वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 361–370
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 361–370
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वेदार्थ पारिजातः १२६१ यत् प्रकाशितवन्तः विस्तृतं कृतवन्त. कुर्वन्ति करिष्यन्ति च । इदानीं जगदुत्पत्ती कालस्यावयवाख्या सामग्रयु च्यते । अस्य यज्ञस्य पुरुषादुत्पन्नस्य ब्रह्माण्डमयस्य वसन्त आज्यं घृतवदस्ति । ग्रीष्म: ग्रीष्मर्तुरिष्म इन्धनान्यग्निर्वा शरद्धविः पुरोडाशादिवद्धविः हवनीयमस्ति' (पृ० १४१ - १४२ ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानम् । अत्रोच्यते - अत्र पुरुषस्य हविष्ट्वं स्पष्टमुच्यते । 'तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं तेन देवा अयजन्त' इत्युभयोः कश्चन सम्बन्धः प्रतीयते । त्वया तु तत्र हृदयान्तरिक्षे पुरुषस्याभिषेक एवोक्तः । तस्य हविष्ट्वेन प्रोक्षणादिसंस्कारो नाङ्गीकृतः, न वा पुरुषरूपेण द्रव्येण यजन- मङ्गीकृतम् । तेनायजन्तेति यजनसाधनत्वेन सम्बन्धार्हाया अपि तृतीयायास्तेनेत्युपदेशक्रियायाः कर्तृत्वेन सम्बन्ध उक्तः, यद्यप्युपदेशक्रियायास्तत्र यद्यप्युपदेशक्रियायास्तत्र चर्चापि नास्ति । इदमप्युपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पनाया उदाहरणम् ॥ परमत्र पुरुषेण हविषेति सामानाधिकरण्येन पुरुषरूपेण हविषेत्येवायाति, तथापि पुरुषेण दत्तेन पुरुषेण गृहीतेन वा हविषेत्यर्थः कृतः । तदेतदप्युपस्थितं परित्यज्यानुपस्थित कल्पनारूपो दोष एव, गृहीतेन दत्तेनेत्यनयोः शब्दयोरश्रवणात् । अग्निहोत्राश्वमेघपर्यन्त यज्ञ पुरुषेण गृहीतेन हविषाऽतन्वत कृतवन्तः कर्तारस्त्वत्र देवा विद्वांस एव । यद्येवं तहि त एव ग्रहीतारोऽपि स्युः किमन्तगंडुना पुरुषेण ग्रहीत्रा? ये यज्ञमतन्वत त एव हविर्गृह्णन्ति । यदि तु पुरुषेण दत्तेनेत्येवोच्यते तदापि प्रत्यक्षविरोध. । नहि क्वचिदपि यजमानेभ्यः पुरुषो हविर्यच्छन्नुपलभ्यते । यदि तु सर्वस्यात्मा- ज्यादिहविषः परेशसृष्टत्वादेव तेन दत्तमित्युच्यते, तदपि न युक्तम्, सृष्ट्य क्त्यैव गतार्थत्वात् । अग्निहोत्रादिक्रियामयं ब्राह्मणसूत्रादौ यजमानैः क्रियमाणं च प्रसिद्धम्, शिल्पमय तु तन्न क्वाप्युक्तम्, न वा प्रसिद्धमिति तु मुधैव तत्प्रलापः । करना यही इस यज्ञ का स्वरूप है । इस जगत् लक्षण यज्ञ को जिस सामग्री से संपादित किया गया, वह इस प्रकार थी -( वसन्तो० ) पुरुष के द्वारा उत्पन्न किया गया जो यह ब्रह्माण्डरूप यज्ञ है, इसमें वसन्त ऋतु अर्थात् चैत्र और वैशाख घृत के समान है । ( ग्रीष्म इष्मः ) ग्रीष्म ऋतु, ज्येष्ठ और आषाढ, इन्धन है । श्रावण और भाद्रपद वर्षा ऋतु, आश्विन और कार्तिक शरद ऋतु, मार्गशीर्ष और पौष हिम ऋतु तथा माघ और फाल्गुन शिशिर ऋतु कहलाती है, यह सब इस यज्ञ में आहुति है । इस तरह से यहाँ रूपकालंकार से सब ब्रह्माण्ड का व्याख्यान जानना चाहिये ' ( पृ० १४२ ) । दयानन्द की इस व्याख्या के सम्बन्ध में हमारा यह कहना है —यहां स्पष्ट रूप से पुरुष को हवि बताया गया है । 'तं यज्ञं बर्हिषि प्रोक्षन् पुरुष ' और 'तेन देवा अयजन्त इन दोनों मन्त्रों का परस्पर कुछ संबन्ध अवश्य मालूम होता है । आपने तो वहाँ हृदयाकाश में पुरुष को अभिषित करने की बात मानी हैं, उसको हवि मानकर प्रोक्षण आदि संस्कारो की बात आपने नही मानी है और न पुरुषरूप द्रव्य से यज्ञ को निष्पन्न करने की बात ही आपने मानी है । 'तेन अयजन्त' यहाँ यजन के साधन के रूप में सम्बन्ध जोडने लायक तृतीया का आपने उपदेश क्रिया के कर्ता से सम्बन्ध जोड़ा है, यद्यपि उपदेश क्रिया की वहीं कोई चर्चा नही | यह भी उपस्थित को छोडकर अनुपस्थित की कल्पना करने वाला उदाहरण है, जो कि मीमासा में दोष माना जाता है । इस मन्त्र में भी 'पुरुषेण हविषा' इनकी समान अधिकरणता के आधार पर 'पुरुष रूप हवि से ' यह अर्थ होता है, तो भी आपने ' पुरुष के द्वारा दी गई अथवा पुरुष से गृहीत हवि से यह अर्थ किया है । यह भी उपस्थित को छोड़कर अनुपस्थित कल्पना वाला दोष हो माना जायगा, क्योंकि मन्त्र में गृहीत अथवा दस शब्द हैं ही नही । अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त यज्ञो का अनुष्ठान पुरुष के द्वारा गृहीत हवि से किया, यहाँ कर्ता विद्वान् पुरुष माने जाते हैं । यदि ऐसी बात है, तो ग्रहीता भी उन्हीको क्यो न मान लिया जाय, बीच में व्यर्थ ही ग्रहीता के रूप में पुरुष की कल्पना क्यों की जाय? जो अनुष्ठान का अनुष्ठान करते हैं, वे ही हवि को ग्रहण करते है । हवि पुरुष द्वारा प्रदत्त है, ऐसा मानने पर यह बात प्रत्यक्ष प्रमाण के विरुद्ध पडेगी, क्योकि कही भी यह पुरुष यजमानो को हवि द्रव्य प्रदान करता हुआ दिखाई नहीं पड़ता । यदि यह माना जाय कि घृत प्रभूति सभी हवन की सामग्री परमेश्वर की सृष्टि होने से परमेश्वर के द्वारा दी गई ही मानी जायगी, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह सब भगवान् की ही सृष्टि है, यह तो बता ही दिया गया है, तब आप यहाँ पुनः उसको हमारे द्वारा दी गई है, ऐसा क्यों कहते हैं? ब्राह्मण एवं सूत्र ग्रन्थों में यज्ञ को यजमानादि से अनुष्ठेय अनुष्ठान ( कर्म ) के रूप में ही माना गया है, यज्ञ को शिल्प कही नही कहा गया और न कही यज्ञादि शिल्प के रूप में प्रसिद्ध ही है । इस तरह से आपकी यज्ञादि को शिल्प मानने की बात भी
