वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 501–510
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 501–510
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वेदार्थपारिजात. १३ ९९ , ' व्यक्तिनामभयात् प्रसिद्धार्थत्यागो युक्त शब्दप्रापाण्यविदा प्रतीतेरेव गरणत्वात् । चतुर्थ मन्त्रगतात् अयं नाभा वदति वल्गु' इति लिङ्गाच्चात्र नाभानेदिष्टकृतस्तुतिर्ज्ञायते । वस्तुतस्तु नाय मन्त्रो मोक्षतिरूपण उपयुज्यते । ' स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वद भुवनानि विश्वा । यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥ " ( वा ० सं ० ३२| १० ) इत्यस्य व्याख्याने यदुक्तम् -'स परमेश्वरो नो बन्धुर्दु.खनाशक. जनिता सर्वसुख-पालकः स एव सर्वकामाना पूरक. सर्वलोकाना वेदिता यत्र देवा विद्वासो मोक्षं प्राप्य सदा सुखिनो भवन्ति ते तृतीये . ' ( ),, धामन् धाम्नि शुद्धसत्त्वसहिता सर्वोत्तमसुखेषु स्वाच्छन्द्येन रमन्ते पृ ० २१८ इति तदपि न विचारचार प्रसिद्धार्थत्यागस्यैव दोषत्वात् । तथाहि—स परमेश्वरो नोऽस्माक बन्धुबन्धु वन्मान्योऽन्तरङ्गरचेत्येवार्थ., कारणभूताधारो वार्थ:? बध्यतेऽस्मिन्निति बन्धुरिति व्युत्पत्तेः । प्राणबन्धन हि सोम्य मनः, ( छा० ६८२ ) इति श्रुते । मन इति मन , ' ' ( | ).., उपाधिको जीव प्राण इति सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् छा० ६ २ १ इत्युक्त सत्पदार्थ परमात्मा बद्धयते- ऽस्मिन्निति बन्धन प्राण परमात्मा बन्धनमाधारो यस्य मन उपाधिकस्य जीवस्य स इति तदर्थ' । जनिता जनयिता 'जनिता मन्त्रे ' ( पा ० सू० ६ |४| ५३ ) इतिणिचो लोपः । स परमेश्वरो विधाता धारयिता सविश्वा सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि धामानि स्थानानि च वेद जानाति । देवा अग्न्यादयः, तृतीये धामन् धाम्नि स्थाने स्वर्गात्मके अध्यैरयन्त स्वेच्छया वर्तन्ते । कीदृशाः? अमृत मोक्षप्रापक ज्ञानं यत्र ब्रह्मणि आनशाना अश्नुवते । 'बहुलं छन्दसि' (पा० सू० २०४/७६) दित्वेन द्वित्वे शानच्यभ्यासस्य नुगागमे रूपम् । मोक्षप्रापक ज्ञान प्राप्ता सन्तो देवा स्वर्गे मोदन्ते । नहि मोक्षसुखं तृतीये धान्येव भवति, तस्य ब्रह्मरूपत्वेन व्यापकत्वात् तस्मात् स्वर्गं एव तृतीयं धाम न मोक्ष । अत एवामृतपदमपि इत्यशे मे स्वीकार कर लीजिये । यहाँ व्यक्ति के नाम के डर से प्रसिद्ध अर्थ का परित्याग करने में कोई तुक नही है, क्योकि हमारे जैसे शब्दो का सर्वोपरि प्रामाण्य मानने वालो के मत में प्रतीति की ही शरण में जाना पडता है, अर्थात् जिस शब्द का जो अर्थ प्रतीत हो रहा है, उसको मानना ही पडता है । इस सूक्त के चतुर्थ मन्त्र में स्पष्ट ही इस नाम का उल्लेख है । इस प्रमाण के आधार पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस मन्त्र में नाभानेदिष्ट के द्वारा अगिरसों की स्तुति की गई है । वास्तव में इस मन्त्र का मोक्ष दशा के निरूपण से कोई कतई सम्बन्ध नहीं है । इस मन्त्र का मोक्ष के निरूपण मे उपयोग नही किया जा सकता । "स नो बन्धु०" इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने लिखा है-"वही परमेश्वर हमारा बन्धु अर्थात् दु.ख का नाश करने वाला, जनिता ) सब सुखो को उत्पन्न और पालन करने वाला है । तथा वही सब कामो को पूर्ण करता और सब लोको को जानने वाला है । जिनमें कि देव अर्थात् विद्वान् लोग मोक्ष को प्राप्त होकर सदा आनन्द मे रहते है और तीसरे धाम अर्थात् शुद्ध सत्त्व से संयुक्त होकर सर्वोत्तम सुख मे सदा स्वच्छन्दता से रमण करते हैं " ( पृ० २१८ ) । यह व्याख्या भी विचार करने पर गलत सिद्ध होती है । इसमे सबसे बडा दोष है प्रसिद्ध अर्थ का परित्याग | वह परमेश्वर हमारा बन्धु अर्थात् बन्धु की तरह मान्य और अन्तरंग है, यही अर्थ किया जायगा? अथवा वह हमारा कारण है, आधार है, यह अर्थ किया जायगा 2 व्यक्ति जिसमें बंधता है, उसको बन्धु कहते है, इस व्युत्पति के आधार पर और "हे सोम्य, यह जीव प्राणो से बँधा रहता है, इस श्रुति के आधार पर जिस मे कि मन शब्द से मन की उपाधि वाले जीव का ग्रहण किया जाता है और प्राण शब्द से "हे सोम्य, प्रारंभ में सब कुछ सत् था" इस श्रुति के आधार पर सत्पदार्थ परमात्मा का ग्रहण किया जाता है । यह प्राण अर्थात् परमात्मा बन्धन अर्थात् आधार है, जिस मन की उपाधि वाले जीव का इस व्युत्पतिलभ्य अर्थ के आधार पर बन्धुपद यही परमात्मा का बोधक है । वही परमात्मा सबको पैदा करने वाला है । यहीं णिच् प्रत्यय का बोध हो जाता है । वह परमात्मा सबको धारण करने वाला है और सारे लोकों को तथा उनमें रहने वाले सब प्राणियों को जानता है । अग्नि प्रभृति देवतागण अपनी इच्छा से तृतीय धाम स्वर्ग में निवास करते हैं और वहीं रहते हुए ये देवगण मोक्ष प्रापक ज्ञान की सहायता से ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं । अशू धातु का द्वित्व, शानच् प्रत्यय और अभ्यास में नुक् का आगम होने पर ' आनशान ' पद बनता है । मोक्ष के प्रापक ज्ञान को
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वेदार्थपारिजात: १४०० न मोक्षपरम्, स्वर्गस्य मोक्षरूपत्वाभावात् । तस्मादमृतत्वसाधके ब्रह्मात्मज्ञान एवात्रामृतपदप्रयोग । तच्च सम्भवत्येव स्वर्गेऽपि । '.. यदप्युक्तम्- जीव परिच्छिन्नोऽनादिरनन्तश्च परमेश्वराद्भिन्नो ज्ञानादिगुणक सुकृतदुष्कृतानुष्ठाने स्वतन्त्र, तद्विपाकदुखाद्युपभोगेऽस्वतन्त्र ईश्वराधीनः स्वरूपतो न बद्धो न मुक्तः, दुरदृष्टाधीनमस्य देहादिधारणम्, तद्- गाच्च सुखदुःखादिभोग, धर्मादिना तदभावे मोक्षः, तत्रापि यदा शुश्रूषति तदा श्रोत्र जायते, यदा दिदृक्षति तदा चक्षुरुत्पद्यते एव स्वविषयग्रहणाभिलाषकाले तत्तदीन्द्रियाणि जायन्ते, शृण्वन् श्रोत्रम्, स्पर्शयन् त्वग्भवति पश्यञ्चक्षुर्भवति इत्यादि वचनादिति सत्यार्थप्रकाशे नवमसमुल्लासे, तदपि न सङ्गतम्, परिच्छिन्नत्वाद्यनुपपत्तेः । प्रागभावप्रध्वंसाभावान्यतर- प्रतियोगित्वं कालपरिच्छेद । न चानादेरनन्तस्य च तत्सम्भवति, अनित्यत्वे कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्गाच्च । तस्माद्देश-, परिच्छिन्नत्वमेव वक्तव्यम् । तत्रापि