वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 261–270
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 261–270
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वेदार्थपारिजात. ११६१ 'तस्मिश्च श्रपणश्रुतेः' ( मी० सू० ८| १| ३५ ) (प्राजापत्य शतकृष्णलं चरु निर्वपेत्' इत्येव श्रुतम् । अत्र सुवर्ण शकलरूपेषु कृष्णलेष्वाज्यधर्मोऽनुष्ठेय ओषधिधर्मो वेति सशये पूर्वोक्तसूत्रद्वारा आज्य श्रपयतीति ब्राह्मणवाक्य- द्वारा ओषधिधर्म एवानुष्ठेय इति सिद्धान्तितम् । तदर्थमाज्य श्रपयतीति वाक्य श्रुतिपदेनोद्धतम् । ' न लौकिकानामाचारग्रहणत्वाच्छब्दवता चान्यार्थाभिधानात्', ( मी० सू० ८| ४ | ६ ) | दविहोम. कर्मनाम- घेयो न गुणविधिरित्यस्य सिद्धान्तस्य स्थैर्याय शब्दपदेन 'जुह्वा नारिष्टान् जुहोति ', 'स्रुवेण जुहोति' ( श ० ३ | १ | ४/२ ) इत्यादि ब्राह्मणवाक्यं शब्दपदेनोदाहृतम् । शब्दपदेन वेद एव गृह्यत इति न विस्मरणायम् । ' शब्दसामर्थ्याच्च' ( मो ० सू० ८| ४| १ ९ ) अत्र दविहोमोऽपूर्वं कर्मेति निश्चयप्रसङ्गे ' नारिष्टान् जुहोति', 'अग्निहोत्र जुहोति' ( श० १।७।१।१० ) इत्यादिवाक्यं शब्दपदेनोदाहृतम् । 'तृचे स्याच्छ्रुतिनिर्देशात्' ( मी० सू० ९ ।२।१४ ) अत्र प्रत्यृचं सामसमाप्तिः स्यादिति सिद्धान्तपक्षवैपरी- त्येनोक्तसूत्रद्वारेकस्य साम्नो विभागपूर्वक तिसृणामूचा समाप्तिः स्यादिति साधनाय 'एक साम तृचे क्रियते' इति ब्राह्मणवाक्यं श्रुतिपदेन निर्दिष्टम् । ' अभ्यासे नेतरा श्रुति ' ( मी० सू० ९ | २ | २० ) इति सूत्रेण ' तिसृषु गायति' इति ब्राह्मणवाक्य श्रुतिशब्देन निर्दिश्य सम्पूर्णसामगानाभ्यासेनेय श्रुतिरुपपन्नेत्युक्तम् । 'शङ्कते च निवृत्तेरुभयत्व हि श्रूयते' ( मी० सू० १० | ३ | ३३ ) अत्र पुनरग्न्याधाने दक्षिण। निर्वर्तत इति विचारप्रसङ्गे 'तद् यद् वैकृतीर्ददाति दक्षिणा उभय्योऽपि तेन दक्षिणाः प्रत्ता भवन्ति इति ब्राह्मणवाक्य श्रूयत इति पदेन स्मार्यते जैमिनिना । 'अपि वा श्रुतिमूलत्वात् सर्वासां तस्य भागो नियम्येत' ( मी ० सू० १०।३।७५ ) अत्राध्वर्यवे यजुर्युक्तो रथोऽवश्य देय इति निश्चयाय पूर्वोक्तसूत्रेण 'सप्तदश रथाः सप्तदश निष्का सप्तदश दास्यो दक्षिणा:' इति ब्राह्मणवाक्य श्रुतिपदेन निर्दिष्टम् । 'तस्मिश्च श्रपणश्रुतेः ' इस सूत्र मे ' प्राजापत्य' इत्यादि ब्राह्मणश्रुति पर विचार किया गया है । यहा पर सुवर्ण के टुकडो में, जो कि ' कृष्णल ' कहलाते है, आज्य धर्म का अनुष्ठान विहित हैं, अथवा ओषधि धर्म का? इस संशय में पूर्वोक्त सूत्र द्वारा आज्य पण का विधान होने से यहा पर ओषधि धर्म का अनुष्ठान करना चाहिये, यह सिद्धान्त स्थिर किया गया है । इस प्रकार यहा पर भी ब्राह्मण वाक्य ही श्रुति पद से उद्धृत है । 'न लौकिकाना०' इत्यादि मीमासा सूत्र मे दविहोम कर्म का नाम है, गुणविधि नही, इस सिद्धान्त की स्थिरता के लिये जुह्वा, स्रुवेण इत्यादि ब्राह्मण वाक्यों का शब्द पद से निर्देश किया गया है । शब्द पद से वेद ही गृहीत होता है, यह नही भूलना चाहिये । ' शब्दसामर्थ्याच' इस सूत्र मे भी दविहोम एक अपूर्व कर्म है, ऐसा निश्चय करते समय ' नारिष्टान् जुहोति', 'अग्निहोत्रं जुहोति' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य ' शब्द' पद से उदाहृत हैं । ' तृचे स्याच्छु तिनिर्देशात्' यहा पर प्रत्येक ऋचा मे साम की समाप्ति होगी, इस सिद्धान्त पक्ष के विपरीत तीन ऋचाओ मे जाकर एक साम की समाप्ति होगी, इस बात को सिद्ध करने के लिये 'एक साम तृच से किया जाता है' यह ब्राह्मण वाक्य श्रुति पद से निर्दिष्ट है । इसी प्रकार ' अभ्यासे नेतरा श्रुतिः । इम सिद्धान्त सूत्र मे 'तिसृपु गायत' इस ब्राह्मण वाक्य को श्रुतिपद से निर्दिष्ट कर बताया गया है कि सम्पूर्ण साम के गान के अभ्यास द्वारा ही यह श्रुति सार्थक हो सकती है । 'शङ्कते च० ' इस सूत्र में अग्नि के आधान से दक्षिणा संपन्न हो जाती है, इस विचार के अवसर पर ' तद् यद्वै ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य को ही जैमिनि श्रुति पद से स्मरण कराते हैं । इसी तरह ' अपि वा० ' इत्यादि सूत्र मे भी अध्वर्यु को यजु से युक्त रथ अवश्य देना चाहिये, ऐसा निश्चय करते समय ' सप्तदश रथा ०' यह ब्राह्मण वाक्य श्रुति पद से निर्दिष्ट है । १४६
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११६२ वेदार्थपारिजातः ' ' ( ) प्राकृतस्य गुणश्रुतौ सगुणेनाभिधान रयात् मी० सू० १०।४।२६ अत्र पावक गुणयुक्त एवाग्नि- राधानेऽभिहित इति साधनाय 'अग्नये पावकायाष्टाकपालम्' इति ब्राह्मणवाक्य श्रुतित्वेनोपात्तम् । 'आरम्भसमवायाद्वा चोदितेाभिधान स्यादर्थस्य श्रुतिसमवानित्वादवचने च गुणशामनमनर्थक स्वात्' ( मी० सू० १०/४/२८ ) पूर्वोक्तविचार- प्रसङ्ग एव ब्राह्मणभागीयानि विधिवचनानि श्रुतित्वेनोपन्यस्तानि । 'उभयपानात् पृषदाज्ये दध्नोऽप्युपलक्षण निगमेषु पातव्यस्योपलक्षणत्वात्' ( मी० सू० १० | ४| ५१ ), 'दनस्तु गुणभूतत्वादाज्यपा निगमा. स्युर्गुणत्व श्रुते राज्यप्रधानत्वात्' ( मी० सू० १० | ४| ५५) । चातुर्मास्ये आज्य- शब्दस्याविकारेण प्राधान्य भवतीति विचारप्रसङ्गे द्वाभ्या सूत्राभ्या ' देवॉ आज्यपाँ आवह' ( श० २/६/१/२२ ) इति मन्त्रो निगमशब्देनोक्तः । एतावना सत्यार्थप्रकाशे मप्तमसमुल्लासे यदुक्तम्-'इत्यपि निगमो भवतीति ब्राह्मणम्' ( नि० ५।३१४ ) इत्युद्धरणेन ब्राह्मणभाग एव निगमशब्दप्रयोगो भवति' इति, तदपास्तम्, पूर्वोक्तमूत्राभ्या मन्त्रे निगम-पदप्रयोगदर्शनात् । वस्तुतस्तु —' इत्यपि निगमो भवतीनि ब्राह्मणम्' ( नि० ५।३।