वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 481–490
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 481–490
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वेदार्थपारिजात १३८१ सासारिकधर्माधर्मजनितसुखदुःखापघातबोधनपरमेवेति चेन्न, जोवात्मना तद्विलक्षणसुखाभावस्य साधितत्वात् । न च विज्ञानमानन्दमिति वचनेनात्मनो नित्यानन्दवत्त्वमिति वाच्यम्, तथात्वे नित्यविज्ञानवत्त्वमप्यनेन वचनेन सेत्स्यति । तथात्वे संसारदशायामपि नित्यसुखोपलब्धि स्यात् । तस्माद् दुःखाभाव एवानन्दोपचारो मन्तव्य । तदुक्तम्-' चिरज्वरशिरो-त्यादिव्याधिदु.खेन खेदिता । सुखिनो वयमद्येति तदपाये प्रयुञ्जते ॥ ' इति । मोक्षरम्यत्वाय तत्र नित्यज्ञानादिकल्पना युज्यते, अन्यथा नित्यदेहेन्द्रियादिकल्पनापत्ते | योगजोऽपि धर्मो नाक्षयिष्णुः, सर्वस्यैव कृतकस्यानित्यत्वदर्शनात् । न चानिर्वचनीयावरणाज्ञान नित्यविज्ञानानन्दमावरीतु समर्थम्, न बला-हकव्यूहपिहितोऽपि रविबिम्बो रजनीसदृशो भवति । मोक्षे नित्यसुखस्वभावे तद्रागेण प्रयतमानो मुमुक्षुर्न मोक्षमाप्तु शक्नोति । नहि रागिणा मोक्षः सम्भवति । न च दुःखनिवृत्त्यात्मके मोक्षे दुखद्वेषात्प्रयतमानस्य समानो दोष इति वाच्यम्, मुमुक्षो-द्वेषाभावात् । रागद्वेषौ हि ससारकारणमिति जानानो दुःख द्वेष्टि । ननु तथैव सुखेऽपि न रागवान् भविष्यतीति चेन्न, स्वर्ग- निर्विशेषेऽपवर्गे स्वर्गवद्रागस्य सम्भाव्यमानत्वात् । दुःखेन तु निर्विण्णस्य मुमुक्षोर्वैराग्यं भवति । दुःखविषयो द्वेषः । विरक्तस्य मोक्षं प्रति यत्नो भवति न द्वेष द्विषतः । यथा निरानन्दो मोक्षो न रोचते प्रेक्षावद्भ्यस्तथाप्यप्रामाणिकमानन्दमभ्यु-पगन्तु न शक्नुमः । वस्तुतस्तु संसारेऽपि सुख नास्त्येव । क्षुत्पिपासादिव्याधिप्रतीकार एव सुखोपचार । तृष्णाव्याकुलितः स्वादु सुरभि पयः पिबति । क्षुधार्तो मोदकान् भुङ्क्ते । रागाग्निव्याकुलितो वधूमाश्लिष्यति । ऐसा मानने पर आत्मा मे नित्य विज्ञान की स्थिति भी इसी वचन के आधार पर माननी पडेगी और तब संसार दशा मे भी नित्य सुख की उपलब्धि की आपत्ति उठ खडी होगी । इसीलिये उक्त श्रुति मे दुख के अभाव मे ही आनन्द शब्द का औपचारिक प्रयोग मानना उचित है । जैसा कि कहा गया है - "जीर्णज्वर, शिरोवेदना आदि व्याधियों से पीडित व्यक्ति इन रोगो के दूर हो जाने पर यह कहते देखे गये है कि आज हमे बहुत आराम है, हम सुखी है" । इससे यह सिद्ध होता है कि मोक्षावस्था में दुख के अभाव की स्थिति को आनन्द की अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार कर लेते है, वस्तुत उस अवस्था में सुख और दुख की ही नही, आत्माहो कुछदार्शनिक के किसी भी गुण की स्थिति नही रह जाती । मोक्ष की रमणीयता के लिये उसमें नित्य ज्ञान आदि की कल्पना करना भी ठीक नही है, ऐसा करने पर तो नित्य देह, इन्द्रिय आदि की भी कल्पना की जानी लगेगी । इस स्थिति को योगजन्य मानने पर भी नित्य नही माना जा सकता, क्योकि जो वस्तु कृतक है, प्रयत्न से साध्य है, वह कभी नित्य नही हो सकती । अनिर्वचनीय आवरणात्मक अज्ञान भी नित्यविज्ञान और आनन्द को ढकने में समर्थ नही हो सकते, क्योकि बादलो से घिर जाने पर भी सूर्य का बिम्ब रात की तरह आँखों से ओझल नही हो पाता, अर्थात् उसकी सत्ता बनी ही रहती है । उसी तरह से आत्मा मे नित्यविज्ञान और आनन्द मानने पर व्यवहार दशा मे भी उसकी सना का लोप नही होना चाहिये । अपि च, मोक्ष को यदि नित्य सुख स्वभाव माना जाता है, उसमे राग के कारण ही प्रवृत्ति होगी, ऐसी अवस्था मे राग की विद्यमानता मे मुमुक्षु मुक्त ही नही हो सकेगा, क्योकि रागी पुरुष को मोक्ष की प्राप्ति नही हो सकती । शंका उठ सकती है कि दुःख की निवृत्ति मोक्ष का स्वरूप माना जाता है, तब भी दुख से द्वेष होने के कारण मोक्ष में प्रवृत्ति होगी, तब द्वेष की स्थिति मे भी मोक्ष की प्राप्ति कैसी होगी? इस तरह से यहाँ भी उसी प्रकार का दोष विद्यमान है, किन्तु यह शंका भी उचित नही हैं, क्योकि मुमुक्षु मे द्वेष की स्थिति रहती ही नही | राग और द्वेष ही संसार के कारण है, ऐसा जानकर दुःख से द्वेष करता है । तब तो इसी तरह पुरुष सुख,,, से मे भी मुमुक्षु रागवान् नही होगा किन्तु ऐसा सम्भव नही है क्योकि मोक्ष को यदि स्वर्ग के समान ही मान लिया जाता है तो स्वर्ग की तरह ही मोक्ष मे भी राग की सम्भावना हो ही सकती है । दुख से तो निर्विण्ण होकर मुमुक्षु वैराग्य की ओर झुकता है, अतः दुःख में द्वेषबुद्धि मोक्ष के लिये प्रतिबन्धक नहीं है, किन्तु उसकी ओर बढने का उपाय है । शत्रु के प्रति द्वेष बुद्धि की तरह इस द्वेष की स्थिति नहीं है, जिससे कि दोषकोटि में इसकी गणना हो । यद्यपि निरानन्द मोक्ष कुछ विद्वानो को रुचिकर नही लगता, किन्तु उनकी खुशी के लिये हम अप्रामाणिक आनन्द को स्वीकार करने में समर्थ नही है । वास्तव में तो संसार में भी सुख की कोई स्थिति नही है, भूख, प्यास, रोग आदि का जो प्रतीकार किया जाता है, उसी को सुख मान लिया जाता है । प्यासा आदमी स्वादिष्ट सुगन्धि जल पीकर ब्रह्म हो जाता है, भूखा आदमी बड़े चाव से लड्डू खाता है, रोग से व्याकुल व्यक्ति वधू का आलिंगन करता है ।
