वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 41–50
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 41–50
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वेदार्थपारिजातः ६४१ प्राचीनाः सस्था विनिःसृताः । तथा तथा पुरोहितानां प्रभावा अपि दाढर्थं मुपगता: । पतृकरीतीनां नियमानां देव- पूजनानां च संरक्षकैरेतैनिरन्तरं विकासोन्मुख महत्त्वपूर्ण पदमासादितम् तेषां च पारलौकिकशक्तीनां प्रतिनिधया सञ्जातास्ते पुरोहिताः । तैरनुकूलावसरस्य चातुर्येणोपयोगं कृत्वा तादृश्याः पुरोहितप्रधानाया व्यवस्थायाः स्थापने साफल्यमवाप्तम्, यादृशी व्यवस्था केनापि न दृष्टा, एतत्पदप्राप्तिरसम्भवैव स्याद्यदि हिन्दुस्थानस्यास्वास्थ्यकरो जलवायू न स्याताम् । तत्प्रभाविता जीवनप्रणाली च न स्यात् । यथा चानभ्यस्ताया जातेरुपरि हानिकारकः प्रभावः पातित इति ( पृ० ११-१२ ) । तदेतत्सर्वं पाश्चात्त्याना कौटिल्यमेव बेवरमुखादुद्गतम् । सर्व चैतन्निर्मूलम् । वेदसाहित्यमाश्रित्यैतत्सर्वं तेन जल्पित पर तादृश वचनमेकमपि न समुद्धृतम्, यतो हि वचनसमुद्धरणेन सुतरां निःसारतैव स्यात् । वचनाना- मर्थावगमप्रणाल्यपि तैर्न ज्ञायते ॥ मन्त्रार्थावगमस्तु दूरापेत एव । एव विधैविषाक्तं विचारैरेवात्रार्यानार्य सवर्णा- सवर्णभेदा उत्थापिताः कलहश्चोत्पादितः । बहिर्देशादार्या भारतमुपगता इत्यय पक्षोऽपि निर्मूल एव । वेदादिभारतीय- साहित्येषु तद्वर्णनानुपलम्भात् । विवेचित चैतद् रामायणमीमांसाया चातुवर्ण्यसस्कृतिविमर्शे च । यज्ञाश्च न रीति- मात्रप्रसूता न वा सामान्यचेतनाया उद्भूता न वा तेषा विस्तारा विशिष्टव्यक्तीना चिन्तनपरामर्शेः समुद्भूताः, किन्त्वनादेरपौरुषेयाद्वेदादेव । वेदाश्च न कैश्चिद्रचिता गीतरूपास्तत्र प्रमाणाभावात् । केवलं कल्प्यते पाश्चात्त्यैः । न च कल्पनाः प्रामाण्यमुपगच्छन्ति निरङ्कुशत्वात् । नैयायिकैस्तु परमेश्वरकर्तृकत्वमेव वेदानामनुमीयते । मीमां सकैस्तान्यप्यनुमानानि निरस्याविच्छिन्नपारम्पर्येण 'वाचा विरूपनित्यया' (ऋ० सं० ८२७५| ६ ) इत्यादिप्रमाणैश्च हुई कोई भी वस्तु पवित्रता से परिवृत प्रतीत होने लगती है और इस प्रकार ऐसा हुआ कि गीतो की रचना करने वालो के ये परिवार पुरोहितों के परिवार बन गये तथा जैसे- जैसे इस जाति के लोग अपने प्राचीन निवास -स्थान से दूर होते गये एवं बाह्य संघर्षों के फल- स्वरूप उनके मस्तिष्क से अपनी प्राचीन संस्थाएँ निकलती गई, वैसे -वैसे इन पुरोहितो के परिवारों का भी प्रभाव जमता गया । पैतृक रीति-रिवाजो और देवपूजन के इन संरक्षको ने निरन्तर विकासोन्मुख महत्त्व का पद प्राप्त किया । वे इनके प्रतिनिधि हो गये और अन्त में स्वयं पारलौकिक शक्ति के हो प्रतिनिधि बन बैठे । उन्होने अपने अनुकूल अवसरो का इतनी चतुराई के साथ उपयोग किया कि वे इस प्रकार की पुरोहित प्रधान व्यवस्था स्थापित करने मे सफल हुए, जिसके समान संसार ने कभी देखी ही नही । इस पद तक पहुँचना उनके लिये असंभव हुआ होता, यदि हिन्दुस्तान जैसी अस्वास्थ्यकर जलवायु और उस जलवायु से प्रभावित जीवन -प्रणाली न रही होगी, जिसने इनसे अनभ्यस्त जाति के ऊपर हानिकारक प्रभाव छोडा' ( पृ० ११-१२ ) । पाश्चात्य विद्वानों की कुटिलता ही इस तरह से वेवर के मुंह से प्रकट हो रही है । ये सब बातें निराधार है । वैदिक साहित्य के संबन्ध में ही बेबर ने यह सब कुछ कहा है, किन्तु इसके लिये कोई प्रमाण नही दिया । क्योंकि यदि ये लोग वचनों को उद्धृत करें तो उनसे ही इनके कथन की निःसारता सिद्ध हो जायगी, इस बात को वे भी जानते हैं । इन वैदिक वचनों के अर्थ को समझने की पद्धति का भी उनको ज्ञान नही है, तब ये लोग मन्त्रों का अर्थ कैसे समझ सकते हैं? इस तरह के विषाक्त प्रचार से ही आज देश में 20 आर्य- अनार्य, सवर्ण-असवर्ण आदि के भेदों को उभाड कर परस्पर वर्गों में संघर्ष की स्थिति पैदा कर दी गई है । बाहर के किसी देश से आर्य यहाँ आये, इस तरह की बातें भी सर्वथा निराधार है । वेद आदि किसी भी भारतीय ग्रन्थ में इस बात का कहीं भी उल्लेख नही है । इस बात पर हमने ' रामायण मीमांसा ' और ' चातुर्वर्ण्य-संस्कृति विमर्श' नामक ग्रन्थों में विस्तार से विवेचन किया है । यज्ञो का विस्तार केवल रीति या परम्पराओं से अथवा मनुष्य की सामान्य चेतना से या विशिष्ट व्यक्तियों की चिन्तन-परामर्श पद्धति से नही हुआ है, किन्तु अनादि अपौरुषेय वेद से ही उनकी विधि- विधानों की पद्धति भी ज्ञात होती हैं । वेद किन्ही के द्वारा रचे गये गीत है, इसमें भी कोई प्रमाण नही है । यह पाश्चात्यों की कोरी कल्पना है । कल्पना कभी प्रमाण नही मानी जाती, क्योंकि कल्पना पर कोई कभी यह अंकुश नही लगाया जा सकता कि इस तरह की कल्पना करनी चाहिये और इस तरह की नहीं । नैयायिक अनुमान के द्वारा ईश्वर को वेदों का कर्ता सिद्ध करते हैं । मीमांसक इन नैयायिकों की युक्तियों का खण्डन कर अविच्छिन्न परम्परा के आधार पर तथा 'वाचा
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वेदार्थपारिजातः६४२ वेदानामनादित्व स्थाप्यते । पाश्चात्त्यास्तु - 'अशक्तास्तत्पद गन्तु ततो निन्दा प्रकुर्वते' इति न्यायमनुसृत्य यत्किश्वित् प्रलपन्ति । येषां नास्तिकप्रायाणा परमेश्वरे धर्मे परलोके च विश्वासो नासीत् तैरेव तत्कल्पना विश्वासमापादिता । पैतृकरीतिसमुद्भूता देवपूजादिकल्पना इति त एव प्रजल्पन्ति । वैदिकैस्तु प्रत्यक्षानुमानागमादिप्रमाणान्यमुसृत्यैव किमप्युच्यतेऽभिप्रेयते च । लोकव्यवहारनिर्वाहाय शब्दप्रामाण्यं सर्वैरप्यभ्युपेयते । वक्तृदोषेणैव शब्दानामप्रामाण्यं भवति । येषां शब्दानां प्रथमवक्ता निर्माता वा प्रमाणर्न सिद्ध्यति, ये च व्यवहारारूढा अविच्छिन्नपारम्पयस्तिषाम- पौरुषेयत्वेनापास्तसमस्त पुंदोषत्वात् प्रामाण्यमेव । भारतस्य यादृशौ जलवायू स्वास्थ्यकरौ न तादृशस्वास्थ्यकरो पाश्चात्यदेशेषु, भारतस्य सर्वर्तुसुखकरत्वात् । फलानि विविधान्यन्नानि पयोदध्यादीनि स्वास्थ्यकराणि वस्तूनि यथा भारते तदानीमपि यथासन्न तथान्यत्रेति स्पष्टमेव । विश्वासनीतिरीतीनां नियमानां च न प्रामाण्यम्, न वा तेषां परिगणितप्रमाणेष्वन्तर्भावः । तदाश्रिता यज्ञाः कथमुपादेयाः स्युः । एवं लघुभी राजभिः प्रथम जातिषु वैयक्तिकं शासनं कृतम् । तदानीं तेऽपि विस्तृतानां राज्याना स्वामिनः सन्तः शक्तिशालिनो जाताः । एव क्षत्रियवर्णस्योदयः । सर्वत्र वसन्तो जनसाधारणा विशः । विशोऽपि सङ्घटिताः सन्तश्चतुर्थवर्णेषु स्वाधिकारान् सुरक्षितान् कृतवन्तः । अन्तिमस्य शूद्रवर्णस्य सङ्घटनमनेकैमिश्रितस्तत्त्वैः सवृत्तं यस्मिन्नंशत एका आर्यजातिरप्यासीत् । या प्रथममेव भारतमागतेति । ते चांशतो मूलनिवासिनोंऽशतो बहिर्देशादा- गताः, अथवा पश्चिमदेशादागतानामार्याणां बान्धवसमुदायैकदेशिन एव यैर्ब्राह्मणीयव्यवस्थाया अनुगमनमस्वीकृतम्, योद्धारो राज - रिवाराश्च यैर्ब्राह्मणानां तावत्पर्यन्त प्राणपणैः समर्थन कृतम, यावत्तेषामधिकारापहरणप्रश्न आसीत्, तत्सिद्धी तेऽपि पूर्वनित्रैविरुद्धयमानाः स्वस्कन्धस्थयुगमुत्तायं शूद्रवर्ग एवं समवेताः । सर्वमेतत् परवर्तिषु गूढाख्यानेषु विरूपनित्यया' इस तरह के वैदिक वचनो के प्रमाणो से भी वेदों की अनादिता को सिद्ध करते है |। पाश्चात्यपाश्चात्य विद्वान्विद्वान् 'अंगूर खट्टे' है ' इस कहावत के अनुसार जब वेदों का अर्थ कुछ समझ नही पाते तो मनमाना बकवास करने लगते है । प्रायः उन नास्तिको को, जिनका कि परमेश्वर, धर्म या परलोक मे विश्वान नही था, इस तरह की पाश्वात्यों की कल्पना पर विश्वास हो गया । उन्ही लोगो का यह कहना है कि देवपूजा आदि की कल्पनाएँ केवल परम्परा प्रसूत है । इसके विपरीत वैदिक विद्वान् प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि प्रमाणो के अनुसार ही कुछ कहते है या मानते है । लोक व्यवहार के निर्वाह के लिये भी सभी लोगो को शब्द को प्रमाण मानना पडता है । बक्ता के दोष से ही शब्द मे अप्रामाण्य आता है । जिन शब्दो का काई प्रथम वक्ता या निर्माता प्रमाणो से सिद्ध नही हो पाता और जिनका व्यवहार अविच्छिन्न परम्परा से निरन्तर चला आ रहा है, वे अपौरुषेय माने जाते हैं । उनमे समस्त पुरुष दोषो की संभावना न रहने से उनकी प्रामाणिकता में भी कोई शंका नही बनती । बेवर की भारत के जलवायु के संबन्ध मे कही गई बात भी सर्वथा निराधार है । भारत का जलवायु सारी दुनिया के लोगों के लिये जिस तरह का स्वास्थ्यप्रद है, उस तरह का जलवायु पाश्चात्य देशो का नही है । भारत की सभी ऋतुएँ सुखद है । भाँति-भाँति के फल, अन्न, दूध, दही आदि स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ जैसे यहाँ होते रहे है, वह स्थिति अब भी कही की नही है । विश्वास, नीति - रीति और नियमो को कोई प्रमाण नही मानता और न इनका किन्ही प्रमाणों मे अन्तर्भाव ही माना जाता है । तब यज्ञो की स्थिति यदि इनके आधार पर मानी जाय तो उनको कैसे प्रमाण माना जा सकता है? 'छोटे छोटे राजाओ के परिवारो ने भी, जिन्होने पहले व्यक्तिगत जातियो पर शासन किया था, अब हिन्दुस्तान में आवश्यक रूप से स्थापित किये गये अधिक विस्तृत राज्यो के स्वामी बनकर और भी शक्तिशाली हो गये । इस प्रकार क्षत्रिय वर्ग का उदय हुआ । अन्ततः सामान्य जनता ने, जो 'विश्' या 'बसने वाले' कहलायी, मिलकर तीसरे वर्ग का संगठन किया और उन्होने भी स्वभावतः चौथे वर्ण या शूद्रों के ऊपर अपने विशेषाधिकार सुरक्षित कर लिये । इस अन्तिम वर्ण का संगठन अनेक मिश्रित तत्वों से हुआ, जिनमें आंशिक रूप से संभवतः एक ऐसी आर्य जाति थी, जो पहले भारत में आकर बस गई थी; आशिक रूप में स्वयं भूल निवासी थे और आशिक रूप में बाहर से बाई हुई जातियों के या उनके पश्चिमी बान्धवों के समुदाय के ऐसे लोग थे, जिन्होंने नवीन ब्राह्मणीय व्यवस्था का अनुगमन करना अस्वीकार कर दिया था । राज -परिवार या योद्धा जिन्होने उस समय तक पुरोहितों का जी-जान , से समर्थन किया था जब तक कि लोगों के अधिकारों का अपहरण करने का प्रश्न था । अब इस कार्य के सिद्ध हो जाने पर अपने पहले
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बदार्थपारजातः ६४३ वणितमिति, तदपि न क्षोदक्षमम्, निर्मूलत्वात् । वैदिकसाहित्येषु नास्याः कपोलकल्पनाया आधारो विद्यत इतीत एव सिद्ध्यति 1। केचिद्रामायणगत वशिष्ठविश्वामित्रसङ्घर्षमाश्रित्य भारतगतं भृगुवंशीयाना ब्राह्मणानां हैहयवंशीयः क्षत्रियैजतं सङ्घषं च तत्र प्रमाणयन्ति । परन्तु रामायणमहाभारताद्युक्तहेतुजातमुपेक्ष्यानुक्तस्वाम्यूहितहेतुकल्पनं सर्वथा निराधारमेव । श्रुतहानिरश्रुतकल्पना च न युक्ता । अत्राप्यन्ते समन्वय एव दृश्यते । 'येषु परिवारेषु प्राचीनरीतीनां स्मृतीनां च रक्षणे यत्न आसीत्, ब्राह्मणाना प्रभावात्तेष्वपि पर्याप्तानि परिवर्तनानि परिष्कृतयश्च जातानि । तयाप्ययं प्रभावो राजनीतिक मान्यताम्देव प्रतिफलितः । गृहस्थजीवनसम्बन्धिन्यो रीतयस्तु प्राचीनरूपेणास्पृष्टा एवासन् । स्मार्तसूत्रेषु प्राचीनविचाराणां बृहद्भाण्डागाराणा समावेशो दृश्यते । एतेष्वेव हिन्दूनां विधिसाहित्यस्योद्गमो लभ्यते । ( पृ ० १३ ) अत्रैव टिप्पण्यां जातकर्म संस्कारसम्वन्धे स्पाइजेरस्य विवाह- संस्कारसम्बन्धे हासमहाशयस्य, अन्त्येष्टि संस्कारसम्बन्धे रोथप्रभृतीनाम्, पिण्डपितृयज्ञसम्बन्धे च आ ० डोन्नेरमहाशयस्य सकेताः सूचिताः । गृह्यसूत्र- धर्मसूत्र समयाचारिक सूत्र: श्रौतसूत्राणा च सम्बन्धा उक्ताः । तदपि न किञ्चित्, ग्रन्थस्वारस्यानवगमात्, गुरुपारम्पर्याभावाच्च । वस्तुतः सम्यक्सम्कृताध्ययनाभावात् मन्त्राणा ब्राह्मणानामुपनिषदी सूत्राणां चाशयं न मनागप्यवगच्छन्ति पाश्चात्त्याः, किन्तु बाह्य किमपि स्थूलाशमावृत्य कल्पनाबहुला वाचं जल्पन्ति । यदपि च-' वर्धमानया बौद्धशक्त्या ब्राह्मणीयव्यवस्थाया उपर्युग्रमाक्रमणमा रब्धम् । तदानी सङ्कर- मेघच्छन्ना सा व्यवस्था | क्षत्रियैर्वर्णसामान्यैश्च पौरोहित्यप्रभुतायाः शक्तिशालियुगं प्रक्षेप्तुं बौद्धधर्मसाहाय्यमुद्गृही- के मित्रों के विरुद्ध हो गये और उस जुए को फेंकने का प्रयत्न करने लगे जो उनके कन्धो पर भी समान रूप से रखा हुआ था । इनका विवरण परवर्ती रचनाओ के गूढ आख्यानो में मिलते है' पृ० १२ ) । यह कथन भी तर्क के सामने नही टिक पाता, क्योंकि निराधार है । वैदिक साहित्य में इस तरह की कल्पनाओ को पुष्ट करने वाला कोई आधार नहीं मिलता, जिनसे ये बातें सिद्ध हो सकें । कुछ लोग ब्राह्मण और क्षत्रियो के संघर्ष के प्रमाण के रूप मे रामायण में वर्णित वसिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष को और महाभारत में वर्णित भृगुवंशी ब्राह्मणो और हैहय वंशी क्षत्रियो के संघर्ष को उद्धृत करते है । परन्तु रामायण और महाभारत में वर्णित इन संघर्षों के कारणों की उपेक्षा करके उनके मनमाने कारणो की कल्पना करना सर्वथा निराधार है । शास्त्रों मे जो कहा गया हो उसको न मानना और जो न कहा गया हो उसकी कल्पना कर लेना दोष माना जाता है । अन्त मे रामायण और महाभारत में इन परिवारो में सौमनस्य भी बताया गया है । 