वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40
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वेदार्थपारिजातः ३१ वृक्षशाखानामेकस्याज्जन्म बीजत । तथैव सर्वशाखानामेकस्मात् पुरुषोत्तमात् । कर्ता य एव जगतामखिलात्मवृत्तिकर्म- प्रपञ्चपरिपाकविचित्रताज्ञः । विश्वात्मना तदुपदेशपदा. प्रणीतास्तेनैव वेदरचना इति युक्तमेतत् ॥ आप्त तमेव भग- वन्तमनादिमीशमाश्रित्य विश्वसिति वेदवचःसु लोकः ॥ ' ( पृ ० २२० ) । परमेश्वरोऽपि विश्वकर्तृतयैक एव निर्णीयते । "विचित्रं प्राणिभृत्कर्मफलभोगाश्रय जगत् । तत्कर्मफल- सम्बन्धविदा तदुपदेशिना । तेनैव रचिता वेदा इति नान्यस्य कल्पना । एकेनैव च सिद्धेऽर्थे द्वितीयं कल्पयेम किम् || अनेक कल्पनाबीज नहि किञ्चन विद्यते ।' जगत्सर्गे एक एवेश्वरो न द्वौ न बहवः । भिन्नाशयकल्पने एकत्र वैयर्थ्यात्, I इतरत्र व्यवहारवैशसप्रसङ्गेन एकेश्वरत्वविघातात् । तदुक्त जयन्तभट्टेन न्यायमञ्जर्याम् -'अनेकेश्वरवादो हि नातीव हृदयङ्गम. । ते चेत्सदृशसङ्कल्पाः कोऽर्थो बहुभिरीश्वरः ॥ सङ्कल्पयति यदेकः शुभमशुभ वापि सत्यसङ्कल्पः । तत्सि- द्धयति तद्विभवादित्यपरस्तत्र कि कुर्यात् ॥ भिन्नाभिप्रायताया तु कार्यविप्रतिषेधतः । नूनमेक. स्वसङ्कल्पं विहत्याऽनीश्वरो भवेत् || एकस्य किल सङ्कल्पो राजायं क्रियतामिति । हन्यतामिति चान्यस्य तौ समाविशतः कथम् ॥ राज्यसङ्कल्प- साफल्ये विहता वधक्ल्पना । तस्याः साफल्यताया च राज्यसङ्कल्पविप्लवः । तेन चित्रजगत्कार्यसवादानुगुणाशयः । एक एवेश्वरः स्रष्टा जगतामिति साधितम् ॥ ' (पृ० २१६ ) ब्राह्मणग्रन्थविषयक वेबरमतम् ब्राह्मणाना सम्बन्धे संक्षेपतो बेवरमतमुद्धियते । तद्रीत्या 'ब्राह्मणस्वरूपमेव व्यक्तीकर्तुं शक्यते - यज्ञीयसूक्तानी मन्त्राणा च यज्ञकर्मभिरेकत' पारस्परिकसम्बन्धप्रदर्शनमन्यतस्तेषा प्रतीकात्मकपारस्परिकसम्बन्धनिर्देशेन सयोजन विधान मिलता है । वृक्ष की इन सभी शाखाओ की एक ही बीज से उत्पत्ति होती है, उसी तरह वेद की भी सभी शाखाओ की उत्पत्ति एक ही परमेश्वर से मानी जाती है । जो ईश्वर जगत् का कर्ता है, जो जगत् के सारे प्राणियो के कर्मपरिपाक की विचित्रता को जानता है, उसी विश्वात्मा ईश्वर ने प्राणियों को उपदेश देने के लिये इन वेदो की रचना की है, यही उचित माना जा सकता है । उसी परम आप्त, अनादि, सबके स्वामी ईश्वर की रचना वेद है, इस बात पर विश्वास करके ही लोक वेद-वाक्यो मे विश्वास करते हैं' | ( पृ० २२० न्या० म० ) इस सार जगत् के कर्ता के रूप मे ईश्वर एक ही सिद्ध हो सकता है । प्राणियो के विचित्र कर्मफलो के उपयोग के सहारे बना हुआ यह विचित्र जगत् उनके कर्मफल के सम्बन्ध को जानने वाले ईश्वर के द्वारा ही रचित है । वेदो की रचना भी उसी ईश्वर ने की है, यह किसी दूसरे की कल्पना नही हो सकते । एक ही ईश्वर की कल्पना से जगत् की सृष्टि और वेद की रचना की समस्या का समाधान मिल जाने पर दूसरे ईश्वर की कल्पना करना व्यर्थ है, अतः दूसरे ईश्वर की कल्पना करने मे कोई प्रमाण नही । जगत् की सृष्टि करने वाला ईश्वर एक ही है । दो तीन या बहुत से ईश्वर नही माने जाते, क्योकि दो या उससे अधिक ईश्वर मानकर इनके अभिप्राय को भी यदि भिन्न-भिन्न माना जाता है, तो जिसका अभिप्राय सिद्ध नही होगा, उसको ईश्वर मानना व्यर्थ हो जायगा । अब यदि सबके परस्परविरोधी अभिप्राय सिद्ध होने लगेगे तो लोकव्यवहार मे बडा विप्लव उठ खड़ा होगा । इस विषय को न्यायमंजरीकार ने इस तरह से स्पष्ट किया है --' अनेक ईश्वरो को मानने वाली बात कभी मन में नहीं बैठ सकती । क्योकि इन सब ईश्वरो का संकल्प यदि एक सा ही है, तो फिर अनेक ईश्वर मानने से लाभ क्या है? सत्य संकल्प वाला एक ईश्वर शुभ या अशुभ जिस बात को सोचेगा, उसकी अपनी सामर्थ्य से ही जब सब कुछ सिद्ध हो जायगा, तो फिर उसके लिये दूसरे ईश्वर की आवश्यकता ही क्या है? यदि इनके अभिप्राय भिन्न -भिन्न हैं तो परस्पर विरोधी कार्य करते समय यह निश्चित है कि किसी एक का संकल्प पूरा नही होगा । जिसका सङ्कल्प पूरा नही हुआ, वह कैसे ईश्वर माना जायगा? एक ईश्वर ने सङ्कल्प किया कि मैं इस व्यक्ति को राजा बना दूं और दूसरे ने सङ्कल्प किया कि मैं इसको मार डालूँ । ये दोनो कार्य कैसे पूरे हो सकते है? राजा बनाने के सङ्कल्प के पूरा होने पर उसको मार डाने का सङ्कल्प बाधित हो जायगा और मार डालने के सङ्कल्प के पूरा हो जाने पर राजा बनाने का सङ्कल्प बाधित हो जायगा । इस लिये इस विचित्र जगत् रूपी कार्य के निर्वाह के अनुरूप गुणो से युक्त एक ही ईश्वर जगत् का कर्ता माना जायगा' ( पृ० २१ ९ ) ।
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वेदार्थपारिजातः ६३२ वर्णन तेषु । तेषा प्रतीकात्मकसम्बन्ध प्रदर्शनाय व्याख्यान- चिन्तनद्वारा वा स्थापयन्ति । एवब्राह्मणग्रन्थानां लक्ष्यम् । तदर्थं विशिष्टयज्ञक्रियाणा सविस्तर रीत्या ब्राह्मणेषु. ', रूपाणिप्राचीनयज्ञभाषाविषयिकाविश्लेषणरूपाणि वा ब्राह्मणानिप्राचीनतमा। अथवाव्याख्यास्तादृश्यतत्सम्बन्ध परम्परयाकथा ।दार्शनिकयज्ञविधानचिन्तनानिक्व विद्यतवोपलभ्यन्तेइति तु नोक्तम्इति । तदपितच्च वैदिकसाहित्यविवेचनविज्ञानवेधुर्यमूलकम्, तद्रीत्या यज्ञविधानासिद्धेमतदर्थानाम्' ( मी० सू० ), ' वधिना त्वेकवाक्यत्वात् जैमिनिमहर्षिणा स्पष्टमुक्तम्-'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य ब्राह्मणग्रन्थादन्यत्र नोपलभ्यते । तस्माद्येषा मन्त्राणा ' ( ) स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः मी ० सू० इति । यज्ञविधानमेवनोपलभ्यते । वैदिकाना दृष्ट्या विधायकेषु ब्राह्मणेष्व-,, । येषु येषु कर्मसु मन्त्राणा यज्ञैः सम्बन्धविधानमुच्यते तेषु मन्त्रेषु यज्ञस्य स्वरूपविधान विधान क्रियते मन्त्रैस्तेषा कर्मणा मुख्यमाम्नायत्व भवति ॥ तद्रीत्या मन्त्रा विधेया भवन्तिएव 'विधिविधेयस्तर्कश्च वेद: ' इति पारस्कररीत्या विधिविधाय-, ( ) स्वरूप न किन्तु ब्राह्मणैरेव ज्ञायते विधीयते । अत । उपपादन निर्वचन चार्थवादेष्वेव विद्यते । कर्मपरेषु कानि ब्राह्मणानि विधेया मन्त्रास्तर्कश्चार्थवाद एते वेदा भवन्तिवेदेषु सत्त्वात् । महातात्पर्यं तु समेषा वेदाना ब्रह्मण्येव । वेदेष्वियं व्यवस्था, ब्रह्मपराणां मन्त्रब्राह्मणोपनिषदामपि स्थानस्य स्वायत्तीकृतत्वात्' इति, यत् सूत्राणि, सर्वाणि पौरुषेयाणि यद्यपि –'ब्राह्मणानामुत्तरोत्तरकाले महत्त्वं समाप्तप्रायम् श्रौतसूत्रस्तेषा । नास्ति स्वातन्त्र्येण तदपि न किञ्चित् भावानवबोधात् । पाश्चात्त्या नैतज्जानन्ति ब्राह्मण -ग्रन्थों के सम्बन्ध में बेवर का मत किया - 'ब्राह्मणो के स्वरूप को सामान्यतः इस प्रकार से व्यक्त - ब्राह्मण ग्रन्थो के संबन्ध मे बेवर का मत संक्षेपयज्ञ कर्मोंमें यहके हैसाथ एक ओर उनके प्रत्यक्ष पारस्परिक सम्बन्ध का और दूसरी - जा सकता है उनका लक्ष्य यज्ञीय सूक्तो और मन्त्रो को हुए संयुक्त करना है । उनका प्रत्यक्ष पारस्परिक सम्बन्ध प्रदर्शित करने ओर उनके प्रतीकात्मक पारस्परिक सम्बन्ध का निर्देश करतेकरते है । उनका प्रतीकात्मक सम्बन्ध दिखाने के लिये वे या तो प्रत्यक्षतः - को परम्परा या चिन्तन द्वारा के लिये ब्राह्मण ग्रंथ विशिष्ट यज्ञक्रिया का सविस्तार वर्णन स्थापित कराते है । इस प्रकार उनमे हमे सबसे, ' ( ) व्याख्यात्मक और विश्लेषणात्मक है अथवा उस सम्बन्ध और प्राचीनतम दार्शनिक चिन्तन उपलब्ध होते हैं पृ० ६ । प्राचीन यज्ञ, भाषाविषयक प्राचीनतम व्याख्याएं, प्राचीनतमन होनेकथाएंके कारण है, क्योकि उनकी बताई पद्धति से यज्ञ के विधि-विधानो यह कथन भी वैदिक साहित्य की विवेचन पद्धति का ज्ञान विधि-विधान कहाँ बताये गये है? इस सम्बन्ध मे जैमिनि महर्षि का स्पष्ट के लिये ही उपदिष्ट हैं, अत - - की सिद्धि नही होती । उन्होने यह नही बताया कि यज्ञ के विधि वाक्यों के अतिरिक्त सिद्धार्थक वेद वाक्यो मत है कि सारा आम्नाय ( वेदशास्त्र ) यज्ञ के विधि-विधानों के साथ एकवाक्यता मानकर विधि-वाक्यों की स्तुति के रूप में माना जा , का प्रामण्य नही हो सकता उनका प्रामाण्य विधि वाक्यों नही मिलते । इस तरह से वेवर आदि पाश्चात्य विद्वान् जिन मन्त्रो का सकता है | यज्ञ के विधि-विधान ब्राह्मण ग्रंथों के सिवाय अन्यत्र प्रतिपादन है ही नहीं । वैदिको की दृष्टि से विधायक ब्राह्मण ग्रंथो को, अनुसार ही मन्त्रो का विनियोग - यज्ञ की विधियो से सम्बन्ध मानते है उनमे यज्ञ के स्वरूप का होता है । जिन जिन कार्यों के लिये मन्त्रो ( ), ' ' हो मुख्य आम्नाय वेद माना जाता है । ब्राह्मण वाक्योंब्राह्मणके ग्रंथो से जाना जाता है मन्त्रों से नही । इसीलिये विधिविधेय० इस,, ' ' का विनियोग किया जाता है उन कर्मों का स्वरूप भी विधेय मन्त्र और अर्थवाद वाक्य इन सबकी वेद संज्ञा होती है । पारस्कर सूत्र के अनुसार विधि अर्थात् विधायक ब्राह्मण वाक्य विधि वाक्यों की उपपत्ति निर्वचन और उनके रहस्य का ज्ञान अर्थवाद अर्थवाद वाक्यों को तर्क शब्द से यहाँ इस लिये कहा गया है कि के सम्बन्ध में ही मान्य है । इसके अतिरिक्त ब्रह्म के प्रतिपादक वाक्यों से ही होता है । यह व्यवस्था कर्मभाग के प्रतिपादक वेद वाक्यों वेद का महातात्पर्य ब्रह्म मे ही माना गया है । मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् भी वेद में हो गिने जाते है । अन्ततः समस्त होता गया और उनका स्थान सूत्रो आदि -' बेवर ने आगे लिखा है ब्राह्मणों का व्यावहारिक महत्त्व उत्तरोत्तरभाव उनकीसमाप्तसमझ में नही आया है । पाश्चात्य विद्वान् यह ने ग्रहण कर लिया' (पृ० ८), किन्तु यह कथन भी गलत है, क्योंकि इनका
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वेदार्थ पारिजातः ६३३ तेषा प्रामाण्यम्, अनपेक्षं प्रामाण्य तु मन्त्रब्राह्मणयोरेवापौरुषेयत्वात् । श्रौतसूत्राणि तु श्रुतिमूलकत्वादेव प्रामाण्यमर्हन्ति । सक्षिप्तत्वादनुष्ठानक्रमेण निर्दिष्टत्वाद् अनुष्ठातृषु तेषामादरो युक्त एव, तथापि तेषु विप्रतिपत्ती श्रुतित्वाद् ब्राह्मणमेव शरणं भवति । तत एव केषाञ्चित् सहिताब्राह्मणादीना लोपे जातेऽपि तदीयानि सूत्राण्यवशिष्यन्ते । कानिचित्- वाष्कल-पंङ्गि-भाल्लवि- शाट्यायनि कालभावि-लामकायनि- शाम्बुवि-खाडायनि - शालङ्कायनिप्रभृतीनि सहिताब्राह्मणा- दीनि लुप्तानि तेषा चोद्धरणानि क्वचित् क्वचिदुपलभ्यन्ते । ( पा० सू० ४।३।१०६ ) इत्यत्र येषां छन्दोग्रन्थाना सहिताना च निर्देशो लभ्यते, तेषामुद्धरणमपि क्वचिन्नोपलभ्यते ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, पातञ्जलभाष्य निर्दिष्टशाखा- संख्यासु तेषामन्तर्भूतत्वात् । तत्रानि सूत्राणि तावन्ति न सन्ति । शुक्लयजुर्वेदीयपञ्चदशशाखासु शाखोयकर्मणा कात्यायनसूत्रेग सङ्कलितत्वात्तासामेकमेव सूत्रमिति सम्प्रदायविदामतिरोहितमेव । - यदपि — 'ऋग्वेदीयब्राह्मणानि तान्येव कर्माणि वर्णयन्ति, यानि होतृभिः कर्तव्यानि' इति, होतॄणामिद कर्तव्यमासीद्यद् विशिष्टावसरापयोगिनो मन्त्रान् सूक्तेभ्य आचिन्वन्ति येषां शास्त्ररूपेण प्रयोगो भवति स्म' इति, तदेतत्सर्वमज्ञानमूलकम्, स्तोत्रशस्त्रादिस्वरूपाणा ब्राह्मणैः सूत्रः पारम्पर्येण च निर्धारितत्वात् । स्वेच्छयाभ्यूहेन वा नहि कर्माणि क्रियन्ते, तेषा शास्त्रैकसमधिगम्यत्वात् । श्रुतयो न पर्यनुयोक्तु शक्याः । तदभिप्रायस्तु शिष्ट निर्दिष्टैरुपायैरवगन्तुं शक्यः । अतः ' सामवेदीयसहिता यजुर्वेदीयसंहिताश्च कर्मणा सम्पादनक्रमेण निर्मिताः । ऋग्वेदीयसंहितासु तादृशः पाठक्रमो नास्ति ' इत्यादिकमपि बालभाषितमेव, सहितासङ्कलनेऽपि पुरुषाणा स्वातन्त्र्येऽपौरुषेयत्वक्षतेः । नही जानते कि सभी सूत्र ग्रन्थ पौरुषेय है । उनको स्वतन्त्र रूप से प्रमाण नही माना जाता, सर्वथा निरपेक्ष प्रामाण्य मन्त्र और ब्राह्मण भाग का ही माना जाता है, क्योकि ये अपौरुषेय है । श्रोत सूत्रो का प्रामाण्य श्रुति के आधार पर ही माना जा सकता है । ये ग्रन्थ अत्यन्त संक्षिप्त शैली मे लिखे गये है और प्रत्येक विषय का यहाँ अनुष्ठान के क्रम से प्रतिपादन हुआ है, अत वैदिको की इनके प्रति आदर दृष्टि उचित ही है, किन्तु इनमे परस्पर विरोध हो तो उस परिस्थिति में श्रुति होने के कारण ब्राह्मण ग्रन्थो को ही प्रमाण मानना पडेगा । ' सूत्र ग्रन्थो के प्रति आदर दृष्टि होने