वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 51–60
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 51–60
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बेवार्थपारिजातः ६५१ वज्राणा व धारयितृषु दुष्टदमयितृषु नोलमेवभेत्तृषु शक्तिशालिदेवत्वकल्पना अपि तादृश्य एवं । तोलनात्मकस्य देवकथाशास्त्रस्येदानी यावत् सामान्य रूपरेखामात्र द्रष्टुं शक्यते । यत्स्थान तोलनात्मकप्राचीनदेवकथाशास्त्रसन्दर्भे इण्डोजर्मन- व्याकरणेन शास्त्रीयव्याकरणस्य सन्दर्भेऽवाप्तम्, यस्मिन्त्राधारे देवकथाशास्त्रमिदानी यावत्स्थिरमासीत्, नदेव दोलायमान भवति । एतदुपरि यो नवीन प्रकाशः समेष्यते तदर्थं वयमृग्वेदस्यैवाधमर्णा । अनेनैव वेदेन तस्या उद्योगशालाया दृश्यमालोकितं यतोऽस्य मूलमुदेतीति । (पृ०२८-२९ ) , तदेतत् सर्वं वेदार्थविश्लेषणप्रक्रियानभिज्ञानमूलकमेव अनादित्वापौरुषेयत्वादिभिरपास्तस मस्तपुदोषे वेदे तेषा तेषा विषयाणा सुखावबोधार्थ तत्तत्कालिकभावाना वर्णनेऽपि तस्य तादात्विकत्वासिद्धेः । वैदिकाना भावानामनादित्वात्तेषामन्यत्रापि सङ्क्रमणसम्भवात् । केषाञ्चिद्भावानां कदाचित् समानरूपाणामेकत्र सद्भावेऽपि न काचिदनुपपत्तिः । न च तथात्वेऽपि तस्य वैदिककालनिर्धारणौपयिकव्यभिचरितहेतुत्वमुपपद्यते । न चैताः कल्पना ,बालसुलभा न वा दाक्षिण्यहीनाः । दार्शनिकप्रवरा अपि सोपाधिकस्यात्मनः प्राणमयत्वमङ्गीकुर्वन्ति प्राणस्य वायुविशेषत्वानतिरेकात् । 'न वायुक्रिये पृथगुपदेशात्' (ब्र ० सू० २२४१९ ) इति न्यायात् । वस्तुतः पाश्चात्त्या मूल मन्त्र तदर्थं च नावगच्छन्ति न वोद्धरन्ति, तथात्वे तदुक्तीनां निःसारत्वस्य शीघ्र- मेव प्राकट्यापातात् । रूपकवर्णन तु पाण्डित्यापादकमेव न वाल्यावगमकम् । गमनशीलत्वे पवने पक्षकल्पनापि नानु पपन्ना | छान्दोग्यबृहदारण्यकादी दक्षिणायनोत्तरायणमार्गाभ्यां पितृलोकदेवलोक प्रापका अनेके पदार्था वर्णिताः । गीतायामपि- ' धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्' ( श्री० भ० गी० ८२२५), 'अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः श्याम वर्ण के मेघ देवता की और विद्युत् एवं वज्र को धारण करने वाले तथा दुष्टों को दण्ड देने वाले, उन पर प्रहार करने वाले शक्तिशाली देवता की कल्पनाएं भी इसी प्रकार की है । इस तुलनात्मक देवकथाशास्त्र की अब तक सामान्य रूप-रेखा मात्र ही देखी जा सकती है । इसमे सन्देह नही कि यह क्रमश प्राचीन देवकथाशास्त्र के सन्दर्भ मे उसी स्थान का अधिकारी होगा और वही स्थान प्राप्त करेगा, जो स्थान वस्तुतः तुलनात्मक इण्डो-जर्मन व्याकरण ने शास्त्रीय व्याकरण के सन्दर्भ में प्राप्त कर लिया है । जिस आधार पर वह देवकथाशास्त्र अब तक स्थिर रहा है, वह इसके नीचे लडखडा उठता है और इस पर जो नया प्रकाश पडने वाला है, उसके लिये हम ऋग्वेद के ऋणी है । इस वेद ने ही हमें मानो उस उद्योगशाला की झाको दिखलाई, जहा से इनका मूलतः उदय हुआ' (पृ० २८-२९ ) । यह सारा कथन भी सभी वेदो के अर्थ का विश्लेषण करने वाली प्रक्रिया का ठीक से सही ज्ञान न होने के कारण है । वेद अनादि और अपौरुषेय है । इनके पुरुष के दोषो के संक्रमण की संभावना ही नही हो सकती । उन उन विषयो को समझाने के लिये कुछ सामयिक घटनाओ का वर्णन भी यहाँ प्रतीत होता है, किन्तु वे कथामात्र है । इससे कोई इतिहास सिद्ध नहीं हो सकता । वैदिक विषय अनादिकाल से चले आ रहे है । उनका अन्य देशों में भी समयानुसार प्रचार- प्रसारण हो गया हो, ऐसा मानने में हमे कोई बाधा नही है । कुछ वस्तुओ की स्थिति अनेक स्थलो पर एक सी हो, इसमें क्या आपत्ति हो सकती है । किन्तु इससे ये घटनाए वैदिक काल के निश्चय करने मे कभी अव्यभिचारी हेतु का कार्य नही कर सकती । ये कल्पनाएं न तो बालसुलभ ही है और न दाक्षिण्य हीन | बादरायण जैसे महान् दार्शनिक भी 'न वायु' इत्यादि सूत्रो में सोपाधिक आत्मा को प्राणमय ही मानते हैं और यह प्राण वायु का ही एक प्रकारविशेष है । वस्तुतः पाश्चात्य विद्वान् अपनी बात की पुष्टि मे किसी प्रमाण या मन्त्र को उद्धृत नही करते और न वेद के मन्त्रों का ठीक से अर्थ ही समझ पाते है । यदि वे ऐसा करें तो उनके कथनों की निःसारता शीघ्र ही प्रकट हो जाय । किसी बात का रूपक शैली मे वर्णन कोई पंडित ही कर सकता है, इसमें बचकानापन कैसे सिद्ध हो सकता है । पवन गतिशील है, इसके लिये पंख की कल्पना करने में अनौचित्य कहां है? छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषदों में दक्षिणायन और उत्तरायण मार्ग से पितृलोक और देवलोक तक पहुँचाने वाले अनेक पदार्थ वर्णित हैं । गीता मे भी 'धूमो रात्रिः, 'अग्निज्योति० ' यहाँ इन पदार्थों को गिनाया गया है । ब्रह्मसूत्र मे यह स्पष्ट
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६५२ वेदार्थपारिजातः षण्मासा उत्तरायणम्' ( श्री० भ० गी० ८/२४ ) अय पदार्थो वर्णितः । ब्रह्मसूत्रेषु च धूमाग्न्यादितत्तत्पदार्थाभिमानिनो देवास्तत्र प्रापका इत्युक्तम् । शङ्करभगवत्पादादयः सर्वेऽपि दार्शनिकास्तत्पक्षं सम्यगुपपादयन्त्येव । देवतासिद्धान्ता-नभिज्ञा: पाश्चात्त्यास्तदनुगा भारतीयाश्च सामाजिकास्तत्र भ्राम्यन्ति । पर 'नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति' इति न्यायेन देवताधिकरणादी ब्रह्मसूत्रभाष्ये भामत्यादौ न्यायरक्षामणी प्रकृतग्रन्थे च तद् याथात्म्यं सम्यगुक्तमेव । स्वर्गस्थितसमुद्रवर्णनमपि नासङ्गतम्, द्युलोके सोमात्मकाना सूक्ष्मरसाना सत्त्वे बाधानुपपत्ते । सूर्यरश्मिषु मेघेषु च जलसत्वेऽपि सचेतसामनुपपत्त्यभावात् । साख्यैस्तमसः प्रावरणावष्टम्भात्मकत्वोपगमनेन सर्वधारकस्य सर्वा- वरकस्य वरुणत्वेऽपि न कापि विप्रतिपत्तिः । द्यावापृथिव्योः परमेशप्रकृतिप्रतीकत्वेन पितृत्व मातृत्व च सूपपन्नमेव । ' सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरह बीजप्रदः पिता ॥ ' (श्री० भ ० गी ०१४४ ) इति गीतोक्तः । पञ्चाग्निविद्याया पृथिव्याश्चतुर्थ्याहुत्याधारत्वेन मातृत्वमन्तरिक्षस्थ पर्जन्यस्याहुतिप्रदत्वेन पितृत्वमुक्तम् । व्रीहियवादिद्वारा भरणहेतुत्वात् पृथिव्या मातृत्व द्युलोकस्य तदुपोद्बलकरससेचकत्वेन पितृत्वमपि नानुपपन्नम् । किरणेषु गोपदप्रयोगस्तु निरुक्तकारैरपि कृत एव । मेघेषु तदपहारकत्वेन तत्र तादृशी कल्पनापि युक्तव । विद्युता वज्रत्वं मेघविदारकस्येन्द्रत्वमपि सङ्गतमेव । ऐतिहासिकदृष्ट्या मेघाद्यावरणाभिमानिनि वृत्रत्वं तद्घातकप्रकाशा- द्यभिमानिनि इन्द्रत्वमपि सङ्गच्छते, मन्त्राणामाधिभौतिकाधिदैविकाध्यात्मिकभेदेनानेकार्थप्रतिपादकत्वात् । यदपि -' फारसी -जेन्दावेस्ताग्रन्थे तथा महाभारत रामायण महाकाव्य योर्वणितायाः कथायाश्चक्रद्वय रूपेण निरूपितयोः पक्षयोः क्रमिक विकासस्य सूचनाप्रदानेन तत्सम्बन्धीनि ऋक्सूक्तानि स्वप्राचीनताया प्रचुर प्रमाणमुपस्था- किया गया है कि धूम, अग्नि आदि पदार्थों के अधिष्ठाता देवता गतात्मा को वहाँ पहुँचाते है । शंकर भगवत्पाद प्रभृति सभी बडे -वडे दार्शनिक इसी पक्ष का समर्थन करते हैं । भारतीय देवतावाद को न समझ पाने वाले पाश्चात्य विद्वान् और उनका आँख मूंद कर अनुसरण करने वाले भारतीय विद्वान् और आर्यसमाजी यहाँ चक्कर में पड जाते है । किन्तु ' स्थाणु ( खंभा) का यह अपराध थोडे ही है कि उसको अन्धा नही देख पाता' इस न्याय के अनुसार आचरण करने वालो को भी विषय का ज्ञान कराने के लिये देवताधिकरण में, उसके भाष्यों में, भामती, न्यायरक्षामणि प्रभृति ग्रन्थों मे और प्रस्तुत पुस्तक में भी देवतावाद को सही तरीके से समझाने का प्रयत्न किया गया है । स्वर्ग में स्थित समुद्र का वर्णन कोई असंगत बात नही है, क्योकि अन्तरिक्ष में सोमात्मक सूक्ष्म रसो की सत्ता मानने में कोई बाघा नही है । सूर्य की किरणों और मेघो में जल की सत्ता मानने में किस समझदार व्यक्ति को आपत्ति हो सकती है । साख्य तमोगुण को ढकने वाला (प्रावरक) और धारण करने वाला ( अवष्टम्भक ) मानते है । इस तरह से सबको धारण करने वाला और सबको ढक देने वाला देवता वरुण पाया जाता है, इसमे क्या आपत्ति हो सकती है । आकाश और पृथ्वी परमेश्वर और प्रकृति के प्रतीक है, अतः इनको माता- पिता मानना भी ठीक ही है । 'सर्वयोनिषु' इत्यादि गीता वचन में इसी बात को कहा गया है । पञ्चाग्नि विद्या में चौथी आहुति को धारण करने वाली पृथिवी को माता और अन्तरिक्ष स्थित पर्जन्य को आहुति द्रव्य का जनक होने से पिता कहा गया है । व्रीहि-यव आदि अन्न को उत्पन्न कर जीवों का भरण-पोषण करने वाली पृथिवी को माता और इन अन्नों को वर्षा से रस -सिक्त करने वाले अन्तरिक्ष को पिता मानना कोई अनुचित भी नही है । किरणो के लिए 'गो' ( गाय ) शब्द का प्रयोग निरुक्तकार ने भी किया है । मेघ इन किरणो को छिपा देते है, अतः इनको गायो का हरण करने वाला कहना ठीक ही है । विद्युत् की वज्र के रूप में और इन्द्र की मेघों को छिन्न-भिन्न कर देने वाले के रूप में कल्पना भी उचित ही है । ऐतिहासिक दृष्टि से मेघ आदि आवरक द्रव्यो के अभिमानी की वृत्र के रूप में और आवरक द्रव्य के कारण फैले अन्धकार को नष्ट कर पुनः प्रकाश को फैला देने वाले की इन्द्र के रूप में कल्पना भी सही है, क्योंकि मन्त्रों के आधिभौतिक 1, आधिदैविक,, आध्यात्मिक आदि के भेद से अनेक अर्थ किये जा सकते है । बेवर आगे लिखते है-- ऋग्वेद के सूक्त फारसी शौर महाकाव्यीय कथाओ के दो चक्रों के उद्भव और क्रमिक विकास के सम्बन्ध में बहुमूल्य सूचनाएँ देकर अपनी प्राचीनता का प्रचुर प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । ऋग्वेद के गीतों में हम अन्धकार और प्रकाश के
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वेदार्थपारिजातः ६५३ पयन्ति । ऋग्वेदोयगीतेष्वन्धकारप्रकाशयोः स्वर्गीयसङ्घर्षस्य काव्यीयरङ्गरञ्जितं वर्णनं दृश्यते । एतन्नितान्तसारल्येन प्रतीकपरिवेशेन वा देवव्यक्तीनां रूपक चित्रितम् । अवेस्ताग्रन्थेऽयमेव सङ्घर्षः स्वर्गात् पृथिव्यां प्राकृतिक दृश्यप्रदेशेभ्यो नैतिकजगति वात्रतरति । अस्य विजेता कश्चिदेक: पुत्रो यश्चैकस्मै पित्रे लभ्यते, यश्च सोमयज्ञस्य पवित्रक्रियायां पुरस्काररूपेण पृथिव्या रक्षत्वेन नियुज्यते, यं दैत्य स हन्ति । मपापशक्तिः सृष्टिससारस्य पावित्र्यप्रध्वंसनायापारदान- वीयबलयुक्तः । अन्ते कारती महाकाव्यमितिहासक्षेत्रं प्रविशति । युद्धमार्याणां देशे भवति । सर्पों जण्डेय आजिदहक- रूपेण वेदे आहि ( दासक ) रूपेण वर्ग्यते । स जोकफल्पेण ईरानप्रदेशे सिंहासनासीनः सन्नत्याचारं करोति । युद्धरताय वेदे त्रैतनाय ' जेण्डे थे इतानी' इत्यस्मै जननायाः कल्याणाम यानि वरदानानि लभ्यन्ते 9 तानि पैतृकभूमौ स्वातन्त्र्य- लाभः सन्तोषप्राप्तिश्चेति । फारसीकथानकेन विकासम्येमा अवस्था ज्ञायन्ते । कदाचित्ता द्विसहस्रवर्षैरतिक्रान्ता. । : प्रकृतिराज्यात् काव्यक्षेत्रं प्रविश्येतिहासक्षेत्र प्रवेशः फेरेढूनस्य विभिन्नानिर्देशाभिस्तुल्य एव दशाक्रमो जेमशीदस्य ( = ): ( ) ( यम यिम विषयेऽपि द्रटुं शक्यते । इतीदृश्य एव कथा कैववश काव्य उसनस कवउश विषये खोस्र सुश्रन- सहश्रवह्न ) विषयेऽपि । विकासदृष्ट्या भारतीयमाख्यान फारसीकथासमानान्तरमेव । यजुर्वेदस्य समयेऽस्याः कथाया महत्त्वपूर्ण रूपं लुप्तमेव । नत्र त्विन्द्रः कलहप्रियः कश्चिदोर्ष्यालुर्देवः योऽजेयान् दैत्यान् निम्नस्तरीयया धूर्ततया , पराजयति । महाभारते सा कथा तेनैव रूपेणागता अर्जुननाम्ना वा यश्चेन्द्रस्यावताररूप आसीत् । स तान् महा- शक्तिशालिनो राज्ञः पराजयते, ये दैत्यावतारभूता आसन् । महाभारतरामायणयोः प्रमुखपात्राणि फिरदूसीराजमिश्र- समानमेव नश्यन्ति' इत्यादिकम् । तदपि कपोलकल्पनामात्रम्, इन्द्रवृत्रादिकथानामाधिभौतिकादिरूपेणार्थभेदस्योक्तत्वात् । परवर्तिषु ग्रन्थेषु तस्या रूपान्तरण नासम्भवि । नामरूपघटनानां वैरूप्ये तु प्रत्यभिज्ञानमैक्यं च दुर्लभमेव, केनचिदंशेन साधर्म्यस्य स्वर्गीय संघर्षो का काव्यीय रंगो मे रंजित वर्णन पाते है, जिन्हें या तो नितान्त सरल और स्वाभाविक रूप में या प्रतीकात्मक परिवेष मे देवी व्यक्तियों के रूप में चित्रित किया गया है । दूसरी ओर फारसी वेद अवेस्ता मे यह संघर्ष स्वर्ग से पृथ्वी पर, किं वा प्राकृतिक दृश्यों के प्रदेश से नैतिक जगत् में उतरता है । इसका विजेता एक पुत्र है, जो एक पिता को प्राप्त होता है और जो पृथ्वी का