वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 61–70
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 61–70
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वेदार्थपारिजातः II पत्ते । सन्तुष्यतुदुर्जनन्यायेन तथात्वाभ्युपगमेऽपि वेदार्थपरिनिष्ठिता वेदार्थरहस्यज्ञाने महर्षय एव तन्निर्मातारो मन्तव्याः । तथा च ते यथा वेदार्थमवगन्तु सक्षमा न तथाधुनिकास्तादृशसस्कारशून्या वेदानभिज्ञा इति वेदार्थनिर्णये त एव प्रमाणभूता नान्ये । कोलब्रुक महाशयस्य ' आन द वेदाज' ग्रन्थः प्रसिद्ध. । मैक्समूलरेण सायणभाष्यसहिता ऋक्- सहिता प्रकाशिता, तथाप्येते सर्वे सायणादिभारतीयपरम्परागताचार्यादिविरुद्धमेव मत पोषयन्ति । सायणादयो मन्त्रब्राह्मणोपनिषदामनादित्वमपौरुषेयत्वमङ्गीकुर्वन्ति । पाश्चात्त्यास्तु समेषा पौरुषेयत्व तेषु च संहिताया • प्राचीनत्वं ब्राह्मणोपनिपाततोऽप्यर्वाचीनत्वमूरीकुर्वन्ति । न केवल ब्राह्मणाना सम्बन्धे, किन्तु सहितास्वपि ऋक्संहितायाः प्राचीनत्वमन्यासामर्वाचीनत्वमृकसहितायामपि कनीनामिण्डलानामर्वाचीनत्वं दशम मण्डलस्यात्यन्ताधुनिकत्वं कथयन्ति । वेदार्थनिरूपणेऽपि ते सायण विरुन्धन्ति । देवतावादे यज्ञवादे च ते सर्वथा विरुद्धाः । दयानन्दोऽपि तन्मत- मेवानुससार । वेदाना नित्यत्व सर्वेश्वरपरत्व वायुजलशुद्धयर्थं यज्ञहोमादिकमेव पाश्चात्त्येभ्यस्तन्मत वैशिष्ट्यम् । कैश्विदार्य सामाजिकैस्तु पाश्चात्त्यानां सायणानुवर्तित्व ब्रुवाणैस्तदीयदोषा अपि सायणोपर्यारोप्यन्ते, तच्च तेषा बुद्धिलाघवं द्वेषादिवशंवदत्वं वा । बेवरस्तु ऋग्वेदीयमैतरेयब्राह्मण शाङ्खायनब्राह्मण च चर्चयति ॥ तत्रापि शाङ्खायनब्राह्मण निश्चितयोजना- नुसारेण सपूर्णयज्ञविधीन् विवेचयतीति वदति, तदपि न युक्तम्, ब्राह्मण यज्ञ विदधात्येव न विधीन् विवेचयत, किन्तु तांस्तान् यज्ञान् ब्राह्मणमेव विधिरूपेण विदधाति, अर्थवादरूपेण चोपपादयति । ऐतरेयब्राह्मणस्यान्तिमदशाध्या- 'प्रकृति की शक्तियों के अतिरिक्त हम विकास की अवस्थाओं के रूप में आध्यात्मिक विचारों एवं नैतिक अर्थों के भी प्रतीक पाते है, किन्तु प्रकृति की शक्तियों की पूजा की अपेक्षा इनकी पूजा परवर्ती काल की है' ( पृ० ३३ ), यह कथन भी निःसार है, क्योकि मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् अनादि काल से चले आ रहे है, अतः इनमे प्रतिपादित पदार्थों को नया नही माना जा सकता । थोडी देर के लिये आपको सन्तुष्ट करने के अभिप्राय से यह बात मान भी ली जाय तो वेदार्थ के पारंगत और इसके रहस्यो से परिचित महर्षि हो इन सूको के निर्माता माने जायेंगे । इस स्थिति में भी ये महर्षिगण जिस तरह से इनके अर्थों को समझ पावेगे, क्या आधुनिक पाश्चात्य विद्वान् भी उसी तरह से इनको समझ सकेंगे, जिनमें कि वैदिक संस्कारो का नितान्त अभाव है? वास्तव मे वेदार्थ के निर्माण ने ये महर्षिगण ही प्रमाण माने जा सकते है. पाश्चात्य विद्वान् नही । कोलब्रुक महाशय का ' आन द वेदाज्' नामक ग्रन्थ प्रसिद्ध है । मैक्समूलर ने सायण भाष्य के साथ ऋग्वेदसहिता का संपादन किया है । तो भी ये सब विद्वान् सायण प्रभृति आचार्यों की भारतीय परम्परा के विरुद्ध ही अपने मत को पुष्ट करते है । सायण प्रभृति आचार्य मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषदो को अनादि और अपौरुषेय मानते है । इसके विपरीत पाश्चात्य विद्वान् इन सबको पौरुषेय मानते है । इतना ही नही, वे संहिता को प्राचीन और ब्राह्मणो तथा उपनिषदो को अर्वाचीन बताते है । केवल ब्राह्मणो को नही अपितु संहिताओ को भी वे प्राचीन तथा अर्वाचीन मानते है | यहाँ तक कि सबसे प्राचीन ऋक्संहिता के भा कुछ अंशो को प्राचीन और कुछ को अर्वाचीन बताते हैं । दशम मण्डल को तो वे अत्यन्त आधुनिक मानते हैं । वेदार्थ का निरूपण करते समय भी वे सायण के विरुद्ध बोलते है । देवतावाद और यज्ञवाद के तो ये सर्वथा विरोधी हैं । इस बात में दयानन्द भी इन्हीं का अनुसरण करते है । पाश्चात्यो से इनकी इतनी ही विशेषता है कि दयानन्द वेदों को नित्य मानते है और कहते है कि इनमें ईश्वर की स्तुति की गई है । यज्ञ-होम आदि का उपयोग वे जल- वायु की शुद्धि तक हो मानते है । कुछ आर्यसमाजी विद्वान् पाश्चात्य विद्वानों को सायण का अनुवर्ती घोषित कर सायण के ऊपर उन सब दोषो को भी मढ देते है, जो कि पाश्चात्यो की निजी कल्पनाएँ है । यह सब या तो बुद्धि की कमी के कारण है, अथवा द्वेषवश किया जाता है । बेवर ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण और शांखायन ब्राह्मण की चर्चा करते हैं । वे कहते है -' शाखायन ब्राह्मण अच्छी प्रकार व्यवस्थित रचना है और एक निश्चित योजना के अनुसार संपूर्ण यज्ञविधि का विवेचन करता है' ( पृ० ३७ ), यह कथन भी ठीक नही है, क्योकि ब्राह्मण ग्रन्थ यज्ञो का विधान हो करते है, विधि का विवेचन नही करते । उन उन यज्ञों का ब्राह्मण ही विधि के रूप में विधान भी करते है और अर्थवाद के रूप में उनका उपपादन भी करते हैं । 'आन्तरिक प्रमाणों से यह माना जा सकता है कि ये १२१
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वेदार्थ पारिजातः ६२ । ऐतरेयस्य चत्वारिंशदध्याया अष्टाभिः एते ऐतरेयब्राह्मणे पश्चाद् योजिताः । पारम्पर्येण येयानामनुरूपा एव शाङ्खायनस्य विषयात्रिंशदध्यायाः सन्ति । इति तु पाश्चात्त्यप्रवृत्तिदुष्परिणामरूपमेव सर्वत्रैवपञ्चिकाभिर्विभक्ताः । शाङ्खायनस्य इति भारतीया पद्धतिः । पाश्चात्त्यास्तदनुवर्तिनः सामाजिकाश्च, ग्रन्था यथैवोपलभ्यन्ते तथैव मन्तव्या नैमिषीययज्ञस्योल्लेखो दृश्यते परन्तु स तस्माद्यज्ञाद् भिन्न एव प्रक्षेपकल्पनां निराधारामेव कुर्वन्ति । शाङ्खायनब्राह्मणेसूतेनोक्ता । ब्राह्मणानामपि मन्त्राणामिवानादित्वेन तत्रत्या कथा सुखावबो- यस्मिन् महाभारतस्य कथा द्वितीयवारं धार्थाख्यायिकारूपा एव नेतिवृत्तरूपा । प्रदत्ता दृश्यन्ते । स्थानं तस्मै ईशान-महादेवादय उपाधयः 'अत्र द्वितीयानुच्छेदे शिवस्य सर्वोपरि शुक्लयजु सहिताया अन्तिमाध्यामाता तद्ब्राह्मणस्य, अथर्ववेदस्य