'उन परिवारों में भी, जो कि प्राचीन रीतियों और स्मृतियों की रक्षा कर रहे थे, ब्राह्मणो के प्रभाव से इसमे पर्याप्त परिवर्तन और परिष्कार हो चुके थे, फिर भी यह प्रभाव विशेष रूप से इसकी राजनीतिक मान्यताओ पर पडा और गृहस्थ जीवन के रिवाज तथा रीतियां अपने प्राचीन रूप मे अछूती ही रह गईं । इस कारण इन रचनाओं मे (रमार्त सूत्र ) नितान्त प्राचीन काल के विचारो एवं मान्यताओं के बृहत् भण्डार का समावेश है । इनमें ही हम हिन्दू विधि-साहित्य का उद्गम पाते है ' ( पृ ० १३ ) इस कथम के साथ ही इसी पृष्ठ की टिप्पणियों में कहा गया है -'जातकर्म संस्कार के सम्बन्ध की 'स्फाइजेर' की पुस्तक, विवाह संस्कार के लिये 'हास' महाशय का लेख, अन्त्येष्टि संस्कार के सम्बन्ध में 'रॉय' प्रभृति के लेख, पिण्डपितृयज्ञ के सम्बन्ध में 'ओ० डोनेर' का लेख देखिये ' । 'साथ ही वही गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और समयाचारिक सूत्रों का और श्रोत सूत्रों का परस्पर सम्बन्ध भी बताया गया है ( पृ० १३ ), किन्तु ये सब मान्यताएं भी निराधार है । पाश्चात्य विद्वान् एक तो ग्रन्थ के अभिप्राय को नही समझ पाते और फिर इनको गुरुपरम्परा से इस सम्बन्ध में कोई जानकारी भी नही मिल पाती । वास्तव में तो इनको संस्कृत का अध्ययन सही पद्धति से नहीं हो पाता, अतः ये मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद् और सूत्र ग्रन्थों का आशय कुछ भी नही समझ पाते, किन्तु ऊपर-ऊपर की कुछ मोटी बातों को पकड कर मनमानी कल्पनाएं करते रहते हैं । 'बो धर्म की धीरे- धीरे बढती हुई शक्ति ने ब्राह्मणीय व्यवस्था के ऊपर जो उग्र आक्रमण प्रारम्भ किये, उनसे और भी अधिक वास्तविक संकट के बादल उन पर मंडराने लगे । क्योंकि क्षत्रिय वर्ण और सामान्य पीडित जन समूह ने पौरोहित्य प्रभुता के
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वेदार्थपारिजातः* II तम् । अत एव मेगस्थनीजस्येदं कथनं सत्यमेव यत् स्मृतिद्वारेव व्यवहरन्ति स्मेति ( अथोम्बीग्निस ) । बौद्धधर्मस्य ब्राह्मणधर्मविरोधित्वात् तदानीमवश्य परिवर्तनं कल्पयितुं शक्यते । तदानी मानवगृह्यसूत्राश्रितस्य मनुस्मृतिसदृशस्य ,विधिग्रन्थस्य प्रादुर्भावः सम्भाव्यते । अत एव नाय मनुस्मृतिग्रन्थो वैदिककालिक किन्तु बौद्धधर्मपरवर्तिकाने लिक एव' इति, तदेतदपि भारतीयसाहित्यगौरवासहिष्णुतामूलकमेव, ब्राह्मणात्मके वेदे - 'यद्वै मनुरवदत्तभेषजम्' इति शतपथे तंत्तिरीयब्राह्मणे च यम्य मनुवचनस्य माहात्म्य जोघुष्यते, तस्य बौद्धधर्मार्वाचीन कालिकत्वसाघन ,,दुरभिसन्धिमूलकमेव नात्र किमपि प्रामाणिकं वचन तैरुपभ्यस्त तथानुपलम्भात् । नाप्यनुमान व्याप्त्यभावात् साध्यसम्बन्धहेत्वनुपलम्भाच्च । प्रत्यक्ष तु दूरापास्तमेव । मेगस्थनीजलेखस्य प्रामाण्येऽपि तदानी स्मृतिग्रन्थसत्तेव सिद्धयति, न तदानीन्तननिर्मितस्य स्मृतिग्रन्यस्येति । ईदृशा अनर्गला बेवरस्य विचारा उपेक्षणीया एव । ११ पृष्ठेऽनुक्रमणीसम्बद्ध विचारोऽपि तदोयग्रन्थचुम्बकत्वमेव ख्यापयति । सूक्तसम्बन्धिनामृषिच्छन्दो- देवतानां निर्धारणमपि न स्वाच्छन्द्येनानुक्रमणी बृहद्देवता वा कर्तुं प्रभवति, आर्षेयब्राह्मणादावृष्यादिज्ञानस्यानिवार्य- ': ' त्वोक्त । यो ह वा अविदितार्षेय च्छन्दोदेवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वा स्थाणुं वर्छति गर्ते वा पद्यति वा मीयते ' ( ), पापीयान् भवति यातयामान्यस्य छन्दानि भवन्ति आर्षेय ब्राह्मणम् ब्राह्मणानुरोधेन पारम्पर्येण च महर्षिभि- स्तनिर्धारणात् । अत एव बृहद्देवताग्रन्थस्य निर्माणं यास्कस्य निरुक्तमाघृत्य जातमित्यपि न सङ्गतम्, निर्वचनस्य ब्राह्मणेऽपि विद्यमानत्वात्, निरुक्तस्यापि ब्राह्मणमूलकत्वोपपत्तेः । जुए को दूर शक्तिशाली जुए फेंकने के लिये बौद्ध धर्म की सहायता का लाभ उठाया । अत एव मेगस्थनीज के इस कथन को कि उसके समय में भारतवासी विधि का व्यवहार 'स्मृति द्वारा ही' ( अथोम्बीग्निस ) करते थे, मैं पूर्णतः यथार्थ मानता हूँ । बौद्ध धर्म के ब्राह्मण विरोधी धर्म के रूप में विकास होने के परिणाम स्वरूप शीघ्र ही स्थिति में परिवर्तन आया होगा और कोई विधि ग्रन्थ, उदाहरण के लिये मनु का विधि ग्रन्थ ( जो मानव गृह्यसूत्र पर आधारित है) रचा गया होगा । किन्तु यह ग्रन्थ वैदिक काल के अवसान के समय का नही, अपितु उसके अनुवर्ती काल के आरम्भ का है' ( पू- १३-१४ ) । यह सारा कथन भी भारतीय साहित्य के गौरव के प्रति पाश्चात्य विद्वानो के असहिष्णु दृष्टिकोण को ही प्रकट करता है । ब्राह्मण ग्रन्थो मे मनु के वचनो का सर्वोच्च प्रामाण्य माना गया है । उसक बौद्ध धर्म के आविर्भाव के बाद का मानना पाश्चात्यो की दुरभिसन्धि का हो एक उदाहरण मानना चाहिये । इस विषय में उन्होने कोई प्रमाण नही दिया है और न ऐसा प्रमाण मिलता ही है । इसमें अनुमान प्रमाण नही हो सकता, क्योकि न तो यहाँ व्याप्ति बन पाती है, न उसका साध्य से सम्बन्ध बनता है और न कोई हेतु ही इस बात की सिद्धि करने वाला दिखाई देता है । प्रत्यक्ष की बात तो बहुत दूर की है । मेगस्थनीज के ऊपर दिये प्रमाण से उस समय स्मृति ग्रन्थ विद्यमान थे, इतनी ही बात सिद्ध हो पाती है । उसके सामने या उस समय किसी स्मृति ग्रथ की रचना हुई हो, यह उससे सिद्ध नही हो पाता । बेवर के इस तरह के अनर्गल विचार सर्वथा उपेक्षणीय हैं । १७ वें पृष्ठ पर बेबर ने अनुक्रमणियो के संबन्ध मे जो कुछ कहा है, उससे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि वह ग्रंथों को केवल ऊपर