वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 421–430
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 421–430
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वेदार्थपारिजात। १३२१ जगतः सृष्टेरभावाद् यज्ञः कथं सम्पन्नः? तत्र यज्ञप्रमा परिमाणमियत्ता कासीत् । यज्ञस्य प्रतिमा देवता कासीत्? देवता द्रव्य च यज्ञस्य स्वरूप भवतीत्येव युक्तम् । बुद्धि परिमाण- निदाना-ज्य ( सार ) गोल पृष्ठावरणस्वतन्त्रवस्तु-प्रयोगादिप्रश्नानां कः प्रसङ्गः? प्रउगमित्यस्य ग्रहोक्थ स्तोतव्यमिति कथमर्थ.? भाषाभाष्ये च प्रयोगैः शब्देश्च स्तोतव्यमिति कस्य शब्दस्यार्थः? इति सर्वथोपहासास्पदमेव भाष्यम् । अत एव हविः प्रतियोगित्वेन मोयमाना देवता प्रतिमा युक्ता । तदानी जगत्सृष्टेः प्राग् यज्ञस्य देवता कासीत्? निदानं प्रवर्तकफलं किमासीत्? आज्यादिक हविः किमासीत्? परिधिः परिधय क आसन्? गायत्र्यादि-छन्दः किमासीत्? प्रउगादीनि शस्त्राणि कान्यासन्? इतीमे प्रश्नास्तु प्रकरणानुसारेण सङ्गताः । एतेषु प्रश्नेषु - 'त्रयाणामुत्तर द्वाभ्यामृग्भ्यामुक्तम् ॥ तथाहि अग्नेर्गायत्र्यभवत् सयुग्वोष्णिहया सविता सम्बभूव ॥ अनुष्टुभा सोम उक्थैर्महस्वान् बृहस्पतेर्बृहती वाचमावत् ॥ ' (ऋ ० स० १०।१३०।४ ) सयुग्वा अग्नेः सहायभूता गायत्री यष्टव्यात्प्रजा-पतेर्मुखादग्नेर्गायत्री जाता । देवासुरमध्येऽग्निः, छन्दस्सु गायत्री चोभावप्यजायेतामित्यर्थ । 'प्रजापतिरकामयत प्रजाये-येति । स मुखतस्त्रिवतं निरमिमीत । तमग्निर्देवतान्वसृज्यत गायत्री छन्द. ' (तै० स० ७| १ | १ | ४ ) इति श्रुतेः । उष्णि-हया उष्णिकछन्दसा सह सविता देवः सम्बभूव । ततः प्रजापतेर्यज्ञे ( आप चैव हलन्तामिति टाप्) महस्वान् तेजस्वी सोमः, उक्थं. स्तुतशस्त्रैरनुष्टुप्छन्दसा च सार्धं तस्मादेव प्रजापतेरजायत । बृहस्पतेर्देवस्य वाच वाक्य बृहतीच्छन्दः आवत् अरक्षत् अगच्छद्वा । बृहत्या सार्धं बृहस्पतिरपि तस्मादेव जज्ञ इत्यर्थः । 'विराण्मित्रावरुणयोरभिश्रीरिन्द्रस्य त्रिष्टुबिह भागो अह्नः । विश्वान् देवान् जगत्या विवेश तेन चाक्लृप्र ऋषयो मनुष्याः ॥ ' ( ऋ ० सं ० १०| १३०१५ ) । अपि च, मित्रावरुणयोर्देवयोर्विराट् छन्दः अभिश्रीः अभिश्रिता आसीत् । विराजा छन्दसा सह मित्रावरुणावपि प्रजापतेः सकाशाद् अजायेतामिति यावत् । इह अस्मिन् यज्ञे अह्नः सवनत्रयरूपस्य करें । इसलिये जब विश्वेदेव प्रजापति देव का यजन कर रहे थे, तब जगत् की सृष्टि के अभाव मे यज्ञ कैसे सम्पन्न हुआ? वहाँ यज्ञ का परिमाण अर्थात् इयत्ता क्या थी? यज्ञ की प्रतिमा अर्थात् देवता क्या थी? देवता और द्रव्य ही यज्ञ के स्वरूप होते है । अत ये हो प्रश्न इस मन्त्र के अर्थ के रूप में माने जाने चाहिये । ऐसा न कर इस मन्त्र में से बुद्धि, परिमाण, निदान, आज्यसार, गोलक पृष्ठ, आवरण, स्वतन्त्र वस्तु प्रयोग आदि अर्थों को निकालने का क्या प्रसंग है? प्रउग शब्द का अर्थ स्तोतव्य ग्रहोक्थ कैसे हो सकता है और हिन्दी अनुवाद मे इसका अर्थ प्रयोग और शब्दो से स्तुति करना चाहिये, यह कैसे किन शब्दो के आधार पर किया जा सकता है? इस तरह से दयानन्द का यह भाष्य सर्वथा उपहास का ही विषय माना जायगा । इसलिये जिसको हवि दी जाती है, वह प्रमीयमान देवता ही प्रतिमा शब्द से यहाँ बोधित माना जायगा । उस समय जगत् की सृष्टि होने से पहले यज्ञ की देवता क्या थी? उस यज्ञादि की प्रवृत्ति का फल क्या था? घृत प्रभृति आहुतियाँ क्या थी? परिधि क्या थी? गायत्री प्रभृति छन्द क्या थे? प्रथम प्रभृति शस्त्र क्या थे? ये ही प्रश्न प्रसंग के अनुसार ठीक माने जा सकते है । इन प्रश्नो मे से तीन का उत्तर दो ऋचाओं के द्वारा दिया गया है । जैसे कि ' अग्नेर्गायत्र्यभवत्' इस मन्त्र में बताया गया है कि अग्नि की सहायक गायत्री यष्टव्य प्रजापति के मुखभूत अग्नि से पैदा हुई थी । अर्थात् देव और असुरो मे अग्नि तथा छन्दों में गायत्री ये दोनो पदार्थ एक ही प्रजापति के मुख से उत्पन्न हुए थे । तैत्तिरीय श्रुति मे भी इसका प्रतिपादन मिलता है । उष्णिक छन्द के साथ सविता देवता पैदा हुए । ये दोनो भी एक साथ उस प्रजापति के यज्ञ में ही पैदा हुए । उष्णिक् शब्द से टाप् होने पर ' उष्णिहा' शब्द बनता है । उसी प्रजापति से महान तेजस्वी सोम उक्थ स्तुत शस्त्र तथा अनुष्टुप् छन्द के साथ पैदा हुआ । बृहस्पति देवता की वाणी का अनुसरण बृहती छन्द ने किया, अर्थात् वृहती छन्द के साथ वृहस्पति की उत्पत्ति भी उसी प्रजापति के यज्ञ में हुई । मित्रावरुण देवताओं के साथ विराट् छन्द शोभा बढा रहा था, अर्थात् विराट् छन्द के साथ मित्रावरुण देवता प्रजापति से ही पैदा हुए थे । इस यज्ञ में तीन सवन वाले दिन का एक भाग माध्यन्दिन सवन और त्रिष्टुप् छन्द के आश्रित थे, अर्थात् माध्यन्दिन सवन, त्रिष्टम् छन्द और इन्द्र इन सबकी उत्पत्ति भी प्रजापति से ही हुई थी । तैत्तिरीय श्रुति मे भी इसका वर्णन मिलता है । तथा १६६
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वेदार्थ पारिजातः १३२२ भागो मध्यन्दिनसवनाख्योऽशः त्रिष्टुपछन्दश्च इन्द्रस्याभिश्रयणीयौ आस्ताम् । अर्थान्मध्यन्दिनसवनेन त्रिष्टुप्छन्दसा सार्धंमिन्द्रश्च प्रजापतेः सकाशादुत्पन्न: ।' 'उरसो बाहुन्या पञ्चदशं निरमिमीत तमिन्द्रो देवतान्वसृज्यत त्रिष्टुप्छन्दो बृहत्साम' ( तै ० स० ७ १।१।४ ) इति श्रुतेः । तथा विश्वान् सर्वान् देवान् जगतोच्छन्द आविवेश प्रविष्टवती विश्वेदेवा जगतो च प्रजापतेरजायन्तेत्यर्थ ।' त विश्वेदेवा अन्वसृज्यन्त जगती छन्दो वैरूप साम' ( तै ० स० ७| १ | १| ५) इति श्रुते · । एवमुक्तेन प्रकारेण प्रतिमा कासीत् छन्दः किमासीत् प्रउग किमुक्थमिति त्रयाणां प्रश्नानामुत्तर जातम् । '. आज्यं किमासोत् परिधि क आसोदित्यनयोरुत्तरं देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासदाज्य ग्रीष्म इध्म शरद्धविः । सप्तास्यासन् परिघयस्त्रिःसप्त समिधः कृताः ॥ ' इति पुरुषसूक्तमन्त्रैरुक्तम् । तदर्थस्तु सर्वरसोत्पादको वसन्तः, तस्य जगत्सर्जनसाधनस्य यज्ञस्य आज्य हविरासोत् । आज्यदध्यादिभी रसैः सार्धं वसन्तोऽजायत । सर्वरसानां शोषको ग्रीष्म ऋतुरिष्म आसीत् । शुष्कैः काष्ठैः सार्धं ग्रीष्मोऽजायत । तथा पच्यमानव्रीहियुक्तः शरदृतुरस्य यज्ञस्य हविरासीत् । सप्त छन्दासि त्रिःसप्तैकविंशतिधा भूत्वा अष्टादश समिघः त्रयः परिधयश्चासन् । आसीत्प्रमा किं निदानमित्यनयोरपि प्रश्नयोरुत्तरम् -' पूर्वे विश्वसृजोऽमृताः शतं वर्षाणि दीक्षिताः सत्र- मासत । एतेन वै विश्वसृज इदं विश्वमसृजन्त' ( तै ० ब्रा ० ३।१२।९ ।२ ) इत्यत्रोक्तम् । अतस्तस्य यज्ञस्य सहस्र संवत्सर-परिमितः कालः प्रमाणम् इयत्ता वा । विश्वस्य जगतः सर्जनमादिकारणं प्रवर्तक फलम् । अर्थाद् यदा विश्वसृजो देवा देवं प्रजापति विश्वसृजामयनाख्येन यागेनायजन् तदोक्ताः सर्वयागोपकरणाः प्रजापतेः सकाशादजायन्त, अग्न्यादिदेवताभिः सह गायत्र्यादीनां छन्दसा तत एव जातत्वात् । तत एव तेषा छन्दसामग्न्यादयो देवता इत्यपि छन्दोविचितौ सूचितम् । विश्वेदेवो का अनुगमन जगती छन्द ने किया, अर्थात् विश्वेदेवो के साथ जगती छन्द भी उसी प्रजापति से पैदा हुए । 'उसके बाद विश्वेदेवो की सृष्टि की गई, साथ हीं जगती छन्द की भी' ऐसा तैत्तिरीय संहिता मे भी कहा गया है । इस तरह से उक्त दो मन्त्रो मे इन तीन प्रश्नो का उत्तर हो गया कि प्रतिमा छन्द और प्रउग उक्य क्या थे? आज्य क्या था? परिधियां क्या थी? इन दोनो प्रश्नो का उत्तर 'देवा यज्ञमतन्वत' इत्यादि पुरुष सूक्त के मन्त्रो के द्वारा दिया गया है । इस मन्त्र का अर्थ इस तरह से होगा------- सभी तरह के रसो का उत्पादक वसन्त उस जगत् की सृष्टि के साधनभूत यज्ञ का आज्य, अर्थात् हवि था । अर्थात् घृत, दही आदि रसमय पदार्थों के साथ वसन्त पैदा हुआ । इन सभी प्रकार के रसो का शोषक सुखा देने वाला ग्रीष्म ऋतु इस यज्ञ का दृश्य ( काष्ठ ) था, अर्थात् सूखी यज्ञीय लकडियो के साथ ग्रीष्म ऋतु भी इसी यज्ञ से पैदा हुआ । तथा पके हुए अनाज के साथ विद्यमान शरद् ऋतु इस यज्ञ का हवि था । सात, छन्द तिगुने होकर अर्थात् इक्कीस भेदों में विभक्त होकर १८ समिधाएँ और तीन परिधियाँ बन गई । प्रमा क्या थी और निदान क्या था? इन दोनो प्रश्नो का भी उत्तर पूर्वे विश्वसृजो० ' इत्यादि मन्त्र मे दिया गया है । तैत्तिरीय ब्राह्मण के इस वचन का अभिप्राय है कि 'पहले के जगत् की सृष्टि करने वाले देवगण यज्ञीय दीक्षा ग्रहण कर सौ वर्ष तक यज्ञ करते रहे । इसी मन्त्र की सहायता से उन्होने इस विश्व की रचना की । इसलिए यह सौ वर्ष का काल ही इस यज्ञ का प्रमाण या इयत्ता है, अर्थात् इतने समय में यह पूरा होता है । सारे जगत् की सृष्टि करना ही इस यज्ञ मे देवताओं के प्रवृत्त होने का प्रथम कारण है और यही इसका फल भी है । अर्थात् जब विश्व की सृष्टि करने में लगे हुए देवगण विश्व के आदिकारण प्रजापति का अयनाख्य याग के द्वारा यजन करने लगे, तो उस समय ये सब याग के उपकरण उस प्रजापति से ही विभिन्न प्रकारों से उत्पन्न हुए । क्योकि ऊपर बताई गई पद्धति से अग्नि प्रभृति देवताओ के साथ गायत्री प्रभृति छन्द उस प्रजापति से ही पैदा हुए है । उन-उन देवताओ के साथ पैदा होने के दो कारण उन उन छन्दो के ही देवता छन्दोविचिति मे बताये गये हैं, जिनके साथ कि ये छन्द पैदा
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वेदार्थपारिजात । १३२३ 'अग्निः सविता मोमो बृहस्पतिमित्रावरुणाविन्द्रो विश्वेदेवा देवता ' ((पिङ्गलसूत्र ३ | ६३ ) एव प्राजापत्यो यज्ञो- ऽनुष्ठित ' । तेन यज्ञेन ऋषयो मनुष्या चाक्लृप्रे चक्लृपिरे क्लृप्ता सृष्टा आसन् । तेनैव यज्ञेन सर्वं जगद् असृजन्नित्यर्थः । अयमेव प्रामाणिक प्रासङ्गिकश्च मन्त्रार्थो सायणादिभिराचायेंरुक्त । ईश्वरस्तुतिप्रार्थना ' अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचनासमर्पणोपासनाविद्याविषयः ' इति प्रलम्वमानशीर्षकेण प्रार्थनायाचनयोर्भेदो- ऽङ्गीकृतः, स च निर्मूल एव, अर्थ- याचधात्वोरेकार्थ्यात् । ग्रन्थादौ निरूप्यमाणे प्रार्थनाविषये कुतो नैतद् व्यवस्था- पितम्? प्रार्थनाप्रसङ्गे च 'तेजोऽसि तेजो मयि घेहि वोयंमसि वीर्य मयि घेहि वलमसि वल मयि घेहि ओजोस्पोजो मयि धेहि मन्युरसि मन्यु मयि घेहि सहोसि सहो मयि घेहि' ( वा० स ० १ ९ / ९ ), 'मयोदमिन्द्र इन्द्रिय दधात्वस्मान् रायो मघवा नः सचन्ताम् ॥ ' ( वा० स० २।१० ) अस्माक सन्त्विति शेषः । 'या मेधा पितृगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेघयाग्ने मेधाविन कुरु || ' ( वा० स ० ३२ । १४ ) एतेषा मन्त्राणा कल्पनाबहुलो गौण एवार्थ प्रतिपादितः, मूलार्थाद्विप्रकृष्टत्वात् । 'गोधूमकुवलचूर्णानि चावपति तेजोऽसीति' ( का ० श्री० सू० १६।२।१६ ) इति सूत्रानुसारेण आश्विन- ग्रहणानन्तर सादनात् प्राग् द्वे दर्भतृणे प्रागग्रे पात्रोपरि कृत्वा गोधूमकुवलयाश्चूर्णानि सहैव क्षिपति | कुबल स्थूल- वदरीफलम् । अत्र कण्डिकाया त्रीणि यजूषि पयोदेवत्यानि, आद्य यजुर्बृहती । हे पयः, त्वं तेजोऽसि । अतो तेजो मयि . घेहि स्थापय । अत्रापि पय पदेन तदधिष्ठातृविशिष्टैश्वयदेवतस्य प्रार्थनम् । देवताना च परमेश्वराभिन्नत्वात् परमात्मप्रार्थनापि नानुपपन्ना । यो यदात्मकः स तत्र प्रार्थ्यते । अनन्तविद्यादिगुणैः प्रकाशमयोऽसि मय्यप्यसख्यात हुए है । जैसा कि पिंगल सूत्र के ' अग्निः सविता ' इस सूत्र मे बताया है । इस तरह से यह प्राजापत्य यज्ञ सपन्न किया गया । इस यज्ञ की सहायता से ऋषियो और मुनियो को सृष्टि हुई । इसी यज्ञ को महायता से देवताओ ने सारे जगत् की सृष्टि की । यही अर्थ प्रामाणिक है और प्रसङ्ग के अनुकूल भी है, जो कि सायण प्रभृति महान् भारतीय वैदिक विद्वानो के द्वारा परम्परागत पद्धति से किया गया है । ईश्वर स्तुति प्रार्थना विचार इस प्रकरण का 'ईश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचनासमर्पणोपासना विद्याविषय' इतना लम्बः शीर्षक देकर दयानन्द ने प्रार्थना और याचना मे भेद किया है । यह सर्वथा निराधार है, क्योकि अर्थ और याच् दोनो धातुओ का अर्थ एक ही है । ग्रन्थ के प्रारम्भ में, जहाँ लेखक ने प्रार्थना शब्द पर विचार किया, वहाँ इस बात को क्यो नही बताया गया? प्रार्थना शब्द का विचार करते हुए दयानन्द ने 'तेजोऽसि ', ' मयोदमिन्द्र', 'या मेधा' ये तीन मन्त्र उद्धृत किये हैं और इनका कल्पित गौण अर्थ किया है, जिसकी कि मूल मन्त्र के वास्तविक अर्थ से बहुत दूरी है । 