वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 471–480
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 471–480
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वेदार्थपारिजातः १३७१ इत्याक्षेपस्योत्तर सङ्गच्छते । द्वितीय आक्षेपे ब्रह्मपुरस्य देहस्य जरया प्रध्वसनेन तन्मध्यस्थपुण्डरीकतदन्त.स्थानामपि नाश आशङ्कितः । नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत इत्यादिभिर्हृदयान्तराकाशाख्यस्य ब्रह्मणो नित्यत्वकूटस्थत्व- निर्विकारत्वादिभि समाधानमुक्तम् । एवमेव 'अन्वाविशन्ति' इत्यस्यापि प्रलये प्रजाप्रवेशार्थकत्व न सम्भवति, प्रलयस्याप्रासङ्गिकत्वत् । तथात्वे वा सृष्टी तत आविर्भवन्तीत्यपि वक्तव्यम्, न तु तदुक्तम् । एवमेव - उपासका य यं देशं क्षेत्रभाग कामयन्ते तं तमाप्नुवन्तीत्य- स्यैव विवक्षितत्वे यथानुशासनमित्यस्य व्यर्थतेव स्यात्तस्मादुत्तरमन्त्रानुसारेण य आत्मान तत्रत्याश्च कामानननुविद्य व्रजन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति, यथानुशासन प्रजावत् प्रवृत्तेः । ये चैतमात्मान सर्वाश्च कामाननुविद्य यथावद्विज्ञाय व्रजन्ति, तेषा सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति सार्वभौमवत् । यच्च स पर्यगाच्छुक्रमिति सगुणोपासनम्, अकायम व्रणमस्नाविरमित्यादिना निर्गुणोपासनमुक्तम्, यच्च 'एको देव. सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । सर्वाध्यक्ष सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ' ( श्वे ० ६। ११ ) ,, इत्यत्र एको देव इति सगुणोपासनम् निर्गुणश्चेति निर्गुणोपासनमुक्तम् सर्वज्ञादिगुणैः सह वर्तमानः सगुण अविद्यादि- - क्लेशपरिमाणद्वित्वादिसख्याशब्दस्पर्शरूपरसगन्धादिगुणेभ्यो निर्गतत्वान्निर्गुण । तद्यथा परमेश्वरः सर्वज्ञः सर्वव्यापी सर्वाध्यक्षः सर्वस्वामीत्यादिगुणै. मह वर्तमानत्वात् परमेश्वरस्य सगुणोपासन कर्तव्यम् ॥ सोऽजोऽव्रणो निराकार, अकायस्तथैव रूपादयो गुणास्तस्मिन्न सन्तीदमेवास्य निर्गुणोपासन ज्ञातव्यम्' इति, तदेतत्सर्वमज्ञानविजृम्भितमेव । जन्म- नही होता और न यह किसी के मारने से मरता ही है । इससे यह ज्ञात हो जाता है कि उक्त आशका का यह समाधान किया जाता है कि हृदयवर्ती आकाश के रूप मे प्रसिद्ध यह ब्रह्म नित्य है, कूटस्थ है, अत एव निर्विकार है । अत इसमे उक्त दोषो की प्रसक्ति किसी भी अवस्था मे नही हो पाती । इसी तरह से 'अन्वाविशन्ति' इस पद का भी प्रलयावस्था मे सारी प्रजा उसमे प्रविष्ट हो जाती है, यह अर्थ नही किया जा सकता, क्योकि प्रलयावस्था का यहाँ कोई प्रसग नहीं है । थोडी देर के लिये ऐसा मान भी लिया जाय तो साथ ही यह भी कहना पडेगा कि सृष्टि दशा मे उसी मे सब प्रादुर्भूत भी होते है । ऐसा तो कहा नही गया है । इसी तरह से उपासक जिस- जिस स्थान की कामना करते है, उसको पा जाते है, यही अर्थ यदि विवक्षित है तो उस अवस्था में ' यथानुशासनम्' इसकी कोई आवश्यकता न रह जायगी । इस लिये आगे के मन्त्र की तरह ही इसका यही अर्थ उचित होगा कि जो व्यक्ति आत्मा को और उसमे स्थित { विभिन्न कल्पनाओ को बिना समझे दूसरे लोक के लिये प्रयाण कर देता है, वह सभी लोको मे अपनी इच्छा के अनुसार नही जा ,, सकता क्योकि प्रजा जैसे राजा के अनुशासन में चलती है उसी तरह से उसको भी शास्त्र के अनुशासन मे चलना पडता है । इसके सिवाय जो व्यक्ति अपने स्वरूप को और उसमे वर्तमान कल्पनाओ को ठीक से समझ कर इस लोक को छोड़ता है, वह अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी लोक में जा सकता है, जैसे कि सार्वभौम राजा अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ करने मे स्वतन्त्र है । स्वामी दयानन्द ने ' स पर्यगा० ' इस मन्त्र मे सगुण उपासना और ' अकायमत्रण ' इत्यादि मे निर्गुण उपासना के प्रतिपादन की बात कही है और इसी तरह से 'एको देव ' इस ग्रन्थ के प्रथम अश में सगुण और अन्तिम अश मे निर्गुण उपासना का प्रतिपादन माना है । ईश्वर के सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, शुद्ध, सनातन, न्यायकारी, दयालु, सबमे व्यापक, सबका आधार, मंगलमय, सबकी उत्पत्ति करने वाला और सबका स्वामी इत्यादि सत्य गुणो के ज्ञानपूर्वक उपासना करने को सगुणोपासना कहते है । वह परमेश्वर कभी जन्म नही लेता, निराकार अर्थात् आकारवाला कभी नही होता, अकाय अर्थात् शरीर कभी नही धारण करता, अन्रण अर्थात् जिसमे छिद्र कभी नही होता, जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धवाला कभी नही होता, जिसमें दो, तीन आदि संख्या की गणना नही बन सकती, जो लम्बा-चौडा और हलका-भारी कभी नहीं होता, इत्यादि गुणो के निवारण पूर्वक उसका स्मरण करना निर्गुण उपासना कही जाती है' ( पृ० २०७ -२०८ ) । यह सारा कथन उनके अज्ञान को ही उजागर करता है, क्योकि जन्म से रहित, रूप रस प्रभति से रहित और सर्वज्ञ आदि गुणो से युक्त परमात्मा की स्थिति तो एक हो तरह की हुई, इसमे दो प्रकार की उपासना कैसे बन सकती है? जैसे स्पर्श प्रभृति से रहित और शब्दगुणसहित आकाश का निर्गुण
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वेदार्थपारिजातः१३७२ रूपरसादिरहितस्य सर्वज्ञादिगुणयुक्तस्यैक्येनोपासनाद्वैविध्यानुपपत्तेः । यथा स्पर्शादिरहितः शब्दसहितश्चाकाशो निर्गुणसगुण-रूपेण न भिद्यते, तद्वत् । यथा वाकाशस्य निर्गुणत्व न वक्तुं शक्यते, तथैव सर्वज्ञादिगुणकस्य कतिपयगुण राहित्येन निर्गुणत्वं नैव वक्तुं शक्यम् । तथात्वे कतिपयगुणराहित्येन सर्वेषामपि सगुणाना निर्गुणत्वप्रसङ्गात् । तस्माद्यथा निर्घट भूतलमित्युक्तो सकलघटप्रतियोगिक एव निषेधो विज्ञायते, तथैव निर्गुणमित्यनेनापि सकलगुणप्रतियोगिकनिषेध एव मन्तव्यः कस्यापि कीदृशस्यापि घटस्य सत्त्वे निघंट भूतलमिति प्रतीत्यदर्शनात् । केचित्तु प्राकृतगुणराहित्येन निर्गुणत्वं दिव्याप्राकृतगुण साहित्येन सगुणत्वमाहुः । निर्विशेषाद्वैतवादिनस्तु सविशेषस्य निर्विशेषस्य च निर्गुणत्वं प्राहुः । यद्वा पारमार्थिक दशायामशेषगुणराहित्येन निर्गुणत्वम्, व्यवहारदशायां दिव्यानन्तगुणगणार्णवत्त्वेन सगुणत्वं ज्ञेयमिति । मुक्तिविचारः यत्तु दयानन्देन - 'परमेश्वरोपासनेनाऽविद्याऽधर्माचरणनिवारणाच्छुद्ध विज्ञानधर्मानुष्ठानोन्नतिभ्यां जीवो मुक्ति माप्नोति' ( पृ० २०९ ) इत्युक्तम्, तदपि चिन्त्यम्, मुक्ते. कार्यत्वेनानित्यत्वापत्तेः । ईश्वरोपासनं कार्यम्, अविद्याऽधर्माचरण-निवारणमपि युक्तम्, विज्ञानस्य धर्मानुष्ठानस्य चोन्नतिरपि कर्तव्या, परं तावतापि तत्त्वज्ञानमन्तरा मुक्तिर्न सम्भवत्येव, 'तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ( वा० सं ० ३१।