वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 231–240
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 231–240
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वेदार्थपारिजातः ११३१ कथ शुचित्वं सिद्धये त? प्रकृते त्वव्यभिचरितहेतुव्याप्त्याद्यभावादपि जातिलोपादिकल्पना न युक्ता । ब्राह्मणक्षत्रियादि- जातिलोपे तन्मूलककर्मणामप्यसत्त्वेन वेदाध्ययनतदर्थानुष्ठानाभावापातात् । तदपि -'तासु तासु जातिषु गायककुलानि भवन्ति स्म, तानि राजकुलसेवासंलग्नानि भवन्ति स्म । राजकीयवीरगाथावर्णनं यज्ञादिषु देवतास्तोत्रगान च तेषा कार्यमासीत् । राजकार्यार्थं यस्य पुरोहितस्य ऋत्विजो वा नियुक्तिः स्यात् स राजपुरोहितत्वेन प्रशस्यते । महाराजसुदासस्य राजकुले वशिष्ठस्य तन्महत्त्वमासीत् । ऋ० ७।७३ इत्यत्र तेनोक्तं यत् तत्स्तुतिप्रभावादेव त्रित्सूनां विजयो जातः । दानस्तुतिषु राज्ञो दानश्लाघात्युक्तिपूर्णा भवति स्म । अत्युक्तयस्तु प्रोत्साहनार्था एव भवन्ति स्म । तेन हिरण्यगवाश्वरथवस्त्राभरणादिवस्तूनि राजभि. पुरोहितेभ्यो दीयन्ते स्म । परिवर्तियुगे ब्राह्मणाना गौरवे सविशेषं स्थापिते पुरोहितेभ्यो दानं राज्ञां घर्मो जातः । यज्ञानुष्ठाने पौरोहित्यपौरोहित्यनियुक्त्यैवनियुक्त्यैव पौरोहित्यपरम्परोपक्रमः । तत्फलस्वरूपमेव समाजे पुरोहितवर्गस्य महत्त्वपूर्ण स्थानं स्थापितम् । राज्यमेव धर्माधिकारिवर्गायत्तं जातम् । मध्ययुगे पाश्चात्यदेशेऽपि कैथलिक चर्चस्थानस्य स एवादर्श आसीत् । परन्तु यूरोपदेशे कदापि न स आदर्शः कार्यान्वितोऽभूत्, यथा भारते । पौरोहित्यं पारम्पर्येणा- त्रानुवंशिकं संगृहीतम् । तदानीमेव जातिवादविकासश्रीगणेशो जातः । ऋग्वेदीयप्राचीनांशरचनाकाले वशिष्ठस्य पौरोहित्य मानुवंशिकं नासीत् । अत एव पञ्चनदीया भटाः पुरोहिताश्च न जातिविशेषरूपेण परिणताः । तत्प्रमाणं महाभारतयुगे समुपलभ्यते । मध्यभारतनिवासिनो ब्राह्मणाः स्वब्राह्मणत्वस्य गौरवाद् वायव्यभागीयान् जनान् बर्बरत्वेन गणयन्ति स्म । में तो व्यभिचार दोष से रहित हेतु, व्याप्ति आदि की उपलब्धि न होने से भी जातियो के नष्ट हो जाने की कल्पना नही की जा सकती । ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जातियो के लुप्त हो जाने पर उनके द्वारा किये जाने वाले कर्मों का भी लोप मानना पड़ जायगा और इस तरह से वेद के अध्ययन और उनके अनुष्ठान का भी उच्छेद मान लेना पड़ेगा, जो कि सही नही है । 'हर जाति में अवश्य ही एक गायको का कुल हुआ करता था, जो राजसेवा में आसक्त होता था । वह राजा की वीरगाथाओं का वर्णन करता अथवा यज्ञानुष्ठान के समय देवताओं के स्तोत्रो की रचना कर गान करता था । राजा के द्वारा अपने स्थान पर धार्मिक विधि को पूरा करने के लिये जिस पुरोहित या ऋत्विक् की नियुक्ति की जाती थी, यह राजपुरोहित कहलाता था । महाराज सुदास के यहाँ वसिष्ठ को यह मान प्राप्त था और ऋग्वेद के एक सूक्त (७१३३ ) में वह यह कहे बिना न रह सके कि त्रित्सुओ का विजय उनकी ही स्तुतियो के कारण हुआ था । अपने उदार आश्रय दाताओ के प्रति श्लाघा के वचन अधिकाश अत्युक्तिपूर्ण हुआ करते थे । अंशतः ये अत्युक्तिया नि.संदेह इन राजाओ को प्रोत्साहित करने के लिये हुआ करती थी । जो भी कुछ हो स्वर्ण, गौ, अश्व, रथ एवं वस्त्राभरण के उपहार जो राजाओ के द्वारा अपने मुख्य पुरोहित को दिये जाते थे, अवश्य ही बहुमूल्य हुआ करते थे । परवर्तीयुग मे जब ब्राह्मण का गौरव सविशेष स्थापित हो चुका था, पुरोहितो को दान देना राजा का एक धर्म बन गया था । राजाओ के द्वारा यज्ञानुष्ठान में अपने स्थान पर पुरोहितो की नियुक्ति से ही भारतवर्ष में पौरोहित्य -परम्परा का उपक्रम हुआ । यह वह आरंभ था जिससे विश्व के इतिहास में एक अनूठी परम्परा चल पडी और जिसके फलस्वरूप समाज में पौरोहित्य वर्ग का सर्वोत्कृष्ट स्थान बना और राज्य एक दम धर्माधिकारी वर्ग पर अवलम्बित हो गया । मध्ययुग मे पाश्चात्य देशों में भी कैथलिक चर्च का यही आदर्श बना हुआ था, परन्तु यूरप में यह आदर्श कभी भी कार्यान्वित न हो पाया, जिस तरह भारत में हुआ ॥ पौरोहित्य परम्परा ने आनुवंशिक रूप ग्रहण किया, ज्यो ही भारत में जातिवाद के विकास का श्रीगणेश किया । ऋग्वेद के प्राचीन अंश के रचना-काल में, जब सुदास और वसिष्ठ हुए थे, पौरोहित्य-प्रथा आनुवंशिक न थी और न कभी वीर भटो के और पुरोहितों के वर्ग पंजाब में बसे हुए आर्यों के साथ जातिविशेष के रूप में परिणत हो पाये थे । इस बात का प्रमाण हमें महाभारत युग में मिलता है कि मध्यदेश के वासी अपने ब्राह्मणत्व के गौरव के कारण देश के वायव्य भाग में रहने वाले लोगों को बर्बरप्राय ही समझते थे ।
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वंदाथ पारिजातः ११३२ तथापि जातिव्यवस्था पूर्व जटिला नासीत् । यथा यथा आर्या विभिन्नप्रदेशेषु विस्तारमुपगतास्तथा तथा पराक्रमणशङ्कयाऽऽदिवासिनामभिभवाय सैनिकसगठनमावश्यक जातम् । तदानी सैनिकदलानि सेनानायकानु- शासने सङ्घटितानि । कृषकवर्गा निर्विघ्नतया औद्योगिक व्यवसायसम्पादनाय सन्नद्धाः । धार्मिकानुष्ठानान्यपि क्रमेण जटिलतामुपगतानि । तेन पुरोहितवर्गाः सम्पूर्णशक्तिभिर्धार्मिककार्याणा निर्वाहाय स्ववशगम्यपवित्रपारम्पर्योपदेशे सलग्ना जाताः । तेनवार्यजातिषु प्रमुखास्त्रयो विभाग अधिकाधिकतया पार्थक्यमुपगताः । एव प्रतीयते यत् पराजिताना- मादिवासिनामार्यधर्माङ्गीकारेऽपि तत्समाजे तेषा दासवृत्तिरेवासीत् । तयोरार्यानार्यजात्योरार्यदासजात्योश्च महान् भेदखातः साम्प्रतिकेषु गौरकृष्ण ( गोरा- काला हब्शी ) जनापेक्षयाऽप्यधिक एवासीत् । जातिवादस्य वशोत्पत्त्यघनत्वे जाते पुरोहितवर्गस्य स्वोच्चताप्राप्ती साफल्य जातम् । अत एव तेषा सम्मानमनतिक्रम्य जातम् । यथा दासेभ्य आर्या: स्वात्मानमुच्चतमं मन्यन्ते, तथैव पुरोहिताः क्षत्रियादिभ्य आत्मानमुत्कृष्टतमं मन्यन्ते स्म । तिसृष्वार्यजातिषु शूद्रस्यापि सन्निवेशेन चातुर्वण्यं स्थापितम् । यजुर्वेदे