वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 591–600
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 591–600
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वेदार्थपारिजातः IIII — ' एतेषु गृहाश्रमविधान क्रियते । यदुक्तम् ग्रामे गृहाश्रमे वय विद्याप्रचारं सन्तानोत्पत्त्युत्तममामाजिकनियमं सर्वोपकारकं तथारण्ये वानप्रस्थाश्रमे ब्रह्मविचार विद्याध्ययन तपश्चरण सभामध्ये यच्छ्रेष्टम् इन्द्रिये मानसव्यवहारे च यदुत्तमं कर्म कुर्म, तत्सर्वमीश्वरमोक्षप्राप्त्यर्थमस्तु । यच्च भ्रमेणैन पाप च कृत तत्सर्वमिद पापमवयजामहे आश्रमानुष्ठानेन नाशयाम ' इति, तदपि तुच्छम् गृहाश्रमविधानस्य निर्मूलत्वादप्रासङ्गिकत्वाच्च । पुण्यपदमपि मन्त्रे नास्त्येव । यत्पदानि च सामान्यसर्वनामवाचकानि विशिष्टार्थवाचकेनैन पदेन सयुक्तानि तत्पराण्येव पर्यवस्यन्ति । ' मे ', ' अरण्ये ' इति पदयोरपि गृहस्थवानप्रस्थार्थत्वे बीज वक्तव्यम्, ' ईश्वरमोक्षप्राप्त्यर्थमस्तु' इत्यपि निर्मूलमेव, मन्त्रे तद्बोधकपदाभावात् । पूर्वोक्तेऽर्थे तु कात्यायनमहर्षिवचनमपि प्रमाणम् । 'देहि मे देहि म इति जुहोति' (का० थो० सू० ५/६ ३८) इन्द्रो वदति -हे यजमान, त्व मे मह्यमिन्द्राय देहि हवि. प्रथम प्रयच्छ । ते तुभ्य हविर्दात्रे ददामि प्रयच्छाम्यभीष्टम् । पूर्वोक्त एवार्थी द्वितीयपादेनोच्यते आदरातिशयार्थम् । मे मह्यमिन्द्राय निधेहि प्रथम त्व हविर्नितरा सम्पादय । ते तुभ्य यजनानाय निदधे अपेक्षित फलं नितरा सम्पादयामि । एवमिन्द्रवाक्य श्रुत्वोत्तरार्धेन यजमानो वक्ति - नितरा हियत इति । मूल्येन क्रेतव्य. पदार्थ उच्यते-निहार मूल्येन क्रेतव्यवस्तुतुल्य फल मे मह्य यजमानाय हरासि प्रयच्छ । 'लेटोडाटा' (पा० सू० ३।४।९ ४) । उत्तरो निहारी मूल्यवाची । निहार मूल्य हवि, ते तुभ्यमिन्द्राय निहराणि नितरा समर्पयामि | स्वाहाशब्दो हविर्दानार्थ. । यत्तु श्रीदयानन्देनोक्तम् — ‘परमेश्वर आज्ञापयति -हे जीव, त्वमेवं वद मे मह्य देहि मत्सुखार्थं विद्या द्रव्यादिक च देहि । अहमपि ते तुभ्यं ददामि । मे मह्यं मदर्थं त्वमुत्तमस्वभावदानमुदारता सुशीलता धेहि धारय । ते तुभ्य त्वदर्थ- से बनाये गये सन्तान परिमित एक से अधिक गोल आकार वाले करम्भ पात्र होते है । उनको सूप में रखकर पत्नी दक्षिणाग्नि में आहुति देती है, यह एक पक्ष है । पति-पत्नी दोनो मिलकर इसकी आहुति देते है, यह दूसरा पक्ष है । दयानन्द का कहना है कि इन मन्त्रो में गृहस्थाश्रम का विधान है । जैसा कि उन्होने इस मन्त्र की व्याख्या मे कहा है- ' गृहाश्रमी को उचित है कि जब वह पूर्ण विद्या को पढ चुके, तब अपने तुल्य स्त्री से स्वयंवर करे और वे दोनो यथावत् उन विवाह के नियमों में चलें, जो कि विवाह और नियोग के प्रकरणो मे लिख आये है । परन्तु उनसे जो विशेष कहना है, सो यहाँ लिखते हैं--गृहस्थ स्त्री-पुरुषो को धर्म की उन्नति और ग्रामवासियों के हित के लिये जो जो काम करना है, तथा वनवासियों के हित और सभा के बीच में सत्य विचार और अपने सामर्थ्य से संसार को सुख देने के लिये, जितेन्द्रियता से ज्ञान की वृद्धि करनी चाहिये, सो सो सब काम अपने पूर्ण पुरुषार्थ के साथ यथावत् करे । पाप करने की बुद्धि को हम लोग मन, वचन और कर्म से छोड़कर सर्वथा सबके हितकारी बने' (पृ० २७६) | किन्तु यहा पूरा कथन निराधार है, क्योकि इन मन्त्रो में गृहस्थाश्रम का विधान है, ऐसा मानने में कोई प्रमाण नही है और इसका यहाँ कोई प्रसंग भी नही है । पुण्य पद मन्त्र मे है भी नही । इस मन्त्र में जिसने भी ' यत्' पद है, वे सभी सामान्य सर्वनाम के वाचक है, अतः इन सबका सबन्ध विशिष्ट अर्थ के वाचक 'एन ' पद से है, जिसका कि अर्थ पाप होता है । ग्राम और अरण्य पद से गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम का बोध होता है, ऐसा मानने में प्रमाण बताना पडेगा । ' यह सब ईश्वर और मोक्ष की प्राप्ति के लिये हो' ऐसा अर्थ कहना भी निराधार है, क्योकि मन्त्र में इन अर्थों के बोधक पद नही है । हमारे बताये अर्थ मे तो महषि कात्यायन का वचन प्रमाण है । ' देहि में' इत्यादि मन्त्र से आहुति देता है, यह कात्यायन महर्षि ने इस मन्त्र का विनियोग बताया है । इस मन्त्र मे इन्द्र यजमान से कहता है कि है यजमान, तुम मुझ इन्द्र को पहले आहुति दो । हवि प्रदान करने पर मैं तुम्हारी इच्छित मनोकामना पूरी करूंगा । अतिशय आदर प्रदर्शित करने के लिये मन्त्र के द्वितीय चरण मे भी इसी बात को दुहराया गया है । मुझ इन्द्र के लिये तुम खूब अच्छी तरह से हवि प्रदान करो ॥ भलीभांति हवि देने पर मै तुम्हारी मनोकामना भी बहुत अच्छी तरह से पूरा करूंगा । इस तरह इन्द्र की बात को सुनकर यजमान कहता है- मैं तुमको भलीभांति हवि प्रदान करता हूँ । कीमत चुकाकर खरीदी जाने वाली वस्तु के लिये कहता है - मूल्य देकर खरीदी गई वस्तु की तरह तुम मेरे द्वारा दी गई आहुति के बदले में मुझे इसका फल प्रदान करो । बाद वाला निहार पद मूल्य का वाचक है । मैं तुम ( इन्द्र) को मूल्य के रूप में हवि प्रदान करता हूँ, तुम उसके बदले में मुझे फल प्रदान करो । स्वहा शब्द हवि के अर्पण करने में प्रयुक्त होता है । १८७
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वेदार्थ पारिजाता III महमप्येव च दधे । तथैव धर्मव्यवहार क्रयदानादानाख्य च हरासि प्रयच्छ । तथैवाहमपि ते तुभ्य त्वदर्थं निहराणि नित्य प्रयच्छानि । स्वाहेति मत्यभाषण सत्यमान सत्यभाषणं सत्याचरण सत्यवचनश्रवण च सर्वे वय मिलित्वा कुर्यामेति सत्येनैव सर्वं व्यवहारं कुर्यु.' (पृ० २७५ ) | हिन्दीव्याख्याने तु ततोऽप्यन्यदेव किञ्चिदुक्तम्— 'सामाजिक नियमव्यवस्थानुसारेण ' सम्यक् चलनीयम् ॥ इदमेव गृहस्थोन्नतिकारणम् । यत्किञ्चिद् वस्त्वादेयमथवा देय तत्सर्वं सत्यव्यवहारेण कर्तव्यम् (पृ० २७६) इत्यादिकं तत्सर्व निर्मूलमेव । यतो हि कस्य शब्दस्य वाक्यस्य वायमर्थ " इति नोक्तम्, स्वतन्त्रेच्छस्य तस्य पदवाक्यानपेक्षं स्वतन्त्रमेवेद व्याख्यानम् । परमेश्वरो जीवानाज्ञापयति -हे जीव, इतीदमपि निर्मूलम्, हिन्दीव्याख्याने जीवाः परमेश्वरेण परस्पर सत्यव्यवहारायाज्ञप्ता । संस्कृतव्याख्याने विद्या द्रव्यादिकमुत्तमस्वभावमुदारता सुशीलता च मे , देहीत्युक्तम् । न च जीवा जीवान्तरेभ्य उदारता सुशीलता दातु प्रभवन्ति । यदीश्वरस्तथा व्यवहारकर्तव्यतामुपदिशति तदपि न युक्तम्, परमेश्वरस्याप्तकामत्वेन तथा व्यवहारस्यौचित्याभावात् । ननु पूर्वोक्तव्याख्यानस्यापि कि मूलमिति चेन्न, एकोनपञ्चाशत्तम्या. कण्डिकाया एव तत्र मानत्वात् । तथाहि- 'पूर्णा दवि परा पत सुपूर्णा पुनरापत । वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्ज शतक्रतो ||' ( वा० स० ३| ४९ ) । 