वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 251–260
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 251–260
पृष्ठ 251
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेवार्थपारिजातः ११५१ सह-वृश्चिक ) प्रभृतिनाम्ना महाभारते समुल्लेखो द्वादशसंक्रान्तीना सूचको वर्तते । अत्र अयन विषुव षडशीतिमुख-विशब्दा द्वादशराशीन् सङ्केतयन्ति । सक्रान्तीना तानीमानि नामानि वृद्धवशिष्ठस्मृतावपि स्मृतानि । द्वादशसक्रान्तिषु नयनद्वयम्, विषुवद्वयम्, षडशीतिचतुष्टयम्, विष्णुपदीचतुष्टय च तत्र वर्णितम् । वशपरम्पराप्राप्तानां भारतीयपञ्चाङ्गानामाधारेण स्पष्टमिदमुद्धोषयितुं शक्यते यदितः २०३१ वर्षेभ्यः ॥ग् विक्रमसंवत्सरारम्भस्तथा ५०७५ वर्षेभ्यः प्राग् युधिष्ठिरसंवत्सरारम्भ ' सजात इति । युधिष्ठिरे राज्यं शासति धृतराष्टः परलोक जगाम, महाभारत रचना च समजायत । ९७७वि० वत्सरे विद्यमान शिशुपालवधमहाकाव्यस्य टीका-कारो वल्लभदेव: 'त्वया विप्रकृत०' इति श्लोकव्याख्यानावसरे सपादलक्षश्लोकपरिमिता महाभारतसंहिता स्मरति । [: ल्लभदेवस्य पुत्रश्चन्द्रादित्यस्तस्य च पुत्र कैयट आसीत् । देवीशतकविवृतौ तेन स्वसमय ४०७८ कलिसवत्सर लिखित । विक्रम संवत्सरानुसार १०३४ वत्सरे तेन ग्रन्थोऽय रचित | महाभारतेन सह खिलभागस्य हरिवशस्य योजनेन सपादलक्षमिता श्लोकसख्या निष्पद्यते । एवमेव ९ ३७ वि० वत्सरे विद्यमानो राजशेखरः स्वकीये काव्य- मासाख्ये ग्रन्थे तृतीयाध्याये लक्षश्लोकमितां महाभारतसंहितां स्मरति । विक्रमस्य नवम्यां शताब्धा विद्यमान नन्दवर्धनाचार्यो ध्वन्यालोकवृत्तौ ( ३।१५ ) महाभारतशान्तिपर्ववणित गृध्रगोमायुसंवाद चर्चयति । तस्मिन्नेव ग्रन्थे तुर्थोद्यते 'महाभारतेऽपि० ' इत्यादिवाक्यावली स अनुक्रमणिकाध्यायतो महाभारतग्रन्थारम्भो भवतीति, हरिवंशाख्यो गोऽपि महाभारतस्यैवेति च वर्णयति । सप्तमशताब्दीभव आचार्यो महाकविश्च दण्डी स्वोयायामवन्तिसुन्दरीकथाया हाभारत तन्निर्मातारं भगवन्त वेदव्यास च स्मरति । इतोऽपि प्राग्भवेन बाणभट्टेन हर्षचरिते कादम्बर्यां च महा- तस्य भगवतो वेदव्यासस्य च नैकवारमुल्लेखः कृतः । तथाहि—कादम्बर्याः पूर्वभागे विन्ध्याटवीवर्णनावसरे- -, र्जुन स्थपताकाया विराटनगर्याश्च शबरसेनापतिवर्णनावसरे वकराक्षस भीष्मपितामह शिखण्डि पराशरप्रभृतीनाम् म्भ, सिंह और वृश्चिक, आदि नामो से महाभारत मे बारह सक्रान्तियो का वर्णन मिलता है । जैसे कि ऊपर मूल मे उद्धृत दो श्लोको मे ये अयन, विषुव, षडशीतिमुख प्रभृति शब्दो से उक्त बारह राशियों का संकेत मिलता है । सक्रान्तियो के ये हो नाम वृद्धवसिष्ठ स्मृति में ---पतरह से वर्णित है - 'इन बारह संक्रान्तियों में दो अयन, दो विषुव, चार षडशीति और चार विष्णुपदी कही जाती है' । वंश परम्परा से प्राप्त हमारे पचागो के आधार पर यह स्पष्ट घोषणा की जा सकती है कि आज से २०३१ वर्ष पहले क्रम के वर्ष का आरंभ हुआ था तथा ५०७५ वर्ष पहले युधिष्ठिर के वर्ष की प्रवृत्ति हुई थी । युधिष्ठिर के शासन काल मे ही धृतराष्ट्र परलोक वासी हो जाने पर महाभारत की रचना हुई । संवत् ९ ७७ मे विद्यमान शिशुपालवध महाकाव्य का टीकाकार वल्लभदेव वया विप्रकृत० ' इस श्लोक की टीका में महाभारत के सवा लाख श्लोको को चर्चा करता है । वल्लभदेव का पुत्र चन्द्रादित्य और द्रादित्य का पुत्र कैयट नाम से प्रसिद्ध हुआ । देवीशतक की विवृति में यह अपना समय ४०७८ कवि सवत् बनाता है । विक्रम के अनुसार यह १०३४ होता है । महाभारत के साथ हरिवंश को मिला देने पर उसकी श्लोक संख्या सवा लाख पूरी हो जाती । संवत् ९ ३७ में विद्यमान राजशेखर अपने काव्यमीमासा नामक ग्रन्थ के तीसरे अध्याय मे महाभारत को एक लाख श्लोकों की हेता के रूप में स्मरण करता है । विक्रम की नवी शताब्दी में विद्यमान आनन्दवर्धन ध्वन्यालोक ( ३।१५ ) की वृत्ति मे महाभारत शान्तिपर्व में स्थित गृध्रगोमायु संवाद की चर्चा करता है । उसी ग्रन्थ के चतुर्थ उद्यात में 'महाभारतेऽपि ० ' इत्यादि वाक्यावली आनन्दवर्धन अनुक्रमणिकाध्याय से महाभारत का आरंभ मानते हैं और हरिवंश को भी महाभारत का ही अश कहते है | सातवीं आब्दी का आचार्य और कवि दण्डी अपनी अवन्तिसुन्दरी कथा में महाभारत को और उसके निर्माता भगवान् वेद व्यास को स्मरण 1 + रता है । इससे भी पहले उत्पन्न हुए भट्ट बाण हर्षचरित और कादम्बरी में अनेक बार महाभारत और वेदव्यास का उल्लेख करते । जैसे कि कादम्बरी के पूर्व भाग में विन्ध्याटवी का वर्णन करते समय अर्जुन के रथ को पताका का और विराट नगरी का शबर पति के वर्णन में वक राक्षस, भीष्म पितामह, शिखण्डी और पराशर का; आश्रम का वर्णन करते समय महाभारत में हुए शकुनि
पृष्ठ 252
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात. ११५२ ,, आश्रमवर्णनावसरे शकुनिवधस्य उज्जयिनीवर्णने कद्रूकथाया हरिवंशस्य च राजगुणवर्णने दुःशासनकृतापराधस्य शुकनासकृतोपदेशे जरासन्धभागद्वयसंयोजनकथायाश्चोल्लेखो विद्यते । एवमेव हर्षचरितस्य षष्ठोच्छ्वासे जामदग्न्यस्य रामस्य हिडिम्बायाश्च कथा महाभारतीयोल्लिखिता । हर्षचरितोपाद्धातश्लोकेषु महाकविना बाणभट्टेन सर्वविदे कविवेधसे व्यासाय नमस्कारनिवेदनमिषेण महाभारतकारस्य वेदव्यासस्य महाभारतकथायास्त्रिलोक्यां प्रसारस्य च वर्णनं कृतम् । बाणभट्टसमकालीनः काशिकाका रो जयादित्योऽपि 'द्रोण० ' ( ४।१।१०३ ) इत्यादिसूत्रव्याख्यानावसरे वर्ण- यति यदत्र महाभारतकथावणितस्य द्रोणाचार्यस्य ग्रहण न भवतीति । महाकविना कालिदासेन मेघदूते ' क्षेत्र क्षत्र ० इत्यादिके श्लोके महाभारत स्मर्यते । जयादित्यात् प्राग्भवेन भट्टपादकुमारिलेन औत्पत्तिकसूत्रश्लोकवार्त्तिके पाराशर्यो व्यासः समुल्लिखितः । कुमारिलसमकालीनो धर्मकीर्तिः स्वकीये प्रमाणवार्त्तिके महाभारतं चर्चयति । ६२७ वि० संवत्सरात् प्राग् विद्यमानो वाक्यपदीयकारो भर्तृहरिः स्वग्रन्थस्य ब्रह्मकाण्डीये १४२ तमे श्लोके महाभारतीयं 'गौरिव ० ' इत्यमुं श्लोकमितिहासवचनत्वेन समुद्धरति । सुबन्धुकृताया वासवदत्तायां प्रसङ्गवशात् स्मृतेन न्यायवात्तिककारेणो- ( ) ' ' द्योतकरेण ४।