वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 451–460

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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वंदार्थपारिजात: १३५१ युञ्जन्ति, इति नोक्तम्, अतोऽसङ्गतम्, परमेश्वरम्प व्यापकत्वेन नित्ययुक्तत्वात् । 'परितम्थुषश्चरन्नमग्निमयवध्नमादित्य सर्वे लोका. पदार्थाश्च युञ्जन्ति तदाकर्षणेन युक्ताः सन्ति, ते सर्वे तस्यैव दिवि प्रकाशे रोचना रुचिकरा. सन्तो रोचन्ते (पृ० १८४ ) इति द्वितीयोऽप्यर्थोऽसङ्गत एव, सर्वलोकाना पदार्थाना युञ्जते कर्तृत्वे योजकत्वोपपत्त्या युक्तत्वासिद्धे । ' मन्तुप्यतु ' न्यायेन युक्तत्वेऽप्यादित्यरश्मियोगादेव युक्तत्वोपपत्त्याऽऽकर्षंणकल्पनस्यान्यथासिद्धत्वात् । 'य उपासका परितस्थुष सर्वान् पदार्थान् चरन्तमरुषं सर्वमर्मस्थ ब्रध्न सर्वावयववृद्धिकर प्राणमादित्य प्राणायामरीत्या दिवि द्योतनात्मके परमेश्वरे वर्तमाना रोचना रुचिमन्त सन्तो युञ्जन्ति युक्त कुर्वन्ति आसते मोक्षानन्दे परमेश्वरे सदैव प्रकाशन्ते ' ( पृ० १८४) इति तृतीयोऽप्यर्थोऽसङ्गत एव, समष्टिप्राणस्य सर्वकर्मस्थत्वे सर्वावयववृद्धिकरत्वे च सत्यपि परमेश्वरस्य व्यापकत्वेन तत्र वर्तमानत्वेऽपि प्राणायामरीत्या तस्य परमेश्वरे योजनासम्भवात् । आधारत्वेन योगस्य स्वत. सिद्धत्वे तत्प्रयासवैयर्थ्याच्च । उपासकाना च स्वप्राणस्यैव प्राणायामेन कचिद्योग सम्भवति । स्वप्राणस्य तु समष्टि-रूपेण सर्वपदार्थचारित्वं सम्भवति । त्वन्मते मोक्षं गता न सदैव परमात्मनि प्रकाशन्ते, मोक्षात् पुनरावृत्त्यभ्युपगमात् । यतु प्रमाणरूपेण 'युञ्जन्ति ब्रध्नमरुप चरन्तमित्यसौ वा आदित्यो ब्रध्नोऽरुषोऽमुमेवास्मा आदित्य युनक्ति स्वर्गस्य लोकस्य समष्टयै' ' इति शतपथवचनमुप स्थापितम्, तत्तु न त्वदुक्तार्थपोषकम्, किन्तु पूर्वसमुद्धृततैत्तिरीयश्रुत्युक्तमेवार्थं समर्थयते । वस्तुतस्तु कचिन्निघण्टावश्वस्यापि ब्रध्नारुषौ नामनी पठिते । तावता मोक्षमूलरस्य व्याख्याने पशोर्ग्रहण भ्रान्ति-मूलकम्, तथैव दयानन्दस्य व्याख्यानमपि भ्रान्तिमूलकमेव, तदर्थस्य पूर्वोद्धृतश्रुतिविरुद्धत्वात् । 'आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा ' इति श्रुतिरपि न त्वदर्थपोषिका, ब्रध्नपदस्य प्राणपरत्वाभ्युपगमेऽपि तस्य ब्रह्मणि धारणानुपपत्ते । वस्तु-तस्तूपासनाविषयत्वेनोद्धृता व्याख्याताश्च मन्त्रा न तत्पोषका, तेषामन्यपरत्वोक्ते. । है, यह आपने बताया नही । इसलिये यह भी सगत नही है । परमेश्वर तो व्यापक है, अतः वे सब आत्माओ के साथ सदा ही जुड़े हुए है, इसके लिये प्रयत्न करने का प्रसंग हो क्या है? ( परितस्थुष ) अपना किरणो से सब ओर व्याप्त होने वाले अग्निमय ( ब्रघ्नम् ) आदित्य को सब लोक और सब पदार्थ जिसके आकर्षण से युक्त हो रहे है और उसी के प्रकाश से प्रकाशित हो रहे है, विद्वान् लोग सब लोको का आकर्षण जानते है' (पृ० १८५- १८६ ) यह द्वितीय अर्थ भी असंगत है, क्योकि सभी लोगो और पदार्थों को यदि युज् धातु का कर्ता माना जायगा तो सब योजक ही होगे, तब युक्त कौन होगा? यदि आपको संतुष्ट करने के लिये कुछ देर के लिये यह मान भी लिया जाय तो आदित्य की किरणों के संयोग से ही युक्तता बन जायगी, आकर्षण की कल्पना करने से क्या लाभ होगा? अर्थात् यह व्यर्थ ही होगा । (' युञ्जन्ति ) इस मन्त्र का तीसरा यह भी अर्थ है कि सब पदार्थो की सिद्धि का मुख्य हेतु जो प्राण है, उसको प्राणायाम की रीति से अत्यन्त प्रीति के साथ परमात्मा में युक्त करते हैं । इसी कारण वे लोग मोक्ष को प्राप्त होकर सदा आनन्द में रहते हैं' (१० १८६) | यह तृतीय अर्थ भी असंगत है, क्योकि समष्टि प्राण सभी प्राणियो केमर्म स्थान मे स्थित है और उसी के कारण प्राणियों के सब अवयव पुष्ट होते हैं । बढते है, ऐसा होते हुए भी परमेश्वर तो व्यापक है, अत: वह इस प्राणियों में भी व्याप्त है ही । तब प्राणायाम की पद्धति से प्राणों में परमेश्वर का योग करने का क्या अर्थ हो सकता है? आधार रूप में वह परमेश्वर सबके साथ संयुक्त है, उसका योग तो स्वत्तः सिद्ध है, तब उसके लिये प्रयास करना व्यर्थ है । उपासको के अपने प्राण का ही प्रायायाम के द्वारा कही योग हो सकता है । समष्टि रूप में स्थित यह प्राण कहीं भी जा सकता है । फिर आपके मत में तो मोक्ष को प्राप्त कर लेने के बाद भी जीव का सदा परमेश्वर में प्रकाश नही होता, क्योकि आपने तो मोक्ष से जीवों के वापस लोटने की बात मानी है । अपनी बातों की पुष्टि के लिये दयानन्द ने शतपथ ब्राह्मण के वचन को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है । यह उद्धरण भी उनकी बात की पुष्टि न कर पूर्वोद्धृत तैत्तिरीय ब्राह्मण के वचन का ही पोषक है । वास्तव में निघण्टु में कही ब्रघ्न और अरुष शब्द घोडे के अर्थ में भी प्रयुक्त माने गये हैं । उसके आधार पर जैसे मोक्षमूलर की व्याख्या में इस मन्त्र में पशु का ग्रहण करना भ्रमपूर्ण हैं, उसी तरह से दयानन्द की यह व्याख्या भी भ्रमजनक ही है, क्योंकि यह अर्थ भी पूर्व उद्धृत श्रुतियों के विरुद्ध पड़ता है । आदित्य को प्राण और चन्द्रमा को रयि बताने वाली श्रुति भी आपके

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वेदार्यपारिजातः १३५२ उपासना कथ रीत्या कर्तव्येति शीर्षके यल्लिखित तदप्युपहासास्पदमेव । 'तस्यैव स्तुतिप्रार्थनानुष्ठाने सम्यक्कृत्वो- पासनयेश्वरे पुन पुन सलगयेत्' । व्यापके परमेश्वरे स्वत सलग्नस्य जीवस्य कथमिव पुन सलगनमिति तु नोक्तम् । ' योगश्चित्तवृत्तिनिरोध ' इत्यादीनि सूत्राणि वेदव्यासभाष्य च समर्थयमानेनापि विरुद्धार्थनयैव व्याख्यातानि । तथाहि— 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोध ' ( यो० सू० १ १ २) उपासनासमये व्यवहारसमये परमेश्वरादतिरिक्तविषयादधर्मव्यवहाराच्च मनसो वृत्ति सदैव निरुद्धा रक्षणीया । वस्तुतोऽत्र सर्वासा क्लिष्टानामक्लिष्टाना च वृत्तीना निरोधोऽभीष्ट । अय वराकस्तत्र तत्रेश्वरो वदतीति वक्ति । वदधातुस्तु व्यक्तवागर्थक । व्यक्ता वाक् तु कण्ठतालवाद्यभिघाता- दितन्त्रा । निराकारस्य परमेश्वरस्य कण्हतात्वाद्यभावात् तत्सर्वथैव नोपपद्यते । यदुक्तम्-'निरुद्धा सती कावतिष्ठते' इति तत्रोच्यते -'तदा द्रष्टु स्वरूपेऽवस्थानम्' (यो ० सू० १।