मध्यमपरिमाणत्वे घटादिवदनित्यत्वापत्ति रतोऽणुपरिमाणत्वमेव वाच्यम् तदपि , न युक्तम् तदुत्पन्यश्रवणात् । न च नैयायिकाभिमतपरमाणूनां नित्यत्ववदणुपरिमितानामात्मनामपि नित्यत्वस्यादिति , ' ', ( | | ) वाच्यम् तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्य ब्र ० सू० २ १ १४ इति ब्रह्मसूत्रविरोधेन ब्रह्मातिरिक्तस्य सर्वस्य ब्रह्मकार्यत्वोपपत्या परमाणूनामपि नित्यत्वासम्भवात् । जीवात्मना चानुत्पत्तिमता ब्रह्माभिन्नत्वेनैव तदनन्यता । प्राप्त कर देवगण स्वर्ग मे आनन्द मनाते है । मोक्ष का सुख केवल तीसरे धाम स्वर्ग मे ही हो, ऐसी बात नही है, क्योकि वह तो ब्रह्म का स्वरूप साक्षात्कार ही है, जो कि सर्वत्र व्याप्त है । यहाँ स्वर्ग हो तृतीय धाम है, मोक्ष नही । इसीलिये अमृत पद भी मोक्ष के अर्थ मे नही है, क्योकि स्वर्ग मोक्ष स्वरूप नही होता । इस लिये अमृतत्व के साधक ब्रह्मात्मज्ञान के लिये ही यह अमृतपद का प्रयोग हुआ है । इसकी सभावना स्वर्ग मे भी है ही । सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में बताया गया है कि जीव परिच्छिन्न होते हुए भी अनादि और अनन्त है । यह परमेश्वर से भिन्न है । इसमें ज्ञान प्रभृति गुण रहते है । पाप और पुण्य के अनुष्ठान में यह स्वतन्त्र है, किन्तु इनके फल के उपयोग मे वह स्वतन्त्र न होकर ईश्वर के अधीन रहता है । स्वरूपतः यह न तो बद्ध है और न मुक्त | बुरे अदृष्ट के कारण यह शरीर धारण करता है और शरीर को धारण करने से ही इसको सुख, दुख आदि भोगने पडते हैं । धर्म का, सत्कर्मो का आचरण करने पर जब शरीर छूट जाता है तो इसको मोक्ष प्राप्त हो जाता है । वहाँ भी मोक्षदशा मे भी यदि वह सुनना चाहता है तो श्रोत्र और देखना चाहता है तो चक्षु उसको मिल जाते है । इस तरह उस उस विषय की कामना करने पर वे वे इन्द्रियाँ उसको प्राप्त हो जाती है " ण्वन् श्रोत्रं भवति०" इत्यादि श्रुतियाँ इसमे प्रमाण है । किन्तु यह सारा कथन भी असंगत है, क्योकि जीवात्मा को भी परिच्छिन्न नही माना जा सकता । जो पदार्थ प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव मे से किसी एक का भी विरोधी हो अर्थात् जिसकी सत्ता से प्रागभाव अथवा प्रध्वंसाभाव में से किसी एक की भी सत्ता नष्ट हो जाय तो उस पदार्थ को काल से परिच्छिन्न माना जाता है । अनादि और अनन्त पदार्थ इस तरह से काल से परिच्छिन्न नही हो सकता, क्योंकि ऐसा होने पर उसको अनित्य मानना पडेगा और इसमे नया दोष एक यह होगा कि इतहानि और अकृत की आपत्ति आवेगी, अर्थात् यदि आत्मा को अनित्य माना जाय तो उसके नष्ट हो जाने पर जो कुछ उसने किया, उसका फल उसे न मिलने से कृत की हानि हुईं और फल तो उसको मिलता है, यह किसका फल मिला? पूर्व रूप तो उसका नष्ट हो गया जिसने कि कर्म किया था, अतः नये सिरे से ही यह फल प्राप्ति उसमे माननी पडेगी, जो कि अकृत की प्राप्ति के नाम से ही कही जायगी । इसलिये काल से परिच्छिन्न न मानकर इसकी देश की परिच्छिन्नता ही मानी जायगी । इस स्थिति में भी आत्मा में मध्यम परिमाण मानने पर उसकी घटादि की तरह अनित्यता हो जायगी, अतः इसमें अणु परमाण ही मानना पडेगा, किन्तु यह कथन भी उचित नही है, क्योकि आत्मा की उत्पत्ति की बात कही सुनी नही गई है । आप यदि कहें कि नैयायिको के द्वारा स्वीकृत परमाणु जैसे नित्य होते है, उसी तरह से अणु परिमाण आत्मा को भी नित्य मानने में क्या आपत्ति है? किन्तु यह कथन भी ठीक नही है, क्योकि आपकी यह बात ब्रह्मसूत्र के विरुद्ध है । ' तदनन्यत्व ' इत्यादि ब्रह्मसूत्र में ब्रह्म से भिन्न सभी वस्तुओ को कार्य माना है, अतः परमाणुओं का भी कार्य है, वे नित्य नही हो सकते । जीवात्मा तो कभी उत्पन्न नही होते, वे ब्रह्म से अभिन्न है, अतः
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वेदार्थपारिजात १४०१ परमेश्वरस्यैव जैवेन रूपेण प्रवेश: श्रूयते ' हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि, ( छा० ६।३।२ ) इति श्रुते । ब्रह्मणो विभुत्वात्तस्यैव जीवरूपेणानुप्रवेशात् तस्यापि विभुत्वमेव स्वीकार्यम् । 'सवा एष महान आत्मा योग्य विज्ञानमयः प्राणेषु ' ( बृ ४ । ४ । २२ ) इत्येवमादिभिरात्मनो विभुत्वमेवावगम्यते । अणोर्जीवस्य सकलशरीरगतवेदनानुभवोऽपि नोपपद्यते । तच्चैतन्य शरीरव्यापीत्यपि न युक्तम्, चैतन्यस्यैव तद्रूपत्वात् । यथाग्ने रौष्ण्यप्रकाशी न च चैतन्यात्मनोर्गुणगुणिभाव, । भिन्नयोर्गोत्वाश्वत्वयोरिवभिन्नयोर्गोत्वाश्वत्वयोरिव गुणगुणिभावा- नुपपत्तेः । चैतन्यस्यात्मगुणत्वेऽपि तद्देशवृत्तित्वमेव स्यात्, न सर्वदेहव्यापिवृत्तित्वम्, नहि रूपादिगुणाना गुणिभिन्न देशवृत्तिता दृश्यते । न च प्रकाशस्य प्रदीपभिन्नदेश वृत्तितेति वाच्यम्, तत्र गुणगुणिभावानङ्गीकारात् । प्रकाशस्यैव सान्द्रावयवसंश्लेषवत प्रदीपत्व विरलावयवस्य च प्रकाशत्वम् । न च पुष्पगुणस्य गन्धस्य पुष्पभिन्नदेशवृत्तिव दृश्यत इति वाच्यम्, केवलगन्धस्य गमनागमनासम्भवेन पुष्पावयवाश्रयस्यैव गन्धस्य वायुना दूरदेशप्रसराभ्युपगमात् । ,न चावयवप्रसरणाभ्युपगमे पुष्पपरिमाणहासापत्ति स्यादिति वाच्यम् नालस्कन्धादिभ्यो नवीनावयवाभ्यागमेन परिमाणन्यूनतानुभवानापत्ते । वृत्तच्युताना तु परिमाणहासो भवत्येव 1। किञ्च चैतन्यस्य गुणत्वे गुणिनामात्मना स्वरूपेणा- चेतनत्वापत्ति. स्यात् । अत एव ज्ञानादिगुणक आत्मा इत्यप्यपास्तं वेदितव्यम् । तस्मादात्मा विभुरेव । अणुत्वव्यपदेशस्तु दुर्ज्ञानत्वाभिप्रायेण बुद्ध्याद्युपाध्यभिप्रायेण वा । ' तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेश.' ( ब्र० सू० २।३।२ ९ ) इति न्यायात् । -' ',, यदुक्तम् स्वरूपत आत्मा न बद्धो न मुक्त इति तदप्यसङ्गतम् स्वरूपतो नित्यमुक्तत्वात् । के नित्य ही माने जाते है । परमेश्वर ही जीवात्मा के रूप से शरीर मे प्रविष्ट होता है । छान्दोग्य श्रुति मे बताया गया है कि मैं ही जीवात्मा के रूप में प्रविष्ट होकर नाम और रूप के भेद का विस्तार करता हूँ । ब्रह्म विभु है । वही जब जीवात्मा के रूप में प्रविष्ट होता है, तो इस जीवात्मा को विभु मानना ही पडेगा । 