'पूर्णा दर्वि देहि मे इतीमेद्वे ऐन्द्रयावनुष्टुभौ तेनेन्द्रदेवत्ये उभे । स्थाल्या दर्व्यादत्ते पूर्णा दवति' (का० श्र० सू० ५| ६ | ३४ ) । दर्व्या स्थालीत ओदनग्रहण करोति प्रथमयाऽनुष्टुभा, द्वितीययाऽनुष्टुभा त जुहोति । प्रथमाया अयमर्थ. -हे दर्बि, अन्नप्रदानसाधनभूते काष्ठादिनिर्मिते, त्व पूर्णा स्थाल्या सकाशादन्नं गृहीत्वा पूर्णा भूत्वा परा पूर्णत्वादेवोत्कृष्टा सती पत इन्द्र प्रति गच्छ । ------ सुपूर्णा कर्मफलेन सुष्ठु पूर्णा सती पुनरापत भूयोऽस्मान् प्रत्यागच्छ । एव दर्वीमुक्त्वा इन्द्रमाह -हे शतक्रतो इन्द्र, त्वचाह चोभौ वस्नेव, वस्नशब्दो मूल्यवाचक, तृतीयाया. पूर्वसवर्ण । मूल्येनेव इषमभीष्ट हवि. स्वरूपमन्नमूर्जं हविर्दानफलरूपं दयानन्द ने इस मन्त्र की संस्कृत और हिन्दी मे व्याख्या करते हुए लिखा है— परमेश्वर उपदेश करता है कि जो सामाजिक नियमों की व्यवस्था के अनुसार ठीक-ठीक चलता है, यही गृहस्थ की परम उन्नति का कारण है । जो वस्तु किसी से लेने अथवा देने, सो भी सत्य व्यवहार के साथ करे कि यह मै तेरे साथ काम करूगा और तू मेरे साथ ऐसा करना । ऐसे व्यवहार को भी सत्यता के साथ करना चाहिये । यह वस्तु मेरे लिये तू दे अथवा तेरे लिये मैं दूंगा, इसको भी यथावत् पूरा करे । अर्थात् किसी प्रकार का मिथ्या व्यवहार किसी के साथ न करे । इस प्रकार गृहस्थ लोगो के सब व्यवहार सिद्ध होते है, क्योकि जो गृहस्थ विचारपूर्वक सबके हितकारी काम करते हैं, उनकी सदा उन्नति होती है' (पृ० २७६- २७७ ), किन्तु यह सारा कथन भी निराधार है, क्योकि किस शब्द या वाक्य का यह अर्थ है, इसको स्पष्ट नही किया गया है । दयानन्द का यह मनमाना अर्थ बिना ही पद और वाक्य की अपेक्षा के मनमाने तरीके से किया गया है । 'परमेश्वर जीवो को आज्ञा देता है कि हे जीवो' इस तरह का कथन भी सर्वथा निर्मूल | हिन्दी व्याख्या मे दयानन्द ने कहा है कि जीवो को परस्पर सही आचरण करने की आज्ञा परमेश्वर ने दी है और संस्कृत में 'विद्या, धन, उत्तम स्वभाव, उदारता और सुशीलता मुझे दो' ऐसी व्याख्या की गई है । एक जीव दूसरे जीव को उदारता और सुशीलता दे नही सकता । यदि वह ऐसा कहता है कि परमेश्वर ऐसा करे, तो यह बात भी ठीक नही हो सकती, क्योकि परमेश्वर तो आप्तकाम है, उसकी सब तरह की इच्छाएँ स्वयं परिपूर्ण है । वह इस तरह का व्यवहार करे, इसमें कोई औचित्य नही प्रतीत होता । प्रश्न किया जा सकता है कि आपके द्वारा किये गये अर्थ में भी क्या प्रमाण है? इसका उत्तर है कि ४ ९वी कण्डिका ही इसमे प्रमाण है । जैसे कि 'पूर्णा दवि ' और ' देहि में ' ये दो मन्त्र अनुष्टुप् छन्द में है और इनका देवता इन्द्र है । कात्यायन ने इनका विनियोग बताते हुए लिखा है कि प्रथम मन्त्र से दव के द्वारा स्थाली से ओदन का ग्रहण करता है और दूसरे मन्त्र से उसकी आहुति देता है । प्रथम मन्त्र का अर्थ यह है - हे अन्न को परोसने के साधनभूत काठ की बनी कड़छुल, तुम स्थाली (बटलोही ) में से अन्न लेकर पूर्ण हो, भरी हुई हो । पूर्ण होने से ही तुम उत्कृष्ट हो, अत एव तुम इन्द्र के पास जाओ । वहाँ से कर्मफल से परिपूर्ण होकर तुम पुनः हमारे पास चली जाओ । इस तरह से दव को कहने के बाद इन्द्र को कहा जाता है कि हे शतक्रतो, सौ अश्वमेघ यज्ञ करते वाले इन्द्र, तुम और हम दोनों मिलकर मूल्य से अन्न को अभीष्ट हवि को तथा हवि के फल के रूप में प्राप्त होने वाले कर्ज नामक रस
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वेदार्थपारिजातः १४६१ रसविशेष च विक्रीणावहै, परस्पर द्रव्यविनिमयरूपं विक्रय करवावहै । अह तुभ्य हविर्ददामि त्व मह्य फलं देहि । एवं 'वस्नेव विक्रीणावहै' इति मन्त्राशेनैवोत्तरमत्र । मन्त्रस्येन्द्रयजमानमवादरूपोऽर्थो ज्ञायते । पूर्वमन्त्रेण यजमानप्रस्तावानन्तर- मुत्तरमन्त्रे पूर्वपादेनेन्द्रवचनमुत्तरेण यजमानवचनमिति श्लिष्यते । 'गृहा मा बिभीत मा वेपध्वमूर्जं बिभ्रत एमसि । ऊर्ज बिभ्रव सुमना सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः ॥ ' (वा० सं ० ३।४१ ) 'गृहा मा विभीतेति गृहानुपैति' (का० श्रौ० सू० ४।१२।२२ ) इत्यनेन ग्रामान्तरादागतो गृहा मेत्यादि मन्त्रत्रयेण गृह प्राप्नुयात् । तिस्रो वास्तुदेवत्या गयुदृष्टास्त्रिष्टुब्बिराड्रपा । यस्या एकादशार्णास्त्रय पादा, एकोऽष्टार्ण. सा विराट् । अत्र प्रथमो दशार्णस्तेनैकोना । हे गृहा, यूय मा बिभीत पालको यजमानो गत इति भय मा कुरुत । मा च वेपध्व कोऽपि शत्रुरागत्य विनाशयिष्यतीति बुद्धया मा कम्पध्वम् । यतो वयमूर्ज बिभ्रतो धारयमाणानक्षीणान्नानेव युष्मान् एमसि आ इम आगताः स्मः । तथैवाहमूर्ज बिभ्रद् धारयन् शोभनमनस्क सुमेधा शोभनधारणप्रज्ञोपेत, मनसा दु.ख- । रहितेन मोदमानो हृष्यन् वो युष्मानुपैमि आगच्छामि । - यदुक्तम् — 'हे गृहाश्रमानिच्छन्तो मनुष्या, स्वयंवरं विवाह कृत्वा यूय गृहाणि प्राप्तुत गृहाश्रमानुष्ठाने मा बिभीत भयं मा प्राप्तुत तथा मा वेपध्वम् ऊर्जं बल पराक्रम च बिभ्रत पदार्थानेमसि वय प्राप्तुम इतीच्छत वो युष्माक मध्येऽहमूर्ज बिभ्रत् सन् सुमना शुद्धमना सुमेधा उत्तमबुद्धियुक्त मनसा मोदमान प्राप्तानन्द गृहानैमि गृहाणि प्राप्नोमि' (पृ ० २७५ ) इति, तदपि विश्वङ्खलमेव, वेदाक्षरविरुद्धत्वात् । तथाहि-अत्र हे मनुष्या इति कुत. कल्प्यते? कश्च सम्बोद्धा? तत्र च कि मानम्? ननु गृहा इति पदेनैव गृहाश्रमानिच्छन्तो मनुष्या इत्यर्थो लक्षणया बोध्यत इति चेत्, न, लक्षणाया विशेष को परस्पर विनिमय के आधार पर क्रय-विक्रय करके, आपस मे बदल ले । अर्थात् मैं तुम्हे हवि प्रदान करता हूँ और तुम मुझे उसका फल प्रदान करो । इस तरह से इस मन्त्र के ' वस्नेव विक्रीणावहै' इस अंश से ही यह ज्ञात हो जाता है कि आगे के मन्त्र में इन्द्र और यजमान का संवाद है । इस तरह से यह स्पष्ट हो जाता है कि पूर्व मन्त्र में यजमान के उक्त प्रस्ताव के बाद उत्तर मन्त्र के पूर्वार्ध में इन्द्र का ववन और उत्तरार्ध में यजमान का वचन है । इस तरह से हमारा किया अर्थ इन मन्त्रो के आधार पर ही सगत ( सही ) सिद्ध हो जाता है I। 