वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 351–360

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 351–360

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वेदार्थ पारिजातः १२५१ वान्तरभेदप्रदर्शनार्थम् । तदुक्तं विष्णुपुराणे प्रथमाशे पञ्चमाध्याये --' गायत्र च ऋचश्चैव त्रिवृत्स्तोमं रथन्तरम् । अग्निष्टोम च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् ॥ यजूषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोम पञ्चदश तथा । बृहत्साम तथोक्थ्य च दक्षिणा- दसृजन्मुखात् । सामानि जगतीच्छन्दः स्तोम सप्तदश तथा । वैरूपमतिरात्र च पश्चिमादसृजन्मुखात् ॥ एकविंश+ मथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च । अनुष्टुभं च वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ॥ ' ( ५३-५६) इति । 'अवयो वक्षसश्चक्रे मुखतोऽ- जान् स सृष्टवान् । सृष्टवानुदराद् गाश्च पाश्वभ्या च प्रजापति । पद्भ्या चाश्वान् समातङ्गान् रासभान् गवयान् मृगान् । उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कनन्याश्च जातय: ॥ ( ४८-४९ ) इति । तस्मात् पूर्वोक्ताद् यज्ञात् अश्वा अजायन्त उत्पन्नाः । तथा ये के च अश्वव्यतिरिक्ता गर्दभा अश्वतराश्च, उभयादतः ऊर्ध्वाधोभागयोर्दन्तयुक्ताः सन्ति तेऽप्य- जायन्त, छान्दस दैर्घ्यम् । तथा तस्माद् यज्ञाद् गावश्च जज्ञिरे । किञ्च तस्माद् अजावयश्च जाताः || ८|| ' तं यज्ञं वर्हिषि प्रौक्षन् पुरुष जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये । ' ( वा० सं ० ३१।९; ऋ०स० १०।९०।९ ) । ' यमग्रतो जातं जगत्कर्तार पुरुष यज्ञ सर्वपूज्यं परमेश्वरं बर्हिषि हृदयान्तरिक्षे प्रौक्षन् प्रकृष्टतया यस्यैवाभिषेकं कृतवन्तः कुर्वन्ति करिष्यन्ति चेत्युपदिश्यते परमेश्वरेण तेन परमेश्वरेण पुरुषेण वेदद्वारोपदिष्टास्ते देवा विद्वांसः साध्या ज्ञानिन ऋषयो मन्त्रद्रष्टारश्च ये चान्ये मनुष्यास्त परमेश्वस्मयजन्तापूजयन्त । अनेन किं सिद्धम्? सर्वे मनुष्याः परमेश्वरस्य स्तुतिप्रार्थनोपासनपुरःसरमेव सर्वकर्मानुष्ठानं कुर्युरित्यर्थः' ( पृ० १३ ९ ) इति दयानन्दीये व्याख्यान उच्यते- त्वद्रीत्या जगत्कर्ता कदा केन रूपेणाविर्भूतः, निराकारस्य तस्य सर्वदैकरूपत्वात् । अभिषेकश्च दुग्ध- जलादिभिर्भवति । सोऽपि कथं निराकारस्य सम्भवति? बर्हिषीत्यस्य हृदयान्तरिक्षं कथमर्थः? वस्तुतो मन्त्रार्थस्तु- यज्ञसाधने यज्ञशब्दः । यज्ञं यज्ञसाघनभूतं पुरुषं पशुत्वमाभाव्यय यूपे बद्धं बर्हिषि मानसे यज्ञे प्रौक्षन् प्रोक्षणादिभिः सस्कारैः 'जनि' धातु का बार बार उपादान करने से स्थान के अवान्तर भेदो को बताया जा रहा है । जैसा कि विष्णुपुराण के प्रथम अंश के - ',,,, पंचमाध्याय में यशो के प्रथम मुख से गायत्र ऋचाएं त्रिवृत्स्तोम रथन्तर और अग्निष्टोम निर्मित हुए । उनके दक्षिण मुख से यजुष्, त्रैष्टुभ् छन्द, पचदश स्तोम, बृहत्स्तोम, उवश्य पैदा हुए तथा उनके पश्चिम मुख से साम, जगतो छन्द, सप्तदश स्तोम, रूप और , अंतरात्र पैदा हुए । उनके उत्तर मुख से इक्कीस शाखा वाला अथर्वण और आप्तोर्याम अनुष्टुभ् छन्द तथा वैराज साम उत्पन्न हुए । ( ५३-५६ ) । उस प्रजापति ने अपने वक्षस्थल से भेडो को तथा मुख से बकरो को पैदा किया । उदर से गौओं को तथा दोनो पार्श्व- भागो से और दोनों पैरो से हाथियो सहित घोड़ो को, गदहो को गवय, मृग, पशुओ को तथा ऊँट, अश्वतर, न्यंकु ( मुगविशेष ) आदि अन्य जातियो के पशुओं को पैदा किया ।' (४८-४९) । उस पूर्वोक्त ब्रह्मरूप यज्ञ से अश्व उत्पन्न हुए, उसी प्रकार कतिपय जो अश्वव्यतिरिक्त गर्दभ, अश्वतर और ऊपर नीचे जिन्हें दात होते है, ऐसे भी पशु उत्पन्न हुए । उसी प्रकार उसी यज्ञरूप ब्रह्म से गौएं पैदा हुई और उसी से अज, अवि ( भेड ) आदि पशु भी उत्पन्न हुए ॥ ८॥

'तं यज्ञं बहि० ' जो सबसे पहले प्रकट था, जो सब जगत् का बनाने वाला है और सब जगत् मे पूर्ण हो रहा है, उस यज्ञ अर्थात् पूजने के योग्य परमेश्वर को जो मनुष्य हृदय रूपी आकाश में अच्छे प्रकार से प्रेमभक्ति, सत्य आचरण करके पूजन करता है, वही उत्तम मनुष्य है । ईश्वर का यह उपदेश सबके लिये है । ( तेन देवा अयजन्त सा ० ) उसी परमेश्वर के वेदोक्त उपदेशों से ( देवाः ) जो विद्वान्, ( साध्या ) जो ज्ञानी लोग, (ऋषयश्च ये ) ऋषि लोग, वेदमन्त्रों का अर्थ जाननेवाले और अन्य भी मनुष्य जो परमेश्वर के सत्कारपूर्वक सब उत्तम ही काम करते हैं, वे ही सुखी होते हैं । अतः सब श्रेष्ठ कर्मों के करने के पूर्व ही उसका स्मरण और प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये और दुष्ट कर्म करना तो किसी को भी उचित ही नही' ( पृ० १३ ९) दयानन्द की इस व्याख्या के संबन्ध में हमारा कहना है कि आपकी बताई पद्धति के अनुसार जगत् का कर्ता परमेश्वर कब किस रूप में आविर्भूत हुआ? वह तो निराकारहृदया-है, सदा एकरूप रहता है । अभिषेक तो दूध, जल आदि से होता है, निराकार मे यह कैसे संभव हो सकता है? बर्हिषद: का अर्थ काश कैसे किया जा सकता है? वास्तव में तो मन्त्र का संक्षिप्त अर्थ यह है - यज्ञ शब्द यहां यज्ञ के साधनो लिये प्रयुक्त है । यज्ञ अर्थात्