तस्योल्लेखो दृश्यते । तस्मिन्नेव युगेऽथर्ववेदस्य केचिदशा निर्मिताः ८ १३, केचिच्च ऋग्वेदस्याप्यंशा निर्मिता यत्र चतुर्णां वर्णानामुल्लेखः । ऋग्वेदेऽष्टकृत्वो ब्राह्मणशब्दोऽस्मिन्नर्थे आगत.' (पृ ० १५० - १५२ ) इत्यादिकम् । तत्सर्वमपि दुष्टतामूलकमेव, ऋग्वेदीयसूक्तेषु तत्सूचकशब्दाभावात् । यथा कश्चित् क्वचिदेकं ताम्रखण्ड विलोक्य तदाधारेण कञ्चिद्राजानं तस्य चतस्रो भार्याः पञ्चदश पुत्रान् पञ्चामात्यान् सेनाः सेनापति च कल्पयेत्, तद्वदेवेय कल्पना । कल्पनासु व्यभिचारबाहुल्यसम्भवात् । ८। ३३ सूक्ते तु सपुत्रस्य वशिष्ठस्येन्द्रेण सवाद इत्यनुक्रमणि- तथापि यह जातिव्यवस्था प्रारंभ में उतनी जटिल न थी । जब देश के विभिन्न भागों में आर्य जाति फैल गयी, तब यह अवश्यकता प्रतीत हुई कि महमा आक्रमणों का सामना करने के लिये तथा कभी-कभी एकाएक सिर उठाते हुए अधीन आदिवासियो को दबाने के लिये एक सदा तत्पर सेना का संगठन किया जाय । सेना का मूल भाग छोटे छोटे दलो के मुखियो के परिवार से प्राप्त हुआ जो एक सेनानायक के अधीन जुटकर खडे हो गये । इस तरह कृषक वर्ग एवं औद्योगिक वर्ग निर्विघ्नता से अपने अपने व्यवसाय को करने में समर्थ हुए । उन्ही दिनो धार्मिक अनुष्ठान का स्वरूप क्रमशः जटिल होता गया और उसमे होने वाली सिद्धि शुद्ध प्रयोग पर निर्भर होने लगी । साथ ही साथ प्राचीन सूक्तो की सुरक्षा अत्यधिक आवश्यक प्रतीत होने लगी । अत एव पुरोहित वर्ग को अपना सारा समय एवं संपूर्ण शक्ति अपने धार्मिक कार्यों के निर्वाह तथा उस पवित्र परम्परा को अपने वंशजो को सिखाने मे लगानी पड़ी । इन कारणो से आर्य जातियो मे ये तीन प्रमुख विभाग अधिकाधिक पृथक् हो गये । ऐसा लगता है यह कठोर पारस्परिक दुर्भाव पराजित आदिवासियो के प्रति पृथक् व्यवहार के कारण उत्पन्न हुआ, क्योंकि आर्य धर्म को स्वीकार कर लेने पर भी इन आदि- वासियों को आर्यों के समाज में केवल दास वृत्ति हो उपलब्ध हुई थी । इन दो जातियों में खाई उससे कही अधिक न होगी, जितनी आज संयुक्त राष्ट्र की जनता में गोरे और काले हब्शियो के बीच दीख रही है । जातिभेद के वंशोत्पत्ति पर आधारित हो जाने के बाद पुरोहित वर्ग को उच्च एवं पुनीत सामाजिक स्थिति प्राप्त करने में सफलता मिली । इसी कारण उनका संमान अनतिक्रम्य हो गया । वे शेष आर्यों से ठीक उसी तरह ऊंचे समझे जाने लगे, जिस तरह इतर आर्य दासो से कही उच्च समझे जाते थे । तीन आर्य जातियों में शूद्रों को संमिलित करने पर चातुर्वर्ण्य स्थापित हुआ, जिसका मूलाधार यजुर्वेद में पाया जाता है । उसी युग में अथर्ववेद का अधिकाश ( अध्याय ८-१३) तथा कुछ भाग ऋग्वेद का भी रचा गया, जिसमें चार वर्णों का नामतः स्पष्ट उल्लेख मिलता है | प्रथम वर्ण के व्यक्ति के लिये ' ब्राह्मण' पद का प्रयोग ऋग्वेद में मिलता है । केवल आठ ही बार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग इस अर्थ में किया गया है तथा ब्राह्मण शब्द का प्रयोग कोई ४६ बार हुआ है जिसका अर्थ ऋषि तथा प्रधान ऋत्विक है' ( पृ ० १५० - १५२ ) । यह सारा प्रतिपादन दुष्टतामूलक है, ऋग्वेद के सूक्तो में इस विषय के प्रतिपादक शब्दों का नितान्त अभाव है । जैसे कोई व्यक्ति किसी एक ताबे के सिक्के को देखकर उसी के आधार पर किसी राजा की, उसकी चार रानियो को और उसके पन्द्रह पुत्र, पाच मन्त्री, सेना, सेनापति आदि की भी कल्पना करले, इसी तरह की यह भी कल्पना है । इस तरह की
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वेवायपारिजातः ११३३ कातो ज्ञायते । तस्य वशिष्ठऋषिस्तत्पुत्राणामेव स्तूयमानत्वात् त एव देवताः । तत्र-'दूरादिन्द्रमनयन्ना सुतेन तिरो वैशन्तमति पान्तमुग्रम् । पाशद्युम्नस्य वायतस्य सोमात् सुतादिन्द्रोऽवृणीता वशिष्ठान् ॥ ' (ऋ० स० ७।३३।२ ) इति मन्त्रे यदा वशिष्ठस्य पुत्राः सुदासं राजानमयाजयन् तदैव पाशद्युम्नाख्योऽपि राजा सोमान् यष्टुमुद्यम चकार । वशिष्ठ- पुत्रास्त तिरस्कृत्य तदीययागे सोम पिबन्तमिन्द्र मन्त्रबलेन तस्मादाच्छिद्य सुदासो यज्ञे स्थापयामासुः । तदेतद् वृत्तान्तं कीर्तयन् वशिष्ठ स्वसुताननेन मन्त्रेण स्तौति -वेशन्तः पल्वल । प्रकृते च सोमाधारश्चमसो लक्ष्यते । तत्स्थ सोमं पिबन्तम् उग्रम् उद्गूर्णमिन्द्र सुतेन सुदासो यज्ञेऽभिषुतेन सोमेन हेतुना तिरः पाशद्युम्न तिरस्कृत्य दूरात् आ आनयन् वाशिष्ठा मन्त्रबलेनानीतवन्तः । इन्द्रोऽपि वायतस्य वयत. पुत्रस्य पाशद्युम्नस्य द्वितीयार्थे षष्ठी । तमविहाय सुदासो यज्ञे सुतात् सोमाद् हेतोः वासिष्ठान् वसिष्ठपुत्रानवृणीत $ पाशद्युम्नस्य सोमयागे चमसस्थ सोम पिबन्नपीन्द्रस्तं तिरस्कृत्य मन्त्रसामर्थ्ये ( बले ) न सुदासो यज्ञ आवाहनकाले वासिष्ठानाजगाम । दशमं मन्त्रमारभ्य चतुर्दशं यावत्तु वशिष्ठपुनर्देहग्रहणादिकमुक्तम् । नात्र त्रित्सूना विजयो मन्त्रबलेन जात इत्युक्तम् । अयं मंकडानलोऽन्येऽपि पाश्चात्त्यास्तदनुयायिनश्चयान् ग्रन्थानाश्रित्यंव किञ्चित् प्रकल्पयन्ति तेषां च स्वकल्पनानुकूलाशानां प्रामाण्यमप्रामाण्य चेतराशानामभ्युपयन्ति । तच्च कुक्कुट्या अर्को भागः पाकायापरश्च प्रसवाय यथा कल्पेत, तथार्धजरतीयमनुसरन्तो दृश्यते । यदि ऋग्वेदस्य प्रामाण्यमभ्युपेयते तदा तदन्तर्गतस्य दशम- मण्डलस्यापि प्रामाण्यमेव । तत्र च पुरुषसूक्ते चातुर्वण्यं जन्मनैवोक्तम् । यथा परमेश्वरस्य मुखबाहुभ्यां ब्राह्मणक्षत्रिययो- रुत्पत्तिस्तथैव शूद्रस्यापि परमेश्वरस्य पद्भ्यामुत्पत्तिरुक्तैव । तथा च पूर्वं जातयो नासन् पश्चात् कल्पिता इति च कल्पनैव । यदि च दशमस्य प्रामाण्यं नास्ति तदान्याशानामप्यप्रामाण्यापत्त्या त्वत्कल्पनापि निर्मूलैव । त्वदभिमता कल्पनाओ में अनेक प्रकार के दोष देखने को मिलते है । ऋग्वेद के ८ ३३ सूक्त मे वसिष्ठ और उसके पुत्रो के साथ इन्द्र का संवाद ,है यह बात अनुक्रमणिका के आधार पर ज्ञात होती है । इसका ऋषि वसिष्ठ । वसिष्ठ के पुत्रों की स्तुति होने से वे ही इस सूक्त के देवता है । 