ही ऊपर से देख पाया है । सूक्तो के ऋषि, छन्द और देवताओं का निर्णय कोई भी अनुक्रमणी या बृहद्देवता जैसे ग्रंथ मनमाने तरीके से नही कर पाते, ये भी वैदिक अनादि परम्परा से ही प्राप्त है | आर्षेय ब्राह्मण आदि में ऋषि आदि का ज्ञान अनिवार्य माना गया है । वहाँ बताया है- 'जो व्यक्ति किसी मन्त्र या ब्राह्मण का छन्द, देवता और ऋषि का बिना ज्ञान प्राप्त किये इनसे यज्ञ कराता है अथवा इनका अध्ययन करता है, उसकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, वह किसी सङ्कट में पड़ जाता है, उसकी मृत्यु तक हो सकती है, वह भयंकर पाप का भागी होता है और इसको वेद का ज्ञान निष्फल हो जाता है' । इसीलिये ब्राह्मण ग्रंथो के अनुसार और परम्परा के आधार पर ही ऋषियों ने अनुक्रमणी आदि मे इनका विधान किया है । इसीलिये यह कथन भी उचित नही है कि यास्क के निरुक्त के आधार पर बृहद्देवता का निर्माण हुआ, क्योकि इस तरह के निर्वचन ब्राह्मण ग्रन्थो में भी विद्यमान है और निरुक्त को रचना भी इन ब्राह्मण ग्रन्थो के आधार पर ही हुई हैं ।
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वेदार्थपारिजातः TL यत्तु निघण्टुसम्बन्धे गदितं यत् शब्दाना सङ्ग्रहो युगपद्यथितत्वाद् निग्रन्थुरेवापष्टत्वाद् निघण्टुरिति जातमिति, तदध्यशुद्धम्, निघण्टुशब्दस्य संस्कृतत्वेनापभ्रशत्वाभावात् । 'तमिम समास्नायं निघण्टव इत्याचक्षते' ( नि० १1१ ) इति निरुक्तविरोधाच्च । अत्रैव निघण्टवः कस्मात्? निगमा इमे भवन्ति, छन्दोभ्यः समाहृत्य समाम्ना- तास्ते निगन्तव एव सन्तो निगमनान्निघण्टव उच्यन्ते । छन्दासि मन्त्रास्तेभ्य उपलक्षितसामर्थ्याद् ग्रन्थीकृता इत्यर्थः । कस्मात्पुनरेतावन्त एव ग्रन्थीकृता:? एतेषु परिजातेष्वप्रतिबन्धेन शक्यते मन्त्रार्थोऽवगन्तुम् । ते निगन्तव एव सन्तो निगमनानिघण्टवः, मन्त्रार्थ निगमयितृत्वाद् अतिपरोक्षवृत्तिना वाकारस्थाने घकार कृत्वा तकारस्थाने टकार कृत्वा अथाप्यादिविपर्ययम्' ( नि० २ १ ) | वर्णविपर्ययाद् उत्कटवृत्तयः प्रत्यक्षवृत्तयः, अन्तर्लीनक्रियाः परोक्षवृत्तयः, अति- परोक्षवृत्तिशब्देषु निर्वचनाभ्युपायः । निघण्टवः अतिपरोक्षवृत्तिः, निगन्तवः परोक्षवृत्ति, निगमयितार इति प्रत्यक्षवृत्तिः । ' वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च द्वौ चापरी वर्णविकारनाशौ । धातोस्तदर्थातिशयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविध निरुक्तम् ॥ ' एवमेव निरुक्तव्याकरणादिसम्बन्धेऽपि बेवरस्य कल्पना भारतीयपरम्पराविपरीतैव । इदमभ्युपगतं बेवरेण यद् दर्श- नानां व्याकरणाना च सम्बन्धे भारतीयाना बुद्धेरुर्वरता चरमसीमामुपगतेति, तथापि तत्र दोषप्रदर्शनाय दुर्बोधता दाक्षिण्यहीनता वाङ्मात्रेणोक्तव । (पृ० १ ९ ) —' यदप्युक्तम् ऋक्सहिताया अन्तिममण्डले समागतदार्शनिक चिन्तायुक्तानामनेकेषा सूक्ताना दर्शनाद् विश्वस्यादिकारणविषयक चिन्तनस्य गम्भीरता तत्सम्बन्धिन्येकाग्रता चेदं प्रमाणयति यदतिप्रलम्ब - कालाद् दार्शनिकानुसन्धानानि प्रचलन्ति स्म । भारतीयज्ञानस्य प्राचानख्यात्या भारतीययोगाभ्यासिना विषये निघण्टु के सम्बन्ध मे बेवर ने कहा है- 'इन शब्दो के सग्रह को एक साथ ' गुंथे होने के कारण' 'निग्रन्थ' कहा गया, जिससे भ्रष्ट होकर ' निघण्टु' बना' ( पृ० १८ ) । यह कथन भी गलत है, क्योकि निघण्टु शब्द संस्कृत भाषा का है । अपभ्रंश शब्द से इसको व्युत्पत्ति बताना नितान्त गलत बात है । निरुक्त मे भी इसको 'निघण्टु' ही कहा गया है । वहाँ प्रश्न किया गया है कि इनको ' निघण्टु' क्यों कहा जाता है? और फिर उसका उत्तर दिया गया है कि पहले इनको निगम कहा जाता है, क्योकि छन्दो से चुन -चुन कर इनका उपदेश दिया जाता है । ये निगम ही निगमन के आधार पर बाद में निघण्टु कहे जाने लगते है । छन्द शब्द यहाँ मन्त्र का पर्यायवाची है, उनसे चुने गये शब्दो के संग्रह को निघण्टु कहा जाता है । पुन प्रश्न हो सकता है कि 'निघण्टु' में इतने थोड़े से ही शब्द क्यो ग्रथित किये गये? इसका उत्तर यह है कि इन शब्दो को जान लेने पर व्यक्ति बिना बाधा के मन्त्रो का अर्थ समझ सकता है । इसी बात को निरुक्त मे 'ते निगन्तव' इत्यादि वाक्य से कहा गया है । अपनी अतिपरोक्ष वृत्ति के आधार पर गकार के स्थान में घकार और तकार के स्थान में टकार, इस तरह वर्णों का व्यत्यय करके निघण्टु शब्द बनाया जाता है । उत्कट वृत्ति शब्द को प्रत्यक्ष वृत्ति और जिनमे क्रिया छिपी हुई हो उसको परोक्षवृत्ति कहा जाता है । अतिपरोक्ष वृत्ति शब्द में वर्णों का व्यत्यय किया जाता है । निघण्टु इसका निर्वाचन अतिपरोक्ष वृत्ति से, ' निगन्तु' का परोक्ष वृत्ति से और 'निगमयिता' की व्युत्पत्ति प्रत्यक्ष वृत्ति के आधार पर होती है । एक श्लोक मे निरुक्त (निर्वचन ) के पांच प्रकार बताये गये है- वर्णों का आगम (नये वर्णों का समावेश), वर्णों का विपर्यय (अदला- बदली), वर्णों का विकार और उनका नाश तथा धातु का किसी विशेष अर्थ से सम्बन्ध, इस तरह से पांच प्रकार से शब्दों की निरुक्ति की जाती है । इसी तरह से निरुक्त, व्याकरण आदि के सम्बन्ध में भी वेवर की कल्पनाएं भारतीय परम्परा के विपरीत है । अन्ततः बेवर को भी यह मानना पडा है-'दर्शन और व्याकरण के क्षेत्र मे हो तो भारतीय मस्तिष्क ने सूक्ष्म भेद करने मे बुद्धि की उर्वरता को चरम सीमा तक पहुँचा दिया' ( पृ० १ ९) । साथ ही यहाँ भी दोष दर्शन में वह चूका नहीं है, जब कि वह कहता है- ' भले ही समय- समय पर उनकी यह प्रणाली दुर्बोध और दाक्षिण्य रहित है' (पृ ० १ ९ ) । 'ऋग्वेद संहिता के अन्तिम मण्डल में आए हुए दार्शनिक चिन्तन से युक्त अनेक सूक्त विश्व के आदि कारण के विषय में चिन्तन की गंभीरता और एकाग्रता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । इनसे अनिवार्यतः यह अर्थ निकलता है कि इनके पूर्ववर्ती युग में लम्बे अर्से से दार्शनिक अनुसन्धान चले आ रहे थे । इसका प्रमाण भारतीय ज्ञान की प्राचीन ख्याति से और भारतीय योगाभ्यासियों के संबन्ध ११ ९