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वेदार्थपारिजातः १२५२ संस्कृतवन्तः । कीदृशम्? अग्रतः सृष्टेः पूर्वं जातं पुरुषत्वेनोत्पन्नम् । तेन पुरुषरूपेण पशुना देवा अयजन्त मानसयागं निष्पादितवन्तः । के ते देवा इत्याह - ये साध्याः सृष्टिसाधनयोग्याः प्रजापतिप्रभतयः । ये च तदनुकूला ऋषयो मन्त्र द्रष्टारस्ते सर्वेऽप्ययजन्त । वास्तविकार्थः- त यज्ञ बहिषीति । तदेत्यध्याहार्यम्, तदा तं ब्रह्माख्यं यज्ञम्, यजन्त्यनेनेति यज्ञः, यजनीयहवी - रूपमित्यर्थः । बर्हिषि प्रकृतौ निघायेत्यध्याहार्यम् । प्रौक्षन् प्रोक्षणसंस्कारमकुर्वन्, द्रव्यत्यागयोग्यतापादकान् प्रोक्षणो- पस्तरणावदानाभिधारणादिसंस्कारान् अकुर्वन्नित्यर्थः । अग्रतः स्थिरतरसृष्टेरग्रतः, जातमुत्पन्नम् । तेन पश्वादिसृष्टेः प्रागेवायं यज्ञः प्रवृत्तः, ततो मानसमेव सर्वमक्रियत । तेन ब्रह्मरूपेण हविषा । देवा इन्द्रियाणि । अयजन्त यागमकुर्वन् । अनिरुद्धाग्नी ब्रह्मरूप हविः प्रक्षिप्तवन्तः, आत्मसमर्पण कृतवन्तः । साध्याः कर्मसाधनानि वागादीनि । ऋषयो ज्ञान- - साधनानि चक्षुरादीनि । एतस्मिन्नर्थे पुरुषसूक्तव्याख्यानभूत शाबल्यब्राह्मणं चोदाहरन्ति - 'तस्मात्पादनारायणात् मूलप्रकृतिरजायत । सा प्रकृतिः पादनारायणशासनान्महदहङ्कारादीन् सूक्ष्मान् पदार्थानजनयत् । एवं सूक्ष्मायां सृष्टी कृताया स पादनारायणः स्थूलसृष्ट्यर्थं चतुर्मुख पुरुषमभिदध्यौ । तद्ध्यानात् पश्चात् पुरुषश्चतुर्मुखाख्योऽजायत । स जातो भूमेः पश्चात् पुरतश्चातिरिच्यत । सर्वकार्यक्षमो वृद्धकायः सन् पुरुष- स्तूष्णीमास । तमनिरुद्धनारायणोऽप्राक्षीत् -ब्रह्मस्तूष्णी भवसीति? अज्ञानादिति होवाच । ब्रह्मंस्तवेन्द्रियाणि देवानृ- त्विजः कृत्वा त्वदीयं च कलेवर हविः कृत्वा मां हविर्भुजं ध्यात्वा मय्यग्नौ निवेदय । मदङ्गस्पर्शमात्रेण जगत्कोशभूत- स्त्वत्कायो बृहिष्यते । तस्मादुद्भूतानि प्राणिजातानि यथापुरं निर्माय स्रष्टा भविष्यसि । य एव सृष्टियज्ञं जानाति स जन्मनीह मुक्तो भवति' इति । यज्ञ के साधनभूत इस पुरुष को पशु के रूप में कल्पित कर उसको यूप में बाघ कर मानस यज्ञ के अवसर पर प्रोक्षण प्रभृति संस्कारो से संस्कृत किया 1। कैसे? सृष्टि से पहले पुरुष के रूप में उत्पन्न होकर । उस पुरुष रूप पशु से देवताओ ने मानस याग संपन्न किया । वे देवगण कौन थे? वे थे सृष्टि को संपन्न करनेवाले प्रजापति प्रभृति । साथ ही प्रजापति को बताई पद्धति के अनुकूल चलने वाले मन्त्रद्रष्टा ऋषिगण भी यज्ञ करने में इनके साथ थे । मन्त्र का विस्तृत अर्थ इस प्रकार है- .... .......... ॥ ऋ० सं ० १०, ९०, ९)1 ' ' ( अर्थः--तं यज्ञं बहिषीति । तदा का अध्याहार कर अर्थ किया जायगा । तब उस ब्रह्मसंज्ञक यज्ञ को जिससे करते हैं उसे यज्ञ कहते है, अर्थात् यजनीय हविःस्वरूप) प्रकृति पर रखकर ( ' रखकर' का अध्याहार किया गया है ) उसका यजन प्रोक्षण संस्कार किया, अर्थात् द्रव्य -त्याग की योग्यता के संपादक प्रोक्षण, उपस्तरण, अवदान, अभिधारण आदि संस्कारो को किया । स्थिरतर सृष्टि के पूर्व उत्पन्न होने के कारण प्रतीत होता है कि पश्वादि सृष्टि के पहिले ही यह यज्ञ प्रवृत्त हुआ है । इसलिये सब कुछ मानस गया । उस ब्रह्मरूप हवि से इन्द्रियरूप देवताओ ने याग किया । अनिरुद्ध रूप अग्नि में ब्रह्मरूप हवि का प्रक्षेप किया । अर्थात्ही किया ऋषि है । इस विषय मे पुरुषसूक्त के समर्पण उन्होने किया । कर्म के साघनभूत वाक् आदि साध्य है और ज्ञान के साधन चक्षुरादि आत्म- व्याख्यानरूप शाबल्य ब्राह्मण को दे रहे हैं -'उस पादनारायण से मूलप्रकृति हुई । उस प्रकृति ने पादनारायण के शासन से - कारादि सूक्ष्म पदार्थों को पैदा किया । इस प्रकार सूक्ष्म सृष्टि कर चुकने पर उस पादनारायण ने स्थूल सृष्टि की महदहं पुरुष का ध्यान किया । उसके ध्यान करने के पश्चात् चतुर्मुख नाम का पुरुष हुआ । वह उत्पन्न हुआ रचना के लिये चतुर्मुख वह पुरुष चुपचाप रहा । उसे अनिरुद्ध-और पश्चात् भी रहा । समस्त कार्यों को करने में समर्थ महान् शरीर को धारण करता हुआ पुरुष ब्रह्माण्डभूमि के पहले नारायण ने पूछा-हे ब्रह्मन्! आप चुपचाप क्यो है? अज्ञान के कारण चुप हूँ, उसने कहा । तब अनिरुद्धनारायण ने कहा-है ब्रह्मन्! अपने इन्द्रियरूपी देवताओं को ऋत्विक् बनाकर तथा अपने कलेवर (शरीर ) को हवि मुझ अग्नि में उसे अर्पण कर दो । मेरे अंगस्पर्श के होते ही जगत् का कोषभूत तुम्हारा शरीर बनाकर और मुझ हविर्भुक् का ध्यान कर को यथापूर्व निर्माण कर तुम स्रष्टा हो सकोगे । जो कोई इस सृष्टि यज्ञ को जान पाता है, वह वृद्धिंगतइसी जन्महोगा । उससे उद्भूत हुए प्राणियों में मुक्त हो जाता है ।