३ ) यदा सर्वस्माद् व्यवहारान्मनोऽवरुद्धयते तदास्योपासकस्य मनो द्रष्टु. सर्वज्ञस्य परमेश्वरस्य स्वरूपेऽवतिष्ठते' (पृ० १८६) इति, तत्सर्वमुपहासास्पदम्, परकीयात्मसाक्षात्कारे मनसोऽहेतुत्वात्, अतो द्रष्टु प्रत्यगात्मन. पुरुषस्य स्वरूपेऽवस्थानम् । द्रष्टृपदस्य ज्ञातृबोधकत्वमेव न सर्वज्ञातृबोधकत्वम्, 'स्वरूपप्रतिष्ठा तदानी चितिर्यथा कैवल्ये' इति व्यासभाष्यविरोधाच्च । यत्तूक्तम्— 'परमात्मन. स्वरूपेऽवस्थान नान्तरीयकमिति' (पृ० १८७ टि० ) तत्तुच्छम् अन्यस्यान्यस्वरूपेऽवस्थानेनात्मस्वरूपेऽवस्थाना- सम्भवात्, अन्यस्वरूपेऽवस्थानासम्भवात्, असङ्गत्वोक्तिव्याकोपाच्च । परमेश्वराराधनेनापि प्रत्यक्चेतनाधिगम एवेष्यते । मत का समर्थन नही करती, क्योकि ब्रध्न पद प्राण का वाचक भले ही हो जाय, किन्तु उस प्राण की ब्रह्म में धारणा का कोई अर्थ नही है | यह उपासना किस तरह से करनी चाहिये? इस प्रश्न के उत्तर मे जो कुछ दयानन्द ने लिखा है, वह भी उपहास का ही विषय है । 'उसी ( परमात्मा ) की स्तुति, प्रार्थना और उपासना को बार बार करके अपने आत्मा का भलीभाँति से उसमे लगा दें' (पृ० १ ८) यह बात को दयानन्द ने कही है, किन्तु व्यापक परमेश्वर के साथ जीव तो अपने आप सदा संलग्न है ही, वह परमात्मा मे फिर किस प्रकार से लगे, यह बात उन्होंने नही बताई । ' योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' इत्यादि योगसूत्रो का और उनसे व्यासकृत भाष्य का समर्थन करते हुए भी दयानन्द ने उनका अर्थ विपरीत ही किया है । जैसे कि ' योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:' इस सूत्र का अर्थ यह किया गया है -'चित्त की वृत्तियो को सब बुराइयो से हटाकर, शुभ गुणो मे स्थिर करके, परमेश्वर के समीप में मोक्ष प्राप्त करने को 'योग ' कहते है' ( पृ० १८८) । वास्तव में तो इस सूत्र में क्लिष्ट अविलष्ट सभी प्रकार की चित्त की वृत्तियो का निरोध अभीष्ट है । दयानन्द स्थान स्थान पर ईश्वर के बोलने की बात कहते रहते है । वद् धातु का प्रयोग वहा होता है, जहा कि उच्चारण का स्पष्ट बोध हो । इस तरह की वाणी कण्ठ, तालु आदि के अभिधान से ही उत्पन्न हो सकती है । आपके मत में जब ईश्वर निराकार है, तब इस तरह की वाणी बिना कण्ठ, तालु आदि की सहायता के कैसे बोल सकता है? आगे दयानन्द ने लिखा है - ' ( प्रश्न ) जब वृत्ति बाहर के व्यवहारो से हटाकर स्थिर की जाती है, तब वह कहा स्थिर होती है? इसका उत्तर पद यह है कि ( तदा द्र० ) जब उपासक की मनोवृत्ति सव तरह के बाहरी व्यवहारो से निरुद्ध हो जाती है, तो उसका मन सर्वज्ञ परमेश्वर के स्वरूप में स्थिर हो जाता है' ( पृ० १८७) यह सब भी उपहासास्पद ही है, क्योकि दूसरे की आत्मा का साक्षात्कार करने मे मन समर्थ नहीं हो सकता । इसलिये द्रष्टा प्रत्यगात्मस्वरूप पुरुष की अपने स्वरूप में ही अवस्थिति हो सकती है । द्रष्टा पद केवल ज्ञाता का ही बोधक हो सकता है, सर्वज्ञ ज्ञाता का नही । व्यासभाष्य में बताया गया है कि केवलावस्था में चिति अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती हैं । आपकी बात का इस भाष्य से स्पष्ट विरोध है । यहाँ टिप्पणीकार ने स्पष्टीकरण किया है कि परमात्मा की स्वरूप में अवस्थिति अपने आप हो जायगी । यह कथन भी निराधार है, क्योंकि यदि कोई दूसरा अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाय तो सब कोई अपने स्वरूप मे अवस्थित नही हो सकते । दूसरे के स्वरूप में दूसरे की स्थिति हो नही सकता । यदि ऐसा माना जाय तो फिर परमात्मा की असगता कैसे हो सकती है । परमेश्वर की आराधना से आराधक अपने में ही आन्तर स्वरूप की अभिव्यक्ति मांगता है ।

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वेदार्थपारिजातः १३५३ —' ' (( )) - ' यत्तु वृत्तिसारूप्यमितरत्र योयो०० सूसू०० ११४११४ इतिइति सूत्रव्याख्याने गदितम् इतरसासारिक व्यवहारे प्रवृत्तेऽप्युपासकस्य योगिन. शान्ता धर्मरूढा विद्याविज्ञानप्रकाशा सत्यतत्त्वनिष्ठा तीव्रतीव्रा साधारणमनुष्यविलक्षणाऽपूर्वेव वृत्तिर्भवतीति । नैवेदृशी अनुपासकानामयोगिना कदाचिद् वृत्तिर्जायते ' इति, तदेतदुन्मत्तप्रलपितम्, सूत्राक्षरप्रकरणाद्यसङ्गते । इतरत्र व्युत्थानकाले पुरुषस्य वृत्तिसारूप्यमेवेहोक्तम् । यत्तु ' वृत्तित्वेन विशेष्याशे सारूप्येऽपि कचिद्विशेषणाशे शान्तघोर- मूढरूपेण योग्ययोगिनो वैरूप्यमर्थादापततीति व्यासभाष्यपूरकमेव दयानन्दभाष्यम्' (पृ० १८७ टि०) इति, तदपि मूढजन-जल्पितमेव, प्रकृतसूत्रे योग्ययोगिनो. सारूप्यवैरूप्ययोरप्रस्तुतत्वात् । अत्रैव कति वृत्तयः सन्ति कथ निरोद्धव्या इति भूमिकया क्लिष्टाक्लिष्टा पञ्चतय्यो वृत्तय । प्रमाणविपर्यय-विकल्पनिद्रास्मृतयस्तल्लक्षणबोधकानि पातञ्जलसूत्राण्युपन्यस्तानि, 'अभ्यासवैराग्याभ्या तन्निरोध ' (यो ० सू० १।१२) इति सूत्रमुक्तम्, व्याख्यानमस्य न कृतमित्येव शोभनम्, ' ईश्वरप्रणिधानाद्वा' (यो० सू० १।२३ ) इति सूत्र तद् भाष्य चोद्धृतम् । तदर्थस्तु वृत्तयश्चित्तस्य परिणामविशेषा पञ्च वक्ष्यमाणास्ताश्च क्लिष्टा, क्लेशैर्वच्यमाणैराक्रान्ता. क्लिष्टा, तद्वि-परोता अक्लिष्टा । ताश्च प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतय । अतिप्रसिद्धत्वात् प्रमाणाना भेदनिरूपणेनैव गतार्थत्वा-ल्लक्षणस्य न पृथग्लक्षण कृतम् । तत्राविसवादिज्ञान प्रमाणम् । तत्रेन्द्रियद्वारिका विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः प्रत्यक्षम् । गृहीतसम्बन्धाल्लिङ्गाल्लिङ्गिनि सामान्यात्मनाऽध्यवसायात्मिका वृत्तिरनुमानम् ॥ आप्तवचनमागमः । यस्यार्थस्य यद्रूपं तस्मिन् रूपे न प्रतितिष्ठतीत्यतथाभूतेऽर्थे तथोत्पद्यमान ज्ञान विपर्यय । यथा शुक्तिकाया रजतम् 1 स्थाणुर्वा पुरुषो वेति वस्तुन- ' वृत्तिसारूप्यमितरत्र' इस सूत्र की व्याख्या में दयानन्द ने कहा है - ' उपासक योगी और संसारी मनुष्य जब व्यवहार में प्रवृत्त होते है, तब योगी की वृत्ति तो सदा हर्ष-शोक रहित, आनन्द से प्रकाशित होकर उत्साह और आनन्दयुक्त रहती हैं और संसार के मनुष्य की वृत्ति सदा हर्ष-शोकरूप दुःखसागर में ही डूबी रहती है । उपासक योगी की तो वृत्ति ज्ञानरूप प्रकाश में सदा बढती रहती है और संसारी मनुष्य की वृत्ति सदा अन्धकार में फॅसती जाती है' ( पृ० १८९ ) । यह सारा कथन मी पागलो के प्रलाप जैसा है, क्योकि इसका सूत्र के अक्षरो से और प्रकरण से भी कोई संबन्ध नही है । वास्तव में इस सूत्र मे व्युत्थान दशा में पुरुष की वृत्तियो की सदृशता का ही प्रतिपादन किया गया है । टिप्पणीकार ने यहा स्पष्टीकरण किया है कि 'वृत्ति के रूप में विशेष्य अश में सादृश्य रहने पर भी विशेषण के अंश मे शान्त, घोर और मूढ इन त्रिगुणात्मक वृत्तियो के कारण योगी और अयोगी में विलक्षणता आ जाती है । दयानन्द की यह योगसूत्र की व्याख्या व्यासभाष्य की पूरक ही मानी जायगी' (पृ ० १८ ९ टि० ) । यह सारा कथन भी मूढ व्यक्ति की ही उक्ति माना जायगा, क्योकि प्रकृत सूत्र मे योगी और अयोगी की सदृशता और विसदृशता के प्रतिपादन का कोई प्रसंग नही है । यही वृत्तिया कितनी है और उनका निरोध कैसे होता है? इस प्रश्न के उत्तर में प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति इन क्लिष्ट और अक्लिष्ट पाँच वृत्तियो का उल्लेख कर इनके लक्षणो को बताने वाले पातंजल सूत्रो को उद्धृत करके ' अभ्यास वैराग्याभ्या तन्निरोध: ' अर्थात् अभ्यास और वैराग्य से इन वृत्तियो का निरोध होता है, इस सूत्र को भी उद्धृत कर दिया है । यह अच्छा ही हुआ कि उन्होंने इनकी व्याख्या नही की । इसके बाद ' ईश्वरप्रणिधानाद्वा ' इस सूत्र को और इसके भाष्य को दयानन्द ने उद्धृत किया है । , इनका अर्थ यह है वृत्तिया अर्थात् चित्त की विशेष परिणतिया पाच प्रकार को होती है । ये क्लिष्ट और अक्लिष्ट ---------,के भेद से दो प्रकार की होती हैं । क्लेशों से आक्रान्त क्लिष्ट और उनसे मुक्त अक्लिष्ट कहलाती है । इनके पाच भेद प्रमाण विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति के नाम से प्रसिद्ध है । प्रमाण अत्यन्त प्रसिद्ध है । अतः उनका यहाँ अलग अलग लक्षण न बता केवल उनके नामो का निर्देश कर दिया गया है । अविसंवादी अर्थात् जो कभी गलत न हो, उस ज्ञान को प्रमाण कहते है । इन्द्रियो की सहायता से वस्तु के विशेष स्वरूप का निर्णय करने वाली वृत्ति प्रत्यक्ष कहलाती है । जिस लिंग का लिंगी के साथ संबन्ध पहले जाना जा चुका है, बाद में उस लिंग की सहायता से सामान्यरूप से जो लिंगी का निश्चयात्मक ज्ञान होता है, उसको अनुमान कहते हैं । आप्त पुरुष के वचन को आगम कहा जाता है । जिस वस्तु का जैसा रूप है, उस रूप में न रह कर जो उसके विपरीत रूप में उत्पन्न अर्थ को ग्रहण करता है, उसको विपर्यय कहते हैं, जैसे कि सीप में चांदी का ज्ञान ॥ स्थाणु है या पुरुष इस तरह से वस्तु के यथार्थ १७०

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वेदार्थपारिजातः १३५४ स्तथात्वमनपेक्षमाण शब्दज्ञानजनित. प्रत्ययो विकल्प, यथा षष्ठ्यर्थं भेदमनपेच्य चैतन्य पुरुषस्य स्वरूपं राहो शिरः । वस्तुनश्चैतन्यमेव पुरुष, शिर एव राहु, नास्त्युभयोर्भेद । सम्प्रबोधे ( जागरे ) सुखमहमस्वाप्सम्, दुखमहमस्वाप्तम्, गाढ मूढोऽहमस्वाप्सम् इत्यादिप्रत्यवमर्शात् । न चासत्यनुभवे सम्भवत्यभावो वृत्तीनाम् । अभावस्य प्रत्यय कारण तम., तदुद्रेक एव निद्रादर्शनात् तम अभावप्रत्यय आलम्बन यस्या सा तमोऽवलम्बना वृत्तिनिद्रा भवति । अनुभूतविषयासप्रमोष स्मृति. प्रमाणेनानुभूतस्यासम्प्रमोष सस्कारवशाद् बुद्धावुपारोह. । तेन कदाचित् कस्यचिदशस्प बुद्धावनुपारोहेण सम्प्रमोषोऽपि विज्ञायते । यथा प्रमुष्टत्ताका स्मृतिरेव इद रजतमिति भ्रमे रजतप्रतीतिरित्यख्यातिवादिन । अभ्यासो वृत्तिरहितस्य स्वरूपात्मक परिणाम स्थितिस्तस्या यत्न । लक्ष्ये वा मनस स्थितिरेकाग्रता । पुन. पुनस्तादृशस्थितो योऽभ्यास । विषयदोषदर्शनेन विषयवैमुख्य वैराग्यम् ॥ ताभ्या चेतसो दृढ स्थैर्य सम्पद्यते । भगवदर्पणबुद्धया ईश्वरप्रणिधानाद् भक्तिविशेषाद् विषयसुखादिनैरपेक्ष्येण शास्त्रविहितकर्मणामनुष्ठानरूपात् समाधिसिद्धि: सुखेन सम्पद्यते । ‘ क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट पुरुषविशेष ईश्वर ' (यो ० सू० १ १३ ) अस्य सूत्रस्य तु व्यासभाष्यमेवोद्धृतम्, अतो नास्त्यत्र विप्रतिपत्ति । क्लेशा अविद्यादय, विहितप्रतिषिद्धानि कर्माणि, विपाका जात्यायुर्भोगरूपाणि कर्मफलानि, आगया वासनारूपा सस्कारा, एतै सर्वथाऽसस्पृष्टोऽन्येभ्यो विलक्षणः पुरुषविशेष ईश्वरो भवति भक्त्याभिमूखीभूतः सङ्कल्पमात्रेण सर्वप्राणिनामुद्धरणक्षम । यद्यप्यन्येषामपि पुरुषाणा क्लेशादिस्पर्शो नास्त्येव, तथापि चित्तजा एव सन्त स्वरूप की बिना अपेक्षा किये शब्द के उच्चारण मात्र से पैदा हुआ ज्ञान विकल्प कहलाता है । जैसे षष्ठी विभक्ति का प्रयोग तो भेद का ही बोधक होता है, अत उसकी सहायता से चैतन्य पुरुष का स्वरूप है, राहु का शिर इत्यादि स्थलो में भेद न रखते हुए भी भेद की प्रतीति होने लगती है । वस्तुत. चैतन्य ही पुरुष हैं, शिर ही राहु, इनमें परस्पर कोई भेद नही होता । गाढ निद्रा से उठने के बाद मनुष्य को अनुभव होता है कि मैं आराम से सोया, मुझे आज अच्छी नोद नही आई अथवा आज निद्रा में मुझे कुछ भी भान नही हुआ । इस तरह के परामर्श के होने से यह प्रतीत होता है कि उस समय भा चैतन्य वृत्ति कार्य कर रही थी, क्योंकि विना अनुभव के कोई भी स्मृति पैदा नही हो सकती । अभाव की प्रतीति का कारण तम होता है । तमोगुण का उद्रेक होने पर ही निद्रा वृत्ति का व्यापार प्रारंभ होता है । तम कहते हैं अभाव की प्रतीति को, यह प्रतीति जिसका आलम्बन है, उस वृत्ति को निद्रा के नाम से जाना जाता है । प्रमाणों से अनुभूत विषयो का असम्प्रमोप अर्थात् सस्कारो के कारण बुद्धि में अवस्थिति स्मृति कहलाती है । इसलिये यदि किसी अनुभृत विषय का कोई संस्कार बुद्धि में नही बैठा तो उसको व्यक्ति भूल बैठता है । जैसे कि ' यह रजत है' इस तरह से सीप में जहा चादी का भ्रम होता है, वहा मनुष्य को सीप के यथार्थ सस्कारो की विस्मृति के कारण ही उसमें रजत की प्रतीति होने लगती है । यह मत अख्यातिवाद को मानने वाले दार्शनिकों का है । चित्त की इन वृत्तियो का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है । चित्त की वृत्ति रहित स्वरूप में परिणति को निरन्तर यत्नपूर्वक स्थिर रखने का नाम अभ्यास है और विषयों में अनेक प्रकार के दोषो को देखकर उनसे विमुख होना वैराग्य कहलाता है । अभ्यास और वैराग्य की सहायता से चित्त में स्थिरता लाई जाती है । भगवान् को ही सब कुछ अर्पण कर देने की अभिलाषा से भक्तिपूर्वक ईश्वर का ध्यान करने से विषय सुखो को प्राप्त करने को इच्छा न रखकर शास्त्रों में विहित कर्मों का अनुष्ठान करने से सुखपूर्वक समाधि दशा की प्राप्ति हो जाती है । 