वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 511–520

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 511–520

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वेदार्थपारिजातः III एव कुर्वन् न कश्चिन्नममृवान् क्षेमविरह. कश्चिन्मरणं न प्राप्नोति, अतो नावम् अवाहा द्वीपान्तरगमन प्रति वाहनाने प्रयत्नेन कुर्यात् । यदुक्तम् —'कौ साधयित्वा अश्विना द्योतनात्मकेनाग्निप्रयोगेण पृथिव्या पृथिवीमयेनायस्ताम्र- ' ( ),, रजतधातुकाष्ठादिमयेन चेय क्रिया साधनीया पृ० २१९ इति तदपि तादृगेव एतावत्कथनेनापि नौनिर्माणविद्या न . ( ) सम्भवति । स्वेच्छया पुरुषव्यत्ययो वचनव्यत्ययो वा न युक्त । स्वाभीष्टार्थसिद्धये व्यत्ययेन लाक्षणिका गौणा र्थकरणे- ऽराजकतैव भविष्यति । अत एव कचित् तात्पर्यानुपपत्त्यादिभिरेव लक्षणादिकमभ्युपेयते । आत्मन्वतीभि. स्वय स्थिताभि स्वात्मीयस्थिताभि, राजपुरुषैर्व्यापारिभिश्च व्यवहारार्थ समुद्रमार्गेण गमनागमने नित्यकार्ये एवविधानबोधक. कोऽपि शब्दो मन्त्रे नैव दृश्यते । अन्तरिक्षप्रुद्भि अन्तरिक्ष प्रति गन्तृभि. विमानाख्ययाने साधितै परमैश्वर्यं प्रापणीयम् इत्यपि विधि- बोधक वचन नास्ति । साधितैरित्यपि मन्त्रबहिर्भूतमेव । बहुतिथात्कालान्नदीसमुद्रादिषु नौपोतादीना नानाकार्यार्थं व्यापार. प्रचलत्येव । रामायणमहाभारतपुराणादिषु पुष्पकादियानाना चर्चापि प्रसिद्धा । वैमानिकाना देवानामपि चर्चा बृहत्कथाया कथासरित्सागरादौ वा प्रभूततया श्रूयते । 'वैमानिकाना मरुतामपश्यदाकृष्टलीलान्नरलोकपालान्' ( ६।१ ) इत्यादिप्रकारेण रघुवशादौ वर्ण्यते च । समराङ्गणसूत्रधारादिनिर्दिष्टपद्धतितुल्यापि काचित्पद्धतिरनेन व्याख्यानेन न सिद्ध्यति । ' अथातो द्युस्थानादेवतास्तासामश्विनौ प्रथमागामिनौ । यद् व्यश्नुवाते सर्व रसेनान्यो ज्योतिषान्योऽश्वैरश्विना- वित्यौर्णवाभ । तत्कावश्विनौ द्यावापृथिव्यावित्येकेऽहोरात्रावित्येके सूर्याचन्द्रमसावित्येके ' (नि० १२1१ ) इत्यनेनापि न त्वदिष्ट- सिद्धि । तथाश्विनौ चापि भर्तारौ जर्भरी 'भर्तारावित्यर्थ. ' तुर्फरी हन्तारौ उदन्यजे वेत्युदकजे इव रत्ने सामुद्रे' (नि० १३।५) इत्यादीनि वचनानि न त्वदर्थसाधकानि, अन्यार्थत्वात् । नाव बनाकर सामूहिक यातायात करे, इस बात को कह देने भर से नाव, विमान आदि के निर्माण की बात तो दूर, कोई भी आदमी छोटी सी नदी को पार करने वाला साधारण नाव भी नही बना सकता । 'जो कोई इस तरह से पुरुषार्थ करता है, वह पदार्थों की प्राप्ति और उनकी रक्षा सहित होकर दुख से मरण को कभी प्राप्त नही होता । अतः नाव, विमान आदि सवारियो से जाना-आना देश-देशान्तर में सुख से होता है । ये नौका आदि किनको साधने से सिद्ध होते है? अग्नि, वायु और पृथिव्यादि पदार्थों में शीघ्रगमनादि गुण और अश्वि नाम से प्रसिद्ध सोना, चांदी, तांबा, ,, ( )पीतल लोहा लकडी आदि पदार्थों से यह कार्य संपन्न करना चाहिये पृ० २२१ यह कथन भी पहले जैसा ही है । इतना कहने से भी नाव बनाने की विद्या नही आ सकती । मनमाने तरीके से मन्त्रो मे पुरुष और वचन में परिवर्तन करना ठीक नही है । अपना अभीष्ट अर्थ निकालने के लिये पुरुष और वचन आदि में परिवर्तन कर लाक्षणिक ( गौण ) अर्थ करने पर वेदार्थ की प्रक्रिया में अराजकता मच जायगी । ' जिनसे उनके मालिक अथवा नोकर चला के जाते-आते रहें । व्यवहारी और राजपुरुष लोग इन सवारियो से समुद्र में जावे-आवे ' ( पृ ० २२१ ) इस तरह के विधान को बताने वाला कोई भी शब्द मन्त्र में नही है । 'जिनसे आकाश मे जाने -आने की क्रिया सिद्ध होती है, जिनका नाम ' विमान' प्रसिद्ध है, उनसे परम ऐश्वर्य को प्राप्त करना चाहिये ' ( पृ ० २२२ ) इस तरह की बिधि को बताने वाले पद भी मन्त्र मे नही हैं । साधित शब्द भी मन्त्र मे नही मिलता । बहुत पुराने जमाने से नदी, समुद्र आदि में नाव, जहाज आदि से अनेक प्रकार का व्यापार प्रचलित रहा है । रामायण, महाभारत, पुराण प्रभूति ग्रन्थो में पुष्पक आदि विमानो की चर्चा भी प्रसिद्ध है । वैमानिक देवताओ की चर्चा भी बृहत्कथा, कथासरित्सागर प्रभृति ग्रन्थो मे बहुत मिलती है । रघुवश आदि काव्यों में भी इनका वर्णन है । किन्तु दयानन्द की व्याख्या के अनुसार उतनी बातें भी नही मालूम हो पाती, जितनी कि समरागण सूत्रधार प्रभृति ग्रन्थो में वर्णित है । ' स्थान देवताओ मे अश्विनी युगल की प्रथम गणना की जाती है । ये रस, ज्योति या अश्व से सबको व्याप्त कर लेते है, ऐसा और्णनाभ आचार्य का मत है । ये अश्विनी युगल कौन है? कुछ लोगो के अनुसार ये द्यावा- पृथिवी, अहोरात्र अथवा सूर्य - चन्द्र है' इस निरुक्त के वचन से भी आपका मनोरथ नही सिद्ध हो सकता । इसी तरह से 'ये अश्विनीयुगल सबका पालन करने वाले, सबका नाश करने वाले, नाना प्रकार के रत्नों को देने वाले है निरुक्त का यह वाक्य भी आपके मतलब का नही है, क्योकि इसका अर्थ जो आप कहते है, वह न होकर दूसरा हो है । १७७

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वेदार्थपारिजाता १४१० -- सायणादिसम्मतस्त्वेषा मन्त्राणामयमर्थं -अस्य सूक्तस्य कक्षीवान् ऋषि त्रिष्टुप्छन्दः अश्विनौ देवता– तथा --चानुक्रान्त नासत्याभ्या पञ्चाधिका कक्षीवान् दैर्घतमस उशिक् प्रसू आश्विन वै' इति । अत्रेयमाख्यायिका - तुग्रो नामाश्विनो प्रिय कश्चिद्राजर्षि. । स च द्वीपान्तरवर्तिभिः शत्रुभिरत्यन्तमुपद्रुतस्तेषा जयाय स्वपुत्र भुज्युं सेनया सह नावा प्राहैषीत् । सा च नौर्मध्ये समुद्रमतिदूर गता भिन्ना जाता । तदानी सभुज्युरश्विनौ तुष्टाव । स्तुत्या सन्तुष्टौ तौ सेनया सहित भुज्युमात्मीयासु नौष्वारोप्य पितुस्तुग्रस्य समीप त्रिभिरहोरात्र प्रापयामासतु । अयमेवार्थोऽत्र स्पष्ट प्रतिपादित । तुग्रस्तन्नामक. खलु उदमेधे उदकँमह्यते सिच्यत इत्युदमेघ समुद्रस्तस्मिन् भुज्यु तन्नामकं तुग्रपुत्र अवाहा नावा गन्तु पर्यत्याक्षीत् । 'ओहाक् त्यागे' लुडिरूपम् । तत्र दृष्टान्त. -ममृवान् म्रियमाण सन् धनलोभी कश्चित् रयि धन न इव यथा लोभी म्रियमाणोऽतिकष्टेन धन परित्यजति तथैव कष्टेन तु प्रिय पुत्र समुद्रे प्रेषितवान् ॥ हे अश्विनौ त भुज्यु मध्ये समुद्र निमग्न नौभि पितृसमीपमूहथुः प्रापितवन्तौ । कीदृशीभि आत्मन्वतीभिरात्मीयाभि । यद्वात्रात्मशब्दो धृतिपरः । तथा च धारणावतीभिः । अन्तरिक्ष-युवा प्रुद्भि. अतिस्वच्छत्वात् अन्तरिक्ष इव जलस्योपरिष्टाद् गन्त्रीभि । अपोदकाभि सुश्लिष्टत्वादप्रविष्टोदकाभिः । नात्राकस्मा-दन्तरिक्षगामिविमानप्रसङ्ग, नौभिरूहथुरितिविरोधात् । एतावतात्युत्कृष्टतीव्रगामिबहुजनधारणसमर्थपोतादिव्यवस्था ज्ञातु शक्यते । नात्र कस्यचिदपि यानस्य निर्माणविधानमस्ति, तादृशशब्दाभावात् । चतुर्थमन्त्रार्थ: -हे नासत्यौ निमग्नं भुज्यु ससेन तिस्र क्षपा. त्रिसंख्याका रात्री: त्रिरहा त्रिवारमावृत्तान्यहानि च अतिव्रजद्भिरतिक्रम्य गच्छद्भि पत. पतद्भिस्त्रिभी रथैः ऊहथुः युवामूढवन्तौ समुद्रस्य मध्ये धन्वन् जलवर्जिते प्रदेशे आर्द्रस्योदकेनार्द्रीभूतस्य समुद्रस्य पारे तीरदेशे शतपद्भिः शतसख्याकैश्चक्ररूपै पादैरुपेते. षडवैः षड्भिरश्वैर्युक्तं रथैर्भुज्य पितृसमीपमूहथुरित्यर्थं । मन्त्रार्थं व्याकुर्वता दयानन्देन तिस्र. क्षपाः त्रिरहा पत: समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे इत्यादि शब्दाना स्पर्शोऽपि न कृत । आध्यात्मिकतत्त्वान्वेषिणस्तु तुग्रः परमेश्वर भुज्यु भोक्कार जीवं प्रियपुत्रमिव ससारसमुद्रे इन मन्त्रो का सायणसमत अर्थ यह है- तुग्र नाम का कोई राजर्षि अश्विनीकुमारो को अत्यन्त प्रिय था । द्वीपान्तर में रहने वाले शत्रुओ ने उसे बहुत परेशान कर दिया था । उनको जीतने के लिये उसने अपने पुत्र भुज्यु को सेना के साथ नाव स भेजा । यह नाव समुद्र में बहुत दूर जाकर टूट गई । उस समय भुज्यु ने अश्विनीकुमारों की स्तुति की । स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनीकुमारो ने सेना के साथ भुज्यु को अपनी नावो पर बैठाकर उसके पिता तुम के पास लगातार तीन रात- दिन चलकर सकुशल पहुँचा दिया । इसी अर्थ का इस मन्त्र में स्पष्ट प्रतिपादन किया गया है । तुग्र नाम के राजा ने समुद्र मे नाव से यात्रा करने के लिये अपने पुत्र भुज्यु को छोड दिया । इसमें यह दृष्टान्त है - जैसे मरता हुआ धन का लोभी आदमी बडे कष्ट से अपने धन को छोड़ पाता है, उसी तरह से बड़े कष्ट से तुन ने अपने पुत्र को समुद्र की यात्रा पर रवाना किया । हे अश्विनीकुमारो, उस भुज्यु को समुद्र के बीच में डूबने से बचा कर आप लोगो ने नावो के द्वारा अपने पिता के पास पहुँचा दिया । ये नावें आप लोगो की ही थी । अथवा यहाँ आत्म शब्द धृति के अर्थ में है । तब इसका अर्थ होगा कि मजबूत । ये नावे अत्यन्त स्वच्छ होने से जल के ऊपर उडती हुई सी प्रतीत होती है । इनके जोड इतने मजबूत हैं कि इनमें जल का तनिक भी प्रवेश नही हो सकता । यहाँ अकस्मात् अन्तरिक्ष में चलने वाले विमान के प्रसंग का कोई औचित्य नही है, क्योकि भावो का यहाँ स्पष्ट उल्लेख है । इस तरह से इस मन्त्र से इतना ही जाना जा सकता है कि काल में भी अत्यन्त उच्चकोटि की2 तीव्रगामी नौकाओं की, जहाजों की व्यवस्था थी, जिनमें कि बहुत से लोग यात्रा कर सकते थे । यहाँ किसी यान के निर्माण की विधि नही बताई गई है । ' तिस्र:' इत्यादि मन्त्र का यह अर्थ है - हे अश्विनीकुमारो, डूबते हुए भुज्यु को उसको सेना के साथ आप लोगों ने तीन रात और तीन दिन तक लगातार नावों की सहायता से समुद्र में और जल वर्जित मरूप्रदेश में शतचक्र रथो की सहायता से, जिनमें कि छः घोडे जुते हुए है, उसके पिता के पास पहुँचा दिया था । इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने तिस्रः क्षपाः त्रिरहा पतङ्गः समुद्रस्य धन्वन्न दिस्य पारे ' इत्यादि शब्दों को छूआ भी नहीं है । मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ करने वाले इसका यह अर्थ कहते है --तुन अर्थात् परमेश्वर ने भुज्यु अर्थात् भोक्ता जीव को अपने प्रिय पुत्र के समान इस ससार समुद्र में भेजा है । पर और अपर

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वेदार्थपारिजात' १४११ प्रेषितवान् । परापराविद्ययोरुपदेशकौ गुरू तेस्तै साधनैस्तं परमेश्वरस्य समीपमूहथु ऊहतुरित्यर्थ । नौयानविमाननिर्माण तु सर्वथाप्यस्मिन् मन्त्रे नास्त्येव । ------ निरुक्तवाक्यानामर्थस्तु – अथ 'मध्यस्थानाना देवताना व्याख्यानन्तर द्युस्थाना देवता व्याख्यायन्ते । तासामश्विनौ ? प्रथमागामिनौ भवतः । कस्मात् अश्विने स्तुतशस्त्रके कर्मणि प्रथममश्विनो का सन्धौ । अश्विनौ कस्मात् यद्धयश्नुवाते सर्वम्, रसेनान्यो ज्योतिषान्यो रसेनोदकेनान्य सर्व व्यश्नुते, ज्योतिषान्य अश्वैरश्विनावित्यौर्णवाभ. 1। अश्वैस्तद्वन्तावित्यौर्ण- वाभ. । तत्रापि कौ तौ इति विचार, द्यावापृथिव्यावित्येके, तो यो प्रत्यक्षदैवत द्यावापृथिव्यौ तावश्विनावित्येके । द्यौज्योतिषा व्याप्नोति पृथिव्यन्नेन । अहोरात्रावित्येके । अहर्ज्योतिषा व्यश्नुते रात्रिरवश्यायैः । सूर्याचन्द्रमसावित्येके । सूर्यो ज्योतिषा रसेन चन्द्रमा व्यश्नुते । राजानौ पुण्यकृतावित्यैतिहासिका । अश्वैरश्विनौ व्यश्नुत । नात्र नौविमानादिचर्चाप्यस्ति । 'सृण्येव० ' इत्यत्रापि न नौविमानविद्या वर्णिता, किन्त्वश्विनोरेव वर्णनम् । द्विविधा सृणिर्भवति-भर्ता च हन्ता च ॥ तथाश्विनौ चापि भर्तारौ जर्भरी भर्तारावित्यर्थं तुर्फरीतू हन्तारौ । समग्रमन्त्रस्त्वित्थम्— 'सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्फरीका । उदन्यजेव जेमना मदेरू ता मे जराखजर मरायु । ' (ऋ ० स ० १० । १०६। ६) सृणिरङ्कुशः । तत्र साधु सृण्य. । ' 'तौ सृण्यौ अशा मत्तगजाविव जर्भरी गात्रविनाम कुर्वन्तौ जभ नृभि गात्रविनामे अस्माद्धातोरौणादिके रि प्रत्यये । यद्वा सृण्येव सृणिर्द्वधा । मत्तगजस्यैकत्रावस्थापयित्री एका । बाधयित्री चापरा । 