रक्षक नियुक्त कर सोमयज्ञ की पवित्र क्रियाओं के पुरस्कार के रूप में प्रदान किया गया है । वह जिस दैत्य का वध करता है, वह पाप की एक शक्ति की सृष्टि है और संसार की पवित्रता को ध्वस्त करने के लिये अपार दानवीय बल से युक्त है । अन्त मे फारसी महाकाव्य इतिहास के क्षेत्र मे प्रवेश करता है । युद्ध आर्यों के देश में होता है । सर्प जो जेण्ड मे अजिदहक है और वेद में अहि ( दासक ) है, जोकफ के रूप में ईरान के सिंहासन पर अत्याचारी शासक बनकर बैठता है । युद्धरत फेरेदून - वेद में त्रैतन् और जेण्ड में थ्रेइनाओनो को पीड़ित जनता के कल्याण के लिये जो वरदान मिलते है, वे है पैतृक भूमि पर जीवन में स्वतन्त्रता एवं संतोष की प्राप्ति । फारसी आख्यान ने विकास की इन अवस्थाओं को कदाचित् २००० वर्षों में पार किया और प्रकृति के राज्य से महाकाव्य के राज्य मे पहुँच कर वहाँ से इतिहास के क्षेत्र मे प्रवेश किया । फेरेदून की विभिन्न दशाओं से मिलती- जुलती दशाओं का क्रम जेमशीद ( यम, यिम ) के विषय में भी देखा जा सकता है । इसी प्रकार की कथाएं कैकवक्ष ( काव्य उशनस् कवउश्) के और सम्भवतः कैखोस् ( सुश्रवस्, हुश्रवस्) के विषय में भी है । विकास की दृष्टि से भारतीय आख्यान फारसी कथा का समानान्तर है । यहां तक कि यजुर्वेद के समय में कथा का स्वाभाविक महत्वपूर्ण रूप लुप्त हो गया था । उसमें इन्द्र केवल एक कलहप्रिय और ईर्ष्यालु देवता है, जो अजेय दैत्यों को निम्नकोटि को धूर्तता से पराजित करता है और भारतीय महाकाव्य में यह कथा या तो उसी रूप मे आई है या इन्द्र को मनुष्य रूप में अर्जुन नाम से उपस्थित किया गया है, जो इन्द्र का ही अवतार है और उस महाशक्तिशाली दैत्य एवं राजाओ का नाश करता है, जो दैत्यों के अवतार के रूप में संमुख आते है । महाभारत और रामायण के प्रमुख पात्र फिरदूसी के राजाओं के समान नष्ट होते हैं ' (पृ० २ ९ -३० ) । ये सारी बातें खाली कपोल कल्पनाएँ हैं । इन्द्र-वृत्र आदि की कथाएँ आधिभौतिक आदि अर्थो के अनुसार अनेक अभिप्रायो से कही गई है । परवर्ती ग्रन्थों में उसका दूसरा स्वरूप हो जाय, यह कोई असंभव बात नही है । नाम, रूप और घटनाओं की भिन्नता १२०
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६५४ वेदार्थपारिजातः बंधम्यंस्य च सर्वत्रापि कल्पयितुं शक्यत्वात् । अहिवत् कुटिलत्वाद् दस्युवदपहारकत्वाद् अहिदस्युप्रभृतिशब्दा वृत्रादिष्वसुरेषु वेदे प्रयुज्यन्ते । धर्मब्रह्मपर्यवसिताना वेदानामाख्यानेतिहासादिवर्णने तात्पर्यं नास्त्येव । आख्यानेतिहासा- - - -दिरूपकं तु विषयबोधसौकर्यायं वेत्युक्तमेव । नामसाम्यान्वेषणप्रयासस्तु निरर्थक एव स्व श्व सकृत् शकृत् स्वजन- श्वजनादिस्थलेषु व्यभिचारात् । यजुर्वेदसमयेऽस्या कथाया महत्त्वपूर्णो भागो नष्ट इत्यपि न विचारचारु, ऋक्संहिताया विद्यमानत्वेन तादृशकल्पनायोगात् । किञ्च जीवनेऽनेका अनुकूलाः प्रतिकूलाश्च घटना घटन्ते । न तावतापि , व्यक्तिभेदः सम्भवति वाल्मीकिप्रभतीनां कालान्तरेऽन्यादृशानामपि महर्षित्वप्राप्तिस्मरणात् । समन्वयमन्तरा श्रीरामस्य श्रीकृष्णस्य चाभिन्नस्याप्यनेके भेदाः कल्प्येरन् । तत एव कैश्चिन्महाभारतस्य गीताया भागवतस्य च भिन्नाः श्रीकृष्णा अभ्युपेयते । महाभारतरामायणपात्रसम्बन्धिन्यः कल्पनास्तु महाभारतादिविरुद्धत्वादेवोपेक्ष्याः । रामायण- महाभारतादयस्तु भारतीयानां नित्येतिहासरूपाः । तत्पात्रेष्वनेका आध्यात्मिकादिकल्पना अपि सम्भवन्ति । सति कुडये चित्रोल्लेखो नासति । ऐतिहासिकेषु पात्रेषु सत्स्वेव तत्राध्यात्मिकादिकल्पना: सम्भवन्ति । 'मायाचारो मायया :' ( ) " वर्तितव्य म० भा ० इति न्यायं प्रदर्शयितुमेव क्वचिच्छद्मनापि दुष्टानां पराजयो नानुचितः असत्य- वत्मनापि सत्यप्राप्तिप्रयत्नसम्भवात् । रामायणानुसारेणैव रामस्य परब्रह्मरूपविष्ण्ववतारत्वेन रावणस्य शापवशात् तत्पार्षदप्रमुखस्यावगतत्वेन त्वदुक्तकल्पनानुपपत्तेः । अर्जुनस्य जीवनपावित्र्यसूचकनामत्वादपि तदनुपपत्तिः । तस्य , शौयं यथा लोकोत्तरमासीत्तथैव चरित्रशुद्धिरप्यनुपमैवासीत् । स्वर्गलोके उर्वश्या प्रार्थितस्यापि निष्ठा धैर्यम् होने पर उनको पहचान पाना कि यह एक ही है, बडा कठिन है । किसी अंश में समानता और असमानता तो सभी जगह खोजी जा सकती है । सांप की तरह कुटिल स्वभाव के कारण और लुटेरे की तरह प्राणो को ले लेने वाला होने से 'अहिदस्यु' प्रभृति शब्द वृत्र आदि असुरों के लिये वेद में प्रयुक्त हुए हैं । वेदो का मुख्य प्रतिपाद्य विषय धर्म और ब्रह्म है, अतः इनका तात्पर्य आख्यान या इतिहास के प्रतिपादन में नहीं हैं । आख्यान और इतिहास के रूप में रूपक अलंकार की पद्धति से विषय को सरलता से समझाया जाता है । नाम की समानता की खोज करने का सारा प्रयास व्यर्थ है, क्योकि हम बता चुके है कि स्व और श्व, सकृत् और शकृत्, स्वजन और श्वजन शब्दो में समानता होने पर भी अर्थ में बहुत भेद हो जाता है । यजुर्वेद के समय मे इस कथा का महत्त्वपूर्ण अंश नष्ट हो गया था, यह कथन भी विचार करने से भला नही मालूम पडता, क्योकि ऋग्वेद में भी यह कथा विद्यमान है, अतः आपकी कल्पना सही नही मानी जा सकती । जीवन में अनेक तरह की घटनाएँ घटती रहती हैं, उनमें से कुछ अनुकूल और प्रतिकूल होती है । इनसे व्यक्ति में भिन्नता नही आ जाती । वाल्मीकि प्रभूति के विषय में यह प्रसिद्ध है कि पहले वे डाकू का जीवन बिताते थे, किन्तु बाद में वे महर्षि कहलाने लगे । व्यक्ति के जीवन को यदि समन्वित न किया जाय तो श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे व्यक्तियो के अनेक भेद मानते पड़ेंगे । कुछ लोग यह मानते भी हैं कि महाभारत के कृष्ण, गीता के उपदेशक कृष्ण और भागवत के कृष्ण भिन्न -भिन्न थे । महाभारत और रामायण में वर्णित पात्रो से संबद्ध वे कल्पनाएँ सर्वथा निराधार ही हैं, जो कि इनमें प्रतिपादित स्वरूप के विपरीत बताई जाती है । रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थ भारतीयों के लिए सनातन इतिहास ग्रन्थ है । उनके पात्रो के सम्बन्ध में आध्यात्मिक आदि कल्पनाएँ भो की ही जा सकती हैं । दीवाल के रहने पर ही उस पर चित्रकारी की जा सकती है, खाली