वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 661–670

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 661–670

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वेदार्थपारिजात १५५ ९ तदनुगाना च भेदोऽभिप्रेयते? एवमेव ' ईश्वराधारेण सकल विश्व धारयन्ति चेष्टयन्ति च ते मरुत.' इत्यपि यत्किञ्चित्, मरुत्पदस्य प्राणार्थकत्वेन तथार्थत्वाङ्गीकारे गौणार्थाश्रयणापातात् । तथात्वेऽपि जडत्वं नातिवर्तते, जडाय बल्युपहरणे- अमिद्धान्तापातात् । वनस्पतिपदेन वायुमेघादोना ग्रहणे वनाना लोकानामधिपतित्वे ईश्वरान्तरत्वमायाति प्रसिद्धिव्या कोपश्च । ', यदपित्तमगुणयोगेनेश्वरोत्पादितेभ्यो महावृक्षेभ्यश्वोपकारग्रहण यदा कार्यम् इति तदपि बलप्रलपितमेव । तथात्वेऽपि जडेभ्यो बल्युपहारेण त्वद्रीत्या मूर्तिपूजात्वापत्तेः । भद्रकाल्या परमेश्वरशक्तित्वेऽपि प्रसिद्धदेवतातिक्रमे मानाभावात् । श्रयते हरि या सा श्रीति श्रियोऽपि तच्छक्तित्वसम्भवात् । विघ्नभयादपि नक्तञ्चारिभ्यो दिवाचारिभ्या वत्युपहरणेऽतीश्वरपूजा समायातैव । पितृभ्यः स्वधायिभ्य इत्यप्यसङ्गतम्, प्रत्यक्षपितृपितामहादिभ्यो ग्रासप्रदानं किमर्थम्? तेषा तृप्त्यर्थमिति चेन्न, ग्रासमात्रेण तृप्त्यभम्भवात् । तदर्थं तेषा कृते स्थाल्यादिषु पर्याप्तभाजनस्यैव दातव्यत्वा पातात् । एवमेव पितृतर्पण - नाम्ना तेभ्यस्तेभ्यो जलाञ्जल्यादिदानमपि व्यर्थमेव । वस्तुतस्तु मनुष्यभिन्नदेवपित्रादिसत्तानभ्युपगमे तर्पणश्राद्धवलि- वैश्वदेवादिकर्मानुष्ठान लोकवञ्चनार्थं स्वनास्तिक्यप्रच्छादनार्थमेव भवति सामाजिकानाम् । यदप्यतिथियज्ञसिद्धये प्रमाणमुपन्यस्तम् — ' तद्यस्यैवं विद्वान् व्रात्योऽति थर्गृहानागच्छेत् स्वयमेनमभ्युपेत्य ब्रूयात्- व्रात्य कावात्सीव्रंत्योदक व्रात्य तर्पयन्तु व्रात्य यथा ते प्रिय तथास्तु व्रात्य यथा ते बशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति' ( अथर्व ० १५ | ३ | १ ) इति, तदप्यकिञ्चित्करमेव, मन्त्रयोरनयोर्वात्यवर्णनपरत्वेनातिथिसामान्यवर्णनाभावात् । अत्र व्रात्यशब्दस्य महोत्तमगुणविशिष्ट इत्यर्थस्तु निष्प्रमाण एव । व्रात्यो नाम उपनयनादिसस्कारहीनः पुरुष उच्यते । स च यज्ञादिवेदविहित- क्रियास्वनधिकृतो व्यवहारायोग्यश्चेति प्रसिद्धम् । अत्र तु व्रात्यकाण्डे पञ्चदशे विशिष्ट व्रात्यः शिवः परमेश्वर एव तस्य सर्व- ईश्वर के सहारे सारे विश्व को धारण करते है और चेष्टा करते है, वे मरुत् है' ऐसा अर्थ करना भी गलत है, क्योकि मरुत् शब्द का अर्थ तो प्राण होता है, आपका अर्थ करने मे गौणी वृत्ति का सहारा लेना पडेगा और इतने पर भी यह जड पदार्थ के रूप में ही स्वीकृत होगे । जड पदार्थ को बलि देना तो किसी सिद्धान्त मे स्वीकृत नही है । वनस्पति शब्द से वायु, मेघ आदि का ग्रहण करने पर दन और लोक के अधिपति के रूप में किसी भिन्न परमेश्वर की सत्ता माननी पडेगी और इस तरह से आपका यह अर्थ लोकप्रसिद्धि के विपरीत पडेगा । इसी तरह से उत्तम गुण सम्पन्न ईश्वर के द्वारा उत्पादित महावृक्षो का भी सदा उपकार मानना चाहिये, अर्थात् उनको बलि देना चाहिये, यह बात भी बच्चो की बकवास के समान है । यदि ऐसा किया भी जाय, तो यह स्पष्ट जड पदार्थ को बलि देना हुआ, उसकी पूजा करना हुआ । इस तरह से यह तो एक प्रकार की मूर्तिपूजा ही हुई । भद्रकाली परमेश्वर की शक्ति होते हुए भी वह एक प्रसिद्ध देवता भी है । इसको न स्वीकार करने मे कोई प्रमाण नही है । 'जो हरि का आश्रय लेती है, वह श्री है, इस व्युत्पत्ति के अनुसार श्री भी परमेश्वर की ही शक्ति है । विघ्न के भय से यदि रात्रि मे और दिन मे भो विचरण करने वाले विघ्नकारी प्राणियो को बलि दी जाती है, तो यह एक प्रकार से ईश्वर से भिन्न जीवो को पूजा मान ही ली गई । 'पितृभ्यः स्वधायिभ्यः' का अर्थ भी आपका असंगत है । पिता, पितामह आदि जब प्रत्यक्ष है, तब उनको एक ग्रास किसलिये दिया जायगा? उनकी तृप्ति तो एक ग्रास से होगी नही । उनके लिये तो थाली मे पर्याप्त भोजन देना पडेगा, जिससे कि उनका पेट भर सके । इसी तरह से पितृतर्पण के नाम से उन जीवित पिता, पितामह आदि के लिये जलाजलि देना भी व्यर्थ है । वास्तव मे तो मनुष्यो से भिन्न देवता, पितृगण को न मानते हुए भी आर्यसमाजी तर्पण, श्राद्ध, बलिवैश्वदेव आदि का अनुष्ठान जनता को ठपने के किये और अपनी नास्तिकता को छिपाने के लिये करते हैं । आगे स्वामी दयानन्द अतिथि यज्ञ की सिद्धि के लिये ' तद्यस्यैवं विद्वान्' इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्रों को प्रमाण के रूप में उपस्थित करते है, किन्तु यह भी गलत है, क्योकि ये मन्त्र तो व्रात्य का वर्णन करते हैं । इनका सामान्य अतिथियों से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है । यहाँ व्रात्य का अर्थ 'महान् उत्तम गुण विशिष्ट' करना गलत है । व्रात्य उपनयन संस्कार से रहित पुरुष को कहा जाता है । वह वेदविहित यज्ञ आदि करने का अधिकारी नही होता, तथा वह अन्य व्यवहारों के सम्पादन में भी अयोग्य माना जाता है । अथर्ववेदीय व्रात्य काण्ड में इसके विपरीत भगवान् शिव को ही विशिष्ट व्रात्य माना गया है, क्योंकि वही इस विस्तृत सृष्टि का कारण है । मूल का कोई मूल नही होता, अर्थात् सारे जगत् के कारणभूत उस शिव परमेश्वर का कोई दूसरा कारण नही है । वह तो परममूल हैं,

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१५६० वेदार्थपारिजातः कारणत्वात् । मूले मूलाभावात् परममूलस्यामूलत्वात् तस्योपनयनादिसंस्कार कर्तृपित्राद्यभावाद् असंस्कृतत्वाद् व्रात्यत्वव्यपदेश ' । शिवपुराणादौ तस्य व्रात्यत्वव्यवहारो दृश्यते । स व्रात्यो महानुभावो देवप्रियः । किं बहुना, व्रात्यो देवाधिदेव एवेति प्रतिपादितः । यत्र व्रात्यो गच्छति तत्रैव विश्व जगद् विश्वे च देवास्तत्र समनुगच्छन्ति, तस्मिन् स्थिते तिष्ठन्ति तस्मिश्चलति चलन्ति, यदा स गच्छति राजवद् गच्छति, नैतावतापि सर्वव्रात्यपरोऽय व्रात्यशब्दः " किन्तु कञ्चिद्विद्वत्तमं महाधिकारं पुण्यशीलं विश्वमम्मान्यं कर्मपरैः कर्मविद्विष्टमनुलक्ष्य तत्रत्या मन्त्राः प्रवर्तन्ते । यस्य गृहे सौभाग्यवशात् स व्रात्योऽतिथि- र्भूत्वाऽऽगच्छेत् स स्वयमभ्युत्थानं कृत्वा ब्रूयात्-हे व्रात्य, त्व क्व निवासं कृतवानसि? हे अतिथे, यथा भवन्त उदक जलं गृहाण, अस्मदीया जना यथा ते प्रियं स्यात् तथा त्वा तर्पयन्तु यथा ते वशः स्वाधीनत्व तथास्तु यथा ते निकामः नितरां कामो विशिष्टकामस्तथास्तु । यदुक्त - ' यथा भवन्तः स्वकीयसत्योपदेशेनास्माकं मित्रादीश्व तर्पयन्तीति', तत्तु निर्मूलमेव, तादृशार्थबोधक- वचनाभावात् । दयानन्दोक्तिस्तु परस्परव्याहता, एकत्रोच्यते यस्य गमनागमनानियता तिथिः सोऽतिथिर्भवति । उत्तरत्र मन्त्रब्याख्याने तु सत्योपदेशकर्तृत्वे तस्य मित्रादितपंकत्वमुच्यते । मूले एकवचनान्त एव व्रात्यशब्दः । व्याख्याने यथा भवन्त इति बहुवचनमपि तत्र प्रयुक्तम् । 