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वेदार्थपारिजाता १२५३ यज्ञ यज्ञसाघनभूत त पुरुष पशुत्वभावनया युपे बद्धम्, बर्हिषि मानसे यज्ञे, प्रौक्षन् प्रोक्षितवन्तः । कीदृशम्? अग्रतः सर्वसृष्टेः प्राग्जात पुरुषत्वेन उत्पन्नम् तस्माद्विराडजायत विराजोऽधिपूरुष इत्युक्तत्वात् । तेन पुरुषरूपेण पशुना, देवा अयजन्त मानसं याग सम्पादितवन्तः । के ते देवा? साध्या सृष्टिसाधनयोग्याः प्रजापति- प्रभृतयः । तदनुकूला ऋषयो मन्त्रद्रष्टारश्च ये सन्ति ते सर्वेऽप्ययजन्त || ९ || 'यत्पुरुष व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुख किमस्यासीत् कि बाहू किमूरू पादा उच्येते ॥ ( वा० सं ० ३१।१०; ऋ ० स ० १० ९ ० १० ) । ' यद्यस्मादेतं पूर्वोक्तलक्षण पुरुषं परमेश्वर कतिधा कियत्प्रकारैर्व्यकल्पयन् तस्य सामर्थ्यगुणकल्पन कुर्वन्ति करिष्यन्ति च । व्यदधुः तं सर्वशक्तिमन्तमीश्वरं विविधसामर्थ्यकथनेनादधुरर्थादनेकविध तस्य व्याख्यानं कृतवन्त. कुर्वन्ति करिष्यन्ति च । मुख किम्, अस्य पुरुषस्य मुख मुख्यगुणेभ्यः किमुत्पन्नमासीत्? कि बाहू बलवीर्यगुणेभ्य. किमुत्पन्नमासीत्, किमूरू व्यापारादिमध्यमगुणैः किमुत्पन्नमासीत्? पादावर्थान्मूर्खत्वादिनीचगुणैः किमुत्पन्न वर्तते' (पृ० १३ ९ ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् । तत्रोच्यते -विदधातेर्व्याख्यान कथमर्थः? एव मुखादि- पदाना मुख्यमर्थमपहाय मुख्यगुणादयो लाक्षणिका अर्थाः किमर्थमाश्रियन्ते? पादशब्देन मूर्खत्वादयो नीचगुणाः कथं गृह्यते? किं परमेश्वरेऽपि मूर्खत्वादयो नीचगुणा अपि सन्ति? परमेश्वरस्य नित्यनिरवद्यसामर्थ्येषु मध्यमनीचगुणानां कल्पन पामरोऽपि न कर्तुमीहते । किञ्च, यदि परमेश्वरे मुखादयो न सन्ति तदोत्तरे मन्त्रे परमेश्वरे मुखादीनि न सन्तीत्येव वक्तव्यमासीत्, न पुनर्ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदित्येवम् । तस्मात् सायणादिसम्मतमस्मदुक्तमेव व्याख्यानं युक्तम् । तद्यथा- यत्पुरुषमिति । यज्ञानुष्ठायिनां ब्राह्मणादीनामुत्पत्तिरुच्यते । यद् यदा पुरुषं ब्रह्माख्य व्यदधुः । पशुमित्यध्याहार्यम् । पशुत्वेन अकल्पयन् । तत् तदा । कतिधा कतिप्रकारविशिष्टम् । व्यकल्पयत्, बहुवचन छान्दसम् । यज्ञ के साधनभूत उस पुरुष में पशु की भावना कर उसे यूप से बांध दिया और उस मानस -यज्ञ में उसका प्रोक्षण किया । वह पशु समस्त सृष्टि के पूर्वपुरुष के रूप में उत्पन्न हुआ था, उससे विराट हुआ. क्योकि 'विराजोऽधिपूरुष ' कारणरूप होने से पुरुष विराट् , - - से श्रेष्ठ है ऐसा कहा गया है । उस पुरुष रूप पशु से देवताओ ने मानस याग को सम्पन्न किया । वे देवतागण सृष्टि साधन करने के योग्य प्रजापति प्रभृति ही है और उनके अनुकूल मन्त्र-द्रष्टा जो ऋषि है उन सभी ने यजन किया ||९|| ( यत्पुरुषं ० ) 'पुरुष उसको कहते हैं, जो कि सर्वशक्तिमान् ईश्वर कहलाता है । ( कतिधा व्य० ) जिसके सामर्थ्य का अनेक प्रकार से प्रतिपादन करते हैं, क्योंकि उसमें चित्र-विचित्र बहुत प्रकार का सामर्थ्य है । अनेक कल्पनाओ से जिसका कथन करते हैं । (मुखं किमस्यासीत्) उस प्रकार के मुख अर्थात् मुख्य गुणों से इस संसार में क्या उत्पन्न हुआ है? ( कि बाहू) बल, वीर्य, शूरता और युद्ध आदि विद्या गुणों से इस संसार में कौन पदार्थ उत्पन्न हुआ है? ( किमूरू ) व्यापार आदि मध्यम गुणों से किसकी उत्पत्ति हुई है? (पादा उच्येते ) मूर्खपन आदि नीच गुणों से किसकी उत्पत्ति होती है?' ( पृ० १३ ९) । पुरुषसूक्त के दसवें मन्त्र की यह दयानन्द कृत? होगा इसी तरह से मुख प्रभूति शब्दो के अर्थ ' ' व्याख्या है । इस पर हमारा कहना है कि विदधाति पद का अर्थ व्याख्यान कैसे मुख्यको छोड़ कर मुख्य गुण आदि लाक्षणिक अर्थ का ग्रहण यहाँ किस अभिप्राय से किया जाता है? पाद शब्द से मूर्खपन आदि नीच गुणों का ग्रहण कैसे होगा? क्या परमेश्वर में भी मूर्खपन आदि नीच गुण है? परमेश्वर तो सदा निर्दुष्ट सामर्थ्यवाला है, उसमें मध्यम, नीच कोटि के गुणों की कल्पना अबोध आदमी भी नही कर सकता । अपि च, यदि परमेश्वर के मुख आदि नही है, तो अगले मन्त्र में यही कहा जाना चाहिये था कि परमेश्वर के तो मुख प्रभृति है ही नहीं, न कि ब्राह्मण इसका मुख है आदि आदि । अतः इस मन्त्र का सायण प्रति भाष्यकारों के अनुकूल हमारा किया अर्थ ही युक्तियुक्त है । जो कि इस प्रकार है- F **** (ऋ. सं ० १० ९ ०१० ).........॥ अर्थ: --- यत्पुरुषमिति । यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण आदि की उत्पत्ति को बताते है । जब ब्रह्मसंज्ञक पुरुष में पशु की कल्पना की (यहाँ पशु का अध्याहार किया गया है), तब कई प्रकारो से वह कल्पना की । ( यहाँ बहुवचन छान्दस है) । अथवा

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वेदार्थपारिजाता १२४४ अथवा यद् यदा पुरुषं मनुष्यं व्यदधुः अकल्पयन् असृजन्तेत्यर्थः । तत् तदा । कस्मात् कस्मात् स्थानात् कीदृशकीदृश- प्रकारविशिष्टमकल्पयन् । यद्वा पुरुषं मनुष्यं यद् यदा व्यदधुः, तत् तदा कतिधा व्यकल्पयन् । मनुष्याद्युपादानभूतं चतुर्मुखशरीरं कतिविभागविशिष्टमकल्पयन् । अस्य मुखं किंरूपमासीत्, कार्यकारणभावमूलक सामानाधिकरण्यमत्र, मुखादुत्पन्नं किमित्यर्थः । एवं किं बाहू, किमूरू, कि पादौ उच्येते? प्रश्नोत्तरूपेण ब्राह्मणादिसृष्टि वक्तु ब्रह्मवादिनां प्रश्ना उच्यन्ते 1। प्रजापतेः प्राणरूपा देवाः, यत् यदा, पुरुषं विराहरूपं व्यदधुः सङ्कल्पेन उत्पादितवन्तः, तदानी कतिधा कतिभिः प्रकारैः व्यकल्पयन् विविधं कल्पितवन्तः । अस्य पुरुषस्य मुख किम् आसीत् । को बाहू अभूताम् । को ऊरू, कौ च पादा उच्येते । प्रथम सामान्यरूपः प्रश्नः, पश्चान्मुखं किम् इत्यादिना विशेषविषयाः प्रश्नाः ॥ १० ॥

'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजभ्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ||' ( वा ० सं ० ३१।११; ऋ ० सं ० १०।९ ०।११ ) । ' अस्य पुरुषस्य ये विद्यादयो मुख्यगुणाः सत्यभाषणोपदेशादीनि कर्माणि सन्ति तेभ्यो ब्राह्मण आसीद् उत्पन्नो भवति । बाहू राजन्यः, वलवीर्यादिलक्षणाम्वितो राजन्यः क्षत्रियस्तेन कृत आज्ञप्त आसीद् उत्पन्नो भवति । (ऊरू ) कृषिव्यापारादयो गुणा मध्यमास्तेभ्यो वैश्यो वणिग्जनोऽस्य पुरुषस्योपदेशादुत्पन्नो भवतीति वेद्यम् । पद्भ्यां शूद्रः पद्द्भ्यां पादेन्द्रियनीचत्वमर्थाज्जडबुद्धित्वादिगुणेभ्यः सेवागुणविशिष्टः पराधीनतया प्रवर्तमानोऽजायतेति वेद्यम्' (पृ० १४० ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानम् । तदुपर्युच्यते -- अत्र मुखबाहूरुपादशब्दानां लाक्षणिकार्याश्रयणमेव दूषणम् । किञ्चोत्पन्ने पुरुषे विद्यादिभि- गुणैर्ब्राह्मण्यादिकं जायते, तदा आसीद् उत्पन्न इति कथमर्थः सम्भवति? नात्पन्न एवोत्पद्यते । कृत आज्ञप्त उत्पन्न इति किमर्थमेकस्मिन्नर्थे शब्दत्रयप्रयोगः? कृत इत्यस्य आज्ञप्त इति कथमर्थः? वणिग्जनोऽस्योपदेशात् कथमुत्पन्नः? पुरुष में मनुष्य की कल्पना की, अर्थात् पुरुष को मनुष्य के रूप मे पैदा किया | तब किस स्थान से किस प्रकार की कल्पना की? अथवा I पुरुष में मनुष्य की जब कल्पना की, तब कितने प्रकारो से कल्पना की मनुष्य आदि के उपादानभूत चतुर्मुख शरीर की कितने विभागों मे कल्पना की । उसके मुख का कैसा रूप था । यहाँ पर कार्यकारणभावमूलक सामानाधिकरण्य है, अर्थात् मुख से क्या ( कौन) उत्पन्न हुआ । उसी प्रकार बाहू से कौन, ऊरुओं से कौन और पैरो से कौन उत्पन्न हुआ? अर्थात् बाहू, ऊरु, पाद किन नामो से बोले जाते हैं । प्रश्नोत्तर के रूप में ब्राह्मण आदि की सृष्टि बताने के लिये ब्रह्मवादियो के ये प्रश्न कहे जा रहे है । प्रजापति के प्राणरूप देवताओं ने जब विराट्रूप पुरुष को अपने संकल्प से उत्पन्न किया, तब कितने ही प्रकारो से उसे कल्पित किया, अर्थात् अनेक प्रकारों से उसे कल्पित किया । इस पुरुष का मुख क्या था, बाहु कौन थे, ठरु कौन थे, और पैर कौन कहे जाते हैं । पहिले सामान्यरूप से प्रश्न किया गया है, पञ्चात् ' मुखं किम्' इत्यादि के द्वारा विशेषविषयक प्रश्न किया गया है ॥ १० ॥