१८ ) इति मन्त्रवर्णात् । अत्र बहूनि योगसूत्राणि प्रमाणतयोद्धृतानि 1 पर तदर्थाः संस्कृतभाषया नोद्घाटिताः । हिन्दीभाषया चासङ्गता एवार्था उक्ता । उद्धृतानि सूत्राणि सर्वथापि तन्मतविरुद्धान्येवेति संक्षेपेण प्रदश्यते । और सगुण रूप से कोई भेद नही हो सकता, वही स्थिति यहाँ भी उपस्थित है । जैसे यहाँ स्पर्शरहित होने से आकाश को निर्गुण नही माना जा सकता, उसी तरह से सर्वत्र प्रभृति गुणो वाले ईश्वर को भी कुछ गुणो के अभाव मे निर्गुण नही कहा जा सकता । ऐसा मानने पर तो कुछ गुणो के अभाव में सभी सगुण पदार्थ निर्गुण मान लेने पडेंगे । इसलिये जैसे यह भूतल घट से रहित है, ऐसा कहने पर भूतल पर समस्त घटो का निषेध माना जाता है, उसी तरह से निर्गुग कहने पर भी सभी तरह के गुणो की निषेध मानना पड़ेगा, जिसमें कि सर्वज्ञ प्रभृति गुणो का भी निषेध आ जाता है । किसी भी तरह के किसी भी घट की उपस्थिति में 'भूतल घट रहित है' इस तरह की प्रतीति नही हो सकती । कुछ लोग प्राकृत गुणो के न होने से ईश्वर को निर्गुण और दिव्य, अप्राकृत गुणो की उपस्थिति के कारण ईश्वर को सगुण मानते हैं । निर्विशेषाद्वैतवादी दार्शनिक सविशेष ब्रह्म को सगुण और निर्विशेष ब्रह्म को निर्गुण मानते है । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि पारमार्थिक दशा में समस्त गुणों से अतीत स्वरूप निर्गुण और व्यवहार दशा में दिव्य अनन्त गुणों से अन्वित स्वरूप सगुण है । मुक्ति विषयक विचार इस प्रसंग मे संक्षेप मे मुक्ति का विचार करते हुए दयानन्द ने कहा है-'इसी प्रकार परमेश्वर की उपासना करके, अविद्या आदि क्लेश तथा अधर्माचरण आदि दुष्ट गुणो का निवारण करके, शुद्ध विज्ञान और धर्मादि शुभ गुणो के आचरण से आत्मा की उन्नति करके जीव मुक्ति को प्राप्त हो जाता है' ( पृ० २० ९ ) । यह भी बात विचारणीय है, क्योकि इस तरह से तो मुक्ति की भी एक कार्य के रूप में गणना होगी और तरह से कार्य होने से यह अनित्य मानी जायगी । ईश्वर की उपासना करनी चाहिये, अविद्या, अधर्माचरण आदि से अपने मन को हटाना भी ठीक ही है । साथ ही विज्ञान का और धर्म का अनुष्ठान कर अपनी उन्नति करना भी अच्छी बात है, किन्तु इतना सब करने के बाद भी बिना तत्त्व ज्ञान के मुक्ति कभी नही मिल सकती । 'तमेव' इत्यादि मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि बिना ज्ञान के मुक्ति नही होती । अपने मत की पुष्टि में इन्होंने योग दर्शन के अनेक सूत्रों को प्रमाण के रूप में उपस्थापित किया है, किन्तु उनका अर्थ संस्कृत में नही किया है । हिन्दी मे जो अर्थ किया है, वह भी असंगत है । उद्धृत सभी सूत्र सर्वथा उनके मत के विरुद्ध ही पडते है, इस बात को यहाँ संक्षेप में बताया जा रहा है ।
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वेदार्थपारिजात. १३७३ ' अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा.' ( यो ० सू० २/३ ) | अविद्या विपर्ययज्ञानम्, अनित्याशुचिदुःखा- नात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्येति तल्लक्षणात् । अनित्ये नित्यबुद्धि, अशुचौ शुचिबुद्धि, दुखे सुखबुद्धि, अनात्मसु आत्मबुद्धिर्भ्रान्तिरेव । अविद्यामूलकत्वादस्मितारागद्वेषाभिनिवेशा अपि विपर्ययात्मका एव मन्तव्या । एते क्लेशा अनुशयिनं पुरुष क्लिश्नन्ति । 'अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषाम् ' अस्मितादीनामविद्या क्षेत्रं प्रसवभूमिः । अत एव यत्र विपर्ययज्ञानरूपा शिथिली- भवति, तत्रैषा नोद्भवो दृश्यते । ते च प्रसुप्त-तनु- विच्छिन्नोदारभेदेन चतुर्विधा भवन्ति । ये चित्तभूमौ स्थिता अपि प्रबोधकाभावे स्वकार्यानारम्भकास्ते प्रसुप्ता. । यथा बालानां बाल्यावस्थाया सहकार्यभावेन स्थिता अपि क्लेशा नाभिव्यज्यन्ते । स्वस्व- प्रतिपक्षभावनया शिथिलीकृतकार्यक्षमता वासनारूपेण ये चेतसि स्थिता प्रभूतां सामग्रीमन्तरेण स्वकार्यानारम्भकास्ते तनव । यथाभ्यासशालिनो योगिनः । केनचिद्बलवता क्लेशेनामिभूतशक्तयो ये ते विच्छिन्नाः । यथा द्वेषावस्थाया राग, रागावस्थाया वा द्वेषः 1। परस्परविरुद्धयोर्युगपदसम्भवात् । ये प्राप्तसहकारिसन्निधानात् स्वं स्व कार्यं निर्वर्तयन्ति ते उदाराः । सदैव ते योगपरिपन्थिनः । प्रत्येकं चतुर्विधानामपि तेषा मूलमविद्येव, विपर्ययानपेक्ष्येण तेषामप्रवृत्तेः । प्रसंख्यानदग्धाना तु तेषां सम्मुखीभूतेऽपि सहकारिणि विषये प्रवृत्त्यभावः । दयानन्देन तूक्तम्— —मिथ्याभाषणादिदूषणानां माता अविद्या, या मूढानन्धकारे विषज्य दुःखसागरे निम-ज्जयति । विदुषा सद्विद्यया विच्छिन्ना भूत्वा प्रसुप्ततनुर्नश्यति तदा ते जीवन्मुक्ता भवन्ति' इति, सर्वथाप्येतद् व्याख्यानं सूत्रविसङ्गतं व्यासभाष्य च विरुणद्धि । मूले उत्तरेषामस्मितादिक्लेशाना मूलत्वमविद्याया उक्तम्, मिथ्याभाषणादीनामिहा-,प्रसङ्गात् प्रमख्यानमन्तरा सत्यवादिनामप्यविद्यादिक्लेशदर्शनात् । सद्विद्यया विच्छिन्ना भूत्वा प्रसुप्ततनुर्नश्यतीति अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश कहे जाते है । इनमें से अविद्या विपरीत ज्ञान को कहते है । 