वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 491–500
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 491–500
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वेदार्थपारिजात १३ ९ १ यःदियोग इत्युक्तमेव । तं वा एतमात्मान देवा उपासते तस्मात्तेषा सर्वे लोका जाता प्राप्ता । सर्वे च कामाः प्राप्ताः । यदर्थमिन्द्र एकशतं वर्षाणि प्रजापती ब्रह्मचर्यमुवास तत्फल प्राप्त देवै । ननु देवानां माहाभाग्यात्तद्युक्तं नास्मदादीना नत्सम्भवतीति प्राप्त उच्यते -यस्तमात्मानमिति, य इन्द्रवत्त- मनुविद्य विजानाति । स इदानीन्तनोऽपि सर्वान् लोकान् सर्वाश्च कामानाप्नोति, अत सर्वेषामात्मज्ञानं तत्फलप्राप्तिश्च समानैव भवति ॥ तथा च सर्वात्मत्वात् सर्वव्यापकत्वात् सर्वद्रष्टृत्वात् सर्वकामभोक्तृणा तदनतिरिक्तत्वादेव सर्वकामप्राप्ति- रत्रोक्ता । वस्तुतो मोक्ष काम्यकामाद्यभाव एव । ' यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता ।' ( बृ० ४| ४|७ ) इति- -',कामनमोकस्य तत्त्वज्ञानकाल एव सञ्जातत्वात् । अत एव सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिनेति ( तै ० उ० २।१ १ ) । अत्र ब्रह्मरूपे युगपदुपस्थितान् सर्वान् कामानश्नुत इत्युक्तम् । नहि कश्चिद् भोक्ता जीवो युगपत् सर्वान् छापान भोक्तु शक्नोति, स्वेनोपाधिकेन रूपेण तस्य परिच्छिन्नत्वात् । 'यदन्तरापस्तद् ब्रह्म, तदमृत स आत्मा प्रजापते. सभा वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि, ब्राह्मणाना यशो राज्ञा यशो-विशा यशोऽहमनुप्रापत्सि सदाहं यशसा यश ' ( छा० ८२१४११ ) । अत्र यदन्तराप इति पाठोऽशुद्धोऽसगतश्च । तदर्थस्त्वेव ज्ञातव्यः --यद्याकाशरूप आत्मा नामरूपयोनिर्वहिता ते नामरूपे यदन्तरा यस्मात्मनो ब्रह्मणो मध्ये वर्तेते तयोर्वा नामरूपयो- रन्तरा मध्ये यन्नामरूपाभ्यामस्पृष्ट नामरूपविलक्षण तद्ब्रह्म । तदमृत स आत्मा सर्वजन्तूना प्रत्यक्चेतन स्वसवेद्यः :, प्रसिद्ध तेनैव स्वरूपेणोन्नीयाशरीरो व्योमवत्सर्वंगत आत्मा ब्रह्मेत्यवगन्तव्यम् । त ऊर्ध्वं मन्त्रः प्रजापतेरिति । प्रजा- पतेर्ब्रह्मणश्चतुर्मुखस्य सभा वेश्म प्रपद्ये गच्छेयम् । किञ्च यशोऽह भवामि ब्राह्मणानाम्, तेषा विशेषत उपासकत्वात् । अथवा इन्द्रियो से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नही रहता । देवगण इसी आत्मा को उपासना करते है, इस लिये सभी लोक उनको प्राप्त है, उनके अधिकार मे है । साथ ही सभी प्रकार की कामनाएँ भी उनको प्राप्त है । जिस प्रयोजन की सिद्धि मेंके लिये प्रजापति के पास रह कर इन्द्र ने सौ वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया, उसका फल देनायो को प्राप्त हो गया । ,,? प्रश्न उठता है कि देवता तो महान् ऐश्वर्य शाली है उनको जो प्राप्त हो सकता है हमे भी कैसे मिल सकता है इसी का उत्तर 'यस्तमात्मानम्' इत्यादि श्रुति मे दिया गया है । व्यक्ति इन्द्र के समान तपस्या करके उसको जान लेता है, वह भले ही आजकल के समय मे ही पैदा हआ हो, सभी लोको और सभी कामनाओं का अधिकारी देवतो की तरह ही हो जाता है । इसमें स्पष्ट है कि आत्मज्ञान का फल सबके लिये एक सा ही है । इम तरह से सर्वात्मक, सर्वव्याप, सर्वद्रष्टा, सब तरह की कामनाओ को भोक्ता और ब्रह्मस्वरूप से अभिन्न होने से ही इस आत्मा को सब कामनाओ की प्राप्ति हो जाती है, ऐसा कहा गया है । वस्तुत मोक्ष में किसी काम्य अथवा काम की स्थिति नही रहती । बृहदारण्यक श्रुति में बताया गया है कि तत्वज्ञान हो जाने पर इसके हृदय में विद्यमान सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती है । इसी लिये तैतिरीय श्रुति में ब्रह्मस्त्ररूप की अधिगति हो जाने पर मुक्तात्मा के एक साथ सभी कामनाओ का उपभोग कर सकने की जात कही गई है । कोई भी भोक्ता जीव ,एक साथ इस तरह से सब कामनाओ का उपभोग नहीं कर सकता क्योकि वह अपने औपाधिक स्वरूप के कारण परिच्छिन्न रहता है । ' यदन्तरा० ' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत करते समय दयानन्द 'यदन्तराय ' ऐसा पाठ देते हैं, जो कि अशुद्ध और असंगत है । इसका अर्थ यह होगा - --जो आकार रूप आत्मा नाम और रूप का निर्वाहक है और ये नाम-रूप जिस आत्मा के ब्रह्म के मध्य में रहते है अथवा इन नाम और रूप के मध्य में इनसे अस्पृष्ट अर्थात् नाम और रूप से जो विलक्षण है, वही ब्रह्म है । वही अमृत है और वही सब प्राणियो की आत्मा अर्थात् स्वसंवेद्य प्रत्यक् चेतन है । आत्मा को इसी स्वरूप में पहचानना चाहिये कि वह अशरीर है और आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त है । इसके आगे 'प्रजापते.' इत्यादि मन्त्र है । इसका अर्थ है -- प्रजापति अर्थात् चतुर्मुख ब्रह्मा की सभा को मै प्राप्त करूँ और में ब्राह्मणो के ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित होऊँ, क्योकि वे ही इस ब्रह्म के
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वेदार्थपारिजात १३ ९ २ राज्ञा विशां च तेषामप्यात्मा भवामि, तद्यशोऽहमनुप्रापत्सि अनुप्राप्तुमिच्छामि । सभा वेश्म प्रपद्ये इत्युक्तत्वात् ब्रह्मलोकप्राप्ति- रेवात्र विवक्षिता, उपासनाप्रकरणात् । कैवल्यमोक्षस्तु निर्विशेषपरब्रह्मात्मसाक्षात्कारेणैव भवति, तत्रैव सर्वस्याध्यस्तत्वात् तत्प्राप्तिरेव सर्वप्राप्तिरित्युक्तमेव । 'अणुः पन्था विततः पुराणः मा स्पृष्टो अनुवित्तो मयैव । तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविद उत्क्रम्य स्वर्गं लोक- मितो विमुक्ता । तस्मिन् शुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलं हरित लोहितं च । एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्तैजसः पुण्यकृच्च । प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्तस्यान्न मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमय्यम् । ' मनसैवेदमाप्तव्यं नेहनानास्ति किञ्चन । मृत्यो. स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति || ' ( काठकोप० २| ४ | ११, बृ० ४| ४| १ ९ ), ' मनसैवानुद्रष्टव्यम्' ( बृ० उ० ४|४| १ ९ ), 'एतदप्रमेय ध्रुवम्' ( बृ० उ० ४।