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वेदार्थपारिजातः १३८२ अन्ये तु दुखेऽपि सुखसंवेदनान्न दुःखाभावाय सुखम्, निरभिलाषस्याप्यतर्कितोपनतसुखसाधनविषयसम्पर्के सुखा- नुभवादपि भावरूपमेव सुखम् | दुखाभावे सुखव्यवहारस्तु भाक्त एव । सुखदुःखबुद्ध्यादयस्त्वागन्तुका एवेति न महत्त्वव- त्सासिद्धिकाः, नित्यविज्ञानानन्दस्वभावस्त्वात्मा स्वाभाविक एवेति तदप्ययुक्तम्, अर्थविज्ञानातिरिक्तस्याज्ञानस्यासम्भवात् । तच्च सामग्र्यभावान्नैव मोक्षे सम्भवति । यदि दर्शनशक्तियोग्यतामात्रमेव पुंसश्चैतन्यमिति चेत्, तर्हि तथाविधस्य कैवल्यस्य नैयायिकाभिमतमोक्ष तुल्यत्वमेव । एकविंशतिप्रकारदुखध्वस एव मोक्ष इति स्वीकृती, कारणविभागेभ्यो जायमानो ध्वंसो न पुनः केनापि प्रति- योगिना भावेन निवर्त्यते, तदनिवृत्ती ध्वसध्वंसाभावेन न मुक्तस्य पुनः ससारापत्तिः । सादिरनन्तोऽभावो ध्वसो भवति । तथा चात्यन्तिकदुःखध्वसस्यानन्तत्वेन न मोक्षस्यानित्यत्वसम्भवति । अन्येत्वशेषविशेषगुणध्वसावधिकदुःखप्रागभावमेव मोक्ष मन्यन्ते । न चायमसाध्यत्वादपुरुषार्थ इति वाच्यम्, कारणविघटन मुखेन प्रागभावस्यापि साध्यत्वोपपत्ते । न चैव प्रागभावस्य साध्यत्वे तस्यानादित्वव्याहतिरिति वाच्यम्, प्रतियोगिजन कावच्छेदकत्वेनैव तस्यानादित्वात् । न च तस्य कारणत्वेऽपि कार्यावश्यं भावित्वम्, चरमसामग्र्याः सत्त्व एव कार्यावश्यम्भावित्वनियमात् । न च प्रागभावस्य चरमसामग्रीत्वम् तेन तत्सत्त्वेऽपि न कार्यावश्यभावित्वम् । जनकत्वमा प स्वरूपयोग्यतामात्रम्, तेन यथा सहकारिविरहादिदानी यावत् कार्यं नाजीजनत् तथैवाप्तेऽपि तद्विरहान्न जनिष्यति । हेतु- च्छेदे पुरुषव्यापारादिति वचनस्यापि प्रागभावपरिपालन एव तात्पर्यात् । अत एव दुःखजन्मप्रवृत्तीति सूत्रोक्तं कारणाभावा- अन्य विद्वानों का कहना है कि कभी-कभी दुख में भी सुख की प्रतीति होती है, अतः दुख का अभाव सुख नही कहा जा सक्ता । कभी कभी बिना इच्छा के हो अचानक सुख के साधक विषयों से सम्पर्क हो जाने पर सुख का अनुभव होता है । इससे यह सिद्ध होता है कि सुख भावरूप ही है । दुख के अभाव मे सुख व्यवहार औपचारिक ही माना जायगा । सुख, दुख, बुद्धि प्रभति आगन्तुक गुण है, अत आत्मा मे महत्त्व की तरह इनकी स्वाभाविक स्थिति नही मानी जा सकती । नित्य विज्ञान और नित्य आनन्द आत्मा का स्वाभाविक स्वरूप है । किन्तु यह सारा कथन भी असंगत है, क्योकि अर्थ के विज्ञान के अतिरिक्त ज्ञान की स्वतन्त्र कोई स्थिति नही रहती । अर्थ का विज्ञान सामग्री के अभाव में मोक्षदशा में रह ही नही सकता । यदि आप दर्शन शक्ति की योग्यता मात्र को ही पुरुष का चैतन्य मानते हो तो इस तरह का कैवल्य तो नैयायिको के द्वारा स्वीकृत मोक्ष के समान ही है, इसको मानने में हमे भी कोई आपत्ति नही है । इक्कीस प्रकार के दुखो का ध्वंस ही मोक्ष है, ऐसा मानने पर कारणो के विभाग से उत्पन्न होने वाला ध्वंस फिर कभी किसी भी प्रतियोगी अभाव से निवृत्त नहीं होता और इसकी निवृत्ति न होने से अर्थात् इस ध्वंस का पुनः ध्वंस न होने से एक बार मुक्त हुए जीवात्मा को पुनः संसार मे नही आना पडता । जिसका आदि तो हो, किन्तु अन्त न हो, इस तरह के अभाव को ध्वंसक कहा जाता है । इस तरह से आत्यन्तिक दुख ध्वंस का कभी अन्त नही होता, अतः मोक्ष के अनित्य होने का कोई प्रसंग ही नही है । अन्य दार्शनिक समस्त विशेष गुणों के ध्वंस हो जाने के बाद दुःख के प्रागभाव को ही मोक्ष मानते हैं । इस प्रकार की स्थिति प्रयत्न साध्य नही है । अतः पुरुषार्थ नही मानी जा सकती, इस शंका का समाधान यह है कि कारण का विघटन करने के लिये प्रागभाव की भी साधना बन ही सकती है । प्रागभाव को साध्य मानने पर उसको अनादि कैसे माना जा सकता है? इस शंका का समाधान यह है कि उसकी अनादिता इसी में है कि वह केवल अपने प्रतियोगी का जनक ही है, वह स्वयं किसी से जन्य नही है । जब वह किसी का कारण है तो किसी का कार्य भी होगा ही, ऐसा नही कहा जा सकता, क्योकि चरम सामग्री की विद्यमानता में ही कार्यता बन सकती । प्रागभाव में चरम सामग्री की सत्ता नहीं है, अतः उसके रहते हुए भी उसमें कार्यता नहीं मानी जाती । जनकता का तात्पर्य भी स्वरूपयोग्यता मात्र है । इसलिये जैसे सहकारी के अभाव से उसने आज तक कार्य नही पैदा किया, उसी तरह से सहकारी के अभाव के ही कारण वह आगे भी कार्य को पैदा नही करेगा । 'हेतुच्छेदे पुरुषव्यापारात्' इस वचन का भी प्रागभाव के इसी
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वेदार्थ पारिजातः १३८ त्कार्याभावाभिधानं प्रागभावरूपामेव मुक्ति द्रढयति । दोषापाये प्रवृत्त्यभाव:, प्रवृत्यभावे जन्माभावः, जन्मापाये दुःखापा ., इत्यत्र नापायोध्वस किन्त्वनुत्पत्तिरेव । तत्त्वज्ञानात्ससारहेतोः सवासनस्य मिथ्याज्ञानस्योच्छेदे पुनर्न कदाचिर्दा दु.खोत्पत्तिः सम्भवति । तत्त्वज्ञानार्थ योगविध्यादौ पुरुषप्रवृत्त्या पुरुषार्थत्वमपि मोक्षस्योपपद्यते । सांख्ययोगवेदान्तरीत्या तु पुरुषस्य नित्यमुक्तत्वाङ्गीकारेण स्वरूपावस्थानरूपस्य सोक्षस्य नित्यत्वं भविष्यति ' असङ्गो ह्यय पुरुष:' ( बृ० ४| ३ | १५ ) इति श्रुते । मीमासकास्तु स्वर्गादिरूपामेव मुक्ति मन्यन्ते । दयानन्दस्तु मीमासकसम्मत मपि मोक्षनाङ्गीकरोति । सत्यार्थप्रकाशस्य नवमसमुल्लासे सर्गप्रलययो. षट्त्रिंशत्कृत्वो यावान् काल स एव मोक्षकाल. तावत्पर्यन्त जीवो मुक्तावानन्द भुनक्ति । परमत्र प्रकरणे तु पुरुषार्थशून्यानां गुणाना प्रतिप्रसव इत्यादियोगसूत्रव्याख्या शुद्धस्वरूपपरमेश्वरस्य सच्चिदानन्दस्वरूपे नित्यावस्थानमेव कैवल्यमोक्ष इत्युक्तम् । एतेन न केवल शास्त्रविरोध किन्तु तस्य स्वोक्तिविरोधश्च । यदि दुखनिवृत्तिपूर्वकसुखाप्तिरूपा काचिदात्मावस्थैव मुक्तिस्तदा संसारदशायामपि मुहि प्रसङ्गः स्यात् । तत्रापि कदाचिद् दुःखनिवृत्तिपूर्वकस्यानन्दस्य सत्त्वाविशेषात् । न च निरुक्तकालावधिकस्यैतादृशर सुखस्यैव मोक्षरूपतेति ससारदशावैलक्षण्यमिति वाच्यम्, तत्र प्रमाणाभावात् । यत्तु - "अभाव बादरिराह - ह्यवम्, ''भावभाव जैमिनिर्विकल्पामननात्जैमिनिर्विकल्पामननात्,, 'द्वादशवदुभयविध बादरायणोऽत ( ब्र० सू० ४ | ४| १० - १२) इति सूत्राण्याश्रित्योक्तम्, मुक्तो जीवः शुद्धेन मनसा परमेश्वरीये परमानन्दे मोक्षे तिष्ठ तदुभाभ्या भिन्नानामिन्द्रियादिपदार्थानामभावो भवतीति वादरिमतम् । यथैव मोक्षे मनो भवति' तथैव शुद्धसङ्कल्पर शरीर शुद्धप्राणेन्द्रियादिशक्तयश्च सर्वदैव तिष्ठन्ति । स 'एकधा भवति, द्विधा भवति त्रिधा भवतीति' श्रुतिवचनेभ्य स्वरूप के परिपालन में तात्पर्य है । इसीलिये ' दु खजन्म० ' इत्यादि सूत्र मे जो कारण के अभाव से कार्य के अभाव की बात कही गई उससे भी इस प्रागभाव रूप मुक्ति के स्वरूप को ही समर्थन मिलता है । दोष के हट जाने पर प्रवृत्ति का अपाय, प्रवृत्ति के अभाव जन्म का अपाय, जन्म के अभाव में दुख का अपाय, यहाँ अपाय का अर्थ ध्वस न होकर अनुत्पत्ति है । तत्त्वज्ञान से संसार के कार मिथ्याज्ञान का वासनाओं के साथ नाश हो जाने पर फिर कभी भी दुःख की उत्पत्ति नही हो सकती । इस तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लि योगशास्त्र प्रदर्शित विधियों का पुरुष को सहारा लेना पडता है, अत मोक्ष की प्राप्ति के लिये पुरुषार्थ करना ही पडता है । साख्य, योग और वेदान्त मत के अनुसार तो पुरुष नित्यमुक्त है, अत • अपने स्वरूप में अवस्थिति होने से ही यह नि माना जायगा । ' असङ्गो ह्यय पुरुष ' यह पुरुष सासारिक विषय-वस्तुओ के साथ कभी अनुषक्त नही होता, यह श्रुति ही इसमें प्रम है । मीमासक स्वर्गप्राप्ति का ही नाम मुक्ति बताते हैं । दयानन्द इस मीमांसक संमत मुक्ति को भी नही मानते । सत्यार्थप्रकाश के न समुल्लास में बताया गया है कि सृष्टि और प्रलय की छत्तीस आवृत्ति पर्यन्त मोक्ष की स्थिति रहती है । इतने समय तक जीव मुक्ति आनन्द का अनुभव करता है । किन्तु इस प्रकरण में दयानन्द 'पुरुषार्थशून्याना०' इत्यादि योगसूत्र की व्याख्या करते समय शुद्ध स्व. परमेश्वर के सच्चिदानन्द स्वरूप में नित्य अवस्थिति को ही कैवल्य मोक्ष मानते है । इस तरह से दयानन्द की मोक्ष को सार्वाधिक मा की बात केवल शास्त्रविरुद्ध ही नहीं, अपितु अपनी इस उक्ति के भी विपरीत पडती है । यदि दुःख की निवृत्ति के साथ सुख की प्रा रूप आत्मा की अवस्था ही मुक्ति मानी जाय, तब तो संसार में स्थिति रहने पर भी मुक्ति मिल सकती है, क्योकि यहाँ पर भी ऐ स्थिति कभी न कभी बनती ही रहती है । यदि आप कहे कि ऊपर बताई गई अवधि तक इस प्रकार की स्थिति रहने पर ही उस मुक्ति का नाम दिया जा सकता है, किन्तु आपके इस कथन में कोई प्रमाण नही है । इसके आगे दयानन्द ने वेदान्त दर्शन के ' अभावं वादरि०' इत्यादि तीन सूत्रो को उद्धृत कर कहा है — " लब जं मुक्तदशा को प्राप्त होता है, तब वह शुद्ध मन से परमेश्वर के साथ परमानन्द मोक्ष में रहता है और इन दोनों से भिन्न इन्द्रिया पदार्थों का अभाव हो जाता हैं । यह मत व्यास जी के पिता आचार्य बादरि का है । व्यास जी के मुख्य शिष्य जैमिनि का मत यह है-जैसे मोक्ष में मन रहता है, वैसे ही शुद्ध संकल्पमय शरीर तथा प्राण आदि और इन्द्रियो की शुद्ध शक्ति भी बराबर बनी रहती है क्योंकि उपनिषद् में 'स एकधा भवति०' इत्यादि वचनों का प्रमाण है कि मुक्त जीव संकल्पमात्र से ही दिव्य शरीर रच लेता है अ
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वेदार्थपारिजातः १३८४ मुक्तात्मान. सङ्कल्पमात्रेण दिव्यानि शरीराणि रचयन्ति स्वेच्छया च त्यजन्तीति जैमिनिमतम् । मुक्तौ क्लेशाज्ञानाशुद्धि- दोषाणामभाव. परमानन्दज्ञानशुद्धतादिसत्यग्णाना भावश्च भवति । तत्र दृष्टान्तः - यथा वानप्रस्थाश्रमे द्वादशाहादिप्राजा- पत्यव्रतेषु स्वरुपभोजनात् क्षुधाया अभाव. पूर्णभोजनाभावाद् भावश्च भवति, तथैव मोक्षे भावाभावसामञ्जस्यं ज्ञेय- मिति बादरायणमतम्' इति, तत्त्पहासास्पदमेव निष्प्रमाणत्वात् । असम्बद्धत्वाच्च । नानाविधाना भावाभावाना प्रसक्तौ विनिगमनाविरहात् तदुक्त भावाभावानामप्रामाणिकत्वमेव । किश्च } समानविषय एवान्यमतोपन्यासेन स्वमतोपन्यासो युक्तः, । न विषयभेदेन । शब्दो नित्य इति मीमांसकाः । बुद्धिरनित्येति नैयायिका इति नोपन्यासार्हो मतभेदस्तस्य भिन्नविषय- त्वात् । तेन बादरिमतेन शरीरेन्द्रियाभावः, जैमिनिमतेन शरीरेन्द्रियादिभाव, बादरायणमतेन सत्यसङ्कल्पत्वात् शरीरादि- सङ्कल्पे सति भाव, तदभावेऽभाव इत्युभयमपि श्रुतिबलात् सङ्गच्छते ॥ तथाहि -' सङ्कल्पादेवास्य पितर समुत्तिष्ठन्ति' (छा० ८२२१ ) इति श्रुते. मन सङ्कल्पसाधन सिद्धम् । विदुष शरीरेन्द्रियाणि सन्ति न वेति विचार्यते । तत्र बादरेराचार्यस्य रीत्या महीयमानस्य विदुषः शरीरेन्द्रियाणामभाव एव भवति । कस्मात्, तथैवाम्नानात् । ' मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ' (छा० ८| १२| ५ ) ' ये एते ब्रह्मलोके' (छा० ८ | १३ | १ ) । तत्र यदि शरीरेन्द्रियैश्च विहरेत् तदा मनसेति विशेषणं व्यर्थमेव स्यात् । तस्मान्मोक्षे शरीरेन्द्रियाणामभावः । जैमिन्याचार्यस्तु मोक्षे सेन्द्रियस्य शरीरस्य भाव एवेति मन्यते । यत 'स एकधा भवति...त्रिधा भवति' (छा० ७ २६।२) इत्यनेकधा विकल्पः श्रूयते । नहि शरीरेन्द्रिय- भेदमन्तराऽनेकविधता सम्भवति । मनसेति केवलमनोविषयां 'स एकधा भवति त्रिधा भवति' इति शरीरेन्द्रियविषया च श्रुतिमनुसृत्य बादरायणाचार्य उभयविधत्वं साधु मन्यते । यदा स सशरीरता सङ्कल्पयति तदा सशरीरो भवति यदा इच्छामात्र से ही शीघ्र छोड भी देता है तथा शुद्ध ज्ञान का सदा प्रकाश बना रहता है । स्वयं व्यास जी का मत यह है— मुक्ति में क्लेश, अज्ञान और अशुद्धि आदि दोषो का सर्वथा अभाव हो जाता है और परमानन्द, ज्ञान, शुद्धता आदि सब सत्यगुणों का भाव बना रहता है । इसमे दृष्टान्त भी दिया है कि जैसे वानप्रस्थ आश्रम मे बारह दिन का प्राजापत्य आदि का व्रत करना होता है, उसमें थोडा भोजन करने से क्षुधा का थोडा अभाव और पूर्ण भोजन न करने से क्षुधा का कुछ भाव भी बना रहता है । इसी प्रकार मोक्ष में भी पूर्वोक्त रीति से भाव और अभाव का सामंजस्य समझ लेना” ( पृ० २१४ ) ये सारी बातें उपहासास्पद है, क्योकि इनमें कोई प्रमाण नही है और ये परस्पर असंबद्ध भी हैं । नाना प्रकार के भावों और अभावो की प्रसक्ति का कोई कारण भी प्रतीत नही होता और साथ ही उनके बताये भावों और अभावो की स्थिति में कोई प्रमाण भी नही है । अपि च, समान विषय होने पर ही दूसरे के मत का उपन्यास करने के बाद उस पर अपना मत प्रकाशित करना चाहिये, विषय की भिन्नता मे ऐसा नही किया जा सकता । मीमापक के मत से शब्द नित्य है और नैयायिक के मत से बुद्धि अनित्य, तो इस तरह के मतभेद की चर्चा करने का कोई तुक नही है, क्योंकि इनका विषय भिन्न है । इसी तरह से बादरि आचार्य के मत से शरीर, इन्द्रिय आदि का अभाव, जैमिनि के मत से इनका भाव और बादरायण के मत से शरीर आदि का संकल्प रहने पर इनकी सत्ता और न रहने पर इनका अभाव, इस तरह से ये सभी पक्ष श्रुति के प्रमाण के आधार पर संगत ही माने जायेंगे । जैसे कि "संकल्प से ही इसके पितृगण