'गृहा मा' इत्यादि मन्त्र का विनियोग बताते हुए कात्यायन ने बताया है कि दूसरे ग्राम से आकर यजमान ' गुहा मा' इत्यादि तीन मन्त्रो का उच्चारण करते हुए घर मे प्रवेश करे । इन तीन मन्त्रो का देवता वास्तु है । शंयु ऋषि इन मन्त्रो के द्रष्टा है और छन्द त्रिष्टुप् तथा विराट् है । विराट् छन्द वाले मन्त्र के ग्यारह अक्षर वाले तीन पाद है और एक पाद आठ अक्षरो का है । इनमें पहला पाद दस अक्षरो का है, इसलिये इसे एकोना विराट् कहा गया है । हे गृह देवताओ, आप लोग डरो मत कि इस घर का स्वामी यजमान कही चला गया है और में आप लोगो को डर के मारे कापने की ही आवश्यकता है कि शत्रु आकर हम लोगो को नष्ट कर देंगे, क्योकि हमलोग बल वीर्य से संपन्न अक्षय अन्न की स्थिति मे हो यहाँ पुनः आ गये हैं, अर्थात् जिस भरी -पूरी हालत मे हम इस घर को छोड़ कर गये थे, उसी हालत मे हम इसको देख रहे हैं । आपकी ही तरह मैं भो बल-वीर्य से सपन्न होकर प्रसन्न चित्त से सुन्दर स्मरण शक्ति ,,को साथ लिये सभी प्रकार की चिन्ताओ कष्टकल्पनाओ से मुक्त होकर प्रसन्न होता हुआ तुमको प्राप्त कर रहा हूँ तुम्हारे भीतर प्रवेश कर रहा हूँ | दयानन्द ने इस मन्त्र की व्याख्या इस तरह से की है-' हे गृहाश्रम की इच्छा रखने वाले मनुष्य लोगो, तुम लोग स्वयंवर अर्थात् अपनी इच्छा के अनुकूल विवाह करके गृहाश्रम को प्राप्त हो और उससे डरो और काँपो मत । किन्तु उससे बल, पराक्रम करने वाले पदार्थों को प्राप्त होने की इच्छा करो तथा गृहाश्रमी पुरुषो से ऐसा कहो कि मैं परमात्मा की कृपा से आप लोगों के बीच पराक्रम, शुद्ध मन, उत्तम बुद्धि और आनन्द को प्राप्त होकर गृहाश्रम करूँ' ( १० २७७ ) । किन्तु यह व्याख्या भी अव्यवस्थित है, क्योंकि यह व्याख्या मन्त्राक्षरों से विरुद्ध है । जैसे कि इस मन्त्र में 'हे मनुष्यो' यह किस शब्द का अर्थ है? यह मनुष्यों को संबोधित
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वेदार्थपारिजातः १४६२ , बीजानुपलब्धे । न चाचेतनस्य गृहस्य सम्बोद्ध्यत्वानुपपत्तिरेव बीजमिति वाच्यम् यूपादिवत्तदधिष्ठातृदैवतस्य सम्बोद्ध्यत्वेऽनुपपत्तेरभावात् ॥ मञ्चा क्रोशन्तीतिवत् कथञ्चिद् गृहस्थपुरुषाणा सम्बोध्यत्वसम्भवेऽपि गृहपदस्य गृहाश्रमे लक्षणा, ततोऽपि गृहाश्रमेच्छाया लक्षणा, ततस्तद्वति लक्षणेति महद्गौरवपराहतमेवेद व्याख्यानम् । स्वयवरविवाहः कर्तव्य इत्यस्यार्थस्य बोधकानि कानि पदानि मन्त्रे सन्ति? पदार्थानेमसीत्यस्य 'वय प्राप्तुम इतीच्छते' इति कथमर्थ., इच्छार्थकस्य धातोरभावात् । यदि परमेश्वर सम्बोद्धा, तदा सुमना सुमेधा गृहानैमीत्यादिपदाना कथ सङ्गति? किं व्यापकस्य परमेश्वरस्य कस्यचिद् गृहे गमन सम्भवति? कि वा 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र:' ( मुण्ड० २१ २ ) इति श्रुत्युक्तस्यामनसोऽपि भगवतो मनोयोग सम्भवति? सकलकल्याणगुणगणाकरस्य भगवतो दौर्मनस्यदुर्मेधस्त्वाद्यसम्भवेन तद्व्यावृत्त्यर्थं सुमना इत्यादिविशेषणाना वैयर्थ्यापाश्च । प्राप्तानन्दत्वमपि कि नित्यानन्दस्य सम्भवति? ननु पूर्वोक्तव्याख्यानेऽपि कि बीजमिति चेन्न, गृहा इति पदस्यैव गृहाणा सम्बोध्यत्वे मानत्वात् । 'गृहा मा बिभीतेति गृहानुपैति' ( का० श्री ० सू० ४।१२।२२) इति कात्यायनमहर्षिसूत्रस्यापि तत्र मानत्वाच्च । येषामध्येति प्रवमन् येषु सौमनसो बहु । गृहानुपह्वयामहे ते नो जानन्तु जानत ||' (वा० स ० ३।४२) प्रवसन् देशान्तर गच्छन् यजमानो येषा यान् गृहान् स्मरति, 'अधीगर्थदयेशा कर्मणि' (पा० सू० २।३।५२ ) इति षष्ठी, गृहविषय क्षेम सदा चिन्तयतीत्यर्थं । तथा येषु गृहेषु यजमानस्य बहु सौमनस. सुमनसो भाव प्रीत्यतिशयः, वय तान् गृहानुपह्वयाम', गृहाभिमानो देवोऽम्मत्समीपमागच्छत्वित्यर्थं । हे गृहदेवा', आहूताः सन्त जानत' उपकाराभिज्ञान् नोऽस्मान् जानन्तु । एते गृहस्वामिन कृतघ्ना न भवन्तीत्यवगच्छन्तु । करने वाला कौन है? और ऐसा अर्थ करने मे प्रमाण क्या है? यदि यह कहा जाय कि 'गृहा' इस पद से ही गृहस्थाश्रम को चाहने वाले मनुष्यों का बोध लक्षणा वृत्ति की सहायता से हो सकेगा, किन्तु ऐसा कहना गलत होगा, क्योकि लक्षणा का सहारा लेने में यहाँ कोई कारण प्रतीत नही होता । अचेतन गृह को कैसे संबोधित किया जा सकता है, यह संबोधन की अनुपपत्ति ही लक्षणा का कारण मानी जायगी, ऐसा भी नही कहा जा सकता, क्योकि यज्ञ में जैसे अचेतन यूप को संबोधित किया जाता है, उसी तरह से अचेतन गृह को संबोधित करने मे भी क्या अनुपपत्ति हो सकती है? 'मञ्चाः क्रोशन्ति' इस वाक्य मे जैसे मच पर स्थित व्यक्तियो का ग्रहण होता है, उसी तरह से 'गृहाः' पद से भी गृह में स्थित पुरुष अर्थ किया जा सकता है, किन्तु गृह पद का पहले गृहस्थाश्रम में, बाद में गृहस्थाश्रम में रहने की इच्छा में और अन्त मे तद्वान् में लक्षणा -इस लक्षणा परम्परा को मानने में बडा गौरव होगा । इस प्रकार इस व्याख्या में गौरव दोष है । स्वयंवर विवाह के करने की बात भी मन्त्र मे नही है । 'एमसि' पद का अर्थ 'हम प्राप्त करे, ऐसी इच्छा वाले' यह अर्थ कैसे हो सकता है, क्योकि इच्छार्थक धातु तो यहाँ है नहीं । यदि इस मन्त्र में परमेश्वर को संबोद्धा माना जाय, तो प्रसन्न मन और बुद्धि से मैं घर पर आ गया हूं, इन पदों की संगति कैसे बनेगी? क्या व्यापक परमेश्वर के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह प्रसन्न मन - बुद्धि से किसी घर मे जायगा? अथवा क्या श्रुति के अनुसार प्राण और मन आदि से रहित भगवान् का किसी तरह से मन आदि से संबन्ध जोड़ा जा सकता है? समस्त कल्याण गुणो को समुद्र की भाँति अपने में समेटे हुए भगवान् का दौर्मनस्य, दुर्मेधा आदि की कोई संभावना भी कभी नही हो सकती । तब इनकी निवृत्ति के लिये मन्त्र में ' सुमना' आदि विशेषण व्यर्थ ही पड जायगे । नित्य आनन्दसागर में लोन परमेश्वर के आनन्द को नये सिरे से प्राप्त करने की बात भी सगत नही मानी जा सकती । प्रश्न उठ सकता है कि पूर्वोक्त सायणसंमत अर्थ में भी क्या प्रमाण है, किन्तु इसका सीधा सा उत्तर यह है कि 'गृहाः' यह पद ही इस बात में प्रमाण है कि यहाँ गृहों को संबोधित किया गया है । 'गृहा मा०' इत्यादि कात्यायन महर्षि का सूत्र भी इस बात की पुष्टि करता है । ' येषामध्येति ० ' इस मन्त्र की व्याख्या यह है ---देशान्तर में जाते समय यजमान जिन गृहों को स्मरण करता है, अर्थात् अपने घर में सब तरह का कल्याण सदा बना रहे, इस बात को सदा विचारता रहता है । साथ ही जिन घरों के प्रति यजमान की अतिशय प्रीति रहती हैं, हम उन गृहो को संबोधित करते है कि उस गृह का अभिमानी देवता हमारे पास आवे । हे वास्तु देवों, बुलाये जाने पर आप इस बात को जानिये कि हम आप लोगों का बहुत उपकार मानते है । ये गृहस्वामी कभी कृतघ्न नही होते, इस बात को आप लोग सदा याद रखिये ।
