वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 431–440
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 431–440
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वेदार्थपारिजातः १३३१ इति वाच्यम्, निरुपाधिकस्यात्मनफलव्याप्त्यविपयत्ववोधने उक्तवाक्यतात्पर्येणादोपात्. मनोजन्याज्ञाननिवारत्रवृत्तिविण्य- '' '’ ( | | ) तयाऽऽवरणभङ्गेन स्वप्रकाशतया तत्प्रकाशे वाधाभावात् मनमैवानुद्रष्टव्यम्मनमैवानुद्रष्टव्यम् वृ० उ० ४ ४ १९ इति श्रुतेश्व । तत् उकारश्चार्थ । यच्च मन सुप्तस्य पुसो यथागत तथैव पुनरागच्छति स्वापकाले, 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीलो भवति तस्मादेन स्वपितीत्याचक्षते' (छा० उ० ६६८|१| इति श्रुते । यच स्वप्ने दूरङ्गमम्, यद्यप्यन्तरेव स्वप्नदर्शन न वहिस्तथापि दूरगमनप्रतीत्यभिप्रायमेतत् । दूराद् गच्छतीनि दूरङ्गमम्, अतीतानागतवर्तमानविप्रकृष्टव्यवहितमर्वपदार्थग्राहक स्वच्छ चित्तसत्त्व सर्वार्थावभासनशीलमिति पातञ्जलसिद्धान्तात् । यच्च मनो ज्योतिषा प्रकाशकाना श्रोत्रादीनामिन्द्रियाणामेक , तत्प्रवर्तितानामेवेन्द्रियाणा स्वविषये प्रवृत्ते । आत्मा मनसा सयुज्यते, मन इन्द्रियेण, मुख्य ज्योति प्रकाशक प्रवर्तकम् इन्द्रियमर्थेनेति न्यायशास्त्ररीत्या मन सम्बन्धमन्तरा तेषा प्रवृत्त्यसम्भवात् । तन्मे मदीय मन शिवसङ्कल्पमस्तु । शिव. कल्याणकारी धर्मब्रह्मविषय सङ्कल्पो यम्य तत्तादृशमस्तु | धर्मब्रह्मनिष्ठमेव मन्मनो भवतु न पापविषयमिति । अधिष्ठातृत्वेन व्याप्नोतीति तु न सङ्गतम्, मनसोऽणुत्वेनाव्यापकत्वात् । यौगपद्येन विषयोपलब्धिप्रसङ्गाच्च । दैव दिव्यगुणादियुक्तमित्यप्यसङ्गतम्, दुखद्वेपाद्यदिव्यगुणवत्त्वेन तदनुपपत्ते । स्वप्ने दिव्यपदार्थद्रष्टृ, इत्यप्यसङ्गतम्, म्वाप्न- पदार्थाना मिथ्यार्थत्वेन दिव्यत्वायोगात् । शुभस्वप्नदर्शनाभिप्रायेणापि तन्त्र युक्तम्, अशुभपदार्थानामपि स्वप्ने दर्शनात् । ज्योतिषामिन्द्रियाणा सूर्यादीना च ज्योति प्रकाशकमित्यपि नार्थ, इन्द्रियाणामतीन्द्रियत्वेन मनसोऽविषयत्वात् । 'रूपं दृश्य धिक स्वरूप की प्राप्ति मे मन भले हो समर्थ न हो, किन्तु मन से उत्पन्न हुई अज्ञान वृत्ति को हटाने में और इस तरह से स्वात्मस्वरूप पर पडे आवरण को दूर कर स्वप्रकाश स्वात्मस्वरूप को प्रकाशित करने में उसका उपयोग है ही । इस तरह से इस मन्त्र में और उक्त श्रुतियो में परस्पर कोई विरोध नही है । 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इस श्रुति में उकार का अर्थ (च ) ' और' है । अर्थात् इसको मन से भी देखना चाहिये । यह मन सोये हुए मनुष्य का जैसे कही चला जाता है, वैसे ही जागने पर वापस चला आता है | छान्दोग्य श्रुति मे बताया गया है कि स्वापावस्था मे मन सदवस्था में लीन हो जाता है । इस अवस्था मे भी यह बहुत दूर चला जाता है । यद्यपि स्वप्नदर्शन की प्रक्रिया मन के भीतर ही चलती है, बाहर नही, अत. वहाँ दूर जाने का कोई प्रसंग नही है, तथापि स्वप्नावस्था में ऐसा प्रतीत होता है कि मन कही दूर चला गया है । इसी अनुभव का अनुसरण कर स्वप्नावस्था में मन के दूरगमन का गौण व्यवहार कल्पित कर दिया जाता है । पातंजल योग का यह सिद्धान्त है कि यह स्वच्छ चित्त सत्व, अर्थात् सत्त्वगुणप्रधान मन अतीत, अना- गत, वर्ततान, विप्रकृष्ट, व्यवहित, सभी पदार्थों को ग्रहण कर लेने में समर्थ हैं, इन सभी पदार्थों को वह प्रकाशित कर सकता है । इस सिद्धान्त के आधार पर मन के दूरगमन की कल्पना निराधार नही है । यही मन भिन्न- भिन्न विषयो की प्रकाशक श्रोत्रप्रभृति इन्द्रियों को प्रकाश देने के कारण मुख्य प्रकाशक, अर्थात् प्रवर्तक माना जाता है, क्योकि मन के द्वारा प्रवृत्त कराये जाने पर ही ये इन्द्रियाँ अपने - अपने विषय के प्रकाशन में प्रवृत्त होती है । 'पहले आत्मा मन से संयुक्त होता है तो मन इन्द्रियो से संयुक्त होता है, मन के इन्द्रियो से संयुक्त होने के बाद ही ये इन्द्रियाँ विषयों से संबद्ध होती है' इस न्यायदर्शन की पद्धति के अनुसार मन का सबन्ध हुए बिना इन्द्रियो को प्रवृत्ति हो हो नही सकती । ऐसा मेरा मन सदा शिव संकल्प हो । शिव सकल्प का अर्थ है कल्याणकारी संकल्प | कल्याणकारी संकल्प धर्मविषयक या ब्रह्मविषयक ही हो सकती है । अतः इसका अर्थ यह होगा कि मेरे मन में धर्मविषयक या ब्रह्म-विषयक संकल्प ही उत्पन्न हो, पाप मे इसकी प्रवृत्ति कभी न हो । मेरा मन सब इन्द्रियो का अधिष्ठाता होने से इनमें व्याप्त है, ऐसा अर्थ नही किया जा सकता, क्योकि मन तो अणु परिमाण है, यह सब इन्द्रियो में एक साथ व्याप्त नही रह सकता । ऐसा मानने पर तो एक साथ ही मन से सब तरह के विषयो के ग्रहण की आपत्ति उठ खड़ी होगी । देव पद का अर्थ दिव्य गुणादि से युक्त करना भी सही नही है, क्योकि मन तो दु:ख, द्वेष आदि अदिव्य गुणों से भी संवलित है । स्वप्नावस्था मे दिव्य पदार्थों को देखने वाला, यह अर्थ भी असंगत है, क्योकि स्वप्नावस्था के पदार्थ तो मिथ्या है, उनको दिव्य कैसे कहा जा सकता है । इसका अभिप्राय शुभ स्वप्नो से भी नहीं लगाया जा सकता, क्योकि स्वप्न तो शुभ के साथ अशुभ भी होते हैं । इन्द्रियों और सूर्य प्रभृति ज्योतियो का प्रकाशक, यह अर्थ भी संगत नही है, क्योकि इन्द्रियाँ तो अतीन्द्रिय हैं, अतः इसको इन्द्रियो का प्रकाशक नही माना जा सकता । वेदान्त शास्त्र के एक श्लोक में बताया गया है कि 'रूप दृश्य है और
