वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 441–450
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 441–450
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वेदार्थपारिजातः १३४१ कथमर्थः? देवस्य सवितुरित्यनयोः पदयोरपि पूर्वोक्तश्रुतिप्रमाणेन प्रजापतिरूपो देव एवार्थ । सवेऽनन्तैश्वर्ये सदोपयुञ्जीमहीति निरर्थकमेव वाक्यम्, कर्मणोऽनिर्देशात् । हिन्दीभाषामय व्याख्यान तु सर्वथा बाह्य न मन्त्र न वा तत्मस्कृतव्याख्यानं स्पृशति । अहो जित धाष्टर्येन । युक्त्वाय अग्निकर्मणि युक्त्वा ये ते सविता तान् प्रसिद्धान् देवान् सयोज्य प्रसुवाति प्रसौति अभ्यनुजानाति प्रेरयतीत्यर्थ. । कीदृशान् देवान्? धिया बुद्धया कर्मणा वा दीव्यमान स्वर्ग यतो गच्छतः । शत्रन्तस्येणो यत इति रूपम् । धियोपासनात्मकेन ज्ञानेन शुभकर्मणा वा द्योतमान स्वर्गं गच्छतो देवान् । पुनः कीदृशम्? वृहत् महत्, ज्योतिरादित्यात्मक- मात्मत्वेन करिष्यत संस्कुर्वत । आत्मत्वबुद्धया हि सस्क्रियते सविता, आदित्यदृष्ट्या दृष्ट्यूपवत् । कीदृश सविता? धिया ज्ञानकर्मणा स्वर्गं गच्छतो देवान् अग्निकर्मणि सविता प्रेरयिता । प्रजापतिस्तान् देवान् इन्द्रियविशेषान् युक्त्वा विषयेभ्यो नियम्य प्रसुवाति प्रकर्षेणाग्निकर्मणि प्रेरयति, कीदृशान्? स्वर्गप्राप्त्यै समुद्यतान्, तथा बृहत् प्रौढ ज्योति, चीयमानस्याग्ने - स्तेजो धिया दिवं करिष्यतः, तत्तदिष्टकादिविषयया प्रज्ञया द्योतमान कर्तुमुद्यमान् देवान् सविता प्रसौति अभ्यनुजानाति प्रेरयतीत्यर्थः । --- यत्तु—'एवं योगाभ्यासेन कृतेन स्वर्यंत. शुद्धभावप्रेम्णा देवानुपासकान् योगिन सविता युक्त्वाय तदात्मनस्तु प्रकाशकरणेन सम्यग्युक्त्वा स्वकृपाधारवृत्त्या अनन्तप्रकाश दिव दिव्यं स्वरूप प्रमुवाति प्रकाशयति । तथा करिष्यत. सत्यभक्ति करिष्यमाणान् सविता परमकारुणिकोऽन्तर्यामीश्वरो मोक्षदाने सदानन्दयति' ( पृ ० १७७ ) इति, तत्तु तन्मनो-विलसितमेव, मन्त्राक्षराननुगमात् । 'स्वर्यत ' इत्यस्य 'शुद्धप्रेम्णा' इति विवरण शाब्दिकजगदुपहासास्पदमेव । देवानित्यस्यो- जा सकता है? 'देवस्य सवितु.' इन दोनो पदो का भी पूर्वोक्त श्रुति के आधार पर प्रजापति रूप देव ही अर्थ हो सकता है । सब का , अर्थ अनन्त ऐश्वर्य कर भगवान् के अनन्त ऐश्वर्य में अपने मन को नियोजित करे, ऐसा कहना भी निरर्थक है क्योकि यहाँ कर्म का निर्देश नही किया गया है । हिन्दी भाषा मे की गई व्याख्या तो और भी विलक्षण है । उसका न तो मन्त्र से ही कोई संबन्ध है और न उनकी अपनी संस्कृत व्याख्या से ही इससे बढकर और क्या घृष्टता हो सकती है? (युक्त्वाय) सविता देवता उन प्रसिद्ध देवताओ का अग्निकार्य मे अर्थात् यज्ञ-यागादि कर्मों में लगाकर उनमें निरन्तर इसी तरह की प्रेरणा भरता रहता है । ये देवगण अपनी बुद्धि अथवा कर्मों से प्रकाशमान स्वर्ग को प्राप्त करते है । इण् धातु से शतृ प्रत्यय होने पर ' यत्' शब्द बनता है । उपासनात्मक ज्ञान अथवा शुभ कर्मों के कारण प्रकाशमान स्वर्ग को जाते हुए देवताओ को अग्नि इन कार्यो मे लगाता है । ये देवगण आदित्य स्वरूप महान् ज्योति को अपने हो स्वरूप की तरह संस्कृत करते रहते हैं । सविता देवता को अपना ही स्वरूप मानकर ये उसका सस्कार करते रहते है, जैसे कि यज्ञीय यूप को आदित्य मानकर उसका सस्कार किया जाता है । यह सविता कैसा है? अपनी बुद्धि के व्यापार से स्वर्ग को जाने वाले देवताओ को अग्निकार्य यज्ञ-यागादि में लगाता है । प्रजापति इन देवताओ को, इन्द्रिय विशेषो को बाह्य विषयो की ओर बढने से रोक कर मनोयोगपूर्वक उनको यज्ञ-यागादि शुभ कर्मों में प्रवृत्त करता है । कैसे इन्द्रिय विशेषो को? जो कि स्वर्ग की प्राप्ति के लिये उद्यत है तथा चीयमान प्रौढ़ अग्नि की ज्योति से यही स्वर्ग को उतार लाने के लिये प्रयत्नशील है ॥ उन-उन इष्टका आदि के निर्माण मे प्रवीण बुद्धि से चीयमान अग्नि को प्रज्वलित करने में लगे हुए उन-उन इन्द्रिय विशेषों के अधिष्ठाताओ को यह सविता प्रेरणा और अनुमति प्रदान करता है । 'इसी प्रकार वह परमेश्वर देव भी ( देवान्) उपासको को (स्वर्यतो धिया दिवम्) अत्यन्त सुख को देकर ( सविता) उनकी बुद्धि के साथ अपने आनन्दस्वरूप प्रकाश को करता है, तथा ( युक्त्वाय ) वही अन्तर्यामी परमात्मा अपनी कृपा से उनको युक्त करके उनके आत्माओं में ( बृहज्ज्योतिः ) बड़े प्रकाश को प्रकट करता है और ( सविता ) जो सब जगत् का पिता है, वही (प्रसुवा०) उन उपासकों को ज्ञान और आनन्द आदि से परिपूर्ण कर देता है । परन्तु ( करिष्यतः ) जो मनुष्य सत्य, प्रेम, शक्ति से परमेश्वर की उपासना करेंगे, उन्ही उपासको को परम कृपामय अन्तर्यामी परमेश्वर मोक्षसुख देकर सदा के लिये आनन्दयुक्त कर देगा' ( १० १७८) यह व्याख्या मनोविलासमात्र है । मन्त्र के अक्षरों से इसका कोई संबन्ध नही है 1। 'स्वयंतः' शब्द का अर्थ ' शुद्ध प्रेम से '
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वेदार्थपारिजातः १३४२ पासकान् योगिन इत्यपि निर्मूलम् । 'धिया' इत्यस्य 'स्वकृपाधारवृत्त्या' इत्यपि चिन्त्यम् । तथा 'करिष्यत सत्यभक्ति करिष्यमाणान्' इत्यत्रापि सत्यभक्तेराक्षेपेऽध्याहारे वा कि मूलम्? 'बृहज्ज्योति ' इत्युपस्थितं कर्म परित्यज्य अनुपस्थित- कल्पनाया कथ न जिहेतीत्याश्चर्यम् । युजे वामिति । अत्र वामितिपदेन दम्पती यजमानौ विवक्षितौ । हे पत्नीयजमानो, वा युवयोरर्थे नमोभिरन्नैरिदानी हुतैर्वृते. सहितं पूर्व्यं पुरातनैर्महर्षिभिरनुष्ठितं ब्रह्म परिवृढम् अग्निचयनाख्य कर्माह युजे युनज्मि । ब्रह्मशब्देन प्राणा ऋषयो ब्राह्मणाश्च वक्तु शक्यन्ते । तेन वामर्थे पूर्व्यं पुरातन ब्रह्म ब्राह्मणजाति नमोभिरन्तैर्युजे योजयामि, अन्नर्ब्राह्मणान् तर्पयामि । किमर्थं सूरे पण्डितस्य यजमानस्य श्लोको यशो व्येतु विविधं लोकद्वय व्याप्नोतु । तत्र दृष्टान्त -पथ्या इव, पथोऽनपेताः पथ्या । यज्ञभागप्रवृत्ता आहुतिर्यथा लोकद्वय व्याप्नोति, एव यजमानश्लोक उभयलोकसञ्चारी । किञ्च, अमृतस्य मरणधर्म- रहितस्य प्रजापते परमात्मन. सर्वे देवा यजमानस्य श्लोक शृण्वन्तु । ये दिव्यानि दिवि भवानि स्थानानि आतस्थु अधिष्ठितवन्त " तेऽस्य कीर्ति शृण्वन्तु । दयानन्दस्तु वामिति पदेनोपासनाप्रदोपासनाग्रहीतारौ प्रति परमेश्वर प्रतिजानीत इत्यर्थयते । केन शब्देनैत- ज्ज्ञायते परमेश्वरोऽत्र वक्तेति च नोत्तरयति । सिद्धान्ते तु चयनयागसम्बन्धिन इमे मन्त्रा इति पारम्पर्येण श्रुत्या सूत्रेण च ज्ञायते । त्वदृष्ट्योपासनाप्रदाता परमेश्वर एव तेनैव तदुपदेशात् । तेनोपदेशप्रदोऽन्य इति त्वन्धविश्वासित्वस्यैव पोषणम् । ब्रह्म पूर्व्यं यदा तौ पुरातन सनातन ब्रह्म नमोभि स्थिरेण सत्यभावेन नमस्कारैरुपासाते, तदा तद् ब्रह्म ताभ्यामाशीर्वाद ददाति । 