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वेदार्थपारिजात| III यदुक्तम्–' येषु प्रवसतो मनुष्यस्य बहु अधिक सौमनस आनन्दो भवति । तत्र प्रवसन् येषा यान् पदार्थान् सुखकरान् ( अध्येति ) स्मरति (गृहानुपह्वयामहे) वय गृहेषु विवाहादिषु सत्कारार्थ तान् गृहसम्बन्धिन सखिबन्ध्वाचार्यादीन् निमन्त्रयामहे (ते न ) विवाहनियमेषु कृतप्रतिज्ञान् अस्मान् (जानत ) प्रौढज्ञानान् युवावस्थास्थान् स्वेच्छया कृतविवाहान् (जानन्तु ) अस्माक साक्षिण सन्तु ' ( पृ ० २७६) इति, तदेतत्सर्वं सर्वथाऽसङ्गत वेदाक्षरसम्बन्धशून्यत्वात् । प्रवसन्नित्यस्य प्रवसत इति विपरिणामे मानाभावात् । येषा येषु इति यत्पदोपात्ता गृहा एव वक्तव्यास्तेषामेव प्रकृतत्वात् । गृहानिति पदेन गृहसम्बन्धिना सख्यादीना ग्रहणे किं मूलमित्यपि वक्तव्यम्? विवाहप्रसङ्गस्तु प्रकृते नास्त्येव । विवाहनियमेषु कृतप्रतिज्ञान् जानत प्रौढज्ञानान् युवावस्थास्थान् स्वेच्छया कृतविवाहान् इत्यादिक तु न वेदव्याख्यानम्, वेदाक्षरासम्बद्धत्वात् । जानन्त्विति विवाहसाक्षिणो भवन्त्वित्यपि तथाविधमेव । पूर्वव्याख्यान तु गृहान् येषु इति मन्त्राक्षरानुगत सूत्रसम्मत च । यथा गार्हपत्य- मुपतिष्ठते, दक्षिणाग्निमुपतिष्ठते तथैव गृहानुपैति इति रीत्या गृहोपगमनसम्बन्धिन एवेमे मन्त्रा इति मन्तव्यम् । 'उपहूता इह गाव उपहूता अजावय । अथो अन्नस्य कीलाल उपहूतो गृहेषु नः । क्षेमायव शान्त्यै प्रपद्ये शिव शग्म शंयो. शयो ॥ ' (वा ० स ० ३।४३) इह गृहेषु गाव उपहूता धेनवो बलीवर्दाश्च सुखेन तिष्ठन्तु । यथा इह गृहेषु अजावय उपहूता अजात्वावित्वादि-जातिद्वयविशिष्टा पशव उपहूताः सुखेन वर्तन्ताम् इत्यस्माभिरनुज्ञाता अथो अपि च अन्नस्य कीलाल. अन्नसम्बन्धी रसविशेषो नोऽस्मदीयेषु उपहूत. समृद्धो भवतु 1। इत्येवमस्माभिरभ्यनुज्ञात 'क्षेमाय व प्रविशति' (का० श्र ० सू० ४।१२।२३) । हे गृहाः, वो युष्मान् प्रपद्ये प्राप्तोऽस्मि । किमर्थ क्षेमाय विद्यमानस्य वस्तुनो रक्षण क्षेमस्तस्मै क्षेमाय शान्त्यै मम सर्वानिष्टशमनाय शंयो शं सुखं यौति कामयते इति शयु, 'इदयुरिद कामयमान.' (नि० ६ ३१ ) इति यास्कवचनात् । 'शिवं शग्ममिति द्वे सुखनामनी ' (निघण्टु० ३।६।१८-२२) । आजमैहिक द्वितीयमामुष्मिकम् उभयविध सुखं भूयादिति शेष । उपस्थानसमाप्तावादरार्थोऽभ्यासः । दयानन्द ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है- 'जिन घरो मे बसते हुए मनुष्यो को अधिक आनन्द होता है, उनमें वे मनुष्य अपने संबन्धी मित्र, बन्धु और आचार्य आदि का स्मरण करते है और उन्ही लोगो को विवाह आदि शुभ कार्यों मे सत्कार से बुलाकर उनसे यह इच्छा करते है कि वे सब हमको युवावस्थायुक्त और विवाह आदि नियमो से ठीक ठीक प्रतिज्ञा करने वाले जानें, अर्थात् हमारे साक्षी हो' ( पृ० २७७ ) । यह सारी व्याख्या सर्वथा असंगत और मन्त्र के पदो के विपरीत है । 'प्रवसन्' पद को 'प्रवसतः' में बदल देने में कोई प्रमाण नही है । मन्त्र में आये ' येषा येषु' इन पदो में गृह को ही पकड़ा जा सकता है, क्योकि प्रसंग उन्ही का है । 'गृहान्' पद से अपने सम्बन्धी मित्र बान्धवो का उल्लेख कैसे माना जा सकता है? प्रकृत मन्त्र मे विवाह की कोई चर्चा नही है । 'विवाह के नियमों का अनुसरण कर अनेक प्रतिज्ञाओ को करने वाले युवावस्था के कारण प्रौढ ज्ञान से सम्पन्न अपनी इच्छा के अनुसार विवाह करने वाले ' यह सब वेद की व्याख्या नही मानी जा सकती, क्योकि इस मन्त्र के पदों से इसका कोई संबन्ध नही है । 'जानन्तु' पद का अर्थ 'आप लोग विवाह के साक्षी होइये' यह कहना भी उसी तरह निराधार है । हमारी व्याख्या तो मन्त्र में आये पदों का पूरी तरह से अनुसरण करती है और इसमें कात्यायन सूत्रो की भी संमति है । जैसे गार्हपत्य अग्नि और दक्षिणाग्नि के समक्ष यजमान उपस्थित होता है, उसी तरह से 'गृहानुपैति' इत्यादि मन्त्रों मे भी यजमान के वास्तु देवता के समक्ष उपस्थित होने की बात माननी ही चाहिये । 'उपहता० ' इत्यादि मन्त्र का सही अर्थ इस प्रकार है- इन घरों में धेनु और बैल सुखपूर्वक रहे । इन घरो में भेड और बकरियां भी सुखपूर्वक निवास करे । साथ ही हमारी अनुमति लेकर स्वादिष्ट अन्न भी हमारे घर में भरा रहे । इसी प्रकार हे वास्तु देवताओं, विद्यमान वस्तु को रक्षा रूप क्षेम के लिये मैं आप लोगो के पास आया हूँ, साथ ही इसलिये भी गाया हूँ कि आप लोगों की कृपा से हमारे घर में सब तरह की सुखशान्ति का निवास हो, हमारे सभी अरिष्ट, विघ्न बाधाएँ दूर हो जाय । सुख की कामना वाला शंयु कहलाता है, यास्क वचन इसमें प्रमाण है । शिव और शग्म ये दो सुख के नाम है । ऐहिक सुख शिव और आमुष्मिक सुख शग्म कहलाता है । यह दोनो प्रकार का सुख हमें प्राप्त हो । शंयु शब्द की द्विरावृत्ति उसके प्रति आदर प्रकट करने के लिये है ।