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१३३२ वेदार्थपारिजातः लोचन दृक् तद् दृश्य दृक् च मानसम् । दृश्या धीवृत्तय साक्षी दृगेव न तु दृश्यते ॥' इति वेदान्तिमतालोचनादिजन्यज्ञान- विपयकानुव्यवसायज्ञानजन्यत्वेन साच्युपाधित्वेनोपपद्यते । एकमसहायमित्यप्यशुद्धम्, असहायस्य मनसो बहिरप्रवृत्ते । 'वाजश्च मे' इत्यादयन्तु वसोर्धारासम्बन्धिनो मन्त्रा, 'वसोर्धारा जुहोति' (का ० श्र ० सू० १८/५/१ ) इति क्ातीयसूत्रात् । ' महत्यौदुम्बर्या पञ्चगृहीत यजमानोऽरण्येऽनुच्येऽग्निप्राप्ते वाजश्च म इत्यष्टानुवाकेन' ( का० श्रौ० सू० ) सूत्रानुसारेणाज्य मस्कृत्यार्थपरिमाणया महत्यौदुम्बर्या स्रुचा महता स्रुवेण पञ्चवार गृहीतमाज्यमरण्येऽनूच्ये पुरोडाशेऽधिकरणे तदुपरि सन्ततमविच्छिन्नधार यथा स्यात्तथा वसोर्धारामाज्याहुति जुहोति । घृतेऽग्नि प्राप्ते सनि वाजश्वेत्यादिहोममन्त्रारम्भः । वाजोऽन्नम् । चशब्दा. समुच्चयार्था । प्रसवोऽन्नदानाभ्यनुज्ञा, दीयता भुज्यतामित्याद्या । प्रयति प्रयतनम्, आज्ञा शुद्धिर्वा । प्रमितिर्बन्धनम्, अन्नविषयमौत्सुक्यम्, षिञ् बन्धने इति निष्पत्ते । धीतिर्ध्यानम्, ध्यै चिन्तयाम्, सम्प्रसारणात् । क्रतुः सङ्कल्पो यज्ञो वा स्वर: साधुशब्द श्लोकः पद्यबन्ध स्तुतिर्वा । श्रव वेदमन्त्रा यशो वा श्रवणसामर्थ्य वा । श्रुतिः ब्राह्मण ज्योति प्रकाश । स्व स्वर्गः । एते मम यज्ञेन कल्पन्ताम् । समुदायापेक्षया बहुवचनम् । यज्ञेनानेन मया कृतेन वाजादयः पदार्था. कल्पन्ता कृप्ता सम्पन्ना भवन्तु । स यज्ञोऽस्मभ्य वाजादीना दातास्त्विति समुदायार्थ, 'अथो इद च मे देहीद च मे' ( ० ९ । ३। २१५ ) इति श्रुते । यद्वा वाजादय. पदार्था मम यज्ञेन कल्पन्ताम्, विभक्तिव्यत्ययेन यज्ञेऽग्नि तर्पयन्तु अभिषिञ्चन्तु मम वाजादिभि- रग्निर्देवविशेष परमात्मा वा तृप्यताम् अभिषिच्यतामित्यर्थं, 'अनेन च त्वा प्रीणामि अनेन चानेन च त्वाभिषिञ्चामि' ( ० ९ ३३५ ) इति श्रुते । श्रुतिद्वयसम्मतत्वाद् व्याख्यानद्वयमपि सङ्गतमेव । नेत्र को दृक् अर्थात् देखने वाला कहा जाता है । यह दृश्य और दृक् दोनो हो मानस अर्थात् मन के ही व्यापार है, क्योकि बुद्धि प्राप्त विभिन्न वृत्तियाँ ही दृश्य के रूप में परिणत हो जाती है और वे ही उनको ग्रहण भी करती है । इन सबका साक्षी तटस्थ रूप से सबका द्रष्टा है । वह इन्द्रियो अथवा मन का विषय नही हो सकता' । इस श्लोक में मन को दृक् और दृश्य दोनो माना है । दृक् के रूप मे जब यह इन्द्रियों से अभिन्न है, तो ऊपर दी गई आपत्ति यहाँ भी उठेगी । किन्तु उसका समाधान यहाँ इस तरह से किया जाता है कि वस्तुतः मन दुगात्मक नही है, किन्तु लोचन आदि इन्द्रियो से उत्पन्न हुए घट आदि विषयो के ज्ञान के बाद 'मै घट ज्ञान वाला हूँ, ' 'मैं घट को जानता हूँ इस तरह का एक अनुव्यवसायात्मक ज्ञान पैदा होता है । यह अनुव्यवसायात्मक ज्ञान साक्षी में इस मन की उपाधि के कारण ही पैदा होता है । इसका यह अभिप्राय नही है कि मन से इन्द्रियो का ग्रहण होता है । मन को असहाय मानना भी सही नही है, क्योकि बिना इन्द्रियो की सहायता के अकेली मनोवृत्ति बाहर की ओर नही प्रवृत्त हो सकती । ' वाजश्व में ' इत्यादि मन्त्र वसोर्धारा से सबद्ध है । कातीय सूत्र मे ऐसा ही कहा गया है । 'महत्योदुम्बर्या' इत्यादि कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार घृत का सस्कार करके उदुम्बर की लकडी से बनी बड़ी सी स्रुचा और स्रुव से पाँच बार घृत लेकर पुरोडाश के ऊपर उसकी निरन्तर धारा गिरानी चाहिये । इसी को वसोर्धारा नाम की घृताहुति कहा जाता है । घृत की धारा जब अग्नि पर गिराई जा रही हो, उसके साथ ही 'वाजश्च' इत्यादि होम मन्त्रो का उच्चारण किया जाता है । वाजशब्द अन्न का वाची है । च शब्द समुच्चय का बोधक है । प्रसव शब्द का अर्थ है अन्न देने की अनुज्ञा । जैसे कि यह दो, यह खाओ इत्यादि । प्रयति का अर्थ प्रयतन (फैलाना ), आज्ञा अथवा शुद्धि, प्रसिति का अर्थ है बन्धन अथवा अन्नविषयक उत्सुकता । बन्धन अर्थ वाले षिव् धातु से यह शब्द बनता है । घीति ध्यान को कहते हैं । चिन्ता अर्थ वालो ध्यै धातु से संप्रसारण होने पर यह शब्द बनता है । ऋतु संकल्प अथवा यज्ञ को कहते है । शुद्ध शब्द स्वर और श्लोक पद्य में की गई रचना को कहते हैं, अथवा
श्लोक का अर्थ स्तुति भी हो सकता है । वेदमन्त्र, यज्ञ अथवा सुनने की शक्ति को श्रव कहा जाता है । ब्राह्मण, ज्योति और प्रकाश
कहलाते है । स्व स्वर्ग को कहते है । यज्ञ की सहायता से ये सब वस्तुएं मुझे प्राप्त हो । बहुवचन का प्रयोग इन सब श्रुतिको लेकर किया गया है । इस प्रकार के अर्थ करने में शतपथ श्रुति ही प्रमाण है । वस्तुओ के समुदाय शतपथ ब्राह्मण में हो इसका दूसरी तरह से भी अर्थ किया गया है । बाज प्रभृति पदार्थ मुझे यज्ञ की सहायता से प्राप्त हों, यहां यज्ञ शब्द में तृतीया विभक्ति है । इसको सप्तमी में बदल कर यह अर्थ किया जाना चाहिये कि ये पदार्थ यज्ञ में अग्नि को तृप्त
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वदाथपरिजातः १३२३ - यत्तु—' वाजश्च म इत्यष्टादशाध्यायस्यैर्मन्त्रे सर्वस्वसमर्पण परमेश्वराय कर्तव्यमिति वेदे विहितमिति तु निर्मूलमेव, एतेषु मन्त्रेषु तादृगविधेरदर्शनात् । नहि 'अग्निहोत्र जुहोति' (तै० म० १/ ५/ ९ / १ ) इतिवत् परमेश्वराय स्वसर्वस्व समर्पयेदिति विधिरिह मन्त्रेषु दृश्यते । अत्र तु ' कल्पन्नाम्' इत्याशिपि लोट् । न च यज्ञेनेत्यत्र विभक्तिविपरिणामेन मम वाजादय सर्वे यज्ञे परमेश्वरे कल्पना समन्तामित्यर्थोऽस्तु, धातूनामनेकार्थत्वाद् इति वाच्यम्, यथाश्रुतार्थोपपत्ती विभक्तिविपरिणामेन गौणार्थाश्रयणानुपपत्ते । परमेश्वरस्य तर्पणेऽभिषेके वाजादीनामुपयोगे नान्तरीयकतया तदापत्तेश्चेति दिक् । यदुक्तम् —'परमोत्तमपदार्थ मोक्षमारभ्यान्नपानादिपर्यन्तमीश्वराद् याचितव्यम्' इति, तदपि चिन्त्यम्, याञ्चा-समर्पणयोविरोधात् । रागवैराग्यमूलकत्वादुभयो । श्रुतिसम्मतपूर्वोक्तार्थद्वयेऽभ्युपगम्यमाने तु रागदशाया भगवत सकाशात् सर्वे पदार्था काम्यन्ते । वैराग्यदशाया तत एवोपलब्धे. सर्वे पदार्थेरन्यनैरपेक्ष्येण स एव तर्पणीयोऽभिषेचनीयश्च । 'आयुर्यज्ञेन कल्पता प्राणो यज्ञेन कल्पता चक्षुर्यज्ञेन कल्पता श्रोत्र यज्ञेन कल्पना ज्योतिर्यज्ञेन कल्पता स्वर्यज्ञेन कल्पता पृष्ठ यज्ञेन कल्पता यज्ञो यज्ञेन कल्पताम् ॥ स्तोमश्च यजुश्च ऋक् च साम च बृहच्च रथन्तर च । स्वर्देवा अगन्मा मृता अभूम प्रजापते प्रजा अभूम वेट् स्वाहा ॥ ' (वा ० स० १८/ २९) । अस्या कण्डिकाया अपि पूर्वोक्तश्रुत्यनुगुण एवार्थं । आयु- र्जीवनं जीवनकालो वा यज्ञेन निमित्तेन कल्पता साध्यताम् । प्राप्यनामित्यर्थ । प्राणश्चक्षु श्रोत्रवाङ्मनासि मम यज्ञेन क्लृप्तानि . ' भवन्तु आत्मा देहो यज्ञेन कल्पताम् । यज्ञेन यज्ञोपलक्षितेन शुभकर्मणैवाभीपुरुषार्थसाधकप्राणचक्षु श्रोत्रवाङ्मनोदेहा करें । अर्थात् मेरे द्वारा दिये जारहे बाज ( अन्न ) प्रभृति पदार्थों से देवविशेष अग्नि और परमात्मा तृप्तिलाभ करें । ' इससे मै तुमको प्रसन्न ( तृप्त ) करता हूँ और इस पदार्थ से मैं तुमको अभिषिक्त करता हूँ' ऐसा शतपथश्रुति मे इनका अर्थ किया गया है । ये दोनो हो व्याख्याए दो प्रकार को शतपथ श्रुति से समर्थित होने से उचित ही है । यहाँ स्वामी दयानन्द ने कहा है कि -' बाजश्च में' इत्यादि शुक्लयजुर्वेद के अठारहवें अध्याय मे ( वर्तमान ) मन्त्र ईश्वर के अर्थ मे सर्वस्व समर्पण करने का हो विधान में हैं' (पृ ० १७३ ) किन्तु यह व्याख्यान निराधार है, क्योंकि इन मन्त्रो में इस तरह की कोई विधि नही देखी जाती । अग्निहोत्र की विधि की तरह परमेश्वर के लिये सर्वस्व समर्पण करने का विधान करने वाला कोई fafaart मन्त्रो मे नही दिखाई पडता । इस मन्त्र मे तो ' कल्पन्ताम्' इस आशीर्वादात्मक लोट् लकार का प्रयोग है । ' यज्ञेन ' पद में विभक्ति का विपरिणाम कर मेरे सभी अन्न आदि पदार्थ यज्ञ में, परमेश्वर में समर्पित हो, ऐसा अर्थ क्यो न किया जाय, जब कि धातुओ की अनेकार्थता के कारण ऐसा आसानी से किया जा सकता है? इस प्रश्न का समाधान यह है कि जब हम बिना विभक्ति को बदले ही एक उचित अर्थ कर सकते है, तो ऐसी अवस्था में गौणार्थ करने से कोई लाभ नही । परमेश्वर की तृप्ति और अभिषेक के लिये अन्न आदि का उपयोग मानने में अनायास उक्त अर्थ निकल आता है । ' सबसे उत्तम मोक्षसुख से लेकर अन्न -जल पर्यन्त सब पदार्थों की याचना मनुष्यो को केवल ईश्वर से ही करनी चाहिये' (पृ० १७३ ) यह कथन भी विचारणीय है, क्योकि मागना और समर्पण करना ये दो विरोधी स्वभाव की क्रियाएँ है । पहली का कारण राग और दूसरी का वैराग्य है । श्रुति समर्पित पूर्वोक्त दोनो अर्थों में तो संगति इस तरह से बैठ जाती है कि मनुष्य रागावस्था मे भगवान् से सब कुछ मागता है और वैराग्यावस्था में उससे उपलब्ध पदार्थों से बिना किसी अपेक्षा के उसी को सन्तुष्ट करता है । ' आयुर्यज्ञेन ' इत्यादि कण्डिका का भी पूर्वोक्त ' वाजच' इत्यादि श्रुति की तरह का ही अर्थ है । आयु अर्थात् जीवन अथवा जीवन कला वह यज्ञ की सहायता से प्राप्त हो । प्राण, चक्षु, श्रोत्र, वाणी और मन ये सब भी यज्ञ की सहायता से सदा स्वस्थ अवस्था में बने रहें । मेरा शरीर भी यज्ञ की सहायता से स्वस्थ रहे । इसका अभिप्राय यह है कि यज्ञ से अर्थात् यज्ञ से निष्पन्न होने शुभ कर्म से ही अभीष्ट पुरुषार्थ को प्राप्त करने में समर्थ प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और शरीर की प्राप्ति होती है । ब्रह्म वेद है * वाले और ज्योतिः स्वयंप्रकाश परमात्मा । ये भी यज्ञ से प्राप्त हो । यज्ञ, तप, दान आदि को सहायता से ही परम पुरुषार्थ के रूप में माने गये ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है । ऊपर उद्धत शतपथ बुति इसमें प्रमाण है । ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाना ही उसकी उपलब्धि
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१३३४ वेदार्थपारिजात उपलभ्यन्ते । ब्रह्मा वेद । ज्योति स्वयप्रकाश परमात्मा । यज्ञेन कल्पता प्राप्यनाम् । यज्ञतपोदानादीनामिष्यमाणब्रह्मवेदन- हेतुत्वश्रवणात् । 'तमेत वेदानुवचनेन विविदिषन्ति ब्रह्मचर्येण तपसा श्रद्धयाऽनाशकेन' ( ० १४/७/२/२५) तत्साक्षात्कार- रूपोपलब्धिरेव तत्प्राप्तिर्विम्मॄतकण्ठमणेरिवेति । स्व स्वर्गमुख पृष्ठ स्तोत्र स्वर्गस्थान वा यज्ञेन कल्पता प्राप्यताम्, स्वर्गादि- साधनतया यज्ञविधानात् । यज्ञोऽग्निहोत्रदर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादिर्यज्ञोऽपि यज्ञेन कल्पताम्, पूर्वपूर्वयज्ञैरेवोत्तरोत्तरयज्ञानुष्ठान- सम्पत्ते । तस्मादिदानीन्तनेनानुष्ठीयमानेन यज्ञेन भावी यज्ञ प्राप्यताम् । यथा धर्ममेघसमाधिना धर्मो वर्धते भक्तया भक्ति- वर्धते, तथैव यज्ञादिपुण्यानुष्ठानेनैव यज्ञादिपुण्यानुष्ठान वर्धते । 'एष ह्येवैनं साधु कर्म कारयति तं यमन्वानुनीषति' ( कौ० ब्रा० उ ० ३।९ ), ‘कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्य ' ( ब्र० सू० २२३| ४२) इति श्रुतिसूत्रादिभ्यः । अनौद्धत्यपरिहाराय वा तथोति । यज्ञेनैव यज्ञ कल्पते न मम सामर्थ्यं तत्क्लृप्तावित्यर्थं । 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:' ( वा ० स० ३१।१६) इति श्रुतेश्च । स्तोमयजुर्ऋक्सामबृहद्रथन्तराणि यज्ञेन क्लृप्तानि प्राप्तानि भवन्तु, पुण्यवतामेव तत्प्राप्तिदर्शनात् । स्तोमस्त्रिवृत् पञ्चदशादि., यजुरनियतपादो मन्त्र, ऋक् नियतपादा, साम गीतिप्रधानम्, बृहद्रथन्तरे सामविशेषौ । सर्वाणि चैतान्यभीष्ट- पुरुषार्थसाधनानि यज्ञेन कल्पन्ताम्, प्राप्यन्तामित्यर्थः । वसोर्धारयैवाभिषिच्यात्मान यजमान प्रशसति वय यजमाना. स्व. स्वर्गमगन्म गतवन्त । गमेर्लङि शब्लोपे मस्य नत्वम् । गत्वा चामृता अभूम भूता । तत. प्रजापतेहिरण्यगर्भस्य प्रजा अभूमेति फलवचनम् । अनेन वसोर्धारायाः सर्वकामहेतुत्वमुक्तम् । वेट् स्वाहेति । वेडिति वषट्कार, 'वषट्कारो हैप परोक्ष यद्वेट्कारः । वषट्कारेण वा वै स्वाहाकारेण वा देवेभ्योऽन्न प्रदीयते ' ( श० ९| ३ | ३ | १४) इति श्रुतेः । द्वितीयशातपथीयश्रुत्यनुसारेणायुरादिभि. सर्व पुरुषार्थसाधनैरग्नि देव तन्मूलभूतं परमदैवत परमात्मानमह प्रीणयामि तर्पयायि अभिषेचयामि वा । सर्वात्मना सर्वभावेन परमात्मसमर्हणमेवेहेष्टम् । कर्मकाण्डप्रसङ्गे तु श्रुत्या अर्थात् प्राप्ति है, जैसे भूली हुई कण्ठमणि आदि वस्तु याद पड जाने पर पुनः प्राप्त हुई मान ली जाती है । स्वः स्वर्ग के सुख को पृष्ठ- स्तोत्र को अथवा स्वर्ग स्थान को कहा जाता है । यज्ञ की सहायता से यह भी मुझे प्राप्त हो जाय । यज्ञ का विधान स्वर्ग आदि की प्राप्ति के लिये ही किया जाता है । अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास प्रभृति यज्ञ भी मुझे यज्ञ की सहायता से ही प्राप्त हो, क्योकि पहले किये गये यज्ञो के कारण ही भविष्य मे भो यज्ञादि शुभ कर्मों मे मनुष्य की प्रवृत्ति होती है । इसलिये इसका यह अभिप्राय होगा कि अभी किये जा रहे यज्ञ की सहायता से मुझमे भविष्यकाल मे भी यज्ञ करने की प्रवृत्ति पैदा हो । जैसे धर्ममेघ समाधि से धर्म बढता है, ईश्वर भक्ति से भगवान् मे अनुराग बढना है, उसी तरह से यज्ञ आदि पुण्य कर्मों के अनुष्ठान से यज्ञ आदि पुण्य कर्मों में भी वृद्धि होती है । इस विषय मे ऊपर श्रुति एवं वेदान्तदर्शन के सूत्र प्रमाण के रूप मे उद्धृत किये गये है । यज्ञ-यागादि का अनुष्ठान कर मनुष्य उद्धत न हो जाय इसके लिये ऐसा कहा गया है कि मनुष्य को सदा यज्ञ-यागादि शुभ कर्मों के अनुष्ठान मे लगे रहना चाहिये ॥ पूर्वकृत यज्ञ की सहायता से ही मैं इस यज्ञ को करने में समर्थ हुआ हूँ, अन्यथा मुझमें यह सामर्थ्य कहाँ कि मै इस तरह के शुभ कर्म कर सकूँ । इस तरह से निरभिमान अवस्था मे रहने से मनुष्य उद्धत नही हो पाता । 'देवताओ ने भी यज्ञ की सहायता से ही यज्ञ किया ऐसा श्रुतिवचन भी उपलब्ध है । सोम, यजु, ऋक्, साम, बृहत् और रथन्तर ये सब भी यज्ञ की सहायता से मुझे प्राप्त हो, क्योकि ये सब वस्तुएँ पुण्यवालो को ही मिल सकती है । त्रिवृत्, पंचदश आदि स्तोम कहे जाते है, अनियत पाद वाले मन्त्र को यजु. कहते है, जिसके पाद के अक्षर नियत है, वह मन्त्र ऋक् कहा जाता है, गीतिप्रधान मन्त्र साम कहलाता है, बृहत् और रथन्तर साम के ही भेद है । अभीष्ट पुरुषार्थ को देने वाले ये सब साधन यज्ञ की सहायता से ही मुझे प्राप्त हों । इन वसोर्धारा मन्त्रो से यजमान अपना अभिषेक करके अपनी ही प्रशंसा करता है कि हम यजमान स्वर्ग को प्राप्त कर चुके हैं और वहाँ जाकर अमर हो गये है । ' अगन्म' पद गम् धातु से लड् लकार में शप् का लोप होकर मकार या नकार होने पर बनता है । तदनन्तर हम प्रजापति हिरण्यगर्भ को प्रजा के रूप में निवास करते है । यह सब फलश्रुति के बोधक बचन है । इससे यह बताया जाता है कि वसोर्धारा से सब कामनाओ की पूर्ति हो जाती है । बेट् शब्द वषट्कार का बोधक है । शतपथ बुति मे बताया गया है कि वेट्कार वषट्कार का ही छिपा हुआ रूप है । वषट्कार अथवा स्वाहाकार के द्वारा देवताओ को आहुति दी जाती है । द्वितीय शतपथीय श्रुति के अनुसार इस कण्डिका का अर्थ यह होगा कि आयु प्रभृति सभी तरह के पुरुषार्थ की सिद्धि
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वेदार्थपारिजातः १३३५ वाजादीनामायु प्राणादीना चाग्नेर्देवताविशेषस्य परमात्माङ्गभूतस्य तर्पणाभिषेकौ विहिनौ । सुतरा तदङ्गिन परमात्मन. समर्हण सम्पद्यते, अङ्गपूजाया अङ्गिनि पर्यवसानात् । लोके गुर्वादीना पादवन्दनेन शिरमि गन्धपुष्पमालादिममर्पणेनाङ्गिपूजा दृश्यते, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । ज्योतिरत्राप्युपास्य ज्ञेय वा परब्रह्मैव तदुपामनाज्ञानादिभिश्च तदेव समर्हणीयम्, सर्वनैरपेक्ष्येण मोक्षस्याप्यकाम्यत्वात् । यत्तु —' यज्ञो वै विष्णु ' ( श० १| १| २| १३), (वेवेष्टि सर्व जगद् व्याप्नोतीति विष्णुरीश्वर ' इति, तत्तु न सङ्गतम्, श्रुतौ व्यापकत्वगुणयोगेन यज्ञे विष्णुत्वमुक्तम्, शौर्यादियोगाद् देवदत्ते सिंहत्ववत् । तस्माद्यज्ञगब्दोऽत्र प्रकृतयज्ञपर एव । यत्तु 'हे मनुष्या यज्ञेनेश्वरप्राप्त्यर्थ स्वकीयमायु कल्पताम् परमेश्वराय समर्पित भवतु' इति, तन्न सङ्गतम्, } मनुष्याणा सम्बोधनीयत्वे मानाभावात् । परमेश्वरायेति पदमपि मूले नास्त्येव, अध्याहारे च मानाभावात् । क्लपे समर्पणार्थत्वे मानाभावाच्च । ममायुरादय पदार्था यज्ञेऽग्नि तर्पयन्तु, अभिषिञ्चत्विति श्रुतिसम्मतार्थस्वीकारेऽपि परमेश्वरा- राधनाङ्गतायामायुरादीना तत्समर्पण नान्तरीयकतयापततीत्युक्तमेव । आत्मेति तु प्रकृते देह एव न जीव, तस्य कल्पना- सङ्कल्पयितृत्वेन पृथङ्गिर्देशानर्हत्वात्, 'आत्मेन्द्रियमनोयुक्तो भोक्तेत्याहुर्मनीपिण ' इति गीतायामात्मपदेन शरीरग्रहणदर्शनाच्च । ब्रह्मेति वेद एवार्थो न चतुर्वेदविज्ञाता यज्ञानुष्ठानकर्ता वा, तत्र मानाभावाद् गौरवाञ्च । ज्योति सूर्यादिप्रकाश इत्यपि न, हूँ । सब तरह से परमात्मा के प्रति समर्पण ही यहाँ अभिषेक है । कर्मकाण्ड के प्रसग मे श्रुनि अन्नप्रभृति और आयु, प्राण प्रभृति की प्राप्ति के लिये देवताविशेष अग्नि के, जो कि परमदेव परमात्मा का अगभूत है, तर्पग और अभिषेक का विधान करती है । अग्नि का तर्पण और अभिषेक करने से परमात्मा की पूजा अपने आप हो जाती है, क्योकि अंग की पूजा का पर्यवसान अगी की पूजा में हो ही जाता है । लोक में देखा जाता है कि गुरु का पादवन्दन करने से अथवा उसके सिर पर गन्ध, पुष्प, माला आदि समर्पित करने से, अगपूजा मे अगी गुरु की पूजा हुई, ऐसा माना जाता है, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिए । यहाँ भी ज्योति की ही उपासना करनी है 7, उसी को जानना भी है । यह ज्योति परब्रह्म ही है । ज्योति की उपासना और ज्ञान से उस परब्रह्म का ही समादर होता है । मोक्ष को सर्वथा निरपेक्ष माना जाय, तो वह भी कामना की विषय न होगा । 'यज्ञ नाम विष्णु का है, जो कि सब जगत् में व्यापक हो रहा है । उसी परमेश्वर के अर्थ सब चीज समर्पण कर देना चाहिये' (पृ० १७४ ) दयानन्द का यह अर्थ सही नही है, क्योकि श्रुति मे व्यापकता के आधार पर यज्ञ को गौण रूप से विष्णु कहा गया है, जैसे कि शौर्य प्रभृति गुणो के होने से देवदत्त को गौण रूप से सिंह कहा जाता है । इस तरह से प्रकृत मन्त्र मे यज्ञ शब्द विष्णु अर्थात् परमात्मा का वाचक न होकर प्रकृत यज्ञ का हो वाचक माना जाता है । 'इस विषय मे यह मन्त्र है कि सब मनुष्य अपनी आयु को ईश्वर की सेवा और उसकी आज्ञा के पालन में समर्पित करे' ( पृ० १७४) यह अर्थ भी मगत नही है, क्योकि यहाँ मनुष्यों को संबोधन करने वाला कोई पद विद्यमान नही है । 'परमेश्वराय' यह पद भी मूल मन्त्र में नही है और न अध्याहार करने में कोई प्रमाण है । क्लृप् धातु का समर्पण अर्थ करने मे भी कोई प्रमाण नही है । यह तो पहले ही बताया जा चुका है कि मेरे आयु प्रभृति पदार्थ यज्ञ में अग्नि को तृप्त करे, अभिषिक्त करें, इस श्रुतिसंमत अर्थ को स्वीकार करने पर भी परमेश्वर की आराधना मे आयु प्रभृति का समर्पण अतन्तोगत्वा हो ही जाता है, क्योकि अंगपूजा का विनियोग अन्ततः अंगी की पूजा में ही होता है । प्रकृत स्थल मे आत्मा का अर्थ देह ही किया जा सकता है, जीव नही, क्योकि कल्पना करने वाला और संकल्प करने वाला तो जीव ही है, अतः उसका अलग से निर्देश कैसे हो सकता है । 'आत्मा, इन्द्रिय और मन से संयुक्त जीव को ही मनीषीगण भोक्ता कहते है ' इस गीता वचन में आत्म शब्द शरीर के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्म पद का अर्थ यहाँ वेद ही किया जाना चाहिये । चारो वेदों का जानकार अथवा यज्ञ का अनुष्टान करने वाला, ऐसा अर्थ करने में कोई प्रमाण नही है और इसमें गौरव भी है । 'ज्योति' पद का अर्थ सूर्य प्रभृति का प्रकाश करना भी ठीक नही है, क्योंकि ज्योतियाँ तो अनेक प्रकार की है, अतः यहाँ किस ज्योति का ग्रहण किया जाय, इसमे कोई प्रमाण नही है । सभी ज्योतियो को प्रकाशित करने वाला ब्रह्म तो एक ही है । अतः इसमें विनिगमक का अभाव नही है, अर्थात् अनेक श्रुतिवचन इसमें प्रमाण है कि यह ब्रह्म सभी प्रकार