'दूरादिन्द्र० ' इस मन्त्र में बताया गया है कि जब वसिष्ठ के पुत्र राजा सुदास का यज्ञ करा रहे थे, उसी समय पागद्युम्न नाम का राजा भी सोम याग करने लगा । वसिष्ठ के पुत्रो ने उसके याग का तिरस्कार कर दिया और उसके याग में सोमवान के लिये आये इन्द्र को अपने मन्त्रो के बल से उम याग से हटा कर सुदास के यज्ञ में बुला लिया । इसी बात की चर्चा करते हुए वसिष्ठ अपने पुत्रो की इस मन्त्र से स्तुति करते थे । यहाँ पर वेशन्त पद से सोम जिसमे रक्खा जाता है, उस चमस पात्र का ग्रहण किया जाता है । उस चमस पात्र मे सोमपान करते हुए उग्र स्वभाव वाले इन्द्र को पाशद्युम्न के यज्ञ से दूर कर राजा सुदास के लिये किये जाने वाले यज्ञ मे वशिष्ठ के पुत्रो ने अपने मन्त्रबल से बुला लिया । इन्द्र भी वयत के पुत्र पाशद्युम्न के यज्ञ को छोड कर सुदास के यज्ञ में सोम की आहुति दे रहे वशिष्ठ पुत्रो के पास चला आया । अर्थात् पाशद्युम्न के सोम याग मे चमस पात्र में स्थित सोम का पान करता हुआ भी इन्द्र उसको छोडकर मन्त्र की सामर्थ्य से सुदास के यज्ञ मे आवाहन करते ही चला आया । इस सूक्त के दसवें मन्त्र से चौदहवें मन्त्र तक वशिष्ठ के पुनः देह-ग्रहण की बात है । यहाँ पर मन्त्र के बल से त्रित्सुओ पर विजय पाने की बात की कही भी कोई चर्चा नही है । मैकडानल और इसी तरह के इसके अनुयायी अन्य पाश्चात्य विद्वान् जिन ग्रन्थो के आधार पर कुछ कल्पनाएँ करते हैं, उनमें से अपनी कल्पना के अनुकूल अशो को तो प्रमाण मानते है और विपरीत अंशो को अप्रमाण घोषित कर देते है । उनका यह व्यापार अर्धजरतीय न्याय का उदाहरण है । जैसे कि कोई मुर्गी का आधा भाग पकाने के लिये और आधा भाग अंडा देने के लिये रखना चाहता हो, उसी तरह का इन पाश्चात्यो का यह प्रयत्न भी उपहास का ही विषय हो सकता है । यदि आप ऋग्वेद को प्रमाण मानते है, तो उसके अन्तर्गत विद्यमान दशम मण्डल को भी प्रमाण मानना ही पडेगा । वहाँ पर पुरुष सूक्त मे जन्म से ही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का प्रतिपादन किया गया है । जैसे परमेश्वर के मुँह और बाहु से ब्राह्मण और क्षत्रिय की उत्पत्ति बताई गई है, उसी तरह से शूद्र की भी उत्पत्ति परमेश्वर के पैर से बताई गई है । इस तरह से यह कहना कि पहले जातियाँ नही थी, बाद में उनकी कल्पना की गई, यह बात कोरी कल्पना के सिवाय क्या हो सकती है? यदि दशम मण्डल का प्रामाण्य नही है, तो अन्य अंशों का भी प्रामाण्य क्यों
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११३४ वेदार्थपारिजातः अशाः सत्यार्थप्रतिपादका अन्ये चातथाभूता इत्यत्र शपथमन्तरा कि प्रमाणम् । तत्रैव ऋग्वेदे 'वाचा विरूप नित्यया' (ऋ० सं० ८।७५।६) इति मन्त्रे वेदवाचां नित्यत्वमुक्तम् । स एक एव मन्त्रः सर्वा अपि त्वत्कल्पनाः समूलमुन्मूलयति । पूर्वोक्तः ७।३३ मन्त्रस्तु त्वद्रीत्यापि प्राचीनांशगतः । द्वितीयमारम्य सप्तम यावत् षण्णां मण्डलाना त्वयापि प्राचीन- त्वाम्युपगमात् । तत्र च मन्त्रबले ने वेन्द्रस्य द्वरादानयनमुक्तम् । इन्द्रश्च देवराजो महेश्वर्यवान् । स कथमन्यथा मनुष्ये- च्छया बलादन्यत्र नीयेत । तस्मादार्याणामभारतीयत्वमादिवासिनामुपरि तेषामाक्रमणं पराजित्य तेषा दस्युत्वेन दासत्वेन शूद्रत्वेन च तिरस्करण तेभ्य आत्मनामुत्कृष्टतमत्वव्यवस्थापनमित्यादिकं सर्वमपि मैकडानलस्यानल्पजल्पन निर्मूलं प्रलपनमेव, प्रमाणाभावात् । नहि प्रतिज्ञामात्रेण वस्तुसिद्धिः । यदपि- 'विवाहे उत्सवे च गोमाससमर्पणम् ' तदपि निर्मूलम् 'मा गामनागामदिति वधिष्ट (ऋ ० सं ० १०।१०१।१५ ) इति गोवधनिषेधात् । अध्या (ऋ० स ० १।२२।२७ ), अध्न्या (ऋ० सं० ७/७/४ ) इत्यृग्वेद एव मवामध्यत्वोक्तेः ॥ तथा च महाभारतम् -' अध्न्या इति गवां नाम के एता हन्तुमर्हति' इति ॥ एवमेवान्या अप्यनुमाना- भासमाश्रिता मैकडानलस्य बह्वयः कल्पना निरस्ता वेदितव्याः । एवमेव सामवेदसम्बन्धेऽपि तत्कल्पना निराधारा एव । ' यदप्युक्तम्– यजुर्वेदस्य भौगोलिकं क्षेत्रमृग्वेदाद्भिन्नतयैव परिचीयते । तत्रत्यं भारतीयं धार्मिक सामाजिक जीवनमेव नवयुगं सङ्केतयति । यजुर्वेदसमये वैदिक सभ्यतायाः केन्द्र सुदूरपूर्वभागेऽवस्थितमुपलभ्यते । सिन्धु- तत्सहगामिनीनां सरितां वर्णनमत्र नोपलभ्यते । यजुर्वेदीयसंहितायां ब्राह्मणग्रन्थेषु कुरुक्षेत्रं शतद्रुयमुनयोर्मध्यस्थिता ', - भूमिः पवित्रतमाऽभ्युपेयते इत्यादिकम् तदपि यत्किञ्चित् वेदानां धर्मं ब्रह्मप्रतिपादकत्वेन भूगोलनिघण्टुशब्दकोष रूपत्वाभावेन तददोषात् । माना जाय और इस तरह से उनके आधार पर की गई आपको कल्पना भी कैसे प्रमाण मानी जा सकेगी? आपके अभिमत अंश तो प्रमाण हैं और अनभिमत अंश प्रमाण नहीं हैं, इसमें आपकी बात के सिवाय और क्या प्रमाण है । उसी ऋग्वेद में 'वाचा विरूप नित्यया' यहाँ पर वेद वाणी को नित्य माना गया है । यह एक मन्त्र ही आपकी सारी कल्पनाओ को जड़ से उखाड़ फेंकता है । पूर्वोक्त मन्त्र आपके मत से भी प्राचीन अंश में विद्यमान है । आप दूसरे से सातवें तक के मण्डलों को प्राचीन मानते है । वहाँ पर मन्त्र की सामर्थ्य से इन्द्र को दूर से बुला लेने की बात कही गई है । देवराज इन्द्र महान् ऐश्वर्य वाला है । वह मनुष्य की इच्छा से कैसे अन्यत्र ले जाया जा सकता है? इसलिये आर्य अभारतीय हैं, उन्होने यहाँ के आदिवासियो पर आक्रमण कर उनको पराजित किया और दस्यु, दास और शूद्र नाम देकर उनको अपमानित किया, तथा उनसे अपने को उच्च घोषित किया, इस तरह की मैकडानल की सारी बातें प्रमाण के अभाव में प्रलापमात्र है । केवल प्रतिज्ञा कर लेने से किसी वस्तु की सिद्धि नहीं हो जाती । इसी तरह से विवाह और अन्य बडे उत्सवो पर अभ्यागतो को गोमास प्रस्तुत करने की ( पृ० १५२ ) बात भी निर्मूल | 'मा गामनागा ० ' इस मन्त्र में गोवध का स्पष्ट निषेध है । ॠग्वेद में गाय को अवध्य माना गया है । महाभारत में भी कहा गया है कि 'अघ्न्या यह गायों का नाम है, इनको कोन मार सकता है । इसी तरह के गलत अनुमानों के आधार पर कल्पित मैकडानल की