वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 671–680
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 671–680
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वेदार्थपारिजातः १५६६ बालरण्डां तपस्विनीम् । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णो परमं पदम् ॥ ' तत्स्वरूप तत्रैवोक्तम्- ' इडा भागीरथी गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी । तयोर्मध्यगता रण्डा सुषुम्नैव सरस्वती ॥ ' ननु किमर्थमेवमुद्वेजकैः शब्दैस्तत्कथनमिति चेन्न 'परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विष ' (गोपथ- ब्रा० १।२।२१ ), ‘ परोक्षवादा ऋषयः' ( भा ० पु० ११।२१।३५ ), ' परोक्षकामा देवा प्रत्यक्षद्विष ' ( श० ७।५।१।२२) । तथैव मन्त्रभागेऽपि पिता दुहितुर्गर्भमाधात्' (ऋ० सं ० १।१६४१३३), 'जार आ भगम्' ( अथर्व० १०| ११३८ ), ' वीर्यं मयि धेहि । ' ( ), ' ' वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु वा ० सं ० २३ २० मातुर्दिधिषुमब्रव स्वसुर्जार शृणोतु न । सुयम्या कन्या कल्याणी ( अथर्व० २०१२८/९), ' योनिरुलूखल शिश्नं मुसलम्' ( श० ७| ५ | १ | ३८ ), ' यथा स्थूलेन पयसाऽणो मुष्कौ उपावधीत्' ( अथर्व० २०।१३६।२) इति सर्वत्रैव परोक्षवृत्त्याऽर्थान्तरं विवक्ष्यते । तन्त्रमार्गोऽयं जितेन्द्रियाणामेव कृते लाभदायक. । ' अय सर्वोत्तमो मार्गः शिवोक्त. सर्वसिद्धिद । जितेन्द्रियस्य सुलभो नान्यस्यानन्तजन्मभिः ॥ परद्रव्येषु योऽन्धश्च परस्त्रीषु नपुसक । परापवादे यो मूक. सर्वदा विजितेन्द्रियः ॥ तस्यैव ब्राह्मणस्यात्र वामे स्यादधिकारिता' । ' मातृयोनिं परित्यज्य विहरेत् सर्वयोनिषु ' इति सत्यार्थप्रकाशे एकादशसमुल्लासे उद्धृतम् । अस्य श्लोकस्याभिप्राय उदीर्यते - मातृवंशीया कन्या परित्यज्यान्याभिः सार्धमेव विवाह कर्तव्यः । गौरीशङ्करयोश्च पूजनमेव भगलिङ्गपूजनम्, सामाजिकास्तु नियोगावरणेन काभिश्चित् कस्यापि सम्बन्धो युक्त इति साधयन्ति तथैव केषाञ्चिदनधिकारिणामहं भैरव', त्व च भैरवीति वाचानर्थाचरणं न शास्त्रीयो मार्गः । 'इम ते उपस्थं मधुना ससृजामि प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयम्' इति मन्त्रेण सामाजिकाना स्त्रीणामुपस्थे मधुयोजनव्याजेनानर्थाचरणमपि तथाविधमेव । अथ कल्याणाभिधानाया मासिकपत्रिकायाः शक्त्यङ्के २५६ पृष्ठे मद्यम् - यदुक्त परम ब्रह्म निर्विकारं निरञ्जनम् । तस्मिन् प्रमदनज्ञानं तन्मद्य परिकीर्तितम् ॥ ' ( मेरुतन्त्र ) । ' गंगा और यमुना के बीच में स्थित तपस्विनी बालविधवा को बलपूर्वक पकडना चाहिये । वास्तव में विष्णु का परम पद यही है' इस श्लोक के कुछ पदों का निगूढ अर्थ उसी स्थान पर स्पष्ट किया गया है-' इडा नाडी ही यहाँ भागीरथी गंगा और पिंगला नाडी यमुना कही गई है । इन दोनों के बीच में स्थित सुषुम्णा नाडी रण्डा या सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध है । इस तरह के उद्वेजक शब्दो से इन निगूढ अभिप्रायों का विवेचन क्यो किया जाता है? इसका उत्तर यही है कि गोपथ ब्राह्मण के अनुसार देवताओ को इस तरह के रहस्यों से भरी बातें ही प्रिय लगती हैं, सीधे-सादे शाब्दिक अर्थों से उनको अरुचि रहती है । भागवत मे भी बताया गया है कि ऋषिगण परोक्ष बातो को अधिक रुचि से बोलते है । शतपथ ब्राह्मण में भी कहा गया है कि देवगण परोक्ष वस्तु को अधिक चाहते हैं और जो प्रत्यक्ष है, उसमे अधिक रुचि नही लेते । इसी तरह से मन्त्रभाग में भी ऊपर मूल मे उद्धृत अनेक स्थलों मे सभी जगह परोक्षवृत्ति के सहारे दूसरा निगूढ़ अभिप्राय स्वीकार करना पडता है । तलवार की धार पर चलने के समान तन्त्रशास्त्र के वामाचार का यह उपदेश जितेन्द्रिय व्यक्ति के लिये ही लाभदायक हो सकता है । जैसा कि बताया गया है— 'शिव के द्वारा उपदिष्ट यह तन्त्रशास्त्र का मार्ग सब मार्गों