'स वा एष' इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति आत्मा की विभुता का ही प्रति- पादन करता है । जीव को यदि अणु माना जाय तो, वह सारे शरीर में होने वाली वेदना की प्रतीति एक साथ कैसे कर सकेगा? उसका चैतन्य सारे शरीर मे व्याप्त है,, ऐसा भी नही कह सकते, क्योकि स्वयं चैतन्य ही तो उसका स्वरूप है, जैसे कि उष्णता और प्रकाश ही अग्नि का स्वरूप है । अणु परिमाण होने पर यह सारे शरीर में कैसे व्याप्त हो सकता है? चैतन्य और आत्मा मे गुणगुणीभाव भी नही बन सकता, जैसे गोत्व और अश्वत्व इन सर्वथा भिन्न पदार्थो मे गुणगुणीभाव नही बन सकता, उसी तरह से सर्वथा अभिन्न चैतन्य और आत्मा मे भी यह नही बनेगा । चैतन्य को यदि आत्मा का गुण माना जाय तो, जहाँ आत्मा रहता है, वही इसकी भी वृत्ति माननी पडेगी, तब वह सारे शरीर में व्याप्त नही माना जा सकेगा । रूप प्रभृति गुणो में यह देखा गया है कि वे गुणी से भिन्न देश मे नही रहते । यदि आप कहे कि प्रकाश में तो यह देखा गया है कि यह प्रदीप से अतिरिक्त देश में भी रहता है, किन्तु आपको यह समझ लेना चाहिये कि प्रकाश और दीपक का परस्पर गुणगुणीभाव नही माना जाता । प्रकाश उसको कहते है, जब कि दीपक के अवयव चारो तरफ फैल जाते है, और उन्ही के सिमटे हुए रूप को दीपक कहते है । पुष्प का गुण गन्ध भी तो पुष्प से अतिरिक्त प्रदेश में रहता है? किन्तु यह कथन भी सही नही है, क्योकि बिना सहारे के गन्ध कही आ जा नही सकती, अतः पुष्प के अवयवो के सहारे से ही वायु गन्ध को चारो ओर फैला देता है, ऐसा मानना पडेगा । पुष्प के अवयवो का प्रसार मानने पर पुष्प के आकार में कमी की बात करना भी गलत है, क्योंकि नाल, स्कन्ध आदि से नवीन अवयवों की पूर्ति होते रहने से परिमाण मे कमी आने का कोई प्रसग ही नही उठ सकता । टहनी से अलग हो जाने पर तो उनके परिमाण में ह्रास माना ही जाता है । अपि च, चैतन्य को गुण मानने पर गुणी आत्मा मे स्वरूपतः चैतन्य का अभाव मानना पडेगा । इसीलिये ज्ञान आदि को आत्मा का गुण मानने वाले नैयायिक सिद्धान्त का वेदान्ती खण्डन इसी तर्क पद्धति से करते हैं । इस तरह से आत्मा को विभु ही मानना पडेगा । कही कही उसको अणु कहा गया है, उसका तात्पर्य यही है कि वह दुर्ज्ञेय है । अथवा मन, बुद्धि आदि की उपाधि की सूक्ष्मता के आधार पर भी आत्मा को अणु कह दिया जाता है । 'तद्गुण:' इत्यादि वेदान्तसूत्र में भी यही बात कही गई है । स्वरूपतः आत्मा न तो बद्ध है और न मुक्त, यह कथन भी असंगत है, क्योंकि वह आत्मा स्वरूपतः नित्य और मुक्त है । १७६ 1
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१४०२ वेदार्थपारिजाता यत्तु — ' मोक्षे श्रोत्रादिक जायते' इति, तदपि तुच्छम्, भोगायतनाभावे तदुत्पत्तेर्वेयर्थ्यात् ॥ तदभ्युपगमे देहायतनस्याप्युत्पत्त्यभ्यु- पगमापातात् । तस्याप्यभ्युपगमे ससारमोक्षयोरवैशेष्यमेव स्यात् । कथ च जीवस्येच्छामात्रेणेन्द्रियोत्पत्ति सम्भवति, शृण्वन्निति ब्राह्मणवचने नेच्छावाचक' कश्चित् प्रत्ययो दृश्यते, इच्छासत्त्वे मुक्तेरेवासम्भवात् । सर्वेरपि मोक्षवादिभिर्मोक्ष इच्छाभावा- भ्युपगमात् । सामाजिकाना मोक्षेऽपीच्छादयो वर्तन्त इति चित्रम् । श्रुतेरर्थस्तु पूर्वोक्तश्रुतिव्याख्याने व्यक्त । यदपि जीवात्मना कर्मसु स्वातन्त्र्यमुक्त तदपि न युक्तम्, एष उ ह्येवैन साधु कर्म कारयति, त यमेन्वानुनेष्यति एष एवैनमसाधुकर्म कारयति यमेभ्यो लोकेभ्यो ननुत्सते' ( कौ० ब्रा० उ० ३।९) इति श्रुतिविरोधात् । तत एव सन्मार्गप्रवृत्तये परमेश्वर' प्रार्थ्यते । 'स नो बुद्ध्या शुभया सयुनक्तु ' (श्वेता० उ० ३।४) 'या मेधा देवगणा पितरश्चोपासते' ( वा० स० ३२।१४ ) ,, इत्यादिभिर्बुद्धिमेधादिप्रार्थनापि दृश्यते । बुद्ध्यधीनत्वात्कर्मणा न कर्तुर्निरङ्कुश स्वातन्त्र्यम् यथाकथञ्चित् कर्तृत्व तु प्रयोज्यकर्तॄणा सर्वेरप्यभ्युपेयत एव । तस्माद्यथा राजाधीनानाममात्यादीना पत्यधीनाना पत्नीना विद्युदधीनाना यन्त्राणा च तत्कार्यकरणे स्वातन्त्र्यमापेक्षिकमेव, तथैव परमेश्वराधीनाना जीवानामपि सापेक्षमेव स्वातन्त्र्य मन्तव्यम् । यदि सर्वथा स्वातन्त्र्यमेव जीवस्य तर्ह्यार्याभिविनयादिग्रन्थेषु कथ बुद्धे सन्मार्गप्रवृत्तये सामाजिकै प्रार्थना विधीयते । यत्तु ——अत्यन्तानावृत्तौ क्रमेण सर्वेषा मुक्तौ ससारोच्छेदप्रसङ्ग उक्त, तदपि तुच्छम् सर्वेषा मुक्तौ ससारोच्छेदेऽपि हान्यभावात् । सर्वस्यापि लोकस्य कल्याणभागित्वे कस्याप्युद्वेगे कारणाभावात् । अत एव तत्त्वान्युपदेष्टु मुक्ता. पुन शरीरमापद्यन्त इत्यनर्गलमेव । जीवन्मुक्ताना प्रवर्तकत्वसम्भवेन तदर्थं विदेहमुक्ताना मोक्षादावृत्त्यभ्युपगमवैयर्थ्यात् । यत्तु— मोक्ष मे क्षोत्र आदि की उत्पत्ति की बात भी गलत है, क्योंकि भोग का आयतन ( शरीर) जब मोक्ष दशा मे नही रहता, तब उसके श्रोत्र आदि की उत्पत्ति की बात मानना व्यर्थ है । यदि उस समय श्रोत्र आदि की उत्पत्ति मानी जाती है, तो देह की भी उत्पत्ति माननी पड़ेगी और यदि इसको भो स्वीकार किया जाता है तो फिर संसार और मोक्ष में अन्तर ही क्या रह जायगा? जीव की इच्छा मात्र से इन्द्रियो की उत्पत्ति हो भी कैसे सकती है? 'शृण्वन्' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य मे इच्छावाचक कोई प्रत्यय नही है । मोक्ष मे किसी इच्छा के रहने पर मुक्ति की स्थिति ही कैसे संभव हो सकती है? सभी मोक्षवादी इस बात में एकमत है कि मोक्ष में किसी तरह की इच्छा नही रह जाती । आर्यसमाजियो के मोक्ष में इच्छा आदि की स्थिति रहती है, जो कि स्वर्ग आदि को मानते हो नही एक आश्चर्य की ही बात है । जीवात्मा की कर्म में स्वतन्त्रता की बात भी सही नही है, क्योकि श्रति मे यह स्पष्ट प्रतिपादित है कि परमात्मा जिसको ऊपर उठाना चाहता है, उससे भले काम करवाता है और जिसको नीचे गिराना चाहता है उसको बुरे कामो मे लगा देता है । इसीलिये सन्मार्ग में प्रवृत्ति हो, इसके लिये परमात्मा की प्रार्थना की जाती है । 