वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 581–590

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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वेदार्थपारिजातः १४७९ देश्यम् । तत्र कल्याणवर्णं सुवणं तस्येव रूपं यस्य स कल्याणवर्णरूपोऽग्निरत्यो वा कश्चिदिति दुर्गाचार्यः । व्रियते वा कर्मभि- रिति वर्णशब्दो ब्राह्मणादावपि प्रवर्तते ब्राह्मणराजन्यादिकमुद्दिश्यैव ज्योतिष्टोमराजसूयादिकर्मप्रवृत्ते । त्वद्रीत्या तु गुणाः कर्माणि वा वरीतुमर्हाणि वरणीयानीति तान्येव वर्णपदव्यपदेश्यानि स्युरिति, तदपि त्वद्विरुद्धमेव, ककारादिवर्णेष्वपि वर्णशब्दः प्रयुज्यते, तथैव ब्राह्मणादिष्वपि गुणकर्मादिवरणीयत्वेनापि वर्णशब्द प्रयोक्तुं शक्यते । जन्मसिद्धमेव ब्राह्मणादिक- मुद्दिश्य वैदिकानि कर्माणि विहितानि, अनुपनीताना वेदाध्ययनानुष्ठानाद्यनुपपत्तेः । उपनयन च ब्राह्मणादीनामेव विधीयते, न मनुष्यमात्रस्य । 'ब्रह्म हि ब्राह्मण, क्षत्र हीन्द्रो राजन्यः' इत्यपि न त्वत्समीहितसाधकम्, तत्र ब्रह्मपदेन ब्रह्मवर्चसस्य क्षत्रपदेन, क्षत्रत्राण रक्षत्रतेजसो ग्रहणेन तत्र ब्राह्मणराजन्यदृष्टिविधानेन त्वदभिप्रायासिद्धे । ब्रह्मपदेन विद्याद्युत्तमगुणग्रहणेऽपि तत्र ब्राह्म- णत्वारोप एव । न तु गुणस्य ब्राह्मणत्व संभवति, गुणमुद्दिश्य ब्राह्मणोचितकर्मविधानासभवात् गुणगुणिनोरभेदासंभवाच्च ॥ '. " ', क्षत्र क्षत्रियकुलं य पुरुष इन्द्र परमैश्वर्य्यवान् स राजन्यो भवितुमर्हति इति तु सर्वथा विश्वडूखलम् पूर्ववाक्यानु- रोधेन यथा ब्रह्म ब्राह्मण, तथैव क्षत्र होन्द्र क्षत्र राजन्य इन्द्रे वान्वयस्य युक्तत्वात् । त्वद्रीत्या 'क्षत्र' वा अश्व:' इत्य- श्वस्यैव क्षत्रियकुलत्वं स्यात् । ' अथो क्षत्र' वा अश्व । क्षत्रस्यैतद्रूपं यद्धिरण्यम् । क्षत्रमेतत्क्षत्रेण समर्धयति' ( श०१३ | १ | ११| १७ ) 'विड्वा इतरे पशव । विश एतद्रूपम् । विड्वै यवो राष्ट्रं हरिण ' ( श० १३३२२८) इत्यादिभिर्विशो यवत्वं राष्ट्रस्य हरिणत्वमपि स्यात् । सिद्धान्ते तु तत्र तत्रारोप एव । 'ब्रह्म वै ब्राह्मणः क्षत्र राजन्य.' ( श० १३| १| ५| ३ ) इत्यादी ब्रह्मवर्चसे ब्राह्मणदृष्टि । ' न वै क्षत्रे ब्रह्मवर्चसं रमते' ( श ० १३/१/५/३ ), ' न वै ब्रह्मणि क्षत्र' रमते ' ( श० १३| १| ५ | २) इत्यादिषु क्षत्र क्षत्रियजातो ब्रह्मवर्चसं ब्राह्म तेजो न रमते ब्रह्मणि ब्राह्मणे क्षत्र क्षात्र तेजो न रमत इत्युक्तम् । तस्मान्न किञ्चिदेतत् । के इस वचन की व्याख्या करते हुए दुर्गाचार्य ने बताया है कि कल्याणवर्ण सुवर्ण के समान रूप वाला अग्नि अथवा अन्य कोई यहाँ निर्दिष्ट है । विभिन्न कर्मो के द्वारा जिनका वरण होता है, वह वर्ण है । इस व्युत्पत्ति के आधार पर ब्राह्मण आदि में भी वर्ण शब्द की प्रवृत्ति हो सकती है, क्योकि ज्योतिष्टोम " राजसूय प्रभृति यज्ञ कर्मों की प्रवृत्ति किसी एक ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण को लेकर ही हुई है । आपकी व्याख्या के अनुसार तो गुण अथवा कर्म ही वरणीय है, तब तो इन्ही के लिये वर्ण पद का प्रयोग माना जायगा और यह बात आपके मत के विपरीत पडेगी । ककार प्रभृति वर्णों के लिये भी वर्ण शब्द का प्रयोग किया जाता है, उसी तरह से ब्राह्मण प्रभृति मे भी उनके गुण और कर्मों की वरणीयता के आधार पर वर्ण शब्द का प्रयोग किया ही जा सकता है । जन्म से सिद्ध ब्राह्मण आदि वर्णों को लेकर ही वैदिक कर्मो का विधान किया गया है । अनुपनीत व्यक्ति का न तो वेदाध्ययन में ही अधिकार है और न उसका किसी अनुष्ठान में ही । उपनयन ब्राह्मण आदि तीन वर्णों का ही होता है, मनुष्य मात्र को उद्दिष्ट कर इसका विधान नही है । 'ब्रह्म हि ब्राह्मण. ' इत्यादि वचन भी आपके मत को नही सिद्ध करता, क्योकि ब्रह्मपद से ब्रह्मवर्चस का और क्षत्र पद से दु.खी व्यक्ति की रक्षा करने वाले क्षात्र तेज का ग्रहण होने से यहाँ ब्राह्मण और क्षत्रिय की दृष्टि का ही प्रतिपादन होने से आपका अभिप्राय इससे सिद्ध नही होगा । ब्रह्मपद से विद्या प्रभृति उत्तम गुणो का ग्रहण होने से उसमे ब्राह्मणत्व का आरोप ही होगा । गुण मे ब्राह्मणत्व का आरोप नही हो सकता, क्योकि गुण को उद्दिष्ट कर ब्राह्मणोचित कर्मों का विधान नही किया जा सकता । साथ ही गुण और गुणी का अभेद भी नही हो सकता । 'जो क्षत्रिय कुल का पुरुष इन्द्र अर्थात् परम ऐश्वर्य सम्पन्न होता है, वही राजन्य कहा जा सकता है' ( पृ ० २६ ९ ) यह कथन भी सर्वथा गलत है, क्योंकि पहले वाक्य में जैसे ब्रह्म का ब्राह्मण से अन्वय किया गया है, उसी तरह से इस वाक्य में भी क्षत्र शब्द का इन्द्र या राजन्य पद से अन्वय होगा । यदि आपकी पद्धति से अर्थ किया जाय, तब वो 'क्षत्र वा - अश्व: ' इस वाक्य के सहारे अश्व को भी क्षत्रिय कुल का मान लिया जायगा । इसी तरह से 'विड् वै यवो राष्ट्रं हरिणः' इत्यादि वाक्यों हमारे मत से तो इन सब स्थलों में औपचारिक प्रयोग ही माना के प्रमाण से प्रजा को यव और राष्ट्र को हरिण माना जा सकता है । ब्राह्मण की दृष्टि रहती है । 'न वै क्षत्रे ब्रह्मवर्चसं रमते' और | ':'जाता है ब्रह्मवै ब्राह्मण इत्यादि वाक्यो मे ब्रह्मतेज की प्राप्ति में में क्षात्र तेन 'न वै ब्रह्मणि क्षत्रं रमते ' इन वाक्यों में यह बताया गया है कि क्षत्रिय जाति में ब्रह्मतेज नही रमता और ब्राह्मण जाति -नहीं रमता । अतः आपको व्याख्या सर्वथा निराधार है । 1

