वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 241–250
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 241–250
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वेदार्थपारिजातः IIII , नित्यत्वं वक्तुं शक्यम् युष्माभिस्तथानुपगमात् । तेषा कालकत्रादिप्रसिद्धेः । एव वेदाना नित्यत्वापीरुषेयत्वाभ्या कर्त्रसिद्धया वेदेषु कर्तृ गतदोषासंस्पर्शात् स्वतः सिद्धमेव प्रामाण्यम् । , ते च वेदा न केवलमृक्सहितामात्रम् किन्त्वेकत्रिंशदुत्तरंकादशशतशाखात्मकाः । यत्र मन्त्रसहिताभागा ब्राह्मणभागा आरण्यकोपनिषदश्च सन्ति । तत्र ब्राह्मणगतविधिभिरेव कर्माण्युपासनानि च विहितानि । विधिभिरेव मन्त्रा अपि विहिता: । केषा मन्त्राणामुच्चारणेन केषा कर्मणामनुष्ठानेन कथ किं फल भवतीत्यत्र विषय एव प्रमाणं नान्यत् । ऋग्वेदेऽपि चातुर्वण्यं ब्राह्मणाना चात्विज्यमृगादिवेदचतुष्टयसम्बन्धिनामृत्विजा चातुविध्य चोक्तमन्यत्र च - तत्स्पष्टम् । जातयः संकरास्तेषां तारतम्य च विस्तरेण चातुर्वण्यंसस्कृतिविमर्शे निरूपितम् । तत्रैव कणे हत्या लोचनीयम् । तत्र स्वरमात्रामात्रार्धभेदेनाप्यनेकानर्थत्वमुक्तम्, ' यथेन्द्रशत्रः स्वरतोऽपराधात्' इत्यादी । किमुत निघायो निधायो इत्यादिपदसमुदायव्यत्यासेन । वस्तुतस्तु भारते ब्राह्मणाना लोकोत्तरं सम्मानं दृष्ट्वा पाश्चात्त्या आश्चर्यचकिता भवन्ति । सरसुन्दर- लालनिर्मिते 'भारत मे अग्रेजी राज्य' पुस्तके लिखितम्–'कश्चिदुच्चाधिकारस्थ आङ्गलः कदाचित् स्वस्माद् ( ) — निम्नपदस्थित क्षत्रियं निम्नतम कि द्वारपाल चपरासी पदस्थितं ब्राह्मण श्रद्धया प्रणमन्तं दृष्ट्वा पृष्टवान् अहं तवोच्चाधिकारी त्वं च मह्यं तथाविध सत्कार नार्पयसि यथात्यन्तनिम्नपदस्थाय ब्राह्मणाय सम्मानमर्पयसि । तत्र किं कारणमिति पृष्टः क्षत्रियोऽवोचत्-तुभ्य तदरपोषणायैवाल्पतरमपि सम्मानं करोमि 1। अयं तु ब्राह्मणो जन्मनैव मम उदाहरण महाभारत को दिया जा सकता है । महाभारत के कर्ता व्यास हैं, यह बात स्मृति परम्परा से चली आ रही है । इस तरह की स्मृति परम्परा वेद के संबन्ध में नही चली आ रही है, अतः वेद अपौरुषेय अत एव नित्य माने जाते हैं । इस तरह की नित्यता बाइबिल, कुरान आदि की नहीं मानी जा सकती, क्योकि आप स्वयं इस बात को नही मानते और उनका रचना काल और कर्ता भी प्रसिद्ध है । इस तरह वेदों की नित्यता और अपौरुषेयता के कारण उनके कर्ता की सिद्धि न होने से वेदो मे मनुष्य मे विद्यमान दोषो का स्पर्श न होने से उनकी प्रामाणिकता स्वतः सिद्ध मानी जाती है । केवल ऋग्वेदसंहिता ही वेद नही मानी जाती, किन्तु वेद की ११३१ शाखाएं हैं । इनमें से प्रत्येक शाखा में मन्त्रसहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् का समावेश होता है । इनमें से ब्राह्मण भाग में बताई गई विधियो से ही कर्म और उपासना का विधान होता है । विधि वाक्यों से ही मन्त्रों का भी विनियोग होता है । किन मन्त्रो के उच्चारण से किन कर्मों के करने से क्या फल होता है, इन सब में ब्राह्मणभाग में विद्यमान विधि वाक्य ही प्रमाण माने जाते हैं । ऋग्वेद मे भी चातुर्वर्ण्य का वर्णन है । ब्राह्मण ही ऋत्विक होते हैं और चारों वेदो के चार अलग अलग ऋत्विक होते हैं, यह बात भी स्वयं ऋग्वेद में तथा अन्यत्र भी वर्णित है । नाना प्रकार की जातियो का, उनमें सकर से उत्पन्न हुई उपजातियो का वर्णन हमने 'चातुर्वर्ण्य संस्कृति विमर्श' नामक ग्रन्थ में किया है । अपने मन को संतुष्ट करने के लिये इस विषय को वही विस्तार से देखना चाहिये । वेद के उच्चारण में स्वर, मात्रा, अर्धमात्रा का अन्तर हो जाने पर भी अनर्थ हो जाता है, यह बात ' इन्द्रशत्रु ' शब्द के गलत उच्चारण से हुई घटना का उदाहरण देकर समझाई गई | तब 'निघायो निधायो' इत्यादि ऊपर उद्धृत मैत्रायणी संहिता के पद- समुदाय को उलट-पलट देना, अथवा उसको व्यर्थ बता पाना तो ast दूर की बात है । वास्तव में बात यह है कि भारत में ब्राह्मणो का लोकोत्तर संमान देखकर पाश्चात्य लोग माचर्यचकित हो जाते हैं । सर सुन्दरलाल के ग्रन्थ 'भारत में अंग्रेजी राज' में लिखा हुआ है कि- 'कोई अंग्रेज उच्चाधिकारी अपने अधीन कार्य कर रहे क्षत्रिय को उस क्षत्रिय के अधीन चपरासी के पद पर काम करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धा से प्रणाम करते हुए देख कर पूछने लगा कि मैं'तुम्हारा उच्च अधिकारी हूँ, तुम मुझे उतना आदर नही देते, जितना कि अत्यन्त निम्न पद ( चपरासी ) पर कार्य कर रहे इस ब्राह्मण को दे रहे हो । इसमें क्या कारण है? उस अंग्रेज के ऐसा पूछने पर क्षत्रिय ने जबाब दिया कि मैं अपना पेट भरने के लिये आपका संमान करता हूँ । ब्राह्मणों की तो हमारे पूर्वज भी जन्म से ही पूजा करते हैं, क्योंकि हमारे इहलोक और परलोक दोनो इन्हीं की कृपा पर
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वेदार्थपारिजातः ११४२ पूर्वजैरपि स्वाभाविक्या श्रद्धया वन्द्यने, अस्माक लोकपरलोकयोरेतदायत्तत्वात् । तच्छ्रुत्वा तेन विचारितम् - यावत्पर्यन्त- मत्र देशे ब्राह्मणानां स्वाभाविक उत्कर्ष स्थास्यति, तावत्पर्यन्तमास्माकोनं बाह्यशासनम किञ्चित्करमेवेति । तदर्थमेव पाश्चात्त्या ब्राह्मणवादकल्पनया तानाक्रोशन्ति । यदप्यथर्ववेदसमबन्धेऽस्य प्रलपितम्, तदपि बेवरादिप्रसङ्गेनोकोत्तरत्वात् पिष्टपेषणतुल्यम् ॥ यदुक्तम्— ' ' ( ),, यज्ञियविधानानि ऋक्सामयजुः संहितास्वेव पृ० १७१ इति तदपि तुच्छम् कस्याश्विदपि संहितायां यज्ञादि विधानादर्शनात् । पाश्चात्त्यास्तु यथाकथञ्चिदुत्तानार्थं गृहीत्वा पदार्थतत्पर्यायादिकमजानाना एव जल्पन्ति । प्रायेण लिङ्लोट्तव्याम्तक्रियापदोत्तराणि विधिवाक्यानि भवन्ति । न च तादृशानि वाक्यानि मन्त्रेषु दृश्यन्ते । अपूर्व- द्रव्यदेवताश्रवणादपि विधयः परिकल्प्यन्ते । न च मन्त्रा अपूर्वद्रव्यदेवताप्रतिपादकाः सन्ति, किन्तु ब्राह्मणनिहिताना स्मारका एव । तेन नापूर्वद्रव्यदेवताप्रतिपादकाः । तस्मान्न मन्त्रेषु यागादिविधानम् । ब्राह्मणानि च यथा ऋग्वेदीयानि तथैव याजुषाणि । सामवेदे यान्याथर्वणानि विधिसमन्वितानि सन्ति, तेनाथर्ववेदे यज्ञियविधानाभावान्न वेदत्वमित्युक्ति- रतभिज्ञानामेव शोभते । यदुक्तम्— 'ऋग्वेदापेक्षया निश्चयेनाथर्ववेदोऽधिकमूढ ग्रहैरनुप्राणित:' ( पृ० १७१ ) इति, तदपि पूर्वापर- विरुद्धमेव । एतेन वाक्येनेदं ज्ञायते यद् ऋग्वेदोऽपि मूढग्रहैरनुप्राणितः, अथर्ववेदस्तु तदपेक्षयाऽधिकमूढग्रहैरनुप्राणित इति । एतेनास्य पाश्चात्त्यस्य ऋग्वेदीयसत्यधर्मभावनेति कथनं दम्भ एव । -':' ( ), यदपि अयं वेदः प्रागैतिहासिकयुगीयाभिरपरिष्कृतभावनाभिरनुप्राणित १७१ पृ० इति तदपि , ' नास्तिक्यमूलकमेव वेदानामपौरुषेयत्वेन प्राचीनार्वाचीनपरिष्कृतभावनामूलकत्वाभावात् । एतेन एडलवर्टरीत्या निर्भर हैं । यह उत्तर सुन कर उस अंग्रेज ने विचार किया कि जबतक इस देश मे ब्राह्मणो का स्वाभाविक उत्कर्ष बना रहेगा, तब तक हम बाहरी लोगो का शासन यहाँ कारगर नही हो सकता । इसी लिये पाश्चात्य लोग ब्राह्मणवाद की कल्पना कर उनको भला-बुरा कहते रहते हैं । अथर्ववेद के संबन्ध में कही गई ऊल -जलूल बातो का जवाब हम बेवर के मत का खण्डन करते समय दे चुके है, अब पुन. यहाँ उनका पिष्टपेषण करना व्यर्थ है । ' केवल ऋक्, यजु और साम का ही यशिय विधि-विधान से संबन्ध पाया जाता है' ( पृ० १७१ ) यह कहना भी व्यर्थ है, क्योंकि यज्ञादि का विधान तो किसी भी संहिता में नही है । पाश्र्चात्य विद्वानों की आदत है कि वे जिस किसी तरह से उलटा- सीधा अर्थ जानकर किसी पद के अर्थ को और उसके पर्यायो को बिना जाने ही मनमानी बातें गढते रहते है । प्रायः देखा जाता है विधि वाक्यों के अन्त में लिड्, लोट् या तव्यत् प्रत्ययों वाले क्रियापद रहते है । इस तरह के वाक्य मन्त्रो में उपलब्ध नहीं है । अपूर्व द्रव्य और देवता के सुनाई पडने पर भी विधि वाक्यो की कल्पना की जाती है, किन्तु मन्त्रो में किसी अपूर्व द्रव्य या देवता का प्रतिपादन नही मिलता, वे तो ब्राह्मणवाक्यो के विहित द्रव्य और देवता के स्मारक मात्र होते है । इस लिये ये अपूर्व द्रव्य और देवता के प्रतिपादक नही माने जाते । तब मन्त्रो में याग आदि का विधान कैसे माना जा सकता है? ब्राह्मण तो जैसे ऋग्वेद के है, वैसे ही यजुर्वेद के भी है । जिस तरह के विवान सामवेद के ब्राह्मणो में है, वैसे ही अथर्ववेद के भी । अतः अथर्ववेद में विधि-विधानों का अभाव होने से वह बेद नही है, यह कथन मैकडानल जैसे वैदिक पद्धति के अनजान व्यक्ति को ही शोभा दे सकता है । 'अथर्ववेद निश्चय ही ऋग्वेद की अपेक्षा अधिक मूढग्रहो से अनुप्राणित है' ( पृ ० १७१ ), यह कथन भी परस्पर विरुद्ध है । इस वाक्य का तात्पर्य यह निकलता है कि ऋग्वेद भी मूढग्रहो से अनुप्राणित है, किन्तु अथर्ववेद में तो उससे भी ज्यादा मूढग्रह विद्यमान हैं । इस परिस्थिति में इस पाश्र्वात्य विद्वान् का यह पूर्व कथन दम्भ के सिवाय और क्या हो सकता है कि ऋग्वेदीय धर्म की भावना सत्य पर आधारित थी । 'यह वेद प्रागैतिहासिक युग की अपरिष्कृत भावनाओ से अनुप्राणित है ' (पृ० १७१ ), यह कथन भी वक्ता की नास्तिकता का हो प्रतिपादक है । वेद तो अपौरुषेय है । उनके विषय में प्राचीनता-नवीनता, अथवा परिष्कार और अपरिष्कार की
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वेदार्थ पारिजात. ११४३ अथर्ववेदे शारीरकष्टनिवारणाय विहितानि कतिपयानि मन्त्रतत्राणि 'जर्मन - लेटिकै रूसी जादूटोना' आदिभिस्तुल्यानि सन्ति । देवतासम्बन्धिनामुच्चतरधार्मिकविचाराणा दृष्ट्या तु ऋग्वेदापेक्षयाऽप्यथर्ववेदोऽर्वाचीनप्रगतिशीलयुगस्य प्रति- निधित्व करोति । अन्यसहितापेक्षया आध्यात्मिका विचारा इहाधिक्येनोपलभ्यन्ते । अत एव सभ्यताया इतिवृत्ता- ध्ययनाय ऋग्वेदापेक्षया अथर्ववेद उपलभ्यमाना सामग्री अधिकरोचिका महत्त्वपूर्णा च' इति, तदपि यत्किञ्चित्, ऋग्वेदेऽपि मन्त्रतन्त्राणा वर्णनात्, प्राणिना कल्याणाय नानाविधोपायाना निर्देशस्यापि शास्त्रत्व प्रयोजकत्वात् । शिष्यते हितमुपदिश्यतेऽनेनेति शास्त्रमिति तन्निर्वचनात् । यदपि मूलतोऽथर्ववेदस्त्रयोदशकाण्डात्मक एव (पृ ० १७३ ) इति, तदपि बालजल्पितम्, निर्मूलत्वात् । रचना- शैली तु फलबलकल्प्या । वैयाकरणा अपि वैदिकप्रयोगानुसारेण नियमान् कल्पयन्ति, न व्याकरणनियमानुसारेण वैदिकान् शब्दान् परिवर्तयन्ति । साधर्म्यवैधम्र्म्यादिकं यथाकथञ्चित् सर्वत्र लभ्यते । प्रथमकाण्डस्यापि द्वितीयादिकाण्डे- वैलक्षण्यमेव । यत्तु ' अथर्ववेदसहिताया: सत्ता शतपथब्राह्मणस्यान्त्योपान्त्याध्यायद्वयस्य तैत्तिरीयब्राह्मणस्य छान्दोग्यो पनिषदश्च रचनाकालेऽवश्यं स्यात् । पातञ्जलभाष्यरचनाकाले त्वथर्ववेदो वेदानां शिरोमणिवेदानामेकमात्रं ',,प्रतिनिधिरासीत् इति तदपि निर्लज्जतामूलकम् शतपथतंत्तिरीयकादिभिर्ब्राह्मणैर्व्यासजैमिनिपतञ्जलिप्रभृतीनां ?विदुषामपेक्षयापि किं यूयमधिक विवेचका येन तेषां दृष्ट्या ऋग्वेदादीनामिवाथर्ववेदस्य वेदत्वापौरुषे- यत्वेऽपि त्वद्रीत्याऽर्वाचीनत्व स्वीक्रियेत? वस्तुतस्तु वैदिका एव वंदिकी स्थिति जानन्ति न वैदिकाचारशून्या यूयं तदर्हाः । भावना का आस्तिक हृदय में उदय ही कैसे हो सकता है? इसी लिये -' एडलवर्ट कुहन का कथन है कि अथर्ववेद में शारीरिक कष्ट को निवारण करने के लिये विहित कतिपय मन्त्र-तन्त्र ऐसे है, जिनका स्वरूप एवं उद्देश्य प्राचीन जर्मन, लेटिक और रूसी जादू-टोने से बहुत कुछ मिलता - जुलता है । जहाँ तक देवता- संबन्धी उच्चतर धार्मिक विचारो का सम्बन्ध है, ऋग्वेद को अपेक्षा अथर्ववेद भारतीय धार्मिक विचारो के अर्वाचीन एवं प्रगतिशील युग का प्रतिनिधित्व करता है । निश्चय ही इसमें अन्य संहिताओं की अपेक्षा अधिक आध्यात्मिक विचार उपलब्ध होते है । अत एव सभ्यता के इतिवृत्त के अध्ययन के लिये ऋग्वेद की अपेक्षा अथर्ववेद में उपलभ्यमान सामग्री कही अधिक रोचक एवं महत्त्वपूर्ण है' ( पृ० १७२ ), यह कथन भी निरर्थक है । ॠग्वेद में भी मन्त्र-तन्त्रो का वर्णन है । प्राणियों के कल्याण के लिये सभी तरह के उपाय बताना भी शास्त्र का प्रयोजन है । 