में उत्तम है और सब तरह की सिद्धि को देने वाला है । जितेन्द्रिय व्यक्ति ही इस मार्ग को सरलता से प्राप्त कर सकता है, अन्य व्यक्ति अनन्त जन्मों में भी इसको नही समझ सकता । दूसरों के धन के प्रति जिसकी दृष्टि अन्धी है, पर स्त्री में जो नपुंसक के समान हैं, दूसरों की निन्दा करने मे जिसकी वाणी चुप रहती है, ऐसा इन्द्रियजयी ब्राह्मण ही वाममार्ग का अधिकारी हो सकता है । सत्यार्थप्रकाश के ११ वें समुल्लास में 'मातृयोनि० ' इत्यादि श्लोक उद्धृत किया गया है । इस श्लोक का वास्तविक अभिप्राय यह है-'माता के वंश की कन्या को छोड़कर अन्य कन्याओं के साथ विवाह करना चाहिये' । इसी तरह भग और लिंग के -शंकर भगवान् शिव की पिण्डी का पूजन है । आर्यसमाजी विद्वान् जैसे नियोग के बहाने किसी का भी किसीपूजन से अभिप्राय गौरी के साथ संबन्ध जोड़ लेते हैं उसी तरह से कुछ अनधिकारी व्यक्ति 'मैं भैरव हूँ, तुम भैरवी हो' इस तरह की बातें करके यदि कुछ अनर्थ करते हैं, तो उसको शास्त्रीय मार्ग नही माना जायगा । ऊपर पंचमकार की जो आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत की गई हैं, उसका १ ९७
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१५७० वेदार्थपारिजातः मांसम् –मा शब्दाद्रसना ज्ञेया तदशान् रसनाप्रिये । सदा यो भक्षयेद्देवि स एव मांससाधकः ॥ अथवा- मा सनोति हि यत्कर्म तन्मास परिकीर्तितम् । न च कामप्रतीकं तु योगिभिर्मासमुच्यते ॥ मत्स्याः –गङ्गायमुनयोर्मध्ये मत्स्यौ द्वौ चरतः सदा । तौ मत्स्यौ भक्षयेद्यस्तु स भवेन्मत्स्यसाधक ॥। अथवा- मत्समानं सर्वमूले सुखदुःखमिद प्रिये । इति यत्सात्त्विक ज्ञान तन्मत्स्यः परिकीर्तित ॥ - मुद्रा सत्सङ्गेन भवेन्मुक्तिरसत्सङ्गेषु बन्धनम् । असत्सङ्गमुद्रण यत्तु तन्मुद्रा परिकीर्तिता ॥॥ मैथुनम् —कुल कुण्डलिनी शक्तिर्देहिना देहधारिणी । तया शिवस्य सयोगो मैथुन परिकीर्तितम् || द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम् । उत्तानयोश्चम्बोर्योनिरन्तरत्रा पिता दुहितुगर्भ- माधात् ॥' (ऋ ० स० १।१६४| ३ ३ ) | यथा त्वया तन्त्राणि दूष्यन्ते तथैव त्वदीया वेदा अपि नास्तिकैर्दृष्यन्ते, तत्रापि दुहितरि पितृकर्तृकगर्भाधानस्योक्तत्वात् । सिद्धान्ते यथा सविता सूर्य एव प्रजापति, उषा एव तस्य दुहिता, तस्या. सूर्यजनितत्वात् । सूर्यकिरणयोगेन रोहिता रागवती दुहितरं किरणैर्ऋष्यवच्छीघ्रमभ्यध्यायत इत्यर्थंकरणेन तत्समाधान क्रियते, तथैव तन्त्रसाधनानामपि समाधान सुशकमेव । मन्त्रार्थस्तु - दीर्घतमा ऋषिरत्र वक्ता, द्यौ द्युलोक, पिता पालकः, न केवलं पालकत्व तस्य किन्तु जनिता उत्पादकः । तत्रोपपत्तिरुच्यते -अत्र द्युलोको नाभि नाभिभूतो भौमो रसस्तिष्ठतीति शेषः । ततश्चान्नं जायते । अन्नाद्रेतः । रेतसो मनुष्यः । इत्येव पारम्पर्येण जननसम्बन्धिनो हेतो रसस्यात्र सद्भावाद् द्युलोको जनितोच्यत इत्यर्थः । अत एव बन्धुः बन्धिका । तथा इय मही महती पृथिवी मे माता मातृस्थानीया स्वोद्भूतौषध्यादिजनयित्री । किञ्च, उत्तानयोः ऊर्ध्वं तानयोः चम्वोः सर्वस्य अत्र्योः अन्तः मध्ये योनिः सर्वभूतनिर्माणाश्रयमन्तरिक्ष वर्तत इति शेष । अत्र अस्मिन्नन्तरिक्षे पिता द्यौः द्युलोकः, अत्राधिष्ठात्रधिष्ठानयोरभेदेन आदित्यो द्यौरुच्यते । स्वस्वरिश्मभिः इन्द्रः पर्जन्यो वा दुहितुरे हिताया निहिताया भूम्या गर्भं सर्वोत्पादनसमर्थं वृष्टयुदकलक्षणमाधानं सर्वत. करोतीति सायणसम्मतोऽर्थः । यत्तु प्रकाशः पिता जनिता विशेष विवरण हिन्दो को प्रसिद्ध धार्मिक मासिक पत्रिका ' कल्याण' के शक्त्यंक में पृ० २५६ में देखना चाहिये । यहा उद्धृत श्लोको की व्याख्या अभी ऊपर हम कर चुके है । जैसे आप तन्त्रशास्त्र पर आक्षेप करते हैं, उसी तरह से नास्तिक लोग वेदो पर भी आक्षेप करते रहते है । स्वामी दयानन्द के द्वारा ( पृ ० ३१ ९ ) उद्धृत मन्त्रो से