का हो यह परिणाम है कि कुछ शाखाओ के सहिता और ब्राह्मण ग्रन्थो के लुप्त हो जाने पर भी उनके सूत्र ग्रन्थ अब भा बचे हुए है । इस प्रकार जिन ब्राह्मणो या सहिताओं के पाठ नष्ट हो गये, उनके अन्तर्गत ही वाष्कल, पैङ्गिन्, भाल्लविन्, पाट्या निन्, कालभविन्, लामकायनिन्, शाम्बुवि, खाडायनिन् और गालङ्कायनिन् शाखा की रचनाएँ आती है, जिनके उद्धरण इ 1 वर्ग की रचनाओ में अनेक स्थलो पर मिलते है । इसके अतिरिक्त शौनकादि गण ( ४| ३ | १०६ ) मे उद्दिष्ट सभी छन्दस् ग्रन्थ वा सहिताएँ भी नष्ट हो चुकी है. जिनके नामों का उल्लेख अन्यत्र नही हुआ है' ( पृ० ८) यह कथन भी उचित नही है, क्योकि पातंजल महाभाष्य में निर्दिष्ट शाखाओ को सख्या में वे भी अन्तर्भूत है । यह विशेष उल्लेखनीय है कि सूत्रो की सख्या उतनी नही है, क्योकि शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाओ मे शाखा के सभी कर्मों का अकेले कात्यायन श्रौतसूत्र मे ही संकलन किया हुआ है, अत • इन सब शाखाओ का सूत्र ग्रन्थ एक ही है, यह बात साम्प्रदायिक परम्परा को जानने वालो से छिपी नही है । ' ऋग्वेद के ब्राह्मण सामान्यतः केवल उन्ही कर्मों का वर्णन करते हैं. जो होता या ऋचाओ के गायक को करने होते हैं । होता का काम यह था कि वह विशिष्ट अवसरो के उपयुक्त मन्त्रों को विविध सूक्तो से चुनता था और उनका ' शस्त्र' रूप में प्रयोग करता था ' (पृ ० ८ ) यह सारा कथन भी वक्ता के अज्ञान का ही उदाहरण है, क्योंकि स्तोत्र, शस्त्र आदि का स्वरूप ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थो तथा परम्परा से भी निर्धारित है । अपनी इच्छा से या मनमाने तरीके से कोई वैदिक कर्म नही सम्पन्न होता, उनकी पद्धति केवल शास्त्रो से ही जानी जा सकती है । श्रुतियो को हम मनमाने तरीके से कही नही लगा सकते । उनका अभिप्राय शिष्ट पुरुषो के द्वारा बताये गये उपायो से ही जाना जा सकता है । इसी लिये 'सामवेद और यजुर्वेद की संहिता यज्ञ आदि कर्मों के संपादन के क्रम से संकलित की गई है, ऋग्वेद की संहिता में इस तरह का क्रम नही है' यह कथन भी बच्चो की सी बात लगती है, क्योकि संहिताओ का संकलन करने में भी पुरुषों की स्वतन्त्रता मानने पर वेदो की अपौरुषेयता नष्ट हो जायगी ।
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६३४ वेदार्थपारिजातः यदुक्तम्- ' शुक्लयजुर्वेदीय ब्राह्मण सहितायाः परम्परानुगामिनी टीकैव मन्तु शक्यते । यत्र ब्राह्मणेन केचिन्मन्त्रा न व्याख्यातास्ते मन्त्राः पश्चान्निर्मिता इत्येव निष्कर्षो वक्तु शक्यते' इति, तदपि निर्मूलम्, व्याख्यातमन्त्रेष्वपि बहूना पदानामध्याख्यातत्वेन तेषामपि पश्चाद्भवत्वापत्ते । वस्तुतस्तु ब्राह्मणश्रुतय एव तानि तानि कर्माणि विधाय तत्र विहिताना व्रीहियवादिद्रव्याणा यथा प्रोक्षणादीन् सस्कारान् विदधति, तथैव विहिताना मन्त्राणा तदनुगुणव्याख्या- रूपान् सस्कारानेव विदधति । अत एव न ब्राह्मण मन्त्राणा व्याख्यानमात्रम् । ब्राह्मणाना विधातृत्वेन प्राधान्यात्, , विधेयत्वेन च मन्त्राणामप्राधान्यात् । परिशिष्टयोजनमपि न पाश्चात्त्यम् किन्त्वपौरुषेयत्वेनानाद्येव । तस्यापि शताध्यायात्मकशतपथान्तर्गतत्वात् । यथा प्रधानकर्मणामनुष्ठानानन्तर प्रतिपत्तिकर्माणि शिष्यमाणानि पश्चाद- नुष्ठीयते, तथैवाश्वमेधादिसम्बन्धीनि विशिष्टानि शिष्यमाणानि विज्ञानानि यानि परिशिष्यन्ते, तान्येव परिशिष्टानी- त्युच्यन्ते । अत एव कृष्णयजुर्वेदीयं ब्राह्मणं शतपथेन समानमपि कालदृष्ट्या विशेषवत् । तच्च स्वसहिताया एव पूरकम् । यदप्युक्तम्-' अथर्ववेदस्य ब्राह्मणमिदानी यावदज्ञातम्' इति, तदपि यत्किञ्चित्, पाश्चात्त्यानामविज्ञा- -' तत्वेऽपि गोपथब्राह्मणरूपेण तस्य प्रसिद्धत्वात् । यदपि ब्राह्मणीयश्रवणविवेचनाध्यापनेषु वैदुष्यपूर्ण तेषा विशुद्ध ज्ञानमुपलभ्यते, तत्र निम्नवर्गेभ्य एतन देयमित्यपि चेतितम्' इति, तत्तु युक्तमेव, अधिकारमन्तरा प्राप्तज्ञानानामनिष्ट- करत्वात् । तन्नियमाननुरोधादेव बेवरप्रभृतिभिर्बहवोऽनर्था वेदेषूद्भाविता । ' यदुक्तम्- वैदिकसाहित्य सम्बन्धितृतीययुगस्य प्रतिनिधित्वं सूत्राणि कुर्वन्ति । एतानि ब्राह्मणाना स्वाभाविकविकासरूपाणि 1। अत्रैव टिप्पण्यां सूत्रशब्दः सर्वप्रथम मधुकाण्डे लभ्यते । यश्च यजुर्ब्राह्मणस्य पश्चाद्भाव्यशः । "शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मण को इसकी संहिता पर एक चलती हुई और परम्परानुगामिनी टीका मान सकते है । शुक्ल यजुर्वेद संहिता के क्रम का इसका ब्राह्मण इतनी कठोरता के साथ पालन करता है कि जहाँ ब्राह्मण ने एक या अधिक मन्त्रों को छोड दिया है, वहाँ हमारा यह निष्कर्ष निकालना कदाचित् सगत होगा कि उस समय वे मन्त्र सहिता में थे ही नहीं' ( पृ० ८) । यह कथन भी निराधार है, क्योकि जिन मन्त्रों की वहाँ व्याख्या की गई है, उनमें भी बहुत से पदो की व्याख्या छोड दी गई है, आपकी तर्क शैली से इन अव्याख्यात पदो को भी प्रक्षिप्त मानना पड जायगा । वास्तव में तो ब्राह्मण ग्रन्थ ही जैसे उन उन कर्मों का विधान कर बाद मै व्रीहि, यव आदि विहित द्रव्यों के प्रोक्षण प्रभृति संस्कारो का विधान करते है, उसी तरह से विहित मन्त्रो की भी अनुरूप व्याख्या करते हुए वे एक तरह का उनका संस्कार ही करते है । इसी लिये ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों की मात्र व्याख्याएँ ही नही है । ब्राह्मण ग्रन्थ विधायक होने से प्रधान है और मन्त्रो की विधेयता के कारण वे अप्रधान है । परिशिष्टो का संयोजन भी बाद मे नही हुआ है, किन्तु अपौरुषेयता के आधार पर ये भी अनादि है, क्योंकि ये भी सो अध्यायो के शतपथ ब्राह्मण के अन्तर्गत है । जैसे प्रधान कर्मों के अनुष्ठान के बाद बचे हुए प्रतिपत्ति कर्मों का अनुष्ठान बाद मे किया जाता है, उसी तरह से अश्वमेध आदि कर्मों से संबद्ध बचे हुए विशिष्ट विज्ञानो का परिशिष्ट के रूप में वर्णन बाद में हुआ है । इसी लिये कृष्णयजुर्वेद का ब्राह्मण शतपथ से मिलता-जुलता होने पर भी कुछ अपनी विशेषता रखता है । ऐसा होने पर भी इसमें कालिक दृष्टि से कोई विशेषता नही मानी जा सकती । वह अपनी संहिता का पूरक ही माना जाता है । ' अथर्ववेद का ब्राह्मण आज तक अज्ञात है' (पृ० ८), यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि वह पाश्चात्यों को भले ही अज्ञात रहा हो, किन्तु गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद के ब्राह्मण के रूप में ही प्रसिद्ध है । 