४।२० ), विरज. पर आकाशात् 'अज आत्मा महान् ध्रुव ' ( बृ० उ ० ४।४।२० ), 'तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञा कुर्वीत ब्राह्मण: ( बृ० उ ० ४।४।२१ ) इत्यादि- वचनानामपि न त्वदभिमतेऽनित्ये मोक्षे पर्यवसानम् । ( बृहदारण्यके ४।४ ) । --- तदर्थस्त्वेवम् - अणु सूक्ष्म., पन्था दुर्विज्ञेयत्वात्, विततो विस्तीर्णं । वितर इति पाठे विस्पष्टतरणहेतुत्वात् मोक्षसाधनोऽय ज्ञानमार्गं । पुराणश्चिरन्तनो नित्यश्रुतिबोधितत्वात् । न ताकि कादिप्रभवकुदृष्टिमार्गवदाधुनिक । मा स्पृष्टो मयोपलब्ध । स योगेन लभ्य स त स्पृशतीव । न केवलं स्पृष्ट, किन्तु अनुवित्तोऽपि । विद्याया परिपाकापेक्षया फलावसानता निष्ठाप्राप्तिरेवानुवित्तिः, यथा भुजेस्तृप्त्यवसानतेति तद्वत् । पूर्वं ज्ञानसम्बन्ध एवोक्त । ननु किमसौ मन्त्रद्रष्टैव ब्रह्मविद्या- फलं प्राप्तो नान्य इति चेन्न तथोक्तेर्ब्रह्मविद्यास्तुतिपरत्वात् । आत्मसाक्षिकं कृतार्थतासूचकं ब्रह्मात्मज्ञानमिति तत्स्तुतिः । नान्यज्ञानतत्फलनिषेधपरा । 'तद्यो यो देवानां प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत्' ( बू० १| ४| १० ) इति श्रुतेस्तदेवोच्यते 1। तेन उपासक होते है | क्षत्रियो और वैश्यो की भी मै आत्मा बन जाऊँ । उनके यश को भी मैं प्राप्त कर सकूँ, क्योकि मै ब्रह्म सभा मे प्रवेश करना चाहता हूँ । यह मन्त्र उपासना के प्रकरण में पठित है, अतः इसमें ब्रह्म लोक की प्राप्ति का ही वर्णन माना जायगा । कैवल्य मोक्ष तो निर्विशेष परब्रह्मात्मक तत्त्व के साक्षात्कार से ही हो सकता है, क्योंकि उसी में सब अध्यस्त है । उसके प्राप्तहोने से सब कुछ प्राप्त हो जाता है, यह पहले ही बताया जा चुका है । इसके आगे दयानन्द ने 'अणु • पन्था वितत ' से लेकर 'तमेव धोरो विज्ञाय प्रज्ञा कुर्वीत ब्राह्मण ' पर्यन्त अनेक मन्त्रो को उद्धृत किया है । ये सब वचन भी उनके द्वारा स्वीकृत अनित्य मोक्ष को नही सिद्ध कर पाते । इनका अर्थ क्रमश. इस तरह से है - इस मुक्तावस्था का मार्ग अत्यन्त सूक्ष्म है, इसको जान पाना बडा कठिन है । साथ ही यह अत्यन्त विस्तीर्ण भी है । 'वितर' ऐसा पाठ मानने पर उसका अर्थ होगा कि बहुत ही स्पष्ट रूप से इसकी सहायता से ससार सागर को पार किया जा सकता है, अतः मोक्षसाधन यह ज्ञानमार्ग 'बितर' कहा जाता है । यह बहुत पुराना भी है, क्योंकि नित्य, अपौरुषेय श्रुति इसका ज्ञान कराती है । यह कुतार्किको की बुद्धि से प्रसूत आधुनिक शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित मार्ग से भिन्न है | इसको मैने प्राप्त किया है । जो जिसको प्राप्त होता है, यह उसको छू सा लेता है । यह ब्रह्मज्ञान केवल मेरे द्वारा स्पष्ट ही नही अनुवित्त भी है । विद्या का परिपाक होने की अपेक्षा फल में पर्यवसित होना, अन्तिम स्वरूप की अधिगति होना ही अनुवित्ति कहलाता है । जैसे भोजन का पर्ययवसान तृप्ति में होता है । उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । पहले केवल ज्ञान का सम्बन्ध बताया गया था, यहाँ फल का भी सम्बन्ध बताया गया है । प्रश्न होता है कि क्या मन्त्रद्रष्टा को ही ब्रह्मविद्या का फल मिलता है, किसी दूसरे को नही? उत्तर है कि ऐसी बात नही है, इस तरह की उक्ति ब्रह्मविद्या की स्तुति के लिये है । वृह्मात्म ज्ञान से आत्मा का साक्षात्कार कर मनुष्य कृतार्थ हो जाता है, इस तरह से यह उसकी स्तुति के लिये है । किसी दूसरे को इसका ज्ञान नहीं होगा या इसका फल नही मिलेगा, ऐसी कोई बात नही है | "देवताओ में से जिसने इसको जान लिया वही ब्रह्मस्वरूप हो गया" इस बृहदारण्यक श्रुति में यही बात कही गई है । इसलिये ब्रह्मविद्या के मार्ग में विद्वान् और साधारण व्यक्ति सभी जा सकते हैं, सभी ब्रह्मविद्या के फल मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं ।
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वेदार्थपारिजात १३ ९ ३ ब्रह्मविद्यामार्गे धीरा प्रज्ञावन्तोऽन्येऽपि अपियन्ति । ब्रह्मविद्याफल मोक्ष स्वर्गं लोक प्राप्नुवन्ति । अन्यत्र त्रिविष्टपवाच्यपि स्वर्गशब्दोऽत्र प्रकरणात् मोक्षाभिधायक । जीवन्तोऽपि मुक्ता सन्तो देहपातादूर्ध्वं कैवल्यपद प्राप्नुवन्तीत्यर्थं । तस्मिन्निति । तस्मिन् मोक्षमार्गे मुमुक्षूणा मतभेदमाह श्रुति. - केचित् तं मार्ग शुक्ल शुद्ध विमलमाहु | केचिन्नीलमन्ये पिङ्गलं हरितमयं यथादर्शनं प्राहु । वस्तुतस्तु सुषुम्नाद्या नाड्य एव श्लेष्मपित्तादिरससम्पूर्णा न दर्शन- मार्गस्य शुक्लादिवर्णत्व सम्भवति । ननु शुक्लो ज्ञानमार्ग सम्भवत्येवेति चेन्न, वर्णवाचकैर्नीलपीत। दिशब्दे नुक्रमणात् । तथा च यान् शुक्लादीन् मोक्षमार्गानाहुर्योगिनस्ते संसारविषया एव 'चक्षुष्टो वो मूनवाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्य.' इति शरीर- निःसरणसम्बन्धात् । आदित्योऽपि ब्रह्मलोकस्यैव प्रापक, तस्मादात्मदर्शनमेव तत्प्राप्तिमार्गः । आत्मकामत्वेनाप्तकामतया सर्वकामक्षये गमनागमनानुपपत्ती प्रदीपनिर्वाणवञ्चक्षुरादीना कार्यकारणानामत्रैव समनयः । एष ज्ञानमार्गः, ब्रह्मणा परमात्म- स्वरूपेणैव ब्राह्मणेन त्यक्तसर्वेषणेनानुवित्तः । तेनैवान्यो ब्रह्मविद् तदाप्नोति । कीदृश पुण्यकृत् पूर्वपुण्यकृद् भूत्वा भगवदा-. राधनबुद्धयाऽनुष्ठितश्रौतस्मार्तधर्मो भूत्वा लब्धेश्वरानुग्रहात् त्यक्तसर्वेषण परमात्मतेजस्यात्मानं संयोज्य तस्मिन्नभि- निर्वृत्तस्तैजसश्चे हैवात्मभूतो ब्रह्मवित्तेन मार्गेण एति ब्रह्म प्राप्नोति । प्राप्तिरप्यत्र विस्मृतकण्ठपणिप्राप्तिवत् प्राप्तस्यै- वाज्ञानापगम निबन्धनैव नान्यविधा, तस्य नित्यप्राप्तत्वात् । 'प्राणस्य प्राणश्च सुषश्चक्षुः' ( के ० उ० १।