पुत्री में पिता के द्वारा किये गये गर्भाधान की बात कही जाती है, किन्तु जैसे आप सविता ( सूर्य ) को ही प्रजापति मानकर उषा को उसकी पुत्री मानते है और सूर्य की किरणों के संपर्क से रागवती ( लाल रंग वाली ) सन्ध्या के साथ सूर्य को किरणों का संम्पर्क बताकर उक्त दोष का परिहार करते हैं, उसी तरह तन्त्रशास्त्र में प्रदर्शित विभिन्न विधिविधानों की भी इस तरह की व्याख्या कर समाधान किया जाय, इसमें कोई कठिनाई नही होगी । ' द्यौमें पिता० ' इत्यादि मन्त्र का सायणाचार्य द्वारा किया गया अर्थ इस प्रकार है - इस मन्त्र के दीर्घतमा ऋषि वक्ता है । वे कहते है कि लोक मेरा पालन करने वाला पिता है । वह केवल पालक ही नहीं, किन्तु मेरा जन्मदाता भी है । इसकी उपपत्ति इस तरह से होती है । यहां लोक नाभिसदृश है, जिसमें भूमि का सारा रस इकट्ठा होता है । इस रस से अन्न पैदा होता है । अन्न से वीयं और वीर्य से मनुष्य, इस तरह से परम्परा से उत्पत्ति करने वाला रस इस द्युलोक में विद्यमान है, अत द्युलोक को जन्मदाता पिता माना जाता है । इसीलिये बन्धन में बाघने वाली यह महती (विस्तीर्ण) पृथिवी माता मानी गई है, क्योकि यह अपने गर्भ में से नाना प्रकार की ओषधियों को पैदा करने वाली है । अपि च, ऊपर-नीचे तनी हुई आकाश और पृथिवी की चादनी के बीच में सभी भूतो के निर्माण का आश्रयभूत अन्तरिक्ष विद्यमान हैं । इस अन्तरिक्ष में पितृस्थानीय द्युलोक, अधिष्ठाता और अधिष्ठान में अभेद का आरोप कर इस स्थान में द्युलोक शब्द से उसमें विचरण करने वाले आदित्य का ग्रहण किया जाता है, अपनी अपनी किरणो से द्युलोकस्थानीय इन्द्र अथवा पर्जन्य बहुत दूर प्रदेश मे स्थित दुहिता पृथिवी के गर्भ में अन्न इत्यादि सभी पदार्थों की उत्पत्ति में समर्थ वृष्टि के जल के रूप में गर्भ की सब तरह से स्थापना करता है । द्यो जो सूर्य का प्रकाश है, वह सभी लौकिक व्यवहारों का कारण होने से मेरे पिता
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वेदार्थपारिजाता ११७१ सर्वव्यवहाराणामुत्पादकः ' ( पृ० ३२० ) इति, तन्त्र सङ्गतम्, अत्र नाभिरित्यशस्यासङ्गते । इय पृथिवी माता मानकर्त्रीत्यपि ( ), — ' पृ० ३२० न सङ्गतम् मानार्थताया प्रकृतेऽनपेक्षणात् । यदुक्तम् द्वयोश्चम्वो पर्जन्यपृथिव्योः सेनावदुत्तानयोः उत्तानस्थितयो ', ( पृ० ३२० ) इति, तदप्यसङ्गतम्, सेनयोर्गर्भाधानेऽनुदाहरणात् । 'शासद्वह्निर्दुहितुर्नप्त्यङ्गाद्विद्वाँ ऋतस्य दीधिति सपर्यन् । पिता यत्र दुहितुः सेकमृञ्जन्त्सशग्म्येन मनसा दधन्वे ॥ (ऋ ० स० ३ । ३१।१ ) । कुशिकः प्रसङ्गात् कश्चित् शास्त्रार्थ ब्रूते । अपुत्रस्य पितुः पुत्री दायादा पुत्रिका सती यत. सन्तानकृत् तस्या. पुत्र इत्यनयर्वोच्यते । अपुत्रो यः कन्यामन्यकुलं प्रापयति स वह्नि, 'वह प्रापणे' इति स्मरणात् । स पिता शासत् 'अभ्रातृका प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलङ्कृताम् । अस्या यो जायते पुत्रः स मे पुत्रो भवेदिति ||' ( वशिष्ठस्मृति १७/१७ ) इत्युक्तमनुशासन कुर्वन् दुहितुः पुत्रिकाया नप्त्यं नप्तभवं पिण्डदानादिक कर्तव्यतया गात् तिष्ठति । कि कुर्वन्? विद्वान् अस्या यो जायते पुत्र. स मम स्वधाकरो भविष्यतीति जानन् । ऋतस्य सत्यस्य पुत्रोत्पादनसमर्थस्य रेतसो दीधिति धर्तारं जामातरं तत्पति सपर्यंन् वस्त्रालङ्कारादिना पूजयन् पिता न प्रभाव गच्छति । यत्र यस्या. दुहितु पिता पालक. पतिर्जामाता सेक तस्या रेतःसेकम् ऋञ्जन् प्रसाधयन् यः शग्मेन केवल सुखनिमित्तेन मनसा तया स्वशरीर सदधन् वे सन्धत्ते न तु पुत्रनिमित्तेन मनसा प्रशास्ति, वोढा सन्तानकर्मणे दुहितु पुत्रभावं दुहिता दुहिता दूरे हिता दोग्धेर्वा नप्तारमुपागमद् दौहित्र पौत्रमिति विद्वान् प्रजननयज्ञस्य रेतसो वाङ्गादङ्गात् सम्भूतस्य हृदयादधिजातस्य मातरि प्रत्पृतस्य विधान पूजयन् ( नि० ३| १४ | - यत्त्वत्रोक्तम् – ' अयमपि मन्त्रोऽस्यैवालङ्कारस्य विधायकोऽस्ति । वह्निशब्देन सूर्यो दुहितास्य पूर्वोक्तेव स पिता के समान है' ( पृ० ३२१ ) यह अर्थ सगत नही है, क्योकि इसमें 'नानि' पद की संगति नही बैठती । ' पृथिवी माता संमान करन वाली है' यह अर्थ भी सही नही है, क्योकि प्रकृत स्थल में संमान का कोई प्रसग नही है । 