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वेदार्थपारिजात. १४९४ यत्तु – 'हे परमेश्वर, भवत्कृपया इहास्मिन् गृहाश्रमे गाव पशुपृथिवीन्द्रियविद्याप्रकाशाह्लादादय उपहूताः प्राप्ता भवन्तु । तथा ( अजावय ) उपहूता अस्मदनुकूला भवन्तु । अथो पूर्वपदार्थप्राप्त्यनन्तर नोऽस्माक गृहेषु अन्नस्य भोक्तव्य- पदार्थंसमूहस्य कोलालो विशेषेणोत्तमरस उपहूत सम्यक्प्राप्तो भवतु । वो युष्मान्, अत्र पुरुषव्यत्यय, तान् पूर्वोक्तान् प्रत्यक्षान् पदार्थान् क्षेमाय रक्षणाय शान्त्यै सुखाय प्रपद्ये प्राप्नोति । तत्प्राप्त्या शिव निश्रेयसं कल्याण पारमार्थिक सुख शग्म सासारिक-माभ्युदयिक सुख च प्राप्नुयाम । शमिति निघण्टौ पदनामास्ति । परोपकाराय गृहाश्रमे स्थित्वा पूर्वोक्तस्य द्विविधस्य सुख-स्योन्नति कुर्म ' ( पृ० २७६ ) इति, तदपि पदपदार्थसम्बन्धातीनमेव । अत्र परमेश्वर सम्बोधनीय इत्यस्य मूल वक्तव्यम् । ' गृहाः' इति पदेन गृहाधिष्ठातृदेवा सम्बोधनीया इति प्रासङ्गिकम् । गृहाश्रमपदमपि मन्त्रे नास्त्येव । गृहपदस्य गृहाश्रमे लक्षणा चेत्, तदा तत्रापि बीज वक्तव्यम्, अन्वयानुपपत्तिस्तात्पर्यानुपपत्तिश्च नास्त्येव, अन्यथोपपत्तेरुक्तत्वात् । अजाविसान्निध्य-वशाद् गाव इत्यपि धेनुबोधकमेव पदम् । उपहूता प्राप्ता भवन्तु । अस्मदनुकूला भवन्तु इत्यत्र तथार्थभेदे कारण वक्तव्यम् । क्षेमाय व इत्यत्र व इत्यस्य युष्मानिति वाच्यार्थमुपेक्ष्य पुरुषव्यत्ययेन पूर्वोक्तान् तान् पदार्थानित्यर्थंकरणे कि मूलमिति तु नोक्तम् । युष्मान् गृहान् प्रपद्ये प्राप्नोमोति तु श्लिष्यते । पूर्वोकपदार्थप्राप्त्या पारमार्थिक नि श्रेयसम् आभ्युदयिक च सुख कथ लभ्यते? नहि पश्वादिप्राप्त्या नि श्रेयसप्राप्ति सम्भवति । स्वर्गाद्यामुष्मिकाभ्युदयप्राप्तेरप्यग्निहोत्रादिवैदिकसाधनसाध्यत्वात् कथ तैस्तत्प्राप्ति? गयोरिति पदनामत्वेऽपि प्रकृते कि तेनेति तु नोक्तमेव । हिन्दीव्याख्याने तु प्रतिष्ठाया अर्थात् सासारिक-सुखस्य नामेत्यपि निर्मूलमेव, पदशब्दस्य तथार्थत्वायोगात् । कथ च तैरुभयविधस्य सुखस्योन्नति सम्भवति? नि श्रेयस-सुखस्योन्नतिशीलत्वे सातिशयत्वेनानित्यत्वेन च निःश्रेयसत्वव्याघातात् । तस्माद् गृहस्थाश्रमविषया एते मन्त्रा इति प्रतिज्ञा मिथ्यैव । ' त्रयो धर्मस्कन्धा — यज्ञोऽध्ययन दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मान-माचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति' (छान्दोग्य० २।२३| १ ) । इतीदमपि वचनं न तदभिमतवानप्रस्थाश्रम- दयानन्द का अर्थ यह है-'हे परमेश्वर, आपकी कृपा से हम लोगो को गृहस्थाश्रम मे पशु, पृथिवी, विद्या, प्रकाश, आनन्द, बकरी और भेड आदि पदार्थ अच्छी तरह से प्राप्त हो तथा तथा हमारे घरो मे उत्तम रसयुक्त खाने-पीने योग्य पदार्थ सदा बने रहे । 'वः' यह पद पुरुष व्यत्यय से सिद्ध होता है । हम लोग उक्त पदार्थों को उनकी रक्षा और अपने सुख के लिये प्राप्त हो । फिर उस प्राप्ति से हमको परमार्थ और संसार का सुख मिले । 'शंयो. ( शम्) यह निघण्टु में प्रतिष्ठा अर्थात् सासारिक सुख का नाम है' ( पृ० २७७ ) | यह सारा अर्थ भी पद और पदार्थ के सम्बन्ध से बहुत दूर है । यहां परमेश्वर को संबोधित किया जाना चाहिये, इसमें प्रमाण बताना पड़ेगा । 'गृहाः' इस पद से गृह के अधिष्ठाता देवता को संबोधित किया जाय, यह तो प्रसंग प्राप्त है । गृहाश्रम पद भी मन्त्र में नही है । गृह पद की गृहाश्रम में लक्षणा यदि मानी जाय, तो इसमे भी कारण बताना पड़ेगा । भेड़ और बकरी के साथ गाय पद भी धेनु का ही बोधक माना जायगा! उपहूत पद का अर्थ होगा प्राप्त हों । हमारे अनुकूल हो, ऐसा अर्थ करने में भी कारण बताना पडेगा । ' क्षेमाय वः' यहाँ स्थित 'वः' पद का अर्थ 'तुम लोगो को छोड़कर पुरुष का व्यत्यय कर 'उन पदार्थों को' करने मे क्या कारण है? इसके बारे में भी कुछ बताया नही गया । तुमको ( गृहो को ) मैं प्राप्त करता हूँ, यह अर्थ तो सही लगता है । गाय, बैल आदि पूर्वोक्त पदार्थों के मिलने से पारमार्थिक मोक्ष और ऐहलौकिक अभ्युदय ( सुख) की प्राप्ति कैसे होती है? यह नही बताया गया है । स्वर्ग प्रभृति आमुष्मिक ( पारलौकिक ) अभ्युदय की प्राप्ति भी अग्निहोत्र प्रभृति वैदिक कर्मों के अनुष्ठान से हो होती है । उन पदार्थों से इनकी प्राप्ति कैसे हो सकती है । 'शंयु' यह पद का नाम तो है, किन्तु इसका प्रकृत में क्या उपयोग है, यह नही बताया गया । हिन्दी व्याख्या में तो प्रतिष्ठा अर्थात् सांसारिक सुख का नाम इसको बताया गया है, किन्तु यह बात निराधार है, क्योकि पद शब्द का यह अर्थ नहीं होता । निश्रेयस ( मोक्ष ) सुख को उन्नतिशील मानने पर सातिशयता के आधार पर अनित्यता दोष ',उसमें आवेगा । इस तरह से उसकी निःश्रेयसता ही नष्ट हो जायगी । इस तरह से ये मन्त्र गृहस्थाश्रम से संबद्ध है दयानन्द की यह प्रतिज्ञा सर्वथा गलत है ।
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वेदार्थपारिजातः १४६५ प्रतिपादकम् यतो हि --अत्रत्यमित्थ तदीय व्याख्यानम् -' अत्र सर्वेष्वाश्रमेषु धर्मस्य स्कन्धा अवयवास्त्रय सन्ति । अध्ययनम्, यज्ञ क्रियाकाण्डस्, दान च । तत्र प्रथमो ब्रह्मचारी तप सुशिक्षाधर्मानुष्ठानेनाचार्यकुले वसति । द्वितीयो गृहाश्रमी । तृतीयोऽ- त्यन्तमात्मानमवसादयन् हृदये विचारयन् एकान्तदेश प्राप्य सत्यासत्ये निश्चिनुयात् । स वानप्रस्थाश्रमी । एते सर्वे ब्रह्मचर्या - दयस्त्रय आश्रमा पुण्यलोकाः सुखनिवासा सुखयुक्ता भवन्ति । पुण्यानुष्ठानादेवाश्रमसंख्या जायते नान्यथा' (पृ० २७८) इति, एतदपि यत्किञ्चित् भावानवबोधात् । तत्र 'यज्ञोऽध्ययन दानमिति प्रथम, तप एव द्वितीय, ब्रह्मचारी कुलवासी तृतीय इति यथाश्रुतार्थातिक्रमो निर्दिष्ट । वस्तुतस्तु शाङ्करभाष्यरीत्यात्र ओङ्कारस्योपासनाविध्यर्थं 'त्रयो धर्मस्कन्धा ' इत्याद्यारभ्यते । नैव मन्तव्य सामावयवभूतस्यैवोद्गीथादिलक्षणस्यौङ्कारस्योपासनात् फल प्राप्यते किन्तर्हि यत्सर्वेरपि सामोपासने कर्मभिश्च प्राप्यते तत्फलममृतत्व -वलादोङ्कारोपासनात् प्राप्यत इति, तत्स्तुत्यर्थ सामप्रकरणे तदुपन्यास । तद्रीत्या धर्मस्य त्रय त्रिसख्याका. प्रविभागा । यज्ञोऽग्निहोत्रादि, अध्ययन सनियमस्य ऋगादेरभ्यास, दान बहिर्वेदि यथाशक्तिद्रव्यसविभागो भिक्षमाणेभ्य इत्येष प्रथम स्कन्ध | गृहस्थसमवेतत्वात् तन्निर्वर्तकेन गृहस्थेन प्रथम इत्यस्येक इत्यर्थ । नाद्योऽर्थ, द्वितीयतृतीयश्रवणात् । न च प्राथम्यमेव कुतो न प्रथमशब्दस्यार्थ इति वाच्यम्, द्वितीयेत्यादिवाक्यशेषात् ब्रह्मचारिप्राथम्यप्रसिद्धिविरोधाच्च । तप. कृच्छ्रचान्द्रायणादि, तद्वास्तापस परिव्राड् वा द्वितीयो धर्मस्कन्ध । न ब्रह्मसस्थो गृह्यते किन्त्वाश्रमधर्ममात्रस्थ., 'ब्रह्मसस्थोऽ- मृतत्वमेति' इति तस्य त्वमृतत्वश्रवणात् । तस्माद्वनस्थोऽमुख्य • परिव्राट् च द्वितीयधर्मस्कन्धेऽन्तर्भवति । ब्रह्मचारी