ऊपर उठते हैं " इस श्रुति के प्रमाण से मन संकल्प का साधन है, यह बात सिद्ध होती है । विचारणीय विषय यह है कि आत्मविद् में शरीर, इन्द्रिय आदि की स्थिति रहेगी अथवा नही? बादरि आचार्य के मत से महान् ब्रह्मवेत्ता के शरीर, इन्द्रिय आदि की स्थिति नही मानी जाती, क्योकि शास्त्र मे ऐसी ही स्थिति वर्णित है । छान्दोग्य श्रुति में ब्रह्मवेत्ता के मनोविहार की बात वर्णित है । यदि वह शरीर और इन्द्रियो के साथ भी विहार करता हो तो ऐसी स्थिति में मन को विहार के विशेषण के रूप में उपस्थित करना व्यर्थ हो जायगा । इसलिये यह स्पष्ट है कि मोक्ष दशा में शरीर इन्द्रिय आदि की स्थिति नहीं रहती । जैमिनि आचार्य मोक्षदशा में इन्द्रियो के साथ शरीर की भी स्थिति मानते हैं, क्योकि 'वह एकधा, द्विघा, त्रिधा बन जाता है' इत्यादि श्रुति में उसकी अनेक प्रकार की स्थिति वर्णित है । जब तक शरीर, इन्द्रिय आदि का भेद नही माना जायगा, तब तक उसकी अनेकविधता कैसे सम्भव हो सकेगी । उक्त दोनो प्रकार की श्रुतियो के मिलने से बादरायण आचार्य इन दोनों ही स्थितियों को सही मानते है । जब वह संकल्प करता है कि मैं सशरीर रहूँ तो उसके शरीर, इन्द्रिय
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वेदार्थपारिजात १३८५ , त्वशरीरतां तदाऽशरीरो भवति सत्यसङ्कल्पत्वात् द्वादशाहवत् । यथा द्वादशाहः सत्रमपि भवति अहीनश्च भवति तद्वत् । स्पष्टीकृतमेतद्भामतीकृता -'द्वादशाहस्य सत्रत्वमासनोपायि चोदने । अहीनत्वं च यजति चोदने सति गम्यते ॥ ' इति । 'द्वादशाहमृद्धिकामा उपेयुरित्युपायिचोदनेन य एव विद्वास. सत्रमुपयन्ती' ति च द्वादशाहस्य सत्रत्वामुक्तम् । बहुकर्तृक- त्वेन सत्रत्वम् । आसनोपायिचोदनयोरन्यतरस्य सत्रलक्षणत्वात् । सप्तदशावराश्चतुर्विंशतिपरमा सत्रमासीरन्निति द्वादशाह- प्रकरणे मासि चोदनं द्रष्टव्यम् । तस्यैव द्वादशाहेन प्रजाकामं याजयेदिति यजतिचोदनेन नियतकर्तृकपरिमाणत्वे द्विरात्रेण यजेतेत्यादिवदहीनत्वमपि गम्यते । अहर्गणत्वे सति नियतकर्तृपरिमाणत्वमहीनलक्षणमुक्तम् । अत एवैकाहे ज्योतिष्टोमादो एककर्तृके यजतिचोदनाचोदिते नातिव्याप्ति । विस्तरस्तु कल्पतरुपरिमलयोर्द्रष्टव्यः । नैतैः सूत्रैर्दयानन्दाभिमतो नियतकालपरिमितः सुखोपभोगरूपो मोक्षः सिद्धयति । उक्तसूत्राण्यपि सालोक्या- द्यपरमुक्तिपराण्येव न कैवल्यमोक्षपराणि ' सम्पद्याविर्भाव स्वेनशब्दात्' ( ब्र० सू० ४| ४ | १ ), ' मुक्तः प्रतिज्ञानात्' (ब्र० सू० ४/४/२) 'आत्मा प्रकरणात्' (ब्र० स० ४| ४ | ३) । 'अविभागेन दृष्टत्वात्' ( ब्र० सू० ४ | ४ | ४ ) ' इत्येभिः सूत्रैः केवल्य- मोक्ष उक्त । तथाहि 'एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( मैत्रायणी- उप० २।२) इति श्रूयते । तत्रैवं संशय. -कि शरीरात्समुत्थाय देवलोकादिष्विव केनचिदागन्तुकेन विशेषेणाभिनिष्पद्यते? आहोस्विदात्ममात्रेणेति? तत्र मोक्षस्यापि फलत्वप्रसिद्धया 'अभिनिष्पद्यते' इत्यस्योत्पत्तिपर्यायत्वाच्च केनचिद्विशेषेणेति प्राप्ते सिद्धान्तः । केवलेनात्मनैवाभिनिष्पद्यते न धर्मान्तरेण । कुतः? स्वेनशब्दात् । ' स्वेन ' रूपेणाभिनिष्पद्यते इत्यत्र स्वशब्दात् । आदि हो जाते है और जब वह चाहता है कि मैं अशरीर रहूँ तो उसके शरीर, इन्द्रिय आदि छिप जाते है, क्योकि उसका संकल्प सत्य होता है । द्वादशाह के समान ही इसकी भी व्यवस्था मानी जाती है । अर्थात् द्वादशाह जैसे सत्र भी माना जाता है और अहीनयाग भी, उसी तरह से इन दोनो स्थितियो को भी व्यवस्था मानने मे कोई बाधा नही है । इस विषय को 'द्वादशाहस्य सत्रत्व' इत्यादि श्लोक के द्वारा भामतीकार ने स्पष्ट किया है । 'द्वादशाहमृद्धिकामा उपेयु.' इस उपायि चोदनावाक्य और 'य एव विद्वासः सत्रमुपयन्ति० ' इस श्रुति- वाक्य के आधार पर द्वादशाह एक सत्र है, यह प्रतीत होता है । अनेक व्यक्तियो के द्वारा यह सम्पादित होता है, इसलिये इसको सत्र कहते हैं । इसी तरह से 'द्वादशाहेन प्रजाकाम याजयेत्' इस विधिवाक्य के आधार पर कर्त्ता के नियत हो जाने पर ' द्विरात्रेण यजेत' इत्यादि विधिवाक्यो की तरह इस द्वादशाह की अहीनयागता भी मानी जाती है । अहीन का लक्षण यह है कि याग अनेक दिन तक चलता रहता है, किन्तु इसके अनुष्ठाता नियत रहते है । इसीलिये एकाह सम्पाद्य ज्योतिष्टोम प्रभृति याग में और एककर्तृक यजति चोदना से संपाद्य याग मे इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती । कल्पतरु और परिमल व्याख्या में इस विषय को विस्तार से देखा जा सकता है । इन सूत्रो से भी दयानन्द के द्वारा स्वीकृत एक निश्चित अवधि तक सुखोपभोग की स्थितिवाला मोक्ष नही सिद्ध हो पाता । ऊपर उद्धृत सूत्र भी सालोक्य आदि भेदवाली मुक्ति का हो वर्णन करते है, कैवल्य मोक्ष का नही । कैवल्य मोक्ष का प्रतिपादन तो ' सम्पद्याविर्भावः ० ' इत्यादि सूत्रों में किया गया है । जैसे कि मैत्रायणी उपनिषद् में 'एवमेवैष ०' इत्यादि श्रुति वचन मिलता है । इसके विषय में यह शंका उठती है कि इस स्थूल शरीर को छोड़ देने के बाद यह आत्मा देवलोक आदि की तरह किसी आगन्तुक विशेषता से सम्बद्ध हो जाता है अथवा केवल अपने स्वरूप में ही अवस्थित रहता है? मोक्ष भी एक प्रकार का फल ही है और 'अभिनिष्पद्यते' यह क्रिया उत्पत्ति को ही प्रदर्शित करती है; अतः उस अवस्था मे इसका कोई विशेष रूप अभिव्यक्त होता है, ऐसा माना जाना चाहिये । इस पर सिद्धान्ती का कहना है कि ऐसा नही माना जा सकता, किन्तु आत्मा उस अवस्था में केवल अपने स्वात्मस्वरूप में ही प्रतिष्ठित रहता है, क्योंकि यहाँ 'स्व' शब्द रखा गया है । ' स्वेनरूपेण' यहाँ स्व शब्द का अर्थ है कि इस मोक्षावस्था में आत्मा अपने स्वरूप से ही रहता है । स्व शब्द को यहाँ आत्मीय अर्थ में प्रयुक्त नही माना जा सकता, क्योंकि आत्मीयता को बताने की कोई आवश्यकता नही पड़ती । जिस किसी रूप में वह निष्पन्न होता है, वह आत्मीय तो अपने आप हो ही जाता है । स्व शब्द आत्मपरक मानने पर तो