'शास्त्र' पद का जब निर्वचन किया जाता है, तब उनका अर्थ निकलता है कि जो हितकर बात का उपदेश करता है, वह शास्त्र कहलाता है । ' अथर्ववेद मूलतः केवल तेरह ही काण्डो का था' ( पृ० १७३ ) यह भी बच्चो की सी बात है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नही है । रचनाशैली की कल्पना फल के अनुसार की जानी चाहिये । वैयाकरण भी वैदिक प्रयोगों के अनुसार ही नियमों को कल्पना करते है, व्याकरण के नियमों के अनुसार वैदिक शब्दो मे परिवर्तन नही करते । थोडी-बहुत समानता और असमानता तो सब जगह मिल सकती है । प्रथम काण्ड की भी अन्य काण्डो से विलक्षणता है ही । ' अथर्ववेद की संहिता का किसी न किसी रूप में अस्तित्व शतपथ ब्राह्मण के अन्तिम अध्यायों तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण एवं छान्दोग्य उपनिषद् के रचना काल में अवश्य रहा होगा । पातंजल महाभाष्य के समय में तो अथर्ववेद ते वह प्रतिष्ठा पा ली थी,, जिसके कारण उसे वेदो का शिरोमणि अथवा वेदों का एकमात्र प्रतिनिधि भी कही कहीं कहा गया है' (पृ० १७४ ), यह कथन भी वक्ता की निर्लज्जता को ही उजागर करता है । शतपथ, तैत्तिरीय प्रभृति ब्राह्मण ग्रन्थों के क्या आप लोग व्यास, जैमिनि पतंजलि प्रभूति विद्वानो की अपेक्षा भी अधिक विवेचक बनने का वादा करना चाहते है? उनकी दृष्टि में ऋग्वेद आदि की तरह अथर्ववेद भी वेद हैं और अपौरुषेय है । क्या उनकी बात को न मानकर आपकी पद्धति से इनको अर्वाचीन माना जाय? वास्तव में तो वैदिक विद्वान् ही वेदो की सही स्थिति को जान सकते है, वैदिक आचारों से सर्वथा शून्य आप जैसे लोग नहीं । 1
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११४४ वेदार्थपारिजातः अन्यत् तदुद्भावितं सर्वमसम्बद्धममूल दुष्टतामूलकं कुतर्कजालमुपेक्षणीयमेव । पारम्पर्याविच्छेदेनाथर्ववेदस्य स्वयं विद्यमानत्वेन ब्राह्मणेषूल्लेखानुल्लेखावकिञ्चित्करौ । ऋग्वेद एव चतुर्विधानामृत्विजामुल्लेखेन ब्रह्मवेदस्याथर्व- वेदस्यार्थादुक्तिरस्ति । तत एव गोपथब्राह्मणेऽथर्ववेदस्य ब्रह्मवेदेति सज्ञोक्ता । अत एव सोमयागविधिषु प्रमादे प्राय- श्चित्तविधानमथर्व सूक्तेष्वस्तीति १७७ पृष्ठे त्वयाप्यभ्युपेयते । गृह्यसूत्रेष्वथर्वपाठाः पाठान्तरितत्वेनोदघृता इत्यशुद्धम्, वेदानुपूर्व्याः परिवर्तने परमेश्वरस्याप्यनधिकारात् । किन्तु शाखान्तरीयास्ते पाठा इति मन्तव्यम् ॥ गोतम- वात्स्यायनाभ्यां महर्षिभ्यां मन्त्रायुर्वेदवद् वेदानां प्रामाण्यमुक्तम् । तद्रीत्या ये आयुर्वेदस्य स्मर्तारस्त एव वेदानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च । आयुर्वेदश्चाथर्ववेदस्यैवोपवेदः । धर्मशास्त्रेष्वथर्वविधोना निन्दनमाभिचारिककर्मनिषेधाभिप्रायेणार्थ-, वादमात्रमेव मन्वादौ सामवेदध्वनेरप्यशुचित्वोक्तेः । सापि न निन्दा किन्त्वर्थवादः । सामवेदाध्ययनकालेऽन्य- वेदानध्यायविवक्षया तादृश्युक्तिः । मनुस्मृति - रामायण- महाभारतादिष्वप्यथर्ववेदस्य मान्यतोक्तैव । ये व्यवहारे लौकिके वैदिके चाभीष्टा विषयाः सन्ति तेषा वर्णनं वेदे युक्तमेव । अन्यत् सर्वमथर्वसम्बन्धे यदुक्तं तत्पूर्वमुत्तरितमेव । यदपि -'ब्राह्मणानामुत्पत्तिसम्बन्धे वैदिकसंहितानां पश्चादुत्पत्तिरुक्ता' इति, तदपि निर्मूलम्, परमेश्वर- निःश्वसितत्वेनाष्टविधब्राह्मणानामपौरुषेयत्वस्य बृहदारण्यकादौ प्रतिपादनात् ॥ यदप-'पञ्चविंश-तैत्तिरीय- जैमिनीय- कौषीतक्यैतरेयादिब्राह्मणापेक्षया शतपथस्य रचनाऽर्वाचीना' इति, तदपि निर्मूलम्, वैदिकेषु तत्सम्प्रदायाविच्छेदेनानादि- त्वात् । हरिश्चन्द्र- रोहित - शुनःशेपादिकथा तु सुखावबोधार्थाऽऽख्यायिकैवेति न तयाऽपीतिहासः सिद्ध्यति । ताण्ड्यपञ्च- विशादिब्राह्मणोक्तव्रात्यस्तोमेन ब्राह्मणेतरेषां प्रवेशो ब्राह्मणेषु भवति स्मेत्युक्तिस्तु तदज्ञानविजृम्भिता । यथाकाल- इसी तरह की मैकडानल की अन्य कल्पनाएं भी असम्बद्ध एवं बिना प्रमाण की है । बुरी नियत से कुतर्कों के आधार पर गढ़ी गई ये सब बातें उपेक्षा के लायक है । अविच्छिन्न परम्परा से अथर्ववेद की सत्ता विद्यमान है, अतः ब्राह्मणो मे इसका उल्लेख है या नहीं, इसकी कोई कीमत नही है । ॠग्वेद मे ही चार तरह के ऋत्विजो का उल्लेख मिलता है, अतः ब्रह्मवेद के नाम से प्रसिद्ध अथर्ववेद का उल्लेख वहाँ है ही । इसीलिये गोपथब्राह्मण मे अथर्ववेद को ब्रह्मवेद कहा है । इसीलिये पृ० १७७ पर स्वयं आप भी मानते है कि सोम याग आदि की विधि में कुछ गलती हो जाने पर अथर्ववेद मे प्रायश्चित्त का विधान है । गृह्यसूत्रो मे अथर्ववेद के पाठभेद उद्धृत है, यह कथन भी गलत है, क्योकि— वेद की आनुपूर्वी को बदलने का अधिकार परमेश्वर को भी नही है । इसलिये वहां पर यह मानना चाहिये कि दूसरी शाखाओ के पाठ वहा उद्धृत है । महर्षि गोतम और वात्स्यायन मन्त्र और आयुर्वेद के समान वेदो को भी प्रमाण माना है । उनके मत से जो ऋणिगण आयुर्वेद का स्मरण करने वाले है, वे ही वेदों के द्रष्टा और प्रवक्ता है । आयुर्वेद अथर्ववेद का ही उपवेद है । धर्मशास्त्रों में कही कही अथर्व विघानो की निन्दा की गई है, इसका अभिप्राय आभिचारिक कर्मों का निषेध करने वाले अर्थवाद वाक्यों की तरह है । मनु आदि के स्मृति ग्रन्थों में सामवेद की ध्वनि को अशुचि बताया गया है । यह सामवेद की निन्दा न होकर अर्थवाद मात्र है । इसका अभिप्राय इतना ही है कि सामवेद का अध्ययन करते समय अन्य वेदों का अध्ययन नही करना चाहिये । मनुस्मृति, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थों में अथर्ववेद की मान्यता स्वीकृत है । लौकिक और वैदिक व्यवहार के लिये आवश्यक सभी विषयों का वर्णन वेद में हो, यह उचित हो है । इसके अतिरिक्त भी अथर्ववेद के संबन्ध में जो कुछ कहा गया है, उसका उत्तर पहले दिया जा चुका है । ब्राह्मणो की उत्पत्ति के संबन्ध मे कहा गया है कि इनकी रचना वैदिक संहिता ग्रन्थो के बाद हुई ( १० १८८), यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि परमेश्वर के निःश्वास से उद्भूत आठ तरह के ब्राह्मणों की अपौरुषेयता का प्रतिपादन बृहदारण्यक आदि में मिलता है । पंचविंश, तैत्तिरीय, जैमिनीय, कौषीतकि, ऐतरेय प्रभूति ब्राह्मणो की अपेक्षा शतपथ ब्राह्मण नवीन है यह कथन भी सर्वथा निर्मूल है, क्योंकि सभी वैदिक ग्रन्थों की अविच्छिन्न संप्रदाय परम्परा के आधार पर अनादिता सिद्ध है । हरिश्चन्द्र, रोहित, शुन शेप आदि की कथा विषय को सरलता से समझाने के लिये कल्पित आख्यान मात्र है, इनसे वेद में इतिहास नही सिद्ध हो जाता । ताण्ड्य ब्राह्मण में प्रतिपादित ब्राह्मण स्तोम से ब्राह्मणभिन्न जातियो का प्रवेश ब्राह्मणो में किया जाता था, यह कथन भी वक्तो के अज्ञान को ही उजागर
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वदार्थपारिजातः ११४५ मसंस्कृतानां त्रैवर्णिकानामेव व्रात्यपदव्यपदेश्यत्वात् । बेवरमतनिराकरणप्रसङ्गेऽपि तन्निराकरण द्रष्टव्यम् । शतपथ- सम्बन्धी मैकडानल विचारोऽपि बेवरमतनिराकरणेन निराकृतो वेदितव्यः । उपनिषदा विचारविषये पाश्चात्त्या वराका वालका एव वेदान्तप्रख्यातग्रन्थेषु तदप्रवेशात् । यदपि - ‘ यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म' ( बृ० उ० ३।४।२ ), 'य आत्मा सर्वान्तरस्त मे व्याचक्ष्व' ( वृ ० उ ० ३।४।१ ) इति प्रश्नोत्तर- तयोक्तो जीवब्रह्मैक्यसिद्धान्त आपत्तिमन्तरेव बौद्धः स्वीकृत:' इति, तदपि न युक्तम्, बौद्धसिद्धान्ताज्ञानात् । बुद्धस्तु नैरात्म्यवादीति तदीयसर्वप्रस्थानेषु प्रसिद्धम्, क्षणिकत्व तु सर्वपदार्थाना तैरभ्युपेयते । वेदान्तिनां ब्रह्मात्मतत्त्वं सर्वविघ- भावविकारवजितं कूटस्थ नित्यमेव । एवमेव पुनर्जन्म सम्बन्धेऽपि तद्विचारा भ्रान्ता एव । श्रद्धा ज्ञानान्वितो यतिर्देवयानेन परलोकयात्रया ब्रह्मणि विलीयत इति छान्दोग्याश्रयेण यदुक्तम्, तदप्यशुद्धम्, उपासकाना देवयानगत्युक्तेः । ज्ञानिनां सम्बन्धे तु 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इहैव समवलीयन्ते' ( बृ० उ ० ४।४।६ ) इत्येव सिद्धान्त: । एवमेव सूत्राणा रचनाकाला अपि तदुक्ता अशुद्धा एव । यदुक्तम्-'गोतमधर्मसूत्ररचना ईसवीयपूर्वपर- वर्तनी न सम्भवति' इति, तदपि न युक्तम्, गोतमकालस्य बादरायणपूर्व भावित्वेन तद्रचनाया अपि तत्कालत्वोपपत्तेः । बादरायणश्च महाभारतयुद्धपूर्वभावीति इहैवान्यत्रोक्तम् । एवमेव कल्पज्योतिषशिक्षाप्रातिशाख्यछन्दोव्याकरणसमयोऽपि महाभारतात् प्राचीन एव, महाभारते तत्सम्बन्धदर्शनात् । व्याकरणनिरुक्तादिग्रन्था अपि यद्यपि वेदाङ्गत्वाद् वेदवदनादय एव, तथापि पौरुषेयत्वादेतेषां प्रतिकल्पं तत्तदृषिभिभिन्नानामानुपूर्वीणां निर्माणाम्युपगमः । करता है, क्योकि समय से जिनका संस्कार नही हुआ है, इस तरह के त्रैर्वाणिक ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) व्यक्ति ही 'प्रास्य' शब्द से कहे जाते थे । इस बात का खण्डन हम बेबर के मत का निराकरण करते समय कर चुके है । शतपथ ब्राह्मण के संबन्ध में मैकडानल ने और भी जो कुछ कहा है, उसका खण्डन भी बेवर के मत के खण्डन से ही हो जाता है । उपनिषदों पर विचार करते समय पाश्चात्य विद्वान् निरे बालक से लगते है, क्योकि वेदान्त शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थो में उनका प्रवेश नही हो पाता । मैकडानल का कहना है कि 'हमें व्यक्त ब्रह्म का रूप समझाइये, अव्यक्त का नही—उस आत्मा का, जो सर्वत्र व्याप्त है' यहां पर प्रश्नोत्तर रूप मे प्रतिपादित जीव और ब्रह्म की एकता का सिद्धान्त बुद्ध ने वगैर किसी आपत्ति के स्वीकार किया था' ( १० २०८), किन्तु यह कथन ठीक नही है । बौद्ध सिद्धान्तो का मैकडानल को ज्ञान ही नही है । बुद्ध नैरात्म्यवादी थे, यह बात उनके सभी प्रस्थानो में एकमत से मानी गई है । ये लोग सभी पदार्थों की क्षणिकता भी मानते है । इसके विपरीत वेदान्तियो का ब्रह्म, आत्मतत्त्व सभी प्रकार के ( षड्विध ) भाव विकारो से रहित कूटस्थ नित्य है । इसी तरह से मैकडानल के पुनर्जन्म संबन्धी विचार ( १० २० ९) भी भ्रमपूर्ण है । ' श्रद्धा और ज्ञान से समन्वित यति देहत्याग के पश्चात् देवयान से परलोक यात्रा करता है और वहा ब्रह्म में विलीन हो जाता है' इस छान्दोग्य श्रुति का सहारा लेकर जो कुछ कहा गया है ( पृ० २० ९ ), वह भी गलत है, क्योंकि देव-यान गति उपासको को प्राप्त होती है, यह बात यहाँ बताई गई है । ज्ञानियों के संबन्ध में तो बताया गया है कि कि ' इस ज्ञानी के प्राण कही उड़ कर नही जाते, वे जहाँ के तहाँ ब्रह्म में विलीन हो जाते है' । यही वेदान्त का सिद्धान्त है भी । इसी तरह से उनका बताया गया सूत्रो का रचना काल भी गलत है । उसने बताया है कि गोतम धर्मसूत्र का रचना काल ई० पू० ५०० से परवर्ती नही कहा जा सकता ( पृ० २४० ) । यह कथन भी गलत है, क्योकि गोतम बादरायण से पहले हुए है । इसलिये गोतम की रचना निश्चित हो बादरायण से पहले विद्यमान मानी जायगी । बादरायण का समय महाभारत युद्ध से पहले का है, इस बात को इसी ग्रन्थ में अन्यत्र बताया गया है । इसी तरह से कल्प, ज्योतिष, शिक्षा, प्रातिशाख्य, छन्द, व्याकरण के सूत्र ग्रन्थों का समय भी महाभारत से प्राचीन है । महाभारत में इनका उल्लेख मिलता है और इनका परस्पर संबन्ध बताया गया है | व्याकरण, निरुक्त आदि ग्रन्थ भी यद्यपि वेदांग होने से वेद की तरह अनादि ही है, तो भी ये पौरुषेय हैं और इसीलिये प्रत्येक कल्प में उन उन ऋषियों द्वारा उनका नई आनुपूर्वी से निर्माण होता है, यह बात मानी जाती है । १४४