'यद्वस्तु भवत्प्रियमस्ति तस्याज्ञा कुरु । यथा भवदिच्छापूर्ति स्यात्तथा सेवा वय कुर्याम । यतो भवान् वय च परस्परं सेवासत्सङ्गपूर्विकया विद्यावृद्धया सदा सुखे तिष्ठेम ' ( पृ० ३१० ) इत्यादिक तु ,, सर्वं कल्पनामात्रम् अक्षराननुगमात् । किं बहुना मन्त्रब्राह्मणश्रोतगृह्यादिसूत्रस्मृत्यादिप्रामाण्याभ्युपगममन्तरा शिखा सबका कारण हैं, अतः उसका कोई कारण नही है । उस स्थिति में पिता मादि के अभाव में उसका उपनयन आदि सस्कार करने वाला भी कोई नही है, अतः उस परमेश्वर शिव के असंस्कृत होने से वह व्रात्य कहलाता है । शिवपुराण आदि ग्रन्थो मे शिव को व्रात्य के नाम से ही जाना गया है ।' वह व्रात्य परम श्रेष्ठ है, देवताओं का प्रिय है, बस्तुत सभी देवताओ का भी अधिपति ( स्वामी ) है । यह व्रात्य जहाँ चलता है, वही यह सारा जगत् और सारे देवता उसके पीछे पीछे चलते हैं, उसके रुकने पर रुक जाते है और उसके चलने ' पर फिर चलने लगते है । जब वह चलता है तो राजा के समान चलता है इस वर्णन से यह नही सिद्ध होता कि यहाँ का व्रात्य शब्द सभी प्रकार के व्रात्यों का बोधक है, किन्तु किसी महान् अधिकार सम्पन्न परमश्रेष्ठ विद्वान् विश्वसंमान्य पुण्यात्मा का यहाँ उल्लेख माना जायगा, जो कि कर्ममार्ग मे पडे कर्मठ लोगो को कभी मान्य नही होता । ऐसे परम विरक्त विशिष्ट व्यक्ति के लिये ही उक्त व्रात्य सूक्त के मन्त्रो का कहना है कि जिसके घर उसके सौभाग्य से इस तरह का व्रात्य अतिथि बनकर पहुँचता है, वह स्वयं उसकी अगवानी करके पूँछे कि हे व्रात्य, तुम इतने दिन कहाँ निवास कर रहे थे । हे अतिथि, आप हमारे यहाँ अपनी रुचि के अनुसार जल ग्रहण कीजिये, हमारे परिजन तुम्हारी रुचि के अनुसार सब तरह से सेवा करे, आप अपनी रुचि के अनुसार अपनी सारी विशिष्ट कामनाओ को पूरी कीजिये । ' अपने सत्य उपदेश से हमे और हमारे मित्रो को आप तृप्त करते है' ( पृ० ३१० ) स्वामी दयानन्द कृत यह अर्थ सर्वथा निर्मूल है, क्योकि इस तरह के अर्थ को बताने वाले शब्द इस मन्त्र में है ही नही । स्वामी दयानन्द का कथन अपने मे ही परस्पर विरोधी है । एक जगह वे कहते है कि जिसके आने-जाने की कोई तिथि निश्चित नहीं होती, वह अतिथि कहलाता है तो दूसरी जगह वे उस अतिथि को सत्य का उपदेश करके उसके मित्रो आदि को भी तृप्त करने वाला मानते है । जब अतिथि के आने की तिथि हो निश्चित नही है, तो वह सत्य का उपदेश कर उस परिवार के मित्रो को भी तृप्त किस प्रकार करेगा? मूल मन्त्र में व्रात्य शब्द एकवचन मे प्रयुक्त हुआ है, किन्तु इसकी व्याख्या करते हुए स्वामी दयानन्द ने उसको बहुवचन का बना दिया है । हे विद्वन्, जिस प्रकार आपकी ,,,प्रसन्नता हो हम लोग वैसा ही काम करें तथा जो पदार्थ आपको प्रिय हो उसकी आज्ञा कीजिये । जैसे आपकी कामना पूर्ण हो वैसी सेवा की जाय कि जिससे आप और हम लोग परस्पर प्रोति और सत्संगपूर्वक विद्यावृद्धि करके सदा आनन्द में रहे' ( पृ० ३१० ) यह व्याख्या भी पूरी तरह से उनको कल्पना पर ही टिकी हुई है, क्योकि मन्त्र के शब्दो से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । अधिक क्या। कहा जाय, मन्त्र, ब्राह्मण, श्रीतसूत्र, गृह्यसूत्र, स्मृति आदि ग्रन्थों का सहारा लिये बिना, इन सबको प्रमाण माने बिना शिखा ( चोटी ) और यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) को धारण करने को विधि भी केवल मन्त्रो के आधार पर ज्ञात नही हो सकती । शिक्षा पद का अर्थक्या

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वेदार्थपारिजातः १५६१ यज्ञोपवीतादिकमपि मन्त्रैर्न साधयितुं शक्यम् । शिखापदवाच्य किं क्व च तद्रक्षणीयम्, यज्ञोपवीतस्य कथं निर्माणम्, तच्च क्व कथं च धारणीयमेतत्सवं सामाजिकैर्मन्त्रबलेन न साधयितुं शक्यम् । ग्रन्थप्रामाण्यविचारः ', यदुक्तम्- य ईश्वरोक्ता ग्रन्थास्ते स्वत प्रमाणं कर्तुं योग्याः ये जीवोक्तास्ते परत प्रमाणा । ईश्वरोक्ताश्चत्वारो वेदाः स्वत प्रमाणम्, कुतस्तदुक्तौ भ्रमादिदोषाभावात् । तस्य सर्वज्ञत्वात् सर्वविद्याविषयत्वात् सर्वशक्तित्वात्' ( पृ० ३११ ) इत्यादि, तत्तु निर्मूलमेव, वेदानामीश्वरोक्तत्वे प्रमाणाभावात् । न च वेदा एव तत्र प्रमाणम्, अन्योन्याश्रयप्रसङ्गात् । नहीश्वरोक्तत्व प्रामाण्यप्रयोजकम् । न चेदमनुमानम्, दृष्टान्ताभावात् । न च व्यतिरेकिदृष्टान्तेन तत्सिद्धि, आप्तोक्तानामपि प्रामाण्यदर्शनात् । यदि तु वेदप्रामाण्यादीश्वरसिद्धि, ईश्वरोक्तत्वाच्च वेदप्रामाण्यमिति, तदपि तुच्छम्, अन्योन्याश्रयदोषग्रस्तत्वात्॥ न चानुमाना- दीश्वरसिद्धिरिति वाच्यम्, अनुमानेनेश्वरसामान्यसिद्धावपि तस्य वेदकारत्वासिद्धेः । यदुक्तम्— 'वेदेषु वेदानामेव प्रामाण्यं स्वीकार्य सूर्यदीपादीनामिव । यथा सूर्य. प्रदीपश्च स्वप्रकाशेनैव प्रकाशितो सन्तौ सर्वमूर्तद्रव्यप्रकाशकौ तथैव वेदाः स्वप्रकाशेनैव प्रकाशिता. सन्त सर्वानन्यान् विद्याग्रन्थान् प्रकाशयन्ति' (पृ० ३११ ) इति, तदपि तुच्छम्, परसमवेतक्रियाफलशालिनः कर्मत्वेनैकस्मिन्नेव तदसम्भवेन कर्मकर्तृविरोधात् । न च प्रकाशान्तर-, निरपेक्षत्वेन स्वप्रकाशत्वम् सूर्यादीनामपि चक्षुरादिप्रकाशसापेक्षत्वेन तदयोगात् । न च सजातीतप्रकाशानपेक्षत्वेनैव है? उसकी रक्षा किस तरह से की जाती है, यज्ञोपवीत किस तरह से बनाया जाता है तथा उसको कहाँ और कव धारण करना चाहिये, इन सब बातो को आर्यसमाजी केवल वेद के मन्त्रो के सहारे से कभी नहीं बना सकते, इसके लिये तो उनको पूरे वैदिक और स्मृति साहित्य को ही प्रमाण के रूप मे स्वीकार करना पडेगा ॥ ग्रन्थों के प्रामाण्य पर विचार ग्रन्थो के स्वतः प्रामाण्य और परत. प्रामाण्य की चर्चा उठाते हुए स्वामी दयानन्द कहते है कि ' ईश्वर की कही हुई जो चारो मन्त्रसंहिताएं है, वे ही स्वयं प्रमाण होने योग्य है, अन्य नहीं । परन्तु उनसे भिन्न भी जो जो जीवो के रचे हुए ग्रन्थ है, वे भी वेदो के अनुकूल होने से परतः प्रमाण होने होग्य है । क्योकि वेद ईश्वर के रचे हुए है और ईश्वर सर्वश, सर्वविद्यायुक्त तथा सर्वशक्ति- वाला है । इस कारण से निर्भ्रम और प्रमाण के योग्य है । और जीवो के बनाये ग्रन्थ स्वतः प्रमाण के योग्य नही होते, क्योकि जीव सर्वज्ञ, सर्वविद्यायुक्त और सर्वशक्तिमान् नहीं होते । इसलिये उनका कहना स्वतः प्रमाण के योग्य नही हो सकता' ( पृ० ३१२ ), किन्तु उनका यह सारा कथन निराधार है । वेद ईश्वर के द्वारा कहे गये है, इसमें कोई प्रमाण नही है । वेद ही इसमें प्रमाण नहीं माने जा सकते है, क्योकि ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रय दोष पड़ जायगा । ईश्वरप्रोक्त होने से वेद्र प्रमाण होगे और वेद के प्रमाण होने पर उसकी ईश्वर- प्रोक्तता सिद्ध होगी । वेद के ईश्वरप्रोक्त होने से उसमे प्रामाणिकता नही आ सकती । अनुमान से इसको सिद्ध नहीं किया जा सकता, क्योकि इसमें कोई दृष्टान्त उपलब्ध नही है । व्यतिरेक दृष्टान्त से भी इसकी सिद्धि नही हो सकती, क्योकि व्याप्त वाक्यों को भी प्रमाण माना जाता है । ईश्वर प्रोक्त वाक्य की व्यतिरेक दृष्टान्त के आधार पर प्रामाणिकता सिद्ध करने पर आप्त वाक्य की प्रामाणिकता नही सिद्ध हो पावेगी । वेद की प्रामाणिकता के आधार पर ईश्वर की सिद्धि और ईश्वरप्रोक्त होने से वेद का प्रामाण्य मानने पर स्पष्ट ही अन्योन्याश्रय दोष आता है । ईश्वर की सिद्धि अनुमान से नही कर सकते, क्योकि अनुमान से आप सामान्य रूप से ईश्वर की सिद्धि भले ही करलें, किन्तु यह सिद्ध नही कर सकते कि उस ईश्वर ने वेदों की भी रचना की है । ' वेद के विषय में जहाँ कही प्रमाण की आवश्यकता हो, वहा सूर्य और दीपक के समान वेदो का ही प्रमाण लेना उचित है । अर्थात् जैसे सूर्य और दीपक अपने ही प्रकाश से प्रकाशमान होकर सब क्रिया वाले द्रव्यों को प्रकाशित कर देते हैं, वैसे ही वेद भी अपने प्रकाश से प्रकाशित होकर अन्य ग्रन्थों का भी प्रकाश करते हैं ' (पृ० ३१२) स्वामी दयानन्द का यह कथन भी ठीक नही है, क्योकि जिस क्रिया का फल दूसरे के साथ जुडा है, उसको कर्म कहा जागया । अतः कर्म और कर्ता कभी एक नही हो सकते, क्योंकि कर्ता कारक में तो फल अपने में रहता है । स्वप्रकाश का अर्थ दूसरे प्रकाश की अपेक्षा न रहना भी नही कर सकते, इस तरह की स्वप्रकाशता तो सूर्य, दीपक प्रभूति में भी नही मिलेगी, क्योकि वे भी चक्षु प्रभूति प्रकाश की सहायता के बिना किसी वस्तु को अपने १ ९ ६

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वेदार्थपारिजातः III स्वप्रकाशत्वम्, इतरग्रन्थानामपि स्वसजातीयग्रन्थानपेक्षत्वेन स्वप्रकाशत्वापत्तेः । किञ्च वेदेषु वेदानामेव प्रामाण्ये चार्वाका- दीनामपि तेषा प्रामाण्याभ्युपगमापातात् । सूर्यस्य यथावस्तुप्रकाशकत्वे ते यथा न विवदन्ते तथैव वेदानां यथावस्तु-प्रकाशकत्वेऽपि ते न विवदेरन् । नहि वेदाना स्वप्रकाशत्व केचिद्दार्शनिका अभ्युपगच्छन्ति, शब्दात्मकाना तेषा श्रोत्रबुद्धयादि - प्रकाश्यत्वेन स्वप्रकाशत्वाभावात् । ज्ञानजनकत्वेन स्वप्रकाशत्वे तु चक्षुरादीनामपि स्वप्रकाशत्वापत्ति. स्यात् । न चेष्टापत्ति., तेषामतीन्द्रियत्वेन प्रकाशानुपपत्तौ स्वप्रकाशत्वस्य दूरापास्तत्वात् । य ईश्वरमेव नाभ्युपगच्छन्ति तेषा तदुक्तत्वेन वेद-प्रामाण्याभ्युपगमाकाङ्क्षा दुराशैव । अत एव वेदानामन्येभ्यो विरोधादप्यप्रामाण्य न भवतीत्यन्धश्रद्धामात्रम् । सिद्धान्ते तु सम्प्रदानाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वेनापौरुषेयत्वाद् वेदानामपास्तसमस्तभ्रमप्रमादविप्रलिप्सा-करणापाटवादिशङ्काकलङ्कपङ्कत्वेनानपोदित प्रामाण्यस्वतस्त्व तिष्ठति, सर्वप्रमाणाना प्रामाण्यस्वतस्त्वाभ्युपगमात् । करण- दोषाद् विषयबाधाच्चाप्रामाण्यमित्यप्रामाण्यं परत । प्रामाण्य तु स्वविषयसिद्धी अन्यानपेक्षत्वात् स्वत एव, अर्थतथात्वस्यैव प्रामाण्यात् । पूर्वप्रमाणस्य प्रामाण्याय प्रमाणान्तरापेक्षणे तस्यापि प्रामाण्याय प्रमाणान्तरापेक्षायामनवस्थादिदोषप्रसक्ते । नैयायिकादिरीत्या त्वीश्वरोक्ताना वेदानां गुणवद्वक्तृकत्वेन प्रामाण्यं न त्वीश्वरोक्तत्वेन, अननुगमाद् गौरवाच्च । गुणवद्वक्तृकत्वं त्वीश्वरानीश्वरसाधारणप्रोक्तवचनेष्वनुगतम् । आप नही प्रकाशित करते । समानजातीय प्रकाश की अपेक्षा न रखने को यदि स्वप्रकाशता माना जाय, तब तो अन्य ग्रन्थ भी जब अपने सजातीय ग्रन्थों की अपेक्षा न रखें, तो उनकी भी स्वप्रकाशता मानी जाने लगेगी । वेद का प्रामाण्य यदि वेद से ही सिद्ध है, तो उसमें फिर चार्वाक प्रभृति को भी किसी प्रकार संदेह नही होना चाहिये । सूर्य के प्रकाश से किसी वस्तु के प्रकाशित होने पर जैसे चार्वाक प्रभृति उस वस्तु के विषय में किसी प्रकार का संदेह नही उठाते, उसी तरह से उनको वेदो से वेदों की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाने पर उस पर विवाद नही उठाना चाहिये, किन्तु ऐसा होता नही । अतः उनकी स्वतः प्रकाशता मानी नही जा सकती । कोई भी दार्शनिक वेदों की स्वतः प्रकाशता को स्वीकार नही करता, क्योंकि वे तो शब्दात्मक है, अतः उनका प्रकाश श्रोत्र, वुद्धि आदि की सहायता से ही हो सकता है, स्वतः नही । स्वप्रकाश का अर्थ यदि ज्ञान का जनक माना जाय 1 तब तो चक्षु प्रभृति इन्द्रियो को भी स्वप्रकाश मानना पड जायगा, क्योंकि वे भी तो ज्ञान की जनक है ही । इस आपत्ति को यदि आप स्वीकार करलें, अर्थात् यदि आप चक्षु प्रभुति इन्द्रियो को भी स्वप्रकाश मानने लगें, तो यह कैसे संभव हो सकता है । ये इन्द्रिया तो अतीन्द्रिय है, इसमें जब प्रकाश ही नही है, तब इनकी स्वप्रकाशता कहाँ आवेगी । जो ईश्वर को ही नही मानते, उनके मत से उस ईश्वर के द्वारा कहे गये वेदो की प्रामाणिकता की इच्छा रखना दुराशामात्र है । ' इसीलिये वेदों का अन्य ग्रन्थों के साथ विरोध भी हो, तब भी अप्रमाण नही हो सकते' (पृ ० ३१३ ) यह उक्ति स्वामी दयानन्द की वेदो के प्रति अन्धश्रद्धा को व्यक्त करने वाली है । हमारे मत से तो सम्प्रदाय की अविच्छिन्न परम्परा के रहते भी उसका कोई बनाने वाला किसी की स्मृति में विद्यमान नही है, अतः वेदो की