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वेदार्थपारिजात. १३८६ तथा च स्वरूपावस्थानमेव मोक्षः । न चात्मीयपर स्वशब्द, तस्यावचनीयत्वात् । येनापि रूपेण निष्पद्यते तस्यात्मीयत्वा- विशेषात् । स्वशब्दस्यात्मपरत्वे तु केवलेनात्मरूपेणाभिनिष्पद्यते नान्येनागन्तुकेनेति स्वशब्दस्यार्थवत्त्वात् । ' मुक्तः प्रतिज्ञानात्' ( ब्र० सू० ४ ४ २) । स सर्वबन्धविनिर्मुक्त शुद्धेनात्मनैवावतिष्ठते । कुत? प्रतिज्ञानात् । 'एवं स्वेव ते भूयोनुव्याख्यास्यामि' ( छा० ८/ ९ / ३.८/ १०१४.८।११।३० ) इत्यवस्थात्रयविहीनमात्मान व्याख्येयत्वेन प्रतिज्ञाय ' अशरीरं वाव सन्त नैनं प्रियाप्रिये स्पृशत ' ( छा० ८| १२| १ ) इति चोपन्यस्य ( स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ', स उत्तम: पुरुष ' (छा ० ८।१२।३) इत्युपसहारात् । उपक्रमेऽपि 'य आत्मापहतपाप्मा' (छा० ८/७/१ ) इति मुक्तात्मविषयमेव प्रतिज्ञानम् । फलत्व-, प्रसिद्धिस्तु बन्धनिवृत्तिमात्रापेक्षा । यथा रोगनिवृत्तावरोगोऽभिनिष्पद्यते तथैव पूर्वावस्थापेक्षयैव सर्वोपाधिनिवृत्तावात्मा स्वरूपेणाभिनिष्पद्यते इत्युत्पत्तिव्यपदेशोऽपि नासङ्गतः । ननु ' पर ज्योतिरूपसम्पद्येति' ज्योति शब्देन भौतिकज्योतिरेव गृह्यते । तथा च भौतिकज्योति प्राप्तिरेव मुक्ति- रिति, तत्राह- आत्मा प्रकरणात्' ( ब्र० स० ४ ४ ३ ) | आत्मैवात्र ज्योति. पदार्थो न भौतिकज्योति, कुत । प्रकरणात् । 'य आत्मा अपहतपाप्मा विजरो विमृत्यु.' (छा० ८/७/१ ) इति परमात्मन. प्रकृतत्वात् । तद्देवा ज्योतिषा ज्योति ' (बृ० ४| ४| १६ । इति- ज्योतिः शब्देनात्मग्रहणात् । ' ज्योतिदर्शनाच्च' (ब्र ० सू० १/३/४ ) इत्यादी ज्योति शब्दस्य आत्मपरत्व निर्णयाच्च । तत्रापि य. पर ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स परमात्मन पृथगेव भवति, उताविभागेनेति पर्यालोचने ' स तत्र पर्येति' (छा० ८०१२( ३) परं ज्योतिरूपसम्पद्य इत्यधिकरणाधिकर्तव्यस्य कर्मकर्तृभावस्य चोपदेशात् भेदेनैव स्थानमिति पूर्वपक्षय्य सिद्धान्तमाह — अविभागेन दृष्टत्वात् । परमात्मस्वरूपेणैव मुक्तोऽवतिष्ठते दृष्टत्वात् ' अह ब्रह्मास्मि' (बृ० १ ४ १० ), ' तत्त्व- मसि' (छा० ६/८/७) ' यत्र नान्यत्पश्यति' (छा० ७१२४| ११ ) इत्यादि वाक्यान्यभेदैनैवात्मानं दर्शयन्ति । भेदनिर्देशस्त्वभेदेऽपि उसकी यह सार्थकता है कि वह आत्मा केवल स्वात्मस्वरूप से ही अभिव्यक्त होता है, किसी आगन्तुक धर्म के साथ नही, इस बात का स्पष्ट बोध उससे हो जाता है । 'मुक्त. प्रतिज्ञानात्' इस द्वितीय सूत्र का अर्थ यह है कि वह आत्मा समस्त बन्धनो से मुक्त होकर शुद्ध स्वात्मस्वरूप मे ही वहाँ अवस्थित रहता है, क्योकि श्रुति मे इसी स्वरूप को बताने को प्रतिज्ञा की गई है । छान्दोग्य श्रुति में 'एव त्वेव' इत्यादि वाक्यों मे तीनों अवस्थाओं से मुक्त आत्मा के स्वरूप की व्याख्या करने की प्रतिज्ञा की गई है और उसके बाद ही अशरीर आत्मा के प्रिय और अप्रिय का स्पर्श न होने की बात बताकर उपसंहार में अपने स्वरूप मे उसके प्रतिष्ठित होने की बात कही गई है । उपक्रम मे भी मुक्तात्मा का विषय ही प्रतिपादित है । मोक्ष को तो फल कहा जाता है, वह इसलिये है कि यहाँ बन्धनों की निवृत्ति हो जाती है । जैसे रोग के निवृत्त हो जाने पर मनुष्य स्वस्थ अपने आप हो जाता है, उसी तरह से बन्धन के निवृत्त हो जाने से सब व्याधियों की निवृत्ति हो जाने पर अपने स्वरूप मे वह अपने आप प्रतिष्ठित हो जाता है । अत बन्धन की निवृत्ति में ही फल की व्याप्ति मानी जाती है, स्वरूप प्रतिष्ठा मे नही । इसीलिये इस स्वरूप की अभिव्यक्ति को उत्पत्ति नाम देने में भी किसी प्रकार की आपत्ति या असगति नही उठ पाती । शका उठती है कि ' परंज्योतिरूपसम्पद्य' इस श्रुतिवाक्य में ज्योति शब्द से भौतिक ज्योति का ही ग्रहण होता है । इस तरह से इस भौतिक ज्योति की प्राप्ति को ही मुक्ति कहा जायगा? इस शंका का उत्तर 'आत्माप्रकरणात्' इस सूत्र से दिया गया है । अर्थात् इस प्रकरण में ज्योति पद से आत्मा का ही ग्रहण होगा, भौतिक ज्योति का नही, क्योकि यहाँ परमात्मा की ही चर्चा चल रही है । 'तद्देवा०' इत्यादि श्रुतिवाक्य में भी ज्योति पद से आत्मा का ही बोध होता है । इसके अतिरिक्त 'ज्योतिर्दर्शनाच्च' इत्यादि अधिकरण मे ज्योतिः शब्द का अर्थ आत्मा ही निर्धारित है । वहाँ भी यह शंका उठाई गई है कि परम ज्योति को प्राप्त कर जो अपने रूप मे प्रतिष्ठित होता है, वह परमात्मा से पृथक् है या अभिन्न? तब पूर्वपक्ष में यह बताया गया है कि यहाँ कर्मकर्तृभाव का उपदेश होने से इसकी स्थिति परमात्मा से भिन्न ही है, किन्तु अन्त मे सिद्धान्त यह स्थिर किया गया है कि ' अहं ब्रह्मास्मि', 'तत्त्वमसि' इत्यादि श्रुति वचनों के प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि मुक्त आत्मा परमात्मा के स्वरूप से ही, उससे अभिन्न रूप से ही उस स्थिति में रहता है ।
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वेदार्थपारिजात १३८७ सम्भवत्युपचारात् । ' स भगव. कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्ति' (छा० ७।२४ १ ) ' आत्मरतिरात्मक्रीड ' (छा० ७/२५/२ ) इत्येवमादिदर्शनात् । तत्राप्यय विचार. -स्वरूप ब्राह्ममपहतपाप्मत्वादिसत्यसङ्कल्पावसान सर्वज्ञत्व सर्वेश्वरत्व च तेन रूपेणाभि- निष्पद्यत इति जैमिनिराचार्यो मन्यते ॥ कुतः? उपन्यासादिभ्यस्तथावगमात् । 'य आत्मा अपहतपाप्मा' (छा० ८| ७| १ ) ' सत्यसङ्कल्पः ' (छा० ८| ७| १ ) इत्युपन्यासेनात्मन एव रूपत्वावगमात् । स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाण ' (छा० ८।१२।३ ) ' तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति' (छा० ७/२५/२ ), ' सर्वज्ञ. सर्वेश्वर. ' (माण्डूक्योप० ६ ) इत्येवमादिभिरप्युपन्यासैस्तथा- भूतमेव स्वं रूप गम्यते । 