आकाश में चित्रकारी नही होती । इसी तरह से ऐतिहासिक पात्रों की सत्ता मानने पर हो उनसे संबन्ध में ईश्वर, भगवान् आदि को आध्यात्मिक कल्पनाएँ संभव हो सकती है । ' मायावी व्यक्ति के साथ उसी तरह का व्यवहार करना चाहिये' इस राजनीतिक सिद्धान्त के अनुसार कभी-कभी छल- कपट से भी दुष्टो को हटाया जाता है, इसमें कोई अनुचित बात नही है । असत्य मार्ग से भी सत्य तक पहुँचा जा सकता है । रामायण के अनुसार ही राम परब्रह्म स्वरूप विष्णु के अवतार है और उनका पार्षद ही शाप के कारण रावण के रूप में अवतरित हुआ था । इससे भी आप जैसे लोगो की निराधार कल्पनाएँ सही नही मानी जा सकती । अर्जुन का नाम उसके जीवन की पवित्रता का सूचक है । इससे उसके संबन्ध में कही गईं आपकी बात सही नहीं मानी जा सकती । उसकी वीरता जैसे लोकोत्तर थी, उसी तरह से उसका चरित्र भी परम पवित्र और अनुपम था । स्वर्गलोक में उर्वशी के प्रार्थना करने पर भी उसमें मातृत्व भावना की निष्ठा और धैर्य, एकान्त में उत्तरा को नृत्य आदि
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वेदार्थ पारिजातः ५५ रहस्युत्तरायाः शिक्षणादिकार्यरतत्वेऽपि तस्या दुहितृबुद्धि:, पाशुपतब्राह्मादिदिव्यास्त्रसम्पन्नस्यापि विपद्यपि तदप्रयोगः, तस्यानृशस्यत्वादिकमेवावगमयन्ति । यदपि-'ऋग्वेदीयानि गीतानि स्वसमयं स्थानमुत्पत्ति विकासावस्थाविवरणमुद्घाटय पुरः स्थापयन्ति । यथा तेष्वधिकप्राचीनसूक्त ष्विद विज्ञायते यत्तदानीं भारतीया जनता सिन्धुनद्यास्तटे वसन्ती प्रतीयते । तदानीमनेकासु लध्वीषु जातिषु विभक्ता परस्य शत्रुभावमापन्ना कर्षकाणा निश्चितस्थानराहित्येन बम्भ्रम्यमाणाना यायावराणां (खानाबदोश ) जीवन यापयति स्म । एता जातयोऽल्पाल्पसमुदायरूपेण यत्र निवसन्ति स्म । एतासां प्रतिनिधित्वं राजा करोति स्म । परस्पर युध्यमानाः पृथक् पृथक् स्थिता देवतानामुपस्थितौ समानरूपेण यज्ञान् सम्पादयन्ति स्म । परि- वाराणा पितरः पौरोहित्य कुर्वन्ति स्म, गृह्यकर्माणि च निर्वर्तयन्ति स्म । देवताभ्यः स्तुतीः प्रार्थनाश्च समर्पयन्ति स्म । महतां सार्वजनिकयज्ञाना सिद्धयर्थ ये जात्युत्सवरूपेण निवर्त्यन्ते निवर्त्याना तेषा कृते ऋत्विजा नियुक्तयो भवन्ति स्मार्ते च ऋत्विजः कर्मणा ज्ञानाध्ययनादिभिरतियोग्या बुद्धयन्ते स्म । तेष्वेकजातीयाना भिन्नजातीयानां वा यज्ञैरधिसमृद्धिमत्त्वेन प्रतिद्वन्द्विता विकासमुपगता । यथा वशिष्ठविश्वामित्रवशीयाना परस्पर शात्रव सम्पूर्णे वैदिकयुगेऽक्षुण्णरूपेण चलति स्म । अस्यासहिष्णुतापूर्णविद्रोहस्योत्पत्तिः केवलमेकं लघुकारणमुपजीव्य सभूता यत् कश्चिन्तृपो विश्वामित्रस्य स्थाने स्वयज्ञे वशिष्ठं ऋत्विक्त्वे नियुक्तवान् । तस्मिन् काले राजवशीयाना पुरोहिताना प्रभावो यज्ञादुपरि न प्रसरति स्म । तस्मिन् काले वर्णानामुत्पत्तिर्नेवासीत् ॥ जनता तदानीमप्येकेनैव सङ्घटितसमूहरूपेणासीत् । इदानी यावत्तस्या विश इत्येव नामासोत् । निर्वाचितो राजा विश्पतिरुच्यते स्म । स चाद्यापि लिथूनियनभाषायामुपलभ्यमान एक उपाधिरस्ति । एवविधान्यनेकानि सूक्ताम्युपलभ्यन्ते येषां रचना कवयित्रीभिर्महिषीभिः कृता । एतास्वत्रिपुत्री अग्रणीरासीत् । प्रेमसम्बन्धिनि कोमलायादर्शतत्त्वायाधिकं महत्त्व न प्रदीयते । यत्राद्योपान्तमपरिष्कृतस्वाभाविके - की शिक्षा देते रहने पर भी उसमें अपनी पुत्री के समान दृष्टि, पाशुपत, ब्राह्म आदि दिव्य अस्त्रों के बनी होने पर भी उनका कभी निरर्थक प्रयोग न करना, ये सब बातें उनकी महानता को बताती है । 'ऋग्वेद के सूक्त हमारे संमुख अपने समय, स्थान और उत्पत्ति तथा विकास की अवस्थाओं के विवरण को खोल कर रख देते हैं । इनमे से अधिक प्राचीन सूक्तों में भारतीय जनता सिन्धु नदी के किनारो पर बसी हुई प्रतीत होती है । इस समय यह अनेक छोटी जातियो मे बँटी हुई हैं, जो परस्पर शत्रुता रखती है, कृषको और खानाबदोशो का जीवन व्यतीत करती हैं । ये जातिया अलग- अलग या छोटे समुदायों में निवास करती है, इनका प्रतिनिधित्व इनके राजा करते है । ये जातियाँ एक दूसरे से युद्ध करती हुई पृथक् बनी रहती है और देवताओ की उपस्थिति मे समान ढंग के यज्ञो का संपादन करती है । परिवार का प्रत्येक पिता अपने घर में पुरोहित का कार्य करता है, गृह्य कर्मों का संपादन करता है और देवताओ की स्तुति या प्रार्थनाएं अर्पित करता है । केवल बडे सार्वजनिक यज्ञो के लिये ही, जो एक प्रकार का जातिगत उत्सव होता है और राजा द्वारा संपादित होता है, विशेष ऋत्विजो की नियुक्ति होती है, जो आवश्यक कर्मों के पर्याप्त ज्ञान एवं अध्ययन के कारण योग्य समझे जाते है और जिनमे एक या दूसरी जाति के यज्ञो द्वारा कम या अधिक समृद्ध होने के आधार पर शनैः -शनैः एक प्रकार की प्रतिद्वन्द्विता का विकास होता है । यहाँ विशेष महत्त्वपूर्ण है वसिष्ठ और विश्वामित्र के वंशो की आपसी शत्रुता, जो सम्पूर्ण वैदिक युग मे चलती रहती है । इस असहिष्णुतापूर्ण द्रोह की उत्पत्ति इस छोटी बात से होती है कि इस काल के एक छोटे राजा ने विश्वामित्र के स्थान पर वसिष्ठ को अपने यज्ञ का प्रधान ऋत्विक् नियुक्त कर लिया । इस आरम्भिक काल मे राजवशी ऋत्विजों का प्रभाव यज्ञ से आगे नहीं फैलता । इस समय तक वर्णों की उत्पत्ति नही हुई है, जनता अब भी एक संगठित समूह के रूप में है और इस समय तक इसका केवल एक नाम है 'बिश:' या बसने वाले । राजा जो संभवतः निर्वाचित होता है, ' विश्पति' कहा जाता है, जो अब भी लियूनियन भाषा में पाई जाने वाली एक उपाधि है । इस समय में स्त्रियों को जो स्वतन्त्र स्थान प्राप्त है, वह ध्यान देने योग्य है । हम ऐसे अनेक उत्कृष्ट सूक्त पाते है, जिनकी रचना का श्रेय कवि-यित्रियों तथा रानियो को दिया गया है और इन कवियित्रियों मे अत्रि की पुत्री अग्रणी है । जहाँ तक प्रेम का सम्बन्ध है, इसके कोमल
