वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 601–610
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 601–610
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पदार्थपारिजातः १४६६ पुत्रवित्तलोकैषणाभ्यो व्युत्थाय भिक्षाचर्यं चरन्ति । पुत्रैषणा पुत्रेणेमं लोकं जयेयमिति मनुष्यलोकजयसाधन पुत्रं प्रतीच्छा, एषणा दारसग्रह, तस्या व्युत्थाय दारसंग्रहमकृत्वेत्यर्थं • । वित्तस्य कर्मसाधनस्य गवादेरुपादानमनेन कर्म कृत्वा पितृलोकं जेष्यामीति इच्छा वित्तैषणा । विद्यासंयुक्तेन वा देवलोकं केवलया वा हिरण्यगर्भविद्यया दैवेन वित्तेन देवलोक प्राप्नुया- मितीच्छा लोकैषणा तस्या अपि व्युत्थाय त्रिविधेऽप्यनात्मलोकप्राप्तिसाधने तृष्णामकृत्वा भिक्षाचर्या चरन्ति सन्यस्यन्तीत्यर्थः । कैश्चित्तु दैवाद्वित्ताद् व्युत्थानमेव न सम्भवतीति, तदपि न, एतावान् वै काम इति पठितत्वात् एषणामध्ये देवस्य वित्तस्य उक्तत्वात् । हिरण्यगर्भादिदेवताविषयैव विद्या वित्तमुच्यते, देवलोकहेतुत्वात् । न निरुपाधिकब्रह्मविद्यादेवलोकप्राप्तिहेतुः, ‘तस्मात् तत्सर्वमभवत् । आत्मा ह्येषा संभवति' इति श्रुते । तद्बलेन हि व्युत्थानम्, 'एत वैतमात्मान विदित्वा' इति विशेषवचनात् । तस्मात् त्रिभ्योऽप्यनात्मलोकप्राप्तिसाधनेभ्य एषणाविषयेभ्यो व्युत्थाय तत्र तृष्णामकृत्वेत्यर्थः । सर्वा हि साधनेच्छा फलेच्छ्वातो व्याचष्टे–श्रुतिरेकैवेषणेति । या ह्येव पुत्रैषणा सा विशेषणा, दृष्टफलसाधनत्वेन तुल्यत्वात् ॥ या वित्तैषणा सा लोकैषणा फलार्थेव सा । फलार्थप्रयुक्त एव सर्व सर्वं साधनमुपादत्ते । अत एवैकैवैषणा । या लोकैषणा सा साधनमन्तरेण सम्पादयितु न शक्यत इति साध्यसाधनभेदेनोभे हि यस्मादेते एषणे एव भवतः । -- यत्तु —' यस्य पुत्रैषणा तस्यावश्य वित्तैषणापि भवति,, यस्य वित्तैषणा तस्य निश्चयेन लोकैषणा भवति । यस्यैका लोकैषणा भवति तस्योभे पूर्वे पुत्रैषणावित्तैषणे भवतः ' (पृ० २७९) इति, तत्तु सर्वथा विश्वङ्खलम्, वेदाक्षरबहिर्भूतत्वात् । आदि के द्वारा नही हो सकती, क्योकि यह स्वात्मस्वरूप न तो उत्पाद्य है और न प्राप्तव्य हो, अर्थात् इसकी न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न प्राप्त ही किया जा सकता है, क्योकि यह स्वात्मस्वरूप अविकारी है और इसका किसी तरह से किसी भी प्रकार का कोई सरकार नही किया जा सकता । अतः ये परिव्राजक पुत्र, वित्त और लोकप्रसिद्धि जैसी मुच्छ इच्छाओ को छोडकर केवल भिक्षा मांगने में अर्थात् संन्यासी बनकर, सब कुछ छोड़कर केवल पेट भरने के लिये भिक्षा मांगना ही एक काम अपने पास रखते है, बाकी सारी विधियों का परित्याग कर देते हैं । पुत्रैषणा का अभिप्राय यह है कि पुत्र को सहायता में मैं इस लोक पर विजय प्राप्त करूँ, इस प्रकार की पुत्र के प्रति इच्छा । एषणा पद का तात्पर्य पुत्र की प्राप्ति के लिये पत्नी से सहवास करने में है । यह संन्यासी इससे ऊपर उठ जाता है, अर्थात् वह पुत्र को प्राप्ति के लिये किसी स्त्री से विवाह कर गृहस्थी नही चलाता । वित्त का अभिप्राय यज्ञ-याग आदि कर्मों की निष्पत्ति में सहायक गाय, हिरण्य ( सुवर्ण) प्रभृति का संग्रह करने में है । इनकी सहायता से यज्ञ-याग आदि का अनुष्ठान कर मैं पितृलोक को जीत लूंगा, इस प्रकार की इच्छा ही वित्तैषणा है । अपर विद्या के द्वारा अथवा केवल हिरण्यगर्भ विद्या के द्वारा अथवा वन की सहायता से देवलोक को प्राप्त करूँ, इस प्रकार की इच्छा लोकैषणा कहलाती है । इन तीनो प्रकार की एषणाओ ( इच्छाओ) से ऊपर उठकर अर्थात् इन तीनो प्रकार के साधनो में न पड़कर, क्योकि ये आत्मस्वरूप की अधिगति में सहायक नही बन सकते, अतः इसमें अपनी तृष्णा का परित्याग कर साधक संन्यास ग्रहण कर लेते है । कुछ लोगों का कहना है कि हिरण्यगर्भ प्रभृति देवी विद्या से कभी व्युत्थान, छुटकारा नही मिल सकता । किन्तु ऐसी बात नही है, क्योकि इसी प्रकरण मे कामनाओ की जो सूची दी गई है, उनसे इस दैव वित्त का भी परिगणन किया गया है । हिरण्यगर्भ प्रभृति देवताओ से संबद्ध विद्या को ही यहाँ वित्त कहा गया है, क्योकि उनसे देवलोक की प्राप्ति होती है । निरुपाधिक ब्रह्म स्वरूप का उपदेश करने वाली परा विद्या से देवलोक की प्राप्ति नही होती, क्योंकि श्रुति कहती है कि परा विद्या का जानने वाला सर्वमय हो जाता है, सभी जागतिक स्वरूप उसकी आत्मा के ही विलास प्रतीत होने लगते हैं । ऐसी स्थिति मे आ जाने से वह ब्रह्मवेत्ता उन सब एषणाओं से ऊपर उठ जाता है, जैसा कि श्रुतियों में प्रतिपादित है । इसलिये आत्मलोक की प्राप्ति में जो सहायक नही है, इस तरह की इन तीनो एषणाओं से ऊपर उठकर, अर्थात् इनमें किसी प्रकार की तृष्णा न रखकर ब्रह्मवेत्ता इनसे संन्यास ले लेता है, इनका परित्याग कर देता है । नाना प्रकार के साधनो मे मनुष्य अपने अभीष्ट को प्राप्त करना चाहते हैं, अतः श्रुति का यहाँ कहना है कि ये तीनों एषणाएँ अन्ततः एक ही हैं, पुत्रैषणा और वित्तेषणा में कोई अन्तर नही है, क्योंकि इन दोनों से हो इष्टफल की सिद्धि होती है । इसी तरह से वित्तेषणा और लोकैषणा में भी कोई अन्तर नही है । किसी न किसी फल की कामना से ही मनुष्य किसी काम में लगता है । अतः ये सब एषणायें एक ही हैं । लोकषणा की पूर्ति बिना पुत्र -वित्त आदि साधनों के हो नही सकती, अत: साध्य और साघन का भेद रहते हुए 1 भी ये सब एषणाएँ अन्ततः एषणा के रूप में सब एक ही है । 1