अपौरुषेयता सिद्ध होती है, अर्थात् यह मालूम हो जाता है कि उनका कोई बनाने वाला नहीं है । वेदो का कोई बनाने वाला नही है, इसी लिये वेदो में कर्ता में विद्यमान भ्रम, प्रमाद, वंचना, इन्द्रियो की असमर्थता आदि दोषो की भी किसी प्रकार की आशंका नही उठती । अतः इन वेदो की स्वतः प्रामाणिकता को किसी प्रकार से अस्वीकार नही किया जा सकता । सभी प्रमाणो का प्रामाण्य स्वतः ( अपने आप ) माना जाता है । कारण में किसी दोष के रहने पर अथवा विषय का बाघ हो जाने पर ज्ञान की अप्रामाणिकता सिद्ध होती है, अतः अप्रामाण्य का ज्ञान दूसरों की सहायता से ही हो पाता है । प्रामाण्य अपनी सिद्धि में किसी की अपेक्षा नहीं रखता, अत: वह स्वत ही सिद्ध है । प्रामाण्य का अर्थ वस्तु की यथार्थता, वास्तविकता ही है । पहले प्रमाण की यथार्थता के लिये यदि दूसरे प्रमाण की आवश्यकता मानी जायगी, तो उस दूसरे प्रमाण की प्रामाणिकता के लिये भी प्रमाणान्तर की आवश्यकता होगी और इस तरह से यह विषय अनवस्था दोष में पड़ जायगा । नैयायिक प्रभृति दार्शनिकों के मत से तो ईश्वरप्रोक्त वेदों का प्रामाण्य इस लिये माना जाता है कि ये गुणवान् वक्ता के द्वारा उपदिष्ट हैं । केवल ईश्वर के द्वारा उपदिष्ट है, इतने मात्र से वेदों का प्रामाण्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें कोई अनुकूल तर्क नहीं है, साथ ही ऐसा मानने में गौरव भी है । गुणवान् वक्ता तो ईश्वर भी हो सकता है और ईश्वरभिन्न कोई आप्त पुरुष भी, अतः यह लक्षण सभी प्रामाणिक वाक्यो में अनुगत रहता है ।

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वेदार्थपारिजात। १५६३ [–'ये स्वतः — ' यदप्युक्तम् ये प्रमाणभूता मन्त्रभागसहिताख्याश्चत्वारो वेदा उक्तास्तद्भिन्नास्तद्व्याख्यानभूता ब्राह्मणमर्हन्ति । तथैवैकादशशतानि सप्तविशतिश्च वेदशाखा वेदार्थव्याख्याना अपि वेदानुकूलतयैव प्रमाणमर्हन्ति' (पृ० ३११ ) इति, तदेतत्सर्वं मत्तप्रलपितमेव, निष्प्रमाणत्वात् खण्डितत्वाच्च 1। त्वद्रीत्या स्वत.प्रामाण्यस्यासिद्ध त्वाच्च । मन्त्रभागपद- व्यपदेशेनैव भागान्तरस्य ब्राह्मणभागस्यापि स्वत प्रामाण्य निश्चीयते । नहि फलस्यैको भाग फलमपर फलभिन्नो भवति । किञ्च चत्वारो वेदा इत्यनेन ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदश्वोच्यन्ते, न चत्वारि पुस्तकानि विनिगमनाविरहात् । महाभाष्यकारादिभिस्तेषामेकशतमध्वर्युशाखा एकविशतिधा बाहुच्यम्, नवधाथर्वण., सहस्रवर्त्मा सामवेद इत्येकत्रिशदुत्तरे- कादशशतशाखाभेदेन वर्णितत्वात् । एकैकस्या शाखाया संहिताभागो ब्राह्मणभागश्च । ब्राह्मणेऽपि ब्राह्मणारण्यकोपनिषद | इत्थं वैदिकाना दृष्ट्याऽनेकशाखाभेदभिन्नो मन्त्रब्राह्मणात्मक सर्वोऽपि वेदः । अत्र काश्चतस्र. शाखा वेदाः काश्च नेत्यत्र न कापि किञ्चन मूलमुपलभ्यते । भगवद्दत्तादिकृतवैदिक वाङ्मयादिप्रोक्ता युक्तयस्तु पूर्व खण्डिता एव । शिक्षाकल्पव्याकरण- निरुक्तछन्दोज्योतिषाङ्गानामायुर्वेदधनुर्वेदगान्धर्ववेदादीना च प्रामाण्यमास्तिकैरभ्युपेयत एव । भूमिकाभासग्रन्थे सत्यधर्मप्रियारचणैरित्युद्धृत्य विचारः कृतः । मन्ये तत एव पाठ. परिवर्तित । इदानीन्तने संस्करणे तु सत्यधर्मंप्रियाचरणैरिति पाठो दृश्यते, तथापि नार्थसङ्गतिः, तदनिरूपणात् । न च सत्यधर्माय प्रियमाचरण येषामिति समासो दोषतादवस्थ्यात् । नहि धर्मस्यासत्यत्व सम्भवति, येन तद्व्यावृत्तये सत्यमिति विशेषणसार्थक्यं स्यात् । विशेषणत्वाभावे तस्यापि धर्मान्तर्गतत्वमेवेति पृथक् पाठवैयर्थ्यमेव स्यात् । इसके आगे स्वामी दयानन्द ने लिखा है - 'मन्त्रभाग की चार संहिता, जिनका कि नाम वेद है, वे सब स्वत. प्रमाण कहे जाते है और इनसे भिन्न ऐतरेय, शतपथ आदि प्राचीन सत्य ग्रन्थ है, वे परत. प्रमाण के योग्य हैं । इसी तरह से ११२७ चार वेदो की शाखाएँ भी वेदो के व्याख्यान होने से परतः प्रमाण हैं' ( पृ० २१३ ), किन्तु इस कथन मे कोई प्रमाण नही है । आपने वेदो का जिस तरह का स्वतः प्रामाण्य माना है, उसकी सिद्धि हो भी नही सकती, जैसा कि अभी अभी हमने ऊपर बताया है । 'मन्त्रभाग' इस पद मे भाग शब्द ही यह सिद्ध करता है कि ब्राह्मण नाम का भाग भी स्वतः प्रमाण स्वरूप वेद का अभिन्न अंग है । किसी एक ही रूप का एक भाग तो फल हो और दूसरा भाग उससे भिन्न हो, ऐसा होता नही । चार वेद यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का बोधक शब्द है । इस नाम की चार पुस्तकों का उससे बोध होता हो. सो बात नही है । ऐसा अर्थ करने में आपके पास कोई सहायक सामग्री नही हैं । इसके विपरीत महाभाष्यकार प्रभृति ने १०१ यजुर्वेदीय शाखाओ का, २१ ऋग्वेद की, ९ अथर्ववेद की और एक हजार सामवेद की शाखाओं का " इस तरह से कुल मिलाकर वेद को ११३१ शाखाओ का स्पष्ट उल्लेख किया है । प्रत्येक शाखा में संहिता भाग और ब्राह्मण भाग अलग अलग है । ब्राह्मण भाग में भी ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों का समावेश माना जाता है । इस तरह से वैदिकों की दृष्टि में अनेक शाखाओ के भेदों में बटा हुआ यह मन्त्र और ब्राह्मणभागात्मक सारा साहित्य वेद के ही अन्तर्गत माना जाता है । इनमें से चार शाखाऐं वेदो की कौन कौन सी है, और कौन नही है? इसका विवेचन करने वाला कोई प्रमाण हमारे सामने विद्यमान नही है । भगवद्दत्त प्रभूति आर्यसमाजी विद्वानो ने 'वैदिक वाङ्मय का इतिहास' प्रभृति ग्रन्थों में जो युक्तियाँ दी हैं, उनका खण्डन हम पहले ही कर चुके है । वेदो की ही तरह शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इन छः वेदांगो को भी और आयुर्वेद, धनुर्वेद, शिल्पशास्त्र और गान्धर्व वेद को भी सभी आस्तिक जन प्रामाणिक ग्रन्थो के रूप में स्वीकार करते है । स्वामी दयानन्द ने इस नये प्रकरण का आरंभ ' सत्यधर्मंप्रियारचणैः' इस वाक्य से किया है. जिसका कि कुछ अर्थ नहीं "निकलता । लगता है इसीलिये बाद में पाठ बदल दिया गया । आजकल के संस्करण मे ' सत्यधर्मप्रियाचरणैः' ऐसा पाठ है । तब भी अर्थ को संगति तो नही बैठती, क्योकि इसके लिये उन्होंने कुछ प्रयत्न ही नही किया है । 'सत्यधर्म के लिये प्रिय आचरण करने वाले' ऐसा अर्थ करने पर भी दोष बचा ही रह जाता है, क्योंकि धर्म कभी असत्य नहीं होता, तब उसकी निवृत्ति के लिये यहाँ ' सत्य' विशेषण जोड़ने की क्या आवश्यकता है? अब यदि इसको विशेषण न मानकर धर्म का ही अंग माना जाता है, तो फिर उसका अलग से उल्लेख करना व्यर्थ है ।

