वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 221–230
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 221–230
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वदार्थपारिजातः ११२१ ' आपो ह यद् बृहतीविश्वमायत् गर्भ दधाना जनयन्तीरग्निम् | ततो देवाना समवर्तता सुरेकः कस्मै ० ॥ ' न बृहतीः बृहत्यो महत्यो अग्निम् अग्न्युपलक्षित सर्व वियदादिक जनयन्त्य तदर्थं गर्भ हिरण्यमयाण्डस्य गर्भभूत प्रजापति दधाना आप एव विश्वमायन् सर्व जगद् व्याप्नुवन् । तनो गर्भभूतात् प्रजापतेर्देवादीना प्राणात्मको वायुरजायत । अथवा यदित्यत्र लिङ्गवचनयोर्व्यत्यय । या उक्तलक्षणा आपो विश्वमादृत्य स्थितास्ततस्ताभ्योऽद्द्भ्य सकाशादेकोऽद्वितीयोऽसुः प्राणात्मकः प्रजापति. समवर्तत निश्चक्राम । कस्मै देवाय हविषा विधेम । ( १० | १२१ | ७) 'यचिदापो महिना पर्यपश्यद्दक्ष दधाना जनयन्तीयज्ञम् । यो देवेष्वधि देव एक आसीत् कस्मै ० ॥ ' यज्ञं यज्ञोपलक्षित जनयन्तो. तदर्थ दक्ष प्रपञ्चात्मना वर्धिष्णु प्रजापतिमात्मनि दधाना ईदृशी • आप:, व्यत्ययेन प्रथमा, अप. प्रलयकालीना. महिना महिम्ना यश्च प्रजापति पर्यपश्यत् परिदृष्टवान् यश्च देवेष्वधि मध्ये देवस्तेषामीश्वर. सन् एकोऽद्वितीय आसीद् भवति । अस्तेश्छान्दसो लङ् । तस्मै कस्मै हविषा विधेम । अत्र मन्त्रेषु समष्टिसूक्ष्मप्रपञ्चावच्छिन्नः परमेश्वरो हिरण्यगर्भपदेनोच्यते । विराट् हिरण्यगर्भः अन्या- कृतः, तुरोय इति भेदेन परमेश्वरस्य चातुविध्योक्तेः । तस्मान्नषा मन्त्राणा पुरुषसूक्तवैरूप्यमिति वृथैव मेकडानलस्य तत्रार्वाचीनत्वकल्पनोद्भावनम् । -- — '. यदप्युक्तम् जगत्सृष्टिसम्बद्धयोरन्यसूक्तयोरसन सद्विकाश उक्तः । १०।७२ सूक्ते सृष्टेरवस्थात्रयं प्रतीयते - प्रथम जगद्रचना, पश्चाद्देवानामन्ते सूर्यरचना 1 तत्रापि सृष्टिवादेन सार्धं विकासवाद ओतश्च प्रोतश्चेति' (पृ ० १३१ ) तदपि न सगतम्, भावार्थानवबोघात् । तथाहि- नदुदाहरणरूपेण 'ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मार इवाधमत् ॥ देवाना पूर्व्ये युगे असत सदजायत ||' (ऋ ० स० १०।७२ / २) इति मन्त्र उद्धृतः । मैकडानलेन प्रायेण मन्त्राः क्वापि यथावन्न व्याख्यायन्ते, कथञ्चिदुत्तानार्थं लिखित्वा तद्बलेनैव सायणाचार्यादिप्रोक्तान् अखण्डसिद्धान्तान् खण्डयितु- 'आपो ह०' । यह महान् मलिल न केवल अग्नि, किन्तु आकाश प्रभृति जगत् के सभी पदार्थों को उत्पन्न करता है । इसके लिये हिरण्मय अण्ड के गर्भभूत प्रजापति को धारण करते हुए यह सलिल ही सारे जगत् में व्याप्त हो जाता है । तब उस गर्भभूत प्रजापति से देवादि का प्राणभूत वायु उत्पन्न हुआ । अथवा ' यत्' पद में लिंग और वचन का व्यत्यय हो जाता है । ऊपर बताये लक्षण वाला सलिल सारे विश्व को आवृत करके विद्यमान रहता है । इसी सलिल से एक एवं अद्वितीय प्राणात्मक प्रजापति उद्भूत होता है । उसी प्रजापति की हम हवि · प्रदान द्वारा उपासना करते है । 'यचिदापो ० ' । यज्ञ अर्थात् यज्ञोपलक्षित यावत् पदार्थों को उत्पन्न करने वाला और यज्ञ की निष्पत्ति के लिये दक्ष प्रभूति प्रपंच की वृद्धि करने वाला, प्रजापति को अपने में धारण किये हुए सलिल, यहाँ पर व्यत्यय के द्वारा 'आप' पद को प्रथमान्त मान लिया जाता है, यह प्रलयकालीन सलिल अपने माहात्म्य से प्रजापति को देखता है, जो कि देवताओ का भी अधिपति है और जो एक एवं अद्वितीय है | यहा पर अस्ति धातु से छान्दस लड् होता है । उसी प्रजापति की हम हविःप्रदान द्वारा उपासना करते है । इस मन्त्रो मे सूक्ष्म प्रपंच को समष्टि से अवच्छिन्न परमेश्वर 'हिरण्यगर्भ' पद से अभिहित होता है । विराट् हिरण्यगर्भ, अव्याकृत और तुरीय के भेद से परमेश्वर के चार प्रकार है । इस तरह से इन मन्त्रो को भी पुरुषसूक्त के मन्त्रो के साथ कोई भिन्नता देखने को नही मिलती । इस तरह से मैकडानल का यह कथन सर्वथा गलत है कि वे सूक्त नवीन हैं । 'जगत् की सृष्टि से संबन्ध रखने वाले दो सूक्त है, जो दार्शनिक दृष्टि से जगत् को असत् से सद्रूप में विकसित बताते है । कुछ अस्पष्ट रूप में दिये गये वर्णनो से ( १०।७२ ) सृष्टि की तीन अवस्थाएं पृथक् - पृथक् प्रतीत होती है—पहले जगत् की रचना, बाद में देवताओ की ओर अन्त में सूर्य की । यहाँ पर भी सृष्टिवाद के साथ विकासवाद ओतप्रोत है' ( पृ ० १३१ ) । यह कथन भी भावानवबोध प्रयुक्त एवं असंगत है । जैसे कि यहाँ पर उदाहरण के रूप में ' ब्रह्मणस्पति० ' इस मन्त्र को उद्धृत किया है । मैकडानल प्राय: कहीं भी मन्त्रो का सही अर्थ नही करते । उलटा-सीधा अर्थ लिखकर उसी के आधार पर सायण प्रभृति प्राचीन आचार्यों के द्वारा १४१
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११२२ वेदार्थपारिजातः मव्यापारेषु व्यापारमिव क्रियते । अस्य मन्त्रस्याभिप्रायस्तु पूर्वमेवोक्तः, तथापि मन्त्रोऽत्र व्याख्यायते सायणरीत्या | देवानामिति नवर्चमानुष्टुभ देवदेवत्यम् । लोकनाम्नः पुत्रो बृहस्पतिराङ्गिरस एव वा बृहस्पतिर्ऋषिः, अथवा दक्षस्य दुहिता अदितिऋषिः ॥ तथैवानुक्रान्तम्- 'देवाना नवलोक्यो वा बृहस्पतिर्दाक्षायण्यदितिर्वा दैवमानुष्टुभम्' इति ॥ तत्र- 'देवाना नु वय जानाप्रवोचाम विपन्यया । उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्यादुत्तरे युगे ॥' इति प्रथमो मन्त्रः । अदितिर्दाक्षायण्यनेन सूक्तेन स्वय यथादित्यानजनयत् तद् ब्रवीति । बृहस्पत्यृषिपक्षे स ऋषिरदितेः सकाशादादित्यो + त्पत्तिप्रकारमाह- वयदेवानामादित्याना जाना जन्मानि । प्रवोचाम विपन्यया विस्पष्टया वाचा । पूजार्थं बहुवचनम् । यो देवाना गणः पूर्वे युग उत्पन्नोऽप्युक्थेषु शस्यमानेषु यागे शस्त्रेषु पठ्यमानेषूत्तरे युगे वर्तमानं स्तुवन्तं स्तोतार पश्यात् पश्यति । अनेकेष्वपि युगेषु गतेषु कर्मसु स्तूयमानो वर्तत इत्यर्थ: । ब्रह्मणोऽन्नस्य पतिरदितिर्ब्रह्मणस्पतिः । एता एतानि देवाना जन्मानि कर्मार इवाघमत् । यथा कर्मारो लौहकार. भस्त्रयाग्नि प्रज्वलनार्थ धमति तथा अधमत् उदपादयत् । एतानि देवजन्मानि उदपादयदित्यर्थः । देवाना पूर्व्ये युगे आदिसृष्टी तेषामुपादानकारणाद् असतो नामरूप- रहितत्वेनासत्तुल्याद् ब्रह्मण. सकाशात् सद् नामरूपविशिष्टं देवादिकमजायत । अत्रासदिति पदेन न शून्यं न वा अभाव- मात्र विवक्षितम्, किन्तु नामरुपातीतं ब्रह्मैवाव्यवहार्यत्वेनास तुल्यत्वाद् गोण्या वृत्त्याऽभिधीयते । तदेवोपनिषत्सूक्तम्- 'असद्वा इदमग्र आसोत्ततो वे सदजायत' ( तं ० उ० २| ७ ) | न सदात्मकस्य प्रपञ्चस्यासत्कारणकत्व सम्भवति, तथात्वे मृद्घट. सुवर्ण कुण्ड लमित्यादिवदसदुपादानकत्वेनासन् प्रपञ्च इति प्रतीत्यापातात् कथमसतः सज्जायेतेत्यसत्कारण- त्वाक्षेपश्रुतेः । तस्मादव्याकृतत्वाभिप्रायेणैवासत्कारवादो मन्तव्यः । 