४ ) इति पाठ एवं नोपलभ्यते, किन्तु तत्र - ' इत्यपि निगमो भवति' इत्येव पाठः । यदि निरुक्त' ब्राह्मणमुद्धत्य ' इत्यपि निगमो भवति' इति पाठ स्यात्, तदैव तत्सिद्धयेत् । वस्तुतस्तु वेदनिगमशब्द पर्यायवाचकौ । यदपि स्वामिदयानन्देनोक्तम् -'सहितापुस्तके आरम्भेऽन्ते च वेदशब्द सनातनकालाल्लिख्यते, ब्राह्मण- पुस्तकेष्वादावन्ते च तथा न लिख्यते' इति, तदपि नि सारम्, पूर्वोक्तजैमिन्यादिसूत्रैर्ब्राह्मणेषु वेद श्रुति- शब्दादिप्रयोग-दर्शनात् । दयानन्देन मन्त्रभागेषु वेदपदप्रयोगे किञ्चिदेकमपि प्रमाण नोपन्यस्तम् । दयानन्दीयमुद्रणालयेष्वेव सहिता- पुस्तकेष्वादावन्ते च वेदशब्दोल्लेखो नान्यत्र । तथैव 'मोतीलाल बनारसीदास' -द्वारा प्रकाशिते शतपथब्राह्मणे श्रीशुक्ल-यजुर्वेदशतपथब्राह्मणमिति ब्राह्मणपुस्तकेष्वपि वेदशब्दोल्लेखो दृश्यत एव । बेवरद्वारा बर्लिन ( जर्मनी ) नगरे सन् १८५५ प्रकाशिते शतपथब्राह्मणेऽपि श्रीशुक्लयजुर्वेद शतपथब्राह्मणम | चौखम्भासंस्कृत सीरीजवाराणसीतः ( १ ९ ३६ ) प्रकाशिते 'प्राकृतस्य ० ' इस सूत्र में पावकत्व गुण से युक्त अग्नि ही आधान मे विहित है, इसकी सिद्धि के लिये ' अग्नये पावका ο' इत्यादि ब्राह्मणवाक्य श्रुति पद से उपात्त है । इसी तरह 'आरम्भसमवायाद्वा' इत्यादि सूत्र मे भी पूर्वोक्त विवार के अवसर पर ही ब्राह्मण भाग के अनेक वचन श्रुति पद से उपन्यस्त है । ' उभयपानात्० ' तथा 'दघ्नस्तु० ' इन दो सूत्रो मे चातुर्मास्य मे आज्य शब्द की प्रधानता का निश्चय करने के प्रसंग मे 'देवा आज्या आवह' इस मन्त्र को निगम शब्द से बोधित किया है । इससे सत्यार्थप्रकाश के सप्तम समुल्लास में ' इत्यपि निगमो भवतीति ब्राह्मणम्' इस निरुक्त के वचन को उद्धृत करके यह जो सिद्ध किया गया है कि ब्राह्मण भाग के लिये ही निगम शब्द प्रयुक्त है, वह खण्डित हो जाता है, क्योकि उक्त दोनो सूत्रो में मन्त्र के लिये निगम शब्द प्रयुक्त है । वास्तव में निरुक्त में उक्त पाठ उपलब्ध ही नही होता, ' इत्यपि निगमो भवति' यही पाठ वहा का है । यदि निरुक्त मे ब्राह्मण को उद्धृत करके उक्त बात कही गई होती, तभी उनकी बात सिद्ध हो सकती थी । यथार्थत वेद और निगम ये दोनो शब्द पर्यायवाची है । स्वामी दयानन्द ने यह भी लिखा है कि ' संहिता पुस्तक के आदि और अन्त में सनातन काल से वेद शब्द लिखा जाता है, ब्राह्मण पुस्तको के आदि और अन्त में ऐसा नही देखा जाता', यह उक्ति भी लचर है, क्योकि ऊपर उद्धृत किये गये जैमिनि प्रभृति के सूत्रों में ब्राह्मणों के लिये वेद, श्रुति आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है । दयानन्द ने मन्त्रभाग के लिये ही वेद शब्द प्रयुक्त किया है, यहा पर कोई प्रमाण नही दिया है । दयानन्दीय मुद्रणालयों में ही संहिता की पुस्तकों में आदि और अन्त में वेद शब्द का उल्लेख है, अन्यत्र नही । मोतीलाल बनारसीदास के द्वारा प्रकाशित शतपथ ब्राह्मण में ' श्रीशुक्लयजुर्वेदशतपथब्राह्मणम्' इस तरह ब्राह्मण पुस्तक में भी वेद शब्द का उल्लेख देखा जाता है । बेवर के द्वारा जर्मनी के बर्लिन नगर से सन् १८५५ में प्रकाशित शतपथब्राह्मण की पुस्तक में भी 'श्रीशुक्लयजुर्वेदशतपथब्राह्मण' छपा है । चौखम्बा संस्कृत सीरीज वाराणसी से सन् १ ९ ३६ में प्रकाशित ताण्ड्यब्राह्मण में 'साम-
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बेवार्थपारिजात ११६३ ताण्डब्राह्मणे सामवेदीयताण्ड्यब्राह्मणमिति वेदशब्दोल्लेखो दृश्यत एव । ददीपवेदभायनहिताय शुक्लयजु.- " सहिताया केवल 'यजु सहिता' इत्येवोल्लेखोऽस्ति न तत्र वेदशब्दप्रयाग | माध्यन्दनीयसहितापुस्तकेऽपि माध्यन्दि- नीयाया वाजसनेयिसहितया चत्वारिंशत्तमोऽध्याय इत्येव प्रकाशितम्, तत्रापि वेदशब्दोल्लेखो नस्ति ॥ सन १८९ ७ हस्तलिखिते वालकरामस्याग्निहात्रिण पुस्तके ' इनिश्रीसहिताया दीर्घप ठे चत्वारिणत्तमोध्याय ' एतावदेव लिखितम् । शुक्ल यजु काण्वसहिताभाष्येऽपि वेदशव्दमन्तरेव 'शुक्लयजु काण्यसहिताभाष्यम्' इत्येव लिखितम् । तत्रैव 'मायवीये वेदार्थप्रकाशे काण्वसहिताभाष्ये' इत्येव लिखितम् । यदि वेदशब्दोल्लेखेनैव वेदत्व कस्यचित्पुस्तकस्य स्वात्तदोपनिपदा पुस्तकेष्वमुक वेदस्यामुकोपनिषद् इत्युल्लेखो लभ्यत इत्युपनिषदा वेदत्वमङ्गीक्रियताम् । 'आम्नायवचन तद्वत्' ( मी० सू० ११।२।४१ ) अत्र उत्तरविहारदक्षिणविहारादिदेशभेदेऽप्यङ्गानां प्रतिदेश- भेदेन पुनरनुष्ठान भवतीति सिद्धान्तस्थापनाय पूर्वोक्तसूत्रद्वारा 'पदे वाध्वर्यु करोति तत्प्रतिप्रस्थाना करोति' इति ब्राह्मणवाक्यमाम्नायशब्देन निर्दिष्टम् । 'सख्यासु विकल्पः स्यात् श्रुतिषु विप्रतिषेधात्' ( मी ० सू० १२ । ४ । ९ ) इत्यत्र आधाने विविधदक्षिणाना विकल्प इति सिद्धान्तपक्षे 'एका देया षट् देया द्वादश देया ' इति ब्राह्मणवाक्यमाम्नायशब्दे- ' ' (: ) नोक्तम् । आम्नायवचनाच्च मो० सू० १२ ४ । ३६ इति सूत्रऽञ्जनादय सस्कारा सर्वेषा सत्रिणा कृते सन्तोति विचारप्रसङ्गे ' सत्रे भूयसा यजमानाना या गृहपति स भूयिष्ठाद्धिमवाप्नोति' इति ब्राह्मणवाक्यमाम्नायशब्देनोक्तम् । कि बहुना ' अथातो धर्मजिज्ञासा' इत्यारभ्य ' अन्वाहार्ये च दर्शनात्' इति सूत्रं यावत् पूर्वमीमांसादर्शनस्य षष्टिपादेषु त्रयोदशोत्तरनवशताधिकरणेषु द्वादशाध्यायेषु प्राय · सर्वत्रैव ब्राह्मणभागीयवचनान्येव विचारतानि, मन्त्र- भागस्तु ब्राह्मणविध्युक्तकर्मस्मारक एव नवीनार्थबोधकत्वाभावादनुवादक एव । मानान्तराप्राप्तकर्म विधायकत्वाद् ब्राह्मणवाक्यस्य विचारेण मन्त्रभागस्य गतार्थत्वात् तद्विचारार्थं पूर्वमीमासायामवसर एव नासीत् । अर्थसन्देहे सत्येव वेदीय ताण्ड्यमहाब्राह्मणम्' इस तरह से वेद शब्द का उल्लेख दिखाई देता है । वेददीप नामक वेदभाष्य के साथ छपी शुक्लयजु. सहिता में केवल ' यजुः सहिता' इतना ही उल्लेख है, यहा पर वेद शब्द का प्रयोग नही हुआ है । माध्यन्दिन संहिता की पुस्तक में भी ' माध्य- न्दिनीय वाजसनेयिसहिता में ४० वा अध्याय समाप्त हुआ' इस प्रकार छपा है । यहा पर भी वेद शब्द का उल्लेख नही है । संवत् १८ ९ ५ की हस्तलिखित बालकराम अग्निहोत्री की पुस्तक मे ' इतिश्रीसंहिताया दीर्घपाठे चत्वारिंशोऽध्याय ' इतना ही लिखा है । शुक्लयजुर्वेद की काण्वसहिता के भाष्य मे बिना वेद शब्द के ही ' शुक्लयजुःकाण्वसहिताभाष्यम्' यह लिखा गया है । वही पर ' माधवीये वेदार्थप्रकाशे काण्वसंहिताभाष्ये' यह लिखा गया है । यदि वेद शब्द के उल्लेख से ही किसी पुस्तक को वेद मान लेना है, तो उपनिपदो की पुस्तको में अमुक वेद की अमुक उपनिषद् समाप्त हुई, इस उल्लेख के मिलने पर आप को उपनिषदो को वेद मान लेना चाहिये । 