वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 521–530
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 521–530
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वेदार्थ पारिजात. १४१६ मेघं हरयः उदकस्य हर्तार सुपर्णाः शोभनपतना. रश्मय अपो वसाना उदकानि मेघेषु वासयन्त, अद्भिर्मेधान् पूरयन्त, अन्तर्भावितण्यर्थत्वात् । यद्वा कृष्ण नियान दक्षिणायन नियमन रात्रिर्वा । देवाना रात्रिर्दक्षिणायनम् । दक्षिणायनस्य कृष्ण- गतित्वात् कृष्णत्वम् । 'शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगत. शाश्वते मते । ' ( श्री० भ० गी० ) इति गीतावचनम् । कृष्ण नियान प्रति- वर्षाकाले पूर्वे हरय अपो वसाना अद्भिर्मेघान् पूरयन्त दिव द्युलोक नदाश्रितमादित्य वा उद्दिश्य उत्पतन्ति ऊर्ध्व गच्छन्ति । ते च ऋतस्य उदकस्य सदनात् स्थानात् आदित्यमण्डलात् आववृत्रन् आवर्तन्ते । अर्वाञ्च आगच्छन्ति । आदित् अनन्तरमेव यदा अर्वाग्गच्छन्ति तदानीमेव घृतेनोदकेन पृथिवी व्युद्यते विविध क्लिद्यते । अयमेवार्थो निरुक्तवचनेनापि समर्थ्यते । कृष्ण निरयण रात्रिरादित्य हरय सुपर्णा हरणा आदित्यरश्मयस्ते यदा मुतोऽर्वाञ्च पर्यावर्तन्ते सह स्थानादुदकस्यादित्यादथ --- घृतेनोदकेन पृथिवी व्युद्यते । घृतमित्युदकनाम जिघर्ते सिञ्चतिकर्मण (नि० ७।२४ ) । तदर्थस्तु – निरयण निर्गति, निर्गच्छत्ये-तदितिनियान वर्त्म पन्था । तच्च रात्रि । द्वे ह्यस्यायने शुक्ल चोत्तर च कृष्ण च दक्षिणम्, सा हि देवी रात्रि । स आदित्यो जगदनुग्रहाय गर्भमुदकमात्मन्याधित्सुरुत्तरायण प्रतिपद्यते । हरयो रसहरणा सुपर्णास्तस्य हरयो रमय सर्वस्माल्लोकादपो वसाना आत्मन्याच्छादयन्त आददाना दिव द्योतनवन्तमादित्यमुत्पतन्ति तदुदक निधित्समानास्तस्मिन् गर्भत्वेन । तस्मादा- दित्य उत्तरायण षड्भिर्मासै राहितोदकगर्भ सम्पद्यते । स एष परिषिक्तोदकगर्भो दक्षिणवर्त्मप्रतिपद्यमानो नभस्यान्मासा- प्रभृति प्रसूयत इति दुर्गाचार्येण स्पष्टीकृत । तेनात्राग्न्यादयोऽखा जलपात्राच्छादिता ज्वाला कलाकौशलभ्रमणयुक्ता इत्याद्यर्थ- कल्पन निर्मूलमेव । द्वितीयमन्त्रस्याप्ययमर्थं -द्वादशसख्याका प्रधय प्रहिता प्रश्लेष्य चक्रे निहिता 7 द्वादशमासा एकमद्वितीय चक्रं क्रमणस्वभाव सवत्सराख्य चक्रमाश्रिता तथा त्रीणि त्रिसख्याकानि नभ्यानि नाभ्याश्रयाणि फलकानि तत्स्थानीयानि ग्रीष्मवर्षा हेमन्ताख्यानि आश्रितानि । यथा सूर्यरथचक्रस्य द्वादशप्रधय प्रहिता नाभ्यार्हाणि फलकानि सन्ति तद्वत्कालचक्रस्य । की रात्रि माना जाता है । दक्षिणायन कृष्ण गति को देने वाला है, अतः इसको कृष्ण माना जाता है । गीता मे शुक्ल और कृष्ण दोनो गतियो को शाश्वत माना जाता है । तब इस मन्त्र का अर्थ होगा कि प्रत्येक वर्षा ऋतु से पहले सूर्य की किरणें पृथ्वी से जल का ग्रहण कर उससे मेघो को भर देने के लिये द्युलोक अथवा आदित्य की ओर उड़ चलती है और वहाँ से वे उन जल के स्थान आदित्य मंडल से पुनः लौटकर आती है । जब ये लौट कर वापस आती है, तभी पृथिवी पर पानी की वर्षा होती है, पृथिवी जल से गीली हो जाती है । निरुक्त के निम्न वचन से भी यही बात सिद्ध होती है-' कृष्ण निरयण दक्षिणायन को रात्रि को कहते है । आदित्य की चारो तरफ फैलने वाली किरणें जल का आहरण करती है । जब ये आदित्य से वापस लौटती है, तब आदित्य मण्डल से जल को अपने साथ ले आती है और इस पृथ्वी को जल से आध्यायित कर देती है । निरुक्त वचन का अभिप्राय यह है - निपान मार्ग को कहते है । यहां कृष्ण शब्द रात्रि का वाचक है । शुक्ल और कृष्ण ये दो अयन ( मार्ग ) होते है । इनमे कृष्ण अयन देवताओ की रात्रि कहा जाता है । सूर्य जगत् का उपकार करने के अभिप्राय से अपने में जल का खजाना बनाने के लिये उत्तरायण मार्ग का अवलम्बन करता है । उसकी किरणें इस काल मे सभी पदार्थों में से उनके रस को सीचने लगती हैं और अपने में भरती रहती है । वे इस सारे रस को लेकर आकाश में प्रकाशित हो रहे सूर्य में प्रविष्ट हो जाती है और वहाँ उस रस को स्थापित कर देता है ॥ इस तरह से उत्तरायण के छः महीनो में ये किरणें सूर्य में सभी पदार्थों के रस का संग्रह करती रहती है ।जब। जब सूर्यसूर्य काका यहंयह गर्भगर्भ पूर्ण हो जाता है, तो वह दक्षिणायन मार्ग मे प्रविष्ट होता है और तब श्रावण मास से वह जल की वर्षा करने लगता है । दुर्गाचार्य ने इस निरुक्त वचन का यही अर्थ किया है । इस तरह से इस मन्त्र में अग्निप्रभूति अश्वों की, जलमात्र से आच्छादित ज्वाला की और कला कौशल से चक्रों को घूमने की बात सर्वथा निर्मूल है । इस तरह का अर्थ केवल कपोल कल्पना ही माना जायगा । द्वितीय मन्त्र का अर्थ यह है - चक्र में जैसे अराएं ( तीलियाँ) लगी रहती है, उसी तरह से सूर्य के रथ के इस संवत्सररूपी चक्र में बारह मास बारह तीलियों के जैसे जुड़े रहते हैं । चक्र की नाभि में जैसे तीन फलक जुडे रहते है, उसी तरह से इस संवत्सर चक्र की नाभि में भी ग्रीष्म, वर्षा और हेमन्त नाम के तीन फलक हैं । जैसे सूर्य के रथ में बारह तीलिया और नाभि 1
