वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 461–470
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 461–470
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वेदार्थपारिजातः १३६१ इति शास्त्राचार्योपदेशसस्कृतबुद्धयपरपर्यायमनोविषयत्वोक्ते । न चैवं सति परमेश्वरस्य स्वप्रकाशत्वोक्तिविरोध इति वाच्यम्, आवरणनिवर्तकतया ब्रह्मणो वृत्तिविषयत्वेऽपि फलव्याप्यत्वाभावेन स्वप्रकाशत्वानपायात् । नह्येवमिन्द्रियविषयत्व शक्य- समर्थनम्, तत एवानुकार इवेत्युक्तं सूत्रकृता । तदुक्तं विष्णुपुराणे -' शब्दादिष्वनुषक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् । कुर्याच्चित्तानु- कारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥ ४३ ॥ वश्यता परमा तेन जायते निश्चलात्मनाम् । इन्द्रियाणामवश्यैस्तैर्न योगी योगसाधकः
॥ ४४ ॥ ' ( ६।७ ) ।
'तत परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्' ( यो० सू० २/५५ ) | पूर्वोक्तार्थानुवादकमेवेद सूत्रम् । तत. प्रत्याहारात् परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् । शब्दादिष्वव्यसनमिन्द्रियजय इति केचित् । शब्दादिसम्प्रयोगः स्वेच्छयेत्यन्ये । रागाद्यभावे सुखदुःखशून्य- शब्दादिज्ञानमिन्द्रियजय इति केचित् । सिद्धान्ते परमा त्वियं वश्यता यच्चित्तनिरोधे निरुद्धानीन्द्रियाणि । न यथैकेन्द्रियजये इन्द्रियान्तरजयाय प्रयत्नान्तरापेक्षा, न तथा चित्तनिरोधे बाह्येन्द्रियनिरोधाय प्रयत्नान्तरापेक्षेति । 'ततस्तदनन्तरं स्वस्व-विषयासम्प्रयोगे, अर्थात् स्वस्वविषयान्निवृत्तो' इत्यादिव्याख्यान त्वपव्याख्यानमेव, तत इति पूर्वपरामर्शसर्वनाम्ना प्रत्याहारस्यैव ग्रहणयोग्यत्वात् । ' देशबन्धश्चित्तस्य धारणा' ( यो० सू० ३| १ ) नाभिचक्रादावभ्यन्तरे, बाह्ये सूर्यचन्द्रादी प्रतिमादौ वा । 'एषा वे धारणा ज्ञेया यच्चित्तं तत्र धार्यते ॥७७॥ तच्च मूर्त हरे रूप यद्विचिन्त्य नराधिप । तच्छ्रयतामनाधारा धारणा नोपपद्यते
|| ७८|| प्रसन्नवदन चारु पद्मपत्रनिभेक्षणम् । सुकपोल सुविस्तीर्णललाटफलकोज्ज्वलम् ॥७९॥ ' ( विष्णुपुराणे, ६।७ ) ।
तो परमेश्वर की स्वप्रकाशता का विरोध होगा, तो इसका उत्तर है कि आवरण के निवर्तक के रूप मे ब्रह्म यद्यपि चित्त की वृत्ति का विषय हो सकता है, तो भी फलभूत ब्रह्म के साक्षात्कार मे वृत्ति का व्यापार न रहने से उसकी स्वप्रकाशता मे कोई बाधा नही पडती । इस तरह से ब्रह्म को इन्द्रियो का विषय मानने का समर्थन किसी भी तरह से नही किया जा सकता । इसीलिये सूत्रकार ने यहां इस शब्द का प्रयोग किया है । यही बात विष्णुपुराण में भी कही गई है -'प्रत्याहार के अभ्यास में लगा योगी शब्द आदि बाह्य विषयो मे लगी इन्द्रियो को निगृहीत कर उनको चित्त की अनुवर्तिनी बना देता है । मानो वे चित्त के रूप में ही परिणत हो गई हो । ऐसा करने से उन इन्द्रियो की निश्चलता के कारण योगी का मन उसके वश में हो जाता है । यदि इन्द्रियाँ वश में न हो तो योगी कभी भी योग की साधना नही कर सकता ।' 'तत परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्' इस सूत्र मे भी वही बात बताई गई है । अर्थात् इस तरह से प्रत्याहार का अभ्यास करने से योगी की इन्द्रियाँ पूरी तरह से उसके वश में हो जाती हैं । कुछ आचार्य शब्द प्रभृति विषयो का व्यसन न होना ही इन्द्रिय जय मानते है | अन्य आचार्यों का कहना है कि स्वेच्छा से इन विषयों का सम्पर्क छोड देना ही इन्द्रिय जय कहलाता है । राग आदि के अभाव मे सुख और दुख की अनुभूति से रहित शब्द आदि विषयो में इन्द्रियो की स्वाभाविक प्रवृत्ति भी कुछ आचार्यो के मत से इन्द्रिय जय ही मानी जाती है । सिद्धान्त मे इन्द्रियो का परम वशीकार यही है कि चित्त के निरोध के साथ ही इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती है । जैसे एक इन्द्रिय को जीत लेने पर अन्य इन्द्रियो का जय अपने आप हो जाता है }, उसके लिये अलग से प्रयत्न नही करना पडता, उसी तरह से चित्त का निरोध हो जाने पर बाह्य इन्द्रियो के निरोध के लिये अलग से प्रयत्न करने की आवश्यकता नही रह जाती । 'इसके बाद अपने - अपने विषयो से सम्पर्क न होने से, अर्थात् अपने-अपने विषयो से निवृत्त हो जाने पर यह व्याख्या गलत है, क्योकि 'तत ' यह सर्वनाम शब्द है, यह प्रकृत पूर्व विषय का परामर्श करता है, अतः प्रत्याहार का ही इससे ग्रहण किया जा सकता है । ' देशबन्धश्चित्तस्य धारणा' इस सूत्र का अर्थ यह है कि नाभिचक्र आदि आभ्यन्तर देश मे अथवा बाह्य सूर्य, चन्द्रमा, प्रतिमा आदि में चित्त को बाँधना धारणा कही जाती है । जैसा कि विष्णुपुराण मे कहा गया है- ' इसको धारणा इसलिये कहते है कि इसमे भगवान् के स्वरूप मे चित्त को लगाया जाता है । इस धारणा मे भगवान् विष्णु के मूर्त स्वरूप का चिन्तन करना चाहिये । यह इसलिये किया जाता है, क्योंकि बिना आधार के कोई धारणा नही की जा सकती । भगवान् का यह मूर्त स्वरूप बहुत ही मनोहर है, उनकी आँखें कमलपत्र के सदृश हैं, उनका मुँह सदा प्रसन्नता से भरा रहता है, उनके गात्र बहुत ही कोमल है, उनका शरीर बड़ा विशाल है । ' १७१
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१३६२ वेदार्थ परिजातः ' तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्' ( यो० सू० ३।२ ) | ध्येयविषये विजातीयप्रत्ययानन्तरितसजातीयप्रत्ययप्रवाहो ध्यानम् | 'तदेवार्थमात्रनिर्भास स्वरूपशून्यमिव समाधि ' ( यो० सू० ३।३ ) | ध्यानमेव ध्येयाकारनिर्भासं प्रत्ययात्मकेन स्वरूपेण यदा शून्यमिव भवति, तदा ध्येयस्वभावावेशात् समाधिर्भवति ॥ तदप्युक्तम्— ' तस्यैव कल्पनाहीनस्वरूपग्रहण हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधि. सोऽभिधीयते ॥ ' ( वि० पुरा० ६।७ ९ ) इति । यदुक्तम्—'समाधौ तु परमेश्वरस्वरूपे तदानन्दे च मग्नः स्वरूपशून्य इव भवति' इति, तदसङ्गतमेव, पौर्वा- पर्याननुसन्धानात् । परमात्मनि तदानन्दे चोभयत्र निमग्नता न सम्भवति, उभयालम्बनतायामैकाग्र्यासम्भवेन निमग्नत्वा- सम्भवात् । कश्च निमग्नो भवति? योगी तच्चित्तं वा? नाद्य, तदेवेति सूत्राक्षरविरोधात् । नापि चित्तम् तस्मादेव कारणात्, निमग्नः स्वरूपशून्य इति पुल्लिङ्ग प्रयोगविरोधाच्च । वस्तुतस्तु तदेवेत्यस्य ध्यानमेवेति व्यासभाष्योक्तमेव व्याख्यान युक्तम्, तदनुगुणमेव स्वरूपशून्यमिवेति नपुसकलिङ्गनिर्देशोऽपि सङ्गतः । न केवल परमेश्वरे तदानन्द एव वा धारणा- ध्यानसमाधयो भवन्ति, अन्येष्वपि बाह्याभ्यन्तरेषु निर्दिष्टध्येयेषु तत्सम्भवात् । अत एव भाष्यनाम्ना स्वव्याख्यानोल्लेखो भ्रामक एव । 