'अनित्या०' इत्यादि सूत्र मे अविद्या का लक्षण दिया गया है । अनित्य में नित्य, अशुचि में शुचि, दुख में सुख और अनात्मा मे आत्म बुद्धि भ्रान्ति ही मानी जाती है । अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश के मूल मे भी अविद्या विद्यमान रहती है, अत ये सब विपर्यय स्वरूप ही हैं । ये क्लेश अनुशयवान् पुरुष को कष्ट देते है । अस्मिता प्रभृति की उत्पत्ति का क्षेत्र अविद्या है, अत विपर्यय ( भ्रमात्मक ) ज्ञान रूप यह अविद्या जिनकी शिथिल होने लगती है, तो वहाँ अस्मिता प्रभृति की उत्पत्ति नही होती । ये क्लेश प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार के भेद से चार तरह के होते है । जो क्लेश चित्तभूमि मे रहते हुए भी प्रबोधक के अभाव में अपना कार्य आरम्भ नही कर पाते, वे प्रसुप्त कहे जाते है । जैसे कि बाल्यावस्था मे बालको के मन से प्रसुप्त रूप से विद्यमान क्लेश सहकारी कारण के अभाव मे अभिव्यक्त नहीं हो पाते । तनु उन क्लेशो को कहते है, जो कि उनके प्रतिपक्ष में विद्यमान बृत्तियो की भावना से कार्यक्षमता मे शिथिलता आ जाने से केवल वासना के रूप मे चित्त मे रहते तो है, किन्तु पर्याप्त सामग्री के अभाव मे अपने कार्य को उत्पन्न नही कर पाते, जैसा कि अभ्यास में लगे योगी का चित्त । किसी बलवान् क्लेश से जिनकी शक्ति अभिभूत हो जाती है, वे विच्छिन्न कहलाते है । जैसे कि द्वेष वृत्ति का जब उदय होता है, तो मनुष्य की राग वृत्ति दब जाती है; अथवा राग को अवस्था मे द्वेष दब जाता है । परस्पर विरुद्ध इन दोनो वृत्तियो की एक साथ स्थिति नही कर सकती । उदार उन वृत्तियो को कहते हैं, जो कि सहकारी कारण के सहयोग से अपने अपने कार्य को निष्पन्न करने लगती है । ये वृत्तियाँ योग के अभ्यास में सदा बाधक ही मानी जाती है । उक्त अविद्या प्रभृति सभी क्लेश इन चार विभागो मे विभक्त होते है, किन्तु इन सब के मूल में अविद्या विद्यमान रहती है, क्योकि बिना विपरीत ज्ञान के इनकी प्रवृत्ति नही होने पाती । सम्यग् ज्ञान से जब इन सबकी वासनाओं का दाह हो जाता है, तो सहकारी की उपस्थिति में भी उनसे कार्य नही उत्पन्न हो सकता, जैसे कि भुने बीज से अंकुर नही पैदा हो पाता । दयानन्द ने यह व्याख्या की है -- 'मिथ्याभाषण आदि दोषो की माता अविद्या है, जो कि मूढ जीवो को अन्धकार में फँसाकर जन्म- मरण आदि दुःखसागर मे सदा डुबाती है । परन्तु जब विद्वान् और धर्मात्मा उपासकों को सत्यविद्या से अविद्या विच्छिन्न अर्थात् छिन्न-भिन्न होकर प्रसुप्त तनु नष्ट हो जाती है, तब वे जीव मुक्ति को प्राप्त हो जाते है ' ( पृ० २१० ) । यह व्याख्या सूत्र से तो असंबद्ध हैं ही, साथ ही व्यासभाष्य के विपरीत भी है । सूत्र में अस्मिता प्रभृति परवर्ती क्लेशो का मूल अविद्या को ही बताया गया है, मिथ्याभाषण आदि का यहाँ कोई प्रसंग नही है | ज्ञान के बिना सत्यवादी मनुष्य के भी अविद्या
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वेदार्थपारिजाता १३७४ विचित्रमेव । प्रसुप्ततनूना केषाञ्चिदपि मृत्युर्न दृश्यते । सद्विद्याया इह सूत्रे चर्चाऽपि नास्ति । एवमपव्याख्यानेऽप्युदारेत्यस्य व्याख्यानं न कृतमेव । यदि तु उदारेत्यस्य मुच्यन्ते इत्यर्थं स्यात् सोऽप्यप्रामाणिक एव उदारशब्दस्य मुक्त्यर्थत्वे रवेच्छाया अव्याहतप्रसरत्वेन लूलायीशब्दस्यापि मुक्त्यर्थत्वापातात् । 'अनित्याशुचिदु खानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या' ( यो० सू० २२५ ) । तदर्थस्त्वनित्ये कार्यमात्रे लौकिके पृथिव्यादावलौकिके स्वगादी नित्यख्यातिरविद्या । तथैव परमबीभत्से काये स्थानाद्बीजादुष्टम्भान्निष्यन्दान्निधना- दाधेयगौचत्वादशुचौ शुचिबुद्धिरविद्या, एतेनापुण्ये मिथ्याधर्मादौ पुण्यप्रत्ययोऽप्यविद्येव । दुखे दु.खप्राये भोगादी सुख- प्रत्ययोऽविद्या । एतेनार्जनरक्षणादिदु खबहुलतयाऽनर्थे धनादावर्थप्रत्ययाद्या अपि व्याख्याताः । जुगुप्सितत्वेनाशुचित्वाद् अनात्मसु बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु शरीरे तदुपकरणे मनोबुद्धयहङ्काराय केष्वात्मख्यातिरविद्या, अत-मस्तबुद्धि- रविद्येत्यर्थः । एतेन ज्ञानाभावोऽविद्येति मतमपास्तम्, अमित्राधर्मादिशब्दाना यथा न मित्राद्यभावोऽर्थ., किन्तु तद्विरुद्धः सपत्नः प्रतिषिद्धाचरणं चार्थस्तद्वत् । विद्याविरुद्धपूर्वोक्त ख्यातीनामेवा विद्यात्वम् । यत्तु दयानन्देन नित्ये ईश्वरे जीवे जगत्कारणे क्रियाक्रियावतोर्गुणगुणिनोर्धर्मधर्मिणोनित्येष्वनित्यबुद्धिर विद्या- विद्यायाः प्रथमो भाग इति, तत्तु निर्मूलम्, असोत्रत्वात् । न चैतेन सोत्रन्यूनतापूर्तिरेवेति वाच्यम्, सर्वज्ञे सूत्रकारे तत्कल्पनाया नास्तिक्यमूलत्वात् । सर्वोऽपि लोकोऽनित्ये देहादिकार्येषु नित्यत्वबुद्ध्या भ्राम्यति । यश्च देहादिभिन्नं तद्विलक्षणमात्मानं जगद्विलक्षणं चेश्वरं जानाति स तयोर्नित्यत्वमपि जानात्येव, अनित्यत्वे देहजगदादिसाधारण्यापत्त्या तद्विलक्षणत्वासिद्धे । प्रभृति क्लेश दूर नही हो पाता । सत्य विद्या से विच्छिन्न होकर नष्ट हो जाती है, यह भी विचित्र ही बात है । किसी भी प्राणी को सो जाने पर मृत्यु हो जाती हो, ऐसा नही देखा गया है । सद्विद्या की इस सूत्र मे कोई चर्चा भी नही है । इस तरह से गलत व्याख्या करके भी दयानन्द ने 'उदार' पद का कोई अर्थ नहीं किया । 'उदार' का मुक्त हो जाते है, यह अर्थ माना जाय तो यह अप्रामाणिक ही होगा, क्योकि मुक्ति के अर्थ मे ' उदार' पद का कही प्रयोग नही देखा गया । इतने पर भी मनमाने तरीके इसका यह अर्थ किया जाय, तो स्वेच्छा के बढाव को रोकना कठिन हो जायगा और 'लूलायी' शब्द का अर्थ भी हम मुक्ति करने लगेंगे । 'अनित्या० ' इत्यादि सूत्र का अर्थ यह है- अनित्य अर्थात् कार्यमात्र मे, चाहे वह लौकिक पृथिवी प्रभृति हो अथवा अलौकिक स्वर्ग प्रभृति, नित्यता की बुद्धि अविद्या कहलाती है । इसी तरह से परम बीभत्स शरीर मे, जो कि अनेक कारणो से अपवित्र माना गया है, पवित्रता की बुद्धि भी अविद्या कहलाती है । इसी तरह से मिथ्याधर्मादि मे उपदिष्ट अपुण्य कार्य को पुण्य मानना भी अविद्या ही है और प्रायः दुःखमय भोग विषयों में सुख मानना भी अविद्या है । इसी तरह से अर्जन, रक्षण आदि मे अनेक तरह का कष्ट १ होने से दुःखबहुल, अनर्थरूप घनादि मे अर्थ की प्रतीति भी भ्रम ही मानी जाती है । आत्मा के बाह्य उपकरण, जो कि चेतन और अचेतन के रूप में, शरीर, मन, बुद्धि, अहङ्कार, अव्यक्त आदि के रूप में विद्यमान है और जो जुगुप्सित होने से अपवित्र माने जाते है, इनमे आत्मबुद्धि भी अविद्या है । यहाँ ज्ञान के अभाव को अविद्या नही माना गया है । अमित्र, अधर्म