'यदा तौ ' इतीमे पदे वेदबाह्ये त्वत्कपोलकल्पिते एव | अमृतस्य मोक्षस्वरूपस्य परमेश्वरस्य पुत्राः तदाज्ञानुष्ठातार- स्तत्सेवका सन्ति । त एव दिव्यानि धामानि सुखस्वरूपाणि स्थानानि, आतस्थुः आसमन्तात् स्थिरा भवन्ति । अत्रापि करना शाब्दिक जगत् मे शास्त्रो की दृष्टि से हँसी का ही विषय हो सकता है । देव पद का अर्थ 'उपासक योगी' करना भी सर्वथा निराधार है | 'धिया' पद का अर्थ ' अपनी कृपा पर आधारित वृत्ति से करना भी विचारणीय है । तथा 'करिष्यत.' पद के साथ सत्य भक्ति का आक्षेप अथवा अध्याहार किस प्रमाण के आधार पर किया गया है? ' बृहज्ज्योति:' इस मन्त्र में विद्यमान कर्म को छोडकर अनुपस्थित की कल्पना करने में व्याख्याता को किसी संकोच का अनुभव नही होता, यह आश्चर्य की ही बात है | ' युजे वा०' इत्यादि मन्त्र में भी 'वाम्' यह पद यजमान दम्पती का बोधक है । हे सपत्नीक यजमान, तुम दोनो के कल्याण के लिये मैं अन्न और घृत आदि की आहुति देकर पुरातन महर्षियों के द्वारा अनुष्ठित अग्निचयन नामक कर्म को संपन्न करता हू । ब्रह्म शब्द यहाँ प्राण, ऋषि और ब्राह्मणो का भी बोधक हो सकता है । इसलिये यह भी अर्थ हो सकता है कि मैं तुम दोनो के लिये पुरातन ब्राह्मणों को अन्न से संपन्न कर दे रहा हूं, अर्थात् उनके लिये अन्न देकर उनको संतुष्ट कर रहा हूं । किस लिये? इस लिये कि हमारे सुबुद्ध यजमान का यश सब तरफ इस लोक और परलोक मे सब जगह फैल जाय । इसमें दृष्टान्त देते है - जैसे यज्ञ के अंश के रूप में दी गई आहुति दोनों लोको में व्याप्त हो जाती है, उसी तरह हमारे यजमान का यश भी सब जगह व्याप्त हो जाय । अपि च, मरणधर्म से रहित अमृतमय प्रजापति परमात्मा से सभी देवगण हमारे यजमान के यश की वृद्धि की कामना करें । जिन देवताओं ने दिव्य स्थानो को प्राप्त किया है, उन पर अधिकार स्थापित कर लिया है, वे भी हमारे यजमान की कीर्ति को सुनें । इसके विपरीत दयानन्द ' वाम्' पद का अर्थ उपासना का उपदेश देने वाले और ग्रहण करने वाले दोनो के प्रति परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है, ऐसा करते हैं । वे इसका कोई उत्तर नहीं देते कि उनको यह कैसे मालूम हुआ कि इस मन्त्र के वक्ता परमेश्वर हैं । हमारे मत में तो यह बात परम्परा से तथा श्रुति और सूत्र से भी ज्ञात होती हैं कि ये मन्त्र चयनयाग से संबद्ध है । आपके मत से उपासना को समझाने वाले,, उसका उपदेश करने वाले परमेश्वर ही है । तब उससे भिन्न कोई उपदेश करने वाला माना जाय, यह तो अन्धविश्वास को बल देना ही हुआ । 'जब तुम (ब्रह्म पूर्व्यम्) सनातन ब्रह्म की (नमोभि ) सत्यप्रेमभाव से अपने आत्मा को स्थिर करके नमस्कार आदि से उपासना करोगे, तब मैं तुमको आशीर्वाद दूंगा' ( पृ० १७८- १७ ९) इस व्याख्या में भी ' यदा तो' ये दोनों पद मन्त्र में नही है, आपकी कल्पना ने इनको पैदा किया है । ' अमृत अर्थात् मोक्षस्वरूप परमेश्वर के पुत्र तुम्हारी आज्ञा के पालन करने वाले सेवक है । वे ही दिव्यधाम को, सुखस्वरूप स्थानों को सब ओर से घेर कर रहते है ' ( १० १७ ९) यहाँ भी ' अमृतस्य 1
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वेदार्थपारिजातः १३४३ 'अमृतस्य पुत्रा ' (ऋ ० स ० १० | १३ | १ ) इत्यस्य अमृतस्याज्ञानुष्ठातार इति कथमर्थ? शृण्वन्तु प्रख्यात जानन्तु, इत्यादिकमपि क्लिष्टकल्पनमेव, 'उपासना कुर्वाणी वा युवा द्वो प्रतीश्वरोऽहं युजे कृपया समवेतो भवामि इत्यपि निराधारम्, मन्त्राक्षरार्थान- नुगमात् । अनया रीत्या कस्यापि मन्त्रस्य स्वेच्छया स्वाभीष्टपरतया व्याख्यानेन सर्वत्र व्याख्यानेऽतिप्रसक्तिरेव स्यात् |। वेद एवेश्वरस्य संविधानम्, तदनुसरणेन तदनुग्रहोऽतिलङ्घनेन निग्रहश्व भवति, तत पृथग् एव करिप्यसि तदाहमाशीर्वाद दास्यामीति कल्पन बालजल्पनमेव । ' सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथग् धीरा देवेषु सुम्नया' (वा० म० १२६७) इत्यय मन्त्रोऽपि न तदर्थसाधक. । अत्र ‘ दक्षिणामग्निश्रोणिमपरेण तिष्ठन् युज्यमानमभिमन्त्रयते सीरा युञ्जन्तीति' (का० श्री० सू० १६/२/११ ) इति सूत्रानुसारेण चितेर्दक्षिणश्रोणेः पश्चिमे तिष्ठन्नध्वर्यु प्रतिप्रस्थात्रोत्तरा स पूर्वे षड्भिर्वा दशभिर्वा चतुर्विंशत्या वा — वृषैर्युज्यमानमौदुम्बर हल द्वाभ्यामभिमन्त्रयते । सीरदेवत्ये सोमपुत्रबुधदृष्टे द्वे गायत्रीत्रिष्टुभौ । मन्त्रार्थस्तु धीरा धीमन्तोऽग्निक्षेत्रविद. कवय कृषिकर्माभिज्ञा सीरा सीराणि हलानि युञ्जन्ति वृषैर्योजयन्ति, युगा युगानि पृथग् नाना वितन्वते विस्तारयन्ति, देवेषु सुम्नया देवाना सुख कर्तुम्, 'सुम्नया' इत्यत्र चतुर्थ्या यादेश. । धीरा कवय इत्यत्र बहुवचनं पूजार्थम्, तयोरेकत्वात् । युगानि तु वृषभेदेन बहून्येव सन्ति । दयानन्दस्तु-हे कर्षका, सीरा सीराणि हलानि युक्त युक्त योजयत । 'तप्तनप्तनथनाश्च' (पा० सू० ७| १| ४५) इति थस्य तनादेशे इनसोरल्लोपाभावे युनक्तेति रूपम् | युगा युगानि वितनुध्व सम्यग्योक्त्रादिभिविस्तारयत । तत कृते कर्षणेन सस्कृते इह अस्मिन् योनौ क्षेत्रे वीज व्रीह्यादिक यूय गिरा 'या ओषधी ' ( वा० स० १२/७५ ) इत्यादिकया वेदमन्त्र वाचा चकाराच्चमसेन च वपत, 'वाग् वै गीरन्न श्रुष्टि ' (श० ७ २/२/५ ) इति श्रुते । श्रुष्टिः व्रीह्यादिकान्नजाति सभरा असत, भरण भर पुष्टिः, भृजोऽसुन्, भरसा फलपुष्पादिभिः सह वर्तमाना, भरसाऽन्नव्रातेन वर्तत इति वा सभरा पुष्टा अस्तु । पुत्रा. इनका अर्थ अमृत को आज्ञा का पालन करने वाले कैसे होगा? ' शृण्वन्तु' पद का अर्थ उस प्रख्यात परमात्मा को जानो, यह कहना भी एक कठित कल्पना है । 