'क्लेशकर्म ० ' इत्यादि योगसूत्र की व्याख्या के रूप मे दयानन्द ने व्यासभाष्य को हो उद्धृत कर दिया है । इसमें हमारी कोई विमति नही है । अविद्या प्रभृति क्लेश हैं । शास्त्रविहित, शास्त्रनिषिद्ध अनेक प्रकार के कर्म होते हैं । जाति, आयु, और भोग के रूप में उपस्थित होने वाले कर्मफल विपाक कहलाते है । वासना रूप से विद्यमान संस्कार आशय कहे जाते है । इन सबसे सर्वथा अस्पृष्ट अन्य सब प्राणियों से विलक्षण पुरुषविशेष ईश्वर कहलाता है । भक्ति के द्वारा इसको जब प्राणी अपने अभिमुख कर लेता है, तो यह संकल्पमात्र से सब प्राणियो को उद्धार करने में समर्थ हो जाता है । यद्यपि वस्तुतः अन्य पुरुषो का भी क्लेश

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वेदार्थपारिजातः १३५५ पुरुषे व्यपदिश्यन्ते, राज्ञि योद्धृगतजयपराजयादिवत् । ईश्वरे तथाविधोऽपि क्लेशादिपरामर्शो नास्ति । अतोऽपि तत्र वैशेष्याद् अनादिसत्त्वोत्कर्षात् तस्य तथाविधमैश्वर्य प्रकृष्टज्ञानाच्च सत्त्वोत्कर्ष । तयोर्ज्ञानैश्वर्ययोरनादित्वाच्च न परस्पराश्रयता । तथाविधेन तस्यानादि सम्बन्ध, प्रकृतिपुरुष सयोगतद्व्यतिरेकयोरपि तदिच्छायत्तत्त्वात् । शास्त्रीयोपायै क्लेशादिनिवृत्तावपि मुक्तात्मना पूर्वबन्धकोऽपि । इत एव स मुक्तात्मभ्योऽपि विलक्षण, सदैव मुक्तत्वात् । तस्यैश्वर्यमसाम्यातिशयम् । अत एव स एक एव । ईश्वरनानात्वे भिन्नाभिप्रायत्वे कार्यानुपपत्ति । समानाभिप्रायत्वे वा तन्नानात्वानुपपत्ति । उत्कर्षापकर्षवत्त्वे य एव निरतिशयैश्वर्यवान् स एवेश्वर, तत्रैवैश्वर्यस्य निरतिशयत्वात् । ‘ तत्र निरतिगय सार्वज्ञ्यबीजम्' (यो० सू० ११२५ ) अत्रापि व्यासभाष्यमेवोद्धृतम् । तस्यात्मानुग्रहाभावेऽपि भूता- नुग्रह प्रयोजनम् । ज्ञानधर्मोपदेशेन कल्पप्रलयमहाप्रलयेषु ससारिण पुरुषानुद्धरिष्यामि । तथा चोक्तम्- 'आदिविद्वान् ' | निर्माणचित्तमधिष्ठाय कारुण्याद् भगवान् गरमर्षिरापुरये जिज्ञासमानाय तन्त्र प्रोवाच व्यासभाष्यमिद कथमिव तत्सिद्धान्तसङ्गतम्? आदिविद्वानत्र विष्ण्ववतारभूत कपिलमुनिविवक्षित । स च जिज्ञासमानायासुरये उपदिदेश । अत्र कण्ठताल्वादिजनितै शब्दैरेवोपदेशो मन्तव्य । त्वन्मते तु तस्य निराकारत्वाद् अव्यक्तत्वाच्च त प्रत्यासुरेजिज्ञासा तत्कर्तृक तन्त्रप्रवचन तु नोपपद्यते । न चात्रादिविद्वान् कश्विज्जीवोऽभ्युपगम्यते त्वया । 'स हि सर्वेषामपि गुरु कालेनानवच्छेदत्वात्' ( यो० सू० १ १५ ) इत्युत्तरसूत्रेऽपि परमेश्वर एव पूर्वसूत्रोक्त. परामृष्ट, कालानवच्छिन्नत्वात् परमेश्वरस्यैव नित्यगुरुत्वसिद्धे । 'तस्य वाचक प्रणव ' (यो० सू० १।२७) । यथा पितृपुत्रयो आदि से कोई संपर्क नही रहता, तो भी चित्त मे उत्पन्न होने के कारण ऐसा प्रतीत होने लगता है कि इसके साथ उनका सीधे संबंध है, जैसा कि सेना की हार हो जाने पर राजा की या राष्ट्र की हार मान ली जाती है । ईश्वर मे तो इस तरह के भी क्लेश आदि का कभी परामर्श नही होता । इसीलिये यह अन्य सब प्राणियों से विशिष्ट माना जाता है । अनादि सत्त्व गुण के उत्कर्ष से तथा प्रकृष्ट ज्ञान के कारण ईश्वर में यह ऐश्वय रहता है और इसीलिये इमका सत्व गुण अत्यन्त उत्कृष्ट दशा में सदा विद्यमान रहता । ईश्वर में विद्यमान ये ज्ञान और ऐश्वर्य अनादि है, अत इनमें परस्पराश्रय दोष का कोई प्रसंग नही है । इनके साथ इसका संबन्ध भी अनादि काल से चला आ रहा है । प्रकृति और पुरुष का सयोग और वियोग भो ईश्वर की इच्छा के हो ,अधीन है । शास्त्रविहित उपायो का आचरण करने पर मुक्तात्मा भो क्लेशादि से निवृत्त हो जाता है तो भी पहले वह बन्धन मे पडा रहता है और ईश्वर तो सदा ही इन बन्धनो से मुक्त रहता है । यही इनमे विशेषता है । उसका ऐश्वर्य निरतिशय होता है । इसीलिये वह एक हो है । ईश्वर यदि अनेक मानें जायें तो उनके भिन्न-भिन्न अभिप्राय होने पर कोई अर्थ होने हो नही पावेगा और यदि सबका एक ही अभिप्राय है तो फिर अनेक ईश्वर मानने का उपयोग ही क्या है? यदि इनमें कोई छोटा या बडा है, तो जिसमे निरतिशील ऐश्वर्य है, उसी को ईश्वर माना जायगा । जो सबसे बडा है, उसी मे निरतिशय ऐश्वर्य माना जा सकता है । इस बात को 'तत्र निरतिशयं सार्वज्ञबीजम्' इस सूत्र में अभिव्यक्त किया गया है । दयानन्द ने यहाँ भी व्यासभाष्य को ही उद्धृत किया है । इसकी प्रवृत्ति अपने किसी प्रयोजन की सिद्धि के लिये न होकर सभी प्राणियों पर अनुग्रह करने के लिये ही होती है । ज्ञान और धर्म का उपदेश कर कल्प, प्रलय, महाप्रलय में कभी न कभी इन ससारा पुरुषो का मै उद्धार करूँगा, यही उसका संकल्प रहता है । जैसा कि कहा गया है -आदिवद्वान् भगवान् परमपि कपिल ने करुणावश निर्माणचित्त में अधिष्ठित होकर जिज्ञासु शिष्य आसुरि को इस शास्त्र का उपदेश दिया । व्यासभाष्य की यह बात दयानन्द के मत से कैसे ठीक मानी जा सकती है? आदि-विद्वान् के नाम से यहाँ विष्णु के अवतार कपिल मुनि का ग्रहण किया जाता है । उसने जिज्ञासु आसुरि को शास्त्र का उपदेश किया । कण्ठ, तालु आदि से निकलने वाले शब्दों से यह उपदेश दिया जा सकता है । आपके मत से तो ईश्वर निराकार है और अव्यक्त भी है । उसके सामने आसुरि की जिज्ञासा और उसका प्रत्युत्तर रूप में शास्त्र का प्रवचन, ये दोनो ही संभव नहीं हो सकते । इस प्रसंग मे आप 1 दूसरे किसी आदिविद्वान् जीव की सत्ता भी नही मानते । 'स हि पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्' इस आगे के सूत्र में भी पूर्व सूत्र में व्यपदिष्ट ईश्वर के विषय में ही कहा जाता है, क्योंकि परमेश्वर ही काल से अवच्छित न होने के कारण अनादि काल से उसका गुरु माना जा सकता है । 'तस्य वाचकः प्रणवः'