यद्ययमनुच्छेदः क्षेषको न स्यात् तदा शाङ्खायनब्राह्मणतस्य च पङ्क्तौ मान्यतामर्हति । तृतीयानुच्छेदपरिशीलनेनेद विज्ञायतेप्रश्नेषु यस्मिन् भागे शिवादिनामान्युपलभ्यन्ते विशिष्टमनुशीलन चलति स्म । तत. प्रत्यावर्तमानानां भाषासम्बद्धेषु यद् भारतस्योत्तरभागेषु भाषायाः क्षेत्रेगाथा अधियज्ञगाथाः स्मरणीयाः श्लोका निर्दिष्टाः । शाङ्खायने पैङ्ग्यकोषीत-तस्य - प्रामाण्यमासीत् । तत्र आख्यानविदो च रचना ऐतरेयापेक्षया परवर्तिकालिकी । ऐतरेयापेक्षया क्यादीनां सम्मानं दृश्यते । शाङ्खायनब्राह्मणस्यएतदपि सर्वथा निर्मूल कल्पनामात्रम्, रचनायामभ्युपगम्यमानायामपि ', सुसंघटितक्रमयोजनयेदं निर्णीयते इति कल्पयितु न शक्यते प्राचीनानामपि सुसङ्घटितक्रमबद्धग्रन्थनिर्माण- पंङ्गिब्राह्मणेन सर्वज्ञकल्पानामृषीणां सम्बन्धे ज्ञानदुभिक्षतातूक्तमेव ब्राह्मणानामपि । अत एव यास्क-पैङ्गी -पिङ्गलादीनां, सामर्थ्यसम्भवात् । अपौरुषेयत्वमनादित्वं है जो आठ पञ्चिकाओ ' ब्राह्मण के वर्तमान पाठ मे ४० अध्याय है । ' में बाद में जोडे गये थे । ऐतरेय की दुष्प्रवृत्ति का ही प्रमाण ' ' ' ( ) विवादग्रस्त अध्याय ऐतरेय ब्राह्मण है पृ० ३७ यह कथन भी पाश्चात्यों और ', ' मे ३० अध्याय. भारतीय पद्धति है । पाश्र्चात्य विद्वान् में बंटे हुए है जब कि शाखायन ब्राह्मणउपलब्ध होते हैं उनको उसी रूप में स्वीकार करना ही में नैमिषारण्य में संपन्न परम्परा से जो ग्रन्थ जिस तरह से प्रक्षेपों की निराधार कल्पनाएं करते रहते है । शाखायन ब्राह्मणमिलता है । मन्त्रभाग की उनके अनुयायी आर्यसमाजी सभी यहजगहयज्ञ उससे भिन्न ही है जिसमे कि महाभारत की कथा का उल्लेखलिये दी गई कहानी के रूप में, यज्ञ का उल्लेख मिलता है परन्तु वहाँ आई कथाएं प्रतिपाद्य वस्तु को सरलता से समझाने के तरह ब्राह्मणभाग भी अनादि हैं, अतःघटना का उल्लेख नहीं माना जा सकता । , जो आगे चलकर पूर्णरूप से शिव मानी जायगी, इसमें कोई ऐतिहासिक है ऐसे देवता को सर्वोपरि स्थान दिया गया यह अनुच्छेद क्षेपक न हो ' ' ' ' दूसरे अनुच्छेद में सभी देवताओं में एक और महादेव उपाधियों दी गई हैं । यदि ' के साथ उसे ईशान शुक्ल यजुर्वेद संहिता के अन्तिम अध्यायों नाम से ख्यात होता है । अनेक अन्यनिष्कर्षउपाधियोंउपयुक्त होगा कि काल की दृष्टि से शाखायन ब्राह्मण रूप से उपलब्ध होता है ।, तो किसी भी स्थिति में हमारा यह के उन अंशो की पंक्ति में आता है जिनमे यह नाम समान क्षेत्र मे विशेष अनुशीलन की तथा इसके ब्राह्मणों और अथर्वसंहिता यह अर्थ निकलता है कि भारत के उत्तरी भागों में भाषा के पर इस विषय से सम्बद्ध 'शांखायन ब्राह्मण' के एक अनुच्छेदप्राप्तसे करने के लिये इस प्रदेश का आश्रय लेते थे और वहाँ सेरखनेलौटनेवालो का उल्लेख किया गया ' ' ' चल रहा था । लोग भाषा का ज्ञान । उक्त दोनों ब्राह्मणो में आख्यानविदः या परम्परा का ज्ञान दिये गये हैं । शांखायन प्रश्नों पर उन्हें प्रमाण माना जाता था, का भी प्रायः उल्लेख किया गया है और उनके उद्धरण परवर्ती स्मरणीय श्लोकों रचना ऐतरेय ब्राह्मण की अपेक्षा, है और गाथाओं अधियज्ञ गाथाओं गया है । शाखायन ब्राह्मण की ) विशेष सम्मान दिया ३८-३९ । यह सारा कथन भी सर्वथा ' ' ( ब्राह्मण में पैङ्ग्य और कौषीतकि को सुगठित क्रम योजना से सम्भव प्रतीत होती है पृ० की कल्पना नही की जा, काल की है यह बात पहले ही इसकी मान लेने पर भी सर्वज्ञकल्प ऋषियों के सम्बन्ध में ज्ञान की कमी और अनादिता हम निर्मूल कल्पना मात्र है, क्योकि रचना क्रमबद्ध ग्रन्थों का निर्माण कर ही सकते है । ब्राह्मण ग्रन्थों की अपौरुषेयताअसङ्गत है । पैङ्गि और सकती । प्राचीन ऋषिगण सुसंगठित के साथ यास्क, पैगि ओर पिङ्गल आदि का सम्बन्ध जोड़ना भी बता चुके हैं । इसीलिये पैङ्गि ब्राह्मण
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वदार्थ पारिजातः ६६३ सम्बन्धयोजनमप्यसङ्गतमेव, पैङ्गिकौषीतक्यादिब्राह्मणानामनादित्वेन तात्कालिक मनुष्याणा सम्बन्धायोगात् । अपि चैते तत्तद्ग्रन्थानां व्यक्तोनां च सम्बन्धे कालनिर्धारणे स्वयं सन्दिहाना निश्चप्रचं वक्तुमसमर्थाः सम्भावनामात्रमाहुः । वेदेभ्यश्च वेदानां नित्यत्व सिद्धयति । ४० पृष्ठे बेवरः कथयति -'आरण्यक वनेषु ते तदीयाः शिष्यगणाश्चाधीयन्ते स्म यान् मेगस्थनीजो ' उलोविओई' सज्ञा निर्दिशति । ते रहस्यमययोगसाधनाया तल्लीना आसन् । यत्र हिन्दवः सर्वोच्चामुन्नति प्राप्तवन्तः । अस्या विकासावस्थायाः परिणामभूतमारण्यकम् ॥ सुतरां तद्रीत्यापि तेषा सूक्तमन्त्रार्थज्ञानमपि निर्भ्रान्तमासीदिति मन्तव्यम् । तथा च तद्विरुद्धा सूक्तादिसम्बन्धिनी पाश्चात्त्यकल्पना तद्रीत्यापि त्याज्या भवितुमर्हति । यदपि - 'ऐतरेयब्राह्मणैतरेयारण्यब्राह्मणैतरेयारण्यकैतरेयोपनिषदांकैतरेयोपनिषदां निर्माता महीदास ऐतरेय आसीत् ॥ इतराया. पुत्र ऐतरेय इति नामनिर्देशस्तद्ग्रन्थ एव दृश्यते' इति, तदपि न, महीदासस्यैतरेयस्य तद्ब्राह्मणद्रष्टृत्वमेव मन्तव्यम्, ब्राह्मणानां वेदत्वेनापौरुषेयत्वात् । ऐतरेये सम्भावनैव तत्सम्बन्ध उच्यते । तेन पाश्चात्त्यैः किञ्चिदपि निश्चेतु न पार्यते, केवल कल्पनया सम्भावनया च यत्किञ्चिदुच्यते । ऐतरेयारण्यकस्य चतुर्थारण्यकं शौनकशिष्येणाश्वलायनेन निर्मितम् । ऐतरेयारण्यकस्य ' इण्डिया आफिस लाइब्रेरी' ९ ८६ स्थितपाण्डुलिपिग्रन्थेऽन्ते आश्वलायनोक्तम् आरण्यकम्, शौनकनिर्मितं पश्चममारण्यकमित्यत्र प्रमाणम्, ,, - 'कोलब्रुकमिस ० एसे ० १-४७ टिप्पणी तत्तु निर्मूलमेव ऐतरेयसमाख्याविरोधात् । यदपि ब्राह्मणेष्वंतरेयनाम नोपलभ्यते, सर्वप्रथम छान्दोग्यो निपदि तन्नामोल्लेख, ऐतरेयशाखायाः सर्वप्राचीनोल्लेखः सामसूत्रेषु लभ्यते । तृतीया- कौषीतकि प्रभृति ब्राह्मण ग्रन्थ अनादि है, अत: उनका किसी समय विशेष के मनुष्यो के साथ संबन्ध नही जोडा जा सकता । पाश्र्चात्य विद्वान् उन-उन ग्रन्थो और व्यक्तियो का काल-निर्धारण निश्चित नही कर पाते । इस विषय में वे संदेह में पड़े रहते है, अत: भाँति भाति की संभावनाएं प्रकट करते रहते है । वेदो से तो