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वेदार्थ पारिजातःIII ( पृ०२० ) इति, यद्यपीदमशतः सत्यमेव, तथापि दशममण्डलस्यसिकन्दरसहकारिणा लेखनेन चैतत्प्रमीयते' , दृढप्रमाणैस्तेषामपौरुषेयत्वस्यदार्शनिक विषयास्त्वपौरुषेयवेदैकसमधिगम्या न तु पौरुषेयविचारमाश्रित्य प्रसूताः साधितत्वात् । ', - आरम्भिककाले चिखनेषूत्साहः सञ्जात विभिन्नैर्मर्तविभिन्ना मान्यता स्थापिताः । सृष्ट्य त्पत्तिविषयेऽनेके विचारा उद्भूता अत्यन्त रहस्यमयत्वात् कठिनत्वाल्लोकप्रिमत्वाच्च ब्राह्मणेषु तत्सम्बन्धे नैकविधानि विवरणान्युपलभ्यन्ते । तत्र मतभेदस्य मुख्योऽयं विषय उपस्थितः । भौतिकपदार्थानामादिकारणत्वमात्मनो वा तदभ्युप- गन्तव्यम् । शनैः शनैरात्मसम्बन्धिवादः शास्त्रसमर्थितः सञ्जातः । जडकारणवादिनो नास्तिकत्वेन शास्त्रद्रोहित्वेन च प्रसिद्धिमुपगताः । क्रमेण शास्त्रप्रतिपादितमतानां घोरविरोधिनो जाता । एतेषां पूर्वं सिद्धान्ताश एव विरोध आसीत् । कालक्रमेण शीघ्रव्यावहारिक प्रश्नेष्वप्येतैविरोध उद्भूता । अत एव तेषां स्थापनापि जाता । स एव बौद्धधर्म इत्याख्यायते । बुद्धश्रमणादिशब्दा यद्यपि धात्वर्थयोगाद् ब्राह्मणादिविद्वत्सु समादरसूचकतया प्रयुज्यन्ते स्म, पश्चाद् बौद्धेष्वेव | मेगस्थनीजेन दार्शनिकाना वर्गद्वयमुक्तम् । ब्रकमानीज- शर्मानाईरूपेण तद्भेद उक्तः । तद्रीत्या उलोबि-ओई ब्रह्मचारिवानप्रस्थो शर्मानाई इत्यस्याङ्गरूपेणोक्ती । एव वा सम्भाव्यते यज्जन्मजातदार्शनिका गृहस्था ' (पृ० २०२०-२१- २१ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, ब्रकमानीजपदवाच्याः । तद्विपरीताः शर्मानाईपदवाच्या भवन्ति स्म कल्पनामूलत्वात् । वेदानामनादित्वाद् बौद्धधर्मस्यार्वाचीनत्वात् तयोः समकक्षतानुपपत्तेः । वेदानुप्राणिता आस्तिकाः परमात्मकारणवादिनः । तद्विशेषाश्च नैयायिक- वैशेषिक-साख्य- योगादयः प्रकृति परमाणुकारणवादिनोऽपि निमित्तादि- मे सिकन्दर के साथियो के लेखो इत्यादि से भी लिया जाता है' ( पृ ० २० ) | बेबर का यह कथन यद्यपि ठीक ही है, तथापि दशम मण्डल के दार्शनिक विषय केवल एकमात्र अपौरुषेय वेद से ही ज्ञात होते हैं, इनका आधार कोई पुरुष का ज्ञान नही है, इस बात को हम अनेक स्थलो पर दृढ़ प्रमाणो से स्थापित कर चुके है । ' यह स्वाभाविक था कि आरम्भिक काल मे ज्यो ही चिन्तन में कुछ उत्साह आया, विभिन्न मतो और नवीन मान्यताओ की स्थापना हुई, विशेषतः सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में त्यो ही अनेक विचारो का उदय हुआ, क्योंकि यह सबके लिये अत्यन्त रहस्यमय और कठिन समस्या होने के साथ-साथ लोकप्रिय भी थी । प्रत्येक ब्राह्मण में इस विषय पर कम से कम एक या अधिक विवरण पाये जाते है । इस सन्दर्भ में स्वभावतः मतवैचित्र्य का एक विषय यह था कि भौतिक पदार्थ को आदि कारण माना जाय या आत्मा को । आत्म- विषयक सिद्धान्त शनैः शनै शास्त्र समर्थित सिद्धान्त बन गया और इस कारण उनका ब्राह्मणो मे प्राय. विवेचन है । जड़ पदार्थ को आदि कारण बताने वाले मत के अनुयायियों को शास्त्रद्रोही या नास्तिक कहा जाने लगा । इनके विचारो के विकास के साथ ही साथ ऐसे प्रतिपक्षियों का उदय हुआ, जो शास्त्रप्रतिपादित मतो के और भी कट्टर विरोधी थे । इन्होने यद्यपि पहले अपने को एकमात्र सिद्धान्तों तक ही सीमित रखा, किन्तु शीघ्र ही ये व्यावहारिक प्रश्नों पर भी आ गये और अन्ततोगत्वा इन्होने एक विशेष प्रकार के धर्म की स्थापना कर दी । जिसे हम बौद्ध धर्म के नाम से जानते है । बुद्ध, श्रमण आदि शब्द यद्यपि व्युत्पत्ति के आधार पर आदरसूचक उपाधि के रूप में विद्वान् ब्राह्मणों के लिये भी ब्राह्मण ग्रन्थो में प्रयुक्त हुए है, किन्तु बाद मे इन शब्दो का प्रयोग बौद्धो में ही रूढ़ हो गया । मेगस्थनीज ने दार्शनिकों के दो वर्गों 'ब्रकमानीज' और ' शर्मानाई' में स्पष्ट भेद किया है । उसने स्पष्टतः 'उलोविओई' का — ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ, जो ब्राह्मण जीवन के चार आश्रमो में प्रथम और तृतीय आश्रम है -'शर्मानाई' के अंग के रूप में उल्लेख किया है । दार्शनिकों के उपर्युक्त दो वर्गों में अन्तर संभवतः यह था कि ' ब्रकमानीज' जन्मजात दार्शनिक थे और गृहस्थ थे, इसके विपरीत ' शर्मानाई ' वे लोग थे जो विशेष रूप से त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे और जिनमें अन्य वर्गों के लोग भी संभावित थे' ( पृ ० २०-२१ ) | यह सारा कथन भी केवल कल्पना का मायाजाल है । वेद अनादि हैं, बौद्ध धर्म एक नया वाद है । इन दोनों में तुलना कैसे की जा सकती है । वेदों को सर्वथा प्रमाण मानने वाले आस्तिकजन परमात्मा को हो जगत् का कारण मानते है । नैयायिक, वैशेषिक एवं सांख्य और योग दर्शन के अनुयायी भी आस्तिक ही हैं । ये यद्यपि प्रकृति और परमाणु को जगत् का कारण मानते है,
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वेदार्थपारिजातः ६४७ रूपेण परमेश्वरमङ्गीकुर्वन्ति स्म । नास्तिकास्तु निमित्तेनापीश्वर नाङ्गीकुर्वन्ति स्म । यद्यप्यसदादिकारणवादिनोऽपि सत्कारणवादिन इवानादय एव, वेदेषु ( मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु ) समेषा वर्णनदर्शनात् । अत एव लङ्कावतारसूत्रादो बुद्धोऽपि स्वस्यानेकानवतारानुक्तवान् । उपनिषदामारण्यकाना सम्बन्धेऽपि ( २१ पृष्ठे ) वेवरस्य भ्रामका विचाराः सन्ति, सिद्धान्ते समेषामेषा ब्राह्मणत्वेन वेदत्वाविशेषात् । उलोविओई जनाना कृते आरण्यकानामुत्पत्तिरपि न युक्ता, अरण्ये पठनीयत्वादेव ' तत्रारण्यकपदप्रयोगात् । यदुक्तम्- इमास्ता उपनिषदो या प्राचीनाना वेदत्रयाणा मध्ये कस्यचिदेकस्य वेदस्य ब्राह्मणेन आरण्यकेन वा सम्बद्धा, तथाप्यघुनाथर्वपाठ एव ता उपलभ्यन्ते' इति, तदपि न किञ्चित्, बृहदारण्यक- छान्दोग्ययोर्यजु सामसम्बद्धत्वात् । उपनिषद्गतानामृषीणा नाम्ना यज्ञीयसूत्रेषूपलम्भात् तदभिन्नत्वोपपत्ती तासा- मर्वाचीनत्वकल्पनमपि निर्मूलमेव । सुखावबोधार्थाख्यायिकान्तर्गतत्वेन तैर्नामभिर्व्यक्तिविशेषस्य बोधासम्भवात् । न केवलमुपनिषत्सु पर सहितास्वप्युर्वंशीपुरूरवसोर्यमयम्योश्च सवादेरपि नेतिहासः सिद्ध्यति, कैमर्थ्याकाङ्क्षावशात् तत्तदाख्यायिकानां नित्यार्थबोधन एव तात्पर्येण स्वार्थेऽतात्पर्यात् । यच्च ( २२ पृष्ठे ) उक्तम्- 'नक्षत्रविद्याया ओषधिशास्त्रस्य