अन्य बहुत सी बातें भी प्रमाणरहित ही मानी जायगी । सामवेद संबन्धी (पू० १६० - १६२ ) उसकी कल्पनाएं भी इसी तरह निराधार माननी चाहिये । यजुर्वेद के संबन्ध में मैकडानल ने कहा है- 'यजुर्वेद न केवल ऋग्वेद से भिन्न भौगोलिक क्षेत्र से ही हमें परिचित कराता है, अपितु भारतीय धार्मिक एवं सामाजिक जीवन के एक बिलकुल नये युग की सूचना देता है । अब वैदिक सभ्यता का केन्द्र देश के सुदूर पूर्वभाग में अवस्थित पाया जाता है । अब हमें सिन्धु नदी तथा उसकी सहगामिनी सरिताओं का वर्णन नही मिलता । यजुर्वेद संहिता तथा तत्संबन्धी ब्राह्मण ग्रन्थों में जिस भूमि को परम पवित्र बताया है, वह है कुरुक्षेत्र, जो सतलज और यमुना के मध्य स्थित है' ( पृ ० १६२) । यह पूरा कथन भी गलत है, क्योकि वेद तो धर्म और ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं, अतः उनमें भूगोल आदि का वर्णन हो अथवा निघण्टु, शब्दकोष आदि का वे प्रतिपादन करते हो, ऐसा न होने से उक्त दोषों का यहाँ कोई प्रसंग ही नहीं है ।
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वेदार्थपारिजातः ११३१ मैक्समूलरप्रभृतिभि सस्कृतजेन्दले टिन ग्रीकप्रभृतिभाषासु साम्यबाहुल्योपलम्भात् तद्भाषाभाषिणा पूर्वजाः क्वचिदेकत्रैव देशे निवसन्ति स्मेति परिकल्पितम् । तत एव ये समूहा यावताशेन विप्रकर्षमुगगताः क्रमेण तद्भाषासु वैषम्यमुपगतम् । संस्कृतादयो भाषा भगिन्य एव । आसा मातृभूता काचिदार्यभाषासीत्, तद्भाषिणश्चार्या आसन् । तत एव केचित्सुदूरपश्चिमाभिमुखा यूरोपमुपगताः । केचिदीरानदेशमुपगता: । अपरे सप्तसिन्धूनुपागम्य हिन्दवः सञ्जाताः । तद्रीत्या भारतवर्षे आर्याः ३५००-४००० वर्षेभ्य वाक् पश्चिमोत्तरस्मादेशियाप्रदेशात् समागताः । ततः प्राग् मध्य एशियाप्रदेशवास्तव्या आसन् । सख्यावृद्ध्या खाद्यसामग्रीणां न्यूनतादिहेतोस्तत्रावासकाठिन्यात्त ततः सङ्घ- बद्धास्तत्र तत्र गताः । हिन्दूना सर्वोत्तमो निधिर्वेदा विशेषत ॠग्वेदो न केवलमार्याणा किन्तु समस्तभूमण्डलस्य सर्वप्राचीनो ग्रन्थः । येन चतुःसहस्रवर्षप्राचीनजीवनविषयेषु बहूनि ज्ञातव्यानि ज्ञायन्ते । तद्रीत्या वेदाद् अवेस्ता-ग्रन्थाच्च आर्यसस्कृतेः परिचयो जायते । येषामिमो ग्रन्थी प्रसिद्धौ तेषां बहुकालपर्यन्त सहवासः समानश्चेतिहास आसीत् । प्राचीना आर्या गवादिपशून् पालयन्ति स्म । तदर्थं विस्तृतप्रदेश आवश्यक आसोत् । तदानी हिमाधिक्याद् हिमशब्देन वर्षगणना भवति स्म । ग्रीकदेशेऽपि हिमशब्द उपलभ्यते । हिमतरणं दुर्गममासीत् । अत एव पूर्व ' शत हिमाः' इति पश्चात् 'शरद: शतम्' । ऋग्वेदे -' तद्वो यामि द्रविण सद्य ऊतयो येना स्वर्ण ततनाम नृरभि । इदं सु मे मरुतो हर्यता वचो यस्य तरेम तरसा शत हिमाः ॥' (ऋ० स० ५।५४।१५ ) । एवमेव 'शत हिमाः तरेम' । ऋग्वेदे बृहतीनां नावा चर्चा दृश्यते । तेन नावा' गमनागमनानुकूलजलसमूहोऽपि कल्पयितुं शक्यते । अश्व- पिप्पल- सोमवर्णनात् यूरोपीयैस्तदनुगुणो देशो हिन्दुकुशपर्वतस्य परस्ताद् भागः कस्पियन्- समुद्रस्य निम्नभागो वा पामीरपर्वतोपत्यकास्थानमेव वा निश्चीयते । तत एव शकादिजातीयैणक्रमणं कृतम् । पारसीकानां धर्मग्रन्थे अवेस्ताख्ये प्रथममानवसृष्टिर्बाह्लोकप्रदेशे वर्णिता । अत: ' ' ( )एव आर्याणां मूलदेश स एव मन्यते । वेदे तु तच्चर्चा न दृश्यते । गान्धारीणामिवाविका ऋ० सं० मैक्समूलर प्रभृति पाश्र्चात्य विद्वानो ने संस्कृत, जेन्दावेस्ता, लैटिन, ग्रीक प्रभृति भाषाओ मे परस्पर बहुत समानता देखकर यह कल्पना की है कि इन भाषाओ को बोलने वालो के पूर्वज कभी किसी एक ही स्थान मे रहते थे । इनमे से जो समूह जितनी दूर चला गया उनकी भाषाओ में उतना ही अन्तर आ गया । संस्कृत आदि ऊपर निर्दिष्ट भाषाएँ परस्पर बहिनें है । इन सबकी जननी कोई आर्य भाषा थी, जिसके बोलवे वाले आर्य कहलाते थे । इन्ही मे से कुछ सुदूर पश्चिम यूरोप चले गये, कुछ ईरान चले गये, और अन्य सात नदियों के देश भारत में आकर हिन्दू कहलाने लगे । इनके मत से आर्य आज से कोई ३५००-४००० सो वर्ष पहले पश्चिमोत्तर एशिया से यहाँ आये । इससे पहले वे मध्य एशिया में रहते थे । जनसंख्या बढ़ जाने पर और खाद्य सामग्री की कमी पड जाने से वहां बसना कठिन हो जावे से वे अनेक समूहो में इधर-उधर चले गये । हिन्दुओ की सर्वोत्तम निधि वेद, विशेषतः ऋग्वेद न केवल आर्यों का, किन्तु समस्त भूमण्डल का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है । इससे चार हजार वर्ष पहले के जीवन के विषय में अनेक तरह की जानकारी मिलती है । उनके मत से वेद से और अवेस्ता से आर्य संस्कृति का परिचय प्राप्त होता है । जिनके ये दोनों ग्रन्थ है, वे बहुत समय तक एक साथ रहे है और इन दोनों का इतिहास एक सरीखा है । प्राचीन आर्य गाय प्रभृति पशुओं को पालते थे । इसके लिए बड़े- बड़े मैदानों को आवश्यकता थी । उस समय हिम (बर्फ) की अधिकता थी, अतः हिम शब्द से ही वर्ष की गणना होती थी । ग्रीक देश में भी हिमकाल शब्द मिलता है । हिम को पार करना कठिन कार्य था । इसीलिए पहले हिम शब्द का और बाद में शरत् शब्द का प्रयोग मिलता है । ऋग्वेद में 'तद्वो यामि', 'शतं हिमाः' आदि अनेक मन्त्रो में हिम शब्द इसी अर्थ में मिलता है । ऋग्वेद में बडी - बड़ी नावों का उल्लेख मिलता है । इससे इन बडी- बड़ी नौकाओ के जाने-आने लायक जल की भी कल्पना की जा सकती है । अश्व, पिप्पल और सोम का वर्णन देखकर यूरोपीय विद्वान् इसी तरह के हिन्दुकुश पर्वत के आगे के प्रदेश को, किसी समुद्र के किनारे की नीची भूमि को, अथवा पामीर पर्वत की तलहटी को ही यह स्थान मानते है । बाद में भी यही से शक आदि जातियों ने भी भारत पर आक्रमण किया था । पारसियों के धर्मग्रन्थ अवेस्ता में मानव की प्रथम सृष्टि बाह्लिक ( वलख ) प्रदेश में मानी गई है । इसीलिये उसी को आर्यों का मूल देश माना जाता है । वेद में इसकी चर्चा नही है । 'गान्धारीणामिव' ई इस