'तद्धदं तर्ह्यव्याकृतमासीत' ( श० १४।५।२।१५ ) , इति श्रुते । ननु तर्हि कथमदितेः सकाशाद्देवाद्युत्पत्तिरिति चेन्न वायोरित्यादिवददिते रवान्तरकारणत्वापपत्तः । अत्र मन्त्रे प्रथम जगदुत्पत्तिः पश्चाद्देवाना ततः सूर्यस्योत्पत्तिरुक्ता । प्रतिपादित अखण्डनीय सिद्धान्तो का खण्डन करने में व्यर्थ का परिश्रम करने लगते है । इस मन्त्र का अभिप्राय तो पहले ही बताया जा चुका है । यहाँ पर सायण की पद्धति से इस मन्त्र का अर्थ किया जाता है । ' देवानाम्' इत्यादि नौ ऋचाओ वाला यह सूक्त अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है और देवगण इसके देवता है । लोक नाम का पुत्र बृहस्पति अथवा आगिरस बृहस्पति इसके द्रष्टा ऋषि है । अथवा दक्ष की दुहिता अदिति इसकी ऋषि है । सर्वानुक्रमणी मे इसी तरह से इसका विनियोग प्रदर्शित है । इसका पहला मन्त्र है- देवाना तु० । दाक्षायणी अदिति इस सूक्त से स्वय जैसे आदित्यो को उत्पन्न करती है, उसका वर्णन है । बृहस्पति ऋषि के पक्ष मे अर्थ करने पर वह ऋषि अदिति से आदित्य की उत्पत्ति का प्रकार बताते है कि हम आदित्य प्रभृति देवताओ के जन्म की बात स्पष्ट रूप से बताते हैं । यहाँ पर बहुवचन पूजा के लिये है । जो देवताओ का गण पूर्वयुग मे उत्पन्न हुआ है और जा बाद मे उक्य याग में स्तुत होने पर, शस्त्र प्रभुति सामगान में पाठ किये जाने पर स्तोता को देखते हैं, अर्थात् अनेक युगो के बीत जाने पर भी जिनकी यागादि कर्मों में निरन्तर स्तुति होती रहती है । ब्रह्म अर्थात् अन्न की स्वामिनी अदिति जब ब्रह्मणस्पति कहलाती है, तब वह इन देवताओं की उत्पत्ति के लिये लोहकार जैसे अग्नि को प्रज्वलित करने के लिये धौंकनी चलाता है, उसी तरह से यह अदिति भी देवताओ को उत्पन्न करती हैं । देवताओ के उस पूर्व युग में सृष्टि की आदि बेला मे उन देवताओं के उपादानकारणभूत असत् से, अर्थात् नाम और रूप से रहित होने से असत् के समान विद्यमान ब्रह्म से नाम और रूप से विशिष्ट देवादि की सृष्टि होती है । यहाँ पर 'असत्' पद से न तो शून्य विवक्षित है और न अभावमात्र हो, किन्तु नाम और रूप से अतीत होने से अव्यवहार्य होने के कारण असत् के तुल्य ब्रह्म ही गौणी वृत्ति से अभिहित होता है । इसी को उपनिषद् में इस तरह से कहा गया है- 'आगे यह सब कुछ असत् था, उसी से सत् की उत्पत्ति हुई । सदात्मक प्रपंच असदात्मक कारण से उत्पन्न नही हो सकता, क्योकि यदि ऐसा माना जाय तो घड़ा जैसे मिट्टी है, कुण्डल जैसे सुवर्ण है, उसी तरह से यह प्रपंच असत् हैं, ऐसी प्रतीति माननी पड़ जायगी । इसीलिये असत् से सत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? यह आक्षेपात्मक श्रुति गतार्थ मानी जाती है । इसलिये अव्याकृत अर्थात् नाम और रूप से विभक्त न होने के कारण ही प्रारंभ में असत्कारणवाद की संगति माननी चाहिये, 'यह उस समय अव्याकृत था' ऐसी शतपथ श्रुति मिलती भी है । प्रश्न है कि तब अदिति से
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वेदार्थ पारिजातः ११२३ यदपि 'नासदासीनो सदासीत्' इति नासदीयसूक्तसम्बन्धे उक्तम्- 'साहित्यिकैर्गुणै महत्त्वपूर्णमिदं सूक्तम्, प्रौढविचारैरप्यस्य माहात्म्यातिशयः । तत्रापि भारतीयदर्शनस्य कतिपये दोषा दृश्यन्ते यथा - अस्पष्टता, एकवाक्यताया अभाव, विचारेषु तर्काः शब्दमात्रावलम्बना: । इदमेव तथाविध सूक्तमृग्वेदे यत्राद्योपान्त सुसम्बद्धा विचारा दृश्यन्ते । इदं प्राकृतिकदर्शनानां प्रारम्भबिन्दुः । विकासवादिमाख्यदर्शन तदङ्कुरपल्लवादिरूपम् । आर्यदर्शनविचारधारायाः प्रतीकरूपमिदम् । अत्र सृष्टिगीतप्रतिपादितसत्कार्यवादानुसारेण सर्वप्रथम जलसृष्टिरुक्ता । पश्चात्तैजसतस्वबलाद् महत्तत्त्वस्य विकासो जात । परवतिब्राह्मणग्रन्थेषुपलभ्यमाना सृष्टिसिद्धान्ता उक्तविचारधारयाऽनुगुणा एव ॥ अत्राप्यसदेव सद्रूपतामुपगतम् । प्रथम च जलसत्ता तदुपरि हिरण्यगर्भ समवर्तत । स च विश्वरूपसुवर्णाणुरूपमेव । तत्र मा शक्तिरुत्पन्ना यया प्रजापतिर्जगन्निर्माणसमर्थः सञ्जात' । एतावान् भेदोऽत्र प्रजापति पूर्वतनः पश्चाच्छक्तिः । अय मौलिको विसवादो विकासवादसृष्टिवादयोमिश्रणाज्जात • । माख्यबादे पुरुषस्य कूटस्थद्रष्टृत्वाभ्युपगमेन प्रकृतेर्महदा- द्यवस्थया परिणामाभ्युपगमेन च तद्विसंवादनिराकरणम् । तेन नासदीयसुक्त न केवल भारतीयदर्शनानामग्रदूतरूपमपि तु पुराणानामपि, येषां लक्षणेषु सर्गे मुख्यमेक लक्षण वर्णितम्' ( पृ ० १३३ ) इति । तदपि न सङ्गतम्, भारतीयदर्शनेषु नासदीय सूक्ते च तात्पर्यानवगमेनैव अस्पष्टताया एकवाक्यताभावस्य च प्रतीतेः । उत्तरमीमांसाया बादरायणसूत्रेषु तादृग्विरोधाभासस्य निराकरणात् । उपनिषत्सु क्वचिद्वियदादिक्रमेण सृष्टिरुक्ताः2 क्वचिच्च तेजोऽबन्नपूर्विका सृष्टिः क्वचिच्चाक्रमेणैव सृष्टिरुक्ता । यथा - 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूत अकाशाद्वायुः, वायोरग्नि ' ( तै ० उ ० २ १ १ ), यथा वा -'तत्तेजोऽसृजत' ( छा ० उ ० ६| २ | ३ ), यथा वा - ' स देवताओ की उत्पत्ति की संगति कैसे बैठेगी? उत्तर है कि वायु प्रभृति की तरह अदिति की भी अवान्तरकारणता मानने मे कोई आपत्ति नही हो सकती । इस मन्त्र मे प्रथम जगत् की उत्पत्ति, बाद में देवताओं की और अन्ततः सूर्य की उत्पत्ति का वर्णन है । मैकडानल ने ' नासदासीन्नो' इत्यादि नासदीय सूक्त के संबन्ध में कहा है-' न केवल साहित्यिक गुणो की दृष्टि से ही यह सूक्त महत्त्व का है, वरन् इससे भी अधिक इसकी महत्ता उन प्रौढ़ विचारों के कारण है, जिनका प्रतिपादन आज