आचार्यकुले ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ० ' इत्यादि छान्दोग्य श्रुति का वचन भी आपके अभिमत वानप्रस्थ आश्रम का साधक नही हो सकता । इस वाक्य की व्याख्या आपने इस प्रकार की है-'यहाँ सभी आश्रमो मे धर्म के तीन स्कन्ध है -एक विद्या का अध्ययन, दूसरा यज्ञ अर्थात् उत्तम क्रियाओ का करना, तीसरा दान अर्थात् विद्या आदि उत्तम गुणो का देना । इनमे से प्रथम कार्य के लिये ब्रह्मचारी तप का आचरण करते हुए आचार्य कुल मे रहकर धर्मानुष्ठानपूर्वक शिक्षा ग्रहण करता है । यज्ञ आदि क्रियाकाण्ड का अनुष्ठान गृहस्थाश्रमी करता है और तृतीय अपने को कठिन तपस्या के आचरण से सुखा देने वाला, एकान्त स्थान में बैठकर अपने चित्त में सद्विचारों की चिन्ता करने वाला, सत्य और असत्य का निश्चय करने वाला वानप्रस्थी कहलाता है । ये सब ब्रह्मचर्य प्रभृति तीनो आश्रम लोगो के कल्याण के लिये है । इन बातो से सब प्रकार की उन्नति करना मनुष्यो का धर्म है' ( पृ० २७८) । यह सारी व्याख्या भी गलत है, क्योकि आपने इस छान्दोग्य श्रुति का अभिप्राय ही नही समझा । छान्दोग्य श्रुति मे यज्ञ! अध्ययन और दान को प्रथम कोटि मे; तप को द्वितीय तथा आचार्य कुलवासी ब्रह्मचारी को तृतीय स्थान पर परिगणित किया है । इस तरह से वहाँ का क्रम आपकी व्याख्या के क्रम से एकदम विपरीत है । वास्तव में तो यहाँ पर शाकर भाष्य के अनुसार ओकार की उपासना की विधि का प्रारंभ किया गया है । यह नही समझ लेना चाहिये कि साम के अवयवभूत ओकार की उपासना से ही फल प्राप्त होता है, किन्तु सभी प्रकार के साम तथा कर्मों के अनुष्ठान से जो अमृतत्वरूप फल प्राप्त होता है, वह अकेले ओकार की उपासना से भी प्राप्त होता है । इसीलिये इस ओकार की स्तुति के लिये साम के प्रकरण में ही ओकार का उल्लेख किया गया है । उसके अनुसार धर्म के तीन विभाग होते है । अग्निहोत्र प्रभृति यज्ञ पहला, नियम पूर्वक ऋग्वेद आदि का अध्ययन दूसरा और वेदि के बाहर शक्ति के अनुसार मागने वालो को द्रव्य का दान करना -तीसरा । यह धर्म का पहला स्कन्ध है, प्रविभाग है । यह धर्मस्कन्ध गृहस्थाश्रम के साथ जुड़ा हुआ है । यहा एक का अर्थ प्रथम है, आद्य नही, क्योकिद्वितीय और तृतीय धर्म स्कन्ध भी यहा बताये गये है । प्रथम शब्द का अर्थ प्राथम्य या आद्य इसलिये नही होगा कि द्वितीय, तृतीय धर्म स्कन्धो को बताने वाले वाक्य भी आगे दिये गये है । साथ ही ब्रह्मचर्य आश्रम को ही प्राथमिकता प्रसिद्ध है, यहा गृहस्थ धर्म की प्राथमिकता मानने पर उसकी प्रसिद्धि का विरोध होगा । कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रतो का अनुष्ठान तप कहलाता 1 इस तप का जो आचरण करता है, वह तापस अथवा परिवाद धर्म का द्वितीय स्कन्ध है । यहां ब्रह्म में स्थित ब्रह्मज्ञ का ग्रहण नही किया जाता, किन्तु आश्रम धर्म में स्थित तपस्वी का ग्रहण किया जाता है । ब्रह्मसंस्थ तापस तो अमृतत्व को मोक्ष को प्राप्त कर लेता -है । इसलिये वन में रहने वाला सामान्य तपस्वी और परिव्राजक का अन्तर्भाव इस दूसरे धर्मस्कन्ध मे किया जाता है । ब्रह्मचारी f
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वेदार्थपारिजातः १४९ ६ वस्तु शीलमस्येति आचार्यकुलवासी, अत्यन्तं यावज्जीवमात्मान देहनियमैराचार्यकुलेऽवसादयन् क्षपयन् यो वर्तते स तृतीयो धर्मस्कन्ध । अत्यन्तमित्यादिविशेषणाद् नैष्ठिको ब्रह्मचारी गृह्यते नोपकुर्वाण तस्य स्वाध्यायग्रहणार्थत्वेन पुण्यलोकत्वा- नुपपत्ते । सर्व एते त्रयोऽप्याश्रमिणो यथोक्त मैं पुण्यलोका पुण्यलोकफला भवन्ति । अवशिष्टस्तत्रानुतो ब्रह्मसंस्थो ब्रह्मणि मम्यस्थितो मुख्य परिव्राड् अमृतत्व मुख्यमनापेक्षिकममरणभावमेति प्राप्नोति । प्रणवोपासनस्तुत्यर्थमाश्रमधर्मफलोपन्यासो न तत्फलविध्यर्थम्, प्रणवोपासनस्तुतये आश्रमफलविधये चेति वाक्यस्य प्रयोजनद्वयाङ्गीकारे वाक्यभेदापत्ते । यत्तु —' सर्वेष्वाश्रमेषु ' अध्ययन यज्ञो दान च' इति, तन्न, प्रथमान्त्ययोर्दारयोगाभावेन दम्पत्यो सहाधिकार- नियमेनाग्निहोत्रादिकर्मानधिकारात् । 'यज्ञोऽध्ययन दानमिति प्रथम, तप एव द्वितीय ' इत्यादिनिर्देशविरोधाच्च । स्पष्टमिति- गब्देन यज्ञतपोदानानामेकत्वलक्षण प्राथम्यमुक्तम् । प्रथमो ब्रह्मचारी सुशिक्षाधर्मानुष्ठानेनाचार्यकुले वसतीति तु विरुद्धम् । 1 तथा द्वितीय गृहाश्रमत्यपि विरुद्धमेव, तप एव द्वितीय इति विरोधात् । अत्यन्तमात्मानमवसादयन् हृदये विचारयन्ने- 1 1 कान्तदेश प्राप्य सत्यासत्ये निश्चिनुयात् स वानप्रस्थाश्रमीत्यपि विरुद्धमेव, अवपूर्वस्य सदेर्नाशार्थत्वप्रसिद्धे । वानप्रस्थ एव ब्रह्मात्मविचारे सम्पन्ने मन्यासाश्रमस्य वैयर्थ्यापाताच्च । न च तत्र प्रथमाश्रमस्यानिरूपणात् सिद्धान्ते न्यूनत्वात्पत्तिरिति वाच्यम्, अर्थवादवचनस्यास्य फलविधान इवाश्रमविधानेऽपि तात्पर्याभावात्, उपकुर्वाणब्रह्मचारिणः स्वाध्यायग्रहणार्थत्वेन स्वाध्यायस्य च सर्वपुरुषार्थसाधकत्वेन तस्य स्वातन्त्र्येण फलासाधकत्वात् । वानप्रस्थस्याश्रमधर्ममात्रनिष्ठस्य सन्यासिनश्च द्वितीयस्कन्धेऽन्तर्भावः, नैष्ठिकब्रह्मचारिणश्च तृतीयेस्कन्धेऽन्तर्भाव' । आचार्य कुल में रहता है । वही रह कर वह जीवन पर्यन्त नियमो का पालन करते हुए अपने शरीर को सुखा डालता है । यह धर्म का तीसरा स्कन्ध है । अत्यन्त पद की स्थिति के कारण यहा नैष्ठिक ब्रह्मचारी का ग्रहण किया जाता है, सामान्य ब्रह्मचारी का नही, क्योकि सामान्य ब्रह्मचारी तो वेदाध्ययन के लिये आचार्य कुल में रहता है । अतः उसको पुण्य लोकों की प्राप्ति होने का कोई प्रसंग नही है । यहा बताये गये तीनो आश्रमियो को यथोक्त धर्मों का पालन करने के कारण पुण्य लोको की प्राप्ति का विधान है । ब्रह्मसस्थ योगी के विषय में यहाँ कुछ नही कहा गया है । यह परिव्राजक पूरी तरह से ब्रह्म में लीन रहता है, इस लिये वह मुख्य अर्थात् अन्यनिरपेक्ष अमरता को प्राप्त करता है । इस प्रकरण में प्रणव की उपासना की स्तुति के लिये आश्रम धर्म के फल का उपन्यास किया गया है, यहा फल विधि नही बताई गई है, क्योकि प्रणव की उपासना की स्तुति और आश्रम फल की विधि दोनो का विधान मानने पर वाक्य के दो प्रयोजन हो जायेंगे और इस तरह वाक्यभेद दोष यहाँ उठ खड़ा होगा । दयानन्द