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वेदार्थपारिजाता १४२० क उ कोऽपि महान् तत् चक्र त्रिकेत जानाति यस्मिन् चक्रे साक सह, शङ्कव न शङ्कव इव, त्रिशता त्रिशतसंख्याका षष्टिर्न, नश्चार्थ, षष्टिश्च अरा अरस्थानीयानि दिनानि अर्पिता अर्पितानि आश्रितानि । कीदृशानि तानि? चलाचलास. चलान्यचलानि च, चलान्यनवस्थायित्वात्, अचलानि अहोरात्रभाव न मुञ्चन्ति । एक एव चलशब्दो द्विर्भाव प्राप्तः । ' परिचलिपतिवदीनामच्याक् चाभ्यासस्य' ( पा० सू० ६ ११ १२६ ) इति द्विर्वचनमागागमश्च ततोऽसुक् । षष्टिश्च ह वै त्रीणि शतानि च सवत्सरस्याहानि' (श ० ९| १| १| ४३ ) इति श्रुते । द्वादशप्रधयश्चक्रमेकमिति मासाना 'भासा मानात्' (नि० ४।२७) मीयन्ते हि तैः संवत्सराः । कलाभ्रमणार्थमेक चक्र त्रीणि मध्यस्थानि मध्यावयवधारणार्थानि यन्त्राणि रचनीयानि । ' इत्यपि नगण्यम्, यतो हि नाद्यापि सामाजिकेस्तानि कर्तुं शक्यन्ते । त्रीणि शतानि शङ्कव. क क निखातव्यानि । षष्टिशतानि कलायन्त्राणि कर्त्तव्यानि, ताश्चलनार्था । अचला स्थित्यह इत्येतत् केवल वाग्जालमेव । नेद व्याख्यान शब्दानुगुणम्, न वार्थानुगुणम्, केवल प्रजादौर्भाग्यात् समयापव्ययार्थमेव । शब्दार्थास्तु प्रायेण सायणभाष्यमाश्रित्यैव विकृति नीताः । श्रथ तारविद्यामूलविचारः 'युव पेदवे पुरुवारमश्विना स्पृधा श्वेत तरुतार दुवस्यथ । शर्यैरभिद्यु पृतनासु दुष्टर चर्कृत्यमिन्द्रमिव चर्षणी सहम् || ' (ऋ ० स० १।११ ९/ १० ) । अत्र केवल तारशब्दमवलोक्य कथञ्चित्तदनुगुणानि पदानि योजितानि । कतिचिदपहायान्ये पदार्था सायणभाष्यानुसारिण | 'अश्विनौ' इति सम्बोधनमुत्सृज्य हे मनुष्या इति सम्बोधनमप्यक्षरबाह्यमेव । श्वेत- मित्यस्य अग्निगुणविद्युन्मय शुद्धधातुनिर्मितम् इत्यर्थ. कृतः । शुद्धधातुनिर्मित तु सायणोक्तमेव । अग्निगुणविद्युन्मयमिति .??.? कथं श्वेतशब्दार्थ अभिद्युमित्यस्य प्राप्तविद्युत्प्रकाशमित्यपि कथमर्थः शब्दस्य द्युत्यर्थकत्वे सत्यपि विद्युदिति कथमर्थ तरुतार यूय कुरुतेति क्रियापद मूले नैवोपलभ्यते । चर्कृत्य वार वार सर्वक्रियासु योज्य, सर्वमित्यपि तथाविधमेव । कथं सर्व- में तीन फलक लगे है, उसी तरह से ये काल चक्र मे भी लगे रहते हैं । कोई महान् व्यक्ति ही उस काल चक्र को ठीक तरह से जान सकता है, जिसमें कि तीन सौ साठ दिन अराओ की भाँति जुड़े रहते हैं । ये अहोरात्र चल और अचल भी है । चल इसलिये कि ये सदा बदलते रहते है और अचल इसलिये कि बदलते रहने पर भी अपने स्वभाव को अर्थात् दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होने की क्रमिकता को कभी नही छोड़ती । एक ही चल शब्द का द्वित्व होकर आफु आगम और असुक् प्रत्यय होने पर 'चलाचलास ' शब्द बनता है । एक वर्ष मे तीन सौ साठ दिन होते है, यह बात श्रुति से सिद्ध है । बारह तीलियो वाला एक संवत्सर बारह मासो का द्योतक है । मास के आधार पर संवत्सर को नापा जाता है, इसीलिये इनको मास कहा जाता है । , जिसमें 'उनमे एक चक्र बनाना चाहिये, जिसके घुमाने से सब कला घूमें । फिर उसके मध्य मे तीन चक्र रचने चाहिये से कि एक के चलाने से सब रुक जाय, दूसरे के चलाने से आगे चलें और तीसरे के चलाने से पीछे चलें' (पु० २२८) इस तरह की सारे व्याख्याएँ व्यर्थ है, क्योंकि आज तक किसी आर्यसमाजी ने यह सब करके नही दिखाया है । तीन सौ बड़ी- बड़ी कीलें कहा कहा लगाई जायगी? 'साठ कला यन्त्र बनाने चाहिये । उनमें से कई एक चलते रहे और कुछ बन्द रहें ( पृ० २२८-२२९ ) इस तरह की सारी बातें वाग्जाल मात्र है । ऐसी व्याख्याओ का न तो मन्त्र के अक्षरो से कोई संबन्ध है और न इस तरह के अर्थ में ही कोई संगति है । शब्दों का अर्थ तो प्रायः सायण भाष्य के सहारे ही किया गया है, किन्तु उनको जगह-जगह विकृत कर दिया गया है । तार विद्या का मूलस्रोत ' युवं पेदबे ० ' इत्यादि मन्त्र में केवल तार शब्द को देखकर ही जिस किसी तरह से इस मन्त्र को संबन्ध दूर तक संवाद भेजने की प्रणाली से जोड दिया गया है और इस मन्त्र के कुछ शब्दो का अर्थ जोड़-मरोड़ कर किया गया है । कुछ शब्दों का अर्थ सायणभाष्य के अनुसार ही किया है । 'अश्विनी' पद से अश्विनीकुमारों को संबोधित न कर मनुष्यों को संबोधित करना गलत है । श्वेत पद का अर्थ शुद्ध धातु से बना अग्निगुण वाला विद्युत प्रकाश से युक्त किया गया है । शुद्ध धातु से निर्मितः यह अर्थ तो सायण को भी अभिप्रेत है, किन्तु इसका अर्थ 'अग्नि गुणवाली विद्युत् से युक्त ' कैसे हो सकता है? ' अभिधु' पद का अर्थ भी 'विद्युत प्रकाश से संयुक्त' कैसे किया जा सकता है? यु शब्द यद्यपि द्युति के अर्थ में प्रयुक्त होता है, किन्तु उसका अर्थ विद्युत कैसे हो सकता है? "जो इस J
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वेदार्थपारिजातः १४२१ क्रियासु तारयोजन दृश्यते । शय्यैरित्यस्य हननप्रेरणगुणयुक्तत्व कथमर्थ', शृणातेहिसार्थकत्वात् । अश्विनाविति द्यावापृथिव्यो- बधक । शब्द द्युशब्देन द्युलोको बोध्यते न वैद्युताग्नि । तरुतारमित्यत्र तरुशब्दस्यार्थो वाच्य । स्पृधा पराजयाय स्वकीयाना वीराणा विजयायेत्याद्यपि निर्मूलमेवाक्षरबाह्यत्वात् । वस्तुतस्त्वयमर्थः –हे अश्विनौ, पेदवे पेटु नाम्ने राज्ञे पुरुवार बहुभिर्वरणीय प्रार्थनीय स्पृधा सग्रामे स्पर्धमानाना ' ' ' ' ( } शत्रूणा तरुतार तरणीयतारक विजयकारकमित्यर्थः । तू प्लवनतरणयो रित्यस्मात्तृचि ग्रसित स्कभित स्थभित- इत्यादी निपातनाद् रूपसिद्धि । श्वेत श्वेतवर्णमिन्द्राल्लब्धमश्व युव युवा दुवस्यथ दत्तवन्तौ । त्वया तु सेवध्वमिति- व्याख्यातम्, तच्च निर्मूलम् । कीदृशमश्वम्? शर्योदभि शय्र्यन्त इति शर्या योद्धार, तै पृतनासु सग्रामेषु दुस्तर तरीतुमशक्यम् अभिद्युम् अभिगतदीप्ति दीप्तिमन्त चर्कृत्य सर्वकार्येषु मुहुर्मुहु प्रयोज्यम्, इन्द्रमिव चर्पणीसह शत्रुजनानामभि- भवितारम् । चर्षणीसह मनुष्यसेनाया कार्यसहनशीलम् इति त्वया व्याख्यातम्, तन्न युक्तम्, सेनाकार्यादिबोधकपदाभावात् । चर्षणीशब्द जनार्थक., तेन शत्रुजनोऽप्यर्थस्तु सम्भवत्येव । वंद्यकमूलविचार 'सुमित्रिया न आप ओषधय: सन्तु, दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि य च वय द्विष्म. ॥ ' ( वा० सं० ६।२२) । यद्यपि पर्याप्तमायुर्वेदस्य मूलं वेदे विद्यते नास्त्यत्र विवाद, तथापि मन्त्रस्यास्य तथार्थवर्णनमशुद्धमेव । मन्त्रार्थस्तु–हे वरुण, सुमित्रिया आप ओषधयश्च साधु मित्रत्वेनावस्थिता सन्तु । य शत्रुरस्मान् द्वेष्टि य च वय द्विष्म " तस्मै उभयात्मकाय शत्रवे दुर्मित्रिया अमित्रत्वेनावस्थिताः सन्तु । इस तरह का ' तार' नामक यन्त्र है, उसको सिद्ध करके प्रीति से सेवन करों' (पृ० २३१ ) इस अर्थ में जिस क्रिया का उल्लेख किया गया है, वह मन्त्र में देखने को नही मिलती । 