१।३१ संख्याकन्याय गोतम सूत्रव्याख्यानावसरे महाभारतीयवनपर्वणि विद्यमानः अज्ञो जन्तु० इत्यादिकः श्लोकः समुद्धतः । एवमेव योगभाष्ये 'प्रज्ञाप्रासाद ० ' इत्यादिको महाभारतीयः श्लोकः समुपलभ्यते । संवत् १ ९ १ त आरम्य २१४ यावत् तियङ्किता महाराजस्य सर्वनाथस्यानेके शिलालेखाः प्राप्यन्ते । पाश्चात्त्यपद्धत्य- नुसारमत्र कलिसवत्सरस्योल्लेखो वर्तते 1। तत्रैकस्मिन् ताम्रलेखे एकलक्षश्लोकात्मक महाभारतं पराशरपुत्रेण व्यासेन ( ) रचितमिति स्पष्टमुल्लिखितम् । अस्मात् ताम्रलेखादपि प्राचीनेन शबरस्वामिना मीमांसासूत्र ८1१/२ भाष्ये महाभारतस्यादिपर्वणि स्थितः 'विस्तीर्य हि' इत्यादिकः श्लोकः समुद्धृतः । 'एष चाख्यानसमय:' इति निरुक्तवचनं व्याकुर्वता भाष्यकारेण दुर्गाचार्येणोक्तं यन्महाभारतमपि मतमेतत् पोषयति यत् पृथिवी स्त्रीरूप धारयित्वा स्वभार- तनूकरणार्थं ब्रह्माण प्रार्थितवती, अग्निना ब्राह्मणरूपं धारयित्वा खाण्डववनदाहाय कृष्णार्जुनयो: साहाय्यं भिक्षितम्, के वध का; उज्जयिनी के वर्णन में कद्र की कथा का और हरिवश का, राजा के गुणो का वर्णन करते हुए महाभारत में हुए दुःशासन के अपराध का; शुकनास के वर्णन में जरासन्ध के दो हिस्सो को जोडने को कथा का वर्णन मिलता है । इसी तरह से हर्षचरित के छठे उच्छ्वास में जामदग्न्य राम का और हिडिम्बा का उल्लेख मिलता है । हर्षचरित के उपोद्घात श्लोको में महाकवि भट्ट बाण ने सभी कवियो की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा के रूप मे महाभारतकार वेदव्यास का तथा महाभारत की कथा के त्रिलोकी में व्याप्त हो जाने का वर्णन किया है । काशिकाकार जयादित्य भी, जो कि बाण के समय का ही लेखक है, 'द्रोण ० ' इत्यादि पाणिनि सूत्र की व्याख्या करते हुए बताते है कि इस सूत्र में द्रोण शब्द से महाभारत की कथा में वर्णित द्रोण का ग्रहण नही किया जाता । कालिदास ने मेघदूत के ' क्षेत्रं क्षत्र ० ' इत्यादि श्लोक मे महाभारत को स्मरण किया है । जयादित्य से पहले हुए भट्टपाद कुमारिल बोत्पत्तिक सूत्र के श्लोकवात्तिक में पाराशर्य व्यास का उल्लेख करते है । कुमारिल का समकालीन धर्मकीर्ति अपने प्रमाणवार्तिक में महाभारत की चर्चा करता है । संवत् ६२७ से पहले विद्यमान वाक्यपदीयकार भर्तृहरि अपने ग्रन्थ के प्रथम ( ब्रह्म ) काण्ड के १४२वें श्लोक में महाभारत के 'गौरिव० ' इत्यादि श्लोक को इतिहास के वचन के नाम से उद्धृत करता है । सुबन्धु की वासवदत्ता में प्रसंगवश उल्लिखित न्यायवात्तिककार उद्योतकर ( ४११/२१ ) संख्या के न्याय ( गोतम ) सूत्र में महाभारत के वनपर्व में विद्यमान 'अशो जन्तु०' इत्यादि श्लोक को उद्धृत करते हैं । इसी तरह से योगभाष्य में योगभाष्यकार 'प्रज्ञाप्रासाद' इत्यादि महाभारत के श्लोक को उद्धृत करते हैं । संवत् १ ९ १ से २१४ तक के महाराज सर्वनाम के अनेक शिलालेख मिले हैं । पाश्र्चात्य पद्धति के अनुसार इसको कलि संवत् माना गया है । इनमें से एक ताम्रलेख मे एक लाख श्लोकात्मक महाभारत की रचना पराशर के पुत्र व्यास ने की, इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है । शबरस्वामी, जिसका कि समय इस ताम्रलेख से भी प्राचीन है, मीमांसासूत्र ( ८1१1३ ) के भाष्य में महाभारत के आदि पर्व का एक श्लोक ( ' विस्तीर्य हि० ' इत्यादि) उद्धृत करते है । 'एष चाख्यानसमयः निरुक्त के इस वचन की व्याख्या करते हुए भाष्यकार दुर्गाचार्य कहते हैं कि महाभारत में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि पृथिवी ने स्त्री का रूप धारण कर
पृष्ठ 253
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः ११५३ , अग्निपुरुषरूपेण तेन खाण्डववन दग्धमिति । लङ्कावतारसूत्रनामके बौद्धग्रन्थे यस्य चीनीभाषायामनुवादः ५७ ई० वर्षे संजातः, व्यासभारतयोरुल्लेखो वर्तते । नत्रोक्त यद् भगवतो बुद्धस्य निर्वाणानन्तरं व्यास-कणाद ऋषभ-कपिल- शाक्यनामका अन्ये च महापुरुषा समुत्पत्स्यन्त इति । मम निर्वाणाच्छतवर्षानन्तर व्यासो महाभारतं रचयिष्यति, यत्र कौरवपाण्डवयोर्युद्ध वर्ण्यते । तदनन्तर मोर्या नन्दा गुप्ता म्लेच्छाश्च राजानो भविष्यन्ति । शस्त्रसंक्षोभ एष म्लेच्छ राज्य पर्यन्त प्रचलिष्यति । पर्यन्ते भविष्यति कलियुगस्य प्रवृत्तिरिति । वररुचेनिरुक्तसमुच्चये दृश्यते— ' बिभेत्यल्प- श्रुताद्वेदो मामय प्रहरिष्यति' इति । श्लोक एष व्यासवचनत्वेन तत्र समुद्धतः । महाभारतस्य सर्वेषु पुष्पिकावाक्येषु शतसाहस्री संहितेति समुल्लेखो वर्तते । एवप्रकारकै रुपर्युद्धतेः प्रचुरैः प्रमाणे र्लक्षेकश्लोकमित सम्पूर्ण महाभारत व्यासस्यैव कृनिरिति स्पष्टं सिद्धयति । यत्तु पाश्चात्यैरुक्तम् -'ब्राह्मणग्रन्थेषु ग्रन्थकारा मतभेदमपि वर्णयन्ति । ते परस्पर विवदन्ते स्म । एकेन ब्राह्मणग्रन्थेन बाधितस्याभ्यब्राह्मणग्रन्थस्य लोपोऽपि जात' । शुक्लयजुर्वेदीय ब्राह्मग्रन्थस्य पूर्वं षष्टिरध्याया आसन्, इदानीं शतमध्यायाः सन्ति' इति, तदपि तुच्छम्, कठादिसंज्ञावत् ताण्ड्य शतपथादिसंज्ञानामप्यनादित्वेन तन्निर्माणकालकल्पनाया निर्मूलत्वात् । प्रवचनमूलिकाश्च सज्ञा न तु रचनामूलिका इति बहुश उक्तत्वात् 1 यद्यपि ताण्ड्यादिसंज्ञा अध्यापनमूलिका रचनामूलिकाश्चोभयथापि सम्भवन्ति, तथाप्यध्यापनमूलिका एव संज्ञा ग्राह्याः, उभयसम्मतत्वात् । रचनामूलिकाः संज्ञास्तु न वैदिकानां सम्मताः । ज्ञानधर्मोन्नत्यादयस्तु ब्राह्मणग्रस्थानां प्रचार- मूलका न निर्माणमूलका: । यत्तु - ' पूर्वं मुद्रणव्यवस्थाया अभावात् पाठभेदा ' सञ्जाताः' इनि, तदनि न क्षोदक्षमम्, वेदानामनुश्रवत्व- प्रसिद्धेः । गुरोर्मुखादनुश्रूयत