'त्रयमेकत्र सयम: ' ( यो० सू ० ३।४ ) । त्रयाणामेकस्मिन् विषये सिद्धौ संयमसज्ञा भवति । यदुक्तम्- ' सबमश्चो- पासनाया नवमाङ्गम्' इति, यच्च हिन्दीभाषाया परमेश्वरे मग्नतैव सयम इति, तदुभयमसङ्गतम्, स्ववचनविरोधात् । यदा परमेश्वरे निमग्नतैव संयमः सैव च समाधिरपि तदा कथ सयमस्य नवमाङ्गता? यदुक्तम् —' धारणायुक्त ध्यानं ध्यानयुक्तः समाधिः' इति, तदप्यसङ्गतम्, समेषामेषा भिन्नकालावस्थायित्वेन सयोगासम्भवात् । योगशास्त्रेऽपि सयमस्य न 'तत्र प्रत्ययैकतानता व्यानम्' ध्येय स्वरूप में विजातीय ज्ञानप्रवाह से बिना रुकावट पडे सजातीय ज्ञान प्रवाह की निरन्तर प्रवृत्ति को ध्यान कहा जाता है । इसी स्थिति में अर्थात् ध्यान की स्थिति में ही ध्येय आकार का जब प्रतिभास मात्र बचा रह जाय और उसका स्वरूप शून्य के समान हो जाय, तब ध्येय स्वभाव मे चित्त की वृत्ति का समावेश हो जाने से समाधि दशा की प्राप्ति हो जाती है । इस स्थिति का वर्णन भी विष्णुपुराण मे ही किया गया है- 'उसी भगवान् के किसी प्रकार की कल्पना से रहित शुद्ध स्वरूप का जब ग्रहण होता है, जो कि ध्यान से परिष्कृत चित्त से ही सम्भव हो सकता है, तो उस अवस्था को समाधि कहा जाता है ।' यहाँ दयानन्द ने कहा है- 'समाधि मे केवल परमेश्वर के और उसके आनन्दस्वरूप के ज्ञान में आत्मा मग्न हो जाता है' ( पृ० २०५ ), किन्तु यह कथन भी असंगत है, क्योकि इसमें पूर्वापर ग्रन्थ का ठीक से अनुसन्धान नही किया गया । परमात्मा मे और उसके ज्ञान में दोनों जगह चित्त की एकाग्रता नही बन सकती, क्योकि चित्त यदि इन दोनो अवस्थाओं को अपना आलम्बन बनाता तब चित्त एकाग्र कैसे हो सकता है और वह एक जगह स्थिर कैसे रह सकता है । पुनः प्रश्न उठता है कि स्थिर योगी होता है कि उसका चित्त? योगी की स्थिरता का वर्णन होगा तो सूत्र में 'तदेव' पद का प्रयोग गलत होगा । 'तदेव' पद से चित्त का ग्रहण भी इस- लिये नही होगा, क्योकि इसी कारण से निमग्न होकर स्वरूप शून्य हो जाता है, यहाँ पुलिंग का प्रयोग है, जो कि चित्त के लिये सही नही माना जा सकता । वास्तव मे 'तदेव' पद का अर्थ 'ध्यान' हो लिया जायगा, जैसा कि व्यासभाष्य मे किया गया है । इसी के अनुरूप 'स्वरूपशून्यमिव ' इस तरह से नपुंसक लिंग का निर्देश भी सगत हो जाता है । केवल परमेश्वर अथवा उसके आनन्द में ही धारणा, ध्यान और समाधि नहीं होती, अन्य बाह्य और आभ्यन्तर निर्दिष्ट ध्येय वस्तुओं में भी धारणा आदि की स्थिति हो सकती है । इसीलिये भाष्य के नाम पर अपनी व्याख्या का उल्लेख करना भी भ्रामक है । ' त्रयमेकत्र संयम ' इस सूत्र का अर्थ यह है कि धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनो की एक ही विषय में सिद्धि हो जाने पर उसकी संयम संज्ञा होती है । यहाँ दयानन्द ने संस्कृत व्याख्या में संयम को उपासना का नवाँ अंग माना है और हिन्दी भाषा की व्याख्या में 'परमेश्वर में मग्न हो जाने को संयम' ( पृ० २०५ ) बताया गया है । ये दोनों ही बातें असंगत है । इसमें अपनी हो उनकी बात का विरोध पडता है । जब परमेश्वर में निमग्न हो जाना ही संयम है और इसी को समाधि भी कहते हैं, तब इसको अलग से नव अंग कैसे माना जा सकता है? 'धारणा से युक्त ध्यान और ध्यान से संयुक्त समाधि होती है' ( पृ ० २०५ ) यह भी असंगत
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वेदार्थपारिजातः १३ नवमाङ्गताभ्युपगमः, किन्त्येकस्मिन् विषये प्रवर्तमानस्य धारणा ध्यान- समाधित्रयस्यैव सयम इति सज्ञामात्रमुक्तम्, नवमाङ्गत्वम्, अष्टाङ्गेभ्योऽ तिरिक्तत्वात् । उपासनाविषये यान्युपनिषदा प्रमाणान्युक्तानि, तानि सर्वाण्यपि न तदभिप्रायानुगुणानि । एतेषामभिप्राय. संस्कृतभाषायामनुक्त्वा हिन्दीभाषायामुक्त । कुत एतदिति तु नोक्तम् । 'नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहित नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ ' ( कठोप० २१२४ ) । यो दुखरितात् सच्छास्त्रप्रतिषिद्धात् पापकर्मणोऽविरतोऽ परतः, यश्वाशान्त इन्द्रियलौल्यादनुपरतः, यश्चासमाहितो विक्षिप्तमना, समाहितोऽप्यशान्तमानसः समाधानफला थिस्टे व्यापृतचित्तो यः स प्रज्ञानेन शास्त्रजनितज्ञानमात्रेणेन परमात्मान नाप्नुयात् न प्राप्नोतीत्यर्थः । अर्थाद् दुश्चरिताद्विरत इन्द्रि : ' लौल्यादुपरत समाहितचित्तः समाधानफलेऽपि निरपेक्ष स एवैनमात्मान जानातीत्यर्थः । यदुक्तम्- अयमुपासनायो दुष्टमनुष्याणा न सिद्ध्यति । यो वा दुष्टकार्येभ्यो निवृत्तो भूत्वा शान्तमना मनः शान्तमात्मान च पुरुषार्थिन न करोति त बाह्याभ्यन्तरान् व्यवहारान् न शोधयति तावत्कियद्भिरपि पठनै श्रवणैश्व परमेश्वरप्राप्तिर्न भवितु शक्नोति' इ तत्त्वक्षरार्थाद् बाह्यमेव । आत्मान पुरुषार्थिनं बाह्याभ्यन्तरान् व्यवहारान् न शोधयतीत्यादिबोधकशब्दाना मन्त्रेऽभावात् । तपःश्रद्धे ये ह्य पवसन्त्यरण्ये शान्तो विद्वासो भैक्ष्यचर्या चरन्त । सूर्यद्वारेण ते विरजा प्रयान्ति यत्रामृतः पुरुषोऽव्ययात्मा ॥ ' ( मुण्डको ० १| २| ११ ) | मन्त्रार्थस्त्वयम्- पूर्वमन्त्रे इष्टापूतं वरिष्ठ नान्यच्छ्रेय इति मन्यमानानां नाकप्रा मनुष्यलोकप्राप्ति हीनतरलोकप्राप्ति चोक्त्वा तद्विपरीताना परमात्मप्राप्तिरुच्यते 1। ये तद्विपरीता ज्ञानयुक्ता वानप्रस्थ सन्यासिन, तप श्रद्धे तपः स्वाश्रमविहित कर्म, श्रद्धा हिरण्यगर्भादिविषया विद्या, ते तपःश्रद्धे अरण्ये निर्जने वने नदीपु नादौ वर्तमाना उपवसन्ति सेवन्ते शान्ता उपरतान्तर्बाह्यकरणा. सर्वपरिग्रहत्यागाद् भैक्ष्यचर्या चरन्तः अरण्य उपविशनि उक्ति है, क्योकि इन सबकी स्थिति भिन्न-भिन्न कालो मे होती है, अत इनकी स्थिति एक साथ कभी नही रह सकती । योगशास्त्र भी कही भी संयम को नवाँ अग नही माना गया है, किन्तु एक ही आलम्बन मे प्रवर्तमान धारणा, ध्यान और समाधि - इन तीनो १ नाम सयम रखा गया है । इसको नवाँ अग नही माना गया है । क्योकि यह आठ अगो से अतिरिक्त नही है । उपासना के विषय में जो उपनिषदो के प्रमाण दिये गये है । वे भी सब उनके अभिप्राय का समर्थन