से इतने प्राचीन युग मे पाया जाता है । परन्तु वहाँ पर भी भारतीय दर्शन के कतिपय प्रमुख दोष दृष्टिगोचर होते हैं । इसमे स्पष्टता तथा एकवाक्यता का अभाव है और विचारो में तर्क प्रायः शब्दमात्र पर अवलम्बित है । परन्तु ऋग्वेद में यही एक अश ऐसा है, जिसमे सुसंबद्ध दार्शनिक विचार आद्योपान्त मिलते हो । यों कहना चाहिये कि प्राकृतिक दर्शन का यह प्रारम्भ बिन्दु है, जिसका अंकुर आगे चलकर विकासवादी साख्यदर्शन मे पल्लवित हुआ । यह सूक्त आर्यों के दार्शनिक विचारो का एक नमूना है और इसी कारण यह सदा अपने महत्त्व को बनाये रखेगा । सृष्टिगीत में प्रतिपादित इस सत्कार्यवाद के अनुसार जल की सृष्टि सबसे पहले हुई और उसके पश्चात् तैजस तत्त्व के बाद महत्तत्त्व का विकास हुआ |। परवर्ती ब्राह्मण ग्रन्थो में दिये गये सृष्टि संबन्धी सिद्धान्त उक्त विचारधारा से सहमत है । इनमें भी असत् ही सद्रूप हुआ और प्रथम सत्ता जल की ही थी । इस जल पर हिरण्यगर्भ तैरता रहा । हिरण्यगर्भ विश्वरूप सुवर्णाण्ड है और उससे वह शक्ति उत्पन्न हुई जिसके द्वारा प्रजापति जगत् का निर्माण कर सके । इतना अवश्य अन्तर है कि प्रजापति पहले, फिर वह शक्ति । यह मौलिक विसंवाद सृष्टिवाद का विकासवाद के साथ समिश्रण करने से हुआ है और उसका निराकरण साख्यदर्शन में पुरुष को एक कूटस्थ द्रष्टा के रूप में मानते हुए केवल प्रकृति को ही विकास की विभिन्न दशाओ में परिणत होते बतला कर किया है । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि ऋग्वेद का नासदीय सूक्त न केवल भारतीय दर्शन का ही अग्रदूत है, वरन् पुराणो का भी, जिनके कि मुख्य लक्षणो में एक लक्षण सर्गवर्णन भी है ' ( पृ ० १३३ ) । यह कथन भी ठीक नही है, क्योंकि भारतीय दर्शनों और नासदीय सूक्त का तात्पर्य ठीक से न समझ पाने के कारण ही इनमें अस्पष्टता और एकवाक्यता के अभाव की प्रतीति पाश्चात्य विद्वानो को होती है । उत्तरमीमासा अर्थात् बादरायणकृत ब्रह्मसूत्रों में इस तरह के विरोध का परिहार किया गया है । उपनिषदों में कही पर माकाशादि के क्रम से सृष्टि वर्णित है, कही पर तेज, जल अथवा अन्न के क्रम से तो कही पर बिना क्रम के हो सृष्टि प्रतिपादित है । जैसे कि - ' इस लिये उस आत्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई,
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११२४ वेदार्थपारिजात इमाल्लोकानसृजत' ( ऐ ० उ०१।२ ), तथापि तैत्तिरीयानुसारेण समन्वय उक्त । तद्रोत्या छान्दोग्यश्रुतेरप्याकाशवायु- सृष्टिपूर्वक तेजोऽसजदित्यर्थः क्रियते । तथैवाकाशादिभूतसृष्ट्यनन्तरं स इर्माल्लोकानसृजदिति समम्बीयते । तथैव सूक्तोक्तीनामपि समन्वय एव योग्य: । अत एव धर्मब्रह्मप्रमयोर्वेदवेदान्ताना करणत्व पूर्वोत्तरमीमासयोश्चेतिकर्तव्यता- -' ' ' ' रूपत्वमुक्तम् धर्मे प्रमीयमाणे हि वेदेन करणात्मना । इतिकर्तव्यताभाग मीमांसा पूरयिष्यति ॥ तदुक्तं न वियदश्रुतेः' ( ब्र० सू० २।३।१ ) इत्यत्र भगवत्पादे शङ्कराचार्ये – वेदान्तेषु भिन्नप्रस्थाना उत्पत्तिश्रुतय उपलभ्यन्ते, केचिद्वायोरुत्पत्तिमामनन्ति केचिन्न । एव जीवस्य प्राणाना च । एवमेव क्रमादिद्वारकोऽपि विप्रतिषेध इत्यभिहितम | सांख्यदर्शनं तूत्तरमीमांसाया वादरायणेन खण्डितमेव, तत्र प्रकृते स्वातन्त्र्येण कारणत्वप्रतिपादनात् सृष्टेस्त्वीक्षणपूर्वकत्वश्रवणाच्च । स्थूलकार्योत्पत्तावेव च जलस्य पूर्वभावित्वम्, मूलसृष्टी जलात्पूर्वमाकाशवायुतेजसा- मुत्पत्तिश्रवणात् । सांख्यीयं महत्तत्त्व तु प्रकृत्यनन्तरभावि, न तैजसतत्त्वात्तद्विकासः । तैजसतत्त्वमपि न जलानन्तरभावि, तस्य जलकारणत्वात् । ' अग्नेराप:' इति श्रुतेश्च । हिरण्यगर्भरूप महत्तत्त्वमपि समष्टिसूक्ष्मशरीरमय वेदान्तसम्मतमपि जलोत्पत्तेः पूर्वाभावि, अपा तदीयतपः श्रमरूपत्वात् । 'नैतत्किञ्चन अग्र आसीत्', ' मृत्युनै वेदमावृतमासीत्' इत्यादि- श्रुतेः । ब्राह्मणग्रन्थानां परवर्तित्वमप्यसिद्धम्, तेषामप्यनादित्वप्रतिपादनात् । वैदिकरीत्या ब्रह्मण एव पुरुषत्व कूटस्थत्व निर्विकारत्व च । तदीययाऽनिर्वचनीयया मायाशक्त्यैव कल्पित तस्य कारणत्वमप्यनिर्वचनीयमेव । नासदीयानि सूक्तानि दर्शनानां पुराणानां च मूलमिति तु युक्तमेव । नासदीय सूक्तमन्त्राणा व्याख्यानं त्विहैवान्यत्र द्रष्टव्यम् । , ", ' ' ', आकाश से वायु वायु से अग्नि अथवा उसने तेज की सृष्टि की या उसने यह मारा विश्व बनाया तथापि तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार इनमें परस्पर समन्वय भी बताया गया है । उसके अनुसार छान्दोग्य श्रुति का भी यह अर्थ किया जाता है कि आकाश और वायु की सृष्टि करके ही उसने तेज की सृष्टि की । इसी तरह से आकाशादि भूतो की सृष्टि के बाद उसने इन सारे भुवनो की सृष्टि की, यह वाक्य भी समन्वित हो जाता है । इसी तरह उक्त नासदीय सूक्त मे कही गई बातो का भी इसी तरह से समन्वय करना ही उचित मार्ग है । इसी लिये धर्म और ब्रह्म का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का साधन वेद और वेदान्त ही हैं । पूर्व और उत्तर मीमासा, जैमिनि और बादरायण के सूत्र यह समझाते हैं कि वेद और वेदान्त से धर्म और ब्रह्म का यथार्थ ज्ञान किस प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है । भट्ट कुमारिल ने कहा है-' वेद रूपी साधन की सहायता से धर्म की यथार्थ प्रतीति हो जाने पर इस धर्म की इतिकर्तव्यता को, अर्थात् किस तरह से किन साधन सामग्रियो की सहायता से किसका आचरण किया जाय कि जिससे धर्म की उत्पत्ति हो, इस बातको मीमासा बताती है' । 