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बेदार्थपारिजात १४८० 'मित्र. सर्वेभ्य सुखदाता, वरुण उत्तमगुणधारणेन श्रेष्ठ ' इत्यत्रापि मूल वक्तव्यम् । 'वीय्र्यं वा एतदपा रसः' इत्यस्य 'प्राणाना यो रस आनन्दस्तं प्रयच्छत क्षत्रियस्य वीय्यं वर्धते ' इति तन्मत्तप्रलपितमेव, वाक्यस्य तादृगर्थबोधकत्वा- सभवात् । यत्तु हिन्दीव्याख्याने निगदितम्- 'हे जीव, त्व विजानीह्यार्थ्यान् ये च दस्यव । तथा उत शूद्र आयें इत्यादिमन्त्रे- ब्रह्मणक्षत्रियवैश्या आय उच्यन्ते, अनार्य्या शूद्रा उच्यन्ते' इत्यादि, तदपि पाश्चात्त्यप्रभावमूलकमेव, मनुष्येष्वार्थ्यदस्युत्व- विद्वत्त्वमूर्खत्वादिभेदेषु सत्स्वपि ब्राह्मणादिभेदे बाधाभावात् । साधर्म्यवैधर्म्य वैविध्येऽपि बाधाभावात् । मित्रशब्दस्तु प्रकृते देवविशेषस्यैव वाचक, तथैव वरुणशब्दोऽपि । राजमूययज्ञस्य प्रसङ्गे ' अथ बाहू उद्गृह्णाति' इति यजमानो बाहू - उद्गृह्णाति ऊर्ध्वो प्रसारितौ कुर्य्यात् । मित्रोऽसि वरुणोऽसीत्यय मन्त्रस्तत्र विधास्यते । तत्र पूर्वपक्षत्वेन मन्त्र पठति ' ' -' ' हिरण्यरूपौ । अत एव कात्यायनो विकल्पेन सूत्रयामास बाहू उद्गृह्णाति । हिरण्यरूपा मित्रोऽसि वरुणोऽसि बा ( १५ ।१४७ - १४८) | सिद्धान्तरूपेण मित्रोऽसि वरुणोऽसीत्येवोद्गृह्णीयादिति तद्विधानम् । 'हिरण्यरूपा उषसो विराक उभाविन्द्रा उदिथ सूर्य्यश्च । आरोहत वरुण मित्र गर्त ततश्चक्षाथामदिति दिति च ॥ ' इति मन्त्रव्याख्यान ब्राह्मणमेव करोति -' बाहू वै मित्रावरुणी पुरुषो गर्तस्तस्मादारोहत वरुण मित्र गर्तम् । तत- श्चक्षाणामदिति दिति चेति तत पश्यत स्व चारण चेत्येतदेवाह -' हे वरुण, हे मित्र, बाहुद्वयस्य पृथक् सबुद्धिः । हिरण्यरूपौ हितरमणीयरूपौ हिरण्यस्वरूपी वा, सालङ्कारत्वात् । इन्द्रौ परमेश्वर्यवन्तौ उभौ युवा उषसो विरोके विरोचने उदिथः सूर्य्यश्चोद्गत, हे मित्रावरुणौ, बाहुरूपौ गतं पुरुषमारोहत पुरुषस्योपरि भवतम् । ततोऽदितिमखण्डनीया पृथिवीरूपा स्वीया प्रजा चक्षाथा पश्येताम् | दिति खण्डनीया परामेना च पश्यतम्, तद्वाहुद्वयमेव स्वबल रक्षति परबलं च हन्ती- मित्र का अर्थ सबको सुख देने वाला और वरुण का अर्थ उत्तम गुण का धारक होने से श्रेष्ठ, ऐसा करने मे भी प्रमाण बताना पडेगा । ' वीयं वा एतदपा रस.' इसका अर्थ यह करना कि प्राणो के रस आनन्द को देने वाले क्षत्रिय का बल बढता है, केवल पागल का प्रलाप ही माना जा सकता है, क्योकि इस वाक्य से इस तरह का अर्थ निकल ही नही सकता | हिन्दी व्याख्या में आर्य और दस्यु की बात उठाकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को आर्य तथा शूद्र को अनार्य बताया है, किन्तु ये सारी बातें भी पाश्चात्य प्रभाव मूलक ही है । मनुष्यों में आर्य दस्यु, विद्वान् मूर्ख आदि भेद भले ही रहे, इनके रहते हुए भी ब्राह्मण प्रभृति भेदो की स्थिति मानने में कोई बाधा नही है । इनमे नाना प्रकार के साधर्म्य और वैधर्म्य की स्थिति मानने में भी कोई बाघा नही है । प्रकृत मन्त्र में मित्र शब्द और वरुण शब्द देवविशेष के ही वाचक हैं । राजसूय यज्ञ के प्रसग मे यह ब्राह्मण वचन मिलता है - ' अथ बाहू उद्गृह्णाति' । इसका अर्थ यह है कि अब यजमान अपनी दोनो भुजाओ को ऊपर फैलावे । 'मित्रोऽसि वरुणोऽसि ' इस मन्त्र का उच्चारण इसी कार्य को सम्पन्न करते समय किया जाता है । यहाँ पर पूर्वपक्ष के रूप में 'हिरण्यरूपी' इस मन्त्र का विधान है । इसीलिये कात्यायन ने इन मन्त्रों का विकल्प से विधान किया है कि उक्त दोनो मन्त्रों में से किसी एक का उच्चारण करते हुए यजमान अपनी भुजाओं को ऊपर फैलावे । इस तरह का पूर्वपक्ष कर बाद मे वहाँ बताया गया है कि 'मित्रोऽसि ' इत्यादि मन्त्र से ही यह कार्य सम्पन्न किया जाय 'हिरण्यरूपौ' इत्यादि से नही । 'हिरण्यरूपी' इस मन्त्र की व्याख्या स्वयं ब्राह्मण ने इस तरह से की है- 'मित्र और वरुण बाहुस्थानीय हैं । पुरुष गर्त स्थानीय है । वरुण और मित्र से यहाँ गर्त अर्थात् पुरुष की सहायता करने की प्रार्थना की गई है और कहा गया है कि इस पुरुष को आप लोग अदिति और दिति का ज्ञान कराइये । 'हे वरुण, हे मित्र' इस तरह से दोनो बाहुओं को अलग अलग सबोधित किया गया है, आप लोग हितकर है और रमणीय है, अथवा अलंकारों से भूषित होने से हिरण्यस्वरूप है । आप लोग परम ऐश्वर्य संपन्न हैं ॥ आप लोग उषा देवी को प्रसन्न करने के लिये उदित होते है । हे बाहुस्वरूप मित्रावरुण, आप लोग इस गर्त अर्थात् पुरुष के ऊपर होइये । इसके बाद इस अखण्डनीय पृथिवीरूप अदिति का और अपनी प्रजा का अवलोकन कीजिये । साथ ही इस खण्डनीय दिति को भी आप लोग देखिये | मित्र और वरुण के प्रतिनिधि भूत ये बाहू अपने बल की रक्षा और दूसरे के बल का नाश करते हैं । इस मन्त्र का यह आध्यात्मिक अर्थ हुआ । आधिदैविक अर्थ करने पर गर्त शब्द का अर्थ रथ होगा । हे मित्र और वरुण देवो, आप लोग रथ पर

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II वेदार्थपारिजातः त्याध्यात्मिकोऽर्थः 1। आधिदैविके तु गर्तो रथः, हे मित्रावरुणी, गतं रथमारोहतम् । ततोऽदितिमदीन समर्थं विहितकर्म- कर्तारं पुरुषं प्रपश्यतम् । दितिं दीनमविवेकिन च पश्यतम् । तमिम मन्त्र बाहुद्वयपरत्वेन व्याचष्टे - बाहू वै मित्रेति । अन्तिम- पादार्थं चाह- स्व स्वीयम् अरणम् अरमणीय पर च पश्यतम् । तथा चात्र ब्राह्मणेन बाहुरूपादेव मित्रावरुणी उच्येते । यथा शालग्रामो विष्णुरुच्यत इति तद्वत् । यदपि - 'आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त । तं रात्रोस्तिस्र उउरे बिर्भात त जातं द्रष्टुमभि- संयन्ति देवा || इय समित् पृथिवी द्यौद्वितीयतान्तरिक्ष समिधा पृणाति । ब्रह्मचारी समिधा मेखलया क्रमेण लोकास्तपसा- पिपति ॥ पूर्वी जातो ब्राह्मणो ब्रह्मचारी धर्मं वसानस्तपसोदतिष्ठत् । तस्माज्जात ब्राह्मण ब्रह्मज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्' ( अथर्व ० ११ | ३ | ५ | ३- ५ ) एतेषा मन्त्राणा सिद्धान्तानुसार्ययमर्थः -ब्रह्मचारिण माणवकम् उपनीयमानं स्वसमीप- मुपगमयन्नाचार्य स्वीयविद्यात्मकस्य शरीरस्यान्तर्मध्ये गर्भं कृणुते करोति । तं गर्भीभूत तिस्रो रात्रीः उदरे आत्मीये वारयति 1। चतुर्थे दिवसे जातं विद्यामयशरीरादुत्पन्नं ब्रह्मचारिण द्रष्टुं देवा इन्द्रादयोऽभिसयन्ति । अभिमुखं सभूय गच्छन्ति । 'स हि विद्यातस्तं जनयति तच्छ्रेष्ठं जन्म ॥ शरीरमेव मातापितरौ जनयत:' (आप ० ध ० सू० १ | १ | १५११७ ) इत्यापस्तम्बवचनात् । एतेन ' गर्भमिव करोति ' इत्यादिक निर्मूलमेव । 