'आम्नायवचन तद्वत्' इस सूत्र मे उत्तर बिहार, दक्षिण बिहार आदि देशो के भेद रहने पर भी प्रत्येक देश के भेद से अंगो का पुनः अनुष्ठान होता है, इस सिद्धान्त की स्थापना के लिये पूर्वोक्त सूत्र मे ' जो अध्वर्यु करता है, वही प्रतिप्रस्थाता भी करता है' इस ब्राह्मण वाक्य को आम्नाय शब्द से कहा है । इसी तरह ' सख्यासु विकल्प ० ' इत्यादि सूत्र मे भी आधान मे विविध दक्षिणाओ का विकल्प होता है, इस सिद्धान्त के पक्ष में एक देना, छ देना, बारह देना' इस ब्राह्मण वाक्य को आम्नाय के नाम से उद्धृत किया है । 'आम्नाय० ' इस सूत्र में भी अंजन प्रभृति संस्कार सत्र के सभी अनुष्ठाताओ के लिये है, इस विचार के प्रसग में ' सत्र में अनेक यजमानो का गृहपति सर्वाधिक ऋद्धि को प्राप्त करता है' यह ब्राह्मण वाक्य आम्नाय शब्द से अभिदिष्ट है । अधिक क्या कहा जाय, ' अथातो धर्मजिज्ञासा' से प्रारम्भ कर ' अन्वाहार्ये च दर्शनात्' इस अन्तिम सूत्र तक पूर्वमीमासा दर्शन के ६० पाद, ९ १३ अधिकरण और १२ अध्यायो में प्रायः सभी जगह ब्राह्मणभाग के वचनों की ही परीक्षा की गई है । यहाँ पर मन्त्रभाग ब्राह्मण के द्वारा उक्त विधि ( कर्म ) के स्मारक ही है । ये नवीन अर्थ को नही बनाते, अतः ये केवल अनुवादक है । मानान्तर से अप्राप्त कर्म के विधायक ब्राह्मण वाक्य ही है, अत इन पर विचार करने से हो मन्त्रभाग भी गतार्थ है । फलत. मन्त्रभाग पर विचार करने का पूर्वमीमासा में कोई अवसर ही नही था । अर्थ में सन्देह उपस्थित होने पर हो विचार का प्रसंग आता है । मन्त्र तो अनुवादक
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वेदार्थपारिजातः ११६४ विचारप्रसङ्गः समुदेति । अनुवादकमन्त्रेष्वर्थ सन्देहस्य प्रमङ्ग एव नायाति । दार्शनिकेषु वेदवाक्यविचारो मीमासापदेन व्यवह्रियते । तत्रापि मन्वादिधर्मशास्त्रेतिहासपुराणादिपौरुषेयवाक्येषु विचारमकृत्वाऽपोरुषेयब्राह्मणवाक्यान्येवोद्धृत्य तत्रैव प्राधान्येन पूर्वमीमांसाया विचारो भवति । तत्रैव सति ब्राह्मणभागस्य पौरुषेयत्वकथन मीमासावृत्तान्तानभिज्ञस्यैव शाभते । विशेषतोऽय प्रसङ्गः पण्डितप्रवरोमापतिकृते सनातनधर्मोद्धारग्रन्थे तथास्मदीये हिन्दीभाषामये ' वेद का स्वरूप और प्रामाण्य' नामधेये ग्रन्थे तथा गोर्वाणवाणो निबद्धे 'वेदस्वरूपविमर्श' इति ग्रन्थे च द्रष्टव्यः । वस्तुतस्तु ब्राह्मणभागस्य वेदत्वापलापेन मन्त्राणामीश्वरस्तुति राजमन्त्रिसेनापत्यादिस्तुतिपरत्वमुपगम्य वायुशुद्धिप्रयोजन होममात्रस्य यज्ञत्वमभ्युपगग्य वैदिककर्मोपासनज्ञानादिस्वरूपापलापार्थमेव दयानन्देन चत्वारि पुस्त- कान्येव वेदत्वेनाभ्युपगम्य सप्तविशत्युत्तरैकादशशतसहिता एकत्रिंशदुत्तरं का दशशतब्राह्मणानामुपनिषदां च वेदत्व प्रामाण्यस्वतस्त्व चापलप्य महान् प्रमाद कृत इति विभावनीयम् । अथ ब्रह्मविद्याविषय: यत्तु - 'वेदेषु सर्वा विद्या: सन्त्याहोस्विन्नेति? अत्रोच्यते सर्वाः सन्ति मूलोद्देशत: । तत्रादिमा ब्रह्मविद्या संक्षेपतः प्रकाश्यते' (पृ० १०२ ) इत्युक्तम्, तदपि बालभाषितम्, सर्वेरप्यास्तिकंर्वेदाना सर्वविद्यास्थानत्वस्य स्वीकारेण तत्र विप्रतिपत्तेरभावात् 1। वेदोक्तधर्मनिरूपणमपि न केनापि निरुद्धयते, तथापि तत्र शास्त्रसिद्धान्तमुपेक्ष्य स्वकल्पितार्थ- निरूपण दुनोत्येव सचेतसा चेतासि, अतः कानिचिदेव वाक्यानि समुद्धृत्य निराक्रियन्ते 1। , ब्रह्मविद्या वेदेषु सर्वोत्कृष्टा महत्त्वपूर्णा विद्या ब्रह्मण एव सर्ववेदाना महातात्पर्यविषयत्वात् । सपरिकर ब्रह्म तल्लक्षण च भगवता व्यासेन ब्रह्मसूत्रेषु ' जन्माद्यस्य यत ' ( ब्र ० सू० १ | १ | २ ) इत्यादिभिश्चतुर्लक्षण्या मोमासाया है, अत यहाँ पर अर्थ का सन्देह हो ही नही सकता । दार्शनिको में वेद के वाक्यो का विचार मोमासा नाम से जाना जाता है । यहाँ पर भी मनु प्रभृति के धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण प्रभृति पुरुषनिर्मित वाक्यो मे विचार न कर अपौरुषेय ब्राह्मण वाक्यों को ही उद्धृत कर उन्ही के संबन्ध मे पूर्वमीमांसा में विचार किया है । ऐसी अवस्था में ब्राह्मणभाग को पौरुषेय मानना मोमासा के मर्म को न समझ पाने वाले के लिये ही शोभा की वस्तु हो सकती है । विशेषत यह प्रसंग पंडितप्रवर उमापतिकृत 'सनातनधर्मोद्धार' नामक ग्रन्थ मे तथा हमारे हिन्दी भाषा के ग्रन्थ ' वेद का स्वरूप और प्रामाण्य' मे तथा ' वेदस्वरूपविमर्श:' नामक संस्कृत ग्रन्थ मे देखना चाहिये । वास्तव मे ब्राह्मण भाग को वेद न मानकर, मन्त्रो की ईश्वर स्तुति को राजा, मन्त्री, सेनापति आदि को स्तुति मान कर, वायु की शुद्धि ही होममात्र का प्रयोजन है और इसी के लिये यज्ञ का विधान है, ऐसा मानकर वैदिक कर्म, उपासना, ज्ञान आदि के स्वरूप का अपलाप करने के लिये वेद की चार शाखाओ की पुस्तकों को ही वेद मान कर ११२७ संहिताओ की और १ ९ ३१ ब्राह्मण- उपनिषद् ग्रन्थों की वेदता और स्वतःप्रमाणता का अपलाप कर स्वामी दयानन्द ने महान् प्रमाद किया है, यह समझ लेना चाहिये । ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन ' वेदो में सब विद्या है वा नहीं? सब है, क्योकि जितनी सत्यविद्या संसार में है, वे सब वेदो से ही निकली है । उनमें से पहिले ब्रह्मविद्या संक्षेप में लिखते हैं ' ( पृ० १०२ ) यह भी बच्चो की सी बात है । सभी आस्तिक वेदो को सभी विद्याओ की उत्पत्ति का स्थान मानते है, अतः इस विषय में किसी प्रकार का विवाद नही है । वेद प्रतिपादित धर्म का निरूपण किया जाय, इसमें भी किसी को विरोध नही हो सकता, तो भी जब वेद में शास्त्रो के सिद्धान्तो की उपेक्षा करके कल्पित अर्थों का निरूपण किया जाता है, तो समझदार व्यक्ति के मन में अवश्य दुःख होता है । अत • इस तरह के कुछ वाक्यों को उद्धृत कर हम उनका खण्डन करना चाहते है । वेदो में ब्रह्मविद्या सर्वोत्कृष्ट महत्वपूर्ण विद्या है, क्योकि सभी वेदों का ब्रह्म के प्रतिपादन में ही मुख्य तात्पर्य है । पूरी सामग्री के साथ ब्रह्म का निरूपण भगवान् व्यास ने ब्रह्मसूत्र मे 'जन्माद्यस्य यतः' इत्यादि सूत्रो के द्वारा चार अध्याय वाली ब्रह्ममीमासा