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वेदार्थपारिजात. ११४६ पाश्चात्त्यमतसमीक्षणम् ' राज्ञ एपिरसस्य नाम्ना ' एलेग्जेण्डर' एव वर्णित:' इति कथनमपि न समञ्जसम् । एवमेव 'केनचिद् भारतीयेन सम्राजा स्वीये धार्मिके शिलालेखे यूनानदेशीया राजान उल्लिखिता.' इति कथनमपि तथैव । वचनानीमानि स्पष्टयन्ति यद् यद्यपि वेदशास्त्राण्यनादीन्यपौरुषेयाणि च, तथापि पाश्चात्त्याना विदुषामृषिप्रणीतानि प्राचीनेतिहास- पुराण- धर्मशास्त्राण्यपि भूयसीमोर्ष्यामेवोत्पादयन्तीति । अत एव ते पाश्चात्त्या विद्वासो वेदान् ख्रीष्टपूर्वद्विसहस्राब्दीत: प्राचीनान् नैव कदाचिदङ्गीकुर्वन्ति । एतेषां मतेन कस्यचिद् ग्रन्थस्य ग्रन्थकारस्य वा नाम अन्यस्मिन् ग्रन्थेऽवलोक्यान- वलोक्य वा तस्य रचनाकालविषये पूर्वापरतासम्वन्धे वा निर्णयो भवति । अथवा ग्रन्थेष्वेतेषु यवनादिजातीनाम् कस्यचिद्व्यक्तिविशेषस्य वा नामकर्मणोरुल्लेख दृष्ट्वा रविवासरादिनाम्ना राशीना वा नामान्यवलोक्य, नक्षत्र- गणनाक्रमं चैत्रप्रभृतिमासाना वा वर्णन दृष्ट्वा तदा तेषा सत्ता आसीन्न वेति निर्णीयते । पाश्चात्त्याना मतेनानयैव पद्धत्या महाभारतादिषु समागतानां नाम्ना ग्रन्थाना चाधारेण तत्समयनिर्धारणं भवति । अत्रास्माभिः पृच्छ्यते यद् यावन्नाम्नामेषामुत्पत्तिसमयो न निर्धार्यते, यावच्च ग्रन्थरचनाकालो न निश्चीयते तावत् तेषामाधारेण महाभारत-? रचनाकालः कथं नाम निर्धारयितुं शक्येत पाश्चात्त्याना मतेन भारतीयज्योतिर्विज्ञानगणना वेदाङ्गज्योतिषा- पेक्षयातीव स्थूला वर्तते । तदनुसारमेव विराटपर्वणि भीष्मपितामहेन सौरमानेन त्रयोदशवर्षाणि चान्द्रसवत्सरमानेन त्रयोदशवर्षपञ्चमासदिनद्वादशतुल्यानि स्वीकृतानि । पाश्चात्त्या वदन्ति यद् भारतीयैः सिद्धान्तज्योतिषस्य ज्ञान यूनानदेशनिवासिनां सकाशादधिगतमिति । नक्षत्रमण्डलस्य द्वादशराशिषु विभाजनं सर्वप्रथमं यूनानदेशनिवासिभिः कृतस् । भारते साम्प्रत सप्ताहगणना प्रचलति किन्तु प्राचीनकालेऽत्र षड्दिनानां गणना प्रचलिताऽऽसीत् । भारतीयः सप्तवासराणा ज्ञानं काल्डियादेशनिवासिनां सकाशादधिगतम् । एवं च संस्कृतभाषाया विविधविषयकेषु येषु ग्रन्थेषु पाश्चात्य मत की समीक्षा राजा एपिरस के नाम से एलेग्जेंडर का ही वर्णन किया गया है,2 यह कथन भी ठीक नही है । किसी भारतीय सम्राट् ने अपने धार्मिक शिलालेख में यूनानी राजाओं का उल्लेख किया है, यह कथन भी सही नही है । ऐसे कथनो से यही स्पष्ट होता है कि यद्यपि हमारे वेदशास्त्र अनादि और अपौरुषेय हैं, किन्तु पाश्चात्य विद्वानों की हमारे ऋषिप्रणीत प्राचीन इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि के प्रति कितनी ईर्ष्या है? इसीलिये वे पाश्चात्य विद्वान् वेदो को ईसा पूर्व दो हजार वर्ष से अधिक प्राचीन मानने को तैयार नहीं हैं । इनके मत से किसी ग्रन्थ या ग्रन्थकार का नाम दूसरे ग्रन्थ मे देखकर अथवा न देखकर इन ग्रन्थो का रचनाकाल और इनकी पूर्वापरता का निर्धारण किया जाता है । अथवा इन ग्रन्थो में यवन आदि जातियों के नाम का या किसी विशेष व्यक्ति के नाम का अथवा उसके कार्यों का उल्लेख देखकर, रविवार प्रभूति नामों को देखकर, राशि के नामों को देखकर, नक्षत्रों की गणना के क्रम को देखकर, चैत्र प्रभृति मासो के नामों को देखकर इनकी उस समय सत्ता थी या नहीं, उनका क्या समय हो सकता है, इत्यादि बातों का ये लोग निश्चय करते है । इनके मत से इसी पद्धति से महाभारत में आये नाम और ग्रन्थों के सहारे महाभारत के समय का निर्धारण करने मे उपयोग हो सकता है । किन्तु इस पर हमारा यह प्रश्न है कि जब तक इन नामों की उत्पत्ति के समय का निश्चय नहीं हो जाता और जब तक ग्रन्थों की रचना का समय निर्धारित नही कर दिया जाता, तब तक उनके आधार पर महाभारत की रचना का समय कैसे निर्धारित किया जा सकता है । पाश्चात्यों के मत के अनुसार भारतीय ज्योतिविज्ञान की गणना वेदांग ज्योतिष की गणना से भी बहुत स्थूल है । उसी का अनुसरण करके विराट पर्व में भीष्म पितामह ने सौर मान से पूरे तेरह वर्ष के समय को चान्द्र संवत्सर मान से तेरह वर्ष पांच मास और बारह रात्रि का माना है । पाश्र्चात्यों का कहना है कि भारतीयों को सिद्धान्त ज्योतिष काI " ज्ञान यूनान देश के निवासियों से प्राप्त हुआ था । नक्षत्र मण्डल का बारह राशियों में विभाजित करना यूनान देश के रहने वाले ज्योतिषियों की निजी उपज है । भारत में आज कल सप्ताह की गणना प्रचलित है, किन्तु पहले यहाँ छः दिन की ही गणना प्रचलित
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वदाथपारिजातः ११४७ द्वादशराशीनां सप्तवासराणा चाधारेण कालगणना दृश्यते, सर्वे ते ग्रभ्था ख्रीष्टपूर्वचतुर्थशताब्दीत. प्राचीना नैव मन्तुं शक्यन्ते ॥ चैत्रप्रभृतिमासानां येषु ग्रन्थेषूल्लेखो वर्तते, तेषा रचनाकालो वेदाङ्गज्योतिषात् प्राग्वर्ती ब्राह्मण- ग्रन्थेभ्यश्च पश्चाद्वर्ती मन्तव्य । पाश्चात्त्यविदुषा दृष्टिकोणानुसार महाभारत-पुराण-पातञ्जलमहाभाष्यप्रभृतयो ग्रन्था अथ च ज्योति शास्त्रग्रन्थाः येषु यवनानां विद्वत्ताया वीरताया आक्रमणशीलतायाश्च वर्णनानि विद्यन्ते, सर्वे ते सिकन्दराक्रमणानन्तरम्, अर्थात् ख्रीष्टपूर्व ३२३ वर्षानन्तर विरचिता । पाश्चात्त्यानामेना कालनिर्णायकां पद्धति- मङ्गीकृत्यैव लोकमान्येन बालगङ्गाधरतिलकेन महाभारते द्वादशराशीनामुल्लेखमदृष्ट्वा तस्य काल सिकन्दराक्रमणात् प्राग्वर्ती, मेष वृषप्रभृतिरा शिनामसत्त्वाच्च बौधायनगृह्यसूत्र पश्चाद्वर्तीति प्रतिपादितम् । एतच्च सर्व सारहीन वितथ च, महाभारते प्रयुक्तस्य यवनशब्दस्य यूनानदेशनिवासिना ग्रीकजनाना वाचकत्वाभावात्, किन्तु शब्दोऽयमत्र यया- तिपुत्राणां तुर्वस्प्रभृतीना बोधक, ये हि पितुः शापाद् यवना समजायन्त । तत्र स्पष्टं प्रतिपाद्यते - 'यदुभ्यो यादवा जातास्तुवंसोर्यवनाः स्मृताः' इति । एषामेव राज्य महाभारते यवनराज्यनाम्ना प्रसिद्धम् । ब्रह्मपुराणानुसारं सूर्यवंशीयो राजा बाहुर्यदा हैहयवंशीयै राजभिराक्रान्तस्तदा पञ्चगणानामधिपतयो यवना अपि तेषां सहायका आसन् । हे द्विजोत्तम! तालजङ्घीयाना हैहयानामाक्रमणसमये शकाः, यवनाः, पारदाः, कम्बोजाः, पह्लवाश्चेति पञ्चगणाना राजानो तेषां सहायका आसन्' इत्यभिप्रायकं ब्रह्मपुराणीयं वचनम् इन्द्रविजये ४४ पृष्ठे समुद्धृतं दृश्यते । नृपतेर्बाहोः सगरनामकेन पुत्रेण स्वपितु शत्रव इमे पश्चापि गणाः पराजिता युद्धे । यदा ते सर्वे महर्षि वशिष्ठं शरणं ययुस्तदा तत्कथनेन प्राणदानेन रक्षिता अपि धर्मभ्रष्टत्वादाचारभ्रष्टत्वादार्यसंस्कृतिबहिर्भूता इमे स्वराज्याद बहिनिष्कासिताः । 