'उपासना करने वाले तुम लोगो के प्रति मैं ईश्वर की कृपा से युक्त हो जाता हू' यह अर्थ भी निराधार है, क्योकि मन्त्र में विद्यमान अक्षरो से इसका कोई संबन्ध नही है । इस तरह से मनमानी पद्धति से किसी भी मन्त्र का कुछ भी अर्थ करने से सब जगह अव्यवस्था ही फैन जायगी । वेद ही ईश्वर का संविधान है । उसके अनुसार चलने से ईश्वर का अनुग्रह और विपरीत चलने पर ईश्वर का कोप होगा । इस अवस्था मे ऐसा करोगे तब मैं तुमको आशीर्वाद दूगा, इस तरह की कल्पना बच्चो की सी बात मानी जायगी । 'सोरा युञ्जन्ति० ' इत्यादि मन्त्र भी उसके मत का समर्थक नही है । कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार चिति के दक्षिण कटि भाग के पश्चिम में अवस्थित होकर अध्वर्यु प्रतिप्रस्थाता के उत्तर में छ, दस अथवा चोबीस बैलो से जोते जानेवाले उदुम्बर वृक्ष से बनाये हल को इन दो मन्त्रो से अभिमन्त्रित करता है । इनका देवता सीर है और सोमपुत्र बुध इनका ऋषि है । गायत्री और त्रिष्टुप् क्रमशः इन दोनों का छन्द है । मन्त्र का अर्थ यह है— बुद्धिमान्, अग्नि के स्थान को जानने वाले, कृषिकर्म में निपुण लोग हलो के साथ बैलों को जोतते है । जब वे बैलो को इनमें जोतते हैं तो हलों को भाति भाति के जुओ से सजाते है, जिससे कि देवताओं का कल्याण हो, उनको सुख प्राप्त हो । 'सुम्नया' पद मे चतुर्थी के अर्थ में 'या' का आदेश हुआ है । 'धीराः, कवयः' इन पदो में बहुवचन आदर का प्रदर्शन करने के लिये है । बैलो की भिन्नता पर जुएं भी भिन्न भिन्न बहुत से हो हो जायेंगे । 'युनक्त सीरा०' इत्यादि द्वितीय मन्त्र का अर्थ यह है - हे कृषको, तुम लोग हल जोतो । 'तप्तनप्तनथनाश्र्व' इस पाणिनि सूत्र से थ के स्थान में तन आदेश होने पर और अकार को लोप न होने से 'युनक्त' यह रूप बनता है । जुओ का विस्तार करो, अर्थात् बैलो की जोड़ियों को बढाओ । ऐसा करने के बाद कर्षण आदि संस्कारों से परिष्कृत इस खेत में व्रीहि आदि के बीजो को बोवो 1| ऐसा करते समय तुम वेदमन्त्रो का उच्चारण करो और चमस की सहायता से बीजो का वपन करो । ऋषि अर्थात् व्रीहि प्रभृति नाना प्रकार की अन्न की जातियाँ तुम्हारे खेतों में फल-पुष्प आदि से भरपूर हो । पके हुए अनाज को तुम लोग शीघ्र ही काट कर अपने
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वेदार्थपारिजातः १३४४ इद् एव, अन्तिकतममेवमत्यल्पकालमेव पक्वं धान्य सृण्यो लवनसाधनेनपक्व धान्यं नेदीय इत् अतिशयेनान्तिक नेदीय ।दात्रेण, लूनमिति शेष । दात्रेण छिन्नं सन् न अस्मान् आ इयात् आगच्छतु । अल्पकालेन पक्वमन्नमस्मद्गृहमागच्छत्वित्यर्थः स्यात्तथा वपतेत्यर्थं ।यद्वा सृण्यो दात्रान् पक्वमोषधमा इयात् । दात्रैर्लूनं पक्वमोषध नेदीयो निकटतम यथा । यद्यपि ब्राह्मणैरपि मन्त्रोच्चारणपूर्वकाणि कर्माणि फलपर्यवसायीनि भवन्ति, मन्त्राश्च कर्मस्मारका भवन्ति । तेन ब्राह्मणसूत्र-द्रव्यदेवतादय. स्मर्तुं शक्यन्ते, तथापि नियमादृष्टोत्पत्तये मन्त्रैरेव द्रव्यदेवते स्मर्तव्ये इति मीमासकराद्धान्तः रीत्या पूर्वोक्त एव मन्त्रार्थः । नाडी युञ्जन्ति, यत्तु—— कवय क्रान्तदर्शना क्रान्तप्रज्ञा धीरा ध्यानवन्तो योगिन सीरा योगाभ्यासोपासनार्थं ते देवेषुअर्थात् तासु परमात्मानं ज्ञातुमभ्यस्यन्ति । युगानि योगयुक्तानि कर्माणि वितन्वते विस्तारयन्ति । य एवं कुर्वन्तियुञ्जन्तीति ' ( ),,विद्वत्सु सुम्नया सुखेनैव स्थित्वा परमानन्द युञ्जन्ति प्राप्नुवन्ति पृ० १७९ इति तत्तु सर्वथाऽप्रासङ्गिकमसङ्गतबीजाभावाच्चच ॥क्रियापदेन योगावगममूलकभ्रान्तिनिबन्धनत्वात् ॥ सीरापद हलेषु प्रसिद्धम्, तदपहायाप्रसिद्धनाड्यर्थकत्वे सति गत्यन्तरे युञ्जन्तीति क्रियापदस्यावृत्तौ मानाभावाच्च । सीरेति योगेन शान्ताकाङ्क्षत्वाच्च । परमानन्दमित्यध्याहारोऽपि दोष एव । युनक्त इत्यत्र तूक्तम्— है योगिनो यूय योगाभ्यासोपासनेन परमात्मयोगेनानन्द युनक्त तद्युक्ता भवत, एव योजयत । मोक्षसुखं सदा वितनुध्वम् । तथा युगा उपासनायुक्तानि कर्माणि प्राणादित्ययुक्ता नाडी: युनक्त उपासनकर्मणि एवं कृते योनौ अन्त करणे शुद्धे कृते सति परमात्मयोनौ कारणे आत्मनि वपते ह वीजम्, उपासनाविधानेन योगोपासनया विज्ञानाख्य वीज वपत तथा गिरा च वेदवाण्या विद्यया युक्त युक्ता भवत । किञ्च क्षिप्र शीघ्र योगफल नो नेदीय. घर ले जाओ और हमारे घर भी पहुंचा दो । थोड़े से ही समय में पक कर यह अनाज हमारे घर भी पहुंच जाय । अथवा दराती से काटा हुआ अन्न शीघ्र घर पहुंच जाय, इसके लिये तुम उसको बहुत पास पास मे बो दो । प्राप्त होता है । ये मन्त्र यज्ञ में सम्पन्न जो कार्य मन्त्र का उच्चारण करते हुए किया जाता है, उसका फल शीघ्र , देवता इत्यादि का स्मरण कराने में समर्थ है, तो होने वाले विविध क्रियाकलापो का स्मरण कराते हैं । यद्यपि ब्राह्मण ग्रन्थ भी द्रव्य भी नियमतः अदृष्ट की उत्पत्ति के लिये मन्त्रो से ही द्रव्य और देवता का भी स्मरण किया जाता है । ऐसा मीमासको का सिद्धान्त है । इस तरह से ब्राह्मण और श्रीतसूत्रों के अनुसार दयानन्द के द्वारा उद्धत उक्त दो मन्त्रो का यही ठीक अर्थ है । दयानन्द ने प्रथम मन्त्र का अर्थ किया है- ' (कवयः ) जो विद्वान् योगी लोग और ( धीराः ) ध्यान करने वाले हैं, वे ( सीरा युञ्जन्ति पृथक् ) यथा योग्य विभाग से नाडियो में अपने आत्मा से परमेश्वर की धारणा करते है । ( युगा) जो योगयुक्त कर्मों में तत्पर रहते है, (वितन्वते ) अपने ज्ञान और आनन्द को सदा विस्तृत करते हैं ( देवेषु सुम्नया ) वे विद्वानों के बीच में प्रशंसित होकर परमानन्द को प्राप्त होते हैं' (पृ० १८० ) । यह अर्थ सर्वथा अप्रासंगिक तथा असंगत है । 'युञ्जन्ति' इस क्रियावाचक पद के कारण व्याख्याकार को यहां योग की प्रक्रिया का प्रतिपादन किया गया है, इस प्रकार की भ्रान्ति हो जाने से यह सब गडबड घोटाला कर दिया गया है । 'सोर' पद हल के अर्थ में प्रसिद्ध है । उसको छोड़कर उसका अप्रसिद्ध नाडी अर्थ करने का कोई आधारभूत प्रमाण विद्यमान नही है । 'युञ्जन्ति' इस क्रिया पद की आवृत्ति करने में भी कोई प्रमाण नही है । उसकी आकांक्षा तो ' सीर' पद के साथ उसका संबन्ध हो जाने से ही शान्त हो जाती है । जब ऊपर बताई पद्धति से मन्त्र का अर्थ बिना किसी पद का अध्याहार किये ही हो जाता है, तो 'परमानन्द' पद का अध्याहार करना भी दोष हो माना जायगा । 'युनक्त० ' इत्यादि द्वितीय मन्त्र का अर्थ दयानन्द ने इस तरह से किया है-' हे उपासक लोगो, तुम योगाभ्यास तथा परमात्मा के योग से नाडियो में ध्यान करके परमानन्द को ( वितनुध्वम्) विस्तार करो । ऐसा करने से (कृते योनी) योनि अर्थात् अपने अन्तःकरण को शुद्ध और परमानन्द स्वरूप परमेश्वर में स्थिर करके उसमें उपासना विधान से विज्ञान रूप (बोजं ) बीज को ( वपत) अच्छी प्रकार से बोवो | तथा ( गिरा च ) पूर्वोक्त प्रकार से वेदवाणी करके परमात्मा में ( युनक्त) युक्त होकर
