वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 321–330
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 321–330
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वेदार्थपारिजातः १२२१ त्यावरणस्य निमित्ताभावादपि तदावरण न घटते । एतेन भोग्यप्रपञ्चवत् भोक्तृप्रपञ्चोऽपि तदानी नासीदित्युक्त भवति । एवमवस्थानप्रदेशमावरणनिमित्तं चाक्षिप्य तदावरण निषिद्धम् । अम्भ किमासीदित्यम्भसो जलस्यापि निषेध: । यद्यपि ब्रह्माण्डनिषेधेन तदन्तर्गतस्याम्भसोऽपि निषेधः प्राप्त एव, तथा 'आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत्' ( तै ० सं ० ७।१।५।१ ) इति श्रुत्यापां सद्भाव कश्चिदाशङ्केतेति पृथक् तत्प्रत्याख्यान युक्तमेव: गहनं दुष्प्रवेशं गभीर दुरवस्थान- मत्यगाधमम्भोऽपि किमासोत्तदानीम्, तदपि नासीदित्यर्थः । न च तहि श्रुतेः का गतिरिति वाच्यम्, तस्या अवान्तर- प्रलयपरत्वेन महाप्रलये तत्सद्भावासिद्धे । 'न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न राज्या अह्न आसीत् प्रकेतः । आनीदवातं स्वधया तदेक तस्माद्धान्यन्न परः किश्वनास ॥ ' (ऋ ० सं ० १० | १२ ९ । २ ) । ननूक्तस्य प्रतिसहारस्य प्रतिहपेक्षत्वात् प्रतिसहर्ता मृत्युरासीदिति चेत्, तदपि निषिद्धयते, 'न मृत्युरासीत्' इति संहारकस्य कालस्यापि तदानीं महाकारणे विलीनत्वात् । ननु यदि मृत्युर्नासीत्तदा तदभावकृतममृत सर्वप्राणिनाममरणमेवास्तु । इति चेत्तत्राह -तर्हि तदानीममृतमपि नासीत् । सर्वप्राणिना भोगहेतुभूतं परिपक्वं सर्वं कर्म यदोपभुक्तं भवति, तदा भोगाभावान्निष्प्रयोजनमिद जगदिति परमेश्वरस्य मनसि सजिहीर्षोपजायते । तथैव सर्वं जगदुपसंहरति । किमनेन मृत्युना सहर्त्रा तदभावकृतं वा कथममरणं स्यात्? अत एव महाकारणे मृत्योरपि लय: श्रूयते । 'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उमे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥' ( कठोप ० २।२५) । प्राणिनां पूर्वमेव संहृतत्वात् प्राणिनामवस्थानरूपममृत तु कुतस्त्यम्? लीन हो जाने से भोक्ता जीव भी लीन हो जाते है । इस स्थिति में कोई भोक्ता बच नही रहता । इस अवस्था में जब आवरण के निमित्त की कोई स्थिति नही है, तो आवरक की स्थिति कैसे रह सकती है? इस तरह से जैसे भोग्य प्रचंच की उस समय कोई स्थिति नही रहती, वैसे हो भोक्ता (जीव ) के प्रपंच की भी सत्ता का निषेध कर दिया जाता है । इस तरह से आधार प्रदेश का निषेध और आवरण के निमित्त का निषेध स्वयं आवरण का भी निषेध कर देता है । ' अम्भः किमासीत्' इससे प्रलयावस्था में जल की सत्ता का मी निषेध कर दिया जाता है । यद्यपि ब्रह्माण्ड का निषेध कर देने से उसके अन्दर स्थित जल का भी निषेध अपने आप हो जाता है, किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ में जल की सत्ता का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियों से विरोध की आशका कही न उठ खड़ी हो, इसके परिहार के लिये यहाँ जल का अलग से उल्लेख कर दिया गया है कि उस प्रलयावस्था मे जल की भी कोई सत्ता नही थी । क्या उस समय चारों तरफ फैला हुआ अगाध जल विद्यमान था? नहीं, उस समय उसकी भी कोई सत्ता नही थी । तब जल की सत्ता का प्रतिपादन करने वाली श्रुति की क्या गति होगी? उसकी यह गति होगी कि अवान्तर प्रलयावस्था में जल की सत्ता के प्रतिपादन में उसका तात्पर्य माना जायगा, क्योकि महाप्रलय दशा में तो जल की भी कोई स्थिति नही रह जाती । 'न मृत्युरासी ०' इत्यादि मन्त्रों का अर्थ सायण ने इस प्रकार किया है-प्रश्न उठता है कि इस सूक्त के पहले मन्त्र में जिस प्रलयावस्था का वर्णन किया है, उस प्रतिसंहार को करनेवाले किसी कर्ता की सत्ता स्वीकार किये बिना यह कैसे संभव होगा? अतः प्रतिसंहर्ता मृत्यु की सत्ता तो माननी पड़ेगी, किन्तु इस दूसरे मन्त्र के आरंभ में उसका भी निषेध किया गया है, क्योंकि संहारक काल भी उस समय महाकारण में विलीन हो जाता है । प्रश्न उठता है कि जब उस समय मृत्यु नही थी तो इसके अभाव में सभी प्राणियों को अमरता तो विद्यमान रहेगी, किन्तु श्रुति उसका भी निषेध करती है कि उस समय अमृत दशा को भी स्थिति नही थी । सभी प्राणियों के भोग का कारण कर्म जब परिपक्व हो जाता है, तब उसके उपभुक्त हो जाने से भोग बच नहीं रहते । जब ये बच नही रहते तो जगत् का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता । उस अवस्था में भगवान् के मन में इस जगत् का संहार करने की इच्छा होती है और वह जगत् का उपसंहार कर भी देते हैं । इस अवस्था में न तो मृत्यु का ही कोई प्रयोजन रह जाता है और न अमरता का ही । इसीलिये महाकारण में मृत्यु का भी लय माना जाता है, जैसा कि ' यस्य ब्रह्म च' इस कठ श्रुति में प्रतिपादित है । जब मृत्यु की कोई स्थिति नहीं है और मृत्यु सहित सभी प्राणियों का उपसंहार भी उस महाकारण में हो चुका है, तो उस अमरता की स्थिति कैसे रह सकती है, जो कि प्राणियों के रहने पर ही बन सकती है?
