वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 331–340

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 331 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १२३१ ऽपि बहवो जडात् प्रधानाज्जगज्जातमिति वदन्ति बहवश्चाकर्तृकमेवेदं जगत् स्वयमजायतेति विपरीतं प्रतिपन्नाः । विदधतो विधानमजानन्तोऽपि विप्रतिपद्यन्ते । स एवोपादानभूत इत्यपि को वेद, न कोऽपीत्यर्थः । उपादानादम्यस्तटस्थ एवेश्वरो विदधे इत्यप्यन्ये वदन्ति । देवा अपि यत्र जानन्ति ततोऽप्यर्वाचीनानामेषा तत्परिज्ञाने कव कथा? यद्येव जगत्सृष्टिरत्यन्तमेव दुरवबोधा स्यात्, तदा न प्रमाणपद्धतिमध्यास्त इत्याशङ्कय तत्सद्भावे ईश्वर- मेव प्रमाणयति - योऽस्याध्यक्ष इति । ईश्वरः परमे उत्कृष्टे सत्यभूते व्योमन् व्योम्न्याकाशे आकाशवन्निर्मले स्वप्रकाशे, यद्वा विपूर्वात् तर्पणार्थादवते: ' अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ' ( पा० सू० ३।२।७५ ) इति मनिन्प्रत्यये ' नेड्वशि कृति' (पा० सू० ७ २८ ) इतीनिषेधे 'ज्वरत्वर' ( पा० सू० ६ | ४ | २० ) इत्यादिना वकारोपधयोरूठि सप्तम्या लुकि च व्योमन्निति । तथा च व्योमनि विशेषेण तृप्ते निरतिशयानन्दस्वरूप इत्यर्थः । यद्वा गत्यर्थादवते., व्योमनि विशेषेण गते व्याप्ते देश- कालवस्तुभिरपरिच्छिन्ने, ज्ञानार्थाद्वावते, विशेषेण ज्ञातरि विशिष्टज्ञानात्मनि ईदृशे स्वात्मनि प्रतिष्ठितः, 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि' ( छा० उ० ७।२४।१ ) इति श्रुत्यन्तरात् । ईदृशो यः परमेश्वर सांऽङ्ग वेद । अङ्गेति सम्बोधने प्रसिद्धौ च । सोऽपि नाम वद जानाति यदि वा न वेद न जानाति, को नामाऽन्यो जानीयात् । सर्वज्ञ ईश्वर एव तां सृष्टि जानीयाद् नान्य इत्यर्थः । यथा -'वय ब्राह्मणा वा अब्राह्मणा वा इत्यत्र न सशयप्रतिपादनम्, ब्राह्मणानिश्चये कर्मण्यनधिकारप्रसङ्गात्, किन्तु प्रवरानुमन्त्रणमन्त्रेण ब्राह्मण्यप्राप्तिप्रशंसायामेव तात्पर्यम्, यथा वा 'को हि तद्वेद यद्यमुष्मिल्लोके अस्ति वा न वा' ( तै ० स ० ६ | १ | १ | १ ) इत्यत्र न परलोकसंशय. प्रतिपिपादयिषितः, बनाया है, इसको कौन जानता है? न जानते हुए भी बहुत से व्यक्ति जड़ प्रधान से जगत् की उत्पत्ति मानते हैं और इसके विपरीत बहुत से यह मानते है कि यह जगत् अपने आप पैदा हो गया है, इसका कोई कर्ता नही है । जगत्स्रष्टा के विधान को न जानते हुए भी ये विवाद खड़ा कर देते हैं । यह परमात्मा ही उपादानकारण है इसको भी कौन जानता है? कोई भी नही । कुछ लोगों का कहना है कि परमात्मा उपादानकारण नही है, किन्तु संसार की रचना में वह तटस्थ है । देवता भी जिसके संबन्ध में कुछ नही जानते, तब उसमे बाद में पैदा हुए मनुष्य उसको जान पावेंगे, इसकी कोई संभावना ही नही हो सकती । शंका उठती है कि यदि जगत् की यह सृष्टि इस तरह से अत्यन्त दुरवबोध, है तो उसको फिर किसी भी प्रमाण से जान पाना कठिन है? इसका समाधान स्वयं श्रुति ही ' योsस्याध्यक्षः' इत्यादि से देती है कि इस सृष्टि के रहस्य को ईश्वर ही जान सकता है । ईश्वर परम सत्यस्वरूप आकाश के समान निर्मल स्वप्रकाश में स्थित होकर इस सृष्टि के रहस्य को जानता रहता है । विपूर्वक तर्पणार्थक अव घातु से मनिन् प्रत्यय होने पर, इट् का निषेध होने पर, ऊठ एवं सप्तमी का लुक होने पर 'व्योमन्' पद बनता है । इसका अर्थ होगा विशेष रूप से तृप्त, निरतिशय आनन्दस्वरूप । गत्यर्थक अव् धातु से इसी प्रक्रिया से व्योमन् पद बनाने पर उसका अर्थ होगा आकाश में विशेष रूप से व्याप्त अर्थात् देश, काल और वस्तु से अपरिच्छित । ज्ञानार्थक मन् धातु से व्योमन् पद बनाने पर उसका विशेष रूप से ज्ञानात्मक स्वात्मा मे प्रतिष्ठित, अर्थ होता है । 'हे भगवन् वह किसमें प्रतिष्ठित है? अपनी महिमा में' इस तरह प्रश्न-प्रतिवचनात्मक छान्दोग्य श्रुति में इसी अर्थ का प्रतिपादन हुआ है । ऊपर बताये स्वरूप वाला ईश्वर भी भला उसको जानता है नही, कुछ कहा नही जा सकता । अंग शब्द संबोधन और प्रसिद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है । जब परमेश्वर की यह स्थिति है, तो फिर उस रहस्य को दूसरा कोई कैसे जान सकता है? इसका अभिप्राय यह है कि सर्वज्ञ ईश्वर ही उस सृष्टि को जान सकता है, दूसरा कोई नही । जैसे ' हम ब्राह्मण हैं या अब्राह्मण' इस वाक्य का संशय उपस्थित करने मे तात्पर्य नही है, क्योंकि ऐसा होने पर कर्म में अधिकार ही नहीं रह जायगा, किन्तु प्रवरानुमन्त्रण मन्त्र से जो ब्राह्मण्य की प्राप्ति होती है, उसकी प्रशंसा में उक्त वाक्य का तात्पर्य माना जाता है । इसी तरह से ' यह कौन जानता है कि परलोक कुछ है भी या नहीं इस वाक्य का परलोक में संशय पैदा करने में तात्पर्य नही है, क्योंकि इस स्थिति में अतीकाश प्रभृति का विधान व्यर्थ हो जायगा, किन्तु अतीकाश के विधायक अर्थवाद से उसकी प्रशंसा में ही तात्पर्य है । अतीकाश का विधान न करने पर घूम के उपद्रव से यही मृत्यु हो सकती हैं, उस परिस्थिति में परलोक की ?,, 1स्थिति कहां रह जायगी इस लिये इस विषम परिस्थिति का जिनसे कि परलोक की स्थिति ही संशय में ही पड़ जाती है परिहार