'जो सब क्रियाओ मे बार बार चलाने के लिये योग्य होता है' (पृ ० २३१ ) यह व्याख्या भी असंगत है । सभी क्रियाओ में तार को जोडने की बात का क्या तुक है? 'शर्य' शब्द का अर्थ ' अनेक प्रकार की कलाओ के चलाने से अनेक उत्तम व्यवहारो को सिद्ध करने के लिये विद्युत् की उत्पत्ति करके उसका ताडन करना चाहिये ' यह अर्थ कैसे होगा? शृणाति ' ', धातु का अर्थ हिंसा होता है । अश्विनो पद द्यावापृथिवी का बोधक है । शब्द से द्युलोक का बोध होगा विद्युन्मय अग्नि का नही । 'तरुतार' शब्द मे तरु शब्द का अर्थ बनाना पडेगा । इसी तरह से 'स्पृधाम्' पद का 'लडाई करने वाले राजपुरुषो के लिये यह तार विद्या अत्यन्त हितकारी है' यह अर्थ भी सर्वथा निर्मूल है, मन्त्र अक्षरो से इसका कोई संबन्ध नही है । इस मन्त्र का वास्तविक अर्थ यह है— हे अश्विनीकुमारो, पेदु नाम राजा को आप लोगो ने अनेक व्यक्तियो द्वारा वरणीय और युद्ध में शत्रुओ पर विजय दिलाने वाले, श्वेत वर्ण के, इन्द्र से प्राप्त घोडे को दे दिया है । अपने 'दुवस्यय:' क्रियापद का अर्थ ' सेवन करो ' किया है, जो कि निराधार है । वह अश्व कैसा है? युद्ध में योद्धागण इसकी पकड से छूट नही सकते, यह अत्यन्त तेजस्वी है, सभी कार्यों में बार-बार इसको लगाया जा सकता है, इन्द्र के समान यह शत्रुओ को अभिभूत कर देने वाला है । आपने ' चर्षणीसहम् ' का अर्थ ' मनुष्यों की सेना के युद्ध आदि अनेक कार्यों में सहायता करने वाला' किया है । यह सही नही माना जा सकता क्योंकि मन्त्र में सेना के कार्य युद्ध आदि का बोधक कोई पद नही है । चर्षणी शब्द का अर्थ मनुष्य होता है, अत शत्रु पर विजय पाने की बात इसमें से किसी तरह निकल सकती । वैद्यक शास्त्र का मूल स्रोत ' सुमित्रिया न० ' इस मन्त्र की व्याख्या करते समय दयानन्द ने कहा है कि इस तरह के मन्त्र वैद्यक विद्या के मूल के प्रकाश करने वाले हैं । इसमें कोई विवाद नहीं है कि वेद मे आयुर्वेद के मूल स्रात होने के पर्याप्त प्रमाण विद्यमान हैं, तो भी इस मन्त्र का अर्थ इस बात को शुद्ध करने के पक्ष में करना कथमपि संगत नही हो सकता । मन्त्र का सही अर्थ यह है-हे वरुण, हमारे 157 लिये जल तथा औषधियां सदा मित्र की तरह हित करने वाली हों । जो शत्रु हमसे द्वेष रखता है तथा जिनसे हम द्वेष रखते हैं, ये दोनों ही प्रकार के शत्रु कभी सुखपूर्वक न रहें ।
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१४२२ वेदार्थपारिजातः पुनर्जन्मविषयो विचार 'अमुनीते पुनरस्मासु चक्षु पुन प्राणमिह नो धेहि भोगम् । ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया न स्वस्ति || ' (ऋ ० १०/ ५ ९ /६ ) | (पुनर्नो असु पृथिवी ददातु पुनद्यैर्देवी पुनरन्तरिक्षम् । पुनर्न सोमस्तन्व ददातु पुनः पूषा पथ्या या स्वस्ति ॥ ' (ऋ० स० २०५९/ ७) | यदत्र व्याख्यातम्- 'असव प्राणा नीयन्ते येन सोऽसुनीति परमेश्वर, तत्सम्बुद्धौ हे असुनी ईश्वर । मरणानन्तर द्वितीयशरीरधारणे वय सदा सुखिनो भवेम । पुनरस्मासु अर्थाद् यदा वयं पूर्वशरीर त्यक्त्वा द्वितीयशरीरधारण कुर्म, तदा चक्षु चक्षुरादीनि सर्वाणीन्द्रियाणि अस्मासु धेहि । पुन प्राणमिति प्राणमन्त करणे च धेहि । एव पुनर्जन्मसु न भोग भोगपदार्थान् ज्योक् निरन्तरमस्मासु धेहि, यतो वयं सर्वेषु जन्मसु उच्चरन्तं सूर्य श्वासप्रश्वासात्मक प्राण प्रकाशमयं सूर्यलोक च निरन्तर पश्येम । अनुमते अनुमन्त परमेश्वर नोऽस्मान् सर्वेषु जन्मसु मृडय । भवत्कृपया सर्वजन्ममु सुखमेव भवेदिति प्रार्थ्यते । पुनर्नो इति । हे भगवन्, नोऽस्मभ्यम्, असु प्राणमन्नमय बलं च पृथिवी पुनर्ददातु । तथा द्यौ देवी द्योतमाना सूर्यज्योती रम ददातु, पुनरन्तरिक्ष तथान्तरिक्ष पुनर्जन्मनि असुं जीवन ददातु, तथा सोम ओषधिममूहजन्यो रस पुनर्जन्मनि तन्व शरीर ददातु । पुन पूषा हे परमेश्वर पुष्टिकर्ता भवान् यथा पुनर्जन्मनि धर्ममार्गं ददातु तथा स्वस्ति भवत्कृपया नोऽस्मभ्य सदैव भवति' । ( ०२३३ ) । यद्यप्यर्थो नातीवासङ्गतस्तथापि कर्मवशाद् अवश्य भाविनि जन्मनि चक्षुरादीन्यवश्य भविष्यन्त्येव, कर्मप्रातिकूल्ये तद्विघटनमप्यवश्यं भावीति तत्प्रार्थन निरर्थकमेव, तथापि प्रार्थनया सामर्थ्यविशेषप्राप्तिस्तत्र सम्भवत्येव । 'प्रतारीति दशर्चे चतस्रो निर्ऋत्यपनोदनार्थं जेपुचतुर्थ्या सोम चास्तुवन् मृत्योरपगमायोत्तराभ्या दैवीमसुनीति सप्तम्या लिङ्गोक्तदेवताः शिष्टाभिः पङ्क्तिमहापङ्क्तिपङ्क्त्युत्तराभिर्द्यावापृथिव्यौ समिन्द्रतीन्द्र चार्धर्चेन' इत्यनुक्रमणीरीत्या द्वाभ्या मन्त्राभ्या मन्त्रद्रष्टारस्त्रयोबन्ध्वादयो गौपायना असुनीतिनाम्नी देवीमस्तुवन् । तयोर्द्वितीयोऽय मन्त्र —तत एवमर्थो पुनर्जन्मसंबन्धी विचार इस प्रकरण के प्रारम्भ मे ' असुनीते ० ' इत्यादि मन्त्रो को उद्धृत कर कहा गया है कि इस तरह के मन्त्रो मे पुनर्जन्म पर प्रकाश डाला गया है । इन दोनो मन्त्रों का अर्थ दयानन्द ने इस तरह से किया है -' हे सुखदायक परमेश्वर, आप कृपा करके पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रिया स्थापित कीजिये तथा प्राण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, बल, पराक्रम आदि से युक्त शरीर पुनर्जन्म में कीजिये । हे जगदीश्वर, इस संसार अर्थात् इस जन्म और परजन्म मे हम लोग उत्तम उत्तम भोगो को प्राप्त हों, तथा हे भगवन्, आपकी कृपा से सूर्यलोक, प्राण और आपको विज्ञान तथा प्रेम से सदा देखते रहें । हे अनुमते = सबको मानदेने वाले, सब जन्मो में हम लोगो को सुखी रखिये, जिससे हम लोगो का स्वस्ति अर्थात् कल्याण हो । हे सर्वशक्तिमान्, आपके अनुग्रह से हमारे लिये बार- बार पृथिवी प्राण को, प्रकाश चक्षु को और अन्तरिक्ष स्थान आदि अवकाशों को देते रहे । पुनर्जन्म में सोम अर्थात् ओषधियों का रस हमको उत्तम शरीर देने में अनुकूल रहे । पुष्टि करने वाला परमेश्वर कृपा करके सब जन्मो में हमको सब दुःख निवारण करने वाला पथ्यरूप स्वस्ति को देवे' ( पृ ० २३३ - २३४ ) यद्यपि यह अर्थ अधिक असंगत नही है, किन्तु कर्मों के कारण जन्म अवश्य होगा और जन्म होने पर वक्षु प्रभृति इन्द्रिया भी होगी ही । कर्मों के प्रतिकूल होने पर उन इन्द्रियो की विगुणता रोकी नहीं जा सकती । ऐसी परिस्थिति में उसके लिये प्रार्थना निरर्थक है । तो भी प्रार्थना करने पर उनमें सामर्थ्यविशेष की प्राप्ति हो सकती । } ' प्रतारि' इत्यादि दस ऋचाओ वाले सूक्त में चार मन्त्रो का विनियोग निर्ऋति ( कृत्या ) के परिहार के लिये किया गया है । इनमें से चतुर्थ ऋचा में सोम की भी स्तुति की गई है । आगे की दो ऋचाएं मृत्यु के परिहार के लिये देवी असुनीति की स्तुति में विनियुक्त हैं । सातवें मन्त्र के लिंगोक्त देवता और अवशिष्ट तीन पंक्ति, महापंक्ति और पंक्त्युत्तर छन्दों वाले मन्त्रों से द्यावापृथिवी की और 'समिन्द्र' इत्यादि आधी ऋचा से इन्द्र की स्तुति की गई है । यह विनियोग सर्वानुक्रमणी के अनुसार है ।
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वेदार्थपारिजातः १४२३ युक्त: -हे असुनीते, प्राणदायिनि देवि । अस्मासु अस्मदीये सुबन्धौ पुन चक्षुः प्रकाशक नयन ईक्षणसामर्थ्य प्राण पुनरस्मासु धेहि स्थापय । वय च ज्योक् चिरं उच्चरन्त सूर्य पश्येम । हे अनुमते देवि, स्वस्ति अविनाश यथा स्यात्तथा नः अस्मान् मृडय सुखय । अत्र पुनर्जन्मलिङ्ग दृश्यते, न तत्प्रतिपादनम् । द्वितीयेन तु मन्त्रेण पृथिव्याद्या देवता. स्तूयन्ते । पृथिवी देवी न अस्मभ्य असु प्राणं ददातु पुनद्यर्देवता असु ददातु । तथा अन्तरिक्षम् अन्तरिक्षदेवता असु ददातु । तथा सोम. न. तन्व शरीर पुनर्ददातु । तथा पूषा पोषाभिमानिनी देवता पथ्या पन्था अन्तरिक्षम्' (नि० ११।४५ ) तत्र भवा बाच वागात्मक' शब्दो ह्याकाशादुत्पद्यते । ता पुनर्ददातु । किञ्च यास्वस्तिर्वेदे लोके चोच्यते ता पुनर्ददातु । यद्वा पूषा पोष प्रयच्छतु । या स्वस्तिर्वाड्नाम्नी देव्यस्ति सा पथ्या वाच प्रयच्छतु । 'वाग्वै पथ्या स्वस्ति ' ( श० ब्रा० ३| २| ३| ८ ) इति श्रुते । मृत्युनिवारणार्थदुरदृष्टापहृतप्रायचक्षु प्राणादि पुन प्राप्त्यर्थेय स्तुतिर्ज्ञातव्या । 'पुनर्मन. पुनरायुर्म आगन् पुन. प्राण पुनरात्मा म आगन् । पुनश्चक्षु. पुन. श्रोत्र म आगन् वैश्वानरो अदब्धस्तनूया अग्निर्न. पातु दुरितादवद्यात् ॥ ' ( वा० स० ४।१५ ) | (पुनर्मेत्विन्द्रिय पुनरात्मा द्रविण ब्राह्मण च । पुनरग्नयो धिष्ण्या यास्थाम कल्पयन्तामिहैव ||' (अथर्व० ७२६ ६७) । 'आयो धर्माणि प्रथम. ससाद ततो वपूषि कृणुषे पुरूणि । धास्युर्योनि प्रथम आविवेश यो वाचमनुदिता चिकेत ॥ ' (अथर्व० ५।१।२ ) । एते मन्त्रास्तेनैव व्याख्याता -"-----हे जगदीश्वर, भवदनुग्रहेण विद्यादिश्रेष्ठगुणयुक्त मन आयुश्च मे मह्यम् आगन् पुन पुनर्जन्मसु प्राप्नुयात् । पुन प्राण पुनर्जन्मनि प्राणशरीरधारको वायु । पुनरात्मा पुनर्जन्मनि मदात्मा विचार. शुद्धः सन् प्राप्नुयात् । पुनश्चक्षु श्रोत्र च मह्य प्राप्नुयात् । वैश्वानर. सकलस्य जगतो नयनकर्ता अदब्धः दम्भादिदोषरहितः, तनूपाः तदनुसार दो मन्त्रो से त्रयोबन्धु प्रभृति गोपायन ऋषिगण असुनीति नाम की देवी की स्तुति करते हैं । उनमे से ‘ असुनीते ' इत्यादि मन्त्र दूसरा है । अतः इस मन्त्र का सही अर्थ यह होगा -हे प्राणप्रदात्री असुनीति देवि, हमारे बन्धु बान्धवो में और हमारे में भी आप पुन. रूप के प्रकाशक चक्षुरिन्द्रिय की, उसमे देखने के सामर्थ्य की, प्राण की स्थापना कीजिये । जिससे कि हम सब चिरकाल तक सूर्य का दर्शन कर सके । हे अनुमते देवि, जैसे हमारा कल्याण हो, कोई हानि न हो, उस तरह से आप हम लोगो को सुख दीजिये । इस मन्त्र से पुनर्जन्म की पहचान ही हो सकती है, उसका प्रतिपादन यहीं नही किया गया है । द्वितीय मन्त्र से पृथिवी प्रभृति देवताओ की स्तुति की गई है । पृथिवी देवी हमे प्राणो का दान करें । फिर द्यौ ( आकाश ) देवता भी हमें प्राण शक्ति दें । साथ ही अन्तरिक्ष देवता भी हमे प्राण दान करें । सोम हमारे लिये शरीर देवें तथा पुष्टि का अभिमानी पूषन् देवता आकाश मे उत्पन्न वागात्मक शब्द को, जो कि आकाश से उत्पन्न होता है, देवे । वेद और लोक मे जो स्वस्ति अर्थात् कल्याणकारक बातें कही गई है, उनको भी वह देवे । अथवा पूषन् देवता हमे पुष्टि प्रदान करें । जो स्वस्तिनाम को वाणी देवता है, वह हमे हितकारक वाणी देवें । शतपथ श्रुति इसमे प्रमाण है । मृत्यु की निवृत्ति के लिये तथा दुर्भाग्य से नष्ट प्राय हुए चक्षु, प्राण आदि की पुन: प्राप्ति के लिये यह प्रार्थना की गई है । इसके आगे दयानन्द ने तीन और मन्त्र उद्धृत किये हैं और उनकी व्याख्या इस तरह से की है- 'हे सवज्ञ जगदीश्वर, जब जब हम जन्म लेवें, तब तब हमको शुद्ध मन, पूर्ण आयु, आरोग्यता, प्राण, कुशलतायुक्त जीवात्मा, उत्तम चक्षु और श्रोत्र प्राप्त हो । जो विश्व मे विराजमान ईश्वर है, वह सब जन्मो मे हमारे शरीरो का पालन करे । सब पापो के नाश करने वाले आप हमको -बुरे कामों और सब दुःखों से पुनर्जन्म में अलग रखें' । हे जगदीश्वर, आपकी कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रिया मुझे प्राप्त हो । अर्थात् सर्वदा मनुष्य देह ही प्राप्त होता रहे । प्राणों को धारण करने वाला सामर्थ्य मुझे प्राप्त होता रहे, जिससे दूसरे जन्म मे भी हम लोग सो वर्ष या अच्छे आचरण से अधिक भी जीवें । हमें सत्य विद्या आदि श्रेष्ठ धन भी पुनर्जन्म में प्राप्त होते रहे । सदा के लिये ब्रह्म जो वेद है, उसका व्याख्यान सहित विज्ञान तथा आप में ही हमारी निष्ठा बनी रहे । तथा सब जगत् के उपकार के अर्थ हम लोग अग्निहोत्र आदि यज्ञ को करते रहें । हे जगदीश्वर, हम लोग जैसे पूर्वजन्मों में शुभ गुण धारण करनेवाले बुद्धि से उत्तम शरीर और इन्द्रिय सहित थे, वैसे ही इस