'वह परमात्मा हमे शुभबुद्धि से संयुक्त करे' 'उस मेधा की देवगण और पितृगण उपासना करते है, इत्यादि श्रुतिवचनो में बुद्धि, मेघा आदि के लिये प्रार्थना की गई है । सारे कर्म बुद्धि के अधान है, अत. कर्त्ता की निरंकुश स्वतन्त्रता नही मानी जाती । किसी के द्वारा प्रेरित व्यक्ति मे भी कर्तृत्व की तो स्थिति मानी ही जाती इसलिये राजाके अधीन काम करने वाले मन्त्री, पति के अधीन काम करने वाली पत्नी और विद्युत के अधीन काम करने वाले यन्त्रो हैकी। उन उन कार्यों को करने मे स्वतन्त्रता आपेक्षिक रहती है, उसी तरह से परमेश्वर के अधीन काम करने वाले जीवो की स्वतन्त्रता आपेक्षिक ही मानी जाती है । यदि जीव सर्वथा स्वतन्त्र है तो फिर आर्याभिविनय प्रभृति ग्रन्थो में बुद्धि की सन्मार्ग में प्रवृत्ति करानेभीअभिप्राय से सामाजिक लोग ईश्वर से प्रार्थना क्यों करते के यदि मोक्ष दशा से पुनरावृत्ति न मानी जाय तो सभी जीवो को मुक्ति मिल जाने पर ससार की समाप्ति यह कथन भी गलत है, क्योकि यदि सब प्राणी मुक्त हो जाने पर जो इस परिस्थिति मे संसार का उच्छेद हो जाने परही भीहो जायगी,,कोई हानि नही है । सारा संसार कल्याणमय हो जाता है तो इसमें किसी को उद्विग्न होने की किसी की यथार्थ तत्व का उपदेश करने के लिये मुक्त पुनः पुनः शरीर धारण करते हैं इस तरह का कथन भी अनर्गलक्या आवश्यकता है? इसी लिये इस तरह का उपदेश तो जीवन्मुक्त महात्मा भी कर सकते हैं, इसके लिये विदेहमुक्त जीवो की मोक्ष से पुनरावृत्तिही माना जाता है । क्योंकि मानना व्यर्थ है ।
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वेदार्थपारिजात' १४०३ 'अवशिष्टकर्मवशान्मुक्ते पुनरावृत्ति ' इति तत्तुच्छम् 'क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे' ( मुण्ड ० २२८ ) 'आनन्द ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तै० उ० २२ ९), ' अभय वै जनक प्राप्तोऽसि' ( बृ० ४/२/४ ), 'को मोह. क शोक एकत्व-मनुपश्यत ' ( ईशा ० ७ ) इत्यादिश्रुतिविरोधात् । तत्त्वज्ञानेन कामकर्मक्षये सति हि मोक्षो भवति । न च मोक्षे कर्मसम्भवो हेत्वभावात् । तदधिगमे—' उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात्' ( ब्र० सू० ४| १ | १३ ) यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्ते एवमेव विदि पाप कर्म न श्लिष्यन्ते' (छा० ४ १४१३ ), 'तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोत प्रदूयेतैव हास्य सर्वे पाप्मान प्रदूयन्ते' (छा० ५।२४।३ ) इत्यादिश्रुतिभ्य. । ननु पुण्यकर्मणा शास्त्रीयेण ज्ञानेनाविरोधात् तेषामवशेष सम्भवतीति चेन्न, ' इतरस्याप्येवमश्लेष पाते तु' (ब्र ० सू० ४।१।१४) इत्यनेन तेषामपि तथात्वोपवर्णनात् । इतरस्यापि पुण्यकर्मणोऽप्येवमसंश्लेष विनाशश्च ज्ञानवतो भवत., तस्यापि स्वफलहेतुत्वेन ज्ञानफलप्रतिबन्धकत्वेन विरुद्धत्वात् । 'उभे उ हैवैष एते तरति' (बृ० ४/४/२२ ) इत्यत्र दुष्कृतस्येव सुकृतस्यापि नाशव्यपदेशात् । अत एव न च पुनरावर्तते' (छा० ८।१५।१ ), 'अनावृत्ति शब्दात्' (ब्र ० सू० ४/४/२२ ) इत्यादिषु प्राप्तविवेकस्य मुक्तस्य मोक्षादनावृत्तिरेवोक्ता । सिद्धान्ते सकलानर्थनिवृत्तिपूर्वकपरमानन्दब्रह्मप्राप्तिरेव मुक्ति । सा चाविद्या-निवृत्तिमूलिकैव । अविद्यानिवृत्तिश्चाधिष्ठानावसानैव । अत एव ज्ञातत्वोपलक्षित आत्मैव मोक्ष इत्यपि सङ्गतम् । ब्रह्माकार-चरमवृत्त्युपलक्षितस्यात्मनोऽज्ञानहानिरूपत्वात् । न चोपलक्षणनिवृत्त्या मुक्तेरपि निवृत्ति, पाके निवृत्तेऽपि पाचकानिवृत्ति- दर्शनात् । न च तत्त्वज्ञानात् पूर्वमपि वृत्त्युपलक्षितत्व सम्भवति, पूर्वमसिद्धस्योपलक्षणत्वायोगात् । न च मुक्तौ चिन्मात्र भवति तच्च प्रागप्यासीदेवेति साध्यतानुपपत्ति, उपलक्ष्यस्यासाध्यत्वेऽपि घटाकाशोत्पत्तिवदुपलक्षणे साध्यत्वोपपत्ते' ॥ यद्वा अविद्याविरोधिवृत्तिरेवाविद्यानिवृत्ति । यावत् कार्य्योत्पत्तिविरोधिकार्य्यमेव ध्वस इत्यङ्गीकारात् । न च वृत्तौ बचे हुए कर्मों के कारण मुक्त व्यक्ति को पुन. आना पडता है, इस तरह की बात मानना भी गलत है, क्योकि 'उस ब्रह्म को देख लेने पर सारे कर्म नष्ट हो जाते है' इत्यादि श्रुतियो के प्रमाण पर ब्रह्म का ज्ञान हो जाने के बाद किसी कर्म के बचे रहने की बात सर्वथा निर्मूल सिद्ध हो जाती है । तस्वज्ञान से सब तरह को कामनाओ के नष्ट हो जाने पर ही मोक्ष की प्राप्ति होती है । इस तरह से किसी कारण के न बच रहने से मोक्ष में पुनः कर्म को उत्पत्ति की बात कहना व्यर्थ है । श्रुतियो और सूत्रों में यह बताया गया है कि उस मोक्षावस्था में पहले के कर्म नष्ट हो जाते है और बाद के किसी कर्म से उसका लगाव नहीं रहता । जैसे कमल के पत्ते पर पानी नही ठहर पाता, उसी तरह से इस ब्रह्मवेत्ता से पाप कर्मों का किसी तरह से सपर्क नहीं हो पाता । जैसे अग्नि मे डालने पर तिनका जल जाता है, उसी तरह से इस ब्रह्मवेत्ता के भी सारे पाप भस्म हो जाते है । यहाँ प्रश्न उठता है कि पुण्यकर्मो का तो शास्त्रीय ज्ञान से कोई विरोध नहीं है, तब वे बचे रहे तो इसमे क्या आपत्ति है, किन्तु ऐसी बात नही है । वेदान्तसूत्र में पुण्य कर्म की भी वही स्थिति बताई गई है, जा कि पाप को । क्योकि पुण्य कर्म भी तो अपने फल की उत्पत्ति के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति में बाधक हो सकते है । बृहदारण्यकश्रुति में पाप और पुण्य दोनो हो तरह के कर्मों के नाश की बात कही गई है । इसीलिये ब्रह्मसूत्र में विवेक की प्राप्ति के बाद मुक्त व्यक्ति की माक्ष दशा में अनावृत्ति का ही प्रतिपादन किया गया है । सिद्धान्ततः सभी अनर्थों की निवृत्ति के साथ परम आनन्द को अधिगति को ही मुक्ति कहा जाता है । यह अविद्या की निवृत्ति होने पर ही मिलती है । अविद्या की निवृत्ति अधिष्ठान का नाश होने पर हो होता है । इसीलिये आत्मज्ञान को ही मुक्ति मानना अधिक सगत है । ब्रह्माकार चरमवृत्ति से उपलक्षित आत्मा अज्ञान से असंपृक्त ही है । उपलक्षण के निवृत्त होने पर मुक्ति की भी निवृत्ति उसी तरह से नही होगो, जैसे कि पाकक्रिया के निवृत्त हो जाने पर भी पाचकत्व धर्म की निवृत्ति नही होती । तत्वज्ञान से पहले ब्रह्म में वृत्ति से उपलक्षितता नही आ सकती, क्योकि पहले जो स्थिति सिद्ध नही है, उसमें उपलक्षितता नही बन सकती । मुक्ति मे आत्मा चिन्मात्र ही रहता है, यह स्थिति तो पहले भी थी, तब इसमें क्या सिद्ध करना है? इस प्रश्न का समाधान यह है कि यद्यपि साध्य नही होता, तो भी घटाकाश की उत्पत्ति की तरह उपलक्षण मे भी साध्यता मानने मे कोई आपत्ति नही हो सकती । अथवा अविद्या की विरोधी वृत्ति का उदय होना ही अविद्या की निवृत्ति मान ली जायगी, क्योकि कार्य की उत्पत्ति का विरोधी कार्य 1