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वेदार्थपारिजाता १५०० नात्र साध्यसाधनभावः प्रोच्यते, तादृशपदविन्यासाभावात् । सामानाधिकरण्यव्यपदेशेन दृष्टफलसाधनत्वेन रूपेण पुत्रैषणा- वित्तैषणयोरभेद एवोच्यते । फलार्थत्वेन तुल्यत्वात्तु वित्तैषणालोकैषणयोरभेद उक्तः । साध्यसाधनादिभेदेन तासा भेदेऽप्येषणा- त्वेन रूपेणाभेद एव । यदुक्तम्- ' यज्ञेन नाशरहितेन विज्ञानेन धर्मंक्रियाकाण्डेन चैतं परमात्मानं विदित्वा मुनिर्भवति' (पृ ० २७९) इति, तत्तुच्छम् कर्मणा विज्ञानानामुत्पत्तिमता समेषामेवानित्यत्वे भङ्गुरत्वाविशेषात् । 'परमेश्वर ' प्राप्यो लोको दर्शनी- यश्चास्ति' ( पृ० २७९ ) इत्यपि न सङ्गतम्, प्राप्यस्य ग्रामादेरिव परिच्छिन्नत्वेनानित्यत्वापातात् । दर्शनीयस्यापि घटादेरिवा- नित्यत्वमेव । सिद्धान्ते स्वात्मभूतत्वे नित्यप्राप्तत्वात् स्वप्रकाशत्वाच्चाविद्याव्यवधाननिवृत्त्यैव तद्वयोपपत्तिः । किञ्च, वेदादिप्रामाण्यानभ्युपगन्तॄणा पुत्रवित्तेषणयोः सत्त्वेऽपि न लोकैषणा भवति, तेषा परलोकविश्वासा- भावात् । न चात्र सम्म्गनप्रतिष्ठाकामनैव लोकैषणेति वाच्यम्, प्रकरणविरोधात् । तथाहि-' पुत्रेणायं लोको जय्य, कर्मणा पितृलोकः, विद्यया देवलोक. ' इति श्रुतिप्रसिद्धमनुष्यलोक-पितृलोक- देवलोकसाधनत्वेन प्रसिद्धेषु पुत्रकर्मापरविद्याविषयाणा- मेषणाना त्यागेन ब्रह्मात्मनिष्ठासम्पादनाय सन्यासः क्रियते । 'ब्रह्मानन्दवित्तेन तुल्य न लोकवित्तं भवति । यस्य परमेश्वरे प्रतिष्ठास्ति तस्यान्याः सर्वा प्रतिष्ठा नैव रुचिता भवन्ति' ( पृ ० २७९) इत्यादिकं यद्यपि सत्यम्, तथापि प्रकृते तन्नोपयुज्यते । यत्तु—' ब्रह्मचर्य समाप्य गृही भवेद् गृही भूत्वा वनी भवेत् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्' इत्येकः पक्ष । 'यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेद् वनाद्वा गृहाद्वा' इत्यस्मिन् पक्षे वानप्रस्थाश्रममकृत्वा गृहाश्रमानन्तरं संन्यास गृह्णीयादिति द्वितीयः पक्षः । स्वामी दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है कि 'जिसको पुत्रेषणा रहती है, उसको वित्तैषणा भी अवश्य होती है और जिसको वित्तैषणा होती है, उसको लोकैषणा भी अवश्य होगी । जिसको अकेली लोकैषणा रहती है, उसके साथ भी पहले की पुत्रैषणा और वित्तैषणा लग जाती है' ( पृ० २७ ९ ), किन्तु यह व्याख्या सर्वथा निराधार है और वेद के अक्षरो के प्रतिकूल भी है । यहाँ इनका परस्पर साध्यसाधनभाव नही बताया गया है । इष्ट फल की साधक होने से पुत्रैषणा और वित्तैषणा में अभेद ही बताया गया है । इसी प्रकार वित्तेषणा और लोकैषणा की समानता ( अभिन्नता ) फल की अभिन्नता के आधार पर बनती है । साध्य और साधन के रूप में भेद होते हुए भी इनकी एषणा के रूप मे अभिन्नता है ही । दयानन्द पुन: कहते है कि ' यज्ञ से अर्थात् नाशरहित विज्ञान से धर्मानुष्ठान क्रियाकाण्ड से इस परमात्मा को जानकर मुनि अर्थात् विचारशील होते हैं' ( १० २८० ) किन्तु यह कथन भी निराधार है, क्योकि सभी विज्ञानात्मक कर्म उत्पत्तिशील हैं, अतः ये सब अनित्य हैं, क्षणभंगुर है । अतः इनसे परमात्मा (स्वात्मस्वरूप ) को नही जाना जा सकता । ' परमेश्वर प्राप्य है और यह लोक दर्शनीय है' (पृ० २७ ९ ) दयानन्द का यह कथन भी असंगत है, क्योकि परमेश्वर को प्राप्य मानने पर ग्राम प्रभूति नश्वर प्राप्य वस्तुओं के समान वह भी परिच्छिन्न और अनित्य हो जायगा । दर्शनीय वस्तु भी घट के समान अनित्य ही होती है । हमारे मत से तो यह परमात्मा अपना ही स्वरूप है, यह तो हमें सदा से ही प्राप्त है और स्वयं प्रकाशित हो रहा है । अतः उक्त साधनों का उपयोग केवल अविद्या के आवरण को हटाने मे ही होता है । एक बात और भी है, जो व्यक्ति वेद प्रभृति को प्रमाण नही मानते, उनमें पुत्र और वित्त की एषणा तो हो सकती है, किन्तु लोकषणा न हो पावेगी, क्योंकि उनका परलोक मे विश्वास है ही नही । लोकैषणा का अर्थ इस श्रुति नें लौकिक सम्मान, प्रतिष्ठा आदि की कामना नहीं है, क्योंकि ऐसा अर्थ करने पर यह प्रकरण के विरुद्ध पड़ेगा । यहाँ तो बताया गया है कि पुत्र से इस मनुष्यलोक को, कर्म से पितृलोक को और विद्या से देवलोक को जीतना चाहिये । इस तरह से इन तीन एषणाओं को तीन लोको की प्राप्ति के साधन के रूप में बताया गया है । इन पुत्र, कर्म ( वित्त ) और अपर विद्या नामक तीन एषणाओं का परित्याग कर, अर्थात् उक्त तीन लोकों की प्राप्ति के मोह को छोडकर ब्रह्मनिष्ठा की संपत्ति के लिये संन्यास का विधान है । 'ब्रह्मानन्द रूपी धन के बराबर लौकिक धन नहीं होता । जिस व्यक्ति की भगवान् में प्रतिष्ठा हैं, अर्थात् जिसका मन भगवान् में लग गया है, उसकी लौकिक प्रतिष्ठा ( मान -संमान ) नहीं जाती' ( १० २७ ९ ) इत्यादि दयानन्द की उक्ति यद्यपि सही है, किन्तु उसका प्रकृत प्रसंग से कोई लगाव नही है ।
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वेदार्थ पारिजातः १५०१ ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् सम्यग्ब्रह्मचर्याश्रमं कृत्वा गृहस्थवानप्रस्थाश्रमावकृत्वा सन्यासाश्रम गृह्णीयादिति तृतीयः पक्षः । सर्वत्रा- न्याश्रमविकल्प उक्तः । परन्तु ब्रह्मचर्याश्रमानुष्ठानं नित्यमेव कर्तव्यमित्यायाति । कुत, ब्रह्मचर्याश्रयेण विनाऽन्याश्रमानुपपत्तेः' (पृ ०२७८) इति, तदप्यविचारितरमणीयम्, सर्वत्र सन्यासे वैराग्यस्यैव हेतुत्वेनैकपक्षस्यैव युक्तत्वात् । ब्रह्मचर्याश्रम एव वैराग्योत्पत्तौ तदानीमेव संन्यासः, तत्रावैराग्ये दारसंग्रह कृत्वा गृहस्थ. सत्त्वशुद्धये कर्माणि कुर्वीत । सति वैराग्ये तदानीमेव सन्यास कुर्यात् ॥ वैराग्याभावे सत्त्वशुद्धये तप करणार्थं वानप्रस्थाश्रम गृह्णीयात् । सति वैराग्ये ततः सन्यस्येत् । यथा कथञ्चिद् वैराग्येऽपि आश्रमलक्षण सन्यास गृहीत्वा यमनियमादिसहितवेदान्तश्रवण प्रणवोपासन वा कुर्यात् । यथाकथञ्चिदपि वैराग्याभावे वानप्रस्थाश्रम एव तप परायणेन भाव्यम् । तत्प्रसादात् कषायपरिपाकाद् जन्मान्तरे वैराग्योदयेन सन्यासः सेत्स्यति । ब्रह्मचर्याश्रमस्य वेदाध्ययनार्थत्वाद् वेदस्य सर्वपुरुषार्थहेतुत्वात् तत्र विकल्पाभावस्तु युक्त एव । 'प्राजापत्यामिष्टि निरूप्य तस्या सर्ववेदसं हुत्वा ब्राह्मण प्रव्रजेत्' इति शतपथे श्रुत्यक्षराणि । ' यं य लोक मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते याश्च कामान् । त त लोक जयते ताश्च कामास्तस्मादात्मज्ञ ह्यर्चयेद् भूतिकामः ||' ( मुण्डको० ३| १ | १०) (पृ० २८०) । प्रजापतिदेवत्यामिष्टि कृत्वा तस्यामिष्टौ सर्ववेदस हुत्वा सर्वस्व दक्षिणा दत्त्वा ब्राह्मण. प्रव्रजेत् । यत्तु—'स सन्यासी प्राजापत्या परमेश्वरदेवताकामिष्टि कृत्वा हृदये सर्वमेतन्निश्चित्य तस्या सर्ववेदस शिखासूत्रादिकं हुत्वा मुनिर्मननशीलः सन् प्रव्रजति संन्यासं गृह्णाति' (पृ० २८० ) इति, तदप्यसङ्गतम्, सन्यासिन इष्ट्यामनधिकारात् । किञ्च, हृदये इस प्रकरण के आरंभ मे दयानन्द ने कहा है- 'संन्यासाश्रम के तीन पक्ष है- उनमे से एक यह है कि जो विषय -भोग करना चाहता है, वह ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ इन आश्रमो को स्वीकार कर अन्त मे संन्यास ग्रहण करे | दूसरा जिस समय वैराग्य हो, अर्थात् बुरे कामो से चित्त हट कर ठीक- ठीक सत्य मार्ग मे निश्चिन्त हो जाय, उस समय गृहाश्रम से भी संन्यास हो सकता है और तीसरा जो पूर्ण विद्वान् बन कर सब प्राणियो का शीघ्र उपकार करना चाहता हो, वह ब्रह्मचर्य आश्रम से ही संन्यास ग्रहण कर ले । यहाँ सर्वत्र अन्य आश्रमो का तो विकल्प बताया गया है, किन्तु ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान तो सर्वत्र आवश्यक माना गया है, क्योकि ब्रह्मचर्य आश्रम के बिना अन्य आश्रमो की उत्पत्ति ही नही हो सकती' ( पृ० २७८- २७ ९) । किन्तु यह सारा कथन भी जब तक इस पर कुछ विचार नही किया जाता, तभी तक के लिये भला मालूम होता है, क्योकि संन्यास आश्रम के लिये ब्रह्मचर्य की अपेक्षा वैराग्य को ही प्रधान कारण माना गया है । ब्रह्मचर्य आश्रम मे ही वैराग्य हो जाने पर उसी समय संन्यास लिया जा सकता । यदि इस आश्रम में वैराग्य उत्पन्न नही हुआ तो विवाह कर गृहस्थ धर्म का पालन कर अपने सात्त्विक भावो की शुद्धि में लगे रहना चाहिये । वैराग्य हो जाने पर गृहस्थाश्रम से ही संन्यास लिया जा सकता है । वैराग्य न होने पर पुनः अपने मानसिक भावों की शुद्धि के लिये वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार कर तप का अनुष्ठान करना चाहिये । वैराग्य उत्पन्न हो जाने पर संन्यास लेना चाहिये । अन्ततः वैराग्य की जिस किसी तरह से उत्पत्ति होने पर आश्रम धर्म का पालन करने के लिये संन्यास आश्रम को स्वीकार कर यम- नियम आदि का पालन करते हुए वेदान्त शास्त्र का श्रवण और कार की उपासना में लग जाना चाहिये । यदि प्रयत्न करने पर भी वैराग्य की उत्पत्ति न हो तो उस दशा में वानप्रस्थ आश्रम में ही रहकर तप करते रहना चाहिये । इस तप के प्रभाव से मानसिक कषायों ( दोषों ) का परिपाक होने पर, वासनाओ के क्षीण हो जाने पर दूसरे जन्म में वैराग्य की उत्पत्ति होकर संन्यास आश्रम की . प्राप्ति हो सकेगी । वेदो का अध्ययन पूरा करने के लिये ब्रह्मचर्य आश्रम आवश्यक है और वेद ही सभी पुरुषार्थों के साधक अत ब्रह्मचर्य आश्रम की सर्वत्र विद्यमानता तो इस तरह से उचित ही है । अर्थात् इस वैराग्य के लिये भी ब्रह्मचर्य आश्रम की आवश्यकता क्योंकि वेदाध्ययन से ही भविष्य में वैराग्य की संभावना हो सकती हैं । 'प्राजापत्य इष्टि में अपने सर्वस्व का दान कर गृहस्थ आश्रम को छोडकर, विरक्त होकर मनुष्य संन्यास आश्रम को स्वीकार करे यह बात शतपथ श्रुति में बताई गई है । इसमें मुण्डक श्रुति भी प्रमाण है-'वह शुद्ध मन से जिस-जिस लोक और कामना की इच्छा करता है, वे सब उसको सिद्ध हो जाते है । इसलिये जिसको ऐश्वर्य की इच्छा हो, वह आत्मज्ञ अर्थात ब्रह्मवेता -संन्यासी की सेवा करें । यहाँ प्राजापत्य इष्टि का अभिप्राय प्रजापति जिसके देवता है, उस इष्टि से है । इस प्राजापत्य इष्टि में अपने
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वेदार्थपारिजातः १५०२ निश्चित्येति कस्य शब्दस्यार्थः? सर्ववेदसमित्यस्य शिखासूत्रादिकं कथमर्थः? नहि कस्याञ्चिदिष्टौ संन्यासे वा शिखायज्ञोपवी- तादिहोमो विधीयते तादृग्विधेरभावात् । यदप्युक्तम्— 'परन्त्वय पूर्णविद्यावता रागद्वेषरहिताना सर्वमनुष्योपकारबुद्धीना संन्यासग्रहणाधिकारो भवति, नाल्पविद्यानामिति । तेषा संन्यासिना प्राणापानहोमो दोषेभ्य इन्द्रियाणा मनसश्च सदा निवर्तनं सत्यधर्मानुष्ठान चैवाग्नि- होत्रम् । किन्तु पूर्वेषा त्रयाणामेवाश्रमिणामनुष्ठातु योग्यं यद् बाह्यक्रियामयमस्ति, संन्यासिनां तन्न । सत्योपदेश एव सन्यासिनां 1 ब्रह्मयज्ञ., देवयज्ञो ब्रह्मोपासनम्, विज्ञानिना प्रतिष्ठाकरणं पितृयज्ञो ह्यज्ञेभ्यो ज्ञानदानम्, सर्वेषा भूतानामुपर्यनुग्रहोऽपीडनं च भूतयज्ञः, सर्वमनुष्योपकारार्थ भ्रमणमभिमानशून्यता सत्योपदेशकरणेन सर्वमनुष्याणा सत्कारानुष्ठान चातिथियज्ञ । एव 1 लक्षणा' पञ्च महायज्ञा विज्ञानधर्मानुष्ठानमया भवन्ति' (पृ० २८० ) इति, तदपि निर्मूलम्, सन्यासिना कृते पञ्चयज्ञविधाना- नुपलम्भात् 1। गृहस्थाना कृत एव पञ्चयज्ञानुष्ठान विहितम् । तथाहि-' स्वाध्यायेनार्चयेतर्षीन् होमैर्देवान् यथाविधि । पितॄन् श्राद्धेश्च नृनन्तैर्भूतानि बलिकर्मणा ||' ( म० ३२८१ ), 'ऋषियज्ञ देवयज्ञ भूतयज्ञं च सर्वदा । नृयज्ञ पितृयज्ञ च यथाशक्ति न हापयेत् | ' (म० ४।२१ ) इति गृहस्थप्रकरण एव पञ्चयज्ञविधानात् । 'अनीहमाना. सततमिन्द्रियेष्वेव जुह्वति' (म० ४।२२ ) इत्यपि द्रव्यमनीहमानाना गृहस्थानामेव शिलोञ्छवृत्तीना पङ्ग्वादीना चायं विधिरिति मेधातिथि' । तेषामपि ' यद्यर्थिता तु दारैः स्यात्' ( म ० ९ ।२०३ ) इति दारसग्रहविधानात् । न चैतेषा पञ्चयज्ञाधिकार, अद्रव्यत्वात् । भरणमात्रं ते लभन्ते । ‘वाच्येके सर्वस्व का दान कर ब्राह्मण सम्यास ग्रहण करता है । स्वामी दयानन्द ने इसका अर्थ 'परमेश्वर जिसके देवता है' ( पृ० २८० ) ऐसा किया है, जो कि सहा नही है, क्योकि सन्यासी का इष्टि मे अधिकार ही नहीं होता । ' ऐसा हृदय में विचार कर' यह अर्थ किस शब्द से निकलेगा? इसी तरह से ' सर्ववेदस' शब्द से शिखा सूत्र आदि का ग्रहण किस प्रमाण के आधार पर किया जायगा? किसी भी इष्टि में अथवा संन्यास आश्रम को स्वीकार करने पर भी शिखा यज्ञोपवीत आदि का होम कही भी विहित नही है । इस प्रकार की विधि का बोधक कोई वेद वाक्य भी उपलब्ध नहीं है । आगे अपनी व्याख्या मे दयानन्द ने कहा है-' परन्तु इस सन्यास आश्रम के ग्रहण करने का अधिकार उन्ही को होता है, जो कि सम्पूर्ण वेदविद्या से परिचित हो, राग-द्वेष से रहित हो और जिनकी बुद्धि सभी मनुष्यो का उपकार करने में लगी हो, अल्पज्ञ जनो को इसमे अधिकार नही दिया जा सकता । इन संन्यासियो का अग्निहोत्र यही कि वे नित्य प्राण और अपान की, अर्थात् अपने श्वास-प्रश्वास की नित्य आहुति देते रहते है और बाह्य दोषो से अपनी इन्द्रियों और मन को सदा हटाकर सत्य धर्म का अनुष्ठान करते हैं । अन्य तीन आश्रमो में रहने वाले व्यक्ति जिन बाहरी क्रियाकाण्डो का अनुष्ठान करते हैं, संन्यासियों के लिये उनकी आवश्यकता नही रहती । संन्यासियो के लिये तो सच्ची बात का उपदेश करना ही ब्रह्मयज्ञ है । ब्रह्म की उपासना करना