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SAGE A वेदार्थपारिजातः १३४५ नोऽस्मान् नेदीय अतिशयेन निकटं परमेश्वरानुग्रहेण असत अस्तु । कथभूत फल पक्वं शुद्धानन्दसिद्धम् एयात् प्राप्नुयात् । इत्सृण्य. उपासनायुक्ता योगवृत्तय सृण्य. सर्वक्लेशहन्त्र्य एव भवन्तु । इदिति निश्वयार्थं पुन कथम्भूतास्ता? समना: शस्त्रादिपुष्टा एव । एताभिर्वृत्तिभि परमात्मयोग वितनुध्वम् । अत्र प्रमाण भ्रष्टीति । क्षिप्रनामसु अष्टीति (नि० ६ १२ ) 'द्विविधा सृष्टिर्भवति भर्ता हन्ता च (नि० १३/५ ) (पृ० १७९) । वस्तुतस्त्वयमर्थो महीधरार्थमनुसृत्य पदानामर्थान्तरमुपवर्ण्य कृत., अतो यत्किञ्चिज्जल्पनमेव । तच्च प्रकरणसूत्रादिविरुद्धत्वादुपेक्ष्यम् । आनन्दं युनक्त इति न विधानमर्हति फलस्याविधेयत्वात् । मोक्षमुखस्य विस्तारोऽपि न सम्भवति तथात्वे परिणामित्वेन तस्यानित्यत्वापातात् । सीराः प्राणादित्ययुक्ता नाडीश्वोपासनाकर्मणि युक्त इत्यत्र युनक्तेति क्रियापदस्यावृत्ति-, श्चिन्त्या पूर्वान्वयेन शान्ताकाङ्क्षत्वात् । उपासनाकर्मणीत्यध्याहारोऽपि निर्मूल । सीरा नाड्यस्ताभि प्राणादित्ययोग इत्यर्थ. । सीरा युनक्तेत्याभ्या पदाभ्या कथमयमर्थ आयाति? कथ च तद्योग इति क्व केनोक्तम्? इत्यपि नोक्तम् । यस्य क्षेत्रस्य सस्कारो भवति तत्रैव बीजमुप्यते । त्वया त्वन्त करणे शुद्धे कृते योनौ कारणे आत्मनि बीजवपनमुच्यते, उपासना- विधानेन योगोपासनाया बीज विज्ञानाख्यबीजवपनमुच्यते । य खलु परमानन्दरूपः कारणात्मास्ति, तत्र विज्ञान- बीजवपनस्य कि प्रयोजनमिति न ज्ञायते । किञ्च यो बीज वपति योगफल तन्निकटे युज्यते । अत्र तु सम्बोधनार्हा योगिनः कर्मबीज वपन्ति । फल तु सम्बोधकाना निकटमायातीति चित्रम् । पक्वमित्यस्य शुद्धानन्दसिद्धम् । शुद्धानन्दस्तु साध्य. प्राप्यो वा? तस्य साधनत्व कथम्? तेन साध्य फल च किम्? तस्मान्निरर्थकं धूलिप्रक्षेपप्रायमेव तद् व्याख्यानम् | हिन्दीभाष्यं तु संस्कृतव्याख्यानादपि भ्रष्टतरम् । उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना मे प्रवृत्ति करो | तथा ( श्रुष्टि ) तुम लोग ऐसी इच्छा करो कि हम उपासना योग के फल को शीघ्र प्राप्त करें । और ( नो नेदीय:) हमको ईश्वर के अनुग्रह से वह फल निकट हो ( असत्) प्राप्त हो । कैसा वह फल हैं? ( पक्वम् ) जो परिपक्व शुद्ध परम आनन्द से भरा हुआ और मोक्षसुख को प्राप्त कराने वाला है । ( इत्सृण्य ) अर्थात् यह उपासना योगवृत्ति कैसी है? सब क्लेशो को नाश करने वाली और ( सभरा ) सब शान्ति आदि गुणो से पूर्ण है । उन उपासना योगवृत्तियो से परमात्मा के योग को अपने आत्मा मे प्रकाशित करो' ( पृ० १८० ) । वास्तव में यह अर्थ नहीघर के द्वारा किये गये अर्थ के आधार पर किया गया है, किन्तु साथ ही पदो को तोड़ -मरोड कर कुछ बदल भी दिया गया है । इसलिये यह सब उल-जलूल बकवास से भरा हुआ है । प्रस्तुत प्रकरण, ब्राह्मण, सूत्र आदि ग्रन्थो के विरुद्ध होने से दयानन्द कृत यह अर्थ सर्वथा उपेक्षणीय है । आनन्द का विधान नही किया जा सकता, क्योकि फल विधेय नही होता । मोक्षसुख का विस्तार हो भी नही सकता, क्योकि ऐसा मानने पर उसकी परिणामशीलता के कारण उसमें अनित्यता आ जायगी । सीर पद का अर्थ प्राण और सूर्य से संचालित हो रही नाडियाँ करना और उनका उपासना के साथ योग करने के लिये ' युनक्त' इस क्रिया पद की आवृत्ति करना भी गलत है, क्योकि उसका तो पहले ही योगी पद से आपने संबन्ध कर दिया है । 'उपासना कम' पद का अध्याहार करना भी निराधार हो है । सीरा वे नाडियाँ है, जिनका प्राण और आदित्य से योग होता है । यह अर्थ 'सीरा युनक्त' इन दो पदो से कैसे निकल सकता है और उनका योग कैसे होगा? ऐसा किसने कहाँ कहा है }, यह भी आपने बताया नही है । जिस क्षेत्र का सस्कार किया जाता है, जिसको जोता जाता है, वही बीज भी बोया जाता है । आप संस्कार तो करते है अन्तःकरण का और बीज वपन करते है अन्तःकरण के कारणभूत आत्मा मे । उपासना के विधान के द्वारा योगोपासना का विज्ञान नामक बीज उस आत्मा मे बोया जाता है । आत्मा तो परमानन्द स्वरूप है । सबके कारणभूत परमानन्दात्मक इस आत्मा में ज्ञान बीज को बोने का प्रयोजन क्या है, यह मालूम नही होता । अपि च, जो बीज बोता है, उसके योग का फल उसी के पास रहना चाहिये । आपके मत से संबोधनीय योगी कर्मरूपी बीज को बोते है और उनका फल संबोधक के पास आ जाता है, यह बडी विचित्र बात है । पक्व का अर्थ शुद्धानन्द से सिद्ध किया गया है । फल क्या होगा? इस तरह से विचार करने परयह शुद्ध आनन्द साध्य है या प्राप्य? वह साधन कैसे हो सकता है? उससे साध्य दयानन्द की यह व्याख्या सीधे आंखो में धूल झोंकने के समान है । हिन्दी भाष्य तो संस्कृत भाष्य से भी अधिक भ्रष्ट है । १६ ९