'सर्ते किच्च' (उ० सू० ४| १० | १०४ ) इति निप्रत्यये कित्वादगुणे ' कृदिकारादक्तिन.' इति डीषि सुप आकारे तादृश्यौ सृण्याविव जर्भरी भर्तारौ एकत्रैवावस्थापको तुर्फरीतू तर्फितारौ शत्रूणा हन्तारो जर्भरीति भरतेर्यङ्लुगन्तादौणादिक इप्रत्ययेऽभ्यासस्य जकारश्छान्दस । 'तृफ तृम्फ हिसायाम्' इत्यस्य तृजन्तस्य रूपम् । पृषोदरादित्वाद् वर्णविकारः । यद्वा अस्मादेव धातोर्बाहुलकादौणादिक अरीतुप्रत्ययः उत्वं च । विद्या के उपदेष्टा गुरु उन उन साधनो की सहायता से उसे पुनः परमेश्वर के पास भेजते है । इस तरह नाव, विमान आदि यानो के निर्माण की बात इन मन्त्रों की सहायता से किसी भी तरह से नही सिद्ध की जा सकती । दयानन्द के द्वारा उद्धृत निरुक्त वाक्शे का अर्थ भी इस तरह से होगा । मध्यस्थान अर्थात् अन्तरिक्ष में निवास करने वाले देवताओ के निरूपण के बाद अब स्थान अर्थात् स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओ के संबन्ध मे कहा जाता है । इनमे सबसे पहले अश्विनीकुमार आते है, क्योकि आश्विन स्तुत शस्त्रकर्म मे प्रथम सन्धिकाल में इनकी स्थिति है । इनको अश्विनीकुमार इसलिये कहा जाता है कि ये रस ( बल ) और ज्योति से जगत् के सारे पदार्थों को व्याप्तकर अवस्थित है । यह और्णवाभ ऋषि का मत है । उनका यह भी मत है कि ये अश्वो के कारण भी इस नाम से प्रसिद्ध है । ये रस, ज्योति अश्व से सारे जगत् को आप्यायित करने वाले कुछ लोगों के मत से द्यावा पृथिवी है, जो कि सबको प्रत्यक्ष दिखाई पडते है । अन्य आचार्यों के मत से अहोरात्र अश्विनी कुमार है । दिन प्रकाश से सारे जगत् को भर देता है और रात्रि ओस की बूदो से । कुछ आचार्य इस शब्द से सूर्य और चन्द्रमा का ग्रहण करते हैं । सूर्य ज्योति से और चन्द्रमा रस से सारे जगत् को आप्यायित करते है । ऐतिहासिको का कहना है कि ये दो पुण्यश्लोक राजा हैं । अश्विनी-कुमार अपने अश्वो की सहायता से इस सारे जगत् में विचरण करते रहते है । इस तरह से इस निरुक्त वाक्य में भी नाव-विमान आदि बनाने की विधि नही बताई गई है । ' सृण्येव' इत्यादि मन्त्र में भी इनके निर्माण की विधि प्रदर्शित नही है, किन्तु यहा भी अश्विनीकुमारो का ही वर्णन है । सृष्टि दो तरह की होती है— भर्ता और हन्ता । जर्जरी शब्द से इनको भर्ता और तुर्फरी शब्द से हन्ता बताया गया है । ऊपर उद्धृत पूरे मन्त्र का अर्थ यह है-सृणि अंकुश का नाम है । सृण्य का अर्थ होगा अकुश धारण करने में निपुण अर्थात् अश्विनीकुमार मतवाले हाथी कीतरह चलतेचलते है । जभ जूभि धातु का अर्थ शरीर को झुलाना होता है । अथवा सृणि और सृण्य दोनो का अर्थ अकुश ही करेंगे । यह अंकुश दो तरह का होता है । एक से मतवाले हाथी को एक जगह खड़ा रखता है और दूसरा उसको नियन्त्रित करता है । इन सृणियों की तरह ये अश्विनीकुमार शत्रुओं को एक जगह बाध देते है और उनको अपने वश मे कर लेते है । विभिन्न धातुओ से मन्त्र में आये जर्मरी, तर्फरीतू इत्यादि शब्दों को सिद्ध करने की विधि ऊपर ( मूल में ) विस्तार से दी गई है । निरुक्त के बचनो से इन्ही अर्थों में

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१४१२ वेदार्थपारिजातः अत्रेवार्थे पूर्वोक्तनिरुवचनमनुसन्धेयम् । नैनोगेव वधार्थको नितोशनि, तस्यापत्य नैतोश, नितोशयतीतिनितोशस्ताविव निद्यावकाविव हन्तारौ तुर्फरी यत्रणा हन्तारो पर्फरीका शत्रूणा विदारयितारौ त्रिफला विशरणे इत्यस्मात् पर्फरीकादयश्च ( उ० ४।२० ) इनीक् प्रत्यये निपति रूपसिद्धि । यहा स्तोतृजनाना धनादिदानेन पूरयितारौ ' पालनपूरणयो ' अस्मात् इकनि पूर्ववत्सर्व निपात्यने । उदन्यजेव उदके भवम् उदन्य 'पत्रोमास' (पा० सू० ६| १/६३ ) इत्यादिनाऽशस्त्रभृतिष्वप्यदन्नादेश । नत्र जाते रत्ने इव निर्मलौ जेमना जयिनौ जयते 'अन्येभ्योऽपि दृश्यते' इनि मनिनि मदेरू बलातिशयेन मत्तौ स्तुत्यौ इव, ना तौ पूर्वोक्तगुणान्विनो अश्विनौ, युवा मे मदीय जरायुजम् अत एव मरायु मरणशील शरीरम् अजर जरारहित मरणरहित कुरुतम् । अर्थात् सृण्यों मत्तगजाविव गात्रजृम्भणकर्तारो अङ्कुशाविव एकत्रव्यवस्थापयितारौ तद्वदेव बाधितारौ जर्भरी भर्तारौ तुर्फरीतू शत्रूणा हन्नारी सिहशावकाविव हन्तारौ पर्फरीको शत्रूणा विदारयितारौ तुर्करी स्तोतृजनकामपूरयितारौ उदन्यजेव ममुद्राज्जाते रत्ने इव निर्मलौ जेमनो जयशीली मदेरू मत्ती स्तुत्यौ हे नासत्यौ, युवा मे मदीय जरायु जरायुज शरीर मरणशील अजर जरारहित जरामरणरहित कुरुतम् । 'उभा उ नूनम्' इत्येकादश सूक्तम्, त्रैष्टुभमश्विदैवत्यम् । कश्यपुत्रो भूताशो नामर्षि । उभौ भूताश काश्य- आश्विनमित्यनुक्रमणीयवचनादश्विदेवत्येनाश्विस्तुतिरेव मन्त्रार्थं । ' व्यत्ययो बहुलम्' ( पा० सू० ३ | १ | ४ ) 'सुप्तिडुपग्रहलिङ्ग- नराणा कालहलच्स्वरकर्तृयडा च । व्यत्ययमिच्छति शास्त्र कृदेषा सोऽपि च सिद्धयति बाहुलकेन! ' इति महाभाष्येण तत्रैव व्यत्ययादिक भवति यत्र यथाश्रुतग्रहणे बाधक स्यात्, न यथाश्रुतार्थसम्भवेऽपि । अग्निवायुजलैविमानादिक साधनीयमित्यपि न मन्त्रार्थं, तादृशपदाभावात् । द्यावापृथिव्योरश्विपदप्रयोग उक्तो न तु वाय्वग्निजलयोगोऽत्रोक्त | पृथिवीपदेन पृथिवीविकारकाष्ठलोहादिग्रहणसम्भवेऽपि यन्त्रनिर्माणबोधक पद त्वत्र नास्त्येव । एवमेव सूर्याचन्द्रमसोरश्वित्वमुक्तम्, तथापि तत्राकर्पणादिगुणैर्जगति पृथिव्यादिपदार्थसयोगवियोगादिभिर्वृद्धिक्षयादि-गुणा उत्पद्यन्ते इति कस्यापि पदस्य नार्थ । उदन्यजशब्दस्याप्युदकोद्भूतरत्नादिबोधकत्वमेव नाग्निजलप्रयोगबोधकत्वम् । 'अनारम्भणे तदवीरयेथामनास्थाने अग्रभणं समुद्रे | यदश्विना अहथुर्भुज्युमस्त शतारित्रा नावमातस्थिवासम् ॥ ५ ॥