२ ) चैतन्यात्मज्योतिषावभास्यमान. प्राण आत्मभूतेन तेनैव प्राणिति तस्मात्तदात्मज्योति. प्राणस्य प्राणस्तं प्राणस्य प्राणम् । चक्षुषश्चक्षुः । यथाग्नितादात्म्यापन्नोऽयः पिण्डोऽग्निमहिम्नैव दहति, अन्य स्थानो मे त्रिविष्टप शब्द यद्यपि स्वर्ग का वाची हैं, किन्तु यहाँ प्रकरण के अनुसार मोक्ष का ही वाचक है । इसका अभिप्राय यह है है कि जीवन्मुक्त साधक देहपात के बाद कैवल्य पद को प्राप्त करते हैं । ' तस्मिन्० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है- उस मोक्षमार्ग में प्रविष्ट होने की इच्छा वाले विद्वानो से परस्पर मतभेद है, इस बात को श्रुति इस तरह से बताती है कुछ आचार्य उस मोक्ष के मार्ग को शुक्ल, शुद्ध, विमल बताते है, अन्य विद्वान् नील, पिंगल, हरित अथवा लाक जैसा जिसने देखा बताते है । वास्तव मे सुषुम्ना प्रभृति नाडियाँ ही कफ, पित्त आदि रसो से भरी होने के कारण भिन्न-भिन्न वर्णो की प्रतीति कराती है, ब्रह्मदर्शन के मार्ग मे ये शुक्ल प्रभृति वर्ण नही हो सकते । प्रश्न उठता है, कि ज्ञानमार्ग को तो शुक्ल कहा ही जाता है । उत्तर इसका यह है कि यहाँ नील, पीत आदि शब्द वर्णों के ही वाचक है, अत शुक्ल शब्द भी वर्ण का ही वाचक माना जायगा, ज्ञान का नही । जिन शुक्ल प्रभृति मोक्ष मार्गो की योगी जन चर्चा करते है, वे सब सासारिक विषय ही है "चक्षु मे, शिर से अथवा शरीर के किसी अन्य स्थान से " इत्यादि श्रुतियो मे आत्मा के निकलने की बात कही गई है । आदित्य ( सूर्य) भी ब्रह्मलोक की ही प्राप्ति कराता है, इस लिये आत्मदर्शन ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति का मार्ग है । यह आप्तकाम है, इसलिये सभी तरह की कामनाएँ इसकी पूरी हो चुकी है, इस स्थिति में जब इसमे किसी तरह की कामना नही पैदा होतो, वे सब क्षीण हो जाती हैं । तब उसको कही जाने-आने की जरूरत नही रह जाती और दीपक के बुझ जाने की तरह इसके चक्षु प्रभृति सारे करण चक्र जहाँ के तहाँ लीन हो जाते हैं । इस ज्ञानमार्ग को परमात्म स्वरूप ब्राह्मण, जिसने कि सब तरह एषणा ( इच्छा) ओ का त्याग कर दिया है, जान पाता है । इसी तरह से दूसरा व्यक्ति भी इसी मार्ग से उस ब्रह्म को जान सकता है, उसको प्राप्त कर सकता है, जिसने कि पहले पुण्य- कर्मों का अनुष्ठान किया है, भगवान् की आराधना करने के अभिप्राय से श्रौत और स्मार्त घर्मो का अनुष्ठान किया है, ईश्वर के अनुग्रह की प्राप्ति हो जाने से सब तरह की इच्छाओ का परित्याग कर दिया है,# परमात्मा के तेज मे अपने को संयुक्त कर अपने को कृतकृत्य बना दिया है । यहाँ प्राप्ति का अभिप्राय गले में पडी हुई भूली माला की प्राप्ति के समान अज्ञान के निवारण मात्र से है, क्योकि यह स्वात्म स्वरूप तो नित्य प्राप्त है । इसको नये सिरे से प्राप्त करना है । 'प्राणस्य प्राणमुत० ' इसका अर्थ-- चैतन्य स्वरूप आत्मा की ज्योति से प्रकाशित हो रहा प्राण उस आत्मा के कारण ही प्राणन क्रिया कर सकता है, इसलिये यह आत्म ज्योति प्राण का भी प्राण है । यह चक्षु का भी चक्षु है । जैसे अग्नि से तादात्म्य प्राप्त कर, तदाकार होकर लोहे का गोला जला सकने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है । यद्यपि वह स्वतः न उष्ण है और न गरम, अत एव १७५
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वेदार्थपारिजातः १३ ९ ४ स्वस्तत्वनुष्णाशीतत्वाद् दहनसामर्थ्यहीन एव; तथैवात्मचैतन्यज्योतिषोद्दीपितेन तत एव लब्धावभाससामर्थ्येन चक्षुषा रूप- मवभास्यते । वथा दग्धुरप्यय.पिण्डस्य दग्धाग्निर्भवति, तथैव चक्षुषोऽपि चक्षुरात्मज्योतिरेव 1। तथैव ब्रह्मशक्त्याधिष्ठितस्यैव श्रोत्रस्य शब्दश्रवणसामथ्यं चैतन्यात्मज्योति शून्य तु काष्ठलेोष्टसममेव तद्भवति । तेन तदेव श्रोत्रस्य श्रोत्र मनसो मनस्तत् । तमेवं चक्षुरादिव्यापारानुमितास्तित्वं प्रत्यगात्मानविषयभूतं ये विदुस्ते निचिक्युः निश्चयेन ज्ञातवन्तः । चिरन्तनं ब्रह्म । अग्रे भवमग्न्यम् । मनसैवानुद्रष्टव्यमिति । मनसैव परमार्थज्ञानसंस्कृतेनाचार्योपदेशपूर्वकं तदवाप्तव्यम् । मनसोऽविषयत्वेऽपि श्रवणादिसंस्कृत मनस्तदाकारं जायते । तेन तद्द्द्रष्टव्यमित्युच्यते । तेनैव फलव्याप्त्यविषयत्वेऽपि ब्रह्मणो वृत्तिव्याप्यत्वमभ्यु- पेयते । ' नेह नानास्ति किञ्चन' ( कठोप० ४| ११ ) इह दर्शनविषये ब्रह्मणि न किञ्चन किञ्चिदपि नाना भेदोऽस्ति । एतेन मजातीयो विजातीयः स्वगत सर्वविधोऽपि भेदोऽत्र निषिद्धयते । यथा नात्र भूतले कश्चन घटोऽस्तीत्युक्तो सर्वविधोऽपि घटो निषिद्धयते, तद्वत् । असत्यपि नानात्वे नानात्वमारोपयति बालिशः । तेनैव स नानात्वदर्शी मृत्योर्मरणान्मृत्युं प्राप्नोति, तस्मान्मनसैवानुद्रष्टव्यमेतत् । यस्मादेतद्ब्रह्म अप्रमेयम्, कुतः? एकत्वात् कर्मकर्तृभावानुपपत्तेः । ' केन कं पश्येत्' (बृ० उ ०४ | ५| १५ ) इति श्रुतेश्च । आगमोऽपि प्रमातृप्रमाणादिव्यापारप्रतिषेधेनैव ज्ञापयति, नाभिधानाभिधेयवाक्यधर्माङ्गीकरणेन । तमेव धीरः । प्रत्यक्चैतन्याभिन्नं तमीदृशमात्मान विज्ञायोपदेशतः शास्त्रतश्चानुभूय शास्त्राचार्योपदिष्टपरब्रह्मात्मविषयां प्रज्ञां सुदृढनिघालक्षणा कुर्वीत । स्वत उसमें जला सकने की सामर्थ्य नही है; उसी तरह से चैतन्य स्वरूप आत्मा के ज्योति से उद्दीपित चक्षु वही से शक्ति पाकर विविध रूपो को प्रकाशित कर पाता है । जैसे जलाने वाले लोहे के गोले में यह सामर्थ्य अग्नि के कारण आती है, उसी तरह से चक्षु का प्रकाशक भी यह आत्मा ही है । इसी तरह से ब्रह्म की शक्ति से अधिष्ठित श्रोत्र ही शब्दो को सुनने में समर्थ हो सकता है, चैतन्य स्वरूप आत्मा की ज्योति से रहित कोई भी पदार्थ काठ या मिट्टी के ढेले के समान जड ही माना जायगा । इसलिये यह आत्मज्योति ही श्रोत्र का भी श्रोत्र और मन का भी मन है । अर्थात् इसी की शक्ति से ये सब अपना अपना कार्य करने में समर्थ होते है । इस तरह से यह ब्रह्म ही श्रोत्र का भी श्रोत्र और मन का भी मन है । इस तरह के चक्षुरादि के व्यापारो से जिसके अस्तित्व का भान होता है, और जो किसी का विषय नही होता, उस प्रत्यगात्मा, सबसे पहले आविर्भूत, चिरन्तन ब्रह्म को इस रूप मे जो देखते है, बे ही निश्चयपूर्वक इसको जान पाते है | " मनसैवानुद्रष्टव्यम् ” इसका अर्थ यह है कि परमार्थ ज्ञान से संस्कृत व्यक्ति को आचार्य के उपदेश के अनुसार आचरण करके ही इस ब्रह्मात्मस्वरूप को देखना चाहिये । यद्यपि यह स्वरूप मन