इत्यनुश्रवो वेद: । न केनचिन्निर्मीयते न वा तत्र पाठभेदसम्भवः । तत्र मात्रामात्रस्यापि अपना भार हलका करने के लिये ब्रह्मा से प्रार्थना की थी, अग्नि ने ब्राह्मण का स्वरूप धारण कर खाण्डव वन को जलाने में कृष्ण और अर्जुन से सहायता मांगी थी और उसने अग्नि रूप में ही पुरुष के रूप में भी खाण्डव वन को जला डाला था । लङ्कावतार सूत्र नामक बौद्ध ग्रन्थ का चीनी अनुवाद ५७ ई० सवत् में हुआ था । वहाँ व्यास और भारत दोनो के नाम मिलते हैं । वहाँ कहा गया है-' मेरे निर्वाण प्राप्त कर लेने के उपरान्त व्यास, कणाद, ऋषभ, कपिल, शाक्य नाम के और इसी तरह के और भी व्यक्ति पैदा होगे । मेरे निर्वाण के सौ वर्ष बाद व्यास भारत की रचना करेंगे, जिसमे कौरव और पाण्डवों के युद्ध का वर्णन होगा । इनके बाद मौर्य नन्द, गुप्त और म्लेच्छ राजा होगे । यह शस्त्र सक्षोभ अर्थात् युद्ध, मारकाट आदि म्लेच्छ राजाओ के होने तक चलता रहेगा । अन्त में कलियुग की प्रवृत्ति होगी' । वररुचि के निरुक्तसमुच्चय में ' अल्पश्रुत ( अल्पज्ञ ) व्यक्ति से वेद डरता रहता है कि यह अपने अज्ञान से मेरा दुरुपयोग करेगा' । यह श्लोक व्यास के वचन के रूप में उद्धृत है । महाभारत के सभी पुष्पिका वाक्यो में शतसाहस्री (सौ हजार, अर्थात् एक लाख श्लोक की ) सहिता के रूप में इसका उल्लेख है, ऊपर उद्धृत इन सब प्रचुर प्रमाणो के आधार पर एक लाख श्लोक का यह पूरा महाभारत व्यास की ही रचना है, यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हो जाता है । पाश्चात्य विद्वानों का कहना है कि 'ब्राह्मण ग्रन्थों में ग्रन्थकार परस्पर मतभेद प्रदर्शित करते है और उनमे विवाद भी होता है । एक ब्राह्मण ग्रन्थ के द्वारा खण्डित दूसरा ब्राह्मण ग्रन्थ लुप्त भी हो गया है । शुल्क यजुर्वेद के ब्राह्मण में पहले ६० अध्याय थे, आजकल उसमें १०० अध्याय है' यह सब व्यर्थ की बात है । कठ प्रभूति संज्ञा के समान ताण्ड्य शतपथ आदि संज्ञाओ के भी अनादि होने से इनसे ब्राह्मण ग्रन्थो के निर्माण का समय निर्धारण नही किया जा सकता । यह हम अनेक बार कह चुके है कि ये नाम प्रवचनकर्ता के नाम के कारण पडे है, ये ऋषिगण उनके रचयिता नही हैं । यद्यपि ताण्ड्य प्रभृति संज्ञाएं अध्यापन के कारण और रचना के कारण दोनो ही तरह से हो सकती है, तो भी अध्यापन अर्थात् प्रवचनमूलक हो ये संज्ञाएं मानी जानी चाहिये, क्योंकि यह बात दोनों ही पक्षों को मान्य है । ये संज्ञाएं रचनामूलक हैं, यह बात वैदिकों को स्वीकार्य नही है । एक की अपेक्षा दूसरे में ज्ञान, धर्म इत्यादि की जो उन्नति देखी जाती है, यह प्रचार के कारण है, निर्माण के कारण नही । १४५
पृष्ठ 254
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
BY वेदार्थपारिजातः व्यत्यासो न सम्भवति । तदर्थमेव मन्त्रेषु पदक्रमादिदशविकृतयः । ताभिस्तत्स्वरूपरक्षाय वैदिकैयंत्यते । अत एवाद्यत्वे मुद्रण प्रसारबाहुल्य युगेऽपि शुद्धपाठनिर्धारणाय घनान्तिनो वैदिका एवाश्रियन्ते । अत एव कलिकालादिषु ग्रन्थानां विलोपेऽपीश्वरे ब्रह्मणि चतुर्मुखे ऋषिषु चाविच्छिन्नपारम्पर्येण वेदाः सर्वेऽपि तिष्ठन्ति । अद्यापि वैदिकेषु वेदाः कण्ठस्था एव भवन्ति । 'हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये न पर घनम्' ( वाल्मीकीय रामायणेऽयोध्याकाण्डे ४५।२५ ) । बेवर' कथयति ' शाकलीसंहितेति नाम्ना शाकल्यर्षेरस्या सम्बन्धो विज्ञायते । ब्राह्मणग्रन्थेषु शाकल्यस्य चर्चा दृश्यते, तेन तस्याः पौरुषेयत्वं सिद्धयति' इति, तदपि तुच्छम्, निरुक्तकारेण शाकल्यस्य पदपाठकर्तृत्वाभ्युपगमात् । यदुक्तम् -'शतपथब्राह्मणे जनकसभायां याज्ञवल्क्येन स पराजितः शप्तश्च तच्छिरो निपतित तदस्थीनि च चौरंरप हृतानि । तस्मिन्नेव च ब्राह्मणे वाष्कलिमहर्षेरपि चर्चा विद्यते । पुराणेषु शाकलानां शुनकानां च सम्बन्धो ज्ञायते । शौनकेन ऋग्वेदस्य रक्षार्थमृषिच्छन्दोदेवतानामनुवा कसूक्तानां चानुक्रमणी निर्मिता । बृहद्देवता, ऋग्वेदप्रातिशाख्यम्, ऐतरेयसम्बन्धिस्मार्तसूत्रं कल्पसूत्र च निर्मितम्, परन्तु स्वशिष्येणाश्वलायनेन निर्मित कल्पसूत्रं दृष्ट्वा तन्नाशितम् । शाकलसंहिताया द्वितीयमण्डल शौनकेन रचितमिति सम्भाव्यते । स एवाय शौनको यस्य यज्ञमहोत्सवे वैशम्पायनपुत्रेण सौतिना महाभारतं श्रावितम । वैशम्पायनेन हरिवशसहिता महाभारतकथा जनमेजयाय श्राविता । शुनकानां वश ,, ऋग्वेदीयैः प्राचीनैर्ऋ षिव सम्बद्धः नूतनकालेऽपि महर्षिसभासु समादरणीय आसीत् । आश्वलायनगुरुः शौनकः , नैमिषारण्यीययज्ञकर्ता शौनकश्चाभित्र एव । शुक्लयजुर्वेदीयब्राह्मणानुसारेण शोनको द्वो दृश्येते । इन्द्रोतः शौनकः स्वैडायन औदीच्य: शौनकश्च । प्रथमेन जनमेजययज्ञस्यात्विज्यं कृतम्' इत्यादि । 'पहले पुस्तकों के छपाने की व्यवस्था न होने से इनमें पाठ भेद हो गये' यह उक्ति भी तर्क को कसौटी पर ठीक नही उतरती, क्योकि वेदो की आनुभविकता प्रसिद्ध है । गुरु के मुख से जो सुना जाता है, इस प्रकार वेदों को अनुभव कहा जाता है । इसका कोई निर्माता नही है और न यहाँ कोई पाठभेद ही सम्भव है । यहाँ पर एक मात्रा का भी हेर-फेर नही हो सकता । इसी के लिये ग्रन्थों में पद क्रम आदि दस विकृतिया प्रचलित है । इनके माध्यम से वैदिक गण उसके स्वरूप को ज्यों का त्यो रख पाने में समर्थ होते है । इसी लिये इस युग में भी जब कि छपाई का बहुत प्रसार हो गया है, शुद्ध पाठ का निर्णय करने के लिये घनान्ती वेदपाठी ही प्रमाण माने जाते है । इसीलिये कलियुग आदि में ग्रन्थो के लुप्त हो जाने पर भी ईश्वर, ब्रह्म, चतुर्मुख ब्रह्मा और ऋषियों में अविच्छिन्न परम्परा से सारे वेद विद्यमान रहते है । आज भी वैदिकों को वेद कण्ठस्थ है । वाल्मीकि रामायण में कहा गया हैं कि 'जो वेद सदा हृदय में अवस्थित रहते है, वे ही हमारी उत्कृष्ट सम्पत्ति हैं' । बेवर का कहना है कि 'शाकली