'न वियदधुते ' इत्यादि सूत्रो मे बादरायण के मत को स्पष्ट करते हुए भगवत्पाद शंकराचार्य कहते है कि वेदान्तों में इस सृष्टि की उत्पत्ति के संबन्ध में विभिन्न प्रस्थान ( दृष्टिया ) देखने को मिलते है । कुछ में वायु की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है, कुछ में नही । इसी तरह से जीव और प्राण के संम्बन्ध में भी विभिन्न मत मिलते है । कहीं पर क्रमपूर्वक सृष्टि का भी वर्णन मिलता है । साख्यदर्शन का तो उत्तरमीमासा में बादरायण ने खण्डन ही किया है । सांख्यदर्शन में प्रकृति की जगत् के प्रति स्वतन्त्र रूप से कारणता प्रतिपादित है, किन्तु उपनिषदों में ब्रह्म के ईक्षण के अनन्तर ही सृष्टि की उत्पत्ति मानी गई है । स्थूल कार्य की उत्पत्ति की अपेक्षा से ही जल की पूर्ववतता मानी जा सकती है, क्योकि मूल सृष्टि में जल से पहले आकाश, वायु और तेज की उत्पत्ति हुई रहती है । साख्य का महत्तत्त्व प्रकृति के अनन्तर उत्पन्न होता है, उसका विकास तेजस तत्त्व से नहीं होता । तेजस तत्त्व भी जल के अनन्तर नही होता, क्योकि वह तो स्वयं जल का कारण है । श्रुति में यह स्पष्ट कहा गया है कि 'अग्नि से जल की सृष्टि होती है' । हिरण्यगर्भ के नाम से प्रसिद्ध महत्तत्त्व भी, जो कि सूक्ष्म शरीरों का समष्टि स्वरूप है, वेदान्त में यद्यपि स्वीकृत है, किन्तु वह भी जल की सृष्टि से पहले ही विद्यमान रहता है, क्योकि श्रुति में जल को हिरण्यगर्भ के तप के श्रम से उत्पन्न माना गया है । 'पहले यहां पर कुछ भी नही था', 'मृत्यु से ही यह सब कुछ आवृत था' इत्यादि श्रुतिया इसमें प्रमाण है । ब्राह्मण ग्रन्थों की परवर्तिता को नहीं सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि हमने उनकी भी अनादिता का प्रतिपादन किया है । वैदिक मत के अनुसार ब्रह्म ही पुरुष है, कूटस्थ है और निर्विकार है । उसकी अनिर्वचनीय माया शक्ति से हो सब कुछ कल्पित होता है । उसकी कारणता को भी अनिर्वचनीय ही माना जाता है । नासदीय सूक्त दर्शनों के और पुराणो के मूल हैं, यह कथन तो उचित ही है । हमने इसी ग्रन्थ में अन्यत्र नासदीय सूक्त के मन्त्रो की व्याख्या की है ।
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वेदार्थपारिजातः ११२१ वेदान्तिना ब्रह्मणि साख्याना प्रकृतौ चानन्तानन्तप्रपञ्चबीजानि भवन्ति । कारणावस्थाया वर्तमानाः कार्य- शक्तय: सहकारिसव्यपेक्षा यथाकाल विकासमुपयन्तीत्यय विकासस्तु शास्त्रीय एव । डार्विन- स्पेन्सर- हैकल प्रभृतीनां | विकासवादस्त्वसङ्गत एव अध्यात्मवादिना कर्मवैचित्र्यं सम्भवति । कर्मसिद्धान्तमन्तग जगद्वैचित्र्य तु कथमपि नोपपद्यते 1। कार्यकारणाना प्रकृतिभावोऽपि नियत एव । आकाशाद्वायु.. वायोरग्निः, अग्नेराप:, अद्द्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधय सम्भवन्ति । परन्तु निम्बाम्रपनसाना कार्यकारणभावस्त्वसिद्ध एव । वृक्षसरीसृपखगदंशमत्स्या- नामपि परस्पर प्रकृतिविकृतिभावोऽसिद्ध एव । तत एव अमीवाहाइड्रासरीसृप मत्स्य कूर्मपक्षिवानरादिक्रमेण मनुष्यो- त्पत्तिरप्यसिद्धा । देशकालजलवायुवेशेष्येण गुणाकृत्यादिषु किञ्चिद्ध्रासविकाससम्भवेऽपि न नि. सीमपरिवर्तन सभवति । यथाकथञ्चित् साधर्म्यवैधर्म्य सारूप्य वैरूप्यादिक तु सर्वत्रैव सुलभम् । यदि बीजादङ्कुरविकासनियमोऽस्ति पुष्पात्फल- विकासः । नहि पुष्पात् पुष्पविकासो भवति । नहि मत्स्याद्विहङ्गमादयो विकाससुपयन्ति । नहि मत्स्यान्मत्स्यविकासः क्वचिद् दृश्यते । यदि प्राचीनकाले यथा वानराद्वानरा एव जायन्ते बीजादङ्कुरा एव जायन्ते तथैवाद्यापि भवन्ति । यदि पूर्व वानरेभ्यो मनुष्या उत्पन्नास्तर्ह्य द्यापि कथ न वानरेभ्यो मनुष्या उत्पद्यमाना दृश्यन्ते? दृश्यन्ते तु वानराद्वानरा मत्स्याच्च मत्स्या उत्पद्यमानाः । डार्विनरीत्या तु प्रतिद्वन्द्विता सङ्घर्षश्च शाश्वतिक. सार्वत्रिकश्च । दृश्यते तु तद्विपरीतम् । क्वचिन्मनुष्या बर्बरा. संहारका भवन्ति क्वचिच्च वानरा अपि स्वाम्यर्थे प्राणानपि परित्यजन्ति । डार्विनरीत्या यदि कश्चित्परमकारुणिक सर्वज्ञो जगन्निर्माता शासकः स्यात्तदा दुःखरहितमेव जगत् स्यान्न दुःखबहुलम् । अध्यात्मवाद- वेदान्ती द्वारा स्वीकृत ब्रह्म मे और साख्यदर्शन की प्रकृति मे असख्य प्रपंच सृष्टि के बीज विद्यमान है । कारण अवस्था में विद्यमान कार्य की शक्तियाँ अपने- अपने सहकारी द्रव्यो की सहायता से समयानुसार विकसित होती है, यह बात शास्त्र- संमत है । डार्विन, स्पेन्सर, हैकल प्रभृति पाश्चात्य दार्शनिको का विकासवाद तो असंगत है । अध्यात्मवादी दार्शनिको के मत से कर्म की विचित्रता के आधार पर सृष्टि की विचित्रता हो सकती है । इस कर्मसिद्धान्त को बिना माने इस जगत् की विचित्रता कैसे बन सकती है? कार्य और कारण का प्रकृतिभाव भी निश्चित है । आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी और पृथिवी से ओषधियो की उत्पत्ति इसी कार्यकारण की प्रक्रिया से होती है । परन्तु निम्ब ( नीम ) आम और पनस ( कटहल ) का परस्पर कार्यकारणभाव नही सिद्ध किया जा सकता । इसी तरह से वृक्ष, सरीसृप ( सर्प आदि), पक्षी, मच्छर, मछली आदि का भी परस्पर प्रकृति-विकृतिभाव नही सिद्ध किया जा सकता । इसीलिये अभीवा, हाइड्रा, सरीसृप, मत्स्य, कूर्म, पक्षी, वानर के रूप में क्रम से विकसित होते हुए प्राणी अन्त में मनुष्य बना, यह मत भी नही सिद्ध हो सकता । देश, काल और जल, वायु की विशेषता के कारण किसी प्राणी की गुण, आकृति आदि में कुछ हास या विकास देखा जा सकता है, किन्तु इनमें भारी परिवर्तन कभी संभव नही है । जिस किसी तरह खीचातानी करके एक दूसरे मे समानता और असमानता बता देना कोई भारी बात नही है । यदि यह नियम देखा जाता है कि बीज से अंकुर का विकास होता है और पुष्प से फल का, तो यह कभी नही हो सकता कि पुष्प से ही पुष्प का विकास होने लगे । यदि मत्स्य से पक्षी आदि का विकास होने लगे तो फिर मत्स्य से मत्स्य का विकास होना बन्द हो जायगा । जैसे प्राचीन काल में यदि वानरो से वानर ही पैदा होते थे और बीज से अंकुर पैदा होते थे, तो वैसा ही आज भी देखा जाता है । यदि पहले के वानरो से मनुष्यों की उत्पत्ति होती थी तो आज भी वानरों से मनुष्यो की उत्पत्ति क्यो नही होती? देखा तो यही जाता है कि वानरों से वानर ही पैदा होते है और मत्स्य से मत्स्य की ही उत्पत्ति होती है । डार्विन के मत के अनुसार प्रतिद्वन्द्विता और सघर्ष प्राणियों में सर्वत्र निरन्तर चलता रहता है । किन्तु देखा इसके विपरीत ही जाता है । कही पर मनुष्य ही पशु के समान बर्बर होकर एक दूसरे के प्राणों के प्यासे हो उठते है और कही पर वानर भी स्वामी के लिये अपने प्राणो को निछावर कर देते हैं । डार्विन के मत के अनुसार यदि कोई परम कारुणिक, सर्वज्ञ, ईश्वर इस जगत् का निर्माता हो तो उसको दुःख से रहित ही इस दुनियाँ को बनाना चाहिये, प्रायः दुःखो से भरी हुई नही । अध्यात्मवादियों के मत से तो परमेश्वर की तरह उसके अंशभूत जीव भी अविद्या से उपहित है और यह स्थिति अनादिकाल से चली आ रही है । अविद्या को इस उपाधि से ग्रस्त इन अनादि जीवो की अनादि कर्मों