आदि शब्दो का जैसे मित्र का अभाव या धर्म का अभाव अर्थ न होकर शत्रु या निषिद्ध आचरण अर्थ माना जाता है, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । विद्या के विपरीत उक्त तरह के मिथ्याज्ञान ही यहां अविद्या पद से अभिहित होते है । दयानन्द ने इसका अर्थ इस तरह से किया है- ' नित्य अर्थात् ईश्वर, जीव, जगत् का कारण, क्रिया-क्रियावान् गुण-गुणी और धर्म- धर्मी है, इन नित्य पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध है । इनमे अनित्य बुद्धि का होना, यह अविद्या का प्रथम भाग है' ( पृ० २१० ), किन्तु यह अर्थ सूत्र के विपरीत होने से निराधार है । इससे सूत्र की न्यूनता की पूर्ति होती है, ऐसा नही कहा जा सकता, क्योकि सूत्रकार तो सर्वज्ञ है, अत सूत्र के सम्बन्ध में इस तरह की कल्पना नास्तिक ही कर सकता है । अनित्य देहादि मे नित्य बुद्धि करनेवाला कोई भी भ्रान्त ही माना जाता है । जो व्यक्ति देहादि से भिन्न और इससे विलक्षण आत्मा को और जगत् से विलक्षण ईश्वर को जानता है, वह इन दोनो की नित्यता को भी जान लेता है । यदि इनकी भी अनित्य ही माना जाय तो उस स्थिति मे इनकी देह, जगत् प्रकृति से समानता के रहते विलक्षणता कैसे सिद्ध हो पावेगी । जो व्यक्ति इनकी विलक्षणता को स्वीकार नही
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वेदार्थपारिजातः १३७५ यस्तु वैलक्षण्य न प्रत्येति, स जीवादिस्वरूपमेव नाभ्युपगच्छति, किमु वक्तव्य तत्र नित्यत्वे | क्रियाक्रियावतोर्गुणगुणिनोर्धर्म- धर्मिणोश्चानित्यत्वमेव i। ' नेह नानास्ति किञ्चन' ( बृ० ४/४: १ ९) इति ब्रह्मातिरिक्तस्य सर्वस्यैवानित्यत्वमिथ्यात्वोपपत्ते ', निर्दिकारे कूटस्थे क्रियावत्त्वाद्यनुपपत्ते । अन्यथा पृथिव्यादीनामपि नित्यत्व स्थात्, तत्रापि धर्मधर्मि गवोपपत्ते । ताख्य-यागादिदृष्ट्या घटाद्यव्यक्तान्ताना समेषा परिणामित्वेनानित्यत्वमेव, पुरुषस्य कूटस्थत्वनिर्विकारत्वादिभिर्नित्यत्वमेव । यत्तु तेनैव - ' अशुची नदीस रोव रादितोर्थेषु पापमोचनाय तीर्थस्नानचरणोदकग्रहणादि, एकदश्यादिमिथ्याव्रतेषु क्षुपासादिसहनमविद्या ' (पृ० २१० ) इति तत्तु नास्तिक्यमूलकमेव गङ्गायमुनापुष्करादीना पावनहेतुत्वस्य महाभारते बनपर्वणि विस्तरेण वर्णितत्वात् मृज्जलादिभिर्देहशौचस्य मन्वादिधर्मशास्त्रसम्मतत्वात् प्रत्यक्षादिविरोधाच्च, मलमूत्रादि-कृताया अशुद्धेर्मृज्जलादिभि: प्रत्यक्षमेव निवारणदर्शनात् । एकादश्यादिवताना च पावनहेतुत्वं विष्णुपुराणादिसम्मतम् । तेषा च प्रामाण्यं महता सरम्भेण साधितम् । जितेन्द्रियत्वनिष्कामशमसन्तोषादिविवेकप्रसादादिषु दु खबुद्धिरविद्येत्यपि न युक्तम्, व्याहृतेः । शमदमविवेकादिषु सत्सु दुःखबुद्धिर्न सम्भवत्येव, सूर्ये तमोबुद्धिवद् विरुद्धत्वात् । ' दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ' (यो ० सू० २२६ ) । दृक्शक्ति पुरुष, दर्शनशक्तिर्बुद्धिः, तयोर्भोग्यभोक्तृत्वजडत्वा- जडत्वादिभिरत्यन्तविविक्तयोरप्येकात्मताभिमानोऽस्मिता क्लेशः । तस्या सत्यामेव भोगः । तयो. स्वरूपविवेके कैवल्यमेव । यदुक्तम्—' अहङ्कारेणात्मनो महत्त्वावगमोऽस्मिता' ( पृ० २११ ) इति, तत्तु विसङ्गतमेव । अल्पे महत्त्वबुद्धेरविद्या-कुक्षिनि. क्षिप्तत्वाद् अस्मितात्वायोगात् । येनाहङ्कारेण तादृशी बुद्धिस्तस्यापि सूक्ष्मरूपमेवास्मितेति सौत्राभिप्रायत्वात् । करता, वह तो जीव प्रकृति के स्वरूप को भी नही मानेगा, जो उनकी नित्यता को स्वीकार करने की बात तो बहुत दूर है । क्रिया-क्रियावान्, गुण-गुणी और धर्म- धर्मी को तो अनित्य ही माना जाता है । 'यहाँ नाना कुछ भी नही है' इस श्रुति के अनुसार ब्रह्म से भिन्न सभी कुछ अनित्य और मिथ्या हो माना जाता है । निर्विकार, कूटस्थ ब्रह्म को क्रिया, गुण या धर्म से सयुक्त नही माना जाता । ऐसा मानने पर तो पृथिवी प्रभृति मे भी नित्यता माननी पड जायगी, क्योकि धर्म धर्मीभाव प्रभृति की स्थिति वहाँ भी हैं । साख्य-योग आदि दर्शनो के अनुसार घट से लेकर अव्यक्त पर्यन्त सभी परिणामी पदार्थ अनित्य माने जाते है और पुरुष कूटस्थ, निर्विकार होने से नित्य कहा गया है । ' दयानन्द ने आगे लिखा है -' तालाब, बावली, कुण्ड, कुआं और नदी आदि मे तीर्थ और पाप छुडाने की बुद्धि करना और उनका चरणामृत पीना, एकादशी आदि मिथ्या व्रतो मे भूख -प्यास आदि दुखो का सहन अविद्या है' ( पृ० २१० ), किन्तु उनका यह कथन नास्तिकता से प्ररित है, क्योकि महाभारत के वन पर्व में विस्तार से गंगा, यमुना, पुष्कर, प्रभृति तीर्थो को पवित्र बताया गया है । स्नान करने से देह की शुद्धि होती है, इस बात का समर्थन मनु प्रभृति के धर्मशास्त्रो मे भी किया गया है । आपकी बात प्रत्यक्ष प्रमाण के भी विपरीत हैं, क्योकि मल -मूत्र प्रभृति से उत्पन्न हुई अशुद्धि का परिहार मिट्टी, जल आदि से होता है, यह हम नित्य-प्रति प्रत्यक्ष देखते है | एकादशी प्रभृति व्रत के आचरण से मन पवित्र होता है, यह बात विष्णुपुराण प्रभृति ग्रन्थो में बडे प्रयत्न से बताई गई है । जितेन्द्रियता, निष्काम कर्म, शम, सन्तोष, विवेक, चित्त की प्रसन्नता आदि मे दुखबुद्धि को अविद्या बताना भी गलत है, क्योकि यह बात परस्पर विरुद्ध है । शम, दम, विवेक आदि के रहते दु खबुद्धि हो ही नही सकती, क्योकि सूर्य के रहते जैसे तम नही रह सकता, उसी तरह से शम-दम आदि के रहते दुख की भी कोई स्थिति नही रह सकती । ----- ' दृग्दर्शन० ' इत्यादि सूत्र का अर्थ यह है- ' दृक्शक्ति पुरुष और दर्शनशक्ति बुद्धि – इन दोनो में भोक्ता और भोग्य, अजड और जड आदि के रूप मे अत्यन्त भिन्नता है, किन्तु इनकी एकता को मान लेना अस्मिता नामक कोश के कारण होता है । इस अस्मिता के कारण ही प्रकृति और पुरुष के गुणो का मिश्रण हो जाने से भोग की स्थिति प्राप्त होती है और इसके स्वरूप का विवेक होने से कैवल्य स्थिति आ जाती है । ' ( पृ ० २११ ) दयानन्द की यह धारणा गलत है, 'अभिमान और अहंकार से अपने को बड़ा समझना अस्मिता है ,क्योकि अल्प को महान् समझना तो अविद्या कही जाती है, इसको अस्मिता नही कह सकते । जिस अहङ्कार के कारण ऐसी बुद्धि है उसका सूक्ष्म रूप ही अस्मिता है, सूत्र का यही अभिप्राय हो सकता है ।
