्यमयस्याण्डस्य गर्भभूतः प्रजापतिहिरण्यगर्भः, 'प्रजापतिर्वै हिरण्यगर्भः प्रजापतेरनुरूपत्वाय' ( तै ० सं ० ५।५।१।२ ) इति श्रुतेः । यद्वा हिरण्मयोऽण्डो गर्भबद्यस्योदरे वर्तते सोऽसौ सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ उच्यते । सोऽग्रे प्रपञ्चो- त्पत्तेः प्राक् समवर्तत । स च हिरण्यगर्भो मायाध्यक्षात् सिसृक्षोः परमात्मन समजायत । यद्यपि परमात्मैव हिरण्यगर्भो- ऽपि तथापि तदुपाधिभूताना वियदादीना ब्रह्मण उत्पत्तेस्तपहितो हिरण्यगर्भोऽपि परमात्मन उत्पद्यत इति व्यवहारः । स च जातमात्र एव एकोऽद्वितीयो भूतस्य विकारजातस्य ब्रह्माण्डादेः सर्वजगतः पतिरीश्वर आसीत् । न केवल पति- रासीत्, किन्तु स पृथिवी विस्तीणा द्या दिवम् उत अपि तु इमा दृश्यमानां भूमि दाधार । यद्वा पृथिवीत्यन्तरिक्षनाम | तथा चान्तरिक्ष दिव भूमि च दाधार धारयति । 'छन्दसि लुलुलट ' ( पा० सू० ३।४।६ ) इति सार्वकालिको लिट् । तस्मै कस्मै प्रजापतये वयमृत्विजो हविषा विधेम परिचरेम । 'य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिष यस्य देवाः । यस्य च्छायाऽमृत यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ' ( ऋ ० सं० १०।१२१।२ ) । य आत्मदा आत्मनां दाता अग्नेः सकाशाद्विस्फुलिङ्गा इव तस्मात् सर्व आत्मानो जायन्ते । घटोत्पत्त्या घटाकाश इव बुद्धचायुपाध्युत्पस्या तदुपहिता जीवात्मानोऽप्युत्पद्यन्ते । यद्वा ' प् शोधने' इति धातोस्तद्रूपनिष्पत्या आत्म शोधयिता बलदा बलस्य दाता शोधयिता वा । यस्य प्रशिष प्रकृष्ट शासनं विश्वे प्राणिनः उपासते प्रार्थयन्ते देवा अपि यस्य प्रशासनमुपासते । अपि च, अमृतम् अमृतत्वम्, भावप्रधानो निर्देश: । यद्वा नास्ति मृत मरणं यस्मात्तदमृत सुधा यस्य छाया छायेव वशवर्तिनी भवति, मृत्यु. यमस्य प्राणापहारी छायेव भवति, तस्मै करने देवाय हविषा विधेम । मैकडानल इसका अभिप्राय ही ठीक से नही समझ पाये है । जैसे कि ' हिरण्यगर्भः' इस मन्त्र का अर्थ यह है- हिरण्मय अण्ड के गर्भभूत प्रजापति यहाँ पर हिरण्यगर्भ कहलाते है 'प्रजापतिर्वे हिरण्यगर्भः ' यह तैत्तिरीय श्रुति इसमें प्रमाण है । अथवा हिरण्मय अण्ड गर्भ के समान जिसके उदर मे रहता है, वह सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ कहलाता है । यह हिरण्यगर्भ अर्थात् सूत्रात्मा प्रपंच की उत्पत्ति के पहले विद्यमान था । यह हिरण्यगर्भ माया के अध्यक्ष, सृष्टि करने की इच्छा वाले परमात्मा से पैदा हुआ । यद्यपि परमात्मा ही हिरण्यगर्भ भी है, तथापि उसके अधिभूत आकाशादि की भी उत्पत्ति ब्रह्म से ही होती है, अतः तदुपहित हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति भी परमात्मा से ही होती है, ऐसा व्यवहार मे चल पडा है । वह उत्पन्न होने के साथ ही अकेला बिना किसी की सहायता से सभी भूतो का विकारमात्र का ब्रह्माण्ड प्रभृति पूरे जगत् का स्वामी था, ईश्वर था! वह केवल ईश्वर ही नही था, किन्तु उसने इस पूरी पृथ्वी को और विशाल आकाश को भी धारण कर लिया था । अथवा पृथिवी यह अन्तरिक्ष का नाम माना जायगा, तो यह अर्थ होगा कि वह हिरण्यगर्भ अन्तरिक्ष, आकाश और पृथ्वी को भी धारण करता है । ' छन्दसि ' इस पाणिनि सूत्र से यहाँ पर सार्वकालिक लिट् प्रत्यय का विधान माना जायगा । उस प्रजापति की हम हविःप्रदान द्वारा उपासना करते है । ' य आत्मदा' जो सभी आत्माओ का दाता है, अर्थात् अग्नि से जैसे विस्फुलिंग निकलते हैं, उसी तरह से जिससे सारी आत्माएं उत्पन्न होती है, घट की उत्पत्ति से जैसे घटाकाश की उत्पत्ति का उपचरित प्रयोग होता है, उसी तरह से बुद्धि प्रभृति उपाधि की उत्पत्ति के आधार पर उस बुद्धि से उपहित जीवात्माओ में भी उत्पत्ति का व्यवहार माना जाता है । अथवा ' देप् शोधने ' इस धातु से इस पद की निष्पत्ति मानी जायगी । तब उसका अर्थ होगा कि आत्माओं की शुद्धि करने वाला । इसी तरह से ' बलदा' का भी अर्थ बल का दाता अथवा शोधयिता होगा जिसके प्रकृष्ट शासन को सभी प्राणी चाहते है, देवता भी जिसके शासन की कामना करते हैं । अपि च, वह अमृत है, अमृतस्वभाव है । यहाँ पर भावप्रधान निर्देश किया गया है । अथवा जिससे मृत्यु की प्राप्ति नहीं होती, जिसके पीने से मनुष्य मरता नही, वह सुधा यहा पर अभूत कहलाती है । यह सुधा जिसकी छाया के समान वशवर्तिनी होती है और इसी तरह से मृत्युभय की प्राणहारिणी शक्ति भी जिसकी छाया के समान वशवर्तिनी है, उस प्रजापति की हम हविःप्रदान द्वारा उपासना करते हैं ।