'ब्राह्मण साहित्य के लिये प्रचलित नाम है 'श्रुति' या सुनना, अर्थात् वह जो श्रवण, विवेचन और अध्यापन का विषय हो । इस नाम के द्वारा उनके वैदुष्यपूर्ण विशुद्ध स्वरूप का पर्याप्त बोध होता है । इसके अनुसार हम स्वयं रचनाओं से इस बात की चेतावनी पाते है कि उनका ज्ञान किसी निम्न वर्ग के व्यक्ति को न प्रदान किया जाय' (पृ० ९), यह बात तो ठीक ही है, क्योकि बिना अधिकार के किसी ज्ञान को प्राप्त करने से अनिष्ट की ही संभावना रहती है । इन नियमो का पालन न हो पाने से ही बेवर प्रभृति विद्वानो ने वेदो में अनेक अनर्थों की उद्भावना कर दी है । 'वैदिक साहित्य के तीसरे युग का प्रतिनिधित्व 'सूत्र' करते है । सामान्यतः ये सूत्र ब्राह्मण -ग्रन्थों के स्वाभाविक विकास की कड़ी हैं' ( ० ९ ), 'सूत्र शब्द सर्वप्रथम मधु काण्ड में आता है, जो शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मण का सबसे बाद का अंश है । इसके
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वेदार्थपारिजातः ६३५ पश्चादृग्वेदीययोगृह्यसूत्रयोरन्ते पाणिनिसूत्रेऽय शब्द उपलभ्यते । पाश्चात्त्या लैटिनजर्मनादिशब्दैः सूत्रादि- ग्रन्थाना कालक्रम निर्धारयन्ति । अन्ते सङ्केतमार्गः सङ्केतो वा सूत्रपदस्यार्थ इति वदन्ति । ' सेण्टपीटर्स- डिक्शनरी इत्यादावयमर्थ उक्त । विस्तृतव्याख्याविषयाणा विषयशृङ्खलाविलोपभयात् सूक्ष्मविषयाणां विस्तृत विवेचनापेक्षया सार गर्भिताना सक्षिप्तविवरणाना रक्षणार्थं स्मृतेर्भारातिशयनिवारणाय च संक्षिप्तरूपेण सङ्कलनमेव सूत्राणामुद्देश्यमासीत् । तत्परिणामेन गूढशैल्या आविर्भावो जातः । तत एव प्राचीनसूत्राणि सुबोधानि नवीनानि च दुर्बोधानीत्यादिकं बहु जल्पितम्, तत्सर्वमपि निःसारमेव, ब्राह्मणग्रन्थेष्वपि सूत्रानुकारिणा वाक्यानां बाहुल्येन दर्शनात् । ' आत्मेत्येवोपासीत, आत्मान लोकमुपासीत' इति बृहदारण्यके, 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' ( तै ० उ ० २।१।१ ) इत्यादिसूत्राणां तद्व्याख्या- रूपाणामपि ब्राह्मणाना दर्शनात् । ' ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इत्यस्य व्याख्यानरूप ' सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायाम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ॥ ब्राह्मणं मन्त्ररूपं तस्यापि व्याख्यानम्—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादिब्राह्मणम् । ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेद' इति बृहदारण्य - कस्थवाक्येषु सूत्राण्यनुव्याख्यानानि सूत्रादिपदानि ब्राह्मणविशेषबोधकान्येवेति मन्तव्यम्। कात्यायनपाणिन्यादि- सूत्राणि न तत्र सूत्रपदेन ग्राह्याणीति तद्विदा स्पष्टमेव । बेवरादयस्त्वज्ञानादेव साङ्कर्यमापादयन्ति । श्रोतगृह्यभेदेन श्रौतस्मार्तकर्मभेदात् सूत्रद्वैविध्यमपि मन्तव्यम् । न गृहस्थजोवनसम्बन्धित्वेन गृह्यत्वव्यपदेशः, श्रोत्रसूत्रोक्तक्रियाणामपि गृहस्थैक सम्पादनीयत्वात् । ' यत्स्मरणीयं सा स्मृतिः' इत्यपि यत्किञ्चित् मन्त्रब्राह्मणानामपि स्मर्तव्यत्वाविशेषात् 1। वस्तुतस्तु पौरुषेय- ग्रन्थाः स्मृतिपदव्यपदेश्या भवन्ति नापीरुषेयाः । श्रोतानर्थान् स्मृत्वा स्वशब्दैः स्मर्तारो महर्षयो यन्निरूपयन्ति उपरान्त यह शब्द ऋग्वेद के दो गृह्यसूत्रों में और अन्त में पाणिनि में आता है' ( पृ ० ९ टिप्पणी ) ( पाश्चात्य विद्वान् इस सूत्र शब्द की इसी अर्थ के लेटिन -जर्मन आदि भाषाओ के शब्दो से तुलना करके सूत्र- ग्रन्थो के कार्यक्रम को निर्धारित करते है और अन्त में इस शब्द का मौलिक अर्थ वे ' संकेत मार्ग' या ' संकेत' ठहराते है । सेण्ट पीटर्स वर्ग डिक्शनरी में यही अर्थ दिया गया है -पू० ९ टिप्पणी)... विस्तृत व्याख्याओ मे कही सम्पूर्ण विषय श्रृंखला का लोप न हो जाय, अतः सूक्ष्म विषयो के विस्तृत विवेचन के स्थान पर ठोस और सारगर्भित सक्षिप्त विवरणो को रखने की आवश्यकता पडी । इस विस्तृत विषय भाण्डार को संक्षिप्त रूप देने के लिये अत्यन्त सूक्ष्मता की आवश्यकता थी, जिससे स्मृति पर अधिक बोझ न पडे । इस सूक्ष्मता का अन्ततोगत्वा परिणाम यह हुआ कि एक नितान्त संक्षिप्त ओरगूढ शैली का विकास हुआ, जिसका प्रयोग सूत्रो के उत्तरोत्तर स्वतन्त्र होने और उसकी उपादेयता प्रकट होने पर बढ़ता गया । अतः जो सूत्र जितना प्राचीन है, वह उतना ही अधिक बोधगम्य होगा और जो सूत्र जितना अधिक दुर्बोध है, वह उतना ही अधिक अर्वाचीन सिद्ध होगा' (पृ० १० ) । इस तरह की बहुत सो बातें यहाँ कही गई है, किन्तु वे सब भी निःसार हैं, क्योकि ब्राह्मण-ग्रन्थों में भी बहुत से वाक्य ऐसे मिलते है, जो कि सूत्रो की तरह ही अत्यन्त संक्षिप्त है । 'आत्मेत्येवोपासीत' इस तरह के सूत्र रूप में और उनकी व्याख्या के रूप मे अत्यन्त संक्षेप मे किसी बात का प्रतिपादन करने वाले अनेक वाक्य ब्राह्मण- ग्रन्थों में विद्यमान है । ' ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इस सूत्ररूप ब्राह्मणवाक्य की व्याख्या ' सत्यं ज्ञानमनन्तं' इत्यादि मन्त्ररूप ब्राह्मण में की गई हैं और इसकी भी व्याख्या 'तस्माद्वा एतस्मा' इत्यादि ब्राह्मण वाक्यों से की गई है । 'अस्य महतो भूतस्य' इत्यादि बृहदारण्यक वाक्य में सूत्र, अनुव्याख्यान आदि पदविशेष ब्राह्मणो के अंशों के ही बोधक हैं । यहाँ कात्यायन, पाणिनि आदि के सूत्र ग्रन्थो का ग्रहण नही किया जाता, यह बात इस विषय के विद्वानो को ज्ञात है । बेवर प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् अपने अज्ञान के कारण ही ऐसे स्थलो मे आपस में घोल-मेल कर देते है । इसी तरह से श्रोत और स्मार्त कर्मों के भेद के आधार पर ही श्रोत और गृह्यसूत्रो को अलग अलग माना जाता है । गृहस्थ जीवन से संबद्ध कर्मों का विधान होने से गृह्यसूत्र नाम पडा हो सो बात नहीं है, क्योकि श्रोतसूत्रों में प्रतिपादित विधि-विधानों का संपादन भी केवल गृहस्थ ही करते हैं । 'स्मृति का अर्थ है वह जो याद किया जाने योग्य हो' ( पृ० १६ ), यह बात भी गलत है, क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मण भी याद किये जाने योग्य है ही । वास्तव में तो पौरुषेय ग्रन्थों को ' स्मृति' शब्द से बोधित किया जाता है, अपौरुषेय वेदों को नही ।