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वार्थपारिजातः १२२२ ननु तथापि सर्वस्याधिकरणभूत कालः स्यादित्यत आह ' रात्र्या अह्नश्च प्रकेतः प्रज्ञानं नासीत्, तद्धेतु- भूतयो: सूर्याचन्द्रमसोरभावात् । एतेनाहोरात्र निषेधेन तदात्मको मासतुंसंवत्सरावयवकः कालोऽपि प्रत्याख्यातः । ननु तर्हि कथं तदानीमिति कालवाची प्रत्ययः? इति चेन्न, तादृक्प्रत्ययस्योपचारात् । यथेदानीन्तननिषेधस्य कालोऽवच्छेद- कस्तथा मायापि तदवच्छेदहेतुरित्यवच्छेदकसाम्येनाकालेऽपि कालवाचिप्रत्ययोपपत्तेः । नन्वेवं कस्यचित्परमार्थवस्तुनः सत्त्वाभावे शून्यपर्यवसाय्येव सर्वं स्यादिति चेत्तत्राह - आनीत्, तद् वेदान्तप्रसिद्ध ब्रह्मतत्त्वमानीत् अनन प्राणन कुर्वत् आसीत् । ननु तर्हि प्राणनकर्तुर्जीवभावापन्नस्यैव ब्रह्मणोऽस्तित्व सिद्धयतीति चेत्तत्राह -अवातम् । अप्राणं शुद्ध ब्रह्मे- त्यर्थः, ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' ( मु ० उ० २।१।२ ) इति श्रुते । यद्यपि 'आनंत्' इत्युक्त्या धात्वर्थक्रिया, तत्कर्ता तस्य च भूतकालसम्बन्ध इति त्रयोऽप्यर्थाः प्रतीयन्ते, तथापि न तत्र 'आग्नेयोऽष्टाकपालो भवति' इतिवत् तत्समुदायो विधीयते, येन शुद्धब्रह्मणः सत्त्वं न सिद्ध्यति । किन्तु कर्तृत्वमनूद्य भूतकालसत्तालक्षणो गुणो विधीयते, ' दध्ना जुहोति' इतिवत् । तत्र च होममनूद्य दधिलक्षणो गुणो विधीयते । तत्राप्यनेन कर्तृत्वविशिष्टस्य न पूर्वकालसत्ता विधीयते, तन्निषेधानुपपत्तिप्रसङ्गात् । अतोऽनेनेदानीन्तनेन कर्तृत्वेनोपलक्षित यन्निरुपाधिक परं ब्रह्म तस्यैव भूतकालसत्ता विधीयते । तेन प्राणनादिक्रियातत्कर्तृत्वादिरहित शुद्धं ब्रह्मैव बोध्यते । नन्वीदृशस्य ब्रह्मणो मायासम्बन्धासम्भवात् साख्याभिमता स्वतन्त्रा प्रकृतिरेव सिद्धयतीति कुतः नो सदिति निषेधः? तत्राह -स्वधया । स्वस्मिन् घीयते ध्रियते आश्रित्य वर्तत इति स्वघा माया तया सहाविभागापन्न ब्रह्मवासीत् । अत्र सहशब्दप्रयोगाभावेऽपि 'सहयुक्तेऽप्रधाने ' (पा० सू० २।३।१ ९ ) इति सहार्थयोगेऽपि तृतीया भवति, इस पर प्रश्न उठाया जा सकता है कि उस समय सबके अधिष्ठाता काल की तो स्थिति माननी ही पडेगी? इसका उत्तर श्रुति ही देती है कि उस प्रलयावस्था में दिन और रात के सूचक सूर्य और चन्द्र की भी स्थिति न रहने से न तो अहोरात्र ही विद्यमान थे और उनकी समृष्टि से संपन्न होने वाले मास, ऋतु, संवत्सर आदि अवयव वाले काल की हो कोई स्थिति थी । पुनः शंका उठाई जाती है कि ' तदानीम्' ( उस समय ) शब्द से भी तो काल ही बोधित होता है? किन्तु इसका समाधान यह है कि इस तरह का प्रयोग उपचार मात्र है । जैसे इदानीन्तन ( इस समय ) निषेध का अवच्छेदक काल है, उसी तरह से माया भी उसकी अवच्छेदिका है । इसी अवच्छेदक को समानता के आधार पर अकाल में भी कालवाचक शब्द का प्रयोग हो सकता है । पुनः प्रश्न उठता है कि इस तरह से तो जब किसी वस्तु की सत्ता नही है, तो यह सारा जगत् शून्य में समाप्त हो जायगा? किन्तु इसका उत्तर परमार्थ भी यही श्रुति देती है कि उस समय वेदान्त शास्त्र में प्रसिद्ध ब्रह्मतत्त्व निरन्तर श्वसनशील था । इस तरह से श्वास-प्रश्वास लेकर जीने वाले जीवभावापन्न ब्रह्म का ही अस्तित्व सिद्ध होगा, यह बात भी नही कही जा सकती, क्योकि उस प्रलयावस्था मे शुद्ध ब्रह्म की ही स्थिति रह सकती है । 'अप्राण' इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है । यद्यपि श्रुति में विद्यमान 'आनीत्' इस पद से धात्वर्थ क्रिया, उसका कर्ता, तथा भूतकाल -इन तीनो अर्थों की प्रतीति होती है, तो भी वहा 'आग्नेय अष्टाकपाल' की तरह समुदाय का विधान नही माना जाता, जिससे कि शुद्ध ब्रह्म की सत्ता न सिद्ध हो सके । किन्तु 'दध्ना जुहोति' इस वाक्य में जैसे होम का अनुवाद कर दविलक्षण गुण का विधान किया जाता है, उसी तरह यहा कर्ता का अनुवाद कर उसकी भूतकाल की सत्ता वाले गुण मात्र का विधान किया जाता है । इस स्थिति में इस श्रुति वाक्य से कर्तृत्व विशिष्ट की पूर्वकालीन सत्ता नही बताई जाती, क्योंकि तब तो उसका निषेध न हो पावेगा । किन्तु इदानीन्तन कर्तृत्व से उपलक्षित निरुपाधिक परब्रह्म की ही भूतकाल की सत्ता विहित होती है । इस तरह से प्राणन प्रभूति क्रिया और कर्तृत्व से रहित शुद्ध ब्रह्म का हो यहा बोध होता है । प्रश्न उठता है कि इस तरह का ब्रह्म माया से संबद्ध नही माना जा सकता, तब तो उस प्रलयावस्था में सांख्यदर्शन अभिमत स्वतन्त्र प्रकृति की ही सत्ता मानी जायगी, तब सत् का निषेध कैसे बन सकता है? इसका उत्तर श्रुति 'स्वघया' इत्यादि से देती है । स्वधा शब्द का अर्थ 'अपने में सबको समेट कर रहने वाली' इस व्युत्पत्ति के आधार पर माया है । उस माया से अविभागापन ब्रा ही उस समय विद्यमान था । यहा 'सह' शब्द का प्रयोग न होने पर भी 'सहयुक्त० ' इत्यादि पाणिनि सूत्र से सहार्थ के योग में तृतीया
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वार्थपारिजातः १२२३ 'वृद्धो यूना' ( पा ० सू० १/२/६५) इति निदेशाल्लिङ्गात् । 'स्वधया' इत्यत्र प्रकृतिप्रत्ययाभ्या तस्याः स्वातन्त्र्यं निषिद्धयते । यथा गोधूमादिवीजेषु तत्तदङ्कुरादिजननानुगुणाः शक्तयः सन्ति, तथैव ब्रह्मणि प्रपश्चोत्पादनानुगुणाः शक्तय: सन्ति । तासा समष्टिरेव माया भवति । सा च न जीवादिकार्याश्रया, कारणस्य कार्याश्रयत्वानुपपत्तेः । नापि स्वाश्रया, आत्माश्रयत्वायोगात् । पारिशेष्याद् ब्रह्माश्रयैव सा । श्रमोपादानत्वेन संवाविद्यापि जेगीयते । यद्यप्यसङ्गे ब्रह्मणि तत्सम्बन्धो न सम्भाव्यते, तथापि तस्मिन्नविद्यर्यव तत्स्वरूपमिव सम्बन्धोऽपि कल्प्यते । यथा शुक्तिकायां रजतस्याध्यासिकसम्बन्धो भवति, तथैव मायाधिष्ठाने ब्रह्मणि मायाया आध्यासिकः सम्बन्ध • । सम्बन्धोऽप्याध्यासिक एव । यथा वह्निशक्तिर्वह्निविलक्षणा भवति, तथैव सतः शक्तिरपि सद्विलक्षणैव । तत एव तस्या. सद्रूपता प्रत्याख्याता । यथा भेदो भेद्य भिन्दन स्वमपि ततो भिनत्ति, यथा वा नैयायिकानामात्मा प्रमेयजातमिव स्वमपि श्रमिणोति, तथैव सा माया विश्वप्रपञ्च कल्पयन्ती स्वमपि कल्पयति, स्वपरनिर्वाहकाणा भावाना बहुलमुपलब्धेः । ननु ब्रह्मणोऽविभागापन्नत्वेन तस्या अनिर्वाच्यत्वमिव ब्रह्मणाऽपि तथात्व कि न स्यादिति? ब्रह्मणो वा सत्त्वे तस्या अपि सत्त्वप्रसङ्ग इति कुतो नो सदासीदिति सत्त्वनिषेधः? इति चेन्न, अयुक्तिदृष्ट्यं क्यावभासेऽपि युक्त्या विविच्यमाने मायाशस्यानिर्वाच्यत्व ब्रह्मणश्च सत्त्वमिति प्रतिपादितत्वात् । न च दृग्दृश्यों द्वावेव पदार्थों आनीतदवात स्वधयेति चेदङ्गीक्रियेते, तर्हि कुतो नासीद्रज इत्यादिना लोकाना निषेध इति तत्राह - तस्माद्धान्यन्न पर: ( | ) किंचनास ऋ० सं ० १० १२ ९ ।