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बेवार्थपारिजात ११६५ प्रतिपादितमेव । 'तं स्वोपनिषद पुरुष पृच्छामि' (बृ० ३० ३१ ९/ २६ ) इति श्रुत्या ब्रह्मग' प्राधान्येनोपनिषत्स्वेव प्रति- पादनम, तासामनन्यशेषत्वात् । ईशावास्यादिमन्त्रेः सजातीयविजातपस्वगतनेवतया ब्रह्मग साक्षात्कारेण सर्वस्यैव नामरूपक्रियात्मकस्य प्रपञ्चस्य वाघरूणमाच्छादनमेव ज्ञायते । यथा साक्षात्कृतया रज्ज्वा तदध्यस्ताना सर्पधारामाला- भूछिद्रादीना बाधस्तथैवाधिष्ठानस्वरूप ब्रह्मात्मसाक्षात्कारेण तदध्यस्तप्रपञ्चस्यापि बाध । तत्रानेकः प्रत्यक्षानुमानैः कर्मोपासनपरैरागमैच द्वैतप्रतिपादकविरोधे 'तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो वलीयासि' इति न्यायेन तत्प्रधानेनाद्वैतागमेना- तत्प्रधानान्यन्यानि वचनानि बाध्यन्ते । कर्मोपासनपराणा वाक्याना लोकसिद्धद्वैताश्रयेणापि कर्मोपासनप्रतिपादन- सम्भवाद् अतत्प्रधानत्वमेव तेषाम् । ईशावास्यादिवाक्याना त्वद्वितीयब्रह्मात्मपरत्वेन तत्प्रधानत्वमेव 1। येषा ब्रह्मप्रति-पादकानामपि मन्त्राणा कर्मोपासनपरत्वमस्ति तेषा स्वप्राधान्याभावेन तत्प्रधानत्वाभावान्नान्यबाधकत्व सम्भवति । - यदुक्तम् — ' ईशावास्यमित्यादयो मन्त्राः कर्मसु विनियुक्ता मन्त्रत्वाद् इषे त्वेत्यादिमन्त्रवत्' इति, तत्तुच्छम्, विनियोजक प्रमाणसत्त्वस्योपाधित्वेनानुमानस्य सोपाधिकत्वेन दूषितत्वात् । ' इषे त्वेति शाखा छिनत्ति' इति ब्राह्मणवाक्येन श्रुतः' ', इषं त्वा इति मन्त्रस्य शाखाच्छेदने विनियोगः श्रुतः । ईशावास्यमित्यादिमन्त्राणां तु न ऋत्वादिषु विनियोगः न च कर्तृ- भोक्तृ -कर्मशेषात्मप्रतिपादकत्वेनापि तेषामभ्यपरत्व सिद्धयति, तेषामकर्मशेषस्य नित्यशुद्धबुद्धस्वभावस्य कर्तृत्व- भोक्तृत्व नानात्वशून्यस्यात्मनः प्रतिपादकत्वेन तदनुपपत्तेः । नाप्युपासनाविधिशेषत्व सम्भवति, ' यन्मनसा न मनुते में किया है । ' उस उपनिषदो के द्वारा प्रतिपाद्य पुरुष के विषय में मै पूछता हूँ' इस श्रुति में यह बताया गया है कि ब्रह्म का प्रतिपादन प्रधानत उपनिषदों में ही मिलता है, क्योकि इनका ब्रह्म के प्रतिपादन के अतिरिक्त और कोई विषय नही है । 'ईशावास्य' इत्यादि उपनिषद् के वाक्यो से सजातीय, विजातीय और स्वगत इस प्रकार त्रिविध भेदो से रहित ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर सभी नाम, रूप, क्रियात्मक प्रपच की बाघरूपता और आच्छादकता का ज्ञान हो जाता है । जैसे रस्सी का साक्षात्कार हो जाने पर उसमें कल्पित सर्प, जलधारा, माला, भूच्छिद्र प्रभृति पदार्थों का बाघ हो जाता है, उसी तरह से जगत् के अधिष्ठानभूत ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर उसमे कल्पित प्रपंच का भी बाध हो जाता है । प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा तथा कर्म और उपासना के प्रतिपादक शास्त्रो से द्वैत का प्रतिपादन होता है, अत · इनका अद्वैत प्रतिपादक वाक्यो से जब विरोध उपस्थित होता है, उस समय 'तत्प्रधान वाक्य अतत्प्रधान वाक्यों से बलवान् होते है' इस न्याय के अनुसार तत्प्रधान अद्वैत आगम से अतत्प्रधान द्वैत प्रतिपादक वचन बाधित हो जाते है । कर्म और उपासनापरक वाक्यों के द्वारा प्रतिपादित विषय का प्रतिपादन लोकप्रसिद्ध द्वैतवाद के सहारे से भी किया जा सकता है, अत इसको अतत्प्रधान कहा जा सकता है, क्योकि इन शास्त्र वाक्यो के द्वारा प्रतिपादित विषय के लोकसिद्ध होने से इन वाक्यो का विनियोग किसी नवीन विषय के प्रतिपादन में नही हुआ । ईशावास्य प्रभृति वाक्य तो अद्वितीय ब्रह्म के प्रतिपादन मे ही विनियुक्त हैं, इनका कोई अन्य विषय नही है और न किसी अन्य प्रमाण द्वारा इस विषय का प्रतिपादन संभव है । अत ये तत्प्रधान कहलाते है । जो ब्रह्मप्रतिपादक मन्त्र कर्म और उपासना का भी प्रतिपादन करते है, वे भी ब्रह्म-प्रतिपादन की प्रधानता न रहने के कारण तत्प्रधान नही रह जाते, अतः वे अन्य के बाधक नही हो सकते । ' ईशावास्य' इत्यादि मन्त्रो का भी विनियोग कर्म के लिये ही है, क्योकि ये भी ' इषे त्वा ' इत्यादि के समान मन्त्र है' यह कथन भी गलत है, क्योकि यह अनुमान सोपाधिक है । इस अनुमान में विनियोजक प्रमाणसत्त्व उपाधि है, अर्थात् आप इस अनुमान से यह सिद्ध करते है कि ' इषे त्वा' इत्यादि मन्त्रों की तरह 'ईशावास्य' प्रभृति मन्त्रो का भी कर्म मे ही विनियोग हो सकता है, इस पर हम कहते है कि ' इषे त्वा' इत्यादि मन्त्रो का कर्म में विनियोग करने वाले ' इषे त्वा' इससे शाखा का छेदन करता है' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य उपलब्ध है, 'ईशावास्य' प्रभृति मन्त्रो का यज्ञ-यागादि में विनियोग करने वाला वाक्य कहीं है । इस प्रकार विनियोजक प्रमाण के न मिलने से आपका उक्त अनुमान सोपाधिक हेत्वाभास से ग्रस्त होने से किसी वस्तु को सिद्ध करने में असमर्थ है । ' ईशावास्य' ,,प्रभृति वाक्यो की किसी कर्ता भोक्ता कर्मशेष के प्रतिपादक के रूप में भी अन्यशेषता नही सिद्ध की जा सकती क्योकि ये किसी कर्म का प्रतिपादन कर नित्यशुद्धबुद्धस्वभाव कर्तृत्व-भोक्तृत्व नानात्व मे शून्य आत्मा का प्रतिपादन करते है, अत: इनकी अन्यशेषता किसी भी तरह से उपपन्न नही होती । इनको उपासना विधि का अंग भी नही माना जा सकता, क्योकि 'जिसका मन से अनुभव नही किया