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वेदार्थपारिजाता १४२४ शरीररक्षक, अग्निविज्ञानानन्दघन परमेश्वर, पातु दुरिताद् जन्मजन्मान्तरे दुष्टकर्मभ्योऽस्मान् पृथक्कृत्य पातु रक्षतु येन वय निष्पापा भूत्वा सर्वेषु जन्मसु सुखिनो भवेम । पुनर्मेत्विति । हे भगवन्, पुनर्जन्मनि इन्द्रियं सर्वेन्द्रियाणि आत्मा प्राणधारको बलाख्य विद्यादिश्रेष्ठधन ब्राह्मणं च ब्रह्मनिष्ठत्व पुनरग्नय आहवनीयाग्न्याधानकरण मैतु पुन: पुनर्जन्मसु एते प्राप्नुवन्तु । धिष्ण्या. = हे जगदीश्वर, यथा येन प्रकारेण पूर्वपूर्वजन्मसु धिष्ण्या धारणावत्या धिया सोत्तमशरीरेन्द्रिया आस्थाय तथैवेहास्मिन् ससारे पुनर्जन्मनि स्वस्वकार्यकरणे समर्था भवेम, येन केनापि कारणेन न कदाचिद्विकला भवेम । आ यो इति, यो जीव प्रथम. पूर्वजन्मनि धर्माणि यादृशानि धर्मकार्याणि आससाद कृतवानस्ति, स ततो धर्मकरणाद् बहून्युत्तमानि शरीराणि पुनर्जन्मानि कृणुषे धारयसि । यश्च अधर्मकृत्यानि चकार स नैव पुनर्मनुष्यशरीराणि प्राप्नोति, किन्तु पश्वादीनि शरीराणि धारयित्वा दु खानि भुङ्क्ते, इदमेव मन्त्रार्धेनेश्वरो ज्ञापयति । धास्यतीति धास्युरर्थात् पूर्वजन्मकृतपापपुण्यभोगशीलो जीव प्रथम पूर्वदेह त्यक्त्वा वायुजलौषधिपदार्था आविवेग प्रविश्य पुनः पूर्वकृतपाप-पुण्यानुमारिणी योनिमाविवेग प्रविशति । यो जीवोऽनुदितामीश्वरोक्ता देववाणीमासमन्ताद् विदित्वा धर्ममाचरति, स पूर्ववच्छिरीर धृत्वा सुखमेव भुङ्क्ते तद्विपरीतस्तिर्यग्देह धृत्वा दु खभागी भवति' (पृ० २३४-२३५ ) । वस्तुतस्तु कर्मानुसारेण जन्मानि प्राप्नुवन्ति, जन्मसु तन्नान्तरीयकाणीन्द्रियादीन्युपलभ्यन्त एव, अतस्तत्प्राप्ति-प्रार्थना तु निरर्थकप्राया । अत एव पुनर्जन्म साधनायैतेषा मन्त्राणा प्रयोगोऽपि न युक्त । शास्त्रप्रामाण्यवादिनामामुष्मिक -फलकर्मणा विधानादेव पुनर्जन्मानायाससिद्धमेव । वैदिकानां रीत्या तु —'अग्ने त्व सुजागृहि वय सुमन्दिषीमहि । रक्षाणो अप्रयुच्छन् प्रबुधे नः पुनस्कृधि ॥ ' (वा० स० ४।१४) इति मन्त्रेण यजमानस्य स्वापो विहित । 'अग्ने त्वमित्युक्त्वा स्वपित्यध प्राग्दक्षिणतः इति' (का० श्री० सू० ७| ४ | ३ ९ ) इत्यार्षस्मरणात् । मन्त्रार्थस्तु –हे अग्ने, त्व सुजागृहि वय सुमन्दिषीमहि स्वप्स्यामः । मन्दतेः संसार में पुनर्जन्म में भी बुद्धि के साथ मनुष्य देह के कृत्य करने में समर्थ हो । ये सब शुद्ध बुद्धि के साथ मुझे यथावत् प्राप्त हो । जिनसे कि हम लोग इस संसार में मनुष्य जन्म को धारण करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सदा सिद्ध करे और इस सामग्री से आपकी भक्ति को प्रेम से सदा किया करें, जिस करके किसी जन्म में हमको कभी दुःख प्राप्त न हो । जो मनुष्य पूर्व जन्म में धर्माचरण करता है, उस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरो को धारण करता और अधर्मात्मा मनुष्य नीच शरीर को प्राप्त होता है । जो पूर्वजन्म में किये हुए पाप-पुण्य के फलो को भोग करने के स्वभाव युक्त जीवात्मा है, वह पूर्व शरीर को छोडकर वायु के साथ रहता है, पुनः जल, ओषधि या प्राण आदि में प्रवेश करके वीर्य में प्रवेश करता है तदनन्तर योनि अर्थात् गर्भाशय में स्थिर होकर पुनर्जन्म लेता है । जो जीव अनुदित वाणी, अर्थात् जैसी ईश्वर ने वेदो मे सत्य भाषण करने की आज्ञा दी है, वैसा ही यथावत् जानकर बोलता है और धर्म मे ही यथावत् स्थिर रता है, वह मनुष्य योनि में उत्तम शरीर धारण करके अनेक सुखो को भोगता है और जो अधर्माचरण करता है, वह अनेक नीच शरीर अर्थात् कीट, पतंग, पशु आदि के शरीर को धारण करके अनेक दुःखो को भोगता है' (पृ० २३५-२३६ ) [ वास्तव मे प्राणी अपने कर्मों के अनुसार जन्म पाते है । जब पुनर्जन्म होगा, तो उसके साथ अनिवार्य रूप से इन्द्रिय आदि 1की प्राप्ति होगी ही, अत: इनकी प्राप्ति के लिये प्रार्थना निरर्थक सी है । इसीलिये पुनर्जन्म की सिद्धि के लिये इन मन्त्रो की सहायता लेना भी ठीक नही है । शास्त्र को प्रमाण वालो के मत से पारलौकिक फल के लिये कर्मों का विधान होने मात्र से अनायास पुनर्जन्म सिद्ध हो जाता है । वैदिकों को पद्धति से 'अग्ने त्वं० ' इस मन्त्र से यजमान के शयन का विधान किया गया है । कात्यायन श्रौतसूत्र के बचन से यह स्पष्ट है । इस मन्त्र का अर्थ यह है कि हे अग्ने, अब जागते रहिये, अब हम लोग सोवेंगे । मन्दति धातु का प्रयोग शयन ' अर्थ में किया जाता है । आप हमारी सावधानी से रक्षा कीजिये । हमको आप पुनः जगाने के लिये भी सावधान रहिये । तैत्तिरीयधुति 1 ८
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वेदार्थपारिजातः १४३५ स्वापार्थत्वात्, नोऽस्मान् अप्रयुच्छन् सावधानतया रक्ष । पुन प्रबुधे प्रबोधाय कृधि प्रबोधन कुर्वित्यर्थ. । स्वपतोऽग्ने. प्रार्थन- मुपद्रवकारिणा रक्षसा नाशाय 'अग्निमेवाधिप कृत्वा स्वपिति रक्षमामपहत्यै ' इति तैत्तिरीयश्रुते । 'पुनर्मन:' (वा० स ० ४।१५ ) इति मन्त्रं तु विबुद्धं वाचयत्यध्वर्यु । ' विबुद्धमस्वप्स्यन्त पुनर्मन इति वाचयति' (का ० धी० सू० ७| ४| ४० ) इति ------ कात्यायनवचनात् । तदर्थस्तु—मे मम यजमानस्य मन पुनरागन् मुप्तिकाले विलीय पुनरिदानी शरीरमागत् आगतम् । नात्र लकारान्तरपरिणामोऽपेक्षित, गमेर्लङि शपि लुप्ते 'हल्ड्याभ्य ' ( पा० सू० ६। १ ६८ ) इति प्रत्ययलोपे मकारस्य नकारे आगन्निति रूपसिद्धिः । किञ्च, स्वापकाले मदीयमायुर्नष्टप्राय भूत्वा पुनरागत् इदानी पुनरुत्पन्नमिवासीत् । तथा मे प्राणो वायुः पुनरागत् तथा मे आत्मा जीव पुनरागत् तथा मे चक्षु श्रोत्र पुनरागन्, 'सर्वे ह वा एते स्वपतोऽपक्रामन्ति' (श० ३।