'नृपस्य बाहोः सगरनामकेन पुत्रेण अवं शिरो मुण्डयित्वा शकाः परित्यक्ताः । यवनानां काम्बोजानां च सम्पूर्ण शिरो मुण्डितम् । पारदा विकीर्णकेशाः, पह्लवाश्च श्मश्रुलाः कृताः । सर्वे इमे पूर्व थी । सात वारों का ज्ञान भारतीयो को काल्डिया के निवासियो से प्राप्त हुआ था । इस दृष्टि से संस्कृत भाषा के जिन ग्रन्थो में, भले ही वे किसी भी विषय के हो, बारह राशियो के, रविवार प्रभृति सात वारो के आधार पर ज्योतिष सिद्धान्त की गणना मिलती हो, वे सभी ग्रन्थ ईसापूर्व चार सौ वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं है 1। चैत्र प्रभृति मासी का जिन ग्रन्थो में उल्लेख मिलता है, उनकी रचना बेदांग ज्योतिष के रचनाकाल से पहले और ब्राह्मण ग्रन्थो के रचनाकाल के बाद हुई है । इन पाश्र्चात्य विद्वानो के इस दृष्टिकोण की कसोटी पर महाभारत, पुराण, पातंजल महाभाष्य प्रभृति ग्रन्थ, अथवा वे ज्योतिष शास्त्र के ग्रन्थ, जिनमे यवन जाति की विद्वत्ता, वीरता और आक्रमणशीलता की बात लिखी गई है, सभी सिकन्दर के आक्रमण के बाद, अर्थात् ईसापूर्व ३२३ वर्ष के बाद बनाये गये है । पाश्चात्यो की इसी पद्धति का स्वीकार कर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भी महाभारत में बारह राशियो के विभाग का वर्णन न मिलने से इसको सिकन्दर के आक्रमण से पहले का और मेष, वृष आदि राशियो के नाम का उल्लेख मिलने से बौधायन गृह्यसूत्र को सिकन्दर के आक्रमण के बाद का बनाया गया ग्रन्थ मानते है । किन्तु इस तरह के सारे तर्क सारहीन है, क्योकि महाभारत में आया यवन शब्द यूनान देश के रहने वाले ग्रीक लोगो के लिए नहीं प्रयुक्त हुआ, किन्तु यहाँ यवन शब्द से महाभारत ययाति के तुर्वसु प्रभृति पुत्रो का बोध होता है, जो कि पिता के शाप से यवन हो गये थे । वहीं स्पष्ट बताया गया है -' यदु से यादवो की उत्पत्ति हुई और तुर्वसु से यवनों की ' । इन्ही का राज्य महाभारत में यवन राज्य के नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्मपुराण के अनुसार सूर्यवंश के राजा बाहु पर जब हैहय प्रभृति वशो के राजाओं ने आक्रमण किया, उस समय पाँच गणो के अधिपति यवन भी उनके सहयोगी थे । वहाँ बताया गया है -'हे द्विजोत्तम, तालजंघ हैहयो ने शकों के साथ आक्रमण कर दिया । इस आक्रमण के समय शक, यवन, पारद, काम्बोज, पह्नव इन पाँच गणो के राजाओ ने भी हैहयो का साथ दिया । यह वचन इन्द्र विजय के पृ० ४४ पर उद्धृत है । राजा बाहु के सगर नामक पुत्र ने अपने पिता के शत्रु इन पांचों गणो को पराजित कर दिया था । जब ये महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गये तो उनके कहने से उसने इनको प्राणदान देकर धर्मभ्रष्ट आचारभ्रष्ट और आर्य-संस्कृति से बहिष्कृत कर इनको अपने राज्य से निकाल दिया । वहीं कहा गया है -' राजा बाहु के सगर नाम के पुत्र ने शको को उनका
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११४८ वेदार्थपारिजातः क्षत्रिया आसन्, किन्तु तेन धर्मच्युता इमे स्वराज्यानिष्कासिताः ' इत्यभिप्रायकं वचनमपीन्द्रविजय एव समुपलभ्यते । मनुसंहिताया दशमेऽध्यायेऽपि - ' शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्व गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्नवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥' तदभिप्रायकमेव वचनमेतद् दृश्यते । केवल यवननामदर्शनेन तेषा यूनानदेशनिवासकल्पना भ्रमपूर्णेव विद्यते । अत एव 'शूद्राणा० ', ( २| ४| १० ) इति पाणिनिसूत्रभाष्ये भगवता पतञ्जलिना पात्रैरनिवसितानां शूद्राणामुदाहरणम् 'शकयवनम्' इति प्रदीयते । एवमेव भारतीयज्योतिःशास्त्रप्रासादो ज्योतिर्विज्ञानकालगणनाधारो विराजते । भारतीया कालगणना सृष्ट्यारम्भात् प्रलयपर्यन्तं समानमाना । विराटपर्वणि भीष्मपितामहेन कृता कालगणना नैतद्विरुद्धा | भीष्मपितामह- जीवनवेलायामपि सौरी चान्द्री चोभयविधा कालगणना प्रचलिताऽऽसीत् । अधिकमासव्यवस्थयाऽनयोः परस्परं समन्वयः ss कृतः । अनयैव दृष्ट्या भीष्मपितामहेन व्यवस्थेयं प्रदत्ता सीद् यत् पाण्डवानां वनवासकालोऽज्ञातवासकालश्च मासपञ्चकद्वादशरात्र्यधिको व्यतीत इति । भगवता रामचन्द्रेणापि स्वीयस्य वनवासस्य चतुर्दशवर्षाणि काल- गणनयाऽनयैव भुक्तान्यासन् । पाण्डवा अपि वनवासावधि त्रयोदशवर्षीयामनयैव कालगणनया सौरचान्द्रगणनाख्यया भुक्तवन्तः । अस्याः कालगणनाया वर्ष चैत्रशुक्लप्रतिपत्तिथितश्चैत्र कृष्णामावस्यापर्यन्त परिगण्यते । अस्मिन् वर्षे न्यूनान्न्यूनं ३५४ दिनानि, अधिकादधिकं च ३८४ दिनानि भवन्ति । कौरवमतानुस | रमिमां कालगणनामनुसृत्य चतुर्द- शस्य वर्षस्य प्रथमो दिवसो वेदाङ्गज्योतिषकालगणनादृष्टया त्रयोदशवर्षपञ्चमासद्वादशदिनात्मको भवति । यदि द्यूतक्रीडायास्तिथि: १ ९९ ० वि० ज्येष्ठ कृष्णाष्टमी बुधवासरान्विता कल्प्यते, तदा तस्मिन् दिने राश्यादिः सूर्यः १।३।३०।