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वेदार्थ पारिजातः६३६ सा स्मृतिः । श्रुतिस्तु केवलं गुरुपारम्पर्येण श्रूयत एव न केनापि क्रियते । श्रुतिविरोधे स्मृतीनामप्रामाण्य श्रुत्यनुगुणा-नयनं वा । अविरोधे तु श्रुतिमूलकत्वानुमानेन मन्वादिस्मृतिवत् प्रामाण्यमेव । 'विरोधे त्वनपेक्ष स्यादसति ह्यनुमानम्' ( ),,: मी० सू० इति जैमिनिसूत्रात् । यत्तु स्मृतयः स्मरणशक्ति प्रभावयन्तीति तत्तुच्छम् तासामनुभूतिभि प्रभा-वितत्वेन स्मृतित्वापत्तेः । यदपि - ' याज्ञिकक्रियासु यथा यथा पावित्र्य निष्पन्न तथैव शनैः शनै तासा पद्धतय सुनिश्चिता जाता: । तथैव तासां सूक्त: सम्बन्धस्य महत्त्वमपि वृद्धिमुपगतम् । तत्सिद्धयं सूक्ताना पाठा निर्धारितास्तथैव शुद्धोच्चारणाना पाठाना च स्थापनया तासामुत्पत्तिपारम्पर्यसुरक्षणाय यत्न आस्थितः । कालान्तरेण तेषा शाब्दिका अर्था भाषारूप च प्राचीनरूपदृष्ट्या वैदेशिकत्वमुपगतानि । तदानीं तद्रक्षणायात्यन्तमवधानमपेक्षितमासीत् । तत्सिद्धये विशेषज्ञानामुपरि शिक्षाप्रदानस्योत्तरदायित्वमागतम् । तेषां चतुर्दिक्षु पर्यटनशीलाना विदुषा समुदायो निर्मितः । य एकस्मादाचार्याद् आचार्यान्तरस्य ख्यातिमाकर्ण्याध्ययनार्थं यात्रा कुर्वन्ति स्म । ते चानुसन्धातारो भाषासम्बन्धिप्रश्नेष्वेव न सीमिता आसन्, किन्तु ब्राह्मणीयानामध्यात्मविद्यानां सर्वेषु क्षेत्रेष्वश्वेषण कुर्वन्ति स्म । पूजनविधानानां चिन्तनाना प्रश्नाश्च समानरूपेण सर्वक्षेत्रेषु समायान्ति स्म । परस्पर सुसम्बद्धाश्च ते । इदं तु स्वीकर्तव्यमेव यत्तदानीन्तनेषु ब्राह्मणेषु नितान्तमुत्साहपूर्णानि वौद्धानि जीवनान्यासन् । स्त्रियश्च तस्मिन् विषये सक्रियं भागं गृह्णन्ति स्म । इद बौद्धिकश्रष्ठ्य- मेव ब्राह्मणानां शेषाज्जनसमूहात् प्राधान्यस्य कारणत्वमुपगतम् । क्षत्रिया अपि बाह्ययुद्धेभ्यो विश्रमणकालेषु शान्ति- लाभायैवैभ्योऽन्वेषणेभ्यो न दूरेऽवस्थातुं समर्था आसन् । राज्ञा सदासि बौद्धिकजीवनस्य केन्द्रभूतान्यासत् । यत्र श्रीत अर्थो को स्मरण करके उनकी स्मृति को ताजा रखने के अभिप्राय से महर्षिगण अपने शब्दो में जिन ग्रन्थो की रचना करते है, उनको स्मृति कहा जाता है । श्रुति केवल गुरु-परम्परा से सुनी जाती है, उसकी कोई रचना नही करता । श्रुति से विरोध होने पर स्मृति अप्रामाणिक मानी जाती है । इसके प्रामाण्य के लिये श्रुति के अनुसार उसकी व्याख्या करनी पड़ती है । यदि विरोध नही है तो अनुमान के आधार पर स्मृति के अनुगुण श्रुति की कल्पना कर उसको मनु प्रभृति की स्मृतियो की तरह प्रमाण माना जाता है, जैसा कि ' विरोधे त्वनपेक्षं ' इस जैमिनि सूत्र में प्रतिपादित है । 'स्मृति सीधे स्मरण शक्ति पर छाप डालती है' ( पृ० ११ ) यह कथन भी गलत है, क्योकि स्मृति ग्रन्थो की रचना उनके प्रणेता महर्षियो की अनुभूति पर आधारित रहती है । 'याज्ञिक क्रियाएं जितनी ही पवित्र होती गई और धीरे- धीरे पूजा की पद्धति जितनी ही अधिक सुनिश्चित होती गई, उतना ही इनसे सम्बद्ध सूक्तों का महत्त्व भी बढ़ता गया और यथासभव पवित्रता और सुरक्षा का उनका दावा भी प्रबल होता गया । इसे सिद्ध करने के लिये यह आवश्यक था कि पहले सूक्तो के पाठ का निर्धारण हो, दूसरे शुद्ध उच्चारण और पाठ की स्थापना हो और अन्ततः उनकी उत्पत्ति की परम्परा सुरक्षित रक्खी जाय । कालान्तर में उनका शाब्दिक अर्थ भाषा के उस रूप के लिये विदेशी हो गया, जिस रूप में यह पहुँच चुकी थी । आगे चलकर यह स्थिति सामान्य जनता की अपेक्षा उन पुरोहितो की हो गई, जिन्हे इनका ज्ञान था । ऐसी दशा में अर्थ की भी सुरक्षा और स्थापना के लिये सावधानी बरतने की आवश्यकता पडी । इन सभी प्रयोजनो को सिद्ध करने के लिये विषय का उत्तम ज्ञान रखने वाले विद्वानो को अज्ञात व्यक्तियों को शिक्षा प्रदान करने का बीडा उठाना पडा और उनके चारो ओर पर्यटनशील विद्वानों के ऐसे समुदाय बन गये जो एक आचार्य से दूसरे आचार्य के पास उसके विशिष्ट ज्ञान की ख्याति सुनकर अध्ययन करने के लिये यात्राएँ किया करते थे । ये अनुसन्धान कर्ता स्वभावतः भाषा- संबन्धी प्रश्नो तक ही सीमित नहीं थे, अपि तु ब्राह्मणीय आध्यात्मिकता के समूचे क्षेत्र में खोज किया करते थे । इस क्षेत्र में पूजन विधि और चिन्तन के प्रश्न समान रूप से माते थे, जो वस्तुतः परस्पर सुसंबद्ध थे । कुछ भी हो, हमे यह मानना पड़ेगा कि इस युग के ब्राह्मणों में एक नितान्त उत्साह- पूर्ण बौद्धिक जीवन था, जिसमें स्त्रियाँ भी सक्रिय भाग लेती थी । यह बौद्धिक श्रेष्ठता ही आगे जाने वाले युग में भी ब्राह्मणों को शेष जन -समुदाय के ऊपर प्रधानता का कारण बनी रही । क्षत्रिय वर्णं भी विशेषतः बाह्य युद्धो से विश्राम और शान्ति प्राप्त कर लेने पर इन अन्वेषणों से दूर न रह सका । यहाँ हम मध्य युगों के पाण्डित्य-प्रधान काल का एक यथार्थ चित्र देते है -- राजा जिनकी सभाएँ