'आमने-सामने दो सेनाएं होती है, उसी प्रकार सूर्य और पृथिवी, अर्थात् ऊपर की चादनी के समान सूर्य और नीचे के बिछौने के समान पृथिवी है' ( पृ० ३२१ ) यह अर्थ भी सही नही बैठता, क्योंकि दो सेनाओ को गर्भाधान के उदाहरण के रूप में कही नही दिखाया गया है । 'शासद्वह्नि० ' इस मन्त्र में कुशिक ऋषि ने प्रसंगवश शास्त्र की चर्चा चलाई है । पुत्रविहीन पिता की पुत्री पिता के दायाद को उत्तराधिकारिणी होती हैं और उस पुत्री का पुत्र ही उसकी कुलपरम्परा को आगे बढाता है, इस बात की चर्चा इस मन्त्र में की गई है । पुत्र सन्तानहीन पिता अपनी कन्या का दूसरे कुल में विवाह करने के कारण इस मन्त्र मे ' वह्नि' नाम से अभिहित है । वह पिता विवाह करते समय कहता है कि इस बिना भाई की कन्या को अलंकारो से विभूषित कर मैं तुमकां दे रहा हूँ । इसमे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह मेरा होगा । इस तरह से उस पुत्रिका दुहिता से पैदा हुआ नाती अपनी माता के वंश वालो को पिण्ड देता है, अपने पिता के वंश के लिये वह पिण्डदान का अधिकारी नहीं रह जाता । वह जानता है कि मेरा इस पुत्री में पैदा हुआ पुत्र मेरे लिये स्वधाकार का उच्चारण करेगा, पिण्डदान करेगा । वह पिता ऋत = सत्य, अर्थात् पुत्र की उत्पत्ति में समर्थ वीर्य के धारक अपने जामाता की, उस कन्या के पति की, वस्त्र, अलंकार आदि से पूजा कर स्वयं अपने नप्तृभाव को प्राप्त करता है, अर्थात् अपने नाती को प्राप्त कर लेता है । इस अपुत्र पिता की पुत्री में उसका जामाता अपने को साज -सवार कर केवल अपने सुख के लिये हो अपने मन के साथ ही अपने शरीर को भी उसके लिये ही समर्पित कर देता है, वह उस पिता की दुहिता में अपने पुत्र के निमित्त अपने मन को समर्पित नहीं करता, क्योकि उससे उत्पन्न हुआ पुत्र दुहिता के पिता के हित में विनियोजित होता है । निरुक्त मे दुहिता की व्युत्पत्ति यह की गई है कि वह दूर रह कर भी हित करती है, अथवा अपने पिता की कामना की पूर्ति करती है । उस दुहिता का पिता उस पुत्री से दोहित्र को प्राप्त करता है, जो कि उसके लिये पिण्डदान का अधिकारी रहता है । वह जानता है कि वह प्रजनन यज्ञ में उस दुहिता के पति के प्रत्येक अंग से पैदा होकर इकट्ठे हुए वीर्य से पैदा हुआ है और उसकी दुहिता के गर्भ में पिता की कामना की पूर्ति करने के मन से स्थापित किया गया है । अतः वह पिता अपनी पुत्री के गर्भ में अपने पिण्डदान के अधिकारी पुत्र का आधान करने वाले जामाता की सब तरह से पूजा करता है । स्वामी दयानन्द ने यहाँ कहा है-' सबका वहन, अर्थात् प्राप्ति कराने वाले परमेश्वर ने मनुष्यों की ज्ञान वृद्धि के लिये रूपकालंकार में कथाओं का उपदेश किया है । वही जल का धारण करने वाला है, जगत् में पुत्र-पोत्र आदि का पालन और उपदेश
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वेदार्थपारिजातः १५७२ स्वस्या उषसो दुहितु सेक किरणाख्यवीर्यस्य स्थापनेन गर्भाधान कृत्वा दिवस पुत्रमजनयत्' ( पृ० ३२० ) इति, तत्तु सर्वथा वेदार्थानभिज्ञानमूलकम्, पदवाक्यार्थासम्बन्धात् । निरुक्तवाक्यैस्तु सायणोक्तस्यैवार्थस्य समर्थन भवति । यत्तु — 'ब्रह्मवैवर्तादिमिथ्यापुराणेषु मिथ्याभूता. कथा लिखिता: सन्ति, प्रजाप्रतिर्ब्रह्मा चतुर्मुखो देहधारी स्वा दुहितरं मैथुनाय जग्राहेति कथा, ला मिथ्यैवास्ति, कुतस्तस्या अलङ्काराभिप्रायत्वात्' ( पृ ० ३१ ९ ) इति, तदपि विशृङ्खल- मेव, पुराणप्रतिपादिवायाः कथाया