'यदत्युक्तम्-' यद् विद्यायुक्तो विद्वान् जायते तदा तं विद्यासु जात प्रादुर्भूतं देवा विद्वासो द्रष्टुमभिसयन्ति तस्य मान्यं कुर्वन्ति । अस्माक मध्ये महाभाग्योदयेनेश्वरानुग्रहेण च सर्वमनुष्योपकारार्थं त्वं विद्वान् जात इति प्रशंसन्ति' इति, तदपि न संगतम्, त्रिदिनपर्यन्त विद्यामये शरीरे गर्भबद्धारणेऽपि विद्वत्प्रशंसार्हविद्वत्वासंभवः, समर्थ इस अदिति अर्थात् अदीन पुरुष को देखिये और साथ ही दिति चढिये । रथ पर चढ कर आप लोग विहित कर्मों के अनुष्ठान में अर्थात् दीन, अविवेकी पुरुष को भी देखिये । इसी मन्त्र की बाहुपरक भी व्याख्या की गई है । अन्तिम पाद का अर्थ यह है--आप लोग अपने अशोभन शत्रु को भी देखिये । इस तरह से यहाँ ब्राह्मण वाक्य मे मित्र और वरुण को बाहुरूप ही माना गया है । जैसे कि शालिग्राम शिला में विष्णु का आरोप किया जाता है, उसी तरह भुजाओ मे मित्र और वरुण का आरोप यह किया गया है । इस तरह से चार वर्णों का विवेचन करने के बाद स्वामी दयानन्द ने चार आश्रमो की चर्चा छेडी है और ब्रह्मचर्य आश्रम के प्रमाण के रूप में 'आचार्य उपनयमानो' इत्यादि तीन मन्त्र उद्धृत किये है । हमारे मत से इस मन्त्रो का अर्थ इस तरह से होगा-जिसका यज्ञोपवीत करना है, उस ब्रह्मचारी बालक को अपने पास बुलाकर आचार्य अपने विद्यारूपी शरीर के भीतर गर्भ की तरह उसका पालन-पोषण विद्यादान आदि करता है, यज्ञोपवीत संस्कार से उसको संस्कृत करता है । वह आचार्य अपने विद्या शरीर में तीन रात्रि पर्यन्त उसे धारण किये रहता है । चौथे दिन विद्यामय शरीर से इस ब्रह्मचारी बटुक का नया जन्म होता है, तब इसको देखने के लिये इन्द्र प्रभृति देवगण आते है । आपस्तम्ब धर्मसूत्र मे बताया गया है कि वह आचार्य अपनी विद्या से उसको जन्म देता है, जो कि श्रेष्ठ जन्म हैं । माता-पिता तो केवल उस शरीर को पैदा करते है । इसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य को शिक्षित करने का आचार्य का कार्य माता-पिता के द्वारा मनुष्य के शरीर मात्र को पैदा करने से अधिक श्रेष्ट है, क्योकि विद्या के द्वारा ही उसके मानवीय संस्कारों का परिष्कार होता है । दयानन्द ने 'गर्भमिव करोति' ऐसी व्याख्या की है, जिसका कि स्पष्ट अभिप्राय है कि आचार्य शिष्य को गर्भ की तरह धारण नहीं करता, किन्तु यह औपचारिक प्रयोग है । उनका यह कथन स्पष्ट ही आपस्तम्ब धर्मसूत्र के विपरीत पड़ता है । जिसमें कि आचार्य द्वारा शिष्य के विद्याजन्म की बात कही गई है । दयानन्द ने यह भी लिखा है कि जब यह विद्या पढ़कर विद्वान् हो जाता हैं, तब विद्या में प्रवीण हुए इस शिष्य को तीन दिन के बाद देखने के लिये अध्यापक अर्थात् विद्वान् आते है और उसको संमान देते है । हमारे बीच महान् भाग्य से और ईश्वर की कृपा से सब मनुष्यो का उपकार करने के लिये तुम्हारा जैसा विद्वान् हुआ है, इस तरहधारणसे उसकी प्रशंसा करते हैं ( पृ० २७१-२७२ ) । यह सारा कथन भी असंगत है, क्योंकि तीन दिन तक विद्यामय शरीर में गर्भ के समान १८६

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१४८२ वेदार्थपारिचातः तथाऽदृष्टत्वात् । तस्मादाचार्यस्य विद्यामयशरीरस्य मध्ये गर्भकरणेन गर्भीभूतस्य ब्रह्मचारिणो रात्रित्रयानन्तरमेव चतुर्थे दिवसे जातस्य सस्कारादिजनितब्रह्मवर्चसादिदृष्टमेव वैलक्षण्यं जायते । तद्वैलक्षण्यमिन्द्रादिदेवेरेव द्रष्टुमर्हम्,न मानवविद्वदृष्टियोग्यम् । दिनत्रयसम्कारैरेव देवादिपूजायोग्यता, देवकर्तृकदर्शनयोग्यता च तत्रोदेति । ततः पूर्व तु मानवादिदृष्ट्यर्हतैवासीत् । इय समिदिति पूर्वब्रह्मचारिणो माहात्म्यकथनपूर्वक तदुत्पत्तिरुक्ता । साम्प्रत तु तत्स्तुतिव्याजेन नियमा उपदि- श्यन्ते '। इयं दृश्या पृथिवी ब्रह्मचारिण. प्रथमा समित् । द्योद्युलोकरूपा द्वितीया समित् । उतापि अन्तरिक्षं समिधा अग्नावाधीय- मानया पृणाति पूरयति, अर्थात् प्रथमया समिधा पृथिवी द्वितीयया द्युलोकं तृतीययाऽन्तरिक्षं पृणाति पूरयति, पालयति वा आयुर्वे, घृतमितिवत् । इयं समिद् द्यौद्वितीयेति सामानाधिकरण्यम् । इत्थं ब्रह्मचारी समिधा आधीययानया तथा मेखलया धार्य्यमाणया मौञ्ज्या श्रमेणेन्द्रियनिग्रहोद्भूतस्वेदेनान्येनापि तपोरूपेण देहसंतापकेन नियमव्रातेन लोकान् पृथिव्यादीन् पूरयति पालयति वा । अतः समिदाधानादिकमवश्य कर्तव्यमित्यर्थ. । श्रीदयानन्दस्तु इयं पृथिवी द्यौः प्रकाशोऽन्तरिक्षं चानया समिधा ब्रह्मचारी पृणातीत्युक्तवान् । इय समिदिति प्रथमान्तसमिच्छन्दस्य व्याख्यानं तु नैव कृतवान् । द्वितीयसमिच्छन्दस्य समिधाऽग्निहोत्रादिनेत्यर्थं कृतवान् । तदपि निर्मूलम्, समिच्छन्दस्य तदर्थत्वे मानाभावात् । पूर्वो जातः सर्वाश्रमेभ्यः प्रथममुत्पन्नः । स चोत्पन्नो धर्मं दीप्तं रूपं वसान आच्छादयन् तपसा समिदा- धानादिरूपेण सह उदतिष्ठत् उत्तिष्ठत् उत्थितवान् धर्मब्रह्मानुष्ठानज्ञानाभ्यामुत्कर्षं प्राप्तवान् । ब्रह्म वेदस्तदध्ययनार्थं करने पर भी विद्वानों की प्रशंसा लायक विद्वत्ता प्राप्त नही होती । ऐसा कही नही देखा गया कि तीन दिन मे बालक विद्वान् हो जाय । इसलिये यही मानना पडेगा कि आचार्य के विद्यामय शरीर के बीच मे गर्भीभूत ब्रह्मचारी का जब तीन दिन के बाद चौथे दिन संस्कारो के द्वारा विद्यामय ब्रह्मवर्चस सम्पन्न विलक्षण देह पैदा होता है, तो उस विलक्षण ब्रह्मतेज से सम्पन्न शरीर को देखने की योग्यता इन्द्र प्रभृति देवताओ मे ही हो सकती है । मानव विद्वान् उसको देखने में समर्थ नही हो सकते । पहले मन्त्र मे ब्रह्मचारी की महत्ता बताते हुए उसकी उत्पत्ति का वर्णन किया गया है । अब 'इयं समित्० ' इत्यादि मन्त्र में उसकी स्तुति के बहाने कुछ नियम बताये जा रहे हैं, जिनका कि वह पालन करता है । वह दृश्य पृथिवी ब्रह्मचारी की पहली समिधा है । द्युलोक उसकी दूसरी समिधा है । वह ब्रह्मचारी तीसरी समिधा को जब अग्नि को समर्पित करता है, वह उससे अन्तरिक्ष को भर देता है । अर्थात् पहली समिधा से पृथिवी को, दूसरी से द्युलोक को और तीसरी समिधा से ब्रह्मचारी अन्तरिक्ष लोक को पूरित कर देता है, अथवा उनका पालन करता है, रक्षा करता है । यहाँ पहली समिधा को पृथिवी, दूसरी समिधा को द्युलोक और तीसरी को अन्तरिक्ष लोक उसी तरह से लाक्षणिक रूप से माना गया है, जैसा कि घृत को आयु माना जाता है । ब्रह्मचारी के द्वारा इन तीन आहुतियों के दिये जाने से हम सब लोगों की समृद्धि होती है और रक्षा होती है । इसलिये ब्रह्मचारी को तीनों कालों में समिदाधान अवश्य करना चाहिये, यह इसका तात्पर्य है । इस तरह से ब्रह्मचारी समिधा के आधान द्वारा, मेखला और मौजी को धारण कर परिश्रम पूर्वक इन्द्रियों को अपने नियन्त्रण में रखकर जो अध्ययन तप का अनुष्ठान करता है, अपना पसीना बहाता है, इन नियमों का पालन कर अपने शरीर को कष्ट देता है, इसी से पृथिवी प्रभृति सारे लोकों की रक्षा होती है और समृद्धि बढ़ती है । इसलिये इन नियमो का पालन करते हुए अवश्य ही समिधा का आधान करना चाहिये, तीनों कालों में सन्ध्यावन्दन, हवन आदि कार्य संपन्न कराने चाहिये । श्री दयानन्द ने इसका अर्थ करते हुए लिखा है कि 'ब्रह्मचारी पृथिवी, सूर्य और अन्तरिक्ष इन तीनो प्रकार की विद्याओं का पालन और पूर्ण करने की इच्छा रखता है' ( पृ० २७३ ) । ' इयं समित्' इस प्रथमान्त समित् शब्द का उन्होने कोई अर्थ नही किया । द्वितीय समिधा शब्द का अर्थ उन्होने 'अग्निहोत्र आदि से ' ऐसा किया है । यह सारी व्याख्या भी निराधार है, क्योकि समित् शब्द का दयानन्द का अर्थ करने में कोश, व्याकरण आदि का कोई प्रमाण नही है । 'पूर्वो जात:' इस तृतीय मन्त्र का अर्थ हमारे मत से यह है— यह ब्रह्मचर्य आश्रम अन्य सभी आश्रमों से पहले उत्पन्न हुआ है । यह उत्पन्न होने के साथ ही अपने धर्म के पालन के द्वारा तेजस्वी रूप धारण किये रहता है और समिदाधान रूपी तप का