पृष्ठ 332

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 332 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १२३२ तथात्वेऽतीकाशादिविधानवैयर्थ्यापातात् । किन्तु 'दिवतीकाशान् करोति' ( तै ० स ० ६ | १ | १ | १ ) इत्यतीकाशविधा- नाथंवादेन तत्प्रशंसनमेव, अतीकाशाभावे घूमोपद्रवेणे हैव मरण सम्भाव्यते, परलोककथा को वेद, अतस्तत्परिहारार्थ- मतीकाशानवश्यं कुर्यादित्यर्थः तथैव प्रकृते सृष्टे परमात्मनश्च दुर्ज्ञानत्वबोधनायैव वेदनावेदनविकल्पोपन्यासः, वस्तु- तम् ज्ञाने विकल्पासम्भवात् । 'य: सर्वज्ञः सर्ववित्' ( मुण्डकोप ० १1१1 ९ ) इति श्रुत्या परमात्मनः सामान्यविशेषाभ्यां सर्वज्ञत्वं सर्ववित्त्वं चोक्तम् । स एव विविधर्वचित्र्योपेतामनन्तानन्तब्रह्माण्डतद्भोक्तृतत्कर्मादिविशिष्टा सृष्टि वेद नाम्ये प्रकृतिपरमाण्वादयो देवादिजीवा वा, जडत्वादसर्वज्ञत्वाच्च । विश्वविधातारं परमात्मान तु सर्वद्रष्टृरूपत्वाद्, नान्यो जानाति, द्रष्टृद् ष्ट्यविषयत्वात् । प्रत्यक्चैतन्याभिन्नत्वेन स्वात्मरूपेणैव तज्ज्ञानम्, तटस्थस्यापरोक्षत्वासम्भवात् । मनोवचनातोतत्वाद्वा दुर्ज्ञानत्वम्, ' यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' ( तै ० उ० २।४।१ ) इति श्रुतेः । लक्षणया वृत्तिव्याप्त्या ज्ञेयत्वेऽप्यभिधया फलव्याप्त्याऽव्याप्यत्वाच्च दुर्ज्ञानत्वम् । 'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवी द्यामुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ' (ऋ ० सं ० १० १२१ | १ ) | यत्त्वस्य मन्त्रस्य व्याख्यायामुक्तम्- ' अग्रे सृष्टेः प्राग् हिरण्यगर्भः परमेश्वरो जातस्योत्पन्नस्य जगतो एकोऽद्वितीयः पतिरेव समवर्तत । स पृथिवीमारभ्य द्युपर्यन्तं सकलं जगद् रचयित्वा दाधार धारितवान् । तस्मै सुखस्वरूपाय देवाय हविषा वयं विधेम' इति, तदपि मन्दम्, अस्पष्टार्थत्वात् तथाहि -हिरण्यगर्भः परमेश्वर इत्यत्र किं बीजम्? हविषा कि विधेमेत्यपि सापेक्षमेव । जात इत्यस्य च कारणेश्वरपक्षे कथमुपपत्तिरिति चिन्त्यम् । -, सायणसम्मतस्त्वयमर्थोऽस्य मन्त्रस्य हिरण्यगर्भो हिरण्मयाण्डस्य गर्भभूतः प्रजापतिहिरण्यगर्भः 'प्रजापतिर्वे हिरण्यगर्भः प्रजापतेरनुरूपत्वाय' (तै ० स० ५।५।१।२ ) इति श्रुतेः । यद्वा हिरण्मयोऽण्डो गर्भवद् यस्योदरे करने के लिये दिशाओ में अतीकाश का विधान अवश्य करना चाहिये, यही इस वाक्य का तात्पर्य निकलता है । उसी भाति प्रकृत मे भी सृष्टि और परमात्मा इन दोनों के रहस्य को समझ पाना कठित है, इसी बात को सूचित करने लिये यहा 'जानता है, नही जानता' इस विकल्प को रखा गया है । ज्ञान की सत्ता वस्तु के अधीन है, इसमे कोई विकल्प नही उठ सकता । 'यः सर्वज्ञः' इत्यादि मुण्डक श्रति परमात्मा को सामान्यतः और विशेष रूप में भी सर्वज्ञ और सर्ववित् मानती है । वही विविध विचित्रताओ से भरे अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड, उनके भोक्ता और उन भोक्ताओं के कर्मों से संचलित सृष्टि को जान सकता है, अन्य प्रकृति, परमाणु प्रभृति अथवा देव आदि नाना योनियों के जीव इसको नहीं जान सकते, क्योंकि वे जड है और असर्वज्ञ है । विश्व के विधाता परमात्मा को तो दूसरा कोई नही जान पाता, क्योंकि परमात्मा तो सबका द्रष्टा है, वह दृश्य कैसे बन सकता है । वह प्रत्यक चैतन्य से अभिन्न है, अतः उसको हम स्वात्म-स्वरूप में ही जान सकते है, क्योंकि यदि उसको तटस्थ माना जाय, तो उसका अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष) ज्ञान हो ही नही सकता । यह परमात्मा की सृष्टि मन और वचन से अतीत होने से भी दुर्ज्ञेय है । 'जहा से मन के साथ वाणी भी बिना उसको प्राप्त किये वापस लोट आती हैं' यह तैत्तिरीय श्रुति भी इसी बात का प्रतिपादन करती है । लक्षणा वृत्ति की व्याप्ति के आधार पर यद्यपि यह ज्ञेय हो सकता है, किन्तु फल की व्याप्तिके अभाव में अभिधा वृत्ति से इसका बोध नही हो सकता । 'हिरण्यगर्भः' इत्यादि मन्त्र का स्वामी दयानन्द ने यह अर्थ किया है- 'हिरण्यगर्भ जो परमेश्वर है, वही एक सृष्टि के पहिले वर्तमान था । वही इस सारे जगत् का स्वामी है और वही पृथिवी से लेकर सूर्य पर्यन्त सब जगत् को रच कर धारण कर रहा है, ' ( )उसो सुखस्वरूप परमेश्वर देव की हम लोग उपासना करें अन्य किसी की नहीं पृ ० १३२ । किन्तु यह व्याख्या भी । इसलिये,इस व्याख्या में कोई स्पष्ट अर्थ प्रतीत नही होता । जैसे कि हिरण्यगर्भ का अर्थ किस प्रमाण के आधार पर सही नही है क्योंकिसे क्या करें? यह सापेक्ष वाक्य है । ईश्वर को जगत् का कारण मानने पर वह उत्पन्न कैसे माना जा सकता परमेश्वर हो सकता है? हवि है, यह विचारणीय बात है । इस मन्त्र का सायणसंमत अर्थ यह है- सुवर्णमय अण्ड के गर्भ में विद्यमान प्रजापति हिरण्यगर्भ है उदर में रहता है, वह सूत्रात्मा'हिरण्यगर्भहिरण्यगर्भः यह तैत्तिरीय श्रुति इसमें प्रमाण है । अथवा सुवर्णमय अण्ड गर्भ के समान जिसके । प्रजापतिर्वै