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वेदार्थपारिजान ११३६ इत्यादा ऊर्णावतीनां मेषीणा वर्णनात् सप्तसिन्धूना गङ्गायमुनासरस्वन्यादीनां च वर्णनाद् एकलया अवेस्ताग्रन्थस्य गाथया सन्दिग्धार्थनिर्णयोऽशक्य एव । कुतश्चाचार्यैः स देशस्त्यक्तः? सर्वथा चार्यशून्यः स देशः कुतः संवृत्तः? सप्तसिन्धवस्तु वेदे बाहुल्येन वर्ण्यन्ते । वायविलदृष्ट्या ८५०० वर्षीयैव विश्वसृष्टिरभ्युपेयते पाश्चात्त्यैस्तत एव ते न ततः परस्ताद्वेदकालमभ्युपगन्तुं शक्नुवन्ति । अविनाशचन्द्रदासमहोदयस्य दीनानाथचुलेटप्रभृतीनां त्वनेकलक्षवर्षेभ्यः प्राग्वेदानामुत्पत्तिरभिप्रेता । मनुव्यासप्रभृतयस्त्वनादिनिधनं नित्य वेदमङ्गीकुर्वन्ति । 'सूर्यामा वहतुः प्रागात् सविता यमवासृजत् । अघासु हन्यन्ते गावोऽजुन्यो पर्युह्यते ॥ ' (ऋ० सं ० १०।८५।१३ ) । मघानक्षत्रे सूर्यस्य द्वे गावो सोमगृहनयनाय फाल्गुन्योः दण्डः प्रताडयेत 1। अनेन ज्योतिषसम्बन्धितत्त्वेन मन्त्रस्यातिप्राचीनता सिद्ध्यति । जनश्रुतिभिर्ऋषीणा दीर्घाभिः स्मृतिभिश्व प्रलम्बमानकालः स्मर्यते । वृत्र हत्वा सप्तसिन्धुष्विन्द्रेण जलं प्रवाहितम् एष इन्द्रस्य प्रथमः पराक्रम । एव सत्यपि वेदमन्त्रेषु वैदिकाना देशान्तरादागमन न मर्यते । सिन्धु -विपाशा ( व्यास) -शुतुद्रि ( सतलुज ) -वितस्ता ( झेलम ) -असिक्नी ( चिनाव ) - परुष्णी ( रावी ) -सरस्वती- दृषद्वती गङ्गा- यमुनाद्याश्च वेदे वर्ण्यन्ते । पाश्चात्त्यानां दृष्ट्या वेदे समुद्रवर्णनं नास्ति । सिन्धुशब्दस्तु सिन्धुनदीबोधको न समुद्रबोधक इति, तदपि यत्किञ्चित्, 'वातस्याश्वो वायोः सखाड्यो देवेषितो मुनिः । उभौ समुद्रावा क्षेति यश्च पूर्व उतापरः ॥ ' ( ऋ ० सं ० १० । १३६ । ५) वायुभोक्ता द्योतमानसूर्यसदृशदेहो वायोः सखा करिक्रतनामकषिरुभौ समुद्री गच्छति । कौ द्वौ समुद्राविति तत्राह-यश्च पूर्व उतापि अपरः । ' शयः समुद्रांश्चतुरोऽस्मभ्यं सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणः ॥' (ऋ० सं० ९ ।३३।६ ) हे सोम! धनपूर्णान् चतुरः समुद्रान् सहस्रिणः कामानामस्मभ्यम् आपवस्व देहि । 'यः पृथिवी व्यथमानामदृहद् यः पर्वतान् प्रकुपिता अरम्णात् । यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तस्नात् स जनास इन्द्रः ॥ ' ( ऋ ० २।१२ २ ) हे जनासः, स इन्द्रो यो व्यथमानां पृथिवीमद् हद् यः प्रकुपितान् पर्वतान् अरम्णात् योऽन्तरिक्षं विममे यश्च द्यामस्तभ्नात् । अवेस्ताग्रन्थेऽपि -' ह्यत ता उर्वाता सशया वामञ्च दाद्यो ददाता वीति चा अनीति चा अत एपि ताईश अघहती उश्ता गाथा मजूदेव मह्यम् ॥ ' द्वावात्मानो प्रत्तौ तयोर्य उत्कृष्टः स धर्मं सङ्केतयति । यो निम्नः सोऽनीति ऋङ्मन्त्र में ऊन वाली भेडो का वर्णन मिलने से, सात नदियों और गंगा-यमुना-सरस्वती आदि नदियो का वर्णन मिलने से अकेले अवेस्ता ग्रन्थ के आधार पर संदिग्ध अर्थ का निर्णय नही हो सकता । आर्यों ने उस देश को क्यो छोड दिया? वह प्रदेश सर्वथा आर्यों से शून्य कैसे हो गया? सात नदियों का हो वर्णन वेद में ज्यादा मिलता है । वाइविल के अनुसार पाश्चात्य विद्वान् इस सृष्टि की आयु ८५०० वर्ष की मानते है । इसलिये इससे पहले वे वेद का समय कभी नहीं मान सकते । अविनाशचन्द्रदास और दीनानाथ चुलेट प्रभृति भारतीय विद्वानो की दृष्टि में तो लाखों वर्ष पहले वेदों की उत्पत्ति हुई थी । मनु, व्यास प्रभृति प्राचीन आचार्य तो वेद को अनादि, अनन्त अत एव नित्य मानते है । ' सूर्याया वहतुः' इस ऋमन्त्र में मघा नक्षत्र में सूर्य की दो गायो को सोम के घर ले जाने के लिए दो फाल्गुनी नक्षत्रों के दण्ड से ताडित कराने का वर्णन है । इस ज्योतिष सबन्धी तात्त्विक वर्णन से इस मन्त्र का अतिप्राचीनता सिद्ध होती है । जनश्रुति के आधार पर और ऋषियों की लम्बी स्मृतियो के आधार काल की बडी लम्बी सीमा मानी जाती है । वृत्र को मारकर इन्द्र ने सातों नदियों में जल भर दिया । यह इन्द्र का पहला पराक्रम का कार्य था । इन सब बातों के रहते हुए भी यह कहीं भी नही सुना गया है कि वैदिक आर्य कहीं बाहर से यहाँ आये है । सिन्धु, व्यास, सतलज, झेलम, चिनाव, रावी, सरस्वती, दृषद्वती, गंगा, यमुना का वर्णन वेद मे मिलता है । पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि से वेद मे समुद्र का वर्णन कही नही है । सिन्धु शब्द से सिन्धु नदी का बोध होता है, समुद्र का नही, यह कथन भी व्यर्थ की बात है, क्योकि ' वातस्यावो०', 'राय समुद्रा० ', 'पृथिवी व्यथमाना०' इत्यादि ऋङ्मन्त्रों में स्पष्ट ही समुद्र का वर्णन मिलता है । यहाँ पर प्रथम मन्त्र में दो समुद्रो का और द्वितीय मन्त्र में चार समुद्रों का वर्णन है । अवेस्ता ग्रन्थ में भी 'हात ता' इत्यादि गाथा में दो तरह की आत्माओं का वर्णन है । इनमें जो उत्कृष्ट है, उसकी धर्म की ओर तथा निकृष्ट आत्मा की पाप की ओर प्रवृत्ति बताई गई है । वेद की तरह अवेस्ता में भी सोमपान की प्रथा विद्यमान है । वहाँ
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वदार्थपारिजातः ११३७ नयति । सोमपानप्रथा वेद इव अवेस्ताग्रन्थेऽपि । होमशब्देन सोमोऽत्र वर्णितः । ऋग्वेदेऽग्निवरुणादयोऽनेके देवाः सन्ति, - ' ' ( ) परन्तु एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ऋ० स ० इत्येकेश्वरवादे सर्वेषामन्तर्भावः श्रूयते । सर्वथापि वेदे बहिर्देशादार्याणामागमन न विद्यते । तद्रीत्यापि बहिर्देशादागमन न सिद्ध्यति । पाश्चात्याना रोत्या आर्याणा भारता-. गमनकाल ३५००-४००० वर्षेभ्यः प्राक् । स एव च वेदनिर्माणकालः । तथा च कथ न तत्स्मरण वेदे तद्वर्णन च कथं न स्यात् । तस्मान्मिथ्यैव सा कल्पनेति मन्तव्यम् । यदुक्तम्-'यजुर्वेदसंहिता मूलतोऽष्टादशाध्यायात्मिकैवासीत्' इति, तत्तु बेवरमतसमीक्षाप्रसङ्गे निराकृत- मेव । रुद्रशिवमहादेवादिसम्बन्धिनी दुष्कल्पनापि तत्रैव निरस्ता । यदपि -' अप्सरसा वर्णन वेदोत्तरकालीनपौराणिक- साहित्येषु विख्यातम् । ऋग्वेदे यद्वर्णनमत्यल्पमेव, परन्तु यजुर्वेदे तद्गौरवं विस्तृतम्' इति, तत्तुच्छम्, वेदाना प्रामाण्य- स्वतस्त्ववर्णनेन