वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 341–350
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 341–350
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वेदार्थपारिजातः १२४१ वर्तते' इत्यपि निरर्थकम्, एकदेशनिखिलार्थबोधकदेश- सर्वशब्दाभ्यामेवोपपत्ती 'अश' ' विश्व' प्रयोगवैयर्थ्याच्च । यच्च-' अस्य दिवि द्योतनात्मके स्वरूपे अमृतं मोक्षसुखमस्ति तथास्य दिवि द्योतके ससारे त्रिपाज्जगदस्ति, प्रकाश्यमानं जगदेकगुणमस्ति प्रकाशक च तस्मात्त्रिगुणमस्ति' इति, तदपि व्यामोहविजृम्भितम्, दिवोत्येकस्यैव शब्दस्यार्थद्वैविध्ये प्रमाणाभावात्, वाक्यभेदप्रसङ्गाच्च । एवममृतमित्यस्य त्रिपाद्विशेषणत्वे सम्भवति प्रधानद्वयानुपपत्तेः । त्रिपादित्यस्य त्रिगुणत्वमर्थ इत्यत्रापि बीज मृग्यम् । द्योतकः संसारः कीदृशः कथ च तत्र त्रिपाद् जगद्वर्तते, एकगुण जगत्कि भवति, त्रिगुण च जगत्कीदश भवति, तत्र च कि मानमिति वक्तव्यम् । -' केचित्तु त्रिपात् पुनस्त्रयोंऽशा अस्य पुरुषस्य अमृतमृग्यजुः सामलक्षणम् आदित्यलक्षणं वा दिवि द्योतते' इत्याहुः 1। वास्तविकार्थ: - एतावानस्य महिमेति । अत्र केचिद् भूतानि अचित्ससृष्टा जीवास्तस्य पुरुषस्य पादस्तु- रीयाशः । दिवि परमव्योमपदवाच्ये समस्तसमष्टितत्त्वबहिर्भूताप्राकृतस्थानविशेषरूपे परमपदे अमृत जरामरणादिरहितं नित्यवस्तुजातमस्य त्रिपात् पादत्रयम् । भोग्य-भोगोपकरण - भोगस्थानरूपस्य त्रिविधस्य वस्तुनः सत्त्वात् तेषा पादत्रय- -- व्यपदेशः । यद्वा जगदन्तर्गतवस्त्वभिमानिनाम् अस्त्रभूषणादिरूपाणा नित्याना भगवदनुभवमात्रपराणा नित्याना मुक्ताना च परमपदे सत्त्वात्तेषां त्रिपात्त्वव्यपदेशः । अथवा -पादः भगवदाश्रयायाः सृष्ट्यादिशक्तेरेकदेशः । परमपुरुष-शक्तिलेशविजृम्भितमिद जगदित्यर्थ । तथा च पराशरः - ' यस्यायुतायुताशाशे विश्वसष्टिरिय स्थिता' इति । अस्य त्रिपाद् अधिकाशस्तु अमृतम् अमरणधर्मक नित्यमुक्तरूप दिवि परमव्योम्नि, भासत इति शेषः, 'जागृवांसः समिन्धते' निरर्थक है, क्योकि एकदेश और सम्पूर्ण अर्थ के बोधक सर्वदेश शब्दो से ही इसकी उपपत्ति हो सकती थी, तब एक मन्त्र में अंश और विश्व पदो का ग्रहण करना व्यर्थ हो जायगा । ' इसके द्योतनात्मकस्वरूप में मोक्ष सुख विद्यमान है । इसके इस स्वरूप में तीन पाद वाला जगत् है । प्रकाश्यमान जगत् एक अंश वाला है और प्रकाशक उससे तिगुना है' यह कथन भी अज्ञान को ही उजागर करने वाला है, क्योंकि एक हो 'दिवि' शब्द के दो अर्थ किये जाय, इसमे कोई प्रमाण नही है । इसमें वाक्यभेद दोष की भी प्रसक्ति होगी । इसी तरह अमृत पद त्रिपात् का विशेषण है, अतः यहाँ दो प्रधान विषय प्रतिपादित है भी नही । त्रिपात् पद का त्रिगुण अर्थ करने में भी कोई प्रमाण नही है । द्योतक संसार कैसा है? उसमें त्रिपात् जगत् कैसे रहता है? एक गुण वाला जगत् क्या है, और त्रिगुणात्मक जगत् कैसा होता है? इसमें प्रमाण क्या है? इन सबका समाधान आपको बताना पड़ेगा । कुछ लोगों का कहना है कि इस पुरुष का अमृत लक्षण त्रिपात् ऋक्, यजु, साम लक्षण वेदत्रयी अथवा आदित्य लक्षण स्वरूप दिव्य लोक में प्रकाशित है । .... ... **** (ऋ. सं ० १०.९०३) अर्थ - एतावानस्य महिमेति । इसका अर्थ कुछ विद्वान् इस प्रकार करते हैं - अचित् से संसृष्ट जीव, उस पुरुष का तुरीय ( चतुर्थ) अंश (पाद ) है और ' परम व्योम' पद से जिसे कहा जाता है और जो सम्पूर्ण समष्टि तत्त्व से बहिर्भूत, अप्राकृत स्थान-विशेषरूप परम पद है, उसमें जो जरामरण मादि से रहित नित्य वस्तुजात है, वह उस पुरुष के तीन पैर ( पाद ) है । भोग्य, भोग्यो-पकरण, भोगस्थानरूप तीन प्रकार की वस्तुएँ होती है, अत: उनके लिये ' त्रिपात्' ( पादत्रय ) शब्द का प्रयोग किया गया है । अथवा - जगत् के अन्तर्गत वस्तुओं के अभिमानी और अस्त्र- भूषण आदि से युक्त भगवदनुभव की प्राप्ति में ही निरन्तर लगे हुए नित्य मुक्तों को सत्ता परम पद में होने से उनको 'त्रिपात्' शब्द से यहाँ बताया गया है । अथवा - पाद का अर्थ हैं भगवान् के आश्रय से रहने वाली सृष्ट्यादि शक्ति का एकदेश । अर्थात् परम पुरुष की शक्ति के लेशमात्र से विजुभित ( विलसित ) हुआ यह जगत् है । इसी आशय को पराशर कहते हैं - ' जिसके अयुत के भी अयुताश के एक अंश में यह विश्व सृष्टि स्थित है' । इस परम पुरुष का अधिक अंश ( त्रिपात्) जो अमरण धर्मवाला तथा नित्यमुक्त है, वह परम व्योम में उद्भासित होता रहता है । इसी बात को 'जागृवांसः समिन्धते' यह श्रुति बता रही है । १५६
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१२४२ वेदार्थपारिजातः इति श्रुतेः । अथवा - त्रिशब्दो बहुपरः, पादशब्दश्च गुणपरः । तथा च अनन्तज्ञानानन्दादिगुणविशिष्टमित्यर्थः । अथवा --वासुदेव- सङ्कर्षण- प्रद्युम्न -अनिरुद्धात्मकस्य भगवतस्तुरीयोऽनिरुद्धाशः सर्वाणि भूतानि, अवशिष्टं च त्रिपाद्रपं दिवि नाकपृष्ठे, निवसतीति शेष इत्यर्थमाहुः । एतावानस्य महिमा सर्वं पूर्वोक्तमस्य पुरुषस्य महिमा वैभवम् । यद्यपि तद्वंभवेयत्ता तु नास्त्येव; तथापि अपरिच्छिन्नत्वस्य एतत्परिच्छेदे बाघाभावात् । अतः अपरिच्छिन्नज्ञानशक्त्या दिमत्त्व सर्वान्तर्यामित्वरूपाद् हेतोः पुरुषो ज्यायान् । अथवा — अस्य प्रपञ्चस्य एतावान् महिमा पुरुषश्चातो ज्यायानेव । अथवा सर्वमपि पूर्वोक्तस्य पुरुषस्य महिमा सामर्थ्यमात्रम्, अतः सर्वस्मादस्मात् पुरुषो ज्यायान् । ज्यायस्त्वमेव प्रपञ्चयति--पादोऽस्य विश्वा भूतानि अस्य पुरुष- स्येति भावः । - सम्प्रदाय विदस्त्वित्थं वर्णयन्ति अतीतानागतवर्तमानरूपं जगद् यावदस्ति एतावान् सर्वोऽप्यस्य पुरुषस्य महिमा स्वकीयसामर्थ्यविशेषः, न तु तस्य वास्तवं स्वरूपम् । वास्तवस्तु पुरुषः, अतः महिम्नोऽपि जगज्जालाद् ज्यायान् अतिशयेनाधिकः । तदेव प्रपञ्च्यते -अस्य पुरुषस्य विश्वा भूतानि कालत्रयवर्तीनि सर्वाणि भूतानि प्राणिजा- तानि पादश्चतुर्थाश: । अस्य पुरुषस्यावशिष्ट त्रिपात्स्वरूपम् अमृतं विनाशरहितं सद् दिवि द्योतनात्मके स्वप्रकाश- स्वरूपे, व्यवतिष्ठत इति शेषः । यद्यपि च 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै ० उ० २1१ ) इत्याम्नातस्य परब्रह्मण इयत्ता- भावात् चतुष्पात्वमपि निरूपयितुमशक्यम्, तथापि जगदिदं ब्रह्मस्वरूपापेक्षयाऽल्पमिति विवक्षितत्वात् पादत्वो- पन्यासः || ३|| 'त्रिपादृध्वं उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ॥ ' ( वा० सं ० ३१।४; ऋ ० सं ० १०।९ ० / ४ ) । अय पुरुषः परमेश्वर. पूर्वोक्तस्य त्रिपादुपलक्षितस्य सकाशाद् ऊर्ध्वमुपरिभागेऽर्थात् अथवा -- 'त्रि' शब्द बहु ( विपुल) परक है और 'पाद' शब्द 'गुण' परक है । निष्कर्ष यह है कि अनन्त ज्ञान, अनन्त आनन्द आदि गुणो से विशिष्ट वह परम पद है । अथवा----------वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध स्वरूप भगवान् के अनिरुद्धारा ( तुरीयाश) रूप समस्त भूत ( प्राणी ) है और उनसे बचा हुआ ( अवशिष्ट ) त्रिपात् रूप अश नाकपृष्ठ (स्वर्ग पृष्ठ ) पर स्थित है । इस प्रकार कुछ लोक अर्थ करते है । एतावानस्य महिमा । पूर्व वर्णित सब कुछ इस पुरुष का हो वैभव ( महिमा ) है । यद्यपि उसके वैभव की कोई मर्यादा (अवधि ) नही, तथापि इस वर्णित मर्यादा (सीमा, अवधि ) से उसके वैभव की निरवधिकता में कोई हानि नही हो पाती । अतः अपनो निःसीम ज्ञानशक्ति तथा अन्तर्यामिता के कारण वह पुरुष सबसे श्रेष्ठ है । अथवा— इस प्रपञ्च की इतनी महिमा है, किन्तु उससे भी अधिक महिमाशाली होने से पुरुष ही श्रेष्ठ प्रतीत होता है । अथवा पूर्व प्रतिपादित सभी कुछ इस पुरुष का ही सामर्थ्य ( महिमा ) है । अतः उस समस्त महिमा से विशिष्ट प्रपंच की अपेक्षा पुरुष की हो श्रेष्ठता ( ज्यायस्त्त्र) समझ में आती है । समस्त भूत ( समस्त भौतिक सृष्टि) इस पुरुष का एक ( अंश ) पाद मात्र है । यही उसकी श्रेष्ठता है, अर्थात् सम्पूर्ण प्रपञ्च उस पुरुष के एक पाद ( अंश ) में समा गया है । J -, किन्तु साम्प्रदायिक विद्वान् यह कहते है कि भूत भविष्यत् वर्तमान जितना भी जगत् है वह सब इस पुरुष का अपना विशिष्ट सामर्थ्य है, वह उसका सच्चा स्वरूप नही है । वस्तुत. पुरुष तो अपनी इस महिमा ( शक्ति ) से भी कही अधिक श्रेष्ठ है । उसी -को विस्तृत रूप से बताते है कालत्रयवर्ती सभी प्राणिसमूह इस पुरुष का एक चतुर्थांश है । इस पुरुष के अवशिष्ट तीन अंश विनाश से रहित है, वह स्वप्रकाशस्वरूप मे स्थित रहता है । यद्यपि ' सत्यं ज्ञानमनन्त ब्रह्म ' इस श्रुतिवाक्य के द्वारा की कोई इयत्ता न होने से उसके चतुष्पात्त्व का निरूपण करना असंभव है, तथापि यह जगत् ब्रह्मस्वरूप की अपेक्षा स्वल्पप्रतिपादित परब्रह्म है, इस तात्पर्य से ही पाद शब्द का उपन्यास किया गया है ॥३ ॥
-- ' त्रिपादूध्वं० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ इस तरह से किया गया है – 'पुरुष जो परमेश्वर है, वह पूर्वोक्त त्रिपाद् जगत् से ऊपर भी व्यापक हो रहा है । यह सदा प्रकाशस्वरूप सबके भीतर व्यापक और सबसे अलग भी है । ( पादोऽस्येहाभवत् पुनः ) इस
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वेदार्थपारिजातः १२४३ पृथग्भूतोऽस्ति । एकपादुपलक्षितं यत्पूर्वं जगदस्ति तस्मादपीहास्मिन् संसारे स पुरुषः पृथगभवद् व्यतिरिक्त एवास्ति । , स च त्रिपात् संसार एकपाच्च मिलित्वा चतुष्पाद् भवति । अयं सर्वः संसार इहास्मिन् परमात्मम्येव वर्तते पुनर्लय- समये तत्सामर्थ्य कारणे प्रलीनश्च भवति । तत्रापि स पुरुष अविद्यान्धकारादज्ञानजन्ममरणज्वरादिदुःखाद् ऊध्वं पर उदेत उदितः प्रकाशितो वर्तते । ततस्तत्सामर्थ्यात् सर्वमिदं विश्वमुत्पद्यते । किञ्च तत् ( साशनानशने ) यदेकमशनेन भोजनकरणेन सह वर्तमानं जङ्गम जीवचेतनादिसहित जगद् द्वितीयमनशनम विद्यमानमशन यस्मिन् तत्पृथिव्यादिकं च यज्जडं जीवसम्बन्धरहितं जगद् वर्तते तदुभयं तस्मात् पुरुषस्य सामर्थ्य कारणादेव जायते । यत स पुरुष एतत् त्रिविधं जगद् विविधतया सुष्ठु रीत्या सर्वात्मतयाऽञ्चति । तस्मात् सर्वं द्विविध जगदुत्पाद्य अभिव्यक्रामत् सर्वतो व्याप्त- वानस्ति' ( पृ ० १३५ - १३६ ) इति यद् व्याख्यातम्, अत्राप्युच्यते - मूले 'त्रिपात्' ' पुरुष:' इत्युभयोः पदयोभिन्नप्रवृत्ति- निमित्तकत्वात् समानविभक्तिकत्वाच्च एकार्थनिष्ठत्वलक्षणं सामानाधिकरण्यमेव युक्तम्, तदपहाय त्रिपात्पदस्योप- लक्षणत्वं मत्वा तस्य विभक्त्यन्तरपरिणमने श्रुतत्यागाश्रुतकल्पने स्याताम् । एव 'पादोऽस्येहाभवत् पुन.' इत्यस्याप्येक- पादुपलक्षितं यज्जगदस्ति, तस्मादपि पुरुषो व्यतिरिक्त इत्यत्रापि 'तस्मात् पृथक्' इत्युदक्षरमेव ॥ एव प्रकृतिप्रत्यया- नपेक्षेण स्वातन्त्र्यानुसरणे कस्यापि वाक्यस्य यथेष्टार्थकरणे सर्वत्राऽराजकतैव प्रसज्येत । तथात्वे त्वदीयभाष्यमपि त्वदभिमतवैपरीत्येन योजयितुं शक्येत । चतुष्पात् पुरुषो भवति न तु चतुष्पात् ससारः । अय सर्वः ससार इहास्मिन् परमात्मन्येव वर्तत इत्यस्यार्थस्य बोधकमपि पद मन्त्रे नास्ति । न चेहशब्देन परमात्मबोधः कर्तुं शक्यते, इहपदेना- स्मिन् संसारे इत्यर्थस्योक्तत्वात् । न चोभयमपि तदर्थः, 'सकृदुच्चरितः शब्दः सकृतदेवार्थं गमयति' इति शाब्दन्याय-विरोधात् । सामर्थ्ययुक्तात् कारणात् कार्यं जायते, तत्रैव च प्रलीयत इति तु प्रसिद्धम् । परमेश्वरस्य सामर्थ्यात् कार्य पुरुष की अपेक्षा से यह सब जगत् किचिन्मात्र देश में है । इस संसार के जो चार पाद होते हैं, वे सब परमेश्वर के बीच में ही रहते हैं । इस स्थूल जगत् का जन्म और विनाश सदा होता रहता है । पुरुष तो जन्म- विनाश आदि धर्म से अलग और सदा प्रकाशमान है । ( ततो विष्वड्" व्यक्रामत्) अर्थात् यह