का विषय नही है, तथापि श्रवण, मनन इत्यादि से संस्कृत मन उसी रूप में रंग जाता है । इसीलिये यहाँ द्रष्टव्य पद का प्रयोग किया गया है । इस तरह यह ब्रह्मस्वरूप फल व्याप्ति का विषय न होने पर भी वृत्ति व्याप्ति का विषय बन सकता है । अर्थात् ब्रह्म के स्वरूप की उपलब्धि यद्यपि हमको नही हो सकती, किन्तु उस अन्तःकरण की वृत्ति की हमको उपलब्धि हो सकती है, जो कि बाह्य विषयों से निवृत्त होकर ब्रह्म के पारमार्थिक स्वरूप की ओर आगे बढती "नेह नानास्ति किञ्चन " इसका अभिप्राय यह है कि जब इस ब्रह्म का दर्शन होता है, तो फिर कही भी नानात्व अर्थात् भेद के दर्शन नही होते । इस तरह से ब्रह्म में सजातीय, विजातीय और स्वगत सभी तरह के भेद निषिद्ध है । जैसे यहाँ पृथ्वी पर कोई घडा नही है, ऐसा कहने पर सभी तरह के घट का निषेध मान लिया जाता है, उसी तरह यहां भी समझना चाहिये । अज्ञजन नानात्व के न रहने पर भी उसकी कल्पना कर लेते हैं । इसीलिये इस तरह से सब जगह नानात्व को देखने वाला व्यक्ति मृत्यु के चंगुल मे फस जाता है, अतः ब्रह्म के इस अद्वैतस्वरूप को वैराग्य प्रवण मन को सहायता से समझना चाहिये, क्मोकि यह ब्रह्म अप्रमेय है, इसलिये कि यह एक है, इसमें कर्मकर्तृभाव नही बन सकता । श्रुति भी कहती है कि "किसको किससे देखेगा" । सारे शास्त्र इस तत्त्व का निरूपण प्रभाता, प्रमाण आदि व्यापारो का निषेध करते हुए ही करते हैं, अभिधान और अभिधेय सम्बन्ध के प्रतिपादक वाक्यों के सहारे नही । विद्वान् मनुष्य को चाहिये कि प्रत्यक्ष चैतन्य से अभिन्न इस आत्मा को शास्त्रो से और गुरुजनो के उपदेश से जानकर उसके सम्बन्ध मे अपनी प्रज्ञा को स्थिर करे ।
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वेदार्थपारिजात १३ ९५ यत्तु -' मोक्षपदे' श्वेतनीलहरितपीतलोहितगुणा लोकलोकान्तरा प्रकाशन्ते' इति, तत्तु स्वर्गाद्यविशेषप्रपञ्च- प्राप्तिरेव न मोक्षप्राप्ति, विषयेन्द्रियमनोयोगस्य ससारस्यैवोपलब्धे । यदपि 'शुद्धस्वरूप पुण्यकृत पुण्येन मोक्षसुख प्राप्नोति इति 1। तदपि न, कृतकस्यानित्यत्वानपायात् । ' नास्त्यकृत कृतेन ( मु ० १२ १२) इति श्रुतिविरोधाच्च । यदुक्तम्—' परमेश्वरः प्राणस्य प्राण, चक्षुषश्चक्षु, श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्न मनसो मनः' इति, तदपि न युक्तम्, अनुपपत्ते । नहि प्राणचक्षुरादीनां प्राणान्तरं चक्षुरन्तरं वा दृश्यते उपपद्यते वा, दीपे दीपान्तरस्येव नैरर्थक्यापत्ते । यदप्युक्तम्— 'ब्रह्म चेतन मात्रस्वरूपं प्रमाद- राहित्येन व्यापको भूत्वा सर्वत्रस्थिरम्' इति, तदपि न, मृत्यो. स मृत्युम् ' (बृ० ३० ४| ४| १९) इति श्रुतौ तादृगर्थबोधकपदा-भावात् । ब्रह्मणि प्रमादासम्भवेन निषेधवैयर्थ्यात् । जीवे भवति प्रमादो न ब्रह्मणि । 'तं ज्ञात्वा विशालबुद्धि कुर्वीत' इत्यपि त युक्तम्, प्रज्ञाशब्दस्य विशालार्थकत्वानुपपत्ते । ' स होवाच । एतद्वै तदक्षर गागि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्व ह्रस्वम दीर्घम लोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्व- नाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनामागोत्रम जरममरमभयममृतमरजोऽशब्दम-विवृतमसवृतमपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्य न तदश्नाति किचन न तदश्नाति कश्चन ' (बृ० उ० ३३८८) इत्येतन्मन्त्र-विवृतो यदुक्तम्– 'हे गागि तद्ब्रह्म नाशस्थूलसूक्ष्मलब्ध रोहितच्छायान्धकारवाय्वाकाशस ङ्गशब्दस्पर्शगन्धविकाससङ्कोच- पूर्वापरान्तरबाह्यसर्वविधैर्दोषैर्गुणैश्च रत्तिो मोक्षस्वरूपः, इति, तदपि न तवापसिद्धान्तापातात् । त्वया तस्य सविशेष. "मोक्ष पद में शुक्ल = श्वेत, नील शुद्ध घनश्याम, पिंगल पीला श्वेत, हरित हरा और लोहित लाल ये सब गुण " ),वाले लोकलोकान्तर ज्ञान से प्रकाशित होने है । पृ० २१६ यह व्याख्या तो गलत है क्योकि स्वर्ग प्रभृति के समान सुखमय प्रपंचात्मक लोको की प्राप्ति को मोक्ष नही कहा जा सकता, क्योकि इनसब में विषय, इन्द्रिय, मन आदि के संयोग की उपस्थिति के कारण प्रपचात्मक ससार की ही प्रतीति होती है । ''शुद्ध स्वरूप और पुण्य का करने वाला पुरुष मोक्ष सुख को प्राप्त होता है" ( पृ० २१६ ) यह कथन भी गलत हैं," क्योकि जो कृतक है, वह अनित्य अवश्य होगा । " यह अकृत्रिम मोक्ष कर्मकाण्ड से नही प्राप्त हो सकता" इस श्रुति से आपकी व्याख्या का विरोध भी पडेगा । " परमेश्वर प्राण का प्राण, चक्षु का चक्षु, श्रोत्र का श्रोत्र, अन्न का अन्न और मन का मन है " ( पू० ३१६ ) इस तरह की व्याख्या भी उचित नही है, क्योकि प्राण, चक्षु आदि का कोई दूसरा प्राण, चक्षु आदि न तो दिखाई पडता है और न यह युक्ति से पुष्ट ही हो सकता है । जैसे एक दीपक को प्रकाशित करने के लिये दूसरे दीपक की आवश्यकता नही रहती, उसी तरह से एक चक्षु के लिये भी दूसरे चक्षु आदि की कोई आवश्यकता नही पायी जा सकती ।" वह ब्रह्म एक और चेतन मात्र स्वरूप है तथा प्रमाद रहित और व्यापक होकर सब मे स्थिर है " ( पृ० ३१७ ) यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि " मृत्यो स मृत्यु " इत्यादि श्रुति में इस तरह के अर्थ के बोधक पद विद्यमान नही है । ब्रह्म मे प्रमाद की संभावना ही नही है, तब उसका निषेध व्यर्थ हो जायगा । प्रमाद की संभावना जीव में रहती है, ब्रह्म मे नही । अतः श्रुति का ब्रह्म मे प्रमाण का निषेध करने का क्या तुक हो सकता है । इस प्रकार का अर्थ करने पर श्रुति में ही दोष आ जावेगा, जो कि कथमपि नही माना जा सकता, अत इस तरह का अर्थ करना अपने ही अज्ञान को प्रकट करता है । "ज्ञानी लोग उसी को जानकर अपनी बुद्धि को विशाल करे " ( पृ० ३१७ ) यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि प्रज्ञा शब्द का अर्थ किसी भी तरह से विशाल नही हो सकता । "स होवाच " इत्यादि मन्त्र की व्याख्या, दयानन्द ने इस तरह से की है-" याज्ञवल्क्य कहते है - 'हे गागि, यह 2,,,,,,,,,,,,,,परब्रह्म स्थूल सूक्ष्म लघु दीर्घ लाल चिक्कन छाया अन्धकार वायु आकाश संग शब्द स्पर्श गन्ध रस नेत्र, कर्ण, वाकू, मन, तेज, प्राण, मुख, नाम, गोत्र, वृद्धावस्था, मरण, भय, आकार, विकास, संकोच, पूर्व, ऊपर, भीतर, बाहर इन सब दोषो और गुणो से रहित मोक्षस्वरूप है " ( पृ० २१८ ), किन्तु यह भी गलत है, क्योंकि ऐसा मानने पर आपको अपने ही सिद्धान्त के विपरीत बात माननी पड जायगी । वह यह है कि आप तो ईश्वर को सविशेष, अर्थात् अनेक विशेषणो से युक्त मानते हैं तब इस श्रुति में आप उसको निर्विशेष कैसे मान सकते हैं । "वह आकार पदार्थ के समान किसी को प्राप्त नही होता" 1