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I वेदार्थपारिजातः न्द्रियसुखाय भोगस्य प्रभावमुद्रा निपतिता, तथापि विवाहस्य पवित्रता बुद्धयते स्म पतिपत्न्यो गृहशासको दम्पती मिलित्वा देवानाराध्नुतः स्म । अनेन तथ्येन धार्मिकभावना व्यज्यते । मनुष्याः प्राकृतिकतत्त्वानां तदधिष्ठातृरूपेण कल्पितसत्तानामुपरि समाश्रिताः । तथैवेदमप्युच्यते यत् प्रकृतितत्त्वानामुपरि शासनकत्र्यंः सत्ता अपि मानवीयसहयोग- मपेक्षते । अनेनैकसमतोलनं स्थाप्यते । अत एव पापकल्पना सर्वथा वैदेशिकी भवति । भारतीयस्य देवताः प्रति नम्रता-व्यवहारोऽद्यापि नितान्तं वैदेशिकः | भारतीयाः कथयन्ति यन्मह्यं देहि तुभ्यमहमिदं करिष्यामीति । एकदेव सहयोगाय स स्वाधिकारं प्रदर्शयति | आदानप्रदानरूपस्तु व्यापारः । अस्मिन् मुक्तजीवने ओजस्विन्यामात्मचेतनायां भारत-वासिनस्ततो नितान्तभिन्नान्यधिकपौरुषयुक्तान्युदात्तचित्राणि पुरस्तादुपयान्ति । पूर्वप्रदशितावस्था शनैः शनैः परिवर्तन- मुपगता । विस्तारप्रभावादस्वस्थताकर जलवायुप्रभावान्नवीन शक्तिर्भग्नतामुपगच्छन्ती क्रमेण लोपं गता । कि तत्कारणं येनैतावत्या सख्यया सिन्धोः सकाशात् सरस्वत्याः पारं गत्वा गङ्गामनुलक्ष्य पुरःसरणायेयं जनता प्रेरिता । प्रमुखकारणमद्याप्यनिश्र्चितमेव ॥ नवीनानां वसितॄणां चापाद्वा जनसंख्यावृद्धेर्वा भारतीय सुन्दरप्रदेशदिदृक्षया वा सम्मिलितकारेणभ्यः स्वमूलस्थानत्यागेन दूरदेशमुपगता । शतपथीयाख्यानानुसारेणास्य विस्तारस्य पुरोहिताः कारणम् । राज्ञामिच्छाविरुद्धमपि विस्ताराय तैः प्रेयन्ते स्म राजानः । बहुकालं यावत् सिन्धुतटवर्तिभिस्तेषां घनिष्ठः सम्बन्ध आसीत् । किन्तु पश्चाद् भारते ब्राह्मणीयसमाजस्य स्थापनायां जाताया तेषु कटुताया: प्रबलं तत्त्वं सन्नि- विष्टम् । यतो ब्राह्मणैः स्वप्राचीना बान्धवा यैः स्वपूर्वजानां रीतयो यथार्थतया पाल्यन्ते स्म, नास्तिकरूपेण विर्घाम- रूपेण च बुद्धयते स्म' (पृष्ठे ३०-३२ ) इति । तदेतत् कल्पनामात्रं निर्मूलमेव, प्रमाणानुपलम्भात् । नहि मन्त्रेषु सिन्धुनद्या नामनिर्देशादेव सिन्धुत वैदिकजनताया निवासः कल्पयितुं शक्यते, पाश्चात्त्यैरपि पौरस्त्यदेशन दीपर्वतादिवर्णनदर्शनात् । स्तोत्रशस्त्ररूपेण और आदर्श तत्त्व को अधिक महत्त्व नही दिया गया है, अपि तु इस पर आद्योपान्त अपरिष्कृत स्वाभाविक इन्द्रिय सुखोपभोग की छाप पड़ी है । तथापि विवाह को पवित्र समझा गया है, पति और पत्नी दोनो घर के शासक ( दम्पती ) है और दोनो मिलकर देवताओं की प्रार्थना करते है । धार्मिक भावना इस तथ्य से अभिव्यक्त होती है कि मनुष्य प्राकृतिक तत्त्वों और उनके अधिष्ठाता के रूप में कल्पित सत्ताओं के ऊपर आश्रित है, किन्तु साथ ही साथ कहा गया है कि प्रकृति के तत्त्वो पर शासन करने वाली ये सत्ताएं भी मानवीय सहयोग की अपेक्षा रखती है । इस प्रकार एक सन्तुलन स्थापित होता है । अत एव पाप की धार्मिक कल्पना बिलकुल विदेशी है और भारतीय के लिये देवताओं के प्रति नम्रता का व्यवहार अब भी नितान्त विदेशी बना हुआ है । वह कहता है 'मुझे दो और मैं तुम्हारे लिये यह करूँगा' इस प्रकार वह देवी सहयोग के लिये अपना अधिकार प्रदर्शित करता है, जो आदान-प्रदान का सौदा है, कोई एहसान नहीं । इस मुक्त जीवन में, इस ओजस्वी आत्मचेतना में भारतवासी का उससे नितान्त भिन्न और अधिक पौरुष युक्त एवं उदास चित्र सामने आता है. जैसा कि हम बाद के समय से देखते आ रहे है । मैंने ऊपर यह प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया है कि किस प्रकार यह अवस्था शनैः - शनैः परिवर्तित हुई, किस प्रकार हिन्दुस्तान पर विस्तार तथा नयी जलवायु के अस्वास्थ्यकर प्रभाव के कारण नवीन शक्ति भङ्ग हो गई और क्रमश लुप्त हो गई । किन्तु वह कौन सी वस्तु थी? जिसने इतनी बडी संख्या में इन्हें सिन्धु से सरस्वती को पार कर गङ्गा की ओर बढने के लिये प्रेरित किया? इसका प्रमुख कारण क्या था यह अब भी अनिश्चित ही है । क्या यह नये बसने वालो के दबाव के कारण था? क्या जनसंख्या की वृद्धि के कारण था? या भारत के सुन्दर प्रदेशो की देखने की इच्छा ने उन्हें प्रेरित किया था? या संभवतः इन सभी कारणों से ऐसा हुआ? शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मण में पाये जाने वाले एक आख्यान के अनुसार इस विस्तार के बहुत कुछ कारण पुरोहित थे, जो राजाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध भी आगे फैलने के लिये प्रेरित करते थे । सिन्धु के तटवर्ती पैतृक भूमि से सम्बन्ध पहले तो बहुत घनिष्ठ बना रहा, किन्तु बाद मे जब नये ब्राह्मणीय समाज की हिन्दुस्तान में पूर्णरूप से स्थापना हो गई, तो उसमें कटुता का एक प्रबल तत्त्व प्रविष्ट हुआ, क्योकि ब्राह्मणों ने अपने पुराने बान्धवो को, जो अपने पूर्वजों की रीति-रिवाजों का यथार्थतः पालन करते थे, नास्तिकों और विधर्मियो के रूप में देखना आरम्भ कर दिया' ( पृ० ३०-३२) ।
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वेदार्थपारिजातः विनियुक्ताना मन्त्राणा यज्ञाङ्गद्रव्यदेवतादिस्तवेषूपक्षीणत्वेनान्यत्र तात्पर्याभावात् । तस्थामनेका लध्थ्यो जातय इत्यत्र मन्त्रा उद्धरणीयाः । परस्परशत्रुत्वमपि न तद्गतं वैशेष्यम्, सामान्येन समानस्थानवासिनां साम्मनस्य वैमनस्ययो रुभयोरपि दर्शनात् । नहि सततगन्तारः कर्षका भवन्ति । ता जातयो निवसनशीलत्वाद्विशः सञ्जाता इत्यपि निर्मूलम्, सबैषामपि निवसनशीलत्वात् । तेषां प्रतिनिधिभूतो राजा विश्पतिरित्यपि निर्मूलम्, भारतीयसस्कृतौ वैश्यजातीयेषु ' प्रजासामान्येषु च विश्पदप्रयोगदर्शनात् । राजा च तेषां स्वामित्वाद् विश्पतिव्यपदेश्यो भवति स्म एष वो ' राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा इत्यादिमन्त्रात् । तासा जातीनां परस्परं युद्ध समानरूपेण यज्ञ- सम्पादनमित्यपि निर्मूलम्, प्रमाणवैघुर्यात् । प्रतिगृह पितेव पुरोहितकार्यं गृह्यकर्माणि करोति स्मेत्यपि निर्मूलम्, निष्प्रमाणत्वात् । उपनयनमारभ्य समेषां द्विजातीनां सन्ध्यास्वाध्यायादिविधानान्नैकः पितेव गृहगतानां समेषां प्रति- निधित्वेन गृह्याणि कर्माणि कर्तुं शक्नोति स्मेति । ज्योतिष्टोमादिमहान्ति कर्माणि राजकर्तृकाण्येवासन्नित्यपि , निर्मूलम् वैदिकविधानविरोधात् । वाजपेयाख्यं कर्म ब्राह्मणानामेव भवति । राजसूयश्च क्षत्रियस्य सतो राज्ञ एव नान्येषाम् । ज्योतिष्टोमादयस्तु प्रातिस्विका यागा न सामूहिकाः, ब्राह्मणेषु सूत्रेषु तथैव विधानात् । तद्भिन्नविधाने , त्वदीयनिरङ्कुशकल्पनातिरिक्तप्रमाणानुपलम्भात् । वशिष्ठविश्वामित्रयोर्वैयक्तिको द्वेषः कादाचित्क एव अन्ते रामायणादौ तयोः सामञ्जस्यवर्णनात् । तद्वंशीयानां विरोधस्तु सर्वथा प्रमाणशून्यः । वस्तुतस्तु वशिष्ठविश्वामित्रो आधिकारिकपुरुषों दीर्घजीविनौ । विश्वामित्रस्य ब्राह्मण्यप्राप्तेः पूर्वमपि तो ब्रह्मक्षत्ररूपेण सहयोगिनावभूताम् । कदाचिद्विश्वामित्रस्यातिथ्यप्रसङ्गे वशिष्ठस्य होमधेनुप्रभावैश्वर्ये वीक्ष्य विश्वामित्रस्य लोभो जातः । पश्चात् सङ्घर्षे इन बातो के लिये कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, अतः ये सब निराधार कल्पनाएं है । मन्त्रो में सिन्धु नदी के नाम का उल्लेख होने मात्र से यह बात नही सिद्ध हो जाती कि वैदिक जनता सिन्धु नदी के तट पर निवास करती थी । पाश्चात्य लेखको ने I भी पूर्वी देशो के नदी, पर्वत आदि का वर्णन किया है । इतने से उनको प्राच्य नही कहा जा सकता स्तोत्र और शस्त्र के रूप में विनियुक्त मन्त्रो का तात्पर्य यज्ञ के अङ्गभूत द्रव्यो का बोध कराने और देवताओ की स्तुति करने से पूरा हो जाता है । उसके बाद उनका नदी-पर्वत आदि के वर्णन से कोई सम्बन्ध नही रहता । उस समय अनेक छोटी-छोटी जातिया थी, इस बात का प्रमाण देना पडेगा । परस्पर शत्रुता होना कोई विशेष बात नही है । सामान्यतः एक जगह रहने वालो मे परस्पर सोमनस्य और वैमनस्य बन ही जाता है । कृषक जनता एक जगह स्थिर रह कर खेती बाडी करती है । उसका यह स्वभाव नही हो सकता कि वह एक स्थान छोड़कर दूसरी जगह निरन्तर बदलती रहे । ये जातिया 'विश: ' इसलिये कहलाईं कि ये एक जगह बस गई थी, यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि यह तो मनुष्य का स्वभाव ही है कि यह कही न कहीं बस जाता है । जनता का राजा के रूप में चुना गया प्रतिनिधि 'विश्पति' कहलाता था, यह बात भी गलत है, क्योकि भारतीय संस्कृति में केवल वैश्य जाति की प्रजा के लिये ही इन शब्दों का प्रयोग हुआ है । राजा इन वैश्यो का भी स्वामी होने से ' विश्पति' कहलाता था । 'यह राजा तुम लोगों का है । हम ब्राह्मणो का राजा तो सोम है' इस मन्त्र में स्पष्ट ही वैश्य आदि से ब्राह्मणो का अलग से निर्देश किया गया है । ये जातिया परस्पर युद्ध भी किया करती थी और यज्ञ-यागादि का संपादन भी करती थी, इस बात में भी कोई प्रमाण नहीं है । परिवार का प्रत्येक पिता पुरोहित का कार्य और गृह्य कर्मों का सम्पादन करता था, यह कथन भी निराधार है । उपनयन से लेकर द्विजाति के लिये निर्धारित आवश्यक सम्ध्यावन्दन, वेदाध्ययन आदि कर्मों को परिवार के सभी सदस्यों को करना पडता है, अकेला पिता ही पूरे परिवार के लिये सन्ध्यावन्दन आदि नही कर लेता । ज्योतिष्टोम जैसे बड़े- बड़े यज्ञ केवल राजा ही किया करते थे, यह कथन भी निर्मूल है, क्योंकि वैदिक विधान इसके विपरीत भी है । वाजपेय यज्ञ केवल ब्राह्मण ही कर सकते है । राजसूय यज्ञ वही क्षत्रिय कर सकता है, जो कि क्षत्रिय के साथ राजा भी हो । ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञो को एक-एक व्यक्ति ही सम्पादित करते हैं, इसको सामूहिक रूप से नही किया जा सकता । ब्राह्मण और श्रीतसूत्र ग्रन्थों में इसी तरह का विधान है । इसके अतिरिक्त आपके कथन में निराधार कल्पना के सिवाय और कोई प्रमाण नही मिल सकता । वसिष्ठ और विश्वामित्र का व्यक्तिगत कलह सीमित काल में ही रहा है । अन्त में रामायण आदि में उनके परस्पर सौहार्द का भी वर्णन मिलता है । वसिष्ठ और विश्वामित्र के वंशजो में परस्पर कलह की बात सर्वथा निराधार है । वास्तव मे तो वसिष्ठ और विश्वामित्र दीर्घजीवी अधिकारी पुरुष है । विश्वामित्र
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६५८ वेदार्थपारिजातः पराजितो विश्वामित्रो ब्राह्मण्यलाभाय लोकोत्तरं तपस्तेपे । तत्तपःप्रभावेण च ब्राह्मण्यमासादितवान् । रामायणीय-कथायां तु तयोः परस्परमत्यन्तं सौहार्दमेव दृश्यते । बेवरेण सर्वत्रार्धजरतीयत्वमेवाश्रितम् । महाभारतीयप्रसङ्गा ऋक्-सूक्तकथार्थतया योजिताः । निर्वाचितो राजा भवति स्मेत्यपि निर्मूलम्, पितृपितामहादिपारम्पर्येणैवाभिषेकेण राजपद• प्राप्तेरेव वेदेषु वर्णनात् । वैदिकानि सुक्तानि मन्त्रा ब्राह्मणानि च नित्यानि । न तानि केनचित्क्रियन्ते । अतः कवयि- श्रीभिर्महाराज्ञीभिर्निर्मितानि सूक्तानीत्यपि प्रतिज्ञामात्रम् हेतुमन्तरा प्रतिज्ञासिद्धयसम्भवात् । एवमेवादर्शप्रेम-तत्त्वोपरि अपरिष्कृतेन्द्रियसुखोपभोगप्रभावादिकथनमपि निर्मूलम् । जनसामान्यजीवने यद्यपि तन्नासम्भवि, तथापि ,न तद्वैधम् वैदिकविवाहादिविधानेषु पातिव्रत्यवैभवस्य वर्णितत्वाद् । किञ्च प्रमाणाभ्यनुद्धृत्य वैदिकप्रणाल्या तदर्थाननिरूप्य निष्प्रमाणमेव यत्किञ्चिज्जल्पनं न कठिनम् परं न तत्रादरो युक्तः । यश्चैकस्यापि ग्रन्थस्य समन्वयेन ,समञ्जसमर्थमभ्युपैति तस्य लोकवेदबाह्यत्वात् सर्वथाऽनादर एव युक्तः । मीमांसका वैदिका मन्त्राणां समेषां ब्राह्मणानां च समन्वयेनैवार्थं बुद्ध्यन्ते । समन्वितानां समेषां मन्त्राणां ब्राह्मणानां चोपक्रमादिभिनिर्णीता एवार्थी ग्राह्या भवन्ति । मनुष्या देवाश्रिता देवाश्च मनुष्याश्रिताः । 'देहि मे ददामि ते ' इत्यादिवैदिकाः सिद्धान्ता न कादाचित्काः, अद्यापि तेषां तथैव राजमानत्वात् । ' देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ । ' (श्री ० भ ० गी० ३।११ ) इति वचनस्याद्यापि नागरूकत्वात् । तथापि देवान् प्रति नम्रताव्यवहारो वैदेशिक इति कथनं भारतीयभावनया नितान्तमपरिचितस्य कस्यचिद् वैदेशिकस्यैव शोभते । 'स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ' ( वा० सं ० ३।