नाना प्रकार का जगत् उसी पुरुष के सामर्थ्य से उत्पन्न हुआ है | (साशनान ० ) यह दो प्रकार का है --एक चेतन, जो कि भोजनादि के लिये चेष्टा करने वाला जीवसंयुक्त है और दूसरा अनशन, अर्थात् जड, भोजन के लिये चेष्टा न करने वाला जीवसम्बन्ध रहित पृथिव्यादिक जड़ जगत् है । वह दोनो प्रकार का जगत् उस पुरुष के अनन्त सामर्थ्य से ही उत्पन्न होता है । वह पुरुष सर्वहितकारक होकर उस दो प्रकार के जगत् को अनेक प्रकार से आनन्दित करता है । वह पुरुष इसका बनाने वाला संसार में सर्वत्र व्यापक होकर धारण करके देख रहा है और वही सब जगत् का सब प्रकार से आकर्षण कर रहा है' (पृ ० १३६ ) । इस पर हमारा कथन है कि मूल मन्त्र में त्रिपात् और पुरुष ये दोनो पद भिन्न प्रवृत्ति-निमित्त वाले हैं, साथ ही समान विभक्ति वाले भी है, अतः एक ही अर्थ में इनकी स्थिति होने से इनका सामानाधिकरण्य ही ठीक है । इस सामानाधिकरण्य को न मानकर त्रिपाद् पद की उपलक्षणता स्वीकार कर उसकी विभक्ति बदलने में श्रुत का त्याग और अश्रुत की कल्पना करनी पडेगी, जो कि उचित नही है । इस तरह से ' पादोऽस्ये ' यहाँ भी एक पाद से उपलक्षित जगत् से भी पुरुष व्यतिरिक्त है, यह अर्थ करना भी मन्त्र के अक्षरी से प्राप्त नही होता, क्योकि व्यतिरिक्त अर्थ का बोधक कोई पद नही है । प्रकृति और प्रत्यय का विचार किये बिना इस तरह का मनमाना अर्थ करने पर किसी भी वाक्य का यथेष्ट अर्थ करने पर शास्त्रो मे सर्वत्र अराजकता, अव्यवस्था हो जायगी । इस स्थिति में तो आपके भाष्य का भी आपके मत के विपरीत अर्थ किया जा सकता है । पुरुष चार पाद वाला माना जाता है, ससार नही । यह सारा संसार इस परमात्मा मे विद्यमान है, इस अर्थ का बोधक पद भो मन्त्र मे नही है । यहाँ 'इह' शब्द से परमात्मा का बोध नहीं हो सकता, किन्तु इससे तो संसार का ही बोध होता है । 'इह' पद संसार और ईश्वर दोनों का बोधक नही हो सकता1, क्योंकि ऐसा मानने पर 'एक बार बाला गया शब्द एक ही अर्थ का बोधक होता है' इस न्याय का विरोध होगा । सामर्थ्यवान् कारण से कार्य पैदा होता है और उसी में लीन हो जाता है, ऐसा लोक में प्रसिद्ध है । परमेश्वर के सामर्थ्य से कार्य पैदा होता है और उसी
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वेदाथपारिजातः १२४४ जायते तत्रैव च प्रलीयत इति तु प्रमाणापेक्षमेव । नहि कुलालमन्तरा कुलालसामर्थ्येन घट उत्पद्यते न वा तत्र प्रलीयते । उपादानकारण एव पृथिव्यादी घटादिकार्यलयो दृश्यते, न निमित्ते कुलालादी । पूर्व मूर्ध्वपदस्योपरिभाग इत्यर्थः कृतः, तस्यैवोर्ध्व शब्दस्याविद्यादिदुःखादूर्ध्वः पर उदैत् इत्यर्थंकरणमपि पूर्वोक्तशाब्दन्यायं विरुणद्धि । तत इति पदेन तत्साम- र्थ्यात् सर्वं विश्वमुत्पद्यत इत्यप्यर्थो न युक्तः, सामर्थ्यस्याप्रकृतत्वात् । द्विविधं जगद् विविधतया सुष्ठुरीत्या सर्वात्मतया -ञ्चतीत्यादि न युक्तम्, तस्यार्थस्याभिव्यक्रामदित्यनेनैव गतार्थत्वात् | आभिमुख्येन विविधतया क्रमणस्यापि तदर्थानति-रिक्तत्वात् । मूले तु 'व्यक्रामत्' इत्येव पाठः । त्वदीये ग्रन्थे 'अभिव्यक्रामत ' इति पाठः । स किंमूलक इत्यपि वक्तव्यम् । वस्तुतस्तु मन्त्रस्यायमर्थः - योऽय त्रिपात् पुरुषः ससारस्पर्शरहितब्रह्मरूपः, अयमूर्ध्व उदैत्, अस्मादज्ञान-कार्यात् संसाराद् बहिर्भूतोऽत्रत्यैर्गुणदोषैरस्पृष्ट उत्कर्षेण स्थितवान् । तस्यास्य पादो लेशो जगद्रूप इह मायाया पुन-रभवत् सृष्टिसंहाराभ्यां पुनः पुनरागच्छति । ततो मायायामागत्यानन्तर विष्वङ् विषु सर्वत्राञ्चतोति विष्व देवतिर्य-गादिरूपेण विविधः सन् व्यक्रामत् व्याप्तवान् । किं कृत्वा-साशनानशने अभि अभिलक्ष्य । अशनेन सह वर्तमान साशनमशनादिव्यवहारोपेत चेतनप्राणिजातम्, अनशन तद्रहितमचेतन गिरिनद्यादिकम्, ते अभिलक्ष्य स्वयमेव विविधो भूत्वा व्याप्तवानित्यर्थः । वास्तविकार्थः- त्रिपादूर्ध्व उदैदिति । त्रिपात् अपरिच्छिन्नज्ञानशक्त्यादिमान् वासुदेव - सङ्कर्षण- प्रद्युम्नरूपो नित्यमुक्तादिभिः परिचर्यमाणः । ऊर्ध्वे प्रकृतिमण्डलादुपरि परमव्योम्नि वैकुण्ठे । उदेत् उदगच्छत् । तस्यैवंभूतस्य जगत्स्रष्टृत्वादिकं न स्वप्रयोजनाय भवति, न वाऽन्यनियमाधीनम्, किन्तु कृपामूलकम् । पादोऽस्य इह लीलाविभूतौ में लीन हो जाता है, इसके लिये तो प्रमाण बताना पडेगा । कुलाल (कुम्हार) के न रहने पर केवल उसके सामर्थ्य से न तो घट पैदा ही होता है और न उसमें लीन ही होता देखा गया है । पृथिवी प्रभृति उपादानकारण मे ही घट आदि कार्य का लय होता है । कुलाल आदि निमित्तकारण से नही । पहले ऊर्ध्वं पद का अर्थ ऊपर वाला भाग किया गया है, उसी ऊर्ध्व शब्द का अर्थ अब अविद्या प्रभृति दुःखों से ऊपर स्थित परमात्मा अर्थ करना पूर्वोक्त शाब्द न्याय के विरुद्ध है । ' ततः' पद से उस परमात्मा के सामर्थ्य से सारा विश्व उत्पन्न होता है, यह अर्थ करना भी गलत है, क्योकि सामर्थ्य का यहाँ कोई प्रसंग नही है । दो तरह का जगत् विविध रूपों में भलीभाँति सब रूपो में व्याप्त हो जाता है, यह अर्थ भी ठीक नही है, क्योकि यह अर्थ तो ' अभिव्यक्रामत्' पद से ही प्राप्त हो जायगा, क्योंकि माभिमुख्य अर्थात् विविध रूप से आक्रमणशील हो गया, इस अर्थ में उससे कोई भिन्नता नही प्रतीत होती । मूल में तो ' व्यक्रामत्' पाठ है । इसके स्थान पर आपने ' अभिव्यक्रामत्' पाठ की कल्पना किस आधार पर की है? वास्तव में मन्त्र का अर्थ यह है - यह त्रिपात् पुरुष, जो कि संसार के स्पर्श से रहित ब्रह्म का ही स्वरूप है, इस अज्ञान के कार्य संसार से बाहर रहकर, इसके गुण- दोष से असंपृक्त रह कर अपने उत्कृष्ट स्वात्मस्वरूप में अवस्थित है । उस पुरुष का एक लेश ( पाद = अंश) यह जगत् माया ( अविद्या = अज्ञान ) मे पडकर बार- बार सृष्टि संहार के चक्र में पड़ता है, पैदा होता है और मरता है । माया में आने के बाद यह देव, तिर्यक् आदि नाना रूपो में व्याप्त हो जाता है । क्या करके? साशन और अनशन को अभिलक्षित करके । अशन के साथ रहने वाला अर्थात् भोजन के सहारे जीवन व्यवहार चलाने वाला चेतन प्राणी साशन कहलाता है और भोजन- व्यवहार से रहित अचेतन पर्वत, नदी आदि अनशन कहलाते है । वह पुरुष इन सब रूपों को धारण कर स्वयं ही विविध आकार में सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । (ऋ० सं० १०.