अप्यलङ्काराभिप्रायत्वेऽप्रामाण्यासम्भवात् । अन्यथा 'प्रजापतिर्वा स्वा दुहितरमभ्य- ध्यायत' इत्यादीनामप्यप्रामाभ्यापते । तस्या अप्यलङ्काराभिप्रायत्वे मिथ्यात्वे हेत्वभावात् । पुराणोपन्यस्तानां कथानां मिथ्यात्वं प्रतिज्ञाय तत्रैव हेतुर्वक्तव्य आसीत् । हेतुमनुपन्यस्य प्रजापतिर्वे स्वामित्याद्युपन्यासो व्यर्थ एव । नहि पुराणबाह्य- वचनस्यालङ्काराभिप्रायत्वन पुराणवचनस्यालङ्काराभिप्रायत्व सम्भवति, न वा तेन तस्याप्रामाण्यम् । यदपि 'प्रजापतिर्वे स्वाम्' इत्यारभ्योक्तम्, तदपि तुच्छम् विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि सविता सूर्यो वा सूर्यलोको वा? तत्रापि सूर्यस्य लोक इति समासे सूर्यलोकपद स्थूलमादित्याख्यं लोकमेव बोधयति, आहो सूर्यपद तदधिष्ठात्री चेतना काञ्चिद्देवतामभिदधाति, नात्र विनिगमनोपलभ्यते, कतरस्यात्र ग्रहणमिति । सूर्य एव लोक. सूर्यलोक इति समासे तुभाभ्यामपि पदाभ्या देवतैवोच्यते, तथा सति पदद्वयोपन्यासस्य को वार्थ? अन्यतरग्रहणकल्पनायामपि तदितरोल्लेखो व्यर्थ एव स्यात् । उभयग्रहणे दयानन्दस्य स्वमतविरोध. स्यात्, तेन मनुष्येतरदेवतातत्त्वानभ्युपगमात् । किञ्च, 'तस्य सवितुर्दुहिता कन्यावद् द्योरुषा चास्ति' ( पृ० ३१ ९) इति यदुक्तम्, तदपि न क्षोदक्षमम्, दुहितृ- पदस्य कन्यावदित्यर्थत्वे मानाभावात् शक्यार्थत्वसम्भवे लक्ष्यार्थताया अन्याय्यत्वात् । अत एव यस्माद्यदुत्पद्यते तत्तस्या- करता है । जिस सुखरूप व्यवहार में स्थित होकर पिता ( सूर्य ) दुहिता ( उषा ) मे वीर्य स्थापित करता है, जैसा पूर्व लिख आये है, उसी प्रकार यहा भी जान लेना' ( पृ० ३२१ ) ये सारी बातें वेदो के अर्थ को ठीक तरह से न समझ पाने के कारण है, क्योकि इसमें मन्त्रगत पदो का वाक्य से ठीक संबन्ध नही बैठता । ऊपर उद्धृत निरुक्त वाक्य से सायण द्वारा किये गये अर्थ को ही समर्थन मिलता है । 'ब्रह्मवैवर्त और श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थ, जो कि व्यास जी के नाम से संप्रदायी लोगो ने रच लिये है, उनका नाम पुराण कभी नही हो सकता, किन्तु उसको नवीन कहना उचित है । अब उनकी मिथ्यात्व परीक्षा के लिये कुछ कथा यहा लिखते है । नवोन ग्रन्थकारो ने एक यह कथा भ्रान्ति से मिथ्या करके लिखी है कि प्रजापति चतुर्मुख शरीरधारी ब्रह्मा ने अपनी पुत्री को मैथुन के लिये पकड़ा, जो कि केवल रूपकालंकार मात्र हैं' (पुत्र ३२० ), किन्तु यह कथन भी निराधार है, क्योकि पुराण प्रतिपादित कथा को आलंकारिक मानने पर भी किसी प्रकार की अप्रामाणिकता नही आ जाती । अन्यथा 'प्रजापतिर्वा ० ' इत्यादि वेद मन्त्र को भी अप्रामाणिक मानना पड़ जायगा । इस मन्त्र मे भी रूपकालंकार में कथा वर्णित है, पुराण की कथा मिथ्या है, इसमें कोई कारण भी बताना पड़ेगा । बिना कारण बताये 'प्रजापतिर्वै ' इस मन्त्र को उद्धृत कर देने में कोई तुक नही है । पुराण से बाहर का वचन आलंकारिक अभिप्राय से कहा गया है, अतः पुराण का वचन भी आलकारिक अभिप्राय से उक्त है या नहीं, इसका निर्णय आप कैसे कर सकते है और जब तक आप किसी निर्णय पर नही पहुचते, तब तक पुराण वचन को आप अप्रामाणिक कैसे कह सकते है । 'प्रजापति ० ' इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए जो कुछ आपने लिखा है ( पृ० ३२० ), वह भी असंगत है, क्योंकि आपके पास इस विकल्प का कोई उत्तर नहीं है कि सविता का अर्थ सूर्य है या सूर्यलोक? सूर्यलोक शब्द मे भी सूर्य का लोक यह तत्पुरुष समास मान कर स्थूल आदित्य लोक की बोधकता मानी जाती है, अथवा सूर्यपद उस आदित्यलोक की अधिष्ठात्री किसी चेतन देवता का बोधक माना गया है, इसमें कोई विनियोजक कारण न होने से यह निश्चित नही हो पाता कि इनमें से कौन सा अर्थ प्राप्त है? सूर्य ही लोक इस तरह का कर्मधारय समास मानने पर तो दोनो पदों से देवता का ही बोध होगा, तब इन दोनो पदों को एक साथ रखने का क्या प्रयोजन होगा? किसी एक ही पद से दोनो का ग्रहण हो जाने पर इनमें से किसी एक का उल्लेख व्यर्थ ही होगा । इसमें दयानन्द के अपने मत से भी विरोध पडेगा, क्योंकि वे तो मनुष्य से भिन्न किसी देवता तत्त्व को स्वीकार ही नही करते । 'उस सविता प्रजापति सूर्य की प्रकाश और उषा ये दो कन्याओ की तरह है' ( पृ० ३२० ) दयानन्द का यह कथन भी परीक्षा में खरा नहीं उतरता, क्योंकि दुहिता पद का अर्थ ' कन्याओ की तरह' कभी नहीं हो सकता । जब कि किसी पद का मुख्य अर्थ