२ । तस्मान्मायासहिताद् ब्रह्मणाऽन्यत् भूतभौतिकं न आस न बभूव । ननु तदानीमन्यस्य सत्वे निषेधो न शक्यः, असत्त्वे चाप्रसक्तत्वान्न निषेधोपयोगः इत्यत आह- पर: सृष्टेः परस्तात् सृष्टेरूवं वर्तमानमिद जगत् तदानी न बभूव । अन्यथोक्तरीत्या क्वचिदपि निषेधो न स्यादिति भावः । विभक्ति होती है । 'वृद्धो यूना' इस पाणिनि सूत्र से यह सिद्ध होता है कि सहार्थ के योग में भी, तृतीया विभक्ति हो सकती है । 'स्वघया' इस पद में विद्यमान प्रकृति और प्रत्यय से उनका स्वातन्त्र्य निषिद्ध हो जाता है । जैसे गेहूं प्रभृति के बीजों में उस उस प्रकार के अंकुरादि को पैदा करने की शक्ति विद्यमान है, उसी तरह ब्रह्म मे प्रपंच को उत्पन्न करने लायक शक्ति है । प्रपच को उत्पन्न करने वाली शक्ति ही माया कहलाती है । यह शक्ति जीव मे नही रह सकती, क्योंकि ऐसा कोई नियम नही है कि कारण कार्य मे रहे । स्वाश्रय भी इसको नही माना जा सकता,$ क्योकि तब इसकी आत्माश्रयता न बन पावेगी । इनके अतिरिक्त इसका आश्रय ब्रह्म ही हो सकता है । भ्रम का उपादान होने से यह अविद्या भी कहलाती है । यद्यपि असंग ब्रह्म के साथ उसका संबन्ध नही बन सकता, किन्तु उसी में अविद्या से ही उसके स्वरूप की तरह संबन्ध की भी कल्पना हो जाती है । जैसे सीप मे रजत का आध्यासिक संबन्ध होता है, उसी तरह माया के अधिष्ठान ब्रह्म में माया का आध्यासिक संबन्ध भी हो जाता है । यह संबन्ध भी आध्यासिक ही है । जैसे अग्नि की शक्ति उससे विलक्षण होती है, उसी भाति सत् की शक्ति भी सत् से विलक्षण होती हैं । इसीलिये उसको सत्स्वरूपता का प्रत्याख्यान किया जाता है । जैसे भेद, जिसका भेद दिखाना है, उसको अलग करते हुए, अपने भी उसमे अलग हो जाता है, अथवा जैसे नैयायिकों का आत्मा प्रमेय का ज्ञान करने के साथ अपने स्वरूप को भी जान लेता है, उसी तरह से वह माया विश्वप्रपंच की कल्पना के साथ स्वयं अपनी भी कल्पना कर लेती है । इस तरह के अनेक प्रदीप प्रभृति पदार्थ मिलते हैं, जो कि दूसरे के साथ स्वयं अपना भी प्रकाश करते हैं । प्रप्त है कि जब ब्रह्म भी अविभाग अवस्था में अनिर्वाच्य है, तो माया से और उसमें कोई अन्तर नहीं रह जायगा? अब ब्रह्म को यदि सत् माना जाता है, तो उसी पद्धति से माया को भी सत् मानना पडेगा, तब ' वह सत् नही था' इस श्रुति वाक्य से सत्त्व का निषेध कैसे किया जा सकता है? इसका उत्तर यह है कि आपातत: इनमें एकता की प्रतीति होती है, किन्तु जब हम युक्तिपूर्वक विचार करते हैं, तो हमे प्रतीत होता है कि मायांश अनिर्वाच्य है और ब्रह्म सदा सत्त्व से संवलित है । पुनः प्रश्न उठता है कि ' आनीतदवातं स्वचया' इस श्रुतिवाक्य के अनुसार यदि दृक् और दृश्य ये दो पदार्थ माने जाते है, तब ' नासीद्रजः ' इत्यादि वाक्य से लोकों का निषेध कैसे किया जाता है? इसका उत्तर ' तस्माद्धान्यत्' इसमें दिया गया है । इसका अर्थ है कि इस माया संवलित ब्रह्म से अतिरिक्त अन्य किसी भूत एवं भौतिक पदार्थ की सत्ता उस प्रलयावस्था में नहीं थी । यदि कहा जाय कि उस प्रलयावस्था से किसी अन्य की सत्ता है, तब उसका निषेध नहीं किया जा सकता और यदि किसी की सत्ता नहीं है तो निषेध की कोई बात हो न होने से निषेध व्यर्थ हो जायगा, तो इसका 1
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वेदार्थपारिजातः १२२४ ननु यदि पूर्वमिदं जगन्नासीत् कथ तहि तस्य जन्म, जायमानस्य जनिक्रियायां कर्तृत्वेन कारकत्वात् । कारकत्वं च कारणावान्तरभेद इति कारकस्य सतो नियतपूर्वक्षणवर्तित्वेनावश्यभावात् । यदि तद्दोषपरिजिहीर्षया निक्रियाया: प्रागपि कार्यं विद्यते, तदापि कथ तस्य जन्म, कार्यस्य सत्वेन कारकव्यापारवैयर्थ्यात् । अत आह—'तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । तुच्छय नाभ्वपिहित यदासीत् तपसस्तन्महिनाजायतेकम् ॥ ' (ऋ ० सं ० १०।१२ ९ ।३ ) । अग्रे सृष्टेः प्राक् प्रलयदशायां भूतभौतिकं सर्वं जगत् तमो भावरूपमज्ञानमासीत्, मायापरनामकतम: - शबलितं ब्रह्मासीदित्यर्थः । यथा नैशं तमः सर्वं पदार्थजातमावृणोति, तद्वत् तदज्ञानात्मकं तम आत्मतत्वस्यावरकत्वाद् मायापरनामकं भावरूपं तम आसीदित्यर्थः । तेनैव तमसा सर्वं भूतं भौतिक जगदपि गूढं संवृतं कारणभूतेन तेनाच्छादितं भवति । आच्छादकात्तस्मात्तमसो नामरूपाभ्यां यदाविर्भवनम्, तदेव तस्य जन्म भवति । ये तु कारणावस्थायामसदेव कार्यं कारणव्यापारादुत्पद्यत इति मन्यन्ते, तदेतेनापाकृत भवति, असतो भावायोगात् । 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' (भ ० गी० २।१६ ) इति भगवदुक्तेः " ननु यदि कारणभूते तस्मिंस्तमसि तज्जगदात्मकं कार्यं विद्यते तर्हि कथं नासीद्रज इति पृथिव्यादिलोक- निषेध:? इति चेन्न, तम आसीदित्युक्त्या कार्यस्य भावरूपस्याज्ञानात्मक मूलकारणरूपतैवासीत्, यतः सर्व तम आसीत् तमोरूपमेवासीदिति नासीद्रज इति स्वरूपेण कार्यनिषेधोऽपि युज्यते । ननु तथापि तम आवरकत्वाद् आवरणकर्तृ भवति । जगच्चावार्यत्वाद् आवरणकर्म भवति, कथ तयोः कर्तृकर्मणोस्तादात्म्यमिति चेत् तत्राह - अप्रकेतम् अप्रज्ञायमानम् । यद्यपि तमसो जगतश्च कर्तृकर्मभावो यौक्तिकस्तथापि उत्तर यह है कि सृष्टि होने के बाद जो जगत् सत्ता में आवेगा, उस जगत् की स्थिति प्रलयावस्था मे नही रहती । यदि यह अर्थ न किया जाय, तो ऊपर की पद्धति से किसी निषेध की प्रसक्ति ही न हो सकेगी । पुनः प्रश्न उठता है कि यदि पहले यह जगत् नही था, तब उसका जन्म कैसे हुआ? क्योंकि जो पैदा होता है, उसकी स्थिति उत्पन्न होने की क्रिया के कर्ता कारक के रूप में होती है । कारण का अवान्तर व्यापार हो कारक कहलाता है, इस लिये उस कारक की स्थिति उस क्रिया के उत्पन्न होने के पूर्व के निश्चित क्षण में आवश्यक है । इस दोष के परिहार के लिये यदि यह माना जाय कि जनि क्रिया के पहले भी कार्य को स्थिति है, तो