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वेदार्थपारिजातः १४८३ , व्रतमपि ब्रह्म तच्चरतीत्येवं शीलो ब्रह्मचारी । पूर्वो जात इति यत्सर्वजगत्कारणं सत्यज्ञानादिलक्षणं सत्यज्ञानादिलक्षणं ब्रह्म तस्भाद् ब्रह्मणः सकाशाद् ब्रह्मचारी तस्माद् ब्रह्मचार्य्यात्मना तपस्तप्यमानाद् ब्रह्मण सकाशाद् ब्राह्मणं ब्राह्मणानां - स्वभूत ज्येष्ठ्य प्रशस्यतम वृद्धतमं वा ब्रह्म वेदात्मक जात प्रादुर्भूतम् । वेदाना नित्यत्वेऽपि ब्रह्मचर्यव्रतपुरस्सर मध्ययनेनैव तस्य व्यावहारिके जगति प्रादुर्भाव । तत्प्रतिपाद्याः सर्वेऽग्न्यादयो देवाश्च अमृतेन अमृतत्वप्रापकेण स्वोप- भोग्येन साक सार्द्धं जाता इति शेष । वेदाध्ययनतदर्थधर्मानुष्ठानादिभिरेव देवा भाविता भवन्ति, ' परस्पर भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ' ( ३| ११ ) इति गीतावचनात् । प्रथमजननाद् ब्रह्मचारी सर्वश्रेष्ठ इत्यर्थ । यत्तु —'ब्रह्मेव परमेश्वरो विद्या च ज्येष्ठा सर्वोत्कृष्टा यस्य त ब्रह्मज्येष्ठम् अमृतेन परमेश्वरमोक्षबोधेन परमानन्देन साकं सह वर्तमानं ब्राह्मणं ब्रह्मविद जात प्रसिद्ध देवा विद्वांसः सर्वे प्रशंसति' इति, तन्न सङ्गतम्, विरोधात् । -, तथाहि ब्रह्म परमेश्वरो विद्या वा सर्वेषामेव कृते ज्येष्ठा उत्कृष्टा गृहस्थ वनस्थ यतीनामपि ब्रह्मज्येष्ठत्ववैशेष्येण , ब्रह्मचारिप्रसङ्गविरोधात् । एवमेव ब्राह्मण ब्रह्मविद जात प्रसिद्धमित्यपि न युक्तम् पुनरुक्तिदोषात् । देवा विद्वांस इत्यपि प्रसिद्धिविरुद्धम्, मनुष्यत्वतिरिक्त देवाना प्रमाणे साधितत्वात् । अमृतपदस्यापि परमेश्वरमोक्षबोधकत्वे गौणार्थ- तैव दूषणम्, मुख्यार्थबाधे हेत्वभावात् । मोक्षबोधेन परमानन्देनेति सामानाधिकरण्यं कथम्, तयोर्भेदेन एकार्थनिष्ठत्वा- भावेन तदनुपपत्ते । ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्ध. काणं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः । स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तर समुद्र लोकान् सगृभ्य मुहुराचरित् ॥ ( अथर्व० ११/५/६ ) अनुष्ठान कर धर्म और ब्रह्म-ज्ञान के द्वारा उत्कर्ष को प्राप्त करता है । ब्रह्मचारी शब्द की व्युत्पत्ति यह है- ब्रह्म अर्थात् वेद, वेद के अध्ययन के लिये किया जाने वाला व्रत भी ब्रह्म ही कहलाता है, इसके अध्ययन में, आचरण में, पालन मे जो निरन्तर लगा रहता है, उसको ब्रह्मचारी कहते है । ' पूर्वी जात.' इसका अभिप्राय यह है कि इस सारे जगत् के कारणभूत, अन्य ज्ञान आदि लक्षण वाले ब्रह्म से ही सबसे पहले ब्रह्मचारी की, ब्रह्मचारी के रूप में रहकर वेदाध्ययन आदि तप का अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण के सर्वस्व ब्रह्मात्मक वेद की उत्पत्ति, अर्थात् प्रादुर्भाव हुआ । वेद यद्यपि नित्य हैं, तो भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए अध्ययन करने से ही व्यावहारिक जगत् मे इसका प्रादुर्भाव माना जाता है । वेद में प्रतिपादित अग्नि प्रभृति देवगण अमरता के प्रतिपादक अपने उपभोग्य स्वर्ग आदि लोकों और उनमें रहने वाले दिव्य विषयों के साथ उत्पन्न हुए । वेद का अध्ययन, उनके अर्थ के अनुसार धार्मिक कृत्यों का सपादन, इसी तरह के कर्मो से देवगण प्रसन्न होते हैं, तृप्त होते हैं, बल प्राप्त करते है । इसीलिये गीता मे कहा गया है कि देवगण और मनुष्यगण एक दूसरो का परस्पर उपकार करते हुए ही कल्याण को प्राप्त करेगे । प्रथम उत्पन्न होने से ही यहाँ पर ब्रह्मचारी को सर्वश्रेष्ठ माना गया है । इस मन्त्र की व्याख्या दयानन्द ने इस तरह से की है--'जो ब्रह्मचारी पूर्व पढ के ब्राह्मण होता है, वह धर्मानुष्ठान से अत्यन्त पुरुषार्थी होकर सब मनुष्यों का कल्याण करता है । फिर उस विद्वान् ब्राह्मण को, जो कि अमृत अर्थात् परमेश्वर की पूर्ण भक्ति और धर्मानुष्ठान से युक्त होता है, देखने के लिये सब विद्वान् आते है ' ( पृ० २७५ ), किन्तु यह व्याख्या सही नही है, क्योकि इसमें विरोध है । जैसे ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर या विद्या तो सभी के लिये उत्कृष्ट है । चाहे वह गृहस्थ हो या वानप्रस्थ अथवा यति हो, परमेश्वर या विद्या तो सभी के लिये सर्वश्रेष्ठ है, तब इसका सम्बन्ध केवल ब्रह्मचारी से कैसे जोड़ा जा सकता है? इसी तरह ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्म-वेत्ता के प्रसिद्ध होने पर, इस कथन में पुनरुक्ति दोष है । देव का अर्थ विद्वान् करना भी लोक प्रसिद्धि के विरुद्ध है । मनुष्यों से देवताओं कीपृथक स्थिति अनेक प्रमाणों से सिद्ध की जा चुकी है । अमृत पद का अर्थ परमेश्वर या मोक्ष करना भी लक्षणा दोष से दूषित माना जायेगा, क्योंकि अमृत पद का मुख्य अर्थ स्वर्ग प्रभृति यहाँ किसी प्रकार से बाधित नही है । मोक्ष के ज्ञान का और परमानन्द का सामानाधि-करण्य भी कैसे बन सकता है? क्योकि इनकी स्थिति तो अलग अलग हैं, वे एक जगह विद्यमान नही है, इसलिये इनका सामानाधिकरण्य बन ही नहीं सकता | इसके आगे दयानन्द ने ब्रह्मचर्य आश्रम के समर्थन में और ब्रह्मचर्य का स्वरूप बताने के लिये पाँच ऋचाएँ उद्धृत की है । उनमें से पहली 'ब्रह्मचार्येति समिधा०' यह पहला मन्त्र है । इसका अर्थ सनातन परम्परा के अनुसार यह होगा-- समिघा अर्थात् प्रातःकाल