तत्प्रतिपादितस्यार्थस्य तथैवाभ्युपगन्तव्यत्वात् । अन्यथा नेत्रदृष्टे रूपेऽपि शङ्कासम्भवात् । यदुक्तम्— 'ऋग्वेदे ब्रह्मशब्दस्य तात्पर्य भक्तावेवासीत्• परस्तात् तु तदर्थो विस्तरेण पवित्रताया वन्दनायाश्च मूलतत्त्वबोधकता ', जाता इति तदपि तुच्छम् ब्रह्मशब्दस्य भक्त्यर्थत्वे मानाभावात् । शब्दार्थसम्बन्धाना नित्यत्वाभ्युपगमेन विकासायोगाच्च । यदपि -'ऋग्वेदकालापेक्षया यजुर्वेदकाले देवपूजाप्राधान्य- यज्ञानुष्ठानप्राधान्ययोः प्रातिलोम्यं जातम् । ऋग्वेदेऽर्चाविषया देवता भवन्ति स्म । यासा हस्ते मानवजातेरनुग्रहसामर्थ्यमासीत् । यज्ञयागादयस्तु तत्प्रसादप्राप्ति- साधनमात्रम् । यजुर्वेदे तु यज्ञविचारानुष्ठानानामेव प्राधान्य जातम्, तेषामनुष्ठानसूक्ष्मताया एव सर्वोपरि मान्यता होम शब्द से सोम का वर्णन मिलता है । ॠग्वेद में अग्नि, वरुण प्रभृति अनेक देवताओ का वर्णन है, किन्तु 'एकं सद्विप्रा:' इस ऋ मन्त्र के अनुसार एकेश्वरवाद मे उन सबका अन्तर्भाव हो जाता है । इन सब वर्णनो के रहते हुए भी कही भी वेद में आयों के बाहर से आने की बात की चर्चा नही है । पाश्चात्य विद्वानो के मत के अनुसार भी आर्यों के बाहर से आने की बात सिद्ध नही हो पाती । उनके मत से आर्यों के भारत आगमन का काल आज से ३५००-४००० वर्ष पहले का है । यही काल उनके मत से वेद की रचना का भी है । आर्यों के आगमन का और वेद की रचना का जब एक ही समय है, तब इन मन्त्रो के रचयिताओ को इसका स्मरण रहना चाहिये था और उनमे इस बात का उल्लेख भी मिलना चाहिये था । ऐसा नही है, अतः पाश्चात्यो की यह सारी कल्पना झूठी है । 'यजुर्वेद संहिता मूलतः केवल १८ अध्यायों की थी' (पृ० १६५ ) इस बात का खण्डन हम बेवर के मत की समीक्षा करते समय कर चुके है । रुद्र, देव, महादेव संबन्धी निराधार कल्पनाओं का भी खण्डन हम वहीं कर चुके है । इसी तरह से —' अप्सरा नाम की जलजात देवियाँ अपने ललनोचित मोहक सौन्दर्य के लिये वेदोत्तरकालीन पौराणिक साहित्य में सुविख्यात है, इनका ऋग्वेद में बहुत ही कम उल्लेख है, परन्तु वे भी यजुर्वेद मे अधिक गौरव पा गई है ' ( पृ० १६८) यह कथन भी गलत है, क्योंकि वेद स्वतः प्रमाण है, अतः उसमें प्रतिपादित अर्थ को उसी रूप मे स्वीकार करना चाहिये । अन्यथा अपनी आंखो से देखे गये रूप में शंकाहोने लगेगी । 'ऋग्वेद में 'ब्रह्म' शब्द का तात्पर्य केवल 'भक्ति' होता था और आगे चल कर उसका अर्थविस्तार हो यह पद 'पवित्रता एवं वन्दना मूलतत्त्व' इस तात्पर्य का बोधक बन गया' ( पृ० १६८- १६ ९ ) यह बात भी गलत है, क्योकि 'ब्रह्म' शब्द का तात्पर्य 'भक्ति' है, इसमें कोई प्रमाण नही है । शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध ये सब नित्य माने जाते है । अतः इनके विकास का कोई प्रसंग ही नही रह सकता । 'ऋग्वेद काल की अपेक्षा यजुर्वेद काल में देवताओं की पूजा के प्राधान्य और यज्ञानुष्ठान के प्राधान्य में प्रातिलोम्य हो गया-- जो ऋग्वेद काल में गौण था वह उत्तर काल में प्रधान हो चला तथा जो पूर्वकाल में प्रधान था परवर्ती काल में वह अप्रधान हो गया । ऋग्वेद में अर्चा के विषय देवता होते थे, जिनके हाथ में मानव जाति पर पर अनुग्रह करने का सामर्थ्य था और यज्ञ -याग आदि १४३
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वेदार्थपारिजातः११३८ जाता । यज्ञशक्तिरेवं वृद्धिमुपगता यया न केवल देवता प्रभाव्यन्ते स्म 3 किन्तु पुरोहिताना सङ्कल्पानुसारेणाभीप्सितफल- प्रदानार्थं देवता बाध्यन्त इत्यवगम्यते । देवतास्तु ब्राह्मणानां प्रायो मुष्टिगता:' इति, तत्सर्वमपि प्रतिज्ञामात्रम्, हेत्व- भावेनैव निरस्तत्वात् । अपौरुषेयत्वेनापास्तसमस्त पुंदोषत्वेन यजुर्वेदस्यापि वेदत्वाविशेषात् । समन्वितार्थावगमाय - - यत्नकर्तव्यत्वौचित्यात् । व्यास- जैमिनि शबर- शङ्कर-कुमारिल सायणादिभिः समस्तस्यैव वेदराशेः समन्वयेनार्था वधारणाच्च । देवताश्च न स्वत एव निग्रहमनुग्रह वा कुर्वन्ति तेषामाप्तकामत्वेन वैषम्याद्यभावात् । यजनादिभिरनु-कूलिता इष्टं सम्पादयन्ति, प्रतिषिद्धाचरणेन प्रतिकूलिता निगृह्णन्तीति । यज्ञानुष्ठानमपि न देवार्चातिरिक्तम्, ' यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु ' इति धातोनिष्पन्नत्वात् । यदपि - 'पुरोहिता बाह्यविधिभिः प्रलम्बमानजटिलप्रयोगान् कुर्वन्ति स्म । यस्य महत्त्वं रहस्यमयादृष्ट-रूपेण परिकल्प्यते स्म । एतेष्वनुष्ठानानां लघुलघुषु विधिषु बहुबलं दीयते स्म । एवं निरन्तर यागानुष्ठानगलग्रह-वातावरणेन ऋग्वेदप्रतिपादितायाः सत्यधर्मभावनाया जीवनं दुःशक जातम् । देवतानां शक्तिपूजन देवानुग्रहमहत्ता निजापराधचेतनाश्च परिलोप गतानि । सर्वा अपि प्रार्थनाः कस्यचिदनुष्ठानस्य सहकारिण्यस्तथा भौतिकाभ्युदय-मेवाभिलक्ष्यानुप्राणिता जाता । तत्परिणामे यजुर्वेदस्य प्रयोगेषु पदानां भीषणा आवृत्तयः प्रवृत्ता । यत्रैकस्यैवार्थस्य प्रकारान्तरेण पुनरुक्तयश्चलन्ति । दुर्बोधव्यञ्जनानामर्धवर्णानां प्रणवसहितानां पुनरुच्चारणप्राय प्रयोगस्वरूप सम्पन्नम् । यथा मैत्रायणीसंहिताया निम्नोद्धरणम्- "निधायो वा निधायो वा ओं वा ओ वा ओ वा ओ वा ए ऐ ओं स्वर्णज्योति ' इति । अत्रार्थप्रतिपादक स्वर्णज्योतिरित्येव पदम् । देवताओ का प्रसाद प्राप्त करने के साधन मात्र थे, परन्तु यजुर्वेद में यज्ञ ही विचार एवं अनुष्ठान का केन्द्र हो चला और उसी के विधिवत् अनुष्ठान तथा प्रयोग की सूक्ष्मता सर्वोपरि मान्यता का विषय बन गई । यज्ञ की शक्ति इतनी बढ गई कि उनके द्वारा न केवल देवता प्रभावित ही होते थे, परन्तु पुरोहित के संकल्प के अनुसार देवता अभीप्सित वर प्रदान के लिये बाध्य भी समझे जाते थे । यज्ञ के द्वारा, यो कहा जा सकता है, देवता तो ब्राह्मणो की मुट्ठी मे थे ' (पृ० १६ ९ ) यह सारा कथन भी केवल कहना ही कहना है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नही दिया गया है । बिना प्रमाण की कोई बात कैसे मानी जा सकती है? यजुर्वेद भी अपौरुषेय है, अतः इसमें