फिर उसका जन्म कैसा? क्योकि वह तो पहले से ही है । कार्य जब पहले से ही है, तो उसको पैदा करने वाले व्यापार व्यर्थ ही माने जायेंगे? इस शंका का समाधान इस सूक्त के ' तम आसीत्' इस तृतीय मन्त्र से किया जाता है । सृष्टि से पहले प्रलयावस्था में यह सारा भूत-भौतिक जगत् तमोरूप था, अर्थात् भावरूप अज्ञानात्मक था । इसी का दूसरा नाम माया है । इस तम से शबलित मात्र ब्रह्म की ही उस समय स्थिति थी । जैसे रात्रि का अन्धकार सभी पदार्थों को ढक लेता है, उसी तरह यह अज्ञानात्मक अन्धकार आत्मतत्व को ढक देता है । इस प्रकार 'तम आसीत्' का अर्थ हुआ कि प्रलयावस्था में माया नाम का तम पदार्थ विद्यमान था, जो कि अभावात्मक न होकर भाव पदार्थ है, उसी अन्धकार से यह सारा भूत -भौतिक जगत् ढका हुआ था, क्योंकि इस जगत् का कारण वही है । इस आच्छादक अज्ञानात्मक तम से जब नाम-रूपात्मक जगत् का अविर्भाव होता है, तो यही उसका जन्म माना जाता है । कुछ दार्शनिक ऐसे कार्य की कारक व्यापार से उत्पत्ति मानते हैं, जिसकी कि कारणावस्था में कोई स्थिति नही रहती । उनका मत इस श्रुति के अनुसार गलत सिद्ध हो जाता है, क्योकि असत् वस्तु की सत्ता कभी नहीं बन सकती । भगवान् ने गोता में स्पष्ट कहा है – 'असत को कभी सत्ता नही होती और सत् का कभी अभाव नहीं हो सकता' । यदि यह प्रश्न किया जाय कि उस कारणभूत तप में यदि जगदात्मक कार्य विद्यमान है, तो फिर पूर्व श्रुति में ' नासीद्रजः ' इत्यादि से पृथिवी प्रभृति लोको का निषेध कैसे संगत होगा? तो इसका उत्तर यह होगा कि 'तम आसीत् इसका अभिप्राय यह है कि उस समय कार्य की भावरूप अज्ञानात्मक मूलकारणता हो थी, क्योकि उस समय सब कुछ तमोरूप ही था । इस स्थिति में 'नासीद्रजः ' इस पूर्ववाक्य से नामरूपात्मक जगत् कार्य की स्थिति का निषेध सही ही माना जायगा । पुनः यह शंका उठाई जा सकती है कि तम आवरक है, अतः वह आवरण क्रिया का कर्ता है । जगत् आवार्य होने से आवरण का कर्म है । इस तरह से कर्ता और कर्म में परस्पर तादात्म्य कैसे बन सकता है? इसका समाधान ' अप्रकेतम्' इस विशेषण से
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वेदार्थपारिजात १२२५ व्यवहारदशायामिव तदानी नामरूपाभ्या विस्पष्टं न ज्ञायत इति तादात्म्यवर्णनमपि सङ्गच्छते । अत एव मनुरप्याह- 'आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतयमनिर्देश्यं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥' ( म० ११५ ) इति । कुतश्च न प्रज्ञायते तत्राह - सलिलमिति । पल गतावित्यस्माद् धातोर् इलचिप्रत्यये सलिलमिति रूपं भवति । इदं दृश्यमान सर्वं जगत् सलिल कारणेन सङ्गतमविभागापन्नम् आः आसीत् । अस्तेर्लङि तिपि ' बहुलं छन्दसि' ( पा ० सू० ७।३।९ ७) इतीड- भावे. 'हलुङयाभ्य:' (पा० सू० ६।१।६८ ) इति तिलोपे, 'तिप्यनस्ते:' ( पा० सू० ८।२।७३ ) इति पर्युदासाद्दकारा- भावः । यद्वा सलिलमिति लुप्तोपमं पदम्, सलिलमिवेत्यर्थः । यथा क्षीरेणाविभागापन्न सलिलं दुर्विज्ञान भवति, तथैव तमसाविभागापन्न जगन्न शक्यविज्ञान भवतीत्यभिप्रायः । ननु विविधवैचित्र्योपेतस्य प्रपञ्चस्य कथमतितुच्छेन तमसा क्षीरेण नीरस्येवाभिभवः? यदि च क्षीर- वत्तमोऽपि प्रबलमेवोच्येत, तर्हि दुर्बलस्य प्रपञ्चस्य सर्गसमयेऽपि कथमुद्भवसम्भवः? इत्याशङ्कायामाह - तुच्छ्य नाभु, आसमन्ताद् भवतोत्याभु अज्ञानम्, तुच्छय नेत्यत्र छान्दसो यकारः । तुच्छकल्पेन खपुष्पादितुल्येन सदसद्विलक्षणेन आभुना अज्ञानेन अपिहित छादितमासीत् । यद्यप्यज्ञानं बाध्यत्वान्न ब्रह्मवत् सत्, वियदादिप्रपञ्चोपादानत्वाच्च न खपुष्पवदसद् इति सदसद्विलक्षणत्वाद् अनिर्वाच्यमेव, तथापि बाधदशायां तत्खपुष्पवग्निरुपाख्यमेव भवतीत्य- सत्कल्पतेव तस्य । एकमेकीभूत कारणेन तमसाऽविभागापनमपि तत्कायंजातं तपसः पर्यालोचनरूपस्य महिना माहात्म्येन अजायतोत्पन्नम् ॥ 'य: सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमय तप:' ( मु० उ० १ | १ | ९ ) इति श्रुत्या ' इदमिदानोमुत्पादयितव्यम्' इत्यादिज्ञानात्मक सङ्कल्पस्यैव तपोरूपत्वमुक्तम् । होता है, इसका अर्थ है अप्रज्ञायमान । यद्यपि तम और जगत् का कर्तृकर्मभाव युक्ति से सिद्ध है, तो भी उस प्रलयावस्था में वह नाम-रूप के अभाव में व्यवहार दशा की तरह स्पष्ट रूप से प्रतीत नही होता । इस स्थिति में इनका तादात्म्य भी नही माना जा सकता । इस स्थिति का वर्णन मनु ने भी किया है-'यह जगत् पहले नमस्वरूप अत एव अज्ञेय होने से सभी प्रकार के लक्षणो से हीन, अप्रतर्क्स और अनिर्देश्य था मानों कि चारों तरफ सुषुप्ति का साम्राज्य हो' । यह क्यो अज्ञेय था? इसलिये कि सब कुछ सलिल था । गत्यर्थक ' बलू' धातु से इन प्रत्यय करने पर सलिल बनता है । यह दृश्यमान सारा जगत् सलिलात्मक अर्थात् कारण से मिला हुआ अविभागावस्था में पहले विद्यमान था । यहा 'आ' पद 'आसीत्' के अर्थ में प्रयुक्त है । अस् धातु से लड् लकार में तिप् प्रत्यय करने पर 'बहुलं छन्दसि' सूत्र से इट् प्रत्यय न होने पर " 'हल्डचाम्य ' इससे ति का भी लोप हो जाने पर और 'तिप्यनस्ते' इससे दकार के न होने से उक्त रूप बनता है । अथवा 'सलिलम्' इसको लुप्तोपमा वाला पद मानकर ' सलिल की तरह' यह अर्थ भी किया जा सकता है । जैसे दूध में मिला देने पर पानी को जान पाना कठित है, उसी तरह तम के साथ मिल जाने पर इस जगत् को जान पाना भी कठिन है । प्रश्न होता है कि विविध विचित्रताओं से युक्त प्रपंच का अत्यन्त तुच्छ स्वभाववाला तम उस तरह का आवरक ? यदि दूध की तरह तम को भी प्रबल माना जाय, तब यह दुर्बल प्रपंच कैसे हो जाता है, जैसा कि दूध जल का आवरक हो जाता है 'तुच्छयेनाभु ' इत्यादि से किया जाता है । आभु शब्द अज्ञान का वाचक सृष्टि के समय में भी कैसे पैदा हो सकेगा? इसका समाधान है, क्योंकि वह चारो ओर से पैदा होता है । 'तुच्छ्य' पद 'तुच्छ' का प्रतिरूप है, इसमें यकार अधिक जोड़ दिया गया है, जिसकी संगति इसकी वैदिकता से बैठाई जाती है । यह अज्ञान प्रपंच का बाधक नही हो सकता, क्योकि इसकी स्थिति आकाश के पुष्प की तरह तुच्छ है । सत् और असत् से विलक्षण इस अज्ञान से यह आच्छादित है । इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि अज्ञान की ब्रह्म के समान सत्ता नहीं है, क्योकि अज्ञान परमार्थ दशा में बाधित हो जाता है । इसी तरह से यह अज्ञान आकाश- पुष्प की तरह असत् भी नही है, क्योकि इस प्रपंचात्मक सारे जगत् का उपादान वही है, इसकी इस सदसद्विलक्षणता से ही यह अनिर्वाच्य होता है, तो भी बाह्य दशा में यह आकाश कुसुम की भाँति निरुपाख्य होने से असत् के समान ही है । इस प्रकार एकीभूत अर्थात् अपने कारण तम मे afare रूप में स्थित होने से एक सा प्रतीत हो रहा यह सारा प्रपंचात्मक कार्यजगत् तप के प्रभाव से उत्पन्न होता है । 'यः सर्वज्ञः' इत्यादि श्रुतिवचन के प्रमाण से ' इस समय इस वस्तु को उत्पन्न करना चाहिये' इस तरह का भगवान् का ज्ञानात्मक संकल्प ही यहाँ 'तप' शब्द से अभिहित होता है । १५४