देवयज्ञ है । अपने विषय के विद्वान् पुरुषो का आदर करना और अज्ञ जनो को ज्ञान का उपदेश करना पितृयज्ञ है । सभी प्राणियों पर दयाभाव दिखलाना और उनको किसी तरह की पीडा न पहुँचाना भूतयज्ञ है, सभी मनुष्यों के उपकार के लिये देश- देशान्तर में घूमते रहना, अभिमान न करना, सही बात को समझाना, इस प्रकार सभी मनुष्यो के सत्कार मे लगे रहना अतिथियज्ञ है । इस तरह के पाच महायज्ञ का अनुष्ठान करने वाले संन्यासी वैज्ञानिक धर्म के अनुष्ठान के रूप में प्रसिद्ध होते हैं ' ( पृ० २८० ) । किन्तु यह सारा कथन भी निर्मूल है, क्योंकि संन्यासियो के लिये कहीं भी उक्त पाँच महायज्ञो का विधान नही किया गया है । इन पांच यहायज्ञो का विधान तो केवल गृहस्थ के लिये ही है । जैसा कि मनुस्मृति में कहा गया है- 'वेदपाठ से ऋषियों को, होम से देवताओं को, श्राद्ध से पितरों को, अन्न से मनुष्यो को और बलिकर्म से भूतों को विधिपूर्वक पूजना चाहिये', 'ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नरयज्ञ और पितृयज्ञ इन पांच यज्ञो को जहां तक हो सदा कभी न छोडना चाहिये । इस प्रकार इन पाच यज्ञों का विधान गृहस्थ धर्म के प्रकरण में होने से ये उन्हीं से संबद्ध माने जा सकते हैं । आगे 'यज्ञ शास्त्र के जानने वाले कितने ही लोग इन महायज्ञों को न करके पांच ज्ञानेन्द्रियो के विषयो का ही हवन करते हैं, अर्थात् इन्द्रियो के विषयों में आसक्त नही होते' इस वाक्य में भी द्रव्य की इच्छा रखने वाले गृहस्थों के लिये ही यह विधान है, ऐसी व्याख्या मनु के व्याख्याकार मेधातिथि ने की है । इस प्रकार के शिला और उच्छ वृत्ति से अपनी जीविका चलाने 1वाले ब्राह्मण भी गृहस्थ होते हैं । उनका पाँच यज्ञ में अधिकार नही होता, क्योकि ये द्रव्यसाध्य हैं और उक्त वृत्ति वाले ब्राह्मण केवल
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वेवार्थपारिजाता १५०३ जुह्वति प्राणं प्राणे वाच च सर्वदा । वाचि प्राणे च पश्यन्तो यज्ञनिर्वृतिमक्षयाम् || ' (म० ४।२३) । न च सन्यासिनां कृते पञ्च- यज्ञविधानमतस्तत्र गौणी पञ्चयज्ञकल्पनापि व्यर्थेव । प्राणापानहोमस्तु प्राणेऽपानस्यापाने प्राणस्य च प्रविलापनमेव । दोषेभ्य इन्द्रियाणा मनसश्च निवर्तन सत्यधर्मानुष्ठानस्याग्निहोत्रत्वमपि प्रमाणशून्यमेव । निषिद्धविषयेभ्य इन्द्रियाणां मनसश्च निवृत्तिरपेक्षितैव । एवं सत्योपदेशादीना ब्रह्मयज्ञत्वादिसज्ञाकरणमपि निर्मूलमेव । विज्ञानाना प्रतिष्ठाकरण पितृयज्ञ इत्यपि तत्कपोलकल्पितमेव । 'अद्वितीयस्य सर्वशक्तिमदादिविशेषणयुक्तस्य परब्रह्मण उपासना सत्यधर्मानुष्ठानं च सर्वेषामाश्रमिणामेकमेव ' (पृ० २८० ) इत्यादिकमपि यत्किञ्चिदेव, परमेश्वरोपासनसत्यधर्मानुष्ठानयोर्भेदे ऐक्यासम्भवात् । अभेदे पृथगुल्ले खायोगाच्च । सर्वंशक्त्यादिविशेषणस्येत्युक्त्यैव निर्वाहे गुरुतरशब्दोपन्यासस्य व्यर्थत्वाच्च । य य लोकमित्यस्य त्वयमर्थ. -'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्य इत्यादि रीत्या सर्वात्मानमात्मत्वेन प्रतिपन्नो ब्रह्मात्मविद् य य पितृलोकदेवलोकादिक मनसा संविभाति सङ्कल्पयति मह्यमन्यस्मै वाऽय लोको भवत्विति, विशुद्धसत्त्वः विशुद्धं रजस्तमोरहितं सत्त्वं चित्तं यस्य स क्षीणक्लेशो निर्मलान्त करणो ब्रह्मविद्याश्च कामान्, काम्यन्त इति कामा भोगा- स्तान्, कामयते प्रार्थयते त त लोक ताश्च कामितान् भोगान् जयते प्राप्नोति । तस्माद्विदुष सत्यसङ्कल्पत्वाद् आत्मज्ञमात्मज्ञानेन विशुद्धान्त करणं पादप्रक्षालनशुश्रूषानमस्कारादिभिर्भूतिकामो विभूतिमिच्छुरर्चयेत् पूजयेत् । यत्तु – ' सन्यासिनमेव सदाचयेत्' (पृ ० २८१ ), इति तत्तुच्छम् तस्मादात्मज्ञ ह्यर्चयेदिति वचनेनात्मज्ञस्यैवार्चनविधानात् । न च संन्यासिन एवात्मज्ञत्वमिति नियम', याज्ञवल्क्यादीना गृहस्थानामप्यात्मज्ञत्वश्रवणात्, सन्यासिनामप्याधुनिकानामनात्मज्ञत्वदर्शनात् ॥ अपने भरण-पोषण करने लायक ही धन एकत्र करते हैं । इनमे से ' कोई गृहस्थ वाणी और प्राण में यज्ञ का अक्षय फल जानकर वाणी से प्राण को और प्राण मे वाणी को सदा होमते है, अर्थात् वाणी और प्राण का संयम करते है ।' इस प्रकार पचयज्ञ की विधि सर्वत्र गृहस्थों के लिये ही है. अतः पचयज्ञ की गौण विधि का विधान भी गृहस्थ के लिये होगा, संन्यासी के लिये नही । इस तरह से संन्यासी के लिये की गई दयानन्द की उक्त व्याख्या शास्त्रसंमत नही मानी जा सकती । प्राण-अपान के होम का तात्पर्य प्राण में अपान का और अपान में प्राण का मिला देना ही है । 'इन्द्रियो और मन को दोषो से हटा देना और सत्यधर्म का आचरण ही अग्निहोत्र है' दयानन्द की यह व्याख्या भी प्रमाणो से समर्थित नही है । निषिद्ध विषयों से इन्द्रियो की और मन की निवृत्ति तो अपेक्षित ही है । इस तरह से सही बात का उपदेश करना इत्यादि को दयानन्द ने ब्रह्मयज्ञ बताया है, उनकी पंचयज्ञ की यह नई व्याख्या भी सर्वथा निराधार है । विज्ञान की प्रतिष्ठा करना पितृयज्ञ कहलाता है, यह भी उनकी कपोल कल्पना मात्र है । 'अद्वितीय, सर्वशक्तिमान् आदि विशेषणों से युक्त परब्रह्म की उपासना और सत्य धर्म का आचरण सभी आश्रमो में रहने वाले व्यक्तियो का एक समान धर्म है' ( पृ० २८० ) दयानन्द का यह कथन भी निराधार है, क्योकि परमेश्वर की उपासना और सत्य धर्म के अनुष्ठान को अलग मानने पर इनका एक ही कैसे कहा जा सकता है । अब यदि ये अभिन्न है, तो इनका अलग से उल्लेख आपने क्यो किया? 'सर्वशक्ति' कहने से ही आपके कथन का निर्वाह हो जाता है. इस परिस्थिति में आपके लिये विशेषण लगाना व्यर्थ है । उक्त श्रुति में 'य यं लोकम्' इस अश का तात्पर्य यह है--' इस अणु आत्मा को चित्त की एकाग्रता स्थापित कर जानना चाहिये ' इस श्रुति के प्रमाण पर सब की आत्मा को अपनो आत्मा मानने वाला ब्रह्मवेत्ता जिस किसी पितृलोक, देवलोक आदि का मन में संकल्प करता है कि मुझे या किसी दूसरे अनुग्राह्य को अमुक लोक की प्राप्ति हो, उसको वह पद प्राप्त हो जाता है । जिसका चित्त रज और तम से रहित सत्व गुण प्रधान है, उसको विशुद्धसस्य कहा जाता है, इस तरह का निर्मल अन्तःकरण वाला ब्रह्मवेत्ता जिन जिन कामनाओं., जिन जिन लोको को चाहता है, उन उन कामनाओ और लोकों को वह प्राप्त कर लेता है । इसलिये इस तरह का विद्वान् ब्रह्मवेत्ता सदा सत्यसंकल्प होता है, अतः जो व्यक्ति अपने ऐश्वर्य को बढाना चाहता है, उसको चाहिये कि वह इस तरह के सत्यसंकल्प वाले ब्रह्मवेत्ता विद्वान् की विशुद्ध मन से पैर धोना, सेवा करना, नमस्कार करना आदि विविध उपचारो से पूजा करे । दयानन्द ने इसकी व्याख्या में बताया है कि ' संन्यासी की सदा पूजा करना चाहिये' ( १० २८१ ), किन्तु उसकी यह व्याख्या गलत है, क्योंकि यहां आत्मज्ञ की पूजा का ही विधान है । संन्यासी आत्मज्ञ हो ही, ऐसा कोई नियम नही है । याज्ञवल्क्य प्रभृति विद्वान् गृहस्थ होते हुए भी आत्मश थे । इसके विपरीत आजकल के अनेक संन्यासी आत्मज्ञ नही होते ।