च यद्यपि स्वतन्त्रशाखा नोपलभ्यते, तथापि यज्ञानामग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्यादीनां तत्तत्कालनियतत्वाद् यज्ञेषु चौषधीनामुपयोगात् विकासो जात:' इति, , तदपि न ज्योतिषशास्त्रायुर्वेदशास्त्रयोरपि प्राचीनत्वाविशेषात् । गातमाचार्य आयुर्वेदप्रामाण्यदृष्टान्तेन वेदाना प्रामाण्यमप्युक्तवान् । वात्स्यायनश्च -य एव मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्य द्रष्टार प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदस्येति तथापि निमित्त कारण के रूप में ईश्वर को स्वीकार करते ही है । नास्तिक जन तो निमित्त कारण के रूप में भी ईश्वर को स्वीकार नही करते थे । सत्कारणवादियों की तरह ये असत्कारणवादी भी अनादि काल से चले आ रहे है, क्योकि मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद में इन सबका वर्णन मिलता है । इसीलिये लंकावतार सूत्र आदि ग्रन्थो में बुद्ध ने भी अपने अनेक अवतारों का वर्णन किया है । उपनिषदो और आरण्यको के संबन्ध मे बेवर ने अनेक भ्रामक विचार व्यक्त किये है ( पृ० २१ ), यह सब बातें सिद्धान्ततः गलत है, क्योकि उपनिषद् और आरण्यक भी ब्राह्मण ग्रन्थो के भाग होने से वेद ही माने जाते है । उलोविमई ( वानप्रस्थ ) जीवन व्यतीत करने वालो के लिये आरण्यको की रचना हुई, यह कहना भी ठीक नही है, क्योकि 'आरण्यक' पद का अर्थ अरण्य ( वन ) में पढे जाने वाले ग्रन्थ है । बेवर ने कहा है- ' ये उपनिषद् वे है, जो यद्यपि तीन प्राचीन वेदो में किसी एक के ब्राह्मण या आरण्यक से संबद्ध है, तथापि इस समय अथर्वन् पाठ मे ही उपलब्ध है' ( पृ ० २१ ) किन्तु यह कथन भी गलत है, क्योकि बृहदारण्यक यजुर्वेद से और छान्दोग्य - उपनिषद् सामवेद से संबद्ध है । उपनिषद् में आये नाम यज्ञीय सूत्रो में भी उपलब्ध होते है और जब इनकी एकता मान ली जाती है तो उसी आधार पर ये उपनिषद् अर्वाचीन काल के माने जायगें, इस तरह की बातें भी सर्वथा निराधार ही मानी जायंगी । क्योकि किसी विषय को सरलता से समझाने के लिये दिये गये ये नाम कहानी के कल्पित पात्रो की तरह किसी विशेष ऐतिहासिक व्यक्तित्व को नही सिद्ध कर पाते । केवल उपनिषदो मे ही नही, किन्तु संहिता में भी उर्वशी - पुरूरवा, यम यमो के संवाद से भी कोई इतिहास नही सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि इन आख्यायिकाओ का क्या प्रयोजन है? इस तरह की आकाक्षा की निवृत्ति नित्य ( सनातन ) अर्थ के प्रतिपादन से जब हो जायगी, तब इन वाक्यों का स्वार्थ मे तात्पर्य नही रह जायगा । 'इन दो शाखाओ से मेरा तात्पर्य है -- नक्षत्रविद्या और ओषधिशास्त्र । दोनो को पूजा या यज्ञ मे आवश्यकता होने से फलने -फूलने का अवसर मिला । यद्यपि पहले नक्षत्र विद्या की जानकारियां नि सन्देह अस्पष्ट रूप वाली थी, फिर भी उनकी आवश्यकता यज्ञो के नियमन के लिये पड़ती थी, क्योकि अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य आदि कर्म समय के अनुसार किये जाते थे । यज्ञो में ओषधियों का भी उपयोग होता है । इन्ही के आधार पर उक्त दोनों शास्त्रो का विकास हुआ ' (१० २२-२३ ) यह कथन भी सर्वथा निराधार है, क्योंकि ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद भी समान रूप से अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है । न्यायसूत्रकार आचार्य गोतम ने वो आयुर्वेद के दृष्टान्त से हो वेदो का भी प्रामाण्य सिद्ध किया है । न्यायभाष्यकार वात्स्यायन का कहना है कि मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद के
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६४८ वेदार्थपारिजातः तस्यातीव प्राचीनत्वमाह । ज्योतिषशास्त्रस्य प्राचीनत्वमपि छान्दोग्योपनिषदि नक्षत्रविद्योल्लेखाद्धि ज्ञायत एव । श्रुतिचोदितकर्माङ्गकालपरिज्ञानाय ज्योतिषम्, अनुषङ्गतश्चातोऽपि प्राणिना शुभाशुभकर्मफलविपाककालपरिज्ञानम् । - यज्ञीयपशुशरीरस्यान्तरावयवज्ञानैरथर्ववेदवर्णिताना रोगाणामोषधीनामृग्वेदवर्णितानामोषधीनां च मूलत्वमुपजी व्यायुर्वेदशास्त्रस्यापि निष्पत्तिः । न केवलमेतदेव, किन्तु सर्वप्रथम शिक्षा वेदाङ्गत्वेनोपयुज्यते 'आत्मा बुद्धया ' समेत्यार्थान्मनो युङ्क्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥ इति स्वरव्यञ्जनाभिव्यक्ति-लक्षण पूर्वाह्न मध्यन्दिना-पराह्णेषु यथाध्येयमधीतस्य स्वरसौष्ठवयुक्तस्य यज्ञकर्मणि प्रयोगः । इत्येवादिक शिक्षाया- मुक्तम् । यथा ह्यधीतः प्रयुज्यमानश्चापूर्वाङ्गभावाय नान्यथेति तस्याः सार्थक्यम् । ' मन्त्रो हीनः स्वरतः' इत्युक्तमेव । एवं शिक्षाधिगताध्ययनविधेर्वेदस्याक्षरकोशपादव्यवस्थालक्षणपरिज्ञाने छन्दोविधिराद्रियते । इयताक्षरपादं छन्द- स्त्रिष्टुबित्यादिकम् । नह्यविज्ञातच्छन्दसा प्रयुज्यमानो मन्त्रः कर्मणि समृद्धिकारकः । व्याकरणाद्विभक्त्यादिज्ञानमपि यज्ञ उपयुज्यते । प्रयाजाः सविभक्तिकाः कर्तव्याः । ऊहोऽपि व्याकरणादेव कर्तुं शक्यते संख्यादयो न वर्धन्त इति । न च व्याकरणानभिज्ञो विभक्तीर्जानोयादुहितुं वा मन्त्रानिति । छन्दस्येवं भाषायामेव । कल्पे कात्यायनादिश्वोत- सूत्रादिषु विनियोगश्चिन्त्यते । यो यमर्थमभिधातुं सस्कतुं च समर्थो मन्त्रः स तत्र विनियुज्यते । तदुक्तम् -' अर्था- भिधानसयोगान्मन्त्रेषु शेषभावः स्यात्' ( मी० सू० ९ ।१।३६ ) इति । किं बहुना, ग्रन्थचुम्बकैः पाश्चात्त्यैर्वेदार्थज्ञानयोग्य- सामग्रीविधुरैः स्वाच्छन्द्येन पूतिकूष्माण्डीकृतं सर्वमपि भारतीयसाहित्यमिति तत्समाधातुं किञ्चिदिवोक्तम् । द्रष्टा और प्रवक्ता ऋषिगण ही आयुर्वेद शास्त्र के भी द्रष्टा और प्रवक्ता है । इस तरह से यह सिद्ध हो जाता है कि यह शास्त्र अत्यन्त प्राचीनकाल से चला आ रहा है । ज्योतिष शास्त्र की प्राचीनता का ज्ञान भी छान्दोग्य उपनिषद् में नक्षत्र विद्या का उल्लेख होने से हो जाता है | श्रुति प्रतिपादित कर्म के अङ्ग किस समय किये जायें, इसके लिये ज्योतिष शास्त्र की आवश्यकता रहती है । प्रसंगतः इससे प्राणियो के शुभ-अशुभ कर्मों के फल का ज्ञान भी हो जाता है । यज्ञीय पशु के शरीर के भीतरी अवयवो के ज्ञान से अथर्ववेद में वर्णित रोगो और औषधियो तथा ऋग्वेद में वर्णित ओषधियो के सहारे आयुर्वेद शास्त्र की रचना मानी जाती है । इतना ही नही, सबसे पहले वेदाग के रूप में 'शिक्षा' को स्वीकार किया जाता है । 