वेद की नित्यता का स्पष्ट प्रतिपादन हो जाता है । पृ० ४० पर बेवर लिखते है -'आरण्यक ऐसे अव है, जिनका अध्ययन वनो मे वे लोग और उनके शिष्यगण किया करते थे, जिन्हें मेगस्थनीज ने उलोविओई' कहा है । विचार की गम्भीरता और रहस्यमय योग साधना मे तल्लीनता, जिसमे हिन्दुओं ने सर्वोच्च उन्नति प्राप्त की है, इसी विकास की अवस्था की देन है, जिन्हे सीधे ' आरण्यक ' नाम दिया गया है' (पृ० ४० ) । इस कथन के आधार पर इसी पद्धति से इन ऋषियों का मुक्त और मन्त्रो का ज्ञान भी निर्भ्रान्त मानना पडेगा । तब इसके विपरीत सूक्तो और मन्त्रो के सम्बन्ध मे पाश्चात्यों की कल्पना उन्ही की बताई पद्धति से छोड देनी पडेगी । ' ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय आरण्यक और ऐतरेय उपनिषद् का रचयिता महीदास ऐतरेय है । उन्हें विशाल और इतरा का पुत्र कहा गया है और इतरा से ही उनका नाम ऐतरेय पडा है । स्वय इस ग्रन्थ में ही यह नाम अन्तिम मान्य प्रमाण के रूप में अनेक बार उद्धृत हैं ' ( पृ ० ४१ ) यह कथन भी ठीक नही है, क्योकि महोदास ऐतरेय को उस ब्राह्मण का द्रष्टा ही मानना पडेगा । ब्राह्मण भी वेद ही है और वेद अपौरुषेय है । 'ऐतरेय के सिद्धान्त विशेष रूप से लोकप्रिय रहे होंगे और उनके शिष्यो की सख्या भी विशेषतः बहुत अधिक रही होगी, क्योंकि हम उनका नाम ब्राह्मण और आरण्यक दोनो से ही संबद्ध पाते है ' ( पृ ० ४१ ) इस तरह की सम्भावना के आधार पर ही इन ग्रन्थों के साथ महीदास ऐतरेय का सम्बन्ध जोड़ा जाता है । यद्यपि पाश्चात्य विद्वान् कुछ निश्चित नही कर पाते, तो भी केवल कल्पना और संभावना के आधार पर जो मन में आया कहते रहते है, ' ऐतरेय आरण्यक' का चौथा आरण्यक शौनक के शिष्य आश्वलायन की रचना है । ( ऐतरेय आरण्यक की एक पाण्डुलिपि [ इण्डिया अफिस लाइब्रेरी ९ ८६ ] में समूचे ग्रंथ के अन्त में ' आश्वलायनप्रोक्तम् आरण्यकम्' बताया गया है) स्वयं शौनक, इस विषय पर कोलब्रूक के अनुसार पाचवें आरण्यक के रचयिता के रूप में प्रख्यात हुए ( पृ० ४१ टि० भी ० ) । यह कथन भी सर्वथा निर्मूल है, क्योंकि ऐसा मानने पर इसके 'ऐतरेय' नाम के साथ विरोध पड़ेगा, प्रवचनकर्ता के नाम के साथ ही ग्रन्थ को जोड़ने की परम्परा व्याकरण सिद्ध रही है । बेवर ने यह भी कहा है - 'ब्राह्मणो में ऐतरेय का नाम सही नहीं मिलता । उनका सर्व प्रथम उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् में किया गया है ।
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वेदार्थपारिजातः III , तेनैतरेयारण्यकप्रतिपादितविचाराणा विकासे ता अपि सक्रिया रण्यके मण्डूकानां माण्डूकेयानां शाखा बहुधोल्लिखिता अपौरुषेयत्वादिनिश्चयविरोधात्, निर्मूलकल्पनानामनवकाशात् । ',,,इति विज्ञायते इति तदेतत्सवं बालचापलमेव शक्नोति तस्यातन्त्रत्वात् । ब्राह्मणान्तरेष्वनुल्लेखोऽपि नास्य ब्राह्मणस्यार्वाचीनत्वं साधयितुं बृहदारण्यकवणितारुणि श्वेतकेतु - अजातशत्रु-, व्यग्रो दृश्यते । तदप्यकिश्चित्करम् कौषीतकारण्यक कौषीतक्युपनिषदादिसम्बन्धिवर्णनैः शतपथीय कल्पनामात्रसारत्वात् । -: परिचयप्रश्ने -------वय विश्वेदेवा गार्ग्य वालाकिवर्णनैश्च बेवर केवलकालनिर्धारण एव विश्वतादात्म्यवन्त इतीन्द्रेणोक्तम् । -', यत्तु काण्वं मेधातिथि मेषो भूत्वेन्द्रो जहार । मेडीज सम्बन्धिना ग्रीकाख्यानेनैतत्तुलना- अपहरणकारणवर्णनप्रसङ्गे तत्तपस्यया तोषात् सन्मार्गप्रापणायैवेत्येन्द्रेणोक्तम्वेदोक्ताख्यानतुल्यघटनाना सत्त्वेऽपि वेदानां तात्कालिकत्वसाधना- ',,: मर्हतीति चोक्तम् तदपि यत्किञ्चित् अनादौ ससारे पाश्चात्यानां सर्वा दुष्कल्पना समूलमुन्मूल्यन्ते । तैः सम्भवात् । श्रीशङ्कराचार्यसम्बन्धिरुपनिषद्व्याख्यानैश्च। 'तेषा व्याख्यान बलपूर्वकम्' ( पृ० ४४ ) इति कथनं तु प्रतिज्ञामात्रम्, सर्वत्र वेदानां नित्यत्वापौरुषेयत्वप्रतिपादनात् हेत्वनुपम्यासात् । स्वरूपसम्बन्धिन एव । सामसहिताया मन्त्रा ऋक्सहि- ' मन्त्राणामृक्संहितास्वनुपलम्भात् एवमेव सामसम्बन्धेऽपि बेवरस्य विचारास्तद्बाह्य । सामान्यतया ऋच्यध्यूढं ताया उद्धता एवेति कथनमपि न किञ्चित् 'अनेकेषांइति जैमिनिरीत्या च ऋक्ष्वेव सामानि गीयन्ते । यस्मिन् वेदे ये मन्त्रा ' ', सामविद्यन्ते,इतितत्रछान्दोग्यरीत्याते तेनैव धर्मेणाधीयन्तेगीतिषु सामाख्या। यजुःसंहितास्वप्यनेके ऋङ्मन्त्राः सन्ति परन्तु ते तत्र यजुर्धर्मेणैवाधीयन्ते । या माण्डूकेयो की शाखा का अनेक ऐतरेयो की शाखा का सबसे प्राचीन निर्देश साम जायसूत्रो,मेंतो आयायह हैशाखा। तीसरेभी इसआरण्यकआरण्यकमे में मण्डूकोप्रतिपादित विचारो के विकास में सक्रिय बार उल्लेख होने के आधार पर निष्कर्ष निकालासी बातें है । प्रमाणों से यह सिद्ध किया जा चुका है कि वेद अपौरुषेय है । अतः इस रही होगी' ( पृ० ४१ ) यह सब भी बच्चों कीको कोई अवसर नही दिया जा सकता । अन्य ब्राह्मणो मे उल्लेख न होने से भी इस ब्राह्मण किसी ब्राह्मण में किसी निश्चय के विपरीत निराधार कल्पनाओं ब्राह्मण का उल्लेख न होना उसके अभाव का साधक प्रमाण को अर्वाचीन नहीं सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि उपनिषद् में नही माना जा सकता । वर्णनो के आधार पर और शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक, कौषीतकि आरण्यक कौषीतकि उपनिषद् आदि के के निर्धारण से ही व्यग्र दिखाई पडते है । यह सब वर्णित श्वेतकेतु, अजातशत्रु, गार्ग्य, वालाकि आदि इनमें कोई प्रमाण नही है । ' कण्व के पुत्र मेघातिथि को मेष का को लेकर बेवर केवल इनके काल रूप धारण कर इन्द्र भी सारहीन है, क्योंकि केवल कल्पना के सिवाय का परिचय पूछते हैं । उत्तर मे इन्द्र मुस्कराते हुए अपने को विश्वेदेव बताते हैं स्वर्ग ले जाते है । यात्रा के समय मेधातिथिकरते हैइन्द्र। इस अपहरण का कारण वे यह बताते हैं कि मेघातिथि की तपस्या से प्रसन्नमिलता-होकर ' ' और अपना तादात्म्य विश्व से स्थापित था । यह आख्यान तत्त्वतः और नामतः भी गनीमेडीज के ग्रीक आख्यान से उन्होंने उसे सन्मार्ग में पहुँचाने का विचार किया है । यह संसार अनादि काल से चला आ रहा है । यहाँ इस तरह की समान घटनाओं जुलता है ( पृ ० ४४-४५ ) यह कथन भी सारहीनसिद्ध की जा सकती । श्रीशङ्कराचार्य के द्वारा किये गये उपनिषदो के व्याख्यानों से पाश्चात्यको, के मिलने से वेदो की तात्कालिकता नही हो जाती है क्योकि उन्होने सभी ग्रन्थों में वेदों की नित्यता और अपौरुषेयता -' ' ( ), विद्वानों की सारी कल्पनाएं जड से धराशायी कि यह सत्य है कि उनकी व्याख्याएं प्रायः बलपूर्वक की गई है १०४४ अकाट्य प्रमाणों से सिद्ध कर दिया है । प्रतिज्ञायह कहनाहै, इसमें कोई प्रमाण नही दिया गया है । डालते हैं । 