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बेदार्थपारिजातः १५६४ 'य ईश्वरोक्ता ग्रन्थास्ते स्वत प्रमाण कर्तुं योग्याः सन्ति' ( पृ० ३११ ) इत्यस्य कोऽभिप्रायः? ग्रन्थाः स्वतः प्रमाणं केन कथं कर्तुं शक्यन्त इति तु सामाजिका एव जानन्तु । प्रामाणिकैस्तु स्वतः प्रमाणं प्रामाण्यस्वतस्त्वादेव न क्रियते । ग्रन्थास्ते स्वत प्रमाणमित्येतावनैवोक्तार्थस्य गतार्थत्वात्, अधिकस्य व्यर्थत्वात् । किञ्च मन्त्रभागः संहितेत्यत्र भागपदोपन्यासस्तु तद्रीत्या निरर्थक एव तेन वेदे भागान्तरानभ्युपगमात् । वस्तुतस्तु मन्त्रभागप्रसिद्धयापि ब्राह्मणरूप- भागान्तरस्य वेदत्वमनायासेनैव सिद्धयति । किञ्च, 'वेदार्थव्याख्याना ' ( पृ० ३११ ) इत्यत्र समानवाचकयोरर्थव्याख्यानपदयोरन्यतरस्योपन्यासो व्यर्थ एव, एकेनैव गतार्थत्वात् ॥ ' वेदानुकूलतयैव प्रमाणमर्हन्ति' (पृ० ३११ ) इति वाक्य न मनोज्ञम्, प्रामाण्यमर्हन्तीत्यस्यैव युक्तत्वात् । ' सर्वपदार्थानां श्रवणमननेनानुमानिक ज्ञानतया निश्चयो भवति' ( पृ ० ३१४) इति वाक्यस्य को वार्थः? कथञ्चात्र समन्वयः? न चानुमानिकं ज्ञानं श्रवणेन शक्यं भवितुम्, नापि सर्वपदार्थाना ज्ञानतया निश्चयो भवितुं शक्यः भ्रमाभावप्रसङ्गात् । :' ( | | ) नापि श्रवणस्य मनन क्रियते श्रुतार्थस्यैव मन्तव्यत्वविधानात् श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य बृ० उ० ४ ५ ६ इति श्रुतेः । - तर्कसंग्रह चिन्तामणि जागदीश्यादिग्रन्थाना विद्वन्मान्याना न्यायाभासत्व न्यायवैशेषिकमतविरुद्धत्वं च (पृ० ३१५ - ३१६) कोऽनुन्मत्तो वक्तु शक्नुयात् । 'अशक्तास्तत्पद गन्तु ततो निन्दा प्रकुर्वते' सत्यमिदमाभाणकमेवानुसरति दयानन्द' । साख्यतत्त्वकौमुद्याश्व साख्यशास्त्रविरुद्धत्व ( पृ० ३१६ ) तेन जन्मसहस्रैरपि न दर्शयितुं शक्यम् । वेदान्तसार- ( ) ( ) -पञ्चदशीप्रभृतिग्रन्थानामपि वेदान्तविरुद्धत्वकथनं पृ० ३१६ दुःसाहसमात्रमेव ॥ शाङ्कर शारीरक भाष्य भामती-पञ्चपादिकाविवरणखण्डखाद्यचित्सुख्यद्वैतसिद्धिप्रभृतिग्रन्थाना वेदान्तविरुद्धत्वं नोक्तमित्येव बहु मन्तव्यम् । अन्यथा कीदृशी I जो ईश्वरप्रोक्त ग्रन्थ है, उनका स्वतः प्रमाण करना चाहिये, इसका अभिप्राय क्या हुआ? ग्रन्थो को स्वत. प्रमाण कौन किस तरह से करेगा, इस बात को आर्यसमाजी ही जान सकते है | प्रामाणिक जन तो प्रामाण्य के स्वतस्त्व के आधार पर ग्रन्थो को स्वतः प्रमाण नहीं मानते । वेद प्रभृति ग्रन्थ स्वतः प्रमाण हैं, उनके लिये केवल इतना ही कहना पर्याप्त है । इसके साथ प्रामाण्य का स्वतस्त्व आदि बालों को जोड़ना व्यर्थ है । इसी तरह से सहिता मन्त्रभाग है, इस वाक्य में भाग पद को रखना भी आपके मत के अनुसार तो व्यर्थ ही है, क्योंकि मन्त्रभाग के अतिरिक्त आप ब्राह्मणभाग को वेद मानते ही नही । हमारे मत से तो आपकी इस उक्ति के सहारे ही मन्त्रभाग की प्रसिद्धि के आधार पर ब्राह्मणभाग की भी वेद के रूप में स्वतन्त्र सत्ता सिद्ध हो जाती है । आपके ' वेदार्थव्याख्यान' इस समस्त पद मे अर्थ और व्याख्यान एक ही अर्थ के वाचक है, इन दोनों में किसी एक का ही प्रयोग पर्याप्त है, दूसरे का उपन्यास व्यर्थ है, क्योंकि अर्थ की प्रतीति किसी एक से ही हो जायगी । 'वेदाप्रमाणमर्हन्ति' यह वाक्य भी ठीक नही है, इसके स्थान पर 'प्रामाण्यमर्हन्ति' ऐसा प्रयोग होना चाहिये । ' सभी पदार्थों के श्रवण और मनन से आनुमानिक ज्ञान के रूप में निश्चय होता है' इसका बोधक वाक्य भी अस्तव्यस्त है । इससे आप क्या कहना चाहते है, यह स्पष्ट प्रतीत नही होता । इसमें आये पदों का परस्पर अन्वय कैसे होगा? आनुमानिक ज्ञान कभी श्रवणेन्द्रिय की सहायता से नही होता और न सभी पदार्थों का ज्ञान के रूप में निश्चय ही होता है, क्योंकि ऐसा मानने पर फिर किसी को भ्रम होना ही नही चाहिये । श्रवण का मनन न होकर श्रुत अर्थ का मनन किया जाता है, 'श्रोतव्यः ' इत्यादि श्रुति का यही अभिप्राय है । तर्कसंग्रह, चिन्तामणि, जागदीशी प्रभृति विद्वानो में समादृत ग्रन्थो को मिथ्या न्यायशास्त्र के प्रवर्तक और न्याय- वैशेषिक, शास्त्र के विपरीत पागल के सिवाय कौन बतावेगा? इन शास्त्रों को समझ न पाने के कारण दयानन्द की यह उक्ति ' अंगूर खट्टे है' इस लोकोक्ति को चरितार्थ करती है । 'सांख्यतत्वकौमुदी को वे हजारो जन्म लेकर के भी सांख्यशास्त्र के विपरीत नही सिद्ध कर सकते । वेदान्तसार, पंचदशी प्रभृति ग्रन्थो को वेदान्त शास्त्र के विपरीत कहना दुःसाहसमात्र है । वेदान्त के शाकरभाष्य, भामती, पञ्चपादिका विवरण, खण्डनखण्डखाद्य, चित्सुखी, अद्वैतसिद्धि आदि ग्रन्थों को इन्होने वेदान्तशास्त्र के विपरीत घोषित नहीं किया,

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बंदार्थ पारिजातः १५६५ शृङ्खलोच्छृङ्खलानाम् । वस्तुतस्तु यान् ग्रन्थानधीत्य यथायथ लोकोत्तरं वैदुष्यमासाद्यते, तानेवायमप्रमाणयितुं प्रयतितवान्, इत्याश्वर्यमेव । एतावतैवास्य पाण्डित्यमपि विद्वद्धौरेयैरवगन्तुं शक्यते । ( ), -' यत्तु व्यासजैमिन्यादिदर्शनानामुपाङ्गत्वमुक्तम् पृ ० ३१४ तदपि चिन्त्यम् । यदपि तत्राद्यं कर्मकाण्ड- विधायक धर्मधर्मिव्याख्यामयं व्यासमुन्यादिकृतभाष्यसहितं जैमिनिकृतसूत्र पूर्वमीमांसाशास्त्राख्यं ग्राह्यम्' इति, तदपि चिन्त्यम्, जैमिनिसूत्रेषु व्यासभाष्यस्याप्रामाणिकत्वात् । पूर्वमीमांसासूत्र न कर्मकाण्डविधायकम् ब्राह्मणविधीनामेव तत्र विधायकत्वप्रसिद्धे । धर्मधर्मिव्याख्यापि तत्र नास्ति । ' ' यदपि द्वितीयं विशेषतया धर्मधर्मिविधायक प्रशस्तपादकृतभाष्यसहितं कणादमुनिकृतं वैशेषिकशास्त्रम् (पृ० ३१४), तदपि न सङ्गतम्, पदार्थसाधर्म्यवैधर्म्यनिरूपणपरस्य वैशेषिकशास्त्रस्य धर्मधर्मिविधायकत्वाभावात् । 'पदार्थ- विद्याविधायकं वात्स्यायनभाष्यसहित गौतममुनिकृत न्यायशास्त्रम्' (पृ० ३१४ ) इत्यपि यत्किञ्चित् तस्य शास्त्रस्य पदार्थ- बोधकत्वेऽपि तद्विद्याविधायकत्वायोगात् । विद्या च ज्ञानम् । तच्च न विधातु शक्यम्, वस्तुतन्त्रत्वेन पुरुषतन्त्रत्वाभावात् । पुरुषतन्त्राणि कर्माणि भवन्ति, पुरुषः कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं शक्यत्वात् । न विद्या (ज्ञानम्), तस्य वस्तुतन्त्रत्वात् 1। नहि प्रमाणयोगे प्रमेयमप्रमातुमन्यथा वा प्रमातु शक्यम् । एवमेव पतञ्जलिमुनिकृतं योगशास्त्रमपि चित्तवृत्तिनिरोधतदुपायबोधकम्, नोपासनाविधायकम, ब्राह्मणोपनिषद्रूपवेदभागेनैवोपासनाविधानात् । 