इनकी सिद्धि होती है । नैतोश शब्द का अर्थ सिंह का शावक किया गया है । अर्थात् जैसे सिंह का शावक (बच्चा ) हाथी पर आक्रमण कर उसको मार डालता है, उसी तरह ये अश्विनीकुमार भी शत्रु पर आक्रमण कर उसको नष्ट कर देते है । अथवा पर्फरीका शब्द का यह अर्थ किया जा सकता है कि ये अश्विनीकुमार अपनी स्तुति करने वालो को धन-सम्पत्ति देकर उनका पालन-पोषण करते है । अपने अतिशय बल के कारण मदमत्त अश्विनीकुमार स्तुति के लिये सर्वथा योग्य है । इस तरह से अनेक गुणो से युक्त ये अश्विनीकुमार मेरे जरणशील और मरणशील शरीर को अजर और अमर बनावें । इसका सक्षेप मे अर्थ यह होगा कि मतवाले हाथी कीतरह अकड कर मस्त चाल से चलने वाले, अकुश की तरह एक जगह व्यवस्था करने वाले और उसी को तरह सबको नियन्त्रित करने वाले, पालन करने वाले, शत्रुओ का नाश करने वाले, सिंह के शावक का तरह निडर होकर आक्रमण करने वाले, शत्रुओ को छिन्न-भिन्न कर देने वाले, स्तुति करने वालो की कामनाओ को पूरा करने वाले, समुद्र से उत्पन्न मणि की तरह निर्मल, सर्वत्र विजय प्राप्त करने वाले, स्तुति के योग्य हे अश्विनीकुमारो, आप लोग मेरे जरा-मरणशील शरीर को अजर और अमर बना दीजिये । सर्वानुक्रमणी मे 'उभा उ नूनम्' इत्यादि ग्यारह ऋचाओ वाले इस सूक्त के देवता अश्विनीकुमार, छन्द त्रिष्टुप् और कश्यपुत्र ( काव्य ) तथा भूताश दोनो ऋषि है । इस सूक्त के देवता अश्विनी है, अत इसमे उन्ही की स्तुति को जाय, यह उचित ही का व्यत्यय होता है ।इसी अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये महाभाष्य की पद्धति से पाणिनि सूत्रो के आधार पर धातु प्रत्यय आदि है । अग्नि, वायु, जल आदि की सहायता से विमान यादि का निर्माण करना चाहिये, यह भी मन्त्र का अर्थ नही हो सकता,क्योकि इस तरह के पदो का मन्त्र मे अभाव है । द्यावा पृथिवी के अर्थ में निरुक्त में इस शब्द का प्रयोग अवश्य बतायाउसका वायु, अग्नि, जल आदि से संयोग है, ऐसी बात नहीं कही गई है । पृथिवी पद से किसी तरह से पृथिवी केगयाविकारहै, किन्तु ( ),, लकडी लोहा आदि का ग्रहण भले ही हो जाय किन्तु उनसे मन्त्र के निर्माण की प्रक्रिया का बोध नहीं हो सकता । सूर्य और काष्ठ चन्द्रमा

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वैवार्थपारिजातः १४१३ यमग्विना ददथु श्वेतमञ्वमघाश्वाय शश्वदित् स्वस्ति । तद्वा दात्र महि कीर्तेन्य भूत् पैो वाजी सदमिद्धव्यो अर्यं ॥६॥

(ऋ० स० १।११६/ ५-६) इत्यस्यापि मन्त्रद्वयस्य न त्वदर्थसाधकत्वम् । अश्विभ्यामस्त क्षिप्त चलितविमान कार्य साधयतीत्यादि- कल्पनामात्रम्, शतानि अरित्राणि लोहमयानि समुद्रस्थलान्तरिक्षमध्ये स्तम्भनार्थानि गाधग्रहणार्थानि यस्या ता तथाभूता नावमित्यपि न युक्तम्, अरित्रशब्दस्य तथार्थबोधकत्वे मानाभावात् । तदेतत्त्रिविध यान शतकल गतबन्धन शतस्तम्भन च रचनीयमित्यपि निर्मूलम्, विधिबोधकपदाभावात् कलाबन्धनस्तम्भनानि कानि कीदृशानि कथ निर्मातव्यानीत्यनिरूपणात् । मन्त्रार्थस्त्वित्थम्-हे अश्विनौ । अनारम्भणे आरभ्यतेऽस्मिन्नित्यारम्भण तस्मिन्, आलम्बनरहिते समुद्रे तत्कर्म अवीरयेथा युवा विक्रान्त कृतवन्तौ ' शूरवीरविक्रान्तौ' । अनारम्भणत्वमेव स्पष्टयति -अन्तस्थाने आस्थीयतेऽस्मिन्नित्यास्थानो भूप्रदेशस्तद्रहिते स्थातुमशक्ये जले अग्रभणे हस्तेन ग्राह्य शाखादिक यत्र नास्ति तस्मिन् तादृशे समुद्रे तत्कर्म अबीरयेथा कीदृश तत्कर्म भुज्य समुद्रे मग्न शतारित्रां नावमातस्थिवासमारूढवन्त कृत्वा । अस्यतेऽस्मिन् सर्वमित्यस्त गृह यत् अहथु प्रापितवन्तौ, तत्प्रापणमन्यैर्दु शकम् युवा समुद्रमध्ये कृतवन्तौ । ये काष्ठे पार्श्वतो बद्धैर्जलालोडने सति नौ शीघ्र गच्छति तानि अरित्राणि शतसंख्याकानि यस्या ता नावम् । नाविकेषु डॉणशब्देन प्रसिद्धानि नौचालनसाधनानि जलापसारकाणि काष्ठविशेषाणीहारित्रशब्दव्यपदेश्यानि, नानिर्वचनीयानि यन्त्राणि । 'ऋगतावित्यस्माद् धातो 'अर्तिलूधूसूरवनसहचर इत्र (पा ० सू० ३।२।१८४) इति करणे इत्रप्रत्यय । दयानन्देन अवीरयेथामिति पदस्य व्याख्यान तु न कृतम् । यमश्विनेति मन्त्रस्यापि व्याख्यान न सङ्गतम्, 'यस्मादेव भोगो जायते तस्मात्सर्वेर्मनुष्यै प्रयत्न कर्त्तव्य ' इत्यस्यार्थस्योदक्षरत्वात् । शुक्लवर्णं वाष्पाख्यमश्व गृहीत्वा पूर्वोक्तानि यानानि साधयन्ति । शिल्पिन इत्यादिक निर्मूलम्, मन्त्रे बाष्पबोधकपदाभावात् । 'अग्न्याख्यो बाजी वेगवान् 1। पेद्व यो यान मार्गे शीघ्रवेगेन गमयितास्ति, य सद वेग इत् एति प्राप्नोति इतीदृशोऽश्वोऽग्निरस्माभिव्य, ग्राह्यः । तमर्यो वणिग्जनोऽवश्य गृह्णीयादिति, तदपि विशृङ्खलमेव, हव्यो अर्यं इत्यनन्वयात् । को भी यहाँ अश्विनी बताया गया है, किन्तु वहा भी आकर्षण आदि गुणों से जगत् में पृथिवी आदि पदार्थों के नाना प्रकार की संयोग-वियोग की प्रक्रिया के आधार पर वृद्धि और क्षय आदि अवस्थाओं के उत्पन्न होने की बात को बताने वाले शब्द नही है । उदन्यज शब्द का अर्थ भी उदक ( जल ) से उत्पन्न रत्न आदि ही हो सकते हैं, इससे अग्नि, जल आदि के प्रयोग की बात खोज निकालना संभव नही है । ' अनारम्भणे ' इत्यादि आपके द्वारा ( पृ० २२३ ) में उद्धृत दो मन्त्र भी आपके मतलब के नही, क्योकि अश्वि के द्वारा चलाया गया विमान सभी कार्यों का माधक है, यह कोरी कल्पना है । 'उन नौका आदि सवारियो मे सैकडो अरित्र अर्थात् जल का थाह लेने वाले, उनको थामने और वायु आदि विघ्नो से रक्षा के लिये लोह आदि के लगर भी रखना चाहिये, जिससे जहा चाहे वहा उन यानो का थामे' ( पृ० २२४ ) यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि अरित्र शब्द का ऐसा अर्थ करने में कोई प्रमाण नही है । ' इसी प्रकार उनमें सैकड़ो कल-बन्धन और थामने के माधन रखने चाहिये ' ( पृ० २२४) यह व्याख्या भी निर्मूल है, क्योकि विधि का बोधक कोई पद यहा नही है । मन्त्रो का अर्थ यह है- हे अश्विनीकुमारो, आप लोगो ने आलम्बन रहित इस अथाह सागर मे बड़े पराक्रम का कार्य किया है । यह समुद्र अनारम्भण इसलिये कहलाता है कि इसका आधारभूत कोई भूप्रदेश दिखाई नही पडता, जिस पर कि यह ठहरे । साथ ही यह अग्रभण भी है, अर्थात् इसकी कोई शाखा प्रशाखा आदि भी नही दिखाई पडती, जिसको कि हाथ से पकड़ा जाय । ऐसे समुद्र में आपने यह बडा पराक्रम का कार्य किया कि समुद्र मे डूब रहे भुज्यु को सो पतवार वाली नाव पर चढाकर बचा लिया और उसको अपने घर पहुंचा दिया । यह कार्य किसी दूसरे के लिये कठिन था । अरित्र शब्द यहा पतवार का वाचक है, जिसको सहायता से कि नाव चलाई जाती है । अश्विनीकुमारों की वे नावें सौ पतवार वाली थी । ( मल्लाहों में डांड के नाम से प्रसिद्ध नात्र चलाते समय पानी को काटने वाले विशेष प्रकार के लकड़ी के चप्पों को ही यहा अरित्र शब्द से कहा जाता है किसी अनोखे यन्त्र को नही ) ।