पृष्ठ 333

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 333 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वदार्थपारिजातः १२३३ वर्तते सोऽसौ सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ • परमेश्वर एव समष्टिसूक्ष्मशरीरोपहितः । ( सामाजिकास्तु ईसायीमुस्लिमादिवत् परमेश्वरस्यावान्तररूपाणि नाभ्युपगच्छन्ति, तत एव हिरण्यगर्भोऽपि तन्मते मुख्य ईश्वर एव ) । अग्रे स्थूलप्रपञ्चोत्पत्तेः प्राक् समवर्तत । मायाध्यक्षात् कारणब्रह्मणः सकाशात् समजायत । यद्यपि परमात्मैव सोऽपि 1 तथापि तदुपाधिभूतानां वियदादीनां ब्रह्मण उत्पत्तेस्तदुपहितो हिरण्यगर्भोऽप्युत्पन्न इत्युच्यते । स च जातः जातमात्र एव । एक: अद्वितीयः सन् । भूतस्य विकारजातस्य ब्रह्माण्डादे. सर्वस्य जगत. पतिरीश्वर आसोत् । न केवलं राजादिवत् पतिरेव किन्तु पृथिवी विस्तीर्णा द्या दिवम् । उतापि इमामस्माभिर्दृश्यमाना पुरोवर्तिनी भमि दाधार धारयति । यद्वा पृथ्वीत्यन्त- रिक्षनाम । तथा चान्तरिक्ष दिव भूमि धारयति । 'छन्दसि लुललिट.' ( पा० सू० ३।४।६ ) इति सार्वकालिको लिट् । तुजादित्वादभ्यासदीर्घः । कस्मै किशब्दोऽनिर्ज्ञातस्वरूपत्वात् प्रजापतिवाचकः । यद्वा सृष्ट्यर्थं कामयत इति कः । कमेर्डः प्रत्ययः । यद्वा कं सुख तद्रूपत्वात् क इत्युच्यते । अथवा इन्द्रेण पृष्टः प्रजापतिर्मदीयं महत्त्वं तुभ्य प्रदायाह क कीदृश स्यामिति । स इन्द्रः प्रत्यूचे यदीदं ब्रवीम्यह कः स्यामिति तदेव त्वं भवेति । अतः कारणात् क इति प्रजापतिराख्यायते । 'इन्द्रो वै वृत्रं हत्वा सर्वा विजितीविजित्याऽब्रवीत्' ( ऐ ० ब्रा० ३।२१ ) इत्यादिब्राह्मणवचनात् । यदासी किंशब्दस्तदा सर्वनामत्वात् स्मैभावः । कर्मणा सरप्रदानत्वाच्चतुर्थी । कस्मै प्रजापतये देवाय दानादिगुणयुक्ताय हविषा प्राजापत्यस्य पशोर्वपारूपेणैककपालात्मकेन पुरोडाशेन वा विधेम वयमृत्विजः परिचरेम । विदधातिः परिचरणकर्मा । पुरुषसूक्त चोद्धृत्य व्याख्यातम् - सहस्रशीर्षेति (ऋ० स० १० / ९ ०1१ ) । अत्र मन्त्रे पुरुष इति विशेष्य- मस्ति सहस्रशीर्षेत्यादीनि विशेषणानि ॥ 'पुरुषं पुरिशय इत्याचक्षीरन्' ( नि० १।१३ ) पुरि संसारे सर्वमभिव्याप्य वर्तत इति पुरुष ईश्वरः, पुरुषः पुरिषादः पूरयतेर्वा पूरयत्यन्त रित्यान्त रपुरुषमभिप्रेत्य -' यस्मात्पर नापरमस्ति किञ्चित् कहलाता है । यह सूक्ष्म शरीर की समष्टि से उपहित परमेश्वर ही ( आर्यसमाजी ईसाईयो और मुसलमानो की भांति परमेश्वर के , ) अवान्तर साकार रूपो को नही मानते इसलिये उनके मत मे हिरण्यगर्भ मुख्य ईश्वर ही माना जाता है स्थूलप्रपच की उत्पत्ति से पहले विद्यमान था । यह हिरण्यगर्भ माया के स्वामी कारणब्रह्म से उत्पन्न हुआ था । यद्यपि यह भी परमात्मा ही है, तथापि इस सूत्रात्मा के उपाधिभूत आकाशादि की उत्पत्ति ब्रह्म से होती है, अतः इनसे उपहित हिरण्यगर्भ भी उत्पन्न हुआ माना जाता है । यह हिरण्यगर्भ उत्पन्न होने के साथ ही अकेला ही सारे विकारात्मक ब्रह्माण्ड का, सारे जगत् का स्वामी बन गया । राजा के समान यह केवल स्वामी ही नही था, किन्तु विस्तीर्ण पृथिवी को और आकाश को भी, जो कि हमारी आंखों के सामने फैले हुए है, धारण करता है, अथवा यह पृथ्वी शब्द अन्तरिक्ष के अर्थ में प्रयुक्त है । तब यह अर्थ होगा कि हिरण्यगर्भ अन्तरिक्ष, स्वर्ग और पृथिवी को धारण करता है । ' दाधार ' यहाँ वैदिक लिट् लकार सभी कामो के लिये प्रयुक्त है । तुजादि में पाठ होने से अभ्यास का दीर्घ हो जाता है । ' कस्मै' पद में कि शब्द अज्ञात स्वरूप वाले प्रजापति का वाचक है । अथवा 'कः' शब्द का अर्थ होगा सृष्टि के लिये कामना करने वाला । यहाँ क्रम् धातु से ड प्रत्यय होता है । अथवा 'क' शब्द सुख का वाचक है । सुखस्वरूप होने से प्रजापति 'कः' कहलाता है । अथवा इन्द्र के पूछने पर प्रजापति ने कहा कि यदि मैं तुम्हें अपनी सामर्थ्य दे दूँ तो मेरी स्थिति कैसी होगी? इस पर इन्द्र ने जबाब दिया कि यदि मैं कहूँ कि मैं कौन होऊँ, तभी तुम हो जाओ । इसीलिये प्रजापति को 'क ' कहा जाता है ।' ' इन्द्र ने वृत्र को मारकर सभी तरह की विजय प्राप्त कर कहा' इत्यादि ब्राह्मणवचन इसी की ओर इंगित करते हैं । जब इस कि शब्द का प्रयोग होता है, तो सर्वनाम होने से 'स्मै' आदेश हो जाता है । कर्म का संप्रदान होने से चतुर्थी विभक्ति होती है । क अर्थात् प्रजापति देव को दान प्रभृति गुणों से युक्त परमात्मा को हवि अर्थात् प्रजापति सम्बन्धी पशु की वपा अथवा एककपालात्मक पुरोडाश हम ऋत्विकगण प्रदान करते हैं, हवि प्रदान द्वारा हम प्रजापति को आराधना करते है । स्वामी दयानन्द ने इस पुरुषसूक्त को उद्धृत कर उसकी व्याख्या की है-'इस मन्त्र में पुरुष शब्द विशेष्य है और अन्य सहस्रशीर्षा प्रभूति सभी पद उसके विशेषण है । पुरुष उसको कहते है, जो कि इस जगत् में पूर्ण हो रहा है, अर्थात् जिसने अपनी व्यापकता से इस जगत् को पूर्ण कर रखा है । पुर कहते हैं ब्रह्माण्ड और शरीर को उसमें जो व्याप्त है और जो जीव के भीतर १५५

पृष्ठ 334

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 334 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १२३४ यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेद पूर्ण पुरिषेण सर्वम् ॥ ' इत्यपि निगमो भवति' ( नि० २।३ ) अत्र निरुक्ते श्वेताश्वतरोपनिषदः ( ३ ९ ), महानारायणोपनिषदश्च ( १०1४ ) वचनं निगमशब्दे- नोद्धृतम् । सामाजिकसम्मतवेदेषु नाय मन्त्र उपलभ्यते । पुरि सर्वस्मिन् संसारेऽभिव्याप्य सीदति वर्तत इति पूरयतेर्वा । यः स्वयं परमेश्वर इद सर्वं जगत् स्वरूपेण पूरयति व्याप्नोति, तस्मात् स पुरुषः । यो जीवस्यान्तर्मध्येऽभिव्याप्य पूरयति व्याप्नोति स पुरुषः, तमान्तरपुरुषमन्तर्यामिण परमेश्वरमभिप्रेत्येयमृक् प्रवृत्तास्ति । यस्मात्परं यस्मात्परमेश्वरात्पुरुषा- ख्यात् परमुत्कृष्टं किञ्चिदपि नास्त्येव पूर्वं यस्मादर्वाचीन तत्तुल्यमुत्तम किञ्चिदपि वस्तु नास्त्येव । तथा यस्मादणीयः सूक्ष्मं ज्यायः स्थूलं महद्वा किञ्चिदपि द्रव्य न भूत न भवति नैव च भविष्यतीत्यवधेयम् । स स्तब्धो निष्कम्पः सर्वस्या- स्थिरतां कुर्वन् सन् स्थिरो भवति । क इव वृक्ष इव । यथा वृक्ष. शाखापत्रपुष्पफलादिक धारयन् तिष्ठति, तथैव पृथिवीसूर्यादिकं सर्वं जगत् धारयन् परमेश्वरः अभिव्याप्य स्थितोऽस्ति । यश्चैकोऽद्वितीयः, नास्य कश्चित्सजातीयो विजातीयो वा द्वितीय ईश्वरोऽस्ति । तेन पुरिशयेन पुरुषेण परमात्मना यत इदं सर्वं जगत् पूर्ण कृतमस्ति, तस्मात्स पुरुषः परमेश्वर इत्युच्यते । इत्यय मन्त्रो निगमनं पर प्रमाणं भवतीति वेदितव्यम् । 'सर्वं वै सहस्र सर्वस्य दाता स्वाम्यादि, सर्वमिदं जगत् सहस्रनामकमस्ति । सहस्राण्यसंख्यातानि शिरासि यस्मिन् स सहस्रशीर्षा, अस्मदादीना सहस्राण्यक्षीणि यस्मिन्, एवमेव सहस्राण्यसंख्याताः पादा यस्मिन् वर्तन्ते स सहस्राक्षः सहस्रपात्, स पूरुषः, सर्वेभ्यो बाह्यान्तरदेशेभ्यः । भूमिरिति भूतानामुपलक्षणम् । भूमिमारभ्य प्रकृतिपर्यन्त सर्वं जगत् स्पृत्वाभिव्याप्य वर्तते । दशाङ्गुलमिति ब्रह्माण्डहृदययोरुपलक्षणम् । अङ्गलमित्यवयवोपलक्षणेन मितस्य जगताऽत्र ग्रहणं भवति । पञ्चस्थूलभूतानि पञ्चसूक्ष्मभूतानि मिलित्वा दशावयवाख्य सकल जगदस्ति । अन्यच्च पञ्च भी व्यापक अर्थात् अन्तर्यामी है, वही पुरुष परमेश्वर है । जैसा कि निरुक्त मे कहा गया है - ' पुरुष. पुरिषादः' इत्यादि । (निरुक्त में इस स्थल पर श्वेताश्वतरोपनिषद् और महानारायणोपनिषद् उद्धृत है । इनको यहाँ निगम का वचन माना गया है । आर्यसमाजियो की अभिप्रेत वैदिक संहिताओं में यह निगम वचन नही मिलता । ) इस निरुक्त वाक्य का अर्थ यह है— सारे ससार मे व्याप्त होकर रहने वाला पुरुष कहलाता है, अथवा यह स्वयं परमेश्वर अपने स्वरूप से सारे जगत् को व्याप्त किये हुए हैं, इसलिये पुरुष कहलाता है । जो जीवो के बीच में, हृदय में व्याप्त होकर रहता है और उनको पूर्ण करता रहता है, वह पुरुष है । इस अन्तर्यामी पुरुष का ही are इस श्रुति में किया गया है—जिस पुरुष नाम से प्रसिद्ध पूर्ण परमेश्वर से उत्तम कोई भी वस्तु नही है, अथवा जिसके पहले किसी की सत्ता नही है और जिससे अर्वाचीन उसके समान उत्तम भी कोई वस्तु नही है, तथा जिससे अधिक सूक्ष्म और स्थूल द्रव्य कोई बड़ा भौतिक पदार्थ भी नही है और न होगा, जो स्वयं निष्कम्प होकर सभी पदार्थों को अस्थिरता को करता हुआ स्थिर है, जैसे वृक्ष शाखा, पत्र, पुष्प आदि को धारण कर रहता है, उसी तरह से जो पृथिवी सूर्य प्रभूति सारे जगत् को धारण कर रहता है, वही परमेश्वर इस सारे जगत् में व्याप्त है । यह परमात्मा स्वयं एक अर्थात् अद्वितीय है, इसका कोई न तो सजातीय पदार्थ है और न विजातीय हो । अतः इसमें द्वैत किसी तरह नही आ सकता । इस ब्रह्माण्डरूपी शरीर में विश्राम करने से यह पुरुष, परमात्मा इस सारे जगत् को व्याप्त कर भास्कर रूप में विद्यमान है । इसलिये यह पुरुष परमात्मा ही है । यह मन्त्र ही इस विषय में है सर्वोत्कृष्ट प्रमाण है । 'सहस्र नाम है संपूर्ण जगत् का और असंख्यात का भी नाम है । जिसके बीच में सब जगत् के असंख्यात शिर, आँख और पैर ठहर रहे हैं, उसको सहस्रशीर्षा, सहस्राक्ष और सहस्रपात् कहते हैं, क्योकि वह अनन्त है । जैसे आकाश के बीच में सब पदार्थ रहते है और आकाश सबसे अलग रहता है, अर्थात् किसी के साथ बंधता नही है, उसी प्रकार परमेश्वर भी है । ( स भूमि सर्वतः स्पृत्वा ) यह पुरुष सब जगह से पूर्ण होकर पृथिवी को तथा सब लोगो को धारण कर रहा है । ( अत्यतिष्ठद्) दशांगुल शब्द ब्रह्माण्ड और हृदय का वाची है । अंगुलि शब्द अंग का अवयववाची है । [इसलिये अवयव के उपलक्षण से नपे हुए जगत् का यहां ग्रहण होता है] पांच स्थूल भूत और पांच सूक्ष्म ये दोनोंमिलकर जगत् केके दसदस अवयवअवयव होतेहोते हैं, तथा पाच प्राण, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ये चार अन्त.करण,