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१३५६ वेदार्थपारिजाता स्थित एव सम्बन्ध सङ्केतेन वोध्यते - अयमस्य पिता, अयमस्य पुत्र इति तथैव प्रणवपरमेश्वरयो स्थित एव सम्बन्ध: ' ' ( ) सङ्केतेन प्रकाश्यते । तज्जपस्तदर्थभावनम् यो० सू० ११२८ स्वाध्यायात् प्रणवजपात् तत्स्वरूपमाहात्म्यबोधकशास्त्र- विचाराञ्चाभिव्यक्तं स्वरूपं ध्यायेत् । स्वाध्यायं त्यक्त्वा तद्ध्यानपरायण स्याद् ध्याने शैथिल्ये पुन स्वाध्याय कुर्यात् । तस्मात् स्वाध्यायानन्तरं योगमासीत योगमभ्यस्येद् योगानन्तर च स्वाध्यायं कुर्यात् । एव स्वाध्याययोगपारम्पर्येण परमात्मा प्रकाशते । ' ' ( ) तत प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च यो० सू० ११२९ तज्जपात् तदर्थभावनाच्च प्रत्यक्चेतनस्य शुद्धस्वात्मनोऽधिगम. सशयविपर्ययादिराहित्येन साक्षात्कारो भवति, व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शना- लब्धभूमिकानवस्थितत्वाद्यन्तरायनिवृत्तिश्च भवति । एवमेवानेकानि योगसूत्रात्रि तद्भाष्याणि चोद्धृतानि । तत्र न किमपि वक्तव्यमस्ति । हिन्दीभाष्ये तु किञ्चिदनर्गलमुक्तम्, तत्समाधान तु हिन्दीलेखका. करिष्यन्ति ॥ जिज्ञासुभिस्तु तदभिप्राय सूत्रभाष्यवाचस्पतिभोजराजादिटीकाभ्योऽवगन्तव्यः । 'स्थिरसुखमासनम् ' ( यो० सू० १/४६) आस्ते आस्ते वा अनेनेत्यासनम्, पद्मासनादि । ' प्रयत्नशैथिल्यानन्त- समापत्तिभ्याम्' ( यो ० सू० ११४७) तत्सिद्धि । सासिद्धिको हि प्रयत्नः शरीरधारको यादृच्छिकासनहेतुतयासननियमोप- हन्तृत्वात् स्वाभाविकप्रयत्नशैथिल्याय प्रयत्न आस्थेय । अनन्ते नागनामके स्थिरफणासहस्रविधृतविश्वम्भरामण्डले समापन्नं चित्तमासनसिद्धिहेतुर्भवति । आकाशादिगतानन्त्ये चेतसोऽवधाने तादात्म्यापत्तौ देहाहङ्काराभावान्नासनं दु खजनकं भवति, तस्मादासन सिद्ध्यति । इस सूत्र से प्रणव और परमेश्वर का अनादि काल से विद्यमान संबन्ध हो सकेत के द्वारा प्रकाशित होता है, जैसे कि पिता और पुत्र का पहले से विद्यमान सम्बन्ध ही कोई संकेत से बताता है कि यह इसका पिता है और यह इसका पुत्र । 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' इस सूत्र मे बताया गया है कि स्वाध्याय से और प्रणव के जप से और ईश्वर के स्वरूप के माहात्म्य के बोधक शास्त्र का विचार करने से जो स्वरूप अभिव्यक्त हो, उसका चिन्तन करे । स्वाध्याय को छोडकर ईश्वर का ध्यान करने में लग जाय और ध्यान मे शिथिलता आने पर पुनः स्वाध्याय करने लगे 1। इसीलिये कहा गया है कि स्वाध्याय के अनन्तर योग का अभ्यास करे और योग के बाद स्वाध्याय का अभ्यास करे । इस तरह से स्वाध्याय और योग के निरन्तर अभ्यास से अन्त में परमात्मा प्रकाशित हो जाते है । 'ततः प्रत्यक्० ' इत्यादि सूत्र का अर्थ यह है कि उस प्रणव का जप करने से और उसके अर्थ का चिन्तन करने से प्रत्यक् चैतन्य अर्थात् शुद्ध स्वात्मस्वरूप की संशय और विपर्यय से रहित अवस्था की अधिगति अर्थात् साक्षात्कार होता है और साथ ही व्याधि, स्त्यान आदि अन्तरायो की निवृत्ति भी हो जाती है । दयानन्द ने इस प्रकरण में इसी तरह के अनेक सूत्रो को और उनके भाष्य को उद्धृत किया है । उस पर हमको कुछ कहना नही है । हिन्दी भाष्य में तो कुछ अनर्गल बातें भी लिखी गई है । उनका समाधान या उसकी आलोचना हिन्दी के लेखक करेंगे । जो व्यक्ति इनका वास्तविक अभिप्राय जानना चाहते हैं, उनको सूत्र, भाष्य और उन पर वाचस्पति मिश्र, भोजराज प्रभृति के टीका ग्रन्थ देखने चाहिये । पद्मासन प्रभूति अनेक आसन योगशास्त्र में वर्णित हैं । इनको आसन इसलिये कहते है कि इनकी सहायता के साधक आराम से बहुत देर तक स्थिर रूप से बैठ सकता है । प्रयत्न की शिथिलता और अनन्त में समापत्ति से यह संभव होता है । सासिद्धिक प्रयत्न शरीर का धारक है । यह प्रयत्न जिस तरह से हम स्थिर रूप से बैठना चाहते है, आसन के उस नियम का बाधक हो जाता है । अतः इस स्वाभाविक प्रयत्न में शिथिलता लाने के लिये प्रयत्न करना चाहिये । नागो के राजा अनन्त ( शेष नाग ) की हजार फणाओं पर यह सारी पृथ्वी अत्यन्त स्थिर रूप से विराजमान है । इसमे चित्त को लगा देने पर आसन स्थिर हो जाता है । इस तरह से आकाश प्रभूति में विद्यमान अनन्तता मे चित्त को लगा देने पर1 उस अनन्तता के साथ चित्त का तादात्म्य हो जाने पर देह में आत्मा-हंकार की निवृत्ति हो जाने से आसन दुःख का कारण नही हो पाता । इसका अभ्यास करने से आसन की स्थिरता सिद्ध हो जाती हैं । अर्थात् स्वभावतः शरीर का यह धर्म है कि बिना हिले- डुले एक ही आसन से बैठने पर शरीर में कष्ट की अनुभूति होने लगती है, किन्तु आसन की स्थिरता का अभ्यास करने से शरीर को इस तरह के कष्ट को अनुभूति नही होती और इस तरह से आसन सिद्ध हो जाता है ।

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वेदार्थपारिजातः १३५७ ' तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद' प्राणायाम ' (यो० सू० २२४२ ) । बाह्यस्य वायोरन्तर्निवेशन श्वास, कौष्ठ्यस्य वायोर्वहिर्गमन प्रश्वास, तयोर्गते प्रवाहस्य विच्छेद प्राणायाम | 'बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभि. ' ( ),, परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्म यो० सू० २।५० । इत पूर्व यदुक्त स्थिरीकृत्य गत्यभावकरण प्राणायाम तन्न गत्यभावस्य ,, स्थिरीकरणानतिरिक्तत्वात् । प्रश्वासपूर्वको गत्यभावो बाह्यश्वासपूर्वको गत्यभाव आभ्यन्तर तृतीय स्तम्भवृत्ति यत्रोभयाभाव, सत्कृत्य यत्नाद् भवति । यथा तप्त उपले नि क्षिप्तं जल सर्वत सङ्कोचमापद्यते, तथा द्वयोर्युगपद् गत्यभावो देशकालसख्याभि परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मो भवति । यदुक्तम् — 'बालबुद्धिभिरङ्गुल्यङ्गुष्ठाभ्या नासिकाछिद्रमवरुद्ध्य य प्राणायाम क्रियते स, शिष्टैस्त्याज्य एवास्ति' इति, तदपि बालभाषितम्, 'ततो दक्षिणहस्तस्य अङ्गुष्ठेनैव पिङ्गलाम् । निरुद्धय पूरयेद् वायुमिडया तु शनै शनै ॥ यथा शक्त्यविरोधेन तत कुर्याच्च कुम्भकम् । पुनस्त्यजेत्पिङ्गलया शनैरेव न वेगत ॥ पुन पिङ्गलया पूर्य पूरयेदुदर शनै । ' (योगतत्त्वोपनिषदि ३६, ३९ ) इति योगतत्त्वोपनिषद्विरोधात् । सूर्यचन्द्रादिनाडीभेदेन प्राणरोधाभ्यासे नाडीशुद्धयादौ वैशेष्य- स्यानुभवसिद्धत्वाच्च । योगकुण्डलिन्युपनिषदि च 'दक्षनाड्या समाकृष्य बहिष्ठं पवन शनै । यथेष्ट पूरयेद् वायु रेचयेदिडया ततः ॥ ' इति तदेवोक्तम् । नहि अङ्गुष्ठाद्ययोगे दक्षनाड्या वामनाड्या वा वायो पूरण रेचन वा सम्भवति । 'बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थ ' (यो० सू० २।५१ ) प्राणस्य बाह्य विषयो नासाद्वादशान्तादि', आभ्यन्तरो ,. |विषयो हृदयनाभिचक्रादि तौ द्वौ विषयावाक्षिप्य पर्यालोच्य य स्तम्भरूपो गतिविच्छेद स चतुर्थ प्राणायाम तृतीयस्मात्कुम्भकादयमस्य विशेष -स बाह्याभ्यन्तरविषयौ अपर्यालोच्यैव सहसा तप्तोपलनिपतितजलन्यायेन युगपत् 'तस्मिन् सति० ' इत्यादि सूत्र मे प्राणायाम का स्वरूप बताया गया है । बाहरी वायु को भीतर खोचने का नाम श्वास और भीतरीवायु को बाहर निकालनेनिकालने काका नामनाम प्रश्वासप्रश्वास हैहै ॥ श्वास और प्रश्वास की स्वाभाविक गति का प्रवाह को रोक देना ही प्राणायाम कहलाता है । इस सूत्र के बाद और 'बाह्याभ्यन्तर० ' इस सूत्र से पहले दयानन्द ने कहा है कि श्वास-प्रश्वास की गति को जीतना अर्थात् इनको स्थिर कर गतिहीन कर देना ही प्राणायाम है (१० २० ९ ) । यह कथन गलत है, क्योंकि गतिहीनता का नाम ही तो स्थिरता है । प्रश्वास के साथ ही गतिहीनता बाह्य प्राणायाम, श्वास के साथ ही गतिहीनता आभ्यन्तर प्राणायाम और तृतीय प्राणायाम स्तम्भवत्ति कहलाता है, जिसमें कि बाह्य अथवा आन्तर कोई भी गति नही रहती । निरन्तर आदर - सत्कार पूर्वक अभ्यास करने से ही यह सिद्ध होता है । जैसे तपे हुए पत्थर पर जल डालने से वह चारो तरफ सूख जाता है, उसी तरह से श्वास और प्रश्वास दोनो की गति जब एक साथ रुक जाती है, तो इसकी देश, काल और सख्या के हिसाब से दीर्घ अथवा सूक्ष्म स्थिति सिद्ध हो जाती है । दयानन्द ने यहा कहा है कि 'नासमझ लोग अंगुली और अंगूठे से नाक के छिद्र को रोककर प्राणायाम का अभ्यास करते । शिष्ट जनों के लिये इस विधि का त्याग करना ही ठीक है' ( पृ ० ३०१ ) । वस्तुत: दयानन्द की यह बात हो नासमझी की है, क्योंकि योगतत्त्वोपनिषद् से उनकी बात का विरोध पड़ता है । वहा स्पष्ट बताया गया है कि ' दाहिने हाथ के अंगूठे से पिंगला नाडी का मार्ग रोककर भीतर धीरे धीरे इस नाडी की सहायता से शरीर में वायु का प्रवेश करावे और इसके बाद शक्ति के अनुसार उस वायु को कुंभक प्राणायाम की सहायता से भीतर ही रोके रहे । बाद में पिंगला नाडी के मार्ग से उस रोकी गई वायु को बाहर धीरे धीरे निकाल दे, इस कार्य में शीघ्रता न करे । फिर पिंगला से वायु को खोचकर धारे घोरे अपने पेट को उससे भर ले' । सूर्य और चन्द्र नाडियो के भेद से प्राणायाम का अभ्यास करने से नाडो की शुद्धि हो जाने पर शरीर में एक विशेष स्फूर्ति की स्थिति आती है, यह बात अनुभव सिद्ध है | यही बात योगकुण्डलिनी उपनिषद् मे भो कही गई है । जब तक नाक के साथ अंगूठे आदि का योग नही होगा, तब तक दाहिनी अथवा बायी नाडी से वायु का पूरण अथवा रेचन संभव नही है । ' बाह्याभ्यन्तर० ' इत्यादि सूत्र में चतुर्थ प्राणायाम का वर्णन किया गया है । प्राण के बाह्यविषय नासिका, द्वादशान्त प्रभृति और आभ्यन्तर विषय हृदय, नाभिचक्र आदि है । इन दोनों विषयो से प्राण को खोचकर और उनका भलीभाँति आलोचन कर उनकी गति को रोक देना ही चतुर्थ प्राणायाम कहलाता है । तृतीय कुम्भक प्राणायाम से इसकी विशेषता यह है कि कुभक प्राणायाम बाह्य

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वेदार्थपारिजाता १३५८ स्तम्भवृत्त्या निप्पद्यते । अस्य तु विपयद्वयाक्षेपको निरोध इति भोजदेव • । देशकालस ख्याभिरभ्यासेन वशीकृताभ्या प्राणायामाभ्या भूमिजयक्रमेणोभयोर्गंत्यभावश्चतुर्थ । ननु तृतीयेऽप्युभयोर्गतिविच्छेदको विशेषोऽस्तीति तत्राह भाष्यकार ', तृतीयस्तु विषयानालोचितो गत्यभाव सकृदारब्ध एव अर्थात् अनालोचनपूर्व । सकृत्प्रयत्ननिर्वर्तनीयस्तृतीय । चतुर्थस्त्वालोचनपूर्वको बहुप्रयत्ननिर्वर्तनीय । यदुक्तम्—'यस्तु खलु तृतीयोऽस्ति न सदैव बाह्याभ्यन्तरस्यापेक्षा करोति, किन्तु यत्र यत्र देशे प्राणो वर्तते तत्र तत्रैव सकृत्स्तम्भनीयः । यथा किमप्यद्भुत दृष्ट्वा मनुष्यश्चकितो भवति तथैव कार्यमित्यर्थ ' इति, तन्न, सर्वेषामपि कुम्भकानां मकृत्प्रत्ययनिर्वर्त्यत्वाविशेषात् । तदुक्त तत्त्ववैशारदीकृता -' यत्रोभयो श्वासप्रश्वासयो सकृदेव विधारकात् प्रयत्नादभावो भवति, न पुन पूर्ववदापूरणप्रयत्नौघविधारकप्रयत्नो नापि रेचनप्रयत्नौघविधारक प्रयत्नोऽपेक्ष्यते, किन्तु यथा तप्त उपले नि क्षिप्त जल परिशुष्यते, सर्वत सङ्कोचमापद्यते, एवमयमपि मारुतो वहनशीलो बलवद्विधारकप्रयत्ननिरुद्धक्रिय शरीर एव सूक्ष्मीभूतोऽवतिष्ठते, न पूरयति येन पूरक., न तु रेचयति येन रेचक, न चैष रेचकान्तर क्रियमाणेऽभ्यन्तरे सकृत्प्रयत्न- निर्वृत्ते कुम्भके विषयानालोचितो गत्यभावः, चतुर्थे तु विपयालोचनपूर्वकात् बहुप्रयत्नसाध्यो गत्यभाव' । अद्भुतदर्शने तु प्रयत्नमन्तरैव क्षणाय स्तम्भवृत्तिर्जायते । तत्र सकृत्प्रयत्नोऽपि नास्ति । कुम्भकेषु तु सर्वेषु सकृत्प्रयत्नोऽपेक्षित । 'तत क्षीयते प्रकाशावरणम्' (यो० सू० २१५२) इत्यत्र दयानन्देन स्वव्याख्यानमेव भाष्यशब्देन लिखितम् । - ( ) ' (, तथाहि भाष्यम् एव प्राणायामाभ्यासात् यत्परमेश्वरस्यान्तर्यामिण प्रकाशे सत्यविवेकस्यावरण ख्यमज्ञानमस्ति तत्क्षीयते और आन्तर विषय का पर्यालोचन किये बिना ही एकाएक तपते हुए पत्थर पर पडे जल के समान सहसा प्राणो को स्तब्ध कर देता है । इसके विपरीत इस चतुर्थ प्राणायाम में उक्त दोनो विषयों का ठीक से पर्यालोचन करने लिये उनका निरोध किया जाता है । यह भोजदेव का मत है । देश, काल और संख्या के आधार पर वशीकृत प्राण और अपान के अभ्यास से चित्त-भूमियो का क्रमश. जय करके आगे बढते हुए इन दोनो की गति को रोक देना ही चतुर्थ प्राणायाम का कार्य है । तृतीय प्राणायाम मे भी यही विशेषता है? इस प्रश्न के उत्तर में भाष्यकार का यह कहना है-'तृतीय प्राणायाम में विषय का पर्यालोचन किये बिना हो गति को रोक दिया जाता है और यह एक ही बार हो सकता है । इसका अभिप्राय यह कि विना विचार किये एक बार प्राणायाम के द्वारा प्राणापान की गति का निरोध