'सामवेद- इसलिये गलत है कि यह वक्ता की कोरी विचार उस वेद के बाह्य स्वरूप पर ही प्रकाश इसी तरह से सामवेद के संबन्ध में भी बेवर के है, क्योंकि सामसंहिता के अनेक मन्त्र पृ० कथन भी एकदम निराधार संहिता ऋक्संहिता से उद्धृत की गई एक रचना है' (की परम्परा ५५), यहमें और जैमिनि की परिभाषा के अनुसार भी ॠमन्त्रों का ऋकसंहिता में नही मिलते । सामान्यतः सामवेदियोमन्त्र है, वहाँ उसी वेद की प्रकृति के अनुसार उनका विनियोग होता है । यजुःसंहिता करने पर वे साम बन जाते हैं । जिस वेद में जो
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वेदार्थपारिजातः — ' ' यत्तु मन्त्राणा वास्तविकार्थास्तदानीमेव ज्ञायन्ते यदा ते विशिष्टक्रियासन्दर्भे पठ्यन्ते यतस्तत्सम्बन्धाः सन्ति ( पृ ० ५५ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, यजुर्मन्त्राणामपि तत्तत्क्रियासम्बन्ध एव मन्त्रार्थसङ्गतेः । राणायनीयशाखाया. कौथुमशाखायाश्च सम्प्रदायो वाराणस्या तथा दक्षिणदेशे गुर्जरदेशे च यत्र तत्रोप- लभ्यते । सामवेदीयतलवकारीयकेनोपनिषच्छान्दोग्योपनिषदोः श्रीशङ्कराचार्याणा भाष्याण्युपलभ्यन्ते । ताण्ड्य- सामविधान षड्विंशादिब्राह्मणान्यपि नित्यान्येव । तदनुसारोणि यज्ञादिकर्माणि नान्वेषणादिप्रभवाणि, किन्तु श्रोतानि (श्रुतिसिद्धानि ) एव ॥ (पृ० ५८५८ )) सूत्राणि न केवलं ब्राह्मणकर्तृकाणि, किन्तु समानकल्पीय सोमयाजिब्राह्मणकर्तृकाणि, तथैव श्रुतिसूत्रेषु विधानात् । यत्तु ( ५ ९ पृष्ठे ) गानार्थं सुरक्षिता ऋङ्मन्त्राः शस्त्रपदेनाख्यायन्ते तदपि न, गानस्य सामविषयत्वात् । यत्तु ' साम्नां नथाविधं चयनम् - उक्थ * स्तोभ- पृष्ठादिनामभिराख्यायते ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, शस्त्रस्तोभादिविधानस्य श्रुति- सूत्र -पारम्पर्यमूलकत्वात । यदपि व्रात्यस्तोमविधानाद् ब्राह्मणसमुदाये ब्राह्मणोयव्यवस्था- मननुसरन्तोऽपि प्रवेश लभन्ते स्मेति, तदपि तुच्छम्, त्रैवर्णिकानां यथाकर्मदीक्षितानामेव व्रात्यस्तोमादिविधानात् । जन्मना द्विजातीनामेवातिक्रान्तसस्कारकालाना व्रात्यस्तोमविधानात् । युद्धरथचा रत्वधनुरादिशस्त्रास्त्रधारकत्वोष्णीष- पादत्राणादिधारकत्वं त्वाचारकृतं वैषम्य ब्राह्मणादिषु विपद्भेदेषु तदनुमतत्वात् । यत्तु - ' ऐतरेयनिष्कर्षेण ज्ञायते यतत्रत्याना ब्राह्मणानामार्यैः सम्बन्धो वेगेन चलति स्म । ताण्ड्यब्राह्म-, णीया सा सभ्यता पश्चिमभारतसम्बद्धा तथापि पौरस्त्यसम्बन्धबोधकानामपि सकेताना सख्या नाल्पोयसी ॥ मे भी अनेक ऋङ्मन्त्र हैं, परन्तु वहाँ उनका विनियोग और उच्चारण भी यजुर्वेद की पद्धति के अनुसार ही होता है । यह कहना भी सारहीन है कि ' मन्त्रो का वास्तविक अर्थ उसी समय निकलता है, जब हम उसे उस विशिष्ट क्रिया के सन्दर्भ में लेते हैं, जिनसे उसका संबन्ध है' ( पृ ० ५५ ), क्योकि सभी मन्त्रो का अर्थ विभिन्न वेदो की क्रियापद्धति से उनका जिस तरह का सम्बन्ध रहता है, उसी को दृष्टि में रखकर किया जा सकता है । राणायनीय शाखा का और कोथुम शाखा का संप्रदाय आज भी वाराणसी में, दक्षिण देश में और गुजरात में जहाँ वहाँ मिलता है । सामवेद की तलवकार शाखा के केनोपनिषद् और छान्दोग्य उपनिषद् का शाकर भाष्य उपलब्ध है ही । ताण्ड्य ब्राह्मण, सामविधान और षड्विंश प्रभूति ब्राह्मण-ग्रन्थ भी नित्य ही है । उनके अनुसार सम्पन्न होने वाले यज्ञादि कर्म अन्वेषण (खोज) को परिणति न होकर श्रुतिसिद्ध है, अर्थात् अनादि अनिधन श्रुति ( वेद ) ही उनका विधान करती है । मन्त्रो का अनुष्ठान केवल ब्राह्मण ही कर सकते हो ( पृ० ५८) सो बात भी नही है, क्योकि इन सूत्रो के अनुष्ठान का अधिकार केवल समान कल्पसूत्र वाले सोमयाजी ब्राह्मण को ही था । श्रुति में ओर श्रोतसूत्रों में यह अधिकार उन्ही को दिया गया था । इसी तरह से 'गान के लिए एक साथ रखे गये ऋग्वेद के मन्त्रो के समूह को ' शस्त्र' कहा गया है' ( पृ० ५ ९ ) यह कथन भी सही नहीं है, क्योंकि गान सामवेद का विषय है, इसके साथ ऋग्वेद का संबन्ध कराना गलत है । 'विभिन्न सामी के उसी प्रकार के चयन को प्रायः उक्थ, स्तोम या पृष्ठ नाम से अभिहित किया गया है' ( पृ० ५ ९ ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि शस्त्र, स्तोम आदि का विधान श्रुति और श्रीतसूत्रों की परम्परा के अनुसार ही होता है, इनका नये सिरे से चयन करने का कोई प्रश्न ही नहीं है । इसी तरह से -'ब्रात्यस्तोमों के द्वारा आर्य जाति के होते हुए भी ब्राह्मणीय व्यवस्था के अनुसार जीवन व्यतीत न करने वाले भारतीयों ने ब्राह्मण समुदाय में प्रवेश प्राप्त किया' (पृ० ५ ९) यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि विधिपूर्वक दीक्षित त्रैर्वाणिक को ही ब्रात्यस्तोम करने का अधिकार है । जन्म से जो द्विजाति हैं, किन्तु कारणवश जिनका उपनयन संस्कार का काल बीत गया है, उन्हीं को ब्रात्यस्तोम का अधिकारी माना गया है । विभिन्न परिस्थितियों में यह अनुमति दी गई है कि वे खुले हुए युद्ध के रथो में चले, धनुष और बरछे धारण करें, विशेष प्रकार की पगड़ी और जूते पहनें । यह सब केवल आचारगत भिन्नता है, इनसे जातिगत भेद नहीं सिद्ध किया जा सकता । ' इन कथनों से हमें यही निष्कर्ष निकालना होगा कि पश्चिम से, विशेषतः वहाँ के अब्राह्मण आर्यों से, सम्बन्ध अब भी तेजी से चल रहा था और इस कारण इसकी रचना का स्थान अधिक पश्चिम की ओर रखना होगा, फिर भी ऐसे आकडो का अभाव