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१२६२ वेदार्थ पारिजातः किश्व, यदि परमेश्वरेण प्रसिद्धमाज्यादि हविर्दत्तमेव, तहि किमर्थं वसन्तस्याज्यत्वं शरदश्च हविष्ट्व ग्रीष्मस्ये मत्व- मुच्यते । ब्राह्मणसूत्राद्युक्ते प्रत्यक्षं च क्रियमाणे यज्ञेन वसन्तादीनामाज्यत्वेनोपयोगो न दृश्यते न वा सम्भाव्यते, अग्निना सिच्यत इतिवत् अयोग्यत्वापाताच्च । अत एव 'ब्रह्मरूपिणा यजमानेन सम्पाद्यमानस्य यज्ञस्यैव मुख्यरूपेण वेदेषु यज्ञपदेन व्यवहारः' इत्यप्य- पास्तम्, तस्य परमेश्वरकर्तृकत्वेन जीवानां कृते विधानानर्हत्वात् । 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम:' इत्यादिविधि - सहस्रबाधापाताच्च । देवा अयजन्त इति मूलविरोधात् । 'देवा विद्वांसः' इति वेदभाष्यविरोधाच्च । भूगोल खगोल- ज्ञानाय चित्राणि दृश्यन्ते पठ्यन्ते वा न विधीयन्ते न वा क्रियन्ते । अत्र स्वग्निहोत्रादीनि फलविशेषाय विधीयते क्रियन्ते च । 'याज्ञदेवते पुष्पफले, 'देवताध्यात्मे वा पुष्पफले ' ( नि ० १।१ ९ ) इति निरुक्तवचनोपस्थानं तु धूलि- प्रक्षेपेण मूर्खजनवञ्चनमेव । अत एव २० इति स्थाने १ ९ इति सङ्केतितम् । वचनमिदं विशतितमखण्डीयम् । 'याज्ञ- दैवते पुष्पफले देवताध्यात्मे वा' ( नि० १।२० ) अत्र रूपकपरिकल्पनया पुष्पफलविभागेन द्विधा प्रविभज्यते । तत्राभ्युदय- लक्षणधर्मापेक्षया याज्ञं पुष्पं दैवतं फलम् । यज्ञज्ञानं याज्ञं देवताज्ञानं दैवतम् । पुष्पं फलार्थं भवति तथैव याज्ञं देवतार्थं भवति । निःश्रेयसलक्षणे धर्मेऽभिप्रेयमाणे याज्ञदैवते पुष्परूपे भवतः । देवते याज्ञमन्तर्भवति । तत्र दैवत पुष्पं भवति, अध्यात्मं फल भवति 1। कर्मविशिष्टदेवतोपासनस्य पुष्पत्व ब्रह्मात्मज्ञानस्य फलत्वमुक्तम् । न च शास्त्रसिद्धयज्ञस्यापलाप उक्तः । अधिकं तु पूर्वमुक्तमेव । व्यर्थ का प्रलाप है । अपि च, परमेश्वर ने जब प्रसिद्ध याज्यादि हवि दे ही दी, तब पुनः वसन्त को यहाँ घृत, शरद् को हवि और को इन्धन के रूप में क्यो उपस्थित किया गया है? ब्राह्मण और सूत्रादि ग्रन्थो में उपदिष्ट प्रत्यक्ष किये जाने वाले यज्ञ में वसन्त प्रभृतिग्रीष्म का न तो घृत आदि के रूप में उपयोग देखा हो जाता है और न ऐसा संभव ही है । यह बात आग से सोचने की तरह असंभव है । इसीलिये टिप्पणीकार (पृ० १४१ ) की यह बात भी गलत सिद्ध हो जाती है कि ब्रह्मरूपी यजमान से संपन्न किया ' ', वाला यह यज्ञ ही मुख्य रूप में वेदो में यज्ञ पद से अभिहित होता है क्योकि इस यज्ञ को तो केवल परमेश्वर ही कर जावे जीवों के लिये इसका विधान कैसे हो सकता है? इस तरह से तो 'अग्निहोत्र' आदि का विधान करने वाले सहस्रों सकता है, तब ' ' ' ' ' हो जाएंगे । इस बात का देवताओं ने यज्ञ किया यह मूल श्रुति से और देवता पद को विद्वान् का वेदवाक्य बाधित भाष्य से भी विरोध पडेगा । भूगोल और खगोल के ज्ञान के लिये चित्र देखे जाते है अथवा पढे जाते पर्याय मानने वाले दयानन्दोय है, उनका विधान या अनुष्ठान नहीं किया जाता । यहाँ तो अग्निहोत्र प्रभूति का विशेष फल की प्राप्ति के लिये अनुष्ठान किया जाता है । टिप्पणीकार ( पृ० १४१ ) ने ' याज्ञदैवते ' इत्यादि निरुक्त के दो वचनों को प्रमाणरूप ,, धूलिप्रक्षेप मात्र है बेवकूफों को ही इससे बहकाया जा सकता है । निरुक्त का स्थलनिर्देश भी यहाँ में उपस्थित किया है यह है । इन निरुक्त वाक्यों में रूपक की परिकल्पना के सहारे यज्ञ के फल को पुष्प और फल के रूप में इसीलिये गलत कर दिया गया अभ्युदय लक्षण धर्म को दृष्टि, से याज्ञ पुष्प और दैवत फल है । यज्ञ के ज्ञान को याज्ञ और देवता केदो विभागों में बांट दिया है । इनमे जैसे फल के लिये होता है उसी भाँति याज्ञिक कर्मकाण्ड के ज्ञान का उपयोग देवता के स्वरूप के ज्ञान को देवत कहा जाता है । पुष्प ( मोक्ष ) लक्षण धर्म अभिप्रेत होने पर याज्ञ और दैवत दोनो ज्ञान पुष्पस्थानीय माने जाते हैं । परिज्ञान के लिये होता है । निःश्रेयस् निरुक्त के द्वितीय वाक्य के दैवत शब्द में याज्ञ शब्द भी अन्तर्भूत है । इस तरह से देवत ज्ञान इस अवस्था मे पुष्पस्थानीय है निरुक्त के द्वितीय वाक्य में कर्मविशिष्ट देवतातत्त्व के ज्ञान को, उपासना को पुष्पस्थानीयऔर अध्यात्म ज्ञान फलस्थानीय । इस तरह से भी तरह से नहीं किया जा सकता । इसमाना है । शास्त्रों से भली प्रकार प्रतिपादित यज्ञादि कर्मकाण्ड का अपलाप किसी और ब्रह्मात्मतत्त्व के ज्ञान को फलस्थानीयहम विस्तार से विचार पहले ही प्रकट कर चुके हैं । विषय पर
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वेदार्थपारिजातः १२६३ वास्तविकार्थ' -यत्पुरुषेणेति । स जातश्चतुर्मुखः स्वयं जगत्सृष्टिमजानानो भगवदुपदिष्टमार्गेण भगवन्त-मात्मसमर्पणरूपेण मानसयागेन आराध्य तत्प्रसादाल्लब्धविज्ञानो जगत्सृष्टिमकरोदिति वक्तु भगवदाराधनात्मकं -,,,यागमाह यत् यदा पुरुषेण चतुर्मुखात्मकेन हविषा देवास्तदिन्द्रियाणि यज्ञ मानसं ध्यानरूपम् अतन्वत तदेत्यध्याहार. । अस्य यज्ञस्य वसन्त आज्यम्, वसन्तकालस्य आज्यप्रचुरत्वेन तत्राऽऽज्यकल्पनम् । ग्रीष्म इध्मः, तदानीं पलाशादीनां बाहुल्योपलम्भात् । शरद् हविः, तत्कालस्य मस्यप्रचुरत्वात् । एव वसन्तादीना मानसपज्ञे आज्यादित्वेन ध्यानम् । यद् यदा पूर्वोक्तक्रमेणैव शरीरेषु उत्पन्नेषु सत्सु । देवा उत्तरसृष्टिसिद्धयर्थं बाह्यद्रव्यस्य अनुत्पन्नत्वेन हविरन्तराऽसम्भवात् पुरुषस्वरूपमेव मनसा हविष्ट्वेन सङ्कल्प्य पुरुषेण पुरुषाख्येण हविषा, मानसं यज्ञम् अतन्वत अन्वतिष्ठत् । तदानीं अस्य यज्ञस्य, वसन्तः वसन्तर्तुरेव, आज्यम् आसीद् अभूत् । तमेवाऽऽज्यत्वेन सङ्कल्पितवन्तः । ग्रीष्म: ग्रीष्मर्तुः, इष्म आसीत् । तमेव इष्मत्वेन भावितवन्तः । तथा शरद्धविः पुरोडाशादिहविष्ट्वेन शरदं भावित-वन्त ॥ पूर्व पुरुषस्य हविःसामान्यरूपत्वेन सङ्कल्पः, अनन्तरं वसन्तादीनामाज्यादिविशेषरूपत्वेन सङ्कल्पः || १४ || 'सप्तास्यासन् परिघयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञ तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् 11 ' ( वा० सं ० ३१।१५; ऋ ० स ० १० / ९ ० / १५ ) । अस्य ब्रह्माण्डस्य सप्त परिधय सन्ति । परिधिहि गोलस्योपरिभागस्य यावता सूत्रेण परिवेष्टनं भवति स परिधिर्ज्ञेयः । अस्य ब्रह्माण्डस्य ब्रह्माण्डान्तर्गतलोकाना सप्त परिधयो भवन्ति समुद्र एव: । तदुपरि त्रसरेणुसहितो वायुद्वितीयः । मेघमण्डल तत्रस्थो वायुस्तृतीयः । वृष्टिजलं चतुर्थः । तदुपरि वायुः पञ्चमः । अत्यन्तसूक्ष्मो धनञ्जयः षष्ठः । सूत्रात्मा सर्वत्र व्याप्तः सप्तमश्च । एवमेकैकस्योपरि सप्तावरणानि स्थितानि । तस्मात्ते .