'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या दयानन्द ने इस तरह से की है -- 'पूर्व मन्त्र में उठाये गये चारों प्रश्नों के उत्तर ये है इस पुरुष की आज्ञा के अनुसार विद्या, सत्यभाषण आदि उत्तम गुण और श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है, वह मुख्य कर्म और गुणों के सहित होने से मनुष्यों में उत्तम कहाता है । ( बाहू राजन्यः कृतः ) ईश्वर ने बल, पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है । (ऊरु तदस्य) खेती, व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना तथा पशुपालन आदि मध्यम गुणो से वैश्य वर्ण सिद्ध होता है । ( पन्द्रयां शूद्रो० ) जैसे पग सबसे नीच अंग है, वैसे मूर्खता आदि नीच गुणों से शूद्र वर्ण सिद्ध होता है' (पृ० १४० ) । इस पर हमारा यह कहना है - इस व्याख्या में पहला दोष तो यह है कि यहां मुख, बाहु, ऊरु और पाद शब्दों के लाक्षणिक अर्थ का सहारा लेना पड़ता है । दूसरी बात यह है कि उत्पन्न हुए पुरुष में विद्या प्रभुति गुणो से ब्राह्मण आदि की बाद में जब मानी जाती है, तो उसके लिये भूतकाल की क्रिया का प्रयोग कैसे संगत हो सकता है? एक बार जिसकी उत्पत्ति हो गईउत्पत्ति, वह

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वेदार्थपारिजाता १२५५ ,नह्यपदेशात् कस्यचिदुत्पत्तिर्भवति । शुभगुणकर्मादिभिर्ब्रह्मयोनिषु जन्म भवति मध्यगुणकर्मानुविद्धशुभगुणादिभिः क्षत्रियजन्मेत्यादिकं तु न विरुद्धयते । तत्तज्जन्मानन्तर शुभगुणकर्मादिभिर्ब्राह्मण्यादिषु न व्यवस्था स्यात्, गुणकर्मादि-परिवर्तनेन ब्राह्मण्यादिपरिवर्तनापत्तेः । 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् । तदेक न व्यभवत् । तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत् क्षत्रम | यान्येतानि देवत्रा. क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशानः, तस्मात् क्षत्रं पर नास्ति । स नैव व्यभवत् ॥ स विश्वमसृजत । यान्येतानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा मरुत इति । स नैव व्यभवत । स शौद्र वर्णमसृजत' (बृ ० उ० १४ ) इति बृहदारण्यके ब्रह्म - क्षत्र -विट्शूद्रादीनामुत्पत्तिः श्रूयते । 'तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो हयत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनि क्षत्रिययोनि वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनि सूकरयोनि चण्डालयोनि वा' (छा० उ० ५।९ ) इत्यादिश्रुतिभिः स्पष्ट रमणीयकपूयचरणभेदेन ब्राह्मणादि • योनिषु जन्मानि श्रूयन्ते । मनुना च ब्राह्मणादीनां मुखबाहूरुपज्जत्वं स्पष्टतयोक्तम् । 'लोकानां तु विवृद्धयर्थं मुखबाहू-रुपादतः । ब्राह्मण क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् ॥ ' ( म० १३१ ), 'मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकारयत्' ( म० १1८७ ), ' उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्यैष्ठयाद् ब्रह्मणश्चैव धारणात्' ( म० १।९ ३ ) इति । विशेषस्त्वस्मदीये चातुर्वर्ण्य- सस्कृतिविमर्शाख्ये ग्रन्थे वर्णव्यवस्थाविचारो द्रष्टव्यः । अथ मन्त्रार्थ - -ब्राह्मणोऽस्येति । अथैषां प्रश्नानामुत्तराण्याह । ब्राह्मणः अस्य चतुर्मुखस्य मुखम् आननम् आसीत् । मुखादुत्पन्नो ब्राह्मण इत्यर्थः । ब्राह्मणस्य वक्ष्यमाणसर्वावयवेषु उत्तमात् मुखादुत्पन्नत्वोक्त्या तस्यान्य- वर्णापेक्षया स्वत एव उत्तमत्वं सूचितम् । मुखव्यापारभूतवेदाध्ययनादिप्रधानत्वं मुखवीर्यत्व च व्यञ्जितम् । बाहु राजन्यः क्षत्रियः कृतः । क्षत्रियो वाहोरजायतेत्यर्थः । बाहुजत्वाद् ब्राह्मणापेक्षया न्यूनत्वं बाहुव्यापारभूतयुद्धादिप्रधानत्वं पुनः उत्पन्न नही होता । एक ही अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये कृत, आज्ञप्त और उत्पन्न इन तीन शब्दों का प्रयोग क्यो किया जाता है? कृत शब्द का अर्थ आशप्त कैसे हो सकता है? इस पुरुष के उपदेश से वणिग्जन ( वैश्य ) कैसे उत्पन्न होगा? किसी के उपदेश से किसी की उत्पत्ति होती नही देखी गई है । शुभ गुण, शुभ कर्म प्रभृति से ब्राह्मण योनि में जन्म होता है, मध्यम गुण और मध्यम कर्म आदि से क्षत्रिय वर्ण में जन्म होता है, ऐसा मानवे में तो कोई विशेष प्रतीत नहीं होता । इसके विपरीत उन उन व्यक्तियो का जन्म हो जाने के बाद शुभ गुण-कर्म आदि से ब्राह्मण्य आदि की प्राप्ति की बात मानने पर कोई व्यवस्था नही बन पावेगी, क्योंकि व्यक्ति के गुण -कर्म आदि में परिवर्तन हो जाने पर ब्राह्मण्य आदि में भी परिवर्तन मानना पड़ेगा । 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् ' इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति में ब्रह्म, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण की उत्पत्ति की कथा वर्णित है । 'तद्य इह रमणीयचरणा ' इत्यादि छान्दोग्य श्रुति में स्पष्ट बताया गया है कि शुभ और अशुभ आचरण के आधार पर प्राणी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य योनियो को और कूकर, सूकर, चाण्डाल आदि योनियों को प्राप्त करता है । मनु ने स्पष्ट ही ब्राह्मण प्रभूति वर्णों की उत्पत्ति मुख, बाहु, ऊरु और चरण से मानी है--'प्रजापति से प्रजा की वृद्धि के लिये अपने मुख, बाहु, करु और चरण से क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण को उत्पन्न किया', ' मुख, बाहु, ऊरु मोर चरण से पैदा हुए इन वर्णों को अलग- अलग कार्यों का विधान किया', 'उत्तम अंग मुख से उत्पन्न होने के कारण, सब वर्णों में श्रेष्ठ ( बड़ा) होने के कारण और ब्रह्मज्ञान का धारक होने से ब्राह्मण इन वर्णों मे श्रेष्ठ है' इत्यादि वचन इसमें प्रमाण हैं । इस विषय पर विशेष विचार हमारे 'चातुर्वण्यं संस्कृति- विमर्श नामक ग्रन्थ में देखना चाहिये । इस मन्त्र का वास्तविक परम्परा प्राप्त अर्थ इस प्रकार का है- *........... || ( ऋ ० सं ० १०.९०.११) अर्थ-ब्राह्मणोऽस्येति । इसके अनन्तर उन प्रश्नों के उत्तरों को कहते हैं । ब्राह्मण इस चतुर्मुख का मुख था, अर्थात् ब्राह्मण मुख से उत्पन्न हुवा । वक्ष्यमाण समस्त अवयवों में उत्तम अवयवभूत मुख से ब्राह्मण की उत्पत्ति बताई गई है, इस कारण अन्य वर्गों की अपेक्षा ब्राह्मण की क्षमता स्वतः हो सूचित होती है । इससे मुख के व्यापारभूत अध्ययनादि में प्रधानता तथा मुख की तेजस्विता भी व्यक्ति होती है । बाहू क्षत्रिय हुआ, अर्थात् बाहु से क्षत्रिय पैदा हुआ ॥ बाहु से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण की