पृष्ठ 335

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 335 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वदार्थपारिजातः १२३५ प्राणाः, सेन्द्रियं चतुष्टयमन्त.करणम्, दशमो जीवश्च, एवमेवान्यदपि । जीवस्य हृदयं दशाङ्गलपरिमित च तृतीयं गृह्यते । एतत् त्रय स्पृत्वा व्याप्यातिष्ठत् । एतस्मात् त्रयाद्बहिरपि व्याप्त. सन्नवस्थित. । अर्थात् वहिरन्तश्च पूर्णो भूत्वा पस्मेश्वरोऽवतिष्ठते इति वेद्यम्' (पृ० १३२-१३३ ) । वस्तुतोऽत्र विनियोगानुसारेण सर्वमेधाङ्गभूत पुरुषसूक्तम् ॥ विनियोगानुसारेण तु मन्त्रव्याख्यानमुपरिष्टाद् द्रष्टव्यम् । पुरुषपदव्याख्यानं तु जीवपरमपि सम्भवत्येव, तस्यापि पुरि शयनात् । नैतावदेव, पूर्षु शेते इत्यनया रीत्या स्थूल सूक्ष्म-कारणाख्येषु त्रिषु पूर्षु शयनात्तस्य पुरुषाख्या सम्भवत्येव । नैयायिकादिदृष्ट्या व्यापकत्व चापि तस्य सम्भवत्येव, ततः स एव कुतो न गृह्यते? किञ्च, सामाजिकाना दृष्ट्या निमित्तकारणमेव परमेश्वरः, आत्मन्याकाशे निमित्तकारणे च व्यापकत्वं सम्भवतीति कुत ईश्वरस्यैव सहस्रशीर्ष- त्वादिकमुच्यते । यदोश्वरस्य सर्वव्यापकत्वेन तत्त्वं तर्हि जीवाकाशादीनां कुतो न तत् स्यात्? ' इमे वं लोका. पूरयमेव पुरुषो योऽयं पवते सोऽस्या पुरि शेते' ( श० १३।६।२।१ ) इति हिरण्यगर्भेऽपि पुरुषपदप्रयोगात् । सिद्धान्तत्वभिन्ननिमित्तो- पादानकत्वेन परमेश्वरस्य सर्वोपादानत्वात् सर्वमयत्वम् । न तु तन्निमित्तमात्रस्य सम्भवति । परमेश्वरस्यैव मायोपाधि-, कत्वेन कारणत्वमन्तर्यामित्वच समष्टिसूक्ष्मशरीरोपाधित्वेन हिरण्यगर्भत्व समष्टिस्थूलप्रपञ्चोपाधित्वेनानन्तशीर्ष-त्वादिभिर्विराट्पुरुषत्वमिति मदुक्त सायणादिसम्मत च व्याख्यान युक्तम् अत्र ' शीर्षश्छन्दसि' ( पा ० सू० ६ | १ | ६० ) इति शिरः शब्दस्य शोर्ष आदेशः । अत्र भूमिशब्दो भूमिमारभ्य ,, प्रकृतिपर्यन्तस्योपलक्षणमित्यप्यशुद्धम् तत्र मानाभावात् । किन्तु भमिपद पञ्चभूतोपलक्षक सम्भवति भूतत्वेन साजात्यात् । ततश्च पञ्चभूतानि व्याप्य, अथवा ब्रह्माण्डरूपां भूमि मायाभूमि वा स्पृत्वा व्याप्य, स्पृणोतेर्व्याप्तिकर्मत्वात् । अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् दशाङ्गुलमतिक्रम्यावस्थितः । दशवा जीव और शरीर में जो हृदयदेश है, वह भी दस अगुल के प्रमाण से लिया जाता है । जो इन तीनो में व्यापक होकर इनके चारो ओर भी परिपूर्ण हो रहा है, इससे वह पुरुष कहलाता है, क्योकि जो उक्त ( तीनो प्रकार के ) दशागुल स्थान का भी उल्लंघन करके सर्वत्र स्थिर है, वही सब जगत् का बनाने वाला है' (पृ० १३३ - १३४ ) । वस्तुतः विनियोग के अनुसार पुरुषसूक्त सर्वमेघ यज्ञ का अगभूत है । विनियोग प्रदर्शन पूर्वक इस सूक्त की व्याख्या आगे दी गई है । पुरुषपद की व्याख्या तो जीवपरक भी की जा सकती है, क्योंकि वह भी शरीर में विश्वाम करता है । इतना ही नही, किन्तु 'पुरो मे सोता है' इस व्युत्पत्ति के अनुसार स्थूल, सूक्ष्म और कारण नामक तीन पुरों ( शरीरो ) में विश्राम करने से इसका पुरुष नाम हो ही सकता है । नैयायिक प्रमृति को दृष्टि से यह जीवात्मा व्यापक भी है, तब उसी का यहा ग्रहण क्यो न किया जाय? दूसरी बात यह भी है कि आर्यसमाजियो की दृष्टि से परमेश्वर केवल निमित्तकारण है । आत्मा और आकाश मे भी निमित्तकारणता मानते पर व्यापकता भी मिल जायगी, तब फिर ईश्वर के ही कैसे हजार सिर आदि माने जा सकते है । यदि सर्वव्यापकता के आधार पर ईश्वर में ये माने जाते है, तो आत्मा और आकाश भी तो सर्वव्यापक हैं, इनमें ये क्यो न मानें जाय? ' इमे वै लोकाः' इत्यादि शतपथ श्रुति में हिरण्यगर्भ के लिये पुरुष पद प्रयुक्त है । हमारे मत में तो परमेश्वर निमित्त के साथ उपादान कारण भी है, अतः सबकी उपादान कारणता के आधार पर इसको सर्वमय माना जाता है । यह बात इसको केवल निमित्तकारण मानने पर नहीं बन सकती । मायोपाधिक परमेश्वर ही सबका कारण भी है और अन्तर्यामी भी है । सभी सूक्ष्म शरीरों की समष्टि को उपाधि मान कर यह हिरण्यगर्भ है और स्थूल प्रपंच की समष्टि को उपाधि मान कर यह अनन्त शिर, पैर वाला विराट पुरुष है । इस तरह की सायणसंमत व्याख्या हो इस मन्त्र की सही हो सकती है । यहां 'शिरश्छन्दसि' इस पाणिनि सूत्र से शिरस् शब्द का शीर्ष आदेश होता है । भूमि शब्द को भूमि से लेकर प्रकृति पर्यन्त तत्वों का बोधक मानना गलत बात है, क्योकि इनमें कोई प्रमाण नहीं है, किन्तु भूमि पद यहा केवल पंच महाभूतों का ही उपलक्षक माना गया है, क्योंकि भूतत्त्व इन सबमें विद्यमान है । तब यह अर्थ किया जा सकता है कि पांच महाभूतों को व्याप्त कर अथवा ब्रह्माण्ड रूप भूमि को अथवा मायाभूमि को व्याप्त कर । स्पृणोति धातु व्याप्ति के अर्थ है । ' अत्यतिष्ठद् दशागुलम्' इसका अर्थ है दस अगुल का