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वेदार्थपारिजातः १४१४ परमार्थस्त्वयम्– अत्राप्याख्यायिका प्रसिद्धा । कश्चित् पेदुर्नामकोऽश्विनौ तुष्टाव । तस्मै प्रीतौ कञ्चित् श्वेतवर्णमश्व दत्तवन्तौ । स चाश्वस्तस्य प्रौढ जय चकार ॥ तदेवात्र प्रतिपाद्यते -हे अश्विनौ युवाम् अघाश्वाय अहन्तव्यायाश्वाय पेदुनाम्ने- राजर्पये य श्वेतवर्णमश्व ददथु दत्तवन्तौ सोऽश्वस्तस्मै स्वस्ति जयलक्षण मङ्गल शश्वत् इत् नित्यमेव चकार, वा युवयो तत् दात्र दान महि महत् अतिगम्भीर कीर्तेन्य कीर्तनीय प्रशस्यम् 'कृत्यार्थे तवैकेन केन्यत्वन ' ( पा ० सू० ३ | ४ | १४ ) इति केन्यप्रत्ययः । भूत अभूत् । तस्मात् पैद्व पेदो सम्बन्धी पतनशील शीघ्रगामी वा3 अर्थ शत्रूणा प्रेरयिता, युद्धेषु प्रेरयितव्यो वा वाजी वेजन- वान् सोऽश्व सदमित् सदैव हव्य. अस्माभिरप्याह्नातव्य. अश्विप्रसादभूतस्य विजयादिमङ्गलप्रद शत्रूणा पलायनाय प्रेरकः शत्रूद्वेजकोऽश्व सर्वेराह्वातव्य एव । एव स्वाभाविकार्थमुपेक्ष्य पाश्चात्त्यविज्ञानचाकचिक्यचकितवुद्धित्वात् पाश्चात्त्यविज्ञान- मृगमरीचिकायमानार्थान्वेषणमसङ्गतमेव । योऽग्निर्वाजिरूपेण विवक्षित, तस्यात्र मन्त्रे चर्चापि नास्ति । 'त्रयः पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इविदु । त्रय स्कम्भास स्कभितास आरभे त्रिर्नक्त याथत्रि- वश्विना दिवा ॥ ' (ऋ० स० १ ३४/२ ) इत्यस्यापि व्याख्यानमविचारचारु - ' मधुरगतिमति रथे त्रय पवय वज्रतुल्याश्चक्र- समूहा. कलायन्त्रयुक्ता दृढा शीघ्र गमनार्थं त्रय कार्या । तथैव शिल्पिभि त्रय स्कम्भास स्तम्भनार्थास्तम्भात्र कार्या । किमर्थ सर्वकलाना स्थापनार्था । विश्वे शिल्पिन सोमगुणविशिष्टस्य सुखस्य वेना कमनीया कामनासिद्धि विदुर्जानन्त्येव ॥ अग्विभ्यामेवैतद्यानमारब्धमिच्छेयुः कृत, तावेवाश्विनौ तद्यानसिद्धि याथ प्रापयत । तत्कीदृश तिसृभी रात्रिभिस्त्रिभिर्दि- नैश्चातिदूरमपि गमयतीति बोध्यम् ।' इति, तत्कल्पनामात्रम्, पवय इत्यस्य कलायन्त्रयुक्ताश्चक्रसमूहा अर्थ इत्यत्र बीजाभावात् । ' त्रिर्न त्रिदिवा' इत्यनयोस्ति भी रात्रिभि त्रिभिर्दिनैरित्यर्थक रणमज्ञानविजृम्भितमेव, त्रिर्गकारमुच्चारयतीत्यादी त्रिवार- ' यमश्विना ० ' इत्यादि द्वितीय मन्त्र का अर्थ भी सही नही है, क्योकि 'इस तरह से भोग की प्राप्ति होती है, अत सभी मनुष्यों को इसके लिये प्रयत्न करना चाहिये यह अर्थ सर्वथा मन्त्राक्षरो से विपरीत है । 'भाफरूप अश्व अत्यन्त वेग देने वाला होता है, जिससे कारीगर लोग सवारियो को शीघ्र गमन के लिये वेगयुक्त करते हैं' ( पृ० २२५ ) में सब व्याख्याएँ निराधार है, क्योकि मन्त्र में भाफ का वाचक पद है ही नही । 'वही भावरूपी अश्व मार्ग में यान को शीघ्र चलाने वाला है, जो अत्यन्त वेग से युक्त है । वह ग्रहण और दान देने के योग्य है । वैश्य लोग तथा शिल्पविद्या का स्वामी इसको अवश्य ग्रहण करे, क्योकि इन थानो के बिना द्वीपान्तर मे जाना-आना कठिन है, ( पृ ० २२५ ) यह बात भी अनर्गल है, क्योकि हव्य और अर्थ का कोई सबन्ध नही बैठता । किसी पेदु नाम के व्यक्ति ने अश्विनी कुमारो की स्तुति की थी । अश्विनीकुमारो ने प्रसन्न होकर उसको श्वेत वर्ण का घोड़ा दिया । इस घोड़े ने उसको अनेक विजय दिलाई । उसी का वर्णन इस मन्त्र मे है - हे अश्विनीकुमारो, आप लोगो ने यज्ञ में घोडे को न मारने वाले पेदु नाम के राजर्षि को जो श्वेत वर्ण वाला घोडा दिया, उसने उसको अनेक युद्धो में सदा विजय दिलवाई है । आप लोगो का वह अश्वदान अत्यन्त हो प्रशंसनीय रहा है । इसलिये राजा पेदु का वह तीव्रगति वाला घोडा शत्रुओ में भय का संचार कर देने वाला है । उसको हम सदा याद करते है । अश्विनीकुमारो के प्रसाद से प्राप्त विजय आदि मगल दिलाने वाला, शत्रुओ को भगा देने वाला, उनमे आतंक पैदा कर देने वाला इस तरह का घोडा सभी के लिये वरणीय है । इस तरह के स्वाभाविक अर्थ को छोडकर पाश्चात्य विज्ञान की चकाचौध से चकित बुद्धि वाले दयानन्द ने जो पाश्चात्य विज्ञान की मृगमरीचिका में पडकर वेद मन्त्रो के अर्थ किये है, वह सर्वथा असंभव है । 'त्रय पवयः' इत्यादि मन्त्र का अर्थ भी विचार करने पर जँचता नही, क्योकि 'जिसमे तीन पहिये है, जिनसे वह जल और पृथिवी के ऊपर चलाया जाय और मधुर वेगवाला हो, उसके सब अंग वज्र के समान दृढ हो, जिसमे कलायन्त्र भी दृढ हो, जिनसे शीघ्र गमन होवे । सब शिल्पी विद्वान् लोग ऐसे यानो को सिद्ध करना अवश्य जाने, जिनसे सुन्दर सुख की कामना सिद्ध होती है, जिस रथ में सब क्रीडासुखों की प्राप्ति होती है । उसके आरंभ में अश्वि अर्थात् अग्नि और जल ही मुख्य है' । जिन मन्त्रो से तीन दिन और तीन रात में द्वीप द्वीपान्तर में जा सकते है' (पृ ० २२५ ) । यह सारा अर्थ कोरी कपोल कल्पना है, क्योकि 'पवि' शब्द का अर्थ 'कला यन्त्र से युक्त चक्रसमूह' है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । 'त्रिर्नक्तं त्रिदिवा ' इन शब्दो का अर्थ तीन रात और तीन दिन में करना भी ठीक नही है, क्योंकि 'त्रिर्गकार ० ' इत्यादि वाक्यो का अर्थ गकार का तीन बार उच्चारण होताहै, उसी