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वदार्थपारिजातः १२२६ ननु जगतः पुनरुत्पत्त्यै यदोश्वरस्य स्रष्टव्यपर्यालोचनरूप तपः कारणम्, तदेव किन्निबन्धनम्, इत्यत आह-'कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथम यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनोषा ॥' (ऋ० स०१०।१२ ९ ।४ ) । अग्रे अस्य विकारजातस्य सृष्टेः प्रागवस्थायां परमेश्वरस्य मनसि कामः समवर्तत सम्यग-जायत । परमेशमनसि प्रपञ्चसिसृक्षा सञ्जातेत्यर्थः । तदीयसिसृक्षापि किनिबन्धनेत्याकाङ्क्षायामाह - मनस इति । मनसोऽन्तःकरणस्य सम्बन्धिवासनाशेषेण मायाया विलीनेऽन्तःकरणे समवेत प्रथममतीते कल्पे प्राणिभि कृत पुण्या-पुण्यात्मक कर्म तादृश रेतो भाविनः प्रपञ्चस्य बीजभूत यत् यतः कारणात् सृष्टिसमये आसीद् अभवत्, भूष्णु वधिष्णु अजायत परिपक्व सत्फलोन्मुखमासीत् । ततो हेतोः फलप्रदस्य सर्वसाक्षिणः परमेश्वरस्य कर्माध्यक्षस्य मनसि सिसृक्षा-जायत । तस्या सत्या स्रष्टव्यं पर्यालोच्य ततः सर्वं जगत् सृजति । अत्र कामाधिकरणत्वेन परमेश्वरस्य मायारूप मन आक्षिप्तम्, ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' ( मु० उ० २।१।२ ) इति श्रुतेरन्यादृशस्य मनसोऽभावात् । मन्त्रे श्रुतस्य मनस इत्यत्रैकवचनं सामान्यापेक्षम् । तानि च सर्वजीव सम्बन्धीन्यन्तःकरणानि प्रलये वासनाशेषेण मायाया विलीनानि भवन्ति । तेषु सर्वप्राण्यन्तः करणेषु प्राक्कल्पकृतं पुण्यापुण्यात्मक कर्मादृष्टरूपेण समवेत भवति । तदेव च भाविनः प्रपञ्चस्य रेतो बीज भवति । प्रलयप्राक्का लिके नेश्वरसङ्कल्पेन तदेवा दृष्टरूप कर्म भूष्णु वर्धिष्णु परिपक्व सत् फलोन्मुख भवति । तत एव परेशस्य मायावृत्त्यात्मके मर्नास सिसृक्षा जायते । एतावता कामस्य कर्मादृष्टस्य च मन एवाधिकरण नात्मेत्यपि सिद्धयति । तदेतत्सर्वमाम्नायते - 'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वेद सर्वमसृजत । यदिदं किञ्च' ( तै ० आ ० ८। ६ ) । मन्त्र इत्थ स्वात्मनावगमितेऽर्थे विद्वदनुभव प्रमाणयति - सतः सत्वेनानुभूयमानस्य सर्वस्य जगतः बन्धुं बन्धकं हेतुभूत वा कल्पान्तरोयप्राण्यनुष्ठित कर्मसमूह कवयः क्रान्तदशिनोतीतानागतवर्तमानज्ञा योगिनो हृदि हृदये यदि जगत् की पुनः सृष्टि के लिये ईश्वर का सर्जनीय पदार्थ का ज्ञानात्मक संकल्प अर्थात् तप कारण है, तो इसके भी कारण का होना अनिवार्य है, वह कारण क्या है? इस शका का समाधान इस सूक्त के चतुर्थ मन्त्र 'कामस्तदग्रे' से दिया गया है । अग्रे अर्थात् इस विकारमय सृष्टि की उत्पत्ति से पहले परमेश्वर के मन में कामना उत्पन्न हुई । अर्थात् परमेश्वर के मन में प्रपंच को पैदा करने की इच्छा उत्पन्न हुई । इस सिसृक्षा का भी क्या कोई कारण था? हाँ, मन में अन्त: करण में विद्यमान दासना का अवशेष इसमें कारण था, जो कि माया में विलीन अन्त करण में समवेत थी । यह वासना प्रथम अर्थात् अतीत कल्प में प्राणियों के किये गये पुण्य- पापरूप कर्मों के माध्यम से बनी थी और यही भावी प्रपंच की उत्पत्ति मे रेत अर्थात् वीर्य ( बीज ) का काम करती है । सृष्टि के समय यही कर्मसमूह परिपक्व होकर फलोन्मुख हो जाता है । इसीलिये सभी कर्मों के फल को यथासमय देने वाले सभी के साक्षी, सभी कर्मों के स्वामी परमेश्वर के मन में जगत् को पैदा करने की इच्छा होती है । इस सिसृक्षा के उत्पन्न होने पर वह सर्जनीय प्रपंच का पर्यालोचन कर तब सारे जगत् की सृष्टि करता है । यहाँ काम ( इच्छा ) के अधिष्ठाता के रूप में परमेश्वर के मायारूप मन का बोध होता है, क्योंकि ' अप्राण. ' इत्यादि श्रुतिवचन के प्रमाण से इसके अतिरिक्त मन का कोई स्वरूप ईश्वर में नही माना जाता । मन्त्र मे मनस् शब्द का एकवचन में प्रयोग सामान्यार्थक है, अर्थात् सामान्य मन का वाचक है । सभी जीवो के अन्त करण उस प्रलयावस्था में अपनी वासनाओं के साथ भगवान् के इस मायारूप मन में विलीन हो जाते हैं । माया में विद्यमान इन प्राणियों के अन्तःकरण में पूर्व कल्प के किये गये पुण्य -पाप रूप कर्म अदृष्ट के रूप में विद्यमान रहते है । ये ही कर्म भावी प्रपंच की उत्पत्ति में बीजभूत, कारणभूत है । प्रलया- वस्था से पहले उत्पन्न हुए ईश्वर के संकल्प से यही अदृष्ट रूप कर्म बढ़कर पकने लगता है, और जब पक जाता है, तब फल देने के लिये तत्पर हो जाता है । इसी कारण परमेश्वर के मायावृत्तिरूप मन मे सिसृक्षा होती है । इससे यह सिद्ध हो जाता है कि काम ( इच्छा ) और कर्मदृष्ट का भी अधिकरण मन ही है, आत्मा नही । ' सोऽकामयत' इत्यादि श्रुतिवचनो भी यही बात विस्तारपूर्वक बताई गई है । मन्त्र इसके आगे अपने द्वारा प्रतिपादित विषय की प्रामाणिकता के लिये विद्वानो के अनुभव की साक्षी देता है— सत् स्वरूप से अनुभूयमान इम सारे जगत् को बाँधने वाले अथवा कारणभूत इस कल्पान्तरीय प्राणियो के कर्मसमूह को क्रान्तदशीं, अतीत