२४ ) इति वचनस्य जाज्वल्यमानत्वाच्च । जब ब्राह्मण नही बने थे, इससे पहले वे ब्राह्मण और क्षत्रिय के रूप में परस्पर एक दूसरे के सहयोगी थे । किसी समय विश्वामित्र ने अपने लिये किये गये अतिथि सत्कार के आयोजन में वसिष्ट की गाय के प्रभाव और ऐश्वर्य को देखकर विश्वामित्र को उस गाय को अपने पास रखने का लोभ आ गया । इसी बात पर आपस मे संघर्ष हो गया और उसमे विश्वामित्र हार गये । पराजित होकर विश्वा- मित्र ने ब्रह्मतेज की प्राप्ति के लिये कठिन तपस्या की । तप के प्रभाव से उसको ब्राह्मण्य की प्राप्ति हो गई । रामायण में वर्णित कथा में तो इनमें परस्पर अत्यन्त स्नेह दिखाई पडता है । बेवर सब जगह अर्धजरतीय न्याय का अनुसरण करते है । अपने मतलब की बात मान लेते है और जो बात अपने मन्तव्य के विपरीत पड़ती है, उसको नही मानते । उन्होंने महाभारत में आये प्रसंग को तो ऋग्वेद के सूतों के साथ जोड़ दिया है और इस रामायण के प्रसङ्ग को छोड दिया है । उस समय राजा का निर्वाचन होता था, यह भी गलत बात है, अपनी कुल परम्परा से आये व्यक्ति का ही राजा के पद पर अभिषेक किये जाने की बात वेदो में मिलती है । वैदिक सूक्त मन्त्र और ब्राह्मण ये सब नित्य है । इनको कोई बनाता नही । इसलिये सूक्तो की रचना विदुषी स्त्रियों और राजमहिषियों ने की, यह कथन भी गलत हो है । बिना प्रमाण के कह देने मात्र से कोई बात सच नही मानी जाती । इसी तरह आदर्श प्रेम के उदाहरणो पर अपरिष्कृत इन्द्रिय सुख को भोगने का आक्षेप भी निराधार है । जन सामान्य के जीवन में यद्यपि यह असंभव नही है, किन्तु उसको वैध कभी नहीं माना गया । वैदिक विवाह के प्रसङ्ग में पातिव्रत्य धर्म की पवित्रता का विशद वर्णन मिलता है । बिना प्रमाणो को उद्धृत किये और वैदिक प्रणाली का बिना अनुसरण किये वैदिक वाक्यों का मनमाना अर्थ कर लेना कोई कठिन बात नही है, किन्तु उसमें विश्वास करना उचित नहीं है । जो व्यक्ति एक ही ग्रन्थ को प्रमाण मान कर अन्य ग्रन्थों का परस्पर समन्वय कर एक समंजस अर्थ नहीं स्वीकार करता, वह लोक और वेद की पद्धति से भी परिचित न होने के कारण कभी प्रमाण नही माना जा सकता । मोमासक और वैदिक सभी मन्त्रो और ब्राह्मणो का समन्वय कर एक समंजस अर्थ स्वीकार करते है । इन समन्वित मन्त्रों और ब्राह्मणो का उपक्रम आदि छः प्रकार के उपायो से निर्णीत अर्थ को ही प्रमाण माना जाता है । मनुष्य देवताओ के आश्रित है और देवता मनुष्यो के आश्रित है, देने और लेने का यह वैदिक सिद्धान्त किसी एक समय का न होकर आज भी उसी तरह से मान्य है, जैसा कि पहले था । ' देवान् भावयतानेन' इस गोता वचन में यहीं बात कही गई है । इस स्थिति में भी देवताओ के प्रति नम्रता का व्यवहार भारतीयो ने विदेशियो से सीखा है, यह कहना भारतीय भावना से एकदम अपरिचित किसी विदेशी के मुँह से भी शोभा दे सकता है । वाजसनेय संहिता के इस मन्त्र में भारतीय नम्रता स्पष्ट झलकती है -'हे अग्ने, आप हमारे लिये उसी तरह से मंगलदायक होइये और हमारे कल्याण के लिये लगे रहिये, जैसे कि एक पिता अपने पुत्र के लिये लगा रहता है' ।
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बंदार्थपारिजातः ६५६ यत्तु —' ब्राह्मणीयव्यवस्थायां स्थापितायां ब्राह्मणैः स्वपूर्वबान्धवा नास्तिकतया विधर्मतया च बुद्धयन्ते स्म' इति, तत्सर्वथा निर्मूलम्, गम्भीरतमेऽस्मिन् विषये प्रमाणस्यावश्य वक्तव्यत्वात् । टिप्पण्यां निरर्थकानि बहूनि वस्तूम्युक्तानि किन्तु स्वोक्तिपोषकाणि मूलवचनानि तु क्वचिदपि नोक्ताम्येव । यदपि -'ब्राह्मणीयपुरोहितवादस्य पूर्ण विकासानन्तरम् ऋक्सहितायाः सङ्कलन जातम्' इति, तत्तु प्रतिज्ञामात्रं निरर्थकमेव प्रमाणानामनुपस्थापितत्वात् । 'कोसला विदेहाः कुरुपाञ्चालाः पुरोहितवादविकासेऽग्रगामिनो मन्यन्ते स्म । यदा च ते चरमोत्कर्षमुपगता आसन् तदेयं संहिता संकलितेति प्रलापमात्रं प्रमाणशूभ्यत्वात् । 'हिन्दुस्तानागमनान्तरं कानिचित्सूक्तानि रचितानि' इत्यपि प्रलापमात्रम्, प्रमाणस्यानुक्तत्वात् । यदपि सूक्तानामालोचनात्मकाध्ययनेन सूक्तसम्बद्धा विषयाः कल्पना भाषाः परम्परा आधाराश्च निश्चेतुं शक्यन्ते । कानि सूक्तानि कस्मिन् युगे विरचितानीति ज्ञातु शक्यन्ते' इति, तदपि कथनमात्रम्, विपरीतस्यापि सुवचत्वात् । कस्यचित् सूक्तस्य तादृशालोचनात्मकाध्ययनस्य प्रमाणरूपेणोपस्थापयितव्यत्वाच्च । यत्तु-'ऋक्सहिताया दशममण्डले ९८ सूक्ते देवापेः शन्तनोश्च सवादो दृश्यते । देवापिः शन्तनुश्च यास्कानुसारेण कौरव्यो भ्रातरौ " महाभारतरीत्या च शन्तनुर्भीष्मस्य विचित्रवीर्यस्य च पितासीत् । अम्बिकाम्बा लि- कयोर्विचित्रवीर्यस्य पत्न्योर्व्यासेन धृतराष्ट्रः पाण्डुश्चोत्पादितो | अतः शन्तनुर्महाभारतीयस्य पक्षद्वयस्यापि प्रपितामहो भवति । अनया रीत्या ऋक्संहिताया अन्तिमसङ्कलनस्य बहोः कालात्पूर्वमेव महाभारतवर्णित युद्ध वृत्तमिति मन्तव्यम् । महाभ।स्तवर्णितः शन्तनुर्ऋग्वेदीय एवान्यो वेति सन्देहास्पदमेव । अभिन्नत्वे किं महाकाव्येन तत्सम्बन्धो गौरववर्णनाय स्थापितः । देवापेस्तु पिता ऋग्वेदवणितो महाकाव्यवणिताद्भिन्न एव' ( पृ० ३३ टि० ) इति, तदपि न किञ्चित्, ' शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्' ( ब्र ० सू० १ | ३ | २८ ) इति ब्रह्मसूत्रे नथाभूताना समेता चोद्याना 'ब्राह्मणीय व्यवस्था के स्थापित हो जाने पर ब्राह्मणो ने अपने पुराने बान्धवो को नास्तिको और विधर्मियो के रूप में देखना आरम्भ कर दिया' ( पृ ० ३२ ), यह कथन सर्वथा निराधार है । इस तरह के गभीर विषयो मे प्रमाण अवश्य दिये जाने चाहिये । यहाँ टिप्पणियों मे निरर्थक बातें बहुत कही गई हैं, किन्तु अपने कथन की पुष्टि मे कोई प्रमाण कही भी नही दिया गया है । 'ऋक्स हिता का संकलन उसी युग में जाकर हुआ, जब ब्राह्मणीय पुरोहितवाद का पूर्ण विकास हो चुका था' ( पृ ० ३२ ) यह भी निरर्थक प्रतिज्ञामात्र है, क्योकि यहाँ कोई प्रमाण नही दिया गया है । ' कोसल- विदेह और कुरु पंचाल पुरोहितवाद को फैलाने मे अगुआ माने जाते थे । जब ये अपने चरम उत्कर्ष पर थे, जब ऋग्वेद संहिता का संकलन हुआ था' ( पृ० ३२ ) यह कथन भी एक प्रलापमात्र है, क्योकि यहाँ भी काई प्रमाण नही दिया गया है । 