'गोधूम ' इत्यादि कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार आश्विन पात्र को लेकर, सादन क्रिया के पूर्व दिशा मे अग्र भाग वाले दो दर्भों को रखकर उन सब पर गोधूम ( गेहूँ ) और कुबल के चूर्ण को एक साथ जब छिड़का जाता है, तभी 'तेजोऽसि' इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये । बडे वेर को कुवल कहा जाता है । इस कणिका में तीन यजुर्मन्त्र है और इनके देवता जल है । स्थापना करो, मुझे तेजस्वी बनाओ । यहाँपहला मन्त्र वृहती छन्द में निबद्ध है । हे जल, तुम तेज हो, इसलिए मुझमें तेज की , अतः यहाँपय शब्द से उसके अधिष्ठाता विशिष्ट ऐश्वर्यवाले देवता की प्रार्थना की जाती है । सभी देवता परमेश्वर से अभिन्न है परमेश्वर की प्रार्थना मान लेने में भी कोई हानि नही है । जो देवता जिस रूप में होता है, उसकी उसी रूप में प्रार्थना की जाती है । ''हे परमेश्वर, तुम अनन्त विद्या आदि गुणो से प्रकाशमय हो, अतः मुझमें, मेरे हृदय में भी कृपा कर विज्ञान रूप प्रकाश कीजिये
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वेदार्थपारिजातः १३२४ तेजो विज्ञान घेहीति गौणार्थ एव । 'उपवाकवदरचूर्णानि च वीर्यमसि' (का० श्रो० सू० १ ९ | २| १७ ) इत्यनुसारेण उपवाका इन्द्रयवाः । वदर सूक्ष्मवदरीफलम् । तयोश्चूर्णानि सारस्वते पयोग्रहे निर्वपेत् । तथाच हे ग्रह, त्व वीर्यमसि अतो वीर्य मयि धेहि, वीर्य सामर्थ्यम् । अनन्तपराक्रमवानसि कृपया मय्यपि शरीरबुद्धिशौयंस्फूर्त्यादिवीर्यं पराक्रमं मयि घेहीति तु वेदार्थबाह्यमेव, शरीरबुद्धिपदवैयथ्यं च । वीर्यपदस्य सामर्थ्यपरत्वात् । 'यवकर्कन्धुचूर्णानि च बलमसीति' (का० श्री० सू० १ ९ ।२।१ ९ ) । यवः प्रसिद्धः, कर्कन्धुरतिस्थूल बदरफलम्, तयोश्चूर्णानि पयोग्रहे क्षिपेदिति सूत्रार्थः । हे ग्रह, तदभिन्नपरमेश्वर, त्वं बलमसि निरतिशयबलरूपमेवासि मयि बलमुत्तमं घेहि । बलहेतुरष्टमो धातुर्वल- मुच्यते । 'सुराग्रहान् श्रीणात्योजोऽसीति वृकव्याघ्रसिंहलोमभिः प्रतिमन्त्र मिश्ररेके यथासख्यम्' ( का ० श्रौ० सू० १ ९।२।२२-२३ ) इति कात्यायनरीत्या वृकादीनां मिश्रः केशैरोजोसीति प्रतिमन्त्रं सुराग्रहान् मिश्रयेत् । ओजोसीत्या-श्विनं मन्युरसीति सारस्वत सहोसीत्यैन्द्रम् । एके वृकादिकेशैर्यथासख्य ग्रहं मिश्रयन्ति । अर्थाद् वृककेशराश्विनम् वैयाघ्रः सारस्वतम् सिहैरैन्द्रम् । त्रीणि यजूषि सुरादेवत्यानि । हे सुरे, सुराधिष्ठातृदेवत, तन्मूलभूत परदेव, ओजः कान्तिरुपोऽसि अतो मयि ओज: कान्ति घेहि । मन्युरसि मानसं प्रज्वलन कोपोऽसि तादृशं मन्युं कोपं मयि घेहि । नहि निरुपाधिकस्य स्वप्रकाशचैतन्यरूपस्य भगवतः कोपरूपत्वम् 1। सोपाधिकस्य तु तस्य तन्नासम्भवि, प्रह्लादोद्धरणाय नृसिंहरूपेण भगवतो मन्युरूपेणाविर्भावस्मरणात् । सहोऽसि सहः शारीर बलं सपत्नाभिभवितृत्वं वा । 'महद् भयं वज्रमुद्यतम्' ( क० उ ० २।३।२ ) इति परमेश्वरस्यैतन्मुख्यमतो मयि सहो घेहि । एवं परमात्मस्तुतिप्रार्थनाप्रतिपादकस्यापि मन्त्रस्य विनियोगानुसारेण तत्तदुपहितपरमात्मन उपाविभेदेनोपहितस्वरूपभेदाद् अभ्यर्थनाभेद उपपद्यते । ब्राह्मण- सूत्रादिविहितगोधूमकुवलकादिद्रव्याणि तत्सूचिताः शक्तिविशेषाश्चोपाधयः । (पृ० १६८ ) इस तरह का अर्थ गोणी वृत्ति से ही मिल सकता है । कात्यायन श्रौतसूत्र में ही बताया है कि 'वीर्यमसि' इस मन्त्र कल्प का उच्चारण करते हुए सारस्वत पात्र पर उपवाक और वदर के चूर्ण का छिड़काव किया जाता है । उपवाक इन्द्रयव और वदर छोटे बेर को कहते है । इस तरह से इसका अर्थ होता है - हे ग्रह, तुम वीर्य हो, अतः मुझमें वीर्य की प्रतिष्ठा करो । वीर्य कहते हैं सामर्थ्य को । 'आप अनन्त पराक्रम वाले हैं, अतः कृपा कर मुझे भी शरीर, बुद्धि, शौर्य, स्फूर्ति आदि पूर्ण पराक्रम दीजिये ' (पृ ० १६८- १६ ९ ) इस तरह का अर्थ मन्त्र के पदो से नही निकलता । इस अर्थ में शरीर और बुद्धि का उल्लेख करना व्यर्थ ही है, क्योकि वीर्य तो सामर्थ्य को कहते हैं । कात्यायन श्रौतसूत्र में ' बलमसि' मन्त्रपद का भी विनियोग बताया है । यव ( जो ) और कर्कन्धू ( बहुत बड़ा वेर) इन दोनो के चूर्ण का पयोदेवता वाले पात्र पर इस मन्त्र का उच्चारण कर छिडकाव किया जाता है । 'हे ग्रह के अधिष्ठाता परमेश्वर, आप निरतिशय बलशाली है, इसलिये आप मुझमें उत्तम बल का आधान कीजिये । इस बल का कारण आठवां धातु बल कहलाता है । ' सुराग्रहान्' इस कात्यायन के सूत्र के अनुसार वृक, बाघ और सिंह के मिले-जुले केशो से ' ओजोऽसि ' इत्यादि मन्त्रांश का उच्चारण करते हुए सुरापात्रो का मिश्रण कर दे । 'ओजोऽसि ' इससे आश्विन पात्र का, ' मन्युरसि' से सारस्वत पात्र का और ' सहोऽसि ' से ऐन्द्र पात्र का यथाक्रम वृक, व्याघ्र और सिंह के केशो से मिश्रण किया जाय, ऐसा कुछ आचार्यों का कथन है । इन तीनो यजुर्मन्त्राशो की देवता सुरा है । हे सुरे, सुरा की अधिष्ठातृ देवते, आप का मूल भूत देवता कान्तिमय है, अतः आप मुझे कान्ति से पूर्ण कर दीजिये । आप मन्धु अर्थात् मानस कोपमय अग्नि है, इसलिये इस सात्त्विक कोप से आप मुझे भर दीजिये । यहाँ यदि परमेश्वर को निरुपाधिक स्वप्रकाशमय माना जाय तो उसमे लोप की सत्ता नही बन सकती । जब हम सोपाधिक परमेश्वर को मान्यता दें, तभी यह संभव हो सकता है, क्योकि सोपाधिक रूप में हो भगवान् अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिये नृसिंह रूप धारण अपना मन्यु रूप गुण प्रकट करते है । सह शब्द का अर्थ शारीरिक बल अथवा शत्रु को अभिभूत कर देने वाली शक्ति होता है । यह बल ' महद्भयं वज्रमुद्यतम्' इस कारक श्रुति के अनुसार मुख्यतया परमेश्वर में ही है । उसी परमेश्वर बल की प्राप्ति के लिये यहाँ तदधिष्ठान पात्र से प्रार्थना की जाती है । इस तरह से परमात्मा की स्तुति और प्रार्थना के प्रतिपादक मन्त्र का भी विनियोग के अनुसार उपाविभेद से उपहित के स्वरूप के भेद मानकर अलग-अलग प्रार्थनायें उन-उन औपाधिक स्वरूपो से की जा सकती है । ब्राह्मण और श्रोतसूत्रो मे प्रतिपादित कुवलक प्रभृति द्रव्य और उन तेज आदि पदो से सूचित होने वाली शक्तियाँ, ये सब उपाधि के ही भेद हैं ।