'ब्राह्मण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः' ( ब्र० सू० ४/४/५ ) तदुपरि च औडुलोमिमतबोधकं सूत्रम् ' चिति तन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमि. ( ब्र० सू० ४ ४ ६ ) । यद्यप्यपहतपाप्मत्वादयो भेदे नैव धर्मा निर्दिश्यन्ते, तथापि शब्दविकल्पजा एवैते पाप्मादिनिवृत्तिमात्रत्व पर्यवसायित्वात् । चैतन्यमेवात्मन स्वरूपमिति तद्रूपेणाभि- ' ' ( | | ). | निष्पत्तिर्मन्तव्या । एव वा अरेऽयमात्मानन्तरो बाह्य कृतज्ञ प्रज्ञानघन एव बृ० ४ ५ १३ इति श्रुतिभ्य ,, सत्यकामत्वादयस्तु यद्यपि वस्तुत्वेनैव धर्मा उच्यन्ते सत्या कामा अस्येति तथाप्युपाधिसम्बन्धाधीनत्वात् तेषां न चैतन्यवत् स्वरूपमात्रत्वसम्भव, अनेकाकारत्वप्रतिषेधात् । 'न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गम्' ( ब्र ० सू ३/२/११ ) - - इति सूत्रात् । जक्षणादिसङ्कीर्तन तु स्तुतिमात्रपरम् । निर्विशेषस्वात्मस्वरूपावस्थानलक्षणे मोक्षे रति क्रीडा मिथुनाद्य- सम्भवात् । तस्मान्निरस्ताशेष प्रपञ्चेन प्रसन्नेन चैतन्यात्मनैवावस्थानं युक्तम् ॥ बादरायणस्त्वाचार्योऽत्राप्यविरोध - ', ( ) मन्यते। तदाह एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोध बादरायणः ब्र० सू० ४ ४५७ पारमार्थिक चैतन्यमात्रस्वरूपा- भ्युपगमेऽपि व्यवहारापेक्षया पूर्वस्याभ्युपन्यासादिभ्योऽवगतस्य ब्रह्मेश्वर्यरूपस्याप्रत्याख्यानादविरोध बादरायणाचार्यो अभेद मे भी भेद का आरोप औपचारिक ही माना जा सकता है । 'हे भगवन् । वह किसमे प्रतिष्ठित हैं? अपनी महिमा में', 'वह आत्मा मे ही रहता है और उसी मे क्रीडा करता है' इस तरह की श्रुतियाँ अभेद को ही बताने वाली है । इसी विचार को आगे बढाते हुए कहा गया है कि ब्रह्म को जो सब तरह पापो से रहित, सत्यसकल्प, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर माना जाता है । यही अपना स्वरूप है । इसी रूप से मुक्त आत्मा संपन्न हो जाता है, ऐसा जैमिनि आचार्य का मत है, क्योंकि 'य आत्मा' इत्यादि श्रुतियो का उद्धृत करने से ऐसा ही प्रतीत होता है कि आत्मा का यही रूप है । 'स तत्र पर्येति' इत्यादि श्रुतियो के प्रमाण से भी यही प्रतीत होता है कि आत्मा का स्वरूप इसी तरह का है 'ब्राह्मण जैमिनिरुपन्यासादिभ्य ' इस वेदान्तसूत्र का यही तात्पर्य है । इसके आगे औलोमि के मत का प्रतिपादक यह सूत्र है -' चिति तन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमि । यद्यपि अपहतपाप्मत्व प्रभृति धर्म भेद के हो निर्देशक है, तथापि ये सब केबल शब्दजन्य विकल्प मात्र है, इतना तात्पर्य पाप आदि असद्वृत्तियो की निवृत्ति मात्र मे है । चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है, अत आत्मा की स्वकीय रूप की अभिनिष्पत्ति चैतन्य के रूप में ही हो सकती है । आत्मा को प्रज्ञानधन बताने वाली बृहदारण्यक श्रुति इसमें प्रमाण है । सत्यकामत्व प्रभृति की धर्म के रूप मे उपस्थिति केवल ब्रह्म की वस्तुस्थिति का निदर्शन मात्र है कि उसकी सारी कामनाएँ सत्य होती है, इन धर्मों से उसका सम्बन्ध औपाधिक है । चैतन्य के समान ये उसके स्वरूप मात्र नही हो सकते, क्योंकि ऐसा मानने पर ब्रह्म में अनेक आकार ( स्वरूप = धर्म ) मानने पड जायेंगे । 'न स्थानतोऽपि० ' इत्यादि सूत्र मे ब्रह्म की अनेकाकारता का निषेध किया गया है । 'जक्षन् क्रीडन्' इत्यादि गुणो का मुक्तावस्था मे वर्णन केवल इस अवस्था की प्रशन करने मात्र के प्रयोजन मे किया गया है, क्योंकि निर्विशेष स्वात्मस्वरूप मे अवस्थिति रूप मोक्ष में रति, क्रीडा, मिथुन आदि की सम्भावना हो ही नही सकती । इसलिये समस्त प्रपंच से अतीत प्रसादात्मक चैतन्य स्वरूप में अवस्थान ही मुक्तावस्था का स्वरूप मानना चाहिये । आचार्य बादरायण इन दोनो मतों में भी कोई विरोध नही देखते । जैसा कि 'एवमप्युप०' इत्यादि सूत्र मे बताया गया है । पारमार्थत. चैतन्य मात्र ही आत्मा का स्वरूप है, तो भी व्यवहार की दृष्टि से ब्रह्म के ऐश्वर्य के रूप में उपन्यस्त अपहतपाप्मत्व प्रभृति की स्थिति को भी नकारा नही जा सकता । इस तरह बादरायण आचार्य उक्त दोनो मतो मे अविरोध बताकर समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं । यद्यपि तात्त्विक दृष्टि से आत्मा का स्वरूप चिदानन्दमय है, अपहृतपाप्मत्व, सत्यकामत्व प्रभृतिधर्म औपाधिक होने से पारमार्थिक नही
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वेदार्थपारिजात १३८८ | मन्यते । यद्यपि तात्त्विकानन्दचैतन्यमात्र आत्मा अपहतपाप्मत्वसत्यकामत्वादय औपाधिकतयाऽपारमार्थिका अपि व्यावहारिक प्रमाणोपनीतत्वान्न राहोः शिरआदिवदत्यन्तासन्तः सन्ति तेषामपि व्यावहारिक सत्वं भवत्येवेत्यर्थ. । 'यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमा गतिम् ॥ ' ( काठकोप ०२| ३| १०) इत्यादीनामपि न त्वदभिमतार्थप्रतिपादकत्वम् । यदा स्वविषयेम्यो निर्वाततानि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि ज्ञानसाधनानि श्रोत्रादीनि मनसा सङ्कल्पविकल्पव्यावृत्तेनान्त करणेन सह अवतिष्ठन्ते तदनुगता न भवन्ति बुद्धिश्वाध्यवसायलक्षणा . न विचेष्टते स्वव्यापारेषु न व्याप्रियते तामाहु परमा गतिम् । ब्रह्मात्मस्वरूपसाक्षात्कारनिष्ठादार्याय ज्ञानेन्द्रियमनो-, बुद्धिव्यापारो परमोऽपेक्षितः नात्रेन्द्रियादिनिरोध एव परमा गतिरिति विवक्षितम् । वेदान्तज्ञानशून्यानामपि बौद्धादीनामपि तत्सम्भवात् । तस्मात् परमगतिसाधनपरात्मसाक्षात्कारोपयोगित्वेनैव तत्र परमगतित्वमुक्तम् । 'ता योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययो ॥ ' ( काठको० २।३।११ ) ता पूर्वोक्तावस्था स्थिरामिन्द्रियधारणा वियोगमेव सन्त सर्वानर्थसयोगवियोगान्तरायत्वाद्योगिनो योगमिति मन्यन्ते । अप्रमत्तस्तदा भवति यदा प्रवृत्तयोगो भवति तदैव समाधान प्रतिप्रमादवजितः प्रयत्नवान् भवति । बुद्धयादि- चेष्टाभावे प्रमादासम्भवात् । यद्वा यदैवेन्द्रियाणा स्थिरा धारणा भवति तदैव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वं भवति । कुतः? योगो हि प्रभवाप्ययो यस्मात् योग उपजनापायधर्मकस्तस्मात् सदैव प्रमादराहित्यमपेक्षितम्, अन्यथा योगस्याप्यसम्भवात् । योगेन परमेश्वरं प्राप्य प्रमादरहितो भवतीति तु शब्दार्थबाह्यमेव । यत्तु 'प्रभव. सत्यगुणाना प्रकाशकत्वम्, अप्ययः अशुद्धिदोषाणामसत्यगुणविनाशकत्वम्'इति, तत्तु विरुद्धमेव, तथापि व्यावहारिक प्रमाणो से परिगृहित होने से यह असर्वथा राहु के शिर की तरह असत् नही है । अर्थात् राहु के शिर की जैसे कोई पृथक सत्ता नही है, उस तरह से इन गुणो को भी असत् नही माना जा सकता, क्योकि इनकी व्यावहारिक सत्ता मानी जाती है । 