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१४०४ वेदार्थपारिजातः नष्टाया विरोधिकार्यान्तरस्यानुदयात्, तदापि ध्वससत्त्वेन स न ध्वस यस्मिन् सति तत्पूर्ववृत्तिकाय्र्यं न तिष्ठति स ध्वस इति, ध्वसलक्षणस्य तत्रासत्त्वादिति वाच्यम्, यावद्विरोधिकार्योदय विरोधिकार्य्यस्यैव ध्वसत्वस्वीकारात् । विभागस्य सयोगध्वस- रूपत्वेऽपि विभागादिध्वंसस्याधिकरणरूपतावत् चरमवृत्तिपर्यन्त विरोधिकार्यरूपत्वेऽपि चरमवृत्तिध्वसस्याधिकरणरूपत्वात् । नन्वेव बिम्बप्रतिबिम्बैक्याज्ञाने निवृत्तेऽपि ज्ञाततदैक्यरूपता स्यात्, तथात्वे • तदैक्यधीकाले सोपाधिकतद्भेद- भ्रमोपादानाज्ञानानुवृत्त्ययोगात् । चरमवृत्तिध्वंस एवाय नियम इत्यपि न नियामकाभावात् । न चेह निवृत्तेर्ज्ञाताधिष्ठाना- नतिरेके विश्वमिथ्यात्वश्रुतिपर्यालोचनया निवृत्तेरपि निवृत्त्यापत्तिर्नियामिका, तस्याज्ञानाद्विश्वनिवृत्तिपरत्वेन स्वतात्पर्यविषय- निवृत्तीतरमिथ्यात्वपरत्वादिति चेन्न, सोपाधिकभ्रमे उपाधिविरहकालीनस्यैवैक्याज्ञानध्वसस्य तथात्वात् । 'नेति नेति' इति श्रुते. स्वारस्येनातिरिक्तसर्वनिवृत्तावेव तात्पर्याच्च । न च वृत्त्युपलक्षित आत्मा जीवन्मुक्तावप्यस्तीति तत्र मोक्षापत्तिः, मुक्ति- मात्रापादनस्य तत्रेष्टत्वात् । चरममुक्तेश्चरमसाक्षात्कारोपलक्षितात्मस्वरूपत्वेन तदापादकाभावात् । न च चरमसाक्षा- त्कारनिवृत्तेरात्मत्वेऽसाध्यत्वापत्ति, अविद्यानिवृत्तेरसाध्यत्वेऽप्रवृत्त्यापत्तिवदत्राप्रवृत्त्यापत्त्यभावात् । न च जीवन्मुक्तिप्रयोजक- वृत्त्यपेक्षया परममुक्तिप्रयोजकवृत्तौ आनन्दाभिव्यक्तिगतविशेषाभावे चरमक्षणेन चरमश्वासेनोपलक्षित आत्मा मुक्ति. स्या- दिति वाच्यम्, प्रारब्धकर्मप्रयुक्तविक्षेपाविक्षेपाभ्यामभिव्यक्तिविशेषाङ्गीकारात् । यत्तु —‘ वेदान्तश्रवणसाध्यः पुरुषार्थो वाच्य ' इति, न च त्वन्मते स वक्तु शक्य., मुमुक्त्यनुस्यूतसुखज्ञप्तिरूप- स्यात्मन. पुरुषार्थत्वेनासाध्यत्वात् । वृत्ते. साध्यत्वेऽपि स्वतोऽपुरुषार्थत्वात् तस्मादात्मव्यतिरिक्त एवावरणनिवृत्तिरूप आनन्द- ही ध्वस माना जाता है । शका उठती हैं कि वृत्ति के नष्ट हो जाने पर विरोधी कार्यान्तर की उत्पत्त न होने से उस समय भी आपके लक्षण के अनुसार ध्वस की स्थिति रहने से वह ध्वस नही माना जायगा, क्योकि जिसके रहने पर उसके पूर्ववर्ती कार्य की स्थिति नही रहती वह ध्वस है, यह ध्वंस का लक्षण वहा नही है, किन्तु आपका यह कथन सही नही है, क्योकि ध्वस का लक्षण यही है कि जबतक विरोधी कार्य का उदय हो तबतक के विरोधी कार्य को ही ध्वस कहते है । जैसे विभाग यद्यपि संयोग का ध्वस ही है, तो भी विभाग का ध्वस अधिकरण रूप ही माना गया है, वैसे ही चरमवृत्ति पर्यन्त वह विरोधी कार्य के रूप में स्थित है, किन्तु चरम वृत्ति ध्वस अधिकरण रूप ही है । प्रश्न उठता है कि इस तरह से तो बिम्ब और प्रतिबिम्ब के ऐक्य के अज्ञान के निवृत्त हो जाने पर भी ज्ञाता के ऐक्य का बोध होने लगेगा, क्योकि ऐसा हो जाने पर उस ऐक्य बुद्धि को स्थिति के समय सोपाधिक भेद भ्रम के उपादान अज्ञान की अनुवृत्ति नही रहती । चरम वृत्ति अज्ञान ध्वस मे ही उक्त नियम की प्रवृत्ति हो, ऐसा कोई नियामक नहीं है । यहा निवृत्ति के ज्ञात अधिष्ठान से अतिरिक्त न होने पर विश्व का मिथ्या बताने वाली श्रुति का पर्यालोचन करने से इस निवृत्ति की भी निवृत्ति होने की आपत्ति को ही उक्त नियम का आधार माना जाय, ऐसा भी नही हो सकता, क्योकि उसका अभिप्राय अज्ञान से विश्व की निवृत्ति होने में ही है, अतः अपनी तात्पर्यविषयक निवृत्ति से भिन्न वस्तु में ही वह मिथ्यात्व का बोध करा सकेगी । इसका समाधान यह है कि सोपाधिक भ्रमस्थल में उपाधि विरहकालोन ऐक्य ही अज्ञान ध्वस का अधिकरण हा सकता है । ' नेति नेति' इस जागतिक सभी पदार्थों का निषेध करने वाली श्रुतिका स्वारस्य ब्रह्म के अतिरिक्त सब पदार्थों की निवृत्ति में ही है । जीवन्मुक्ति दशा में भी वृत्ति से उपलक्षित आत्मा है, वहा भी मोक्ष की स्थिति की आपत्ति इसलिये नही उठेगी कि वहा केवल मुक्ति की प्राप्ति की स्थिति मानी जाती है । चरम मुक्ति तो आत्मस्वरूप के चरम साक्षात्कार से ही प्राप्त होती है, अतः जीवन्मुक्ति दशा में इस स्थिति को माना ही नही गया है । चरम साक्षात्कार निवृत्ति को आत्मस्वरूप मानने पर इसमें असाध्यता की आपत्ति इसलिये नही उठेगी कि यहा पर अविद्या निवृत्ति के साध्य न होने पर जैसी अप्रवृत्ति की आपत्ति उठती है, उस तरह की अप्रवृत्ति की आपत्ति नही उठ सकती । जीवन्मुक्ति की प्रयोजक ' वृत्ति की अपेक्षा परम मुक्ति की प्रयोजक वृत्ति में आनन्द की अभिव्यक्ति में विशेषता न मानने पर चरमक्षण के चरम लक्षित आत्मा को ही मुक्ति स्थिति मानने की आपत्ति उठाना भी इसलिये गलत है कि उक्त दोनो अवस्थाओं में प्रारब्ध कर्मोंश्वास से उप- है । आने वाले विक्षेप की स्थिति और उसके अभाव के कारण आनन्द की अभिव्यक्ति में विलक्षणता मानी जाती के कारण
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वदार्थपारिजातः १४०५ प्रकाश पुरुषार्थो वाच्य, प्राप्तप्राप्तिरूपतयानन्दप्रकाशस्य स्वरूपतोऽसाध्यत्वेऽपि तत्तिरोधायकाज्ञाननिवर्तकवृत्ते साध्यत्व- मात्रेण साध्यत्वोपपत्ते । विस्मृतकण्ठमण्यादौ तथा दर्शनात् । तस्मादज्ञानहानिरात्मस्वरूप तदाकारावृत्तिर्वा मोक्ष इति । अविद्यानिवर्तकं च यद्यपि न स्वप्रकाशब्रह्मरूपज्ञानमात्रम्, तथापि श्रवणादिजन्यापरोक्षवृत्त्यारूढ तदेव निवर्तकम् । न चासत्याया वृत्ते मत्योत्पादकत्वविरोध, अभावस्य भावजनकत्ववदस्य सम्भवात् । प्रातिभासिकस्य व्यावहारिकसुखजनकत्व- दर्शनाञ्च । न च न जानामीति ज्ञप्तिरूपचिद्विरोधित्वानुभवविरोध, चिदससृष्टवृत्तेविरोधित्वस्यानङ्गीकारात् । यदुक्तम् —'चरमवृत्तेर्घटादिवृत्त्या चिद्विषयत्वेऽविशेषत्वम्' इति, तन्न, अवच्छिन्नानवच्छिन्नविषयतया विशेषात् । ननु चरमवृत्तेरज्ञानोपादानकत्वेन कथ स्वोपादानाज्ञान निवर्तकत्वम्, 'तरति शोकमात्मविद्' (छा० ७ १ ३) इति प्रमाणबलेन मायोपादानिकाया वेदनवृत्त्या मायातरणसम्भवात् । वृत्तिप्रतिबिम्बितचितो निवर्तकत्वे तु नोक्तशङ्कापि । तृणादेर्भासिकाया अपि सूर्यदीप्ते सूर्यकान्तायामभिव्यक्तायास्तृणादिदाहकत्वदर्शनात् । न चापरोक्षवृत्तौ सत्या चित्प्रतिबिम्बनिबन्धननिवृत्ति-, विलम्बादर्शनान्न विशिष्टे निवर्तकतेति वाच्यम् शुद्धचितस्तद्भासकतया वृत्तेश्च जडतया अज्ञानानिवर्तकतया विशिष्टे निवर्तकत्वाभ्युपगमात् । यत्तु निवर्तक ज्ञानमपि न शुद्धविषयक तस्यादृश्यत्वात् नापि विशिष्टविषयक तस्याध्यस्तत्वेन भ्रमत्वापत्ते । उपहितस्य विषयत्वेऽप्युपाधेरविषयत्वेन भ्रमत्वाभावात् । ननु चान्त्यस्य ज्ञानस्य कि निवर्तक स्वयमन्यद्वा, वेदान्त के श्रवण से सिद्ध होने वाले पुरुषार्थ को बताने की बात कही गई है । किन्तु आपके मत में उसको बताया नही जा सकता, क्योकि मुक्ति से अनुस्यूत आनन्द की अभिव्यक्ति ही तो आत्मा का स्वरूप है, इसको पुरुषार्थ के रूप मे सिद्ध नही किया जा सकता । वृति ही साध्य हो सकती है, किन्तु उसमें पुरुषार्थता नही है । इसलिये आत्मा से अतिरिक्त हो आवरणनिवृत्ति रूप आनन्द का प्रकाश यहाँ पुरुषार्थ के रूप में माना जायगा । यह आनन्द का प्रकाश एक तरह से प्राप्त की हो प्राप्ति है, अत स्वरूपत साध्य नही माना जा सकता, तो भी आनन्द के निरोधात्मक अज्ञान की निवर्तक वृत्ति की साध्यता के आधार पर इसको भा साध्य मान लिया जाता है । कण्ठ मे पडी हुई मणि को भूल जाने पर उसकी जब पुनः स्मृति जाग उठती है, तो ऐसा कहा जाता है कि मुझे मणि मिल गई, उसी तरह का औपचारिक प्रयोग यहाँ भी मान लिया जाता है । इसलिये अज्ञान की निवृत्ति, आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति अथवा तदाकारावृत्ति को मोक्ष कहा जा सकता है, यद्यपि स्वप्रकाश ब्रह्म स्वरूप के ज्ञानमात्र से अविद्या की निवृत्ति नही होती, तो भी श्रवण, मनन आदि से उत्पन्न होने वाली वृत्ति के सहारे जब उसका साक्षात्कार होता है, तो वह अज्ञान का निवर्तक माना जाता है । असत्य वृत्ति सत्य स्वरूप को कैसे पैदा कर सकती है? इसका उत्तर यह है कि अभाव जैसे भाव का जनक है, उसी तरह से वृत्ति आत्म-स्वरूप को प्रत्यक्ष करा देगी । प्रातिभासिक वस्तु से भी व्यावहारिक सुख की प्राप्ति देखी गई है । 'मैं नही जानता' इस ज्ञप्ति के रूप में अवस्थित वृत्ति से जो अनुभव हो रहा है, उससे ज्ञान की सत्ता मानने वाले अनुभव का विरोध होगा, ऐसा भी नही कह सकते, क्योकि चित् से असक्त वृत्ति का सपृक्त वृत्ति से कोई विरोध नही माना जाता । यह आपत्ति भी सही नही है कि चरम वृत्ति और घटादिविषयक वृत्ति यदि समान रूप से चिह्न को ही अपना विषय बनाता है तो इनमें विशेषता क्या रह जायगी? क्योकि इनमे अवच्छिन्नता और अनवच्छिन्नता के आधार पर अन्तर किया जा सकता है । पुनः प्रश्न उठता है कि चरम वृत्ति का उपादान तो अज्ञान है, तो फिर यह उपादान भूत अज्ञान का निवर्तक कैसे हो सकता है? इसका उत्तर है कि छान्दोग्य श्रुति के प्रमाण से माया को उपादान बनाने वालो वृत्ति से भी माया को लाघा जा सकता है । वृत्ति में प्रतिबिम्बित चित् की निवर्तकता मे तो यह शंका भी नही रहेगी । यह देखा जाता है कि सूर्य का प्रकाश तृण प्रभृति वस्तुओ का प्रकाशक है, किन्तु सूर्यकान्त मणि के माध्यम से अभिव्यक्त वही प्रकाश उनको जला भी डालता है । अपरोक्ष वृत्ति के पैदा होने पर चित् के प्रतिबिम्ब से होने वाली निवृत्ति में विलम्ब हो, ऐसा नही माना जा सकता, अत. विशिष्ट में निवर्तकता नही माना जा सकती, ऐसा भी हम नही कह सकते, क्योकि शुद्ध चित् ही स्वात्म स्वरूप को प्रकाशित करती है और वृत्ति तो जड है, अतः वह अज्ञान की निवृत्ति नही कर सकती, इस तरह से विशिष्ट में भी निवर्तकता मानी हो जाती है । कुछ लोग यहाँ शंका करते हैं कि निवर्तक ज्ञान भी शुद्ध विषयक नही हो सकता, क्योकि शुद्ध स्वात्मस्वरूप तो अदृश्य है । यह विशिष्ट विषयक भी नही हो सकता, क्योकि अध्यस्त होने से वह भ्रमात्मक हो सकता है । इसका समाधान यह है कि उपहित के विषय होने पर उपाधि की अविषयता के आधार पर वह } 1
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वेदार्थपारिजाता १४०६ नाद्य, अन्यनिरपेक्षप्रतियोगिनो ध्वसजनकत्वे क्षणिकत्वापत्ते । न च दग्धदारुदहनस्य स्वतो निवृत्तिवत् स्वतो निवृत्तिः स्यादिति वाच्यम्, तस्यापीश्वरेच्छयैव नाशेन स्वतो नाशानभ्युपगमात् । कतकरेणुस्तु न पङ्क नाशयति नापि स्वम् । विश्लेष-मात्रदर्शनात् । नान्त्यः वृत्तेरन्यस्यात्मनः शुद्धस्याहेतुत्वादिति चेन्न, तन्तुनाशस्य पटनाशप्रयोजकत्वदर्शनेन स्वोपादानाविद्या- नाशस्यैतन्नाशकत्वात् । यदुक्तम्– 'अविद्यानाशे आत्मा वा वृत्तिर्वा हेतु.? नाद्य, शुद्धस्याहेतुत्वात्, नान्त्य, प्रतियोगिमात्रस्य नाशकतापर्यवसानमिति तन्न, उभयथाप्यदोषात् । वृत्तिमादायैव ब्रह्मण उपहितत्वेन शुद्धत्वाभावात् । प्रतियोगिनश्च प्रतियोगि-त्वेन नाशकतायामितरानपेक्षत्वे क्षणिकत्वापत्तावपि रूपान्तरावच्छेदेन यत्कारण तस्यापेक्षणे तदभावात् । उपादाननाशत्वा-वच्छिन्नस्य स्वस्यैव क्षणिकत्वानापादकं नाशकत्व स्यात् । द्वितीयकारणनिरपेक्षप्रतियोगिन प्रतियोगित्वोपादाननाशत्वरूप-द्वयावच्छिन्नस्य नाशकत्वोपपत्तेः । वस्तुतस्त्वविद्यानिवृत्तेर्वृत्तिरूपतया न निवर्तकखण्डनावकाश । वृत्तिनिवृत्तेरात्मरूपतया न तज्जनकखण्डनावकाश. । मुक्तिश्च नाविद्योच्छेदमात्रम्, किन्तु निरतिशयानन्दस्फुरणमेव । ननु सुखी स्यामितिवत् सुख स्यादितीच्छाया अदर्शनेन पुरुषार्थस्य चेच्छानियम्यत्वेन कथ सुखस्फुरणे पुरुषार्थता? अन्यथा बौद्धमतसिद्धात्मनाशादेरपि पुरुषार्थता स्यात् । परकीय सुखमपि न पुरुषार्थं, तथेच्छाभावादेव । दु खतत्साधनयोः स्वकीयतयैवापुमर्थत्वदर्शनेन सुखादेरपि तथैव पुरुषार्थ- त्वादिति चेन्न, सुखादौ पुरुषार्थताया अपरकीयत्वप्रयुक्तत्वे स्वकीयत्वप्रयुक्तत्वे वा गौरवापत्त्या साक्षात्क्रियमाणतयैव युक्तत्वात् । भ्रमात्मक नही होगा । प्रश्न होता है कि अन्त्य ज्ञान की निवृत्ति कैसे होगी? वह अपने आप निवृत्त हो जायगा अथवा किसी दूसरे उपाय से वह निवृत्त