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वेदार्थपारिजातः १५०४ पञ्चमहायज्ञविचारः सत्यार्थप्रकाशादौ पञ्चमहायज्ञस्वरूप यल्लिखित तदपि परम्पराविरुद्धमेव । यत्तु ब्रह्मयज्ञाग्निहोत्रप्रमाणरूपेण मन्त्रा उद्धृता' - 'समिधाग्नि दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । अस्मिन् हव्य जु होतन ॥ ' ( वा० सं ० ३( १ ), 'अग्नि दूतं परो दधे हव्यवाहमुपब्रुवे । देवाँ आ सादयादिह || ' ( वा० स ० २२१७) ॥ हे ऋत्विज, यूय समिधा सम्यगिद्धयते दीप्यतेऽग्निर्यया सा समित् तयाऽऽश्वत्थ्या समिधा अग्नि देव दुवस्यत परिचयत । दुवस्यतेः परिचरणार्थत्वात् । घृतै. पूर्णाहुतिसम्बन्धिभिः होष्यमाणैरतिथिमातिथ्यकर्मणाराधनीयमग्नि बोधयत प्रबुद्ध कुरुत । अस्मिन्नग्नौ हव्यान् नानाविधानि हवीषि आजुहोतन सर्वतो जुहुत । 'तप्तनप्तनथनाश्च' ( पा ० सू० ७ १/४५) इति तनबादेश. । यत्तु 'हे मनुष्या, वाय्वोषधिवृष्टिजलशुद्धया परोप- काराय घृतैर्घृतादिभिः शोधितैर्द्रव्यै समिधा चातिथिमग्नि यूय बोधयत' इत्यादिक तत्तु निर्मूलमेव, वाय्वादिशुद्धेरन्यथापि सम्भवात् । यदपि-' हव्या होतुमर्हाणि पुष्टि-मधुर सुगन्ध- रोगनाशकरैर्गुणैर्युक्तानि सम्यक्शोधितानि द्रव्याणि आसमन्ताज्जु- हुत । अनेन कर्मणा सर्वोपकार कुरुत' (पृ ० २८३ ) इत्यादिकम् तत्तु सर्वमुदक्षरमेव मन्तव्यम्, पूर्वमेव निराकृतत्वात् । एतदुपदेशेनैव सामाजिका यत्र तत्र ताम्रायसादिकुण्डेष्वग्निहोत्रनाम्ना वाय्वादिशुद्धि कुर्वन्तो दृश्यन्ते । अग्नि दूतमिति यमग्निमहं पुरः पुरतो दधे स्थापयामि त प्रति उपब्रुवे उपगम्य ब्रवीमि । किं तदाह–हे अग्ने, इह यज्ञे त्वं देवानासादयात् आसादय । कीदृशर्माग्नि दूत देवाना हव्यवाह हविषा वोढारम् । यदुक्तम्— 'अग्निहोत्र- कर्तेवमिच्छेदह वायो मेघमण्डले च भूतद्रव्यस्य प्रापणार्थमग्नि दूत भृत्यवत् पुरो दधे सम्मुखतः स्थापये कथ । भूतमग्नि हव्यवाह द्रव्य देशान्तर वहति प्रापयतीति अन्यान् जिज्ञासून् प्रत्युपदिशानि सोऽग्निरेतदग्निहोत्रकर्मणा देवान् दिव्यगुणान् पच महायज्ञ विचार सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थो में स्वामी दयानन्द ने पंच महायज्ञ आदि को जो स्वरूप बताया है, वह परम्परा से वर्णित स्वरूप के विरुद्ध है | स्वामी दयानन्द ने यहा ब्रह्मयज्ञ और अग्निहोत्र के प्रमाण के रूप मे ' सामिधाग्नि' प्रभूति मन्त्रों को उद्धृत किया है । इनमें से प्रथम मन्त्र का परम्परा प्राप्त अर्थ इस तरह से है - 'हे ऋत्विग्गण, आप लोग समिधा से विशेष कर अश्वत्थ ( पिप्पल वृक्ष ) की समिधा (लकडी ) से उस अग्निदेव की सेवा कीजिये । लकडी को समिधा इसलिये कहा जाता है कि इससे अग्नि प्रज्वलित होती है । इसी तरह से पूर्णाहुति के अवसर पर दो जाने वाली घृत की आहुति से इस अतिथिस्वरूप अग्नि को तृप्त कीजिये । इस अग्नि में आप लोग नाना प्रकार की आहुति प्रदान कीजिये । स्वामी दयानन्द ने तो इसका अर्थ करते हुए लिखा है कि- 'हे मनुष्यो, तुम लोग वायु, औषधी और वर्षा जल की शुद्धि से सबके उपकार के लिये घृत आदि शुद्ध वस्तुओ से और समिधा अर्थात् आम्र, ढाक आदि काष्ठों से अतिथिरूप अग्नि को नित्य प्रकाशमान करो' ( १० २८४ ), किन्तु यह कथन निराधार है, क्योकि वायु प्रभृति की शुद्धि अन्य उपायो से भी हो सकती है । आगे इसकी व्याख्या करते हुए वे लिखते है -'फिर उस अग्नि में होम करने के योग्य पुष्ट, मधुर, सुगन्धित, अर्थात् दुग्ध, घृत, शर्करा, गुड, केशर, कस्तूरी आदि तथा रोगनाशक सोमलता आदि सब प्रकार के शुद्ध द्रव्य है, उनका अच्छी प्रकार नित्य अग्निहोत्र करके सबका उपकार करो ' (पृ० २८४ ) यह सारा कथन भी मन्त्र के अक्षरों के विपरीत है और इसका खण्डन हम पहले ही कर चुके हैं । दयानन्द के इसी उपदेश के आधार पर आर्यसमाजी सज्जन जहाँ कही ताबे, लोहे आदि के कुण्ड बना कर उनमें अग्निहोत्र के नाम से वायु की शुद्धि करते देखे जाते हैं । 'अग्नि दूतं' इस द्वितीय मन्त्र का सही अर्थ यह है -जिस अग्नि को मै सामने स्थापित कर रहा हूं, उसके पास जाकर मै कहता हूं कि हे अग्ने, तुम इस मेरे यज्ञ में देवताओ को ले आओ । यह अग्नि, जिससे मैं यह बात कहता हू, वह देवताओं के लिये दी गई हवि को उनके पास पहुँचाने वाला है' ॥ स्वामी दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है-' अग्निहोत्र करनेवाला मनुष्य ऐसी इच्छा करे कि मैं प्राणियों के उपकार करने वाले पदार्थों को पवन और मेघ मंडल में पहुंचाने के लिये अग्नि को सेवक की नाई अपने सामने स्थापन करता हूं, क्योकि वह अग्नि हव्य अर्थात् होम करने के योग्य वस्तुओं को अन्य देश में पहुंचाने वाला है । इसीलिये इसका नाम 'हव्यवाट्' है । जो उस अग्निहोत्र को जानना चाहें, उनको मैं उपदेश करता हूं कि वह अग्निहोत्र कर्म से पवन और वर्षा जल की शुद्धि