९०.४) अर्थ - त्रिपादूर्ध्व उदैदिति । निःसीम ज्ञानशक्ति आदि से युक्त वासुदेव - संकर्षण-प्रद्युम्नस्वरूपी त्रिपात् पुरुष जिसकी नित्यमुक्त योगिजन आदि सेवा किया करते हैं, वह प्रकृति मण्डल से ऊपर परम व्योमरूप वैकुण्ठ में उद्गत होता है । इस प्रकार के उस पुरुष का जगत् की सृष्टि करने में अपना कोई प्रयोजन नही और न ही वह उसके करने में अन्य किसी नियम के पराधीन है, बल्कि
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वेदार्थपारिजातः १२४५ अभवत् अवातरत् । तदुक्तं वैकुण्ठसहितायाम् -'सर्वव्यापी विष्णुः स्वाच्छरीराद् जगत् त्रातु सङ्कर्षणमभावयत्, स प्रद्युम्नं सोऽप्यनिरुद्धमभावयत् । तस्मात् जगत्स्रष्टु ब्रह्माऽभवत् । एव चतुर्धा सव्यूह्य स्वात्मानं पुरुषोत्तमः । अण्डेभ्यः परतो नित्यं त्रिपादेन विराजते । ' इति । अनिरुद्धात्मा स भगवान् सृष्ट्यनुकूल सङ्कल्पं करोति । ततो योगनिद्रावसाने स एव विष्वक् समन्तात् व्यक्रामत् स्वसङ्कल्पेन समाक्रान्तवान्, 'बहु स्यां प्रजायेय' इति श्रुतेः । साशनं जङ्गमं देवमनुष्यादिरूपम्, अनशन स्थावर वृक्षगुल्मलतादिरूपम्, ते अभि उद्दिश्य स्थावर-जङ्गमात्मक कृत्स्नजगद्रूपेण बहुभवन सङ्कल्पमकरोत् । त्रिपात् पुरुषः संसाररहितो ब्रह्मस्वरूपः ॥ ऊर्ध्व उद् अस्मादज्ञानकार्यात् संसाराद् बहिर्भूतोऽत्रत्यैर्गुण- दोषैरस्पृष्ट उत्कर्षेण स्थितवान् । अस्य पादश्चतुर्थोऽशो लेशो वा । इह मायायां पुनरभवत् सृष्टिसहाराभ्यां पुनः पुनरागच्छत । सर्वस्य जगतः परमात्मलेशत्व भगवताऽप्युक्तम्- ' विष्टम्याहमिद कृत्स्नमेकाशेन स्थितो जगत्' ( भ० गी० १०।४२ ) । ततो मायायामागत्य अनन्तर विष्वङ् देव-मनुष्य- तिर्यगादिरूपेण विविधः सन् व्यक्रामद् व्याप्तवान् । किं कृत्वा? साशनानशने अभिलक्ष्य | साशन भोजनादिव्यवहारोपेतचेतनम्, अनशन तद्रहित गिरिनद्यादिकम्, साशन स्वर्गम् अनशन मोक्षं वा, तदुभय यथा स्यात्तथा स्वयमेव विविधो भूत्वा व्याप्तवानित्यर्थः || ४ || 'ततो विराडजायत विराजो अधि पुरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः || ' ( वा ० स ० ३१।५; ऋ ० सं ० १०।९ ०।५) । 'ततस्तस्माद् ब्रह्माण्डशरीरः सूर्यचन्द्रनेत्रो वायुप्राणः पृथिवीपाद इत्याद्यलङ्कारलक्षणलक्षितः सर्वशरीराणा समष्टिदेहो विविधै: पदार्थे राजमानः सन् विराडजायतोत्पन्नोऽस्ति । विराजोऽधि पूरुषः । तस्माद्विराजोऽधि उपरि पश्चाद् ब्रह्माण्डतत्त्वावयवैः पुरुषः सर्वप्राणिना जीवाधिकरणो देहः पृथक् पृथगजायत । स देहो ब्रह्माण्डावयवैरेव वर्धते, जगत्के सर्जन में एक मात्र उसकी कृपा ही कारण है । उस त्रिपात् पुरुष भगवान् का अवशिष्ट चतुर्थ पाद ऐश्वर्य की इस लीला भूमि पर उतरा । इसी बात को वैकुण्ठसंहिता में भी कहा गया है-' सर्वव्यापी भगवान् विष्णु ते जगत् की रक्षा करने के लिये अपने शरीर से संकर्षण को, उसले ( संकर्षण ने ) प्रद्युम्न को उसने अनिरुद्ध को निष्पन्न किया । तब जगत् की उत्पत्ति करने के लिये उसने ( ) अनिरुद्ध वे ब्रह्मा को पैदा किया । इस प्रकार भगवान् पुरुषोत्तम ने स्वयं अपने को हो चार रूपो में विभक्त किया । अनन्तकोटि ब्रह्माण्डो से परे त्रिपाद रूप से वह नित्य विराजमान है और वह अनिरुद्ध स्वरूप भगवान् सृष्टि के अनुकूल संकल्प करता है । 'बहु स्यां प्रजायेय' इस श्रुति से प्रतीत होता है कि- योगनिद्रा के समाप्त होने पर वही चारो ओर सर्वत्र अपने सकल्पमात्र से ही व्याप्त हो जाता है । देव-मनुष्यादिरूप जंगम तथा वृक्ष- लता-गुल्म आदि स्थावर को लक्ष्य कर स्थावर- जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत् के रूप में अपने को अनेक बनाने का संकल्प उसने किया । संसार से रहित वह त्रिपात् पुरुष ब्रह्म अज्ञान के कार्यभूत ससार से बहिर्भूत अर्थात् यहा के गुण-दोषों से असंस्पृष्ट रहकर अपने उत्कर्ष से स्थित रहा । उस पुरुष का चतुर्थ पाद ( अंश या लेश ) यहा माया में ही पुनः बना रहा, अर्थात् जगत् की सृष्टि और संहार करने लिये बार बार आता रहता है । 'यह समस्त जगत् परमात्मा का एक लेश है' । यह बात भगवान् ने स्वयं अपने श्रीमुख कही है । 'इस समस्त जगत् को मैं अपने एक अंश से व्याप्त कर रहा हू' ( भ० गी ० १०, ४२ ) । माया में आने के पश्चात् देव, मनुष्य, तिर्यक् आदि रूपों से विविध होकर उसने इस जगत् को व्याप्त किया, अर्थात् भोजनादि व्यवहार करने वाले चेतन और उस प्रकार का व्यवहार न करने वाले पर्वत, नदी आदि दोनो प्रकार के चराचर जगत् में विविध रूप से स्वयं ही व्याप्त हो गया ||४ || ' ततो विराडजायत ० ' पुरुष सूक्त के इस पाचवें मन्त्र का स्वामी दयानन्द ने यह अर्थ किया है - 'विराट् जिसका ब्रह्माण्ड के अलंकार से वर्णन किया है, जो उसी पुरुष के सामर्थ्य से उत्पन्न हुआ है, जिसको मूलप्रकृति कहते हैं, जिसका शरीर ब्रह्माण्ड के समतुल्य है, जिसके सूर्य और चन्द्रमा नेत्रस्थानीय है, वायु जिसका प्राण और पृथिवी जिसका पग है, इत्यादि लक्षण वाला जो यह समष्टि देह है, वही विराट् कहलाता है । वह प्रथम कला रूप परमेश्ववर के सामर्थ्य से उत्पन्न होकर प्रकाशमान हो रहा है । (विराजो 1