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वेदार्थपारिजातः १३३६ ज्योतिपामनेकत्वेन विनिगमनाविरहात् । ज्योतिषा ज्योतिस्त्वेकं ब्रह्मेव, तस्मान्न तत्र विनिगमनाविरह | धर्मो न्याय इति तु प्रमाद एव, मूले धर्मपदस्यादर्शनात् । यज्ञ शिल्पादिरित्यप्यसङ्गतम्, प्रसिद्धिबाधात् । यजुर्यजुर्वेदाध्ययनम् ऋग्वेदा- ध्ययनम् इत्यादिकमप्यसङ्गतम्, लक्षणापत्ते । मम यजुरादयो यज्ञेन कल्पन्तामित्यनेन गतार्थता च, अध्ययनेनैव यजुरादिषु मदीयत्वोपपत्ते' | यत्तु -'बृहच्च रथन्तर च' महत् क्रियासिद्धिफलभोग शिल्पविद्याजन्यं वस्तु' इति, तदपि बालभाषितम्, तथार्थत्वे मानाभावात्, ताण्ड्यमहाब्राह्मणस्थवृहद्रथन्तरादिसामविशेपनिर्वचनविरोधाच्च । यदुक्तम् —' एव कृते परमकारुणिक परमेश्वर सर्वोत्तमं सुखमस्मभ्य दद्यात्' इति, तदपि न सङ्गतम्, सकामस्य सर्वस्वसमर्पणायोगात् । यावत्पर्यन्त कामना अवशिष्यन्ते तावत्पर्यन्त व सर्वस्वात्मनिवेदनम्? यत्तु —' येन वय स्वर्देवा सुखे प्रकाशिता, अमृता परमानन्द मोक्षम् अगन्म प्राप्ता तथा वय परमेश्वरस्य प्रजा अभूम, अर्थात् परमेश्वर विहायान्य मनुष्य राजान नैव मन्यामहे ' इति, तदप्यसङ्गतम्, मोक्षस्य स्वात्मस्वरूपत्वेन गन्तव्यत्वा- भावात्, ब्रह्मात्मभावप्राप्त्या प्रजात्वानुपपत्तेश्च, 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' ( मु० उ० ३।२ ९ ) इति श्रुतेः । वेट् स्वाहा, सदा वय सत्य बदाम, भवदाज्ञाकरणे परमप्रयत्नत उत्साहवन्तोऽभूम भवेम' इत्यप्यसङ्गतम्, सिद्धान्तव्याख्यानोद्धृतश्रुतिविरोधात् ॥ तत्र हि देवताहुतिप्रदाने वेट्कार वषट्कार -स्वाहाकाराणा विनियोग स्पष्टमुक्त. । भवदाज्ञाकरण इत्यस्य स्थाने भवदाज्ञापालन इत्येव युक्तम्, परमेश्वरस्याज्ञायाः कृतेरविषयत्वात् । के प्रकाशो का प्रकाशक है । 'धर्म का अर्थ न्याय है' ( पृ० १७३ ) यह पाठ तो पूरा प्रामादिक है, क्योकि मूल मन्त्र में धर्म पद है हो नही । यज्ञ का अर्थ शिल्प आदि करना भी असंगत है, क्योकि इसमें लोकप्रसिद्धि का स्पष्ट बाघ होता है । यजु आदि पदो का अर्थ यजुर्वेद का अध्ययन, ऋग्वेद का अध्ययन ( पृ० १७४ ) आदि करना भी सही नही हैं, क्योकि ऐसा करने के लिये लक्षणा का सहारा लेना पड़ेगा । मेरे यजु प्रभुति वेद यज्ञ की सहायता से कल्पित हो, इस लक्षणा रहित अर्थ से भी इगी अर्थ की प्राप्ति हो जायगी । क्योकि यजु प्रभृति के साथ मदीयत्व की उपपत्ति उनका स्वयं अध्ययन करने पर ही की जा सकती है । बृहत् मोर रथन्तर शब्दो का अर्थ बडे बडे सब पदार्थ और शितविद्या आदि से जन्यफल ( पृ० १७४) करना भी बच्चो की सी बात मालूम होती है, क्योकि ऐसा अर्थ करने मे कोई प्रमाण नही है । साथ ही ताण्ड्य महाब्राह्मण मे किये गये सामविशेष के बोधक निर्वचन से इस अर्थका स्पष्ट हो विरोध पडता है । इस प्रकार से जो मनुष्य अपनी सब चीजें परमेश्वर के अर्थ समर्पित कर देता है, उसके लिये परम कारुणिक परमात्मा सब सुख देता है, इसमे सन्देह नहीं' ' ( पृ ० १७४ ) यह अर्थ भी संगत नही है, क्योकि सकाम व्यक्ति सर्वस्व का समर्पण कर ही नही सकता । जब तक मनुष्य के मन में कामना बची रहती है, तब तक भला वह अपने सर्वस्व का समर्पण करने में कैसे समर्थ हो सकता है? 'परमात्मा की कृपा की लहर और परम प्रकाश रूप विज्ञान प्राप्ति में शुद्ध होकर तथा सब संसार के बीच में कीर्तिमान् होकर हमलोग परमानन्द स्वरूप मोक्ष सुख को सब दिन के लिये प्राप्त हो । तथा हम सब मनुष्यों को उचित है कि किसी एक मनुष्य को अपना राजा न मानें, क्योकि ऐसा कोन अभागा मनुष्य हैं, जो कि सर्वज्ञ, न्यायकारी अपने पिता एक परमेश्वर को छोड़कर दूसरे की उपासना करे और राजा माने '( पृ० १७४ - १७५) यह सारा कथन भी असंगत है, क्योकि मोक्ष तो स्वात्मस्वरूप है । उसमे कही जाना नही पडता । उस दशा में मुमुक्षु स्वयं ब्रह्मात्मभाव को प्राप्त कर लेता है, अतः वह किसी की प्रजा के रूप में उस अवस्था में रहता नही, क्योकि श्रुति का कहना है कि ब्रह्म को जान लेने वाला स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है । '(वेट् स्वाहा) अर्थात् हम लोग सर्वज्ञ, सत्यस्वरूप, सत्यन्याय करनेवाले परमेश्वर राजा को अपने सत्यभाव से प्रजा होकर यथावत् परम प्रयत्न पूर्वक, उत्साह के साथ, सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य कहने में समर्थ होवें ( पृ० १७५ ) यह अर्थ भी असंगत है, क्योंकि इन मन्त्रों का अर्थ करते समय जिन श्रुतियो को हमने उद्धृत किया है, उनका इस अर्थ से स्पष्ट विरोध है । उन श्रुतियो में बेट्कार, वषट्कार और स्वाहाकार का विनियोग देवताओ को आहुति देने में किया गया है । 'भवदाज्ञाकरणे ' इसके स्थान पर 'भवदाज्ञापालने ' अर्थात् आपकी आज्ञा का पालन करने में, यही अर्थ उचित है, क्योकि परमेश्वर की आज्ञा कृति का विषय नही हो सकती । A