परिधयो विज्ञेयाः । त्रि सप्त समिधः कृताः । एकविंशतिपदार्थाः सामग्रयस्य चास्ति प्रकृतिर्महद्बुद्ध्याद्यन्तः करण इस मन्त्र का वास्तविक परम्परा प्राप्त अर्थ यह है- ... ॥ ऋ० सं० १०, ९०, १४ ) अर्थ - यत्पुरुषेणेति । उत्पन्न हुए उस चतुर्भुज ने जगत् का सर्जन करना स्वयं न जानने के कारण भगवान् के द्वारा बतलाये गये माग से आत्मसमर्पणरूप मानस याग के द्वारा भगवान् की किया, यह बतलाने के लिये भगवत्-आराधना रूप याग को बता रहे हैं आराधना-- जब चतुर्मुखकर उनकेपुरुषप्रसादरूपसे ज्ञानहवि प्राप्तके द्वाराकरकेउसकेजगत्अधिकइन्द्रियको उत्पन्नहोतारूप देवताओं ने मानस व्यापाररूप यज्ञ किया, तब उस यज्ञ का आय (घृत ) वसन्त ऋतु को बनाया । वसन्त के समय आज्य पलाशादि लकडिया अधिकहै, इसलिये उसमे आज्य की कल्पना की गई है । ग्रीष्म ऋतु को इध्म ( लकडी) बनाया, क्योकि उस समय । इस प्रकार इस मानस-मात्रा में होती है । शरद ऋतु की हवि बनाया, क्योकि उस समय धान्य की उत्पत्ति प्रचुर मात्रा में होती है हुए, तब आगे की सृष्टि के यज्ञ में उन वसन्त आदि का माज्य आदि के रूप मे ध्यान किया गया । जब पूर्वोक्त क्रम से ही शरीर उत्पन्न को ही हवि के रूपलिये देवताओं ने किसी बाह्य द्रव्य के उत्पन्न न होने के कारण अन्य हवि के न मिलने से मन ही मन मे पुरुषस्वरूप ऋतु ही आज्य बना । में संकल्पित कर अर्थात् पुरुषस्वरूप हवि के द्वारा उस मानस यज्ञ को किया । उस समय उस यज्ञ का वसन्त अर्थात् उसी का माज्य के रूप से ध्यान किया । ग्रीष्म ऋतु इष्म बना, अर्थात् उसका इष्म रूप से ध्यान किया । उसी प्रकार शरद् ऋतु हवि बना, अर्थात् पुरोडाशादि हवि के रूप में शरद् का ध्यान किया । पहले पुरुष का हवि सामान्य रूप से ध्यान किया । तदनन्तर वसन्तादि का आयादि विशेष रूप से ध्यान किया ॥ १४ ॥
एक लोक के चारो ओर सात 'सप्तास्यासन्० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या दयानन्द ने इस तरह से की है—'ईश्वर ने एक परिमाण होता है, उसको परिधि कहते हैं । सात परिधि ऊपर ऊपर रची है । गोल चीज के चारों ओर एक सूत से नाप के जितना एक समुद्र,,, दूसरा त्रसरेणु, तीसरा,सो जितने ब्रह्माण्ड में लोक हैं ईश्वर ने उन एक एक के ऊपर सात सात आवरण बनायेसूक्ष्म। वायु जिसको धनंजय कहते हैंमेघमण्डलसातवा का वायु, चौथा वृष्टिजल, पांच वृष्टिजन के ऊपर एक प्रकार का वायुजाते, छठाहै । अत्यन्त(त्रिःसप्त समिधः ) इस ब्रह्माण्ड की सामग्री इक्कीस सूत्रात्मा वायु, जो कि धनंजय से भी सूक्ष्म है, ये सात परिधि कहे
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वेदार्थपारिजातः १२६४ जीवश्चैषैका सामग्री परमसूक्ष्मत्वात् दशेन्द्रियाणि श्रोत्र त्वक् चक्षुः जिह्वा नासिका वाक् पादौ हस्तौ पायुः उपस्थं चेति । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्चं तन्मात्राः । पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशमिति पञ्चभूतानि मिलित्वा दश भवन्ति । एव सर्वा मिलित्वा एकविंशतिर्भवन्ति । अस्य ब्रह्माण्डरचनस्य समिधः करणानि विज्ञेयानि । एतेषामवयवरूपाणि तत्त्वानि तु बहूनि सन्तीति बोध्यम् । देवास्तदिद येन पुरुषेण रचित तं यज्ञपुरुषं पशुं सर्वद्रष्टारं सर्वैः पूजनीयं देवा विद्वांसो ध्यानेन बध्नन्ति तं विहायेश्वरत्वेन कस्यापि ध्यान नैव बध्नन्ति नैव कुर्वन्तीत्यर्थः' (पृ ० १४२ ) । अहो घाष्ट्यं दयानन्दस्य यदय सर्वथा स्वैरं व्याख्याति । एतदीयं भाष्यं सर्वथा स्वैरचारिताया उदा- हरणम् । नात्र मूलाक्षरार्थचिन्ता मनागपि न वा पौर्वापर्यसङ्गतिविचारः । तथाहि -अस्येति पदेन ब्रह्माण्डग्रहण कथम्? न चेह सन्निधानं ब्रह्माण्डपदस्य । नहि समुद्रो ब्रह्माण्डस्य परिधिस्तस्य ब्रह्माण्डान्तर्गतत्वात् । यदि लोकापेक्षया तदुच्यते तदा सप्त समुद्राणामेव सप्तपरिधित्व कुतो नोच्यते? मेघमण्डलस्यापि ब्रह्माण्डपरिधित्वं न सम्भवति, तदन्तर्गतत्वात् । सप्तावरणानि तु ब्रह्माण्डस्योपर्येव सम्भवन्ति, न सर्वलोकानाम्, तेषां व्यापकत्वेन सर्वलोकावरणत्वे तु लोकान्तर्गतवस्तू- नामपि सप्तावरणत्वं वाच्यम् । वृष्टिजलम धनञ्जयः, सूत्रात्मा च यथा बहिर्भवन्ति तथैवान्तरपि तानि सन्तीति कथ परिधित्वम्? तदिदं येन रचित तस्य यज्ञपुरुषस्य सर्वद्रष्टृत्वेन पशुत्वमुच्यते चेत्तदा यज्ञीयपशुबुद्धयापि पशुत्वं कुतो नोच्यते? ब्राह्मणसूत्रादिषु च यज्ञपशोर्यूपे बन्धनप्रोक्षणादयश्च संस्कारा विहिता एवेति कथं तेषामपलापः क्रियते । सर्वद्रष्टुस्तु पशुत्वमसिद्धमेव । पूजनीयत्वेनैव यज्ञत्वे पित्रादीनामपि यज्ञत्व कुतो नोच्यते?!यूपे पशुं बध्नाति', 'यूपे प्रकार की कही जाती है । जिसमे से प्रकृति, बुद्धि और जीव ये तीनो मिलकर एक है, क्योंकि ये अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ है । दूसरा श्रोत्र, तीसरी त्वचा, चौथा नेत्र, पाचवी जिह्वा, छठी नासिका, सातवी वाकू, आठवा पग, नवा हाथ, दसवी गुदा, ग्यारहवा उपस्थ जिसको लिंग इन्द्रिय कहते है, बारहवा शब्द, तेरहवा स्पर्श, चौदहवा रूप, पन्द्रहवा रस, सोलहवा गन्ध, सत्रहवी पृथिवी, अठारहवा जल, उन्नीसवा अग्नि, बीसवा वायु, इक्कीसवा आकाश, ये इक्कीस समिधा कहाती हैं । ( देवा य ० ) जो परमेश्वर पुरुष सब जगत् का रचने वाला, सबको देखने वाला पूज्य है, उसको विद्वान् लोग सुनकर और उसी के उपदेश से उसी के कर्म और गुणों का कथन, प्रकाश और ध्यान करते है । उसको छोड़कर दूसरे को किसी ने ईश्वर नही माना और उसी के ध्यान में अपनी आत्मा को दृढता से बाघने में कल्याण जानते है' ( पृ ० १४२-१४३ ) । दयानन्द किस तरह से मन्त्रो का मनमाना अर्थ करते है, उसकी घृष्टता देखने योग्य है । इस मन्त्र का भाष्य इनकी मनमानी का, घृष्टता का उत्कृष्ट उदाहरण है । मूल मन्त्र के अक्षरो की उनको कुछ भी चिन्ता नही हैं और न पूर्वापर संगति का ही वे कुछ विचार रखते हैं । जैसे कि इस मन्त्र से आये ' अस्य' पद से ब्रह्माण्ड का ग्रहण किस आधार पर होगा? यहा आस-पास में कही मन्त्र में ' ब्रह्माण्ड' पद तो हैं नही ॥ समुद्र ब्रह्माण्ड का परिधि नही माना जाता, क्योंकि समुद्र तो स्वयं ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत है । किसी पृथ्वीलोक को ध्यान में रखकर ऐसा कहा जाता है, तब तो सात समुद्रो को ही सात परिधि क्यों नही माना? इसी तरह से मेघमण्डलयदि भी ब्रह्माण्ड की परिधि नही हो सकता, क्योंकि वह भी ब्रह्माण्ड के भीतर ही है, बाहर नहीं । सात आवरण ब्रह्माण्ड के ऊपर ही माने जायगे, सभी लोकों के ऊपर नही । इनकी व्यापकता के आधार पर इनको यदि सभी लोको का आवरक माना जाता अन्तर्गत विद्यमान अन्य वस्तुओं के भी सात आवरण बताने पडेंगे । वृष्टि, जल, धनञ्जय और सूत्रात्मा जैसे बाहर रहते है तो, लोक के,?,वे भीतर भी स्थित है तब इनको परिधि कैसे कहा जा सकता है हैं उसी तरह से इस ब्रह्माण्ड की जिसने रचना की वह यज्ञपुरुष सबका द्रष्टा होने पशु कहा गया है, तब यज्ञीय पशु की दृष्टि से भी उसको पशु क्यों नहीं माना जाय? ब्राह्मण और मूत्रादि ग्रन्थों में यज्ञीय पशु के यूप में बांधने, प्रोक्षण करने जैसे अनेक संहार विहित ( ),उनका अपलाप निषेध कैसे किया जा सकता है । सर्वद्रष्टा को पशु मानना ही आपके मन में है तब,?विनियोग आप मानते हैं तब आप पिता आदि का भी यज्ञ में विनियोग क्यो नही करते असंगति है । यज्ञ में यदि पूजनीय का ही 'यूप में पशु को बांधना है' इस श्रुति वाक्य
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वेदार्थपारिजातः १२६५ पशुं नियुञ्जन्ति' ( ता० म ० ब्रा० १७।१३।१६ ) इत्यत्र बन्धनस्य योऽर्थः स एव प्रकृतेऽपि ज्ञेयः । तं विहायेश्वरत्वेन कस्यापि ध्यानकरणेनापि न ध्येयस्य बद्धता भवति, किन्तु ध्यातुचित्तस्यैव बन्धन भवति । बध्नन्ति कुर्वन्तीत्यर्थः, इत्येवंजातीयकानि सर्वाण्यपि व्याख्यानानि श्रुतिषु बलात्कार एव । वस्तुतो यज्ञप्रसिद्धान्येव वस्तूनीह भावनीयत्वे- नोक्तानि यथा ज्ञानयज्ञेऽग्निहविरादीनि कल्पितानि । तस्मादस्मदुक्तमेव व्याख्यानं द्रष्टव्यम् । तद्यथा- सप्तास्यासन्निति । अस्य यज्ञस्य परिधयः परितो धीयन्त इति परिधय । आहवनीयादीनां त्रिषु पार्श्वेषु प्रथममेखलाया उपरि निधीयमानानि मेखलापरिमितायामानि काष्ठानि परिधय उच्यन्ते । सप्त आसन्, न त्रय एव । 'उत्तरवेदिपरिधयस्त्रयः, आहवनीयस्य त्रयः, आदित्यः सप्तम:' इति शतपथानुसारेण सप्तसंख्याकाः परिधय आसन् । यद्यप्यत्र वसन्तादीनामाज्यादित्वमिव न परिधित्वेन केषाञ्चिद् ध्यानमुक्तम्; तथापि पूर्वसृष्टिषु सप्तसंख्याकाना पदार्थानामेव परिधित्वेन भावन युज्यते ॥ तथा च महदहङ्कारी पञ्चतन्मात्राश्च सप्त पदार्थाः परिधित्वेन ध्याता । अस्य यज्ञस्य ॥ त्रिःसप्त त्रिगुणितसप्तसंख्या:, एकविशति संख्याका इत्यर्थः । समिध: = अग्ने- र्दीप्तिसाघनीभूतानि काष्ठानि दशेन्द्रियाणि मनः, पञ्चतन्मात्रा, पञ्च महाभूतानि च मिलित्वा एकविंशतिसख्याका समिद्रूपेण भाव्यन्ते ॥ देवा इन्द्रियरूपाः साध्याश्च यद् यदा, यज्ञं देवतोद्देशेन द्रव्यात्यागरूपम्, तन्वानाः पुरुषं चतुर्मुखाख्यम्, पशु पशुस्थानीयम्, अबध्नन् हृदयाख्ये यूपे अध्यवसायरूपया रशनया अनन्यगतिं चक्रुः । मूलप्रकृतिरूपे वा यूपे भगवदाज्ञारूपया रशनया भ्ययुञ्जन् । अस्य साङ्कल्पिकयज्ञस्य गायत्र्यादीनि सप्त छन्दांसि परिचय आसन् । ऐष्टिकस्य आहवनीयस्य त्रयः परिधय उत्तरवेदिकास्त्रय आदित्यश्च सप्तमः परिधिप्रतिनिधिरूपः । अत एवाऽऽम्नायते -'न पुरस्तात् परिदधात्या- में बन्धन पद का जो अर्थ है, वही अर्थ प्रकृत स्थल मे भी समझना चाहिये । उस परमात्मा को छोड़कर अन्य किसी का ईश्वर बुद्धि से ध्यान न करने पर भी ध्येय बन्धन में नही पड़ता, किन्तु ध्याता का चित्त हो बन्धन में पडता है । बच्नाति पद का अर्थ कुर्वन्ति करना और इसी तरह के दयानन्द के अन्य मनमाने अर्थ भी वेद मन्त्रो के साथ जबर्दस्ती ही है । बास्तव मे तो इस मन्त्र मे यज्ञीय कर्मकाण्ड में प्रसिद्ध वस्तुओं की ही भावना करने की बात कही गई है, जैसे कि ज्ञान यज्ञ में अग्नि, हवि आदि की कल्पना की जाती है । इसलिये इस मन्त्र का हमारा बताया अर्थ ही ठीक है, जो कि इस तरह से है-----.... *** ० *.... G***** ***.... । (ऋ० सं ० १० ९०.१५ ) अर्थ-सप्तास्यासन्निति । इस यज्ञ की परिधियाँ सात थी, तीन ही नही । 'परितो धीयन्ते' इति परिषयः । आहवनीय आदि कुण्डों के तीन पावों मे ( तीनों ओर ) प्रथम मेखला के ऊपर रखी जाने वाली मेखलापरिमित लंबाई की लकडियों को 'परिधि' कहते हैं । 'उत्तर वेदि की तीन परिधिय, आहवनीय की तीन, सातवाँ आदित्य' इस शतपथ ब्राह्मण के अनुसार परिधियो की संख्या सात हुई । यहाँ पर यद्यपि वसंतादि में आज्यादि की भावना की तरह किसी मे परिधि की भावना करना नही बताया गया है, तथापि पूर्वं सृष्टियों में सात पदार्थों में ही परिधि की भावना करना उचित प्रतीत होता है । तात्पर्य यह है कि महत्, अहंकार, और पंच तम्मात्रायें, इन सात पदार्थों का परिधि के रूप में ध्यान किया । इस यज्ञ की इक्कीस समिधायें, अर्थात् अग्नि को प्रदीप्त करने में साधनभूत लकड़ियों के स्थान में दस इन्द्रियों को ही समझ लिया । मन, पञ्च तन्मात्रा, पञ्च महाभूत, इन सबको मिलाकर इक्कीस संख्या पूर्ण होती है, इस प्रकार इक्कीस समिधाओं के रूप में उपर्युक्त पदार्थों का ध्यान किया गया । इन्द्रियरूप तथा साध्यरूप देवता जब देवताओं के उद्देश से द्रव्यत्यागरूप यज्ञ कर रहे थे, तब चतुर्मुखसंज्ञक पुरुष को पशु के स्थानापन्न कर उसे हृदयसंज्ञक यूप में अध्यवसायरूप रशना से बांध दिया, अर्थात् अनन्यगतिक कर दिया । अथवा मूलप्रकृतिरूप यूप में भगवदाज्ञा रूप रशना से उस पशु को जोड़ दिया ( बांध दिया ) । इस सांकल्पिक यज्ञ की परिधियाँ गायत्री आदि सात छन्द ही थे । ऐष्टिक आहवनीय की तीन परिधियाँ, उत्तरवेदि की तीन, सातव आदित्य, परिधि के प्रतिनिधि के रूप में था । इसीलिए कहा गया है - - 'सामने परिधि नही रखनी चाहिये, क्योकि १५ ९ } 1