पृष्ठ 336

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 336 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वदार्थपारिजातः १२३६ यदुक्तम् - 'दशाङ्गुलमिति ब्रह्माण्डहृदययोरुपलक्षणम्' इति, तदपि चिन्त्यम्, निर्मूलत्वात् । नहि पञ्च- स्थूलपञ्चसूक्ष्मभूतान्येव जगत्, प्रकृतिमहदहङ्कारादीना ततो भिन्नत्वात् । प्राणादिष्वपि न प्रकृत्यादीनामन्तर्भावः । हृदयमपि न दशाङ्गुल भवति, तस्याङ्गुष्ठमात्रपरिमितत्वात् । किन्तु दशाङ्गुल ब्रह्माण्डाद् बहिर्देशस्योपलक्षणम्, ब्रह्माण्डाद् बहिरपि सर्वतो व्याप्यावस्थित इत्यर्थः । अत एव 'विकारावति च' ( ब्र ० सू० ४ | ४ | १ ९ ) इति बादरायणं सूत्रं प्रपञ्चाद् बहिर्ब्रह्मणो मुक्तोपसृप्य रूप दर्शयति । यद्वा नाभेः सकाशाद् दशाङ्गुलमतिक्रम्य हृदि स्थितः । ननु नाभित इति कुत उपलभ्यत इति चेन, ' कतम आत्मा' ( बृ० उ० ४।३।७ ) इप्युपक्रम्य 'सोऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः' (बृ० उ० ४।३।७ ) इति श्रुत्या विज्ञानात्मनः कर्मफलोपभोगाय हृद्यवस्थानोक्तेरन्तर्यामिणश्च नियन्तृत्वेनावस्थानोक्त श्च । ' ' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्ष परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पल स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥ (मु० उ० ३।१।१ ) । वस्तुतस्तु -सहस्रशीर्षेति षोडशचं षष्ठ सूक्तम् ॥ नारायणो नाम ऋषि • । अन्त्या त्रिष्टुप, शिष्टा अनुष्टुभः ॥ अव्यक्तमहदादिविलक्षणश्चेतनो यः पुरुषः ' पुरुषान्न परं किञ्चित्' ( कठ उ० ३।११ ) इत्यादिश्रुतिषु प्रसिद्धः स देवता । तथा चानुक्रान्तम् --' सहस्रशीर्षा षोडश नारायणः पौरुषमानुष्टुभं त्रिष्टुबन्तं तु ' इति । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमि विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ॥ (वा० सं ० ३१।१; ऋ० सं ० १० / ९ ०1१ ) अर्थ: -वेदवेद्यः परमेश्वरः सर्वान्तरात्मत्वात् समष्टिप्राणिदेहैरपि देहवानिति सर्वप्राणिसमष्टिरूपो ब्रह्माण्डात्मको विरारूपेण सहस्रशीर्पा । सहस्रशब्दोऽनन्तवचनः । अनन्तैः शिरोभिर्युक्तः । यानि सर्वप्राणिनां शिरांसि तानि सर्वाणि तद्देहान्तःपातित्वात् तदीयान्येव । एवमेव सहस्राक्षित्व सहस्रपादत्व च । स परमात्मरूपः पुरुषः भूमि अतिक्रमण कर अवस्थित है । दयानन्द की व्याख्या में दशागुल को ब्रह्माण्ड और हृदय का उपलक्षक माना है, किन्तु यह गलत है, क्योंकि पांच स्थूल और पांच सूक्ष्म महाभूत ही सारा जगत् नही बन जाते, इसके अतिरिक्त प्रकृति, महत्, अहङ्कार जैसे तत्त्वो को भी अलग से सत्ता जगत् में मानी जाती है । प्राणादि में प्रकृति आदि तत्त्वो का अन्तर्भाव नही हो सकता । हृदय भी दस अंगुल का नही है, क्योंकि उसका परिमाण तो अंगुष्ठमात्र माना गया है । किन्तु दशागुल का अभिप्राय यहा ब्रह्माण्ड से बाहर स्थित प्रदेश से हैं कि पुरुष इस ब्रह्माण्ड से बाहर भी सारे देश को व्याप्त कर अवस्थित है । इसीलिये 'विकाराविति च' इस बादरायण सूत्र में प्रपंच से बाहर ब्रह्म का वह स्वरूप बताया गया है, जिसको कि मुक्त जीव प्राण कहते हैं । अथवा इसका यह अर्थ किया जा सकता है कि नाभि के पास से दस अंगुल हटकर हृदय में स्थित है । बृहदारण्यक उपनिषद् में ' इसमें आत्मा कौन सा है' इस तरह से इस विषय का उपक्रम कर विज्ञानमय आत्मा की कर्मफल के उपयोग के लिये हृदय में स्थिति बताई गई है और वहा अन्तर्यामी को सबका नियन्ता माना गया है । इस प्रतिपादन के आधार पर ' अत्यतिष्ठद् दशागुलम्' इस वाक्य की सार्थकता के लिये नाभि स्थान का आक्षेप किया जाता है । ' द्वा सुपर्णा' इस मुण्डक श्रुति में ईश्वर और जीव का इसी रूप में वर्णन किया गया है । पुरुषसूक्त का तात्पर्य परब्रह्म में ही है । यह छठा सूक्त है । इसमे सोलह ऋचाएँ है । इस सूक्त का ऋषि नारायण है । इसकी अन्तिम ऋक् त्रिष्टुप् छन्द में और अतिरिक्त अन्य सभी ऋचाएँ अनुष्टुप् छन्द में हैं । 'पुरुषान्न परं किञ्चित्' (कठो ० ३.११ ) इत्यादि श्रुतियो में प्रसिद्ध तथा अव्यक्त-महदादि जड तत्त्वो से विलक्षण चेतन पुरुष ही इस सूक्त की देवता है । ...... (ऋ० स० १०.९०.१ ) अर्थ - वेद से जिसका ज्ञान होता है, वह परमेश्वर सभी का अन्तरात्मा होने के कारण समस्त प्राणियों के देहों से वही देहवान है, अतः सम्पूर्ण प्राणियों की समष्टि का रूप धारण करनेवाला ब्रह्माण्ड भी वही है, इस प्रकार उसका विराट् स्वरूप होने से वही सहस्र -शीर्ष ( मस्तक) वाला 'सहस्रशीर्षा ' कहा गया है । यहाँ 'सहस्र' शब्द का अर्थ अनन्त है । इसलिये वह परमेश्वर अनन्त शिरों से युक्त है | अभिप्राय यह है कि समस्त प्राणियो के जो शिर हैं, वे सब उसी के शिर है । इसी प्रकार उसका