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वेदार्थपारिजातः १३४६ 'अष्टाविशानि शिवानि शग्यानि महयोग भजन्तु मे । योग प्रपद्ये क्षेमं च क्षेम प्रपद्ये योगं च नमोऽहोरात्राभ्यामस्तु' ( अथर्व० १९/ ८/ २ ), ' भूयानरात्या. शच्या पतिस्त्वमिन्द्रासि विभू प्रभूरिति त्वोपास्महे वयम् । नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत । अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन' ( अथर्व० १२८ २-४ ) । तत्र प्रथममन्त्रार्थ – अष्टाविशानि प्रत्येक-मष्टाविशते. सख्यापूरणानि । पूरणार्थेऽट्प्रत्यये कृते रूपमिद्धि । कृत्तिकेत्यादीनि भरण्यन्नाति नक्षत्राणि शिवानि, सुखदर्शनानि, शग्मानि सुखप्रदानि तानि सर्वाणि नक्षत्राणि मे मदर्थ फल दातु सहयोग सहभावमैकमत्य भजन्तु । नक्षत्राणामैकमत्येन सहयोगाग्रह योगमलब्धलाभं प्रपद्ये पूर्वमलब्धवस्तूनि नक्षत्रप्रसादाल्लभेय, क्षेम लब्धवस्तुरक्षणात्मक च प्रपद्ये । पूर्वमलब्ध- वस्तूनि नक्षत्रप्रसादाल्लभेय, क्षेम लब्धवस्तुरक्षणात्मक च प्रपद्ये । क्षेमस्यान्वाचयशिष्टत्वेनाप्राधान्यशङ्कामपाकर्तुं तत्प्राधान्येन चाह -क्षेमं च प्रपद्ये योग च । एतेनोभयोरपि प्राधान्य सिद्धयति । नमोऽस्त्वहोरात्राभ्यामहनि रात्रौ च नक्षत्राणा सञ्चर- णात् तयोरानुकूल्यकरणम् । दयानन्दस्तु–' हे परमेश्वर, कृपयाऽष्टाविगति शिवानि कल्याणानि कल्याणकारकाणि सन्तु । अर्थाद् दशेन्द्रि-याणि दश प्राणा मनो बुद्धिश्चित्ताहङ्कारविद्यास्वभावशरीरबल चेति । शग्मानि सुखकारकाणि भूत्वा दिवसे च रात्रौ चो- पासनव्यवहारं योग मे मम भजन्तु सेवन्ताम् । तथा भवत्कृपयाहं योगं प्रपद्ये क्षेम च प्रपद्ये 1। यतोऽस्माक सहायकारी भवान् भवेदेतदर्थ सतत नमोऽस्तु' ( पृ ० १८० - ९ ८१ ) । अत्र प्रकृतपरित्यागाप्रकृतप्रक्रिये स्पष्टं दृश्येते । 'चित्राणि साकं दिवि रोचनानि' ( अथर्व ० १ ९| ७| १ ), 'यानि नक्षत्राणि' ( अथर्व० १९/ ८/ १ ) इति पूर्वसूतेऽस्मिंश्च सुक्ते प्रथममन्त्रे स्पष्टतया नक्षत्राणि प्रकृतानि । तान्यपहाय प्राणेन्द्रियादिभिरष्टाविशतिसख्यापूरणमप्रकृतप्रक्रियैव । हे परमेश्वरेति सम्बोधनमपि निराधारम् । मन्त्रस्यायमेवार्थं इति कथं प्रत्ययः? चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैरात्मान्तरात्मपरमात्मज्ञानात्मभिरप्येतत्सख्यापूर्तिसम्भवात् । एव-मनेकधा तत्पूर्तिः सम्भवति । उपासनाव्यवहारयोगं ज्ञानयोगमष्टाङ्गयोग भजन्त्वित्यत्रापि विनिगमनाभाव एव । इसके आगे दयानन्द ने ' अष्टाविंशति' इत्यादि चार मन्त्र उधृत किये हैं । उनमें से पहले मन्त्र का अर्थ यह है – एक-एक मिलकर अट्ठाईस संख्या को पूरा करने वाले कृत्तिका से लेकर भरिणी पर्यन्त नक्षत्र सुख का दर्शन कराने वाले और सुख को देने वाले है | ये सब नक्षत्र मेरे कल्याण के लिये, मुझे शुभ फल देने के लिये परस्पर एक मत हो जाय । इन नक्षत्रो का यदि इस विषय में ऐकमत्य हो जाय तो मैं इनके सहयोग से अलब्ध लाभ को प्राप्त कर सकता हूँ, ऐसी वस्तुओ को प्राप्त कर सकता हूँ, जो कि इससे पहले मुझे नही मिली थी, जिनको कि योग के नाम से जाना जाता है । योग ही नहीं, उसके साथ मैं क्षेम को भी प्राप्त करूँ । प्राप्त वस्तु की रक्षा को क्षेम कहा जाता है । योग के बाद ही क्षेम की स्थिति हो सकती है । इसलिये योग प्रधान और क्षेम अप्रधान है, इस तरह की आशंका हो सकती है । इसको दूर करने के लिते श्रुति में योग और क्षेम दोनो की समप्रधानता बताई गई है । नक्षत्रगण दिन और रात्रि में निरन्तर संचरणशील रहते हैं, अतः उनकी अनुकूलता के लिये उनको दिन - रात नमन किया जाता है । दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है -' ( अष्टाविंशानि शिवानि० ) हे परमैश्वर्य युक्त मगलमय परमेश्वर, आपकी कृपा से उपासना योग प्राप्त हो तथा उससे मुझे सुख भी मिले । इसी प्रकार आपकी कृपा से दस इन्द्रिय, दस प्राण, मन बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, विद्या, स्वभाव, शरीर और बल ये अट्ठाईस सब कल्याणो में प्रवृत्त होकर उपासना योग को सदा सेवन करें तथा हम भी ( योगं० ) उस योग के द्वारा ( क्षेम ) रक्षा को और रक्षा से योग को प्राप्त हुआ चाहते है । इसलिये हम लोग रात-दिन आपको नमस्कार करते है' (पृ ० १८३ ) इस अर्थ में प्रकृत विषय का परित्याग और अप्रकृत विषय का ग्रहण स्पष्ट दिखाई पड़ता है । इसके पूर्व के सूक्त में और इस सूत्र के भी प्रथम मन्त्र में स्पष्ट ही नक्षत्रों का ग्रहण किया गया है । उनको छोड़कर प्राण, इन्द्रिय आदि से अट्टाईस संख्या पूरी करना अप्रासंगिक ही माना जायगा । हे परमेश्वर, यह संबोधन भी मन्त्र में न होने से निराधार है । मन्त्र का आपका किया अर्थ ही कैसे सही माना जायगा? अट्ठाईस संख्या की पूर्ति चौबीस तत्त्वों के साथ आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा को मिलाने से भी सकता है । इसी तरह से इसकी पूर्ति के और भी अनेक प्रकार हो सकते है । उपासना योग, ज्ञान योग और अष्टांग योग में से वह किस योग का सेवन करे, इसमे भी आपके पास कोई निश्चायक हेतु विद्यमान नही है । }
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वेदार्थपारिजातः १३४७ यत्तु केनचिदुक्तम्— ' शब्दार्थपरिच्छेदे उपक्रमोपसहारावपि प्रमाणम्, तयोरनुरोधेन शब्दार्थस्य सङ्कोचविकासौ भवतः । तथा सति पूर्वसूक्ते नामनिर्देशपुर सरं निर्दिष्टानि नक्षत्राणि ज्योति शास्त्रोक्तान्येव नक्षत्राणि ग्राह्याण्यन्यानि वेति सन्देहे ‘ वेदो वा प्रायदर्शनात्' ( मी० सू० ३।३।२ ) इति न्यायेनैतत्सूक्तस्य प्रथमयर्चा पूर्वसूक्तोताना नक्षत्राणा भवत्यर्थनिश्चय । तथा च यानि नक्षत्राणि दिव्यन्तरिक्षे अप्सु भूमौ यानि नगेषु दिक्षु चेत्येव षट्सु स्थानेषु स्थितिरुक्ता । इहैव च 'यानि' पदस्य द्वि. पाठात् यानि दिवि नक्षत्राणि यान्यन्तरिक्षे यान्यप्सु इत्येव प्रतिस्थान नक्षत्राणा योजना करणीयेति द्योत्यते । एवं कृत्वा ज्योति शास्त्रोक्तान्येव नक्षत्राणि ग्राह्याणीत्याग्रहस्तु मन्त्रविरोधादेव प्रत्युक्त । तत्र मन्त्रे नगशब्दो वृक्षार्थे प्रसिद्धः । मनुष्य- शरीर चोपनिषदि 'ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थ सनातन. ' (क० उ० २।३।१ ) । तेनैव मनुष्यशरीरेन्द्रियादीन्यष्टाविशति- नक्षत्राणि गृहीतानि ग्रन्थकृता । 'प्रकल्पयश्चन्द्रमा यान्येति' इत्यत्रापि यथास्थान नक्षत्राणामनुरोधेन चन्द्रमसोऽपि वैविध्यं कल्पनीयमिति' (पृ० १८१ टि० ) इति तूपहासास्पदम् । 'वेदो वा प्रायदर्शनात्' ( मी० सू० ३।३।