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वेदार्थपारिजातः १५७३ पत्यवत् स तस्य पितृवत्' ( पू० ३१ ९ ) इत्युक्तिरसङ्गतैव, यस्माद्यदुत्पद्यते तत्र तन्निरूपितजन्यत्वस्यैव, यस्माच्चोत्पद्यते तत्र जनकत्वस्यैव च प्रसिद्धे । रूपकालङ्कारवचनमपि न सङ्गच्छते, त्वद्रीत्योपमालङ्कारस्यैव सम्भवान्न रूपकालङ्कारत्वम्, विषयिण उपमानभूतस्य रूपेणोपमेयस्य विषयस्य रञ्जन तदेव रूपकमित्युच्यते, विषयिणोऽभेदेन ताद्रूप्येण विषयस्य रञ्जन - मित्यर्थः । अभेदताद्रूप्यभेदे द्विविधस्यापि पुन. प्रत्येकस्य त्रैविध्यम्- ( १ ) प्रसिद्धविषय्याधिक्यवर्णनेन, ( २ ) तन्न्यूनत्ववर्णनेन, ( ३ ) अनुभयवर्णनेन वा । एवं षड्विधं रूपक भवति । तत्र निदर्शनमपि भूमिकाभासकृता प्रदर्शितम् -'अय हि धूर्जटि साक्षात् येन दग्धा. पुर क्षणात्' । अत्र येन दग्धा इति विशेषणेन वर्णनीये राज्ञि प्रसिद्धशिवाभेदानुरञ्जनात् शिवस्य पूर्वावस्थातो वर्णनीयराजभावावस्थाया न्यूनत्वाधिक्ययोरनुक्तत्वाद् अनुभयाभेदरूपकालङ्कार । यथा वा— 'चन्द्रज्योत्स्ना विशदपुलिने सैकतेऽस्मिन् सरय्वा वादद्यूत चिरतरमभूत् सिद्धयूनो कयोश्चित् ॥ एको वक्ति प्रथमनिहत कैटभ कसमन्यस्तत्त्व स त्वं कथय भगवन् को हतस्तत्र पूर्वम् ॥ ' अत्र स त्वमित्यनेन य कसकैटभयोर्हन्ता वासुदेवस्तत्तादात्म्यं वर्णनीयस्य कस्यचिद्राज्ञः प्रतिपाद्यम् । त प्रति कंसकैटभवधयो. पौर्वापर्यप्रश्नव्याजेन तत्तादात्म्यदाढर्थकरणात् पूर्वावस्थात उत्कर्षापकर्षयोरविभावनाञ्चानु- भयाभेदरूपकमुक्तम् ॥ एवमेवोदाहरणान्तराण्यप्यन्वेष्टव्यानि । प्रकृते वच्छब्दप्रयोगात् तादृशलक्षणासम्भवान्नात्र रूपका- लङ्कारः । तस्मादत्र प्रसङ्गे रूपकालङ्कारोक्तिरज्ञानविजृम्भिता धृष्टतैव । किञ्च, एकत्रादित्यस्य पुत्रत्वमङ्गीचकार, अपरत्र दिवसस्येति स्फुटोsपि विरोधो नावलोकितः । आदित्यपुत्रतामुक्त्वा पुनस्तस्यैव सूर्यापरर्यायस्य पितृत्व चोक्तवान् । यदुक्तम् — — यस्मिन् भूप्रदेशे प्रात. पश्चघटिकाया रात्रौ स्थिताया किञ्चित्सूर्यप्रकाशेन रक्तता भवति, तस्योषा इति सज्ञा' ( पृ ० ३१ ९) इति, तदप्ययुक्तम्, निरुक्तरक्तताया भूप्रदेशेऽसत्त्वात् । तदतिरिक्ते गगनस्थाने रक्कतायाः सर्वानुभव- हो सकता है, तो बिना किसी अभिप्राय के लक्षणा करना ठीक नही माना जाता । इसी लिये 'जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसकी संतान की तरह होता है और यह पिता की तरह होता है' ( पृ० ३२० ) यह व्याख्या भी असंगत है, क्योकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उससे जन्य और उसको उत्पन्न करने वाला जनक के रूप में ही प्रसिद्ध है । रूपकालंकार की बात भी जमती नही, क्योंकि आपकी इस व्याख्या के अनुसार तो उपमा ही इस स्थल पर बनेगी, रूपकालंकार नही । उपमानभूत विषय के रूप में उपमेय विषय को रग देना ही रूपक अलंकार कहलाता है । इसका अभिप्राय यह हुआ कि विषयी के साथ अभेद बोध ( तद्रूपता ) का संपादन कर विषय को रंग देना हो, अर्थात् विषयों से विषय की अभिन्न प्रतीति कराना और तद्रूप प्रतीति कराना ही रूपकालंकार का कार्य है । इस प्रकार इसके | - दो भेद हो जाते अभेद और ताद्रूप्य प्रतीति के भेद से विभक्त इस रूपकालंकार के पुनः प्रत्येक के तीन भेद होते है प्रसिद्ध विषयी के आधिक्य का वर्णन, उसकी