'यदा पञ्चावतिष्ठन्ते० ' इत्यादि उपनिषदो के वचन भी आपके अभिमत सिद्धान्त का प्रतिपादन नही करते । जब अपने अपने विषयों से हटाई ज्ञान की साधनभूत श्रोत्र प्रभृति पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ सकल्प-विकल्पात्मक, अन्तःकरण की वृत्तियों दूर हटे मन के साथ अनुगत हो जाती हैं और अध्यवसायात्मिका बुद्धि भी अपने व्यापार मे प्रवृत्त नही होती, तो इसी को परम गति कहा जाता है । ब्रह्मात्म स्वरूप के साक्षात्कार का दृढ निश्चय करने के लिये ज्ञानेन्द्रिय, मन और बुद्धि के व्यापार की उपरति अपेक्षित रहती है, इतना ही इसका अभिप्राय है । इसका अर्थ यह नही है कि इनके उपराम मात्र को परम गति कहते है । क्योकि यह स्थिति तो वेदान्तज्ञान से शून्य बौद्धो को भी प्राप्त हो जाती है । इसलिये परम गति के साधनभूत परात्म साक्षात्कार मे इन्द्रियादि के उपराम को उपयोगिता होने से ही इनके लिये परम गति शब्द का प्रयोग कर दिया गया है । 'ता योगमिति ० ' इत्यादि श्रुति का अर्थ यह है कि पूर्व मन्त्र में कही गई इस स्थिर इन्द्रियधारणा को ही योगीगण योग नाम से जानते है । वास्तव में यद्यपि इसको योग नही कहा जा सकता, किन्तु सभी तरह के अनर्थ के संयोग और वियोग मे यह स्थिति अन्तराय ( बिघ्न ) डाल सकती है, अत योगीगण इसे योग कहते है । जब योगी इस योग का अभ्यास करने लगता है, तो वह सावधान हो जाता है और तभी यह आलस्य छोड़कर चित्त के समाधान के लिये प्रयत्नशील हो सकता है, क्योंकि बुद्धि आदि जब निश्चेष्ट हो जायगी, तो उस स्थिति में किसी भी प्रकार की चेष्टा के अभाव मे प्रमाद का कोई प्रसंग ही नही रहेगा । अथवा जब इन्द्रियों की धारणा स्थिर हो जाती है, तभी यह निरंकुश चित्त अप्रमादी हो सकता है, क्योकि यह योग ही प्रभाव और अप्यय है, अर्थात् इस योग में सृष्टि और प्रलय की सामर्थ्य विद्यमान है । इसीलिये योग की साधना मे आलस्य का अभाव नितान्त आवश्यक है । अन्यथा योग की सिद्धि हो ही नहीं सकती । योग की सहायता से परमेश्वर को प्राप्त कर योगी आलस्य रहित हो जाता है, इस तरह का अर्थ करने में मन्त्राक्षरो से इसकी कोई संगति नही बैठती । स्वामी दयानन्द ने प्रभव और अध्यय शब्द का अर्थ 'शुद्ध और सत्य गुणों का प्रकाश करने वाला तथा सब अशुद्धि दोषों और असत्य गुणों का नाश करने वाला' ( पृ ० २१५ ) किया है, यह अर्थ भी मन्त्राक्षरों से विपरीत है, क्योंकि प्रमादरहितता में इस
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वेदार्थपारिजात १३८ ९ योगस्यानेश्वर्यावैराग्याधर्माजाननिवर्तकत्वस्यैश्वर्यवैराग्यधर्मज्ञाना-प्रमादराहित्ये तादृशप्रभवाप्यययोर्हेतुत्वासम्भवात् । विर्भावकस्य च वचनान्तरैरवगतत्वात् । 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदिश्रिता । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ ' ( काठको० २| ३| १४ ) | यदा तवज्ञानकाले सर्व कामा येऽस्य साधकस्य हृदि, बुद्धौ श्रिता, तत्वज्ञानात्पूर्वं ( तस्या एव कामाश्रयत्वात्) प्रमुच्यन्ते, ब्रह्मात्मसाक्षात्कारेण कामयितव्यस्यान्यस्याभावाद्विशीर्यन्ते । अथ तदा मर्त्य प्रबोधात्प्राक् अमर्त्य, प्रबोधोत्तर-मविद्याकामकर्मलक्षणस्य मृत्योर्विनाशादमृतो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योरभावात् अत्रैव प्रदीपनिर्वाणवत् सर्वबन्धनो-पशमात् ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थं । ' दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ' ( छा० ८| १२| ५ ), 'य एते ब्रह्मलोके त वा एत देवा आत्मान-मुपासते, तस्मात्तेषा सर्वे लोका आत्ता सर्वे च कामा. स सर्वाश्च लोकानाप्नोति सर्वाश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य जानातीति हि प्रजापतिरुवाच' ( छा० ८| १२| ५-६ ) | दयानन्दीयोद्धृतसंख्या त्वशुद्धैव, छान्दोग्ये प्रपाठकाभावात् । तदर्थ-विवरणे तु प्रश्नप्रतिवचनरूपेणोक्त दयानन्देन मोक्षे शरीरेन्द्रियाणामभावात् जीवात्मा कथ व्यवहरति, कथ जानाति, कथ वा पश्यति मुक्तौ? उत्तरम्- जीवः शुद्धेरिन्द्रिये. शुद्धेन मनसा आनन्दरूपान् कामान् पश्यन् रमते, यतस्तस्य मुक्तस्येन्द्रियाणि मनश्च प्रकाशस्वरूपाणि भवन्ति । प्रश्न -मुक्तः सर्वत्र सृष्टिषु भ्राम्यति क्वचिदेकत्रैव वा? उत्तरम् - मुक्ता ब्रह्मलोके अर्थात् परमेश्वरं प्राप्ताः सन्तः सर्वेषामात्मानं परमात्मानमुपासीनास्तदाश्रया एव तिष्ठन्ति । तस्मादेव सर्वलोके तेषा गमनागमनादिक भर्वात, सर्वेषु लोकलोकान्तरेषु न क्वाप्यवरोध । सर्वे कामा पूर्णा भवन्ति नापूर्णाः । अत एव पूर्वोक्त-रीत्या परमेश्वरं सर्वेषामात्मानं ज्ञात्वोपासते ये ते सर्वान् कामान् प्राप्नुवन्तीत्येतत्प्रजापतिः परमेश्वरो वेदे वदति' तरह के प्रभव और अप्यय की कोई कारणता नही बन पाती । योग अनैश्वर्य, अवैराग्य, अधर्म और अज्ञान का निवर्तक है और ऐश्वर्य, वैराग्य, धर्म तथा ज्ञान का सम्पादक है, यह बात अन्य वचनो से ही अवगत है, अतः इसके लिये पुनः अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नही हो सकती । 