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दार्थ पारिजातः १२२७ निरुद्धया मनीषा मनीषया बुद्ध्या 'सुपां सुलुक्' (पा० सू० ७ १।३ ९ ) इति तृतीयाया लुक् । प्रतीष्य विचार्य, अन्येषा - मपीति साहितिको दीर्घः । असति सद्विलक्षणेऽव्याकृते कारणे निरविन्दन् निष्कृष्य अलभन्त । विविच्याजानन्नित्यर्थः । सतो व्यावहारिकसत्तावत • सर्वस्य जगतो बन्धकं हेतुभूतं वा कल्पान्तरीयप्राण्यनुष्ठितं कर्मसमूह कवयो हृदि निरुद्धया मनीषया बुद्ध्या प्रतीष्य विचार्य असति सद्विलक्षणे अव्याकृते कारणे विविच्य ज्ञातवन्तः । जगतः कारणभूतं प्राणिकर्म- समूह महाप्रलयदशायां मायोपहिते ब्रह्मण्यन्तनिलीनं योगिन एव विविच्य ज्ञातु शक्नुवन्ति, नान्ये । अत्र व्यवहारा- हेत्वेन जगतः सत्त्वमुक्तम् । व्यवहारानर्हत्वेन कारणस्याव्याकृतस्यासत्त्वमुक्तम् । प्राणिकमंसमूहस्य बन्धनहेतुत्वाद् बन्धुत्वमुक्तम्, ' कर्मणा बध्यते जन्तुः ' इति स्मृतेः । सतो जगतः कार्यस्याव्यवहितप्राक्क्षणवर्तित्वेन कारणभूतस्य प्राणिकर्मसमूहस्य कार्यहेतुत्वेन तत्सम्बन्धित्वाद् बन्धुत्वमुक्तम् । 'तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् । रेतोधा आसन् महिमान आसन् स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥ ' (ऋ ० स० १०।१२ ९ ।५) । एवमविद्याकामकर्माणि सृष्टेर्हेतुत्वेनोक्तानि । साम्प्रतं तेषां स्वकार्यजनने शैघ्रय प्रतिपाद्यते । नासदासीदित्यादिनाऽविद्या प्रतिपादिता । कामस्तदग्रे इति कामः प्रतिपादित । मनसो रेतः प्रथम यदासीदित्यादिना कर्म प्रतिपादितम् । एषामविद्याकामकर्मणा वियदादिप्रपञ्च सृजता रश्मि रश्मिसदृश: कार्यवर्गो वितत आसीत् । यथा सूर्यरश्मिरुदयानन्तरमेव निमेषमात्रेण युगपत्सर्वं जगद् व्याप्नोति, तथा शीघ्र सर्वत्र व्याप्नुवन कार्यवर्गों विततो विस्तृत आसीत् । 'विचार्यमाणानाम्' ( पा० सू० ८/ २/ ९ ७ ) इति प्लुतः । तत्रोदात्त इत्यनुवत्तेः स चोदात्तः । स्वित् इति वितर्के । स कार्यवर्गः प्रथमतः तिरश्चीन: तिर्यगवस्थितो मध्ये स्थित आसीत् किं वा अधः अधस्तादासीत् आहोस्विदुपरि उपरिष्टात् किमासीत् ' उपरिस्विदासीदिति च' ( पा ० सू० ८ २६०२ ) इत्यनुदात्त. प्लुन: । 'आत्मन आकाशः सम्भूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निः ' ( तै ० आ ० ८ ५ ) इत्यादिपञ्चमीश्रुत्या तत अनागत और वर्तमान तोनो कालो के ज्ञाता यागीगण अपने हृदय में स्थित बुद्धि से विचार कर असत् अर्थात् सद्विलक्षण अव्याकृत कारण को भी जान लेते हैं । ' मनीषा' यह पद तृतीयान्त है, 'सुपा सुलुक्' इस सूत्र से यहाँ विभक्ति का लोप हो जाता है । 'प्रतीष्या' में दीर्घ वैदिक व्याकरण के अनुसार हा जाता है । इसका भाव यह है कि जगत् के कारणभूत नाना प्राणियो के नाना कर्मों को, जो कि महाप्रलय दशा में माया से उपहत ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, केवल योगी जन ही भलीभाँति समझ सकते है, अन्य प्राणियों में यह सामर्थ्य नही हो सकती है । यहाँ व्यवहार की निष्पत्ति में समर्थ होने से जगत् को सत् कहा जाता है । व्यवहार की निष्पत्ति के अयोग्य होने से अव्याकृत कारण को असत् माना जाता है । 'कर्मों से जन्तु बँध जाता है' इस स्मृति वचन के अनुसार प्राणियों के कर्मसमूह को बन्धु कहा गया है, क्योंकि यह कर्म हो जीवो को जगत् के साथ बाँध देता है । अथवा इसको बन्धु इस अभिप्राय से कह सकते है कि यह कर्म सत्स्वरूप जगत्, जब कार्य का रूप धारण करता है, तो यह उसके अव्यवहित पूर्व क्षण में बन्धु बान्धवो की तरह सहायक रूप में विद्यमान रहता है । इस प्रकार इस सूक्त के पूर्व मन्त्रों में अविद्या, काम और कर्म को सृष्टि का कारण बताया गया है । अब पाँचवें मन्त्र से यह बताया जाता है कि ये कारण अपने कार्य की उत्पत्ति में किस तरह से शीघ्रता करते है । 'नासदासीत्' इत्यादि मन्त्रों में अविद्या का प्रतिपादन हुआ है । 'कामस्तदग्रे' से काम का और ' मनसो रेत.' से कर्म का प्रतिपादन किया गया है । ये अविद्या, काम और कर्म जब प्रपंच की सृष्टि के लिये उन्मुख होते हैं, तब इनकी किरणों के रूप में कार्य जगत् चारो ओर उसी तरह फैल जाता है, जैसे कि सूर्य के निकलने पर उसकी किरणें क्षण मात्र में चारो ओर फैल जाती है । मन्त्र मे प्लुतत्व, उदात्तत्व आदि का विधान वैदिक व्याकरण के नियमों के अनुसार होता है । 'स्वित्' शब्द वितर्क ( संभावना ) अर्थ में प्रयुक्त है । इसका अभिप्राय यह है कि यह जो अविद्या आदि कारणों की किरणों के रूप में कार्य वर्ग फैला, वह पहले तिरछा अर्थात् मध्यभाग में फैला, नोचे फैला या ऊपर की ओर फैला1? इसकी सभावना इसलिये नहीं की जा सकती कि यह सब बड़ी शीघ्रता में संपन्न हो गया । 'आत्मा से आकाश पैदा हुआ, आकाश से वायु' इत्यादि मन्त्रो में स्थित पंचमी विभक्ति के आधार पर और 'तब उद्गाता को उसके बाद होता को इस श्रुति की पद्धति से भी
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१२२८ बंदार्थपारिजातः उद्गातारं ततो होतारमितिवत् क्रमप्रतिपत्तो सत्यामपि विद्युत्प्रकाशवत् सर्गस्य शीघ्रव्यापनेन तस्य क्रमस्य दुर्लक्ष्यत्वात् त्रिषु स्थानेषूपर्यधोमध्यस्थानेषु प्राथम्यं कुत्रेति न निर्धारयितुं शक्यते । एवं नाम शीघ्र सर्वतो दिक्षु सर्गे निष्पन्नः । तदेव विभज्यते । सृष्टेषु कार्येषु मध्ये केचिद् भावा रेतोधा: बीजभूतस्य कर्मणो विधातारः कर्तारो भोक्तारश्च जीवा आसन् । अन्ये भावा महिमानः, स्वार्थिक इमनिच्, महान्तो वियदादयो भोग्या आसन् । एव मायासहितः परमेश्वरः सर्वं जगत् सृष्ट्वा स्वयं चानुप्रविश्य भोक्तृभोग्यादिरूपेण विभागं कृतवान् । 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' ( तै० आ ० ८।६ ) इति श्रुते । तत्र च भोक्तृभोग्ययोर्मध्ये स्वधा अन्न भोग्यप्रपञ्चः, अवस्तात् अवरो निकृष्ट आसीत् । प्रयतिः ' प्रयतिता भोक्ता परस्तात् पर उत्कृष्ट आसीत् । ईश्वरा भोग्यप्रपञ्च भोक्तृप्रपञ्च च कृतवानित्यर्थ । विभाषा परावराभ्याम्' ( पा ० सू० ५।३।२ ९ ) इति प्रथमार्थेऽस्तातिः । 'अस्ताति च' ( पा ० सू० ५।३।