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वेदार्थपारिजात. १३३७ अथोपासनाविषयको विचार: यदुक्तम् — 'युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चित । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्ही ||' ( ) | ( देवस्य सवितु परिष्टुतिः ऋक् स० ५।८१११ युञ्जान प्रथम मनस्तत्त्वाय सविता धियम् । अग्नेज्र्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् || ' ( वा० स० ११ १) । ' युक्तेन मनसा वय देवस्य सवितु सवे । स्वर्ग्याय शक्त्या युक्त्वाय सविता देवान् स्वर्यतो धिया दिवम् । बृहज्ज्योतिः करिष्यत. सविता प्रसुवाति तान्' ( वा० स० ११ । ३ ) । 'युजे वा ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरे. ॥ शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु । (ऋ० स० १० | १३ | १ ) । अत्र जीवेन परमेश्वरस्यैवोपासना कर्तव्येति विधीयते ' (पृ० १७६) इति दयानन्दकथनमसत्, विधिप्रत्ययादर्शनात् । ‘युञ्ज पञ्च श्यावाश्व. सावित्र तु जागतम्' इत्यनुक्रमणिकानुसारेणास्य सूक्तस्य श्यावो नामात्रेय ऋषि जगती ,, ' छन्दः सविता देवता पृष्ठ्याभिप्लवषडहयो प्रथमेऽहनि वैश्वदेवशस्त्रे सावित्रनिविद्धानमिदम् युञ्जते मन उत युञ्जते धियः आ तून इन्द्र क्षुमन्तम् ' (आ ० श्री ० सू० ५।१२) इति सूत्रात् । तथा चाय मन्त्रार्थः -विप्रा मेधाविनः, यज्ञप्रसङ्गानुसारेण ऋत्विग्यजमाना, मनः सङ्कल्पविकल्पात्मक स्वीय मन, यागादिकर्मसु युञ्जते योजयन्ति, मवित्रनुग्रहाय सङ्कल्प कुर्वन्तीति यावत् । उत अपि च, विप्रस्य मेधाविन सर्वज्ञस्य बृहतो महतो महामहिमवैभवस्य विपश्चित स्तुत्यस्य ज्ञानवतो वा सवितु- रनुज्ञया, 'सविता वै प्रसवानामीशे' (ऐ ० ब्रा० ७ १६) इति श्रुते, उतापि धिय कर्माण्यपि युञ्जते प्राप्नुवन्ति जानन्त्यनुतिष्ठन्ति च । स एव सविता होत्रा सप्तहोत्रकाणामुचिता क्रिया, वयुनावित् तत्तदनुष्ठानविषयप्रज्ञावेत्ता, प्रज्ञानामसु वयुनमित्यस्य पाठात् । अत एव एक इत् एक एव विदधे करोति पृथक् पृथगवधारयति सर्वाणि कर्माणि, सवितुः सर्वकर्मसाक्षित्वात् । तस्य सवितुर्देवस्य परिष्टुति स्तुति महती अतिप्रभूताऽपारेत्यर्थं । अत्रेश्वरोपासका योगिन इति न विप्रपदार्थ, अप्रासङ्गिकत्वात् । 'विपश्चितः सर्वविद्यायुक्तस्य' इत्यप्य- सङ्गतम्, सार्वश्येन गतार्थत्वात् । परमेश्वरस्य मध्ये मन युञ्जान इत्यपि नार्थः, मध्ये इत्यस्य पदस्य मन्त्रेऽदर्शनात् । उपासनाविषयक विचार इस प्रकरण के प्रारंभ में 'युञ्जते मनः' इत्यादि पाच मन्त्रो को उद्धृत कर दयानन्द ने कहा है कि इन मन्त्रो में इस बात का विधान किया गया है कि जीव को परमेश्वर की ही उपासना करनी चाहिये । किन्तु यह कथन गलत है, क्योकि इन मन्त्रों में कही भी विधि का प्रत्यायक प्रत्यय विद्यमान नही है । ' युज ' इत्यादि अनुक्रमणिका सूत्र के अनुसार इस सूत्र का आत्रेय कुल का श्याव नाम का ऋषि है । छन्द जगती और देवता सविता है । पृष्ठ्य अभिप्लव और षडह के प्रथम दिन वैश्वदेव शस्त्र में सविता देवता सबन्धी निविद् का आधान इसके द्वारा किया जाता है । आश्वलायन श्रौतसूत्र में इसी कार्य मे इसका विनियोग विहित है । मन्त्र का अर्थ इस तरह से होगा -बुद्धिमान् ब्राह्मण, जो कि यज्ञ के प्रसंग में ऋत्विक् और यजमान के रूप में विद्यमान रहते है, अपने संकल्प-विकल्पात्मक मन को यागादि शुभ कार्यों को संपन्न करने में लगाते हैं, अर्थात् हमारे ऊपर इन शुभ कार्यों के करने से सविता देवता का अनुग्रह हो, ऐसा संकल्प करते है । साथ ही मेधावी, सर्वज्ञ, महामहिमशाली, विद्वान् स्तुत्यर्ह अथवा ज्ञानवान् सविता देवता की आज्ञा के अनुसार, अपनी बुद्धि के अनुसार यज्ञादि कर्मों की पद्धति को जानते हैं और उनका यथावत् अनुष्ठान करते है । यह सविता ही सात प्रकार के होताओं के द्वारा सपन्न की जाने वाली क्रियाओं को जानता है । वयुन शब्द का निघण्टु में प्रज्ञा के पर्यायवाची शब्दो में पाठ किया गया है । अतः यह सविता ही उन उन अनुष्ठानों के करने की विधि को जानता है । यद्यपि ऋत्विक्, यजमान आदि इन क्रियाओ का अलग-अलग अनुष्ठान करते हैं, किन्तु वह सविता देवता अकेला ही इन सबका विधान करने वाला है, क्योकि वही इन सब अनुष्ठानो का साक्षी है । उस सविता देवता की स्तुति अर्थात् महिमा अपार है । यहा विप्र पद का अर्थ ईश्वर के उपासक योगी नही किया जा सकता, क्योंकि योगी का यहाँ कोई प्रसंग नही है । विपश्चित् का अर्थ सर्वविद्यायुक्त नही हो सकता, क्योंकि इस अर्थ की प्राप्ति तो आपके द्वारा व्याख्यात सर्वज्ञ पद से ही हो गई । परमेश्वर " १६८
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वेदार्थपारिजातः १३३८ , '.', ' परमेश्वरस्यानाद्यनन्तत्वेन मध्यदेशासम्भवाञ्च्च धियो बुद्धिवृत्ती इत्यप्यसङ्गतम् काम सङ्कल्पो विचिकित्सा ह्रीर्धीर्भी- रित्येतत् सर्वं मन एव' ( वृ० उ० ११५ ३ ) इति श्रुत्या धियो मनोऽन्तर्गतत्वात् । मनोयोगेन गतार्थत्वात् सावित्रसूक्तत्वान्मूले सवितुरिति श्रवणाच्च सविता देव एवात्र परमेश्वर । 'य सर्वमिद विदधे' इत्यप्य सङ्गतम्, मूलाक्षराननुगमात् । 'होत्रा' इत्युपस्थित कर्म परित्यज्यानुपस्थितकर्मकल्पनाया अनौचित्यात् । तथा च सप्तहोत्रकाणामुचिता क्रिया एव विदधाते कर्म, वयुनाविदित्यस्यापि प्रासङ्गिकत्वात् तत्तदनुष्ठानविषयप्रज्ञावेत्ता इत्येवार्थं । न शुभाशुभानि प्रजाश्च यो वेत्ति स, सार्वज्ञेन तदुक्त्या पौनरुक्त्यापत्ते । 'इत् सर्वत्र व्याप्तो ज्ञानस्वरूपश्च नास्मात्पर उत्तम कश्चित् पदार्थो वर्तते ' इत्यपि यत्किञ्चित्, इदित्यव्ययस्यैवार्थकत्वात् तथा च एक एवेत्यर्थं, व्याप्तिज्ञानार्थंकधातुकल्पनापेक्षया प्रसिद्धस्याव्ययस्य त्यागानौचित्यात्, महत इत्यनेनैव व्यापकत्वार्थलाभाच्च । एव कृते सति जीवा परमेश्वरमुपगच्छन्तीत्यप्यवेदार्थ एव वेदाक्षरबाह्यत्वात्, परमेश्वरस्य व्यापकत्वेन सर्वत्र स्थितस्योपगम्यत्वाभावाच्च । युञ्जान इति व्याख्याने यदुक्तम्—' योग कुर्वाण सन् तत्त्वावबोधार्थ ब्रह्मादितत्त्वज्ञानाय प्रथम मनो युञ्जान. सन् योऽस्ति तस्य धिय सविता कृपया परमेश्वर स्वस्मिन्नियुङ्क्ते । यतोऽग्नेरीश्वरस्य ज्योति प्रकाशस्वरूप निचाय्य यथावन्निश्चित्य अध्याभरत् स योगी स्वात्मनि परमात्मान धारितवान् भवेत् ॥ इदमेव पृथिव्या मध्ये योगिन उपासकस्य लक्षणम्' (पृ० १७७) इति, तदपि न युक्तम्, मन्त्रे 'स्वस्मिन्नियुङ्क्ते' इत्यादिपदाभावात् । यदि सवित्राग्निशब्दयोरुभयोरपि परमात्मपरत्वमेव स्यात्, तदा भिन्नपदयो • प्रयोगस्य प्रयोजन वक्तव्यम् । यस्याग्निरूपस्य परमेश्वरस्य ज्योतिर्निचाय्याभरत् स एव स्वस्मिन् धियं नियुञ्जीत । योगिनो लक्षणकथनमप्यप्रक्रान्तमेव । के मध्य में अपना मन लगाते है, यह भी अर्थ नही हो सकता, क्योकि मन्त्र में ' मध्य' पद नही है । परमेश्वर ता अनादि और अनन्त है । उसमें मध्यदेश की कोई सत्ता नही हो सकती । घी शब्द का अर्थ बुद्धि की वृत्तिया कहना भी गलत है, क्योकि ' कामः संकल्प.' इत्यादि बृहदारण्यकश्रुति के अनुसार घी का भी अन्तर्भाव मन मे ही किया जाता है । इस अर्थ की उपलब्धि ' युञ्जते मनः' इससे ही हो जाती है । यह सविता देवता सबन्धी सूक्त है, मूल मन्त्र में सविता पद सुना जाता है, अतः सविता देवता ही यहाँ परमेश्वर माना जायगा । इस सारे जगत् को जिसने बनाया, यह अर्थ भी असंगत है, क्योकि मूल मन्त्र के अक्षरो से इसकी कोई संगति नही है । मन्त्र मे उपस्थित होत्र कर्म को छोडकर अनुपस्थित जगत् को कर्म के रूप में उपस्थित करने में कोई तुक नही हो सकता । इसलिये सप्त होताओ की उचित क्रियाएँ ही यहाँ विदधाति क्रिया का कर्म है । 