नही करते । इन अभिप्राय संस्कृत मे न बताकर हिन्दी भाषा मे स्पष्ट किया गया है । ऐसा क्यों किया? इसका वहाँ कोई स्पष्टीकरण नही किया ग है । इनमे पहला मन्त्र है 'नाविरत ' इत्यादि । इसका अर्थ यह है- जो व्यक्ति दुश्चरित से अर्थात् सच्छास्त्र मे निषिद्ध पाप कर्म विरत नही होगा, जो अशान्त है, अर्थात् इन्द्रियो की लोलुपता में लिप्त है, जो असमाहित अर्थात् बिक्षिप्त मन वाला है और जो समाहि होने पर भी अशान्त चित्त है, अर्थात् समाधि की अवस्था की प्राप्ति के लिये व्याकुल है, वह प्रज्ञान से अर्थात् शास्त्राभ्यास से उत्पन्न ज्ञ मात्र से परमात्मा को नही प्राप्त कर सकता । अर्थात् दुष्कर्म से विरत, इन्द्रियो की चचलता से दूर, समाधि मन वाला और समाधि द्वारा किसी फल की प्राप्ति से भी जो विरत है, वही व्यक्ति इस परमात्मा को जान सकता है । दयानन्द ने यहाँ कहा है-'यह उपास योगदुष्ट मनुष्य को सिद्ध नही होता, क्योकि जब तक मनुष्य दुष्ट कामो से अलग होकर अपने मन को शान्त और आत्मा को पुरुषा नही करता तथा भीतर के व्यवहारो को शुद्ध नही करता, तब तक कितना ही पढे या सुने, उसको परमेश्वर की प्राप्ति कभी नही । सकती' ( पृ० २०६ ), यह कथन इस मन्त्र के अक्षरो से सर्वथा विपरीत है, क्योकि इस मन्त्र मे पुरुषार्थी आत्मा को बाह्य अं आभ्यन्तर व्यवहारो से शुद्ध नही करता, इस अर्थ के बोधक पदो का सर्वथा अभाव है । 'तपःश्रद्धे० ' इत्यादि यहाँ उद्धृत दूसरे मन्त्र का अर्थ यह है- मुण्डक श्रुति के इस मन्त्र से पहले के मन्त्र में इष्ट अं पूर्त कर्मों से बढ कर अन्य कुछ कल्याणकारक कर्म नही है, ऐसा मानने वालो के लिये स्वर्गलोक, मनुष्यलोक और अन्य हीनतर लो की प्राप्ति को बात कह कर इसके विपरीत इस मन्त्र मे इस तरह के कर्मों में लिप्त न होने वालों के लिये परमात्मा की प्राप्ति की बा कही गई है । जो मनुष्य इष्ट और पूर्व कर्मों मे अनुरक्त पुरुषों से विपरीत ज्ञान की प्राप्ति में अनुरक्त है और इसकी प्राप्ति के लि वानप्रस्थ अथवा संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होकर आश्रम विहित तप का आचरण करते हैं और श्रद्धापूर्वक हिरण्यगर्भ प्रभृति से संब {
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१३६४ वेदार्थपारिजातः ते विरजा विरजसः क्षीणपापाः सूर्यद्वारेण सूर्योपलक्षितेनोत्तरायणेन यथा प्रयान्ति ब्रह्मलोकम्, यत्र यस्मिन् ब्रह्मलोके अमृतः स पुरुषो हिरण्यगर्भः प्रथमजः अव्ययात्मा अव्ययस्वभाव यावत्संसारस्थायी तिष्ठति । यत्तूपवसन्तीत्यस्य परमेश्वरसमीपे वसन्तीति तन्न, ' तप.श्रद्धे' इति प्रत्यक्षकर्मणः क्रियासाकाङ्क्षत्वेन तदतिक्रम्य कर्मान्तरकल्पनायोगात् । नहि वसत्याश्रयत्वेन परमात्मन एव ग्रहण युक्तम् उपसर्गवशाद् धातोरर्थान्तराया विहाराहारपरिहारादौ दर्शनात् । अरण्यपदेनापि शक्यमर्थं वनमपहाय नान्यद् गौणार्थग्रहणं युक्तम्, अन्वयानुपपत्त्याद्यभावात् । सर्वोऽपि हृदयेऽनिच्छ्यापि वसत्येव । सूर्यद्वारेणेत्यत्रापि प्राणग्रहण न युक्तम्, असूर्यद्वारेण गमनेऽपि प्राणद्वारैव गमनं भवतीति तत्र वैशेष्यानुपपत्तेः । अमृतपदेन परमात्मग्रहणमपि न युक्तम्, अमृतब्रह्मप्राप्तेर्ब्रह्मात्मापरोक्षसाक्षात्कारसाध्यत्वेनोपासनफलत्वानुपपत्तेः, गत्यनपेक्षत्वाच्च । 'न तस्य प्राणा --- उत्क्रामन्ति ' (बृ० आ ० ४| ४ | ६ ) इति श्रुत्या ब्रह्मविदो गतिमन्तरैव सर्वात्मभावश्रवणात् । अत एवोक्तं शङ्करभगवत्पादैः –' ननु एतं मोक्षमिच्छन्ति केचित् तन्न, 'इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामास्ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा ', 'युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति', इत्यादिश्रुतिभ्याम् । अप्रकरणाच्च अपरविद्यायाः प्रकरणे हि प्रकृते नह्यकस्मान्मोक्षप्रसङ्गोऽस्ति । विरजस्त्व त्वापेक्षिकम् | समस्तमपरविद्याकार्यं साध्यसाधनलक्षणं क्रियाकारकफलभेदक द्वैतम् । एतावदेव हिरण्यगर्भप्राप्त्यवसानम् । अत एव -'परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रिय ब्रह्म- निष्ठम् ॥ ' ( मुण्डको ० १ २| १२ ) इत्यग्रिममन्त्रेण ब्रह्मविद्याप्रसङ्गस्य वर्णयिष्यमाणत्वात्' इति । विद्या का अभ्यास करते है और निर्जन वन, नदी तट आदि एकान्त स्थानों में निवास करते है, सब तरह के परिग्रह का त्याग कर अपनी बाह्य और आन्तर इन्द्रियो को शान्त कर लेते है और भिक्षा माँग कर अपना जीवन निर्वाह करते हैं, वे क्षीणपाप व्यक्ति उत्तरायण मार्ग से उस ब्रह्मलोक मे पहुँच जाते है, जिसमे कि वह अमृतमय पुरुष हिरण्यगर्भ, जो कि सब प्राणियों से पहले उत्पन्न हुआ और जब तक यह संसार रहेगा, तब तक जिसका कुछ बिगडने वाला नही है, निवास करता है । दयानन्द ने 'उपवसन्ति' पद का अर्थ परमेश्वर के पास रहते है, ऐसा किया है । यह गलत है, क्योकि 'तप और श्रद्धा ' मन्त्र मे प्रत्यक्ष ही कर्म केरूप में निरूपित किये गये है । इनको क्रिया की अपेक्षा हे । अत उक्त क्रिया से इन्ही का सम्बन्ध न कर परमात्मा का कर्म के रूप मे अध्याहार गलत है । वस् के कर्म के रूप मे परमात्मा का हो ग्रहण किया जाय, यह ठीक नही है, क्योकि धातुजाता है, इस बात को विहार, आहार, परिहार आदि में स्पष्ट देखा जा सकता है । अरण्यउपसर्गपदके केकारणभी शक्यधातु के( प्रसिद्धअर्थों में) अर्थपरिवर्तनवन कोहो छोड़कर दूसरा गौण अर्थ करना उचित नही है, क्योकि गौण अर्थ तो वही ग्रहण किया जाता है, जहाँ कि अन्वय की उपपत्ति न होती हो । सभी प्राणी अनिच्छा से ही हृदय में निवास करते ही है । ' सूर्यद्वारेण' यहाँ भी प्राण अर्थ करना गलत है, क्योकि सूर्यमार्ग से न जाने पर भी प्राण के द्वारा तो गमन सभी अवस्थाओ मे होता है, अत इसमें किसी विशेषता की बात नही हो सकती है । अमृत पद से परमात्मा का ग्रहण करना भी ठीक नही है, क्योकि अमृत ब्रह्म को प्राप्ति ब्रह्मात्मतत्त्व के अपरोक्ष साक्षात्कार से ही हो सकती है, अतः उसको उपासना के फल के रूप में नही प्रदर्शित किया जा सकता और फिर ब्रह्मात्मतत्त्व की प्राप्ति के लिये कही जाना भी नही पडता, क्योंकि 'उस ब्रह्मवेत्ता के प्राण कही जाते नही' इस बृहदारण्यक श्रुति के अनुसार बिना कही गये ही ब्रह्मवेत्ता के सर्वात्मभाव की बात स्वीकार की गई है । इसीलिये भगवान् शंकराचार्य ने कहा है- 'कुछ लोग इसी स्थिति को मोक्ष के नाम से जानते हैं, यह ठीक, ' ', 'है क्योंकि उनकी सब कामनाएँ यहीउस सर्वस्वरूप में ही प्रविष्ट हो जाते हैं लीन' इनहोदोजातीश्रुतियोहै के प्रमाणवे घीरसे योगीयुक्तात्मागण कोउसकहीसर्वत्रजानाविद्यमाननही हैब्रह्मात्मतत्त्व। इसका का साक्षात्कार नहीकर यहाँ कोई प्रसंग भी नहीं है । अपर विद्या के प्रसंग में अकस्मात् मोक्ष का वर्णन होने लगे, यह सभव भी नही है । विरजावस्था तो आपेक्षिक मानी जाती है । अपर विद्या का सारा कार्य साध्य और साधन के रूप में तथा क्रिया, कारक और फल के भेद के रूप मेंआता है । इसीलिये इसकी समाप्ति हिरण्यगर्भ की प्राप्ति तक हो जाती है । श्रुतियो में बताया द्वैत प्रपञ्च के अन्तर्गत ही से प्राप्त होने वाले लोकों की परीक्षा करके ब्रह्मवेत्ता को निर्वेद ( वैराग्य ) हो गया कि यह अकृत मोक्षगयाकर्मोंहै कि ' कर्म की सहायता से प्राप्त नहीं हो सकता' । 'एक ब्रह्म की अवगति के लिये वह उस गुरु के पास ही जाय, जो कि स्वयं ब्रह्मवेत्ता है ' इन मन्त्रो को देखने 'हो जाता है कि ब्रह्मविद्या का प्रसग अभी आगे आवेगा । से भी यह स्पष्ट
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वेदार्थपारिजातः १३६५ ' अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहर पुण्डरीक वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्म, तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १॥ त चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहर पुण्डरीकं देश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश कि
तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्य यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ २ ॥ स ब्रूयाद्यावान् वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश
उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिने । उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्यहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितमिति ॥ ३ ॥ त चेद् ब्रूयुरस्मिश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च
कामा यदेतज्जरामाप्नोति प्रध्वसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥ स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यते ।
एतत्सत्य ब्रह्मपुरमस्मिन् कामा: समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपास सत्यकामः सत्यसङ्कल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनम् । यं यमन्तमभिकामा भवन्ति । य जनपद य क्षेत्रभाग त तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥ ( छा० ८1१ ) | । मन्त्रार्थस्तु - अथानन्तर यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे ब्रह्मणः परमात्मन. पुरं राज्ञोऽने-कामात्यादिप्रकृतीना यथा पुर तथैवानेकेन्द्रियमनोबुद्धिभि. स्वाम्पर्थकारिभिर्युक्तत्वाद् इदमपि पुरम् । पुरे च यथा राज्ञो वेश्म
तदा तस्मिन् ब्रह्मपुरे शरीरे दहर वेश्म ब्रह्मण उपलब्धिस्थानम् । तस्मादस्मिन् हृदयपुण्डरीके वेश्मनि उपसहृतकरणैर्बाह्य-विषयविरक्तविशेषतो ब्रह्मचर्यसत्यसाधनाभ्या युक्तैर्वक्ष्यमाणगुणविशिष्ट ब्रह्म ध्यायमानैस्तदुपलभ्यने । अस्मिन् हृदयपुण्डरीके वेश्मनि दहरोऽल्पतरोऽन्तराकाशः, वेश्मनोऽल्पत्वात् तदन्तर्वर्तिनोऽल्पतरत्व युक्तमेव । अयमन्तराकाशो ब्रह्मैव, आकाश इवाशरीरत्वात् तद्वदेव सूक्ष्मत्वात् सर्वगतत्वाच्च । तस्मिन्नाकाशे यदन्तर्मध्ये तदाश्रयेण सहान्वेष्टव्यम् । तद्वाव तदेव विशेषेण गुर्वाश्रयणाद्युपायैरन्विष्य च साक्षात्कर्तव्यम् । यद्वा बुद्धयभिव्यक्ते आकाशाख्ये ब्रह्मणि यच्च स्वाभाविक निरुपाधिकं स्वरूप यच्चौपाधिक द्यावापृथिव्यादिकं तदन्वेष्टव्यम् । तमेवमुक्तवन्तमाचार्यं चेद् ब्रूयु शिष्या यदस्मिन् ब्रह्मपुरे परिच्छिन्नेऽन्तर्दहरं पुण्डरीक ( पुण्डरीक वेश्म ) -ततोऽप्यल्पतर एवाकाशस्तत्र कि भवेत् न किञ्चन विद्यत इत्यर्थ । यदि किमपि वदरतुल्यं स्यादपि, तथापि तदन्वेषणेन विजिज्ञासनेन वा कि फलम्? इसके आगे स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रन्थ मे छान्दोग्य उपनिषद् के ' अथ यदिद० ' इत्यादि पाँच मन्त्र उद्धृत किये है | उनका अर्थ यह है -- इसके बाद इस ब्रह्मपुर में अर्थात् शरीर मे उस ब्रह्म का अन्वेषण करना चाहिये । इस शरीर को ब्रह्मपुर इसलिये कहा जाता है कि यह ब्रह्म अर्थात् परमात्मा का पुर है । जिस तरह से किसी राजा के नगर मे उसके मन्त्री, प्रजा आदि अनेक व्यक्ति निवास करते है, उसी तरह से इस शरीर नगर मे भी इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि का निवास है और ये उसी तरह से आत्मा की सेवा मे लगे रहते है, जैसे कि किसी राजा के सेवक उसकी सेवा में निरत रहते है । इस नगर मे जैसे राजा का प्रासाद भी रहता है, उसी तरह से इस ब्रह्मपुर मे भी दहर नामक स्थान उस ब्रह्म के रहने का प्रासाद है । इसलिये इस हृदय- पुण्डरीक रूप प्रासाद मे अपनी इन्द्रियो को समेट कर और बाह्य विषयों से विरक्त होकर, विशेषतया ब्रह्मचर्य और सत्य की साधना में लग कर आगे कहे गये विभिन्न गुणो वाले ब्रह्म का ध्यान करने वाले योगी को उसकी उपलब्धि हो जाती है । इस हृदय- पुण्डरीक प्रासाद मे एक छोटा सा स्थान है । नगर की अपेक्षा प्रासाद थोडी ही जगह घेरता है, अतः उसके भीतर का स्थान और भी स्वल्प हो, यह ठीक ही है । यह आन्तर आकाश ब्रह्म ही है, क्योकि आकाश के कोई शरीर नहीं होता और आकाश की ही तरह यह सूक्ष्म और सर्वत्र व्याप्त है । उस आकाश के बीच मे हो, उसके सहारे से ही इस ब्रह्म को खोजना चाहिये और उसी को गुरु प्रभृति की सहायता से ठीक से समझ कर तथा उनके बताये उपायो का सहारा लेकर उसका साक्षात्कार करना चाहिये । अथवा बुद्धि मे अभिव्यक्त आकाशस्त्ररूप ब्रह्म का जो स्वाभाविक निरुपाधिक स्वरूप है और जो औपाधिक स्वरूप है, उन सबका अन्वेषण करना चाहिये । इस तरह से उपदेश करते हुए आचार्य से यदि शिष्यगण पूछे कि इस ब्रह्मपुर मे विद्यमान परिच्छिन्न दहर अर्थात् हृदय-पुण्डरीक में विद्यमान घर में जो बहुत थोड़ा सा आकाश है, उसमे क्या हो सकता है? अर्थात् कुछ भी नहीं हो सकता । यदि कोई छोटी-मोटी वस्तु हो भी, तो उसकी खोज करने से अथवा उसको जान लेने से भी क्या लाभ मिल सकता है?