'आत्मा बुद्धि की सहायता से अर्थों का ज्ञान कर उस ज्ञान को प्रकट करने की इच्छा से मन को नियुक्त करता है । मन शरीर में निवास करने वाली अग्नि को और वह अग्नि पवन को प्रेरित करता है' इस तरह से शिक्षाशास्त्र स्वर और व्यंजनो की अभिव्यक्ति की प्रक्रिया को बताता है और पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा सायंकाल में किस तरह से पढना चाहिये एवं पूरी तरह से अभ्यस्त मन्त्रो का सुन्दर तरीके से यशो में कैसे प्रयोग किया जाता है, यह सब विषय शिक्षा ग्रन्थो में बताये गये है । शिक्षा ग्रन्थो में बताई गई पद्धति से पढे गये और प्रयोग में लाये गये मन्त्रो से ही अपूर्व की उत्पत्ति होती है, अन्यथा नही । इसलिये इस शास्त्र की सार्थकता है । मन्त्र का गलत स्वरो में उच्चारण होने से क्या हानि होती है, इस बात का प्रतिपादन ' मन्त्रो होनः ' इत्यादि से किया गया है, जो कि पाणिनि शिक्षा का हो एक श्लोक है । इसी तरह से शिक्षा शास्त्र से अध्ययन की पद्धति के मालूम हो जाने पर किस तरह से अक्षरो का संयोजन करने पर मन्त्रो के पाद आदि की व्यवस्था होती है, इसकी जानकारी के लिये छन्दःशास्त्र का सहारा लेना पड़ता है कि इतने अक्षरो से अमुक छन्द का पाद बनेगा । मन्त्रों के छन्द को बिना जाने उनका यो ही प्रयोग करने से यज्ञों से समृद्धि नही मिलती । यज्ञ में विभक्ति आदि का ज्ञान आवश्यक है, जो कि व्याकरण शास्त्र से प्राप्त होता है । प्रयाजो का विभक्ति के साथ ही प्रयोग होना चाहिये । ऊह भी व्याकरण की सहायता मे ही हो सकता है कि ऐसा करते समय संख्या आदि की वृद्धि नही होनी चाहिये | जो व्याकरण नही जानता, वह न तो विभक्तियों को ही जान सकता है और न मन्त्रो का ऊह ही कर सकता है । इसके लिये वेद की तरह लोक में ही समान रूप से व्याकरण की अपेक्षा रहती है । कात्यायन श्रौतसूत्र आदि ग्रन्थों मे विनियोगो का विचार किया जाता है । जो मन्त्र जिस अर्थ को कहने में अथवा उसका संस्कार करने में समर्थ है, उसका वहीं विनियोग इन कल्प सूत्रो की सहायता से ही किया जाता है । इसी बात का प्रतिपादन ' अर्थाभिधान ० ' आदि मीमांसा सूत्र में है । इस तरह इन सब शास्त्रों की प्रवृत्ति अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही है । ऐसी परिस्थिति मे ग्रन्थो का ऊपर-ऊपर से अध्ययन करने वाले ये पाश्चात्य विद्वान् वेदार्थ को समझने लायक सामग्री का बिना उपयोग किये, अपने मनमाने अर्थों से सारे भारतीय साहित्य को सड़े कद्दू की भांति दुर्गन्ध से, अपने दुविचारो से भर दिया है । उसके समाधान के लिये यहाँ कुछ बातें बताई गई है ।
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वेदार्थपारिजात ६४६ द्वितीयप्रकरणे ऋग्वेदाख्येऽनि वेदे बाह्याभ्यन्तरभेदेन द्विधा विभागमुक्त्वा अष्टकात्मक विभागस्याधिक- - मर्वाचीनत्वमुक्त्वा द्वितीयस्याभ्यन्तरघरातलाघृतस्य प्राचीनत्वमुक्तम् । द्वितीयविभागे गृत्समद विश्वामित्र वामदेव- भारद्वाज- वशिष्ठाङ्गिरसादिनामभिः सम्बद्धानां मण्डलानामनुवाकसूक्तमन्त्राणा च रचितत्वमुक्तम्, तत्तु निर्मूलमेव, ' ’, ' ', ऋषिर्दर्शनात् ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः इत्यादिवचनविरोधात् । वस्तुतस्तु वैदिकाना तूभयविधविभागोऽभिमतः प्रथमविभागस्यापि कात्यायनादिभिरङ्गीकृतत्वात् । ऐतरेयशाङ्खायनाश्वलायनयास्कादिसम्मतत्वेन द्वितीयस्यापि मान्यताऽस्त्येव । —' यत्तु शाकलशाखाया वाष्कलशाखायाश्च पाठेषु विशेषभेदो नासीत् ॥ तत्र वाष्कलशाखायामष्टमे मण्डलेऽष्टसंख्याकाम्यतिरिक्तानि सूक्तानि सन्ति, येन तत्र शतं सूक्तानि भवन्ति । शाकलानां सम्बन्धः शाकल्येन ज्ञायते । स च शाकल ऋषिरासीत्, यस्योल्लेखो ब्राह्मणेयु सूत्रेषु च दृश्यते । शतपथे विदग्धेति तद्विशेषणं दृश्यते । याज्ञवल्क्येन साकं जनकसभायां तस्य शास्त्रार्थो जातः । याज्ञवल्क्यशापात्तस्य शिरश्छिन्नं तदीयास्थीनि च चौरैरपहृतानि ॥ शतपथोक्तेष्वाचार्येषु वार्कलिसंज्ञकोऽपि कश्चिदाचार्य आसोत् । वाष्कलिशब्दस्य तद्देशजं रूप प्रतीयते' । (पृ ० २५-२६ ) - - इतीदृशेषु विवेचनेष्वेव पाश्चात्यानां बुद्धयो व्याप्रियन्ते । अत्रैव टिप्पण्या हाग म्युल्लेर आउफ्रेष्ट राथप्रभृतीनां सम्मतय उदाहृताः । ' - - शाकलानां शुनकानां च घनिष्ठः सम्बन्धो दृश्यते । अनुक्रमणी बृहद्देवता ऋग्वेदीयप्रातिशाख्य-ऐतरेय- सम्बन्धिकल्पप्रभृतिग्रन्थानां स्वपितृत्वेनापि शौनकस्य चर्चा दृश्यते । तदीयशिष्येणाश्वलायनेन यदा कल्पसूत्रं रचित तदा तेन स्वसूत्रं नाशितम् । यद्यप्येते ग्रन्था एकेनापि शौनकेन निर्मिता इत्यसम्भवो नास्ति, तथापि शौनकस्य स्वा- सम्बद्धा अपि तन्नाम्ना व्यपदिश्यन्ते स्मेत्यपि सम्भाव्यते । एकत्र संहिताया द्वितीयमण्डलस्य निर्माणश्रेयोऽपि तस्मा बेवर ने अपने ग्रन्थ के दूसरे प्रकरण में ऋग्वेद के भो बाह्य और आभ्यन्तर दो विभाग बताकर अष्टक विभाग को अर्वाचीन तथा मण्डल विभाग को प्राचीन तथा आभ्यन्तर घरातल पर आधारित बताया है । द्वितीय विभाग मे गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, भारद्वाज, वसिष्ठ और अङ्गिरस ऋषियो के नाम से रचित मण्डल, अनुवाक, सूक्त और मन्त्रो का समावेश माना है ( १० २४ ) । किन्तु यह सारा कथन भी निर्मूल है, क्योकि ऊपर उद्धृत वाक्यो से ऋषि मन्त्रद्रष्टा ही माने जाते है । वास्तव में वैदिको की दृष्टि से उक्त दोनो ही विभाग समान रूप से प्रामाणिक माने जाते है, क्योंकि अष्टक विभाग को भी कात्यायन प्रभृति आचार्यों ने स्वीकार किया है । द्वितीय विभाग का मान्यता भी ऐतरेय, शाखायन, आश्वलायन और यास्क आदि को अभिप्रेत है । 