पृष्ठ 337

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 337 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १२३७ ब्रह्माण्डगोलकरूपां प्रकृतिमण्डलरूपा वा भूमिम्, वृत्वा परिवेष्ट्य, कारणत्वाद् अज्ञान तत्कार्यात्मकं प्रपञ्चम् आध्या- सिकतादात्म्यसम्बन्धेनैव व्याप्य । शाखान्तरे स्पृत्वेति पाठः, तत्रापि न संयोगमात्रमभिप्रेतम् । दशाङ्गुलं दशाङ्गुल- परिमितं देशम् । अत्यतिष्ठत् अतिक्रम्य व्यवस्थित । दशाङ्गुलं दशगुणं महापरिमाण वा देशं अत्यतिष्ठत् । ब्रह्माण्ड- मण्डलाद् बहिरपि व्याप्य स्थित इत्यर्थः । सर्वकारणभूतः परमेश. सर्वविकारजातं व्याप्य ततो बहिरपि स्थितः, प्रकृतितद्विकाराणां तदेकदेशस्थितत्वात् । यथा अनन्ताकाशकक्षुद्रप्रदेशे मेघमण्डलस्थितिस्तथैव भगवतोऽतिस्वल्पप्रदेशे प्रकृतितद्विकारजातं स्थितम् । 'विकारावर्त च तथा हि स्थितिमाह (४| ४| १ ९ ) इति सूत्रेण निर्णीत श्रीबादरायणे- नापि । यद्वा सहस्रशीर्षशब्देन शिरः स्थचक्षुरादिकरणग्रामस्यापि ग्रहणम्, यद्वा सहस्राक्षसहस्रपाच्छ्ब्दाभ्यां ज्ञानकर्मे- न्द्रियाणां ग्रहणम्, तेन सर्वज्ञानक्रियाशक्तिमत्त्वमभिप्रेतम् । स्वतस्तस्य शीर्षाक्ष्याद्यभावेऽपि तत्तच्छक्तिमत्त्वं बोध्यते ' 'न तस्य कार्य करणं च विद्यते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च', 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता' इत्यादिश्रुतिभ्यः || १ || ' पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ ' ( वा० स० ३१।२; ऋ ० स० ),, १०।१०।२ । एतद्विशेषणयुक्तः पुरुषः परमेश्वरः यद्भूत यज्जगदुत्पन्नमभूत् यद्भाव्यमुत्पस्यमानं चकाराद् वर्तमानं च तत् त्रिकालं सवं विश्वं पुरुष एवं कृतवानस्ति नान्यः । नैवातो हि परः कश्चिज्जगद्रचयितास्तीति निश्चेतव्यम् । उतापि स एवेशान ईशनशील: सर्वस्येश्वरोऽमृतत्वस्य मोक्षभावस्य स्वामी दातास्तीति, नवैतद्दाने कस्यापि सामर्थ्यमस्तीति पुरुषो यद्यस्माद् अन्नेन पृथिव्यादिना जगता सहातिरोहति व्यतिरिक्तः सन् जन्मादिरहितोऽ स्ति, तस्मात् स्वयमजः सन् सवं जनयति स्वसामर्थ्यादिकारणात् कार्यमुत्पादयति । नास्यादिकारण किञ्चिदस्ति | किञ्च, सर्वस्यादिनिमित्तकारणं पुरुष एवास्तीति वेद्यम्' (पृ ० १३४ ) । सहस्राक्षत्व और सहस्रपादत्व भी समझना चाहिये । वह परमात्मस्वरूपी पुरुष, ब्रह्माण्डगोलकरूप अथवा प्रकृतिमण्डलरूप भूमि को परिवेष्टित ( आवृत ) कर अर्थात् वह ( पुरुष ) सबका कारण होने से अज्ञान और उसके कार्यभूत प्रपञ्च की आध्यासिक तादात्म्य सम्बन्ध से ही व्याप्त कर लेवे के पश्चात् भी दश अंगुल परिमित देश का अतिक्रमण कर अवस्थित रहता है । अथवा व्याप्त किये हुए कारण सहित प्रपञ्च के दशगुणित या महापरिमाण वाले देश में अवस्थित रहता है । तात्पर्य यह है कि ब्रह्माण्डमण्डल के बाहर भी व्याप्त होकर स्थित रहता है । क्योकि प्रकृति और विकार तो उसके एक देश मे स्थित है । जैसे अनन्त आकाश के एक क्षुद्रप्रदेश में मेघमण्डल की स्थिति रहती है, वैसे ही भगवान् के अतिस्वल्प प्रदेश में प्रकृति और उसका विकारस्वरूप कार्यसमूह स्थित रहता है । श्रीबादरायण ने भी यही निर्णय किया है । अथवा ' सहस्रशीर्ष' शब्द से शिरःस्थित चक्षुरादि इन्द्रिय समुदाय का भी ग्रहण किया जा सकता है । अथवा ' सहस्राक्ष' ' सहस्रपात्' शब्दों से ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रियों का ग्रहण करके उस परमेश्वर की सर्वज्ञान क्रियाशक्तिमत्ता की ओर संकेत हो सकता है । कुछ श्रुतियों के आधार पर कहा जाता है कि उसके स्वयं अपने शीर्ष, अक्षि आदि नही हैं, तथापि यहाँ उसको तत्तच्छक्तिमत्ता बताई जा रही है || १॥ ' ( पुरुष एवे० ) जो पूर्वोक्त विशेषण सहित पुरुष अर्थात् परमेश्वर है, वही जो जगत् उत्पन्न हुआ था, जो होगा और जो इस समय में है, इस तीन प्रकार के जगत् को रचता है । इससे भिन्न कोई दूसरा जगत् का रचने वाला नहीं है, क्योंकि वह ( ईशानः ) अर्थात् सर्वशक्तिमान् है । ( अमृत० ) जो मोक्ष हैं, उसका देने वाला एक वही है, दूसरा कोई नहीं । वही परमेश्वर ( अत्र ०) अर्थात् पृथिव्यादि जगत् के साथ व्यापक होकर स्थित है और इससे अलग भी है, क्योंकि उसमें जन्म आदि व्यवहार नही है, अपनी सामर्थ्य से सब जगत् को उत्पन्न भी करता है और आप कभी जन्म नही लेता । इसका आदिकारण कोई नहीं है | सबका, ' ( ) 1आदि निमित्तकारण पुरुष ही है ऐसा जानना चाहिये पृ ० १३४