न्यूनता का वर्णन अथवा इन दोनो का ही अवर्णन, अर्थात् न तो आधिक्य का वर्णन और न हीनत्व का ही । इस तरह से रूपक छः प्रकार का होता है । अनुभय वर्णन रूप रूपकालंकार का उदाहरण ' अयं हि धूर्जटि.' इत्यादि श्लोक को दिया ' ',गया है । इस उदाहरण में जिसने जला दिये है इस विशेषण के आधार पर जिस राजा का वर्णन किया गया है उसको भगवान् शिव के साथ अभिन्न रूप से रंग दिया गया है, किन्तु शिव की अवस्था से राजभाव की अवस्था मे न्यूनता या अधिकता का प्रतिपादन नही किया गया है । इस तरह से यह अनुभयभेद रूप रूपकालकार का उदाहरण बनता है । अथवा जैसे ' चन्द्रज्योत्स्ना० ' इत्यादि श्लोक में 'वही तुम हो' इस पद से यह प्रतीत होता है कि कंस और कैटभ राक्षसो को मार डालने वाले वासुदेव से किसी राजा की अभिन्नता यहाँ वर्णित है । इस वर्णन में कंस ओर कैटभ में उन्होने पहले किसको मारा? इस प्रश्न के व्याज से इनकी अभिन्नता का तो दृढता से प्रतिपादन किया जारहा है, किन्तु पूर्व ( वासुदेव ) की अवस्था से उत्कर्ष या अपकर्ष का बोध न कराने से यह भी उस अनुभयाभेद नामक रूपक का उदाहरण बनता है । इस तरह के अन्य अनेक उदाहरण दिये जा सकते है । इसके विपरीत प्रकृत स्थल में तो आप ' दुहितावत्' इस प्रकार वत् शब्द का प्रयोग करते है, इसमे उक्त रूपकालंकार का लक्षण घटित नही होता । इस लिये यहाँ रूपकालकार बनता ही नही । अतः इस प्रसंग में रूपकालंकार का बात करना धृष्टता ही मानी जायगी । इसमें वक्ता का अज्ञान ही स्पष्ट होता | दयानन्द एक स्थान पर आदित्य को प्रजापति का पुत्र मानते है और दूसरे स्थान पर दिवस को यह स्पष्ट विरोध भी उनको दिखाई नही पड़ा । आदित्य को पुत्र मान कर फिर वे उसी को सूर्य से अभिन्न मान कर पिता के रूप में भी स्वीकार करते है । इससे बढ़कर परस्पर विरोधी बातें और क्या हो सकती है?
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वेदार्थपारिजाता ११७४ सिद्धत्वात् । किञ्च यदि तयो पितादुहित्रो समागमाद् उत्कटदीप्ति प्रकाशाख्य आदित्यः पुत्रो जायत इति मन्यसे, तदा पुराणकृताऽमुमेवार्थं प्रकारान्तरेण निबन्धता किमपराद्धम्? किञ्च, 'प्रजापतिर्वै स्वा दुहितरम्' इत्यादि. 'रोहित भूतामभ्येत्' इत्यन्त पाठ ऐतरेयब्राह्मणे तृतीयपञ्जिकायां त्रयस्त्रिंशखण्डस्यादावेव पठित । तस्येत्यारभ्यादित्योऽभवदित्यन्त. पाठस्तमेव खण्डमारभ्य चतुस्त्रिंशखण्डे पठित. । चतुस्त्रिश-खण्डस्य मध्यगतस्यावशिष्टस्य सर्वस्यापि कथानकस्य प्रकरणावधृतपाठस्य परित्यक्तत्वान्न त्वत्कपोलकल्पितस्वार्थस्योप- --क्रमपरामर्शोपसंहारैर्विना याथातथ्येन निर्णयो भवति । अन्यथा किमर्थमुक्तपाठं परितत्याज? समग्रः पाठस्तु— 'प्रजापतिर्वै स्वा दुहितरमभ्यध्यायत । दिवमित्यन्य आहुरुषसमित्यन्ये । तामृश्यो भूत्वा रोहित भूतामभ्यैत्त देवा अपश्यन् अकृतं वै प्रजापति करोतीति । ते तमैच्छत् य एनमारिष्यत्येतमन्योन्यस्मिन्नाविन्दंस्तेषा या एव घोरतमा स्तन्व आसंस्ता एकधा समभरस्ता. सभृता एष देवोऽभवत्तदस्यैतद् भूतवन्नाम इति । भवति वै स योऽस्यै तदेव नाम वेद इति । त देवा अब्रुवन्नयं वै प्रजातिरकृतमकरिमं विध्येति । स तथेत्यब्रवीत् । स वै वो वरं वृणा इति वृणीष्वेति स एतमेव वरमवृणीत पशूनामाधिपत्यं तदस्यैतत्पशुमन्नाम इति' । एवमेव 'पर्जन्यपृथिव्यो पितादुहितवत्' ( पृ० ३१ ९) इत्यत्र कस्यापदेशः क्रियत इति पूर्वापर- ग्रन्थपर्यालोचनयापि न ज्ञायते । इदानीन्तने पुस्तके ( रूपकालङ्कार ) इति योजयित्वा केनचित्पाठो लापितः । 'द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र' इत्यादिना मन्त्रं निर्दिश्य यदुक्तं निरुक्तकृता - 'तत्र पिता दुहितुर्गर्भं दधाति' इति, तस्याभिप्रायस्तु न ज्ञायते । 'यतोऽयं पर्जन्यादद्भ्यः पृथिव्या उत्पत्तेः, अतः पृथिवी तस्य दुहितृवदस्ति' (पृ० ३१ ९-३२० ) अत्राप्यत इति व्यर्थमेव, पञ्चम्यैव गतार्थत्वात् । 