'आत्मानमेव लोकमुपासीत', 'तज्जलान् इति शान्त उपासीत' इत्यादिश्रुतिभ्यः । एवं कपिलमुनिकृत साख्यशास्त्रमपि न विश्वसनीयम्, शङ्करभगवत्पादादिभिराचार्यैः सांख्य-कारिकाया एव समुद्धरणात् । एवं वेदान्तशास्त्रमपि न ब्रह्मसूत्रम् वेदान्तविचाररूपत्वादेव वेदान्तशास्त्रम्, वेदान्तशब्दस्यो- हमें इसी को बहुत कुशल मानना चाहिये । अन्यथा उच्छृंखल ( बेलगाम ) व्यक्ति को कुछ भी कहने से कौन रोक सकता है? वास्तव में देखा जाय जो जिन ग्रन्थो को पढकर धीरे धीरे व्यक्ति लोकोत्तर विद्वान् बनता है, उन्ही को अप्रामाणिक घोषित करने के लिये स्वामी दयानन्द ने बड़ा प्रयत्न किया है, यह एक आश्चर्य की ही बात है । उपाग ग्रन्थो को गिनाते समय इन्होने ( पृ ० ३१४ ) व्यास, जैमिनि आदि के दर्शन ग्रन्थो का भी उसमें समावेश किया है, जो कि गलत है । वे कहते है - 'ऐसे ही वेदो के छः उपांग अर्थात् जिनका नाम षट्शास्त्र है, उनमें से एक व्यास मुनि आदि कृत भाष्य सहित जैमिनि मुनिकृत पूर्वमीमांसा है, जिसमे कर्मकाण्ड का विधान और धर्म- धर्मी दो पदार्थों से सब पदार्थों की व्याख्या की है' (पृ० ३१४०३१५ ), किन्तु जैमिनि सूत्र पर व्यासमुनि का कोई प्रामाणिक भाष्य न तो उपलब्ध है और न सुना ही गया है । पूर्वमीमासा सूत्र कर्मकाण्ड का विधान नही करते, किन्तु वे ब्राह्मण ग्रन्थो में प्रतिपादित विधियो की व्याख्या एव व्यवस्था करते है । 'दूसरा वैशेषिक शास्त्र है, जो कि कणाद मुनि कृत सूत्र और प्रशस्तपादभाष्य आदि व्याख्या सहित है और जिसमें विशेष रूप से धर्म और धर्मी का प्रतिपादन है' ( पृ० ३१५ ) स्वामी दयानन्द की यह उक्ति भी गलत है, क्योकि वैशेषिक शास्त्र विशेष कर पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्य का प्रतिपादक शास्त्र है, इसमें धर्म और धर्मीभाव का निरूपण नही है । 'तीसरा न्यायशास्त्र है, जो कि गोतम मुनि प्रणीत सूत्र और वास्यायन मुनि कृत भाष्य सहित है और पदार्थ विद्या का विधान करता है' ( पृ० ३१५ ) यह कथन भी असंगत है, क्योकि यह शास्त्र पदार्थों का ज्ञान अवश्य कराता है, किन्तु पदार्थविद्या का बोधक नही है । विद्या ज्ञान को कहते हैं, इसका विधान नही किया जा सकता । वस्तु के आधार पर ही उसका ज्ञान होगा । यह पुरुष के अधीन नही है कि वह अपने ज्ञान के आधार पर किसी पदार्थ की रचना करले । पुरुष के अधीन तो क्रिया रहती है । पुरुष किसी कार्य को ही करने में, न करने में अथवा अन्यथा करने में समर्थ हो सकता है, किसी ज्ञान को नही । ज्ञान की सत्ता तो वस्तु की स्थिति के आधार पर ही होती है । प्रमाण ( इन्द्रिय आदि) का योग होने पर प्रमेय का ज्ञान न हो अथवा अन्यथा ज्ञान हो, ऐसा हो नही सकता । इसी तरह से पतंजलि मुनि कृत योगशास्त्र भी चित्त वृत्ति के निरोध और उसके उपायो को बताने वाला शास्त्र है, वह उपासना का विधान नही करता, क्योंकि 1 उपासना का विधान ब्राह्मण और उपनिषत् रूप वेद के विभाग में ही किया गया है, 'आत्मान ' इत्यादि श्रुतिया इसमें प्रमाण हैं । इसी तरह से कपिल मुनि कृत सांख्यशास्त्र आज उतना विश्वसनीय नहीं उपलब्ध होता, शंकरभगवत्पाद प्रभूति आचार्यों ने साख्यकारिका को ही अपने ग्रन्थों में प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है, साख्यसूत्र को नहीं । इसी तरह से ब्रह्मसूत्र भी वेदान्तशास्त्र नहीं हैं, किन्तु

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वेदार्थपारिजाता १५६६ पनिषत्स्वेव प्रसिद्धेः । मौक्तिकोपनिषदि वेदान्ता के रघुश्रेष्ठेति हनुमत्प्रश्ने-— यच्चोपनिषदश्वोपाङ्गानीति, तत्तुच्छम्, उपनिषदां वेदत्वस्योक्तत्वात् । वेदविरुद्धा ग्रन्था नाङ्गीकार्या इत्यत्र नास्ति विप्रतिपत्ति, तथापि वेदस्वरूपविप्रतिपत्तौ तदपि विप्रति- पत्तिग्रस्तमेव मन्तव्यम् । यत्तु रुद्रयामलादयस्तन्त्रग्रन्था ब्रह्मवैवर्तादिपुराणानि प्रक्षिप्तश्लोकत्यागाया मनुस्मृतेर्व्यतिरिक्ता: स्मृतयः सारस्वतचन्द्रिकाकौमुद्यादयो व्याकरणाभासग्रन्था मीमासादिशास्त्रविरुद्धनिर्णयसिन्ध्यादयो ग्रन्था वैशेषिकन्यायशास्त्र-विरुद्धास्तर्कसंग्रहमारभ्य जागदीश्यन्ता न्यायाभासग्रन्था योगशास्त्रविरुद्धहदीपिकादयो ग्रन्था. सांख्यशास्त्रविरुद्धाः साख्यतत्त्व-कौमुद्यादयो वेदादिशास्त्रविरुद्धा वेदान्तसारपञ्चदशीयोगवाशिष्ठादयो ग्रन्था ज्योतिषशास्त्रविरुद्धा मुहूर्तचिन्तामण्यादयो मुहूर्तजन्मपत्रफलादेशविषयका ग्रन्थाः (पृ० ३१५- ३१६ ) कलिहतकेन दयानन्देनाप्रमाणभूता उक्ता: एवमेव 'त्रिकण्डिका-स्नानसूत्रपरिशिष्टादयो ग्रन्था मार्गशीर्षैकादशीकाशीस्थजलस्थलयात्राकरणदर्शननामस्मरणस्नानजडमूर्तिपूजाकरणमात्रेण मुक्तिभावनपापनिवारणमाहात्म्यविधायकाः सर्वे ग्रन्थाः पाखण्डिसम्प्रदायनिर्मितानि सर्वाणि पुस्तकानि नास्तिकत्वविधायका- वोपदेशा वेदादिशास्त्रविरुद्धा युक्तिप्रमाणपरीक्षाहीनाः सन्त्यतः शिष्टैरग्राह्या भवन्ति' ( पृ० ३१६) इति दयानन्दोक्तिर्नास्तिक्य-मूलिकेव । वस्तुतस्तु स्वामिदयानन्दस्यैव ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकासत्यार्थप्रकाशसस्कारविधितदीयवेदभाष्यादयो ग्रन्था नास्तिक्यावहा वेदविरुद्धा युक्तितर्कविरुद्धाः प्रमाणाभासमूलका 1 त एव शिष्टः सर्वतोभावेन त्याज्याः । पूर्वोक्तग्रन्थास्तु दयानन्देन विषययुक्तामृततुल्यान्नोदाहरणेन त्याज्या उक्ता । दयानन्दीयग्रन्थेषु कश्चिदप्यंशोऽमृततुल्यो नास्त्येव । वेदान्तशास्त्र पर विचार प्रस्तुत करने वाला ग्रन्थ है । वेदान्त शब्द की प्रसिद्धि उपनिषत् ग्रन्थो के लिये ही है । मौक्तिक उपनिषद् में 'हे रघुश्रेष्ठ, वेदान्त शब्द से किसका बोध होता है' हनुमान् के इस प्रश्न के उत्तर में उपनिषदो को ही वेदान्त कहा गया है । यहा स्वामी दयानन्द ने उपनिषदो का परिगणन उपागो मे किया है ( पृ ० ३१४ ), जो कि गलत है । हम पहले ही बता चुके हैं कि उपनिषद् वेदो के ही भाग हैं । वेद विरोधी ग्रन्थो को स्वीकार न किया जाय इस बात को हम भी मानते है, किन्तु वेद के स्वरूप में हो जब आप सदेह पैदा कर देते है, तो यह अपने आप संशय में पड जाता है कि वेद विरोधी ग्रन्थ कौन है? अर्थात् गेंद का एक मिश्रित स्वरूप मानकर ही यह निश्चित किया जा सकता है कि अमुक ग्रन्थ वेदसमर्थित और अमुक वेदविरोधी है । 