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वेदार्थपारिजान: ९३७ सोत्साह ब्राह्मणाः प्रतिस्पर्धया मानव मस्तिष्कैः प्रतिपादितानां प्रश्नानां समाघाने संल्लग्ना आसन् । स्त्रियश्चोत्साहैः प्रतिभाभिश्च चिन्तनानां रहस्येषु निमज्जन्ति स्म । स्वीयविचारगाम्भीर्ये रौदात्यैश्च पुरुषान् प्रभावयन्ति विस्मापयति स्म । ये विषया वर्णनेषु स्वप्नलोकगता इव भान्ति स्म, धार्मिक विषयसम्बद्धान् समादधति स्म इत्यादिकम् । पाश्चात्त्याः कूटनीत्या भारतीयग्रन्थानालोडयितुं यथाशक्ति प्रयतन्ते । यद्यपि ते तत्त्वाद्विदूर एव तिष्ठन्ति, आपातरमणीयवर्णनेन पाश्चात्त्यान् तादृशानेव सामान्यभारतीयजनानपि प्रभावयन्ति अस्ते महत्त्वहीनतामेव प्रदर्श- यन्ति । तथैव बेवरोऽपि कथयति तेषां समाधानाना महत्त्वसम्बन्धे सामान्यतयाऽन्वेषणानां मूल्यसम्बन्धे त्वभ्यैव वार्ता, किन्तु पाण्डित्यपूर्णेषु सूक्ष्मविवेचनेष्वपि तेषामखण्डयोग्यता नासीत् केवल प्रयत्नमात्र तत् । तदपि तादृशं यस्य कस्यापि युगस्य महत्त्वं प्रख्यापयति । मैक्समूलरादीनामपीयमेव दशा । सर्वमेतद्रामायणमीमांसायां प्रदर्शितम् । ऋगादिमन्त्राणामतिगाम्भीर्यात् तदवगमसामग्रयभावाच्चैते वराकास्तद्विषये न किमपि जानन्ति । क्वचिदुत्तानाथंलेशान् परिगृह्य बाला इव यत्कि- ञ्चित् प्रमाणविधुरमसम्बद्धं प्रलपन्ति कल्पयन्ति च । मन्त्राणा व्यवस्थितान् पाठानालोक्य स्वाभ्यूहमात्रेण तेषा पाठा-नामर्वाचीनत्वं कल्पयन्ति, मूल तु न किमपि प्रस्तुवन्ति । सर्वमेतद्विकासक्रमसापेक्षा कल्पना । स च विकासवादोऽस्माभि-मर्क्सवाद एवं रामराज्यपुस्तके निराकृतः । इदानी पाश्चात्त्या अपि विकासवादं खण्डयन्तोऽवलोक्यन्ते । अचेतनायाः प्रकृतेरचेतनानां परमाणूनां च विद्युत्कणानां च बुद्धीच्छा प्रयत्नवदात्मसाध्यानां विलक्षणकार्याणां निर्माणेऽसामर्थ्यमालोक्य सर्वोऽपि सहृदयः सर्वज्ञसर्वशक्तिमत्परमेशपूर्वकमेव जगन्निर्माणं मनुते । तदपि चेहैवान्यत्र प्रदर्शितम् । तद्रीत्या च हासवाद बौद्धिक जीवन का केन्द्र थी, ब्राह्मण उत्साहपूर्ण प्रतिस्पर्धा के साथ मानव मतिष्क द्वारा प्रतिपादिव नितान्त गूढ प्रश्नो के समाधान मे लगे थे, स्त्रियाँ उत्साह और प्रतिभा के साथ चिन्तन के रहस्यो में गोते लगाती थी, अपने विचारो के गाम्भीर्य और औदात्य से पुरुषो को प्रभावित और विस्मित करती थी, ऐसी स्थिति में रह कर जो वर्णनो के आधार पर स्वप्नलोक की बात प्रतीत होती है, धार्मिक विषयों से सबद्ध प्रश्नो का समाधान करती थी' (पृ० १४-१५ ) । पाश्चात्य विद्वान् कूटनीति की दृष्टि से हो भारतीय ग्रन्थो का अध्ययन करते है । यद्यपि उनके वास्तविक अभिप्राय तक वे नही पहुँच पाते, ता भी ऊपर ऊपर से देखने मे बहुत ही सुन्दर प्रतीत होने वाले अपने निष्कर्षो से न केवल पाश्चात्य जनों को ही, अपि तु इसी तरह के सामान्य भारतीयो को भी वे प्रभावित कर लेते है और अन्ततः उन शास्त्रो को महत्त्वहीन सिद्ध कर देते है । बेवर भी इसी पद्धति का अनुसरण कर कहते हैं--'जहाँ तक उनके समाधानों के महत्व और सामान्य रूप में इन सभी अन्वेषणो के मूल्य का प्रश्न है, वह बिलकुल दूसरी बात है । किन्तु पाडित्यपूर्ण सूक्ष्म विवेचनो मे भी कोई अखण्ड योग्यता नही है । वह केवल प्रयत्न मात्र है और वह भी किसी भी युग ( ) | ऐसाकि इस प्रकार के के महत्त्व को निखार देता है पु ० १५ मैक्समूलर प्रभृति विद्वानो की भी यही पद्धति है । इस बात को हम ' रामायण मीमासा' में विस्तार से बता चुके है । ऋग्वेद आदि सहिताओ के मन्त्र अत्यन्त गूढ अर्थ वाले हैं । उसको समझने का साधन इनके पास नही है, अतः वे कुछ सही रूप से समझ नही पाते । कही कही से उलटे- सीधे अर्थ को पकड कर बच्चो की तरह बिना प्रमाण के मनमाने असबद्ध अर्थों की कल्पना करने लगते है | मन्त्रो के व्यवस्थित पाठों को देखकर भी उनका महत्त्व घटाने के लिये अपनी कल्पना से उनको प्राचीन तथा नवीन बताते रहते हैं, किन्तु इसमें कुछ ठोस प्रमाण नही दे पाते । उनका यह सारा वाग्जाल विकासवाद के क्रम की दृष्टि से विछाया जाता है । इस विकासवाद का खण्डन हम अपनी पुस्तक 'मार्क्सवाद और रामराज्य' में कर चुके हैं । आज कल तो पाश्चात्य विद्वान् भी इस विकास-वाद को अस्वीकार करने लगे है । अचेतन प्रकृति अचेतन परमाणु और विद्युत्कण उन विलक्षण कार्यों को नही कर पाते, जिनको कि बुद्धि, इच्छा, प्रयत्न आदि गुणों वाला चेतन प्राणी ही कर सकता है । चेतन अचेतन की इस विलक्षणता के आधार पर सभी समझदार व्यक्ति यह मानते है कि सर्वज्ञ और सर्व शक्तिमान् ईश्वर ही इस जगत् की सृष्टि कर सकता है । इस बात को इसी ग्रन्थ मे अन्यत्र हम विस्तार से बता चुके है । इस पद्धति से ह्रासवाद ही सिद्ध होता है, विकासवाद नही । उत्पत्ति, स्थिति, बुद्धि, परिणाम, क्षय ११८ 1
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९३८ वार्थपारिजात। एव सिद्ध्यति, न विकासवादः । जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यतीति रीत्या तु ह्रास विकास+ -पारम्पर्यं सर्वत्रैव दृश्यते । तथात्वे परमेश्वरादुद्भूताना ब्रह्म प्रजापति महर्षीणा परमेश्वरापेक्षयाऽल्पज्ञानशक्तीना-माधुनिकजनापेक्षया चापरिमितज्ञानक्रियाशक्तीनां प्रभावातिशयः स्फुट एव । किमुत परमेश्वरादेव निःश्वासन्यायेन प्रवृत्तानां मन्त्रब्राह्मणात्मकानां वेदाना लोकोत्तरमाहात्म्यसम्बन्धे तेषां च सम्बन्धेऽर्वाचीनत्व बिकासं च पश्यतां पाश्चात्याना बुद्धिमान्द्यातिशय एव सिद्ध्यति । आध्यात्मिकतत्त्वान्वेषणसमाधानादिविषयेषु स्पर्धापूर्वक पुरुषाणां स्त्रीणां च सोत्साहप्रवृत्तिसम्बन्धिन्यः कथा बृहदारण्यकादिग्रन्थेभ्य एव कथञ्चिदाचिताः ॥ ताभ्योऽपि वेदाना कालावधारणमितिहासकल्पन च जले बालुका-भित्तिसमानमेव, आख्यायिकाना सुखावबोधार्थमुपकल्पितानामितिहासवर्णने सामर्थ्याभावस्यासकृदावेदितत्वात् । यदपि च 'केषाञ्चिदंशाना प्रक्षेपमन्तरा कथञ्चिदपि परिवर्तनमसम्भवमेव तदानीमासीत् । शब्दोच्चारणानां गानसम्बन्धिनियमानां च प्रातिशाख्यसूत्रेषूपलम्भात् । केनचिद्वेदेन सम्बद्धानि प्रातिशाख्यसूत्राणि स्वसम्बद्धाः सर्वाः शाखा विवेचयन्ति । ध्वनीनां सन्धिनियमानां स्वराणा परिवर्तनेषु ध्वनिसामञ्जस्याय प्रातिशाख्यानि नियमान् प्रस्तुवन्ति यत्र विशिष्टानि परिवर्तनानि भवन्ति तेषां विशेषतो निर्देशोऽत्रोपलभ्यते । एतैरेवविधान्यालोचनात्मकानि साधनान्युपलभ्यन्ते यैः प्रातिशाख्यरचनाकालिकान् संहितापाठान् उपगन्तुं प्रभवामः । यदि कासुचित्संहितासु कस्मिश्चिद् भागे ध्वनिविषयं वैलक्षण्यमुपलभामहे तवं विश्वासो भवति यत्स भागस्तदानीं संहितासु नासीदेव' इलि, एतदपि सर्वं कल्पनामात्रम्, पदक्रमादिभिर्वेदानभ्यस्यतां प्रक्षेपस्याभ्यासासम्भवात् । अतिप्राचीनकाले रामायणेऽप्येवं ज्ञायते- और विनाश निरुक्त मे प्रदर्शित इन छः प्रकार के प्रत्येक वस्तु के विकारो को देखकर यह ह्रास