'वयुनावित्' इस पद की भी संगति इसी में है कि उन-उन अनुष्ठेय विषयो को जानने वाला, इसका अर्थ किया जाय । शुभ और अशुभ प्रज्ञानो को और प्रजाओ को जानने वाला, यह अर्थ इसका नही किया जा सकता, क्योकि पूर्वोक्त सर्वज्ञ पद से ही इसका कथन हो चुका है, पुनः इसी अर्थ को कहने मे पुनरुक्ति दोष को आपत्ति आयेगी । ' वही एक परमात्मा सर्वत्र व्यापक है और ज्ञानस्वरूप है, इससे परे कोई उत्तम पदार्थ नही है' ( पृ ० १७८) यह अर्थ भी गलत है, क्योकि 'इत् यह अव्यय ' एव' के अर्थ मे है । इसलिये इसका अर्थ ' अकेला ही' यह होगा । व्याप्ति और ज्ञानार्थक धातु की कल्पना करने की अपेक्षा प्रसिद्ध अव्यय को छोड़ देने में कोई औचित्य नही है । व्यापक अर्थ की उपलब्धि तो महदर्थक मही शब्द से ही हो जायगी । 'ऐसा करने से जीव परमेश्वर के सामीप्य को प्राप्त करते हैं ' ( पृ ० १७८ ) यह भी इस मन्त्र का अर्थ नही हो सकता, क्योकि मन्त्र में इस अर्थ के बोधक शब्द नहीं हैं । परमेश्वर तो सर्वत्र व्याप्त है, वह तो सभी जगह विद्यमान है, अतः उसके पास जाने का कोई प्रसंग ही नही है | ' युञ्जान' इत्यादि द्वितीय मन्त्र की व्याख्या दयानन्द ने इस तरह से की है – 'योग को करने वाले मनुष्य (तस्वाय) तत्त्व अर्थात् ब्रह्मज्ञान के लिये ( प्रथमं मनः ) जब अपने मन को पहले परमेश्वर में युक्त करते है, तब ( सविता ) परमेश्वर उनकी (घियम्) बुद्धि को अपनी कृपा से अपने में युक्त कर लेता है । ( अग्नेय० ) फिर वे परमेश्वर के प्रकाश को भिश्वय करके ( अध्याभरत्) यथावत् धारण करते हैं । ( पुथिव्याः ) पृथिवी के बीच में योगी का यही प्रसिद्ध लक्षण हैं' ( पृ० १७८ ). किन्तु यह भी सही नही है, क्योंकि मन्त्र में नियुक्त करता है, इस अर्थ के बोधक पद नही है । अर्थात् सविता और अग्नि ये दोनों शब्द परमात्मा के ही बोधक है, तब यह बताना पड़ेगा कि इन दोनो शब्दो का अलग अलग प्रयोग क्यो किया गया है? मन्त्र में योगी के लक्षण बताने का भी कोई प्रसंग नही है ।
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वेदार्थपारिजात १३३६ सिद्धान्तरीत्या तु -'प्रजापतिः प्रथमा चितिमपश्यत् । प्रजापतिरेव तस्या आर्षेयम् । देवा द्वितीया चितिमपश्यन् । देवा एव तस्या आर्षेयम् । इन्द्राग्नी च विश्वकर्मा च तृतीया चितिमपश्यस्त एव तस्या आर्षेयम् । परमेष्ठी पञ्चमी चिति- मपश्यत् परमेष्ठ्येव तस्या आर्पेयम्' ( श ६| २| ३| १० ), 'अष्टागृहीत जुहोति सन्ततमुद्गृह्णन् युञ्जान ' (का० श्री ० सू० १६/२७ ) गार्हपत्ये घृतं सस्कृत्य जुह स्रुवं च सम्भृज्य स्रुच्यष्टागृहीतमाज्यमाहवनीये परिस्तरणसमिदाधानपूर्वक सन्ततमविच्छिन्नधारया स्रुचमूर्ध्वा कुर्वन्नध्वर्युर्जुहोति युञ्जान इत्यष्टकण्डिकाभि । सान्तत्य च स्वाहाकारपर्यन्तम् । आद्या अनुष्टुप् । तृतीय सप्ताक्षर । सविता ऋषिर्देवोऽपि सविता । -, मन्त्रार्थस्तु सविता सर्वस्य प्रेरक प्रजापति अग्नेर्ज्योति चीयमानस्य वह्ने सम्बन्धि तेजो निचाय्य पञ्चपशुषु प्रविष्टमुपलभ्य, यद्वा सफलाना कर्मणा साधनभूतं निश्चित्य पृथिव्याः पशुशरीरान्विताया भूमे सकाशाद् अध्याभरत् अध्याहृतवान् इष्टकाः कृत्वाग्नि चितवानित्यर्थः । अत्र सवितृशब्देन प्रजापतिरुक्त. । 'प्रजापतिर्वे युञ्जान ' ( श ० ६| ३| १ | १२ ) । कीदृश:? प्रथममग्न्यारम्भे मनो युञ्जान समादधान, धियो बुद्धीरिष्टकादिविषयाणि ज्ञानानि तत्त्वाय तनित्वा विस्तार्य मनसालोच्य बुद्धयावधार्य प्रथममग्न्यारम्भे मनो युञ्जान समादधानः । तनु विस्तारे, क्त्वाप्रत्यये आगमविधेरनित्यत्वादिड- भाव' । 'अनुदात्तोपदेश' (पा० सू० ६ | ४ | ३७) इति नलोपे, ' क्त्वो यक्' ( पा० सू० ७ १/४७ ) इति क्त्वाप्रत्ययान्तस्य यगागमे तत्त्वायेति रूपसिद्धि । एतेन तत्त्वातत्त्वज्ञानायेत्यर्थस्त्ववैदिक एव | अग्निशब्दोऽपि कचिद् अग्निपरोऽपि लोकादिव्रजज्ञोऽ-, ' ' ( ) ग्निस्तदङ्गभूतोऽन्य ब्रह्म जज्ञ देवमी उप विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति का ० त० १११७ इति श्रुतेः । न चायमपि परमेश्वर एवेति भ्रमितव्यम्, यमस्य सकाशादग्निविद्याप्राप्त्यनन्तरमपि ब्रह्मविद्यायै नचिकेतसा वरान्तरवरण- हमारे मत मे तो प्रजापति ने प्रथम चिति को देखा, अत: इसका ऋषि प्रजापति है । द्वितीय चिति को देवताओ ने देखा, अतः वे ही उसके ऋषि है । इन्द्राग्नि और विश्वकर्मा ने तृतीय चिति को देखा, अत· वे ही उसके ऋषि हैं । परमेष्ठी ने पाचवी चिति को देखा, अत. परमेष्ठी हो उसके ऋषि है । ' अष्टागृहीतं जुहोति' इत्यादि कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार 'युञ्जान' इत्यादि आठ कण्डिकाओं से घृत की अविच्छिन्न धारा से आहुति दी जाती है । पहले गार्हपत्य अग्नि में घृत को तपाया जाता है, जुहू और स्रुव का भी संस्कार किया जाता है । स्रुचा मे आठ बार घृत लिया जाता है और परिस्तरण, समिदाधान आदि करने के बाद स्रुचा को ऊंचा उठाकर अध्वर्यु उक्त आठ कण्डिकाओ मे अग्नि में निरन्तर घृत की धारा डालता है । स्वाहाकार पर्यन्त इन कण्डिकाओ का निरन्तर पाठ किया जाता है । प्रथम कण्डिका मे त्रिष्टुप् छन्द है । तृतीय पाद सात अक्षर का है । सविता इसके ऋषि है और देवता भी । मन्त्र का अर्थ यह है - सविता अर्थात् सब प्राणियो के प्रेरक प्रजापति ने चीयमान वह्निसंबन्धी तेज को चुनकर, अर्थात् पाँच प्रकार के पशुओ मे छिपे हुए तेज को प्राप्त कर, अथवा अग्निसंबन्धी तेज ही सभी सफल कर्मों का साधक है, ऐसा निश्चय करके पशु का शरीर धारण किये हुए पृथिवी मे से उसको निकाल लिया, अर्थात् पृथिवी में उपलब्ध मिट्टी से इष्टकाओ का निर्माण कर उसमें अग्नि का चयन कर लिया । यहाँ सवितृ पद प्रजापति का वाचक है । शतपथ ब्राह्मण इसमें प्रमाण है । यह प्रजापति कैसा है? पहले ही अग्नि का आधान करते समय अपनी सारी बुद्धि को मनोयोगपूर्वक इष्टका ( इंट ) के निर्माण में ही, इन इष्टकाओ का निर्माण किस प्रकार होगा, इसकी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी मे हो लगा देता है । तस्वाय पद का अर्थ है तनित्वा । 