'आगे उनमें से मुख्य मुख्य मिथ्या ग्रन्थो के नाम भी लिखते है ' (पृ ० ३१६ ) इतना लिखने के बाद स्वामी दयानन्द लिखते है— 'जैसे रुद्रयामल आदि तन्त्रग्रन्थ, ब्रह्मवैवर्त, श्रीमद्भागवत आदि पुराण, मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोक और उससे पृथक सब स्मृतिग्रन्थ, व्याकरण विरुद्ध सारस्वत चन्द्रिका, कौमुदी आदि ग्रन्थ, धर्मशास्त्र विरुद्ध निर्णयसिन्धु आदि तथा वैशेषिक न्यायशास्त्र विरुद्ध तर्कसंग्रह, मुक्तावली आदि ग्रन्थ, हठप्रदीपिका आदि ग्रन्थ, जो कि योगशास्त्र के विरुद्ध है, साख्यशास्त्र विरुद्ध साख्यतत्त्वकौमुदी आदि ग्रन्थ वेदान्तशास्त्र के विरुद्ध वेदान्तसार, पंचदशी, योगवासिष्ठ आदि ग्रन्थ, ज्योतिःशास्त्र के विरुद्ध मुहूर्तचिन्तामणि आदि मुहूर्त, जन्मपत्र, फलादेश का विधान करने वाले ग्रन्थ' ( पृ ० ३१६ ) | यह कलिकाल का ही प्रभाव माना जायगा कि ऐसे ग्रन्थों को स्वामी दयानन्द ने अप्रामाणिक मान लिया है । आगे वे लिखते है-' ऐसे ही श्रौतसूत्र आदि के विरुद्ध त्रिकण्डिका, स्नानसूत्र आदि परिशिष्ट ग्रन्थ, मार्गशीर्ष एकादशी आदि व्रत, काशी आदि स्थानमाहात्म्य, पुष्कर, गंगा प्रभृति तीर्थस्थल यात्रा, माहात्म्य विधायक शास्त्र, दर्शन, नामस्मरण, मूर्तिपूजा करने से मुक्ति का विधान करने वाले ग्रन्थ, इसी प्रकार पाप निवारण विधायक और ईश्वर के अवतार या पुत्र अथवा दूत प्रतिपादक वेदों के विरुद्ध शैव, शक्ति, वैष्णव आदि मत के ग्रन्थ तथा नास्तिक मत के पुस्तक और उनके उपदेश, ये सब वेद, युक्ति, प्रमाण और परीक्षा के विरुद्ध ग्रन्थ है । इसलिये सब मनुष्यों को उक्त अशुद्ध ग्रन्थो का त्याग कर देना चाहिये ' ( पृ ० ३१६ ) । दयानन्द की यह उक्ति भी उनकी नास्तिकता को ही उजागर करती है । वास्तव में तो स्वामी दयानन्द के ही ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, सत्यार्थप्रकाश, संस्कारविधि आदि ग्रन्थ तथा उनके किये गये वेदो के भाष्य ही नास्तिकता का प्रचार करने वाले है, वेदो के विरुद्ध हैं, युक्ति और तर्क के अभाव में इनमें सदा गलत प्रमाणो का सहारा लिया है । इसलिये सभी शिष्ट जनो को इनका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये ।

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वेदार्थपारिजातः १५६७ यत्तु ——मद्यमासादिसेवनविधायकानि तन्त्राणि प्रदर्शितानि (पृ ० ३१७ ), तानि कुत्रत्यानि किमभिप्रायकाणीति तु नोक्तम्, तन्त्राणा गूढाभिप्रायस्य पामरैर्ज्ञातुमशक्यत्वात् । किञ्च यथा प्रजापतिः स्वा दुहितरमभ्यध्यायत । दिवमित्यन्य आहुरुषसमित्यन्ये ॥ तामृश्यो भूत्वा रोहित भूतामभ्येत् । तस्य यद्रेतसः प्रथममुददीप्यत तदसावादित्योऽभवत्' ( ऐ० ब्रा० ३।३३-३४ ), 'प्रजापतिर्वै सुपर्णो गरुत्मानेष सविता' ( श० १ २ २३४ ), ' तत्र पिता दुहितुर्गर्भं दधाति पर्जन्यः पृथिव्याः' (नि०४ / २१ ) इत्यादिभि प्रजापतिकर्तृकस्य दुहितृगमनस्य गूढोऽर्थोऽन्यो ग्राह्य इति त्वयाभ्युपगम्यते ( पृ ० ३१ ९ ), तथैव तन्त्रेऽपि मद्यादीनामन्यार्थत्वोक्तेः । रुद्रयामले – रजस्वला पुष्कर तीर्थम्, चाण्डाली तु स्वय काशी, चर्मकारी प्रयाग. स्याद् रजकी मथुरा मता । अयोध्या पुक्कसी प्रोक्ता 1| सत्यार्थप्रकाशे ११ समुल्लासे वाममार्गालोचनप्रसङ्गे दयानन्देनोक्त यद् रजस्वलायाः समागमेन पुष्करस्नानम्, चाण्डालीगमने काशीयात्रा सम्पद्यते, चर्मकारीगमनेन मथुरायात्रा, कञ्जरीरमणेनायोध्यायात्रा सम्पद्यते । परमेतदनर्गलमेव तद्वचनम्, तत्र विपरीतार्थस्यैव सुवचत्वात् । यत्र तन्त्रेषु चाण्डालीगमन लिखित तत्र काशीयात्रा मन्तव्या परोक्षवृत्त्या, यत्र चर्मकारीगमनं तत्र प्रयागस्नानम्, रजकीगमनशब्देनायोध्यायात्रा विवक्षिता मन्तव्या, 'इत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विष.' (गोपथ० १। १। १ ) । नहि कामिनोऽपि रजस्वला कामयन्ते । यथा -' मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जार. शृणोतु न. ' (ऋ ० स० ६ ५५/५ ) इत्यत्र यथाश्रुतार्थग्रहणेऽश्लीलत्वं प्रतीयते । एवमेव-'गोमांस भक्षयेन्नित्य पिबेद- मरवारुणीम्' इतीदमपि श्रुत्वा भ्रान्तिर्जायते । 'गांशब्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमासभक्षण प्रोक्तं महापात- कनाशनम् || जिह्वाप्रवेशसञ्जातसुषुम्णाक्षोभसम्भव । चन्द्रात् स्रवति य. सार संवेहामरवारुणी ||' (हठयोगप्रदीपिका) । एवमेव नित्यातन्त्रमहानिर्वाणमेरुतन्त्रादिषु मद्यमासमत्स्यमुद्रामैथुनात्मकाना पञ्चमकाराणामपि परोक्षार्थाज्ञानेन भ्रान्तयो जायन्ते । सत्यार्थप्रकाशे एकादशसमुल्लासे -' मद्यं मासं च मीनं च मुद्रा मैथुनमेव च । मकारपञ्चक प्राहुर्योगिनां इसी तरह से स्वामी दयानन्द ने मद्य, मास आदि के सेवन की अनुमति देने वाले तन्त्रशास्त्रो का उल्लेख किया है, किन्तु उन्होंने यह नही बताया कि ये वचन कहाँ के हैं और इनका अभिप्राय क्या है? तन्त्रो के गूढ अभिप्राय को मबोध आदमी समझ नही सकते । ' यथा प्रजापतिः' प्रभूति ऐतरेय, शतपथ और निरुक्त मे उद्धत प्रजापति के द्वारा अपनी पुत्री के अभिसरण का वर्णन करने वाली श्रुतियो का एक दूसरा ही गूढ अभिप्राय आप भी स्वीकार करते हैं ( पृ० ३१ ९ ), उसी तरह से तन्त्रशास्त्रों में भी मद्य, मास प्रभृति शब्दो का एक दूसरा ही निगूढ अभिप्राय माना जाता है । सत्यार्थप्रकाश के ११ वें समुल्लास में वाममार्ग की आलोचना करते हुए रुद्रयामलतन्त्र के 'रजस्वला पुष्करं तीर्थम्' प्रभृति वचन को उद्धृत कर उसका मनमाना अर्थ किया गया है । किन्तु उनका यह कथन अनर्गल है, क्योकि इस वचन का अर्थ ठीक इसके विपरीत है । तन्त्र ग्रन्थों में जब कही भी चाण्डालीगमन लिखा मिलता है, उसका अभिप्राय काशी की यात्रा करने से है । इसी तरह से चर्मकारीगमन का अर्थ प्रयाग स्नान, रजकीगमन का अर्थ अयोध्या की यात्रा आदि समझना चाहिये । शास्त्रो में इस प्रक्रिया को परोक्षवृत्ति के सहारे अभिव्यक्त करने का विधान है । गोपथ प्रभृति ब्राह्मणो में बताया गया है कि देवगण शब्दो के प्रसिद्ध अर्थों से द्वेष रखते है और परोक्ष अर्थ इनको प्रिय लगता है, अर्थात् इनको शब्दो का निगूढ अभिप्राय अधिक प्रियकर है । जैसे ' मातृदिधिषु० ' इत्यादि