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वेदार्थ पारिजातः १२६६ ' ( | | | ) दित्यो ह्येवोद्यन् पुरस्ताद्रक्षास्यपहन्ति तै ० स ० २ ६ ६ ३ इति । तदेते आदित्यसहिताः सप्त परिधयोऽत्र सप्तच्छन्दोरूपाः । तथा समिधः त्रिः सप्त त्रिगुणीकृत सप्तसंख्याका एकविंशतिः कृताः । 'द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एकविंश:' ( तै ० सं ० ५| १ | १० | ३ ) इति श्रुताः पदार्था एकविंशतिदारुयुक्तेध्मत्वेन भाविताः । यद् यः पुरुषो वैराजोऽस्ति तं पुरुषं देवाः प्रजापतिप्राणेन्द्रियरूपा यज्ञं तन्वाना मानसं यज्ञं तन्वानाः कुर्वाणाः पशुम् अबध्नन् विराट्पुरुषमेव पशुत्वेन भावितवन्तः । एतदेवाभिप्रेत्य पूर्वत्र ' यत्पुरुषेण हविषा' इत्युक्तम् || १५|| ' यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ ' ( वा ० सं ० ३१।१६, ऋ ० सं ० १० । ९ ०।१६ ) | ये विद्वांसो यज्ञ यजनीयं पूजनीयं परमेश्वर यज्ञेन स्तुतिप्रार्थनोपासनरीत्या पूजनेन तमेवायजन्त यजन्ते यक्ष्यन्ति च तान्येव धर्माणि प्रथमानि सर्वकर्मभ्य आदौ सर्वैर्मनुष्यः कर्तव्यान्यासन् । न च तैः पूर्वकृतैविना केनापि किञ्चित्कर्तव्यम् । त ईश्वरोपासकाः । हेति प्रसिद्धं नाकं सर्वदुःखरहितं परमेश्वरं मोक्षं च महिमान. पूज्याः सन्तः सचन्त समवेता भवन्ति । कीदृशं तत्? यत्र साध्याः साधनवन्तः कृतसाघनाश्च देवा विद्वांसः पूर्वे अतीता यत्र मोक्षाख्ये पदे सुखिनः सन्ति न तस्माद् ब्रह्मणः शतवर्षसंख्यातात् कालात् कदाचित्पुन- रावर्तन्ते, किन्तु तमेव सेवन्ते । अत्राहुनिरुक्तकारा: — ‘ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, अग्निनाऽग्निमयजन्त देवाः, अग्निः पशुरासीत्, तमालभन्त, तेनायजन्त' इति च ब्राह्मणम् 1। तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः समसेवन्त । यत्र पूर्वे सन्ति देवा साधना द्युस्थानो देवगण इति नैरुक्ताः' ( नि० ११४१ ) इति । अग्निना जीवेनान्तःकरणेनैवाग्निमयजन्त । अग्निः पशुरासीत् । तमेव देवा आलभन्त । सर्वोपकारकमग्नि- मग्निहोत्राद्यश्वमेघान्तं भौतिकाग्निनापि यज्ञं देवाः समसेवन्तेति वा । साध्याः साधनवन्तो यत्र पूर्वे पूर्वभूता मोक्षाख्य आनम्दे पदे सन्ति तमभिप्रेत्यात एव द्युस्थानो देवगण इति निरुक्तकारा वदन्ति । द्युस्थान: प्रकाशमयः परमेश्वराः स्थानं स्थित्यर्थं यस्य सः । यद्वा सूर्यः प्राणस्थानो विज्ञानकिरणस्तत्रैव देवगणो देवसमूहो वर्तते' (पृ० १४३-१४४ ) । I इति यद्व्याख्यातं दयानन्देन, तत्रोच्यते -देवा विद्वांस इत्यशुद्धमेव, मनुष्येभ्यः पृथग् योनिविशेषा देवा इत्यस्य साधितत्वात् । यज्ञपदस्य ज्योतिष्टोमादयो यज्ञा एवार्थः, मुख्यार्थपरित्यागे मानाभावात् । नहि ब्राह्मणसूत्रादिषु आदित्य भगवान् उदित होने के समय सामने पडने वाले राक्षसों का नाश कर देते है ।' ( तै ० सं ० ३.६.६.३ ) । ये आदित्य के सहित सात परिधियां यहाँ पर सात छन्द हो है । उसी तरह समिधाएं इक्कीस की गई है । 'बारह महीने, पाँच ऋतुएँ, तीन ये लोक, और यह इक्कीसवाँ आदित्य' (तै० सं ० ५.१.१०.३ ) ये श्रूयमाण पदार्थ, लकडी की इक्कीस इध्मो के स्थान में कल्पित हुए । और जो वैराज पुरुष है, उस पुरुष को प्रजापति, प्राण, इन्द्रियरूप देवो ने मानस यज्ञ करने के समय पशु के रूप में समझा । अर्थात् विराट् पुरुष का ही पशु के रूप में ध्यान किया । इसी अभिप्राय से पहिले ' यत्पुरुषेण हविषा' कहा गया था । ( यज्ञेन यज्ञम ० ) ' विद्वानों को देव कहते है और वे सबके पूज्य होते हैं, क्योंकि वे सब दिन परमेश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना, उपासना और आज्ञापालन आदि विधान से पूजा करते है । इससे सब मनुष्यों को उचित है कि वेद मन्त्रों से प्रथम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना करके शुभ कर्मों का आरम्भ करें । ( ते ह नाकं ० ) जो जो ईश्वर की उपासना करने वाले लोग हैं, वे वे सब दुःखों से छूटकर सब मनुष्यों में अत्यन्त पूज्य होते है । ( यत्र पूर्वे सा० ) जहाँ विद्वान् लोग परम पुरुषार्थ से जिस पद को प्राप्त होकर आनन्द में रहते हैं, उसीको मोक्ष कहते हैं, क्योकि उससे ब्रह्मा के सौ वर्ष पूर्व संसार के दुःखो में कभी नहीं गिरते । इस अर्थ में निरुक्तकार का भी यही अभिप्राय है कि जो परमेश्वर के अनन्त प्रकाश में मोक्ष को प्राप्त हुए है, वे परमेश्वर के प्रकाश में ही सदा रहते हैं, उनको अज्ञानरूप अन्धकार कभी नही होता' ( पृ० १४४) ॥
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वेदार्थपारिजात: १२६७ स्तुतिप्रार्थनोपासनैव विहिता । 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादिविधानेभ्यः । अयजन्त यजन्ते यक्ष्यन्ति चेत्य- शुद्धम् । सति बाघे ' छन्दसि लुललिट.' ( पा० सू० ३ | ४| ६ ) इति कालसामान्ये लुङादीना प्रयोगः । नहि वर्तमान- कालोऽपि तदर्थ इति सूत्रार्थः । इह तु तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्निति सृष्टिपूर्वकालिक मानसयज्ञविपक्षयैव लप्रयोगः । अन्यथा प्रथमानीत्यस्य वैयर्थ्यापत्ते । सर्वकर्मभ्य पूर्व तानि मनुष्यैः कर्तव्यानीत्यपि रिक्तं वचः, विधिप्रत्ययादर्शनात् । तस्मादतीतानुवाद एवात्र मन्तव्यः । प्राथम्यं चेद्विधित्मित स्यात्तदा प्रथमानीति धर्मविशेषणतया बहुवचनं न स्यात्, एकवचनेनैव तदुपपत्तेः । एवमेव साध्या साधनवन्त इत्यप्यशुद्धम्, साध्यपदेन सिषाधयिषितस्यैव ग्रहीतुमुचितत्वात् । नैयायिकादिष्वपि पक्षे सिषाधयिषितस्याग्न्यादिपक्षधर्मस्यैव साध्यपदव्यपदेश्यत्वदर्शनात् । प्रकृते तु साध्यसंज्ञका गण-देवा एवं साध्यपदव्यपदेश्या:, 'आदित्यविश्ववसवस्तुषिता भास्वरानिलाः । महाराजिकसाध्याश्च रुद्राश्व गणदेवताः ॥ ' ( 9190 ) इत्यमरकोषात् । नह्यनुन्मत्तः कश्चिदसति बाधके साध्यशब्देन साधनवन्त गृह्णाति । 'न तस्मात्पुनरावर्तन्ते ' इत्यर्थस्य बोधक पद मन्त्रे नास्त्येव । सचन्त इत्यस्य तु सेवमाना इत्येवार्थ:, 'न ब्रह्मणः शतवर्षसंख्यातात् कालात् कदाचित् पुनरावर्तन्ते ' इत्यादिकं सर्वथा वेदमन्त्रेषु स्वैरचारितंव, शाब्दन्यायातिवृत्तेः । मुक्तिकालस्यापि सावधिकत्वे स्वर्गमोक्षयोर्भेदलोपापत्ते ॥ कोऽयं ब्रह्मा परमेश्वर एव वा देवविशेषो वा? नाद्यः, परमेश्वरस्य नित्यत्वेन शतायुषत्वा- सिद्धेः । नान्त्यः, त्वया विद्वन्मनुष्यभिन्नदेवानभ्युपगमात् । एवमेवाग्निना जीवेनान्तः करणेन वाग्नि परमेश्वरमित्यपि स्वैरचारितैव, निर्मूलत्वात् । सर्वोपकारक- मग्निहोत्राद्यश्वमेघान्त मित्यपि खण्डितमेव, स्वर्गादिविविधफलोद्देश्येनाग्निहोत्रादीनां विधानात् । द्युस्थान' प्रकाशमयः दयानन्द की इस व्याख्या पर हमारा यह कहना है- देव पद का अर्थ विद्वान् करना गलत है । यह सिद्ध किया जा चुका है कि देव मनुष्यों से पृथक् एक योनिविशेष है । यज्ञ पद का अर्थ भी ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञ ही मानना उचित है, क्योकि बिना प्रयोजन के मुख्य अर्थ का त्याग नही किया जाता । ब्राह्मण सूत्र प्रभृति ग्रन्थो में केवल स्तुति, प्रार्थना, उपासना ही नहीं विहित है, क्योकि 'सर्ग की कामना वाला ज्योतिष्टोम यज्ञ करें इस तरह की विधियां भी वहीं वर्णित है । ' अयजन्त' पद का अर्थ यजन्ते और यक्ष्यन्ति करना भी गलत है । किसी प्रकार की बाधा होने पर वेद में काल सामान्य में लुडु, लड् और लिट् का प्रयोग पाणिनि ने बताया है । किन्तु उससे वर्तमान काल का विधान नही होता । प्रकृत में 'तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्' यहाँ सृष्टि के पहले संकल्पित मानस यज्ञ का ज्ञान कराने के लिये ही लड़ का प्रयोग किया गया है, अन्यथा ' प्रथमानि' इस पद की व्यर्थता हो जायगी । मनुष्यो को अपने सभी कार्यों से पहले इनका अनुष्ठान करना चाहिये, यह व्याख्या भी गलत है, क्योंकि यहां कोई विधायक वाक्य नही है । इसलिये अतीत का अनुवाद ही यहाँ मानना पड़ेगा । यदि यहाँ प्राथम्य बताना होता तो धर्म के विशेषण के रूप में वहाँ बहुवचन की आवश्यकता न थी, क्योंकि वह तो धर्म शब्द में एकवचन का प्रयोग होने पर भी बोधित हो जाता । इसी तरह साध्य पद का साधनवान् अर्थ करना भी गलत है, क्योकि साध्य पद से जिसको सिद्ध करने की इच्छा हो, यही अर्थ बोषित हो सकता है । न्यायदर्शन मे पक्ष में जिसको सिद्ध करने की इच्छा है, ऐसे पक्ष के धर्म अग्नि प्रभुति को ही साध्य कहते है । प्रकृत स्थल में साध्य पद से इस नाम के गणदेव अभिप्रेत है । अमरकोश में आदित्य, रुद्र आदि गण देवों के साथ ये परिगणित हैं । कोई भी समझदार आदमी, जिसका दिमाग खराब नही हुआ है, साध्य शब्द से साधनवान् अर्थ का ग्रहण नहीं करेगा । ' वे फिर संसार के दुःखों में नही पड़ते' इस अर्थ का बोधक पद मन्त्र में नहीं है । 'सचन्त ' क्रिया का अर्थ 'सेवा करते हुए' होता है । ब्रह्मा के सौ वर्ष पूर्व संसार के दुखों में कभी नही पडते, इस तरह का अर्थ करना वेदमन्त्रो के साथ मनमानी ही मानी जायगी, क्योंकि इसमें शब्दार्थ की सही प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लंघन है । मुक्ति ( मोक्ष ) का समय भी यदि सावधि ( अवधि वाला) है, तो फिर स्वर्ग और मोक्ष में अन्तर ही क्या रह जायगा । मोक्ष को निरवधि माना जाता है । आप यह बताइये कि यह ब्रह्मा कौन है? स्वयं परमात्मा ही है या कोई देवविशेष? यह परमेश्वर हो नही सकता, क्योंकि परमेश्वर तो नित्य है, वह सौ वर्ष का नही हो सकता । अन्तिम पक्ष भी आपके मत में नहीं बनेगा, क्योंकि आप विद्वान् मनुष्यों से भिन्न कोई देवता नहीं मानते । इसी तरह से 'अग्निना' इत्यादि निरुक्त वाक्य का 'अन्तःकरण में परमात्मा की उपासना की' इस तरह का अर्थ करना भी मनमानी ही है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त कृत्य सर्वोपकारक है, इस बात का खण्डन किया
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वेदार्थपारिजातः १२६८ परमेश्वर: स्थान स्थित्यर्थं यस्येत्यपि विश्वङ्खलम्, तथात्वे निरुक्तार्थज्ञानार्थं निरुक्तान्तरापेक्षणापत्तेः । यदि प्रसिद्धं द्युस्थानमुपेक्ष्यार्थान्तराश्वेषण स्वेच्छया वा कल्पनं स्यात्तदा शब्दार्थज्ञानेऽराजकर्तव स्यात् । दुर्गाचार्यरीत्या निरुक्तस्याय + मर्थः –'तं वश्चराथा वय वसत्यास्त न गावो नक्षन्त इद्धम्' ( ऋ ० स ० १।६६०५ ) इत्यत्र यजमाना ऋत्विग्भिरुच्यन्ते- चराथा चरन्त्या जङ्गमया पश्वाहुत्या वसत्या निवसन्त्या औषधाहुत्या जङ्गमेन स्थावरेण च हविषा अस्तं न गावो अस्तं गृह यथा गावो अवश्य नक्षन्ते आप्नुवन्ति स्वेनोपकारेण सायं वासाय तथेममग्निमुभयलक्षणेन हविषा वयमाप्नुयाम । ( ): — इद्ध सर्वभोगानामीश्वरम् नि० १०।२१ । तस्माद् दर्शनवतः प्रयोक्त सर्वमिदमग्निरित्यभिप्रेत्य ब्रवीति अग्निना स्थावरजङ्गमभावापन्नेन हविर्भूतेन अग्निमेव सर्वदेवताभूतमादित्यप्रणाडिकया महान्तमात्मानमयजन्त देवा देवभाविनः पूर्वे ज्ञानकर्मसमुच्चयकारिणो यजमानभावमापन्नाः साध्या विश्वसृजः, ऋषयः प्राणा, तानि धर्माणि तानि कर्माणि तथाविधज्ञानयुक्तानि प्रथमानि मुख्यमहदात्मभावप्राप्तये आसन् । तैरप्यक्रियन्तेत्यर्थः । ते च तानि कृत्वा नियमेनंवानन्यभावित्वात् तत्फलस्य महिमानस्तदानुपूर्व्येण जातमहदात्मभावाः सन्तस्तमेव नाक महान्तमात्मान- मेकान्तसुखमसचन्त तद्भावमेत्र ते आपेदिरे । यत्र पूर्वे सन्ति साध्याः सन्ति देवाः । शब्दार्थोपदेशनित्यत्वाद् यत्र पूर्वे पूर्वतरे च ज्ञानकर्मसमुच्चयकारिण आसते, 'विश्वसृजः प्रथमे सत्रमासत' (तै ० ब्रा० ३ | १२ | ९ ) इति श्रुतेः । शिरो ह्यध्यात्मं द्युस्थानभक्तिः, अतः सप्त ऋषयो देवा विश्वेदेवाः साध्या इति सर्वेऽप्येते प्राणा रश्मयो वेत्युपपद्यते । 'अग्निः पशुरासीत्' इति ब्राह्मणमपि तमेवानुविदधाति । तस्मात् सायणादिसम्मतोऽस्मदर्थं एव युक्तः । तद्यथा - यज्ञेनेति । यजनीय देवतोद्देश्यकद्रव्यत्यागरूपेण कर्मणा परमपुरुषोद्देश्यकप्रणवकरणकात्मसमर्पण- रूपमानसयज्ञेन, मुमुक्षूणामात्मसमर्पणस्यैव अवश्यकर्तव्ययज्ञरूपत्वात् । 