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वेदार्थपारिजातः १३७६ 'सुखानुशयी राग ' ( यो० सू० २| ७) सुखाभिज्ञस्य सुखानुस्मृतिपूर्वको यो सुखे तत्साधने वा लोभस्तृणा वा स राग । ' दु.खानुशयी द्वेष: ' (यो ० सू० २८ ) तथैव दुःखाभिज्ञस्य दुःखतत्साधने यो मन्युर्जिघासा क्रोध स द्वेष । 'स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेश: ' (यो ० सू० २( ९) जन्मान्तरीयदुःखानुभवजन्यवासनाबलादुद्भतो भयादिरूपोऽभिनिवेश । स , -च यथा मूढेषु तथैव विज्ञातपूर्वापरान्तस्य विदुषोऽपि दृश्यते मरणादित्रासस्योभयत्र दर्शनात् । भयदावद् रागद्वेषादिदा मप्यभिनिवेश एव । यत्तु जीवपरमेश्वरप्रकृतीना नित्यत्वज्ञानेन द्रव्यसयोगवियोगादीनामनित्यत्वज्ञानेन क्लेशनिवृत्तिरिति, तत्तु अप्रासङ्गिकमेव, हानतदुपायादीना परतो वक्ष्यमाणत्वात् । 'तदभावात् सयोगाभावो हान तद्दृशे कैवल्यम् ' ( यो० सू० २।२५ ) । पूर्वं हेयं ससारदुःख हेयहेतुः द्रष्टृदृश्ययोः सयोगः, दृश्यस्वरूपं कार्यं प्रयोजनम्, द्रष्टृस्वरूपसंयोगः सयोगहेतुश्चोक्त., अनेन सूत्रेण तद्धानमुच्यते । तस्या अविद्यायाः स्वरूपविरुद्धेन तत्त्वज्ञानेनोन्मूलिताया अभावे तत्कार्यस्य सयोगस्याप्यभावस्तद्धानम् । विवेकख्याती सत्यामविवेकनिमित्तस्य सयोगस्य स्वयमेव निवृत्तिनम् । तद्धानमेव केवलस्य पुरुषस्य कैवल्यमुच्यते । एतावता मुक्तिविज्ञानकर्मसाध्या काचित्काल- परिच्छिन्नेति दयानन्दीय मतं तदुद्धृतप्रमाणेनैव निरस्तम् । यत्तु अविद्यादिक्लेशनाशे विद्यादिशुभगुणप्राप्तौ सर्वबन्धनेभ्यो दु.खेभ्यो विनिर्मुक्तो मुक्तिमाप्नोतीति तत्तु सूत्राक्षराद् बहिर्भूतमेव, सूत्राक्षराऽननुगुण्यात् । सूत्रे हानमेव दृशेः कैवल्यमुक्तम्, उत्पाद्याप्यसस्कार्यंविकार्याणामनित्यत्वात् । ' तद्वैराग्यादपि दोषक्षये कैवल्यमिति' (यो ० सू० ३।५० ) | एवं क्लेशकर्मक्षये योगिनोऽयं विवेकप्रत्ययो बुद्धिसत्वस्य 'सुखानुशयी राग ' इस सूत्र का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति सुख से अभिज्ञ है, उसको जब सुख का स्मरण होता है, तो सुख में और सुख के साधन में जो लोभ या तृष्णा होती है, उसी को राग कहते है । इसी तरह से जो व्यक्ति दुख से अभिज्ञ है, उसको जब दुःख का स्मरण होता है, तो दुख के और उसके साधन के जो प्रति आक्रोश, उसको नष्ट कर देने की इच्छा होती है, उसको द्वेष कहते हैं । 'स्वरसवाही० ' इत्यादि सूत्र का अभिप्राय यह है कि जन्मान्तर के दुःख के अनुभव से उत्पन्न वासना के कारण मनुष्य के मन मे उसके प्रति जो भय की भावना पैदा होती है, उसको अभिनिवेश कहते हैं । यह भय मूढ व्यक्ति की ही तरह इसके कार्यकारणभाव को ठीक से जानने वाले विद्वान् को भी त्रस्त किये रहता है । मृत्यु का त्रास सबको आतंकित किये रहता है । भय को इस दृढता के समान राग-द्वेष आदि का भी जो दृढ संस्कार पडता है, वह भी अभिनिवेश ही कहलाता है । ' जब जीव, परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को नित्य तथा कार्य द्रव्य के संयोग-वियोग को अनित्य मान लेगा, तो क्लेशों की शक्ति से उसको मोक्ष गुण की प्राप्ति होती है' ( पृ० २११ ) दयानन्द का यह कथन असंगत है, अप्रासंगिक है, क्योकि द्वेष और उपादेय गुण-दोषो का वर्णन आगे अलग से किया गया है । 'तदभावात्० ' इत्यादि सूत्र का अर्थ यह है— पहले यह बताया जा चुका है कि ससार का दुःख हेय है, द्रष्टा और दृश्य का संयोग इस हेय संसार का कारण है, दृश्यस्वरूप कार्य इसका प्रयोजन और द्रष्टा के स्वरूप का संयोग इस सयोग का कारण है । अब इस सूत्र से इस सयोग को कैसे छोड़ा जाय, यह बताया जाता है । उस अविद्या के स्वरूप के विपरीत तत्त्वज्ञान का उदय होने पर उस अविद्या का नाश हो जाता है और इस अविद्या का नाश हो जाने से उसकेकार्य संयोग का भी नाश हो जाताजाता हैहै,, उससे छुटकारा मिल जाता है । अर्थात् विवेकख्याति के उत्पन्न हो जाने पर अविवेक निमित्त सयोग की निवृत्ति अपने आप हो जाता है । सयोग की यह निवृत्ति हो, अर्थात् पुरुष की प्रकृति से पृथक्ता ही, उसका अकेला रहना ही केवलता अर्थात् कैवल्य कहलाता है । इस प्रतिपादन से दयानन्द का यह मत अपने आप खण्डित हो जाता है कि मुक्ति विज्ञान और कर्म की सहायता से प्राप्त होती है और यह काल से परिच्छिन्न होती है । 'जब अविद्यादि क्लेश दूर होकर विद्यादि शुभ गुण प्राप्त होते हैं, तब जीव सब बन्धनों और दुःखों से छूट कर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है' ( पृ ० २११ ) दयानन्द की यह व्याख्या भी सूत्राक्षरों से विपरीत है । सूत्र में सब कुछ के त्याग से ही कैवल्य की प्राप्ति बताई गई है । जो उत्पाद्य, प्राप्य, संस्कार्य और विकार्य है, वह सब कुछ अनित्य माना जाता है । 'तद्वैराग्यादपि' इस सूत्र का अभिप्राय यह है कि क्लेश और कर्म का क्षय हो जाने पर योगी के लिए यह विवेक ज्ञान
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वेदार्थपारिजात १३७७ धर्मस्तद्वदेवायमपि हेयपक्षे वर्तते । पुरुषश्चान्योऽपरिणामी शुद्धः । एव ततो विरज्यमानस्य यानि क्लेशबीजानि दग्धबीज- कल्पान्यप्रसवसमर्थानि तानि सह मनसा प्रत्यस्तं गच्छन्ति, गुणाना क्लेश-कर्मविपाकस्वरूपेणाभिव्यक्ताना चरितार्थानां पुरुषस्यात्यन्तिको गुणवियोग: कैवल्यम् । तदा स्वरूपप्रतिष्ठा चिच्छक्तिर्भवति, इति व्यासभाष्यम् । विशोकाया सिद्धावपि यदा योगिनो वेराग्यमुत्पद्यते, दोषाणा रागादीनां बीजस्याविद्यायाः क्षये कैवल्यमात्यन्तिकी दुखनिवृत्तिर्भवति । पुरुषस्य गुणाधिकारनिवृत्तौ पुरुषस्य स्वरूपप्रतिष्ठितत्वम् इति भोजराजः । यत्तु -दयानन्देन शोकरहितादिसिद्धिवैराग्येऽपि दोषबीजा-विद्यानाशाय यथावत् प्रयत्नः कर्तव्य:, कुतस्तदन्तरा मोक्षासम्भवात् ( पृ० २११ ) इत्युक्तम्, तत्तु सूत्रार्थाज्ञाननिबन्धनम् । सूत्रे तद्वैराग्यस्यैव तद्वीजनाशहेतुत्वोक्तेः । ' सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्' ( यो० सू० ३।