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१२५६ वेदार्थपारिजातः बाहुवीर्यत्वं च प्रतीयते । वैश्य इति यत् तदस्य ऊरू । अस्योरुम्यां वैश्योऽजायतेत्यर्थः । ऊरुजत्वाद् वैश्यस्य क्षत्रिया- पेक्षया म्यूनत्वमवगतम् । पद्द्भ्यां पादाभ्या शूद्रः अजायत । शूद्रस्य पज्जातत्वात् सर्ववर्णापेक्षयापि निकृष्टत्वं लब्धम् । पादकार्यभूतगमनागमनादिव्यापारश्च सूचितो भवति । इदानीं पूर्वोक्तानां प्रश्नानामुत्तराणि दर्शयति -अस्य प्रजापतेः ब्रह्मणः ब्राह्मणत्वजातिविशिष्टः पुरुषः मुखम् आसीत्, मुखादुत्पन्न इत्यर्थः । योऽयं राजन्यः क्षत्रियत्वजातिमान् पुरुषः, स बाहूकृत: बाहुत्वेन निष्पादितः, बाहुभ्यामुत्पादितः ॥ तत् तदानीमस्य प्रजापतेर्यत् यो ऊरू तद्रूपो वैश्यः, ऊरुभ्यामुत्पन्न इत्यर्थः । तथाऽस्य पद्भ्यां पादाभ्यां शूद्रः शूद्रत्वजातिमान् पुरुषः अजायत । इय च मुखादिभ्यो ब्राह्मणादीनामुत्पत्तिर्यजुःसहितायां सप्तमकाण्डे 'समुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत' ( तै० सं ० ७| १ | १४ ) इत्यादी विस्पष्टमाम्नाता । अतः प्रश्नोत्तरे उभे अपि तत्परतयैव योजनीये ॥११ ॥

'चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ||' ( वा० सं ० ३१।१२; ऋ० सं ० १० / ९ ०।१२ ) । तस्यास्य पुरुषस्य मनसो मननशीलात् सामर्थ्यात् चन्द्रमा जात उत्पन्नः । तथा चक्षोर्ज्योतिर्मयात् सूर्योऽजायत । श्रोत्राकाशमयादाकाशान्तभ उत्पन्नमस्ति । वायुमयाद् वायुरुत्पन्नः । प्राणश्च सर्वेन्द्रियाणि चोत्पन्नानि सन्ति । मुखान्मुखज्योतिर्मयादग्निरजायतोत्पन्नोऽस्ति' ( पृ ० १४१ ) इति यद्वयाख्यातं दयानन्देन, तत्रोच्यते- यदि मनस इत्यस्य मननशीलात् सामर्थ्यादित्यर्थः कृतस्तदा चक्षोरित्यस्यापि दर्शनसामर्थ्यादित्यर्थो युक्तः । ज्योतिर्मया- दित्यर्थः कुतः? एवं श्रोत्रादित्यस्यापि श्रवणसामर्थ्यादित्येवार्थी युक्तो न तु श्रोत्रमयादाकाशान्नभः, वायुमयाद्वायुरिति । मुखाज्ज्योतिर्मयादग्निरित्यपि न युक्तम्, वैरूप्यापातात् । तथा सति श्रोत्रादिसामर्थ्यान्येवेन्द्रियाणि रूपान्तरेणोक्तानि भवन्ति । तथात्वे 'ब्राह्मणोऽस्य मुखम्' इत्यत्रापि मुखबाहूरुपादानां सामर्थ्यान्येव ग्राह्याणि ॥ ततश्च मुखादिभ्यो अपेक्षा उसकी न्यूनता, किन्तु बाहु से होने वाले युद्धादि व्यापार में उसकी प्रधानता और बाहु की पराक्रमशालिता प्रतीत होती है । इसी प्रकार जो वैश्य है वह इसके ऊरु है, अर्थात् इसके ऊरुओ से वैश्य उत्पन्न हुआ । ऊरु से उत्पन्न होने के कारण क्षत्रिय की अपेक्षाउसकी न्यूनता अवगत होती है । दोनों पैरो से शूद्र पैदा हुआ । पैरो से पैदा होने के कारण सर्व वर्णों की अपेक्षा शूद्र की निकृष्टता है । पैर का कार्यभूत गमनागमनादि व्यापार उसका सूचित होता है । लब्ध होती अब पूर्वोक्त प्रश्नो के उत्तरों को दिखाया जा रहा है । इस प्रजापति ब्रह्मा का ब्राह्मणत्व अर्थात् मुख से उत्पन्न हुआ था । जो यह राजम्य है, अर्थात् क्षत्रियत्व जातिमान् पुरुष है, उसे बाहु बनायाजाति से युक्त पुरुष मुख था, ,,, निष्पन्न किया यानी बाहुओ से उत्पन्न किया । उस समय इस प्रजापति के जो ऊरु थे उनके रूप में वैश्य अर्थात् बाहु के रूप में, उत्पन्न हुआ । उसी प्रकार इसके पैरो से शूद्रत्व जातिमान् शूद्र पुरुष पैदा हुआ । मुखादि अवयवो से हुआ अर्थात् ऊरुओं से वैश्य उत्पत्ति यजुःसंहिता के सप्तमकाण्ड मे 'स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत ' (तै० स ० ७.१.१.४ ) स्पष्टतया ब्राह्मणादि की इस प्रकार की उत्तर दोनो को ही तत्परक ही लगाना चाहिये ॥११ ॥ बताई गई है । अतः प्रश्न और ( चन्द्रमा० ) 'उस पुरुष के मनन, अर्थात् ज्ञानस्वरूप सामर्थ्य से चन्द्रमा और तेजस्वरूप ( ) श्रोत्राद्वा० श्रोत्र अर्थात् अवकाश स्वरूप सामर्थ्य से आकाश और वायुरूप सामर्थ्य से वायु उत्पन्न से सूर्य उत्पन्न हुआ है । ' (, अपने कारण से उत्पन्न हुई हैं और मुख्य ज्योतीरूप सामर्थ्य से अग्नि उत्पन्न हुआ है पृ ० हुआ है तथा सब इन्द्रियाँ भी अपनेकहना है कि यदि 'मनसः' पद का अर्थ मननशील सामर्थ्यं किया जाता है, तब 'चक्षोः' १४० ) । दयानन्द की इस व्याख्या पर हमारा

इस पद का अर्थ भी दर्शनशील सामर्थ्य किया जाना चाहिये । सूर्य के साथ ज्योतिर्मय विशेषण कहाँ से जोडा गया? इसी तरह से 'श्रोत्रात् चाहिये, न कि श्रोत्रमय आकाश से । इसी प्रकार 'वायो:' पद का वायुमय से और ' मुखात् ' पद का अर्थ भी श्रवणशील सामर्थ्य होना,, 'चाहिये किन्तु वयनशील सामर्थ्य और ज्वलनशील सामर्थ्य ही अर्थ होना चाहिये पद का ज्योतिर्मय से यह अर्थ भी नही होना पदार्थपरक अर्थ करने में परस्पर विद्रूपता हो जायगी । सामर्थ्यपरक अर्थ मानने परअन्यथा कहीं सामर्थ्यपरक अर्थ करने और कही इन्द्रियाँ कही जायगी और ऐसा यदि यहाँ माना जाता है, तो 'ब्राह्मणोऽस्य ० ' इस मन्त्र श्रोत्र प्रभूति का सामर्थ्य ही रूपान्तरित होकर में भी मुख, बाहु, ऊरु प्रभृति के सामर्थ्य का ही