पृष्ठ 338

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 338 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात. १२३८ इत्यादि यद् व्याख्यात्तम्, तदपि न युक्तम्, अध्याहारादिदोषग्रस्तत्वात् । वस्तुतस्तु कृतवानिति पदाध्याहार तैरपेक्ष्येण सामानाधिकरण्यमेवाभिप्रेतम् । इदमहङ्कारास्पदं फलचैतन्यव्याप्तिविषयत्वेनानुभूयमान सर्वं स्थूल सूक्ष्म-कारणात्मकं जगद् भूतं जातं भव्यमुत्पत्स्यमान वर्तमानं च पुरुष एव पुरुषानतिरिक्तमेव, सर्वस्य तदात्मकत्वात् । 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' ( छा० उ० ६ ८ ७ ), 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ( छा ० उ० ३ | १४ | १ ) इत्यादिश्रुतिभ्य । मृदेव घटः, समुद्र एव तरङ्गादिकम् इत्यादिवत्कार्यकारणभावेन, रज्जुरेव सर्प इत्यधिष्ठानाधिष्ठेयभावेन च सामानाधिकरण्योप-पत्तेः । तेनैव सोऽमृतत्वस्येशानोऽपि सम्भवति, अमृतत्वस्य तदधीनत्वात् । नहि मोक्षः फलादिवद्दातुं शक्यः, स्वरूप- भूतत्वात् । अधिष्ठानसाक्षात्कारेण कल्पितदेहाद्युपाधिबाधेनाधिष्ठानावशेषत्वस्यैव मोक्षपदार्थत्वात् । यदपि - 'अनेन पृथिव्यादिना जगता सहातिरोहति व्यतिरिक्तः सन् जन्मादिरहितोऽस्ति ' इति, तदपि मन्दम्, सहेत्यध्याहारे मानाभावात् । अतिरोह्तीत्यस्य व्यतिरिक्तार्थताऽसिद्धेश्च । तस्मादन्नेन निमित्तभूतेन प्राणिनां भोग्येन अतिरोहति कारणावस्थामतिक्रम्य जगदवस्थां प्राप्नोतीत्येवार्थः । जगदवस्थाप्राप्तिमन्तरा प्राणिनां भोग्यान्न- लाभासम्भवात् । यद्वा — कालत्रयस्येशानः, उतापि, अमृतत्वस्य देवभावस्यापीशानः । यद्वा पुरुष एव चेत्सवं तहि प्राप्त तस्य प्रकृतेरिव परिणामित्वमित्याशङ्कायामाह - अमृतत्वस्य । मरणधर्मस्येशानः मुक्त रपीशः, यो हि मोक्षेश्वरो न स म्रियते । न परिणामोपादानत्वम्, किन्तु दिवर्तोपादानत्वमिह विवक्षितम् । तेन न तस्य परिणामित्वम्, किन्तु कूटस्थनित्यत्वमेवेति मन्तव्यम् । वास्तविकार्थ: -पुरुष एवेदमिति । यदिदं वर्तमानं तत्सर्वं पुरुष एव । यद् भूतमतीतं जगत् यच्च भव्यं भविष्यद् जगत् तदपि पुरुष एव । यथाऽस्मिन् कल्पे वर्तमानाः प्राणिदेहाः सर्वेऽपि विराट्पुरुषस्य अवयवास्तथैव अतीतागामिनो- दयानन्द की यह व्याख्या भी ठीक नही है, क्योकि इसमें अध्याहार प्रभृति अनेक दोष हैं । वास्तव मे 'कृतवान्' इस पद का अध्याहार किये बिना सामानाधिकरण्य से ही यहाँ अन्वय अभिप्रेत है । यह सारा कर्मफल और चैतन्य की व्याप्ति के रूप में अनुभूयमान सारा स्थूल सूक्ष्म- कारणात्मक जगत् जो कुछ हो चुका है, जो कुछ होने वाला है, अथवा जो कुछ है, वह सब कुछ पुरुष ही है । इससे अतिरिक्त और कुछ भी नही है, 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्, ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस तरह के छान्दोग्य श्रुति के वचन इसमें प्रमाण है । मिट्टी ही घडा है, समुद्र हो तरंग है, इसी तरह ये कारण हो कार्य है । रज्जु ही सर्प है, इस तरह से अधिष्ठान और अधिष्ठेय के आधार पर सामानाधिकरण्य बन जाता है । इसीलिये वह अमृतत्व का स्वामी भी हो जाता है, क्योकि अमृतत्व उसी के व्यधीन है । आम, अमरूद की तरह मोक्ष किसी को दिया नही जा सकता, क्योंकि वह तो अपना स्वरूप ही है । अधिष्ठान का साक्षात्कार हो जाने पर कल्पित देहादि उपाधि का बाघ हो जाने से अधिष्ठानमात्र की स्थिति रह जाना ही मोक्ष पद का अर्थ है । ' अन्न अर्थात् पृथिव्यादि जगत् के साथ व्यापक होकर स्थित है और जन्मादि से रहित है' यह व्याख्या भी उचित नहीं है, क्योंकि 'सह' पद का अध्याहार करने में कोई प्रमाण नहीं है । ' व्यतिरोहति' पद इस अर्थ में प्रयुक्त होता भी नही । इसलिये इसका यही अर्थ करना पडेगा कि निमित्तकारणभूत प्राणियो के भोग्य कर्म के कारण यह कारणावस्था को छोडकर जगत् अवस्था को प्राप्त करता है । जगदवस्था की प्राप्ति के बिना प्राणियों को भोग्य वस्तुओं की प्राप्ति नही हो सकती । अथवा तीनो कार्यों का स्वामी या अमृतत्व अर्थात् देवभाव का भी स्वामी, यह अर्थ भी किया जा सकता है । अथवा इस शंका के उत्तर के रूप में भी इसका व्याख्या की जा सकती है कि यदि पुरुष ही सब कुछ है, तब वह भी प्रकृति के समान परिणामी हो जायगा? नहीं, क्योंकि वह तो अमृतत्व अर्थात् अमरणस्वभाव मुक्ति का भी स्वामी है । मोक्षावस्था के ईश्वर का जो स्वरूप है, वह कभी मरता नहीं, वह परिणमनशील उपादान कारण नही है, अपि तु विवर्तस्वभाव का उपादान है । इसलिये वह परिणाम स्वभाव का न होकर कूटस्थ नित्य ही माना जाता है । ....... **** uste 1005 (ऋ० सं ० १०.९ ०२)

पृष्ठ 339

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 339 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' वेदार्थ पारिजात १२३९ रपि कल्पयोर्द्रष्टव्यमित्यभिप्रायः । यथा वा इदानीन्तनं कार्य कारणाभिन्न तथैव अतीतानागतान्यपि कार्याणि तथा- भूतान्येवेत्यर्थः । उत अपि च अमृतत्वस्य देवत्वस्य मोक्षस्य वा अयम् ईशानः स्वामी । यद् यस्मात्कारणाद् अन्नेन निमित्तभूतेन प्राणिनां भोग्यान्नेन अतिरोहति स्वकीया कारणावस्थामतिक्रम्य जगदवस्था प्राप्नोति तस्मात् प्राणिनां कर्मफलभोगाय जगदवस्थास्वीकाराद् नेदं तस्य वस्तुत्वम् । पुरुषसूक्तप्रकरणे मोक्षधर्म -' अजाज्जातस्य भूतस्य मनुष्यादेरकारणात् । निर्वाणदायी भवति कृपया पुरुषोत्तमः ॥' इति । अमृतत्वस्य परमपदस्य ईशानो यत्परमपदम् अत्यन्तं नित्यापूर्वमिव प्रादुर्भवति लीलाविभूतिमति- क्रम्य रोहति प्रकाशते ॥२॥

'एतावानस्य महिमाsतो ज्यायाश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ ' (वा० सं ० ३१।३; ऋ ० सं ० १०।९ ० ३ ) | पुरुषस्य भूतभविष्यद्वर्तमानावस्थो यावान् संसारोऽस्ति तावान् महिमा वेदितव्यः । ननु एतावानस्य महिमास्ति चेत् तर्हि तस्य महिम्नः परिच्छेद इयत्ता जातेति गम्यते । अत्र ब्रूते -अतो ज्यायांश्च पूरुष इति । नैतावन्मात्र एव महिमास्ति, कि तहि - अतोऽप्यधिकतयो महिमाऽनन्तस्तस्यास्तीति गम्यते । अत्राह - ( पादोऽस्य ) । अस्यानन्तसामर्थ्यस्येश्वरस्य विश्वानि प्रकृत्यादिपृथिवीपर्यन्तानि सर्वाणि भूतान्येकः पादोऽस्ति, एकस्मिन् देशाशे सर्वं विश्वं वर्तते । त्रिपादस्यामृतं दिवि । अस्य दिवि द्योतनात्मके स्वरूपे अमृत मोक्षसुखमस्ति । तथास्य दिवि द्योतके संसारे त्रिपाज्जगदस्ति । प्रकाश्यमानं जगदेकगुणमस्ति, प्रकाशकं च तस्मात् त्रिगुणमिति । स्वयं च मोक्षस्वरूपः सर्वाधिष्ठाता सर्वोपास्यः सर्वानन्दः सर्वप्रकाशकोऽस्ति' (पृ० १३५) । इति यद् व्याख्यातं तत्रोच्यते--यावान् संसार इत्यत्र संसारपदेन किं गृह्यते? नित्यानित्यदृश्यादृश्यसाधारणं ब्रह्माण्डरूपमुत कार्यमात्रम्? नाद्यः, नित्याना जीवानां नित्यायाः प्रकृतेश्च परात्ममहिमत्वायोगात्, तन्निमितत्वे अर्थ- पुरुष एवेदमिति । यह जो कुछ भी वर्तमान (विद्यमान) है, वह सब 'पुरुष' ही है । जो अतीत ( भूतकालिक ) था तथा भविष्यत्कालिक ( आगामी ) होगा, वह भी पुरुष ही है । तात्पर्य यह है कि इस कल्प ( सृष्टि) में जैसे वर्तमान सभी प्राणियो के शरीर विराट् पुरुष के अवयव है, वैसे ही अतीत और आगामी कल्पो में भी समझना चाहिये । अथवा जैसे इस समय का कार्य अपने कारण से अभिन्न है, वैसे ही अतीत और अनागत के कार्यों को भी समझना चाहिये । दूसरी बात यह भी है कि देवत्व या मोक्ष का यह स्वामी है, क्योंकि प्राणियों के निमित्तभूत भोग्य अन्न के द्वारा अपनी कारणावस्था का अतिक्रमण कर जगदवस्था को प्राप्त करता है । जगदवस्था को उसका प्राप्त होना वास्तविक नही है, वह तो कर्मफल का भोग प्राणियों को प्राप्त हो सके, इस लिये जगदवस्था को स्वीकार करता है । पुरुष सूक प्रकरण में मोक्षधर्म में कहा है- 'अजन्मा भगवान् से उत्पन्न हुए मनुष्यादि प्राणियों पर भगवान् पुरुषोत्तम अकारण ही कृपा करके उन्हे निर्वाण देता है । ' अमृतत्वरूप परमपद का स्वामी, अत्यन्त नित्य अपूर्व की तरह जो परम पद सहज आविर्भूत होता है, वही लीला विभूति का अतिक्रमण कर प्रकाशमान होता है ॥ २॥