संहिता इस नाम से शाकल्य ऋषि से इस संहिता का सम्बन्ध जुड़ता है । ब्राह्मण ग्रन्थों में शाकल्य की चर्चा है । इससे इस संहिता की पौरुषेयता सिद्ध होती है' यह भी कुछ नहीं है, निरुक्तकार ने शाकल्य को पदपाठ का कर्ता माना है । साथ ही बेवर ने यह भी कहा है कि -'शतपथ ब्राह्मण में वर्णित है कि जनक की सभा में याज्ञवल्क्य ने शास्त्रार्थ में उसे हरा दिया और शाप दे दिया । उसका शिर गिर पडा और उसकी हड्डिया भी चोरों ने चुरा ली । उसी ब्राह्मण में वाष्कल ऋषि की भी चर्चा है । पुराणों से शाकल और शुनक वंशों का परस्पर सम्बन्ध था, यह ज्ञात होता है । शौनक ने ऋग्वेद की रक्षा के लिये ऋषि, छन्द, देवता, अनुवाक और सूक्तो की अनुक्रमणियां बनाई थीं । बृहद्देवता, ऋग्वेद प्रातिशाख्य, ऐतरेय सम्बन्धी स्मार्त सूत्र और कल्प- सूत्र का निर्माण भी इन्होने किया । अपने शिष्य आश्वलायन के बनाये कल्पसूत्र को देख कर इन्होंने अपना कल्पसूत्र नष्ट कर दिया । यह संभावना की जाती है कि शाकल संहिता का द्वितीय मंडल शौनक की रचना है । यह वही शौनक है, जिसके यज्ञ महोत्सव के अवसर पर वैशम्पायन पुत्र सोति ने महाभारत सुनाई थी ॥ वैशम्पायन ने हरिवंश सहित पूरे महाभारत की कथा जनमेजय को सुनाई थी । शुनक वंश ऋग्वेद के प्राचीन ऋषि कुलो से सम्बद्ध है । नूतन काल में भी महर्षियों की सभा में उसका आदर होता था । आश्वलायन के गुरु शौनक और नैमिषारण्य में यज्ञ करने वाले शौनक एक ही ऋषि थे । शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मण के अनुसार दो शौनक ज्ञात होते है । एक इन्द्रोत शौनक और दूसरे औदीच्य स्वैडायन शौनक । इनमें से पहले जनमेजय के यज्ञ के ऋत्विक थे' इत्यादि ।
पृष्ठ 255
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बेदाथपारिजातः ११५५ तदेतत्सर्वं बेवरस्याज्ञानमूलकमेव, काठकादिसमाख्यावत् शाकलादिसमाख्याया अपि प्रवचनमूलकत्वा- भ्युपगमेन तददोषात् । सहितासङ्कलन तु व्यासकर्तृकमेव । शतपथीया कथापि सुखावबोधार्था आख्यायिकैव वेदार्था-. भ्यासिन प्रशंसापरैव । ब्रह्मविदां समक्षेऽभिमानमपहाय नम्रव्यवहारः कर्तव्य इत्येवमुपदेशपरा । आश्वलायनगुरोः शौनकस्य नैमिषयज्ञकर्तु. शौनकस्याभेदे किञ्चिदपि मान नोपलभामहे । पुराणेषु कानिचिच्चरित्राणि ब्राह्मणभागानु- सारीणि कानिचित्पुराणकर्तृभिर्लोक शिक्षार्थमाख्यायिकारूपाणि कल्पितानि । प्रथमानि ब्राह्मणभागानुवादमात्राणि वेदाक्षरश्रवणानधिकारिणा वेदार्थज्ञानजन्यशिक्षार्थानि पुण्यलाभार्थानि च । तेषां स्वार्थे तात्पर्यं नास्त्येव 1। विधेय- स्तुतिर्निषेध्यनिन्दैव तेषा मुख्योऽर्थ । तेन कस्यचिच्चरित्रविशेषस्य कालविशेषस्य न निर्णयो न भवति । अन्तिमस्य पुरञ्जनोपाख्यानरूपस्यापीयमेव स्थितिः । तदुभयभिन्नपौराणिक चरित्राण्यवश्यं व्यक्तिविशेपसम्बद्धानि भवन्ति । तेषु कानिचिद् ब्राह्मणभागीयनामभिश्चरित्रैश्च तुल्यानि, तथापि न तान्यभिन्नानि । कुतः? पौराणिकव्यक्तिविशेषाः सादयः, ब्राह्मणभागरूपो वेदस्त्वनादि । तथैव मन्त्रेष्वपि पौराणिकानां पुरूरवउर्वश्यहल्येन्द्रादीनां तुल्याम्येव नामानि चरित्राणि चोपलभ्यन्ते । तथापि न तान्यभिन्नानि । न च नामादिसाम्यमात्रेण वेदोक्तमेव चरित्र पुराणेषूपनिबद्धमिति वक्तुं शक्यते, वैदिकनाम्ना जातिमात्रवाचकत्वेन व्यक्तिविशेषेषु तात्पर्याभावात् । पुराणानां च व्यक्तिविशेषेऽपि तात्पर्याभ्युपगमात् ॥ किञ्चानादिसृष्टिप्रलयप्रवाहे समानानुपूर्वीकाणा नाम्ना वृत्तानां वा सत्त्वं नासम्भवम् । ततः केनचित्सम्बन्धेन वेदानां पुराणाना च काकतालीयन्यायेन क्वचित् सबन्धेऽपि न तेन वेदानां निर्माणकालो निर्णेतुं शक्यः । यद्वा सृष्टेः शब्दपूर्वकत्वसिद्धान्तरीत्या यदि वैदिकाख्यानानुसारिणी काचिद् घटना घटेतापि, तदापि न घटनानुसार्याख्यानोल्लेखोऽभ्युपेयते, तस्यानादित्वात् । लोक आख्यानस्य घटनापूर्वकत्वेऽपि न वेदे तथाभ्युपगमः, किन्तु तत्र यह सब कथन अज्ञानमूलक है, काठक आदि की समाख्या के समान शाकल आदि समाख्या को प्रवचनमूलक मान लेने पर इन सारे दोषो का परिहार हो जाता है । सहिताओ का संकलन तो व्यास ने किया है । शतपथ की कथा विषय को सरलता से समझाने वाली एक कहानी है । इससे वेदाभ्यासी की प्रशंसा और प्रभाव ही प्रदर्शित होता है । ब्रह्मज्ञ के सामने अभिमान छोड कर नम्र व्यवहार करना चाहिये, यही उपदेश इससे मिलता है । आश्वलायन के गुरु शौनक और नैमिषारण्य में यज्ञ करने वाले शौनक की अभिन्नता में कोई प्रमाण नही है । पुराणो में कुछ चरित्र ब्राह्मण भाग का अनुसरण करते हैं और कुछ पुराणकर्ताओ के द्वारा लोकशिक्षा के लिये आख्यायिका के रूप में कल्पित है । प्रथम ब्राह्मण भाग के अनुवाद मात्र है । जो वेदाक्षरश्रवण के अधिकारी नही है, उनको वेदार्थ ज्ञान की शिक्षा इनसे दी जाती है, जिससे कि उनको भी पुण्य लाभ हो सके । उनका स्वार्थ में कोई तात्पर्य नही है । विधेय की स्तुति और निषेध्य की निन्दा करना ही उनका मुख्य प्रयोजन है । इससे किसी चरित्रविशेष का और कालविशेष का निर्णय नही होता । अन्तिम पुरंजन उपाख्यान की यही स्थिति है । इन दोनो से भिन्न पौराणिक चरित्र अवश्य ही व्यक्तिविशेष से सम्बद्ध है । इनमें से कुछ ब्राह्मण भाग में आये नाम और चरित्र से समान होने पर भी एक ही नही हैं, क्योंकि पौराणिक व्यक्ति विशेष तो सादि है और ब्राह्मण भाग रूप वेद अनादि । इसी तरह मन्त्रो में भी पौराणिक पुरूरवा -उर्वशी, अहल्या, इन्द्र प्रभृति समान नाम और चरित्र उपलब्ध होते हैं, तो भी ये एक ही नही है और न केवल नाम की सदृशता को लेकर यही कहा जा सकता है कि वेद में कहा गया चरित्र ही पुराणो मे भी वर्णित है । वैदिक नाम जातिमात्र के वाचक है, अतः उनका किसी व्यक्तिविशेष में तात्पर्य नही माना जा सकता । पुराणो का तो व्यक्तिविशेष में भी तात्पर्य माना जाता है । सृष्टि और प्रलय के अनादि प्रवाह में समान आनुपूर्वी वाले नाम और वृत्त कथाओ का रहना असंभव नही है । इससे किसी प्रकार वेद और पुराणो का काकतालीय- न्याय से संबन्ध प्रतीत होता हो, तो भी उससे वेदों का निर्माणकाल नही निर्णीत हो सकता । अथवा शब्द से सृष्टि होती है, इस सिद्धान्त के अनुसार यदि वैदिक आख्यान का अनुसरण करने वाली कोई घटना हो तो उससे घटना के अनुसरण पर यह आख्यान वर्णित है, ऐसा नही कहा जा सकता, क्योंकि वेद का वह आख्यान तो अनादि है । लोक में किसी घटना के घटित हो जाने पर ही तदनुसारिणी कोई कथा बनती है, किन्तु वेद में ऐसा नही माना जा सकता । वहाँ 1