पुरुषो में विद्यमान किसी दोष को कैसे माना जा सकता है? जहा परस्पर विरोध प्रतीत होता हो, वहां पूर्वापर प्रकरण मे समन्वय करने के लिये प्रयत्न करना चाहिये । व्यास, जैमिनि, शबर, शंकर, कुमारिल, सायण प्रभृति ने समस्त वेदराशि का समन्वय के आधार पर ही अर्थ निर्धारित किया है । देवता स्वत' निग्रह या अनुग्रह नहीं करते । वे तो आप्तकाम है, अर्थात् उनके सभी मनोरथ स्वत सिद्ध हो जाते हैं, अतः उनमें वैषम्य दृष्टि, अर्थात् किसी जीव पर अनुग्रह करना और किसी पर नही, इस तरह की विषमता नही मानी जा सकती । यज्ञ आदि पुण्य कार्यों के अनुष्ठान से प्रसन्न होकर ये अनुष्ठाता की इच्छा को पूरी करते है और निषिद्ध पाप कर्मों के आचरण से नाराज होकर ये पापी को उसके दुष्कृत्यों की सजा देते हैं । यज्ञ का अनुष्ठान भी देवता की पूजा के सिवाय और कुछ नही है, क्योंकि यज्ञ शब्द की निष्पत्ति ' यज्' धातु से होती है, जिसका कि एक अर्थ ' देवपूजा' भी होता है । 'पुरोहितों का दल कई बाह्य विधियों के लम्बे एवं जटिल प्रयोगों को करता था, जिसका महत्त्व रहस्यमय अदृष्ट के रूप -में परिकल्पित होता था और इसी कारण अनुष्ठान विधि की छोटी से छोटी प्रक्रिया पर भी बहुत बल दिया जाता था । इस प्रकार के निरन्तर यज्ञ-यागादि अनुष्ठान के गलाघोट् वातावरण के द्वारा ऋग्वेद में प्रतिपादित सच्ची धार्मिक भावना का जीवित रहना संभव न रहा । देवताओ की शक्ति की अर्चा, उसके अनुग्रह की महत्ता तथा निज अपराध की चेतना सर्वथा लुप्त हो चली और हर प्रार्थना किसी न किसी अनुष्ठान की सहचारिणी हो भौतिक अभ्युदय के एकमात्र लक्ष्य से अनुप्राणित हो गई थी । इसका सहज परिणाम यह हुआ कि यजुर्वेद के प्रयोगों में पदों की भीषण आवृत्ति तथा एक ही अर्थ की प्रकारान्तर से पुनरुक्ति ने अपना घर कर लिया था. यहाँ तक कि दुर्बोध व्यंजनों अथवा अर्ध वर्णों का प्रणव सहित पुनरुच्चारण मात्र ही प्रयोग का स्वरूप बन गया । मैत्रायणी संहिता में उद्धृत निम्नलिखित अंश एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करता है - 'निघायो० ' इत्यादि । इस पद समूह में अन्तिम पद स्वर्णज्योति' हो अर्थ-प्रतिपादक कहा जा सकता है, जिसका मतलब ' सुनहला प्रकाश' है ।
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दार्थपारिजातः ११३६ अब्राह्मणानां कृते दुरूहमेतदामीत् । अनेके प्रयोगा विजयप्राप्त्यर्थं निर्दिष्टाः । इन्द्र सर्वदाऽपुरयुद्धयत इति प्रचारितम् । वारुणप्रयोगेण मुसलाधारवृष्टिरपि प्रचार्यते स्म । एवमलौकिकाद्भुतशक्तीना मान्यता ब्राह्मणधर्मेषु तपोयोगसाधनेषु प्रचारिता । तथैव मणिमन्त्रौषधीना चोपयोगा सामान्य लौकिक पशुपुत्रग्रामादिप्राप्त्यर्थं प्रचारिताः । वस्तुतस्त्वेतैः प्रयोगः प्राप्या वरा बालसुलभमूढताप्रदर्शनमात्रम् । जातिव्यवस्थाया दाढर्याद् ब्राह्मणाना सामाजिकधार्मिकवचस्वं वर्धिष्णु जातम् । यस्य बन्धने भारतवर्ष सार्वद्विसहस्रवर्षेभ्यो निबद्धं जातम् । यजुर्वेद एव चातुर्वर्ण्यव्यवस्था दृश्यते । वाजसनेयिसहिताया उत्तरस्मिन् भागे वर्णसंकरसकरादिभेदेनानन्तानां जातीनामस्तित्वमुपलभ्यते । यजुर्वेदीय भारतीयाना सामाजिक धार्मिकं स्वरूपमृग्वेदीय- सूक्तप्रतिबिम्बितस्वरूपात् तत्त्वतो भिन्नमेवेति । तदप्यनधिकारचेष्टाविलसितम् विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि यजुर्वेदे नूतनधार्मिक मान्यतानां विकास', प्राचीनाश्च मान्यताः परिवर्तिता, नव्यप्रयोगकल्पाना तत्र सन्निवेशः । यजुर्वेदे यज्ञानुष्ठानप्राधान्य जातम्, यजुर्वेदीय- - विधानानि ब्राह्मणवर्गेण दुरूहरहस्यमयादृष्टरूपाणि परिकल्पितानि । तस्मादृग्वेदीया सत्यधर्मभावना लुप्तेत्यादि वाग्जालस्य कोऽभिप्रायः? कथमृग्वेदः सत्यार्थप्रतिपादकः, कथ च यजुर्वेदोऽसत्यार्थप्रतिपादकः? त्वद्रीया पौरुषेयत्व सममेव । तत पुरुषाश्रितभ्रमप्रमादविप्रलिप्साकरणापाटवादयो दोषा उभयत्रापि सम्भाव्यन्ते । तूभयत्र अत ॠग्वेदेऽपि त्वया त्वदनुगुणैश्च प्रथमाष्टमनवमदशम मण्डलानामर्वाचीनत्वमभ्युपेयते । तेष्वपि दशमस्यात्यन्तार्वाचीन- त्वमभ्युपेयते । द्वितीयादिसप्तमान्तेष्वप्यत्युक्तयो राजादिप्रशंसापरा अभ्युपेयन्ते । ततश्च केवलं प्रतारणामात्रमेतद् यह विधिकल्प उन सबके लिये एक दुरूह रहस्य हो चला था, जो ब्राह्मण वर्ग के न थे । कई प्रयोग विजय प्राप्ति के लिये निर्दिष्ट है, जिनके द्वारा कहा जाता है कि इन्द्र सर्वदा असुरो पर विजय प्राप्त किया करते है । यह भी हमे पता चलता है कि यदि पुरोहित किसी आहुति विशेष का होम कर वारुण प्रयोग का अनुष्ठान करे तो मूसलाधार वर्षा होने लगती थी । इसी प्रकार की अलोकिक अद्भुत शक्ति की मान्यता ब्राह्मण धर्म में तप एवं योग साधनो मे भी परिकल्पित की गई थी । मन्त्र प्रयोग के साथ साथ कई ऐसी मणि, ओषधि आदि वस्तुओं के उपयोग का भी विधान है, जो सहज सामान्य लौकिक कल्याण की अवाप्ति, पशु, गाय आदि की वृद्धि जैसे कतिपय विशेष मनोरथ की पूर्ति के साधन है । वास्तव में देखा जाय तो इन प्रयोगो द्वारा प्राप्य वर बाल सहज मूढता के निदर्शन मात्र है । जाति- व्यवस्था की नीव जम जाने पर ब्राह्मणों का सामाजिक एवं धार्मिक वर्चस्व बढता गया, जिसके बन्धन में भारतवर्ष लगभग ढाई हजार वर्ष से जकड़ा हुआ है । भारतीय समाज के चार प्रमुख भेदो के फलस्वरूप चातुर्वर्ण्य की कल्पना हमे यजुर्वेद से मिलती है । इतना ही नही, बल्कि वाजसनेयो सहिता के उत्तर अध्यायो में हमें वर्णसकर से जनित अनन्त जातियो का अस्तित्व भी प्रतीत होता है । इससे यह कहना होगा कि भारतीयों का सामाजिक एवं धार्मिक स्वरूप इस युग मे ऋग्वेद सूक्तो में प्रतिबिम्बित स्वरूप से तत्त्वत. भिन्न है' ( पृ० १६ ९-१७१ ) । यह सारी बातें मैकडानल की अनधिकार चेष्टा मात्र है, क्योकि आगे किये जाने वाले प्रश्नो का उनके पास कोई उत्तर नही है । यजुर्वेद में नई धार्मिक मान्यताओ का विकास हुआ, प्राचीन मान्यताएं बदल गईं और उनके स्थान में नवीन कर्मकाण्ड पद्धति का दखल हो गया । बजुर्वेद में यज्ञो के अनुष्ठान को प्रधानता हो गई । ब्राह्मण वर्ग ने यजुर्वेद में दुरूह रहस्यात्मक अदृष्ट फल वाले विधि-विधानो की कल्पना कर ली । इससे ॠग्वेदीय सत्य धर्म की भावना लुप्त हो गई, इत्यादि बढ-चढ कर कही गई बातो का मतलब क्या है? ऋग्वेद तो सत्य धर्म का प्रकाशक है और यजुर्वेद असत्य धर्म का, यह बात आप किस प्रमाण के आधार पर कहते है? आपके मत से तो ऋग्वेद और यजुर्वेद दोनो ही पौरुषेय हैं । पुरुष में विद्यमान भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा ( ठगने की इच्छा ), करणापाटव (इन्द्रियों की असामध्य) आदि दोष दोनों ही वेदों में मिल सकते हैं । ऋग्वेद में भी आप और आपके अनुयायी प्रथम, अष्टम नवम और दशम मण्डल को नवीन मानते हैं । इनमें भी दशम मंडल अत्यन्त नवीन माना जाता है । द्वितीय से सप्तम मण्डल तक के अंश मे भी #