मन्त्रों का शब्दप्रक्रिया के सहारे जो शाब्दिक अर्थ होता है, उसको स्वीकार करने पर मन्त्र में अश्लीलता आ जायगी, अतः उसका निगूढ अभिप्राय बताया जाता है, उसी तरह से 'गोमास का भक्षण करे और सदा अमर वारुणी का पान करें' इत्यादि तान्त्रिक वचनो को भी सुनने से सहसा शाब्दिक अर्थ के सामने आजाने से भ्रम होने लगता है । तन्त्रशास्त्रो में उनका निगूढ अर्थ इस प्रकार बताया जाता है- ' 'गो शब्द से यहाँ जिह्वा का ग्रहण किया जाता है । उस जिह्वा का तालु मे प्रवेश ही योगशास्त्र में गोमास भक्षण के नाम से प्रसिद्ध है, जो कि महापातको को भी नष्ट कर देने वाला है । तालु में जिह्वा के प्रविष्ट हो जाने पर सुषुम्णा नाड़ी के क्षुब्ध होने से चान्द्र स्थान से जिस रस का स्वाद होता है, उसी को यहाँ अमरवारुणी कहा गया है । इसी तरह से नित्यातन्त्र, महानिर्वाणतन्त्र, मेरुतन्त्र प्रभृति तन्त्रग्रन्थो में प्रतिपादित मद्य, मास, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन नामक पांच मकारों का परोक्ष अर्थ ज्ञान न होने से नाना प्रकार की भ्रान्तियाँ पैदा हो जाती है | सत्यार्थप्रकाश के ११ वें समुल्लास में

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 670 का मूल पृष्ठ
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दार्थपारिजातः १५६८ मुक्तिदायकम् ॥ ' इति श्लोकमुद्धृत्य महानुपहासः कृतः, तदपि तदीयपरिभाषाऽज्ञानविजृम्भितमेव । तथाहि-' यदुक्त परम ब्रह्म निर्विकारं निरञ्जनम् । तस्मिन् प्रमदन ज्ञानं तन्मद्य परिकीर्तितम् ॥ ' एतस्यैव मद्यस्य पानमुक्तम् । 'पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावत्पतति भूतले । पुनरुत्थाय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ' ( महानिर्वाणतन्त्रे ) न साधारणमद्यपानेन पुनर्जन्म-निवृत्तिरुक्ता । नैतन्मद्यपान सुरादिपानं विज्ञातु शक्यम् । एवमेव मासशब्दोऽपि । 'माशब्दाद्रशना ज्ञेया तदंशान् रशनाप्रियान् । सदा यो भक्षयेन्नित्य स भवेन्मास-साधकः ॥ ' (आगमसारः ), 'पुण्यापुण्यपशुं हत्वा ज्ञानखड्गेन योगवित् । परे लय नयेच्चित्त मासाशी स निगद्यते ॥ ' (कुलार्णव- तन्त्रम्), मत्स्योऽपि -'गङ्गायमुनयोर्मध्ये मत्स्यौ द्वौ चरतः सदा । तौ मत्स्यौ भक्षयेद्यस्तु स भवेन्मत्स्यसाधक ॥ ', 'मनसा चेन्द्रियग्राम संयोज्यात्मनि योगवित् । मत्स्याशी स भवेद्देवि शेषा धीवरवृत्तयः ॥ ' इति मत्स्यपरिभाषा । मुद्रा च -' सत्सङ्गेन भवेन्मुक्तिरसत्सङ्गेन बन्धनम् । असत्सङ्गमुद्रण यत्तु सा मुद्रा परिकीर्तिता ॥ ' 'आत्मनो जायते मोदस्ता मुद्रा परिकीर्तिताः । ता ज्ञेया धारणाध्यानसमाध्याख्यास्तु मोक्षदा ॥ ' इति । एवमेव मैथुनपरिभाषा यथा -'कुल कुण्डलिनीशक्तिर्देहिनां देहधारिणी । तयो शिवस्य सयोगो मैथुनं परिकीर्तितम् ॥ ', 'सहस्रारोपरि बिन्दौ कुण्डल्या मैथुन शिवे । मैथुनं शयनं दिव्य यतीना परिकीर्तितम् || ' (योगिनीतन्त्रे), ' सुषुम्णा शक्तिरुद्दिष्टा जीवोऽयं तु परः शिवः । तयोस्तु सङ्गमो देवा मैथुन परिकीर्तितम् || वीर्यपातस्य समये सुषुम्नासन्न-मारुते । उत्पद्यते च यत्सौख्य शतकोटिगुणं तु तत् ॥ एतदेव रतं प्रोक्तमन्यत् स्याद्रासभ रतम् ।' ( मेरुतन्त्रे), 'गङ्गायमुनयोर्मध्ये 'मद्य मासं च' प्रभृति श्लोक को उद्धृत कर इसका बडा उपहास किया गया है, किन्तु यह सब तन्त्रशास्त्र की परिभाषाओं का सही ज्ञान न होने के कारण है । वास्तव में तन्त्रशास्त्र में मद्य की परिभाषा यह की गई है -' जिस निर्विकार, निरंजन परमब्रह्म का वर्णन इस शास्त्र में किया गया है, उस परब्रह्म मे ही सदा लीन रहने की स्थिति यहाँ मद्य के नाम से कही जाती है' । इसी मद्य के पान करने की बात तन्त्रशास्त्र में कही जाती है । इस मद्य को बार- बार पीता है और तब तक पीता रहता है, जब तक कि वह जमोन पर नही लोटने लगता । वह उठ कर फिर उसी मद्य का पान करता है और तब वह आवागमन के चक्कर से मुक्त होजाता है ॥ साधारणसाधारण,, लोकप्रसिद्ध मदिरा के पान से पुनर्जन्म की निवृत्ति नही हो सकती, अत: इस मद्यपान को सुरा ( मदिरा ) आदि के पान से भिन्न हो समझना चाहिये । तन्त्रशास्त्रों में मांस की परिभाषा यह की गई है - ' मा शब्द का अर्थ है जिह्वा' उस जिह्वा के अंशो को अर्थात्जिह्वा को स्वाद लगने वाले रसो को जो सदा खाता रहता है, अर्थात् जो जिह्वा के स्वाद को जीत लेता है, वह साधक मास भक्षक कहलाता है' (आगमसार) । 'जो योगी ज्ञान रूपी खड्ग से पाप और पुण्य रूपी पशु को मार कर परब्रह्म में अपने चित्त को लीन कर देता है, वह मासभक्षी कहलाता है' ( कुलार्णवतन्त्र ) । इसी प्रकार मत्स्य की परिभाषा यह की गई है-'गंगा और यमुना के बीच में दो मत्स्य सदा चलते रहते हैं । इन मत्स्यो को जो खा जाता है, वही मत्स्यसाधक कहलाता है' । 'जो योगी अपने मन और इन्द्रियो को अपनी आत्मा मे लीन कर देता है, वही मत्स्यभक्षक कहलाता है, इसके अतिरिक्त स्थूल मत्स्य का भक्षण करने वाले तो धीवर कहलाते है' । मुद्रा की वास्तविक परिभाषा यह है -' सत्संग से मुक्ति और दुष्ट संग से मनुष्य बन्धन को प्राप्त करता है, अतः तन्त्रशास्त्र में दुष्ट जनों के सम्पर्क को मुद्रित, प्रतिबन्धित कर देने का नाम ही मुद्रा कहा गया है', 'जिनके आचरण से आत्मा में मोद (आनन्द ) उत्पन्न होता है, उनको मुद्रा कहा जाता है | अतः तन्त्रशास्त्र में धारणा, ध्यान और समाधि को ही मुद्रा कहा जाता है, क्योकि इनका अभ्यास करने से परम सुख की मोक्ष दशा की अभिव्यक्ति होती है । इसी तरह से मैथुन की परिभाषा यह है- 'कुल का अर्थ कुण्डलिनी शक्ति है, जो कि सभी प्राणियों के शरीर को धारण करने वाली है । इस कुलनामक कुण्डलिनी शक्ति के साथ अकुल शिव का संयोग ही मैथुन कहा जाता है', ' सहस्रदल कमल में स्थित बिन्दुस्थान में कुण्डलिनी शक्ति का शिव के साथ समागम ही मैथुन कहा जाता है । यह मैथुन एक प्रकार की योगियों के शयन की ही स्थिति है' (योगिनीतन्त्र) । 'सुषुम्णा शक्ति कही जाती है और यह जीव हो परम शिव है । इन दोनो का संगम ही मैथुन कहा जाता है । वीर्य का पात होते समय सुषुम्ना नाडी में स्थित पवन में जिस सुख की अनुभूति होती है, उससे करोड़ों गुना आनन्द की अनुभूति जिस योगदशा में होती है, वही वास्तविक रतावस्था है । इसके अतिरिक्त और सब रासभ ( गधा ) रवि ही कही जायगी*