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६६६ , वेदार्थपारिजातः, कोसलाधिपतेराट्णारस्य ऋक्संहितागतत्रसद्दस्युपुरुकुत्सयोः विदेहराजनिमिकुरुक्षेत्रयमुनादीनामुल्लेखाच्च । यच्च ताण्ड्यब्राह्मणे कुरुप चालसम्बन्धिनां राज्ञां नामोल्लेखाज्जनकस्यानुल्लेखात् तस्य रचना क्वचिदन्यप्रदेशे जाता' इत्यादिकम्, तत्सर्वमपि निर्मूलम्, कपोलकल्पितत्वात् । नामोल्लेखानुल्लेखाभ्यां ग्रन्थानां देशकालनिर्धारणा- सम्भवात् । आख्यायिकास्व विद्यमानदेशकालव्यक्तीनामपि वर्णनदर्शनात् । यदपि 'चास्मिन् ब्राह्मणे महत्त्वपूर्णमिदं तथ्यं यद् विविधानामाचार्याणां क्वचिदेव मतभेदवर्णनं दृश्यते, केवलं कौषीतकिनां विरोधे ब्रात्ययज्ञावकीर्णादि- शब्दप्रयोगो दृश्यते । अस्य ताण्ड्यब्राह्मणस्य शुक्लयजुर्वेदीयब्राह्मणे नामोल्लेखात् ताण्ड्यब्राह्मणस्य शुक्लयजुर्वेदीय- ब्राह्मणपूर्वकालिकत्वं सिद्धयति' इत्यादिकमपि कुशकाशाबलम्बनमेव, हेतोरव्यभिचारित्वाभावात् । आख्यायिकावृत्ता- - ' ( ) ', न्तस्यानैतिहासिकत्वात् । यदपि विशब्राह्मणं पञ्चविण ताण्ड्य ब्राह्मणस्य परिशिष्टरूपम् इति तदपि न किञ्चित्, वैदिकानां सम्प्रदाये षड्विंशब्राह्मणस्य स्वातन्त्र्येण गणनात् । यदपि - छान्दोग्योपनिषदि महीदासस्य ऐतरीयस्य नामोल्लेखाद् बृहदारण्यकापेक्षया तस्या अर्वाचीनत्वं सिद्धयतीति, तदपि यत्किञ्चित्, बृहदारण्यकस्यापि नित्यत्वेन कालविशेषासिद्धया तदसिद्धेः । यदपि छान्दोग्ये देवकी - पुत्रस्य कृष्णस्योल्लेखादपि कालविशेषकल्पना, सापि निर्मूलैव । अनादिषु मन्त्रब्राह्मणात्मकेषु वेदेषु सुखावबोधार्थतया- ssख्यायिकानां स्वार्थे तात्पर्याभावात् । वेदशब्दानुसारेण सृष्टिसिद्धान्ताभ्युपगमेनातीतानागतानां नाम्नां देशकालवस्तूनां सत्त्वेऽपि तैर्वेदकाल निर्धारणासम्भवात् । अत एव छान्दोग्यबृहदारण्यकयोः प्रबाहणजैबलि-उषस्तिचाक्रायण शाण्डिल्य- सत्यकामजाबाल उद्दालक- आरुणि श्वेतकेतु अश्वपतिनाम्नां सत्त्वेऽपि न कालनिर्धारणं सम्भवति । छान्दोग्ये सनत्कुमार- नही है जो पूर्व की ओर संकेत करते है । इस प्रकार कोसल के राजा पर आटणार का, त्रसदस्यु पुरुकुत्स का, जो ऋकू संहिता मे भी आये है, विदेह के राजा नमिनशाप्य ( महाकाव्य के निमि ) का, कुरुक्षेत्र, यमुना आदि का उल्लेख आया है । ताण्ड्य ब्राह्मण मे कुरु- पंचालो या उनके राजाओ के नामों के उल्लेख का तथा जनक के किसी उल्लेख के अभाव का कारण यही माना जा सकता है कि इनकी रचना किसी भिन्न प्रदेश में हुई थी' ( पृ० ५ ९ -६० ) यह सब भी निराधार कपोल कल्पना मात्र है, क्योंकि नाम का उल्लेख होने और न होने मात्र से किसी ग्रन्थ के देश और काल का निर्धारण नही किया जा सकता । कहानियों में ऐसे व्यक्तियो ( कल्पित व्यक्तियो) का भी वर्णन रहता है, जिनका किसी देश या काल से कोई सम्बन्ध नही रहता । बेवर ने आगे कहा है- ' इस ब्राह्मण का बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि शायद ही कहीं विविध आचार्यों में किसी मत वैभिन्य का वर्णन किया गया । केवल कौषीतकियों के विरुद्ध ही थोड़े द्रोह के साथ विरोध प्रकट किया गया है । उन्हें व्रात्य ( धर्मभ्रष्ट) और यज्ञावकीर्ण ( यज्ञ के अयोग्य ) कहा गया है । अन्ततः इस ब्राह्मण के साथ संयुक्त नाम अर्थात् ताण्ड्य का उल्लेख शुक्लयजुर्वेदीय ब्राह्मण में एक आचार्य के नाम के रूप में आया है । अत एव इन सभी बातो को मिलाकर कम से कम हमे इसे शुक्लयजुर्वेदीय ब्राह्मण से पूर्वकाल का मानने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिये' ( १० ६० ) किन्तु उसका यह सारा कथन बाढ़ में बहते व्यक्ति के कुश और काश के तिनकों का सहारा लेने के समान निष्फल है । उनकी ये सब बातें दोषपूर्ण है । कहानियों के वर्णन में आये व्यक्तियो को कही ऐतिहासिक नही माना जाता । इसी तरह से यह कहना कि ' षडविंश ब्राह्मण पञ्चविंश ब्राह्मण का परिशिष्ट है' ( पृ० ६० ) बेवर महाशय का निरा भ्रम है, क्योकि वैदिक संप्रदाय में षड्विंश ब्राह्मण की एक स्वतन्त्र सत्ता मानी गई है । 'छान्दोग्य उपनिषद् मे महीदास ऐतरेय के नाम का उल्लेख है, अतः बृहदारण्यक की अपेक्षा अधिक अर्वाचीन है' ( १० ६२ ) यह कथन भी सही नही है, क्योकि बृहदारण्यक भी उपनिषद् होने से नित्य और अपौरुषेय है, अतः उसके आधार पर छान्दोग्य का भी कोई विशेष समय निश्चित नही किया जा सकता । इसी तरह से 'छान्दोग्य में कृष्ण देवकीपुत्र के उल्लेख के आधार पर' (पृ० ६२) भी काल विशेष की कल्पना करना निराधार ही सिद्ध होगा, क्योकि मन्त्र ब्राह्मणात्मक अनादि वेद- ग्रन्थो में आये इस तरह के प्रसंग सरलता से किसी विषय को समझाने के लिये कही गई कहानियों से है, उनका स्वार्थ में कोई तात्पर्य नही माना जाता । वैदिक शब्दो के अनुसार सृष्टि का सिद्धान्त हमें मान्य है, अतः वेदो में अतीत और अनागत काल मे हुए या होने वाले नामो की तथा देश, काल और वस्तुओं की सत्ता मानने पर भी उनके आधार पर वेद के काल का निर्धारण नही किया जा सकता । इसीलिये छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषदों में प्रवाहण जैबलि, उषस्ति चाक्रायण, शाण्डिल्य, सत्यकाम जाबाल, उद्दालक आणि श्वेतकेतु