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वेदार्थपारिजातः ११६६ येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्व विद्धि नेद यदिदमुपासते ॥' ( केनोप ० ११५ ) इति ब्रह्मात्मतत्त्वस्य मनोवचनागोचर- स्योपास्यत्वप्रतिषेधात् । यदपि च-'तमोशान जगतस्तस्थुषस्पति धिय जिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे || ' ( ) - ' रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ऋ० स ० १६८९। ५ इति मन्त्रमुल्लिख्यैव व्याख्या कृता ईष्टेऽसावीशानः सर्वजगत्कर्ता जगतो जङ्गमस्य तस्थुष स्थावरस्य च पतिः स्वामी ( धिय जिन्व ) यो बुद्धेस्तृप्तिकर्ता ( अवसे हूमहे वयम्) तमवसे रक्षणाय वयं हूमहे आह्वयामः ( पूषा ) पुष्टिकर्ता न स एवास्माकं पुष्टिकारकोऽस्ति । यथा वेदसाम-, सद्वृधे हे परमेश्वर । यथा येन प्रकारेण वेदसा विद्यासुवर्णादीना धनाना वृधे वर्धनाय भवानस्ति तथैव कृपया रक्षिताऽसत् रक्षकोऽप्यस्तु । एव ( पायुरदब्धः ) अस्माकं रक्षणे स्वस्तये सर्वसुखाय अदब्धः अनलसः सन् पालनकर्ता सदेवास्तु' (पृ ० १०२ ) इति । तदिद व्याख्यान विशृङ्खलं पौर्वापर्यसङ्गतिशून्यं च । वस्तुतः 'आ नो भद्रा' इति पञ्चदशचं सूक्तं गोतम- स्याषं वैश्वदेवम् | आदितः पञ्चर्चः सप्तमी च जगत्य 3 षष्ठी स्वस्ति न इन्द्र इत्येषा विराट्स्थाना । नवौ वैराज- स्त्रैष्टुभश्चेत्युक्तलक्षणयोगात् । अष्टम्याद्यास्तिस्रस्त्रिष्टुभ । तथैवानुक्रान्तत्वात् । 'आ नो दश वैश्वदेव तु पञ्चाद्या. सप्तमी च जगत्यः षष्ठी विराट्स्थाना' इति । अग्निष्ट| मे वैश्वदेवशस्त्रे उत्तमावर्जमेतत् सूक्त । वैश्वदेव निविद्धा- नोयम् । सा तु प्रकृतौ विकृतौ च वश्वदेवशस्त्रस्य परिधानीया । तथा च सूचितम्- 'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वत इति नव वैश्वदेवमिति । अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमिति परिदध्यात् सर्वत्र वैश्वदेवे ' (आ ० श्री० सू० ५।१८ ) इति । 'सदैव पञ्चजनीयया परिदध्यात्' ( ऐ० ब्रा० ३।३१ ) इति ब्राह्मणम् । महाव्रते निष्कैवल्ये एतत्सूक्तम् । तथा च पञ्चमारण्यके सूत्र्यते 'आनोभद्रीय व तस्य स्थाने' ( ऐ० आ ० ५।३।२ ) इति । जा सकता, किन्तु जिसकी सहायता से मन अपने व्यापार मे प्रवृत्त होता है, उसी को तुम ब्रह्म जानो । ब्रह्म वह नही है, जिसकी तुम उपासना करते हो' इस श्रुति के प्रमाण पर ब्रह्मात्मतत्त्व मन-वाणी का भविषय होने से उपास्य हो ही नही सकता । 'तमीशानम्' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत कर उसकी इस तरह से व्याख्या की गई है- 'जो सब जगत् का बनाने वाला है, ( जगतस्तस्थुषस्पति ) अर्थात् जगत् जो चेतन और तस्थुष जो जड, इन दो प्रकार के संसार का जो राजा और पालन करने वाला है, ( घिय जिन्वम् ) जो मनुष्यो को बुद्धि और आनन्द से तृप्ति करने वाला है, उसकी ( अवसे हूमहे वयम्) हमलोग आह्वान, अर्थात् अपनी रक्षा के लिये प्रार्थना करते है, ( पूषा नः ) क्योकि वह हमको सब सुखो से पुष्ट करने वाला है । ( यथा वेदसामसद् वृधे ) हे परमेश्वर । जैसे आप अपनी कृपा से सब पदार्थों और सुखो को बढाने वाले है, वैसे ही (रक्षिता ) सबकी रक्षा भी करें । (पायुरदब्धः स्वस्तये ) जैसे आप हमारे रक्षक है, वैसे ही सब सुख भी दीजिये ' ( पृ ० १०२-१०३ ) । यह पूरी व्याख्या विशृंखल और पूर्वापर सगति से शून्य अर्थात् असंगत है । वस्तुतः ' आ नो भद्रा' प्रभृति पन्द्रह ऋचाओ वाले इस सूक्त के गोतम ऋषि और विश्वेदेव देवता है । प्रथम पाँच और सातवी ऋचा का जगती छन्द है । छठी 'स्वस्ति न इन्द्र:' इसका विराट् छन्द है । आठवी से दशवी तक का छन्द त्रिष्टुप् है । नवी ऋचा में विराट् और त्रिष्टुप् दोनो के लक्षण उपलब्ध होने से दोनो छन्द है । 'आ नो दश' इत्यादि से बताया गया है कि 'इस सूक्त मे दस ऋचायें है और इसके देवता वैश्वदेव है । पहली पाँच और सातवी का छन्द जगती और छठी का विराट् है' । अग्निष्टोम के वैश्वदेव शस्त्र में अन्तिम ऋचा को छोड़कर यह पूरा सूक्त विश्वेदेव निविद् के लिये है । अन्तिम का विनियोग प्रकृति और विकृति में वैश्वदेव शस्त्र के लिये है । जैसा कि इस सूत्र में बताया गया है-'आ नो भद्रा' इत्यादि न ऋचाओ का विनियोग विश्वेदेव के लिये हो । 'अदितिद्य' इसका सर्वत्र वैश्वदेव मे विनियोग करे' । 'पञ्चजनीय ऋचा से सदा निधान करें ' यह ब्राह्मण का कथन है । महाव्रत में निष्कैवल्य में इस सूक्त का विनियोग होता है । जैन कि पञ्चम आरण्यक में बताया गया है-' इसके स्थान में आनोभद्रीय सूक्त का विनियोग करें ।
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बेवार्थपारि कल ११६७ तमोशानमित्यनया तु पूर्वार्धेनेन्द्र स्तूयते, उत्तरार्धे च पूपा, नयंत्र मन्त्राननुगमात् । ईशानम् ऐश्वर्यवन्त त एव जगतो जङ्गमम्य प्राणिजातस्तस्युप स्थावरस्य वसतिस्वामिन दिय जिन्व सत्कर्मभिः प्रीणयित- ' ' ( )व्यम् । जिबि प्रीणनार्थः । कृत्यल्युटो बहुलमिति बहुलवचनात् खच् । इच एकाचोऽम्प्रत्ययवच्च पा ० ० ६।३।६८ इत्यमागम । एवभूतमिन्द्रमवसे रक्षणाय वय हूमहे अह्वयानः । पूपा नोsस्माक वेदना बुधे वर्धनाय रक्षिता यथा येन प्रकारेण असत् भवति तेनैव प्रकारेण अदब्धः केनाप्यहिंसित पूपा स्वस्तयेऽस्माकमविनाशाय वायुः रक्षिता भवतु | ईशान इत्यस्य जगत्कर्तेति न प्रामाणिकोऽर्थ, ईशतेरैश्वर्यार्थकत्वात् । धिय जिन्वमित्यस्य वुद्धेस्तृप्तिकर्तेत्यपि , 'प्रमाणापेक्ष एवार्थ पूषापदस्य देवविशेषपरत्वमपहाय यौगिकार्याश्रयणव्यसङ्गतम् । तद्विष्णो इत्यस्य व्याख्यान त्वन्यत्र कृतम् । यच्च - 'परीत्य भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य सर्वा प्रदिशो दिशश्च । उपस्थाय प्रथमजामृतस्यात्मना-त्मानमभिसंविवेश ॥ ' ( वा० स० ३२ ११ ) यः परमेश्वरो भूतानि आकाशादीनि परीत्य सर्वतोऽभिव्याप्य सर्वा दिशः परीत्य आग्नेयादिप्रदिशश्च परोत्य परितः सर्वत इत्व प्राप्य विदित्वा च ( उपस्थाय ) यः स्वसामर्थ्यस्याध्यात्मास्ति, यश्च प्रथमानि सूक्ष्मभूतानि जनयति त परमानन्दस्वरूप मोक्षाख्य परमेश्वर यो जोव आत्मना स्वसामर्थ्येनान्त: -करणेनोपस्थाय तमेवोपगतो भूत्वा विदित्वा च आभिमुख्येन सम्यक् प्राप्य स एव मोक्षाख्य सुखमनुभवति' (पृ० १०३ ) इति, तदपि विशृङ्खलमेव, मूलमन्त्रे यः परमेश्वर इत्यशस्याभावात् स्वकपोलकल्पितत्वात् । 