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वेदार्थपारिजातः १२५७ ब्राह्मणादीनामुत्पत्तयोऽभाक्ता एव भवेयुः । किञ्च, मूले नभस उत्पत्तिर्वोक्तास्ति, किन्तु श्रोत्राद्वायुश्चेति पाठोऽस्ति । तस्मात् श्रोत्रमयादाकाशादाकाशो नभ उत्पन्नमित्यशुद्धमेव तदीय भाष्यम् । यदि निराकारस्य मुखमेव नास्ति, तदा कुतस्त्य तस्य ज्योतिर्मयत्वमपि । ------ – - वास्तविकार्थः चन्द्रमा मनस इति । एव यज्ञकर्तृणामुत्पत्तिमुक्त्वा यष्टव्यदेवतोत्पत्तिमाह अस्य चतुर्मुखस्य मनसा चन्द्रमाः शीताशुः जातः उत्पन्नः । चक्षो. चक्षुष. सूर्यः सर्वार्थप्रकाशकरो भानुः अजायत । इन्द्रश्च परमैश्वर्यवान् देवतासार्वभौमः शचीपति, अग्निश्च देवाना मुखस्थानीयः अनलः, अजायतामिति विपरिणतस्यानुषङ्गः । प्राणात् सर्वप्राणनहेतोश्चतुर्मुखरूपधरस्य भगवतः प्राणाद् वायु सर्वप्राणनहेतुभूतः अजायत । यथा दव्याज्यादिद्रव्याणि गवादयः पशव ऋगादिवेदा ब्राह्मणादयो मनुष्याश्च तस्मादुत्पन्नाः, एव चन्द्रा- दयो देवा अपि तस्मादेवोत्पन्नाः । प्रजापतेः मनसः सकाशात चन्द्रमा जातः । चक्षोः सूर्यो चक्षुषः सूर्योऽपि अजायत । अस्य मुखादिन्द्रश्च अग्निश्च देवी उत्पन्नौ । अस्य प्राणाद् वायुरजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्चेति शुक्लयजुषपाठे श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्चाजायेताम् ॥ १३ ॥

'नाम्या आसीदन्तरिक्ष शोष्णों द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात् तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥ ( वा० स ० ३१।१३; ऋ ० सं ० १० / ९ ०।१३ ) । ' अस्य पुरुषस्य नाभ्या अवकाशमयात् सामर्थ्याद् अन्तरिक्षमुत्पन्नमासीत् । एवं शीर्ष्णः शिरोवदुत्तम- सामर्थ्यात् प्रकाशमयाद् द्यौः सूर्यादिलोकः प्रकाशात्मकः समवर्तत सम्यगुत्पन्नः सन् वर्तते । पद्भ्यां भूमिः पृथिवी-कारणमयात् सामर्थ्यात् परमेश्वरेण भूमिरुत्पादितास्ति जलं च । दिशः शब्दाकाशमयात्तेन दिश उत्पादिताः । तथा तेनैव प्रकारेण सर्वलोककारणमयात् सामर्थ्यादन्यान् लोकान् तत्र स्थावरजङ्गमान् पदार्थान् अकल्पयन् परमेश्वर ग्रहण होनी चाहिये । तब मुख प्रभूति से ब्राह्मण आदि की उत्पत्ति वास्तविक माननी पडेगी, न कि आपकी उस मन्त्र की व्याख्या के अनुसार लाक्षणिक । अपि च, मूल से आकाश की उत्पत्ति नही बताई गई है, किन्तु श्रोत्र से वायु की उत्पत्ति कही गई है । इसलिये आपका यह अर्थ करना भी गलत है कि श्रोत्रमय आकाश से नभ की उत्पत्ति हुई । निराकार पुरुष का जब कोई मुख है ही नही, तब उसका ज्योतिर्मय विशेषण सुतरा निरर्थक ही माना जायगा । इस तरह से आपका सूर्य का ' ज्योतिर्मय' विशेषण का अध्याहार भी व्यर्थ ही है । इस मन्त्र का वास्तविक परम्परागत अर्थ यह है- ............... ००००(ऋ० सं ० १०.९ ०.१२) अर्थ- चन्द्रमा मनस इति । इस प्रकार से यज्ञकर्ताओं की उत्पत्ति को बताकर यष्टव्य देवताओ की उत्पत्ति को बताते है- इस चतुर्मुख के मन से शीतल किरणों वाला चन्द्रमा उत्पन्न हुआ । चक्षु से समस्त पदार्थों का प्रकाशक सूर्य पैदा हुआ । परमैश्वर्य-शाली, शचीपति, देवताओं में सार्वभौम इन्द्र और देवताओं का मुखस्थानीय अग्नि दोनों पैदा हुए । चतुर्मुख भगवान् के प्राण से सर्व- प्राणनहेतुभूत वायु पैदा हुआ । जिस प्रकार दधि, आज्य आदि द्रव्य, गो आदि पशु, ऋगादि वेद और ब्राह्मणादि मनुष्य, उससे उत्पन्न हुए, उसी प्रकार । चक्षु से सूर्य भी पैदा हुआ । इस प्रजापति के मुख से. चन्द्र आदि देव भी उसीसे उत्पन्न हुए । प्रजापति के मन से चन्द्रमा पैदा हुआ इन्द्र और अग्नि ये देव उत्पन्न हुए ॥ इस प्रजापति के प्राण से वायु पैदा हुआ || १२ || (नाम्या मासीदन्त ० ) ' इस पुरुष के अत्यन्त सूक्ष्म सामर्थ्य से अन्तरिक्ष, अर्थात्, जो भूमि और सूर्य आदि लोकों के बीच पोल है, उसको भी नियत किया गया है । (शीष्णों द्यौः) और जिसके सर्वोत्तम सामर्थ्य से सब लोकों के प्रकाश करने वाले सूर्य आदि लोक उत्पन्न हुए हैं । ( पद्रयां भूमिः ) पृथिवी के परमाणु कारणरूप सामर्थ्य से परमेश्वर ने पृथिवी उत्पन्न की है, तथा जल को भी उसके कारण से उत्पन्न किया है । (दिश: श्रोत्रात्) उसने श्रोत्ररूप सामर्थ्य से दिशाओं को उत्पन्न किया है । (तथा लोकानकल्पयन् ) इसी प्रकार सब लोकों के कारणरूप सामर्थ्य से परमेश्वर ने सब लोक और उनमें बसने वाले सब पदार्थों को उत्पन्न किया है' ( पृ० १४१ ) । १५८