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वेदार्थपारिजाता १४८४ समिधा सायंप्रातराधीयमानया तज्जनितेन तेजसा समिद्धः सम्यग्दीप्त. काष्णं कृष्णमृगसम्बन्ध्यजिनं वसानो धारयन् दीक्षितो भिक्षाचरणादिभिर्नियमैर्नियन्त्रित, गायत्रीब्रह्मचर्यादिदीक्षा सञ्जाताऽस्येति वा दीक्षितः । दीर्घश्मश्रुः दीर्घे रायते. श्मश्रुभिर्मुखकेशैर्युक्त सन् ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यधर्मेण युक्तः, एति वर्तते । स ब्रह्मचारी सद्य शीघ्रं पूर्वस्मात् समुद्राद् उत्तरम् उत्तरदिग्गत समुद्रमेति गच्छति, तपसो महिम्ना व्याप्नोतीत्यर्थः, अन्यादृशस्य समुद्रगमनस्यासङ्गतत्वाद् अप्रकृतप्रक्रियापाताञ्च । तथा लोकान् सर्वान् पृथिव्यन्तरिक्षादीन् सगृह्य हस्ते धृत्वा मुहुरत्यर्थम् आचरित् आभिमुख्येन करोति । सर्वे लोका अस्यायत्ता भवन्तीत्यर्थः । करोतेर्यङ्लुगन्ताल्लङि रूपम् । यत्तु-'समिधा विद्यया समिद्ध. प्रकाशित ' इत्युक्तम्, तदपि न सङ्गतम्, समित्पदस्य प्रसिद्धार्थत्यागे कारणा- भावात् । यदपि 'दीर्घकालपर्यन्तकेशश्मश्रूणि धारितानि येन स ' इति, तदपि न युक्तम्, दीर्घशब्दस्य श्मश्रुविशेषणत्वे सम्भवत्यनुपस्थितकालविशेषणत्वे मानाभावात् । मुख्यार्थत्वे सम्भवति लक्षणाश्रयणायोगाच्च । एति आनन्दं प्राप्नोतीत्यप्य-सङ्गतम्, आनन्दपदाध्याहारापेक्षया एनीत्यस्य वर्तत इत्यर्थस्यैव युक्तत्वात् धातूनामनेकार्थत्वस्य प्रसिद्धेः । यत्तु पूर्वस्माद् ब्रह्मचर्यानुष्ठानभूतात् समुद्राद् उत्तर गृहाश्रमसमुद्रमित्यर्थमुक्तवान् सोऽप्यर्थोऽसङ्गत, लक्षणाश्रयणप्रसङ्गात् । ब्रह्मचारिणो माहात्म्यप्रसङ्गे गृहाश्रमगमनोत्तेविरुद्धत्वात् । सद्य इत्यस्य तत्रास्वारस्यात् । 'दीर्घकालं ब्रह्मचर्यम्' इति शास्त्रविरोधाच्च । यच्च —निवासयोग्यान् सर्वान् लोकान् सगृह्य मुहुर्वार वार धर्मोपदेशमेव करोतीति तदपि विरुद्धम् ब्रह्मचर्यवेदाध्ययन-परायणस्य उपदेशे प्रवृत्त्यसम्भवात् । स्नानोत्तरकालस्यैव प्रवचनोपदेशादिकालत्वात् । न च करोतेरुपदेशार्थत्वं सम्भवति, और सायंकाल आधीयमान समिधा से, अर्थात् नियमित समिधा के आधान से उत्पन्न इस तेज से तेजस्वी, कृष्णमृग के चर्म को धारण करने वाला, भिक्षाचरण आदि नियमो के पालन करने से नियन्त्रित आचरण वाला । अथवा दीक्षित शब्द का यह भी अर्थ किया जा सकता है कि जिसको गायत्री के जप करने की और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने की दीक्षा प्राप्त हो गयी है, ऐसा ब्रह्मचारी डाढी-मूछ बढ़ाकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए अपना जीवन वेदाध्ययन को ही समर्पित कर देता है । वह ब्रह्मचारी शीघ्र ही पूर्व समुद्र से लेकर पश्चिमसमुद्र पर्यन्तपर्यन्त सर्वत्रसर्वत्र व्याप्तव्याप्त होहो जाताजाता हैहै,, तपतप के प्रभाव से सर्वत्र प्रसिद्ध हो जाता है । इससे भिन्न अर्थ निकाल कर इसमें से समुद्र यात्रा की बात नही निकाली जा सकती, क्योंकि उसका यहां न कोई प्रसंग है और न उसका प्रकृत मे कोई उपयोग ही है । यह तो अप्रकृत वस्तु का उल्लेख शब्दन्याय से सदोष ही माना जायगा । सभी पृथिवी, अन्तरिक्ष आदि लोको को वह अपने ,,हाथ में समेट लेता है अर्थात् इन सब लोगो को वह उसी तरह से अपने वश में कर लेता है जैसा कि कोई व्यक्ति अपने हाथ में आई वस्तु का यथेष्ट उपयोग करता है । अर्थात् सारे लोक इसके वश में हो जाते है । कृन् धातु से यङ्लुगन्त प्रक्रिया से लङ् लकार का यह रूप बनेगा । दयानन्द ने 'समिधा अर्थात् विद्या के ज्ञान से प्रकाशित' ( पृ० २७४ ) यह अर्थ किया है, किन्तु यह सही नही है, क्योंकि समिधा शब्द के प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ने में कोई कारण नजर नही आता । आगे दयानन्द ने लिखा है-' दीर्घकाल तक बड़े बड़े केश श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होकर विद्या को प्राप्त होता है' ( पृ ० २७४ ), किन्तु यह अर्थ भी ठीक नही है, क्योंकि दीर्घ शब्द को श्मश्रु का विशेषण तो बनाया जा सकता है, किन्तु अनुपस्थित काल का विशेषण उसे कैसे बनाया जा सकता है? जब पुरुष अर्थ को ग्रहण करने से भी अर्थ में कोई असंगति नही होती, तो फिर लक्षणा का सहारा लेने की क्या आवश्यकता है । परमानन्द को प्राप्त करता है, यह अर्थ भी सही नही है, क्योकि 'आनन्द' पद का अध्याहार करने की अपेक्षा 'एति' पद का अर्थ 'वर्तमान है' यही करना ठीक होगा, क्योकि एक ही धातु के अनेक अर्थ हो सकते हैं । 'पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उत्तर के उत्तर समुद्र स्वरूप गृहस्थाश्रम को प्राप्त होता है' ( पृ ० ३७४ ) यह अर्थ भी असंगत है, क्योंकि ऐसा अर्थ करने के लिये लक्षणा का सहारा लेना पड़ेगा । ब्रह्मचारी का जहा महत्त्व बताया जा रहा है, उस प्रसंग में गृहस्थाश्रम की चर्चा करना अप्रासंगिक भी है । सद्यः अर्थात् तत्काल अर्थ को सूचित करने वाला यह पद इसमें बाधक भी होगा, क्योंकि शास्त्रों में बताया गया है कि ब्रह्मचर्य व्रत का अनुष्ठान लम्बे समय तक करना पडता है । यही पर दयानन्द ने कहा है कि निवास योग्य सभी लोकों का संग्रह कर बार बार धर्म का हो उपदेश करता है, किन्तु यह कथन भी विरुद्ध है, क्योंकि ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए जो व्यक्ति अध्ययन में लगा हुआ है, उसकी उपदेश करने में प्रवृत्ति नहीं होगी । स्नातक होने के बाद ही वह प्रवचन करने और उपदेश देने का अधिकारी होता है । करोतिधातु

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वेदार्थ पारिजाता १४८६ प्रसिद्धिविरोधात् । निवासयोग्यो लोकस्तु जडो भवति । न च तस्योपदेश सम्भवति । सगृभ्येत्यस्य त्वर्थो नोक्त एव । तस्मात् सायणानुसारी पूर्वोक्त एवार्थी युक्त । 'ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोक प्रजापति परमेष्ठिन विराजम् । गर्भो भूत्वाऽमृतस्य योनाविन्द्रोह भूत्वाऽ- सुरास्तनर्ह ||' ( अथर्व० ११।