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वेदार्थपारिजातः १४१५ मित्यस्यैवार्थस्य प्रसिद्धे । अन्यथा त्रिदिवा त्रिनक्तमित्येव स्यात् । मोमस्य सुखमर्थ इत्यत्रापि मूल चिन्त्यम् । सर्वकलाना स्थापनार्थास्त्रय स्तम्भा कार्या इत्यपि न किञ्चित् स्पष्टम्, ईदृशी यन्त्रविद्या श्रुत्वा को नाम वेदेषु श्रधीत? सायणसम्मतोऽर्थस्तु - मधुवाहने मधु वाह्यतेऽनेनेति मधुवाहन तस्मिन् मधुरद्रव्याणा नानाविधखाद्यादीना वहनेन युक्तेऽश्विनो सम्बन्धिनि रथे पवयो वज्रसमानाश्चक्रविशेषास्त्रय त्रिसख्याका सन्ति । इत् इत्थ चक्रत्रयसद्भावप्रकार विश्वे सर्वे देवा सोमस्य चन्द्रस्य वेना कमनीया भार्यामभिलक्ष्य यात्राया विदु जानन्ति । यदा सोमस्य वेनया सह विवाह, तदानी नानाविधवाद्ययुक्त चक्रत्रयोपेत प्रौढरथमारुह्य अश्विनौ गच्छत इति सर्वे देवा जानन्ति । तस्य रथस्योपरि त्रय स्कम्भा स्तम्भविशेषा आलम्बनविशेषा वा आरभे आरब्धुमवलम्बितु स्कम्भितास स्थापिता । यदा रथस्त्वरया याति तदानी पतनभीतिनिवृत्त्यर्थं हस्तालम्बनभूता स्तम्भा इत्यर्थ । हे अश्विनी, युवा तादृशेन रथेन नक्त रात्रौ त्रिर्याथ त्रिवार गच्छथ, त्रिदिवा दिवसेऽपि त्रिवार याथ, रथमारुह्य पुन पुन क्रीडथ इत्यर्थं । नन्वेवमाप्याख्यायिकामात्रार्थप्रतिपादनापेक्षया यन्त्रादिपर व्याख्यानमेव श्रेष्ठ जनोपयोगित्वादिति चेन्न 1 प्रमाणानामनधिगतगन्तृत्वेनैव प्रामाण्यमिति व्यवस्थापनात् । शक्त्या भक्त्या वा यादृशोऽर्थं सम्भवति स एव शब्दार्थ. । न स्वेच्छाबलादपदार्थ. पदैर्बोधयितु शक्य, स्वेच्छाया अव्याहत- प्रसरत्वात् । आश्विनादिमन्त्राणामश्विस्तुतिपरत्वेन यत्र कर्मणि विनियोगस्तदङ्गत्वेनैव सार्थक्यम् । 'त्रिर्नो अश्विना यजता दिवे दिवे परित्रिधातु पृथिवीमशायतम् । तिस्रो नासत्या रथ्या परावत आत्मेव वात स्वसराणि गच्छतम् || ' (ऋ० स० १।३४।७) । 'अरित्र वा दिवस्पृथु तीर्थे सिन्धूना रथ । धिया युयुज्य इन्दव ' (ऋ० स ० १।४६।८) यदत्र व्याख्यातम्— 'यत्पूर्वोक्तयान तत् अयस्ताम्ररजतादिधातुत्रयेण रचनीयम्, इद कीदृग्वेग भवति इत्यत्राह-आत्मेव वात आगमनागमने यथात्मा मनश्च शीघ्र गच्छत्यागच्छति च तथैव कलाप्रेरितौ वाय्वग्नी तद्यान त्वरित गमयतः तरह से यहाँ भी दिन में तीन बार और रात्रि मे तीन बार यही अर्थ ठीक हो सकता है । अन्यथा त्रिदिवा, त्रिनक्त ऐसे शब्दो का प्रयोग यहाँ होना चाहिये था । सोम का अर्थ सुख करने के लिये प्रमाण चाहिये । सभी कलाओ की स्थापना के लिये तीन आधार बनाने चाहिये, यह बात भी कुछ स्पष्ट नही होती । इस मन्त्र का सायणसंमत अर्थ यह है-नाना प्रकार के मधुर खाद्य पदार्थों के वाहक अर्थात् प्राप्त कराने वाले अश्विनीकुमारो के पवि नाम के तीन चक्र है । इस स्थिति को कि अश्विनीकुमारों के पास इस तरह के तीन चक्र हैं, विश्वदेव नामक देवताओ ने तब जाना था, जबकि चन्द्रमा की सुन्दर भार्या वेना के निमित्त यात्रा के लिये निकले थे । सारे देवता इस बात को जानते है कि जब सोम का वेना के साथ विवाह हुआ तब नाना प्रकार के वाद्यो से युक्त तीन चक्र वाले प्रौढ रथ पर बैठकर अश्विनीकुमार वहाँ जाते है । उस रथ के ऊपर सहारे के लिये तीन खभे लगाये हुए थे । जब रथ वेग से चलता हो, तब वह इधर-उधर गिर न पड़े, इसके लिये ये आधार लगाये गये थे । हे अश्विनीकुमारों, आप लोग इस तरह के रथ से दिन और रात्रि में तीन-तीन बार यात्रा करते थे, रथ पर चढकर क्रीडा करते हो । प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस तरह की कहानी के आधार पर किये गये अर्थ की अपेक्षा यन्त्र आदि को बनाने वाला अर्थ अधिक लोकोपकारी हो सकता है । इसका उत्तर यह है कि शक्ति अथवा लक्षण से जो अर्थ प्राप्त हो सकता है, वह शब्द का अर्थ माना जा सकता है । पदों का मनमानी अर्थ नही किया जा सकता, क्योकि इच्छा का कही ठोर ठिगाना नही है कि वह कहाँ जाकर रुकेगी । आश्विन सूक्त के मन्त्रो का विनियोग उनकी स्तुति के लिये ही किया जा सकता है । इसी में उनकी सार्थकता है । 'faif' इत्यादि मन्त्रो का अर्थ दयानन्द ने इस तरह से किया है--'जिन सवारियों से हमारी भूमि, जल और आकाश में प्रतिदिन आनन्द से जाना-आना बनता है, वह लोहा, ताबा, चादी आदि तीन धातुओ से बनता है । नगर या ग्राम की गलियो में झटपट जाना आना बनता है, वैसे दूर देश में भी उन सवारियो से शीघ्र जाना-आना होता है । इसी प्रकार विद्या के निमित्त पूर्वोक्त जो अश्वि है, उनसे बड़े-बडे कठिन मार्ग में भी सहज से जाना-आना करे । जैसे मन के वेग के समान शीघ्र गमन के लिये सवारियों

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येवार्थपारिजातः १४१६ I आगमयतश्चेति विज्ञेयम्' ( पृ० २२६ ) इति तदुपहासास्पदम् 'त्रिधातु आत्मेववात ' इत्येतै पर्दै कथ यन्त्रनिर्माण यन्त्रस्य च मनोजवत्वमित्याद्यर्थस्य साधयितुमशक्यत्वात् । मन्त्रगतानि पदान्तराणि तु स्पष्टानि । सम्पूर्णमन्त्रार्थस्त्वित्थ ज्ञानव्य -अस्य मन्त्रस्य आश्विनसून गतत्वात् तत्स्तुतिपरत्वमेव ज्ञातव्यम् । आङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषि, जगतीच्छन्द । हे अश्विनौ, दिवे दिवे प्रतिदिन दिवे दिवे द्यवि द्यवि' (नि० ११ ९ ) यजता यष्टव्यौ युवा न अस्मदीया पृथिवी वेदिरूपा भूमि परिसर्वत प्राप्य त्रिधातु कदयात्रययुक्ते आस्तीर्णे बर्हिषि त्रिवारमशायत शयनं कुरुतम् । त्रेधा निधीयत इति त्रिधातु बहिरेव । हे रथ्या रथ्यौ रथस्वामिना तिस्र त्रिसख्याका ऐष्टिकपाशुकसौमिकरूपा वेदी. परावत महत्त्वपूर्णा गच्छतम् । कथमव स्वसराणि शरीराणि सरन्ति विषय प्रतीति सरा इन्द्रियाणि स्वकीया सरा येषा शरीराणा तानि स्वसराणि शरीराणि आत्मेव वात, प्राणिनामात्मभूतो वायुर्यथा शरीराणि गच्छति तद्वत् । हे नासत्यौ सत्सु, साधू सत्यौ, न सत्यौ असत्यौ, न असत्यौ नासत्या सत्यावेवेत्यर्थ. । केवल त्रिधातु आत्मेववात. इति शब्दान् दृष्ट्वा पौर्वापर्यमननुसन्धाय यन्त्रनिर्माणपर मन्त्रव्याख्यान सचेतसा चेतसि खेदायैव जायते । अरित्रमित्यत्र यदुक्त कीदृश यानम् अरित्र स्तम्भार्थसाधनयुक्तम्, पृषु अतिविस्तीर्णम् ईदृश खरथ, अग्न्यश्व- युक्त सिन्धूना महासमुद्राणा तीर्थे तरणे कर्त्तव्ये अरित्र वेगवत् भवतीति बोध्यम् । (धियायु ) तत्र त्रिविधे रथे इन्दवः जलानि वाष्पवेगार्थ ( युयुजे ) यथावत् युक्तानि कार्याणि येनातीव शीघ्रगामी सरथ स्यात् (पृ० २२६ ) इति, तदपि न किञ्चित्, रथ इत्यग्न्यश्वरथ इत्यर्थं कुतो लव्ध? इन्दव इत्यस्य जार्थत्वेऽपि वाष्परूप जलमिति कुतो ज्ञातम्? यन्त्रनिर्माण तु नास्त्येवात्र । ------ सायणसम्मतस्त्वर्थ' – हे अश्विनौ वा युवयो