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वेदार्थपारिजातः १३२५ इन्द्रः परमश्वर इदमिन्द्रियं मयि दधातु । इदमस्मदपेक्षित वीर्यमपि स्थापयन् रायो धनानि देवमानुष- भेदेन द्विविधानि मघवानो धनवन्तश्च मा सचन्ताम् । किञ्चास्माकमाशिषोऽभीष्टशंसनानि सन्तु ताश्च सत्या अवि- तथाः सन्तु । श्रोत्रादिक मनश्च सर्वोत्तम सर्वोत्तमैः पदार्थः सह वर्तमानान् अस्मान् सदा कृपया करोत्वित्यादिकं तु वेदार्थबाह्यमेव । मघवेत्यर्थस्तु इन्द्रपदेन गतार्थ एव, तस्मान्नानाविधानि दैवमानुषवित्तानि धनवन्तश्चास्मान् सेवन्ता- मित्येवार्थः । हे अग्ने, अग्रणीत्वादिविशिष्टदेवविशेष, अग्निरूपधारिन् परमेश्वर, या मेघां धारणाशक्तिमती बुद्धिम् इन्द्रादयः प्रसिद्धा देवाः पितरोऽग्निष्वात्तादय उपासनैः पूजयन्ति तथा तादृश्या मेघया प्रशस्तमेघया मामद्य वर्तमान- जन्मभ्येव न कालान्तरे मेधाविन कुरु, देवपितृपूज्यबुद्धिरस्माकमस्त्विति यावत् । स्वाहा सुहुतमस्तु | 'स्वाहुतं हविर्जुहोतोति वा' ( नि० ८२) । यत्तु स्वाहाकृतयः स्वाहेत्येतत् सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्व प्राहेति वा' इत्यादिनिरुक्तवचनान्या- श्रित्य कल्याणकरप्रियभाषणे या ज्ञानमध्ये स्वकीया वाग्वर्तते सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्, स्वकीयपदार्थं प्रत्येव स्वत्व वाच्यम्, न परपदार्थं प्रति चेति' ( पृ ० १६१ ) इत्यादिकम्, तत्त्वविचारितरमणीयमेव, प्रियभाषणादी लोके स्वाहाशब्दाप्रयोगात् । स्ववागुक्त्यसारेण सदा वागिन्द्रियेण वक्तव्यमिति तु निरर्थकं वचनम् ॥ वाचोवदनक्रियायाः करणत्वात्, कर्तृत्वस्य वक्तृनिष्ठत्वाच्च । वागुक्तिर्वाचानुसरणीयेत्यपार्थ कमेव | स्वपदार्थं प्रत्येव स्वत्व वाच्यमिति स्वाहापदार्थोऽपि न युक्तः, तथा प्रयोगादर्शनात् । इन्द्र अर्थात् परमात्मा मुझमें इन्द्रिय का आधान करे, अर्थात् हमारे लिये अपेक्षित वीर्य की स्थापना करे । साथ ही देव और मनुष्य के रूप में विद्यमान सहायक भी मुझे दे, जो कि मेरे लिये यह धरोहर है । साथ ही वह इन्द्र हमें इस प्रकार की शुभाशसा से युक्त करे, जो कि सदा सच ही होने वालो हो, कभी मिथ्या न होने पावे । 'श्रोत्र प्रभृति उत्तम इन्द्रियो और श्रेष्ठ स्वभाव वाले मन को मुझमें स्थिर कीजिये' (पृ० १६ ९ ) इस तरह का अर्थ मन्त्राक्षरो से निकलता ही नही । मघवा शब्द का अर्थ भी यदि इन्द्र ही किया जाय, तो यह अर्थ तो इन्द्र पद से भी मिल जाता है3, तब वह व्यर्थ हो जायगा । इसलिये मघवा पद का यहाँ नाना प्रकार का देव संबन्धी और मानुष संबन्धी धन हमें प्राप्त हो, यही अर्थ ठीक माना जायगा । हे अग्ने, सब देवताओ के आगे चलने वाली विशेष शक्ति से संपन्न अग्निरूपधारी परमेश्वर, जिस मेघा धारणा शक्ति वाली बुद्धि को इन्द्र प्रभृति प्रसिद्ध देवता और अग्निष्वात्त प्रभृति पितृगण आपकी उपासना करके प्राप्त करते है, उस प्रशस्त मेघा से आप मुझे इस जन्म में संयुक्त कर दीजिये, मुझे इसके लिये अधिक काल की प्रतीक्षा न करनी पडे । इसका अभिप्राय यह है कि देवताओ और पितृगणों के प्रति हममे पूज्य बुद्धि उत्पन्न हो । स्वाहा का अर्थ है मेरी यह आहुति शुभ फल देने वाली हो । निरुक्त के अनुसार इसका यही अर्थ होता है । स्वामी दयानन्द ने ' स्वाहाकृतय ' इत्यादि निरुक्त के वचन को उद्धृत करते हुए लिखा है कि 'इस शब्द का अर्थ freeaकार यास्क मुनि जी ने अनेक प्रकार से कहा है, सो लिखते है- ( सु आहेति वा ) सब मनुष्यों को अच्छा, मोठा, कल्याण करनेवाला और प्रिय वचन सदा बोलना चाहिये । (स्वा बागाहेति वा ) अर्थात् मनुष्यों को यह निश्चय करके जानना चाहिये कि जैसी बात उनके ज्ञान के बोच मे वर्तमान हो, जीभ से भी सदा वैसा हो बोले, उनसे विपरीत नही । (स्वं प्रादेति वा ) सब मनुष्य अपने ही पदार्थ को अपना कहे, दूसरे के पदार्थ को कभी नही । अर्थात् जितना जितना धर्मयुक्त पुरुषार्थ से उनको पदार्थ प्राप्त हो, उतने मे ही सदा सन्तोष करें । (स्वाहुतं ह० ) अर्थात् सब दिन अच्छी प्रकार सुगन्ध आदि द्रव्यो का संस्कार करके सब जगत् के उपकार करने वाले होम को किया करें | स्वाहा शब्द का यह भी अर्थ है कि सब दिन मिथ्यावाद को छोड़ के सत्य ही बोलना चाहिये ' (पृ० १६ ९-१७० ) यह सारा कथन अविचारित रमणीय है, प्रिय भाषण आदि अर्थ में लोक में स्वाहा शब्द का प्रयोग कही देखा नही जाता । 'जैसी बात उनके ज्ञान के बीच में वर्तमान हो, जीभ से भी सदा वैसी ही बोलें, यह कहना सर्वथा निरर्थक है, क्योंकि वागिन्द्रिय तो वदन क्रिया