४१ तदनुसारं १७-५-१९ ३३ इत्याङ्लतिथिर्भवति । विराटनगरेऽर्जुनप्राकटयतिथि: २००३ वि० ज्येष्ठ- आधा सिर मुंड कर छोड़ दिया । यवनो और काम्बोजों का उसने सारा सिर मुंडवा दिया । पारदो को बिखरे बाल वाला और पह्नवो को इसने दढियल बना कर छोड़ दिया । ये सब पहले क्षत्रिय थे, किन्तु उसने इन सब को धर्मच्युत कर दिया' । यह वचन भी इन्द्रविजय ---- में ही उद्धृत है । मनुसंहिता के दसवें अध्याय में कहा गया है कि --'ब्राह्मणो के साथ सम्पर्क न हो पाने और धीरे धीरे यज्ञ -यागादि क्रियाकलापों और संस्कारो को भूल जाने से पौण्ड्रक, ओड्र, द्रविड, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पल्लव, चीन, किरात, दरद, खश, ये सभी क्षत्रिय जातियाँ म्लेच्छ प्राय हो गई' । केवल यवन नाम देखकर ही उसको यूनान देश का रहने वाला मान लेने की कल्पना भ्रमपूर्ण ही है । इसीलिये ' शूद्राणां० ' इत्यादि पाणिनि सूत्र के भाष्य में महाभाष्यकार पतंजलि ने पात्र से अबहिष्कृत शूद्रो के उदाहरण में 'शक -यवनम्' यह उदाहरण दिया है । इसी तरह से भारतीय ज्योतिःशास्त्र ज्योतिर्विज्ञान की कालगणना के आधार पर खड़ा है । भारतीय कालगणना सृष्टि से लेकर प्रलय पर्यन्त एक सी है । विराट पर्व में भीष्म पितामह द्वारा की गई कालगणना भी इसके विरुद्ध नहीं है । भीष्म पितामह के समय में भी सौर और चान्द्र दोनों तरह की कालगणना प्रचलित थी । अधिक मास की व्यवस्था के द्वारा इन दोनों में समन्वय स्थापित कर दिया गया था । इसी दृष्टि से भीष्म पितामह ने यह व्यवस्था दी कि पाण्डवों को वनवास और अज्ञातवास करने पर पांच महीना और बारह रात्रि अधिक व्यतीत हो गये 1। भगवान् रामचन्द्र ने भी अपने वनवास की चौदह वर्ष की अवधि को इसी गणना के अनुसार बिताया था । पाण्डवों ने भी अपने वनवास की तेरह वर्ष की अवधि को इसी कालगणना के अनुसार पूरी किया था । इस गणना का नाम सौरचान्द्रगणना कहलाता है । इस कालगणना का वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर चैत्र कृष्ण अमावास्या पर्यन्त रहता है । इस वर्ष में कम से कम ३५४ दिन और अधिक से अधिक ३८४ दिन होते हैं । कौरवो के विचार से इस कालगणना के अनुसार चौदहवें वर्ष का पहला दिन वेदांग ज्योतिष की कालगणना के हिसाब से तेरह वर्ष पाँच मास और बारह दिन होते हैं । यदि द्यूतक्रीडा की तिथि वि० सं ० १ ९९ ० ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी बुधवार मान ली जाय तो उस दिन राश्यादि सूर्य १ | ३ | ३० | ४१ तदनुसार १७ मई सन् १ ९ ३३ होता है । अर्जुन के विराट नगर में प्रकट होने की तिथि वि ० सं० २००३ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी शुक्रवार कल्पित की जाय तो उस दिन राश्यादि
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देवापारिजाता ११४३ कृष्णाष्टमी शुक्रवासरान्विता कल्पिता स्यात्तदा तस्मिन् दिने राश्यादि सूर्य: १ / ९/ ५२३ ९ अर्थात् १४-५-१९ ४६ इत्यालतिथिः सपद्यते । अनया पद्धत्या द्यूतक्रीडातिथे प्राकट्य तिथेश्चान्तर सौरचान्द्रमानेन त्रयोदशवर्षेक दिनात्मक- मर्थात् चतुर्दशवर्षस्य प्रथमदिनात्मक भवति । एषैव कालगणना सौरमानानुसार त्रयोदशवर्षषड्दिनात्मिका, अर्थात् चतुर्दशवर्षस्य षष्ठदिवसात्मिका भवति । आङ्ग्लकालगणनानुसार त्रयोदशवर्ष सप्तदिनात्मिका, अर्थात् चतुर्दशवर्षस्य सप्तमदिनयावत् प्रचलति । एषैव कालगणना वेदाङ्गज्योतिषानुसार चान्द्रमानेन त्रयोदशवर्षपञ्चमास- द्वादशदिनात्मिका भवति । महाभारते भीष्मपितामहेन तदनुसारमेव व्यवस्था प्रदर्शिता । अनेन स्पष्टीभवति यद् महाभारतयुद्धकाले सिद्धान्तज्योतिषानुसारं पञ्चाङ्गगणना भवति स्मेति, तत्र प्रदर्शितायाः कालगणनायाः सिद्धान्त- ज्योतिषीयपञ्चाङ्गगणनामाघृत्य निश्चितत्वात् । चान्द्र सावन-सौरभेदे त्रिविधा मासा भवन्ति ॥ एवमेव वर्षाण्यपि चान्द्र -सावन - सौरभेदेन त्रिविधानि भवन्ति । चैत्रशुक्लप्रतिपत्तिथितः समारभ्य फाल्गुनमासस्यामावस्यां यावच्चान्द्र- कलानां वृद्धिह्रासामुसारं ३६० तिथ्यात्मको वर्षश्चान्द्रसंवत्सरनाम्ना प्रसिद्ध्यति । सोरसंवत्सरे सूर्यो द्वादशराशीन् सम्पूर्ण परिक्रामति । अस्यारम्भः सूर्ये मेषराशी प्रविशति सति समाप्तिश्च मीनराशिभोगावधिर्भवति । सोमयागे प्रतिदिनं प्रातःसवन-माध्यन्दिनसवन सायसवनाख्यानि त्रीणि सवनान्यनुष्ठीयन्ते । एकस्मिन्न- होरात्रे सवनानीमानि निष्पाद्यन्त इत्यहोरात्रं सावनमित्यभिधीयते । सावनः संवत्सर एवविधैः ३६० दिनैः सम्पन्नो भवति । गोसत्रप्रभृतिष्वन्येषु लोकव्यवहारेषु च सावनसवत्सर उपयुज्यते । एतच्च विष्णुधर्मोत्तरे प्रदर्शितम् । श्रुतो गवामयननामक सत्रं संवत्सरनाम्ना संबोध्यते । अत एव संवत्सरस्तस्याङ्गतया विधीयते । सवत्सरस्यैतद् रूप यद् गोत्रम् । य एव विद्वान् समृद्धः स भवति । अत एव गोसत्रे सावनसंवत्सरस्यैव ग्रहण भवति, न सौरस्य चान्द्रस्य ' ' वा संवत्सरस्य । अहोरात्रे निष्पाद्यमानः सोमयागो वेदेऽहः शब्देन व्यवह्रियते । एवं चाहविशेषाणां गणः षडह। सूर्य १ / ९ / ५२/ ९ अर्थात् १४ मई सन् १ ९ ४६ होगा । इस तरह से द्यूतक्रीडा की तिथि और प्राकट्य तिथि का अन्तर सौरचान्द्रमान से १३ वर्ष १ दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का पहला दिन होगा । यही कालगणना सौर मान के अनुसार तेरह वर्ष छः दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का छठा दिन होगा । अंग्रेजी कालगणना के अनुसार तेरह वर्ष सात दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का सातवाँ दिन होगा । यही काल- गणना वेदाग ज्योतिष के अनुसार चान्द्रमान से १३ वर्ष ५ मास बारह दिन होगी । महाभारत में भीष्म पितामह ने यही व्यवस्था दी है । इससे स्पष्ट है कि महाभारत के युद्ध के समय सिद्धान्त ज्योतिष के अनुसार पंचाग की गणना की जाती थी । क्योंकि ऊपर बताई गई कालगणना सिद्धान्त ज्योतिष गणना के पंचाग को आधार मान कर निश्चित की गई है । चान्द्र, सावन और सोर के भेद से तीन तरह के महीने होते है । इसी तरह से वर्ष भी चान्द्र, सावन और सौर के भेद से तीन तरह का होता है । चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होकर