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वेदार्थपारिजातः १२४६ नष्टः संस्तस्मिन्नेव प्रलोयते । परमेश्वरस्तु सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽत्यरिच्यतातिरिक्त: पृथग्भूतोऽस्ति । पश्चाद् भूमिमथो पुरः । पुरः पूर्वं भूमिमुत्पाद्य धारितवांस्ततः पुरुषस्य सामर्थ्यात् स जीवोऽपि देह धारितवानस्ति । स च पुरुषः परमात्मा ततस्तस्माज्जीवादप्यत्यरिच्यत पृथग्भूतोऽस्ति ( पृ० १३६-१३७ ) । इत्येव व्याख्यातम्, तत्रोच्यते--ततस्तस्मादिति विशेषनिर्देशो युक्तः । एव विराट्पुरुषः क इत्यपि वक्तव्य- मासीत् । ब्रह्माण्ड शरीरं यस्य स ब्रह्माण्डशरीरः कः? कि समष्टिस्थूलशरीरोपहितचेतनरूप ईश्वरः, समष्टिप्रपञ्चा- भिमानी विराड् जीवो वा स्वोक्रियते? आद्ये, ईश्वरानेकत्वापत्तिः । अन्त्येऽसम्भवः । त्वद्रीत्याणुजीवस्य समष्टिप्रपञ्चा- भिमानासम्भवात् । विराज ईश्वरत्वे जीवत्वे वाऽनङ्गीक्रियमाणे विविधैः पदार्थः को राजमानः स्यात्? ब्रह्माण्ड- शरीरस्य शरीरी च कः स्यात्? पुरुषशब्दस्यात्र जीवाधिकरणो जीवोऽर्थ इत्यत्रापि बीजं वक्तव्यम्? एकस्मिन्नेव प्रकरणे पुरुषशब्दस्यार्थद्वयाङ्गीकारेऽपि बोजमपेक्षितम् । स जात इत्यत्रापि जात इत्यनेन वर्धते नष्ट. संस्तस्मिन्नेव प्रलीयत इत्यर्थवैचित्र्यं किमाधारकम्? पूर्वमत्यरिच्यतेत्यस्याश्रुतः परमेश्वर. कर्ता कुतोऽध्याह्रियते? 'स जातो अत्यरिच्यत' इति प्रत्यक्ष दृश्यमान सम्बन्ध. कुतोऽपनोद्यते? उपस्थितेन वेदनाकाङ्क्षापूर्ती सम्भवन्त्या कुतोऽनुपस्थित- कल्पनयाकाङ्क्षा पूर्यते । एवं पुरः पूर्वं भूमिमुत्पाद्य धारितवानित्यत्र उत्पाद्य वारितवानिति कस्य शब्दस्यार्थ.? जोवोऽ- पि तत्सामर्थ्याद्देह धारितवान् इत्यपि निराधारम् तादृशार्थप्रतिपादकशब्दाभावात् । स च पुरुषः परमात्मा तस्माज्जी- वादत्यरिच्यत पृथग्भूतोऽस्तीत्यपि निरर्गलम्, 'तत्' 'अत्यरिच्यत' इतिपदयोः स्वसन्निहितपदसम्बन्धेन शान्ताकाङ्क्षयोः पुनराकाङ्क्षानुत्थानेन ' तत' इत्यप्रकृत जीव परिकल्प्य तस्यात्यरिच्यतेतिपदेन सम्बन्धानुपपत्तेः । तस्मादत्रापि मदुक्त एवार्थो ग्राह्य. । अधि ० ) उस विराट् के पश्चात् ब्रह्माण्ड के तत्त्वरूप अवयवो से सब अप्राणी और प्राणियो का देह पृथक् पृथक उत्पन्न हुआ है । जिसमें सब जीव वास करते है और जो देह उसी पृथिवी आदि के अवयव अन्न आदि ओषधियों से वृद्धि को प्राप्त होता है, ( स जातो अत्यरिच्यत) सो विराट् परमेश्वर से अलग और परमेश्वर भी इस ससार रूप देह से सदा अलग रहता है । (पश्चाद् भूमिमथो पुरः ) फिर भूमि आदि जगत् को उत्पन्न करके पश्चात् उनको धारण कर रहा है' ( पृ० १३७) । इस पर हमारा यह कहना है-'ततः' पद का 'तस्मात्' अर्थ करते समय उस विशेष का निर्देश होना चाहिये, जिससे कि विराट् की उत्पत्ति होगी । इसी तरह से वह विराट् पुरुष कौन है? इसको भी बताना चाहिये । ब्रह्माण्ड जिसका शरीर है, वह कौन है? यह समष्टि स्थूल शरीर से उपहित चेतन रूप वाला ईश्वर है या समष्टि प्रपंच का अभिमानी विराट् जीव है? प्रथम पक्ष में ईश्वर की अनेकता माननी पड़ेगी और अन्तिम पक्ष बन ही नही सकता, क्योकि आपके मत से अणु जीव समष्टि प्रपंच का अभिमानी नही बन ?सकता । विराट् को ईश्वर अथवा जीव भी न मानने पर विविध पदार्थों से कोन शोभित होगा इस ब्रह्माण्ड शरीर का शरीरी कौन होगा? इस मन्त्र में पुरुष शब्द का अर्थ जीव ( प्राण ) को धारण करने वाला प्राणी अर्थ होता है, इसमें भी प्रमाण बताना पड़ेगा । एक ही प्रकरण मे पुरुष शब्द के दो तरह के अर्थ करने में कोई कारण होना चाहिये । 'स जातः' यहा भी 'जात' पद का ' बढता है और नष्ट होकर उसी में लीन हो जाता है' यह विचित्र अर्थं करना किस तरह सभव हो सकता है । ' अत्यरिच्यत' इस पद से पहले मधुत 'कर्ता परमेश्वर' इनका अध्याहार कहाँ से होता है? 'स जातो अत्यरिच्यत' इन प्रत्यक्ष श्रूयमाण पदो के साथ उसका संबन्ध किस लिये छोड़ दिया गया है? उपस्थित पद से जब आकांक्षा की पूर्ति हो सकती है, तो फिर अनुपस्थित से आकांक्षा की पूर्ति करने का प्रयत्न किस आधार पर किया जाता है? इसी तरह से पहले भूमि को उत्पन्न किया और बाद में धारण किया, यहां भी 'उत्पन्न करके धारण किया' यह अर्थ किन शब्दो का है? जीव ने भी उसके सामर्थ्य से देह धारण किया, यह अर्थ भी निराधार है, क्योकि इस तरह के अर्थ के बोधक शब्द वहां उपलब्ध नहीं हैं । वह पुरुष अर्थात् परमात्मा उस जीव से पृथक हैं, यह अर्थ भी निराधार है, क्योंकि 'ततः' और 'अत्यरिच्यत' इन दोनों पदो की आकाक्षा जब अपने पास में विद्यमान पद के साथ संबन्ध होने से ही निवृत्त हो जाती है, फिर दुबारा आकाक्षा का उत्थान जब नहीं होगा, तो उस स्थिति मे 'ततः' पद से अप्रकृत जीव की कल्पना कर उसका 'अत्यरिच्यत' पद से संबन्ध करना उचित नहीं है । इस लिये यहा भी हमारा अर्थ हो ठीक है । वास्तव में इसका अर्थ यह है- ---- ----.. 1004 । (ऋ० सं ० १०, ९०. ५ )
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वेदार्थपारिजातः १२४७ वास्तविकार्थ -ततो विराडजायतेति । ततः सङ्कल्पाद्धेतोः, विगड़ महदादिरूपेण विविधं राजत इति विराट् प्रकृतिः, अजायत महदाद्यण्डपर्यन्तरूपेण अजायत । अद्वारका सृष्टिरेषा । अथ सद्वारका सृष्टि वक्तु चतुर्मुखसृष्टि रुच्यते - विराजः अण्डपर्यन्तप्रकृतिमण्डलस्य, अधि अनन्तरम्, पुरुषः चतुर्मुखोऽजायत । अथवा -तत परमपुरुषाद् विराड् विशेषेण राजत इति विराड् अनिरुद्धः, अजायत परमपुरुषोऽनिरुद्ध- रूपेण अवतीर्ण इत्यर्थः । तदुक्त मोक्षधर्मे - 'ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा विभुर्नारायणो विराट् । अनिरुद्ध इति प्रोक्त अंशानां प्रभवाप्यये' ॥ इति । विराजो विराटपुरुषादनिरुद्धाद् अधिपुरुषः अधिकारिपुरुषः चतुर्मुखः अजायत । स चतुर्मुखो भगव- कृपया प्रवृद्धकायोऽभवत्, येन अतिमहदपि वस्तु कर्तुं शक्नुयात् । तद्वृद्धिमेव दर्शयति - पश्चाद् भूमि भूमे पश्चादित्यर्थ, भूमेरधः । अथो भूमि पुरः भूमेरूध्वं च अत्यरिच्यत । भूमिशब्दो ब्रह्माण्डपर्यन्तस्य उपलक्षणम्, ब्रह्माण्डस्य बहिरन्तश्च व्यापकोऽभूत् । अथवा -' विष्वङ् व्यक्रामतेति पूर्वोक्तांशस्यैवात्र प्रपञ्चः । तस्मादादिपुरुषाद् त्रिराड् ब्रह्माण्डदेहोऽ-जायत । विविधानि वस्तूनि राजन्तेऽत्रेति विराट् । विराजो अघि विराड्देहस्य उपरि तमेव देहमधिकरणं कृत्वा, पुरुषः तद्देहाभिमानी कश्चित् पुमानजायत । सोऽय सर्ववेदान्तवेद्य परमात्मा स्वयमेव स्वकीयया मायया विराड़देह ब्रह्माण्डाख्यं सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत् । तदुक्तमाथर्वणे नृसिंहोत्तर- तापनीये - 'स वा एष भूतानीन्द्रियाणि विराज देवताः कोशाश्च सृष्ट्वा प्रविश्यामूढो मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव' ( नृ० ता० २।१।९ ) । स जातो विराट्पुरुषः अत्यरिच्यत अतिरिक्तोऽभूत्, विराव्यतिरिक्तो देवतिर्यङ्मनुष्यादिरूपोऽ- भूत् । पश्चाद् देवादिजीवभावादृध्वं भूमि ससर्जेति शेषः । अथो भूमिसृष्टेरनन्तरं पुरः तेषां जीवानां शरीराणि सप्त- धातुभिः पूर्यन्त इति पुर· ससर्ज ॥५|| ५॥|| 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूंस्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ ' ( वा ० सं ० ३१।६; ऋ ० स ० १० / ९ ०।६) । अर्थ - ततो विराडजायतेति । उसके संकल्प करने के कारण प्रकृतिस्वरूप विराट्, क्योंकि महदादि विविध रूपों में विराजमान रहने से उसे विराट् कहते हैं, पैदा हुआ, अर्थात् महत् से लेकर अण्ड तक के रूपों को धारण किया । यह अद्वारका ( बिना किसी द्वार = माध्यम के ) सृष्टि है । इसके पश्चात् सद्वारका सृष्टि बताने के लिये चतुर्मुख सृष्टि को बताया जा रहा है । अण्ड तक -के प्रकृतिमण्डल के अनन्तर वह पुरुष चतुर्मुख रूप से प्रकट हुआ । अथवा - उस परम पुरुष से अत्यधिक शोभा संपन्न अनिरुद्ध उत्पन्न हुआ, अर्थात् वह परम पुरुष ही अनिरुद्ध रूप से अवतीर्ण हुआ । यही बात मोक्षधर्म में भी कही गई है- 'जगत् का स्रष्टा व्यापक ईश्वर विराट् नारायण ही अनिरुद्ध है । विराट् पुरुष अनिरुद्ध से अधिकारी पुरुष चतुर्मुख हुआ । भगवत्कृपा से वह चतुर्मुख प्रबुद्ध शरीर (महान् शरीर ) वाला बन गया, जिससे कि अत्यन्त महान् वस्तु के निर्माण में वह समर्थ हो सके । उसके शरीर की वृद्धि को बताते हैं — भूमि के नीचे और उसके ऊपर अर्थात् ब्रह्माण्ड के भीतर बाहर सर्वत्र व्याप्त हो गया । अथवा 'विष्वड् व्यक्रामत्' इस पूर्वोक्त अंश को ही विस्तार से बताया जा रहा है । उस आदि पुरुष से विराट् अर्थात् ब्रह्माण्डदेह हुआ । जिसमें विविध प्रकार की वस्तुएं विराजमान रहती हैं, उसे विराट् कहते है विराट् देह के ऊपर अर्थात् उसी देह को आधार बनाकर उस देह का अभिमानी कोई पुरुष पैदा हुआ । वही सम्पूर्ण वेदान्तो का वैद्य परमात्मा स्वयं ही अपनी माया से ब्रह्माण्ड नामक विराट् देह को पैदाकर उसमें जीव रूप से प्रविष्ट होकर उस ब्रह्माण्ड का अभिमानी देवतात्मा जीव हुआ । इसी आशय को अथर्व वेद के नृसिंहतापनीय उपनिषद् में बताया गया है । 'उसी पुरुष ने भूतो को इन्द्रियों को, विराट को, देवताओं को और कोशों को पैदाकर तथा उसमें प्रविष्ट होकर उसमें माया के कारण मूढ हुआ सा व्यवहार करता रहता है' (नृ० ता० उ० २११, ९ ) । उस उत्पन्न हुए विराट् पुरुष ने विराट् से व्यतिरिक्त होकर देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि रूपो को धारण कर लिया । उसके पश्चात् देवना आदि जीवभाव को ग्रहण करने के बाद उसने भूमि को पैदा किया । भूमि की सृष्टि करने अनन्तर सप्त धातुओ के द्वारा उन जीवो के शरीरों की सृष्टि की ॥५॥ 1
II
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वेदार्थपारिजातः १२४८ वर्षन्ति सिश्चन्ति क्षुन्निवृत्त्यादिकारकमन्नादिवस्तु ' ' ' तस्मात् परमेश्वरात् पृषदाज्य पृषु सेचने धातुः ॥ आज्यमित्यञ्जनोपलक्षणम् । यावद्वस्तु यस्मिस्तत् पृषद् आज्यं घृतं मधुदुग्धादिकम् । पृषदिति भक्ष्यान्नोपलक्षणम्बोध्यम् । तत्सर्वमीश्वरेण स्वल्पं स्वल्प जीवैश्च ,जगति वर्तते तावत्सवं पुरुषात् परमेश्वरसामर्थ्यादेव जातमिति । य आरण्या वनस्थाः पशवः ये च ग्राम्या वायुसहचरितान् पक्षिणश्चक्रे ।सम्यग्धारितम् । अतः सर्वेरनन्यचित्तः परमेश्वर एवोपास्यो नान्यश्चेति चकारादन्यान्ग्रामस्थास्तान् सर्वान् स एव च । स च परमेश्वरो वायव्यान् सूक्ष्मदेहधारिणः कीटपतङ्गादोनपि कृतवान्' ( पृ ० १३७ ) । पुरुषसामर्थ्यमित्यर्थः कुतो इति यद् व्याख्यातम्, तत्रोच्यते - तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत इत्येषा जीवैश्चशब्दानांधारितमित्यप्युदक्षरम्, तथा? - गृह्यतेमन्त्रार्थाभावात्उपस्थित। नहिपरित्यज्यानुपस्थितकल्पनेसर्व वस्तु जीवैर्धारयितु मानाभावात्शक्यम् । ईश्वर। सर्वमीश्वरेणएवोपास्य इत्यनेनैवान्यनिषेधेस्वल्पं सिद्धे नान्यश्चेति किमर्थ सम्भवति, तादृशशक्त रभावात् । मनुधावनायासः? यद्यपि परमेश्वर उपास्यस्तथापि नानेन मन्त्रेण तद्द्बोधनं वास्तविकार्थः — तस्माद्यज्ञाद् सर्वहुत इति । तस्माद् आत्मसमर्पणरूपेण यज्ञेनाराघितात् पुरुषाद् लब्धसृष्ट्यनु-, हुतवतः स्वीय- कूलज्ञानशक्त्यादिकश्चतुर्मुखो यथापूर्वं जगत् ससर्ज । सवं जुहोतीति सर्वहुत् तस्मात् सर्वं भगवते स्वात्मान सर्वभरं भगवते समर्पितवतस्तस्मात् । अथवा — कौस्तुभस्थानीयस्य जीवात्मनोऽत्युत्तमतया तमेवानर्घतम समर्पितवताऽनेन सर्वं समर्पितप्रायमिति सर्वहुत् । यद्वा -सर्वशब्दवाच्यो भगवान् तस्मै जुहोतीति सर्वहृद् भगवदुद्देश्य- कात्मसमर्पणरूपयज्ञकृत् । यज्ञात् यजनीयात् । तस्मात् चतुर्मुखात् । पृषदाज्य दधिमिधाज्यस्थानीयतत्तद्विचित्ररूपं सर्वहुत: सर्वहोमा- सृज्यवस्तुजननहेतुशुक्लनीलादि । संभृतन् उत्पन्नम् । यदा त्विद वाक्यद्वय न जगत्सृष्टिपरम्, तदा ) 'तस्माद्यज्ञात्० ' इस छठे मन्त्र का अर्थ स्वामी दयानन्द ने