होगा? इनमे प्रथम पक्ष इसलिये नही बनेगा कि अन्य निरपेक्ष प्रतियोगी यदि ध्वंस का जनक माना जायगा तो वह क्षणिक होगा । लकडी को जलाने वाली आग उसको जलाकर जैसे अपने आप शान्त हो जाती है, उसी तरह से प्रथम पक्ष की भी आपत्ति बन सकेगी, ऐसा भी नही कह सकते, क्योकि वहाँ पर भी नाश का कारण ईश्वर की इच्छा मानी जाती है, अत स्वतः नाश नही माना जाता । कतक रेणु ( काई) न तो कीचड को नष्ट करती है और न अपने ही नष्ट होती है, किन्तु यह उसको अलग कर देती है । अन्तिम पक्ष भी नही बन सकता, क्योकि कोई दूसरी वृत्ति शुद्ध आत्मा का कारण नही हो सकती । किन्तु इसका उत्तर यह है कि तन्तु के नाश से जैसे पट का नाश हो जाता है, उसी तरह से अन्त्य ज्ञान की भी निवृत्ति अपने उपादान भूत अविद्या के नाश से हो जायगी । पुनः शंका उठाई जाती है कि अविद्या के नाश का कारण आत्मा है या वृत्ति? इसमे पहला पक्ष इसलिये नही बनेगा कि शुद्ध आत्मा किसी का कारण नहीं होता । दूसरा पक्ष भी इसलिये नही बनेगा कि इस तरह से तो प्रतियोगी मात्र का नाशकता मे पर्यवसान मानना पडेगा । किन्तु यह शंका भी ठीक नही है, क्योंकि उक्त दोनो ही पक्षो में दिये गये दोषो का परिहार किया जा सकता है । वृत्ति को लेकर ही ब्रह्म उपहित होता है, अतः इस अवस्था में वह शुद्ध नही माना जा सकता । प्रतियोगी भी यदि प्रतियोगी की नाशकता में बिना किसी दूसरे की अपेक्षा के कारण माना जाय तो उसमें क्षणिकता की आपत्ति उठ सकती है, किन्तु रूपान्तर से अवच्छित कारणता की अपेक्षा रखने पर यह दोष नही आवेगा । उपादान के नाश से अवच्छिन्न स्वात्मस्वरूप की नाशकता में क्षणिकत्व दोष की आपत्ति नही उठेगी । द्वितीय कारण से निरपेक्ष प्रतियोगी की तथा प्रतियोगी के उपादान के नाश से अवच्छिन्न प्रतियोगी की नाशकता मानी ही जा सकती है । वास्तव में अविद्या की निवृत्ति के वृत्तिरूप होने से उसकी निवर्तकता का खण्डन नही किया जा सकता तथा वृत्ति की निवृत्ति आत्मस्वरूप है, अतः उसकी जनकता का खण्डन भी नही किया जा सकता । मुक्ति अविद्या का उच्छेद मात्र नही है, किन्तु उस अवस्था में निरतिशय आनन्द का स्फुरण होता है । पूर्वपक्षी कहता है कि ' सुखी स्याम्' ( मैं सुखी होऊ) यह इच्छा तो होती है, किन्तु मैं सुख होऊँ, ऐसी इच्छा नही होती । पुरुषार्थं इच्छा से नियन्त्रित होता है, तब सुख के स्फुरण को पुरुषार्थ कैसे कहा जा सकता? यदि ऐसा माना जाय तो बौद्ध मत नाशात्मक अपवर्ग को भी क्यों न पुरुषार्थ माना जाय? परकीय सुख को भी पुरुषार्थं इसीलिये नही माना जाता कि उसके लिये पुरुष की इच्छा नही होती । दुःख
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वेदार्थपारिजाता १४०७ सम्बन्धस्य चानित्यत्वसाधनपारतन्त्र्यादेरिवावर्जनीयसन्निधिकत्वात् ॥ न चैवमीश्वरस्यास्मदादिमुख पुरुषार्थं स्यादिति वाच्यम्, हेयतयाऽज्ञातत्वे सतीत्यस्यापि प्रयोजकत्वात् । ईश्वरादिनाचास्मदादिसुखस्य हेयत्वेन ज्ञानात्, स्वरूपसुखे चेष्टापत्ते । न च गौरवम्, स्वसम्बन्धित्वेन पुरुषार्थतावादिनोऽपि निलीनमुखे पुरुषार्थतावारणाय तस्यावश्यमभ्युपगन्तव्यत्वात् । ननु साक्षात्कारेऽपि स्वकीयतया पुरुषार्थतापक्षे मुक्तस्य सुखसाक्षात्काररूपतया त प्रत्यपि तस्यापुरुषार्थतापत्ति, स्वेतरासम्बन्धि- त्वेन स्वस्य पुरुषार्थत्वे मुक्तस्वरूपेण सुखेन ससारीतरासम्बन्धेन ससारिण पुरुषार्थता स्यादिति चेन्न, त प्रत्यभासमानत्वात् भाने वाऽससारित्वेनेष्टापत्ते । 6 — '?,, यदप्युक्तम् मोक्षोऽहमर्थस्य चिन्मात्रस्य वा नाद्यस्त्वन्त्मतेऽहमर्थस्य मुक्त्यनन्वयित्वात् नान्त्य अह मुक्त स्यामितिवत् चिन्मात्र मुक्त स्यादितीच्छाया अननुभवात्' इति, तदपि तुच्छम् अहमर्थंगत चिदश मुक्तिकालान्वयिन प्रति मोक्षे पुमर्थत्वसम्भवात् । न च सुखस्य दु खाभावमात्रत्वे वैशेषिकमोक्षवदपुरुषार्थता, अतिरेके सद्वितीयतापत्तिरिति वाच्यम्, दु खाभावातिरेकेऽप्यात्मानतिरेकात् । न चात्मन सुखमात्रत्वे सुखप्रकाशाभावेनापुरुषार्थत्वमुभयात्मकत्वेऽखण्डार्थत्वहानि- रिति वाच्यम्, सुखप्रकाशयोरेकरूपतयोभयात्मकत्वाभावात् । न चार्थभेदाभावे सुखप्रकाश इति सहप्रयोगायोग, अविद्या- कल्पितदु.खजडात्मकत्वरूपव्यावर्त्यभेदेन तदुपपत्ते । न चैवमपि दुखाभावस्य तत्त्वतो दुखाद् भेदेऽपसिद्धान्त, अभेदे- और उसके साधन अपने से सबद्ध रहते है, तभी उनसे विरक्ति होती है, उसो तरह से सुख की भी पुरुषार्थता तभी मानी जायगी, जब कि अपने से सबद्ध हो । इसका समाधान यह है कि सुखादि मे पुरुषार्थता का प्रयोजन परकीयत्व और स्वकीयत्व को मानने में गौरव है, अत उसका साक्षात्कार ही इसमें प्रयोजक माना जायगा । यह संबन्ध अनित्य वस्तु मे परतन्त्रता के समान अवश्य ही सदा उसके साथ रहेगा । यदि कोई कहे कि इस तरह से तो हमारा सुख ईश्वर के लिये पुरुषार्थ हो जायगा, तो इसका उत्तर यह है कि उक्त लक्षण में सबन्ध के साथ 'हैय के रूप में अज्ञात' इतना और जोड देने से इस दोष का परिहार हो जायगा, क्योकि ईश्वर प्रभृति को यह ज्ञात है कि हम लोगो के लिये अभीष्ट लोकिक सुख त्याज्य है । यदि आप स्वरूप सुख की बात करते हो तो, वह तो ईश्वर के लिये भी पुरुषार्थ होगा ही, इसमें क्या आपत्ति हो सकती है । इसमें गौरव दोष भी नही होगा, क्योकि अपने से सबद्ध सुख को ही पुरुषार्थ मानने वाले के पक्ष मे भी छिपे हुए सुख में पुरुषार्थ की निवृत्ति के लिये इसको मानना आवश्यक हा जायगा । पुनः शका उठती है कि साक्षात्कार मे भी अपने से संवन्ध रहने पर ही पुरुषार्थता मानते पर मुक्तावस्था के सुख साक्षात्कार रूप होने से उसके प्रति भी उसकी पुरुषार्थता नही बन पावेगी, अपने से भिन्न से सबन्ध न रहने पर भी उसको अपना पुरुषार्थ मान लेने पर मुक्तस्वरूप सुख के इतर संसारी से सबद्ध न होने से संसारी पुरुष के लिये उसकी पुरुषार्थता माननी पड जायगी । इसका यह उत्तर यह कि मुक्त का सुख संसारी पुरुष के लिये पुरुषार्थ इसलिये नही बनेगा कि वह उसको भासित नही होता है । यदि संसारी पुरुष को उसका भान होता है, तो फिर वह संसारी नही हो सकता है और उस दशा में वह उसके लिये पुरुषार्थ हो, इसमे हमे कोई आपत्ति नही है । यह हमें स्वीकार है । प्रश्न किया गया है कि मोक्ष