'यः स्वसामर्थ्यस्यात्मास्ति' इति व्याख्यानमपि निर्मूलमेव ॥ यश्च प्रथमानीत्यपि मूलमन्त्रवहिर्भूतमेव । सूक्ष्मभूतानीत्यपि निराधारम् ॥ त परमानन्दस्वरूपं मोक्षाख्य परमेश्वर यो जीवः स्वसामर्थ्येनान्तः करणेनेत्यणोऽपि निर्मूलोऽक्षरासस्पयैव, पूर्वापर-सङ्गतिविधुर चेदं व्याख्यानम् 'तमीशानम्' इस ॠचा में पूर्वार्ध से इन्द्र की और उत्तरार्ध से पूषा की स्तुति की गई है, क्योकि ऐसा करने से ही मन्त्राक्षरो की संगति बैठती है । ईशान अर्थात् ऐश्वर्यशाली अत एव जगत् अर्थात् जंगम प्राणियो के और तस्थुष अर्थात् स्थावर प्राणियो के स्वामी को हमको अपने सत्कर्मों से प्रसन्न करना चाहिये । 'जिवि' धातु का अर्थ प्रीणन है । इस धातु से 'कृत्यल्युटो बहुलम्' इस सूत्र में बहुल पद के ग्रहण के कारण खच् प्रत्यय होता है और 'इच एकाच ० ' इत्यादि सूत्र से आमागम होता है । इस प्रकार के इन्द्र को हम अपनी रक्षा के लिये बुलाते है । पूषा देवता हमारे धन को बढाने के लिये और उस धन की किस तरह से रक्षा हो सकती हो, उसके लिये प्रयत्नशील हो । इस कार्य को सपन्न करते समय पूषा को कोई भी शत्रु किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचा सके और वह पूषा हमारे कल्याण के लिये, हमारी शत्रु से रक्षा करने के लिये सदा तत्पर रहे! यहाँ पर ' ईशान' पद का अर्थ जगत्कर्ता किसी भी प्रकार से प्रामाणिक नहीं माना जा सकता, क्योकि ईश धातु का अर्थ ऐश्वर्य है । 'घियं जिन्वम्' इसका अर्थ 'बुद्धि का तृप्ति कर्ता' करने के लिये कोई प्रमाण देना पडेगा । पूषा पद को देवविशेष का वाचक न मानकर यौगिक अर्थ को स्वीकार करना भी असंगत है । 'तद्विष्णोः' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या अन्यत्र की गई है । इससे आगे ' परीत्य भूतानि० ' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत कर उसकी इस प्रकार से व्याख्या की गई है— 'जो परमेश्वर आकाशादि सब भूतो में तथा ( परीत्य लोकान्) सूर्यादि सब लोको मे व्याप्त हो रहा है, ( परीत्य सर्वा. ० ) इसी प्रकार से जो पूर्वादि सब दिशाओं और आग्नेयादि उपदिशाओ मे भी निरन्तर भरपूर हो रहा है, अर्थात् जिसकी व्यापकता से एक अणु भी खाली नही है, (ऋतस्या० ) जो अपने भी सामर्थ्य का आत्मा है, (प्रथमजाम्) और जो कल्पादि में सृष्टि की उत्पत्ति करने वाला है, उस आनन्दस्वरूप परमेश्वर को जो जीवात्मा अपने सामर्थ्य अर्थात् मन से यथावत् जानता है, वही उसको प्राप्त हो कर ( अभि० ) सदा मोक्षसुख को भोगता है' ( पृ० १०३ ) । इस अर्थ मे भी विश्वङ्खलता ही प्रतीत होती है 1। मूलमन्त्र से कही पर भी परमेश्वर की चर्चा नही है, अतः यह अर्थ केवल कपोलकल्पना है । 'जो अपने भी सामर्थ्य का आत्मा है' यह व्याख्या भी निर्मूल है । 'यश्च प्रथमानि' ये शब्द भी मूलमन्त्र के बाहर के हैं । सूक्ष्म भूतो की चर्चा करना भी निराधार है । 'उस आनन्दस्वरूप ( मोक्षरूप ) परमेश्वर को जो जीवात्मा अपने सामर्थ्य,
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वेदार्थपारिजातः ११६८ सिद्धान्तानुसारेण त्वतः पर द्वात्रिंशाध्यायमारम्य ३३ । ५४ पर्यन्त सर्वमेधमन्त्रा उच्यन्ते । उव्वटमहीधरा- द्यनुसारेण तु - ' अथ सर्वमेधमन्त्राः प्रवायुमच्छेत्यस्मात्प्राक्' ( ३३।५५) इति कात्यायनवचनात् । ब्रह्मण आर्षम् । ' ' स्वयम्भुब्रह्मदृष्टा आत्मदेवत्याः सप्तमेऽहन्याप्तोर्यामसज्ञके सर्वहोमे विनियुक्ताः । आप्तोर्यामः सप्तममहर्भवति इत्युपक्रम्य 'सर्वं जुहोति सर्वस्याप्त्यै सर्वस्यावरुद्ध ' ( श० १३| ७| १| ९ ) इति श्रुते । यद्यप्यत्र ब्रह्मणः सर्वकारणस्य प्रतिपादनमस्ति, तथापि यत्रेते मन्त्रा विनियुक्तास्तत्प्रधाना एव न स्वप्रधाना, अन्यशेषत्वात् । प्रथम द्वे अनुष्टुभौ । विज्ञानात्मना परेणात्मना विशिष्टोऽग्न्यादिष्वोतप्रोतत्वेनोपास्योऽभिधीयते । 'तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्र तद् ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥' (श्वे ० उ० ४।२ ) । तदिति कारणं ब्रह्मोच्यते । 'ओ तत्सदिति निर्देशो :' ( ) ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृत भ० गी० १७।२३ । वेदान्तेषु ब्रह्मवित्सु प्रसिद्धत्वाच्च । एवेति तदितरव्यावृत्तिः । तथा च तदेव कारण ब्रह्मवाग्निः, तदेवादित्यः, तदेव वायुः, तदेव चन्द्रमाः, तदु उ एवार्थः, तदेव शुक्र शुक्ल तत्प्रसिद्ध ब्रह्म त्रयीलक्षण ब्रह्मव, ताः प्रसिद्धा आपः, स प्रसिद्धः प्रजापतिः, तदेव ब्रह्म सर्वकारणत्वात्तस्य सार्वात्म्यप्रसिद्धेः । नह्येवंविध ब्रह्म सामाजिकैरभ्युपेयते, प्रकृतितत्कार्यस्य भोक्तृणा च परमात्मनो भिन्नत्वाभ्युपगमेनाग्न्यादिभिर्ब्रह्मणः सामानाधिकरण्यानुपपत्ते । 'स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यै- रयन्त ( वा० स ० ३२।१० ) इति मन्त्रेण तस्यैव कारणब्रह्मणो वर्णनम् । स परमेश्वरः, नोऽस्माक बन्धुः बन्धुवन्मान्य. जनिता जनयिता 'जनिता मन्त्रे' ( पा० सू० ६ | ४| ५३ ) इति णिचो लोपः । स विधाता धारयिता स विश्वा सर्वाणि अर्थात् मन से यथावत् जानता है, यह अंश भी निर्मूल है, मूल के अक्षरो से इसका कुछ भी संबन्ध नही है । इस व्याख्या की पूर्व और पश्चात् के मन्त्रो के अर्थ के साथ कोई सगति भी नही है । सिद्धान्तत. यजुर्वेद के ३२ वें अध्याय से आरम्भ कर ३३।५४ पर्यन्त सर्वमेघ यज्ञ के मन्त्र है, जैसा कि उब्वट और महीधर ने कात्यायन के इस वचन के अनुसार कहा है कि ' अब सर्वमेध के मन्त्र प्रदर्शित किये जाते है । इनकी स्थिति ' प्रवायुमच्छहोने' ( ३३।५५ ) इस मन्त्र से पूर्व तक है । इनका ऋषि ब्रह्मा है, स्वयम्भु ब्रह्मा ने इनको देखा है । इनका देवता आत्मा है । सातवे दिन वाले आप्तोर्याम सज्ञक सर्वहोम मे इनका विनियोग है । 