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१३२६ वेदार्थपारिजातः तदेतदसकृदुक्तम् - ये शब्दा यस्मिन्नर्थे प्रसिद्धा निर्वचनेन त एव तदर्थत्वेन निरुच्यन्ते । प्रकृते देवताभ्य आहुतिप्रदाने स्वाहाशब्द' प्रवर्तते । यास्काचार्योऽपि 'वनस्पते रशनया नियय पिष्टतमया वयुनानि विद्वान् । वह देवत्रा दिधिषो हवीषि प्र च दातारममृतेषु वोचः ||' ( मै० स ० ४।१३।७ ) इति व्याचक्षाण आह— 'वनस्पते रशनया नियूय सुरूपतमया वयुनानि विद्वान् । प्रज्ञानानि प्रजानन् वह अनुत्थिते त्वयि नेतान्युह्यन्त इति त्वमेवैषा वोढेति । देवान् यज्ञे दातु हवीषि प्रब्रूहि च दातारममृतेषु देवेषु स्वाहाकृतय. ' इति । तदर्थस्त्वित्थम्- हे वनस्पते यूप, पिष्टतमया- ऽत्यन्तदृढया रशनया नियूय अप्रध्वसनाय निबद्धय वयुनानि स्वाधिकारयुक्तानि प्रज्ञानान्यस्मदुपकाराय विद्वान् जानानो वह, ' यूपेन वा आहुतयः स्वर्गं लोकं यन्ति' ( मं० स ०४१८१८) इति श्रुते । एतान्यस्मत्प्रत्तानि हवींषि, अस्य दिधिषा- र्दातुर्यजमानस्याभिमतफलप्राप्तये देवत्रा देवान् प्रति प्रदातारममृतेषु वोचः कथयस्व । एनं दातारममृतेषु देवेष्वमुना यजमानेन एतानि हवीषि प्रत्तानि । अत्र यूपान्तर्गतोऽग्निरेव वनस्पतिशब्देन सम्बोध्यते, 'एष हि वनाना पाता पालयिता वा' ( नि ० ८1३ ) इति निरुक्तवचनात् । यस्मादन्तर्गतो बनाना वनानि न दहति तस्मादेष वनस्पतिः । काः पुनस्ता. स्वाहाकृतयः? या यागार्थमाहूयोत्तमे प्रयाजे स्वाहाकारेण सक्रियन्ते ताः स्वाहाकृतय., 'स्वाहाकृत हविरदन्तु देवाः' ( ऋ ० स ० १०।११०।११ ) इति मन्त्रवर्णात् । अथ स्वाहा इत्येतत् कस्मात्? सुष्ठु आह - यदेव सम्प्रदानदेवतायै किञ्चिदाज्यस्येत्यनेन मन्त्रेणाह- तुभ्यमिदमिति तदेव सु आह शोभनमाह । सुः पूर्वपदम् आह उत्तरपदम् । यद्वा ब्राह्मणानुसारि अन्यन्निर्वचनम्, 'स्वा वागाहेति त स्वा वागभ्यवदत् जुहुधोति तत् स्वाहाकारस्य जन्म' ( मं ० स ० १ | ८ | १ ) | एभिः प्रमाणैर्होमकरणार्थ एव स्वाहाशब्दस्य प्रवृत्तिः समध्यंते । अत्र स्वः शब्दः पूर्वपदम् आहेत्युत्तरपदम् । अथवा- स्व प्राहेति । तत्र स्वा बागाहेति कर्तरि स्व वागाहेति कर्मणि । प्रपद तूत्कर्षद्योतनाय । प्राणसवादेषु यथा वागादीन्द्रियाणां की साधन है और वक्तृत्व वक्ता का धर्म है । वागिन्द्रिय को वाणी का अनुसरण करना चाहिये, यह कहना भी गलत है । सब मनुष्य अपने पदार्थ को ही अपना कहे यह भी स्वाहा पद का अर्थ नही हो सकता, क्योकि ऐसा प्रयोग देखा नही जाता । यह बात हम अनेक बार बता चुके है कि जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध है, निर्वचन से भी उन्ही अर्थों की प्रतीति होती है, अपने मनमाने निर्वचन के आधार पर उसका एकदम नया अर्थ नही किया जा सकता । स्वाहा शब्द का प्रयोग देवताओं के प्रति आहुति देने में किया जाता है । यास्काचार्य भी 'वनस्पते ० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि 'हे वनस्पते यूप, तुम मजबूत रस्सी से बांधकर, जिससे कि वे छटक कर गिर न जाय 1 अपने अधिकार में स्थित प्रज्ञान को हमारे कल्याण के लिए ढोकर ले आओ । मैत्रायणी सहिता में यह बताया गया है कि यूप की सहायता से ही आहुतियाँ स्वर्गलोक तक पहुँचती है । हमारे द्वारा दी गई ये आहुतियां इन आहुतियो को देने वाले यजमान की अभीष्ट सिद्ध करें, इसके लिये आप जिन देवो के लिये ये दी गई है, उनसे कहिये । अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिये ही इन देवताओ को यजमान ने ये आहुतियाँ दी है । यहाँ यूप में निवास करने वाला अग्नि क्योकि, वनस्पति पद से संबोधित है । निरुक्त मे इसकी निरुक्ति इस तरह से की गई है कि वनो मे यह अग्नि ही उनका रक्षक है हो जब बन में रहकर यह अग्नि उनको जलाता नही, तभी वहाँ के वृक्ष -वनस्पति बच सकते है । स्वाहाकार शब्द से क्या जाना उन आहुतियो की स्वाहाकार के द्वारा हवि दी जाती है, जो कि आह्वान पूर्वक उत्तम प्रयाज में याग के निमित्त संस्कृत की जाताजाती हैहै?। ऋग्वेद के मन्त्र मे बताया गया है कि स्वाहाकार के उच्चारण पूर्वक दी गई है हवि को देवगण स्वीकार करें । 'स्वाहा' यह शब्द कैसे बनता है? यह शब्द बनता है सुष्ठु ( शोभन ) अर्थ को बताने वाले उपसर्ग के साथ वच धातु के संयोग से, 'तुमको मैं यह हवि , ' ' 'इस तरह से देवता को आज्य आदि की हवि देने के लिये जो शब्द कहता है उसी को शोभन कहा कहा जाता है । इसमें पूर्व देता हूँ और उत्तर में 'आह' पद होता है । अथवा ब्राह्मण के अनुसार इसकी दूसरी निरुक्ति इस तरह से होगी -'अपनी वाणी बोलीमें, ' सुउसको' पद अपनी वाणी ने ही उत्तर दिया कि तुम आहुति दो, इसीसे स्वाहाकार का जन्म हुआ । इन सब प्रमाणो से यह सिद्ध है कि हवि ' ', ' ' ' 'क निमित्त हो स्वाहा शब्द की प्रवृत्ति हुई है । इस निर्वचन में स्व शब्द पूर्व पद है और आह उत्तर पद । अथवा देने इसमें माने जायें । इनमें 'स्वा वागाह' यह कर्तृवाच्य प्रयोग है और स्वं वागाह कर्मवाच्य । इसमें 'प्र' पद उत्कर्ष का द्योतकस्वं प्राह ये है ।
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वेदार्थपारिजाता १३२७ सवाद. काल्पनिक, तदधिष्ठातृदेवकर्तृको वा, तथैव प्रकृतेऽपि वाचो वदनकर्तृत्व ज्ञेयम् । सामाजिकमते तु तन्नोपपद्यते, तैर्मनुष्यातिरिक्तदेवतानङ्गीकारात् ॥ स्व प्राहेत्यत्रापि श्रुत्यनुसारेण जुहुधीत्येवाध्याहर्तव्यम् । स्वाहुत हविर्जुहोतीति यदनेनैव हविर्जुषतीति । तदेव सुष्ठवापाद्य यथाभिधानमग्नौ जुहोति । तासा स्वाहाकृतीनामेषा वक्ष्यमाणा ऋग्बोधिका- 'सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत् पुरोगाः । अस्य होतु प्रदिश्यतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः ॥' तदर्थमपि यास्क आह-'योऽयमग्नि. सद्योजातो जायमानोऽनन्तरमेव यज्ञ व्यमिमीत निवर्तयति । यश्व जायमान एव देवाना पुरोगा' पुरोगामी प्राधान्यमुपगतः । तस्य होतुर्देवानामाह्वातु प्रदिशि प्रकृष्टदिशि प्राच्यामृतस्य गतस्य प्रणीतस्योत्तरवेदि- कत्वेन वाचि आस्ये स्वाहाकृत स्वाहाकारवता मन्त्रेण प्रक्षिप्त हविर् एतदाज्य तन्मुखेन अदन्तु पिबन्तु देवा ' इति दुर्गाचार्यसम्मत व्याख्यानम्, तस्मान्निरुक्तव्याजेन स्वाहेत्यस्य मुधैवार्थान्तरकरणम् । 'स्थिरा व सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे । युष्माकमस्तु तविषी पनीयमी मा मर्त्यस्य मायिन. ॥ ' (ऋ० स० १।३ ९।