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११२६ वंदार्थपारिजातः रीत्या तु परमेश्वरवदेव तदंशभूता जीवास्तदविद्योपाधयश्चानादय एव । तेषामविद्यावता जीवानां कर्मानुसारेणैव सृष्टी वैषम्य भवति । विवेकवैराग्यतत्त्वसाक्षात्कारार्थं सुखापेक्षयापि दुःखान्युपकारकतमानि । विस्तरेण विकासवाद- खण्डनम् 'मार्क्सवाद और रामराज्य' पुस्तके द्रष्टव्यम् । यदप्युक्तम्- 'सूक्तोल्लिखित भूगोलानुसारेणाक्रमणकारिणामार्याणा हिन्दूकुशपर्वताना पाश्चात्याभिर्दरीभिः समतलप्रदेशमवतीर्णा यश्च भारतस्येशानो भागः सम्भाव्यते । ॠग्वेदीयसूक्ते २५ नदनदीनामुल्लेखो दृश्यते । तत्र पञ्चनद्यस्तु पञ्चनददेश एव प्रसिद्धा, यथा - वितस्ता, असिक्नी, परुष्णी, इरावती, विपाशारूपा । अन्याश्च सिन्धु- सहकारिण्यः कुभा- सुवास्तु -गोमतीप्रभृतयोऽपि तत्र वर्णिता । सिन्धुभास्वत्योस्तु बाहुल्येन तत्र वर्णनम् । 'सप्तसिन्धवः ' इति पदावली तु निश्चयेनार्याणां वसत्यभिप्रायेण प्रयुक्ता । अवेस्ताग्रन्थे हप्तहिन्दुप्रयोगोऽपि लभ्यते । रोट्प्रभृतयो विद्वांसस्तु सूक्तकारैः सिन्धोरेव नरस्वतीति नामकरणं कृतम्' इति, तदपि कुशकाशावलम्बनमेव, वेदे ग्रामनद्यादीनां वर्णनेऽपि तत्र तेषामाक्रमणासिद्धे । तद्वर्णनेन वर्णयितॄणां तज्ज्ञानमासीदित्येव वक्तुं शक्यते नान्यत् । मेकडानल- बेवर- प्रभृतीना ग्रन्थे तत्तद्वर्णनेऽपि तेषां तत्रत्यताऽनिश्चयात् । वेदे क्वापि बहिर्देशादार्याणामागमनं तु न श्रुतमेव । ऋग्वेद- यजुर्वेदादिरचनासिद्धान्तस्तु खण्डित एव । यदपि- 'वर्तमानकाले पञ्जाबदेशो यत्र सामान्यवर्षण भवति तत्रातीव भव्यः सूर्योदयो भवति, यथान्यत्र भारते न दृश्यते । तत्र स्थितेरेवार्यैरुषसूक्तानि रचितानि' इत्यध्यापकहा किन्समहोदयस्य मतम्, शेषसूक्ताना रचना तु की परम्परा के अनुसार ही सृष्टि में भारी विषमता दिखाई पडती है । विवेक, वैराग्य और तत्त्व ( ब्रह्म ) के साक्षात्कार के लिये सुख की अपेक्षा दुःख अधिक सहायक होता है । अतः सृष्टि में दुःखो की बहुलता जीवो के उपकार के लिये ही है । विकासवाद का खण्डन हमने ' मार्क्सवाद और रामराज्य' नामक ग्रन्थ मे विस्तार से किया है । 'सूक्तों में उल्लिखित भौगोलिक विषयो से उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर हम यह निश्चयपूर्वक कह सकते है कि आक्रमणकारी आर्य संभवतः हिन्दुकुश की पश्चिमी घाटियों से समतल मैदान में उतर आये और भारतवर्ष के ऐशान्य भाग, जिसे फारसी में पंजाब कहते है, वहा आ बसे । ऋग्वेद के सूक्तों में कुल २५ नद-नदियों का उल्लेख है, जिनमें से दो तीन को छोडकर सभी सिन्ध नदी से संबद्ध है । उनमें से पाच नदिया पंजाब मे ही प्रसिद्ध है । वे नदिया वितस्ता ( झेलम ), असिक्नी (चिनाव ), परुष्णी [इरावती ( अर्थात् श्रमनाशी रावी ) ] और विपाश् ( व्यास ) और सबसे बडी एवं अधिकतर पूर्व की ओर बहने वाली शुतुद्री ( सतलज ) । सिन्धु की सहायक अन्य कुभा ( काबुल), सुवास्तु (स्वात ), गोमती ( गोमन ) आदि का भी वर्णन मिलता है । तथापि सिन्धु और सरस्वती :' नदियो का बहुत वर्णन मिलता है । ऋग्वेद मे सप्त सिन्धव इस पदावली का प्रयोग एक प्रकरण में निश्चित रूप से भारतीय आयो की बस्ती के अर्थ में हुआ है । यह एक रोचक वस्तु है कि अवेस्ता मे भी ' सप्तसिन्धु' का प्रयोग मिलता है । अत एव अध्यापक रोट तथा अन्य प्रसिद्ध विद्वानो ने यह निर्णय किया कि ऋग्वेद के सूक्तकारो ने सिन्धु नदी का ही पवित्र नाम सरस्वती रख दिया है' ( १० १३४ - १३६ ) यह पूरा कथन भी नदी की बाढ में बहते व्यक्ति के कुश और काश का सहारा लेने की तरह है । वेद में ग्राम, नदी आदि का वर्णन हो सकता है, किन्तु इससे यह नही सिद्ध हो पाता कि इन पर आर्यों ने आक्रमण किया था । इस वर्णन से इतना ज्ञात होता है कि इनका वर्णन करने वालो को इनका ज्ञान था । इन नदी, ग्राम आदि का वर्णन तो अभी मेकडानल, वेवर प्रभृति हीके ग्रन्थों में भी मिलता है, किन्तु इससे यह नही सिद्ध हो सकता कि ये लोग उन स्थानो के निवासी थे । वेद में है कि आर्य कही बाहर से भारत में आये । फिर ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि की रचना की बात का खण्डन हम कर चुकेयह हैकही नहीं सुना गया । 'वर्तमानकालीन पंजाब में वर्षा ऋतु में बहुत हल्की सी बरसात होती है और यहाँ के सूर्योदय की छटा इतनी,: समझा कि आर्यों नेहै जितनी उत्तर भारत में अन्यत्र कही नही पाई जाती । संभवत इसी आधार पर अध्यापक हॉप्किन्स ने यह भली होती उषस् सूक्तो जैसे पुरातन सूक्तों की रचना यही की और शेष की रचना सरस्वती के निकट पवित्र भूमि में हुई' ( पृ ० १३ ९) । यह कथन
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वदार्थपारिजातः ११२७ सरस्वत्यास्तटे' इति, तदपि निर्मूलमेव, कस्मिन् काले कस्मिन् देशे कस्य समक्ष केन कानि सूक्तानि रचितानीत्यत्र प्रमाणानुल्लेखात् । कथञ्चित् सकर्तृकत्व तु वाक्यत्वादेव सिद्धयेद् यदि स्मर्यमाणकर्तृकस्योपाधित्व न स्यात् । यदुक्तम्— 'तत्र वर्णितपशुपक्षिपुष्पफलादिवर्णनात्तत्रार्याणा निवासस्थान विज्ञायते । प्राधान्येन सोमस्य तत्र वर्णनम्, पर्वतेषु तदुत्पत्ति । तस्योपयोग आह्निककर्मकाण्ड प्रचुरमात्रयोपलभ्यते । ब्राह्मणकाले तु दूरादानीयते स्म । तदनुपलब्धी तत्प्रतिनिधिभिः पूतिकादिभिनिर्वाहः क्रियते स्म । फलतस्तत्परिचितिरेव भारते लुप्ता । पारसोकैश्च होमादियागार्थ पारसदेशाल्लताऽऽनीयतेस्मेत्यपि न वक्तुं शक्यते । ऋग्वेदोयसामरसास्वादात् प्रतिनिधिद्रव्याणा पानेन चित्तमुद्विजते ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, भारतीयैः सोमादियाग एव सोमोपयोगस्य वेद उपलम्भात् । नहि सोमयागादय आह्निकाः, कालविशेषेष्वेव तेषा विधानात् । सोमस्य न