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है -तत्त्वज्ञान हो जाने पर जब इस योगी की सब कामनाएँ, जो कि तत्त्वज्ञान होने से पहले इसकी बुद्धि में गहरी बैठी हुई थी, दूर हो जाती हैं, ब्रह्मात्मतत्त्व का साक्षात्कार हो जाने से इससे बढकर अन्य किसी वस्तु के अभिलषणीय न होने से नष्ट हो जाती है, तब वह मनुष्य, जो कि प्रबोध से पहले मरणशील अवस्था मे पडा रहता है, अब अमर्त्य हो जाता है, ज्ञान की आविष्कृति होने के बाद अविद्या, काम और कर्मलक्षण मृत्यु का नाश हो जाने से अमर हो जाता है । गमनागमन के प्रयोजक मृत्यु के अभाव में वह यही प्रदीप के निर्वाण की तरह सब तरह के बन्धनो के नष्ट हो जाने से स्वयं ब्रह्म बन जाता है । ' देवेन चक्षुषा० ' तथा 'य एते ब्रह्मलोके ० ' इन दोनो मन्त्रो की दयानन्द के द्वारा उद्धृत संख्या अशुद्ध है, क्योकि छान्दोग्य उपनिषद् मे प्रपाठक विभाग नही है । दयानन्द ने इन दोनो मन्त्रो का विवरण प्रश्न प्रतिवचन शैली में किया है । जैसे कि -' प्रश्न - जब मोक्ष मे शरीर और इन्द्रियाँ नही रहती, तब वह जीवात्मा व्यवहार को कैसे जानता ओर देख सकता है? उत्तर - वह जीव शुद्ध इन्द्रिय और शुद्ध मन से इन आनन्दमय कामो को देखता है और भोक्ता होकर उनमें सदा रमण करता है, क्योकि उसका मन और इन्द्रियाँ प्रकाशस्वरूप हो जाती है । प्रश्न -वह मुक्त जीव सब सृष्टि मे घूमता है अथवा कही एक ही ठिकाने बैठा रहता है? उत्तर - जो मुक्त पुरुष होते हैं, वे ब्रह्मलोक अर्थात् परमेश्वर को प्राप्त होकर और सबके आत्मारूप परमेश्वर की उपासना करते हुए उसी के आश्रय में रहते है । इसी कारण से उनका जाना-आना सब लोक-लोकान्तरो में होता है, उनके लिये कही रुकावट नही रहती और उनके सब काम पूर्ण हो जाते हैं, कोई काम अपूर्ण नही रहता । इसलिये जो मनुष्य पूर्वोक्त रीति से परमेश्वर को सबका आत्मा जानकर उसकी उपासना करता है, वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त होता है । यह बात प्रजापति परमेश्वर सब जीवो के लिये
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वदार्थपारिजातः १३ ९ ० ( पृ० २२५-२१६ ) इति, तदेतत्सर्वं मोक्षस्वरूपाज्ञानमूलकम्, नैयायिकरीत्या विशेषात्मगुणानामुपरमस्यैव मोक्षत्वेन गोक्षे सुखोपभोगभ्रमणाद्यभावात् । श्रुत्यर्थस्त्वेवम्-- स एष वै स्वरूपापन्न. सर्वेश्वरः मन उपाधि सन् एतेनैवेश्वरेण मनसा सवितृप्रकाशवत् नित्य- दर्शनेन पश्यन् रमते, कान् कामानिति विशिनष्टि, य एते ब्रह्मलोके ब्रह्मणि लोके हिरण्यनिधिवद् बाह्यविषयासङ्गानृतेन पिहिता सङ्कल्पमात्रलभ्यास्तान् । न च प्रसिद्धं मन एव कुतो नात्र गृह्यत इति वाच्यम्, यो वेदेद मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य देव चक्षुरिति तत्रत्यश्रुतिविरोधात् । यो वेदेद मन्वानीति मननव्यापारमिन्द्रियासंस्पृष्ट केवलं मन्वानीति वेद स आत्मा मननाय मन इत्यात्मन एव मनस्त्वोक्ते । अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्ण चक्षुः स चाक्षुषः पुरुष, दर्शनाय यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिहराणीति स आत्माभिव्याहाराय वागद्य यो वेदेद शृण्वानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम्, अशरीरोऽपहतपाप्मादिलक्षणः पुरुषो दक्षिणेऽक्षिणि दृश्यते इति प्रजापतिरुवाच । 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाच' ( छा० ४।१५| १ ) इति श्रुते । तत्र कथ तदित्युच्यते यत्र कृष्णतारोपलक्षितमाकाशमनु- विषण्णमनुषक्त तत्र स प्रकृतोऽगरीर आत्मा चाक्षुषः, चक्षुषि भवश्चाक्षुषो भवति, देहादिभिः सहतत्वात् । यस्य परस्या- सहतस्याशरीरस्य द्रष्टुरर्थे चक्षुरादिकरण प्रवर्तते सोऽत्र चक्षुषिदर्शनेन लिङ्गेन दृश्यते तेन सोऽक्षिणि दृश्यत इत्युच्यते, तस्यैव सर्वविषयोपलब्धृत्वात् स्फुटोपलब्धिहेतुत्वात्तु अक्षिणीति विशेषोक्ति । अथापि यो वेदेदं जिघ्राणि गन्धं विजानीया स आत्मा तस्य गन्धाय गन्धविज्ञानाय घ्राणम् । स एवमभिव्याहरणाय वाक् श्रवणाय श्रोत्रं भवति, तथैव स एवात्मा मननाय मनो भवति । अत एवेन्द्रियरूपेभ्यो विलक्षणेन दैवेन चक्षुषा दैवेन मनसा कामान् पश्यन् रमते इत्युक्तम् । तेन न मोक्षे मन इन्द्रि- वेदो मे बताता है' ( २१५ - २१६ ), किन्तु यह सारी व्याख्या मोक्ष का स्वरूप ठीक से न समझ पाने के कारण गलत हो गई है, क्योकि नैयायिकों की पद्धति से विशेष गुणों का उपराम ही मोक्ष कहलाता है, अत मोक्षावस्था में सुख के उपभोग की अथवा भ्रमण को स्थिति हो ही नही सकती । वस्तुत श्रुति का अर्थ यह होगा --यह अपने स्वरूप मे प्रतिष्ठित सर्वेश्वर मन की उपाधि की सहायता से ऐश्वर्य सम्पन्न मन से सूर्य के प्रकाश के समान नित्य सबको देखता हुआ रमण करता है । किन कामो को देखता है? जो काम इस ब्रह्मलोक मे सुवर्ण भण्डार की तरह बाह्य विषयो के आसक्ति रूप असत्य स्वरूपो से छिपे हुए हैं और जिनकी प्राप्ति उसको संकल्प के उठने के साथ ही हो सकती हैं । यहाँ प्रसिद्ध मन का ग्रहण न कर ईश्वर सबन्धी मन का ग्रहण क्यो किया गया? इसलिये कि 'यो वेद ०' इत्यादि श्रुति से इसका विरोध न हो । इस श्रुति के अनुसार इन्द्रियो से असंस्पृष्ट मनन व्यापार का ही यहाँ प्रसंग है, इसलिये मन शब्द का अर्थ यहाँ आत्मा ही लिया जा सकता है । 'अथ यत्र त० ' इत्यादि श्रुति मे भी श्रोत्र, क्षु, घ्राण, वाक् आदि पदो से आत्मा का ही परिग्रहण होता है, क्योंकि आत्मा को अशरीर और पाप आदि दोषो से विरहित बताने के बाद यह श्रुति बताती है कि यह आत्मा आँखो में दिखाई पडने वाले पुरुष से अभिन्न है । यह कैसे हो सकता है? इसमे उत्तर में वहाँ बताया गया है कि इस चक्षु में कृष्ण तारा ( काली पुतली ) मे विद्यमान आकाश में यह अशरीर आत्मा चाक्षुष बन जाता है, इसलिये कि उसका देह, इन्द्रिय आदि से औपाधिक सम्बन्ध हो जाता है । जिस अशरीर, सबसे असंबद्ध पर स्वभाव द्रष्टा के दिये चक्षुरादि इन्द्रियाँ प्रदत्त होती है, वह आत्मा यहाँ चक्षु में दर्शनात्मक क्रिया की संपत्ति रूप लिंग से जाना जाता है, इसी लिये यह औपाधिक प्रयोग होता है कि वह आँख मे दिखाई पडता है, क्योंकि यह आत्मा ही अन्ततः सभी विषयों का ग्राहक माना जाता है । यद्यपि यह स्थिति सभी इन्द्रियों के द्वारा उपलब्ध विषयों के सम्बन्ध में लागू होती है, किन्तु यहाँ विशेषकर अक्षि ( आँख ) का निर्देश इसलिये किया गया है कि यहाँ इस आत्मा की उपलब्धि अधिक स्पष्ट रूप से होती है । केवल चक्षु के विषय मे ही ऐसा नही कहा गया है, अपितु गन्ध के ज्ञान के लिये यह आत्मा घ्राण बन जाता है, बोलने के लिये वाक् और सुनने के लिये श्रोत्र बन जाता है । इसी तरह से यह आत्मा मनन करने के लिये मन भी बन जाता है । इसीलिये सामान्य इन्द्रियों से विलक्षण ईश्वरीय चक्षु और ईश्वरीय मन से यह सब कामो को देखता-सुनता रमण करता है, ऐसा श्रुति का अभिप्राय होने से यह स्पष्ट है कि मोक्षावस्था में आत्मा का मन