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वेदार्थपारिजात १३ ९ ६ त्वाङ्गीकारात् । यदुक्तम् -'तत्प्रापको न कश्चित्' इति तदपि विरुद्धम् त्वयैव शुद्धसाधककर्तृकतत्प्राप्तेरुक्तत्वात् 'न तद- नाति किञ्चन' (बृ० उ० ३३८८ ) इत्यस्याविवृतत्वाच्च । :- श्रीशाङ्करभाष्यादिसम्मतस्त्वय तदर्थ हे गागि कस्मिन्तु खल्वाकाश ओत प्रोतश्चेति पृष्टवत्यसि । एतद्वै तदक्षरं यन्न क्षीयते न क्षतीति वा तदक्षर ब्राह्मणा ब्रह्मविदो वदन्ति । ब्राह्मणा अभिवदन्तीत्युक्त्या नाहमवाच्य वक्ष्यामि न च न प्रतिपद्येयमिति । एवमपाकृते प्रश्ने ब्रूहि किं तदिति गार्ग्य प्रत्युक्तं नाह— अस्थूलं स्थूलादन्यत् तर्हि किमणु? तत्राह - अनणु नापि ह्रस्व न वा दीर्घ चतुर्भि परिमाणप्रतिषेधैर्द्रव्यधर्म प्रतिषिद्ध. । न द्रव्य तदक्षरवित्यर्थः । तर्हि लोहितो- गुणोऽस्तु न लोहितोऽपि आग्नेयो गुणो लोहितो न तदक्षरं लोहितं न स्नेहो न वा छायारूपं तत् । नापि तमः । अवायु तदना-काशं भवेत्तु सङ्गात्मकं तदपि न न रसो नापि गन्धः, चक्षुरप्येव भवतीति । तत्राहाचक्षुष्कम् 'पश्यत्यचक्षुः' ( श्वे ० उ ० ३।१ ९ ) इति मन्त्रवर्णात् । अश्रोत्रमतेजस्कमादित्यादिवत्प्रकाशात्मकम्, अप्राणम् प्राण आध्यात्मिको वायुरपि न तत् । न सुख नान्तरं |न बाह्यम् । अमात्र मीयते येन तन्मात्रम्, तदपि न । नान्तरं न बाह्यं न कार्यं न वा कारणं तत्, तत्रैव कार्यरणादि- प्रपञ्चाध्यारोपणात् ॥ अस्तु तर्हि भक्षयितृ तदिति, तदपि न, अर्थात् न तत् कञ्चननाश्नाति । तर्हि भक्ष्यमस्तु तदपि न, तदक्षरं न कश्चनाश्नाति । 'एकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६।२।१ ) तदतो न केनचिद्विशिष्यते । एतेन सर्वप्रपञ्चनिषेधाधिष्ठान साक्षि- नित्यविज्ञानभूतमेव तत् । ' येन यज्ञेन दक्षिणया समक्ता इन्द्रस्य संख्यममृतत्वमानशा तेभ्यो भट्टमङ्गिरसो वो अस्तु प्रतिगृभ्णीत मानवं (पृ० २१८ ) यह कथन भी आपके सिद्धान्त के विपरीत पडेगा, क्योकि आपने ही यह बताया । शुद्ध साधनों द्वारा उसको प्राप्त किया जा सकता है । 'न तदश्नाति किञ्चन' श्रुति के इस अश की तो दयानन्द ने व्याख्या की ही नहीं है । श्री शाकरभाष्य के अनुसार इसका अर्थ यह होगा - हे गागि, तुमने पूछा है कि यह आकाश किसमें ओत-प्रोत है? आकाश जिसमे ओत-प्रोत हैं, यह अक्षर तत्व है, जो कि कभी क्षीण नही होता । यह बाल विद्वान् ब्राह्मणो की कही हुई है । इसका यह अभिप्राय है कि इस अवाच्य तत्व का मै उपदेश कैसे कर सकता हूँ? और बिना बताये मुझे कैसे चैन पडेगा । अत विद्वानो ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है, वही मैं तुमको बता दे रहा हूँ । इस तरह से पहले प्रश्न का तो उत्तर हो गया, किन्तु याज्ञवल्क्य ने अपने मन में सोचकर कि गार्गी इस पर फिर पूछ सकती है कि वह अक्षर तत्व क्या है? तो इसका उत्तर ये अपने से ही दे रहे है कि वह अक्षर तत्व स्थूल है, स्थूल से भिन्न है । तो क्या वह अणु है? नही, वह अणु भी नही है । वह न ह्रस्व है और न दीर्घ । इस तरह से इन चार निषेधों से परिमाण का निषेध करते हुए यह बताया गया है वह तत्व द्रव्यगत धर्मों से रहित है । अर्थात् वह अक्षर तत्त्व द्रव्यात्मक नहीं है । तब यह तत्त्व लाल रंग वाला मान लिया जाय? नही, श्रुति इसका भी निषेध करती है कि लौहित्य तो अग्नि का गुण है, यह अक्षर लोहित नही हो सकता, न वह स्नेह है, न छाया रूप और न तमरूप ही है । वह वायु और आकाश-त्मक नही है और न संगात्मक ही है । वह रस, गन्ध आदि से भी रहित है । क्या वह चक्षु हो सकता है? नही, वह चक्षु आदि इन्द्रियों से युक्त भी नही है, क्योंकि श्रुति में बताया गया है कि "वह ब्रह्म बिना आंख के ही देखता है" । वह श्रोत्र और तेज से रहित होते हुए भी आदित्य के समान प्रकाशात्मक है । वह अप्राण है, आध्यात्मिक अर्थात् शरीर के भीतर रहने वाला प्राणवायु भी वह नहीं है । वह वाह्य और आन्तर सुख से भी भिन्न है । वह अमात्र है, अर्थात् किसी वस्तु से नापा नही जा सकता । वह न , - 1तो आन्तर है और न बाह्य अर्थात् वह न तो कारण है और न कार्य । तो भी सारा कार्य कारण प्रपंच उसी में अध्यारोपित तब वह सबका भक्षक मान लिया जाय? किन्तु वह ऐसा भी नही है, अर्थात् वह किसी का भी भक्षक नही है । तब क्या वह भक्ष्य है! नही, उस अक्षर तत्त्व को कोई दबा नही सकता । "एकमेवाद्वितीयम्" इस श्रुति के अनुसार वह तो अकेला है, अतः इसको किसकी अपेक्षा विशिष्ट माना जायगा अथवा जब यह अकेला ही है, तब यह किसको खायगा अथवा कौन इसको खायगा? अतः प्रपंचात्मक जगत् की सभी वस्तुओं के निषेध का अधिष्ठान ( आश्रय ) यह ब्रह्मतत्त्व सबका साक्षी और नित्य विज्ञान स्वरूप है । " येन यज्ञेन ० " इत्यादि मन्त्र के द्रष्टा ऋषि नाभानेदिष्ट है । इसमें माङ्गिरस की स्तुति है, अतः वे ही इसके देवता