परिचित्यभाव, ओषधिविशेषाणा कलो लोपस्यायुर्वेदग्रन्थेषु स्मरणात् । पूतिकादिषु यद्यपि सामस्त्येन सोमगुणा न सन्ति, तथापि बहूनां तादृशाना गुणानां सोमयाज्यनुभवसिद्धत्वा- नाधिकमन्तरम् । यदपि - 'परवतषु वेदेषु यागस्य परमोपयोगिता व्रीहिणामृग्वेद उल्लेख एव नास्तीति । एव सम्भाव्यते यत् सिन्धुनद्या क्षेत्रेषु व्रीहयो न भवन्ति स्म यदा ऋग्वेदस्य रचना जाता । धान्योत्पादनचर्चा वेदे विद्यते, यच्चान्न- सामान्यस्य बोधकमासीत्' इत्यादिकमपि निरर्थकमेव सर्वेषा वेदानामनादित्वस्य वर्णनात् । नहि कस्मिश्चिद् ग्रन्थे तदानोन्तनानां सर्वेषामपि वस्तूनां वर्णनं सम्भवति । तेन व्रीहीणा वर्णनाभावऽपि तत्सत्वसम्भवः । अन्यथा यजुर्वेदकाले भी निर्मूल है, क्योकि किस काल और देश में किसके सामने किसने कौन से सूक्तो की रचना की, इसमें कोई प्रमाण नही मिलता । वेदो का कर्ता तो वाक्यत्व हेतु से ही सिद्ध हो सकता है, यदि उसमें स्मर्यमाणकर्तृत्व उपाधि न हो । इसका अभिप्राय यह है कि वाक्यो का कोई न कोई कर्ता होता है, वेद भी वाक्यात्मक है, इसलिये इनका भी कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये । इस तरह से वाक्यत्व हेतु से वेदों का कर्ता सिद्ध किया जा सकता है किन्तु हेतु साध्य की सिद्धि तभी कर सकता है, जब कि वह सोपाधिक न हो । यहां पर तो वाक्यत्व हेतु मे स्मर्यमाणकर्तृत्व उपाधि है, अर्थात् कोई वाक्य तभी सकर्तृक माना जा सकता है, जब कि उसके कर्ता की स्मृति विद्यमान हो । वेदो का कोई कर्ता किसी की भी स्मृति में विद्यमान नही है, अत इस सोपाधिक वाक्यत्व हेतु से वेदो की सकर्तृकता सिद्ध नही हो सकती । 'ऋग्वेद के समय में पूर्वोक्त प्रदेश ही आर्यों का निवास-स्थान था' यह बात ऋग्वेद में वर्णित पशु-पक्षी, फल-फूल और अन्य उपज के द्वारा अधिक प्रमाणित होता है । उदाहरणार्थ, ऋग्वेद का मुख्य पदार्थ सोम है । सोम के विषय में कहा गया है कि वह पहाड़ो पर उगता है । उसका उपयोग आह्निक कर्मकाण्ड में प्रचुर मात्रा में किया जाता था । ब्राह्मण काल में सोम दूर- दूर से लाया जाता था और उसके अनुपलब्ध होने पर अनेक पूतिका प्रभृति द्रव्य प्रतिनिधि रूप में ग्रहण किये जाते थे । फल यह हुआ कि असली सोम की पहचान भारत मे न रही । यह भी नही कहा जा सकता कि पारसी लोग होमा याग के लिये पारस से जिस वल्ली को मंगवाते है, वह कही ऋग्वेद का सोम ही है । आजकल जो सोम के रूप में प्रयुक्त हैं, वह तो कोई भिन्न ही पदार्थ है, कारण उसके रस के पीने से जी घबराने लगता है और उसका स्वाद ऋग्वेद में वर्णित सोमरस के स्वाद से बिलकुल भिन्न हैं (पृ ० १३ ९ ) । यह कथन भी व्यर्थ की बकवास है, क्योकि भारतीय केवल सोम याग में ही सोम का उपयोग करते रहे है, यह बात वेदो से ही सिद्ध है । सोमादि याग आह्निक कृत्य न होकर विशेष अवसरो पर किये जाने वाले अनुष्ठान हैं । सोम लता परिचित न हो, सो बात नही हैं, किन्तु वह अब लुप्त हो गई है । आयुर्वेद के ग्रन्थों में यह स्पष्ट बताया गया है कि अनेक औषधिया कलिकाल में लुप्त हो जाती हैं । पूतिका प्रभृति प्रतिनिधि द्रव्यो में यद्यपि पूरे गुण नही रहते, तो भी मूल सोम द्रव्य से इनके अनेक गुण समान है, यह बात सोम याग करने वाले अनेक याज्ञिको के अनुभव से सिद्ध है । अतः इनमें ज्यादा अन्तर नही माना जा सकता । 'यह भी स्मरण रहे कि परवर्ती वेदो मे बहुधा उल्लिखित तथा जीवन के परम उपयोगी साधन ' व्रीहि' का उल्लेख ऋग्वेद में कही भी नही है । संभवत: चावल की उपज सिन्धु नदी की तलेटियों में न होती होगी, जब कि ऋग्वेद की रचना हुई । ऋग्वेदकालीन कृषकगण धान्य अवश्य पैदा करते थे, जिसका उल्लेख ' यव' शब्द से किया जाता है । परन्तु उस समय यव' शब्द धान्य-
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११२८ वेदार्थ पारिजातः गङ्गाया अवर्णनात्तदानी गङ्गाया अभावापातात् । वस्तुतस्तु नहि मन्त्रसहिताया एव वेदत्वम्, किन्तु मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद- नामधेयत्वमुक्तम् । यथा मन्त्रभागमन्तरा ब्राह्मणभागस्यापूर्णत्वम्, अन्यथा ऋक्सहितायां सोमादियागानां विधाना- दर्शनात् तत्र वणितानां सोमशंसनादीना नैरर्थक्यापातात् । अन्यवेदाना परवर्तित्वे ऋक्संहिताया चतुर्विधानामृत्विजा कार्यवर्णनं निरालम्बनमेव स्यात् । किञ्च, मैकडानलरीत्या ऋक्संहितायां खनिजलवणोपयोगवर्णनं नास्ति 1। तावतापि न तदानी तदभावः, पञ्चनदोत्तरभागे सिन्धुवितस्तयोर्मध्ये पर्याप्ततया तदुपलम्भात् । रजतस्यापि तत्रोल्लेखो नास्ति । अत एव यथा न्यग्रोधस्य तत्रावर्णनेऽपि न तदभावः शक्यसमर्थनः, तस्य भारते सर्वत्र दर्शनात् । वृकस्य वर्णनसत्त्वेऽपि व्याघ्रवर्णनाभावात् किं तदानी व्याघ्राभाव. कल्पयितुं शक्यते? यदुक्तम्- 'शुक्लयजुर्वेदे गोवधार्थं प्राणदण्डो विहितः, तथापि ऋग्वेदे न नितान्तप्रतिषेधः, विवाहसूक्तेषु गवालम्भनविधानात् । वृषभाणां बलिरिन्द्राय विहितः' इति, तदपि वेदार्थाज्ञानविजृम्भितम् 'मा गामनागामदिति वष्टि ( ऋ ० सं ० ) इति प्रत्यक्षमेव गोवधनिषेधदर्शनात् । विवाहसूक्तेष्वपि गवालम्भनप्रतिपादनमसदेव, अनियेति तन्नामनिर्देशात् । यदपि - 'ऋग्वेदे हसवर्णनम्, यजुर्वेदे सोमजलयो विभाजनशक्तिहंसे लिखिता । क्षीरनीरविश्लेषण शक्ति- यजुर्वेदानुसारेण क्रौञ्चेषु भवति' इति, एवमेव यदप्युक्तम्- 'कुमार ( काबुल नदी ) मारभ्य यमुनां यावद् भारतस्य वायव्य- प्रदेशे आर्याणा वसतय आसन् । तदानीमार्यास्तत्रत्यैरादिवासिभिः संघर्षरता आसन्, तेषां पराजयस्यानेकत्र वर्णनात् । सामान्य का बोधक है, न कि 'जो' के संकीर्ण अर्थ का' ( पृ० १३ ९- १४० ) यह सब कथन भी निरर्थक है, क्योकि सभी वेद अनादि है, इसका वर्णन किया जा चुका है । किसी भी ग्रन्थ मे उस समय विद्यमान सभी वस्तुओं का वर्णन नही मिल सकता । इसलिये ऋग्वेद में ब्रीहि का वर्णन न होने पर भी उसकी सत्ता मे कोई बाधा नही उठ सकती । अन्यथा यजुर्वेद मे गंगा का वर्णन न होने से उस समय गंगा का अभाव मानना पड़ जायगा । वास्तव मे केवल मन्त्र संहिता ही वेद नही है, किन्तु मन्त्र और ब्राह्मण दोनो को वेद माना गया है । जैसे मन्त्र भाग के बिना ब्राह्मणभाग