फाल्गुन की अमावास्या तक चन्द्रकलाओ की वृद्धि और ह्रास के अनुसार प्रतिपदा से लेकर ३६० तिथियों का वर्ष चान्द्र संवत्सर कहलाता है । सावन संवत्सर में भी ३६० तिथियाँ होती है । सौर संवत्सर में सूर्य बारह राशियो का योग पूरा कर लेता है । इसका आरम्भ मेष राशि में सूर्य के प्रवेश के साथ होता है और जब तक सूर्य मीन राशि का योग पूरा नहीं कर लेता, तब तक यह चलता है । सोम याग में प्रात सवन, मध्याह्न सवन और सायं सवन ये तीन सवन एक दिन में किये जाते है । इस तरह से ये तीनों सवन ही दिन - रात मे पूरे होते हैं, इसलिये अहोरात्र को सावन कहा जाता है । इस तरह के तीन सौ साठ सावन दिनों में पूरा होने वाला वर्ष सावन संवत्सर कहलाता है । गोसत्र प्रभूति सत्रों में और अन्य लोक व्यवहारो में भी सावन संवत्सर का उपयोग मान्य है । जैसा कि विष्णुधर्मोत्तर में कहा गया-' सत्रो का अनुष्ठान सावन कालगणना के आधार पर करना चाहिये और इसी तरह से अन्य लौकिक व्यवहार कर्मों का संपादन भी इसी कालगणना के अनुसार होना चाहिये' । श्रुति में गवानयन नामक सत्र को सवत्सर नाम से संबोधित किया गया है । इसलिये संवत्सर काल उसका अंग है । 'गोसत्र संवत्सर का ही स्वरूप है, जो विद्वान् इस बात को जानते हैं,
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११५० वेदार्थपारिजातः इत्यभिधीयते । अभिप्लव-पृष्ठ्यभेदेन स द्विविधो भवति । चत्वारोऽभिप्लवा एक पृष्ठ्यश्चेति पञ्चभि: षडहैर्मास एक सम्पन्नो भवति । षष्टिसंख्याकैश्च षडहैः सावनः संवत्सरो निष्पद्यते । अत्र षडहोरात्राणां न्यूनीकरणे ३५४ दिनात्मक- श्वान्द्रः संवत्सरः सम्पन्नो भवति । सावने सवत्सरे सपादपञ्चदिनानां योजनेन सौरः सवत्सरो निष्पद्यते । अनया गणना- पद्धत्या त्रयोदशसोरसंवत्सराणां कालगणना यदा चान्द्रमानेन परिगण्यते, तदा त्रयोदशवर्षेषु पञ्चमासद्वादशदिना- भ्यधिकानि भवन्ति । ' संवत्सरे संवत्सरे यजेत' इति श्रुतौ चान्द्रसंवत्सर एव परिगृह्यते । कल्पसूत्रकारैरमावास्यापौर्णमासी- प्रभृतिषु चान्द्रतिथिष्वेव तेषामनुष्ठानं विधीयते । सुगतिप्राप्तये क्रियमाणानि व्रतानुष्ठानादीनि सौरसंवत्सरानुसारं विधीयन्ते 1। विष्णुधर्मोत्तरे तानि विहितानि । एवं च सूक्ष्मतमानामीदृशीना कालगणनानां सस्वेऽपि वेदादिशास्त्रेषु पाश्चात्त्यानां कथनमेतद् वितथमेव यद् भारतीया विद्वांस नक्षत्रमण्डलस्य द्वादशराशिषु विभाजनम्, सप्तवासराणां च ज्ञानं यूनानदेशीयविद्वद्भ्योऽधिगतवन्त इति । अहर्गणनां विना वारज्ञान नैव भवति । सिद्धान्तज्योतिषीया गणना - हर्गणाना माध्यमेन मध्यमचन्द्रस्य सूर्यप्रभृतिग्रहाणां मन्दोच्च- शीघ्रोच्चादिसस्कारान् विधाय सपाद्यते । 'एको अश्वो वहति सप्तनामा' इत्यस्मिन् ऋङ्मन्त्रे सप्तवासराणां निर्देशो विद्यते । हेमाद्रिग्रन्थस्य दानखण्डीये तृतीयप्रकरणे महा- भारतीय एकः श्लोकः समुद्धृतः । तत्र वर्णितं यद् मोममङ्गलगुरुवासरेष्वेकतमेन युताऽमावस्या ' पुःकरपर्व' इत्यभिधीयते । पर्वण्यस्मिन् स्नानेन सूर्योपरागावसरे कृतेन स्नानेन शतगुणितं फल लभ्यते । एवमेव देव्यथर्वशीर्षे 'भोमाश्विनी' इति पाठः समुपलभ्यते । अनेन स्पष्टीभवति यद् मङ्गलवासरो वेदेऽपि समुल्लिखित इति । एवमेव अयन ( कर्क- मकर) -विषुव ( मेष-तुला ) -षडशीतिमुख - ( मिथुन-कन्या -धन -मीन) - पर्व ( विष्णुपद-वृषभ कुम्भ- उनकी समृद्धि होती है' । इसलिये गोसत्र मे सावन संवत्सर ही लिया जाता है, सौर या चान्द्र संवत्सर नही । दिन- रात में पूरा होने वाला सोम याग वेद मे अहः शब्द से व्यवहृत होता है । इस तरह के अवशेषो का एक गण ' षडह' कहलाता है । यह षडह अभिप्लव और पृष्ठ्य के भेद से दो तरह का होता है । चार अभिप्लव और एक पृष्ठ्य इस तरह से इन पाच षडहो से एक मास संपन्न होता है । इस तरह के साठ षडहो से संपन्न होने वाले सावन मवत्सर मे छ: अहोरात्र निकाल देने पर ३५४ दिन होते हैं मोर यह चान्द्र सवत्सर कहलाता है | सावन संवत्सर मे सवा पाच दिन जोड देने पर सौर सवत्सर हो जाता है । इस प्रकार की गणना के अनुसार तेरह सौर संवत्सरों की कालगणना जब चान्द्र कालगणना के अनुसार की जायगी, तो उसमें तेरह वर्षों मे पाच मास और बारह दिन अधिक बढ़ जायेंगे । 'सवत्सरे संवत्सरे यजेत' इस श्रुति में चान्द्र संवत्सर का ही ग्रहण किया जाता है । कल्पसूत्रकारों ने अमावास्या, पौर्णमासी आदि चान्द्र तिथियों में ही उनके अनुष्ठान का विधान किया है । सुजन्म प्राप्ति के लिये व्रत के अनुष्ठान में सौर संवत्सर का विधान है । विष्णुधर्मोत्तर में इस तरह के व्रतों का विधान मिलता है । इस परिस्थिति में इस तरह की सूक्ष्म कालगणना का वेदादि शास्त्रो में उल्लेख मिलने पर भी पाश्चात्यों का यह कथन सर्वथा निराधार ही माना जायगा कि भारतीय विद्वानो को नक्षत्र मण्डल को बारह राशियों में बांटने का तथा सात वारों का ज्ञान यूनान देश के विद्वानों से प्राप्त हुआ था । अहर्गणना के बिना वार का ज्ञान हो हो नही सकता | सिद्धान्त ज्योतिष की गणना अहर्गणो के माध्यम से मध्यम चन्द्र, सूर्य प्रभृति ग्रहों के मन्दोच्च शीघ्रोच्च आदि संस्कारों के करने पर निष्पन्न होती है । 'एको अश्वो वहति सप्तनामा' इस ऋग्वेद के मन्त्र में सात वारों का संकेत मिलता है । हेमाद्रि के दान खण्ड के तृतीय प्रकरण में महाभारत का एक श्लोक उद्धृत है । उसका अभिप्राय यह है कि सोम, मंगल या गुरुवार से संयुक्त अमावास्या ' ' - - गुना पुष्कर पर्व के नाम से जानी जाती है । इसमें स्नान दान करने से सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान दान करने की अपेक्षा सो अधिक फल मिलता है । इसी तरह से देव्यथर्वशीर्ष में 'भोमाश्विनी' पाठ मिलता है । इससे स्पष्ट है कि मंगलवार का नाम वेद में भी उपलब्ध है । इस तरह से अयन (कर्क- मकर ), विषुव ( मेष- तुला), षडशीतिमुख ( मिथुन, कन्या, धन और मीन), पर्व (विष्णुपद अर्थात् वृषभ,