पृष्ठ 256
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११५६ वेदश्यपारिजातः घटनाया एवाख्यानपूर्वकत्वमिति बहुशो निरूपितम् । लोके शब्दसृष्टेरर्थं पूर्वकत्वेऽपि वैदिकशब्दानामर्थपूर्वकत्वाभावात् । तदेतत्सर्वं देवताधिकरणे मनोहत्यालोचनीयम् । aastra कथयति - 'वेदानां निर्माणकालान्वेषणे बलादिदं वक्तव्यमापतति यदेते मन्त्रा अतिप्राचीना । पौराणिका इतिहासभूगोलादयोऽतिस्पष्टतयाऽत्र मन्त्रेषु वर्णिताः । ऋक्षु बह्वयस्तादृश्य ऋचोऽप्युपलभ्यन्ते यासामुत्पत्ति-: समयस्थानावस्था अपि ज्ञायन्ते । अतिप्राचीनाभि ग्भिरिद विज्ञायते यद् आर्या सिन्धुनद्यास्तटे निवसन्तो विभिन्न- जातिभिर्विभक्ताः परस्परं विरोधिनश्चासन्' इति, तदेतत्सर्वं सारशून्यमेव, सर्वासां कथानामाख्यायिकामात्रत्वेन स्वार्थे तात्पर्याभावस्योक्तत्वात् । ब्राह्मणानामपि वेदत्वम् सामाजिका मन्त्राणामेव वेदत्वमङ्गीकुर्वन्ति, तेषामेव स्वतःप्रामाण्याभ्युपगमात् । परमत्रापि मन्त्राणामेव प्रामाण्यं वक्तव्यं तैः । अमुकामुका मन्त्रा वेदा इत्यपि वेदमन्त्रैरेव साधनीयम् । मन्त्राणा वेदत्वं प्रामाण्य सिद्धयायत्तमेव । मन्त्रैर्मन्त्राणां वेदत्वसाधनमपि सङ्गच्छते नान्यथा । स्वप्रामाण्यसिद्धये स्वघटकप्रामाण्योपस्थापने आत्माश्रयदोषोऽपि । यद्यार्ष ग्रन्यैस्तत्प्रामाण्योपपादन तदा ब्राह्मणभागस्य वेदत्वमार्ष सूत्रे रुपपाद्यते । तत्तु समानयोगक्षेमम् । सूर्यदृष्टान्तेन स्वस्मिन् स्वस्यैव प्रामाण्योपपादन तु खण्डितमेव । तथात्वे नास्तिकैरपि तत्प्रामाण्याभ्युपगमापातात् । वेदत्वप्रसिद्धिस्तु मन्त्राणामिव ब्राह्मणानामप्यस्त्येव । बहुविज्ञप्रसिद्धिर्बहुजनप्रसिद्धिरपि सनातनिपक्ष एवास्ते । ब्राह्मणानां वेदत्वनिषेधोऽपि प्राप्तावप्राप्तौ वा? नान्त्यः, अप्राप्तस्य निषेधायोगात् । मम्वादिस्मृतीना- मपि वेदत्वनिषेधापत्तेः । नाद्यः, विकल्पासहत्वात् । तथाहि प्रामाणिकी प्राप्तिप्रामाणिकी वा? नाद्या, प्रामाणिक- पर तो घटना ही वेदोक्त आख्यान का अनुवर्तन करती है, यह बात हम अनेकशः कह चुके है । लोक में शब्द की सृष्टि अर्थ का अनुसरण करती है, किन्तु वैदिक शब्दो मे अर्थपूर्वकता नही मानी जाती । ये सब बाते देवताधिकरण मे मनलगा कर देखनी चाहिये । बेवर ने भी अन्त में यही कहा है कि ' वेदो के निर्माणकाल का अन्वेषण करते समय जबरदस्ती यह कहना ही पड़ता है कि ये मन्त्र अत्यन्त प्राचीन है । पौराणिक इतिहास, भूगोल आदि विषय इन मन्त्रो मे अतीव स्पष्ट रूप से प्रतिपादित ,,है । ऋचाओं में अनेक ऐसी है जिनसे कि उनकी उत्पत्ति के समय स्थान और अवस्था का ज्ञान होता है । अतिप्राचीन ऋचाओं से यह ज्ञात होता है कि आर्य सिन्धु नदी के तट पर बसे हुए थे । वे विभिन्न जातियो मे बँटे हुए परस्पर लड़ते- झगडते थे' । यह सब सारहीन कथन है । ये सारी कथायें कोरी कहानियाँ है । इनका स्वार्थ के प्रतिपादन में कोई तात्पर्य नही है, यह कहा जा चुका है । ब्राह्मणग्रन्थ भी वेद हैं आर्यसमाजी केवल मन्त्रों को ही वेद मानते है, क्योकि ये मन्त्र हीस्वतः प्रमाण हैं । किन्तु यहाँ पर उनको मन्त्रों का भी प्रामाण्य सिद्ध करना पड़ेगा । अमुक-अमुक मन्त्र वेद है, यह भी उनको वेद मन्त्रो से ही सिद्ध करना पडेगा । मन्त्रों की वेदता प्रामाण्य सिद्धि के अधीन है । मन्त्रो से ही मन्त्रों की वेदता सिद्ध हो सकती है, अन्यथा नही । अपने प्रामाण्य की सिद्धि के लिये अपने में से ही प्रमाण खोजना आत्माश्रय दोष कहलाता है । यदि आर्ष ग्रन्थों से उसका प्रामाण्य उपपादित किया जाता है तो ब्राह्मणभाग की भी वेदता ऋषि प्रणीत सूत्रों से उपपादित है । इस प्रकार न केवल मन्त्रों की, ब्राह्मण भाग की भी वेदता समान योग- क्षेम से सिद्ध हो जायगी । सूर्य के दृष्टान्त से अपने से अपने में प्रामाण्य के उपपादन का पहले खण्डन किया जा चुका है । इसके उपरान्त भी यदि यह मान लिया जाय तो नास्तिक जन उसको क्यों नहीं प्रमाण मान लेते । मन्त्रों के समान ब्राह्मण भाग भी वेद नाम से प्रसिद्ध ही है । अनेक विद्वानों की और अनेक जनसमुदाय की प्रसिद्धि भी सनातनी के पक्ष में ही है । ब्राह्मणो में वेदत्व का निषेध आप करते हैं । ब्राह्मणों में वेदस्व कही से प्राप्त है, इसलिए आप उसका निषेध कहते है, या बिना ही प्राप्त हुए? इसमें अन्तिम पक्ष ठीक नही हैं, क्योंकि बिना प्राप्ति के निषेध नहीं बनता । ऐसा मानने पर मनुस्मृति आदि में भी वेदत्व का निषेध क्यो न माना जाय? पहला पक्ष भी इसलिये ठीक नही है कि आगे दिये गये विकल्प का वहीं पर कोई
पृष्ठ 257
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वदार्थपारिजातः ११५७ प्राप्तेनिषेधासम्भवात् । न च व्यवहारात्प्राप्तिः, व्यवहारस्यानादित्वे तद्वाधायोगात् । सादित्वे कदारभ्य व्यवहारः प्रवृत्त इति वक्तव्यम्? यत्तु यज्ञकालादारम्येति, तदपि तुच्छम्, वैदिकस्य यज्ञस्य वेदवदेवानादित्वोपपत्ते । यत्तु 'कात्यायनादिभिरयं व्यवहारः प्रवर्तित.' इति, तदपि तुच्छम् ऋगादिसज्ञावद् वेदसंज्ञायाअप्यनादित्वात् ॥ सूत्रस्तद्- बोधनमेव कृतम्, न नवीनसज्ञाविधान कृतम् । 'विधिशब्दाश्र्व' ( मी ० सू० १/२/५३ ) इद मन्त्रलिङ्गाधिकरणस्यान्तिम सिद्धान्तसूत्रम् । कर्मकाले , उच्चारणमात्रादविवक्षितार्था एव मन्त्रा अदृष्टद्वारा ऋत्वङ्गतामुपगच्छन्ति अनुष्ठेयार्थप्रकाशनद्वारा वेति संशये सिद्धान्तः— मन्त्रव्याख्यानाय प्रवृत्तवाक्यशेषरूपाद् अर्थवादादविवक्षितार्था एव मन्त्राः । यथाग्निहोत्रप्रकरणे महोपस्थाने 'अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वया' ( वा० स ० २ २७ ) इति मन्त्रे ' शत हिमा:' इदं वाक्यमस्ति । ब्राह्मणेन हिमा इति दुरवबोध- पदव्याख्यान ' शतं हिमा इत्याह शतं त्वा हेमन्तानिन्धिषीयेति वा वैतदाह ( तै ० सं० ११५/८/५ ) इत्यर्थवादद्वारा कृतम् । यदि मन्त्रोऽविवक्षितार्थ: स्यात्, तदा विधिशब्दद्वारा नव्याख्यानमसगतमेव स्यात् । अत्र ब्राह्मणस्य शब्दपदेन निर्देशाद् वेदत्व सिद्धयति, 'श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्' ( ब्र ० सू० २।१।२७ ), ' धर्मस्य शब्दमूलत्वादशब्दमनपेक्षं स्यात्' ( मी ० सू० १ । ३ । १ ) इत्यादी शब्दपदस्य वेदपरत्वदर्शनात् । 'नियमस्तु दक्षिणाभि श्रुतिसयोगात्' ( मी० सू० ३।७।३६ ) अत्र 'ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां ददाति' इत्युक्त्वा 'अग्नीध्रेऽग्रे दक्षिणां ददाति ततो ब्रह्मणे' इत्यादिश्रुतिद्वारा दक्षिणया सार्धं तत्तदृत्विजां नामनिर्देशः । अत्र सूत्रे उदाहरणभूते ब्राह्मणवाक्ये श्रुतिशब्दप्रयोगादपि ब्राह्मणस्य श्रुतित्वं सिद्धयति । 'विरोधे च श्रुतिविरोधादव्यक्तः शेषः (मी ० सू० ३।८।३२ ) 'समावप्रच्छिन्नाग्रो दर्भों प्रादेशमात्री पवित्रे करोति', तथा 'अरत्निमात्रे विघृती करोति' इति । उत्तर नही है । जैसे कि ब्राह्मणो मे वेदत्व की प्राप्ति प्रामाणिक है, या अप्रामाणिक? पहला पक्ष इसलिये नही बन सकता कि यदि वेदत्व की प्राप्ति प्रामाणिक है, तो उसका निषेध नही हो सकता । व्यवहार से इसकी प्राप्ति है ऐसा भी नही कह सकते, क्योकि यदि व्यवहार अनादि है, तो उसका बाध नही होगा । यदि वह सादि है, तो यह बताना पडेगा कि वह कब से प्रारम्भ हुआ । यज्ञो के आरम्भ के साथ इसका आरम्भ हुआ, यह कहना भी ठीक नही है, क्योकि वैदिक यज्ञ वेद के ही समान अनादि है । कात्यायन प्रभृति ने इस व्यवहार को प्रवृत्त किया, यह कथन भी सारहीन है, क्योकि ऋग आदि संज्ञा के समान वेद संज्ञा भी अनादि है, अतः सूत्र केवल उसका ज्ञान कराते है, नयी संज्ञा नही बनाते । ' विधिशब्दाश्र्व' यह मन्त्रनिङ्गाधिकरण का अन्तिम सिद्धान्त सूत्र है । यज्ञ करते समय मन्त्र बिना अर्थ की विवक्षा के केवल उच्चारण मात्र से यज्ञ के अंग होते हैं, या वे अनुष्ठेय अर्थ का प्रकाशन भी साथ में करते हैं? इस संशय के उपस्थित होने पर सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि वाक्यशेष के रूप में मन्त्र का व्याख्यान करने के लिये अर्थवाद वाक्यों की प्रवृत्ति होती है, अतः मन्त्र अविवक्षितार्थ ही है । जैसे कि अग्निहोत्र प्रकरण मे महोपस्थान में 'अग्ने गृहपते ' इस मन्त्र में ' शतं हिमा' यह वाक्य है । यहाँ पर ब्राह्मण ने 'हिमा' इस दुरवबोध पद का अर्थ किया है-'शतं हिमा' का यह अर्थ है कि तुमको मैं सौ वर्ष तक प्रज्वलित रक्खूँ' यह अर्थवाद वाक्य ही है । यदि मन्त्र विवक्षितार्थ होता, तो विधि शब्द के द्वारा उसकी व्याख्या करना असंगत होता । यहाँ पर ब्राह्मण का शब्द पद से निर्देश होने से वेदत्व सिद्ध होता है । श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्', ' धर्मस्य शब्दमूलत्वादशब्दमनपेक्षं स्यात्' इत्यादि सूत्रो में शब्द पद का अर्थ वेद है । 'नियमास्तु ० ' इस मीमासा सूत्र में 'ऋत्विग् को दक्षिणा देता है' ऐसा कहकर ' पहले अग्नीघ्र को दक्षिणा देता है, उसके बाद ब्रह्मा को इस श्रुति के द्वारा दक्षिणा के साथ उन उन ऋत्विग् जनो का नाम निर्दिष्ट है । इस सूत्र के उदाहरणभूत वाक्य में श्रुति शब्द का प्रयोग होने से ब्राह्मण भी वेद है, यह सिद्ध होता है । 'अविरोधे च०' इस सूत्र में ' समान आकार के और जिनके अग्रभाग कटे नही है, ऐसे प्रादेशमात्र दो दर्भों के दो पवित्र बनाता है, तथा 'अरत्निमात्र आकार के दो विधृति बनाता है' इन श्रुति
पृष्ठ 258
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वदाथपारिजातः ११५८ तत्र सशयः - वेदिस्तरणार्थाद्बहषो विघृती पवित्रे कर्तव्ये उताम्यत इति । प्रकृतत्वाद् बर्हिष इति प्राप्ते पूर्वोक्तसूत्र- द्वारा सिद्धान्त उक्तः । यथाविहितसस्कारसंस्कृतकुशाना स्तरणादन्यत्र निषेधाद् विघृतयोऽव्यक्ताः सस्कारधर्मरहिता एव स्युरिति । कुतः? संस्कृतकुशाना विधृतिषु विनियोगे बर्हिषा वेदि स्तृणातीति श्रुतिविरोधात् । अत्र ' बहिषा वेदि स्तृणाति' इति वचनस्य श्रुतित्वमुक्तम् । ' अविशेषात्तु शास्त्रस्य यथाश्रुतिफलानि स्युः' ( मी ० सू० ४ | १ | ४ ) अनीक्षणसङ्कल्पस्य प्रजापतिव्रतत्वेन पुरुषार्थत्वे निश्चिते 'नेक्षेतोद्यन्तमादित्य नास्तं यन्त कदाचन' ( म० ४ | ३७ ) इति शास्त्रवदेव 'समिधो यजति' ( शा ० ब्रा ० ३।४ ) इत्यादीन्यपि शास्त्राणीति तेषामपि पुरुषार्थत्वेऽथंवादश्रुतफलानि तत्फलानि स्यु । अत्र सूत्रेऽर्थवादस्य श्रुतित्वमुक्तम् । ' पृथक्त्वे त्वभिधानयोर्निवेशः श्रुतितोव्यपदेशाच्च ( तत्पुनर्मुख्यलक्षण यत् फलवत्त्व ) तत्सन्निधावसयुक्त तदङ्ग स्यात्, भागित्वात् करणस्याश्रुतेश्चान्यसम्बन्ध:' ( मी ० सू० ४ | ४ | ३३ ) । दर्शपूर्णमासयोर्यावन्तो यागा विहितास्ते सर्वे प्रधानभूता अथवा तेषु केचिदङ्गभूता इति सशये सिद्धान्तपक्षदाढर्यायोक्तम्-' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेति श्रुतिद्वारा दर्शपूर्णमासाभ्यामिति द्विवचनेन त्रिकद्वयस्यानिर्देशेन स्वर्गफल सम्बन्धोक्तेः फलसम्बन्धित्वेन श्रूयमाणत्व प्रधानत्वमिति लक्षणानुरोधेन द्वयोस्त्रिकयोरेव प्राधान्यं ज्ञायते । तत्सन्निधौ पठिताः फलासम्बम्धा. पञ्च प्रयाजास्त्रयोऽनुयाजाः प्रधानस्याङ्गभूताः । तत्र भाव्याकाङ्क्षायां प्रधान भावयेदिति प्रधानभावनया पूरणम् । अत्र दर्शपूर्णमासाभ्यामिति ब्राह्मणवाक्ये श्रुतिशब्दप्रयोगाद् ब्राह्मणस्य वेदत्व सिद्धयति । ' ' कर्तुर्वा श्रुतिसयोगाद् विधिः कार्त्स्न्येन गम्येत' ( मी० सू० ६।