'आप्तोर्याम सातवां दिन होता है' यहाँ से प्रारम्भ कर ' इसमे यजमान सब कुछ हविरूप में प्रदान कर देता है, जिससे कि उसको सब कुछ प्राप्त हो जाय, सभी प्रकार की विघ्न बाधाओ का अवरोध हो जाये' यह शतपथ श्रुति इसमें प्रमाण है । यद्यपि यहाँ पर सर्वकारणभूत ब्रह्म का प्रतिपादन है, तो भी जहाँ पर इन मन्त्रो का विनियोग हुआ, वही इनका प्रधान प्रतिपाद्य है, ब्रह्म का नही, क्योकि इनका विनियोग अन्य के लिये ही हुआ है । इनमे पहली दो ऋचाओ का छन्द अनुष्टुप् है । विज्ञानात्मा के रूप में अग्नि प्रभुति मे ओत प्रोत परमात्मा की यहाँ उपासना बताई गई है । ' वही अग्नि है, वही आदित्य है, वही वायु और चन्द्र है, वही शुक्र है, वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति' इस श्वेताश्वतर श्रुति मे तत्पद से कारण ब्रह्म ही } कहा जाता है । ', तत् और सत् इन तीन शब्दो से ब्रह्म का त्रिविध निर्देश होता है' इस गीता वचन के अनुसार वेदान्तशास्त्र में और ब्रह्मवेत्ताओ के सम्प्रदाय में तत्पद की कारणब्रह्म वाचकता प्रसिद्ध है । उक्त श्वेताश्वतर श्रुति मे 'एव' पद ब्रह्मभिन्न की व्यावृत्ति करता है । अत • उक्त श्रुति का यह अर्थ होता है कि वह कारण ब्रह्म ही अग्नि, आदित्य, वायु और चन्द्रमा है । 'तदु ' में विद्यमान 'उ' का अर्थ 'एव' होता है । वही शुक्र अर्थात् शुक्ल त्रयीलक्षण ब्रह्म के रूप में भी वही प्रसिद्ध है । वह प्रसिद्ध जल और प्रजापति भी ब्रह्म ही है । वह सबका कारण है, अतः वह सर्वात्मकरूप से प्रसिद्ध है । इस तरह का ब्रह्म आर्यसमाजियो को मान्य नही है । उनके मत में प्रकृति, प्राकृतिक कार्य और भोक्ता को परमात्मा से भिन्न माना गया है, अत अग्नि प्रभृति के साथ ब्रह्म का सामानाधिकरण्य इनके यहाँ नहीं बन सकता । ' सतो बन्धु ० ' इस मन्त्र में उसी कारणब्रह्म का वर्णन किया गया है । वह परमेश्वर हमको बन्धु बान्धवो के समान , ' ' ' ' मान्य है क्योकि वही सबको उत्पन्न करता है । जनिता शब्द में जनिता मन्त्रे इस पाणिनि सूत्र से णिच का लोप हो जाता । वही सबको धारण करता है । वह सभी भुवनो और स्थानों को जानता है । अग्नि प्रभृति देवतागण तृतीय स्थान अर्थात् स्वर्ग लोक मे अपनी
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वेदार्थपारिजातः ११६ भुवनानि धामानि स्थानानि च वेद । देवा अग्न्यादय, तृनाये धमत् धाननि स्थाने स्वर्गरूपे अध्ययन्त स्वेच्छया वर्तन्ते । कथभूता देवा? अमृत मोक्षप्रापकं ज्ञान यत्र ब्रह्मण आनशाना व्याप्नुवाना अश्नुवते । 'बहुल छन्दसि' ( पा० सू० २/४/ ७६ ) इत्यशेादित्वेन द्वित्वे शानच्यभ्यासस्य नुगागमे आनशाना इति सिद्धन् ब्रह्मज्ञान प्राप्ताः सन्तः स्वर्गे लोके मोदन्ते इत्यर्थ' । 'परीत्य' ( वा० स ० ३२/११ ) इत्यनेन मन्त्रेण सर्वभूतेष्वहमस्मि सर्वाणि भूतानि मयि सन्तीति ज्ञानवतः सर्वमेधयाजिनो मुक्तिरुच्यते । ब्रह्मज्ञानवतो यजमानस्याग्निहोत्रादयोऽपि यज्ञा. सर्वमेधा एवेत्याह कण्डिकाभ्याम् । एवं ज्ञानवान् सर्वमेधयाजी आत्मना जीवरूपेण ऋतस्य यज्ञस्य आत्मान यज्ञाधिष्ठातार परमात्मानमभिसविवेश प्रविशति, ब्रह्मैव प्रविशति ॥ किं कृत्वा भूतानि सर्वभूतानि परीत्य ब्रह्मत्वेन विज्ञाय, लोकान् भूरादोन् परीत्य ब्रह्मरूपान् ज्ञात्वा, सर्वाः प्रदिशो विदिशो दिशश्च प्राच्यादीन् परोत्य ब्रह्मरूपान् ज्ञात्वा, प्रथमजा प्रथमोत्पन्ना त्रयीरूपा वाचमुपस्थाय संसेव्य वेदोक्तयज्ञादिकमनुष्ठाय, 'अपि हि तस्मात् पुरुषाद् ब्रह्मैव पूर्वमसृज्यत' ( श० ६। १।१।१० ) इति श्रुतेः । प्रथमजा वाग् वेदरूपा गुह्य वस्तु पुनः पुनः कथिता वित्तमारोहतीति तदेव वस्तु परि द्यावापृथिवी सद्य' वा० स० ३२।१२) इत्यनयापि कण्डिकयोच्यते । यदपि -' महद्यक्ष भुवनस्य मध्ये तपसि क्रान्तं सलिलस्य पृष्ठे । तस्मिञ्छ्रयते य उ के च देवा वृक्षस्य स्कन्धः परित इव शाखाः ||' ( अथर्व० १० | ४| ३८ ) । यद् महत् सर्वेभ्यो महत्तर यक्षं सर्वमनुष्ये पूज्यं भुवनस्य सर्व- ससारस्य मध्ये परिपूर्ण तपसि विज्ञाने क्रान्त वृद्ध सलिलस्यान्तरिक्षस्य कारणरूपेण कार्यव्य प्रलयानन्तर पृष्ठे पश्चात् स्थितमस्ति तदेव ब्रह्म विज्ञेयम् । तस्मिन् ब्रह्मणि ये के चापि देवास्त्रयस्त्रिशद् वस्वादयस्ते सर्वे तदाधारेणैव तिष्ठन्ति । कस्य का इव वृक्षस्य स्कन्धे परित सर्वतः सलग्ना शाखा इव' ( पृ० १०३ ) इति । तदपि न मनोरमम्, यतो हि इच्छा से निवास करते है । ये देवता कैसे है? मोक्ष के प्रापक ज्ञान की अधिगति के कारण ये ब्रह्म मे व्याप्त हो कर रहते है । 'बहुलं छन्दसि' इस सूत्र से अश् धातु के द्वित्व, शानच् और अभ्यास में नुक् आगम होने पर ' आनशाना' यह शब्द बनता है । अर्थात् ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर ये सब देवतागण स्वर्ग लोक मे आनन्द का उपभोग करते है । 'परीत्य ' इत्यादि मन्त्र में मैं सभी भूतो मे विद्यमान हूँ और मेरे अन्दर सभी भूतो का निवास है, ऐसा जानने वाले सर्वमेधयाजी मनुष्य की मुक्ति का प्रतिपादन किया गया है । ब्रह्मज्ञानी यजमान के अग्निहोत्र प्रभृति यज्ञ भी सर्वमेध ही कहलाते हैं, यही बात दो कण्डिकाओ में बताई गई है । इस तरह ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति जब सर्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करता है, तो वह अपने जीवरूप से यज्ञ के अधिष्ठाता परमात्मा में, अर्थात् ब्रह्म मे प्रविष्ट हो जाता है । क्या करके प्रविष्ट होता है? सब भूतो को वह ब्रह्म के रूप में ही जानने लगता है, भूरादि लोको को भी वह ब्रह्म के रूप मे ही देखता है, प्राची आदि दिशाओ और आग्नेय प्रभृति प्रदिशाओ को भी वह ब्रह्म के रूप में ही देखने लगता है । साथ ही व्यक्तिसृष्टि के आरम्भ में प्रथम उत्पन्न त्रयीरूप वाणी को वेदोक्त यज्ञ-यागादि का अनुष्ठान कर सेवा करता है । 