'शाकल शाखा और बाष्कल शाखा के पाठो में विशेष अन्तर नही है । वाष्कल शाखा के आठवें मण्डल में आठ अतिरिक्त सूक्त है, जिससे सूक्तो की संख्या कुल मिलाकर १०० हो जाती है । शाखाओ का नाम स्पष्टतः शाकल्य से सम्बन्ध रखता है । शाकल्य एक ऋषि थे, जिनका उल्लेख प्रायः ब्राह्मणो और सूक्तो में हुआ है । शतपथ ब्राह्मण में इनका विशेषण विदग्ध दिया है । जनक की सभा में याज्ञवल्क्य के साथ इनका शास्त्रार्थं हुआ था । उन्हें याज्ञवल्क्य ने पराजित किया और शाप दे दिया । जिसके फलस्वरूप उनका सिर कट गया और उनकी अस्थियो को चोर उठा ले गये । शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित आचार्यों में एक का नाम बार्कलि भी है, जो वाष्कलि का देशज रूप है' ( पृ० २५-२६) । इस तरह की ऊटपटांग बातों में ही पाश्चात्य विद्वानो को बुद्धि लगी रहती है । इन्ही पृष्ठो में हाग, म्युल्लेर, आउफ्रेष्ट, राथ प्रभृति विद्वानों की संगतिया भी जुटाई गई है | आगे 'शाकल शुनकों से धनिष्ट रूप से सम्बद्ध दिखाई पड़ते हैं । अनुक्रमणी, बृहद्देवता, ऋग्वेदीय प्रातिशाख्य, ऐतरेय सम्बन्धी कल्पसूत्र प्रभृति ग्रन्थो के रचयिता के रूप में शौनक प्रसिद्ध हैं । उनके शिष्य आश्वलायन ने एक दूसरे कल्पसूत्र की रचना कर डाली, तब उन्होंने अपने कल्पसूत्र को नष्ट कर दिया । यह असम्भव नही है कि ये सभी ग्रन्थ एक ही व्यक्ति शौनक की रचना रहे हों, फिर भी वे संभवतः ओर कुछ अंशों में निश्चित रूप से केवल उसी शाखा से संबद्ध है, जो उनके नाम से अभिहित हुई है । स्वयं संहिता के द्वितीय मण्डल की रचना का श्रेय भी उन्हें दिया गया है और उन्हें उस शौनक से अभिन्न बताया गया है, जिसके यज्ञ के
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III वैवार्थपारिजातः एव । अन्यतः स तस्माच्छौनकादभिन्न उच्यते, यस्य यज्ञे वैशम्पायनपुत्रेण सौतिना महाभारतकथोक्ता । शुनकाना वंश ऋग्वेदीयप्राचीनषिकुलः सम्बद्ध आसीत् । पश्चादपि बहुकालपर्यन्त विद्वत्ताक्षेत्रे तेषां सर्वोच्चस्थानमक्षुण्ण-मासोत् । आश्वलायनगुरुः शौनको नैमिषवने यज्ञकर्ता शौनकश्चाभिन्नो इति कथनेऽपि विरोधो न दृश्यते । इत्यादिक बहु जल्पन तेषामाघुनिकत्वसिद्धिद्वारा तन्निमिताना वेदाना पौरुषेयत्वसिद्धये कृतम्, तच्च निरर्थकमेव मन्तव्यम् । यथा महाभारत द्वैपायनेनोक्तम्, रामायण वाल्मीकिना कृतम्, तथाऽमुकेनेयं सहिता अष्टकं मण्डल सूक्तानि मन्त्रा वा विरचितानीत्यनुक्त्या कल्पनानामप्रमाणत्वात् 1। ऋषयश्च द्रष्टार एव भवन्ति न कर्तारः । ऋषयश्च प्रतिकल्प भिद्यमाना अपि समाननामानः सम्भवन्ति, तेषां प्राड्विवाकादिपदवत् स्थाननामत्वात् । तत्समाननामानश्चैतिहासिका अपि सम्भ- वन्त्येवर्षयः । 'वाचा विरूपनित्यया' ( ऋ ० स ० ८।७५।६), 'पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदृचु.', 'अत एव च नित्यत्वम्' ( ) ब्र० सू० १।३।२ ९ इत्यादिप्रमाणानुरोधात् ॥ तेनानुक्रमणीकारादयोऽन्ये मन्त्रब्राह्मणनिर्दिष्टाः शाकल्यशाकला- दयोऽन्य इति । यदुक्तम् - ( २८ पृष्ठे ) सूक्तानामुत्पत्तिगवेषणायास्माभिरतिप्राचीनयुगे गन्तव्यं भवति । तदेतत्तदशगत- देवशास्त्रीय भौगोलिकतथ्यैः परिलक्ष्यते । देवशास्त्रीयसम्बन्धानां प्रतिनिधित्व येषु सूक्तेषु जातं तैरिण्डोजर्मनकालं वयमुपगच्छामः । यत्र प्रचलितानां बालसुलभानां दाक्षिण्यहीनानां कल्पनानामवशेषो लभ्यते । यथा ट्यूटनेषु ग्रीकेषु लभ्यते । आत्मा वायुरूपेण परिणमते स्वामिभक्तश्वेव वायुः पक्षधरो गन्तव्यस्थान नयति । ' शरमेय्, एर्माइअस' तथा ' शवल केर्वेरोस' इत्येतयोस्तादात्म्येन विज्ञायते । स्वर्गस्थितः समुद्रः, ससारप्रावरकस्य वरुणत्वम्, द्युलोकस्य पितृत्वम्, जिउसडीपिटेर माता पृथिवी - डिमीटिर- आदिशब्दाना समानार्थकत्वम् । स्वर्वेश्यारूपेणाकाशनदीना गोचारण क्षेत्रे समागतानां गवामिव सूर्यकिरणानां वर्णनम्, युवतीनां गवा चापहारकाणां दस्यूनामिव श्याममेघानां विद्युता भोज में वैशम्पायन के पुत्र सौति ने महाभारत को कथा कही थी । शुनको का वंश ऋग्वेद के प्राचीन ऋषि-कुलो से भी सम्बन्ध रखता था, बहुत बाद तक भी ब्राह्मणों के विद्वता के क्षेत्र मे सर्वोच्च स्थान ग्रहण कर अक्षुण्ण बना रहा । आश्वलायन के गुरु शौनक और नैमिष वन में यज्ञ करने वाले शौनक ऋषि दोनो एक ही हैं, इस कथन में कोई विरोध नही दिखाई पडता' (पृ ० २६-२७) । इस तरह की बहुत सी बातें ऋग्वेद को आधुनिक सिद्ध करने के लिये और उन ऋषियो की कृति के रूप मे उनको पौरुषेय बताने के लिये कही गई है, किन्तु यह सारा प्रतिपादन निरर्थक है । यहाँ कही भी यह नहीं बताया गया है कि जैसे महाभारत की रचना ऋषि द्वैपायन व्यास ने की, रामायण की रचना ऋषि वाल्मीकि ने की, उसी तरह से अमुक ऋषि ने अमुक संहिता, अमुक मण्डल, सूक्त या मन्त्र की रचना की है । ऋषि मन्त्रों के द्रष्टा मात्र माने जाते है, कर्ता नही । ऋषि प्रत्येक कल्प में भिन्न-भिन्न होते है, किन्तु उनके नाम वे ही रहते है । न्यायाधीश आदि की तरह के ये नाम व्यक्तिपरक न होकर पद के साथ जुड़े रहते है । इन्ही नामो वाले कुछ ऋषि इतिहास काल मे भी हुए है, इसको मानने में कोई बाधा नही है । इनकी प्रवाहनित्यता में 'वाचा विरूप० ' इत्यादि श्रुतिया प्रमाण है । इस तरह से अनुक्रमणी आदि ग्रन्थो के रचयिता आचार्य शौनक आदि भिन्न है और मन्त्र ब्राह्मण भाग के द्रष्टा शाकल्य, शाकल प्रभृति ऋषि उनसे सर्वथा भिन्न है । 'स्वयं सूक्तो की उत्पत्ति ढूंढने के लिये हमें बहुत पहले के युग में जाना होगा | यह बात उनमें आये हुए देवशास्त्रीय एवं भौगोलिक तथ्यो से स्पष्टतः परिलक्षित होती है । इनमें प्रथम था देवशास्त्रीय सम्बन्ध, जिसका प्रतिनिधित्व ऋग्वेद के अधिक प्राचीन सूक्तों में हुआ है, अंशतः हमें आदिम इण्डो-जर्मन काल में खीच ले जाते है । उनमे उस समय प्रचलित ऐसी बालसुलभ और दाक्षिण्यहीन कल्पनाओं के अवशेष है, जैसी ट्यूटन और ग्रीक लोगो में भी पाई जा सकती है । इसी प्रकार का उदाहरण गत आत्मा के वायु में परिणत होने की कल्पना है, जिस आत्मा को स्वामिभक्त कुत्ते के समान पंखधारी पवन गन्तव्य तक ले जाता है । यह बात 'शरमेय्' और 'एमइअस' तथा शबल और ' केर्नेरोस ' के तादात्म्य से प्रकट होती है । अपरंच, स्वर्गस्थित समुद्र, संसार को परिवृत करने वाला वरुण, पिता द्युलोक द्यौष्पितर, जिउस डीपिटेर की माता पृथिवी डिमीटिर को, चमकती हुई परियों के रूप में आकाश की नदियों की, चरागाह में चरने वाली गायो जैसी सूर्य की किरणों, इन युवतियों और गायो को उठा ले जाने वाले लुटेरे के समान