'अहमेवाहं मां जुहोमि स्वाहा', 'इदमहं माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि', ' ओमित्यात्मानं युञ्जीत' इत्यादिभिरात्मसमर्पणस्य यागरूपता च विज्ञायते । जा चुका है, क्योकि स्वर्गादि नाना कामनाओ की पूर्ति के लिये इनका विधान है । द्युस्थान पद का अर्थ प्रकाशमय परमेश्वर,, स्थिति के लिये है यह अर्थ भी निराधार है ऐसा मानने पर तो निरुक्त के समझने के लिये भी दूसरे निरुक्त की जिसकी H यदि प्रसिद्ध स्थान को छोड़कर मनमाने तरीके से दूसरे अर्थ का अन्वेषण होने लगेगा, तो शब्दार्थ प्रक्रिया में अराजकताजरूरत पड जायगी । ऋत्विग्गण कहते है — जंगम पशु की ' ' दुर्गाचार्य ने निरुक्त के इस अंश का यह अर्थ किया है- तं वश्वराथा० इस मन्त्र में यजमान से मच जायगी । आहुति से, स्थावर ओषधियो की आहुति से रात्रि में निवास ( विश्राम ) के लिये हमारा गोधन हमारे घर अवश्य पहुँच जाय । इसके लिये हम इस समृद्ध अग्नि को उभयविध हवि प्रदान करते है । इस तरह से यह ऋत्विक हवि को भी अग्नि कहता है कि इस उभयविध स्थावरजंगमात्मक अग्निरूप हवि से सभी देवताओं के प्रतिनिधिभूत उस के रूप में देखता हुआ सहारे पहुँच कर ज्ञान और कर्म का समुच्चय करनेवाले देवगण यजमान के रूप में विश्वस्रष्टा परमात्मा तक सूर्य की किरणों के कर उन ज्ञान युक्त कर्मों का सर्वप्रथम अनुष्ठान करते है । उनको निष्पन्न कर वे महान् साध्यों का, प्राणरूप ऋषियो का रूप धारण , लीन होकर उसके महान् सुखस्वरूप में लीन हो जाते है जहाँ कि पहले के साध्यगण महिमाशाली होकर उस महान् आत्मा में ही ये सब नित्य है, अत: पहले के और उनसे भी पहले के ज्ञानकर्मसमुच्चयवादी उसी निवासस्थान करते है । शब्द, अर्थ और उनका उपदेश , ' ' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति भी इसमें प्रमाण हैं । इस तरह से सात ऋषिगण विश्वेदेव में जाकर लीन हो जाते है । विश्वसृजः ब्राह्मणों में अग्नि का पशु के रूप में वर्णन मिलता है । इसलिये इस मन्त्र का सायणादि, संमतसाध्यअर्थये इससब उसी परमात्मा की रश्मियाँ है । प्रकार होगा -....॥ (ऋ० सं ० १०.९०.१६) अर्थः- यज्ञेनेति । यजनीय देवता को उद्देश कर द्रव्य का त्याग किये मुमुक्षओ के लिए आवश्यक है, उनका वह आत्मसमर्पण करना यज्ञ ही है । परम पुरुष जाने वाले कर्म के द्वारा आत्मसमर्पण करना आत्मसमर्पण करना मुमुक्षुओ का मानस यज्ञ है । आत्मसमर्पण के यज्ञरूप होने में श्रुति के उद्देश से प्रणव का उच्चारण करते हुए का प्रमाण देते है - ' महमेवाहं मा जुहोमि
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वेदार्थपारिजातः १२६६ यज्ञ यजनोयदेवतारूप भगवन्त परमपुरुषम्, ' यज्ञो वै विष्णुः' इति श्रुतेः । अयजन्त भगवन्तमुद्दिश्य आत्मसमर्पणरूपं यज्ञमकुर्वन्नित्यर्थः । तान्येव धर्माणि स धर्म एव । प्रथमानि प्रधानः । आमन् आसीत् । लिङ्गवचनव्यत्ययश्छान्दसः । तेषां फलमुच्यते -ते यज्ञानुष्ठातारः, नाक निरतिशयानन्देकतान मोक्ष परमपद- अक्षर-परमधामादिशब्दितं नाकाख्यं वैकुण्ठलोकम् ।| कमिति सुखम्, अक दु:खम्, तन्न विद्यते यत्र तद् नाकमिति व्युत्पत्या दुःखशून्यवाचकस्य नाकशब्दस्य योगरूढ्या तादृशपरमव्योमवोधकत्वम् । 'नाकोऽम्बरे रवौ स्वर्गे परमव्योम्नि च स्मृतः' इति निघण्टुवचनात् । महि+ मानः परमसाम्यापत्तिरूपमहिमवन्तः, 'ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति' इति श्रुते । अथवा भगवन्महिमभूता भगवद्विभूति भूताः । परब्रह्मोपसम्पत्त्या निवृत्ताविद्यातिरोधानस्य सुविदिताऽऽत्मयाथात्म्यस्य परमात्मात्मकस्वात्मानुसन्धानेन ' ' ' ' अहं ब्रह्मास्मि इत्येव ह्यनुभवस्तद्युक्तस्य । अथवा महिमानो भगवन्तमर्चयन्तः । मह पूजायाम् इति धातो- स्तद्रूपनिष्पत्तेः । अथवा महिमान पूज्यमानः, अचिरादिभिरातिवाहिकः । प्राप्येति अध्याहार्यम् । सचन्ते समवेता ' ', ' भवन्ति नित्यसुरिपरिषदा सह एकीभवन्ति । हेति प्रसिद्धो । ब्रह्मविदाप्नोति परम् परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ।' कैरेते समवेता भवन्ति? अत्र ह वैकुण्ठे लोके पूर्वे पुरातनाः । 'यत्रर्षयः प्रथमजा ये पुराणा:' सर्वदा भगवन्नित्यसङ्कल्पेन अस्खलितज्ञानाः साध्याः प्राप्यभूताः । चेतनस्वरूपस्य तदीयशेषत्वपर्यन्तत्वेन प्राप्यस्यापि तदीयैकपर्यन्तत्वेन नित्यसूरिपरिषदामपि परमप्राप्यत्वात् ते साध्या इत्युच्यन्ते । यद्वा -साध्याः साध्याख्याः देवा भगवत्स्तुतिपरायणा अनन्त गरुड - विष्वक्सेनप्रभृतयो नित्याः, दीव्यन्ति क्रीडन्ति भगवत इति देवाः सन्ति समिन्धते । त नाक ते महिमानः सचन्ते अनन्तादिभिः सह भगवदनुभवं कुर्वन्ति 'तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः' इति श्रुतेः । स्वाहा,' 'इदमह माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि', 'ओमित्यात्मानं युञ्जीत' इत्यादि " उक्त प्रकार के मानस यज्ञ के द्वारा यजनीय देवतारूप भगवान् ने यज्ञरूप परमपुरुष का यजन किया । अर्थात् भगवान् के उद्देश्य से आत्मसमर्पणरूप यज्ञ किया । भगवान् के यज्ञरूप होने में ' यज्ञो वै विष्णुः' श्रुति प्रमाण है । इस प्रकार से यज्ञ का यजन करना धर्म ही है । वह धर्म ही प्रधान पुरुषार्थ था । मंत्र में 'तानि धर्माणि प्रथमानि आसन्' इस प्रकार का लिङ्ग, वचन का व्यत्यय छान्दस है । इस यज्ञ के अनुष्ठाताओ को जो फल उपलब्ध हुआ, उसे बताते है - वे यज्ञानुष्ठाता लोग निरतिशय आनन्दरूप नाकसशक वैकुण्ठलोक की - जिसे मोक्ष, परमपद, अक्षर, परमधाम शब्दो से भी कहा जाता है- प्राप्त करते हैं । 'नाक' शब्द, दुःखशून्य परमव्योम के अर्थ में योगरूढ है । 