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दार्थ पारिजातः ९६७ स्कन्दनारदसम्बन्धी नवमाध्यायः पश्वाद्योजितः इत्यपि निर्मूलमेव वैदिकानां सम्प्रदाये तस्याध्ययनाध्यापनदर्शनात्, हेत्वनुपन्यासाच्च । वैदिक साहित्येऽन्यत्र सनत्कुमारस्य नाम नोपलभ्यत इत्यपि यत्किश्वित्, अस्यापि वैदिकसाहित्या - नतिरिक्तत्वात् । छान्दोग्यादौ समागतयोरितिहासपुराणयोरपि निर्देशेनापि यथा न तयोरितिहासपुराणवर्तित्वं युष्माभिः रम्युपगम्यते, नथंवाभ्यनाम्नामपि सत्त्व न तदर्वाक्कालिकत्व साधयितुं शक्नोति । वस्तुतस्तु पुराणानामप्यनादित्वेन तद्वर्णनेऽपि न क्षतिः । यदपि - ६४ पृष्ठे 'वैदिकसाहित्यानुल्लिखितं चौर्यापराधे मनुप्रोकप्राणदण्डतुल्य तप्तपरशुग्रहणं तथैव बृहदारण्यके मनुसस्कृतिशृङ्खलग्योजकमात्मपुनर्जन्मसिद्धान्त दृष्ट्वा तयोरर्वाचीनत्वसाधनायोपक्रमस्तदपि विरुद्धमेव, स्मृतीना श्रुतिमूलकत्वस्य स्पष्टत्वात्, 'श्रुतेरिवाथं स्मृतिरम्यगच्छत् ( र० म० का० २ २ ) इति महाकविकालिदासोक्ते । यथाग्निकाः पातञ्जलमहाभाष्यस्यैकामपि पङ्क्ति विवदितुमक्षमाः केवल तत्रत्यनदीपर्वत जनबदनामानि सङ्कलय्य तदाधारेणेतिवृत्त प्रकल्प्य निबध्नन्ति, तथैव पाश्चात्त्या अपि रहस्यमभिप्राय सामान्यार्थं चोपनिषदामज्ञात्वा केवलं नामानि सङ्कलय्य तासामर्वाचीनत्वसाधनायैव व्यग्रा भवन्ति । कौषीतक्युपनिषदि राहुनामग्रहणेन कथ तस्या - अर्वाचीनत्वमित्यत्र न किमपि कारणमुक्तमिति । सामविधानसहितोपनिषत्केनोपनिषदामपि वैदिकानां दृष्ट्या पौरुषेयत्वमेव | यदपि ' जनकसप्तरात्रक्रियायाः प्रवर्तको जनकः, पञ्चविंशब्राह्मणेस्योल्लेखाभावात् । पञ्चविंशमशक- ब्राह्मणयोर्मध्यकाल एव तज्जीवनकाल: ' (पृ ० ६७ ) इति, तदपि न किञ्चित्, काठकादिसमाख्यावत् तस्य कर्मणस्तन्नाम्ना अश्वपति प्रभृति नामो के रहते हुए भी उनके समय का निर्धारण नही किया जा सकता । 'छान्दोग्य में सनत्कुमार, स्कन्द तथा नारद के प्रसंगो से भरा नवा अध्याय बाद मे जोडा गया' (पृ० ६३ ) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि वैदिक सम्प्रदाय में इसका अध्ययन- अध्यापन छान्दोग्य उपनिषद् के अङ्ग के रूप में ही किया गया है । अपनी बात को पुष्ट करने लायक आपके कोई प्रमाण भी नही दिया है । ' वैदिक साहित्य में अन्यत्र कही सनत्कुमार का नाम नही मिलता' ( पृ० ६३ ) यह कथन भी गलत है क्योंकि छान्दोग्य भी तो वैदिक साहित्य का ही अङ्ग है । छान्दोग्य आदि में इतिहास और पुराण का उल्लेख रहते हुए भी जैसे आप इनको इतिहास -पुराण से नवीन नही मानते, किन्तु प्राचीन ही मानते है, उसी तरह से दूसरे नामो के रहने पर भी ये ग्रन्थ उनसे नवीन नही माने जा सकते । हमारे मत से तो वास्तव में पुराण भी नित्य है, अतः उनका यह वर्णन मिलने से हमारे किसी सिद्धान्त की कोई क्षति नही हो सकती । पू० ६४ पर बेवर लिखते है - ' इसके अतिरिक्त छान्दोग्योपनिषद् में हम विधि- व्यवहारो का वह उदाहरण भी पाते है, जिसका वैदिक साहित्य में शायद ही कही उल्लेख हुआ हो । वह है चोरी के अपराध के लिये प्राणदण्ड, जो इस विषय में मनुस्मृति में दिये गये कठोर दण्ड के विधान से पूर्णतः साम्य रखता है । अपराध या निर्दोषता का निर्धारण लाल तपते हुए फरसे को उठाकर किया जाता था, यह भी मनु के नियमो के अनुकूल हैं । इसके अतिरिक्त मनुकालोन संस्कृति को जोड़ने वाली एक और श्रृंखला बृहदारण्यक के एक अनुच्छेद मे मिलती है, वह है आत्मा के पुनर्जन्म का सिद्धान्त ' ( पृ ० ६४) और इसके आधार पर वे बृहदारण्यक को नवीन कृति सिद्ध करना चाहते हैं, किन्तु उनका यह सारा प्रयत्न व्यर्थ है, क्योकि स्मृतियाँ श्रुतिप्रतिपादित विषयों का ही अनुकरण करती है | महाकवि कालिदास ने इस बात का स्पष्ट प्रतिपादन किया है । जैसे आजकल के विद्वान् पातञ्जल महाभाष्य की एक पंक्ति का भी अर्थ ठीक से नही कर सकते, किन्तु केवल उसमें आये नदी, पर्वत, जनपद आदि नामो के सहारे इतिहास की कल्पना करते है, उसी तरह से पाश्चात्य विद्वान् भी उपनिषदों के रहस्य को और विशेष अभिप्राय को तो समझना दूर की बात है, वे उनके सामान्य अर्थं को भी सही रूप में समझ नही पाते, किन्तु केवल उनमें वर्णित नामों के संकलन कर उनको अर्वाचीन बताने में ही आतुर दिखाई पढ़ते हैं । कौषीतकि उपनिषद् में राहु का नाम आने से वह किस तरह से अर्वाचीन कृति हो जाता है, इसमें कोई प्रमाण वहाँ ( पृ० ६४) नहीं दिया गया है । सामविधान, संहितोपनिषद् केनोपनिषत् ये सब ग्रन्थ भी वैदिकों की दृष्टि से अपौरुषेय ही हैं । 'जनक सप्तरात्र क्रिया के प्रवर्तक जनक का पञ्चविंश ब्राह्मण में कोई उल्लेख नहीं है । अत एव स्पष्टतः उनके जीवन और प्रसिद्धि का काल पञ्चविंश ब्राह्मण और मशक सूत्र के बीच का है' (पृ ० ६७ ) यह कथन भी सारहीन है, क्योंकि काठक आदि की
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वेदार्थपारिजातः६६८ समाख्यातत्वेऽपि तया न श्रुतीनां कालनिर्धारणं सम्भवति । यथास्मिन् कल्पे कठेन विशिष्टप्रवचनात् काठकेति समाख्या, 'समाख्या प्रवचनात्' ( मी० सू० ) इति, यथा वा नचिकेतसा विदितत्वादग्निविद्याया अग्नेश्च नचिकेत सेति , ' 'समाख्यानम् तद्वदेव प्रकृतेऽपि ज्ञातव्यम् । एवमेव लाट्यायनसूत्रसम्बन्धे यदुक्तम्- लाटटोलेमीडारिकी इत्यस्य पश्चिमसौराष्ट्रदक्षिणीयदेशसूचकम्' इति, तदपि तादृशमेव, आख्यायिकाभिरानुषङ्गिकरूपेण तादृशार्थबोधकत्वेऽपि बाधाभावात् । न तावत्तेन पञ्चविंशब्राह्मणस्य पश्चिमभागे रचना सिद्धयति । यत्तु —- ' आर्षेयकल्पे विभिन्नगौतमद्वयोल्लेखः । द्वयोरेकतरस्य स्थविरोपाधि: ( यो बौद्धानां पारिभाषिक । ) शौचिवृक्षे: (यः पाणिनिपरिचित आचार्यः ), क्षैरकलम्भ:, कौत्सस्य, वार्षगण्यस्य, माण्डितायनस्य, लामकायनस्य, राणायणीपुत्रप्रभृतीनां विशेषतः शाट्यायनानां तथा तै रचितस्य शाट्यायनकस्य, शालङ्कायनः सह ये निश्चप्रचं भारतस्य पश्चिमभागनिवासिन आसन्, उल्लेखो जातः ( पृ० ६८) । एतैरन्यवेदापेक्षया सामवेदीयसूत्राणा प्राक्कालिकता सिद्धयति' इति, तच्च निरर्थकम्, आख्यायिकानां स्वार्थे तात्पर्याभावस्य वहुधोक्तत्वात् । स्थविरादिशब्दा न केवलं बौद्धानां पैतृकाः, किन्तु वैदिकेष्वपि प्रसिद्धा एव । तत एव बोद्धैर्गृहीताः । 