का कहना है कि सभी आश्रमो के लिये अध्ययन, यज्ञ और दान का विधान है, किन्तु यह कथन इसलिये गलत है कि प्रथम और अन्तिम आश्रम मे स्त्री का संबन्ध मान्य नही है । अग्निहोत्र प्रभृति कर्मों में दम्पती का एक साथ अधिकार बताया गया है, अतः यज्ञ का संबन्ध सभी आश्रमो के साथ नही बनता, क्योकि उन आश्रमो में पत्नी का सम्बन्ध न होने से वे उसके अधिकारी ही नही होगे । यज्ञ, अध्ययन और दान यह पहला धर्मस्कन्ध है । तप दूसरा धर्मस्कन्ध है, इन अर्थों के प्रतिपादक वाक्यों में 'हवि' आदि शब्दों के कारण स्पष्ट ही यज्ञ, तप और दान को प्राथमिकता दी गई है । आश्रमो मे पहला ब्रह्मचारी अध्ययन और धर्म के अनुष्ठान के लिये आचार्य कुल में निवास करता है, यह अर्थ उस वाक्य का किसी भी तरह नही किया जा सकता । दूसरा गृहस्थाश्रमी है, यह कथन भी तप हो दूसरा है, इस वाक्य के विरुद्ध पडता है । इसी तरह से अपनी आत्मा को अत्यन्त पीडा देते हुए, चित्त मे भगवान् के स्वरूप का ध्यान करते हुए, एकान्त स्थल में असत्य और सत्य का विवेचन करने वाला वानप्रस्थी कहलाता है, यह बात भी गलत है, क्योंकि अब उपसर्ग पूर्वक सह धातु का अर्थ नाश होता है । यदि वानप्रस्थ आश्रम में ही ब्रह्मात्मतत्त्व का विचार संपन्न हो जाय, तो संन्यास आश्रम व्यर्थ हो जायगा । यदि यह शंका उठाई जाय कि इस तरह से तो आपके मत के अनुसार इस वाक्य में प्रथम ब्रह्मचर्य आश्रम का विधान न होने से न्यूनता आ जायगी, किन्तु इसका समाधान यह है कि यह तो अर्थवाद वाक्य है, अतः यहाँ फल की विधि के साथ आश्रम की विधि नहीं मानी जाती । सामान्य ब्रह्मचर्य का प्रयोजन वेद का अध्ययन करना है । यह स्वाध्याय सभी पुरुषार्थी का साधक है, अतः यह स्वतन्त्र रूप से किसी फल का साधक नही माना जाता । वानप्रस्थ का और आश्रम धर्म मात्र का पालन करने वाले संन्यासी का धर्म के द्वितीय स्कन्ध में तथा नैष्ठिक ब्रह्मचारी का तृतीय धर्मस्कन्ध में अन्तर्भाव माना जाता है ।
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वेवार्थपारिजाता १४९७ भर्तृप्रपञ्चादिमतेन तु चतुर्णामाश्रमिणामविशेषेण स्वकर्मानुष्ठानात् पुण्यलोकतोक्ता ज्ञानवर्जितानाम् । सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति । तत्रैव परिव्राडप्यन्तर्भूत. । ज्ञानं यमा नियमाश्व परिव्राजामपि तप एव । तप एव द्वितीय इत्यत्र तपः शब्देन परिव्राट्तापसौ गृहीतौ । तेषामेव चतुर्णा यो ब्रह्मसंस्थ. प्रणवोपासकः सोऽमृतत्वमेति, अधिकृतत्वाविशेषात्तेषाम् । तत्प्रति- षेधाभावाच्च, स्वस्वकर्मछिद्रेषु ब्रह्मसंस्थतोपपत्तेश्च । यववराहादिशब्दवद् ब्रह्मसंस्थशब्दो न सन्यासिनि रूढ । ब्रह्मणि सस्थिति- निमित्तत्वेन तत्प्रयोगस्याश्रमचतुष्टयेऽपि सम्भवात्, सङ्कोचे मानाभावात्, न चतुर्थाश्रमधर्ममात्रेणामृतत्व सम्भवति, ज्ञानानर्थक्य-प्रसङ्गात् । ज्ञानविशिष्टस्याश्रमस्यामृतत्वहेतुत्वे ज्ञानविशिष्टसर्वाश्रमाणा तथात्वे बाधकाभावात् । तस्माद्य एव ब्रह्मसंस्थः स्वाश्रमविहितकर्मवता तस्यैवामृतत्वं युक्तम् । तत्तु शङ्कराचार्या न क्षमन्ते । ब्रह्मण्येव सम्यक् स्थितिर्यस्य तस्य निवृत्तकर्मणः परिव्राज एव ब्रह्मसस्थत्वसम्भवात् । अनिवृत्तभेदप्रत्ययस्येद कृत्वेद प्राप्नुयामिति प्रत्ययवतो ब्रह्मसस्थत्व न सम्भवत्येव, विकारानृताभिसन्धिप्रत्ययत्वान् । न च रूढशब्दो निमित्तं नापेक्षत इति, तदपि न, गृहस्थ-तक्ष-परिव्राजकादिदर्शनात् । गृहस्थितिपारिव्राज्यतक्षणादिनिमित्तोपादाना अप्येते शब्दा आश्रमिविशेषे विशिष्टगतिमतिरूढा दृश्यन्ते, न यत्र यत्र निमित्तानि दृश्यन्ते तत्र वर्तन्ते, प्रसिद्ध्यभावात् । तथेहापि निवृत्तसर्वकर्मतत्साधनपरिव्राडेकविषयेऽत्याश्रमिणि परमहसाख्य एव प्रवर्तते । मुख्यामृतत्वफलश्रवणात्, 'अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रम्' इति श्वेताश्वतरश्रुतेश्च । एवमेव –'तमेत वेदानुवचनेन विविदिषन्ति । ब्रह्मचर्येण तपसा श्रद्धया यज्ञेनानाशकेन चैतमेव विदित्वा मुनि- र्भवत्येतमेव प्रव्राजिनो लोकमीप्सन्तः प्रव्रजन्ति । एतद्ध स्म वैतत्पूर्वे ब्राह्मणा अनूचाना विद्वास प्रजा न कामयन्ते कि प्रजया वेदान्त के प्राचीन आचार्य भर्तृप्रपच आदि के मत के अनुसार चारो आश्रमो में रहने वाले व्यक्तियो को तब तक समान रूप से अपने-अपने कर्मों के अनुष्ठान से पुण्य लोक की प्राप्ति की बात स्वीकार की जाती है, जब तक कि उनमें ज्ञान की उत्पत्ति नही होती । ये सब पुण्य लोको के ही अधिकारी होते हैं । इन्ही में परिव्राजक की भी गिनती होती है । यम और नियम का पालन परिव्राजक को भी करना ही है । तप को जहाँ धर्म का द्वितीय स्कन्ध माना गया है, यहाँ परिव्राजक और तापस दोनो का ग्रहण किया जाता है । इन चारो मे जो ब्रह्मज्ञ प्रणवोपासक है, उसी को अमृतत्व की प्राप्ति होती है, क्योंकि ये सब समान रूप से प्रणव की उपासना के अधिकारी है । प्रणव की उपासना किसी के लिये वर्जित नही है । अपने-अपने कर्मों का अनुष्ठान करते हुए -,सभी आश्रमो के लोग बीच बीच में इसकी भी उपासना कर सकते हैं । यव वराह आदि शब्दों की तरह ब्रह्मसंस्थ शब्द केवल संन्यासी के अर्थ में ही रूढ नही है । ब्रह्म में चित्त की अवस्थिति के आधार पर चारो आश्रमो मे इनकी स्थिति मानी जा सकती है । केवल संन्यास आश्रम में ही इसको सीमित कर देने में कोई प्रमाण नही है । चतुर्थ आश्रम मे धर्मो का अनुष्ठान करने मात्र से अमृतत्व नही प्राप्त होता, ऐसा होने पर तो ज्ञान की व्यर्थता मान लो जायगी । ज्ञान से युक्त आश्रम धर्म को अमरता का प्रतिपादक मानने पर ज्ञान से युक्त किसी भी आश्रम में इसकी स्थिति मानी जाय, तो उसमे कोई बाधा नही प्रतीत होता । इसलिये अपने अपने आश्रमो के लिये विहित कर्मों का अनुष्ठान करने वाला जो कोई भी ब्रह्म में लीन हो जाता है, वही अमर हो जाता है । इस मत को शंकराचार्य नही स्वीकार करते । ब्रह्म में ही जिसकी सम्यक् स्थिति है, जो समस्त कर्मो से निवृत्त है, ऐसा परिव्राजक ही ब्रह्मसंस्थ कहा जा सकता है । जिसकी भेददृष्टि अभी निवृत्त नही हुई है, तथा जिसको अभी इतना भान है कि यह काम करके मैं इस फल को प्राप्त करूंगा, वह ब्रह्मसंस्थ हो ही नही सकता, क्योकि अभी उसमें नाना प्रकार के विकारो वाली अनृत दृष्टि का अभिनिवेश विद्यमान है । रूढ शब्द को निमित्त की अपेक्षा नही रहती, ऐसा भी नही है, क्योंकि गृहस्थ, तक्षा, परिव्राजक आदि शब्दों के रूढ होते हुए भी इनको निमित्त की भी अपेक्षा रहती है । गृह में स्थिति, परिव्रज्या, तक्षण आदि निमित्तो को लेते हुए भी ये शब्द विशिष्ट आश्रम आदि मे ही रूढ है, जहाँ जहां निमित्त है, सब जगह इनकी प्रवृत्ति नही होती, क्योकि ऐसी प्रसिद्धि नहीं है । उसी तरह से यहां भी सभी कर्मों से और उनकी साधन सामग्री से दूर रहने वाला परिव्राजक ही ब्रह्मसंस्थ कहलाता है । यह सभी आश्रमधर्मों से अतीत होने से परमहंस कहलाता है । इसी परिव्राट् के लिये मुख्य अमृतत्व की प्राप्ति की बात कही जाती है और श्वेताश्वतर श्रुति वे इन आश्रम धर्मों से ऊपर स्थिति होने के कारण ही इसको परम पवित्र बताया है । 