और विकास का क्रम निरन्तर चलता रहता है । इस तरह से परमेश्वर से आविर्भूत ब्रह्मा, प्रजापति और महर्षिगण यद्यपि परमेश्वर की अपेक्षा ज्ञान, शक्ति आदि गुणो मे कुछ कम है, किन्तु आजकल के मनुष्यो की अपेक्षा उनको ज्ञान-क्रिया शक्ति अपरिमित होने से उनका महत्त्व मानना ही पडेगा । इस तरह से परमेश्वर से श्वास-प्रश्वास की गति की भाँति स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों का लोकोत्तर महत्त्व क्या है? इसके संबन्ध में बिना कुछ विचार किये पाश्चात्य विद्वानो का उनमे अर्वाचीनता और विकासवाद की बात ढूढना, बुद्धि का पूरा अजीर्ण ही माना जायगा । आध्यात्मिक तत्त्वों के अन्वेषण और समाधान के लिये पुरुषों और स्त्रियों की स्पर्धा और उत्साह के साथ लगे रहने की बात बृहदारण्यक उपनिषद् प्रभृति ग्रन्थो से ही किसी तरह से निकाली गई है । इनसे भी वेदों का काल-निर्धारण करना अथवा उनमे इतिहास ढूंढ निकालने का काम जल में बालू की भीत खड़ी करने के समान है । यह बात हम अनेक बार बता चुके हैं कि वेदों मे आख्यायिकाएँ विषय को सरलता से समझाने के लिये कल्पित है, उनसे किसी तरह का सत्य इतिहास नही बनाया जा सकता । बेवर ने आगे कहा है-' यह प्रायः असंभव प्रतीत होता है कि उस समय से इन पाठो मे प्रक्षिप्त अंशो के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार का परिवर्तन कभी हुआ हो । ये निर्देश, शब्दो के उच्चारण और गान से संबद्ध नियम प्रातिशाख्य सूत्रों में दिये गये हैं । इस प्रकार का प्रातिशाख्य सूत्र किसी एक वेद की संहिता से संबद्ध तो होता ही है, अपनी सभी शाखाओ का विवेचन भी करता है । यह प्रयुक्त ध्वनियों के रूप, सन्धि के नियमों, स्वरो और उसके परिवर्तनों, ध्वनि का सामंजस्य आदि विषयों पर सामान्य नियम प्रस्तुत करता है । अपरंच, ऐसे सभी उदाहरण, जिनमें विशिष्ट ध्वनि संबन्धी या अन्य प्रकार के परिवर्तन देखे जाते हैं, विशेष रूप से निर्दिष्ट होते है । इस प्रकार हमें ऐसे उत्तम आलोचनात्मक साधन मिलते हैं, जिनके द्वारा हम प्रातिशाख्य की रचना के समय के प्रत्येक संहिता के पाठ तक पहुँच सकते है । यदि हम संहिता के किसी भाग में कोई ऐसी ध्वनि विषयक विलक्षणताएँ पाते हैं, जो उसके प्रातिशास्य में अप्राप्य है, तो हमें यह विश्वास कर लेना चाहिये कि उस प्रातिशाख्य के समय में वह भाग संहिता के अन्तर्गत नहीं था' ( पृ० १६-१७ ) | किन्तु यह सारा कथन कोरी कल्पना है, क्योंकि वेदों का अध्ययन पद, क्रम आदि को पद्धति से किया जाता है । उसमें एक भी नये पद के प्रक्षेप की कोई कल्पना कर हो कैसे सकता है? अतिप्राचीन काल की रचना रामायण में कहा गया
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वेदार्थपारिजातः ९ ३ ९ 'हृदयेष्ववतिष्ठन्ति बंदा ये नः पर धनम्' ( वा० रा० २ ) । अनया रीत्या प्राणादपि प्रियतमानां वेदानां रक्षणे तेषामव- धानवत्त्वात । अनध्यायादावध्ययनादिप्रमादादेव मर्त्यलोके तासा तासा शाखानां विलोपो जातः । विलुप्तानामपि - शाखामा सूर्यब्रह्मलोकादिषु विद्यमानत्वात् । व्याकरण- निघण्टु निरुक्त प्रातिशाख्यादिग्रन्थानां वेदेषूपलब्धस्वरूप- दर्शनायैयोपयोगः । व्याकरणादीनि वेदाननुसरन्ति नहि वेदकर्तृक व्याकरणादिशास्त्रानुसरणम् । १६ पृष्ठीयटिप्पण्या हाग महाशयविचारमनुरुध्य--'ये ब्राह्मणा बौद्धधर्ममङ्गीकृतवन्तस्तैः सर्वतः प्रथम विवादाय वेदा लेखबद्धाः कृताः । तेषामेवानुवरणमन्यैब्रह्मणैः कृतम् । गोल्डस्ट्य केर- बेटलिंक-हिटनी - रोथप्रभृतय एतन्मतविरोधिन । एतेषा सनानुसार प्रातिशाख्यरचयितृभि. प्रथमत एव वेदा लेखबद्धाः कृताः । वेनफीमहाशयस्यापि पूर्वमिदमेव मतमासीत्, किन्तु पश्चात्- 'वैदिकग्रम्या बहाः कालादनन्तर प्रक्षेपाणामनन्तरमेव लेखबद्धा जाताः ' ( आइन लाइटुग इन दो ग्रामाटिक डेर बेदस्प्राख, पृ० ३ ) | वस्तुतो भारतीयाना यन्त्रविद्याऽतीव प्राचीना । यत्र रेखाणामिवाक्षराणामपि सन्निवेश आसीत् । एवमेव छन्दसामपि सम्बन्धे पाश्चात्त्याना श्रमात्मका एव विनाराः । वेदज्ञास्तपोनिर्धूतकल्मषा ऋण्य ऋतम्भराभिः प्रज्ञाभिरधिगतयाथातथ्या ऋचां नाम्ना यजुषामथर्वाङ्गिरमां ब्राह्मणानां च छन्दांसि स्वरांश्च पारम्य- नुरोधेनैव निर्धारितवन्दः । यथा लतावक्रनापि स्वाभाविकत्वात् शोभावहा, तथैव वेदानां तद्भागविशेषाणा च प्रकृति- प्रत्यय- स्वर- च्छन्दोभेदेषु व्याकरणादिशास्त्र वैपरीत्येऽपि शोभा नापैति । अत एवाह पतञ्जलिः--'छन्दसि दृष्टानुविधि: ' इति । ब्राह्मणेषु स्वरवैचित्र्याभावो न ज्ञानाभावात्, किन्तु स्वाभाविकत्वादेव । नहि स्वभाव: पर्यनुयोज्यो भवति, ', 2 है— वेद हमारे सर्वोत्कृष्ट पन है इनको हम अपने हृदय सुरक्षित रखते इस तरह से अपने प्राणो से भी अधिक प्रिय वेदो की रक्षा मे ये वैदिक गण सदा सावधान रहे है । मनध्याय के दिनो मे पढना आदि दोषों के कारण ही उन उन शाखाओ का इस मृत्युलोक मे विलोप हो गया है । इन विलुप्त शाखाओं को भी स्थिति सूर्यलोक ब्रह्मलोक आदि में विद्यमान है ।| व्याकरण, निघण्टु निरुक्त, प्रातिशाख्य आदि ग्रन्थो का उपयोग यही है कि इनसे वेदो के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो सके । व्याकरण प्रभृति शास्त्र वेदो का ही अनुसरण करते है, बेद इनके अनुसार चलें, इसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती । बेबर ने अपनी एक टिप्पणी मे लिखा है- 'हॉग का विचार है कि जिन ब्राह्मणो ने बोद्ध धर्म को स्वीकार किया, उन्होंने हो सर्वप्रथम वेद को विवाद के लिये लेखबद्ध किया और उनका अनुसरण दूसरे ब्राह्मणो ने किया । इसके विपरीत गोल्डस्ट्यूकर, वेटलिंग, ह्विटनी और रोथ प्रभृति इस मत के विरोधी है । उनका विचार है कि प्रातिशाख्यो के रचयिताओ ने पहले हा ग्रन्थो को लेखबद्ध किया होगा । पहले बेनफी का भी यही मत था, किन्तु बाद में उनका यह मत बना कि वैदिक ग्रन्थो को बहुत बाद के समय में उनके प्रक्षेपों के बहुत बाद लिखा गया था' (पृ० १६ ) । वास्तव मे तो भारतीय यन्त्रविद्या अत्यन्त प्राचीन है । इन यन्त्रों मे रेखाओं के साथ अक्षरो का संयोजन रहता था । इसी तरह से छन्दो के संबन्ध मे भी पाश्चात्य