२ ) । ' इषे पिन्वस्वोर्जे पिन्वस्व ब्रह्मणे पिन्वस्य क्षत्राय पिन्वस्व द्यावापृथिवीभ्या पिन्वस्व । धर्मासि सुधर्मा मेन्यस्मे नृम्णानि धारय ब्रह्मधारय क्षेत्र धारय विश धारय' (वा० सं ० ३८। १४) । ' यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैव तदु सुप्तस्य तथैवैति । दूर गम ज्योतिपा ज्योतिरेक तन्मे मन. शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ ' (वा ० सं ० ३४| १ ) । ' वाजश्च मे प्रसवश्च मे प्रयतिश्च मे प्रसितिश्च मे धीतिश्च मे क्रतुश्च में' ( वा० सं ० १८1१ ) इत्येषामपि मन्त्राणामय शुद्धोऽर्थः, तदुक्तस्यासगतत्वात् । ,, ' प्र यदित्था इति दशर्च सूक्त घोरपुत्रस्य कण्वस्यार्षं मरुद्देवताकम् तस्मादत्र मरुत एव सम्बोध्या प्रयद्दश-प्रगाथ तु' इत्यनुक्रमणिकावचनात् । हे मरुतः, आयुधा युष्माकमायुधानि पराणुदे शत्रूणामपनोदनाय पराजयाय स्थिराः स्थिराणि सन्तु । उत अपि च प्रतिष्कम्भे शत्रूणा प्रतिबन्धाय स्तम्भनाय बीळू दृढानि सन्तु । युष्माक तविषी बलं पनीयसी प्राणो के परस्पर संवाद मे जैसे वाणी आदि इन्द्रियो का सवाद काल्पनिक, अथवा उन-उन इन्द्रियो के अधिष्ठाता देवताओ का माना जाता है, उसी तरह से प्रकृत में भी वाणी को वच् धातु का कर्ता जानना चाहिये | आर्य समाजियो के मत में यह संभव नही हो सकता, क्योकि वे मनुष्यों से भिन्न देवता की सत्ता नही मानते । 'स्वं प्राह' इस निर्वचन में भी श्रुति के प्रमाण के अनुसार जुहुधि' (हवि प्रदान करो ) इसी का अध्याहार करना चाहिये ।' ' स्वाहुतं हविर्जुहोति' इसका अर्थ यह है कि स्वाहा शब्द का उच्चारण करके ही हवि प्रदान करता है । उस हवि को इस स्वाहाकार के उच्चारण के साथ जो यह प्रदान करता है, यही इस हवि के प्रदान की सुन्दर पद्धति है । निरुक्तकार ने इस विषय में ' सद्यो जातो' इत्यादि ऋड्मन्त्र जो उद्धृत कर उसका इस तरह से अर्थ किया है-यह तुरन्त उत्पन्न हुमा अग्नि उत्पन्न होने के साथ ही यज्ञ का संपादन करने लगता है । यही अग्नि उत्पन्न होने के साथ ही देवताओ में अपनी प्रधानता स्थापित कर लेता है, देवताओ को बुला कर ले आने वाले उस अग्नि के सब दिशाओ में उत्कृष्ठ प्राची दिशा मे विद्यमान उत्तर वेदि में विधिवत् प्रदत्त मुख मे स्वाहाकार से युक्त मन्त्र से दी गई इस घृत आदि द्रव्यो से बनी हवि को सभी देवगण उस अग्नि के मुख से हो भक्षण करे, स्वीकार करें । दुर्गाचार्य ने इसी बात को विस्तार से समझाया है । इसलिये निरुक्त का सहारा लेकर दयानन्द का 'स्वाहा' शब्द का अन्यथा अर्थ करना व्यर्थ हो जाता है, क्योकि ऊपर बताई पद्धति से निरुक्त की सहायता से उसके विपरीत हो अर्थ निकलता है । निरुक्त के उक्त उद्धृत प्रमाण से दयानन्द की बात सिद्ध नही होने पाती । इसके आगे दयानन्द ने ' स्थिरा वः', ' इषे पिन्वस्यो० ' 'यज्जाग्रतो ०', 'वाजश्च०' इन चार मन्त्रो को उद्धृत कर उनका -अर्थ किया है । यह भी गलत है । इन मन्त्रो का भी शुद्ध अर्थ क्रमशः इस तरह से होगा- ' प्र यदित्था' इत्यादि दस ऋचाओ का एक सूक्त है । घोर का पुत्र कण्व इनका ऋषि है और देवता मरुद्गण है । इसलिये मरुद्गण ही संबोधित होते है । 'प्र यद्दशप्रगाथं तु' इत्यादि अनुक्रमणिका के वचन इसमें प्रमाण है । है मरुद्गण, आपके आयुध (अस्त्र - शस्त्र ) शत्रु को हरा देने में स्थिर हों, समर्थ हो और साथ ही शत्रुओ को स्तम्भित कर देने में भी समर्थ हों । आप लोगो का
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१३२८ वार्थपारिजातः अतिशयेन स्तोतव्य अस्तु भवतु । मन्त्रेणानेन मरुता दृष्टान्तेन मनुष्याणा स्थिराणा दृढानामस्त्रशस्त्राणा संग्रहे प्रशस्तबल- सम्पादनाय शत्रुबलक्षयाय प्रवृत्तिर्भवत्येव । ईश्वरो मनुष्यानुपदिशतीदमिति तु चिन्त्यमेव । विजयाय च सन्त्विति तु शब्दार्थ- बाह्यमेव । वीळूशब्दस्य प्रशसितानीति तु नार्थं, दृढत्वेन गतार्थत्वात् । तविपीत्यस्य अत्यन्तप्रशसनीया सेना अखण्डित बलमस्तु इत्यपि न किञ्चित्, सेनाया अपि बलेऽन्तर्भावात् । येन युष्माक चक्रवतराज्यं स्थिर स्यादिति दुष्टकर्मकारिणा युष्म- द्विरोधिना शत्रुणा पराजयश्च सदा भवेद् इति तु न वेदार्थ, वेदाक्षरबाह्यत्वात् । परन्त्वयम् आशीर्वादान् सत्यकर्मानुष्ठानिभ्यो ददामि मायिनोऽन्यायकारिणो मर्त्यस्य मनुष्यस्य च कदाचिद्वास्तु अर्थातैव दुष्टकर्मकारिभ्योऽहमाशीर्वाद कदाचिद्ददामि इत्यपि त्वत्कपोलकल्पितमेव, तादृगर्थबोधकपदाभावात् । इषे पिन्वस्वेत्यस्य व्याख्यानमपि कल्पनाबहुलमेव, हे भगवन्निति सम्बोधनपदस्य मन्त्रेऽभावात् । 'इषे पिन्वस्वेति पिन्वानमनुमन्त्रयते ' ( का० श्रौ० सू० २६/ ६/ ९ ) इति कात्यायनमहर्षिसूचितविनियोगानुसारेण त्वनेन मन्त्रेण पिन्वमानमतितप्तं धर्ममभिमन्त्रयते । अत एकधर्मदेवत्येय पक्तिर्धर्मेति । याज्ञिकप्रसिद्ध सन्तप्तघृते पयोनिक्षेपेणात्यन्तप्रज्वलितं महावीरपात्रमिह घर्मशब्देनोच्यते । तदधिष्ठातृदैवत तद्द्वारा परमदैवतं चात्र प्रार्थ्यते । हे पिन्वमान धर्म, इषे वृष्टयै पिन्वस्व पुष्टो भव । तत्पुष्ट्या यज्ञसमृद्धिवृष्टिबलब्रह्मक्षत्रद्यावापृथिव्यादिपुष्टिसम्भवात् । 'उत्तमेच्छायै परमोत्कृष्टायान्नाय चास्मान् स्वतन्त्रतया पुष्टिमत. प्रसन्नान् कुरु' ( पृ ० १७१) इत्यपि काल्पनिको प्रसङ्गतश्चार्थ, इच्छाया सौन्दर्यज्ञानेन स्वय जायमानत्वात् प्रार्थनीय- त्वानुपपत्ते, इच्छापेक्षयेष्यमाणस्यैव प्रार्थनीयत्वौचित्यात् । नान्नाद्यप्यर्थः, तस्य ' उर्जे' इत्यनेन वच्यमाणत्वात् । णिजन्ता- भावादस्मानिति कर्मणश्चाभावाद् अध्याहारे मानाभावाच्च । उत्तरत्राप्येवमेव विज्ञेयम् । ऊर्जेऽन्नाय पिन्वस्व अन्नं वर्धयेत्यर्थः । वल अतिशय स्तुति के लायक हो । इस मन्त्र में वर्णित मरुद्गण के दृष्टान्त से मनुष्यों की भी स्थिर अर्थात् दृढ अस्त्र- शस्त्रों के संग्रह की, उत्कृष्ट वल के संपादन की और शत्रु के वल को नष्ट कर देने की प्रवृत्ति हो ही सकती है । ईश्वर मनुष्यो को ऐसा करने का उपदेश देते है, ऐसा अर्थ करना तो विचारणीय बन जाता है । यह सब विजय की प्राप्ति में सहायक हो, ऐसा अर्थ भी मन्त्र के अक्षरो से प्राप्त नही होता । वीळू शब्द का अर्थ प्रशंसित नही होता, किन्तु दृढ ही होता है । इसीलिए दृढ होने से ही वह प्रशंसित अपने आप हो जाता है । 