'क' का अर्थ है सुख, अतः ' अक' का अर्थ हुमा दुःख, वह दुःख नही है जहाँ पर उसे 'नाक' कहते हैं । निघण्टु में ' नाक' शब्द के अर्थ इस प्रकार दिए गए है-'नाकोऽम्बरे रवी स्वर्गे परमव्योम्नि च स्मृतः' इति । वे यज्ञानुष्ठाता लोग परमसाम्यापत्तिरूप महिमा वाले है । क्योकि श्रुति कहती है - ' ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति । अथवा ' महिमानः ' का अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है - भगवम्महिमभूत अर्थात् भगवान् के विभूतिस्वरूप, क्योंकि परब्रह्म की उपासना से अविद्यारूपी तिरोधान के निवृत्त हो जाने से आत्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, अर्थात् आत्मा का परमात्मा के रूप में अनुसन्धान करने से ' अहं ब्रह्मास्मि' मैं ब्रह्म हूँ —यह अनुभव होने लगता है । अथवा ' महिमानः' का अन्य अर्थ है- भगवान् की अर्चा करने वाले, क्योंकि 'मह पूजायाम्' इस पूजार्थक 'मह' धातु से उक्त शब्द की निष्पत्ति होती है । अथवा 'महिमानः' का अर्थ है पूज्यमान, अर्थात् अचिरादि अतिवाहिकों के द्वारा जिनकी पूजा की जाती हो । तात्पर्य यह है कि वे यज्ञानुष्ठाता लोग उस परम पद को प्राप्त कर सम्मानपूर्वक नित्य सूरिपरिषद् के अचिरादि अतिवाहिकों के साथ सम्मिलित होते है, यह प्रसिद्ध मन्त्र मे 'ह' शब्द का अर्थ प्रसिद्धि है । उपर्युक्त आशय में ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' 'परं ज्योति-रूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते । श्रुति प्रमाण है । ये लोग किनके साथ समवेत होते है? वैकुण्ठलोक में प्राचीन ऋषिगण ' यत्रर्षयः प्रथमजा ये पुराणा:' भगवान् के नित्य संकल्प से जिनका ज्ञान सदैव अस्खलित रहता है, वे ही प्राप्य है । उनके शेषत्व के रूप में यद्यपि चेतन स्वरूप को ही प्राप्त करना है, तथापि मुख्य तात्पर्य उसमें होने से नित्यसूरि परिषदों के लिए भी वही परम प्राप्य होने से उन्हें साध्य कहा जाता है । अथवा भगवत्स्तुति में ही परायण अनन्त, गरुड, विष्वक्सेन प्रभृति साध्यसंज्ञक नित्य देवों को हो साध्य शब्द 1 से कहा जा सकता हैं | देव उन्हें कहते हैं जो भगवान् के साथ क्रीडा करते है । ऐसे देव, जो अपनी कान्ति से दमकते रहते हैं । वे
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वेदार्थपारिजात १२७० - पूर्व प्रपञ्चेन उक्तमर्थं संक्षिप्यात्र दर्शयति देवाः प्रजापतिप्राणरूपाः । यज्ञेन यथोक्तेन मानसेन सङ्कल्पेन ॥ यज्ञं यथोक्तयज्ञस्वरूपं प्रजापतिम् अयजन्त पूजितवन्तः । तस्मात् पूजनात्, तानि प्रसिद्धानि धर्माणि जगद्रूपविकाराणां घारकाणि प्रथमानि मुख्यानि आसन् । एतावता सृष्टिप्रतिपादकसूक्तभागार्थः संगृहीतः । अथ उपासनतत्फलानुवादकभागार्थः संगृह्यते -पत्र यस्मिन् विराट्प्राप्तिरूपे नाके पूर्वे साध्याः पुरातना विराडुपास्तिसाधका देवाः सन्ति तिष्ठन्ति तद् नाकं विराट्प्राप्तिरूपं स्वगं ते महिमानः तदुपासका महात्मानः सचन्त समवयन्ति प्राप्नुवन्ति ॥ १६ ॥
केषाञ्चित् शाखिना मते षोडशी ऋगियम्- वेदाहमेतं पुरुषं महान्त आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे । सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् यदास्ते ॥ अर्थ: - 'अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् । वशिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ॥' इत्यादिवत् तादृशतत्त्वस्य स्वीयसाक्षात्कारविषयत्वं वेदपुरुष आह -' अहमेत परमात्मानं महान्तम् अपरिच्छेद्य पुरुष वेद वेद्मि । आदित्यवर्णं सूर्यं समानवर्णम् ' नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा ', 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः', ' सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादघि' इति श्रुतिभ्यः । तमसो मूलप्रकृतेः पारे ऊर्ध्वप्रदेशे त्रिपाद्विभूतो ' अक्षर तमसि लीयते, तमः परे देवे एकीभवति । पाद्मोत्तरखण्डे ( १२७ अध्याये ) – 'असंख्यप्रकृतेः स्थानं निबिडध्वान्तमव्ययम् । ऊध्वं तु सीम्नि विरजा निःसीमाघः सनातनी ॥ प्रधानपरमव्योम्नोरन्तरे विरजा नदी । वेदाङ्गस्वेदजनिततोयैः प्रस्त्राविता शुभा || तस्याः पारे परे व्योम्नि त्रिपाद्भूतिः सनातनो' इति । धीरो यत्सर्वाणि रूपाणि विचित्य नामानि कृत्वाऽभिवदन् तमसः पारे आस्ते एतमहं वेद । धिया रममाणो धीरः, धीमतामयेसरो भगवान् स्वानभिज्ञानामपि पूजनीय देव उस नाक सज्ञक स्वर्ग में अनन्त आदि के साथ भगवान् का अनुभव करते है । इसमें 'तद्विष्णो. परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय " यह श्रुति प्रमाण है । विस्तार के साथ बताये गये उपर्युक्त अर्थ को ही अब संक्षेप से बताते है - प्रजापति के प्राणस्वरूप देवताओं ने पूर्वोक्त मानसिक संकल्परूप यज्ञ के द्वारा पूर्वोक्त यज्ञस्वरूप प्रजापति का पूजन किया । पूजन के परिणामस्वरूप जगद्रूप विकारो को धारण करने वाले प्रसिद्ध मुख्य धर्म हुए । इस कथन से सृष्टि प्रतिपादक सूक्त भाग का अर्थ संगृहीत हुआ । इसके अनन्तर उपासना और उसके फल के प्रतिपादक भाग का अर्थ सगृहीत किया जा रहा है - जिस विराट् प्राप्तिरूप नाक (स्वर्ग ) में प्राचीन विराट् की उपासना करने वाले देव रहते है, उस विराट् प्राप्तिरूप स्वर्ग मे विराट् के उपासक वे महात्मा गण जाकर प्राप्त होते है ॥ १६॥
अन्य शाखा वालों के मत से निम्नाकित ऋक् सोलहवी बताई जाती है- वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं 11 अर्थ- ' सत्यपराक्रमशाली महात्मा राम को मैं जानता हूं, महान् तेजस्वी वशिष्ठ तथा तपस्या में स्थित रहनेवाले जो ये मुनि है वे भी जानते हैं ' इस उक्ति के समान वेद पुरुष कहता है कि वह प्रसिद्ध अद्भुत तत्व मेरे साक्षात्कार का विषय है, अर्थात् मैं उसे जानता हूं । मैं उस अपरिच्छेद्य परमात्मा पुरुष को जानता हूं । 'नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा', ' य एषोऽन्तरा- दित्ये हिरण्मय. पुरुषः', 'सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि' इत्यादि श्रुतिया उक्त आशय को प्रमाणित करती है । मूल प्रकृति के त्रिपाद विभूति-रूप ऊर्ध्व-प्रदेश में वह घोर पुरुष समस्त रूपो को एकत्रित कर" उनका नामकरण करके उन्हें बताता हुआ कहता है, उसे मैं जानता हूँ । उक्त आशय का समर्थन श्रुति ने भी किया है- ' अक्षरं तमसि लीयते, तम. परे देवे एकीभवति । पाद्मोत्तरखण्ड के १२७वें अध्याय में 'असंख्यप्रकृतेः स्थानं निबिडध्वान्तमव्ययम् । ऊर्ध्वं तु सीम्नि विरजा निःसीमाघः सनातनी' । प्रधानपरमव्योम्नो- रन्तरे विरजा नदी । वेदाङ्गस्वेदजनिततोयैः प्रखाविता शुभा ॥ तस्याः पारे परे व्यान्नि त्रिपाद्भूतिः सनातनी ' इति । घी से (बुद्धि से ) रममाण होने वाला वह घोर पुरुष, अर्थात् बुद्धिमानो में अग्रेसर भगवान् अपने को न पहचानने वाले ससारियों को भी उनके योग्य