५ / ७) पूर्वोक्तो ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यमहिम्ना ब्रह्म ब्राह्मणजातिम् अप स्नानपानाद्यर्था गङ्गाद्या नदी', आत्मन. फलभूत स्वर्गादिलोकं प्रजापति प्रजाना स्रष्टारम् अवान्तरसृष्टिकर परमेष्ठिन परमे उत्कृष्टे सत्यलोके तिष्ठतीति परमेष्ठी तम् आदिब्रह्माणम्, विराज स्थूलप्रपञ्चशरीराभिमानिनम् ईश्वर च जनयन् वर्तते । स्वस्वकारणादुत्पद्यमानानामेषा समेषा ब्रह्मचर्यमेव निमित्तकारणमिति तदाश्रयभूतो ब्रह्मचार्येव । जनयन्नित्युपचार. | अमृतस्य अमरणशीलस्य ब्रह्मणः सम्बन्धिन्या योनौ सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिकाया प्रकृतौ प्रथम ब्रह्मचारी गर्भो भूत्वा तपोबलादिन्द्रत्व प्राप्य असुरान् सुखविरोधिनो दैत्यान् ततर्ह जघान । (तह हिसि हिसायाम्) । इत्थ सर्वजगत्कारणत्वेन तत्स्तुति. । यदुक्तम्-'स ब्रह्मचारी ब्रह्म वेदविद्या पठन् ( अप ) प्राणान् (लोक ) दर्शन ( परमेष्ठिन प्रजापति विराज परमेश्वर जनयन् प्रकटयन् ( अमृतस्य) मोक्षस्य योनौ विद्याया गर्भो भूत्वा गर्भवन्नियमेन स्थित्वा यथावद्विद्या गृहीत्वा (इन्द्रो ह भूत्वा ) सूर्यवत्प्रकाशक सन् ( असुरान् ) दुष्टकर्मकारिणो मूर्खान् पाखण्डिनो जनान् दैत्यरक्ष. स्वभावान् ( ततर्ह) तिरस्करोति, सर्वान्निवारयति । यथेन्द्र सूर्योऽसुरान् मेघान् रात्रि च निवारयति तथैव ब्रह्मचारी सर्वगुणप्रकाशको शुभगुणनाशकश्च भवति' ( पृ ० २७३ ) इति, तत्तु मुख्यार्थबहिर्भूतं गौणार्थकमेव व्याख्यानम् । वेदविद्यापठनेन प्राणाना परमेष्ठिनो विराजश्च कथं जनन सम्भवति? न च वेदपठनेन प्राणदर्शनपरमेष्ठिविराजा ज्ञानमेव जननमिति वाच्यम्, तथात्वे घटादिज्ञानेन ( ) घटादिजनकत्वव्यवहारापत्तेः । नान्यादृश प्रकटनमपि सम्भवति । पठन्निति पद तु मूले मन्त्रे नास्त्येव । ब्रह्म जनयन्नित्यन्वयोपपत्तौ पठन्निति क्रियापदाध्याहारोऽपि निर्मूल एव । मोक्षस्य योनौ विद्याया गर्भभवनमित्यपि न युक्तम्, का अर्थ उपदेश करना होगा भी नही, क्योकि इसमें प्रसिद्धि का विरोध है । निवास के लायक लोक तो जड होता है, उसको उपदेश नही दिया जा सकता । संगुभ्य' पद का अर्थ यहाँ नही बताया गया है, इसलिये इस मन्त्र का हमारे द्वारा प्रदर्शित सायण संमत अर्थ ही सही हो सकता है इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह होगा - पूर्वोक्त ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ब्राह्मण जाति को, स्नान- ।' ' - ब्रह्मचारी ०पान आदि के लिये गंगा प्रभूति नदियों को, अपने शुभ कर्मों के फल भूत स्वर्गादि लोक को, प्रजाओ के स्रष्टा, अवान्तर सृष्टि के कर्ता प्रजापति को, परम उत्कृष्ट सत्यलोक में रहने वाले परमेष्ठी को और स्थूल प्रपंच में अपने शरीर का अभिमान रखने वाले ईश्वर को भी उत्पन्न करने समर्थ है, अर्थात् अपने अपने कारणों से उत्पन्न होने वाले इन सब पदार्थों में निमित्तकारण के रूप में सर्वत्र ब्रह्मचारी की स्थिति रहती है । अतः वही इनको उत्पन्न करता है, इस तरह से लाक्षणिक प्रयोग कर दिया जाता है । अमरणशील ब्रह्मसबन्धी योनि में, सत्त्व, रज और तमोगुणात्मिका प्रकृति में पहले ब्रह्मचारी गर्भ के रूप में प्रविष्ट होकर अर्थात् तप के बल से इन्द्रत्व को प्राप्त कर असुरो को, सुख के विरोधी दैत्यों को मार डालता है । 'तुह' धातु हिंसा के अर्थ मे होता है । इस प्रकार सारे जगत् के कारण के रूप में इस मन्त्र में ब्रह्मचारी की स्तुति की गई है । दयानन्द ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है - 'वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जानकर प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर, जो कि सबसे बड़ा और सबका प्रकाशक है, उसको जानता है और इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त होकर असुर अर्थात् मूर्खो की अविद्या का छेदन कर देता है' ( पृ० ३७४ ) । इस अर्थ का मन्त्र के मुख्य पदो से कोई संबन्ध नही है, गोण अर्थ करके ही ऐसा कहा जा सकता है । वेदविद्या के पढने से प्राण, परमेष्ठी और विराट की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? वेद के पढने से प्राण का दर्शन तथा परमेष्ठी और विराट का ज्ञान होता है और इस ज्ञान की उत्पत्ति को ही इनकी उत्पत्ति मान लिया जाता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर घट आदि के ज्ञान से भी घट आदि की उत्पत्ति होने लगेगी । किसी दूसरी तरह का प्राकट्य भी यहां नहीं हो सकता । 'पठन्' यह पद मूल में है ही नही । ब्रह्मचारी पद का जब 'ब्रह्म जनयन्' इन पदों से अन्वय बन ही जाता है, तब ' पठन्' इस क्रिया के अधीन घट का कोई प्रयोजन भी नही है, अतः इसका अध्याहार करना सर्वथा निराधार है ।

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वेदार्थपारिजात। III तं रात्रीस्ति उदरे बिभर्तीति पूर्वमन्त्रेणोक्तमेवेति पौनरुक्त्यापातात् । मोक्षयोनिस्तु ब्रह्मविद्या भवति न विद्यामात्रम् । इन्द्रासुरशब्दयोरपि प्रसिद्धार्थत्यागो गौणार्थाश्रयण च निर्मूलमेव । दैत्यरक्षसामसत्त्वे दैत्यरक्ष. स्वभावानिति कथनमपि किमाश्रयं स्यात्? असुररक्षोजात्यभावे तत्स्वभावोक्त्यसङ्गते । तस्मात् सायणसम्मतव्याख्यानमेव विजयते । स्वस्वकारणा- देव लोकादीनामुत्पत्तावपि ब्रह्मचर्यादिलक्षण तपस्त्वेषा निमित्तमेव । तपस्तप्त्वा परमेश्वरः सर्वमसृजदिति तत्र तत्रोक्ते. । तदाश्रयत्वादेव ब्रह्मचारिणः स्तुत्यर्थ सर्वकारणत्वोक्ति । अमृतपदेनाप्यमरणशील ब्रह्मैव ग्राह्यम्, अमृतस्य पुत्रा इत्यादौ तथा प्रयोगदर्शनात् । तत्सम्बन्धिनी योनिश्च प्रकृतिरेव, 'मम योनिर्महद् ब्रह्म' (भ० गी० १४| ३ ) इति गीतावचनात् । ब्रह्मचर्यविशिष्टश्वेतनो ब्रह्मचारी प्रकृतौ गर्भो भूत्वा प्रकृत्यवच्छिन्न ईश्वरो भूत्वा ब्रह्मादिविराडन्तानुत्पाद्य स एवेन्द्रो भूत्वा वृत्रादीन् जघान । आधिभौतिकादिदृष्ट्या स एव सूर्यो भूत्वा मेघानन्धकारानपि निहन्त्येव । 'ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्र विरक्षति । आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते || ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् । अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घास जिगीषति ॥ ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत । इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरत् ॥ ' ( अथर्व० ११।५ । १७-१९) ब्रह्म वेदस्तदध्ययनार्थं चर्यमाचर्यं समिदाधानभैक्षचर्योर्ध्वरेतस्कत्वादिकं ब्रह्मचारिभिरनुष्ठीयमान कर्म ब्रह्मचर्य तेन ब्रह्मचर्येण तत्कृतेनोपवासादिव्रतनियमेन च राजा राष्ट्रं स्वकीय विरक्षति विशेषेण पालयति । यस्य राज्ञो जनपदे ब्रह्मचर्येण युक्ता पुरुषास्तपश्चन्ति तदीय राष्ट्रमभिवर्धत इत्यर्थः । यद्वा राज्ञः कर्तव्यत्वेन कालविशेषेषु श्रुतिस्मृत्युदितं ब्रह्मचर्यं तपोऽनुष्ठानं राजा तेनैव ब्रह्मचर्येण तपसा राष्ट्रं पालयति । न केवल सेनाऽऽरक्षिन्यायालयैरेव राष्ट्रपालन सम्भवति, तैराधिदैविकाद्युपद्रवनिराकरणासम्भवात् । 'शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धि. । ऊनं न सत्त्वेष्वधिको ' मोक्ष की योनि विद्या में गर्भ होना' यह अर्थ भी सही नही है, यह बात तो 'उसको तीन रात तक उदर में धारण करता है' इस तरह से इससे पहले के मन्त्र मे बता ही दो गई है । पुनः यहा उसी बात को दुहराने पर पुनरुक्ति दोष हो जायगा । मोक्ष की योनि केवल ब्रह्मविद्या ही हो सकती है, सभी विद्याओ मे यह लक्षण नही घटित हो सकता । इन्द्र और असुर पदो का भी मनुष्य अर्थ छोडकर गोण अर्थ करने में कोई प्रमाण नही है । दैत्य और राक्षसों के अभाव में दैत्य और राक्षसो सरीखे व्यवहार वाले व्यक्तियों की बात उठाने का क्या तुक हो सकता है? जब असुर और राक्षस नाम की जातियाँ हो आप नही मानते, तो इन जातियो के स्वभाव की चर्चा करना कैसे संगत माना जा सकता है । इस तरह से इस मन्त्र का भी सायणसंमत अर्थ ही सही माना जा सकता है । यद्यपि सभी लोको की उत्पत्ति अपने अपने कारणो से ही होती है, किन्तु ब्रह्मचर्य आदि तप उनका निमित्तकारण हो ही सकता है । तप करके ही परमेश्वर ने इस सृष्टि की रचना की, यह बात शास्त्रों में स्थान स्थान पर बताई गई है । ब्रह्मचारी भी उस तप का आचरण करता है । इसलिये इस तप के आचरण के निमित ब्रह्मचारी की स्तुति की जाय, यह उचित ही है । अमृत पद से भी अमरणशील ब्रह्म का ग्रहण करना ही ठीक है, क्योकि ' अमृतस्य पुत्राः' इत्यादि श्रुतियो में इस तरह का प्रयोग मिलता है । उस ब्रह्म से संबद्ध योनि प्रकृति ही है, क्योकि भगवद्गीता में यही बताया गया है । ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला ब्रह्मचारी प्रकृति में गर्भ होकर, अर्थात् प्रकृति में ईश्वर के रूप में प्रविष्ट होकर ब्रह्मा से लेकर विराट् पर्यन्त सभी को उत्पन्न करता है और वही इन्द्र का रूप धारण कर वृत्रासुर को मारता है । आधिभौतिक दृष्टि से वही सूर्य बनकर मेघो का और अन्धकार का नाश करता है । 'ब्रह्मचर्येण' इत्यादि तीन मन्त्रो का क्रमशः इस प्रकार अर्थ किया जाता है - ब्रह्म अर्थात् वेद का अध्ययन करते समय आचरणीय समिदाधान, भिक्षाचर्या, ऊर्ध्वरेतस्कता आदि कर्म भी ब्रह्मचर्य के नाम से कहे जाते हैं । उस ब्रह्मचर्य का पालन करने से, उपवास, व्रत आदि का पालन करने से, राजा अपने राष्ट्र की विशेष रूप से रक्षा कर सकता है । जिस राजा के राज्य में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले पुरुष तपस्या करते रहते है, उसका राष्ट्र सब तरह से संपन्न होकर उन्नति करता रहता है । अथवा स्मृतियों और श्रुतियों में समय समय पर राजा के ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का निर्देश किया गया है । अपनी इस तपस्या से ही राजा अपनेराष्ट्र की रक्षा कर सकता है, केवल सेना, पुलिस अथवा न्यायालय से वह अपने देश की रक्षा नही कर पाता, क्योकि ये सब देवी प्रकोप को शान्त करने में कभी समर्थ नही हो सकते । जैसा महाकवि कालिदास की सूक्ति में वर्णन मिलता है -'वन में लगी आग बिना

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वेवार्थपारिजाता IIII बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥ ' (२० वं० २।१४), 'अकार्यचिन्तासमकालमेव प्रादुर्भवंश्चापधरः पुरस्तात् । अन्तः- शरीरेष्वपि य. प्रजाना प्रत्यादिदेशाविनय विनेता ॥ ' ( २० व ० ६ । ३ ९ ) इति महाकवि सूक्तिभ्यः । आचार्योऽपि ब्रह्मचर्येण नियमेन ब्रह्मचारिण शिष्यमिच्छते आत्मनोऽभिलषति । ब्रह्मचर्यनियमस्थ तत्प्रभावेण विद्यातपोयुक्तमेवाचार्य शिष्या उपगच्छन्ति । 'इषु इच्छायाम्' इति धातो 'इषुगमियमा छ ' ( पा० सू० ७।३।७७) इत्यनेन छत्वम् । 'आचिनोति च शास्त्रार्थ- माचारे स्थापयत्यपि । स्वयमाचरते यस्मात्तस्मादाचार्य उच्यते || ' (वायुपुराणे), 'आचार्य कस्मादाचार ग्राहयत्याचिनोत्यर्था - नाचिनोति बुद्धिमिति वा' (नि० १४ ) | ब्रह्मचर्यमन्तरा वेदाध्ययनवेदार्थज्ञानतदाचरणशास्त्रार्थसङ्कलनाचारव्यवस्थापनाद्य- सम्भवेन ब्रह्मचर्यनिष्ठस्यैवाचार्यत्वसम्भवात् । कन्या अनूढा स्त्री ब्रह्मचर्येण इन्द्रियनिग्रहलक्षणेन युवान यौवनोपेतं पति विन्दते । अनड्वानपि अनो वहन् पुङ्गवो ब्रह्मचर्येणोर्ध्वरेतस्कत्वादिना धर्मेण शकटवहनादिस्वकार्य निर्वर्तयन् धुरि नियुज्यते । तथाश्वो ब्रह्मचर्येण घास भक्षणीयं तृणादिकं जिगीषति भक्षयितुमिच्छति । यत्तु कन्या युवतिरिति व्याख्यानम्, तन्न युक्तम्, धर्मशास्त्रेषु रजोदर्शनात् प्रागेव विवाहविधानात् । यदपि---' अनड्वानित्युपलक्षण वेगवता पशूनाम्' इति, तन्न, तथात्वेऽश्वपदवैयर्थ्यात् । यदप्युक्तम्— 'पशवोऽश्वश्च घासं यथा तथा कृतेन ब्रह्मचर्येण स्वविरोधिनो जिगीषन्ति जेतुमिच्छन्ति' इति, तदपि न सङ्गतम्, सायणादि- ' ' रीत्या जिगीषतीति पाठस्य साम्प्रदायिकत्वेन जिगीषन्तीति पाठानुपपत्ते । दयानन्दीयपुस्तकेष्वपि जिगीषति इत्येकवचनान्तपाठः, अतो जिगीषन्तीति पाठानुपपत्ति । यत्तु कश्विदनेन मन्त्रेण कन्याना वेदाध्ययन साधयति, तदपि मन्दम्, तथात्वेऽनडुदश्वादीनामपि वेदाध्ययनविधानापत्ते । दृष्टि के ही शान्त हो गई, पेडो पर फल और पुष्प लदे हुए थे, कोई बलवान् प्राणी निर्बल को कष्ट नही पहुँचाता था, जब कि वह राजा दिलीप बसिष्ठ की धेनु सुदक्षिणा की सेवा में लगकर वन में विचरण करता था', 'किसी भी व्यक्ति के मन में कोई बुरा भाव आने के साथ ही धनुष- बाण हाथ मे लिये यह राजा उसकी आखों के सामने नाचने लगता था । यह विजयी राजा अपने प्रजा के मन को भी अनुशासित करने में समर्थ हो गया था । आचार्य भी ब्रह्मचर्य के नियमो का पालन करता हुआ ही ब्रह्मचारी शिष्य को प्राप्त कर सकता है, अर्थात् ब्रह्मचर्य व्रत का नियम पूर्वक पालन करने वाले विद्या और तप के उत्कर्ष के कारण तेजस्वी आचार्य के पास ही शिष्य अध्ययन के लिये आते हैं । वायुपुराण में आचार्य का लक्षण यह किया गया है - 'जो शास्त्र का भलीभांति अध्ययन करता है, अपने शिष्य को आचार के पालन में भलीभांति नियोजित करता है और स्वयं भी उन नियमो का पालन करता है, उसे आचार्य कहते हैं' । निरुक्त में भी बताया गया है-'इसको आचार्य क्यो कहते है? इसलिये कहते है कि यह अपने शिष्यो को आचार का उपदेश करता है, शास्त्रो के अर्थों का चयन करता रहता है, अथवा शिष्य की बुद्धि का विस्तार करता रहता है' । ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किये बिना वेदाध्ययन, वेदार्थ का ज्ञान, वेदार्थ का अनुष्ठान, शास्त्रार्थ का संकलन, शिष्य को सदाचार मे लगाना आदि अर्थ पूरे नही हो सकते । इसलिये आचार्य की भी ब्रह्मचर्य में निष्ठा अत्यन्त आवश्यक है । कुमारी कन्या इन्द्रियों को अपने वश में करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती हुई योवन भरे पति को प्राप्त करती है । बैल भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के कारण ही गाडी, रथ आदि में आगे जोता जाता है । इसी तरह से घोडा भी ब्रह्मचर्य के कारण ही स्वादिष्ट घास के खाने का अधिकारी होता है । कन्या का अर्थ युवती करना ठीक नही है, क्योंकि धर्मशास्त्रों में रजोदर्शन से पहले हो विवाह कर देने की बात कही गई है । इसी तरह से ' अनड्वान्' शब्द को वेगवान् सभी पशुओ का द्योतक मानना भी ठीक नही है, क्योंकि ऐसा मानने पर आगे 'अश्व ' का अलग से उल्लेख करना व्यर्थ हो जायगा । ' पशु और अश्व को पूरी जवानी पर्यन्त ब्रह्मचर्यं अर्थात् सुनियम में रखा जाय तो अत्यन्त बलवान् होकर निर्बल जीवों को जीत लेता है' ( पृ ० २७४ ) यह अर्थ भी असंगत है, क्योंकि सायण आदि के मत से 'जिगीषति' पाठ है, अतः साम्प्रदायिक पद्धति। के अनुसार यहा 'जिगोषति' ऐसा पाठ मान्य नहीं हो सकता । दयानन्द संमत पुस्तको में भी 'जिगोषति' यह एकवचनान्त पाठ ही है अतः 'जिगीषति' यह बहुवचनान्त पाठ कभी ठीक नहीं माना जा सकता । कुछ लोग इस मन्त्र की सहायता से कन्याओं के वेदाध्ययन की बात सिद्ध करते हैं, किन्तु यह गलत है, क्योंकि ऐसा -मानने पर बैल, घोडा बादि के भी वेदाध्ययन की बात इसी मन्त्र से सिद्ध होने लगेगी । 1

पृष्ठ 590

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 590 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थ पारिजातः १४८८ ब्रह्मचर्येण तपसा ब्रह्मचर्यात्मकेन तपसाऽग्न्यादयो देवा मृत्यु मरणमपाघ्नत अपहतवन्तः । इन्द्रोऽपि ब्रह्मचर्येणैव साधनेन देवेभ्यो देवानामर्थे स्वः स्वर्गमाभरत् आहरत् । यत्तु 'देवा विद्वासो ब्रह्मचर्येण वेदाध्ययनेन ब्रह्मविज्ञानेन तपसा धर्मानुष्ठानेन च मृत्युं मृत्युप्रभवं दुःखमुपाघ्नत नित्य घ्नन्ति नान्यथा' इति, तदपि तुच्छम् अनुपपत्ते । वेदाध्ययनमन्तरा 1 विद्वत्त्वमेव कथम्? विद्वत्त्वं चेत्कुतो वेदाध्ययनापेक्षा? न च सामान्यज्ञानवत्त्वमेव विद्वत्त्वम्, तथात्वे साम्प्रतिकाना जनानामपि विद्वत्त्वमेव, तथा सति मनुष्यत्वदेवत्वभेदस्य निर्मूलत्वमेव स्यात् । देवाना मनुष्येभ्यो भिन्नत्व पूर्वं साधितमेव । अनेनापि 1 वेदवचनेन देवाना मनुष्यभिन्नत्वमेव सिद्धयति । यदप्युक्तम्—'ब्रह्मचर्येण सुनियमेन यथेन्द्र सूर्यो देवेभ्य इन्द्रियेभ्य स्व सुख प्रकाशं चाभरत्' इति, तदपि तुच्छम् त्वद्रीत्या सूर्यस्य जडत्वेन तत्रेन्द्रियनिग्रहलक्षणस्य ब्रह्मचर्यस्यासम्भवात् । सुखमपि नेन्द्रियाणा सम्भवति, तेषा करणत्वेन कुठारादिवज्जडत्वाविशेषात् । ब्रह्मचर्यानुष्ठानपूर्वका एव त्रय आश्रमाः सुखमेधन्त इति तु युक्तमेव । ' यद्ग्रामे यदरण्ये यत्तभाया यदिन्द्रिये । यदेनश्चकृमा वयमिद तदव यजामहे स्वाहा ॥ ४॥ देहि मे ददामि ते

नि मे धेहि नि ते दधे । निहार च हरासि मे निहार निहराणि ते स्वाहा || ' (वा० स० ३।४५, ५० ) मारुत्यनुष्टुप् । ग्रामे वसन्तो वय यदेन पाप ग्रामोपद्रवरूप चकृम कृतवन्तः, तथा अरण्ये यन्मृगादिहिसारूपं ,, चक्रम तथा सभाया स्थिता यन्महाजनतिरस्कारादिकमेन कृतवन्त तथेन्द्रिये जिह्वोपस्थपारवश्येन कलञ्जभक्षणं 1 परस्त्रीगमनादिक चकम, तथान्यत्रापि भृत्यस्वाम्यादौ यदेन. ताडनावज्ञादिकं चक्रम, तदिद सर्वमेनः पापमवयजामहे 1 1 विनाशयामः । अवपूर्वस्य यजेर्नाशार्थकत्वात् । स्वाहा एतद्धविर्देवतायै पापविनाशिन्यै दत्तमस्तु । मन्त्रेणानेन पत्नी 1 दक्षिणाग्नौ करम्भपात्राणि जुहोति, 'शूर्पेण मूर्धनि कृत्वा दक्षिणेऽग्नौ प्रत्यङ्मुखौ जायापती वा दक्षिणेनाहृत्य तीर्थेन पूर्वेण वेदिमपरेण वा यद्ग्राम इति' (का० श्री० सू० ५।५।११ ) इति वचनात् । यवपिष्टेन निर्मितानि सन्तानपरिमितान्येकाधिकानि " वर्तुलानि करम्भपात्राणि तानि शूर्पेण पत्नी दक्षिणाग्नौ जुहोतीत्येकः पक्षः । दम्पती द्वौ वा जुहुयातामित्यपरः पक्षः । ब्रह्मचर्य के पालन रूप तप से अग्नि प्रभृति देवगणो ने मृत्यु को मार डाला है, अपने पास नहीं फटकने दिया है । इन्द्र भी ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही देवताओं के लिये स्वर्ग को ले आया है । 'ब्रह्मचर्य और धर्मानुष्ठान से ही विद्वान् लोग जन्म- मरण को जीतकर मोक्षसुख को प्राप्त करते हैं' ( पृ० २७४) दयानन्द की यह व्याख्या ठीक नही है, क्योकि ऐसा बन ही नही सकता । वेदाध्ययन के बिना विद्वत्ता कैसे आ सकती है, यदि विद्वत्ता अपने आप आती है, तो फिर वेदाध्ययन को क्या आवश्यकता है? सामान्य ज्ञान से कोई विद्वान् नही कहलाता, क्योकि ऐसा मानने पर तो आजकल के सामान्य ज्ञान वाले मनुष्य भी विद्वान् माने जायेंगे । इस तरह से मनुष्यत्व और देवत्व का भेद सर्वथा निराधार मान लेना पडेगा । हमने तो देवताओ की मनुष्यों से भिन्नता पहले ही सिद्ध कर ली है । इस वेद मन्त्र से भी देवो की मनुष्यो से भिन्नता हो सिद्ध होती है । 'जैसे इन्द्र अर्थात् सूर्य परमेश्वर के नियम में स्थित होकर सब लोको का प्रकाश करने वाला हुआ है' ( पृ० २७४ ) यह कथन भी गलत है, क्योकि आपके मत से तो सूर्य जड़ हैं, वहाँ इन्द्रिय निग्रह से सम्पन्न होने वाला ब्रह्मचर्य कैसे रह सकता है । सुख भी इन्द्रियो को नही मिल सकता है, क्योकि करण (साधन ) होने से वे भी कुल्हाड़ी आदि की तरह जड़ ही है । यतः यहाँ प्रासंगिक अर्थ यही उचित माना जायगा कि ब्रह्मचर्य के अनुष्ठान मे निष्ठापूर्वक लगे हुए अन्य तीन आश्रम सुखपूर्वक फलते -फूलते हैं । ' यद् ग्राम' इस मन्त्र में मारुती अनुष्टुप् छन्द है । ग्राम में रहते हुए हमने जो उपद्रव मारपीट आदि पाप किया है, वन में रहते हुए हमने जो मृग आदि पशुओं की हिंसा करके पाप इकट्ठा किया है, सभा में रह कर हमने महान् पुरुषो का जो तिरस्कार किया है, तथा जिल्ह्वा और उपस्थ इन्द्रिय के परवश हो हमने जो अभक्ष्यभक्षण और अगम्यागमन किया है, इसी तरह से अन्यत्र भी नोकर या मालिक की ताडना अथवा अवज्ञा करके जो पाप इकठ्ठा किया है, उस सारे पाप को हम नष्ट कर दे रहे हैं । अब उपसर्ग के साथ यज् धातु के अर्थ में प्रयुक्त होता है । स्वाहा पद का अर्थ है कि यह हवि पाप का नाश करने वाली देवता को प्राप्त हो । इस मन्त्र से पत्नी दक्षिणाग्नि में करम्भ पात्रों की आहुति देती है । कात्यायन श्रौतसूत्र में इस मन्त्र का यही विनियोग बताया गया है । जो के आटे