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१३६६ वेदार्थपारिजातः तत्राचार्या व्यादिति श्रुतिवचनम् | 'यत्पुण्डरीकान्त स्थस्याल्पत्वात् तत्स्थस्यात्पनरत्वमुच्यते ' इति, तन्न, तस्याभिप्रायान्तरत्वात् । तथाहि- तत्राल्पे पुण्डरीकवेश्मनि पुण्डरीकाकाशपरिच्छिन्नं तत्स्थं तदनुविधाय्यन्तःकरण तस्मिन् विशुद्धे संहृतकरणानां योगिता स्वच्छोदके आदर्गे वा यथा प्रतिबिम्बरूप दृश्यते, तथैव स्वच्छं विज्ञान ज्योतिःस्वरूप दह्मोपलभ्यते । स एव दहरोऽन्तराकाशः, दहरत्वस्यान्त करणोपाधिनिमित्तत्वात् । स्वतस्तु यावान् वै प्रसिद्धोऽय भूता- कागस्तावानेषोऽन्तर्हृदये आकाशो यस्मिन्नन्वेष्टव्य • विजिज्ञासितव्यमुक्तम् । तत्रापि यावानित्यादिनाकाशतुल्यपरिमाणत्व न विवक्षितम्, किन्तु दृष्टान्तान्तरासम्भवात्तथोक्ति । 'येनावृतं ख च दिव्य मही च' ( महानारा० १1१ ), 'तस्माद्वा एतस्पा- दात्मन आकाशः सम्भूतः' (तै० उ० २1१), 'एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश' ' (बृ० उ० ३२८/११ ) इत्यादिश्रुतिभ्य । उभे द्यावापृथिवी ब्रह्माकाशे बुद्धयुपाधिविशिट्टे अन्तरेव समाहिते स्थिते । तथोभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ । विद्युन्न- क्षत्राणि यच्चास्यात्मनो देहवतश्चात्मीयत्वेनास्ति विद्यते यच्च नास्ति, नष्ट भविष्यच्चात्र नास्तिपदेनोच्यते, सर्वमत्र समा हितम्, कारण एव सर्वेषा कार्याणामवस्थानसम्भवात् । आकाशपृथिव्याद्यधिष्ठानस्य तत्कारणब्रह्मस्वरूपत्वमेव युक्तम् । पुनश्च तमाचार्यं चेद् ब्रूयुः शिष्या यदिदं ब्रह्मपुरे सवं समाहित सर्वाणि भूतानि सर्वे च कामा समाहिता उक्ता । यदा यस्मिन् काले एतच्छरीरं ब्रह्मपुराख्य जरावलीपलितलक्षणा वयोहानिमाप्नोति शस्त्रादिना वा वृवणं प्रध्वंसते विनश्यति, कि ततोऽन्यदतिशिष्यते घटनाशे घटाश्रितक्षीरदधिस्नेहादिवद् देहनाशे पूर्वपूर्वनाशादुत्तरोत्तरं नश्यत्येव ततस्तत्र कि भविष्यति यदन्वेष्टव्यमिति । तान् प्रत्येवमाचार्यो ब्रूयाद् नास्य देहस्य ब्रह्मपुरस्य जरयेतदाकाशाख्यं ब्रह्म तस्मिन् समाहितं सर्वं जीर्यते । न श्रुति का कहना है कि आचार्य इसका यह उत्तर दे कि हृदय-पुण्डरीक के भीतर का आकाशस्वल्प और स्वल्पतर है, इसका अभिप्राय कुछ दूसरा ही है । वह यह कि इस हृदय-प्ण्डरीकरूप गृह में, उसके भीतर वर्तमान आकाश मे स्थित, उसका सदा अनुवर्तन करने वाले विशुद्ध अन्त करण में अपनी इन्द्रियो को समेट कर रहने वाले योगी को, स्वच्छ जल अथवा दर्पण मे जैसे प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, उसी तरह से अपने विज्ञानात्मक ज्योतिर्मय स्वरूप का ज्ञान होता है, अर्थात् ब्रह्म की उपलब्धि हो जाती है । इसी को दहराकाश या आन्तर आकाश कहते है । इसको दहर इसलिये कहते है कि यह अन्तःकरण की उपाधि का निमित्त है । वास्तव में यह बाहर दिखाई पडने वाला मूलाकाश जितना विस्तृत है, उतना ही विस्तृत यह हृदयाकाश भी है । इसी में इस ब्रह्म का अन्वेषण करना है और उसको जानना है । यहाँ भी आकाश को उदाहरण के रूप मे नही रखा गया है, किन्तु कोई दूसरा दृष्टान्त न मिलने सेऐसा कहा गया है । 'जिससे यह सारा आकाश1, अन्तरिक्ष और पृथिवी आवृत है', 'इसी आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ', 'हे गागि, इसी ब्रह्मरूप आकाश में ' इत्यादि श्रुतियां इसमें प्रमाण है । आकाश और पृथिवी दोनो इस बुद्धि की उपाधि से विशिष्ट ब्रह्माकाश मे विद्यमान है । इसी तरह से अग्नि और बायु, सूर्य और चन्द्रमा, विद्युत् और नक्षत्र तथा और भी जो कुछ इस सशरीर आत्मा से संबद्ध वस्तुएँ है और उससे संबद्ध नही भी है, जो कुछ नष्ट हो गया है अथवा भविष्य में होने वाली है उसको यहाँ 'नास्ति' पद से बताया गया है, यह सब कुछ इसी ब्रह्म में समाहित है, उसीमें विद्यमान है, क्योंकि कारण में ही सभी कार्यों की अवस्थिति मानी जाती है । आकाश, पृथिवी प्रभृति सभी पदार्थों का अधिष्ठान उस सब के कारण ब्रह्म को ही माना गया है । फिर भी यदि उस आचार्य को शिष्य पूछें कि जिस ब्रह्मपुर में सब भूत, सब काम समाहित बताये गये है, उसमे जिस समय वृद्धावस्था के कारण जीर्णता आ जाती है, आयु क्षीण हो जाती है अथवा शस्त्र आदि के आघात से वह शरीर नष्ट हो जाता तब क्या बचा रह जाता है? घर के नष्ट हो जाने पर जैसे उसमें रखा हुआ दूध, दही अथवा घृत आदि पदार्थ भी नष्ट हो जाता हैहै,,,उसी तरह से देह के नष्ट हो जाने पर उसमें विद्यमान दहराकाश आदि स्वयं नष्ट हो जायेंगे । तब क्या बचा रहेगा?अन्वेषण किया जाय जिसका कि उनको आचार्य यह उत्तर दें कि इस ब्रह्मपुर अर्थात् देह के जराजीर्ण होने से यह दहराकाश में विद्यमान ब्रह्म अथवा उसमें समाहित सभी पदार्थ जीर्ण नही हो जाते और न इस देह के नाश से वह नष्ट ही होता है । जब यह मूलाकाश ही शस्त्रादि के
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वेदार्थ पारिजातः १३६७ चास्य वधेन हन्यते । यदा भूताकाशमपि शस्त्रादिघातेन न हन्यते, तरा ततोऽपि सूक्ष्मतरमशब्दस्पर्शं ब्रह्म कथ देहादि- विकारैर्विक्रियेत । एतत्सत्यमवितथ ब्रह्मपुरम् । शरीराख्य ब्रह्मपुर तु ब्रह्मोपलक्षणार्थत्वाद् गौणमेव ब्रह्मपुस्तत्त्वनृतमेव, ' ' ( ) वाचारम्भण विकारो नामधेयम् छा० ६ ११४ इति श्रुतेः । सत्य तु ब्रह्मपुरमेव है तस्यैव सर्वाकाशपृथिव्याद्यास्प दत्वात् । अस्मिन्नेव सर्वे कामा ये बहि. प्रार्थ्यन्ते ते समाहिताः, तम्माद् बाह्यविषयतृष्णा त्यजत, तत्प्राप्त्युपायमनुतिष्ठत, एतद् भवता स्वरूपम् । तल्लक्षणमुच्यते--एष अपहतपाप्मा अपहृतो धर्माधर्मरूप. पाप्मा यस्य स तथोक्त | विजरो जरादि- रहितः, न स्वसम्बन्धिभ्या जरामृत्युभ्या नान्यसम्वन्धिभ्या न वा स्वतस्ताभ्या सम्बद्ध्यते । विशोक इष्टवियोगादिमूलक मानस-तापरहित, विजिघत्सो विगतभोजनेच्छ, अपिपासः पिपासारहित, विजरादिग्रहण सर्वदु.