१।५ ) इति सूत्रेण -' दर्शपूर्णमासाभ्यां वा यजेत' ( श० २।४।३।१३ ) इत्यादिविधिभिर्विहितानां कर्मणामधिकारोऽन्वादीनामङ्गविकलाना सर्वेषामथ वाऽनुष्ठान- वाक्यो के विषय में संशय उठता है कि वेदि पर बिछाने के लिये आई हुई कुशा से पवित्र और विषूति बनाना चाहिये, अथवा अन्य से । प्रकृत होने से यहाँ कुशा का हो ग्रहण होना चाहिये । पूर्वोक्त सूत्र मे सिद्धान्त कहा गया है । विधि के अनुसार संस्कार से संस्कृत कुशाओ का आस्तरण के सिवाय अन्यत्र निषेध होने से विघृतियाँ अव्यक्त अर्थात् संस्कार से रहित ही रहेगी, क्योकि संस्कृत कुशाओ का यदि विवृति में विनियोग होगा तो 'बह से वेदि को ढकता है ' इस श्रुति का विरोध होगा । यहाँ पर इस वचन को श्रुति शब्द से अभिहित किया गया है । 'अविशेषात्तु ० ' यह मीमासा सूत्र है । अनीक्षण संकल्प की प्रजापति व्रत के रूप मे पुरुषार्थता निश्चित हो जाने पर 'उदय होते हुए सूर्य को न देखे और न अस्त होते हुए को ही इस मनु के वचन के समान ही 'समिधा से हवन करता है' इत्यादि शास्त्र वचनो की पुरुषार्थता की खोज मे अर्थवाद श्रुति से अवगत फल उपस्थित होगे । इस प्रकार इस सूत्र में अर्थवाद वाक्यो को श्रुति के अन्तर्गत माना है । ' पृथकत्वे ० ' यह भी मीमासा सूत्र है । यहाँ पर दर्श- पूर्णमास के प्रकरण में जितने याग विहित है, वे सब प्रधानभूत है, या इनमे से कुछ अंगभूत भी है? इस प्रकार के संशय के उठने पर सिद्धान्त पक्ष की दृढता के लिये कहा गया है कि 'दर्शपूर्णमास याग से स्वर्ग की कामना वाला यजन करें । इस श्रुति के द्वारा द्विवचन से दो त्रिको के निर्देश होने से स्वर्गफल का सम्बन्ध बताया गया है । फल सम्बन्ध से जो सुना गया हो वह प्रधान होता है, इस लक्षण के अनुसार दो त्रिक का ही प्राधान्य ज्ञात होगा । उसके साथ पठित फल से असम्बद्ध पांच प्रयाज और तीन अनुयाज प्रधान के अंगभूत होगे । इनमें भाव्य की आकांक्षा में प्रधान की भावना से उसकी पूर्ति की जाती है । यहाँ पर भी 'दर्शपूर्णमासाभ्याम्०' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य में श्रुति शब्द का प्रयोग किया गया हैं, इस लिये तदनुसार ब्राह्मणभाग भी वेद है । ' कर्तुर्वा ० ' इत्यादि मीमांसा सूत्र में अथवा ' दर्शपूर्णमास से यजन करे' इत्यादि विधिवाक्यों से विहित कर्मों में अंग विकल अ आदि सभी का अधिकार है, अथवा अनुष्ठान में समर्थ अंग वैकल्य से रहित समस्त अंग वाले मनुष्यों का, इस संशय की अवस्था
पृष्ठ 259
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः ११५६ समर्थानामङ्गवैकल्यरहितानां समस्ताङ्गाना वेति संशये सूत्रमिद सिद्धान्तयति यत् समस्ताङ्गसहितस्य प्रधानानुष्ठान- समर्थस्यैवाधिकारः । फलवोधक विधिवाक्यस्येदमेव तात्पर्यं यत्समस्तेतिकर्तव्यताविशिष्टस्य प्रधानस्यानुष्ठानेनैव परमापूर्वं सम्पद्यते । परमापूर्वेणैव तत्फलोत्पत्तिः । अत्र ब्राह्मणवाक्याना श्रुतिपदेन निर्देशात् तेषा श्रुतित्व सिद्ध्यति । ' अशब्दमपीति चेत्' ( मी० सू० ६।३।२ ९ ) अग्नीषोमीयपशी खादिरयूपो पलाशयूपश्च विकल्पेन विहितौ । यत्र प्रयोगे खादिरयूपस्य ग्रहण कृतम्, पश्चाद् यूपः कथञ्चिन्नश्येत् तदा किं खादिरयूप एव तत्सदृशो ग्राह्य पालाशी वेत्येवं संशये सिद्धान्तितम् - यत्र प्रयोगे वैकल्पिकद्रव्येषु यद् द्रव्यं गृहीतं तन्नाशे तत्सदृशमेवान्यद् ग्राह्यम | अतः खादिर एव यूपी ग्राह्यस्तत्सदृशः । तत्र पुनराशङ्कितम् - पूर्व यूपद्रव्यसदृशं यद् द्रव्यान्तरं गृहीतं तदशब्दम्, अर्थाद् वैदिकशब्दप्रमाणैरविहितम् । अत्र पूर्वपक्षसूत्रे विधिवाक्यानां शब्दपदेन ग्रहणं कृतम् । ' यथाश्रुतीति चेत्' ( मी ० सू० ६ । ४। १ ९ ), 'यस्योभय हविरार्तिमाछति, ऐन्द्र पञ्च शरावमोदनं निर्वपेत् ' ( | | | ) तै ० ब्रा० ३ ७ १ ८ इत्येवं श्रुतम् ॥ अयं पञ्चशरावोदनः सायङ्कालिकप्रातः कालिको भयहविषां नाशे विहितः कस्यचिदेकस्य वा विनाशे विहित इति सशये यथाश्रुति कर्तव्यम्, अर्थाद् उभयनाशे सत्येवेति पूर्वपक्ष: । तत्र ब्राह्मण- वाक्यं श्रुतिपदेनोक्तम् । 'आदेशार्थेतरश्रुतिः ' ( मी ० सू० ६| ५| २५ ) । ' यदि सत्राय दीक्षिताः साम्युत्तिष्ठेरन् सोमं विभज्य विश्व- जिता यजेत' इत्येवं श्रुतम् । यदि सत्रे प्रवृत्ताः सत्रस्यैकदेशमनुष्ठायावशिष्टांशं परित्यज्य जिगमिषन्ति तदा सोम विभज्य तेन सोमेन विश्वजिद्यागं कुर्यात् । अत्रेयं जिज्ञासा भवति सोमक्रयणानन्तरं जिगजिषायां विश्वजिद्यागानुष्ठानं में सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि समस्त अंग वाले प्रधान कर्म के अनुष्ठान में समर्थ का ही इनमें अधिकार है । फलबोधक विधिवाक्य का यही तात्पर्य है कि समस्त इतिकर्तव्यता से युक्त प्रधान के अनुष्ठान से ही परम अपूर्व की उत्पत्ति होती है । परम अपूर्व से ही उसके फल की उत्पत्ति होती है । यहाँ पर भी ब्राह्मण वाक्य को श्रतिपद से सम्बोधित किया गया है, अतः वे भी वेद है । ' अशब्दमपीति चेत्' यह भी मीमांसासूत्र है । अग्निषोमीय पशु के लिये खदिर और पलाश का यूप विकल्प से विहित है । जिस प्रयोग में खदिर यूप बनाया गया है, किन्तु बाद में यह यूप किसी प्रकार नष्ट हो जाय तो ऐसी अवस्था में पहले की ही तरह खादिर यूप ही बनाया जाय, अथवा वह पलाश का भी बनाया जा सकता है? इस संशय के उठने पर सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि जिस प्रयोग में वैकल्पिक द्रव्यो मे जिस द्रव्य का पहले ग्रहण किया गया है, उसके नाश होने पर उसी के समान दूसरा द्रव्य लेना चाहिये । इस लिये उक्त प्रसंग मे खादिर यूप ही ग्रहण करना चाहिये, पालाश नहीं । यहाँ पर पुनः शंका उठाई गई है कि पूर्व यूप के समान जो दूसरा यूप लिया गया है, उसमें कोई वैदिक शब्द प्रमाण रूप में नही मिलता । यहाँ पर पूर्वपक्ष सूत्र में विधि वाक्यों का शब्द-पद से ग्रहण किया गया है । 