'उस पुरुष से पहले ब्रह्म ( वेद ) की ही सृष्टि हुई यह शतपथश्रुतित्रयी के प्रथम उत्पन्न होने में प्रमाण है । प्रथम उत्पन्न हुई यह वेदरूपी वाणी अत्यन्त गुह्य है । बार बार समझाने पर ही यह मन मे बैठ सकती है, अतः इसी बात को 'परि द्यावा' इस कण्डिका से भी समझाया गया है । इसी प्रसंग मे 'महद्यक्षं' इत्यादि अथर्ववेद के मन्त्र को उद्धृत कर उसकी इस प्रकार व्याख्या की गई है –'ब्रह्म जो महत् अर्थात् सबसे बडा और सबका पूज्य है, जो सब लोको के बीच मे विराजमान और उपासना करने के योग्य है, जो विज्ञानादि गुणो मे सबसे बड़ा है, सलिल जो अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश है, उसका भी आधार और उसमें व्यापक तथा जगत् के प्रलय के पीछे भी नित्य निर्विकार रहने वाला है, जिसके आश्रय से वसु आदि पूर्वोक्त तैतीस देत्र ठहर रहे है, जैसे कि पृथिवी से वृक्ष का प्रथम अंकुर निकल कर और वही स्थूल होकर सब डालियो का आधार होता है, इसी प्रकार सब ब्रह्माण्ड का आधार वही एक परमेश्वर है' (पृ० १०४ ) | यह व्याख्या भी मनोरम नही है । यद्यपि इस स्कम्भ सूक्त में ब्रह्म के भी आदिभूत सनातन देव का वर्णन है, इसीलिये १४७
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११७० वार्थपारिजात: यद्यप्यस्मिन् स्कम्भसूक्त सनातनतम ब्रह्मणोऽप्याद्यभूतो देव उक्तः, अत एव ज्येष्ठ ब्रह्मेति तस्य सज्ञा । तस्मिन् सर्वमेत- त्तिष्ठति, तत्सर्वमेतेनाविष्टम्, विराडपि तत्रैव समाहितः, तस्मिन्नेव सर्वे देवाः समाहिताः । तथाप्यक्षरार्थोऽसङ्गत एव तद्रीत्या । परिपूर्णमित्यध्याहारापेक्षया भुवनस्य मध्ये तद् महद् यक्ष निरतिशय यजनीय पूजनीयमित्यर्थं एव युक्त । यद्वा महदित्यनेन प्रपञ्चापेक्षया तस्य महत्त्वोक्त्या व्यापकत्व परिपूर्णत्व च स्वतः सिद्ध्यति । तपसि ज्ञानमये तपसि ' यस्य ज्ञानमय तप. ' ( मुण्डकोप ० १।१।९ ) इति श्रुतेः । क्रान्त ज्ञेयम् अतिक्रान्त सर्वं ज्ञेय यज्ज्ञानापेक्षयाऽल्पमनन्तज्ञान- वन्तमनन्तज्ञानरूप वा, ‘ सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म' (तै ० उ० २।१।१ ) इति श्रुते । सलिलस्य आपोमयस्य सर्वस्यैव कर्ममयस्य गतः पृष्ठेऽधिष्ठानभूते तस्मिन् ब्रह्मणि ये के च देवा द्योतनवन्तो ब्रह्मादयो देवा आन्तराणीन्द्रियमनोबुद्धयहङ्कार- चिदाभासान्तानि बाह्यानि विद्युदग्न्यादित्यादोनि ज्योतीपि श्रूयन्ते तत्सत्तया सत्तावन्ति तत्स्फूर्त्या च स्फूर्तिमन्ति भवन्ति । यथा वृक्षस्य स्कन्धे परित. शाखा श्रयन्तेD तथैव तस्मिन् सर्वे देवाः श्रयन्ते । यथा वृक्षस्याशभूता एव शाखा भवन्ति" तथैव ब्रह्मेन्द्रादयो देवास्तादृशभूता एवेत्यर्थः । 'न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते न पञ्चमा न षष्ठ. सप्तमो नाप्युच्यते नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते "तमिद निगत सह. स एक वृदेक एव सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति' ( अथर्ववेदसहिता १३।४।१६, १८, २०-२१ ) । व्याख्यात चेत्थम् - एतमन्त्ररिद विज्ञायते यत् परमेश्वर एक एवास्ति, नैवातो भिन्नः कश्चिदपि द्वितीयः, तृतीयः, चतुर्थः, पञ्चमः, षष्ठः, सप्तम, अष्टम नवमः, दशमश्चेश्वरो विद्यते । यतो नवभिर्नका रैद्वित्वादिसख्यामारम्य शून्यपर्यन्तेनैकमीश्वर विधायास्माद् भिन्नेश्वरभावस्यातिशयतया निषेधो वेदेषु कृतोऽस्ति, अतो द्वितीयस्योपासनमत्यन्ते निषिद्धम् । सर्वान्तर्यामितया प्राप्तः सन् जड चेतन च द्विविध सर्वं जगत् स एव पश्यति, नास्य कश्चिद् द्रष्टास्ति । न चायं कस्यापि दृश्यो भवतीति । येनेद जगद् व्याप्तं तमेव परमेश्वरमिद सकल जगदपि निगतं निश्चित प्राप्तमस्ति, इसको ज्येष्ठ ब्रह्म कहा जाता है, उसी में यह सारा जगत् रहता है, यह सारा जगत् इसी से व्याप्त है, विराट् भी वही निवास करता है और उसी में सारे देवगण भी समाहित है, तो भी दयानन्द की पद्धति से मन्त्राक्षरो की संगति नही बैठती । परिपूर्ण पद के अध्याहार की अपेक्षा भुवन के मध्य मे वह महान् यक्ष अर्थात् निरतिशय यजनीय, पूजनीय देवता विद्यमान है, यही अर्थ करना ठीक है । अथवा महत् पद से प्रपंच की अपेक्षा इसका महत्त्व बतलाया गया है, अतः इसकी व्यापकता और परिपूर्णता स्वत सिद्ध होता है । तप का अर्थ यहा ज्ञानमय रूप है, 'जिसका तप ज्ञानमय है' यह मुण्डक श्रुति इसमे प्रमाण है । क्रान्त का अर्थ ज्ञेय है । यह सारा अर्थ ज्ञेय जगत् इस ज्ञान की अपेक्षा बहुत ही थोडा है, अत • ज्ञान इसको अतिक्रान्त कर जाता है, अर्थात् यह ब्रह्म अनन्त ज्ञानवान् और अनन्त- ज्ञानरूप है, ' ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है' यह श्रुति इसमे प्रमाण है । सलिल अर्थात् आपोमय, कर्ममय सारे जगत् के अधिष्ठानभूत ब्रह्म में ही ये सब द्योतमान ब्रह्म प्रभृति देवतागग, मन, बुद्धि, अहङ्कार, चित्त प्रभृति आन्तर इन्द्रिया, विद्युत्, अग्नि प्रभृति बाह्य तेज आश्रित है, अर्थात् इसी की सत्ता से वे सत्तावान् और इसी के स्फुरण से उनमे स्फूर्ति का संचार होता है । जैसे वृक्ष के तने पर उसकी सारी शाखाएं टिकी रहती है, उसी तरह से उस ब्रह्म का ही सहारा लेकर सब देवता अवस्थित है । जैसे शाखाएं वृक्ष का ही अश होती है, उसी तरह से ब्रह्मा, इन्द्र प्रभृति देवतागण उस महान् यक्ष स्वरूप ज्येष्ठ ब्रह्म के ही अंश है । इसी प्रसंग में अथर्ववेद के ही 'न द्वितीयो० ' इत्यादि मन्त्रो को उद्धृत कर उनकी व्याख्या इस प्रकार से की गई है-- "इन सब मन्त्रों से यह निश्चय होता है कि परमेश्वर एक ही है, उससे भिन्न कोई न दूसरा, न तीसरा, न कोई चौथा परमेश्वर है । न पांचवां, न छठा और न कोई सातवा ईश्वर है । न आठवा, न नवां और न कोई दसवा ईश्वर है । इन मन्त्रों में जो दो से लेकर दस पर्यन्त अन्य ईश्वर होने का निषेध किया है, सो इस अभिप्राय से है कि सब संख्या का मूल एक ( १ ) अंक ही है । इसी को दो, तीन, चार, पाच, छः, सात, आठ और नो बार गिनने से २, ३, ४, ५, ६, ७, ८ और ९ अक बनते हैं और एक पर शून्य देने से १० का अंक होता है । उनसे एक ईश्वर का निश्चय कराके वेदो में दूसरे ईश्वर के होने का सर्वथा निषेघ हीं लिखा है, अर्थात् उसके एकपने मे :