४० ) इत्यवरशब्दस्या- वादेशः । अवस्ता दिति सहितायाम् अक्षादित्वात् प्रकृतिभावः । एषामविद्याकामकर्मणां रश्मितुल्यः कार्यवर्गः सूर्योदयानन्तरं रश्मिरिव विततो युगपदेव सर्वत्र विस्तृतः, तथा च प्रथमत तिरश्चीनः तिर्यगवस्थितः मध्ये स्थित आसोत् । स्वित् आहोस्वित् अधस्तात् आसीत् । अथोपरिष्टात् स्थित आसीद् इति वितर्क्यते । आकाशादिसृष्टी क्रमप्रतिपत्तावपि शैघ्रचातिशयाद् विद्युत्प्रकाशवत् क्रमस्य दुर्लक्ष्यत्वात् प्राथम्यं क्वेति विचार्यते । तत्र सृष्टेषु कार्येषु रेतोधा बीजभूतस्य कर्मणो धातारः कर्तारो जीवा आसन् । अन्ये महिमानो महान्त आकाशादयश्चासन् । एवं परमेश्वरो भोक्तृभोग्यादिरूपेण प्रपञ्चं निर्माय तदनुप्रविश्य भोक्तृभोग्यादिरूपेण विभाग कृतवान् । तयोश्च स्वधा अन्नं भोग्यजातम् अवस्तात् निकृष्ट प्रयतिः प्रयतिता भोक्ता परस्तात् पर उत्कृष्टः । उभयोर्भोक्तृभोग्यभावेन शेषशेषिभावेन शेषिणो भोक्तुरुत्कर्ष:, शेषस्य भोग्यस्यापकर्षः । अत्र ऊर्ध्वमूलमधःशाखमित्यत्र कारणत्वाद् ब्यापकत्वात् सूक्ष्मत्वात् स्वच्छत्वात् परमात्मन उत्कृष्टत्वाद् ऊर्ध्वत्वम् । कार्यत्वाद् व्याप्यत्वात् स्थूलत्वा- इस सृष्टि प्रक्रिया में यद्यपि क्रम की सत्ता विद्यमान है, तो भी बिजली के प्रकाश की भाँति यह सारा जगत् एक क्षण में ही चारों तरफ चमक उठता है, अतः उसका यह क्रम हम नही देख पाते कि मध्य, नीचे और ऊपर स्थित तीनो स्थानों में से किसमें पहले यह सृष्टि होती है । इस तरह से पलक झपते ही यह सारी सृष्टि सभी दिशाओ मे व्याप्त हो गई । अब उसी को अलग करके समझाते हैं — इन सृष्ट पदार्थों में से कुछ भाव बीजभूत कर्म के विधाता, कर्ता और भोक्ता जीव थे । अन्य भाव आकाशादि महान् आकार के के होते हुए भी भोग्य कहलाते है । ' महिमानः' इस पद मे स्वार्थ में इमनिच् प्रत्यय होता है । इस तरह से माया की सहायता से परमेश्वर सारे जगत् की रचना कर स्वयं उसमें प्रविष्ट हो जाता है और इस तरह से अपने ही भोक्ता और भोग्य का भी रूप धारण कर लेता है । ' तत्सृष्ट्वा' इत्यादि श्रुतिवचन इसमें प्राण हैं । भोक्ता और भोग्य मे स्वधा, अन्न अर्थात् भोग्यप्रपंच निम्न कोटि को सृष्टि थी और प्रयति अर्थात् प्रयत्न करने वाला भोक्ता उत्कृष्ट सृष्टि मे परिगणित होता है । इन दोनो की सृष्टि ईश्वर ने ही की है । 'विभाषा' इत्यादि पाणिनि सूत्र में प्रथमा विभक्ति के अर्थ मे अस्ताति प्रत्यय होता है । ' अस्ताति च' इस सूत्र से अवर शब्द का अव आदेश हो जायगा । 'अवस्तात्' यहां संहिता में अक्षादिगण में पठित होने से प्रकृतिभाव होगा । इन अविद्या, काम और कर्म की किरणों के तुल्य यह कार्य वर्ग सूर्योदय के बाद उसकी किरणों की तरह एक साथ चारों तरफ व्याप्त हो जाता है । पहले इसकी स्थिति मध्य भाग में रहती हैं अथवा नीचे के हिस्से मे भी, या यह ऊपर की ओर विद्यमान था, ऐसा तर्क-वितर्क उठता है । आकाश आदि की सृष्टि मे यद्यपि क्रम का प्रतिपादन मिलता है, किन्तु बिजली की चमक के समान यह चराचर सारा जगत् एकाएक प्रकाशित हो जाता है, अतः इसमें क्रम को समझ पाना कठिन है । पहले सृष्टि कहा हुई, यह बात समझ में नहीं आती । इसी संबन्ध में यहा शका उठती है । इस सृष्टि में बीजभूत कर्म के धारक जीव है और महान् आकाशादि पदार्थ हैं । इस तरह से परमेश्वर भोक्ता और भोग्य के रूप में इस प्रपंच का निर्माण कर स्वयं उसमें प्रविष्ट हो अपना ही भोक्ता और भोग्य के रूप में विभाग करता है । इसमें स्वधा, अन्त अर्थात् भोग्य वस्तु निकृष्ट कोटि की है और प्रयति भोक्ता उत्कृष्ट है । इन दोनो का परस्पर भोक्तृ- ' ' भोग्यभाव अथात् शेषशेषिभाव है और इसीलिये शेषी भोक्ता प्रधान है एवं शेष अर्थात् भोग्य अप्रधान । यहा ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् इस
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वेदार्थपारिजातः १२२६ दस्वच्छत्वाद् महदादिकार्याणामपकृष्टत्वादधःपदवाच्यता, तथैव प्रकृतेऽपि भोग्यत्वात् अन्नापरपर्यायस्य स्वधापदः वाच्यस्य भोग्यस्य शेषत्वादवरत्वम् । रेतोधातुः कर्मकर्तुर्भोक्तुर्जीवस्य शेषित्वात् परत्वमुत्कृष्टत्वमुक्तम् । 'को अद्धा वेद क इह प्र वोचत् कुत आजाता कुत इय विसृष्टिः । अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाऽथा को वेद यत आ बभूव ॥ ' (ऋ० सं० १० / १२ ९ / ६ ) । एव भोक्तृभोग्यरूपेण सृष्टिः संग्रहेणोक्ता । 'एतावद्वा इद सर्वमन्नं |: ' ( | | ) चंवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नाद श० ब्रा ० १४१४ २ १३ इतिवत् । अथेदानी सा सृष्टिदुर्विज्ञानेति न विस्तरेणाभिहितेत्याह -को अद्धेति । कः पुरुषः, अद्धा पारमार्थ्येत वेद जानाति? क इह अस्मिल्लोके प्रवोचत् प्रब्रूयात्, इयं दृश्यमाना विसृष्टिः विविधा भूतभौतिकभोक्तृभोग्यादिरूपेण बहुप्रकारा सृष्टिः कुतः कारणादुपादानात् कुतः कस्माच्च निमित्तकारणाद् आ जाता समन्तात् प्रादुर्भूता? एतदुभय सम्यक् को वेद? को वा विस्तरेण वक्तु शक्नुयाद इत्यर्थः । ननु देवाः सर्वज्ञास्ते ज्ञास्यन्ति वक्तुं च शक्नुवन्तीत्यत आह- अर्वाग्देवा, देवाश्चास्य जगतो विसर्जनेन वियदादिभूतोत्पत्त्यनन्तरं यद्विविधं सर्जन सृष्टि, तेन अर्वाग् अर्वाचीनाः कृताः भूतसृष्टेः पश्चाज्जाता इत्यर्थः । तथाविधास्ते स्वोत्पत्तेः प्राक्कालीना सृष्टि कथ जानीयुः? अजानन्तो वा कथं प्रब्रूयुः । उक्तं दुर्वितर्यत्व निगमयति-अथ एवं सति देवा अपि न जानन्ति किल तद्व्यतिरिक्तः को नाम मनुष्यादिः, वेद तज्जगत्कारण जानाति, यत कारणात् कृत्स्नं जगद् आबभूव अजायत । न कोऽपि तज्जगत्कारणं वेदेत्यर्थः । इयं दृश्यमाना विसृष्टि: बहुप्रकारा भूतभौतिकभोक्तृभोग्यादिरूपा सृष्टिः कस्माद् उपादानात् कारणात कस्माच्च निमित्तकारणाज्जायते, एतदुभय सम्यक् को वेद? कश्च विस्तरेणं वक्तु शक्नुयात्? अस्य जगतो विसर्जनेन वियदादिभूतसृष्टयनन्तरं विविध भौतिक सर्जन सृष्टिस्तेन तेषां भौतिकत्वात् तेऽप्यर्वाचीनाः कृताः, भूतसृष्टेः पश्चाज्जाताः । गीता वचन के अनुसार कारण, व्यापक, सूक्ष्म होने से परमात्मा उत्कृष्ट अर्थात् ऊर्ध्वस्थानीय है, और कार्य, व्याप्य, स्थूल, अस्वच्छ होने से महदादि कार्य अपकृष्ट अर्थात् अवःस्थानीय है । इसी पद्धति से प्रकृत में भी भोग्य होने से अन्न शब्द के पर्यायवाची स्वधा पद के वाच्य भोग्य पदार्थं शेष होने से अवर ( अपकृष्ट ) तथा रेत ( वीर्य ) का आधायक, कर्म का कर्ता, भोक्ता जीव शेषी होने से उत्कृष्ट कहलाता है । इस तरह से भोक्ता ओर भोग्य के रूप में संक्षेप मे सृष्टि का प्रतिपादन किया गया, जैसा कि ' अन्न और अन्नाद इन दो में ही सबका समावेश हो जाता है । इनमें अन्न सोम और अन्नाद अग्नि है ' इस शतपथ श्रुति में सक्षेप में सृष्टि का वर्णन मिलता है । अब श्रुति यह बनलाती है कि इस सृष्टि को जान पाना कठिन है, इसी लिये इसका विस्तार से वर्णन नही किया जा सकता । इस विषय के प्रतिपादक छठे मन्त्र का अर्थ यह है— कौन पुरुष इसको वास्तविक रूप में जान सकता है? इस लोक मे इस विषय को कौन बता सकता है कि यह दिखाई पडने वाली विविध भूत-भौतिक, भोग्य-भोक्ता मादि आकार वाली सृष्टि किस उपादानकारण से और किस