'पुत्रास्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्य- मर्हति' ( म० ९ ३ ) इति मनुस्मृतिप्रयोगदर्शनात् । यच्च — 'एतेषां रचनासमयेऽनेके मतभेदा आसन् । अन्यवेदेषु पूजाविधिषु कठोरता एकता चागताऽऽसीत् । शूद्रनिषादादयो ये भारतस्यादिवासिनः पूर्वं तेषा दशा दुःखमयी शोषणयुक्ता च नासीत्, परवर्तिकाले यादृशी जाता । , ते मण्डपाद् बहिर्यज्ञेषु समागन्तुं शक्नुवन्ति स्म । क्वचिद्यज्ञेषु तेषा शूद्राणामपि याज्ञिकत्वमासीत् यद्यपि तानि समाख्या ( नाम ) के समान उस कर्म का नाम भी जनक के नाम के साथ जुड गया है, इससे श्रुति के काल का निर्धारण नही किया जा सकता । जैसे इस कल्प में कठ ऋषि के द्वारा विशेषत: प्रवचन हुआ है, इस आधार पर उस शाखा का नाम काठक हो गया है, इसमे प्रमाण ' समाख्या प्रवचनात्' यह सूत्र है । तथा जैसे नचिकेता के द्वारा जानी गई विद्या और अग्नि का नाम 'नाचिकेतस' हो गया है, उसी तरह से इस क्रिया का नाम जनक सप्तरात्र इसलिये हो गया है कि इसका अनुष्ठान सर्वप्रथम जनक ने किया था । इसी तरह से लाट्यायन श्रौतसूत्र के सम्बन्ध में कहा गया है- लाट्यायन का नाम मेरे विचार से 'लाट' या टोलेमी के 'डारिकी' की ओर संकेत करता है, जो पश्चिम में सौराष्ट्र के सीधे दक्षिण की ओर एक देश था' (पृ० ६७ ) यह कथन भी सारहीन ही है, क्योकि कहानियों में प्रसंगवश इस तरह की बहुत सी बातें मा जाया करती है । इससे पञ्चविंश ब्राह्मण की रचना पश्चिम में हुई हो, यह किसी तरह से सिद्ध नहीं हो सकता । इसी तरह से ' आर्षेयकल्प का" दो विभिन्न गोतमो का, जिनमें एक ही विशिष्ट उपाधि स्थविर ( बौद्धो की एक पारिभाषिक उपाधि ) है, शौचिवृत्ति का (जो पाणिनि द्वारा ज्ञात आचार्य है), क्षैरकलम्भि, कौत्स, वार्षगण्य, भाण्डितायन, लामकायन, राणायणीपुत्र इत्यादि का और विशेषतः शाट्यायेनियो एवं उनकी रचना शाट्यायनक का शालंकायनियों के साथ, जो निश्चित रूप से भारत के पश्चिमी भाग के थे, उल्लेख हुआ है । • ये उल्लेख अन्य वेदों के सूत्रों की अपेक्षा सामवेद के सूत्रो की प्राक्कालीनता के प्रमाण है' (१०६७-६८), यह कथन भी निरर्थक है, क्योंकि यह बहुत बार कहा जा चुका है कि आख्यायिकाओं का स्वार्थ में कोई तात्पर्य नही होता । स्थविर प्रभृति शब्दो पर कोई बौद्धो की बपौती नहीं है, ये सब शब्द वेदों में भी प्रसिद्ध है और उनको वहीं से बौद्धो ने भी लिया है । 'वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करते है, इस तरह से स्त्री कभी स्वतन्त्र नही रक्खी जाती' इस मनुस्मृति के वचन में स्थविर शब्द का प्रयोग हुआ है । 'सामवेद के सूत्रों की रचना के समय अनेक प्रकार के मतभेद बने हुए थे, जबकि अन्य वेदों के सूत्रों के समय सिद्धातों और पूजन विधियों में अधिक एकता और कठोरता आ गई थी । शूद्रो और निषादों की दशा जो आदिम भारतवासी थे, वैसी दुःखमय और शोषणयुक्त नही थी, जैसी कि आगे चलकर हो गई । वे स्वयं भी यज्ञ मण्डप के बाहर यज्ञो में उपस्थित हो सकते थे । यत्र तत्र उन्हें स्वयं याज्ञिक क्रियाओं में भी भाग लेते हुए दिखाया गया है, हालाकि वे निम्न कोटि के कर्म का ही सम्पादन करते हैं । उस
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वेदार्थपारिजात ६ निम्नकोटिगतान्येव कर्माण्यासन् । तदानी कठोरेषु ब्राह्मणीयसिद्धान्तेषु प्रतिवेशिन आर्यजातीया अपि मान्यता न प्रयच्छन्ति स्म । शूद्रजातीया अपि ब्राह्मणीयसस्कृतिनिष्ठा ब्राह्मणा इव स्वपूर्वजाना गीतेषु प्रथासु च बहु सम्मान रक्षन्ति, तथैव च तद्विषयाननुशीलयन्ति स्म । कदाचिद् कदाचित् ब्राह्मणा अपि तत्क्रिया: सर्वसमक्ष मेवाश्रयन्ते स्म ॥ यथा श्येनयाग. षड्विंशब्राह्मणे वर्णितः, लाट्यायनेन विस्तरशो वणित. ' इति, तदपि निर्मूलम्, चातुर्वर्ण्ये शूद्राणामप्यन्तर्भावात् । सवर्णसवर्णभेदोत्पादनेन कलहवोजारोपण कौटिल्यमेव पाश्यात्यैरुप्तम् । पाकयज्ञेषु सर्वैरपि . | वैदिकैः शूद्राणामधिकाराभ्युपगमात् ॥ इष्टिविशेषे निषादस्थपतिशूद्रस्यैवाधिकारोऽपि मीमासाया निर्णीत श्येनादियाग. शूद्रकर्तृक इति तु निर्मूलमेव, तस्य ब्राह्मणैर्ऋत्विग्भिनिर्वर्तनात् । नाप्याभिचारिक्यः क्रिया अथर्वेकविषया. श्येनस्य सामवेदेन विधानात् । तान्त्रिकाणि तु कर्माणि तन्त्रविहितानि श्येनादीनां वेदविहितत्वात् । अथर्वसूक्तान्य- ब्राह्मणै. परिशीलितानीत्यपि निष्प्रमाणमेव, अथर्वाध्ययनस्यापि तदुक्तोपनयनादिसापेक्षत्वात् । < -', यदपि च लाट्यायनरीत्या पुरोहिताना रक्तवर्णानि वासासि रामायणीयलङ्कागतपुरोहितानां च तादृक्षाण्येव । वौद्धाना काषायवस्त्राण्यपि तथाविधान्येव' इति, तदपि न किञ्चित्, आभिचारिककर्मसु तादृशवस्त्र- - परिघानविधानेन तादृशकर्मस्वेव तदुपयोगात् । लङ्कागतयज्ञस्याप्यभिचाररूपतंवासीत् । लङ्काधिपस्य महाराज ' शशक्षतजकल्पेन', ' ' ( रावणस्य साधारण्यामवस्थायामपि तादृग्वस्त्रस्यैव परिधान वर्णितम् शशक्षतजकल्पेन वा० रा० इत्यादीनां । बौद्धाना भिक्षूणां त्वभिचाराभावेऽपि तदीयसाधन विशेषाभिप्रायेण तथा वर्णनम् । किमेतावता? क्वचिदा- ( ) ( ) रक्षि पुलीस जनाना लौहपथगामिनी रेलगाडी सम्बन्धिषु गमनागमनादिषु रक्तहरितादीनि वासास्युपयुज्यन्ते । समय कठोर ब्राह्मणीय सिद्धान्तो को अभी प्रतिवेशी आयं जातियो मे भी मान्यता नही मिली थी । ये जातियाँ भी ब्राह्मणीय संस्कृति के भारतीयों के समान ही अपने पूर्वजो के गीतो एवं प्रथाओ को बड़े सम्मान की दृष्टि से देखती थी और उनका उतना ही अनुशीलन करती थी, जितना ब्राह्मणीय भारतीय करते थे, प्रत्युत ब्राह्मण भी कभी- कभी सीधे उनका आश्रय लेते थे और उनकी क्रियाओ को भी खुले आम अपना लेते थे । जैसे कि षड्विंश ब्राह्मण मे श्येन याग का वर्णन है और लाट्यायन श्रौत सूत्र से इसकी विस्तार से व्याख्या की गई है' (पृ० ६८ ) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि चार वर्णों मे शूद्रो की भी गणना की ही गई है । सवर्ण और असवर्ण का भेद पैदा करके पाश्चात्यो ने अपनी कुटिलता से इनमे परस्पर कलह का बीज बो दिया है । सभी वैदिक पाक यज्ञों में शूद्रो को भी अधिकार प्राप्त है । कुछ ऐसी भी इष्टिया है, जिनमे निपाद और स्थपति ( बढई ) जैसे शूद्रो को ही अधिकार दिया गया है । श्येन प्रभृति याग शूद्रो के द्वारा संपादित होते है, यह कथन सर्वथा निराधार है, क्योकि ब्राह्मण ऋत्विक् ही इनका सम्पादन करते है । यह कहना भी समीचीन नही है कि सभी आभिचारिक क्रियाएं अथर्ववेद में ही वर्णित हैं, क्योकि श्येन याग जैसी क्रियाएँ सामवेद में वर्णित है । अन्य तान्त्रिक कर्मो का विधान तन्त्रशास्त्र में हुआ है और श्येन याग प्रभृति का विधान वेदो मे है । अथर्ववेद के सूक्तो का परिशीलन अब्राह्मणो ने किया, यह कथन भी प्रमाणहीन है, क्योकि अथर्ववेद का अध्ययन भी वेदोक्त उपनयन संस्कार के बाद ही हो सकता था । जब यह अब्राह्मणो के द्वारा कैसे परिशीलित माना जा सकता है । इसी तरह से - 'लाट्यायन के अनुसार इन पुरोहितो की पगडी और वेशभूषा लाल ( लोहित ) रंग की होनी चाहिये । रामायण में लंका के राक्षसो के पुरोहितों का याज्ञिक वस्त्र भी इसी वर्ण का बताया गया है और इस रंग के वस्त्रों के साथ बौद्धों के गेरुआ वस्त्र की भी तुलना की जा सकती है' ( पृ० ६ ९) । यह कथन भी नि.