'तविषी' शब्द का अर्थ अत्यन्त प्रशंसनीय सेना और अखण्डित बल ऐसा नही किया जा सकता, क्योकि सेना का भी तो बल में ही अन्तर्भाव माना जाता है । जिससे तुम लोगो का चक्रवर्ती राज्य स्थिर हो, इसके लिए दुष्टता करने वाले तुम्हारे विरोधी शत्रुओं की पराजय भी सदा हो, यह भी इस मन्त्र का अर्थ नही हो सकता, क्योंकि यह अर्थ मन्त्राक्षरो से बाहर का है, अर्थात् मन्त्र में विद्यमान शब्द इस अर्थ को प्रकट करने में असमर्थ हैं । 'परन्तु यह मेरा आशीर्वाद केवल धर्मात्मा, न्यायकारी और श्रेष्ठ मनुष्यों के लिये है और जो ( मायि० ) अर्थात् कपटी, छली, अन्यायकारी और दुष्ट मनुष्य है, उनके लिये नही । किन्तु ऐसे मनुष्यो का तो पराजय ही होता रहेगा । इसलिये तुम लोग सदा धर्म कार्यों को ही करते रहो' ( पृ० १७२ ) यह सब भी आपकी कोरी कपोल- कल्पना है, क्योकि इस तरह के अर्थ के बोधक पद इस मन्त्र में विद्यमान नही है । ' इषे पिन्वस्व' इस मन्त्र की व्याख्या में भी ज्यादातर कल्पना का ही सहारा लिया गया है । 'हे भगवन्' यह संबोधन पद मन्त्र में विद्यमान नही है । कात्यायन महर्षि के बताये विनियोग के अनुसार इस मन्त्र से अत्यन्त तप्त धर्म को अभिमन्त्रित किया जाता है । अतः एक धर्म देवता वाली यह यजुष् पंक्ति छन्द में निबद्ध है । तपे हुए घृत में दूध के डालने से अत्यन्त प्रज्वलित हुआ महावीर पात्र याज्ञिक संप्रदाय में धर्म के नाम से प्रसिद्ध है । उसके अधिष्ठाता देव से और उसके द्वारा परमेश्वर से भी यहाँ प्रार्थना की जाती है । हे पुष्टिशील धर्म, तुम वृष्टि के लिये पुष्ट हो जाओ । तुम्हारे पुष्ट होने से ही यज्ञ की समृद्धि होगी और उससे वृष्टि, वल, ब्रह्म, क्षत्र, द्यावापृथिवी आदि की पुष्टि होगी । हमारी शुभ कर्म करने की इच्छा हो और आप हमारे शरीरो को उत्तम अन्न से सदा पुष्टियुक्त रखिये' (पृ ० १७२ ), यह अर्थ भी काल्पनिक और असंगत है, क्योकि इच्छा तो सौन्दर्य का ज्ञान हो जाने पर अपने आप होती है, इच्छा के लिये किसी तरह की प्रार्थना नही करनी पडती । इच्छा की अपेक्षा इष्यमाण ( वाञ्छित ) वस्तु के लिये ही प्रार्थना की जा सकती है । अन्नादि अर्थ भी यहीं नही होगा, क्योकि 'उर्ज' पद से अलग से उसकी यहाँ चर्चा की गई है । यहाँ णिजन्त प्रत्यय 1
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वेदार्थपारिजातः १३२९ पराक्रमाय दृढप्रयत्नान् कृत्वा पिन्वस्वेत्यपि नार्थ, गौरवात् । ब्रह्मणे ब्राह्मणेभ्य, क्षत्राय क्षत्रियेभ्य सामान्यापेक्षमेकवचनम् ॥ द्यावापृथिवीभ्या च पिन्वस्व तास्तापयेत्यर्थं । ब्रह्मणे इत्यस्य वेदविद्याग्रहणाय परमप्रयत्नकारिणो ब्राह्मणवर्णयोग्यान् क्षत्राय साम्राज्याय क्षत्रियस्वभावयुक्तान् चक्रवर्तिराज्यमहितानस्मान् कुरु इत्याद्यर्थस्तु निर्मूला दुरभिसन्धिमूलकश्च, ब्रह्मक्षत्र- पदयोर्जातिविशेपवाचकतया ताद्गर्थबोधने सामर्थ्याभावात् वर्णव्यवस्थायाश्च जन्ममूलकत्वेन कर्मस्वभावमूलकत्त्रे माना- भावाच्च । विस्तरस्तु अस्मत्कृते चातुर्वर्ण्यसस्कृतिविमर्शे द्रष्टव्य । एव यथा द्यावापृथिवीभ्या सूर्याग्निभूम्यादिभ्य पदार्थेभ्यो जगते प्रकाशोपकारौ भवतस्तथैव कलाकौशलयान- चालनादिविद्या गृहीत्वा सर्वमनुष्योपकार वय कुर्म । एतदर्थमस्मान् पिन्वस्वोत्तम प्रयत्नवत कुरु इत्येतदपि निर्मूल स्वकपोल- कल्पितमेव, मन्त्रे तादृशार्थबोधक पदाभावात्, दृष्टान्नदान्तिकबोधकयथातथापदाभावाच्च । कला- कौगल यानचालनोपकारादि-- बोधकपदाभावाच्च तथार्थकरण स्वैरित्वमेव बोधयति । श्रुतिष्वय बलात्कार एवास्य विचित्रपुरुषस्य । 'घर्मासीत्युत्क्रामत्युत्तरपूर्वार्धम्' (का ० श्र ० सू० २६| ६| १० ) इति विनियोगानुसारेण धर्मासीत्यनेन ऐशानी , ' ( ), दिशमुत्क्रामति यजमान अपातामिति यजमान का० श्री० सू० २६/८/८ इति यजमानपदानुवृत्ते । हे सुधर्म सुष्ठु धारयतीति सुधर्मः, हे साधुधरणशील त्व धर्म अमि । सर्वजगतो धारणममि आहुतिपरिणामद्वारेण त्व सर्वं जगद्धारयसि । यज्ञस्य धर्मरूपत्वेन तत्प्रधानधर्मस्य सुतरा धर्मत्व मत्वा युधर्मरूपेण तत्प्रार्थनोपपद्यते । 'अमेन्यस्मे इति खरे करोति' (का० श्री ० सू० २६/६/११ ) इति विनियोगेनानेन मन्त्रेण महावीर खरे अग्निकुण्डे करोति स्थापयति । हे धर्म, अमेनिमिनोति का अभाव है और साथ ही 'अस्गत्' इस तरह के कर्मवाचक पद का भी अभाव है । इसका अध्याहार किया जाय, इसमें कोई प्रमाण भी नहीं है । आगे भी इसी तरह से समझना चाहिये । अन्न की वृद्धि के लिये आप पुष्ट होइये यही मन्त्राक्षरो का अर्थ होगा, ' इसको सदा उत्तम पराक्रम के लिये दृढ प्रयत्न करने वाला कीजिये ( पृ ० १७२ ) ऐसा अर्थ करने मे गौरव है । ब्राह्मण और क्षत्रिय पदो मे एकवचन ब्राह्मण जाति और क्षत्रिय जाति का सूचक है । आकाश और पृथिवी को भी आप तपाइये । ब्रह्मणे क्षौर क्षत्राय पदो का अर्थ ' सत्य शास्त्र अर्थात् वेद विद्या के पढने-पढाने और उससे यथावत् उपकार लेने में इसको अत्यन्त समर्थ कीजिये, अर्थात् जिससे हम लोग उत्तम विद्यादि गुणों और कर्मों को करके ब्राह्मण वर्ण हो जाय' तथा ' हे परमेश्वर, आपके अनुग्रह से हम लोग चक्रवर्ती राज्य और शूर वीर पुरुषो की सेना से युक्त हों, इसके लिये क्षत्रिय वर्ण के अधिकारी हमको कीजिये' ( पृ ० १७२ ) ऐसा अर्थ करना भी निर्मूल है । इस तरह का अर्थ करने मे एक दुरभिसन्धि भी छिपी हुई है । ब्रह्म और क्षत्र शब्द जातिविशेष के वाचक है, इनसे इस तरह का अर्थ निकल भी नही सकता । वर्णव्यवस्था का आधार जन्म है, अतः कर्म और स्वभाव को वर्णव्यवस्था का आधार नही माना जा सकता । इस विषय की विस्तार से चर्चा हमने 'चातुर्वर्ण्यसंस्कृतिविमर्श ' नामक ग्रन्थ मे की है । इसी तरह से 'जैसे पृथिवी, सूर्य, अग्नि, जल और वायु आदि पदार्थों से सब जगत् का प्रकाश और उपकार होता है, वैसे ही कलाकौशल, विमान आदि यान चलाने के लिये हमको उत्तम सुख सहित कीजिये, जिससे कि हमलोग सब सृष्टि के उपकार करने वाले हो' ( पृ० १७२ ) यह अर्थ निर्मूल एवं कपोलकल्पित है, क्योकि मन्त्र मे इस अर्थ के बोधक पद नही है और साथ ही दृष्टान्त एवं दाष्टन्तिक के अभिव्यंजक कथा एवं तथा पद भी यहाँ नहीं है । साथ ही यहाँ कला-कौशल, यानचालक आदि उपकारो के बोधक पद भी