५५ ) इति सत्त्वपुरुषयोः बुद्धिसत्वात्मनो. शुद्धिसाम्ये केवल्यम् । सत्त्वस्य सर्वकर्तृत्वाभिमाननिवृत्या स्वकारणेऽनुप्रवेशः शुद्धिः । पुरुषस्य तूपचरितभोगाभाव शुद्धिः । द्वयो. समानायां शुद्धौ पुरुषस्य कैवल्य मोक्षो भवति । अत्रापि पुरुषस्य स्वरूपप्रतिष्ठैव मुक्तिरुक्ता न कार्यरूपा । ' ' ( ) तदा विवेकनिम्न कैवल्यप्राग्भार चित्तम् यो० सू० ४१२५ । यदा सत्त्वपुरुषयोरन्यताख्याती बुद्धिसत्त्वे आत्मभावो निवर्तते, तदा विवेकनिम्न कैवल्यप्राग्भार कैवल्यफलं चित्तमुत्पद्यते । अत्र यदुक्तम् -' सर्वदोषेभ्यः पार्थक्ये पुरुषस्य ज्ञानाभिमुख्य तदानी कैवल्यसस्कारेण चित्तं परिपूर्यते, तदानीमेव जीवस्य मोक्षः कुतः, यावद्द्बन्धन- भी, जो कि बुद्धि का सात्त्विक धर्म है, उसी तरह से हेय कोटि में आ जाता है, जैसे कि क्लेश आदि सब के लिये हेय माने जाते है । पुरुष हम सब परिणामी धर्मों से भिन्न अपरिणामी और शुद्ध है । इस तरह से इस संसार से विरक्त पुरुष के जो क्लेश बीज है, वे भुने हुए बीज के समान फिर किसी वासना को पैदा करने में असमर्थ होने से अन्तत मन के साथ समाप्त हो जाते हैं । इस तरह से क्लेश, कर्म और विपाक के रूप में अभिव्यक्त होकर चरितार्थ हुए गुणो के साथ पुरुष का अत्यन्त वियोग हो जाना ही कैवल्य कहलाता है । इस अवस्था में चिच्छति अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती है । यह व्यासभाष्य के अनुसार हुआ । भोजराज ने इसका अर्थ इस तरह से किया है - सिद्धि की विशोकावस्था में जब योगी के चित्त में वैराग्य उत्पन्न होता है, तब रागादि दोषो की बीजभूत अविद्या का क्षय हो जाने पर कैवल्य अर्थात् दु.ख की आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि गुणो के अधिकार के निवृत्त हो जाने पर पुरुष अपने स्वरूप मे प्रतिष्ठित हो जाता है । दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है - "शोकरहित आदि सिद्धि से भी विरक्त होकर सब क्लेशों और दोषो का बीज जो अविद्या है, उसके नाश करने के लिये यथावत् प्रयत्न करे, क्योकि उसके नाश के बिना मोक्ष कभी नही हो सकता" ( पृ० २११ ) । उसके इस कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि उनको सूत्र का अर्थ मालूम ही नही हो पाया है, क्योकि सूत्र में स्पष्ट ही वैराग्य को ही सभी प्रकार के दोषो के बीज अर्थात् कारणो के भी नाश का प्रधान कारण माना है । 'सत्त्वपुरुषयो " इस सूत्र का अर्थ यह है कि सत्त्व और पुरुष की अर्थात् बुद्धि के सत्वाश और आत्मा की जब समान-रूप से शुद्धि हो जाती है तो कैवल्य की अभिव्यक्ति होती है । सत्त्व की शुद्धि यह है कि जब यह जान लेता है कि मै इस संसार का कर्त्ता नही हूँ, तब उसका अपने कारण मे लय हो जाता है और पुरुष की शुद्धि यह है कि वह अब तक अपने को जो सब भोगो का भोक्ता मानता रहा है, उसको यह भान हो जाता है कि वास्तव में मैं इनका भोक्ता नही हूँ । इस तरह ये जब दोनों की समान रूप से एक साथ शुद्धि हो जाती है तो पुरुष को कैवल्यावस्था की प्राप्ति हो जाती है । यहाँ भी पुरुष को अपने स्वरूप में प्रतिष्ठा ही मुक्ति मानी गई है, इसको कार्य नही माना गया है । 'तदा विवेक ' इत्यादि सूत्र में यह बताया गया है कि जब सत्व और पुरुष की आपस मे भिन्नता की प्रतीति सही तरीके से हो जाती है, जो बुद्धि के सत्वाश को योगी आत्मा मानना बन्द कर देता है, तब विवेक से भरा हुआ उसका चित्त कैवल्यावस्था की की ओर बढ़ता हुआ अन्ततः उस अवस्था तक पहुँच जाता है । दयानन्द ने इसकी व्याख्या यह की है- "जब सब दोषो से अलग होकर ज्ञान की ओर आत्मा झुकता है, तब कैवल्य मोक्षधर्म के संसार से चित्त परिपूर्ण हो जाता है, तभी जीव को मोक्ष प्राप्त होता १७३
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वेदार्थपारिजात १३७८ कामेषु विषज्यते जीवस्तावन्मुक्तिप्राप्त्यसम्भव एव' इति, तदपि सूत्रार्थासम्बद्धमेव, कूटस्थस्यासङ्गस्यात्मनः कामेषु ज्ञानेषु वा विषक्त्यसम्भवात् । 'पुरुषार्थशून्यानां गुणाना प्रतिप्रसवः कैवल्यम्, स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति' (यो० सू० ४ । ३३ ) । समाप्तभोगापवर्गरूपपुरुषार्थानां गुणाना प्रतिप्रसवः स्वकारणे प्रधाने लय: । कार्यकारणात्मकानां गुणाना व्युत्थाननिरोध- संस्कारा मनसि लीयन्ते, मनोऽस्मितायामस्मितालिङ्ग लिङ्गमलिङ्गे इति योग्य गुणाना कार्यकारणात्मकाना प्रतिसर्गः, तत्कैवल्यम् | बुद्धिसत्त्वानभिसम्बन्धात् पुरुषचिति रेव केवलाऽवशिष्यते, तथैवावस्थानं कैवल्यमिति व्यासभाष्यतत्त्ववैशारदी-सम्मतः सूत्रार्थः । हिन्दीमय तदीयव्याख्यानमपि लिख्यते - 'कैवल्य मोक्ष का लक्षण यह है कि ( पुरुषार्थ ) अर्थात् कारण के सत्त्व रजो और तमोगुण और उनके सब कार्य पुरुषार्थ से नष्ट होकर आत्मा मे विज्ञान और शुद्धि यथावत् हो के स्वरूपप्रतिष्ठा जैसा जीव का तत्व है वैसा ही स्वाभाविक शक्ति और गुणो से युक्त होके शुद्धस्वरूप परमेश्वर के स्वरूप विज्ञानप्रकाश और नित्य आनन्द मे जो रहना है, उसी को कैवल्य मोक्ष कहते है ।' एव हिन्दीभाषाया-मपि न तलक्षणं स्पष्टम् । अत्र कर्तृकर्म क्रिया सम्बन्धा अप्यव्यवस्थिता इति विद्वासो विदाङ्कुर्वन्तु । सत्त्वरजस्तमसां तत्कार्याणा नाशे मोक्षो भवतीत्यप्याश्चर्यम् । सांख्यैर्योगिभिश्च कस्यचिदपि नाशानभ्युपगमात् । न वा तैरसङ्ग आत्मनि विज्ञानमुपेयते । स्वाभाविक्यः शक्तयो गुणाश्चात्मनि तैर्नाभ्युपेयन्ते तथात्वेऽसङ्गत्वव्याकोपात् । तादृशस्य जीवस्य परमात्मस्वरूपे विज्ञाने प्रकाशे आनन्देऽवस्थानमपि नोपपद्यते । एकस्यात्मनोऽन्यात्माधारत्वानुपपत्तेः । ज्ञानानन्दादयश्च परमेश्वरस्य स्वरूपा गुणा वा? नाद्यः, एकस्यानेकरूपत्वानुपपत्तेः । विज्ञान प्रकाश आनन्दश्च परस्परं भिन्ना अभिन्ना है । क्योकि जब तक बन्धन के कार्यो मे जीव फँसता जाता है, तब तक उसको मुक्ति प्राप्त होना असम्भव है । (पृ० २११ - २१२) किन्तु यह भी सूत्र से असंबद्ध ही है, क्योकि कूटस्थ और असंग आत्मा कामनाओ मे अथवा ज्ञान में भी कभी फँसता नही । 