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वेदार्थपारिजातः १५०५ वायुवृष्टिजलशुद्धिद्वारेहास्मिन् ससारे आसादयात् आसमन्तात् प्रापयति' (पृ० २८३ ) इति तत्तु निर्मूलमेव, तथा भावना- विधानादर्शनात् । निर्मूला च विधुरकर्तृकभामिनीभावना भ्रान्तिरूपैव । हव्यवाहमित्यस्योपस्थितस्य कर्मत्वेनान्वयमपहायानु- पस्थितस्य जिज्ञासूनिति पदस्य प्रकल्पनमन्याय्यमेत्र, उपस्थित परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात् । देवानित्यस्यापि प्रसिद्धेन्द्राद्यर्थमपहाय दिव्यगुणार्थप्रकल्पनमपि मुख्यार्थपरित्यागोऽर्थान्तरकल्पन चापि दूषणमेव, तस्मादिह यज्ञे देवान् आसादयेत्येवार्थो युक्त, देवतोद्देश्यकद्रव्यत्यागस्यैव यज्ञत्वेन यज्ञे देवासादनस्यैव सङ्गतत्वात् 1। - यदप्युक्तम्— 'हे परमेश्वर दूत सर्वेभ्य सत्योपदेशकम् अग्निसंज्ञक त्वा पुरोदधे इत्वेनोपास्य मन्ये । हव्यवाह ग्रहीतु योग्य शुभगुणमय विज्ञान हव्य वहति प्रापयतीति त त्वामुपदिशानि । स भवान् कृपया इह अस्मिन् ससारे देवान् दिव्यगुणान् प्रापयतु' ( पृ ० २८३ ) इति । तदपि न समञ्जमम्, शाब्दन्यायमर्यादाबहिर्भूतत्वान् । कया वृत्त्या दूतपद सर्वोपदेशक- परमिति वक्तव्यम्? स्वैरचारित्वे शाब्दन्यायेऽराजकतापत्ते । विज्ञानस्य हव्यपरता निर्मूलैव । अन्यदपि निर्मूलमेव । 'साय साय गृहपतिर्नो अग्नि प्रात प्रात सौमनसस्य दाता । वसोर्वसोर्वसुदान एधि वय त्वेन्धानास्तन्व पुषेम! | ' ( अथर्व० ९९| ७| ३) गृहपति गृहस्य स्वामी यजमान, गृहपतिनाहितोऽग्निर्वा गार्हपत्योऽग्नि । तद्धितप्रत्ययस्य लुकि रूपम् । नोऽस्माक सर्वेषु सायकालेषु प्रात कालेषु च सौमनसस्य सुखस्य दाता भवति । अथ प्रत्यक्षकृत हे अग्ने, वसोर्वसोः सर्वस्य प्रभूतस्य धनस्य दानो दाता एधि भव । त्वा त्वामिन्धाना हविर्भिर्दीपयन्तो वय तन्वम्, एकवचनमतन्त्रम्, सर्वाणि पुत्रमित्रादिशरीराणि पुषेम पोषयेम । यदुक्तम् —'अस्माकमयमग्निर्भोतिक परमेश्वरश्च गृहपति गृहात्मपालक प्रात साय परिचरित सूपासितश्च सौमनसस्यारोग्यस्यानन्दस्य च दाता' ( पृ० २८३) इति, तदपि न सङ्गतम्, भोतिकस्य जडस्याग्ने सम्बोद्ध्यत्वानुपपत्त्या से इस संसार में श्रेष्ठ गुणो को पहुंचाता है' ( पृ० २८४ ), किन्तु यह व्याख्या पूर्णत निराधार हैं, इस तरह की भावना करने की विधि वेद मे कही विहित नही है । विना प्रमाण की भावना उसी तरह से भ्रान्त मानी जाती है, जैसे कि विधुर की स्त्रीविषयक भावना भ्रान्त होती है । हव्यवाट् के रूप में उपस्थित अग्निरूप कर्म को छोड कर अनुपस्थित जिज्ञासु जनो को कर्म के रूप मे अन्वित करना भी गलत है, क्योकि उपस्थित को छोडकर अनुपस्थित पदार्थ के साथ अन्वय मिलाने में कोई प्रमाण नही है । ' देवान्' इस पद का भी अर्थ इन्द्र प्रभृति देवगण होता है, इसको छोडकर दिव्यगुण वाले पदार्थों की कल्पना करना भी गलत है, क्योकि इसमें मुख्य अर्थ को छोडना पडता है और एक नये अर्थ को कल्पना करनी पडती है । इसलिये इस यज्ञ में देवताओ को ले आओ, यही अर्थ उचित है । देवताओ के निमित्त आहुति आदि देना ही यज्ञ कहलाता है, अतः इस यज्ञ मे देवताओ का ले आना ही, उचित प्रार्थना मानी जा सकती है । दयानन्द ने इस मन्त्र की दूसरी व्याख्या यह की है - हे सब प्राणियो को सत्य उपदेशकारक परमेश्वर,, जो कि आप अग्नि नाम से प्रसिद्ध है, मै इच्छापूर्वक आपको उपासना करने के योग्य मानता हूँ । ऐमी कृपा करो कि आपको जानने की इच्छा करने वालों के लिये भी मै आपका शुभ गुणयुक्त विशेष ज्ञानदायक उपदेश करूं तथा आप भी कृपा करके इस संसार में श्रेष्ठ गुणो को पहुँचायें' (पृ ० २८४ ), किन्तु यह कथन भी सही नही है, क्योकि शब्दार्थप्रक्रिया के यह सर्वथा विपरीत है । आप यह बताइये कि किस वृत्ति की सहायता से आप दूत पद का अर्थ सर्वोपदेशक करेंगे । मनमानी करने पर वो शाब्दिकप्रक्रिया में अराजकता मच जायगी । 'हव्यवाट्' पद में हव्य का अर्थ विज्ञान करना भी निराधार है । इसी तरह से अन्य बातें भी गलत है । दयानन्द द्वारा उद्धृत तृतीय मन्त्र की सही व्याख्या यह है -'गृहपति शब्द से यहाँ घर का स्वामी यजमान गृहीत है । इस यजमान के द्वारा स्थापित गार्हपत्य अग्नि भी यहाँ गृहपति शब्द से ही अभिहित होता है । यह गार्हपत्य अग्नि हमारे सभी सायंकालीन और प्रातःकालीन कार्यों में सुख का संचार करने वाला बने । हे अग्नि, आप सभी तरह के प्रभूत धन को हमे दीजिये । हम आपको हवि प्रदान कर प्रज्वलित करते हुए अपने पुत्र, मित्र शरीर आदि को पुष्ट करें' । दयानन्द ने इसका अर्थ इस तरह से किया है- 'प्रतिदिन प्रातः सायं श्रेष्ठ उपासना को प्राप्त यह गृहपति, अर्थात् घर और आत्मा का रक्षक भौतिक अग्नि और परमेश्वर सौमनस्य आरोग्य, आनन्द और वसु अर्थात् धन का देने वाला है' ( पू० २८४), १८९ 1
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बेदार्थपारिजात १५०६ साधिदेवो गार्हपत्योऽग्निरेवेह ग्राह्य, तस्यैव गार्हपत्यरूपेण गृहपतित्वात् । परमेश्वरस्तु सर्वाधिपतिरेव, तस्य गृहपतित्वे वैशेष्यानुपपत्ते । एवं राज्यादिव्यवहारे हृदये च एधि प्राप्तो भवेत्यप्यसङ्गतम् । राज्यादिव्यवहारे कीदृशी प्राप्तिरित्यपि न स्पष्टमिति न्यूनतेव । वसुदाता भवेत्यन्वयोपपत्त्या निराकाङ्क्षत्वेन प्राप्त इत्यस्य कर्तृत्वेनाक्षेपानर्हत्वात् । हे परमेश्वर, त्वामिन्धाना प्रकाशमाना इत्यप्यसङ्गतम्, परमेश्वरस्य स्वप्रकाशत्वेन प्रकाशकर्मत्वानुपपत्ते । 'प्रात प्रातर्गृहपतिर्नो अग्नि साथ साथ सौमनसस्य दाता । वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतहिमा ऋधेम ॥ ' ( अथर्व ० १९।७।१४) पूर्वस्मिन् मन्त्रे शरीरपोषणमभ्यथितमिह तु जीवनमभ्यर्थ्यते -शत शतसख्याका हिमा हेमन्ततून् ऋधेम 1 वृद्धिमाप्नुम, 'ऋधु वृद्धौ' इति स्मरणात् । अग्निपरिचर्यया शत जीवाम इत्यर्थ: । 'जीवेम शरद शतम्' इत्यत्र शरच्छब्दस्येव प्रकृतमन्त्रे हिमशब्दोऽपि सवत्सरपर, शरदीव हेमन्तर्तावपि कदाचित् वसन्तसम्पातस्य जातत्वात् तथा व्यवहारोपपत्ते । शरद इव हिमर्तोरपि दुरतिक्रमणीयत्वेन संवत्सरपर्यन्तं निर्विघ्नमेव जीवन सम्पद्यत इति वा । यत्तु — 'अग्निहोत्रकरणार्थं ताम्रस्य मृत्तिकाया वैका वेदि सम्पाद्य काष्ठस्य रजतसुवर्णयोर्वा चमसमाज्यस्थाली च संगृह्य तत्र वेद्या पलाशाम्रादिसमिध सस्थाप्याग्नि प्रज्वाल्य पूर्वोक्तद्रव्यस्य प्रात सायकालयो. प्रातरेव वोक्तमन्त्रैर्नित्यं होम कुर्यात्' ( पृ ० २८३ ) इति, तदपि न सङ्गतम्, तादृशाग्निहोत्रस्यानार्षत्वात् । वस्तुतस्तु गृह्यसूत्रानुसारेणाग्न्याधान- पूर्वक स्मार्तमग्निहोत्र भवति । स्वशाखीयकात्यायनादिश्रौतसूत्रानुसारेणाहवनीयगार्हपत्यान्वाहार्यपचनसभ्यावसथ्यादि-पञ्चकुण्डतदनुगुणयज्ञशालादिनिर्माणाधानादिपूर्वक श्रोताग्निहोत्र भवति । किन्तु यह कथन भी सही नही है, भौतिक जड अग्नि को संबोधित नही किया जा सकता, इसलिये आधिदैविक गार्हपत्य अग्नि ही यहा गृहीत होता है, वही गार्हपत्य के रूप में गृहपति माना जाता है । परमेश्वर तो सभी का स्वामी है, उसको गृहपति कहने पर क्या विशेषता आ सकती है? इसी तरह से 'हे परमेश्वर, आप मेरे राज्य आदि व्यवहार और चित्त में सदा प्रकाशित हो' (पृ० २८४), इस तरह का अर्थ करना भी असंगत है, राज्य आदि व्यवहार मे किस तरह की परमेश्वर की प्राप्ति दयानन्द को अभिप्रेत है, यह भी स्पष्ट नही है । ' आप धन के दाता होइये' इसी से वाक्य का अन्त्रय जब बन जाता है और वाक्य निराकाक्ष हो जाता है, तब पुन कर्ता के रूप में परमेश्वर की प्राप्ति की बात करना गलत है । इसी तरह से परमेश्वर को प्रकाशित करने की बात भी गलत हैं, क्योकि परमेश्वर तो स्वयप्रकाश है, यह किसी से प्रकाशित नही हो सकता । 