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वेदार्थपारिजातः ११४० यदृग्वेदीया धर्मभावना सत्यभूता यजुर्वेदीया च पुरोहितप्रकल्पनारूपा । युष्माभिस्तत्र तत्र स्पष्टमुक्त यत् प्राकृतिक- पदार्था एव देवतात्वेन स्तूयन्ते स्म प्राचीनैर्ऋषिभिः । ततश्च का देवताशक्तयः कथं च तासामनुग्रहः सम्भाव्यते? त्वद्रीत्या सोमयागादिचर्चा ऋग्वेदे युष्माभिरप्यभ्युपेयते । तत्रापि घृतसोमादीनामग्नी निःक्षेपोऽभ्युपेयते । त्वद्रीत्यापि तेन कथमनुग्रहो देवतानां सम्भवति । स्तुतिपाठेनापि जडेभ्य किं प्राप्यते? यदि काश्चिद् देवता विशिष्टैश्वर्यशालिन्यः सन्ति तर्हि तत्र किं मानमित्यपि वक्तव्यम् । नहि तत्र प्रत्यक्षमनुमान च प्रवर्तते, लोके तथाविधाना पदार्थानामदर्शनात् । यदि ऋग्वेदसूक्तानि तत्र प्रमाण चेत्तदापि वक्तव्य किं तानि सामान्यमनुष्यनिर्मितानि विशिष्टनिर्मितानि वा? नाद्यः, अद्यत्वेऽपि तथाऽदृष्टार्थवचननिर्माणप्रसङ्गात् । नाप्यन्त्य, वैशिष्टयप्राप्तिहेतोर्वक्तव्यत्वात् । यदि धर्मानुष्ठानमूलक ? वैशिष्ट्य तहि धर्मवैशिष्ट्ययोः कार्यकारणभावज्ञान कथम् यदि ॠग्वेदीयसूक्तान्याप्तप्रणीतानि तदापि तेषामापतत्वे प्रमाणं वक्तव्यम् । यजुर्वेदकारा नाप्ता इत्यत्रापि प्रमाण वाच्यम्, प्रतिज्ञामात्रेण वस्त्वसिद्धेः । वायवलकुरानादीनामपि तथैव प्रामाण्याप्रामाण्यप्रश्नपारम्पर्यम् । तत्रत्यानि कृत्यानि प्रार्थनाश्च परमेश्वर प्रसादयन्तीत्यत्र कि मानम् । ईसा-मुहम्मदादिगतचमत्कृतीना विषयेऽपि कि मूलम्? वैदिकानां रीत्या तु वर्णा नित्या; प्रत्युच्चारण त एवेम इति प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् । तत्समुदायभृताः ,संस्कृतशब्दा अपि प्रवाहरूपेण नित्याः व्यवहाराविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वात् । तथैव वैदिकानि वाक्यान्यपि नित्यानि, सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वात्, व्यतिरेकेण महाभारतवत् । न च वायविलकुरानादिष्वपि तथैव अत्युक्तियाँ, राजा आदि की प्रशंसा जैसे विषय माने जाते है । आपकी दृष्टि से ऋग्वेद को इस पूरी अव्यवस्था के बीच ऋग्वेद की धर्मभावना सत्य पर आधारित है और यजुर्वेद की धर्मभावना पुरोहितो की कल्पना है, यह कथन केवल अबोध व्यक्तियो को ठगने के समान है । आपने अनेक स्थलो पर यह स्पष्ट रूप से माना है कि प्राचीन ऋषिगण प्राकृतिक पदार्थों को ही देवता मानकर उनकी स्तुति किया करते थे । तब इन देवताओ की शक्ति की या इनके अनुग्रह की बात ही कहाँ उठ सकती है? सोम याग आदि की चर्चा ॠग्वेद में आप भी मानते है । यहाँ भी घृत, सोम आदि की अग्नि में आहुति देना ही यज्ञ नाम से अभिप्रेत है । आपके मत से इनसे भी देवता के अनुग्रह की प्राप्ति कैसे हो सकती है? स्तुति करने से भी जड़ पदार्थों से क्या मिल सकता है? कुछ देवता विशिष्ट ऐश्वर्य वाले हैं, ऐसा कहने पर इसके लिये प्रमाण देना पडेगा । प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण की प्रवृत्ति यहाँ नही हो सकती, क्योंकि इस तरह के अदृष्टपरक पदार्थो की लोक में सत्ता नही है । यदि ऋग्वेद के सूक्तो को इसमे प्रमाण मानना है, तो यह बताना पड़ेगा कि ये सूक्त सामान्य मनुष्यो के बनाये हुए है या विशिष्ट पुरुषो के द्वारा? सामान्य मनुष्यो को इनका निर्माता नही माना जा सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर यह आपत्ति उठेगी कि तब आज भी इस तरह के अदृष्टजनक सूक्तो की रचना सामान्य मनुष्यों के द्वारा होनी चाहिये । विशिष्ट मनुष्यों को भी उनका रचयिता नही माना जा सकता, क्योंकि उन मनुष्यों में यह विशेषता कहाँ से आती है? इसका कारण बताना पडेगा । यदि यह विशेषता धर्म का अनुष्ठान करने में प्राप्त होती है, तो यह बताना पड़ेगा कि इसका ज्ञान कैसे होता है कि मनुष्य में धर्म के अनुष्ठान से विशिष्टता उत्पन्न होती है? यदि ऋग्वेद के सूक्त आप्त पुरुषी के द्वारा प्रणीत माने जाते हैं, तो इसमें प्रमाण देना पड़ेगा और यजुर्वेद के रचयिता आप्त नहीं थे, इसमें भी प्रमाण देना होगा । केवल प्रतिज्ञा कर लेने मात्र से किसी वस्तु की सिद्धि नही हो जाती । वाइविल, कुरान आदि ग्रन्थो को प्रमाण माना जाय या न माना जाय, इस विषय में भी इसी तरह के प्रश्न किये जा सकते है । इन ग्रन्थो में बताई गई बातो को करने से अथवा प्रार्थना करने से परमेश्वर प्रसन्न हो जाते है, इसमे क्या प्रमाण है? ईसा और मुहम्मद के विषय में अनेक चमत्कारपूर्ण बातें प्रचलित हैं, इसमें क्या प्रमाण है? वैदिकों के मत से तो वर्ण नित्य हैं, क्योंकि प्रत्येक उच्चारण में ' ये वे हो वर्ण है, जो कि पहले बोले गये थे' इस तरह की प्रत्यभिज्ञा (पहचान) विद्यमान है । इन वर्णों के समुदाय से बने संस्कृत भाषा के शब्द भी प्रवाह रूप से नित्य हैं, क्योकि इन शब्दों से निरन्तर व्यवहार चलता आ रहा है और इनके कर्ता की स्मृति हमें नही है । इसी तरह वैदिक वाक्य भी नित्य हैं, क्योकि वैदिक सम्प्रदाय का कभी विच्छेद नही हुआ है, तो भी इसके कर्ता के रूप में किसी को किसी तरह की स्मृति नही है । इसका व्यतिरेकी