२ ) इति न्यायस्य भिन्न विषय- - त्वात् । तस्य त्वयमभिप्राय. – 'उच्चैर्ऋचा' क्रियते, उपाशु यजुषा, उच्चे साम्ना' इत्यनुरोधेन ऋगादिमन्त्रेष्वेवोच्चैस्त्वादि कर्तव्यम्, अथवा ‘ अग्नेर्ऋग्वेदोऽजायत, वायोर्यजुर्वेद, आदित्यात् सामवेद ' इत्युपक्रमानुरोधेन मन्त्रब्राह्मणात्मकेष्वृग्वेदादिषु उच्चैस्त्वादि कर्त्तव्यम्? तत्र सिद्धान्त -वेदप्राये वाक्ये वेदोपक्रमे निगम्यमाना इमे शब्दा । तस्मादृग्वेदादिष्वेव तद्विधानमित्यादिकम् । तद्रीत्या त्वत्रोपक्रमे ज्योति शास्त्रप्रसिद्धाना नक्षत्राणा श्रवणाद् उपसहारगतेऽष्टाविशानीति वाक्ये तेषामेव ग्रहण न्याय्यम् । न च 'यानि नक्षत्राणि' इत्यनेनैवोपक्रम इति मन्तव्यम्, तस्यापि सन्दिग्धत्वात्, असन्दिग्धेन सन्दिग्धनिर्णयो भवति न सन्दिग्धेन । तस्मान्नामनिर्देशकाना मन्त्राणामेवोपक्रमत्व बोध्यम् । तेन तदनुरोधेनैव नक्षत्राणि यहा टिप्पणीकार यह कहते है - शब्दार्थ का निर्णय करने में उपक्रम और उपसंहार भो प्रमाण माने जाते है । इनके अनुसार शब्दार्थ का संकोच अथवा विस्तार किया जाता है । इस स्थिति में पूर्व सूक्त में नाम का निर्देश कर बताये गये नक्षत्र ज्योति:- शास्त्र मे प्रसिद्ध नक्षत्र ही है या उनसे भिन्न कोई नक्षत्र यहाँ गृहीत होगे? ऐसा सन्देह उठने पर ' वेदो वा प्रायदर्शनात्' इति मोमासा सूत्र के अनुसार इस सूक्त की प्रथम ऋऋचा से पूर्व सूक्त में वर्णित नक्षत्र पद के अर्थ का निश्चय किया जाना चाहिये । यहा इन नक्षत्रो की स्वर्ग, अन्तरिक्ष, जल, भूमि, नग और दिशा इन छः स्थानो मे स्थिति बताई गई है । यही 'यानि' पद का दो बार पाठ किया गया है । इससे यानि पद का प्रत्येक से संबन्ध किया जायगा । अर्थात् जो नक्षत्र स्वर्ग मे है, जो अन्तरिक्ष में है, जो जल मे है, इस तरह से प्रत्येक स्थान के साथ उनका सबन्ध माना जायगा । ज्योति शास्त्र के नक्षत्रो का इन सब स्थानो के साथ सबन्ध नही होता । अतः इस मन्त्र में वे ही नक्षत्र गृहीत होगे, जो कि ज्योतिःशास्त्र मे प्रसिद्ध है, यह आग्रह मन्त्र का विरोध होने से छोड देना पडेगा । मन्त्र मे नगो मे भी नक्षत्र की स्थिति बताई गई है । नग शब्द का लोक में वृक्ष भी अर्थ होता है । मनुष्य के शरीर को उपनिषदों में ऊपर जड़ और नीचे शाखा पत्र वाला वृक्ष बताया है । इसीलिये ग्रन्थकार ने मनुष्य के शरीर, इन्द्रिय आदि का यहा पर अट्ठाईस नक्षत्रो के रूप में उपादान किया है । 'प्रकल्पयंश्चन्द्रमा यान्येति' यहा भी नक्षत्रो के अनुरोध से चन्द्रमा की विविधता की कल्पना की जाती हैं' (पृ० १८१ टि० ), किन्तु यह सारा कथन भी उपहासास्पद है । ' वेदो वा प्रायदर्शनात' इस न्याय की प्रवृत्ति का यहा कोई प्रसंग नही है । उसका वास्तविक अभिप्राय यह है - उच्चैर्ऋचा० ' इत्यादि श्रुति से ऋक् और साम का ऊँचे स्वर से और यजु का धीमे स्वर से उच्चारण करने का विधान है | यहा सन्देह उठता है कि केवल ऋगादि मन्त्रो के लिये हा यह विधान है अथवा ' अग्नेर्ऋग्वेद० ' इत्यादि उपक्रम श्रुति के अनुरोध से मन्त्रब्राह्मणात्मक समस्त वेदभाग का इस तरह से उच्चारण हो सकता है? इस स्थिति में उक्त मीमासा सूत्र से यह सिद्धान्त स्थिर किया गया गया है कि उपक्रम मे सामान्यतः वेद की चर्चा होने से ऋग्वेदादि के मन्त्रब्राह्मणात्मक समस्त भाग का एक ही पद्धति से उच्चारण किया जाना चाहिये । इस पद्धति से तो उपक्रम में ज्योतिःशास्त्र में प्रसिद्ध नक्षत्रो का वर्णन होने से उपसंहार में भी अष्टाविशति संख्यावाचक पद से इन नक्षत्रो का ही ग्रहण होना चाहिये । 'यानि नक्षत्राणि' इसको उपक्रम वाक्य नही माना जा सकता, ।क्योंकि यह भी सदिग्ध ही रह जाता है कि नक्षत्र पद से किसका ग्रहण किया जायगा । असदिग्ध वस्तु के सहारे ही संदिग्ध वस्तु का निर्णय हो सकता है, सदिग्ध के सहारे से नही । इसलिये नाम का निर्देश करने वाले मन्त्रो से ही विषय का उपक्रम मानना पडेगा तथा
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१३४८ वेदार्थपारिजाता निर्णेतव्यानि । 'यानि' इत्यस्योपक्रमत्वाभ्युपगमेऽपि यानीति सर्वनाम्न प्रकृतपरामर्शकत्वेन तत. पूर्वोक्ताना नक्षत्राणामेव ग्रहण युक्तम् । नगपदेनाभिधया वृक्षाः पर्वता वा गृह्यन्ते । शरीरस्य गमनशीलत्वान्न तत्र नगपदलक्ष्यतापि । एषोऽश्वत्थ. सनातन.' ( कठोप० २।३।१ ) इति वचनमपि तत्र न सङ्गतम्, तस्य क्षणभङ्गुरत्वेन सनातनत्वानुपपत्ते । किञ्च दिव्यन्तरिक्षेऽप्सु भूमौ न पृथक् पृथग् नक्षत्राणि भवन्ति । नहीन्द्रियाणि नक्षत्राणि, तत्र मानाभावात्, प्रसिद्धिविरोधाच्च । तस्मादत्र मायणोक्त एवार्थो युक्त । स च यथा -दिवि द्युलोके अन्तरिक्षे मध्यमलोके अप्सु नगेषु पर्वतेषु दिक्षु च यानि नक्षत्राणि दृश्यन्ते, द्युलोके देवतात्मना अन्तरिक्षे तेजोमण्डलाकारेण अप्सु प्रतिबिम्बेन उदये चास्तमये काले च भूमिसमानप्रदेशकाले पर्वतसमानप्रदेशे च प्रतीतेर्भूमि पर्वताश्राधिकरणत्वेनोच्यन्ते । दिक्षु प्रतीतिस्तु स्फुटा । चन्द्रमा यानि नक्षत्राणि प्रकल्पयन् सम्भोगसमर्थानि कुर्वन् प्रोत्साहयन् एति प्राप्नोति एतानि सर्वाणि नक्षत्राणि मम शिवानि भवन्तु । भूयानरात्या इति । हे इन्द्र, त्वम् अरात्या दानशक्तिप्रतिबन्धिकायाः शक्ते', भूयान् श्रेष्ठ । इन्द्राण्या पतिः स्वामी त्वमसि । विभु व्यापक प्रभावेण सर्वव्यापी प्रभुः प्रभविष्णुश्चासि । परमात्मस्वरूपे इन्द्रे निरुपचरितमेव विभुत्व प्रभुत्वं च त्वा त्वा वयमधिकारिण उपास्महे, ते तुभ्य नमोऽस्तु । पश्यत भक्त्या आलोकयतो माऽस्मान् पश्य अनुग्रहदृष्ट्या पश्य । पश्यतेऽनुग्रहदृष्ट्या पश्यते ते तुभ्यं नमोऽस्तु । अन्नाद्येन अद्येन भक्षणीयेन अनेन व्रीहियवादिना यशसा कीर्त्या तेजसा पराभिभवित्रा प्रभावेण ब्राह्मणवर्चसेन ब्राह्मणोचितेन तेजसा तद्दानेन मा पश्य अनुगृहाणेत्यर्थः । ( सायणभाष्ययुक्ते पुस्तके १३ काण्डे, ८ सूक्ते, २, २, ४ मन्त्राः ) । यत्तु — 'हे इन्द्र परमेश्वर, त्व शच्या प्रजाया वाण्या कर्मणो वा पतिरमि तथा भूयान् सर्वशक्तित्वाद् बहुरसि । तथा अरात्या' शत्रुभूताया वाण्या, तादृशस्य कर्मणो वा शत्रुरर्थाद् भूयान् निवारकोऽसि । विभुः व्यापक, प्रभु समर्थश्चासि । उन्ही के अनुरोध से नक्षत्रो का निर्णय करना पडेगा । 