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वेदर्थ जास १३ ९७ ' [ ) |सुमेधस ऋ० स० १०/६२१ येन ज्ञेनेति नामानेतिष्यस्यान् । अङ्गिण निर्देन्ता । यज्ञेनैकादशाद्या पडन्ति स्तुतिरित्यनुक्रमणात् । नासालेदिष्टः स्वःसत्रमासीदुवतवान्-' 'म प्रतिगृह्णीयुपभ्य यज्ञ प्रज्ञापयामीति प्रदुकान तदुदिष्ट शमति समादिष्टं वे त- ( ) | (रेवाणम् ५११४ इति वाह्मणानुसारेण मनु पुत्रेभ्यो दाय व्यभजन तै० ० ३ १ ९ ८ ॥ तस्मादस्या - ऽर्थ यज्ञेन यजनीयेन हविषा दक्षिणया ऋत्विग्भ्यो देयण मक्ता सङ्गता । अहीलेकाह नगगि कुर्वन्नो यूक्ष्म इन्द्रस्य सख्यं सखिकर्म जन एवासृतत्वम् अमरणधर्मदेवत्वम् आनय आनशिध्वे प्रातःस्थ । हे रिसतेभ्यो युष्मभ्य भई कल्याण कर्मास्तु हे सुमेधस. । सुप्रज्ञा ते यूयमिदानीमागत मान्व मनोः पुत्र मा प्रतिगृभ्णीन मयि प्रतिगृहीते सति यज्ञ साबु करिष्यामि तदर्थं प्रतिगृह्णीतेत्यर्थः । यदुक्तम्-'ज्ञानयज्ञेनात्मादिद्रव्याणा च दक्षिणारूपेण परमेश्वराय दानाच्च मुक्ता मोक्षमुखे प्रसीदन्ति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य सख्यमर्थात् तन्मित्रतया मोक्षभावमुपगतास्तेषामेव कृते भद्र भद्राख्यं मुखं नियतम् । अङ्गिरसस्तेषा मुक्ताना प्राणाः सुमेधसस्तेषामत्यन्त बुद्धिवर्धकाः मोक्षप्राप्त मनुष्य पूर्वमुक्ता स्वसमोपस्थ आनन्दे रक्षन्ति । पुनश्च ते ' ( )परस्परं स्वज्ञानेन प्रीतिपूर्वक पश्यन्ति मिलन्ति च पृ० २१८ इति । तदेतत्सर्वथा गाव्दन्यायवहिर्भूतमतीवो-, पहासास्पदम् मन्त्राक्षरार्थाननुगनगत् । कथञ्चिद् यज्ञपदेन ज्ञानयज्ञग्रहणे दक्षिणापदेन परमेश्वरायात्मादिद्रव्यदान-ग्रहणेऽपि समक्ता इत्यस्य मोक्षप्राप्ता इति कथमर्थ.? सख्यममृतत्व च समानविभक्तिकमिति कथं तयोर्हेतुमद्भाव. । न च मृद्घट इतिवत् सामानाधिकरण्येन । कार्यकारणभाव इति वाच्यम्, तद्वत् प्रकृत उपादानोपादेयभावासम्भवात् । सख्य त्वमृतत्वस्य निमित्तमेव 1। है । सर्वानुक्रमणी के ' यज्ञे० ' इत्यादि सूत्र से यह ज्ञात होता है । अपने पिता मनु को आज्ञा प्राप्त कर नाभानेदिष्ट सत्र का अनुष्ठान करने में लगे अङ्गिरसो के पास जाकर कहते है — मुझे आप लोग स्त्रीकार कीजिये, मै आप लोगो की इसका रहस्य समझाऊँगा । इसी बात को ऐतरेय ब्राह्मण में भी बताया गया है कि नाभानेदिष्ट सुत्र का पाठ करता है । यह मनु के पुत्र रामानेदिष्ट के द्वारा परि- दृष्ट है । इसी ब्राह्मण में मनु के द्वारा अपने पुत्रो को दाय का विभाग करने की वात वर्णित है । इस प्रसग को पृष्ठभूमि मे मन्त्र का अर्थ यह होगा - हे अंगिरसो, आप लोगों ने यजनीय हविव्य और ऋत्विजो को देय दक्षिणा से सयुक्त होकर अहील, एकाह-प्रभृति सत्रों का अनुष्ठान करते हुए इन्द्र की मित्रता अर्थात् अमरता ( देवत्व ) को प्राप्त किया है । आप लोगो का कल्याण हो । हे बुद्धि-मान् अगिरसो, आप लोग मनु के पुत्र मुझ नाभानेदिष्ट को ऋत्विक् के रूप में स्वीकार कीजिये । ऐसा करने पर मै आपके इस यज्ञ को और भी भली प्रकार से संपन्न करा सकूंगा, अतः आप लोग मुझे अवश्य स्वीकार कर लीजिये । "पूर्वोक्त ज्ञानरूप यज्ञ और आत्मा आदि द्रव्यो की परमेश्वर को दक्षिणा देने से वे मुक्तलोग मोक्ष सुख मे प्रसन्न रहते है । जो परमेश्वर के सख्य अर्थात् मित्रता से मोक्षभाव को प्राप्त हो गये है, उन्ही के लिये भद्र नाम सब कुछ नियत किये गये है । (अंगिरस. ) अर्थात् उनके जो प्राण है, वे ( सुमेधस ) उनकी बुद्धि को अत्यन्त बढानेवाले होते है । उस मोक्ष प्राप्त मनुष्य को पूर्व मुक्त लोग अपने समीप आनन्द मे रख लेते हैं और फिर वे परस्पर अपने ज्ञान से एक दूसरे को प्रीतिपूर्वक देखते और मिलते हैं" ( पृ० २१८ ) दयानन्द की यह सारी व्याख्या शाब्दिक पद्धति के विपरीत है, अतएव अतीव उपहासास्पद और मन्त्र के अक्षरो से असंबद्ध भी है । किसी तरह से यज्ञपद से ज्ञानयज्ञ का और दक्षिणा पद से परमेश्वर को आत्मा रूपी द्रव्य को देने की बात का सम- र्थन किया भी जा सकता है, किन्तु ' समता' पद से मोक्ष प्राप्ति के अर्थ का ग्रहण कैसे किया जा सकता है? सरल और अमृतत्व दोनों पद एक ही विभक्ति के हैं, इनमें कार्यकारण भाव कैसे बन सकता है? 'मृद्घट' शब्द मे जैसे एक ही विभक्ति के पदो मे सामाना- धिकरण्य के आधार पर कार्यकारणभाव बनता है, वैसे ही यहा नही बन सकता, क्योंकि वहा जैसे मिट्टी और घड़े का उपादान- उपादेय भाव बनता है, वैसा सम्बन्ध यहा नहीं बनता है । मित्रता अमृतता का निमित कारण बन सकता है, उपादान कारण नही । भद्र पद
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वेदार्थपारिजातः १३ ९८ , भद्रपद कल्याणवाचि न विशिष्टनियतमोक्षसुखपरम् निर्मूलत्वात् अमृतत्वेन गतार्थत्वाच्च । अङ्गिरसः सुमेधस इत्यस्य बुद्धिवर्धकाः कथमर्थः? बहुव्रीहिणा शोभनमेधावन्त इति प्रतीयमानार्थमुपेक्ष्य मेधाजनकत्वं कथमर्थः? नहि ; सम्भवति शक्येऽर्थे लक्ष्योऽर्थो ग्राह्यः लक्षणाबीजाभावात् । नचान्वयानुपपत्तिस्तात्पर्यानुपपत्तिर्वात्र बीजमुपलभ्यते । किं मोक्षदशानामपि मुक्तेषु प्राणा भवन्ति? ते च बुद्धि वर्धयन्ति? ओमिति चेत् कि तत्र मानम्? न चायं मन्त्र एव मानमिति वाच्यम्, तस्यान्यार्थताया उक्तत्वात् । प्राणा इन्द्रियाणि चोत्पत्तिमत्त्वादनित्या एवेति कथं मुक्तो तिष्ठन्ति? ? अन्यथा देहोऽपि किन्न तिष्ठेत् तथात्वेऽत्रैव देहप्राणवियोगस्यापि सम्भवे मोक्षे मरणमपि सम्भवत्येवेति साधु- साधितममृतत्वमिति । किश्च, ब्राह्मणानामप्यार्षत्वेन त्वया प्रामाण्यमभ्युपेयते । पूर्वोक्तैतरेयादिब्राह्मणैस्त्वस्य मन्त्रस्य नाभानेदिष्ट- मनुपुत्रकृताङ्गिरसा स्तुतिरेवार्थं उच्यते । अपर च वोऽस्तु मानवमित्यादिपदानामन्वयोऽभिप्रायो वा नोक्त एव । ,, स्वसमीपस्थे आनन्दे रक्षन्तीत्यप्युन्मत्तप्रलपितमेव ब्रह्मानन्दस्य सन्निकर्षविप्रकर्षानुपपत्तेः । लोक आनन्दो भुज्यते न त्वानन्दे स्थीयते, गुणस्य द्रव्याधारत्वानुपपत्ते । तस्मात् ये यज्ञेन प्रसिद्धेन देवतोद्देश्यकचरुपुरोडाश। दित्यागलक्षणेन ऋत्विग्भ्यो दातव्यदानरूपया तत्कर्मपारिश्रमिकदानरूपया समक्ताः संगता, तत्र यज्ञदक्षिणादानादिजन्यादृष्टसमवेता यूयमिन्द्रस्य सख्य समानधर्मत्वममृतत्वममरणधर्मत्व देवत्वमानश प्राप्ताःस्थ तेभ्यो, वो युष्मभ्य भद्र प्रसङ्गात्क्रमोत्कर्ष- सम्पत्तिरूपं भद्रमस्तु । तदर्थं •! हे अङ्गिरस ॥ हे सुमेधसः मानवं मनुपुत्रं मां नाभानेदिष्टं प्रतिगृभ्णीत । नहि कल्याण का वाचक है, विशिष्ट नियत मोक्ष अवस्था के सुख का इससे बोध नही होता, क्योकि इसमे कोई प्रमाण नही है और इस अर्थ की प्रतीति तो अमृत पद से ही हो जाती है, पुन. इस शब्द से उस अर्थ की प्रतीति कराना व्यर्थ है । अंगिरसः सुमेधस का अर्थ बुद्धिवर्धक कैसे हो सकता है? बहुव्रीहि समास के आधार पर 'सुन्दर प्रज्ञावाले 'इस प्रतीत हो रहे अर्थ की उपेक्षा कर उसका अर्थ मेघा को उत्पन्न करनेवाला कैसे किया जा सकता है? जबतक शब्द अर्थ का ग्रहण हो सकता हो, तबतक लक्ष्य अर्थ का ग्रहण नही करना चाहिये । यहा लक्षणा करने का कोई कारण नही प्रतीत होता । अन्वय की अनुपपत्ति या तात्पर्य की अनुपपत्ति होने पर ही लक्षणा की जाती है । क्या मोक्ष दशा मे भी मुक्त प्राणियों में प्राण की सत्ता रहती है और वे बुद्धि को बढानेवाले होते हैं? यदि आप इस बात को स्वीकार करते है तो इसमे प्रमाण क्या है? यह मन्त्र उसमे प्रमाण नही हो सकता, क्योकि यह हम बता चुके हैं कि इस मन्त्र का आपका किया गया अर्थ गलत है । प्राण और इन्द्रिया तो अनित्य है, अतः उनकी स्थिति उस नित्य मोक्षदशा में कैसे रह सकती है । यदि इन्द्रिया और प्राण उस समय रह सकते है, तो फिर शरीर क्यो नही रह सकता । यदि इस बात को भी आप मान ले तो जैसे इस संसार मे देह और प्राण का वियोग होता है, उसी तरह से मोक्षदशा मे भी इस स्थिति के उत्पन्न होने पर मरण की स्थिति को भी वहा मानना पड़ेगा । इस तरह से तो आपने बडी अच्छी तरह से मोक्षदशा की अमरता का प्रतिपादन किया? आप आप्त ऋषियो की रचना होने से ब्राह्मणो को प्रामाणिक मानते है । पूर्वोक्त ऐतरेय प्रभृति ब्राह्मणो में इस मन्त्र के द्वारा नाभानेदिष्ट नाम के मनु के पुत्र ने अगिरसो की स्तुति की है । यही बताया गया है । दूसरी बात इस मन्त्र का अर्थ करते समय आपने ' वोऽस्तु मानव' इत्यादि पदो का अन्वय अथवा अभिप्राय नही बताया है । वे परस्पर अपने पास के ज्ञान से एक दूसरे की रक्षा करते है, यह वथन भी पागल की बात जैसा है, क्योंकि ब्रह्मानन्द दशा के समीप या दूर होने का कोई प्रसंग नही हो सकता । लोक में आनन्द का उपभोग किया जाता है, उसमें रहा नही जाता, क्योकि आनन्द एक गुण है और इस गुण में द्रव्य की सत्ता नहीं रह सकता । इसलिये इस मन्त्र का यही अर्थ किया जा सकता है कि इस प्रसिद्ध यज्ञ से जिसमे कि देवता को उद्दिष्ट कर चरु पुरोडाश आदि द्रव्यों की हवि दी जाती है और ऋत्विजों को दी जाने वाली दक्षिणा से, जो कि उनको यज्ञ कराने के पारिश्रमिक के रूप मे प्राप्त होती है, संयुक्त होकर, यज्ञानुष्ठान दक्षिणादान प्रभृति से उत्पन्न अदृष्ट से भी संयुक्त होकर । हे अंगिरसो, आप लोग इन्द्र की समानता को अर्थात् अमरता को देवत्व को प्राप्त कर चुके हो, आपका कल्याण हो, आपके कर्म की समृद्धि हो, इसलिये हे बुद्धिमान् अंगिरसों! मनु के पुत्र मुझ नाभानेदिष्ट को आप लोग ऋत्विक् के रूप
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वेदार्थपारिजात १३ ९९ 1 ' व्यक्तिनामभयात् प्रसिद्धार्थत्यागो युक्त शब्दप्रामाण्यविदा प्रतीतेरेव शरणत्वात् । चतुर्थं मन्त्रगतात् अयं नाभा वदति वल्गु' इति लिङ्गाच्चात्र नाभानेदिष्टकृतस्तुतिर्ज्ञायते । वस्तुतस्तु नाय मन्त्रो मोक्षनिरूपण उपयुज्यते । 'स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वद भुवनानि विश्वा । यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त || ” ( वा० सं ० ३२ १० ) इत्यस्य व्याख्याने यदुक्तम् -'स परमेश्वरो नो बन्धुर्दु खनाशक जनिता सर्वसुख- पालकः स एव सर्वकामाना पूरक. सर्वलोकाना वेदिता यत्र देवा विद्वासो मोक्षं प्राप्य सदा सुखिनो भवन्ति ते तृतीये ' ( ),, धामन् धाम्नि शुद्धसत्त्वसहिता सर्वोत्तमसुखेषु स्वाच्छन्द्येन रमन्ते पृ० २१८ इति तदपि न विचारचारु प्रसिद्धार्थत्यागस्यैव दोषत्वात् । तथाहि—स परमेश्वरो नोऽस्माक बन्धुर्बन्धु वन्मान्योऽन्तरङ्गश्चेत्येवार्थ., कारणभूताधारो वार्थ:? बध्यतेऽस्मिन्निति बन्धुरिति व्युत्पत्तेः । प्राणबन्धन हि सोम्य मनः, ( छा० ६८२ ) इति श्रुते । मन इति मन , ' ' ( ), उपाधिको जीव प्राण इति सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् छा० ६ २ १ इत्युक्त सत्पदार्थः परमात्मा बद्धयते- ऽस्मिन्निति बन्धनं प्राण. परमात्मा बन्धनमाधारो यस्य मन उपाधिकस्य जीवस्य स इति तदर्थ । जनिता जनयिता 'जनिता मन्त्रे' ( पा ० सू० ६ |४ | ५३ ) इति णिचो लोपः । स परमेश्वरो विधाता धारयिता सविश्वा सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि धामानि स्थानानि च वेद जानाति । देवा अग्न्यादय, तृतीये धामन् धाम्नि स्थाने स्वर्गात्मके अध्यैरयन्त स्वेच्छया वर्तन्ते । कीदृशाः? अमृत मोक्षप्रापक ज्ञानं यत्र ब्रह्मणि आनशाना अश्नुवते । 'बहुलं छन्दसि' ( पा ० सू० २०४/ ७६) दित्वेन द्वित्वे शानच्यभ्यासस्य नुगागमे रूपम् । मोक्षप्रापक ज्ञान प्राप्ता सन्तो देवा. स्वर्गे मोदन्ते । नहि मोक्षसुख तृतीये धाम्न्येव भवति, तस्य ब्रह्मरूपत्वेन व्यापकत्वात् तस्मात् स्वर्ग एव तृतीयं धाम न मोक्षः । अत एवामृतपदमपि इत्यर्द्धा मे स्वीकार कर लीजिये । यहाँ व्यक्ति के नाम के डर से प्रसिद्ध अर्थ का परित्याग करने मे कोई तुक नही है, क्योकि हमारे जैसे शब्दो का सर्वोपरि प्रामाण्य मानने वालो के मत में प्रतीति की ही शरण में जाना पडता है, अर्थात् जिस शब्द का जो अर्थ प्रतीत हो रहा है, उससे मानना ही पड़ता है । इस सूक्त के चतुर्थ मन्त्र में स्पष्ट ही इस नाम का उल्लेख है । इस प्रमाण के आधार पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस मन्त्र में नाभानेदिष्ट के द्वारा अगिरसो की स्तुति की गई है । वास्तव में इस मन्त्र का मोक्ष दशा के निरूपण से कोई कतई सम्बन्ध नही । इस मन्त्र का मोक्ष के निरूपण मे उपयोग नही किया जा सकता । "स नो बन्धु० " इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने लिखा है- "वही परमेश्वर हमारा बन्धु अर्थात् दुख का नाश करने वाला, जनिता । सब सुखो को उत्पन्न और पालन करने वाला है । तथा वही सब कामो को पूर्ण करता और सब लोको को जानने वाला है । जिनमें कि देव अर्थात् विद्वान् लोग मोक्ष को प्राप्त होकर सदा आनन्द मे रहते है और तीसरे धाम अर्थात् शुद्ध सत्त्व से संयुक्त होकर सर्वोत्तम सुख मे सदा स्वच्छन्दता से रमण करते हैं " ( पृ० २१८ ) । यह व्याख्या भी विचार करने पर गलत सिद्ध होती है । इसमे सबसे बडा दोष है प्रसिद्ध अर्थ का परित्याग | वह परमेश्वर हमारा बन्धु अर्थात् बन्धु की तरह