दिवस्पृथु द्युलोकादप्यतिविस्तीर्ण अरित्र गमनसाधन नौरूपम् अति गच्छत्यनेनेत्यरित्रम्, सिन्धूना समुद्राणा तीर्थे अवतरणप्रदेशे विद्यत इति शेष । रथः भूमौ गन्तु विद्यते । इन्दव. सोमा., धिया भवद्विषयेण कर्मणा युयुजे युक्ता बभूवु । अर्थाद् युवयोरतिविस्तृतमरित्राख्य नौयान समुद्राणा तीर्थे अवसरणस्थाने से प्रतिदिन सुख से सब भूगोल के बीच जावे आवे ' ( पृ० २२६) यह सब उपहासास्पद है ' त्रिधातु आत्मेवात ' इन शब्दो से मन्त्र का निर्माण कैसे हो सकता है और यह मन्त्र मन के समान वेग वाला है, यह कैसे सिद्ध हो सकता है । मन्त्र के अन्य पदो का अर्थ भी स्पष्ट किया गया है । पूरे मन्त्र का अर्थ यह है - हे अश्विनीकुमारो, आपलोग प्रतिदिन पूजनीय है । आप हमारे यज्ञमण्डप में बनाई गई वेदि पर तिहरे बिछाये गये आसन पर आकर तीन बार विश्राम कीजिये । त्रिधातु शब्द से व्युत्पत्ति के आधार पर कुश के आसन का बोध होता है । हे सुन्दररथ के स्वामियो, आप लोग ऐष्टिक, पाशुक, सौमिक नाम की तीन महत्वपूर्ण वेदियो पर आकर बैठिये, जैसे कि इन्द्रिया अपने अपने विषयो की ओर तथा प्राणियो का आत्मभूत प्राणवायु जैसे शरीर की ओर बढता है । हे नासत्यो, आप लोग सज्जनो का सदा भला करने वाले है, आप लोग कभी भी असत्य आचरण की ओर प्रवृत्त नही होते । 'अरित्रम्० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने लिखा है-' जो पूर्वोक्त अरित्रयुक्त यान बनते है, जो रथ बड़े बड़े समुद्रो के मध्य से भी पहुंचाने मे श्रेष्ठ होते है, जो विस्तृत आकाश और समुद्र मे आने-जाने के लिये अत्यन्त उत्तम होते है, उन रथो में जो मनुष्य यन्त्र सिद्ध करते हैं, वे सुखो को प्राप्त होते है । उन तीन प्रकार के यानो में वाष्पवेग के लिये एक जलाशय बनाकर उसमें जलसेचन करना चाहिये, जिससे वह अत्यन्त वेग से चलने वाला यान सिद्ध हो' ( पृ० २२६ ) यह व्याख्या भी लचर है 1। रथ का अर्थ अग्निरूपी अश्व से चलने वाला रथ कैसे किया जा सकता है । इन्द्र शब्द का अर्थं जल तो हो सकता है, किन्तु वाष्परूप जल का इससे बोध किस प्रमाण के आधार पर होगा? यन्त्र के निर्माण की बात तो यहाँ है ही नहीं । इसका सायणसंमत अर्थ यह है - हे अश्विनीकुमारो, आपलोगों की आकाश से भी अत्यन्त विस्तीर्ण, डाडो की मदद से चलने वाली नावें समुद्र के किनारो पर लगी हुई है । भूमि पर चलने के लिये रथ आप लोगो के पास है । यह हमारे द्वारा दिया जा रहा सोमरस आपके उपयोग में आये । अर्थात् आप लोगो की बडी बडी नावें समुद्र यात्रा के लिये किनारों पर लगी हुई है और पृथ्वी

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वेदार्थपारिजातः II जले गमनार्थं विद्यते, रथश्च भूमौ गन्तुं विद्यते । सोमाहुतियुक्तं कर्म च त्वदर्थ नियत ब्रह्मवादिभिरनुष्ठीयते । एव महाभाग्यं त्वदीयमित्यर्थ । 'विये भ्राजन्ते सुमखास ऋष्टिभि प्रच्यावयन्तो अच्युता चिदोजसा ॥ मनो जुवो यन्मरुतो रथेष्वावृषव्रातास. पृषतीरयुग्ध्वम् || ' (ऋ ० स० ११८५१४) ।| हे मनुष्या. । मनोजव मनोवद्गतयो वायबो यन्त्रकलासञ्चालनैस्तेषु रथेषु पूर्वोक्तेषु त्रिविधयानेषु यूयम् अयुग्ध्वम् यथावद्योजयत । कथम्भूता आग्निवाय्वादय? आवृषव्रतास जलासेचनयुक्ता, येषा सयोगे वाष्पजन्यवेगोत्पत्त्या वेगवन्ति तानि यानानि सिद्ध्यन्ति' (पृ० २२६ ) इति, तदपि यत्किञ्चित् धूमशकटीयन्त्रदर्शनेन तदनुगुणान् काश्चिच्छब्दाभासान् आलोक्य मूर्खजनप्रतारणाय वेदे यन्त्रविद्याप्रदर्शनमात्रम्, वस्तुतो न वेदाक्षरैस्तत्सम्बन्ध. । अत एव नैतदुपदेशेन कश्चिदपि यन्त्रयुक्तानि जलस्थलान्तरिक्षगामीनि यानानि निर्मातु शक्नोति । दयानन्देन सामाजिकैश्चाद्य चावद् यन्त्रनिर्माणकौशलस्यानाविष्कृतत्वात् । वस्तुतो मन्त्रार्थो वर्ण्यते — मरुद्देवताकसूक्तगतत्वादय मन्त्रो मरुद्देवताक । सुष्ठु शोभनानि मखानि येषा ते सुमखास, ये मरुत ऋष्टिभिरायुधविशेषैर्विभ्राजन्ते विशेषेण दीप्यन्ते ते अच्युता चित् न्यावयितुमशक्यानि दृढानि पर्वतादीन्यपि ओजसा स्वकीयेन बलेन प्रच्यावयन्त. प्रकर्षेण च्यावयितारो भवन्ति । हे मरुत. । मनोजुवो मनोवद्वेगगतयः, वृषव्रातास वृष्ट्युदक सेचनसमर्थमप्तसङ्घात्मका. यूय यत् यदा रथेष्मात्मीयेव पृषती श्वेतविन्दुभिर्युक्ता मृगी स्ववाहनानि आअयुग्ध्वम्, आभिमुख्येन नियुक्ता अकृढ्वम् तदा अच्युता पर्वता अपि च्यवन्तेषु पृषत्य इति मरुद्वाहनाना सज्ञा ' पृषत्यो मरुताम्' ( नि० नैघण्टुककाण्ड ) इत्युक्तवात् । 'आनो नावा मतीना पाराय गन्तवे । युञ्जाथामश्विना रथम् ॥ ' (ऋ ० स० १/४६/७ ) अत्र यदुक्तम् ——-समुद्रे भूमौ अन्तरिक्षे गमनयोग्यमार्गस्य पाराय गन्तवे गन्तु यानानि रचनीयानि । नावा मतीना यथासमुद्रगमनवृत्तिना मेघाविना पर चलने के लिये रथ तैयार है । ब्रह्मवादी आपलोगों के निमित्त सोम को आहुति देने के लिये पवित्र अनुष्ठान करते रहते है । इस तरह से सभी दृष्टियों मे आपका ऐश्वर्य प्रशंसनीय है । ' वि ये भ्राजन्ते ' मन्त्र का अर्थ यह किया गया है - 'हे मनुष्यो, जैसा मन का वेग है, वैसे वेगवाले यन्त्र सिद्ध करो । उन रथो में वायु और अग्नि को मनोवेग के समान चलाओ । उनके योग मे जल को भी स्थापित करो । जैसे जल की भाप घूमने की कलाओ की वेगवाली कर देती है, वैसे ही तुम भी उनको सब प्रकार से युक्त करो! जो इस प्रकार के प्रयत्न करके सवारी सिद्ध कहते से विविध प्रकार के भोगो से प्रकाशमान होते है । जो इस प्रकार से शिल्पविद्यारूप श्रेष्ठ यज्ञ करने वाले है, वे सब भोगो से युक्त होते हैं । वे कभी दुःखी होकर नष्ट नही होते और सदा पराक्रम से बढते जाते है, क्योंकि कला-कौशल से युक्त वायु और अग्नि आदि पदार्थों की कलाओ से पूर्व स्थान को छोड कर मनोवेग यानो से जाते आते है, उन्ही से मनुष्यों का सुख भी बढता है । इसलिये इन उत्तम यानों को अवश्य सिद्ध करे' ( पृ ० २२७ ) | यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि यह सारा अर्थ आधुनिक काल के रेलयान को देखकर कुछ उसी से मिलते जुलते शब्दो को पकड कर अज्ञजनों को ठगने