'तनु विस्तारे' धातु से क्त्वा प्रत्यय होने के बाद आगम विधि की अनित्यता के कारण 'हट' का आगम नही होगा । ' अनुदात्तोपदेश० ' इत्यादि से नकार का लोप हो जाने पर क्त्वा प्रत्ययान्त ' तत्त्वा' शब्द के आगे ' यक' का आगम होने पर 'तत्त्वाय' पद बनता है । इस तरह से 'तत्त्वाय' पद का अर्थ 'तत्त्व ज्ञान के लिये' यह करना वैदिक प्रक्रिया की अनभिज्ञता का ही सूचक है । अग्नि शब्द भी कही सामान्य अग्नि का बोधक होते हुए भी यहाँ पृथिवी आदि लोको में प्रविष्ट हो जाने वाला अग्नि उससे भिन्न हो है, जो कि प्रजापति का ही अगभूत है । काठक श्रुति में इसी अग्निविद्या को जानकारी मिल जाने पर शान्ति की प्राप्ति की बात कही गई है । यह अग्नि भी परमेश्वर का ही स्वरूप है, ऐसा नही कहा जा सकता । क्योंकि यम के पास से अग्निविद्या के प्राप्त हो जाने के बाद भी ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के
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वेदार्थपारिजात' १३४० श्रवणात् । ' येय प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनु शिष्टस्त्वयाह वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ ' ( कठोप० १ १ २ ० ) इति श्रुतेः । न चैष वरो जीवविद्यापर एव, ' देवैरत्रापि विचिकित्सित किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ ' ( कठोप० १ १/२२ ) इति तस्य दुर्ज्ञेयत्वोक्तेः । यमेन च बहुधा प्रलोभ्येतस्माद्वरादन्य याचितुम्, अन्ततः 'नचिकेतो मरण मानुप्राक्षीः ' (कठोप० १ १/२५ ) इत्युक्तम् । तस्य च सुस्थिरा तद्विषयिणी जिज्ञासा दृष्ट्वा त प्रशस्य वैराग्योपदेशपूर्वकं तत्पराङ्मुखान्निन्दित्वा तत्त्वस्य दुर्ज्ञेयता चोक्त्वा ब्रह्मविद्या- मुपदिदेश । तस्मादग्निविद्याया भिन्नैव ब्रह्मविद्या, तत्प्रतिपादन एव वल्लीना पर्यवसानात् । युक्तेन मनसेति । सवितुर्देवस्य प्रजापतेः सवे प्रसवे आज्ञाया वर्तमाना वय यजमाना युक्तेनेन्द्रियेभ्यो नियमिते- नैकाग्रेण मनसा स्वर्ग्याय स्वर्गसाधकाय कर्मणे शक्त्या यथाशक्त्या प्रयतामह इत्यर्थः । यत्तु - 'सर्वे मनुष्या एवमिच्छेयुः स्वर्ग्याय मोक्षसुखाय शक्त्या योगबलोन्नत्या देवस्य स्वप्रकाशस्थानन्दप्रदस्य सवितुः सर्वान्तर्यामिणः परमेश्वरस्य सवेऽनन्तैश्वर्ये युक्तेन मनसा योगयुक्तेन शुद्धेनान्त करणेन वय सदोपयुञ्जीमहि' (पृ० १७७) इति, तत्तु आपातरमणीयम्, अप्रासङ्गिकत्वात् पूर्वोक्तश्रुतिसूत्रानुसारेण कर्मकाण्डपरा इमाः कण्डिका । तस्मान्नात्र स्वर्गशब्दो मोक्षपरः, कर्मणा नित्यमोक्षानुपपत्तेः । अनित्यो मोक्ष इति दयानन्दीयमतस्याश्रौतत्वात् । सर्वे मनुष्या इच्छेयु- रित्यपि वेदार्थबाह्य एव, मन्त्रे तादृशपदाभावात् । इच्छाया कृत्यविषयत्वेन विधानानुपपत्तेश्च । शक्त्येत्यस्य योगबलोन्नत्येति लिये नचिकेता के द्वारा दूसरे वर को प्राप्त करने की बात वही बताई गई है । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अग्निविद्या और ब्रह्मविद्या दोनो पृथक्- पृथक् हैं, अतः अग्नि को ही ब्रह्म नही कहा जा सकता । नचिकेता ने यम से तृतीय वर इस तरह से माँगा है कि मनुष्यो को यह संदेह बना रहता है कि मरने के बाद यह आत्मा रहती है या नहीं? आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये कि मैं इस सन्देह को अपने मन से निकाल सकूँ । यह वर जीवविद्या का बोधक नही माना जा सकता, क्योकि यही पर स्पष्ट कर दिया गया है कि इसी प्रश्न को पहले यमराज के सामने देवताओ ने भी उपस्थित किया था, किन्तु यम ने उनको इस प्रश्न का उत्तर नही दिया । नचिकेता कहते है कि इस विषय को समझाने वाला आपके जैसा मिलना कठिन है और इस वर से बढकर और कोई वर भी नही हो सकता । इससे स्पष्ट ही प्रतीत होता है, जो प्रश्न पूछा गया है, वह बडा गूढ, दुर्ज्ञेय है । इसीलिये यमराज अनेक प्रलोभन प्रश्नकर्ता के सामने रखकर उससे उसका मन हटाना चाहते है और अन्ततः कहते है कि ये नचिकेता, तुम मृत्युसंबन्धी प्रश्न मत करो । जब यमराज ने जान लिया कि नचिकेता को अपनी मूल जिज्ञासा से हटाना कठिन है, तो उन्होने इसके लिये उसकी प्रशंसा की और वैराग्य का उपदेश करते हुए, ब्रह्मतत्त्व से पराङ्मुख लोगो की निन्दा करते हुए तथा ब्रह्मतत्त्व की दुर्ज्ञेयता, दुर्योधता को बताते हुए अन्त में ब्रह्मविद्या का यथाविधि उपदेश किया । इस तरह से अग्निविद्या से ब्रह्मविद्या स्पष्ट रूप से भिन्न हैं और काठक उपनिषद् की आगे की बल्लियों में उसी का प्रतिपादन किया गया है । ' युक्तेन मनसा' इस तृतीय मन्त्र का अर्थ है -सविता देव प्रजापति की आज्ञा मे रहने वाले हम यजमान इन्द्रियों के विषयों से मन को एकाग्र कर स्वर्ग के साधक यज्ञ-याग आदि कर्मों के यथाशक्ति अनुष्ठान में लग जाने के लिये प्रयत्नशील है । दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है -'सब मनुष्य इस प्रकार की इच्छा करें कि ( वयम् ) हम लोग (स्वर्ग्याय) मोक्ष सुख के लिये ( शक्त्या) यथा योग्य सामर्थ्य के बल से, ( देवस्य ० ) परमेश्वर की सृष्टि में उपासना योग करके अपने आत्मा को शुद्ध करें कि जिससे ( युक्तेन मनसा ) अपने शुद्ध मन से परमेश्वर के प्रकाशरूप आनन्द को प्राप्त हो' ( पृ० १७८) यह अर्थ भी ऊपर- ऊपर से देखने में ही अच्छा मालूम पड़ता है, क्योंकि प्रकरण से या प्रकृत प्रसंग से इसका कुछ भी संबन्ध नही है । पूर्वोक्त श्रुति और सूत्रो के अनुसार ये कण्डिकाएं कर्मकाण्ड का निरूपण करती है । इसलिये इनमें स्वर्ग शब्द मोक्ष का वाचक नहीं माना जा सकता, क्योंकि कर्म से नित्य मोक्ष की प्राप्ति नही हो सकती । मोक्ष को भी अनित्य मानने वाला दयानन्द का मत श्रुतिसंगत नही है । सब मनुष्य इच्छा करें,, यह अर्थ भी नहीं किया जा सकता, क्योकि मन्त्र में इस तरह के अथ के बोधक पद विद्यमान नहीं हैं । इच्छा तो कृति का विषय नही हो सकती, अतः इच्छा का विधान नहीं किया जा सकता । शक्तिपद का अर्थ यौगिक बल से प्राप्त सामर्थ्य कैसे किया