मान्य और अन्तरंग है, यही अर्थ किया जायगा? अथवा वह हमारा कारण है, आधार है, यह अर्थ किया जायगा? व्यक्ति जिसमें बंधता है, उसको बन्धु कहते है, इस व्युत्पत्ति के आधार पर और "हे सोम्य, यह जीव प्राणों से बँधा रहता है, इस श्रुति के आधार पर जिसमे कि मन शब्द से मन की उपाधि वाले जीव का ग्रहण किया जाता है और प्राण शब्द से "हे सोम्य, प्रारंभ में सब कुछ सत् था" इस श्रुति के आधार पर सत्पदार्थ परमात्मा का ग्रहण किया जाता है । यह प्राण अर्थात् परमात्मा बन्धन अर्थात् आधार है, जिस मन की उपाधि वाले जीव का, इस व्युत्पतिलभ्य अर्थ के आधार पर बन्धुपद यहाँ परमात्मा का बोधक है । वही परमात्मा सबको पैदा करने वाला है । यहाँ णिच् प्रत्यय का बोध हो जाता है । वह परमात्मा सबको धारण करने वाला है और सारे लोकों को तथा उनमें रहने वाले सब प्राणियों को जानता है । अग्नि प्रभृति देवतागण अपनी इच्छा से तृतीय धाम स्वर्ग में निवास करते हैं और वहीं रहते हुए ये देवगण मोक्ष प्रापक ज्ञान की सहायता से ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं । अश् धातु का द्वित्व, शानच् प्रत्यय और अभ्यास में नुक् का आगम होने पर 'आनशान' पद बनता है । मोक्ष के प्रापक ज्ञान को
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वेदार्थपारिजातः १३ ९८ । भद्रपद कल्याणवाचि न विशिष्टनियतमोक्षसुखपरम् निर्मूलत्वात् अमृतत्वेन गतार्थत्वाच्च । अङ्गिरसः सुमेधस इत्यस्य बुद्धिवर्धका. कथमर्थः? बहुव्रीहिणा शोभनमेधावन्त इति प्रतीयमानार्थमुपेक्ष्य मेधाजनकत्वं कथमर्थः? नहि सम्भवति शक्येऽर्थे लक्ष्योऽर्थो ग्राह्यः, लक्षणाबीजाभावात् ॥ नथान्वयानुपपत्तिस्तात्सर्यानुपपत्तिर्वात्र बीजमुपलभ्यते ॥ कि मोक्षदशायामपि मुक्तेषु प्राणा भवन्ति? ते च बुद्धि वर्धयन्ति? ओमिति चेत् कि तत्र मानम्? न चायं मन्त्र एव मानमिति वाच्यम्, तस्यान्यार्थताया उक्तत्वात् । प्राणा इन्द्रियाणि चोत्पत्तिमत्त्वादनित्या एवेति कथ मुक्तो तिष्ठन्ति? ? अन्यथा देहोऽपि किन्न तिष्ठेत् तथात्वेऽत्रैव देहप्राणवियोगस्यापि सम्भवे मोक्षे मरणमपि सम्भवत्येवेति साधु- साधितममृतत्वमिति । किञ्च ब्राह्मणानामप्यार्षत्वेन त्वया प्रामाण्यमभ्युपेयते । पूर्वोक्तैतरेयादिब्राह्मणैस्त्वस्य मन्त्रस्य नाभानेदिष्ट- मनुपुत्रकृताङ्गिरसा स्तुतिरेवार्थं उच्यते । अपर च वोऽस्तु मानवमित्यादिपदानामन्वयोऽभिप्रायो वा नोक्त एव । ,, स्वसमीपस्थे आनन्दे रक्षन्तीत्यप्युन्मत्तप्रलपितमेव ब्रह्मानन्दस्य सन्निकर्षविप्रकर्षानुपपत्तेः । लोक आनन्दो भुज्यते न त्वानन्दे स्थीयते, गुणस्य द्रव्याधारत्वानुपपत्ते । तस्मात् ये यज्ञेन प्रसिद्धेन देवतोद्देश्यकचरुपुरोडाश। दित्यागलक्षणेन ऋत्विग्भ्यो दातव्यदानरूपया तत्कर्मपारिश्रमिकदानरूपया समक्ताः संगता, तत्र यज्ञदक्षिणादानादिजन्यादृष्टसमवेता यूयमिन्द्रस्य सख्यं समानधर्मत्वममृतत्वममरणधर्मत्व देवत्वमानश प्राप्ताःस्थ तेभ्यो, वो युष्मभ्यं भद्र प्रसङ्गात्क्रमोत्कर्ष -! |1 सम्पत्तिरूपं भद्रमस्तु । तदर्थं हे अङ्गिरसः हे सुमेधसः मानवं मनुपुत्रं मां नाभानेदिष्टं प्रतिगृभ्णीत । नहि कल्याण का वाचक है, विशिष्ट नियत मोक्ष अवस्था के सुख का इससे बोध नही होता, क्योंकि इसमे कोई प्रमाण नही है और इस अर्थ की प्रतीति तो अमृत पद से उस अर्थ की प्रतीति कराना व्यर्थ है । अंगिरसः सुमेधस का अर्थ ? से ही हो जाती है, पुन. इस शब्द ' ' बुद्धि कैसे हो सकता है बहुव्रीहि समास के आधार पर सुन्दर प्रज्ञावाले इस प्रतीत हो रहे अर्थ की उपेक्षा कर उसका अर्थ मेघा को उत्पन्न करनेवाला कैसे किया जा सकता है? जबतक शब्द अर्थ का ग्रहण हो सकता हो, तबतक लक्ष्य अर्थ का ग्रहण नही करना चाहिये । यहा लक्षणा करने का कोई कारण नही प्रतीत होता । अन्वय की अनुपपत्ति या तात्पर्य की अनुपपत्ति होने पर ही लक्षणा की जाती है । क्या मोक्ष दशा मे भी मुक्त प्राणियों में प्राण की सत्ता रहती है और वे बुद्धि को बढानेवाले होते है? यदि आप इस बात को स्वीकार करते हैं तो इसमे प्रमाण क्या है? यह मन्त्र उसमें प्रमाण नही हो सकता, क्योकि यह हम बता चुके है कि इस मन्त्र का आपका किया गया अर्थ गलत है । प्राण और इन्द्रिया तो अनित्य है, अत उनकी स्थिति उस नित्य मोक्षदशा में कैसे रह सकती है । यदि इन्द्रिया और प्राण उस समय रह सकते है, तो फिर शरीर क्यो नही रह सकता । यदि इस बात को भी आप मान ले तो जैसे इस संसार में देह और प्राण का वियोग होता है, उसी तरह से मोक्षदशा मे भी इस स्थिति के उत्पन्न होने पर मरण की स्थिति को भी वहा मानना पडेगा । इस तरह से तो आपने बड़ी अच्छी तरह से मोक्षदशा की अमरता का प्रतिपादन किया? आप आप्त ऋषियों की रचना होने से ब्राह्मणो को प्रामाणिक मानते है । पूर्वोक्त ऐतरेय प्रभृति ब्राह्मणों में इस मन्त्र के द्वारा नाभानेदिष्ट नाम के मनु के पुत्र ने अगिरसो की स्तुति की है । यही बताया गया है । दूसरी बात इस मन्त्र का अर्थ करते समय आपने 'वोऽस्तु मानव' इत्यादि पदो का अभ्वय अथवा अभिप्राय नही बताया है । वे परस्पर अपने पास के ज्ञान से एक दूसरे की रक्षा करते हैं, यह कथन भी पागल की बात जैसा है, क्योकि ब्रह्मानन्द दशा के समीप या दूर होने का कोई प्रसग नही हो सकता | लोक में आनन्द का उपभोग किया जाता है, उसमें रहा नहीं जाता, क्योंकि आनन्द एक गुण है और इस गुण में द्रव्य की सत्ता नही रह सकता । इसलिये इस मन्त्र का यही अर्थ किया जा सकता है कि इस प्रसिद्ध यज्ञ से जिसमें कि देवता को उद्दिष्ट कर चरु पुरोडाश आदि द्रव्यों की हवि दी जाती है और ऋत्विजो को दी जाने वाली दक्षिणा सेJ, जो कि उनको यज्ञ कराने के पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त होती है, संयुक्त होकर, यज्ञानुष्ठान दक्षिणादान प्रभृति से उत्पन्न अदृष्ट से भी संयुक्त होकर । हे अंगिरसो, आप लोग इन्द्र की समानता को अर्थात् अमरता को? देवत्व को प्राप्त कर चुके हो, आपका कल्याण हो, आपके कर्म की समृद्धि हो, इसलिये हे बुद्धिमान् अंगिरसों! मनु के पुत्र मुझ नाभानेदिष्ट को आप लोग ऋत्विक् के रूप