निमित्तकारण से पैदा हुई है? इन दोनो बातो को भलीभांति कौन जान सकता है? अथवा कौन इसको विस्तार से समझा सकता है? देवगण तो सर्वज्ञ है, वे इसको जान जायगे और समझा भी सकेंगे, किन्तु ऐसी बात है नही, क्योंकि देवगण तो बाद में हुए हैं, अर्थात् जगत् की जब विविध प्रकार से सृष्टि हुई, तब आकाश प्रभृति पंच महाभूतो की उत्पत्ति के बाद जो सृष्टि हुई उसमे उनकी गणना की जाती है । इस लिये देवगण अर्वाचीन है, अर्थात् भूत सृष्टि के बाद पैदा हुए है । जब ये बाद में पैदा हुए तो अपनी उत्पत्ति से पहले विद्यमान सृष्टि को कैसे जान सकते है? और जब जान नही सकते तो उसका उपदेश भी कैसे कर सकते है? इसी बात को पुनः सुदृढ़ करते हैं कि जब देवगण इसको नही जान पाते तो मनुष्य प्रभृति की यह सामर्थ्य कहीं है कि वे उस जगत् के कारण को जान सके, जिससे कि यह सारा जगत् पैदा हुआ है । अर्थात् इस कारण को कोई भी नही जान सकता । इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि यह परिदृश्यमान नाना प्रकार की भूत-भौतिक, भोक्ता भोग्य रूप वाली सृष्टि किस उपादान कारण से पैदा होती है, इन दोनो कारणो को कोई नही जान सकता और न कोई इस बात को समझा ही सकता है । इस जगत् में पहले आकाश प्रभृति पंच महाभूतों की उत्पत्ति होती है । उसके बाद देवगण प्रभृति विविध जीवों की सृष्टि होती है । अतः देवगण भी पंच महाभूत से उत्पन्न होने से अर्वाचीन सृष्टि के हो अंग हैं । वे उस प्राचीन सृष्टि को नही जान पाते ।
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वेदार्थपारिजात ) १२३० अतो विशिष्टा सर्वज्ञकल्पा अपि देवा: स्वोत्पत्तेः प्राक्कालीनां सृष्टि कथं जानीयुः? अजानन्तश्च कथं ब्रूयुः? अतो देवा अपि न जानन्ति यदा तदा तद्भिन्नः क मनुष्यादिः, यतः कृत्स्न जगत् आबभूव तज्जगत्कारणं वेद जानाति, न कोऽपि वेदेत्यर्थः । 'इयं विसृष्टियंत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न । वो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन् सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ||' (ऋ ० स ० १० / १२ ९/ ७ ) । उक्तप्रकारेण यथेदं सर्जन दुविज्ञानमेव सृष्ट जगत् दुर्धरमपीत्याह - यत उपादा- नात् परमात्मन इयं विसृष्टि विविधा गिरिनदीसमुद्रादिरूपेण विचित्रा सृष्टिः, आबभूव आजाता सोऽपि किल यदि वा दधे धारयति यदि वा न धारयति एवं को नाम अन्यो धर्तुं शक्नुयात्, यदि धारयेदीश्वर एव धारयेन्नान्यः । एतेन कार्यस्य धारयितृत्वप्रतिपादनेन परमात्मन उपादानकारणत्वमुक्तं भवति, निमित्तमात्रस्य कुलालस्येव धारयितृत्वा- सम्भवात् । 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्' ( ब्र ० सू० १।४।२३ ) इति बादरायणेन ब्रह्मण: प्रकृतित्वस्यापि प्रतिपादनेनाभिन्ननिमित्तोपादानत्वमुक्तम् । यद्वानेनार्धर्चेन पूर्वोक्त' सृष्टेर्दुविज्ञानत्वमेव द्रढयति, को वेदेत्यनुवर्तते, इयं विविधा सृष्टियंत आबभूव इति को वेद, न कोऽपीत्यर्थः । ननु नास्त्येव जगतो जन्म 'न कदाचिदनीदश जगत्' इति बहवो वदन्ति इति चेन्न, प्रकृते जनिकर्तुरेव दुर्ज्ञानत्वप्रतिपादनात् । 'जनिकर्तुः प्रकृतिः' ( पा ० सू० १ | ४ | ३० ) इत्यपादानसंज्ञायां पञ्चम्यास्तसिल । यस्मात्परमात्मन उपादानभूतात् सर्व जगद् आबभूव तं परमात्मानं को वेद, न कोऽपीत्यर्थः । प्रकृतितः परमाणुभ्यो वा जगज्जन्मेति बहवो भ्रान्ताः । तथा स एवोपादानभूतः परमात्मा स्वयमेव निमित्तभूतोऽपि । स यदि दधे विदधे इदं जगत्ससर्ज यदि वा न ससर्ज असन्दिग्धे सन्दिग्धवचनमेतत्, 'यदि वेदाः प्रमाणं स्युः' इतिवत् । स एव विदघे त को वेद । अजानन्तो- देवगण भले ही विशिष्ट कोटि के सर्वदा परमात्मा के सदृश जीव हो, किन्तु वे अपनी उत्पत्ति से पहले की सृष्टि को कैसे जान सकते हैं? और जब जान नही सकते तो वे इस बात को दूसरो को कैसे समझा सकते हैं । इस तरह से जब देवता भी इसको नही जान पाते तो उनसे भिन्न निम्न स्तर के मनुष्य उस बात को कैसे जान सकते हैं, जिससे कि यह सारा जगत् पैदा हुआ है । इस प्रकार इस जगत् के कारण को कौन जान सकता है? कोई भी नही । जिस तरह से इस सृष्टि को जान पाना कठिन है, उसी तरह से इस जगत् को धारण कर पाना भी कठिन है, इस बात को इस सूक्त के सातवें अन्तिम मन्त्र मे बताया गया है । जिस उपादान कारण परमात्मा से यह सृष्टि पैदा हुई, पहाड- नदी समुद्र आदि विचित्र रूपो में फैली, वह परमात्मा भी इसको धारण करने में समर्थ है या नहीं? उस परमात्मा के सिवाय इसको दूसरा कौन धारण कर सकता है? यदि कोई धारण कर सकता है तो वह ईश्वर के सिवाय और कोई नही हो सकता । यहाँ कार्य जगत् का धारक परमात्मा को माना गया है, इसलिये वही इस जगत् का उपादानकारण सिद्ध होता है, क्योकि यदि वह कुम्हार की भाँति केवल निमित्त- कारण हो तो वह उसका आधार नही हो सकता । बादरायण ने ' प्रकृतिश्च० ' इत्यादि सूत्र में ब्रह्म को प्रकृति भी माना है । इस तरह से उसमें उपादानकारणता और निमित्तकारणता अभिन्न रूप से प्रतिपादित है । अथवा इस आधी ऋचा का यह भी अर्थ किया जा सकता है कि इससे पूर्वोक्त सृष्टि की दुर्ज्ञेयता को ही दृढ किया जाता है । 'को वेद' पद की अनुवृत्ति कर यह विविध सृष्टि कहाँ से पैदा हुई, यह कौन जानता है? कोई भी नही । प्रश्न उठाया जाता है कि इस जगत् की उत्पत्ति कभी नही होती । बहुत लोग इस बात को मानते हैं कि यह जगत् कभी इससे मिन्न रूप में विद्यमान नहीं था । किन्तु यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि यहाँ जगत् की उत्पत्ति के कर्ता की ही दुर्ज्ञेयता बताई गई है । 'जनिकर्तुः प्रकृति: ' इस पाणिन सूत्र के अनुसार अपादान संज्ञा होने पर यहाँ पंचमी विभक्ति का बोधक तसिल् प्रत्यय विहित है । जिस उपादानभूत परमात्मा से यह सारा जगत् पैदा हुआ, उसको कौन जानता है? कोई भी नही । प्रकृति से अथवा परमाणु से जगत् की उत्पत्ति होती है, ऐसा बहुत लोगों का भ्रम है । परमात्मा ही जगत् का उपादानकारण भी है और वह स्वयं निमित्तकारण भी है । उस परमात्मा ने इस जगत् को बनाया है या नहीं बनाया है? इस तरह से श्रुति असंदिग्ध वस्तु के प्रति भी शंका, ' ' ने ही यह सब कुछयह बात उसी तरह की है जैसा कि यदि वेद प्रमाण है इस वाक्य से ध्वनित होता है । वस्तुतः उस परमात्मा उठाती है ।