अहमर्थ का होता है या चिन्मात्र का? इसमें पहला पक्ष इसलिये नही बनेगा कि आपके मत में अहमर्थ का मुक्ति से अन्वय नही हो सकता । अन्तिम पक्ष भी इसलिये नही बनेगा कि ' मैं मुक्त होऊं' इसकी तरह 'चिन्मात्र मुक्त हो' इस तरह की इच्छा नही देखी जाती । किन्तु यह कथन इसलिये गलत है कि अहमर्थगत चिदंश का मुक्ति से सबन्ध होने से मोक्ष मे पुरुषार्थता संभव हो सकेगी । इसी तरह से यह शका भी गलत है कि सुख के दुःख के अभावस्वरूप मानने मे वैशेषिक के मोक्ष की तरह पुरुषार्थता नही बनेगी और अतिरिक्त मानने पर उसमें द्वैतत्वापत्ति होगी, सुख और दुःखाभाव को अलग मानने पर आत्मा की भिन्नता न रहने से यह द्वैतत्वापत्ति वाली शंका यहा नही उठ सकेगी । इसी तरह से आत्मा को सुखमात्र मानने पर सुख का प्रकाश न होने से पुरुषार्थता नही बनेगी, और सुख मात्र और सुख प्रकाश इन दोनो स्थितियों के मानने पर अखण्डार्थता की हानि होगी, यह शंका भी गलत है, क्योकि सुख और प्रकाश इनका स्वरूप एक ही है, अतः इनमे उभयात्मकता न होने से अखण्डार्थता में कोई बाधा नहीं है । जब अर्थ का भेद नही है, तो सुख और प्रकाश इन दोनो पदो का एक साथ प्रयोग करने से क्या लाभ है? इसका उत्तर यह है कि अविद्याकल्पित दुखःरूपता और जडरूपता इन दोनों की निवृत्ति के लिये इन दोनो ही पदो का एक साथ प्रयोग जरूरी है । इस तरह से भी दुःखाभाव }
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१४०८ दार्थपारिजातः त्वपुरुषार्थतेति वाच्यम्, दुखस्य कल्पितत्वे तद्भेदस्य तत्समानयोगक्षेमतया तात्त्विकत्वाभावेनापसिद्धान्ताभावात् ॥ न च स्वप्रकाशस्य सुखस्य स्फुरणेऽपि दु खाभावस्यास्फुरणात् अपुरुषार्थत्वमिति वाच्यम्, दुखाभावस्यात्मानतिरेकेणात्माभिन्ने सुखे स्फुरति तस्यापि स्फुरणात् । तस्मात् स्वप्रकाशचिदभिन्न सुखम् इति अद्वैतिन ॥ दिव्ये वैकुण्ठादौ भगवत्सालोक्यसामीप्यसा- रूप्यसायुज्यभेदेन दुखाभावपूर्वक नित्यनिरतिशयानन्दप्राप्तिर्मोक्ष इति वैष्णवाः शैवाश्च । अपुनरावृत्तिस्तु सर्वसम्मतैव । नौविद्याविमानादिविद्याविषयो विचार: 'तुग्रोह भुज्युमश्विनोदमेघे रयि न कश्चिन्ममृवा अवाहा । तमूहथुनभिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भि- रपोदकाभि ॥ तिस्र. क्षपास्त्रिरहानि ब्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथु पतङ्गे । समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभीरथै शतपद्भि. षडवैः ॥ ' (ऋ० स० १ | ११६ ) एषा मन्त्राणामापातरमणीयमर्थाभास विधाय नौविमानविद्यावर्णन कृत दयानन्देन तदप्य- किञ्चित्करम्, निर्माणविधेरवर्णनात् । कश्चिदनभिज्ञोऽप्येव वर्णयितुं शक्नोत्येव । लौहमयशङ्कतन्त्रीवाष्पविद्युदादिभिर्वायुयान निर्माय खपथाकाशगमनं कार्यम्, पर नैतावता तत्कथनमात्र वायुयानविद्येति वक्तु शक्यते । तथाहि- 'तुजि हिसावदान - निकेतनेषु' इत्यस्माद् धातोरौणादिके रप्रत्यये तुग्र इति सिद्धयति । य कश्चिद् धनाभिलाषी स्यात् स रयि धन कामयमानो भुज्यु पालनभोगयोग्य धनादिपदार्थभोगमिच्छन् विजय च पदार्थविद्यया स्वाभिलाष प्राप्नुयात् । स अश्विनौ पृथिवीमयै. काष्ठलेोष्ठादिपदार्थेर्नाव रचयित्वा अग्निजलादिप्रयोगेण उदमेधे समुद्रे गमयेदागमयेच्चेति तदर्थ. । सर्वथापि वेदार्थेऽराजकता जनयन् वेदमेवाश्रद्धेयं विदधात्ययम् । अश्विनुशब्दो नियतद्विवचनान्तो भवति । द्यावापृथिव्योस्तदभिमानिदेवद्वयबोधक., कथञ्चित् पृथिवीशब्दस्तद्विकारबोधकोऽपि स्यात् तावताऽपि काष्ठलेोष्ठादिभिः पदार्थैर्नाविं रचयित्वा गमनागमनादिक कुर्यादि- त्युक्त्यापि । नौविमानादिनिर्माणं दूरे तिष्ठतु, क्षुद्रनदीतरणसाधनमपि निर्मातुं न पारयति कश्चित् । का तत्वतः दुःख से भेद मानने पर गलत सिद्धान्त स्वीकार करना होगा और अभेद मानने पर उसमें पुरुषार्थता नही बन सकेगी, यह शंका भी निराधार है, क्योकि जब दुःख कल्पित है तो उसका भेद भी तो कल्पित ही माना जायगा । जब वह तात्त्विक नही है, ऐसी स्थिति में गलत सिद्धान्त को स्वीकार करने वाला आक्षेप यहाँ लागू ही नही होगा । स्वप्रकाश सुख का स्फुरण होने पर भी दुःखाभाव का स्फुरण न होने से पुरुषार्थता कैसे मानी जावेगी, यह कहना भी गलत है, क्योकि दुःखाभाव आत्मा से अतिरिक्त तो है नही, जब आत्मा से अभिन्न सुखका स्फुरण हो रहा है, तो उसका स्फुरण भी होगा ही । इसलिये सुख स्वप्रकाश चित् से अभिन्न है, ऐसा अद्वैत वेदान्तियो का कहना है । दिव्य वैकुण्ठ, कैलास आदि घामो में भगवान् के साथ सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य के भेद से दुःख के अभाव के साथ नित्य, निरतिशय आनन्द की प्राप्ति हो मोक्ष है, ऐसा वैष्णवो और शैवो का कहना है । ये सभी लोग उस स्थान से पुनः लौटना नही पडता, इस बात को एक स्वर से मानते है । नौविमानादि यानविद्या विचार 'तुग्रो ह भुज्यु० ' इत्यादि ऋग्वेद के मन्त्रो का आपात रमणीय गलत अर्थ करके दयानन्द ने इनमें नाव, विमान आदि बनाने की शिल्पविद्या के वर्णन की बात सिद्ध की है । यह प्रतिपादन भी इसलिये गलत है कि यहां इनके निर्माण की विधि वर्णित नही है । कोई अनभिज्ञ आदमी भी इस तरह का वर्णन कर सकता है । लोहे की कील, तार, भाप, बिजली आदि की सहायता से वायुयान बनाकर आकाशमार्ग से विचरण करना चाहिये, इतना कह देना मात्र वायुयान विद्या नही हो जाती । जैसा कि दयानन्द ने पहले मन्त्र का अर्थ किया है— हिंसा, अवदान और निकेतन अर्थवाली तुज् धातु से ओणादि र प्रत्यय करने पर तुग्र शब्द बनता है । जो व्यक्ति धन की कामना रखता हो, वह पालन और भोग के योग्य घनादि पदार्थों से भोग की अभिलाषा को और विजय को पदार्थ विद्याकी सहायता से प्राप्त करे । उसको चाहिये कि वह काष्ठ, लोह आदि पार्थिव पदार्थों से नाव बनाकर उसमें अग्नि,> जल आदि का प्रयोग कर समुद्र में आ जाकर व्यापार करे । इस तरह का अर्थ वेदार्थ के विवेचन में तो अराजकता फैलावेगा ही, साथ ही वेद के प्रति अश्रद्धा भी उत्पन्न कर देगा । अश्विन् शब्द का प्रयोग सदा द्विवचन में होता है । यह द्यावापृथिवी के अभिमानी दो देवताओ का बोध कराता है । किसी तरह से इन देवताओ के संबन्ध से पृथिवी शब्द पार्थिव विकारो का बोधक हो भी जाय, तो भी लकड़ी, लोहा आदि से