1 इसी तरह से ' तमेतं वेदानुवचनेन० ' इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति का सही अर्थ इस प्रकार है -उस औपनिषद पुरुष, उपनिषत्प्रतिपादित ब्रह्म को ब्राह्मण मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद का नित्य स्वाध्याय करके जानना चाहते हैं । यहा ब्राह्मण शब्द से तीनो १८८
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III वेदार्थपारिजात! करिष्यामो येषा नोऽयमात्माय लोक इति । ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थाय भिक्षाचर्यं चरन्ति । या ह्येव पुत्रेषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवत.' ( श० १४| ७| २| २५-२६, बृ० उ० ४।४।२२ ) । तमेतमौपनिषद पुरुषं वेदानुवचनेन मन्त्रब्राह्मणाध्ययनेन नित्यस्वाध्यायलक्षणेन विविदिषन्ति वेदितुमिच्छन्ति । ब्राह्मणा इत्युपलक्षणं त्रयाणा वर्णानाम्, त्रैवर्णिकाना वेदाधिकाराविशेषात् । वेदानुवचनेन कर्मकाण्डेन, कर्मणा सत्त्वशुद्धि- हेतुत्वात् । 'ज्ञानमुत्पद्यते पुसा क्षयात् पापस्य कर्मण ' इति स्मृते । यज्ञेन द्रव्ययज्ञादिभिर्दानेन, तस्यापि पापक्षयहेतुत्वात् । तपसा कृच्छचान्द्रायणादिना विशेषतोऽनाशकेन कामानशनमेवानाशक न भोजननिवृत्ति, मरणहेतुत्वेन विविदिषाहेतुत्वानु- पपत्ते । एव काम्यवर्जित नित्य कर्मजातमात्मज्ञानोत्पत्तिद्वारेण मोक्षसाधनम् । एव कर्मकाण्डेनास्यैकवाक्यता । एतमेव विदित्वा मननान्मुनिर्भवति । यद्यप्यन्यवेदनेऽपि मुनित्व स्यात्, किन्त्वन्यवेदनेन मुनिरेव स्यात् किन्तर्हि कर्म्यपि सम्भवति? औपनिषदं तु पुरुषं विदित्वा मुनिरेव भवति न कर्म्यपि । एतमेवात्मान स्वं लोकमिच्छन्तः प्रव्राजिनः प्रव्रजन्ति प्रकर्षेण व्रजन्ति सर्वाणि कर्माणि संन्यस्यन्ति । एतेन बाह्यलोकत्रयेप्सूना न पारिव्राज्येऽधिकारः । अविद्यानिवृत्त्या स्वात्मन्यवस्थानमेवात्मलोकप्राप्ति । तत्रार्थ- वादवाक्यरूपेण हेतुं दर्शयति-हम्म वै किल पूर्वेऽतिक्रान्तकालिका विद्वास, प्रजा कर्मापरविद्या च प्रजोपलक्षितलोकत्रयसाधनं न कामयन्ते । पुत्रादिलोकत्रयसाधन नानुतिष्ठन्ति । तेषामभिप्राय दर्शयति –प्रजया साधनेन किं करिष्याम. सर्वं ह्यस्माकमात्म- भूतमेव येषा नोऽयमपरोक्ष आत्माऽयमपरोक्ष प्रत्यक्षतो लोक लोकनीय प्रापणीयो नेतोऽन्यस्तदतिरिक्तस्य सर्वस्य मिथ्या- त्वात् । आत्मा च न बाह्यसाधनपुत्रकर्मादिभि. साध्य, तस्यानुत्पाद्यत्वात्, अनाप्यत्वात्, अविकार्यत्वादसंस्कार्यत्वाञ्च । ते च वर्णों का बोध होता है, क्योकि वेद के अध्ययन मे तीनो का समान अधिकार है । वेदानुवचन का अर्थ वैदिक कर्मकाण्ड के अनुष्ठान से है, क्योकि कर्मों का उपयोग मन की शुद्धि के लिये किया जाता है । स्मृति में भी बताया गया कि पाप कर्मों का क्षय हो जाने पर मनुष्य को ज्ञान उत्पन्न होता है । द्रव्यसाध्य यज्ञों के अनुष्ठान से और दान देने से ही पाप कर्मों का क्षय होता है । कृच्छ्र, चान्द्रायण प्रभुति व्रनो का अनुष्ठान करके भी साधक मोक्ष को प्राप्त करता है, क्योकि ये भी आत्मज्ञान की उत्पत्ति मे उस समय सहायक होते हैं, जब कि इनका अनुष्ठान फल की आकाक्षा से नही किया जाता । अनशन विशेषण का यहा यही तात्पर्य है । अनशन का अर्थ भोजन छोड देना नही है, क्योकि इससे तो शरीर की मृत्यु हो सकती है । इस परिस्थिति में वह उस ब्रह्म को जानने की इच्छा में नरह से हो सकता है । अत • फल की अभिलाषा को छोडकर किये गये, काम्य कर्मों से अतिरिक्त नित्य कर्मों के अनुष्ठान सहायकमे आत्मज्ञानकिस की उत्पत्ति के द्वारा मोक्ष की कारणता वन जाती है । इस तरह से वैदिक कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड की एकता भी सिद्ध , इसी को जानकर जो उस पर निरन्तर मनन करता रहता है वह मुनि कहलाता है । यद्यपि अन्य पदार्थों के जानने हो जाती है । साथ में वह कर्मी ( कर्मरत ) भी रहता है ॥ उपनिषत् प्रतिपादित,, सकता है किन्तु उनको जानने पर केवल मुनि ही नही होता किन्तु पर भी मुनि बन ब्रह्म को जानकर तो वह केवल मुनि ही रहता है, वह फिर कर्मों में लिप्त नही होता । इसी आत्मा को, अपने ( )की इच्छा वाले परिव्राजक संन्यासी पूरी तरह से सब कर्मों का परित्याग कर संन्यास ग्रहण कर लेते है । स्वरूप को प्राप्त करने इससे यह सिद्ध होता है कि बाह्य लोको की प्राप्ति की इच्छा वालो को संन्यास में अधिकार के द्वारा अपने स्वकीय स्वरूप को भलीभाँति जान लेना ही यहाँ आत्मलोक की प्राप्ति कहा जाता है नहीं है । अविद्या की निवृत्ति में हेतु ( कारण) बताया जाता है कि इस आत्मस्वरूप की उपासना में लगे हुए पुराने जमाने के संन्यासी। इसी में अर्थवाद वाक्य के रूप, प्रतिपादक अपर विद्या को और प्रजा शब्द से पहचानी जाने वाली बाह्य लोकत्रय की विद्वान् प्रजा को कर्मकाण्ड अनुष्ठान नहीं करते थे; पुत्र, वित्त, लोकप्रसिद्धि में तीन बातो की साधक विधियों का अनुष्ठानसाधकनहीं करतेविधियों को नही चाहते थे, उनका यह था कि हम प्रजा ( सन्तति ) का क्या करेंगे? जगत् में सब कुछ हमारा ही तो है, स्वात्मस्वरूप थे । उनका आन्तरिक अभिप्राय ( )है । हमें तो इस अपरोक्ष सदा अपने सामने विद्यमान स्वात्मस्वरूप को ही के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीकुछ भी नहीं है, क्योकि उससे भिन्न जो कुछ दिखाई पड़ता है, वह सब मिथ्या हैजानना। इसहै, स्वात्मस्वरूपउसी को प्राप्त करना है । इससे भिन्न यहाँ की अधिगति पुत्र, कर्म ( यश )