यह किया है— ' पूर्वोक्त पुरुष से ही ( संभूतं पृषदाज्यम् क्योकि उसी के सामर्थ्य से ये सब सब भोजन, वस्त्र, अन्न, जल आदि पदार्थों को सब मनुष्य लोगो ने धारण अर्थात् प्राप्त किया हैहै,कि उसको छोड़कर किसी दूसरे की पदार्थ उत्पन्न हुए और उन्ही से सबका जीवन भी होता है । इससे सब मनुष्य लोगो को उचित पक्षियो को भी बनाया है । उपासना न करें । (पशूंस्तांश्चक्रे ० ) ग्राम और वन के सब पशुओ को भी उसी ने उत्पन्न किया है, तथा सब सभी सूक्ष्म देहधारी कीट, पतंग आदि जीवो के देह भी उसी ने उत्पन्न किये है' ( पृ० १३७-१३८) । इस पर हमारा यह कहना है - 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत:' इन शब्दो का अर्थ आप पुरुष और पुरुष का सामर्थ्य किस ईश्वर ने सब कुछ धारण कर? आधार पर करते हैं प्रस्तुत अर्थ को छोडकर अप्रस्तुत अर्थ की कल्पना में कोई प्रमाण होना चाहिये । यह अर्थ है ही,,, रक्खा है और इसमें का कुछ अंश जीवो ने भी धारण किया है ऐसा अर्थ करना भी सर्वथा निरर्गल है क्योंकि मन्त्र का उपास्य है नहीं, इस अर्थ के बोधक अक्षर उसमे विद्यमान ही नही है । जीव सब वस्तुओ को धारण कर भी नही सकते । ईश्वर ही के शब्दों के, ' ' इसी से अन्य किसी की भी उपासना का निषेध सिद्ध हो जायगा पुनः अन्य का निषेध करने के लिये नान्य इस तरह की प्रयोग तक दौड़ लगाना व्यर्थ ही है । यद्यपि परमेश्वर उपास्य है, किन्तु इस मन्त्र से उसका बोध नहीं हो सकता, क्योंकि इस अर्थ अभिव्यक्ति में समर्थ शब्दो का यहाँ अभाव है । वास्तव में इस मन्त्र का अर्थ इस तरह किया जाना चाहिये--... ----........... 485 01.0 (ऋ० सं० १०.९०.६) अर्थ –तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत इति । उस आत्मसमर्पण रूप यज्ञ के द्वारा आराधित पुरुष से सृष्टि के अनुकूल ज्ञानशक्ति को प्राप्त कर चतुर्मुख ने यथापूर्व जगत् का सृजन किया । 'सर्वं जुहोतीति सर्वहुत् तस्मात् भगवान् के लिये सबका हवन करने वाले, - अर्थात् अपना समस्त भार भगवान् को समर्पण करने वाले उस चतुर्मुख से, अथवा — कौस्तुभ स्थानापन्न जीवात्मा अत्युत्तम होने के कारण उसी बहुमूल्य अपनी आत्मा का अर्पण करने वाले चतुर्मुख से, अर्थात् इसने अपना सभी कुछ भगवान् को समर्पित कर दिया, इसलिये इसे सर्वहुतु कहते हैं । अथवा --'सर्व' शब्द का वाच्य जो भगवान् उसके लिये आहुति देने वाला ' सर्वहुत्' कहा जाता है । अर्थात् भगवान् को उद्देश्य कर आत्म समर्पण रूप यज्ञ करने वाला ' सर्वहुत्' कहा जाता है । उस यजनीय चतुर्मुख से पृषदाज्य अर्थात् दषि
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वेदार्थपारिजातः १२४६ घिष्ठानभूतात् पृषदाज्य सम्भृतम् । यद्वा -सर्वं हूयतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या सर्वहुत् नारायण एव । सर्वाय हूयतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या तु तादृशयज्ञपरः । तस्मात् तादृशाद्यज्ञात्, यज्ञाथं प्रयोजनस्य हेतुत्वविवक्षया पञ्चमी, अध्ययनाद् वसती-तिवत् । पृषदाज्यं दधिमिश्राज्यं सम्भृत कल्पितम् । वायव्यान् वायुमार्गचरणशीलान् पक्षिरूपान् पशून् चक्रे । आरण्यान् अरण्ये भवान्, ये ग्राम्या ग्रामे भवाः तान् च चक्रे । तथा च विष्णुपुराणे प्रथमाशे पञ्चमाध्याये - 'गौरजः पुरुषो मेषश्चाश्वाश्वतरगर्दभाः । एतान् ग्राम्यान् पशनाहुरारण्यांश्च निबोध मे । श्वापदा द्विखरा हस्तिवानराः पक्षिपञ्चमाः । औदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमाश्च सरीसृपाः ॥ इति । सर्वहुत: सर्वात्मक. पुरुषो यस्मिन् यज्ञे हूयते सोऽय सर्वहुत् । तादृशात् तस्मात् पूर्वोक्ताद् मानसाद् । तथायज्ञात् पृषदाज्य दधिमिश्रमाज्य सम्भृत सम्पादितम् । दधि चाज्य चेत्येवमादिभोग्यजात सर्व सम्पादितम् , तथा ये च ग्राम्यावायव्यान् वायुदेवताकान् लोकप्रसिद्धान् आरण्यान् पशून् चक्रे उत्पादितवान् । आरण्या हरिणादयः स्थेत्याह वायुर्वागवाश्वादयः, तानपि चक्रे । पशूनामन्तरिक्षद्वारा वायुदेवत्यत्व यजुर्ब्राह्मणे समाम्नायते -' वायवः अन्तरिक्षस्याध्यक्षः । अन्तरिक्षदेवत्याः खलु वै पशवः । वायव एवैनान् परिददाति' ( ते ब्रा ० ३।२।१।३) इति || ६ || ० 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दासि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत || ' ( वा ० सं ३१।७; ऋ ० सं ० १०।९ ० ७ ) इत्यस्य दयानन्दीय व्याख्यान तत्खण्डन च पूर्वमेवोक्तम् । , सामानि सामवेदाः अर्थ: -तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच इति । तस्मात् चतुर्मुखात्, ऋच एकविंशतिशाखाः गायत्र्यादीनि, यजुः सहस्रशाखा:, जज्ञिरे तत्सर्गीयप्रथमोच्चारणविषयत्वरूपाम् उत्पत्ति प्रापुः । तस्मादेव छन्दासि तत्सर्गीयप्रथमोच्चारण-नवाधिकशतशाखो यजुर्वेदः अजायत । इतरसापेक्षोच्चारणेषु प्राथमिकत्वस्य विवक्षितत्वादेव विषयतैव उत्पत्तिः । मे हेतुभूत शुक्ल, नील आदि को मिश्रित आज्य के स्थान में तत् तत् विचित्र स्वरूप मे सर्जन की जाने वाली वस्तुओ को पैदाकेकरनेअधिष्ठानभूत सर्वहुत् से पृषदाज्य उत्पन्न उत्पन्न किया । जब इन दो वाक्यो को जगत सृष्टि-परक न माना जाय, तब समस्त होम । किन्तु ' सर्वाय हूयतेऽस्मिन्' इस व्युत्पत्ति से हुआ, अथवा ' सर्व हूयतेऽस्मिन्' इस व्युत्पत्ति से सर्वहुत् का अर्थ नारायण' अर्थात्ही हैयज्ञ के लिये ऐसा अर्थ करना चाहिये, क्योकि ' ' ' ' ' पूर्वोक्त यज्ञपरक यह सर्वहुत् शब्द है । उस तस्माद् यज्ञात् का अर्थ यशार्थम् जैसे- अध्ययनाद् वसति । पुषदाज्य का अर्थ यहाँ पर प्रयोजन की हेतुत्व के रूप में विवक्षा से पञ्चमी का प्रयोग किया गया है । में होने वाले और ग्राम में होने वाले पशुओ को दविमिश्रित आज्य है । वायु मार्ग में चलने वाले पक्षि रूप पशुओ को बनायागया है-। अरण्य'गाय, अज, पुरुष, मेष, अश्व, अश्वतर, गर्दभ आदि - बनाया । जैसा कि विष्णुपुराण के प्रथम अंश के पञ्चम अध्याय मे कहा औदक (जल के ) पशु और सरीसृप ये आरण्य पशु कहे इन पशुओं को ग्राम्य-पशु कहते है और श्वापद, द्विदुर, हस्ति, वानरसर्वहुत्, पक्षीकहते, हैं । उस पूर्वोक्त मानस यज्ञ से पृषदाज्य का सम्पादन ' -, जाते हैं । सर्वात्मक पुरुष जिस यज्ञ में हवन किया जाता है उसे किया गया । उसी तरह वायुदेवता के लोकप्रसिद्ध आरण्यक, किया गया अर्थात् दषि आज्य आदि सभी भोग्य वस्तुओ का सम्पादन को भी बनाया गया । अन्तरिक्ष के माध्यम से पशुओ को पशुओं को पैदा किया गया । आरण्य हरिण आदि और ग्राम्य गाय, अश्वकी अध्यक्षआदि है । तुम लोग वायुदेवताक हो । अतः ये पशु अन्तरिक्ष वायु देवताकयजुर्वेद के ब्राह्मण में बताया गया है -' वायु अन्तरिक्ष) ॥६ ॥