तृतीय प्राणायाम का विषय है और चतुर्थ प्राणायाम में विषय का आलोचन तो रहता ही है, साथ ही बार-बार प्रयत्न करने के बाद इस प्राणायाम की सिद्धि हो पाती है । दयानन्द ने यहा कहा है कि तृतीय प्राणायाम में ( बाह्य और आन्तर प्राणायाम में ) से किसी न किसी की अपेक्षा रहती है । किन्तु इस अवस्था में जहा कही भीप्राण हो, उसको वही रोक देने का आयास किया जाता है । जैसे किसी अनोखी वस्तु को देखकर आदमी चकित हो जाता है, उसी तरह की स्थिति यहा भी होती है । किन्तु उनका यह कथन सही नही है, क्योकि सभी कुम्भकों की एक सी ही स्थिति होती है कि उनके लिये प्रयत्न एक ही बार किया जाता है । जैसा कि तत्त्ववैशारदीकार ने कहा है-'जिस प्राणायाम में श्वास और प्रश्वास दोनो का एक ही बार के विधारक प्रयत्न से निरोध हो जाता है, फिर पहले की तरह आापूरण प्रयत्न के समूह के विधारक प्रयत्न अथवा रेचक प्रयत्न के समूह के विधारक प्रयत्न की अपेक्षा नही रहती, किन्तु जैसे तपते हुए पत्थर पर डाला सारा पानी सूख जाता है, ' उसी तरह से प्राण और अप्राण की गति जब चारो तरफ से संकुचित हो जाती है और शरीर के ही किसी कोने में सूक्ष्म रूप में टिक जाती है, तब प्राण और अपान की पूरण और रेचन क्रिया के अभाव में यह न तो पूरक ही रहेगा, न रेचक ही और न इसको रेचक क्रिया के बाद किये जाने वाले एक बार के आभ्यन्तर प्रयत्न से निष्पन्न होने वाला कुम्भक ही कहा जा सकता है, जिसमें कि विषय का आलोचन किये बिना ही प्राणापान की गति का अवरोध हो जाता है । इस चतुर्थ प्राणायाम मे तो विषय के आलोचन के साथ बढ़े प्रयत्न के साथ इनकी गति को रोकने का अभ्यास किया जाता है | अनोखी वस्तु को देखने जो स्थिति होती है, उसमे तो बिना प्रयत्न के ही एक क्षण लिये व्यक्ति स्तब्ध हो जाता है, यहा तो एक बार भी प्रयत्न नही करना पडता । तृतीय प्राणायाम कुम्भक में एक बार प्रयत्न करना पड़ता है ।

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देवार्थपारिजात १३५६ ' ( ),, क्षय प्राप्नोति पृ० २०२ इति तदप्ययुक्तम् व्यासभाष्यप्रसङ्गे स्वव्याख्यानस्य भाष्यपदेनोल्लेखने व्यासभाष्यत्वभ्रम- सम्भवात् । व्याख्यानमपि तत्र शोभनम्, परमेश्वरस्य प्रकाशे सतीत्यर्थस्य सूत्राक्षरबहिर्भूतत्वात् । 'प्राणायामानभ्यस्यतोऽस्य योगिन क्षीयते विवेकज्ञानावरणीय कर्म' इति व्यासभाष्यविरोधाच्च । तत्र प्रकाशपदेन विवेकज्ञानमुक्तम्, तम्यावरण कर्मो- क्तम् । तथाविवेकज्ञानरूपप्रकाशस्यावरक कर्म प्राणायामेन क्षीयते । ततो विवेकज्ञानरूप प्रकाश सम्पद्यते । दयानन्देन तु ' अविवेकस्यावरणाख्यमज्ञानमिति वदता प्रकाशपदेनाविवेको गृहीत । तस्यावरणमज्ञानमुक्तम्, तच्च न केवल विरुद्धमपि तु सर्वतन्त्र विरुद्धम् । परमात्मप्रकाशे मत्यविवेकस्यावरणे क्षीणेऽप्यविवेकस्यैवाभिव्यक्तिर्भविष्यति । भाष्ये तू विवेकज्ञानावरणीय कर्मोक्त नाज्ञानम् । विवेकज्ञानमावरणीय येन तत् । वस्तुतस्तु विवेकज्ञानमावृणोतीति व्युत्पत्तावेवावरणार्थ एवावरणीयशब्द । 'भव्यगेयप्रवचनादीनाम्' ( पा० सू० ३।४।६८) इति वृञ्धातो कर्तरि कृत्यप्रत्यय, निपातनस्य प्रदर्शनार्थत्वात् कोपनीय रञ्जनीयादिवत् । तथा च पाप्मा क्लेशश्च विवेकज्ञानावरण भवति, नाज्ञानम् । कर्माप्यत्र कर्मजन्यमपुण्य क्लेशश्वच्यते, 'आव्रियतेऽनेन बुद्धिसत्त्वप्रकाश इत्यावरण क्लेश पाप्मा च' इति वाचस्पतिवचनात् । एवमय यत्र यत्र किञ्चिदपि वर्दात, तदनर्गलमेव । 'धारणासु योग्यता मनम ' ( यो० सू० २।५३ ) । भाष्यम्–प्राणायामाभ्यासादेव प्रच्छर्दनविधारणाभ्या वा प्राणस्येति वचनात्, अर्थात् प्राणस्य प्रच्छर्दनविधारणाभ्या मन स्थितिपद लभत इत्यर्थकसूत्रानुरोधात् प्राणायामाभ्यासा- न्मनसो धारणासु योग्यता सम्पद्यते । यत्त्वत्रैव दयानन्देन प्राणायामानुष्ठानेनोपासकाना मनसो ब्रह्मध्याने सम्यग् योग्यता भवतीत्युक्तम्, तदप्यशुद्धमेव, व्याख्येयसूत्रविरोधात् । सूत्रे तु धारणासु योग्यतोक्ता न ध्याने । न चोभयोरैक्य शङ्कनीयम्, ' ततः क्षीयते ० ' इत्यादि सूत्र के स्वरचित भाष्य को ही दयानन्द ने व्यासभाष्य के नाम से उद्धृत कर दिया है - ' इस प्राणायाम पूर्वक उपासना करने से आत्मा के ज्ञान का आवरण, अर्थात् ढापने वाला जो अज्ञान है, वह नित्य प्रति नष्ट होता जाता है और ज्ञान का प्रकाश धीरे धीरे बढता जाता है' (पृ० २०४ ), यह भी गलत बात है । व्यासभाष्य के प्रसंग मे अपनी व्याख्या का उल्लेख भाष्य के नाम से करना गलत है, क्योकि यह स्वाभाविक भ्रम हो सकता है कि यह व्यासकृत भाष्य ही है, जब कि ऐसी बात नही है । यह व्याख्या ठीक है भी नही, क्योकि परमेश्वर के प्रकाशित होने की बात सूत्र मे नही कही गई है और इसका इस योग- भाष्य से स्पष्ट विरोध है कि 'प्राणायाम का अभ्यास करने वाले योगी के विवेक ज्ञान को ढक देने वाले कर्म क्षोण हो जाते है ' । यहा प्रकाश पद से विवेक ज्ञान का ग्रहण किया गया है और उसका आवरण डालनेवाला कर्म प्राणायाम है । इस तरह का विवेक ज्ञान पर आवरण डालने वाला कर्म प्राणायाम के अभ्यास से क्षीण हो जाता है । तब विवेक ज्ञान का प्रकाश योगी के चित्त में आलोकित हो जाता | इसके विपरीत दयानन्द ने अविवेक का आवरण अज्ञान, ऐसा कहकर प्रकाश का अर्थ अविवेक कर दिया है और उसके आवरण को अज्ञान बताया है । यह बात उक्त भाष्य के ही विरुद्ध नही है, अपितु सभी दार्शनिक सिद्धान्तो के भी विपरीत पडती है । इस तरह से तो परमात्मा के योगी के चित्त में प्रकाशित होने पर भी और अविवेक का आवरण क्षीण हो जाने के बाद भी अविवेक की ही अभि- व्यक्ति होगी । भाष्य में तो विवेक ज्ञान का आवरक कर्म को पाना है," अज्ञान को नही, क्योकि कर्मों के द्वारा विवेक ज्ञान आवृत कर दिया जाता है । वास्तव में तो विवेक ज्ञान को ढकता है, इस व्युत्पत्ति में भी आवरणीय शब्द आवरण के अर्थ मे ही माना जाता है । वृ धातु से कर्ता अर्थ में कृत्य प्रत्यय होता है । कोपनीय, रञ्जनीय की तरह से आवरणीय शब्द भी नियमन के आधार पर सहा माना जाता है । इस तरह से पाप कर्म और क्लेश ये ही विवेक ज्ञान के आवरक होते है, अज्ञान नहीं । कर्म पद से भी यहा कर्म जन्य पाप कर्म और क्लेश का ही बोध होता है । वाचस्पति मिश्र ने कर्म पद का यही अर्थ किया है, क्योंकि ये बुद्धि को सात्विक वृत्ति को रोकते हैं । दयानन्द का यह स्वभाव ही है कि वे जहा वहा इसी तरह अनर्गल व्याख्या करते रहते है । ' धारणासु योग्यता मनस:' इस सूत्र का अर्थ यह है कि प्राणायाम के अभ्यास से ही, अर्थात् प्राण के प्रच्छर्दन और विधारण से ही, मन स्थिर होता है । इस आशय के सूत्र के अनुसार प्राणायाम का अभ्यास करने से मन धारणाओं के लिये समर्थ हा जाता है | यहा दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है कि प्राणायाम के अनुष्ठान से उपासक का मन भली भाति ब्रह्म की आराधना के योग्य हो जाता है । यह अर्थ सर्वथा अशुद्ध है, क्योंकि इसका सूत्र के साथ स्पष्ट विरोध पडता है । सूत्र में बताया गया है कि इसका अभ्यास