२२/ २३ ) इति श्रुते । स्वापकाले मनआदीनामपक्रमो भवति, तेन तेषा यथास्थानमागमन प्रार्थ्यते । अकस्मात्प्रबोधने व्यत्ययेनेन्द्रियाणा प्रवेशेनेन्द्रियघाताद्यनर्थमम्भवात् । एव समागतेषु तेषु अयमग्निरवघात् वदितुमयोग्यात् निन्दितात् दुरितात् पापात् नोऽस्नान् पातु । यद्वा दुर्यशसो दुरितात् पापाच्च पातु, कीदृगोऽग्निः, वैश्वानर विश्वेभ्यो नरेभ्यो हित. सर्वपुरुषहित-करः, अदब्ध. केनाप्यहिसित, तनू पातीति तनूपा, नात्र पुनर्जन्मप्रसङ्ग । पुनर्मैत्विन्द्रियमित्यपि मन्त्रो न पुनर्जन्मबोधक । इन्द्रिय इन्द्रेण दत्तं वीर्य ' इन्द्रियमिन्द्रलिङ्ग...' इति पाणिनि- सूत्रम् । इन्द्रियमिन्द्रियाणि चक्षुरादीनिमा मा पुनरेतु पुनरागच्छन्तु, आत्मा देहाभिमानी पुनरेतु द्रविणं प्रतिग्राह्य धनं मामेतु तथा ब्राह्मणं मन्त्रब्राह्मणात्मको वेदश्च पुनरेतुः तथा होत्रादिधिष्ण्येषु विहिता अग्नय इहैवास्मिन्नेव विहितप्रदेशे यथास्थाम यथास्थान पुनः कल्पयन्ता समर्था प्रवृद्धा भवन्तु । यत्तु दयानन्देन ब्राह्मणपदेन ब्रह्मनिष्ठत्वमुक्तम्, तत्तु निर्मूलत्वादपास्तम् । इत पूर्वस्मिन्नपि मन्त्रे 'यद्यन्तरिक्षे यदि वात आस यदि वृक्षेषु यदि वोपलेषु यदश्नवन् पशव उद्यमान तद्ब्राह्मण पुनरस्मानुपैतु ' ब्राह्मण ब्राह्मणोपलक्षितो मन्त्रब्राह्मणात्मको वेद ', मेघे वाताधिक्ये वृक्षच्छायाया हरितसस्यसन्निधो पशोश्च समीपे नाध्येतव्यम्, तथाध्ययने सम्यक् से यह स्पष्ट है कि सोते समय अग्नि से प्रार्थना इसलिये की जाती है कि उस समय वे उपद्रवी राक्षमो का नाश कर दें । 'पुनर्मन:' इत्यादि मन्त्र का उच्चारण अध्वर्यु यजमान के जग जाने पर करता है । यह कार्य कात्यायन श्रौतसूत्र मे बताई गई पद्धति के अनुसार किया जाता है । इसका अर्थ यह है-- मेरे यजमान का मन पुनः आगया है, जो कि सोते समय विलीन हो गया था, अब जागने पर वह पुनः इसके शरीर में आगया है । इसी तरह से सो जाने पर आयु, प्राणवायु, आत्मा ( जीव ), चक्षु, श्रोत्र ये सब जो नष्ट हो जाने के समान हो गये थे वे सब पुन ' सचेत हो गये है । शतपथश्रुति मे बताया गया है कि सो जाने पर ये सब शरीर मे से निकल जाते हैं । जब स्वाप-काल में मन आदि का निष्क्रमण हो जाता है, तो जागने पर ये पुनः अपनी- अपनी जगह चले आवे, इसके लिये प्रार्थना की जाती है । एकाएक जाग उठने पर यदि इन्द्रियो के आने मे गडबडी हो जाय, तो उससे इन्द्रियो मे विकृति आने का भय रहता है । इस तरह से इन्द्रिय आदि के आ जाने पर यह अग्नि अवद्य अर्थात् निन्दित पाप कर्मों से हमारी रक्षा करे । अथवा अपयश से और पाप से हमारी रक्षा करे । यह अग्नि कैसा है? यह सभी मनुष्यों का कल्याण करने वाला है । इसको कोई हानि नही पहुंचा सकता और यह सबके शरीरों का रक्षक है । इस तरह से इस मन्त्र में पुनर्जन्म का कोई प्रसंग नही है । ' पुनर्मेत्विन्द्रिय०' इत्यादि मन्त्र भी पुनर्जन्म का प्रतिपादक नहीं है । इन्द्र द्वारा प्रदान की गई शक्ति को इन्द्रिय कहते । ' इन्द्रियमिन्द्रलिङ्ग० ' इत्यादि पाणिनि सूत्र से इसकी सिद्धि होती है । चक्षु प्रभृति इन्द्रिया मुझे पुन प्राप्त हो, देह का अभिमानी पुन: आवे, धन भी मुझे पुनः प्राप्त हो और मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद भी मुझे पुनः प्राप्त हो । तथा अग्निहोत्री के घर में स्थापित अग्नियां अपने आधान स्थान में ही पुनः प्रज्वलित हो उठें । ' यद्यन्तरिक्षे ० ' इत्यादि दयानन्द ने ब्राह्मण पद का अर्थ ब्रह्मनिष्ठ किया है, यह सर्वथा निराधार है । इससे पहले आये मन्त्र में भी ब्राह्मण पद का अर्थ मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद ही किया जाता है । आकाश के मेघाच्छन्न हो जाने पर, अंधड चलने पर, वृक्ष की छाया में, हरी फसल के पास और पशु के समीप वेद का अध्ययन नही करना चाहिये । ऐसे समय में अध्ययन करने पर भलीभांति १७९
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वेदार्थपारिजात १४२६ पठितोऽपि वेदो निर्वीर्यो भवति । तदुक्तमापस्तम्वेन स्वाध्यायधर्मप्रकरणे 'नाम्ने न छायाया न पर्य्यावृत आदित्ये न हरित- यत्रान् प्रेक्षमाणो न ग्राम्यस्य पशोरन्ते नारण्यस्य नापामन्ते' ( आ ० श्री० सू० १५।२१।८) अनेन मन्त्रेण तादृशकालेषु स्थलेषु चाधीतम्यापि वेदस्य वीर्यवत्त्व प्रार्थ्यते । अन्तरिक्षे मेघाच्छन्न इति विशेषणसाहित्य ज्ञेयम् । तादृशेऽन्तरिक्षे यदि ब्राह्मणमास । कर्मविधायकं ब्राह्मणमित्युच्यते एतन्मन्त्रस्याप्युपलक्षणम् । मन्त्रब्राह्मणात्मको वेदो यदि तादृशेऽन्तरिक्षे अधीत आसीत् ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इत्यापस्तम्बवचनात् । वाते प्रभूते वायौ सति ब्राह्मणमधीत यदि वृक्षेषु वृक्षच्छायाया उलपेषु सस्यमात्रसन्निधाने ब्राह्मणमधीत तथा यच्चोद्यमान ब्राह्मण ग्राम्या आरण्या पशवो अश्रवन् असृम्वन् तत्तादृशेषु निमित्तेषु अधीतं ब्राह्मणमस्मानुपैतु । निपिद्रकालस्थलेष्वध्ययनेन अस्मत्तो निष्क्रान्त ब्राह्मण पुनर्वीर्यवत्त्वेन फलप्रद सत् आगच्छतु । ' वद व्यक्ताया वाचि' इति धातोर्निप्पल उद्यमानगव्दो ब्राह्मणमित्यनेन ससृष्ट ग्रन्थरूपमेव ब्राह्मण बोधयति । 'यद्यन्तरिक्षे " पुनर्मेत्विन्द्रियम्, शिवा न ' ( का० सू० ११ ९ ) इति शान्त्युदकाभिमन्त्रणादौ विनियोग उक्त । एव 'पुनर्मेत्विन्द्रियमिति प्रति मन्त्रयते' (को ० सृ ० ८।७ ) इन्द्रियभावमने विनियोग | अग्निष्टोमतृतीयसवने हौत्रादिधिष्ण्येषु विहृतानग्नीन् पुनर्मैत्विन्द्रिय-मिति ऋचा ब्रह्मा अनुमन्त्रयेत' ( वैतानसूत्र ३३८) इत्यादिभि कैश्चिन्निमित्तैर्दुरदृष्टोपघाते जाते पुन सस्कारार्थमुक्तमन्त्रैरभि- मन्त्रणादिक क्रियते । 'आयो धर्माणि' इति मन्त्रोऽपि न त्वदभिप्रायपोषक, किन्तु जन्मकर्मणा कार्यकारणभावमेवद्योतयति ॥ य प्राणभृज्जीव प्रथम पूर्वजन्ननु धर्माणि धर्मरूपाणि मसाद कर्मणामनुष्ठानेन धर्मरूपमदृष्ट प्राप्तवान् स तत एव पुरूणि बहूनि वपुषि कृणुषे कुरुते । धर्माणीत्यधर्मस्याप्युपलक्षणम् । धर्माधर्मप्रभावेणैव जीवात्मा नानाविधानि वपूषि शरीराणि तदनुगुणा- न्यायूंषि भोग्यानि च प्राप्नोति । योऽनुदिता वाच चिकेत जानाति, यो वेदलक्षणा वाचमनुदितामविस्पष्टां जानाति ब्रह्म-तात्पर्यवती वाच न वेद स एव योनि प्राप्नोति । यस्तु महातात्पर्यवती वाच जानाति स तु ब्रह्मज्ञानेनामृतत्वमेवाश्नुते । यश्च अभ्यस्त वेद भी निम्तेज हो जाता है । नापस्तम्व श्रोतसूत्र के स्वाध्याय प्रकरण में भी यही बात कही गई है । इस मन्त्र में ऐसे समय में किये गये वेदाध्ययन को भी वीर्यवान् बनाने की प्रार्थना की गई है । अन्तरिक्ष पद से मेघाच्छ अन्तरिक्ष का ग्रहण किया जाता है । इस तरह के अन्तरिक्ष के हो जाने पर कर्मवित्रायक ब्राह्मणभाग के अध्ययन का निषेत्र किया जाता है । ब्राह्मण पद मन्त्र भाग का भी द्योतक माना जाता है । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र का वचन इसमे प्रमाण है । इसी तरह से जोरो की हवा चलने पर, वृक्ष की छाया में, उपल अर्थात् सस्य मात्र के सनिधि में अथवा ग्राम्य तथा आरण्य पशुओ के पान यदि मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद का अध्ययन किया जाता है, तो इन निषिद्ध काल और देश में किया गया यह अध्ययन निस्तेज होकर हमारी स्मृति शक्ति में नही रह पाता । ऐसा निस्तेज अध्ययन पुनः वीर्यवान् होकर हमें प्राप्त हो, फलप्रद हो । कात्यायन श्रौतसूत्र में इन मन्त्रो का विनियोग सर्वविध शान्ति के लिये जल को अभि- मन्त्रित करने मे बताया गया है । इसी तरह से कात्यायन श्रौतसूत्र और वैदान्तसूत्र के आधार पर यह मालूम होता है कि इन मन्त्रो का विनियोग उस समय किया जाता है, जबकि कुछ दुरदृष्ट निमित्तो के कारण इन्द्रिय आदि की हानि की आशंका होने पर उस आशका की निवृत्ति के लिये अथवा हानि हो जाने पर उस हानि के परिहार के लिये इन मन्त्रो मे अभिमन्त्रित कर जल का उपयोग किया जाय । ' आपो कर्माणि ० ' यह मन्त्र भी आपके अभिप्राय को पुष्ट नही करता, किन्तु जम्न और कर्म के कार्यकारणभाव को ही बताता है । जो प्राणधारी जीव पूर्वजन्म में पुण्य कार्यो को करके धर्म ( अदृष्ट) का संचय करता है, वह व्यक्ति उन्ही के कारण उत्कृष्ट शरीरों को प्राप्त करता है । इसके विपरीत जो व्यक्ति पापकर्मों को करता है, निष्कृष्ट शरीर प्राप्त होते है । धर्म और अधर्म के कारण हो जीवात्मा भाँति- भाँति के शरीरो को और उनके अनुरूप आयु और भोगो को प्राप्त करता है । जो व्यक्ति वेद वाणी को स्पष्ट नही समझ पाता कि इसका तात्पर्य परब्रह्म तत्त्व के स्पष्ट प्रतिपादन में है, वही व्यक्ति नाना प्रकार की योनियो को प्राप्त करता है । जो व्यक्ति इस वेद वाणी का परम तात्पर्य, वास्तविक अभिप्राय ब्रह्मतत्त्व के प्रतिपादन में है, इस बात को ठीक तरह से हृदयगम कर लेता है, वह ब्रह्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने से अमृतत्व की अमरता को, ब्रह्मभाव को प्राप्त कर लेता है । सब शरीरधारी प्राणियों में प्रथम अर्थात् श्रेष्ठ
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वेदार्थपारिजातः १४२७ प्रथम. शरीरिषु मुख्यो जीव ', धास्युरन्नादिभोगमिच्छु स योनिमाविवेश, सर्वत्रैव हि रागादिमानेव योनि प्राप्नोति । विरक्तस्तु तत्त्वज्ञानादिद्वारा मुक्तो भवति । 'द्वे सृती अशृणव पितॄणामह देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिद विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितर मातर च ॥ ' (वा० स० १ ९ ४७) (मृतश्चाह पुनर्जातो जातश्चाह पुनर्मृत । नानायोनिसहस्राणि मनोषितानि यानि वै ॥ आहारा विविधा भुक्ता. पीता नानाविधा स्तना । मातरो विविधा दृष्टा पितर सुहृदस्तथा । अवाङ्मुख पीड्यमानो जन्तुश्चैव समन्वित । ' (नि० १३/ १ ९ ) एतेषा वचनाना देवयान पितृयानवर्णनेन वैराग्यवर्णन एव तात्पर्यम् । यथा कथञ्चित्तु सर्वेषामेव मन्त्राणा देहातिरिक्तात्मप्रतिपादनमर्थ । द्वे सृती इत्यस्यायमर्थ – मर्त्याना मरणधर्मणा द्वे सृती हो मागौ अणव श्रुतित श्रुतवानस्मि 'स एष देवयानो वा पितृयाणो वा पन्था ' इति श्रुते । के ते द्वे सृती, देवाना मार्ग एक उतापि पितॄणा चान्य., मातर पितर चान्तरा भूलोकद्युलोकयोर्मध्ये ' असौ वै पितेय माता' (ग० १२/८/२१ ) इति श्रुते । तत् एजत् कम्पमान क्रियावत् विश्व सर्वमिद विश्व ताभ्या सृतिभ्या समेति सङ्गच्छते । ताभ्या सृतिभ्या सुहुतमस्तु इत्यर्थं । यत्तु –'एक. पितॄणा ज्ञानिना देवाना विदुषा च द्वितीयां मर्त्याना विद्याविज्ञानरहिताना तयोरेक पितृयानो द्वितीयो देवयानश्च' इति, तत्तु निर्मूलमेव, ज्ञानिना विदुषा च बोधे तयोश्चैकमार्गत्वे देवपितृशव्दाभ्या देवयानपितृयान मेदेन मार्गद्वयवर्णनासङ्गत्यापत्ते । श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धदेव पितृपदार्थौ परित्यज्य ज्ञानिविद्वदर्थकल्पने मानाभावात् । ज्ञानिविदुषोरर्थे- क्याच्चैकत्रैव पर्यायवाचकपदप्रयोगे हेत्वभावाच्च, देवताधिकरणविरोधश्च । यदुक्तम् —'यत्र जीवो मानापितृभ्या देह धृत्वा पुण्यपापफले सुखदु खे पुन पुनर्भु के सा पितृयानाख्या सृति । यत्र मोक्षाख्य पद लब्ध्वा विमुच्यते सा द्वितीया' इति, तदपि तुच्छम् उक्तेऽर्थे प्रमाणानुपलब्धेः । ताभ्यामितिपदस्य श्रुताभ्या- मनुष्य,, यदि अन्न प्रभृति जागतिक भोगो को चाहता है तो वह भवा अनेक योनियो को करगा वय कि यह बात निश्चित है कि राग-द्वेष प्रभृति दोषो से घिरा व्यक्ति हा आवागमन के चक्कर में पडता है । जो व्यक्ति विरक्त है, वह तो तत्वज्ञान की सहायता से मुक्त हो जाता है । 