अपूर्ण है, उसी तरह से मन्त्रभाग भी ब्राह्मणभाग के बिना अधूरा माना जायगा । ऋग्वेद में सोमादि यागो का विधान नही मिलता, यह विधान ब्राह्मण ग्रन्थो मे ही मिलता है । इस तरह से ऋग्वेद की ब्राह्मण निरपेक्षता मानने पर ऋग्वेद में वर्णित सोम की स्तुति आदि विषय निरर्थक हो जायगे । अन्य वेद यदि परवर्ती हैं, तो ऋक्संहिता में चार तरह के ऋत्विजो के अलग- अलग कार्यो का वर्णन व्यर्थ हो जायगा । मैकडानल की पद्धति को यदि माना जाय तो ऋग्वेद में खनिज लवण के उपयोग का भी कही वर्णन नही मिलता । इससे उस भाग मे तब खनिज लवण नही मिलता था, यह नही सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि पंजाब से उत्तर सिन्धु और वितस्ता ( झेलम ) की घाटियों में पर्याप्त मात्रा में खनिज लवण प्राचीनकाल से मिलता आ रहा है । रजत (चांदी ) का भी वर्णन वहाँ नही मिलता । इसलिये जैसे न्यग्रोध ( वट वृक्ष ) का ॠग्वेद में वर्णन न होने पर भी कभी उसका अभाव नही सिद्ध किया जा सकता, क्योकि पूरे भारत मे यह उपलब्ध होता है, उसी तरह से ब्रीहि आदि के विषय मे भी समझना चाहिये । ऋग्वेद मे वृक ( भेडिया ) का तो वर्णन है, व्याघ्र का नही, तो क्या इससे कभी भारत में व्याघ्र नहीं थे, ऐसी कल्पना की जा सकती है? ' यद्यपि शुक्ल यजुर्वेद मे गोवध के लिये मृत्यु दण्ड विहित है, ऋग्वेद में गोवध का नितान्त प्रतिषेध नही पाया जाता, कारण विवाह सूक्त मे विशेष महोत्सवो पर गो का आलम्भन विहित है और वृषभो की बलि इन्द्र को अर्पित करने का प्रकरण कई जगह वर्णित है' (पृ० १४२ ) यह कथन भी वेदों का अर्थ ठीक से न समझ पाने के कारण ही है, क्योकि ' अदिति स्वरूपिणी निरपराध गाय को कभी नही मारना चाहिये ' इस मन्त्र में स्पष्ट ही गोवध का निषेध किया गया है । विवाह सूक्त में भी गौ का आलम्भन विहित नही है, क्योंकि उनका नाम वहाँ पर 'अध्निया' दिया गया है+, जिसका कि अर्थ होता है कि ये कभी वध करने योग्य नहीं है । 'ऋक् सहिता मे इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है । शुक्ल यजुर्वेद में सोम को जल से विभक्त करने की शक्ति हंस में बताई है, जिस तरह परवर्ती साहित्य मे नीर-क्षीर (दूध और पानी ) के विवेक के लिए हंस की महिमा गाई गई है' (पृ० १४३ ), ' यह प्रमाणित होता है कि ऋग्वेद के रचयिता भारत के वायव्य कोण मे बसे हुये लोग थे । यह भाग काबुल नदी से लगाकर यमुना तक का प्रदेश था । वे उस समय आदिवासियों के साथ सघर्ष में जुटे हुये थे, कारण आदिवासियों की पराजय का वर्णन कई जगह मिलता
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वार्थपारिजान ११२६ विजेतार आर्या नवनवप्रदशाना स्वायत्ताकरणाय यतमाना आसन । नद्य एव तत्र प्रतिरोधिका आसन् । आदिवासिना- मनेका उपजातय आसन् । तासां धर्मभावना परस्परैकत्वभावनाप्यासीत् । तदा ते दस्युशब्देः पश्चादनार्य शब्दैश्च व्यवह्रियन्ते स्म । तेषा कृष्णो वर्ण आसीत् । आर्याश्च गौरवर्णा आसन । रङ्गभेद एव जातिभेदकारुणमासीत् । पर्वतेषु निलीयमाना अपि ते नात्मान रक्षितुं क्षमा आसन् आर्येनिगृहीता एव । यथा कश्चित् प्रस्तोता स्वाश्रयदातू राज्ञो दानस्तुतिप्रसङ्गे शतसंख्याकानां दासाना दान वर्णयति । सर्वथाऽऽर्याणामधीनतास्वीकारानन्तर तेषां शूद्रेति चतुर्थी संज्ञा विहिता । ऋग्वेदे दस्यवोऽयाज्ञिका नास्तिका अधार्मिका उच्यन्ते स्म । तस्मादेव मुक्तद्वये लिङ्गपूजकत्वेन ते सङ्केत्यन्ते । कालान्तरे आर्यैश्च लिङ्गपूजाऽङ्गीकृता । महाभारतरचनाकाले शिवार्चा प्रचलिनासीत् । दस्यूना दुर्गाणि पुरशब्देनोच्यन्ते ' इत्यादिकम्, तत्सर्वं पाश्चात्यानां कूटनीतिमयदुर्भावनामूलकम्, ऋग्वेदेऽन्यत्र वा वेदिकसाहित्ये आर्याणा बहिर्देशादागमनावर्णनात् । वैदिकास्तु सर्वथा भारतीया एव । ऋगादयो वेदास्त्वनादय एव । तत्र चाख्यायिकारूपेण पुरुषाः पर्वता नद्यो युद्धानि च वण्यन्ते । मनुव्यासादिभिः सृष्टेर्वेदिकशब्दपूर्वत्ववर्णनेन सृष्टेः प्रागपि तेषा विद्यमान-त्वाङ्गीकारान् । भारतस्य वर्षस्य सर्वसुखावहत्वात् । ब्रह्मावर्त एव मानवादिमसृष्टिस्थानत्वावगमात् । भारते च प्रदेशभेदेन गौराः कृष्णा उभयविधा अपि मनुष्या उत्पद्यन्ते । रङ्गभेदे प्रदेशभेदजलवाय्वादिभेद एव कारण न जाति: । दक्षिणे ब्राह्मणानामपि कृर्णवर्णत्वदर्शनात् । नहि पाश्चात्त्येषु गौरवर्णा दस्यवो न भवन्ति । दासाश्च कर्मकराः सर्वत्र भवन्ति, मनुष्यादिषु सर्वत्र गौणमुख्यभेदेन सेव्यसेवकभावदर्शनात् । सूक्तद्वये तु न शिवलिङ्गपूजका अयाज्ञिका ! विजेता जाति नये - नये प्रदेश को हस्तगत करने में संनद्ध थी । यह बात 'आगे बढने मे नदियाँ भारी रुकावट डालती थी' इस उक्ति के द्वारा प्रतीत होती है । आक्रमणकारी जाति अनेक अवान्तर जातियो मे विभक्त अवश्य थी, परन्तु उनमे धर्म और वर्गीय भावना मे एकत्व था । वे अपने आपको आर्य ( बन्धु) कह कर उन आदिवासियों से भिन्नता स्थापित करते थे, जिन्हे वे दस्यु अथवा दास कहा करते थे । आगे चलकर तो इस दस्यु जाति को अनार्य भी कहा है । इन दो जातियों में दैहिक विभेद वर्णगत था । आदिवासी को काले रंग का ( अर्थात् दासों के रंग का) बताया है और अपना रंग आर्य ( गौर ) वर्ण घोषित किया है । नि सन्देह भारत में जातियो का मूल कारण यही रंग का भेद है । पराजित जाति के लोग जो पहाडियों में जाकर छिप न सके विजेताओ के द्वारा बन्दीकृत कर लिये गये । उदाहरणार्थ, एक प्रस्तोता को अपने आश्रयदाता राजा से भेंट में १०० गर्दभ, १०० मेष और १०० दास प्राप्त हुए थे । भारत के आदिवासी जब आक्रमणकारियों से अभिभूत हो सर्वथा उनके अधीन हो गये, तब वे दस्यु नही कहे जाते थे, परन्तु उसका वर्ग एक चौथा बना दिया गया, जिसे शूद्र कहते हैं । ऋग्वेद में दस्यु यज्ञ न करने वाले नास्तिक अधार्मिक बताये गये है । निश्चय ही दो सूक्तों में लिंग पूजको के नाम से उन्ही का संकेत किया गया है । परन्तु समय बीतने पर आर्यों ने भी उक्त संप्रदाय को अपना लिया । महाभारत में अनेक सन्दर्भ ऐसे है, जिससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत के रचनाकाल में लिंग के स्वरूप में शिव की अर्चा प्रचलित थी ।.... ऐसे दस्युओं