'(एतावानस्य) तीनों कालो में जितना संसार है, वह सब इस पुरुष की ही महिमा है । प्रश्न --जब उसकी महिमा का परिमाण है, तो अन्त भी होगा? उत्तर- ( अतो ज्यायाश्च पुरुषः ) उस पुरुष की अनन्त महिमा है, क्योकि ( पादोऽस्य विश्वा भूतानि) यह जो सम्पूर्ण ज्ञान प्रकाशित हो रहा है, वह इस पुरुष के एक देश में बसता है । ( त्रिपादस्यामृतं दिवि) और जो प्रकाशगुण वाला जगत् है, वह उससे तिगुना है । मोक्षसुख भी उसी [ पुरुष के द्योतनात्मक] ज्ञानस्वरूप प्रकाश मे है और वह पुरुष सब प्रकाश का भी प्रकाश करने वाला है' ( पृ ० १३५ ) । पुरुष के तृतीय मन्त्र की स्वामी दयानन्द की यह व्याख्या भी ठीक नही है, क्योंकि ' यावान् संसार:' इस वाक्य में आये संसार पद से किसका ग्रहण होता है? नित्य और अनित्य, दृश्य और अदृश्य साधारणतः सारा ब्रह्माण्ड इससे गृहीत होता है, अथवा 1

पृष्ठ 340

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 340 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १२४० स्वरूपंतेषां नित्यत्वविरोधात् । ननु सर्वेशितृत्वे तस्य माहात्म्यं नोत्पादकमिति चेन्न, विकल्पासहत्वात् । सर्वेशितृत्वं ब्रह्मणःसापेक्षं वा? निर्धर्मके काल्पनिकधर्मापादनमुत वास्तविकधर्मापादनम्? नाद्यः, विकल्पासहत्वात्, सर्वेशितृत्वं निरपेक्षं न्यायविरोधाच्च ।नाद्यः, वैषम्यनैर्धृ ण्यप्रसङ्गात् । वैषम्यनंघृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति' ( ब्र ० सू ० २।१।३४ ) इति ॥ नान्त्य:, सापेक्षस्य निरङ्कुशेश्वरत्वासम्भवात् ॥तस्माद् धर्माधर्मसापेक्षस्यैवेश्वरस्य प्रपञ्चनिर्मातृत्व सम्भवति न निरपेक्षस्य नहि नित्य परिपूर्णमप्रतिहतशक्ति कार्योत्पादने सहकार्यन्तरमपेक्षते । न च निर्धर्मके ब्रह्मणि सत्यधर्मापादनं सम्भवति, वदतो व्याधातात् । तथा च न नित्यानित्यसाधारणस्य संसारस्य त्वद्रीत्या परमेशमहिमतोपपद्यते । न वा कार्यमात्रं प्रति स्वतन्त्रस्य निरपेक्षस्य परमेश्वरस्य महिमतेशितृते च सम्भवतः, उच्चावचमध्यमसुखदुःखभेदवत् प्राणभृत्प्रपञ्च सुखदुःखकारणं सुधाविषादिमयं चानेकविधं विरचयतः कर्मसापेक्षस्यैव युक्तत्वेन वैषम्यनैर्धृ ण्यानापातात् । यदपि च महिम्न इयत्तामाशङ्कय 'अतो ज्यायांश्च पूरुषः ' इत्यनेन समाधानावसरे नैतावन्मात्र एव महिमा कि तर्हि अतोऽप्यधिकत्तमो महिमाऽनन्तस्तस्यास्तीति तत्तु वेदार्थानभिज्ञस्यैव शोभते, तत्र पुरुषस्यैव ज्यायस्त्वोक्तेः । न च महिम्नोऽपि पुरुषत्वमेव, तथात्वे पुरुषद्वयप्रसङ्गापातात् । अत एव चकारो नात्र भिन्नक्रमः, किन्त्ववधारणार्थः । अतो ज्यायानेव महिमा । यदपि च- 'विश्वानि प्रकृत्यादीनि पृथिवीपर्यन्तानि सर्वाणि भूतानि एकः पादोऽस्ति, एकस्मिन् देशांशे सर्वं जगद्वर्तते ' इति, तदपि विश्वङ्खलम्, प्रकृतिमहदादीनां भूतत्वाभावात् । न च प्राणिपदेन प्राणिन एव विवक्षिता इति वाच्यम्, तथात्वेऽपि प्रकृत्या दिपृथिवीपर्यन्तानामिति पदोपन्यासप्रयासवैयर्थ्यात् । एवमेव 'एकस्मिन् देशाशे सवं विश्वं केवल कार्य जगत् ही? इनमें पहला पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि नित्य जीव और नित्य प्रकृति को परमात्मा की महिमा नही माना जा सकता, क्योकि इनको भी यदि परमेश्वर की रचना माना जायगा, तो ये अनित्य हो जायेगे । इसका यदि यह उत्तर दिया जाय कि ईश्वर का माहात्म्य इनको उत्पन्न करने में नही है, किन्तु वह सबका स्वामी है, यही उसकी ईश्वरता है, तो ऐसा मानने पर भी आगे दिये गये विकल्प का उत्तर नही बनता । जैसे कि सर्वेश्वरता यदि ब्रह्म का स्वरूप है, तो यह उस धर्मरहित ब्रह्म में काल्पनिक धर्म का आरोप किया जाता है, अथवा वास्तविक? ब्रह्म में काल्पनिक धर्म का आरोप नही हो सकता, क्योंकि यहा भी पुनः विकल्प उठ खड़ा होता है कि सर्वेश्वरता निरपेक्ष है, या सापेक्ष? निरपेक्ष मानने पर ब्रह्म मे विषम दृष्टि और निर्दयता का आरोप आवेगा और वेदान्तसूत्र से विरोध भी होगा । इसलिये धर्माधर्मसापेक्ष ईश्वर को ही प्रपच का निर्माता माना जा सकता है, निरपेक्ष को नही । अब सापेक्ष ईश्वर को जगत् का कर्ता माना जाता है, तो उसमें अप्रतिहत ऐश्वर्यं कैसे संभव होगा । नित्य, परिपूर्ण, अप्रतिहत शक्ति ईश्वर को किसी कार्य की उत्पत्ति में किसी की सहायता अपेक्षित नही रहती । निर्धर्मक (धर्म रहित ) ब्रह्म में सत्य धर्म की स्थिति मानना परस्पर विरुद्ध बात हुई । इस तरह से आपके मत के अनुसार नित्यानित्य साधारण संसार परमेश्वर की महिमा नही माना जा सकता और न कार्यमात्र को सृष्टि के प्रति स्वतन्त्र, निरपेक्ष, परमेश्वर कारण ही माना जा सकता है, क्योंकि ऊँचा-नीचा, मध्यम श्रेणी का सुख-दुःख के भेद वाले प्राणियो से भरा यह विषम संसार किसी के लिये सुखकर किसी के लिये दुःखकर, किसी को अमृत की भांति और किसी को विष की भांति प्रतीत होता है । ऐसा संसार कर्मसापेक्ष यदि हो, तभी ईश्वर के ऊपर विषमता और निर्दयता का परिहार किया जा सकता है । व्याख्याकार ने शंका उठा कर उसका समाधान करते समय कहा है कि उस पुरुष की इतनी ही महिमा नहीं है, किन्तु उसकी तो इससे भी अधिक अनन्त महिमा है, किन्तु यह कथन वेदार्थ को न जानने वाले को ही शोभा दे सकता है, क्योंकि इस मन्त्र में पुरुष को ही महत्ता प्रतिपादित है । महिमा को ही पुरुष नही माना जा सकता, क्योकि ऐसा मानने पर पुरुष में द्वैत मानना पड़ जायगा । इसलिये चकार यहाँ अवधारण के अर्थ मे माना जायगा, भेद का बोधक नही । 'प्रकृति से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सभी जगत् उसका एक पाद है, वह इस पुरुष के एक देश में बसता है, यह कथन भी असंगत है, क्योंकि प्रकृति, महत् आदि को भूत नही कहा जाता । भूत पद को प्राणियो का वाचक मानने पर भी 'प्रकृति से लेकर पृथिवी पर्यन्त' इन पदों को व्याख्या में रखना व्यर्थ हो जायगा । इसी प्रकार 'इस पुरुष के एक देश में सारा विश्व बसता है' यह कथन भी