'द्वे सृती०' इत्यादि वचनो का भो देवयान और पितृयान के वर्णन के द्वारा वैराग्य के उत्पादन मे ही तात्पर्य है । जिस किसी तरह से तो सभी मन्त्रो का अर्थ देह से भिन्न आत्मा के प्रतिपादन में किया जा सकता है । इनमें से ' द्वे सुती० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है— मरणधर्मा मनुष्यों की दो तरह की गतियाँ हमने सुनी है, जिनको कि श्रुतियो मे देवयान और पितृयान के नाम से जाना जाता है । उसी बात को यहाँ भी बताया गया है कि उनमे से एक देवताओं का मार्ग है और दूसरा पितरो का । ये दोनो मार्ग माता और पिता अर्थात् भूलोक और द्युलोक के बीच में है । श्रुति में बताया गया है कि द्युलोक को पिता और इस पृथ्वीलोक को माता कहा जाता है । यह सारा गतिशील ससार उन्ही दो मार्गों पर चलता रहता है । इन दोनों मार्गों के प्रति यह हमारी आहुति शुभ फल देने वाली हो । 'एक पितृ अर्थात् ज्ञानियो, देवो अर्थात् विद्वानो का 1 दूसरा विद्याविज्ञान रहित मनुष्यों का, उनमें एक पितृयान है, दूसरा देवयान' ( पृ ० २३७-२३८ ) यह व्याख्या तो निर्मूल है, असंगत है, क्योकि पितृ शब्द से ज्ञानी और देव शब्द से विद्वान् का बोध होने पर ये दोनो तो एक ही हुए, तब इन्हीं के नाम पर दो भिन्न मार्ग कैसे माने जा सकते है | श्रुति और स्मृति में प्रसिद्ध देव और पितृ शब्दो के अर्थों को छोडकर उनके ज्ञानी और विद्वान् इन नये अर्थों की कल्पना करने में कोई प्रमाण नही है । साथ ही ज्ञानी और विद्वान् तो पर्यायवाची शब्द है, इनका अर्थ एक ही हो सकता है, तब एक ही वस्तु के लिये पर्यायवाची अलग-अलग शब्दो का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा । बिना कारण के ऐसा होता नहीं । साथ ही यहाँ देवताधिकरण में प्रतिपादित सिद्धान्त का विरोध भी है । 'जिसमें माता-पिता के संयोग से देह को धारण करके पाप-पुण्य और सुख- दुःख को पुनः पुनः भोगता है, अर्थात् पूर्वापर जम्मो को धारण करता है, वह पितृयान कहलाता है, तथा जिसमें मोक्ष पद को प्राप्त करके जन्ममरण रूप संसार से मुक्त
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वेदार्थपारिजात । १४२८ मित्येवार्थं । न त्वत्कपोलकल्पितोऽर्थं । श्रुतिश्व मन्त्रव्याख्याने उक्तैव । 'मातरं पितर च प्रविश्य' इति व्याख्यातं, तदप्य- शुद्धम्, 'प्रविश्य' पदस्य मूलेऽभावात् । अत एव पूर्वोक्तव्याख्यानुसारेण पितर मातर चान्तरा द्युलोकभूलोकयोर्मध्ये इत्येवार्थः । अन्तराशब्दस्य च व्याख्यान दयानन्दीयभाष्ये नास्तीत्यपि न्यूनतैव । मृतश्चाहमित्यपि वैराग्यार्थमेव । गर्भस्थजीवस्य जन्मान्तरीयानुभववर्णन स्पष्टमेव । 'स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेश ' (यो० सू० २२ ९ ), 'पुनरुत्पत्ति. प्रेत्यभाव ' (गो० सू० १1१1 ९ ) इत्यादिभिरपि मरणभयदर्शनेन मरण- सस्काराधानादनेकदेहसम्बन्धेन जीवस्य देहादिव्यतिरिक्तत्वसाधन एव तात्पर्यम् । अन्यत्तु न विरुद्धम् । विवाहविषयो विचार 'गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्त मया पत्या जरदष्टिर्यथास । भगोमा सविता पुरन्धिर्योषा मा त्वादुर्गार्हपत्याय देवा ॥ ' (ऋ ० स ० १०।८५ ३६ ) मन्त्रार्थस्तु–हे वधु, ते तव हस्त गृभ्णामि गृह्णामि सौभगत्वाय सौभाग्याय । मया पत्या त्व जरदष्टि प्राप्तवार्धक्या अस भवसि । भग, अर्यमा, सविता, पुरन्धि, पूषा एते देवास्त्वा त्वा मह्यं गार्हपत्याय गृहपतित्वाय अदु दत्तवन्त । सन्तानोत्पत्त्यादिप्रयोजनसिद्धय इति तु नाक्षरार्थं । भगार्यमादयस्तु देवविशेषा एव, तानपलप्य सवित्रादि- शब्दाना परमेश्वरपरत्वव्यवस्थापनमपि शाब्दन्यायोल्लङ्घनमेव । देवा विद्वास इत्यप्यपव्याख्यानमेव, देवजातेर्मनुष्य भिन्नत्वेन साधितत्वात् । यद्यावा प्रतिज्ञोल्लङ्घन कुर्यावहि तर्हि परमेश्वरदण्ड्यौ विद्वद्दण्ड्यौ च भवेवेत्यादिक तु निर्मूलम्, मन्त्रार्थ- बाह्यत्वात् । हो जाता है, वह दूसरा ( देवान) मार्ग कहलाता है' ( पृ० २३८ ) यह कथन भी निराधार है, क्योकि आपकी इस बात को पुष्ट करने वाला कोई प्रमाण उपलब्ध नही है ॥ 'ताभ्याम्' पद का अर्थ ' श्रुताभ्याम्' ( सुने गये ) यही हो सकता है, आपका कपोलकल्पित अर्थ नही । हमारे किये गये अर्थ के प्रमाण में तो हमने श्रुति का प्रमाण दिया है । 'पिता और माता के शरीर में प्रविष्ट होकर' (१० २३८) यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि 'प्रविश्य' पद मूल मन्त्र मे नही है । इसीलिये हमारी पूर्वोक्त व्याख्या के अनुसार द्युलोक और पृथ्वीलोक के बीच मे, यही अर्थ उचित है । 'अन्तरा' शब्द की व्याख्या दयानन्द के भाष्य मे नही की गई है, यह भी उस भाष्य की एक त्रुटि ही है । 'मृतश्चाहं० ' इत्यादि वचनो मे भी वैराग्य की उत्पत्ति के लिये गर्भ मे स्थित जीव के जन्मान्तर के अनुभवो का वर्णन किया गया है, यह बात स्पष्ट है । 'स्वरसवाही ० ' तथा 'पुनरुत्पत्ति'० ' इत्यादि योग और न्यायदर्शन के सूत्रो मे भी मरण ( मृत्यु ) का भय दिखाकर मरण के संस्कारो को दृढ किया गया है, जिससे कि अनेक प्रकार के शरीरो का संबन्ध होने से व्यक्ति का यह संस्कार दृढ हो सके कि आत्मा इन सब शरीरो से भिन्न है, जिसका कि इस तरह के अनेक शरीरो से संबन्ध होता है । इन वचनो की व्याख्या के प्रसंग मे अन्य जो बातें कही गई हैं, उनसे हमारा कोई विरोध नही है । विवाह विषयक विचार 'गृभ्णामि ते ०' इस मन्त्र का अर्थ यह है-हे वधु, मैं तुम्हारे सौभाग्य के लिये तुम्हारा हाथ पकड रहा हूँ । तुम मुझे पति के रूप मे स्वीकार कर मेरे साथ ही वृद्धावस्था को प्राप्त करोगी, अर्थात् हम लोग वृद्धावस्था तक इसी तरह एक साथ रहेंगे । भग, अर्यमा, सविता, पुरन्धि, पूषा – ये सब देवगण गृहस्थाश्रम चलाने के लिये तुम्हें मुझे सौप रहे है । इसका अर्थ सन्तान की उत्पत्ति के लिये तुम्हें मुझे दे रहे हैं, ऐसा नहीं हो सकता । भग अर्थमा ये सब देवता विशेष है । इनका अपलाप कर सविता प्रभृति शब्दों का अर्थ परमेश्वर कहना सर्वथा शाब्दिक प्रक्रिया के विरुद्ध है । देव पद का अर्थ विद्वान् करना भी गलत है । मनुष्य जाति से भिन्न देव जाति का प्रतिपादन किया जा चुका है । 'यदि हम दोनो प्रतिज्ञा का उल्लंघन करें तो हमें परमेश्वर और विद्वान् लोग दण्ड दें' (पृ ० २४१ ) इस तरह का अर्थ करना सर्वथा निराधार है, क्योकि यह बात मन्त्राक्षरों से नही निकलती ।