'यथाश्रुतीति चेत्' इस मीमासा सूत्र मे विचार किया गया है कि 'जिसकी दोनो समय की हवि आपत्ति में पड़ जाती है, वह इन्द्र देवता के लिये पच शराव ओदन अर्पित करें इस वाक्य में विहित पञ्च शराव ओदन सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय की हवि के नष्ट हो जाने पर विहित है, या किसी एक समय की हवि के नष्ट होने पर? ऐसी सशय की अवस्था में श्रुति जैसा कहती है, वही करना चाहिये । अर्थात् दोनो समय की हवि के नाश होने पर यह करना चाहिये, ऐसा पूर्वपक्ष है । यहाँ पर ब्राह्मण वाक्य श्रुतिपद से अभिहित है । 'आदेशात श्रुतिः' इस मीमासा सूत्र में ' यदि सत्राय० ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य के विषय में विचार किया गया है कि यदि किसी सत्र में लगे हुए ऋत्विक् सत्र के एक अंश का अनुष्ठान कर अवशिष्ट अंश को छोडकर जाने लगे, तब सोम का विभाग कर उससे विश्वजित् याग का अनुष्ठान करे । यहां पर जिज्ञासा उठती है कि सोम की खरीद हो जाने पर ऋत्विक् जाना चाहे तब विश्वजित्
पृष्ठ 260
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११६० दार्थपारिजातः ततः पूर्वमपि वा? तत्र सिद्धान्त स्थापयते - सोमं विभज्य विश्वजिता यजेतेति श्रुति• केवलमादेशार्था, अर्थात्लोकप्रसिद्ध- स्वीयांशविभागानुवादिका । अत्र सोम विभज्येतीदं ब्राह्मणवचन श्रुतिपदेन निर्दिष्टम् । ' माघी वैकाष्टकाश्रुतेः' ( मी० सू० ६| ५| ३० ) । अत्र चतुरहे पुरस्तात् पौर्णमास्या दीक्षेरन् तेषा - मेकाष्टकायां क्रमः सम्पद्यते एवं श्रूयते । अत्र का पौर्णमासी ग्राह्येति संशये पूर्वोक्तसूत्रद्वारा माघी पूर्णिमा ग्राह्येति सिद्धान्तः । तेषामेकाष्टकायां क्रयः सम्पद्यते । इदं ब्राह्मणवाक्य जैमिनिना श्रुतिशब्देन संस्मृतम्, तेनापि ब्राह्मणभागस्य वेदत्वमायाति । 'विभागश्रुतेः प्रायश्चित्तं योगपद्येन विद्यते' ( मी ० सू० ६ | ५| ४६ ) इति सूत्रे ज्योतिष्टोमे प्रातःसवन- समये बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणा ऋत्विजः परस्परं कच्छमवलम्बमानाः शालातो बहिर्निर्गच्छन्ति । यदि प्रमादा- दुद्गाता प्रस्तोता चापच्छिद्येत तदा प्रायश्चित्तं विधीयते । यदि प्रतिहर्ताऽपछिन्द्यात् तस्मिन्नेव सर्ववेदस दद्यादिति । अत्र श्रुतिपरित्यागेनान्यतरकर्तृकापच्छेदे उभयकर्तृकापच्छेदे वा प्रायश्चित्तमिति संशये पूर्वपक्षोपस्थापने पूर्वसूत्रेण प्रायश्चित्तविधायकवाक्यं श्रुतिशब्देनाभिहितम् । एतेनापि ब्राह्मणभागस्य वेदत्वमेव निष्पद्यते । 'विघौ तु वेदसंयोगादुपदेशः स्यात्' ( मी ० सू० ६।७।२८) । तदुह स्माहापि वर्कुर्वाष्णो माषान्मे पचत' ( श ०१।१।१।१० ) इति ब्राह्मणवाक्यस्यार्थवादत्वसाधनप्रसङ्गे पक्षान्तरमुपस्थापयताऽस्य वाक्यस्य स्पष्टमेव वेदत्वमुक्तम्! विधौ त्वभ्युपगम्यमाने वेदसयोगादुपदेशः स्यात् । 'न श्रुतिविप्रतिषेधात्' ( मी० सू० ६ ८/१५ ) उपनयनहोमो लौकिकेऽग्नौ स्यादिति विचारप्रसङ्गे 'स्नात्वोद्वहेत्' इति ब्राह्मणवाक्यं श्रुतिपदेनोक्तम | 'अपि वा सत्रकर्मणि गुणार्थेषा श्रुतिः स्यात्' ( मी ० सू० ७।३।५ ) । अत्र प्रायणीय इति नामधेयो धर्मा-न्नातिदिशतीति साधयता द्वादशाहे प्रथममहः प्रायणीय इति ब्राह्मणवाक्यं श्रुतिशब्देनोद्धतम् । प्रकृतिभूतेषु सर्वकर्मषु गुणविधात्रीयं श्रुति॥ याग का अनुष्ठान किया जाय, अथवा उससे पहले मी? ऐसी अवस्था मे सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि यह श्रुति केवल आदेश के लिये है, अर्थात् लोकप्रसिद्ध अपने अंश के विभाग का केवल अनुवाद करती है! यहाँ पर उक्त ब्राह्मण वचन श्रुतिपद से निर्दिष्ट है । ' माघी वैकाष्टकाश्रुतेः' इस मीमासा सूत्र मे ' पूर्णमासी के चार दिन पहले जो दीक्षित हो, उनका एकाष्टका मे क्रय किया जाता है' इस वाक्य में कौन सी पूर्णमासी अभिप्रेत है? इस सराय के उठने पर माघी पूर्णिमा का विधान किया गया है । उक्त ब्राह्मण वाक्य को जैमिनि ने श्रुति शब्द से अभिदिष्ट किया है । इससे भी ब्राह्मण भाग वेद है, यह सिद्ध होता है । ' विभागश्रुतेः ' इत्यादि मीमासा सूत्र में बताया गया है कि ' ज्योतिष्टोम याग में प्रातः सवन वेला में बहिष्पवमान से स्तुति करते हुए ऋत्विक् परस्पर कच्छ पकडे हुए जब शाला से बाहर निकलते है, उस समय यदि प्रमाद से उद्गाता और प्रस्तोता उसमे छूट जाय तो प्रायश्चित करना चाहिये । यदि प्रतिहर्ता छूट जाय तो उसीमें सर्ववेदस् आहुति दे' इस वाक्य में जो सुना गया है, उसको छोड देने पर एक के न रहने पर प्रायश्चित्त किया जाय1, या दोनो के न रहने पर? इस संशय को अवस्था मे पूर्वपक्ष को उपस्थित करते समय पूर्वसूत्र में प्रायश्चित्त का विधायक यह वाक्य श्रुति शब्द से अभिहित है । इससे भी ब्राह्मणभाग वेद है, यह सिद्ध होता है । 'विधौ तु ०' इत्यादि मीमांसा सूत्र मे 'तदु ह स्माहापि० ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य की अर्थवादकता के साधन के प्रसंग मे पक्षान्तर को उपस्थापित करते हुए इस वाक्य को स्पष्ट हो वेद माना गया है । यहां पर विधि मानने पर वेद के संयोग से उपदेश मानना पडेगा । इसी तरह 'न श्रुतिविप्रतिषेधात्' इस सूत्र मे उपनयन होम लौकिक अग्नि में होना चाहिये, इस विचार के प्रसंग में 'स्नात्वोद्वहेत्' इस ब्राह्मण वाक्य को श्रुतिपद से कहा गया है । 'अपि वा सत्रकर्मणि' इस सूत्र में विचार किया गया है कि 'प्रायणीय' यह नामधेय धर्मो का अतिदेश नही करता । इस प्रसंग में 'द्वादशाह में प्रथम दिन प्रायणीय है' यह ब्राह्मण वाक्य श्रुति शब्द से उद्धत है । प्रकृतिभूत सभी कर्मों में यह श्रुति गुण का विधान करती है ।