'यानि' इससे भी विषय का उपक्रम माना सकता है, किन्तु 'यानि' पद तो सर्वनाम है । सर्वनाम प्रकृत विषय को ही पकडता है, अत पूर्वोक्त नक्षत्रो को ही इससे समझा जा सकता है । नग पद से अभिधा वृत्ति से पहाड अथवा वृक्ष का ग्रहण होता है । शरीर तो गमनशील है, अतः उसको नग (न चलने वाला ) नही कहा जा सकता । इसको सनातन अश्वत्थ भी नही कहा जा सकता, क्योंकि शरीर तो क्षणभंगुर है, इसको सनातन कैसे कह सकते है । अपि च स्वर्ग, अन्तरिक्ष, जल, भूमि आदि मे अलग-अलग नक्षत्र नहीं होते । इन्द्रियो को भी नक्षत्र नही कहा जा सकता, क्योकि इसमें कोई प्रमाण तो है ही नहीं, साथ मे प्रसिद्धि का विरोध भी है । इसलिये यहाँ सायणसंमत अर्थ ही ठीक माना जा सकता है । सायण का अर्थ यह है- द्युलोक में, अन्तरिक्ष नाम के मध्यम लोक में, जल में, पर्वतों में दिशाओं में जो नक्षत्र दिखाई पड़ते है, द्युलोक में देवता के रूप में, अन्तरिक्ष में तेजोमण्डल के आकार में, जल में प्रतिबिम्ब के रूप में, उदय और अस्त के समय भूमि से लगे हुए प्रदेश में और पर्वत से लगे प्रदेश में ये नक्षत्र दिखाई पड़ते हैं, अतः भूमि और पर्वत को भी इनका अधिकरण माना जाता है । दिशाओ में तो इन नक्षत्रों की प्रतीति स्पष्ट ही होती है । चन्द्रमा ने जिन नक्षत्रों की कल्पना की, उनको संभोग के लिये अनुकूल समर्थन देता हुआ उनके पास पहुँचता है, वे सब नक्षत्र मेरे लिये मगलमय हो । 'भूयानरात्या०' इत्यादि मन्त्रो का अर्थ यह है- हे इन्द्र, तुम दान शक्ति की प्रतिबन्धक शक्ति से अधिक बलवान् हो । तुम इन्द्राणी के पति हो । अपने प्रभाव के कारण तुम सर्वव्यापी और सबके प्रभु, सब कार्य करने में समर्थ हो । परमात्मा स्वरूप इन्द्र का प्रभुत्व और विभुत्व स्वाभाविक ही हैं । हम अधिकारी गण तुम्हारी उपासना करते है, तुमको नमस्कार करते हैं । भक्तिपूर्वक तुम्हारी आराधना करने वाले हम लोगो को तुम अनुग्रह दृष्टि, कृपादृष्टि से देखो । कृपा दृष्टि से हमारा अवलोकन करने वाले तुमको हम पुनः नमस्कार करते हैं । भक्षणयोग्य व्रीहि, यव आदि अन्न सम्पत्ति से, यश से, दूसरो को अभिभूत कर देने वाले प्रभाव से, ब्राह्मणोचित तेज से, अर्थात् इन सब गुणो को हमारे लिये देकर आप हम पर अनुग्रह कीजिये । दयानन्द ने इनका अर्थ इस तरह से किया है -'हे जगदीश्वर, आप ( शच्या. ) सब प्रजा, वाणी और कर्म इन तीनो के पति है । तथा ( भूयान् ) सर्व शक्तिमान् आदि विशेषणों से युक्त है । जिससे आप ( अरात्याः ) अर्थात् दुष्ट प्रजा, मिथ्यारूप वाणी
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वेदार्थपारिजातः १३४६ अनेन प्रकारेण त्वा वय सदैवोपास्महे तवैवोपासन कुर्महे । वाचो नाममु गचीति पठितम् तथा कर्मणा नामसु (नि० १1११, नि० ३ ९) । ईश्वरो वदति – यूयमुपासनारीत्या सदैव मा पश्यत । सम्यग्ज्ञात्वा चरत । उपासक एवं जानीयाद् वदेच्च -हे परमेश्वर, अनन्तविद्यायुक्त नमस्तेऽस्तु तुभ्यमस्माक सतत नमोऽस्ति । कस्मै प्रयोजनाय अन्नाद्येन अन्नादिराज्यैश्वर्येण यशसा सर्वोत्तमकर्मणामनुष्ठानोद्भूत सत्यकीर्त्या तेजसा निर्दीनतया प्रागल्भ्येण ब्राह्म पूर्णया विद्यया सह वर्तमानान् हे परमेश्वर, त्व कृपया सदैव पश्य सम्प्रेक्षस्वैतदर्थं वय त्वा सदैवोपास्महे (पृ० १८१ ) इति । तदपि यत्किञ्चित्, 'शत्रु' रिति मूले पदाभावात् । शचीपतित्वेनेन्द्रस्य प्रसिद्धत्वाद् अत्र शचीन्द्राण्येव । ईश्वरोऽ- भिवदतीत्यत्रापि बीज वक्तव्यम् । न चेश्वरकर्तृकत्वाद् ईश्वरो वदतीति युक्तमेवेति वाच्यम्, तथात्वे सर्वत्रैव मन्त्रेषु तस्यैव वक्तृत्वापातात् । अत कचिदीश्वरो वदति कचिदाचार्यो वदति कचित् प्रजा वदतीत्यादिकल्पनाना निष्प्रमाणत्वात् । पश्यते- त्यस्याचरणार्थकत्वे बीजं वक्तव्यम् । द्वितीय 'पश्यत' पदस्याव्याख्यानत्वाच्च । ' अम्भो' इत्यादीना त्वयमर्थ -अम्भ अम ज्ञान महो भर्ग सहो बल त्वोपास्महे । अम्भः गङ्गादिरूप सोम वा अरुण लोहित रुद्र रजत रजतनिभ कर्परगौर शिव रज. रञ्जक स्वप्रभया सह. भक्तापराधसोढार त्वामुपास्महे । उरु: बहुधा विराजमान पृथु. व्यापक सुभू. स्वयंभू भूत्वा वसति सर्व यस्मिन् स भुवः । तत्तद्रूपेण त्वामुपास्महे । प्रथः प्रसिद्ध. वर. श्रेष्ठ. व्यचो विविधरूपेण पूज्य लोक फलस्वरूप, लोक्यते दृश्यते भुज्यत इति लोक. फलरूप., सर्वत. सम्प्लुतोदकसमुद्रस्थानीये ब्रह्मणि वापीकूपतडागस्थानीयानामन्यफलानामन्तर्भावात् ( अथर्व० १३। ४/५ - ६ ) । और पापकर्मों को विनाश करने मे अत्यन्त समर्थ है | आपको ( विभु ) सबमे व्यापक और ( प्रभु ) सब सामर्थ्य वाले जानकर हम लोग आपकी उपासना करते है । वाणी, कर्म और प्रजा के अर्थ मे शची शब्द का निघण्टु में पाठ किया गया है । (नमस्ते अस्तु ० ) अर्थात् परमेश्वर सब मनुष्यो को उपदेश करता है कि हे उपासक लोगो, तुम मुझे प्रेमभाव से अपनी आत्मा मे सदा देखते रहो तथा मेरी आज्ञा और वेदविद्या को यथावत् जानकर उसी रोति से आचरण करो । फिर मनुष्य भी ईश्वर से प्रार्थना करें कि हे परमेश्वर, आप कृपादृष्टि से ( पश्य मा ) हमको सदा देखिये । इसलिये हमलोग आपको सदा नमस्कार करते हैं । किस प्रयोजन के लिये? ( अन्नाद्येन ) अन्न आदि ऐश्वर्य ( यशसा ) सबसे उत्तम कीर्ति, ( तेजसा ) भय से रहित, (ब्राह्मणवर्चसेन) और सम्पूर्ण विद्या से युक्त हमलोगो को करके आप कृपापूर्वक हमको देखिये । इसीलिये हम लोग सदा आपकी उपासना करते है (पृ० १८२-१८३) यह कथन भी कुछ नही है, क्योकि मूल मन्त्र में ' शत्रु' पद है ही नही । शची के पति के रूप में इन्द्र ही प्रसिद्ध है तब शची का अर्थ इन्द्राणी ही हो सकता है । ईश्वर कहता है, इसमे कुछ तो प्रमाण बताना ही पडेगा । ईश्वर मन्त्रो का कर्ता है, अतः ईश्वर का कहना उचित ही माना जायगा, ऐसा कहने पर तो सभी मन्त्रो का वही वक्ता हो जायगा । इसलिये कही ईश्वर कहता है, कही आवार्य कहता है और कही प्रजा कहती है, इस तरह की अनेक तरह की कल्पनाएँ सब निराधार ही मानी जायगी । 