'प्रात' प्रात:' इस चतुर्थ मन्त्र का अर्थ यह है--' इससे पहले के मन्त्र मे अपने शरीर की पुष्टि के लिये प्रार्थना की गई थी । अब इस मन्त्र में जीवन के लिये प्रार्थना की जाती है-हे अग्ने, हम सौ वर्ष तक जीवित रहे, अर्थात् आपकी सेवा करते हुए हम सो वर्ष की आयु प्राप्त करें' । 'जीवेम शरद शतम्' इस मन्त्र में शरद् शब्द जैसे संवत्सर ( वर्ष) का वाची है, उसी तरह से हिम शब्द भी यह वर्ष का बोधक है । शरद् ऋतु के समान कभी कभी हेमन्त ऋतु में भी वसन्त सपात होता था, अतः ऐसा व्यवहार प्रचलित है । शरद् ऋतु के समान हेमन्त ऋतु को भी सकुशल बिता पाना कठिन होता है, अतः इन ऋतुओं के सकुशल बीत जाने पर सारा वर्ष सकुशल बीत जाता है, अतः इस तरह की प्रार्थना करना ठीक ही है । स्वामी दयानन्द यहाँ लिखते हैं-'अग्निहोत्र करने के लिये ताम्र या मिट्टी की वेदि बना कर काष्ठ, चादी या सोने का चमचा, अर्थात् अग्नि में पदार्थ डालने का पात्र और आज्य स्थालो, अर्थात् घृत आदि पदार्थ रखने का पात्र लेकर उस वेदि मे ढाक या आम्र आदि वृक्षों की समिधा स्थापन करके अग्नि को प्रज्वलित करके पूर्वोक्त पदार्थों की प्रातः काल और सायकाल अथवा प्रातःकाल ही नित्य होम करें' ( पृ० २८५ ), किन्तु यह कथन भी सही नही है, क्योकि इस तरह का अग्निहोत्र ऋषियो के द्वारा अनुष्ठित नहीं है । वस्तुस्थिति यह है कि गृह्यसूत्रो के अनुसार अग्नि का आधान करना स्मार्त अग्निहोत्र कहलाता है और अपनी अपनी शाखा के कात्यायन प्रसृति श्रोतसूत्रों के अनुसार आहवनीय, गार्हपत्य, अन्वाहार्यपचन, सभ्य और आवसथ्य इन पांच कुण्डो का और तदनुरूप यज्ञशाला का निर्माण कर उसमें अम्ति का आधान करना श्रोत अग्निहोत्र कहलाता है ।
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ववार्थपारिजातः १५०७ 'सूर्यो ज्योतिर्ज्योति. सूर्य स्वाहा । सूर्यो वच्च ज्योतिर्वर्च स्वाहा | ज्योति सूर्य्य. सूर्यो ज्योति स्वाहा । सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या ॥ जुषाण सूर्यो वेतु स्वाहा ।' इति प्रात कालमन्त्रा । 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा | अग्निर्वच ज्योतिर्वर्च स्वाहा । सजूर्देवेन सवित्रा सजू रात्र्येन्द्रवत्या । जुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा ।' इति सायङ्कालमन्त्रा । मन्त्रार्थस्तु -– योग्य सूर्य स एव दृश्यमानज्योति स्वरूपम्, यच्चेद ज्योतिर्दृश्यते तदेव सूर्यो देव, सूर्यस्य ज्योतिषश्च कदाचिदपि वियोगाभावात् तयोरैक्यमिहोच्यते । स्वाहेति सूर्याय देवाय हवि प्रदत्तमस्तु । स्वाहाशब्दस्य देवता- ' ' ( ) मुद्दिश्य विहितद्रव्यत्यागार्थत्वात् । अत्र नम स्वस्तिस्वाहास्वधालवषद्योगाच्च पा० सू० २।३।१६ इति सूत्रानुसार प्रथमा चतुर्थ्यन्तत्वेन व्याख्येया । सूर्यो ज्योतिज्र्ज्योति सूर्य इत्यभ्यासोऽनुपचरितैक्यरूपभूयस्त्वार्थबोधनाय ज्ञेय । सूर्यमुद्दिश्य ,, ' ज्योतिष्ट्वविधानाय प्रथम ज्योतिरुद्दिश्य सूर्यत्वविधानाय द्वितीय त्व वै भगवो देवतेऽहमस्मि ॥ अह वै भगवो देवतेऽहमस्मि । अह वै भगवो देवते त्वमसि' इतिवदत्यन्ताभेदबोधनाय व्यतिहारनिर्देशो वा । हान हा, न हा अहा., स्वस्य अहा अपरित्याग. स्वाहा, स्वस्यात्मन आत्मीयस्य वा अहान (रक्षण ) भवति देवतोद्देश्येन विहितद्रव्यत्यागादित्यर्थ । यथा क्षेत्रेषु व्रीहि- यव-गोधूमादिनिक्षेपो न त्याग किन्तु रक्षणमेव एकैकस्य बीजस्य फलरूपेणापरिगणितव्रीह्यादिलाभ-,, दर्शनात् तथैवाग्निमुखेन तत्तद्देवतोद्देश्येन विहितद्रव्यत्यागोऽपि रक्षणमेव तत्त्यागेनानन्तसुखादिलाभश्रवणात् । सुष्ठु आसमन्तात् हान देवतायै विहितद्रव्यस्य दान वा स्वाहा, स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकदेवतास्वत्वोपपादनस्यैव स्वाहापदार्थत्वात् । सूर्यसम्बन्धितेजो रात्रावग्नि प्रविशतीति सायमग्निर्ज्योतिरिति मन्त्रेण होमो युक्त. । उदयकालेष्वग्निसम्बन्धि तेज सूर्य प्रविशति । तस्मात्प्रात सूर्यो ज्योतिरिति मन्त्रेण होम । 'अग्निमादित्य साय प्रविशति तस्मादग्निर्द्वरानक्त ददृशे उभे हि इसके आगे स्वामी दयानन्द ने प्रात कालोन और सायकालीन अग्निहोत्र के संपादन के लिये दो दो मन्त्रउद्धृत किये है | क्रमशः उन मन्त्रो की व्याख्या इस प्रकार होगी - ' सूर्यो ज्योति० ' इस प्रथम मन्त्र में कहा गया है - ' सूर्य के नाम से यह दिखाई पडने वाला प्रकाश ही जाना जाता है । यह जो प्रकाश दिखायी पडता है, यही सूर्य देव है । सूर्य और ज्योति कभी अलग नही होते, अतः उन दोनो की एकता इस मन्त्र मे बताई गई है । स्वाहा का अर्थ है सूर्य देव के निमित्त दी गई यह हवि हमारे लिये कल्याणकारी हो । किसी देवता को उद्दिष्ट कर विधिपूर्वक हवि को देते समय स्वाहा शब्द का उच्चारण किया जाता है । स्वाहा के योग में चतुर्थी विभक्ति व्याकरण के नियम के अनुसार होनी चाहिये । अत यहाँ प्रथमा विभक्ति चतुर्थी के अर्थ मे ही प्रयुक्त मानी जाती है । सूर्य को ज्योति और ज्योति को सूर्य बताना इन दोनो की अटूट एकता को बडो गंभारता से कहने के लिये है । अपना पहला वाक्य सूर्य को ज्योति बताने के लिये और दूसरा वाक्य ज्योति को सूर्य बताने के लिये हैं 'हे भगवन्' आप ही मैं हूँ और मै ही आप है' इस श्रुति वचन में अपना और देवता का अत्यन्त अभेद बताया जाता है, उसी तरह से यहाँ भी सूर्य और ज्योति का अत्यन्त अभेद अभीष्ट है । स्वाहा शब्द का विग्रह इस तरह से किया जाता है -'हा' का अर्थ है हानि, इसके विपरीत ' अहा' का अर्थ हानि का न होना, अर्थात् अपना कुछ नुकसान न होना । स्व अर्थात् अपना अथवा आत्मीय का अहान अर्थात् रक्षण जिस व्यापार से होता हो, उसको स्वाहा कहा जाता है । इसका अभिप्राय यह हुआ कि देवता को निमित्त बनाकर इस शब्द के उच्चारण के साथ जो हवि दी जाती है, उससे अपने और अपने आत्मीय की रक्षा होती है, किसी प्रकार की हानि नही होती । जैसे खेत में धान, जौ, गेहू के दाने डालना हानि न कहलाकर रक्षा कही जाती है, क्योकि आगे चलकर एक एक बोज से अपरिमित धान आदि की प्राप्ति होती है, उसी तरह से अग्नि के मुख में उस उस देवता के निमित्त दो गई आहुति भी किसी प्रकार की हानि न होकर लाभ ही कहलावेगी, क्योकि आगे चलकर इस आहुति के त्याग से अनन्त सुख आदि लाभ को प्राप्ति होगी । अथवा सभी भांति सब तरह से देवता के निमित्त विहित द्रव्य के दान को स्वाहा कहा जायगा, क्योकि स्वाहा शब्द का उच्चारण कर जिस द्रव्य को समर्पित किया जाता है, उस पर अपना अधिकार छोड़कर अग्नि का अधिकार मान लिया जाता है । सूर्य सम्बन्धी तेज रात्रि में अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है, इसलिये सायंकाल 'अग्निज्योति० ' इस मन्त्र से आहुति दी जाय, यह उचित ही है । सूर्योदय की बेला में अग्नि का तेज सूर्य में प्रविष्ट हो जाता है, अतः प्रातःकाल ' सूर्यो ज्याति ० '
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१५०८ देवार्थपारिजातः तेजसी सम्पद्येते । उद्यन्त वादित्यमग्निरनुसमारोहति तस्माद् धूम एव दिवा ददृशे' इति तैत्तिरीयश्रुते । 'अग्निर्वर्च इति ब्रह्मवर्चसकामस्येति' ( का० श्री० सू० ४।१४।१५ ) इति कात्यायनवचनात् । 'ब्रह्मवर्चसकामः अग्निर्वर्चः सूर्यो वर्च इति ज्योति सूर्य इति वा प्रात ' ( का० श्री० सू० ४।१५।११ ) । यज्ज्योतिः सूर्य एव* यः सूर्य. स ज्योतिरेव, तस्मै स्वाहा । यत्तु - 'यश्वराचरात्मा ज्योतिषा प्रकाशकाना ज्योति प्रकाशक सूर्य सर्वप्राण. परमेश्वरोऽस्ति, तस्मै स्वाहा तदाज्ञापालनेन सर्वजगदुपकारायाहुति दद्म ' (पृ० २८५ ) इति व्याख्यानम्, तत्तु वेदबाह्यमेव, ज्योतिषा ज्योतिरिति पाठा- भावात् । सूर्यो ज्योतिरिति सामानाधिकरण्येन तु सूर्यज्योतिषोरभेद एव सिद्धयति । यदि ज्योतिष्पदमेव ज्योतिषा ज्योतिषो बोधकमिति, तदापि तत्र हेतुर्वक्तव्य । नहि ज्योतिष्पदे तादृशार्थबोधने शक्ति, न च लक्षणाया बीजमुपलभ्यतेऽन्वयानुपपत्ते- स्तात्पर्यानुपपत्तेश्चाभावात् । सन्तुष्यतु दुर्जनन्यायेन तथाभ्युपगमे सूर्यपदस्यापि लाक्षणिक एवार्थ. स्यात् । न च तद्युक्त शक्त्या बोधकत्वे सम्भवति भक्त्याश्रयणस्यायोग्यत्वात् । 'यो वर्चः सर्वविदा ज्योतिषा ज्ञानवता जीवाना वर्चोऽन्तर्यामितया सत्योपदेष्टा सर्वात्मा सूर्य. परमेश्वरोऽस्ति तस्मै स्वाहा' (पृ० २८५) इत्यपि तथाविधमेव, सर्वविदा ज्योतिषा ज्ञानवता जीवानामित्यर्थबोधकपदाना मन्त्रेऽभावात् । न जीवाना सर्ववित्त सम्भवति, प्रत्यक्षादिविरोधात् । वर्चःपदस्यान्तर्यामिसत्योपदेष्टृपरत्वमपि न सम्भवति प्रमाणाभावात् । सूर्याग्नि- पदाना प्रसिद्धार्थपरतामपहायाप्रसिद्धार्थकल्पन शाब्दन्यायविरुद्धमेव । 'येन तेजसेद्ध सूर्यस्तपति', 'ज्योतिषामपि तज्ज्योति. ' इत्यादिस्थलेषु तु तादृशानि पदानि सन्ति ये सूर्यचन्द्राग्न्यादिबाह्यज्योतिषा चक्षु श्रोत्रादीन्द्रियमनोबुद्ध्यादीनामान्तराणा ज्योतिषा च ज्योतिर्नित्य स्वयप्रकाशबोधरूपं प्रत्यक्चैतन्याभिन्न ब्रह्मात्मक तेजो विज्ञायते । न च प्रकृतमन्त्रे तादृशानि पदानि इस मन्त्र से आहुति दी जाती है । तैत्तिरीय श्रुति में भी यह प्रतिपादित है कि सायंकाल सूर्य अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है, अत रात्रि में दूर से केवल अग्नि ही दिखाई पडती है, उसका धूम नही, क्योकि उस समय दोनो तेज एक हो जाते है । प्रातः सूर्य के उदय होने पर अग्नि उसमे प्रविष्ट हो जाता है, अतः दूर से केवल धुआ दिखाई पडता है, अग्नि नही ।' कात्यायन ने इसका विनियोग बताया है कि ब्रह्मवर्चस्व ( ब्रह्मतेज ) की कामना वाला व्यक्ति' 'अग्निर्वचं.' इस मन्त्र से आहुति दे और प्रात काल आहुति देते समय वह ' सूर्यो वर्च ' इस मन्त्र का उच्चारण करे । जो ज्योति है, वही सूर्य है और जो सूर्य है, वही ज्योति है, अत उस ज्योतिस्वरूप सूर्य को दी गई यह आहुति मेरे लिये कल्याणकारी हो । दयानन्द की व्याख्या यह है- 'जो चराचर की आत्मा प्रकाशस्वरूप और सूर्य आदि प्रकाशक लोको का भी प्रकाश करने वाला है, उसकी प्रसन्नता के लिये हम लोग होम करते हैं ' ( पृ० ३८६ ), किन्तु यह ब्याख्या वेदानुकूल नहीं है, क्योकि ' ज्योतियो का ज्योति' इस तरह का पाठ नही है । यहाँ पर तो सूर्य और ज्योति का सामानाधिकरण्य है, अतः इनका अभेद ही सिद्ध होता है । यदि ज्योति पद को ही आप ' ज्योतियो का भी ज्योति' इस अर्थ का वाचक मानें, तो ऐसा अर्थ करने मे प्रमाण देना पड़ेगा । 'ज्योति' पद में इस तरह का अर्थ बताने की शक्ति नही है । लक्षणा तभी की जा सकती है, जब कि पदो का परस्पर अन्वय न बनता हो, या उनका कोई तात्पर्य न निकलता हो । आग्रहो व्यक्ति की प्रसन्नता के लिये उसकी बात मान भी ली जाय, तो ऐसा करने पर तो सूर्य पद का भी लाक्षणिक अर्थ करना पडेगा, किन्तु यह उचित नही माना जा सकता, क्योंकि शब्द की शक्ति से हो जब अर्थ की प्रतीति हो जाती हो, तो उस परिस्थिति में लक्षणा का सहारा लेना ठीक नही माना जा सकता । ' सूर्य जो परमेश्वर है, वह हम लोगों को सब विद्याओ को देने वाला और हमसे उनका प्रचार कराने वाला है, उसी के अनुग्रह से हम लोग अग्निहोत्र करते है ' ( पृ० २८६ ), दयानन्द का यह अर्थ भी वेद समर्थित नहीं है, क्योकि मन्त्र में इस अर्थ के बोधक पद नही है । जीव सर्ववेत्ता नही हो सकते । यह बात प्रत्यक्ष प्रमाण के विरुद्ध है । वर्च पद का अर्थ अन्तर्यामी और सत्य का अर्थ उपदेष्टा भी नही होता, क्योकि इसमे कोई प्रमाण नही है । सूर्य, अग्नि आदि पदो का प्रसिद्ध अर्थ छोड़कर अप्रसिद्ध अर्थ करना भी शास्त्र व्यवहार के विरुद्ध है । 'जिस तेज से समृद्ध हो सूर्य तपता है', 'वह ( ब्रह्म ) ज्योतियो का भी ज्योति है' इत्यादि श्रुतिवचनो मे तो इस तरह के पद हैं, जिनसे कि सूर्य, चन्द्र, अग्नि प्रभृति बाह्य ज्योतियो का और चक्षु, श्रोत्र प्रभृति इन्द्रियो और मन बुद्धि प्रभृति आन्तर ज्योतियो का नित्य प्रकाशक, स्वयंप्रकाशरूप प्रत्यक्ष चैतन्य से अभिन्न ब्रह्मात्मक तेज का बोध होता है । किन्तु प्रकृत मन्त्र में