के दुर्ग को पुर कहा गया है' (पृ० १४४- १४५) इस तरह का सारा प्रतिपादन पाश्चात्य विद्वानों की कूटनीति का अंग है । इस तरह की बातो से वे भारत मे परस्पर दुर्भावना फैलाना चाहते है । ऋग्वेद में अथवा वैदिक साहित्य मे अन्यत्र कही भी आर्यो के बाहर से आने की बात नही कही गई है । वैदिक सब तरह से केवल भारतीय ही हैं । ऋग्वेद आदि सभी वेद ग्रन्थ अनादि है । इनमें कहानी के रूप में पुरुष, पर्वत, नदी, युद्ध आदि का वर्णन मिल सकता है, किन्तु यह वास्तविक नहीं है । मनु, व्यास प्रभृति ने बताया है कि इस सृष्टि की रचना वैदिक शब्दो के आधार पर ही हुई है, अत सृष्टि से पहले भी वेदों की स्थिति थी, उनका यह मत स्पष्ट हो जाता है । भारतवर्ष का मौसम सभी ऋतुओ मे सुखदायक रहता है । मानव की प्रथम सृष्टि ब्रह्मावर्त मे ही मानी जाती है । भारत में प्रदेश के भेद से गौर वर्ण और कृष्ण वर्ण दोनो तरह के मनुष्य होते हैं । इस वर्ण के भेद में प्रदेश का और जल वायु का भेद ही कारण है, इसमें जाति को कारण नही माना गया है, क्योकि दक्षिण भारत के ब्राह्मण भी कृष्ण वर्ण के देखे जाते हैं । पाश्चात्य देशों में गौर वर्ण के व्यक्ति दस्यु ( चोर लुटेरे ) न होते हों सो बात नही है । दास सभी जगह मालिक का काम करते हैं । मनुष्य आदि सभी जातियों में गोण और मुख्य के भेद से मालिक और सेवक होते हैं । उक्त ऋग्वेद १४२
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वेदार्थपारिजात ११३० नास्तिका उच्यन्ते । शिश्नदेवशब्देन शिश्नोदरपरायणा नास्तिका एव सर्वत्रोच्यन्ते तत्र शिवलिङ्गपूजाबोधकशब्दा- भावात् । किञ्च पूर्वत्र तु मेघा एव वृत्रादिशब्देनोक्ताः, मेघा एव दुर्गपुरादिशब्दैरुक्ताः ॥ इदानी तु कूटनीत्या आदि- वासिनः शत्रवस्तेषां पुराणि दुर्गाणीत्युच्यते । तत्तु केवलं धौर्त्यमेव ॥ पुरु- तुर्वसु -यदु -यनु -द्रुह्यनामकाः पञ्चविधा आर्या आसन्नित्युक्तिस्तु भारती यपारम्पर्याज्ञानमूलिकैव, भारतीयपुराणादिषु तेषां ययातिपुत्रत्वेन क्षत्रियत्वावगमात् । वशिष्ठ-विश्वामित्र सुदासप्रभृतीनामृग्वेद उल्लेखेऽपि तेषामाख्यायिकारूपेणैवोल्लेखः । तादृशैः शब्देस्तु सृष्टी कदाचित्तादृशानां पुरुषाणामुत्पत्त्या महाभारतादौ तेषामतिहासि- कत्वेनापि वर्णनं सम्भवत्येव । घटनानुसारिण्यो न वैदिक्य आख्यायिकाः । आख्यायिकानुसारिण्यो घटनास्तु भवन्त्यो न निवार्यन्ते । अत एव ब्राह्मणयुगे कुरु-तुर्वशादिजातयो लुप्ता इत्यपि निर्मूलम्, ब्राह्मणयुगस्य निर्मूलत्वात् । एवमेव 'तासां मिश्रणेन नवीनानि नामानि जातानि, भरतजाती कौरवादयः पाञ्चाल- सृञ्जय - मत्स्यादयो जाता:' इति, तदपि तुच्छम्, निर्मूलत्वात्, अनुमानाभासमूलत्वाच्च । शास्त्रविरुद्धानि त्वनुमानानि त्याज्यान्येव, ( यथा मनुष्यसूत्रं पवित्रं मूत्रत्वात् गोमूत्रवत्, परस्त्री गम्या स्त्रीत्वात् स्वस्त्रीवत्, नरशिरःकपालं शुचि प्राण्यङ्गत्वात् शङ्ख शुक्तिकादिवत् ) उपजीव्यविरोधात् । शुचित्वादिकं तु शास्त्रगम्यमेव, तदेव च साध्यम् । तथा च शास्त्रविरुद्धेनानुमानेन के दो सूतो में शिवलिंग के पूजक अयाज्ञिक नास्तिकों का वर्णन नही है । यहाँ सब जगह शिश्न शब्द से शिश्न और उदर की तृप्ति में लगे हुए नास्तिको को ही संबोधित किया गया है । यहाँ कही भी शिवलिंग की पूजा करने वालो का उल्लेख नही है । अपि च, पहले आपने वृत्र आदि शब्दो को और दुर्ग, पुर आदि शब्दो को वेद में सर्वत्र मेघो का बोधक माना है । अब यहाँ कूटनीति में पडकर आदिवासी को शत्रु बताकर उनके पुरो और दुर्गों का उल्लेख यहां मानते हैं, यह सब धूर्तता के सिवाय क्या हो सकता है? 'पुरु, तुर्वसु, यदु, अनु और द्रुह्य नाम की जातियो में ये सब आर्य विभक्त थे' ( पृ० १४६) इस तरह की उक्तियाँ भी भारतीय परम्परा के अज्ञान को ही सूचित करती है, भारतीय पुराणो में ये सभी ययाति के पुत्र थे और सब क्षत्रिय जाति के थे । वसिष्ठ, विश्वामित्र सुदास आदि का ॠग्वेद में उल्लेख कहानी के पात्रो की तरह ही माना जाता है । इन शब्दो के आधार पर किसी समय सृष्टि में उत्पन्न हुए पुरुषो के ये नाम रक्खे जा सकते है और तब महाभारत आदि इतिहास ग्रन्थों में उनका वर्णन भी ऐतिहासिक माना जा सकता है । वैदिक धान्यान घटना का अनुवर्तन नही करते, किन्तु इन आख्यानो के आधार पर बाद मे इस तरह की घटनाओ की संभावना को कौन रोक सकता है? इसलिए 'ब्राह्मण युग मे कुरु, तुर्वश आदि जातियां लुप्तप्राय हो चली थी' ( पृ ० १४८) यह कथन भी निराधार है, क्योंकि ब्राह्मण युग की कल्पना ही सर्वथा निर्मूल है । 'वैदिक युग की अनेक जातिया आपस मे घुल-मिल गयी और उन्होने नया नाम रख लिया । उदाहरणार्थ --भरत जाति मे कुरु, पाञ्चाल, संजय, मत्स्य आदि जातिया समाविष्ट हो गई' (१० १४८- १४ ९) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि यह गलत अनुमान पर आधारित है । शास्त्रविरोधी अनुमान सर्वथा वर्जित है, (जैसे कि मनुष्य का मूत्र गोमूत्र के समान पवित्र है, अपनी स्त्री की तरह परस्त्री भी गमनयोग्य है, मनुष्य का कपाल शंख और शुक्ति के समान प्राणी का अंग होने से पवित्र है, इस तरह में अनुमान कभी प्रामाणिक नहीं माने जाते ), क्योकि इनमें जिस शास्त्र के आधार पर इनकी प्रवृत्ति होती है, उसी का विरोध स्पष्ट है । अर्थात् शास्त्र गोमूत्र को पवित्र और मनुष्य के मूत्र को अपवित्र बताता है । इसी तरह से शास्त्र से ही यह ज्ञात होता है कि अपनी स्त्री के साथ ही गमन करना चाहिये, परस्त्री के साथ नही और इसी तरह से प्राणि का अंग होते हुए भी शंख और शुक्त ही पवित्र माने जाते हैं, मनुष्य की खोपड़ी नहीं । अनुमान से उक्त शास्त्रवचनों के विरुद्ध मनुष्य के मूत्र को पवित्र, परस्त्री को गम्य और मनुष्य की खोपड़ी को यदि पवित्र माना जाता है, तो स्पष्ट ही अनुमान के द्वारा अपने उपजीव्य शास्त्र का विरोध हुआ । फलतः ऐसे अनुमानों को प्रमाण नही माना जाता । कोई वस्तु पवित्र है या अपवित्र, इसका निर्णय शास्त्र के आधार पर होता है । उक्त अनुमान मैं उसी को साध्य माना गया है । इस तरह से शास्त्रविरोधी अनुमान से पवित्रता, अपवित्रता का निर्णय कैसे हो सकता है? प्रकृत स्थल