खनिवृत्त्युपलक्षणार्थम् । सत्यकामः सत्या अवितथाः कामा यस्य सः, सत्यसङ्कल्प' सत्या सङ्कल्पा यस्य सः, शुद्धसत्त्वोपाधिनिमित्तत्वात् । न स्वतस्तस्मिन् सत्यकामादय, नेति नेतीत्यादिभिस्तस्य स्वतोऽशेष विशेषातीतत्वात् । अतस्तद्गुरुशास्त्राद्याश्रयेणावश्य विज्ञेयम् । अन्यथा यथेहैव लोके प्रजा अन्वाविशन्ति अनुवर्तन्ते यथानुशासन यथेह प्रजा स्वामिनो यथा यथानुशासनं तथा तथा अन्वाविशन्ति । य यमन्त प्रत्यन्तं जनपदं क्षेत्रभाग चाभिकामा अर्थिन्यो भवन्ति, आत्मबुद्धयनुरूपं त तमेवोपजीवन्ति । एतेन दृष्टान्तेन पुण्यफलोपभोगेऽस्वातन्त्र्यमेब द्योत्यते । तत्रैव षष्ठेन मन्त्रेण पुण्यभोगक्षयं दृष्टान्तेनोक्त्वा परमात्मोपासनेन सर्वकामावाप्तिरुक्ता । 'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोक. क्षीयते । तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामान् तेषा सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति । अथ य इह आत्मानमनुविद्य व्रजन्ति एताश्च सत्यान् कामास्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति, प्रहार से नष्ट नही होता, तो उससे भी अत्यन्त सूक्ष्म यह शब्द स्पर्श प्रभृति से रहित ब्रह्म देहादि मे आये विकार मे कैसे विकृत हो सकता है? यह कभी न विकृत होने वाला ब्रह्मपुर ही वास्तविक है, इसके विपरीत शरीर के नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मपुर तो ब्रह्म का उपलक्षक मात्र होने से गौण ब्रह्मपुर है, अत एव मिथ्या है । 'वाचारम्भण' प्रभृति छान्दोग्य श्रुति नाम को विकार ही बताती है । ब्रह्मपुर ही वस्तुत सत्य है, क्योकि वही आकाश, पृथिवी आदि का आश्रय है । इसी मे सभी कामनाएँ; जिनको कि प्राप्त करने के लिये प्रार्थना की जाती है, समाहित है । इसलिये बाह्य विषयो की तृष्णा को छोड देना चाहिये और उस ब्रह्म की प्राप्ति के लिये ही उपाय करना चाहिये । यही आप लोगो का वास्तविक स्वरूप है । उसका लक्षण यह है । वह ब्रह्म अपहतपाप्मा है, अर्थात् इसका धर्म अथवा अधर्म मे किसी प्रकार का सम्पर्क नही रहता । यह वृद्धावस्था से रहित है । इसका जरा और मृत्यु से न तो अपने से कुछ सम्बन्ध है और न दूसरे के कारण ही और न यह स्वयं ही उनसे कभी सबद्ध होता है । इसमे इष्ट मित्र आदि के वियोग से होने वाला शोक कभी व्याप्त नही होता । इसमे कभी भोजन करने की इच्छा नही होती और न प्यास ही लगती है । विजर प्रभृति शब्दो का ग्रहण यहां इसलिये किया गया है कि इसमे किसी भी प्रकार के दुःख की कभी स्थिति नही रहती । इसकी कामना और संकल्प सदा सही रहते हैं, क्योकि शुद्ध सत्त्व इसकी उपाधि है । वास्तव में स्वतः इसमें कोई कामना, संकल्प आदि की स्थिति नही रहती, किन्तु शुद्ध सत्त्व की उपाधि रूप में स्थिति के कारण ही यह होता है । 'नेति नेति' इत्यादि श्रुति वचनो के आधार पर वस्तुत इस ब्रह्म का स्वरूप समस्त विशेषताओं से परे है । अतः उसको गुरु, शास्त्र आदि की सहायता से हो जाना जा सकता है । अन्यथा उसको भी वही स्थिति हो जाती है, जो कि किसी राजा का अनुवर्तन करने वाली प्रजा की होती है कि वह उसी तरह से रह पाता है, जैसा कि राजा उसको रहने की आज्ञा करता है । इस दृष्टान्त से यह बताया गया है कि जैसे प्रजा का कही भी, किसी भी जनपद में निवास वहां के शासन से अनुशासित रहता है, उसी तरह से यह जीव भी पुण्य फल के उपभोग के लिये पराधीन है । इसी प्रकरण के छठे मन्त्र से पुण्यकर्म के फल का भोग पूरा हो जाने पर क्या स्थिति होती है, इस बात को उदाहरण देकर समझाने के बाद यह बताया गया है कि परमात्मा की निष्काम उपासना से सभी फलो की प्राप्ति हो जाती है । जैसे यहाँ सेवा प्रभृति के कारण प्राप्त स्थिति का क्षय देखा गया है, उसी तरह से दूसरे लोको में भी पुण्य के कारण प्राप्त हुई स्थिति क्षीण हो जाती है । जो व्यक्ति इस लोक में कर्तव्य सेवा प्रभृति से विरक्त होकर शास्त्र के उपदेश के अनुसार आत्मा के लक्षणो को बिना जाने ही देह
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१३६८ वेदार्थपारिजाता ( छा० ८| १|६) । यथेह लोके सेवादिकर्मजितो लोको भोगः क्षीयते, तथैवामुत्र स्वर्गादावपि पुण्यजितो लोको भोगः क्षीयते । ये च ततो विरज्य यथाशास्त्रं यथोक्तलक्षणमात्मानमननुविद्य स्वसंवेद्यतामकृत्वा गच्छन्ति देहात्प्रयन्ति एताश्च सत्यान् कामान् अननुविद्य व्रजन्ति, तेषा सर्वलोकेष्वकामचारोऽस्वातन्त्र्यं भवति । ये चान्ये आत्मान शास्त्राचार्योपदेशमनु- विद्योपास्य यथोक्ताश्च सत्यान् कामान् अनुविद्योपास्य गच्छन्ति तेषा सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति सार्वभौमस्येव । दयानन्देन तु हिन्द्यामय भाव उक्त.-' कण्ठस्याधस्तात् उदरस्योपरिष्टात् स्तनयोर्मध्ये हृदयदेशो ब्रह्मपुरम् । तस्मिन् यो गर्तस्तत्र यत्कमलाकारम् अवकाशरूप स्थान विद्यते, तस्य मध्ये सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाह्येऽभ्यन्तरे चेकरसो भूत्वा पूर्यते । स आनन्दरूपः परमेश्वर स्तस्मिन्नेतस्मिन् प्रकाशिते स्थानेऽन्वेषणेन लभ्यते । अन्यत्तदन्वेषणस्थान मार्गश्च नास्त्येव । यदि कश्चित्पृच्छति हृदयाकाशे किमस्ति यदन्वेष्टव्यम्, तस्येदमुत्तरम्- हृदयदेशे यावानाकाशः स सर्वोऽन्तर्यामिणा परमेश्वरेण पूर्णः, तस्मिन्नेव हृदयाकाशस्य मध्ये सूर्याकाशपृथिवीलोकाग्निवायुसूर्यचन्द्रविद्युन्नक्षत्राणि यानि दृश्यन्ते, यानि च न दृश्यन्ते, सर्वाणि वस्तूनि सन्ति तत्सत्ताया स्थिराणि । यदि कश्चिदाशङ्केत वृद्धावस्थानन्तर हृदयस्य नाशे तत्र किम- वशिष्यते यदन्विष्येत, तत्रोत्तरम्--तत्र ब्रह्मपुरे पूर्णो यः परमेश्वरोऽस्ति तस्य जरामरणादिक न भवति । तस्यैव नाम सत्यं ब्रह्मपुरम्, यत्र सर्वे कामा: पूर्यन्ते । स अपहतपाप्मा शुद्धस्वभावो विनरो विशोकोऽविजिघत्स, यस्य सर्वे कामा. सत्या, यः सत्यसङ्कल्पः, तत्रैवाकाशे प्रलयकाले सर्वाः प्रजाः प्रविशन्ति । तदुपासनयैव सृष्टिकाले पुनः प्रकाशमुपयान्ति । तदुपासन- योपासका यान् कामान् यान् देशान् यान् क्षेत्रभागान् इच्छन्ति, तान् यथावत्प्राप्नुवन्ति' इति । अयं चार्थोऽक्षरार्थाननुगुणोऽसङ्गतश्च । यदिदं ब्रह्मपुरमित्यनेन शरीरस्यैव ब्रह्मपुरत्वोक्ति । यदिदमित्यस्य छोड देते हैं और इन सत्य कामनाओ को बिना