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वेदार्थपारिजाता १२५८ उत्पादितवानस्ति' (पृ० १४१ ) इति यद् व्याख्यातं दयानन्देन तत्रोच्यते - अनेन प्रायेण सर्वत्रैव व्याख्याने स्वेच्छा- चारितैव प्रदर्शिता । नास्याः कथमवकाशमयत्वम्? नाभ्युपलक्षितस्योदरस्य त्ववकाशमयत्वं युज्यते । शीष्णं इत्यस्य लक्षणामाश्रित्य शिरोवदुत्तमसामर्थ्यमित्यर्थः कृतः, परन्तु सामर्थ्यस्य प्रकाशमयत्व कुतस्त्यम्? शक्त्यपरपर्यायस्य सामर्थ्यस्य रूपवत्त्वमेव नास्ति, कुतस्तरां प्रकाशमयत्वम्? पद्भ्यामित्यस्य पृथिवीकारणमयत्वं कथमर्थः? पूर्वं श्रोत्रा- दित्यस्याकाशमयत्वमर्थ उक्तः, इदानी शब्दाकाशमयत्व सर्वलोककारणमयत्वं चार्थं उच्यते । यदि शब्दबलात् तदा शब्द- शक्त्या प्रसिद्ध एवार्थो ग्राह्यः । वस्तुतस्तु विराट्पुरुषेऽप्यस्मदादीनामिव शिरःश्रोत्रचक्षुरादिकल्पनानुरोधेन तस्याङ्गेभ्य एव तेषां तेषां लोकादीनामत्रोत्पत्तय उक्ताः । छान्दोग्ये पञ्चमेऽध्याये -' दिवमेव भगवो राजन्निति' ( १२ ), ' आदित्यमेव भगवो राजनिति' ( १३ ), 'वायुमेव भगवो राजन्निति' ( १४ ), 'आकाशमेव भगवो राजनिति' ( १५ ), 'अप एव भगवो राजन्निति' ( १६ ), पृथिवीमेव भगवो राजन्निति' ( १७ ), ' तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्चेव सुतेजाश्चक्षु- विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा सन्देहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिहृदयं गार्हपत्यो मनोऽश्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीय:' ( १८ ) इति | मुण्डके च ' अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूयो दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ( २| १ |४ ) । योऽपि प्रथमजात् प्राणाद्धिरण्य- गर्भाज्जायतेऽण्डस्यान्तविराट् स तत्त्वान्तरितत्वेन लक्ष्यमाणोऽप्येतस्यादेव पुरुषाज्जायते । तं च विशिनष्टि- अग्निर्द्युलोकः, 'असो वाव लोको गौतमाग्निः' इति श्रुतेः । मूर्धा यस्योत्तमाङ्गं शिरः । चक्षुषी चन्द्रश्च सूर्यश्च यस्य! यस्य दिशः श्रोत्रे । विवृता वाक्प्रसिद्धा वेदाः । वायुः प्राणः । यस्य हृदयं विश्वं समस्तं जगत् सर्वं ह्यन्तःकरण- विकारमेव जगद् मनस्येव सुषुप्ते प्रलयदर्शनात्, जागरितेऽपि तत एवोदयात् । यस्य पद्भ्यां जाता पृथिवी ' एष देवो विष्णुरनन्तः प्रथमशरीरी त्रैलोक्यदेहोपाधिः सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा' इति शाङ्करभाष्यम् ( मुण्डक० ११२।४ ) । एतस्यैव विवरण पुराणेषूपलभ्यते- पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पाष्णिप्रपदे रसातलम् । महातलं विश्वसृजोऽथ गुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घ ॥ २६ ॥

दयानन्द की इस व्याख्या के विषय में हमारा यह कहना है- इन्होंने व्याख्या करते समय प्रायः सर्वत्र मनमानी की है । नाभि का अर्थ अवकाशरूप सामर्थ्य कैसे हो सकता है? नाभि से उपलक्षित होने वाले उदर ( पेट ) में अवकाश माना जा सकताहै । शीर्ष्ण शब्द में लक्षणा का सहारा लेकर शिर के समान उत्तम सामर्थ्य अर्थ किया है, किन्तु सामर्थ्य की प्रकाशमयता कैसे हो सकती है? सामर्थ्य शक्ति का ही दूसरा नाम है । जब उसमें रूप ही नही है तो उसकी प्रकाशमयता का कहा प्रसंग है? 'पद्रयाम्' पद का अर्थं पृथिवी को पैदा करने वाला सामथ्र्यं कैसे होगा? पहले श्रोत्र पद का अर्थ आकाशमय किया गया है, अब यहां उसका अर्थ शब्दाकाशमय और सर्वलोक-कारणमय किया जाता है, यह कैसे संभव है? शब्द की शक्ति के अनुसार तो प्रत्येक शब्द का प्रसिद्ध अर्थ हो किया जाना चाहिये । वास्तव में विराट् पुरुष में हमारी ही तरह शिर, श्रोत्र, चक्षु आदि की कल्पना कर उन्ही अंगों से उन उन लोक ,,,,,की उत्पत्ति यहां बताई गई है । छान्दोग्य उपनिषद् के पाचवें अध्याय में द्यौं आदित्य वायु आकाश जल पृथिवी व्यादि आदि ब्रह्म का ही प्रकाश बताकर उस वैश्वानर प्रकाशमय ब्रह्म के विभिन्न अगो की कल्पना कर उनसे विभिन्न पदार्थों की उत्पत्ति बताईको उसगई है । इसी प्रकार मुण्डक श्रुति में भी अग्नि, चन्द्र, सूर्य प्रभृति से उस ब्रह्म के विभिन्न अवयवो की कल्पना की गई है और तदनुसार शाकर भाष्य में इसकी व्याख्या भी की गई है । श्रुतियों में प्रतिपादित यही विषय विस्तार से पुराणों में भी उल्लिखित है । जैसा किही भागवतपुराण में वर्णित है- 'श्रुतियां पाताल को इस विराट् पुरुष का पादमूल बताती है, रसातल उसका एड़ी और पंजा है, महीतल उस विश्वस्रष्टा १

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वदाथपारिजातः १२५६ द्वे जानुनी सुतल विश्वमूर्तेरूरुद्वय वितल चातल च । || || महीतल तज्जघन महीपते नभस्तल नाभिसरो गृणन्ति २७

उरःस्थल ज्योतिरनीकमस्य ग्रीवा महवंदन वे जनोऽस्य ।

तपो स्राटी विदुरादिपुसः सत्य तु शीर्षाणि सहस्रशीर्ण. ॥ २८॥

इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्राः कर्णो दिश. श्रोत्रममुष्य शब्द: ।

नासत्यदत्रस्रौ परमस्य नासे घ्राणोऽस्य गन्धो मुखमग्निरिद्धः ॥ २९॥

द्यौरक्षिणी चक्षुरभूत् पतङ्ग • पक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च ।

तद्भ्रूविजृम्भ. परमेष्ठिधिष्ण्यमापोऽस्य तालू रस एव जिह्वा ॥ ३० ॥

छन्दास्यनन्तस्य शिरो गृणन्ति दष्ट्रा यमः स्नेहकला द्विजानि ।

हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥ ३१ ॥

व्रीडोत्तरोष्ठोऽघर एव लोभो धर्मः स्तनोऽधर्मपथोऽस्य पृष्ठः ।

कस्तस्य मेढ़ वृषणौ च मित्रो कुक्षिः समुद्रा गिरयोऽस्थिसङ्घाः ॥ ३२ ॥

| तनूरुहाणि महीरुहामहीरुहा विश्वतनोर्नृपेन्द्र | नद्योऽस्य नाड्योऽथ || अनन्तवीर्यः श्वसितं मातरिश्वा गतिर्वयः कर्मगुणप्रवाहः ३३ ॥ ईशस्य केशान् विदुरम्बुवाहान् वासस्तु सन्ध्या कुरुवर्य भूम्नः । || || अव्यक्तमाहुर्हृदय मनश्च स चन्द्रमाः सर्वविकारकोशः ३४ विज्ञानशक्ति महिमामनन्ति सर्वात्मनोऽन्तःकरण गिरित्रम् । || || अश्वाश्वतर्युष्ट्रगजा नखानि सर्वे मृगाः पशवः श्रोणिदेशे ३५ वयांसि तद्व्याकरणं विचित्रं मनुर्मनीषा मनुजो निवासः । || || गन्धर्वविद्याधरचारणाप्सरः स्वरस्मृतीरसुरानीकवीर्यः ३६ के टखने हैं, तलातल उस पुरुष की पिण्डलिया है, सुतल उस विश्वमूर्ति भगवान् के घुटने हैं, वितल और अतल उसकी दोनो जंघाएं है, हे राजन्, महीतल उसका नितम्ब भाग है, नभस्तल को श्रुतियां उस पुरुष का नाभितल बताती है, स्वर्लोक इसका उरःस्थल (वक्षस्थल ) है, महलोंक ग्रीवा और जनलोक वदन ( मुह ) है, तपोलोक इस आदि पुरुष का ललाट है और उस हजारो शिर वाले विराट् पुरुष का शिर सत्यलोक है । इन्द्र प्रभूति देवगण इसकी भुजाएं है, दिशाएं कान और शब्द श्रवण शक्ति है । अश्विनीकुमार इस विराट् पुरुष की नासिका और गन्ध गुण इसकी घ्राण शक्ति है । प्रज्वलित अग्नि इसका मुंह, आकाश अक्षिगोलक और सूर्य इसकी दर्शन शक्ति है । इस विराट् पुरुष विष्णु की दिन और रात पलकें हैं । विष्णुलोक इस विराट् का भ्रूविलास है, जल इसकी तालु और रस जिह्वा है । छन्द इस अनन्त भगवान् के शिर कहलाते है, यमराज इसकी डादें हैं और स्नेहकला इसके दात है । इसका हास मनुष्यों को पागल बना देने वाली माया है और इसके कटाक्ष ही यह दुर्गम सृष्टि कहलाती है । इसका ऊपर के होठ लज्जा से और अधरोष्ठ लोभऔरसे पहाड़बना हैइसको, धर्म ( ) ( )इसका स्वन है और पाप पृष्ठ भाग पीठ है । ब्रह्मा इसका लिंग और मित्र देवता अण्डकोश है । समुद्र कुक्षि कांख शक्तिवालाहड्डियां हैं । नदियां इसकी नाडिया हैं और हे राजन्, इस विश्वशरीर विराट् पुरुष के रोम वृक्ष कहलाते हैं । अनन्त पवन इसके श्वासोच्छ्वास और कर्म तथा गुण के अनुसार चलनेवाली गति इसकी अवस्था है । मेघ इसके केश कहे गये हैं और हेशक्तिकुरुश्रेष्ठऔर, सन्ध्या इस विराट् पुरुष के वस्त्र है । इसका हृदय अव्यक्त और मन कलंक चिह्नांकित चन्द्रमा है । पृथ्वी इसकी विज्ञान पशुगिरित्र इस सर्वात्मा का अन्तःकरण है । घोड़ा, खच्चर, ऊँट, हाथी इसके नख हैं और इसकी कमर में सब तरह विद्याधरके मृग औरचारण, निवास करते हैं । इसकी विविध बोलिया पक्षीगण, बुद्धि मनु और निवास मनुज ( मनुष्य ) कहलाते हैं । गन्धर्व,