देवता वाले हैं । वायु हो इन्हें देता है । ' (तै ० ब्रा० ३.२.१.३ ॥ (ऋ ० सं ० १०, ९ ०, ७) कर उसका खण्डन पहले ही वेदोत्पत्ति प्रकरण में किया ' तस्माद्यज्ञात्० ' इत्यादि मन्त्र की दयानन्द कृत व्याख्या को उद्धृत जा चुका है । इसका वास्तविक अर्थ यह है- का ऋग्वेद, एक हजार शाखाओं का सामवेद उसीसे गायत्री आदि छन्द और एक तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच इति । उस चतुर्मुख से इक्कीस शाखाओ सौ नौ शाखा का यजुर्वेद हुआ । उत्पन्न हुआ, अर्थात् उस सर्ग में प्रथमोच्चारण का विषय बना । १५७
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वेदार्थपारिजातः १२५० तत्सर्गीयप्रथमोच्चारणविषयत्वरूपोत्पत्तिरेव सृष्टिः । तेन वेदानां तत्सर्गीयचतुर्मुखकर्तृकप्राथमिको च्चा + रणविषयत्वरूपं चतुर्मुखजन्यत्वमपि यद्यपि न सम्भवति, तथापि इतरसापेक्षोच्चारणेषु प्राथमिकत्वस्य विवक्षितत्वान्न दोषः । तस्मात् परमपुरुषाद्वा वेदानां तादृशोत्पत्तिः । तस्यैव चतुर्मखं प्रत्युपदेष्टृत्वात् । प्रवाहानादित्वं च स्वसमान- जातीय- शब्दासमानकालीन प्रागभावाप्रतियोगित्वम् । तादृशध्वसाप्रतियोगित्व च प्रवाहनित्यत्वम् । स्वसमानजातीयत्व च स्ववृत्त्यानुपूर्वीवत्त्वरूपम् । तत्तदुच्चारणभेदेन आनुपूर्वीभेदे तु स्ववृत्त्यानुपूर्वी सजातीयानुपूर्वीसत्त्वमेव साजात्यम् । सर्वहुतस्तस्मात् पूर्वोक्ताद् यज्ञाद् ऋचः सामानि जज्ञिरे उत्पन्नाः । तस्मात् छन्दांसि गायत्र्यादीनि जज्ञिरे । तस्माद् यजुः अपि अजायत || ७ || 'तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः ॥ ' ( वा० सं ० ३१।८; ऋ० सं ० १० / ९ ०१८) | 'तस्मात् परमेश्वरसामर्थ्यादेवाश्वास्तुरङ्गा अजायन्त । ग्राम्यारण्यपशूनां मध्येऽश्वादीनामन्तर्भावादेषामुत्तम- गुणत्वप्रकाशनार्थोऽयमारम्भः । ये के चोभयादत उभयतो दन्ता येषां ते उभयादतः । ये केचिदुभयादत उष्ट्रगभा- दयस्तेऽप्यजायन्त । गावो ह तथा तस्मात् पुरुषसामर्थ्यादेव गावो धेनवः किरणाश्चेन्द्रियाणि च जज्ञिरे जातानि । तस्मादेव चाजादयश्छागा अवयश्च जाता उत्पन्नाः ' ( पृ० १३८ ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानम् । तदेतत् समालोच्यते - क उत्तमगुणा येषां प्रकाशनार्थोऽयमारम्भः? उभयादत इति दैघ्यं तु कथम्? तस्मादयमर्थोऽनुसन्धेयः -- तस्मादश्वा अजायन्त इति । वेदाविर्भाववर्णनात् तत्प्रतिपाद्यस्य यज्ञस्यापि सृष्टिरुक्ता भवति । तदर्थं यज्ञोपयोगिपदार्थसृष्टिरभ्युच्यते । तस्माद् ब्रह्मणः । अत्र तस्मादित्यस्य जनिधातोश्च पुनः पुनरुपादानं स्थाना- जहा उच्चारण अन्यसापेक्ष हो, वहा किसी उच्चारण विशेष की प्राथमिकता होना विवक्षित होने से 'उत्पत्ति' का अर्थ यहा पर 'तत्सर्गीय प्रथमोच्चारण विषयता' ही करना चाहिये । उस सर्ग की प्रथमोच्चारणविषयतारूप उत्पत्ति ही वेद की सृष्टि है । इस कारण यद्यपि उस सगँ के चतुर्मुख से किये गये प्राथमिकोच्चारण की विषयतारूप चतुर्मुखजन्यत्व वेदों में संभव नही हो पाता, तथापि अन्यसापेक्षोच्चारणों में उसकी प्राथमिकता विव- क्षित होने से कोई दोष नही है । अथवा उस परम पुरुष से वेदो की उक्त प्रकार की उत्पत्ति होती है, क्योंकि चतुर्मुख का उपदेष्टा वही परम पुरुष है । अपने समान जाति वाले शब्दों के समकाल में न रहनेवाले प्रागभाव का प्रतियोगी न होना ही प्रवाह की अनादिता कही जाती है और तादृश ध्वंस का प्रतियोगी न हो पाना प्रवाह की नित्यता है । अपनी आनुपूर्वी से युक्त होना स्वसमानजातीयता है । प्रत्येक उच्चारण के भेद से आनुपूर्वी के भिन्न होते पर स्ववृत्ति आनुपूर्वी की सजातीय आनुपूर्वी का होना ही साजात्य है । पूर्वोक्त यज्ञ से ऋचाएँ तथा साम उत्पन्न हुए । उससे गायत्री आदि छन्द उत्पन्न हुए । उससे यजु भी हुआ || ७|| ' तस्मादश्वा अजायन्त० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ दयानन्द ने यह किया है- ' उसी पुरुष के सामर्थ्य से और बिजली आदि सब पदार्थ उत्पन्न हुए हैं । ( ये के चोभयादतः) जिसके मुख में दोनो ओर दात होते हैं, उन पशुओंअश्वको अर्थात्'उभयदतघोड़े,, ( ),, 'कहते हैं वे ऊँट गधा आदि उसी से उत्पन्न हुए है । गावो ह ज० उसी से गोजाति अर्थात् गाय पृथिवी किरण ( ) ' ( )उत्पन्न हुई है । तस्माज्जाता अ० इसी प्रकार छेरी और भेंडें भी उसी कारण उत्पन्न हुई है १० १३८ और इन्द्रियसमालोचना में हमारा कहना है कि वे कौन से उत्तम गुण हैं? जिनका प्रकाशन करने के लिये यह उद्यम किया| दयानन्दजा की इस व्याख्या की? ' 'इस पद में दीर्घं कैसे हुआ इसलिये......... दयानन्दीय अर्थ को छोड़कर भिन्न अर्थ का अनुसन्धान करना चाहिये- रहा है । उभयादतः •.॥ (ऋ० सं० १०, १०, ८) अर्थ— तस्मादश्वा अजायन्त इति । वेद के आविर्भाव का प्रतिपादन करने से ही भी अर्थात् हो जाता है । उसके लिये यज्ञोपयोगी पदार्थों की भी सृष्टि का प्रतिपादन किया तत्प्रतिपाद्य यज्ञ की सृष्टि का प्रतिपादन जा रहा है । इस ऋक् में 'तस्मात्' और