जाने ही जिनका शरीरपात हो जाता है, वे दूसरे लोक में जाकर भी स्वतन्त्र नही हो सकते और जो व्यक्ति अपने स्वरूप को शास्त्र और गुरु के उपदेश के अनुसार जान कर और परमात्मा की तदनुसार उपासना कर साथ ही यथोक्त सत्य कामनाओ को भी जान कर उस लोक मे जाता है, तो वहाँ सभी लोगो में उसकी स्वतन्त्र सत्ता रहती है, जैसे कि सार्वभौम नृपति जहाँ भी जायगा, उसकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता रहेगी । दयानन्द ने इन मन्त्रो का अर्थ हिन्दी मे इस तरह से किया है— कण्ठ के नीचे, दोनो स्तनो के बीच मे उदर के ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त है, उसमे कमल के आकार - अवकाशरूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर का वेश्म अर्थात्, मेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है । दूसरा उसके मिलने का रह रहा है वह आनन्दमय पर- कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नही है । कदाचित् कोई पूछे कि उस हृदयाकाश में क्या रखा है, जिसकी खोज की जाय? तो उसका उत्तर यह है कि आकाश है, वह सब अन्तर्यामी परमेश्वर से ही भर रहा है और उसी हृदयाकाश के बीच मे सूर्य आदि प्रकाश हृदय देश मे जितना ,,,,,, अग्नि वायु सूर्य चन्द्र विजुली और सब नक्षत्र लोक भी ठहर रहे हैं । जितने दीखनेवाले और नही दीखनेवाले पदार्थछायाहै पृथिवीवे लोक मे सब भूत और काम स्थिर होतेकी सत्ता के बीच में स्थिर हो रहे है । इसमे भी कोई ऐसी शंका करे कि जिस ब्रह्मपुर हृदयाकाश सब उसी हैं, उस हृदयप्रदेश के वृद्धावस्था के उपरान्त नाश हो जाने पर उसके बीच में क्या बाकी रह जाता है कि जिसको तुम खोजने:,,हो तो उसका उत्तर यह है कि सुनो भाई उस ब्रह्मपुर मे जो परिपूर्ण परमेश्वर है उसको न तो को कहते वह सब पापों से रहित, शुद्धस्वभाव, जराकभी नाश होता है । उसी का नाम सत्य ब्रह्मपुर है कि जिसमें सब काम परिपूर्ण हो जाते है । कभी वृद्धावस्था होती है और नअवस्था से रहित, शोकरहित, खाने-पीने की इच्छा से रहित है । इसकी सब कल्पनाएँ सत्य होती है, इसके उसी आकाश में प्रलय होने के समय सब प्रजा प्रवेश कर जाती है और उसी के रचने से उत्पत्ति के समय फिरसब संकल्प भी सत्य है । पूर्वोक्त उपासना से उपासक लोग जिस जिस कल्पना की, जिस जिस देश की जिस जिस क्षेत्र भाग अर्थात् अवकाशप्रकाशित होती है । इस, ( ),उन सबको वे यथावत् प्राप्त होते हैं पृ० २०६-२०७ । की इच्छा करते है यह अर्थ मन्त्राक्षरो के अनुकूल नही है और सही भी नही है । यहीं जिस ब्रह्मपुर की चर्चा की गई है, वह शरीरही है,
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वेदार्थपारिजातः १३६ ९ प्रसिद्धार्थबोधकत्वात् । जरादिविकाराणामपि तत्रैव प्रसिद्धे । तत्र दहर पुण्डरीक ब्रह्मणो वेश्मेत्युक्तम् । तस्मिन् दहरस्यान्तराकाशस्यान्तर्यदस्ति तस्येवान्वेष्टव्यत्वमुक्तम् | त्वया तु वेश्मपदेनावकाशरूपमेव स्थानमुक्तम् । म्ले तु दहर पुण्डरीकमेवोक्तम् । तत्स्थस्याकाशस्यैवान्वेष्टव्यानामाश्रयत्वमुक्तम् । सर्वशक्तिमान् परमेश्वर • कस्य शब्दस्यार्थ इति नोक्तम् । अत्र त्वाकाशशब्दातिरिक्तं ब्रह्मबोधकं पदान्तर नास्त्येव । यदि तु तदाकाशपदमेव तद्बोधक तदा प्रश्नस्तस्मिन् हृदयाकाशे किमस्ति यदन्वेष्टव्यमिति नोपपद्यते । उत्तरेऽपि हृदयदेशे यावानाकाश. सोऽन्तर्यामिणा पूर्ण इत्युक्तम् । मूले तु यावानयमाकाशस्ता- वान् हृदय आकाश उक्तः । तस्मिन्नाकाश एव द्यावापृथिव्यादीनामवस्थानमुक्तम् । त्वयापि हृदयाकाशे पृथिव्यादीनामवस्थान- मुक्तम् । ब्रह्म च न हृदयाकाशरूपम्, किन्तु तत्र कस्य शब्दस्यायमर्थं इति तु नोक्तम्, हृदयाकाशे द्यावापृथिव्यादयः कथं सन्तीत्यपि नोक्तम्, हृदयाकाशे परिच्छिन्ने द्यावापृथिव्यादयस्तु न सम्भवन्त्येव, विपरीतपरिमाणत्वात् । ब्रह्म च व्यापक चेत्कथ हृदयेऽन्विष्यते? सार्वत्रिक आकाश सर्वत्रैवोपलभ्यते, न क्वचिदेकत्रैव । सर्वोऽपि हृदयाकाश. कथ परमात्मना पूर्यते? यदि सर्वस्तेनैव पूर्णस्तहि तत्रैव पृथिव्यादय. कथं सन्ति? मूले तु न हृदयाकाशे परमात्मन. पृथिव्यादीना च सत्त्व प्रतिपाद्यते, 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्' इत्युक्ते, ' यावान् वा अयमाकाशस्तावाने षोऽन्तर्हृदये आकाशः, उभे अस्मिन् द्यावापृथिवो अन्तरेव समाहिते' ( छा० ८। १ । ३ ) इत्युक्तेश्च । तस्मादत्राय सरलोऽक्षरार्थ. - अस्मिन् ब्रह्मपुरे शरीरे यदिद दहरं पुण्डरीकं वेश्म ब्रह्मोपलब्धिस्थानम्, अस्मिन् ., यदन्तराकाश स एव परमात्मा आकाशवदशरीरत्वसूक्ष्मत्व सर्वगतत्वसामान्यात् । हृदयपुण्डरीकशब्देनापि न केवल पुण्डरीकाकारं मासपिण्डमुच्यते, किन्तु हृदयपुण्डरीकाकाशस्था बुद्धिरुच्यते । तस्यां बुद्धो य आकाश आ समन्तात् काशते क्योकि 'यदिद' ये पद प्रसिद्ध अर्थ के बोधक माने जाते है । जरा (वृद्धावस्था ) प्रभृति विकार भी शरीर में ही होते हैं । इस शरीर मे दहर पुण्डरीक ब्रह्म का घर है । उस दहर आकाश के भीतर जो सूक्ष्म आकाश है, उसी को खोजने की बात यहाँ कही गई है । आपने वेश्म शब्द का अवकाश रूप स्थान अर्थ किया है । मूल मे तो दहर पुण्डरोक की चर्चा है । उस दहर कमल में स्थित आकाश को ही अन्वेष्टव्य ब्रह्म का आश्रय स्थान बताया गया है । आपने सर्वशक्तिमान् परमेश्वर किस पद का अर्थ किया है? यहाँ आकाश शब्द के सिवाय ब्रह्म का बोधक कोई पद नही है । यदि यह आकाश पद ही सर्वशक्तिमान् परमात्मा का बोधक है, तो इस प्रश्न की कोई संगति नही बैठेगी कि हृदयाकाश मे यह क्या है, जिसका कि अन्वेषण करना है? इस प्रश्न के उत्तर मे भी हृदय देश मे जितना आकाश है, वह अन्तर्यामी से पूर्ण है, ऐसा बताया गया है । मूल मे बताया गया है कि जितना यह आकाश है, यह हृदयाकाश भी उतना ही विशाल है । इसी आकाश मे द्यावापृथिवी आदि की स्थिति बताई गई है । आपने भी हृदयाकाश मे पृथिवी प्रभृति की अवस्थिति बताई है । यह ब्रह्म हृदयाकाश रूप न होकर उसमें परिपूर्ण है, यह अर्थ आपने किस शब्द का किया, यह आपने नही बताया | हृदयाकाश मे द्यावापृथिवी आदि की स्थिति