'पुरुषार्थं' इत्यादि सूत्र का अभिप्राय यह है कि भोग और अपवर्ग ये दो ही गुणो के प्रयोजन है । इन दोनो प्रयोजनो की सिद्धि हो जाने पर गुणो का प्रतिप्रसव अर्थात् अपने कारण प्रधान मे लय हो जाता है । कार्य और कारण अर्थात् प्रकृति से लेकर पंच महाभूत पर्यन्त सभी पदार्थ त्रिगुणात्मक होने से गुण ही कहे जाते है । इन गुणों की व्युत्थान, निरोध और संस्कार नामक अवस्थाएँ मन में लीन हो जाती है, मन अस्मिता मे, अस्मिता लिंग में और लिंग अलिंग मे लीन हो जाता है । इस तरह से समस्त गुणो का अर्थात् कार्यकारणात्मक जगत् का अपने अपने कारणो में लय हो प्रतिसर्ग के क्रम से अन्त मे कैवल्य मे बदल जाता है । बुद्धि सत्व का सबन्ध न रहने से पुरुष चिति रूप मे अकेला बचा रहता है । उसकी इस अवस्था को ही कैवल्य कहा जाता है । इस सूत्र का व्यासभाष्य, तत्ववैशारदी आदि के आधार पर यही अर्थ हो सकता है, किन्तु दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है - " कैवल्य मोक्ष का लक्षण यह है कि ( पुरुषार्थ) अर्थात् कारण के सत्त्व, रज और तमोगुण और उनके सब कार्य पुरुषार्थ से नष्ट होकर आत्मा में विज्ञान और शुद्धि यथावत होकर स्वरूप प्रतिष्ठा जैसा जीव का तत्त्व है, वैसा ही स्वाभाविक शक्ति और गुणों से युक्त होकर शुद्धस्वरूप परमेश्वर के स्वरूप, विज्ञान, प्रकाश और नित्य आनन्द में जो रहता है, उसी को कैवल्यमोक्ष कहते है " (पृ० २१३ ) । किन्तु इस हिन्दी व्याख्या मे कैवल्य का लक्षण स्पष्ट नही हो पाता । इस व्याख्या में कर्त्ता, कर्म और क्रिया के विभिन्न सम्बन्ध बने हो रह जाते है, यह बात विद्वानों को जान लेनी चाहिये । तब उसको कैवल्यावस्था कैसे कहा जा सकता है? सत्त्व, रज और तम के तथा उनके कार्यों के नाश से मोक्ष होता है, यह बात भी आश्चर्यजनक ही है, क्योकि साख्य और योगदर्शन में कभी किसी वस्तु का नाश अभिप्रेत नही है और न ये दर्शन असंग आत्मा में विज्ञान की सत्ता ही मानते है । स्वाभाविक शक्तियो की और गुणों की सत्ता ये आत्मा मे नही मानते, क्योकि ऐसा मानने पर आत्मा की असंगता भी नष्ट हो जायगी । इस प्रकार के जीव को परमात्मस्वरूप विज्ञान में, प्रकाश में और आनन्द मे अवस्थिति भी नही बन सकती, क्योंकि एक आत्मा की दूसरी आत्मा आधार नही बन सकती । आप यह बताइये कि ज्ञान, आनन्द प्रभृति परमेश्वर के स्वरूप है या उसके गुण है? ये परमेश्वर के स्वरूप नही माने जा सकते, क्योकि एक परमात्मा के अनेक रूप मानना गलत है । विज्ञान, प्रकाश और आनन्द परस्पर भिन्न गुण है या अधिक? प्रथम पक्ष मानने में पुनः एक की अनेकरूपता वाला
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वेदार्थपारिजात १३७९ वा? आद्ये नैकस्यानेकरूपता, अन्त्ये तेषा शब्दाना पर्यायत्वापत्तिः स्यात् । यदि गुणा एव ते तर्हि गुणे कथं द्रव्यरूपाणा- मात्मनामवस्थानम्? गुणानां द्रव्याधारत्वासम्भवात् । ' दुःखजन्मप्रवृत्तिदोपमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः, बाधनालक्षणं दुखम्, तदत्यन्त-: ' (,, ) विमोक्षोऽपवर्ग गो० सू० १-१-२ २१ २२ इत्यादिन्यायसूत्राण्यपि त्वत्प्रतिकूलान्येव न त्वत्समीहितसाधन ,,, नाति । न्यायरीत्या मिथ्याज्ञानाद् रागादयो दोषा भवन्ति दोषेभ्यो धर्माधर्मप्रवृत्तिर्भवति प्रवृत्तेर्जन्म भवति ततो ,,, दुःखं जायते । तत्त्वज्ञानेन मिथ्याज्ञाननिवृत्तिर्भवति तन्निवृत्त्या दोषो निवर्तते दोषनिवृत्त्या जन्म निवर्तते जन्म- — निवृत्त्या दुःखनिवृत्तिर्भवति । यत्तु अविद्यानाशात्पुरुषस्य सर्वे दोषा नश्यन्ति । तदनन्तरप्रवृत्तिरधर्मान्यायविषया- सक्तिवासनाऽपगच्छति, ततो जन्माभावः, तदभावे सर्वदुःखात्यन्ताभावः । दुःखाभावेऽनन्तकालाय परमात्मना सहानन्दभोग- एवावशिष्यते । एष एव मोक्ष इति तत्तु न्यायदर्शनसिद्धान्ताज्ञानविजृम्भितम् धर्माचरणेऽपि देहारम्भसम्भवेन दुःखो- च्छेदासम्भवात् । अत एव 'तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्ग ' ( गो० सू० १११।२१ ) इति मोक्षलक्षणे दुःखात्यन्तमोक्ष एव मोक्ष उक्तो न परमानन्दप्राप्तिर्न वा परमात्मप्राप्ति । तत्र तदित्यनेन प्रक्रान्तस्य दुःखस्य परामर्श । तत्रापि न बाधनास्वभावदुःखमव- मृश्यते, किन्तु तत्साधनं तदनुषक्तं च सर्वमेव, तेन वियोगोऽपवर्गः । प्रलये दुखवियोगेऽपि नापवर्गरूपता, सगँकालेऽक्षीणकर्मा- शयानुरूपशारीरादिसम्बन्धे सति दुःखसम्भवात् । तन्निवृत्त्यर्थमेवात्यन्तपदप्रयोगः । तेनात्यन्तिकोदु खनिवृत्तिरपवर्ग । दोष आवेगा और द्वितीय पक्ष मानने पर इन शब्दो की परस्पर पर्यायता माननी पड जायगी, जो कि आपको अभिप्रेत नही है । यदि ये सत्र परमात्मा के स्वरूप न होकर गुण है, तो गुण मे द्रव्य रूप आत्माओ की स्थिति कैसे रह सकती है? क्योकि गुणों को कही भी द्रव्य का आधार नही माना गया है । दयानन्द ने आगे 'दु खजन्य' प्रकृति गोतम के न्याय दर्शन के तीन सूत्रो को उद्धृत किया है, किन्तु ये भी उनके मत का समर्थन न कर उनके विपरीत ही पडते है । न्याय दर्शन के अनुसार मिथ्या ज्ञान से रागादि दोष पैदा होते है, दोषो के कारण धर्म और अधर्म में प्रवृत्ति होती है, प्रवृत्ति से जन्म होता है और इस जन्म के कारण ही जीव नाना प्रकार के दुखो मे पढ जाता है । तत्त्व-ज्ञान से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति होती है । मिथ्याज्ञान की निवृत्ति होने से दोष निवृत्त हो जाते है । दोषो के निवृत्त होने से जन्म की निवृत्ति हो जाती है और जन्म की निवृत्ति हो जाने पर दुखो की भी निवृत्ति हो जाती है । दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है- “जब मिथ्याज्ञान अर्थात् अविद्या नष्ट हो जाती है, तब जीव के सब दोष नष्ट हो जाते है । उसके पीछे प्रवृत्ति अर्थात् अधर्म, अन्याय, विषयासक्ति आदि की वासना सब दूर हो जाती है । उसके नाश होने से फिर जन्म नही होता । उसके न होनेसे सब दुःखो का अत्यन्त अभाव हो जाता है, दु.