विद्वानों के विचार बड़े भ्रमपूर्ण हैं । तपस्या करके अपने सारे दोषो को धो लेने वाले वेदज्ञ ऋषियों ने ऋतम्भरा प्रज्ञा ( यौगिक दृष्टि) से यथार्थ वस्तु स्थिति को जानकर ऋक्, साम, यजुः, अथर्व वेदो के और ब्राह्मणो के छन्दों और स्वरो को परम्परा के अनुसार ही निर्धारित किया है । जैसे लता का टेढामेढापन उसको स्वाभाविक शोभा को बढ़ाता है, उसी तरह से वेदों और उनके भाग ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रकृति, प्रत्यय, स्वर, छन्द आदि में व्याकरण, छन्द आदि शास्त्रों की दृष्टि से दिखाई पड़ने वाला विपर्यय ( उलटापन) उसकी शोभा ही है । इसी लिये पतंजलि ने माना है कि वेदो मे जो प्रयोग जैसा देखा जाता है, वही उसको विधि है, अर्थात् व्याकरण शास्त्र को तदनुसार ही उस प्रयोग को सही सिद्ध करना पड़ता है, सही माना जाता है । ब्राह्मणो में स्वरो की विभिन्नता स्वरों का ज्ञान न होने से नहीं है, किन्तु स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणो में अनेक स्वर नही रहते । स्वभाव को कोई क्या टोकेगा कि अग्नि गरम क्यों होती है? अर्थात् जैसे अग्नि की उष्णता के विषय मे कोई यह प्रश्न नहीं कर सकता कि यह गरम ही क्यों होती है, उसी तरह से इस विषय पर भी कोई प्रश्न नही किया जा सकता कि ब्राह्मणो से कुछ ही स्वर क्यो
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III वेदार्थपारिजातः अग्ने रौष्ण्यादिवत् । उपासनासु वैदिकानि सच्छन्दस्कानि पदान्यपि भवन्ति । कयाचिदपेक्षया सांसारिकैर्वस्तुभिस्तेषा - –'मैक्यानुसन्धानादिकं भवति । तदेतदज्ञात्वैव बेवरोऽन्यथा जल्पति ब्राह्मणेषु छन्दसामेषां नामभिः संसारस्य सामञ्जस्याय रहस्यमय्या रीत्या सम्बन्धः स्थापित.' इति । यदपि च भारतीयसाहित्यस्य ११ पृष्ठे उक्तम् -यद्यपि रीतयो नियमाश्च सर्वेषां सम्पत्तये भवन्ति, सर्वे-गंम्याश्च भवन्ति, तथापि तद्वैपरीत्येन यज्ञक्रियासमानप्रकारेण मूलतः सामान्यचेतनादुद्भूतास्तद्विस्तारविकासा विशिष्टव्यक्तोनां चिन्तनपरामर्शादिभिर्भवन्ति । तत एव यज्ञक्रियाः केषाञ्चिदल्पसंख्यजनानामधिकारविषयवस्तुभूता भवन्ति । ते च बाह्यपरिस्थित्यनुरोधेनानुकूल्यमवाप्येदं ज्ञातु यतमाना भवन्ति यत् कया रीत्याऽस्याः संस्थाया माहात्म्य पावित्र्यं यथोचितश्रद्धा तथातङ्कश्च समुत्पद्येत । बाह्यदेशादागताया आर्यजातेस्तैः पराभूतानामादिवासिनां पराभवा-नन्तरमपि बहवोऽनेके विषया आसन् येषु ते व्यासज्जमाना भवेयुः । प्रथमतः सम्पूर्णशक्तिभिः शत्रुभ्यः स्वात्मरक्षण-मावश्यकमासीत् । प्रतिरोधपूर्त्यनन्तरं सहसा प्रवोधातैरिद ज्ञातं यद्वय शक्तिशालिना शत्रूणामस्त्रैर्निगडिता असहायाः स्म: । अथवा निद्राभङ्ग एवादिवासिनां नासीदित्यपि वक्तु शक्यते । तेषा शारीर्यः शक्तयो बहोः कालात् समग्ररूपेण ( ) सक्रियत्वात् क्षीणा जाताः । बौद्धशक्तिरपि महती विनष्टिमुपगता कुण्ठिता । नवीनशत्रूणा आर्याणा मितिहास एवमासीत् । प्राचीनगीतानां ज्ञानान्यासन्नेषाम्, ये स्वप्राचीननिवासस्थलेषु प्रकृतिशक्तोः पूजयन्ति स्म । एभिर्गीतः सम्बद्धाना यज्ञानां च ज्ञानान्यासन्नेषाम् येषां पूर्वजैस्तानि गीतानि रचितानि तद्वशीयानां परम्परागतानि तानि तानि जातानि । एतेषामेव परिवारेषु ता अपि परम्परा आसन् यासां व्याख्या अपेक्षिता आसन् । एवं गीतानां रचयितॄणां परिवाराः संवृत्ताः । यथा यथा स्वप्राचीन निवासस्थानादेते दूरमुपगता बाह्यसङ्घर्षाणां प्रभावात् तेषां मस्तिष्केभ्यः होते है, क्योंकि यह तो उनका स्वभाव है । उपासना विधियो मे कभी कभी छन्दोबद्ध वैदिक पदो का भी उपयोग होता है और कभी कभी इनकी किसी दृष्टि से सासारिक वस्तुओ के साथ एकता भी स्थापित की जाती है । इस बात को बिना समझे ही बेवर कहते --हैं -' ब्राह्मणों में इन छन्दों के नामो के साथ अजीबोगरीब युक्तियाँ भिड़ाई गई है, तथा उनके सामंजस्य को रहस्यमय ढंग से संसार के सामंजस्य के साथ संबद्ध किया गया है और वस्तुतः उसे उसका कारण बताया गया है' ( पृ० १७ ) । इससे पहले बेवर ने अपनी दृष्टि से पौरोहित्य परम्परा के विषय में विस्तार से लिखा है -'रीति और नियम सबकी सम्पत्ति होते है और सभी द्वारा गम्य है, किन्तु इसके विपरीत यज्ञ क्रिया यद्यपि समान प्रकार से मूलतः सामान्य चेतना से उद्भूत होती है, तथापि उसके विस्तारों का विकास विशिष्ट व्यक्तियों के चिन्तन और परामर्शो द्वारा होता है और इस कारण यज्ञक्रिया कुछ ऐसे अल्पसंख्यक लोगो के अधिकार की वस्तु होती है, जो बाह्य परिस्थितियों की अनुकूलता प्राप्त कर यह बात जानते रहते है कि किस प्रकार जनता में अपनी संस्थाओं के माहात्म्य और पवित्रता के विषय में यथोचित श्रद्धा एवं आतंग उत्पन्न किया जाय । इससे यही समझ लेना चाहिये कि स्मृति रीति, नियम अथवा विधि में समय के साथ- साथ पर्याप्त परिवर्तन नहीं हुआ । बाहर से आने वाली जाति के हाथो में, आदिवासी जातियो को पराभूत करने के उपरान्त, इतने विषय विद्यमान थे कि ने दूसरे विषयों में उलझे रह सकते थे । पहले तो उन्हें अपनी समूची शक्ति लगाकर शत्रु से अपनी रक्षा करनी थी । जब यह कार्य पूरा हो गया और उनका प्रतिरोध पूर्ण हो गया तो सहसा जाग्रत् होने पर उन्होने अपने को दूसरे और अधिक शक्तिशाली शत्रु के हाथों में बद्ध और असहाय पाया । अथवा यों कहा जा सकता है कि उनकी निद्रा टूटी ही नही । उनकी शारीरिक शक्तियाँ इतने दीर्घकाल से एवं समग्र रूप से सक्रिय थी और खप रही थी कि उनकी बौद्धिक शक्तियों को भी महान् हानि पहुँची और वे शनैः -शनै पूर्ण तथा कुण्ठित हो गई । इन नये शत्रुओं का इतिहास इस प्रकार था-प्राचीन गीतों का ज्ञान, जिनके द्वारा भारतीय अपने प्राचीन निवास स्थानों पर प्रकृति की शक्तियों की पूजा किया करते थे, और उन गीतों से सम्बद्ध यज्ञों का ज्ञान, दोनों ही उत्तरोत्तर उन लोगों के अधिकार में आते गये, जिनके पूर्वजों ने संभवतः उनकी रचना की थी और जिनके वंश में यह ज्ञान परम्परागत होता था । इन्ही परिवारों के अधिकार में वे परम्पराएं भी थी, जो उनकी व्याख्या के लिये आवश्यक थी । विदेश में बाहर से आये हुए व्यक्तियों के लिये अपनी मातृभूमि से लाई