सार है, क्योकि आभिचारिक प्रयोगो में इसी तरह के वस्त्रो को पहनने का विधान है । लंका में प्रायः इसी तरह के उद्वेजक क्रियाकलापो का ही अनुष्ठान हुआ करता था, अतः यहाँ भी उन्ही वस्त्रो का वर्णन मिलता है । वाल्मीकि रामायण मे यह वर्णन मिलता है कि लकाधिपति महाराज रावण सामान्य स्थिति में भी इसी तरह के वस्त्र पहना करता था । बौद्ध भिक्षुगण यद्यपि इस उद्वेजक आभिचारिक कर्मों का अनुष्ठान नहीं करते, तो भी उनकी विशेष प्रकार की साधना के लिये इन वस्त्रों को धारण करने का विधान है । इससे क्या निकलने वाला है? कही पुलिस को भी पगड़ी लाल होती है और रेलगाड़ी को चलाने और रोक्ने के लिये हरे लाल कपडो का उपयोग किया जाता है । १२२
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वेदार्थपारिजातः ६७० किन्तुकम्युनिस्टानां ध्वजवस्त्राणि च तादृशानि भवन्ति । केचित्तत्रापि सम्बन्धमन्वेषयन्ति । एवबौद्धानासस्क्रियन्तन काषायइत्यज्ञात्वैव रक्त वासः, काषाय तु वेदिकसन्यासिनामेव । व्रात्यस्तोमेनातीतसस्कारकाला द्विजबन्धव बेवरी यत्किञ्चित् प्रलपति । समकक्षतया यदपि ' पाश्चात्त्यान् ब्राह्मणेतरान् व्रात्यान् व्रातीनाश्च पौरस्त्यैर्ब्राह्मणेतरैवद्धेराचार्यैश्च सर्वे मन्यन्ते स्म' इति पञ्चविंशब्राह्मणवर्णितव्रात्यम्तोमेन ज्ञायते । तत्र ब्राह्मणसमाजप्रविष्टेर्वात्यैः पूर्वसम्वन्धिभ्यःसम्पत्तयो सम्बन्धा विच्छेतव्याः ॥ स्वानि धनादीनि स्वपूर्ववन्धुभ्यो दातव्यानि यद्वा मगधदेशीयेभ्यो ब्रह्मबन्धुभ्यः फलितश्चासीत् । पञ्चविंश-, देयाः एतेन विज्ञायते यद् ब्राह्मणविरोधिनोभिः प्रवृत्तिभिः सह बौद्धधर्मस्तत्र पुष्पितः पर्याप्तं ब्राह्मण एतादृशविषयस्यानुल्लेखः पञ्चविंशब्राह्मणलाट्यायनसूत्रयो रचनाकालविषयेऽन्तरमवद्योतयितुनित्यत्वेन रचना- ' ( ), महत्त्वपूर्ण पृ० ६ ९ ७ इति तदपि तुच्छम् सूत्रस्य पौरुषेयत्वेन रचितत्वेऽपि ब्राह्मणस्य सन्ति । ऽसम्भवात् । तेन ब्राह्मणेषु विधिवशा दिष्टप्रेप्सूनामनिष्टपरिजिहीर्ष्णामिष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारायैवोपदेशाःव्रात्यस्तोमाना प्राक्तनेभ्यो व्रात्यानां बौद्धः सम्बन्धकल्पनमव्यापारेषु व्यापारमात्रम् । एवमेव सरस्वतीतटीययज्ञाना हितानि सर्वाणि मन्त्र- महत्त्वपूर्णपरिवर्तनादिकल्पनमपि वैदिकपद्धत्यज्ञानमूलकमेव । वैदिकास्तु विविधशाखोपबृंसर्वेषा समन्वय कृत्वैकमप्यथं ' ब्राह्मणात्मकानि शास्त्राणि सूत्राणि धर्मशास्त्राणि पुराणेतिहासादीनि च पर्यालोच्य विधेय स्तोतुम् ', निश्चिन्वन्ति । नहि निन्दायै निन्दावचनानि प्रवर्तते नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितु प्रवर्तते अपिविचारयन्तितु परस्पर इति न्यायात् । निन्दातात्पर्यं कस्यचन विहितपक्षस्य त्रशसायामेव । पाश्चात्त्यास्तु विशृङ्खल विरोधमुद्भाव्यैवात्मान कृतार्थयन्ति । भी आप की पद्धति से कोई सबन्ध जोड़ा जा आजकाल कम्युनिष्ट पार्टी का झण्डा और टोपी लाल रंग के होते हैं । क्या इनके साथहै । काषाय वस्त्र वैदिक संन्यासी धारण करते है ।? सकता है बौद्ध भिक्षुओ का वस्त्र काषाय रंग का न होकर लाल वर्ण का होता से उपनयन संस्कार नही किया जा सका हो । इस व्रात्यस्तोम से भी उन द्विजो का ही संस्कार किया जा सकता है, जिनका समय बात को बिना जाने हो बेवर अपना अनाप- शनाप निष्कर्ष निकालते है । के समकक्ष रखा गया था, ' इन पश्चिमी अब्राह्मणीय व्रात्यो और व्रातीनो को पूर्वदेशीय अब्राह्मणदिये गयेबोद्धोएकऔरअतिरिक्तआचार्यों विवरण से स्पष्ट होती है । कर दिया गया है, उन्हें पिछले व्रात्य यह बात पञ्चविंश ब्राह्मण में व्रात्य स्तोमो के वर्णन के साथ लाट्यायन द्वारा जीवन से सभी संबन्ध इसमे यह बताया गया है कि जिन व्रात्यों को ब्राह्मण समाज में प्रविष्ट व्यतीत कर रहे हो । इस प्रकार वह अपने तोडने के लिये अपना धन अपने उन बन्धुओ को दे देना चाहिए, जो व्रात्य का जीवनअथवा वह 'ब्रह्मबन्धु मगधदेशीय' का अपनी पूर्वजीवन की अपवित्रता को अपने वर्ग के लोगो के पास स्थानान्तरित कर देतासकतीहै, है, जब हम यह मान लें कि अपनी ब्राह्मण सारी सम्पत्ति दान कर दे । ब्रह्मबन्धु मगधदेशोय की व्याख्या तभी संभव हो ब्राह्मण में इस प्रकार के किसी उल्लेख का विरोधी प्रवृत्तियो के साथ बौद्ध धर्म इस समय मगध में फला-फूला हुआ था और पञ्चविंशहै' ( पृ ० ६ ९ ) यह कथन भी सारहीन है, अभाव इस रचना और लाट्यायन सूत्र के बीच बीते हुए समय के लिए पर्याप्त महत्वपूर्ण, किन्तु ब्राह्मण तो नित्य है, अतः उनकी रचना क्योकि सूत्र- ग्रन्थ तो पौरुषेय हैं, अत उनकी रचना की बात मानी जा सकती है अनिष्ट का परिहार चाहने वाले व्यक्तियो के लिये नही हो सकती । इन ब्राह्मण ग्रन्थो में विधिवाक्यों के द्वारा इष्ट की प्राप्ति और का प्रयास है । इसी तरह से सरस्वती उनकी अभीष्ट सिद्धि के उपाय बताये गये है । व्रात्यों का बोद्धो से सबन्ध जोड़ना एक वालेव्यर्थ यज्ञीय क्रिया काण्डों से विलक्षणता की नदी के तट पर होने वाले यज्ञो की और व्रात्य स्तोमो की इनसे पहले संपादितगयेहोनेथे, वैदिक पद्धति को ठीक से समझ न पाने के,,,, बात करना यह कहना कि इन सबमें परस्पर अत्यन्त महत्वपूर्ण परिवर्तन हो वेदशास्त्र का सूत्र धर्मशास्त्र कारण ही हो सकता है । वैदिक विद्वान् तो विविध शाखाओं में उपबृंहित समस्त मन्त्रब्राह्मणात्मक किसी भी विषय का निर्णय करते हैं ।' पुराण-इतिहास आदि का ठीक से परिशीलन कर और इनमें परस्पर समन्वय स्थापित कर इस न्याय के अनुसार 'निन्दापरक अर्थवाद किसी को निन्दा करने के लिये नहीं, किन्तु विधि की स्तुति करने के लिए होते हैं