खो के अभाव से पूर्वोक्त परमानन्द मोक्ष मे अर्थात् सब दिन के लिये परमात्मा के साथ आनन्द ही आनन्द भोगने को बाकी रह जाता है । इसी का नाम मोक्ष है " ( पृ० २१२ ), किन्तु यह कथन भी दयानन्द के न्यायदर्शन के सिद्धान्तों से अपरिचय का ही द्योतक है, क्योंकि धर्म का आचरण करते रहने से भी जन्म-परम्परा चलती ही रह जायगी, तब दुःखो का अत्यन्त उच्छेद कैसे हो सकेगा? इसीलिये 'तदत्यन्त० ' इत्यादि से मोक्ष का लक्षण बताने वाले सूत्र मे दुःख से अत्यन्त विमुक्ति को ही मोक्ष बताया गया है । यहाँ परम आनन्द की प्राप्ति को अथवा परमात्मा की प्राप्ति को मोक्ष नही कहा गया है । इस सूत्र में 'तत्' पद से प्रकरण प्राप्त दुःख को ही पकड़ा जाता है । यहाँ भी केवल बाधा या परतन्त्रता के रूप में उपस्थित होनेवाला दुःख ही इससे गृहीत नही होता, किन्तु इस दुःख के सभी साधनो और उनसे संबद्ध सभी क्रियाकलापो का इसमे समावेश किया जाता है । इन सबसे छुटकारा मिलना ही अपवर्ग अथवा मोक्ष कहलाता है । प्रलयावस्था मे दुःखो से छुटकारा मिल जाने पर भी उसको अपवर्ग नही कहा जाता, क्योकि पुनः सृष्टि होने पर कर्माशयो के क्षीण न होने के कारण उनके अनुरूप शरीरादि से पुनः सम्बन्ध जुड जाता है और इस तरह से पुनः दुःख प्रभृति कीपरम्परालच पड़ती है । इस स्थिति का निवारण कराने के लिये ही यहाँ 'अत्यन्त' पद का प्रयोग किया गया है । इसलिये
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वेदार्थपारिजातः १३८० न सा बाधिका, किन्त्वत्यन्तग्रहणेन सर्वात्मना तद्वियोगाभिधानम् । अर्थाद् बुद्धिसुखदुःखेच्छाप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराणा- मष्टानामात्मगुणाना निर्मूलोच्छेद एवापवर्गः ॥ तदानीमात्मास्वरूपेणावतिष्ठते नान्यरूपेण, न वा सुखाद्यात्मना । तदुक्त न्यायमञ्जरीकृता जयन्तभट्टेन - 'ननु तस्यामवस्थाया कीदृगात्माऽवशिष्यते । स्वरूपैक प्रतिष्ठानः परित्यक्तोऽखिलैर्गुणे ॥ ऊर्मिषट्कातिगं रूपं तदस्याहुर्मनीषिणः । ससारबन्धनाधीनदुः खक्लेशाद्य दूषितम् ॥ ' इति । अन्येभ्यस्तु, शिलाशकलकल्पमपगत सकलसुखसंवेदन मोक्ष न रोचते, किन्तु सोपाधिकसावधिकपरिमितानन्द-निःस्यन्दात् स्वर्गादप्यधिक अनवधिकनिरतिशयनैसर्गिकानन्दसुन्दरमपरिम्लानसवेदनमेव मोक्षं मन्यन्ते । महत्त्ववदेव नित्यसुखमप्यात्मनः स्वाभाविकमेव रूपम् । संसारदशायामविद्यावरणेनानधिगतप्रायमपि तत्त्वज्ञानाभ्यासभावनाभिभूता-विद्यावरणस्त्वात्मा मोक्षे व्यज्यते । तदेतन्न क्षमन्ते न्यायतत्त्वविचक्षणाः, आत्मनो नित्यसुखसत्ताया प्रमाणाभावात् । ' विज्ञानमानन्द ब्रह्म' ( बृ० ३/ ९/ २८ ) इत्यादि श्रुतिस्त्वीश्वरपर्यवसायिनी न जीवविषया । न च प्रमाणान्तर तत्र क्रमते । नानुमानमपि लिङ्गानवलोकनात् । ननु प्रेक्षावता प्रयत्नो नाश्मकल्पमात्मानं सम्पादयितुमपि तु सुखसिद्धय एव कृष्यादि- प्रयत्नवदिति मन्तव्यम् इति चेत्तन्न विचारचारु, अनिष्टशान्तये व्याधिखेदिताना प्रयत्नदर्शनात् । 'न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति' ' अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशत:' ( छा० ८| १२| १ ) इति श्रुत्यापि स शरीरस्य प्रियाप्रिय-योरपहत्य सम्भवादेवाशरीरत्वाय प्रयतन्ते प्रेक्षावन्तः । अशरीरं चात्मानं प्रियाप्रिये न स्पृशत इति विज्ञायते । नन्वेतद्वचनं आत्यन्तिक दुख निवृत्ति को ही अपवर्ग बताया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि बुद्धि, सुख, दुख, इच्छा, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार आत्मा के इन आठ गुणो का जड सहित, कारणों के साथ उच्छेद कर देना ही मोक्ष कहलाता है । उस अवस्था में आत्मा अपने स्वरूप मे प्रतिष्ठित हो जाता है । वह न तो किसी दूसरे रूप मे उस समय रहता है और न सुखादि रूप में ही रहता है । जैसा कि न्याय मंजरीकार जयन्तभट्ट ने कहा है- "उस मोक्षावस्था मे किस तरह का आत्मा बचा रहता है? उस समय आत्मा अपने स्वरूप मे प्रतिष्ठित रहता है । उसके सारे गुण उस समय उससे अलग हो जाते है । आत्मा का यह स्वरूप छ प्रकार की ऊर्मियों से अतीत है । विद्वानों का कहना है कि उस समय आत्मा ससार के बन्धन मे डालने वाले दुःख क्लेश आदि से दूषित नहीं रहता ।" कुछ लोग शिलाखण्ड के समान सभी तरह के सुख संवेदन से अतीत इस तरह की नैयायिको की मोक्षावस्था को नही स्वीकार करते, किन्तु सोपाधिक एव सावधिक परिमित आनन्द के स्थान स्वर्ग से भी बढकर निरवधिक, निरतिशय, नैसर्गिक आनन्द से भरे कभी न मुरझाने वाले, कभी नष्ट न होने वाले आनन्द संवेदन को ही मोक्ष मानते है । महत्व के समान ही नित्य सुख भी आत्मा का स्वाभाविक स्वरूप है । संसार दशा में अविद्या का आवरण पडा रहने से इसकी प्रतीति नही होती, किन्तु तत्वज्ञान के अभ्यास से अविद्या का आवरण जब नष्ट हो जाता है, तो मोक्षावस्था में आत्मा का यह स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है । नैयायिक विद्वान् इस बात को नही स्वीकार करते, क्योकि आत्मा मे नित्यसुख की सत्ता में कोई प्रमाण नही है । ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियों में तो ईश्वर का स्वरूप बताया गया है, इनका जीव से सम्बन्ध नही है । आगम के सिवाय कोई दूसरा प्रमाण इसके स्वरूप की अधिगति मे समर्थ नहीं है । अनुमान भी यहाँ प्रवृत्त नही हो सकता, क्योकि इसके लिये कोई लिंग नही दिखाई पडता । प्रश्न उठता है कि कोई भी समझदार व्यक्ति अपने को शिलाखण्ड के समान नही बनाना चाहेगा । मनुष्य कृषि आदि के लिये जो कष्ट उठाता है, वह भी सुख की आकाक्षा से ही उठाता है, किन्तु यह शंका विचार करने पर ठीक नही मालूम पडती, क्योंकि रोग से पीडित व्यक्ति अनिष्ट व्याषि के निवारण के लिये भी प्रयत्न करता देखा जाता है । 'न वै' इत्यादि छान्दोग्य श्रुति में बताया गया है कि शरीर के रहते प्रिय और अप्रिय, सुख और दुख का नाश नही हो सकता, अशरीर हो जाने पर ही व्यक्ति को सुख और दुःख से छुटकारा मिल सकता । इसी लिये मोक्ष की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है कि शरीर छूट जाने पर उसको सुख और दुःख से भी छुटकारा मिल जायगा । यदि यह कहा जाय कि यह श्रुतिवचन धर्म और अधर्म से उत्पन्न सासारिक सुख और दुःख के ही नाश की बात बताया है, किन्तु यह कथन उचित इसलिये नही माना जायगा कि हम पहले ही यह सिद्ध कर चुके है कि लौकिक सुख से विलक्षण आत्मा मे किसी प्रकार के सुख की अवस्थिति नही है । 'विज्ञानमानन्दं ० ' इत्यादि श्रुतिवचन से भी आत्मा में नित्य आनन्द की स्थिति नही सिद्ध की जा सकती, क्योकि