कैसे है? यह भी आपने नही बताया । परिच्छिन्न हृदयाकाश में द्यावापृथिवी आदि रह हो नही सकते, क्योकि इनका परिमाण विपरीत है । ब्रह्म यदि व्यापक है, तो उसकी खोज हृदय में कैसे की जा सकती है? आकाश तो सब जगह व्याप्त है, उसकी उपलब्धि सभी स्थानो मे होगी, किसी एक स्थान मे नही । सारा हृदयाकाश परमात्मा से कैसे भर जाता है? और यदि भर जाता है, तो उसमें पृथिवी प्रभृति कैसे भरेंगे । मूल में तो हृदयाकाश मे परमात्मा अथवा पृथिवी प्रभृति की स्थिति नही मानी गई है, क्योंकि वहाँ दहराकाश के भीतर के स्थान में ब्रह्म के अन्वेषण की और उसी मे द्यावापृथिवी की स्थिति की बात बताई गई है | इसलिये इस पूरे प्रकरण का सीधा सा अर्थ यह है - इस शरीर में स्थित दहर पुण्डरीक स्थान में ब्रह्म की उपलब्धि हो सकती है । इस स्थान मे जो आन्तर आकाश है, वही परमात्मा है । यह परमात्मा आकाश के समान अशरीर, सूक्ष्म और सर्वगत है । यहाँ हृदय पुण्डरीक शब्द से केवल पुण्डरीक ( कमल ) के आकार का मासपिण्ड नही बोधित होता, अपितु हृदय-पुण्डरीक के आकाश में स्थित बुद्धि इससे जानी जाती है । उस बुद्धि मे जो चारो तरफ से प्रकाशित होता है, वह नित्य, निरवच्छिन्न, विज्ञानात्मक, प्रकाश-स्वरूप परमेश्वर यहाँ आकाशपद से बोषित होता है । उसी बुद्धि की सहायता से इसका अन्वेषण किया है, जिसमें कि यह ब्रह्म रहता है । १७२
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वेदार्थपारिजातः १३७० इत्याकाशो नित्यनिरवच्छिन्नविज्ञानप्रकाशरूप परमेश्वर । तस्मिन् यदन्तस्तदाश्रयेण सहान्वेष्टव्यम् । यथा सपुच्छस्यै- वानन्दमयस्य विज्ञाने पुरुषार्थसिद्धिर्यथा वा समूलस्यैव समारवृक्षस्य वेदनेन वेदवित्त्व तथैव साश्रयस्यैव द्यावापृथिव्यादे- रन्वेष्टव्यत्वम् । केचित्तु स्वे महिन्याकाशाख्ये ब्रह्मणि यत् तस्य स्वाभाविक निरुपाधिक स्वरूप यच्च मायिक पृथिव्यादिक तदन्वेष्टव्यम् ॥ अन्ये तु तस्मिन्नित्यनेनाव्यवहितमाकाशमगृहीत्वा योग्यत्वाद हृदयपुण्डरीकस्थ बुद्धिसत्त्वमुच्यते । यथा 'पानव्यापच्च तद्वत् ' ( मी० सू० ३।४/ ५ ) इति व्यवहितोपमानसम्बन्ध आश्रितो यथा वा ' तथा प्राणा.' ( व्र ० सू० २| ४| १ ) इत्यत्रातीतानन्तरपादादौ उक्ता वियदादयः परमात्मविकारास्तथा प्राणा अपि विकारा एव प्रत्येतव्याः । अत्र तत्पदेन व्यवहित एवार्थो गृहोतस्तथैतस्मिन्नित्यनेन पुण्डरीक वेश्म गृह्यते । वेश्मपदेन च वेश्मस्था बुद्धिर्गृह्यते, मञ्चा. क्रोशन्तीतिवत् । तथा च तस्मिन् हृदयपुण्डरीकाकाशस्थे बुद्धिसत्त्वे यदन्तराकाशाख्य ब्रह्म तदेवान्वेष्टव्यमित्याहुः | तस्य सार्वत्रिकत्वेऽपि हृदयाकाशस्थबुद्धी विशेषेणाभिव्यक्तिर्भवति, जैवेन रूपेण ब्रह्मणस्तत्र प्रवेशात् । यथा व्यापकस्यापि सौरालोकस्य काचादो सूर्यकान्तादौ विशेषेणाभिव्यक्तिस्तथैव बुद्धिसत्वे निर्मले ब्रह्मण. प्रकाशस्य विशेष- रूपेणाभिव्यक्तिर्भवति । अत एव तस्य वेश्मनो दहरत्वेन तदुपाधिकत्वाद् दहरत्वेऽपि न स्वतो दहरत्वम्, निरुपाधिकस्य तस्य भूताकाशादपि तत्कारणत्वेन महत्तरत्वात् । अत एव तस्य सर्वप्रपञ्चाश्रयत्वेन द्यावापृथिव्याश्रयत्वेन कि तदत्र विद्यत जैसे अपने अवान्तर भेदो के साथ वर्तमान आनन्दमय स्वरूप को जानने से ही पुरुषार्य की सिद्धि मानी जाती है, अथवा जैसे अपने कारणों के साथ ही संसार रूपी वृक्ष को जानने से वेदज्ञता प्रकाशित होती है, उसी तरह से द्यावापृथिवी प्रभृति का भी अन्वेषण उनके आश्रयो के साथ ही किया जा सकता है । कुछ लोग ऐसा कहते है कि अपनी नहिमा में, अर्थात् आकाशस्वरूप ब्रह्म मे जो उसका स्वाभाविक, उपाधि रहित स्वरूप है और जो पृथिवी प्रभृति के रूप में मायिक स्वरूप है, उन सबके अन्वेषण की बात इस ग्रन्थ मे बताई गई है । अन्य विद्वानो का कहना है कि 'तस्मिन्' इस शब्द से अव्यवहित आकाश का ग्रहण न कर योग्यता के आधार पर हृदय-पुण्डरीक में स्थित बुद्धि सत्त्व का ग्रहण करना चाहिये । जैसे ' पानव्यापच्च तद्वत्' इस मीमासा सूत्र में व्यवहित उपमान सम्बन्ध का आश्रय लिया गया है, अथवा जैसे ' तथा प्राणा.' इस वेदान्त सूत्र मे पहले के और बाद के पाद, अध्याय आदि में कहे गये वियत् ( आकाश ) प्रभूति परमात्मा के विकार और प्राण ब्रह्म के ही विकार माने गये है, यहाँ भी 'तम्' पद से व्यवहित अर्थ का ग्रहण किया गया है, उसी तरह से 'तस्मिन्' पद से भी पुण्डरीक स्वरूप घर का ही ग्रहण माना जायगा । वेश्म पद से भी इस वेश्म में स्थित बुद्धि का ग्रहण होगा, जैसे कि 'मञ्चा. क्रोशन्ति' इस वाक्य मे ' मञ्च ' पद से मञ्च पर बैठे व्यक्तियो का बोध होता है । इसलिये इस मन्त्र का अर्थ यह होगा कि हृदय पुण्डरीकस्वरूप आकाण मे स्थित बुद्धि सत्त्व में जो आकाश नामक ब्रह्म है, उसीका अन्वेषण होना चाहिये । यह ब्रह्म यद्यपि सभी जगह वर्तमान है, किन्तु हृदय स्थित आकाश में स्थित बुद्धि में इसकी विशेष रूप से अभिव्यक्ति होती है, क्योंकि जोव के रूप मे ब्रह्म उसमे प्रविष्ट हो जाता है । जैसे कि सभी जगह व्याप्त सूर्य का आलोक काच या सूर्यकान्त प्रभृति में विशेष रूप से अभिव्यक्त होता है, उसी तरह से निर्मल बुद्धि सत्त्व मे ब्रस का प्रकाश विशेष रूप से अभिव्यक्त होता है । इसीलिये वह जहाँ प्रकाशित होता है, उस दहर स्थान में औपाधिक रूप में यह रहता अवश्य है, किन्तु इससे वह स्वयं दहर नही हो जाता, क्योंकि निरुपाधिक रूप में यह भूताकाश से भी महत्तर है, क्योकि वही उसका कारण है । इस तरह से यह ब्रह्म सारे प्रपंच का आश्रय होने से द्यावापृथिवी का भी आश्रय है ही । फलतः इस आक्षेप का कि इसमें क्या रखा है कि उसको खोजा जाय, यह सही उत्तर हो जाता है कि बुद्धि सत्व में स्थित यह ब्रह्म हो सबका कारण है, अतः उसको पहचानना बहुत आवश्यक है । द्वितीय आक्षेप का यह अभिप्राय है कि ब्रह्मपुर के रूप में स्थित इस देह का जरा प्रकृति से नाग हो जाने पर इसमे विद्यमान पुण्डरीक का और उस पुण्डरीक में स्थित बुद्धि आादि का भी नाश हो सकता है । इसीलिये इस आशंका की भी निवृत्ति के लिये यह कहा जाता है कि वृद्धावस्था के कारण यह जीर्ण