'हिन्दुस्तान मे आने के बाद कुछ सूक्तो की रचना हुई' ( पृ ० ३२ ) यह भी केवल प्रलाप ही है, क्योकि प्रमाणो से रहित है । ' प्रत्येक सूक्त के विषय मे केवल आलोचनात्मक अध्ययन करने वाला व्यक्ति ही उस सूक्त से संबद्ध विषय, कल्पना, भाषा और परम्परा के आधार पर यह निश्चित कर सकता है कि उसे किस युग की रचना माना जाय' (पृ० ३२ ) यह कथन भी कोरी प्रतिज्ञा है, क्योकि हम इसके विपरीत भो कह सकते हैं कि उक्त बातो में कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता । इस बात को पुष्ट करने के लिये किसी सूक्त का इस तरह का समालोचनात्मक अध्ययन प्रमाण के रूप में उपस्थित किया जाना चाहिये था । ' मण्डल १० का ९८व सूक्त देवापि और शान्तनु का संवाद है । इन दोनो को यास्क ने ' कौरव्यों ' कहा है । महाभारत में शान्तनु भीष्म और विचित्रवीर्य के पिता का नाम है, जिसकी दो पत्नियो अम्बिका और अम्बालिका से व्यास ने धृतराष्ट्र और पाण्डु को उत्पन्न किया । अत एव ये शान्तनु इन दोनो के पितामह या महाभारत के युद्ध के दो पक्षों कौरवों और पाण्डवो के पितामह है । इस प्रकार हमे यह मानना होगा कि इस महाकाव्य में वर्णित युद्ध ऋक्संहिता के अन्तिम सकलन के बहुत पहले हो चुका था । यह प्रश्न सदेहास्पद है कि ' महाभारत' के शान्तनु ऋग्वेद में उल्लिखित शान्तनु हो हैं या नही, या यदि हम उन्हे अभिन्न मान लें तो प्रश्न उठता है कि महाकाव्य के साथ उनका नाम उसका गौरव बढाने के लिए तो नही जोड़ दिया गया है । कम से कम देवापि के, जो यास्क के अनुसार शान्तनु के भाई है, पिता का जो नाम ॠग्वेद में बताया गया है, वह महाकाव्य के नाम से भिन्न है' ( पृ० ३२ टि० ) । इस कथन में भी कोई सार नही है, 'शब्द इति' इत्यादि ब्रह्मसूत्र में इस तरह के सभी कुतकों का समाधान कर
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वेदार्थपारिजातः ६६० वा लिखितनाम्नां व्यक्तिविशेषाणामुत्पत्त्यनन्तरं तत्पुस्तकानांसमाधानस्योक्तत्वात् । सामान्येष्वितिहासेषु पुस्तकेषु न वैदिकाः शब्दास्तादात्विकव्यक्तिविशेषपूर्वका निर्माणं सम्भवति । वेदस्य तु नित्यत्वाज्जगत्सृष्टेर्वेदिकशब्दपूर्वकत्वाच्चकदाचित् तन्नामकानां व्यक्तिविशेषाणामुत्पत्तावपि न लेन, भवितुमर्हन्ति तेषामनादित्वात् । वैदिकशब्दानुसारेण । तद्गतैः शब्दैर्नाविश्यं व्यक्तिविशेषाः कल्पयितव्याः, वैदिकशब्दानां तादात्विकत्वं सिद्धयति आख्यायिकामात्रत्वात्शतपथादिगतयाज्ञवल्क्यमैत्रेयीगार्गीजनकादिनामभिरपि न शतपथस्य, अभूतस्याप्याख्यायिकार्थत्वसम्भवात् । एवमेव घटनापूर्वकत्वाभावात् । घटनास्तु तदनुगुणा भवन्त्यो न निवार्यन्ते, ', तदनन्तरभावित्वं सिद्ध्यति तदुल्लेखस्य नित्यत्वेन असृग्रमिति मनुष्यान् तिरः पवित्रमिति पितॄन् सृष्टेर्वेदिकशब्दप्रभवत्वात् ॥ स भूरिति, व्याहरत्तस्माद्भुवमसृजत्० १।२१ ) इत्यादिप्रत्यक्षा ( श्रुति ) नुमाना ( स्मृति ) भ्याम् । 'वेदशब्देभ्य एवादी पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ( म तात्पर्याभावेनाग्न्यादिद्वारा एतेन ३३ पृष्ठे वर्णितमपि यत्किञ्चिदेव, सूक्ताना लौकिकाग्निविद्युदुषादिवर्णनेयज्ञादिकर्माणि तदङ्गदेवस्तवनानि, मन्त्रब्राह्मण- तदभिमानिदेवविशेषाणां स्तवे विनियोगात् । नहि भ्रान्तिमूलकानि तत्समर्थनात् । देवताधि- सूत्राणामपि तत्रैव समन्वयात् । व्यासजैमिनिगोतमवात्स्यायनशङ्करकुमारिलादिदार्शनिकैरपितेभ्यो हविश्च प्रापयितु शक्नोति । प्राकृतिकानि करणादौ देवतावादस्य समर्थितत्वाच्च । नहि जडोऽग्निर्देवानाह्वातुंकुर्वन्त्येव । विद्युतामुषसां तेजः पिण्डस्य सूर्यस्य च वर्णन विद्युदादीनि यत्र यज्ञादिकं न सम्भवति, तत्रापि स्वकार्याणितत्रैव पर्यवसानात् । न प्राकृतत्वेनापि तु विशिष्टश्वर्यशालिदैवतरूपेणैव प्रतीकतया यत्प्रकृतिशक्तिषु पूजनं भवति तत्परवर्ति- ' यदपि च- आध्यात्मिकविचाराणां नैतिकार्थानां च ब्राह्मणादिसिद्धानां पदार्थानामा घुनिकत्वानुप- कालिकी कल्पना' इति, तदपि तुच्छम्, मन्त्रब्राह्मणोपनिषदामनादित्वेन और विशेष व्यक्तियो के नाम रक्खे जा सकते है सामान्य रूप से आये नामो के आधार पर । वेद तो नित्य दिया गया है । इतिहास आदि के ग्रन्थो में आदि ग्रन्थों में भी उल्लेख माना जा सकता है बाद उनका महाकाव्य व्यक्तियो के बोधक उन विशेष व्यक्तियों की ऐतिहासिक स्थिति के पर ही मानी जाती है । इसलिये वैदिक शब्द इन ऐतिहासिक है । इस जगत् की सृष्टि वैदिक शब्दो के आधारअनादिकाल से चले आ रहे हैं । वैदिक शब्दों के अनुसार कभी उस नाम के व्यक्ति- कभी नही माने जा सकते, क्योकि ये शब्द तोशब्दों की तात्कालिकता नही मानी जा सकती, क्योकि वे तो कहानी के पात्रों की तरह विशेष भी हो सकते हैं, किन्तु इससे वैदिक यह आवश्यक नही कि इनको विशेष ऐतिहासिक व्यक्ति माना जाय, क्योकि कहानियों मे,,, कल्पित नाम हैं । उन शब्दों के आधार पर में वर्णित याज्ञवल्क्य मैत्रेयी गार्गी जनक ली जाती है । इसी तरह से शतपथ आदि ब्राह्मणों नित्य,,, तो जो बात हुई न हो वह भी मढ ऐसा नही सिद्ध किया जा सकता क्योकि ये नाम और घटनायें आदि नामो से भी उनकी रचना बाद में हुई होउसके आधार पर इनको ऐतिहासिकता नही सिद्ध की जा सकती । कभी प्रवाहरूप-कभी सेइस तरह है, अतः इनको अभी नई घटी घटना मान कर नही किया जाता, क्योकि यह सारी सृष्टि ही वैदिक शब्दों के आधार पर होती है ।, ' की घटनायें हो भो सकती है उनका निषेध इत्यादि स्मृतिवचन प्रमाण है । इस बात में 'स भूरिति० इत्यादि श्रुतिवचन और ' वेदशब्देभ्यः सूक्तो का लौकिक बातो की भी असारता सिद्ध हो जाती है । वैदिक की - इस कथन से बेवर के द्वारा पृ० ३३ में कही गई माध्यम से इनके अभिमानी उन उन विशेष देवताओ, अग्नि, विद्यत्, उषाकाल आदि के वर्णन में तात्पर्य के अंग के रूप में देवताओं की स्तुति करना कोई भ्रान्त धारणा नहीं न होकर अग्नि आदि के है क्योंकि,,,,, स्तुति में विनियोग माना जाता है । यज्ञादि कर्मों है । व्यास जैमिनि गोतम वात्स्यायन शङ्कर कुमारिल मन्त्र, ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थ भी एक स्वर से इसी। देवताधिकरण आदि मे देवतावाद का स्पष्ट समर्थन किया गया है बात का प्रतिपादन करते । जड़ अग्नि देवों, - आदि दार्शनिकों ने भी इसका समर्थन किया है नहीं हो सकता । प्राकृतिक विद्युत् उषाकाल आदि जिन देशों में यज्ञ यागादि नही को बुलाने में अथवा उनके लिये हवि ले जाने में समर्थइनका तथा प्रकाश के पिण्ड सूर्य का वर्णन प्राकृतिक वस्तु के रूप में न होकर विशिष्ट होते, वहाँ भी अपना कार्य करते ही हैं । वेदोंहैमें । इसी में उनका वास्तविक अभिप्राय माना जाता है । ऐश्वर्य के धनी देवताओं के रूप में किया गया