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 460 का मूल पृष्ठ
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१३६० वेदार्थपारिजातः धारणाध्यानयोर्लक्षणभेदेन भिन्नत्वात् । 'देशबन्धश्चित्तस्य धारणा' (यो० सू० ३।१ ), ' तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्' ( यो० सू० ३।२ ) । नाभिचक्रादिष्वभ्यन्तरे बाह्य वा चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्धो धारणा, ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता ध्यान भवति । 'स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणा प्रत्याहार ' (यो० सू० २१५४ ) इत्यत्र पुनः स्वव्या- ख्यानमेव दयानन्देन भाष्यत्वेनोक्तम् - ' यदा चित्तं जित भवति परमेश्वरालम्बनाद्विषयान्तरे नैव गच्छति, तदेन्द्रियाणा प्रत्या- हारोऽर्थान्निरोधो भवति । कस्य केषामिव? यथा चित्तं परमेश्वरस्वरूपस्थ भवति, तथैवेन्द्रियाण्यपि । अर्थात् चित्ते जिते सर्व- मिन्द्रियादिकं जित भवतीति विज्ञेयम्' ( पृ० २०३ ) । तदेतत्तदीयमपूर्वभाष्यमसङ्गतमेव, सूत्रार्थास स्पर्शित्वात् । चित्त यदा शब्दादिभिर्विषयैर्न सम्प्रयुज्यते तदसम्प्रयोगात् चक्षुरादीनीन्द्रियाण्यपि न सम्प्रयुज्यन्ते, सोऽयमिन्द्रियाणा चित्तस्वरूपानुकारः । तथापि चित्तं यत्सूक्ष्म ब्रह्मात्मतत्त्वमभिनिविशते न तदिन्द्रियाणि बाह्यविषयत्वादभिनिवेष्टु शक्नुवन्नीति न सर्वथा चित्तानुकारः सम्भवतीन्द्रियाणाम् । तेन स्वविषयासंयोगस्य साधारणधर्मस्य सत्त्वादेव चित्तानुकारत्वमिन्द्रियाणाम् । यत्तु - ' परमेश्वरस्मर- णालम्बनात्' इत्युक्तम्, तदसङ्गतम्, परमेश्वरालम्बनादित्यस्यैव सुवचत्वात् । परमेश्वरो हि चित्तस्यालम्बन भवति न तत्स्मर- णम्, तस्य विषयित्वेन विषयत्वायोगात् । यच्च -' यथा चित्त परमेश्वरस्वरूपस्थ भवति तथेन्द्रियाण्यपि' इति, तदप्यसङ्गतम्, इन्द्रियाणा बाह्यत्वेन परमेश्वरस्थत्वासम्भवात् । 'न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्' ( कठो ० २१३१ ९ ) इत्यादिश्रुतिविरोधात् । ननु - ' यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ' ( केनोप० ११५ ) इति श्रुत्या मनोविषयत्वमपि निषिद्धयत एवेति चेन्न, शास्त्राचार्योपदेश संस्कारशून्यचित्तविषयत्वनिषेध एवोक्तश्रुतेस्तात्पर्यात्, ' दृश्यते स्वयया बुद्धया' ( कठो ० १| ३ | १२ ) करने से चित्त धारणा के लिये समर्थ हो जाता है, इसमें ध्यान का कही उल्लेख नही है । धारणा और ध्यान को एक नही माना जा सकता, क्योकि योगसूत्र मे धारणा और ध्यान का अलग अलग लक्षण किया गया है, जैसा कि ऊपर उद्धृत दो सूत्रो से स्पष्ट है । इनके अनुसार नाभि- चक्र प्रभृति आन्तर अथवा बाह्य वस्तुओं मे चित्त की वृत्ति को बाँध देना धारणा और ध्येय आलम्बन मे चित्त की एकाकारता को ध्यान कहते है । 'स्वविषयासम्प्रयोगे ० ' इत्यादि सूत्र में प्रत्याहार का लक्षण किया गया है । यहाँ पुन दयानन्द ने अपनी व्याख्या को ही भाष्य बताया है । 'प्रत्याहार उसका नाम है, जब कि पुरुष अपने मन को जीत लेता है । परमेश्वर को अपना आलम्बन बना लेने के कारण चित्त कही अन्यत्र नही जाता, तब इन्द्रियो का प्रत्याहार अर्थात् निरोध हो जाता है । किसका कैसा निरोध होता है? जैसे चित्त परमेश्वर के स्वरूप में स्थित हो जाता है, उसी तरह से इन्द्रियाँ भी परमेश्वर के स्वरूप में स्थित हो जाती है । अर्थात् चित्त को जीत लेने पर इन्द्रियों का जीतना अपने आप हो जाता है, क्योकि + मन ही इन्द्रियो को चलाने वाला है' ( पृ० २०४ ) | दयानन्द का यह अनोखा भाष्य भी पूरी तरह से असंगत है, क्योकि सूत्र के अक्षरों से इसका कोई सम्बन्ध नही है । चित्त जब शब्द प्रभृति विषयों से संयुक्त नही होता, तब इन्द्रियाँ भी उन विषयों से संबद्ध नही हो पाती । इस तरह से इन्द्रियां चित्त का अवश्य अनुसरण करती हैं । किन्तु चित्त जब सूक्ष्म ब्रह्मस्वरूप मे अभिनिविष्ट होता है, तब इन्द्रियाँ वहां नही पहुँच पाती, क्योंकि वे तो बाह्य स्थूल विषयों को ही कर पाती हैं । इस तरह से इन्द्रियाँ सब स्थितियों में चित्त का अनुवर्तन नही कर सकती । इन्द्रियों चित्त का अनुकरण अपने ग्रहण को लेकर ही सामान्य रूप से कर पाती है । दयानन्द ने परमेश्वर के स्मरण को चित्त का आलम्बन बताया है, यह गलतबाह्यहै विषय, क्योंकि इतना ही कहना पर्याप्त है कि परमेश्वर चित्त का आलम्बन है । परमेश्वर ही चित्त का आलम्बन हो सकता है, उनका परमेश्वर तो विषयी है, वह किसी का विषय नही हो सकता । 'जैसे चित्त परमेश्वर के स्मरण मे स्थित हो जाता है, स्मरण नही । इन्द्रियाँ भी उसी मे स्थित हो जाती है, यह कहना भी असंगत है, क्योकि इन्द्रियाँ तो बाह्य विषयों का ग्रहण करती है, वेउसीपरमेश्वरतरह सेमें कैसे स्थित हो सकती है? ऐसा मानने पर ' इसको कोई आंखों से नही देख सकता' इत्यादि श्रुतियों से स्पष्ट विरोध होगा । यहाँ प्रश्न उठता है कि 'जिसको मन से नही जाना जाता, किन्तु जिसके रहने से ही मन जान पाता है' इत्यादि श्रुति के प्रमाण पर यह ब्रह्म तो मन का भी विषय नही है? इसका उत्तर यह है कि शास्त्र और आचार्य के उपदेश से असंस्कृत चित्त विषय में ही ऐसा कहा जा सकता है, क्योकि ' यह ब्रह्म सूक्ष्म बुद्धि से गृहीत होता है' इस आशय की श्रुतियों यह बताती है कि शास्त्रके और आचार्य के उपदेश से परिष्कृत हुई बुद्धि से अर्थात् मन से इस ब्रह्म का वर्णन किया जा सकता है । इस परयदि कोई कहे कि इससे