के लिये वेद में मन्त्र विद्या को सिद्ध करने का भोडा प्रयत्न किया गया है । वस्तुतः मन्त्र के अक्षरो से इसका कुछ भी संबन्ध नही है । इसीलिये दयानन्द के उपदेश के अनुसार कोई भी व्यक्ति यन्त्र लगे हुए जल, स्थल और आकाश में चलने वाले यानों को बनाने में समर्थ नही हुआ है । न तो दयानन्द ने और न उनके किसी अनुयायी ने ही वेद के आधार पर अबतक कोई यान बनाकर दिखाया है । वस्तुतः मन्त्र का अर्थ यह है --सुन्दर मुंह वाले ये मरुद्गण ऋष्टि नाम के शस्त्रों को धारण कर बहुत हो शोभा पा रहे हैं । ये मरुद्गण बड़े मजबूत स्थिर पहाड़ों को भी अपने पराक्रम से हिला देते है । है मरुद्गणों, आपलोगों की गति मन के समान है । आप लोग वृष्टि के जल से सारे संसार को सीचते हैं । सात सात का गोल बनाकर अपने रथों पर बैठकर और उनमें सफेद चकतीदार मृगों को जोतकर जब आपलोग चलते हैं, तब बड़े बड़े पहाड़ भी डोल उठते हैं । 'पुषती' इस शब्द का प्रयोग मरुद्गणों के वाहक मृगों के लिये होता है । १७८

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 520 का मूल पृष्ठ
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पारिजातः १४१८ , आसमन्तात् यानेषु युज्येते, नावा पारं गच्छन्ति तथैवास्माकमप्युत्तमा मा नौर्भवेत् । आयुञ्जाथा यथा मेधाविभिरग्निजले प्रयत्न. कर्त्तव्य, (पृ ० २२७ ) 1तथास्माभिरपि योजनीयं भवत एव सर्वेर्मनुष्यै समुद्रादीना पारावारगमनाय पूर्वोक्तयानरचने । किञ्च निर्माणप्रकार-,,इति तदपि नि मारम् मन्त्रे उपमानादिवोधकस्य पदस्याभावाद् यन्त्रनिर्माणविधानकल्पनमसङ्गतमेव भवति । न च केवल निर्देशमन्तरा विधिगतैरपि कार्य न सिद्ध्यति । अत एव यागादिविध्यनन्तरमेव तत्रेतिकर्तव्यतानिर्देशो - हे अश्विनौ मतीनाकाष्ठलोष्ठवाय्वग्निशदरयस्ताम्ररजतादिनामनिर्देशेन वा यन्त्रनिर्माणतिकर्तव्यता पूर्यते । मन्त्रार्थस्तु स्तुतीनां पाराय पार गन्तु नावा नौरूपेण गमनसाधनेन न अस्मान् प्रति आयातम् समुद्रमध्यादागच्छतम् । भूमावागन्तु रथ भवदीयं युञ्जाथा सारव कुरुनम् । 'कृष्णं नियान हरय सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति । त आववृत्र तत्सदनादृतस्यादिद् धृतेन पृथिवी न शङ्खवोऽर्पिताः ' ( ) ' व्युद्यते ॥ ऋ ० स० १।१६४।४७ द्वादगप्रधयश्चक्रमेक त्रीणि नभ्यानिक उतच्चिकेत । तस्मिन्त्साक त्रिशता हरयोजन्या- षष्टिर्न चलाचलास ||' (ऋ० स० १११६४/४८) एतयोर्व्याख्याने यदुक्तम्–'हे मनुष्या, सुपर्णाः शोभनपतनशीला दयोऽश्वाः अपोवसाना जलपात्राच्छादिता अधस्ताज्ज्वालारूपा काष्ठेन्धने प्रज्वलिता. कलाकौशलभ्रमणयुक्ता कृताश्चेत्तदा ) कृष्णं पृथिवीविकारमय नियान निश्चित यान दिवमुत्पतन्ति द्योतनात्मकमाकाशमूर्ध्व चाधुनिकेनगमयन्तीत्यर्थआग्नेयतैलेन(पृ० २२७-२२८, (पेट्रोल),. चालितविमानदर्शननूनमेतत्सर्व धूमशकटीदर्शनोद्भूतसस्कारमहिम्नैवकृत स्यात्तदा तदनुगुणा अपि केचिच्छब्दाभासावेदमन्त्रेष्वपि तादृशार्थभानम्मन्त्रेष्वन्विष्टा भवेयुः। यदि । अधस्ताज्ज्वालारूपाः काष्ठेन्धनै प्रज्वलिताः कलाकौशलभ्रमणयुक्ता इत्येतत्सर्व हरिपदेन कथं लभ्यत? इति तु स एव जानीते । मन्त्रस्य त्वयमर्थ –वृष्टिकामस्य कारीर्यामिष्ट्यामनुवाक्यात्वेनायं मन्त्रो विनियुक्तः । कृष्ण नियानं हरयः सुपर्णाः नियुत्वन्तो ग्रामजितो यथा नराः' (आ ० श्र ० सू० २।१३ ) इति प्रमाणात् । कृष्णं कृष्णवर्ण नियान नियमेन गच्छन्त 'आनोना वा० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या यह की गई है -'हे मनुष्यो. जैसे बुद्धिमान् मनुष्यो के बनाये नाव आदि यानो ही पूर्वोक्त वायु आदि अश्वि का योग यथावत् करो, जिससे कि उन यानो से समुद्र के, - सेआरसमुद्रपारकोजापारसकोकरने। हेमेंमनुष्योसुगमता, आओहोती, हैआपसवैसेमें मिलकर इस प्रकार के यानो को बनावे, जिनसे सब देश देशान्तर मे हमारा जाना- यन्त्रो के निर्माण के विधान की ' ( ) आना बने पृ० २२८ । यह व्याख्या भी निस्सार है । मन्त्र में उपमान बोधक पद है ही नहीसे कुछ। बनने वाला नही है । इसीलिये,,,, कल्पना भी असंगत है । निर्माण की विधि जबतक न बताई जाय तब तक कोरे विधिवाक्यों लोहा वायु याग के प्रतिपादक विधिवाक्यो के साथ ही उसको संपन्न करने की सारी विधि ( पद्धति ) भी बताई जाती है । केवल काठ हो सकती । अग्नि आदि शब्दों से तथा लोहा, ताबा, चादी आदि के नामों के आधार पर यत्रो के निर्माण की पद्धतिलोगनहीयदिमालूमसमुद्र में हो तो मन्त्र का सही अर्थ यह है- हे अश्विनीकुमारो, हमारे द्वारा की जा रही स्तुतियो को सुननेके पासके चलेलिये आओआप | नाव पर बैठकर और भूमि पर हो तो रथ पर घोडे जोतकर जल्दी से जल्दी हम लोगो 'कृष्ण नियानं' और द्वादश प्रधय० ' इन दो मन्त्रो में से पहले मन्त्र का अर्थ यह किया गया है -'हे मनुष्यों, अग्निजल- युक्त कृष्ण अर्थात् खँचने वाले जो निश्चित यान है, उनके वेग आदि गुण रूप, अच्छी प्रकार गमन कराने वाले जो पूर्वोक्त अग्नि आदि अश्व है, वे जलसेचन युक्त वाष्प को प्राप्त होकर उस काष्ठ, लोहा आदि से बने हुए विमान को आकाश में उड़ा चलते हैं । वे जब चारो ओर से सदन अर्थात् जल से वेगयुक्त होते है, तब यथार्थ सुख के देने वाले होते है । जब जल की कलाओ के द्वारा पृथिवी जल से युक्त की जाती है, तब उसमे उत्तम उत्तम भोग प्राप्त होते हैं' ( पु ० २२८) । यह सब आधुनिक धूमशकटी ( रेल) को देख कर उसके संस्कार के कारण वेदमन्त्रों में भी उसी की खोज का परिणाम है । यदि दयानन्द ने पेट्रोल से चलने वाले आधुनिक वायुयान को देखा होगा, तो वे उसको भी वेदमन्त्रो में से खोज निकालते । केवल एक 'हरि' पद से 'ज्वालारूप काष्ठ के इन्धन से जलाये गये और कला- कौशल से घूमने वाले' इतना अर्थ कैसे निकलेगा, इस बात को तो दयानन्द ही जान सकते है । मन्त्र का सीधा -साधा अर्थ है -काले रंग के नियमित रूप से चलने वाले मेघ को पृथिवी से जल को खींचने वाला किरणें जल से भर दें । अथवा कृष्ण नियान शब्द से दक्षिणायन तथा कृष्णपक्ष की रात्रि का बोध होगा । दक्षिणायन को देवताओं