'पश्यत ' पद का अर्थ 'आचरण करो ' यह कैसा होगा, इसमें भी हेतु बताना पडेगा । इस मन्त्र में पश्यत शब्द दो बार आया है, दूसरे का आपने कोई अर्थ नही किया है । ' अम्भ: ' इत्यादि चार मन्त्रो का भी दयानन्द कृत अर्थ गलत है । उनका सही अर्थ इस प्रकार से होगा - जल के समान व्यापक, ज्ञानस्वरूप, तेजोमय और बल के आगार के रूप में हम आपको उपासना करते हैं । गंगा आदि नदियो के पवित्र जल के रूप मे अथवा सोम के रूप में लोहित वर्ण रजत के समान और कपूर के समान धवल, गौरवर्ण शिव की, जो कि अपने स्वभाव के कारण भक्तो के सभी अपराधों को क्षमा कर देते है, हम उपासना करते हैं । अनेक रूपों में विराजमान, व्यापक और स्वयंभू होकर आप सब प्राणियों में बसते है, उन सभी रूपो में हम आपकी उपासना करते हैं । आप सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं, सबसे श्रेष्ठ हैं, विविध रूपों में पूज्य हैं, फलस्वरूप है । लोक शब्द का अर्थ फल इस तरह से होगा कि यह लोक सबके द्वारा देखा जाता है, उपभुक्त होता है । इसके लिये इसको फलस्वरूप माना जाता है । चारों तरफ पानी से लबालब भरे समुद्र के समान ब्रह्म की उपलब्धि हो जाने पर
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१३५० वेदार्थपारिजातः युञ्जन्ति ब्रध्नमरुष चरन्त परितस्थुष । रोचन्ते रोचना दिवि ॥ ' (ऋ ० स० १ ६ १) । इन्द्रोऽत्र स्तूयते । इन्द्रो हि परमैश्वर्ययुक्तः । परमैश्वर्य चाग्निवाय्वादित्यनक्षत्ररूपेणावस्थानात् । तदुच्यते—ब्रध्नमादित्यरूपेणावस्थितम्, अरुषमहि- सकाग्निरूपेणावस्थितम्, क्रोधरहिताग्निरूपेण वाऽवस्थितम्, चरन्त वायुरूपेण सर्वत. प्रसरन्तम्, परितस्थुष सर्वतोऽवस्थिताः प्राणिन युञ्जन्ति, स्वकीये कर्मणि देवतात्वेन सम्बद्ध कुर्वन्ति । तस्यैवेन्द्रस्य मूर्तिविशेषभूतानि रोचना रोचनानि दिवि द्युलोके रोचन्ते प्रकाशन्त इति सायणोक्त एवार्थो युक्त, 'युञ्जन्ति ब्रध्नमित्याह --असौ वा आदित्यो ब्रध्न । आदित्यमेवास्यै युनक्ति अग्निनेबास्मै युनक्ति. चरन्तमित्याह - वायुर्वै चरन् । परितस्थुष इत्याह- इमानेवास्मै लोकान् युनक्ति ॥ रोचन्ते रोचना दिवीत्याह- नक्षत्राणि वै रोचना दिवि नक्षत्राण्येवास्मै रोचयन्ति' (तै ० ब्रा० ३२ ९ | ४| १-२) इति श्रुते । 'यच्च -' योगिनो विद्वास परितस्थुष सर्वान् जगत्पदार्थान् मनुष्यान् वा चरन्तं ज्ञातार सर्वज्ञमरुष करुणामय ब्रध्न विद्यायोगाभ्यासप्रेमभरेण सर्वानन्दवर्धकम्, महान्तं परमेश्वरमात्मना सह युञ्जन्ति रोचना आनन्दे प्रकाशिता रुचिमया भूत्वा द्योतनात्मके सर्वप्रकाशके परमेश्वरे रोचन्ते परमानन्दयोगेन प्रकाशन्ते' (पृ ० १८३ ) इति, तन्न सङ्गतम्, अक्षराननु- गतत्वात् । चरन्त जानन्तमिति युक्तम् । न ज्ञातारमिति, शतुर्योगात् । यजुर्वेदे तु युनयेन युञ्जन्ति ब्रध्नमिति (का० २| ५ | ११ ) रीत्या अश्वे रथे युञ्जन्ति तस्थुप तस्थिवास कर्मार्थमृत्विज । अश्वोऽर्चादित्यरूपेण स्तूयते । ब्रध्नमादित्यमरुषा रोषरहितम् । चरतेर्ज्ञानार्थकत्वेन ज्ञेयार्थस्य प्रपञ्चस्याक्षेपलभ्यत्वेन परितस्थुप इत्यस्यात्पप्रयोजनत्वात् । तस्माद्योगिन इत्यनाहृत्य प्रथमान्त- त्वेन परितस्थिवास इति परिणमय्य युञ्जन्तीति कर्तृत्वेन योगोपपत्ते । ब्रध्नमिति पदमादित्यमेवाह, पूर्वोक्ततैत्तिरीयश्रुतेः । रोचना आनन्दे प्रकाशिता इत्यप्यसङ्गतम्, आनन्दस्यानाधारत्वाद् अप्रकाशकत्वाच्च । महान्तं परमेश्वरं कथमात्मना वापी, कूप, तडाग आदि के समान छोटे छोटे फलो का समावेश अपने आप हो जाता है । इसलिये उस परमफल स्वरूप शिव की हम उपासना करते है । आगे चलकर दयानन्द ने इसी प्रसंग में 'युञ्जन्ति ब्रघ्न० ' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत किया है । वस्तुतः इस मन्त्र मे इन्द्र की स्तुति की गई है । इन्द्र परम ऐश्वर्यशाली देवता है । यह इसलिये है कि इन्द्र ही अग्नि, वायु, आदित्य, नक्षत्र आदि के रूप में अवस्थित है । इसी बात को इस मन्त्र में बताया गया है । ब्रह्म अर्थात् आदित्य के रूप मे अवस्थित, अहिंसक अग्नि के रूप में अवस्थित अथवा क्रोधरहित अग्नि के रूप मे अवस्थित, वायु के रूप मे चारो तरफ फैले हुए इन्द्र को चारो तरफ रहने वाले प्राणी अपने सब कार्यों मे देवता के रूप में संबद्ध कर लेते है । उसी इन्द्र की अनेक मूर्तियां अर्थात् प्रकाशमान स्वरूप स्वर्गलोक में प्रकाशित होते है । इस मन्त्र का यह अर्थ सायण ने किया है । तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी ब्रह्म पद से आदित्य का और अग्नि का, से वायु का, 'परितस्थुष ' पद से इन लोको का और रोचना दिवि पद से नक्षत्रो का का ग्रहण किया गया है । दयानन्द ने इसके तीन अर्थ किये हैं । उनमें से पहला अर्थ यह है-' (युञ्जन्ति) मुक्ति का उत्तम साधन उपासना है । इसी लिये जो विद्वान् लोग है, वे सब जगत् और सब मनुष्यों के हृदयों में व्याप्त ईश्वर को उपासना की पद्धति से अपने आत्मा के साथ युक्त करते है । वह ईश्वर कैसा है कि (चरन्तम् ) अर्थात् सबका जानने वाला, ( अरुषम् ) हिंसादि दोष रहित, कृपा का समुद्र, ( ब्रध्नम् ) सब आनन्दों का बढाने वाला, सब रीति से बडा है । इसी से ( रोचना: ) अर्थात् उपासको के आत्मा, सब अविद्या आदि दोषो के अन्धकार से छूट कर ( दिवि ) आत्माओ को प्रकाशित करने वाले परमेश्वर में प्रकाशमय होकर ( रोचन्ते ) प्रकाशित रहते है' ( पृ० १८५) । यह व्याख्या ठीक नहीं है, क्योकि मन्त्राक्षरों से इसकी कोई संगति नही है । 'चरन्तम्' का अर्थ जानते हुए करना ही ठीक है, न कि जानने वाले ॥ चर धातु ज्ञानार्थक है, अतः ज्ञेय अर्थ प्रपंच तो आक्षेप से ही प्राप्त हो जायगा । तब 'परितस्थुष ' इस पद की क्या आवश्यकता रह जायगी । इसलिये 'योगिनः' पद का अध्याहार किये बिना ही 'परितस्थुषः' इस द्वितीयान्त पद को 'परितस्थिवास.' इस तरह से प्रथमान्त के रूप में परिणत करके उसके साथ 'युञ्जन्ति ' इस क्रिया पद का अन्वय किया जा सकता है । पूर्वोक्त तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार 'ब्रध्न' पद आदित्य का ही वाचक है । ' रोचना' पद का अर्थ 'आनन्द में प्रकाशित करना भी असंगत है, क्योंकि आनन्द न तो आधार हो सकता है और न प्रकाशक ही । महान् परमेश्वर को आत्मा के साथ कैसे जोड़ते