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१२६० वेदार्थ पारिजातः ब्रह्माननं क्षत्रभुजो महात्मा विडूरुरङ्घ्रिश्रितकृष्णवर्णः || || नानाभिघाभीज्यगुणोपपन्नो द्रव्यात्मकः कर्मवितानयोगः ३७

इयानसावीश्वरविग्रहस्य यः सन्निवेशः कथितो मया ते ।

सन्धार्यतेऽस्मिन् वपुषि स्थविष्ठे मनः स्वबुद्धया नयतोऽस्ति किञ्चित् ॥ ३८॥

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः । ( ) त सत्यमानन्दविधि भजेत नान्यत्र सज्जेद्यत आत्मपातः ॥ ३ ९॥ श्री ० भा० २।१ इति । वास्तविकार्थः -- नाभ्या आसीदन्तरिक्षमिति । एतावता उपास्यदेवतामुक्त्वा उपासीनानां भोगस्थानभूतस्य अन्त- रिक्षादिलोकस्य सृष्टिमाह -नाभ्या इति । अन्तरिक्षं सूर्याण्डगोलयो: मध्यदेशरूपः अन्तरिक्षलोकः आसीत् । शीष्णः शिरसः द्यौः द्युलोकः समवर्तत । इदमुपरितनानां सर्वेषा लोकानामुपलक्षणम् । पद्भ्या चरणाम्या भूमिः पृथिवी मण्ड* लम् । इदं च सर्वेषामघोलोकानामुपलक्षणम् । श्रोत्रात् कर्णात् दिशः आशाः, इद च सप्तद्वीपोपलक्षणम् । तथा यथा पूर्वस्मिन् कल्पे आसन तथा लोकान् अन्तरिक्षादीन् पृथिव्यादीश्च चतुर्दशलोकान् । अकल्पयन् अकल्पयत् चकार । बहुवचनं कतिधा व्यकल्पयन्निति प्रश्नानुरूपमत्र विवक्षितम् । यथा चन्द्रादीन् प्रजापतेर्मनःप्रभृतिभ्योऽकल्पयन् तथा अन्तरिक्षादीन् लोकान् प्रजापतेर्नाभ्यादिभ्यो देवा अकल्पयन् उत्पादितवन्तः । एतदेव दर्शयति -नाभ्याः प्रजापतेर्नाभः । f अन्तरिक्षमासीत् । शीर्ष्णः शिरसः द्यौः समवर्तत उत्पन्ना । अस्य पद्भ्यां पादाभ्यां भूमिः उत्पन्ना । अस्य श्रोत्राद् दिश उत्पन्नाः ॥१३ ॥

'यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इष्मः शरद्धविः ॥ ' ( वा ० सं ० ३१।१४; ऋ ० सं ० १०।९ ०।१४ ) । ' देवां विद्वांसः पूर्वोक्तेन पुरुषेण हविषा गृहीतेन दत्तेन अग्निहोत्राद्यश्वमेघान्त शिल्पविद्यामयं अप्सराएं ये सब इसके पराक्रम के विलास हैं । ब्राह्मण इसका मुह, क्षत्रिय भुजाएं, वैश्य जांघ और कृष्णवर्ण शूद्र इसके नाम और प्रशंसनीय गुणो से युक्त द्रव्यात्मक कर्म के चंदवे से ढका हुआ यह विराट् ईश्वर के शरीर का पैर है । नाना इस स्थूल शरीर में ही मन अपनी बुद्धि के साथ निवास करता है । वस्तुतः इनकी अपनी कोई विस्तार मैंने तुमको बताया । प्राणियों की बुद्धियों की वृत्ति के माध्यम से इस संसार के सभी पदार्थों को देखता है, जैसे स्वप्नदशासत्ता नही है । वह विराट् पुरुष ही सभी ,, कहीकल्पनामनुष्यके सहारेको अपनेही देखमन सकताको लिप्तहै । नसत्यकरनाऔरचाहियेआनन्द के खजाने उस भगवान् का ही सबको भजन मेकरनाअकेला आत्मा ही सब कुछ अपनी जिनमे लिप्त होने से कि उसका पतन होता हो । चाहिये इसके सिवाय अन्यत्र इसलिये इस मन्त्र का सायण प्रभृति के द्वारा किया गया पुराना अर्थ ही ठीक है । जो ...... *** ••• ॥ (ऋ० सं ० १०, ९०, १३) कि इस प्रकार है- अर्थ- नाम्या आसीदन्तरिक्षमिति । अभी तक किये गये वर्णन से उपास्य भोगस्थानभूत अन्तरिक्ष आदि लोक की सृष्टि को बताया जा रहा है -नाम्या इति । उस देवताओं को बताया गया, अब उपासीन मध्य का देश अन्तरिक्षलोक हुआ । शिर से द्युलोक हुआ । ऊपर के सभी लोकों प्रजापति की नाभि से सूर्य और अण्डगोल के प्रकारहुआ । कीनीचेरचनाके सभीथी, लोकोंउसी प्रकारका यहअन्तरिक्षउपलक्षणआदिहै । औरकानपृथिवीसे दिशाएँआदिउत्पन्नचतुर्दशहुई । सातोंका द्वीपोयह काउपलक्षणयह उपलक्षणहै । चरणोंहै । पूर्वंसे कल्पपृथ्वीमण्डलमें जिस की विवक्षा प्रश्न के अनुरूप है । जिस प्रकार प्रजापति ने मन प्रभृति अवयवोंलोकोसे की रचना की । ' कतिधा व्यकल्पयन्' यहाँ बहुवचन, की नाभि आदि अवयवों से अन्तरिक्षादि लोकों को पैदा किया । इसी को दिखातेचन्द्रादिहै -कोनाम्याःपैदा किया। प्रजापतिवैसे ही देवताओं ने प्रजापति धोत्र से दिशाएं उत्पन्न हुई || १३|| हुआ । शिर से द्यौः द्युलोक उत्पन्न हुआ । इसके पैरों से भूमि उत्पन्न हुई । इसके की नाभि से अन्तरिक्ष ( यत्पुरुषेण ) ' देव अर्थात् जो विद्वान् लोग होते हैं, उनको भी वे ईश्वर के दिये पदार्थों को ग्रहण करके पूर्वोक्त यज्ञ का विस्तारपूर्वक ईश्वर ने अपने अपने कर्मों के अनुसार उत्पन्त किया है । अनुष्ठान करते हैं । ब्रह्माण्ड की रचना, पालन और प्रलय