नही है । इनके अभाव मे भी इस तरह का अर्थ करना दयानन्द को स्वेच्छाचारिता को ही उजागर करता है । इस विचित्र पुरुष ने सब जगह इसी तरह से श्रुतियों के साथ जबरदस्तो की है । कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार इस मन्त्र के उत्तर भाग 'धर्मा ' इत्यादि का उच्चारण करता हुआ यजमान ऐशान दिशा की ओर चलता है । यजमान पद की इस विनियोग बताने वाले सूत्र मे पहले के सूत्र से अनुवृत्ति होती है । इसका अर्थ यह हुआ कि हे सुधर्म, सबको भलीभांति धारण करने के स्वभाव वाले तुम धर्म हो, इस सारे जगत् को धारण करने वाले हो, अर्थात् आहुतियों के परिणामस्वरूप तुम सारे जगत् को धारण करते हो । यह धर्म रूप माना है, जिस धर्म में यज्ञ की प्रधानता है, उसकी सुधर्म के रूप में प्रार्थना करना सब तरह से उचित ही है । अमेन्यस्मे ' इत्यादि मन्त्रभाग का विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार १६७
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वेदार्थपारिजातः १३३० सन् अस्मे ( ) ' ' ( ) |निम्तीति मेनि मित्र हिसायाम् न मेनिरमेनि सुपा सुलुक् पा० सू० ७ १ ३९ अमेन्यहसन् अक्रुध्यन् अम्मामु तृम्णानि धनानि धारय स्थापय । नृत्रमयतीति नृम्णम्, ' अक्रुध्यन् नो धनानि धारय' ( श ० १४/२/२/३० ) इति श्रुते । ब्रह्मक्षत्रविण च धारय ब्रह्मक्षत्रादीनस्मद्वशान् कुरु इत्यभिप्राय ॥ हे सुधर्म परमेश्वर, त्व न्यायकार्यसि अस्मानपि न्यायधर्म-युक्तान् कुरु इति व्याख्यानेऽपि दयानन्दीये दृढाऽरुचिर्धार्मिकाणाम् । यद्यपि सर्वदेवतानामात्मरूपत्वात् सुधर्मशब्दस्य पर्यवसान परमेश्वरे मम्भवति, तथापि सुधर्मशब्दस्य न वाच्योऽर्थं परमेश्वर । यथाय दयानन्दो नि.शक सन् अग्निवरुणादि-शब्दानामपि परमेशवाचकतामभ्युपैति तथैव सुधर्मशब्दस्यापि । धर्मशब्दस्य न्यायकारित्वमर्थोऽपि तथैव । अमेनिशब्दस्य हे सर्वहितकारकेत्यर्थं कृत., सोऽपि तत्कल्पित एव, मूले तदभावात् ॥ धात्वर्थानुसार्यर्थोऽस्य शब्दस्य तुक्त एव । नृम्णानीत्यस्यापि धनमर्थ उक्त " सुराज्यसुनियममुरत्नानीति कथ तदर्थं इति तु न वक्ति । ब्रह्मपदस्य वेदो ब्राह्मणजातिर्वार्थस्तु सम्भवति, किन्तु वेदविद्येत्यर्थस्तु तत्कल्पित एव । क्षत्रमित्यस्य राज्यार्थता कथमिति तु स एव जानातु । सर्वोत्तमान् मन्निष्ठान् कुर्वित्यादिकमभ्यर्थन तु नानुचितम् पर नास्य मन्त्रस्य सोऽर्थ. । 'यज्जाग्रतः,' (वा० स० ३४| १) इत्यस्यापि तदीयोऽर्थ. कल्पनाबहुलो मूलाक्षरानन्वित एव । सिद्धान्ते त्वस्यायमर्थः —– यत्प्रसिद्ध मन.सङ्कल्पविकल्पात्मक जाग्रत इन्द्रियैर्विषयानुपलभमानस्य । तत्तद्देवतानुगृहीतैरिन्द्रियैर्विषयोप-लब्धिर्जागरितम् । दूर विप्रकृष्टदेशमुदैति उद्गच्छति । चक्षुराद्यपेक्षयाऽतीव दूरगमनमेव तस्योद्गमनम् । यच्च देव दीव्यति प्रकाशत इति देवो विज्ञानोपहितः स्वात्मा, नत्र भवं देव स्वात्मग्राहकम्, न च -' यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्' (केन उ० २| ४| १ ), 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' (तै ० उ० २| ४| १ ) इति विरोधात् कथमात्मग्राहकत्वमात्मन महावीर को अग्निकुण्ड में स्थापित करने में है । इसका अर्थ है–हे धर्म, तुम बिना क्रुद्ध हुए, बिना कुछ नुकसान पहुँचाये हमारे लिये धन संगृहीत कर दो । शतपथ ब्राह्मण में इसका यही अर्थ किया गया है । इसके साथ ही हे धर्म, तुम ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यो को भी हमारे वश में कर दो । इसके विपरीत- 'हे सुधर्मन् न्याय करने वाले परमेश्वर, आप न्यायकारी है, वैसे ही हमको भी आप न्यायकारी कीजिये ' (पृ ० १७२) इस तरह के अर्थों में धार्मिक हृदय आस्तिक जनो की बडी अरुचि है । यद्यपि सभी देवगण आत्म-स्वरूप है, अत. सुधर्म शब्द का भी पर्यवसान परमेश्वर में हो ही सकता है, तो भी सुधर्म शब्द का वाच्य अर्थ परमेश्वर नही हो सकता । स्वामी दयानन्द बिना संकोच के जैसे अग्नि, वरुण प्रभृति शब्दो का अर्थ परमेश्वर करते है, उसी तरह से यह सुधर्म शब्द को भी परमेश्वर का ही वाचक मानते है । धर्म शब्द का अर्थ न्यायकारी करना भी इनकी विशेषता ही मानी जायगी । ' अमेनि' शब्द का अर्थ दयानन्द ने 'सर्व का हित करने वाला' किया है । यह भी उनकी कल्पना ही है, क्योकि मूल मन्त्र में इस अर्थ को बताने वाला कोई पद नही है । धातु के अर्थ के अनुसार इस पद का जो अर्थ निकलता है, उसको ऊपर बताया जा चुका है । नृम्ण शब्द का अर्थ धन होता है, यह हमने बताया है । दयानन्द ने इसका अर्थ सुराज्य, सुनियम, सुरत्न किस आधार पर किया, यह उन्होने नही बताया है । ब्रह्म पद का अर्थ वेद अथवा ब्राह्मण जाति तो हो सकता है, किन्तु ' वेदविद्या' उसका अर्थ करना कोरी कल्पना ही है । ' क्षत्र ' शब्द का अर्थ उन्होंने ' राज्य' किस आधार पर किया, इस बात को तो वे ही जान सकते हैं । हमें आप सर्वोत्तम गुणों से संभूषित कीजिये, इस तरह की प्रार्थना करना अनुचित नही है, किन्तु इस मन्त्र से यह अर्थ नहीं निकलता । 'यज्जाग्रत ० ' इत्यादि मन्त्र का भी उसका किया गया अर्थ कल्पना पर ही आधारित है, मन्त्राक्षरों से उसका कोई संबन्ध नहीं है । सिद्धान्ततः उसका अर्थ इस तरह से होगा -यह जो सकल्प-विकल्प करने वाला प्रसिद्ध मन है, यह जाग्रत अवस्था में इन्द्रियो की सहायता से विषयोपभोग करने वाली दशा से बहुत दूर आगे निकल जाता है । उन- उन देवताओं से अनुगृहीत इन्द्रियो से विषयों को ग्रहण करने वाली अवस्था जागरित के नाम से प्रसिद्ध है । इस अवस्था में ये इन्द्रियाँ तो केवल वर्तमान विषय का ही ग्रहण कर पाती है, किन्तु मन तो इन सबसे आगे अपने संकल्प-विकल्पात्मक व्यापार से तीनों 'कालो' तक पहुँच सकता है । यह मन बाह्य विषयो को ही नहीं, अपितु विज्ञान के रूप में प्रकाशित हो रहे आन्तर स्वात्मस्वरूप तक भी पहुँच सकता है । यदि कोई शंका करे कि अनेक श्रुतियाँ इस बात को बताती है कि मन स्वात्मस्वरूप तक नही पहुँच पाता, तो इसका समाधान यह है कि आत्मा के निरुपा-