'स पर्जन्यो वृष्टिद्वारा तस्यां वीर्यवज्जलप्रक्षेपणेन गर्भं दधाति । तस्माद् गर्भा- स्वामी दयानन्द आगे लिखते है - 'इसलिये उषा जो कि पाच घडी रात्रि शेष रहने पर पूर्व दिशा मे जिस भूप्रदेश पर रक्तता दीख पडती है, वह सूर्य की किरण से उत्पन्न होने के कारण उसकी कन्या कहलाती है' ( पृ० ३२० ), किन्तु यह व्याख्या भी ठीक नहीं है, क्योंकि आपके द्वारा वर्णित यह रक्तता भूप्रदेश में न रह कर उससे भिन्न आकाश में ही दिखाई पडती हैं, यह बात जन साधारण के अनुभव से ज्ञात है । यदि पिता और दुहिता, अर्थात् सूर्य और उषा के समागम से उत्कट प्रकाश वाला आदित्य ( दिवस ) पुत्र के रूप में उत्पन्न होता है, ऐसी आप व्याख्या करते हैं, तो फिर इसी बात को भिन्न प्रकार से वर्णित करने वाले पुराणकार ने क्या अपराध किया है कि जिस पर आप इतना आक्रोश व्यक्त करते है । इस प्रसंग में एक बात यह भी विचारणीय है कि 'प्रजापतिर्वे स्वा दुहितर' यहा से आरंभ कर ' रोहितभूतामभ्येत्' यहाँ तक का पाठ ऐतरेय ब्राह्मण की तृतीय पंजिका के ३३वें खण्ड के प्रारंभ में ही विद्यमान है । 'तस्य' से आरंभ कर ' आदित्योऽभवत्' यहाँ तक का पाठ ३३वें और ३४वें खण्ड में भी विद्यमान है । ३४वें खण्ड में वर्णित कथानक के अवशिष्ट भाग को आपने यहां छोड़ दिया है, उसको अपने मतलब का न समझ कर उद्धृत नही किया है । इस परिस्थिति में आपका कपोलकल्पित अर्थ उपक्रम और उपसंहार वाक्यो का ठीक से आलोडन न हो पाने से सही रूप में निकल नही पाता । लगता है अपने अभिप्राय की सिद्धि न होते देख कर ही आपने पूरे A वाक्य को उद्धृत नहीं किया है । अन्यथा पूरे पाठ को छोड़ देने का और क्या प्रयोजन हो सकता है । पाठकों की सुविधा के लिये वहाँ का पूरा पाठ ऊपर मूल में उद्धृत कर दिया गया है, जिससे कि पुराणप्रतिपादित कथानक की ही स्पष्ट रूप से पुष्टि होती है । इसी तरह से 'पिता के समान पर्जन्य और दुहिता के समान पृथिवी को' (पृ० ३२० ) बताने का दयानन्द का क्या अभिप्राय है, यह स्पष्ट नहीं हो पाता । नये संस्करण में कोष्ठक मे 'रूपकालंकार' इतना जोडकर इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि यहाँ भी रूपकालंकार का निरूपण किया गया है, अर्थात् इस अलंकार की सहायता से कथा लिखी गई है । ' द्योर्मे पिता' इत्यादि मन्त्र का निर्देश कर ' तस्य पिता दुहितुर्गभं दधाति' इस निरुक्तवाक्य को इस प्रसंग में स्वामी दया-नन्द ने उद्धृत किया है, उसका अभिप्राय क्या है? यह ज्ञात नहीं हो पाया । 'क्योंकि पृथिवी को उत्पत्ति जल से ही हुई है, अतः पृथिवी उसकी पुत्री की तरह है' इस अर्थ के प्रतिपादक 'यतोऽयं' इत्यादि वाक्य में 'अत " पद व्यर्थ ही है, क्योंकि पंचमी से ही यह अर्थ प्राप्त हो जायगा, इसके लिये अलग से 'अत:' के प्रयोग की कोई आवश्यकता नहीं है । 'जब वह पर्जन्य उस कन्या में वृष्टि के द्वारा जलरूप वीर्य
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बेवार्थपारिजाता १५७५ दोषध्यादयोऽपत्यानि जायन्ते' ( पृ ० ३२० ) इति तु सर्वथाऽसङ्गतम्, निरुक्तविपरीतं च । पृथिव्या यथाश्रुतं वस्तुभूतं कन्यात्वं प्रकल्प्य तत्रैव तदुत्पादकस्य पर्जन्यस्य वीर्यप्रसेकं च निर्दिश्य गर्भधारणपूर्वकं सोऽपत्य जनयतीत्यश्लीलताव्यञ्जकमर्थं स्वयमेव व्याख्याय परेषा सूतमपि दुरुक्त मन्यमानोऽर्थमप्यनर्थं बुद्ध्यमानो गुणानपि दोषपक्षे निक्षिपन् न मनागपि जिह्रेति । -निरुक्तदृष्ट्या मन्त्रार्थस्तु – पितृपदं 'पाता वा पालयिता वा' इत्यनया योगवृत्त्या यतो दक द्युलोकात्पतितं पार्थिवेन धातुना सम्पृक्तमोषधिभावमापद्य शरीरभावेनावतिष्ठत इत्येतदपेक्ष्य पर्जन्ये दिवि शक्तम् । तथा दुहितृपदेन पृथिव्येवोच्यते । सा हि लोकाद्दूरे हिता निहिता भवति, द्युलोकं दोग्धीति वा । अतस्तयोरत्र न लोकप्रसिद्ध. पितृदुहितृसम्बन्धो ज्ञायते, पितृ-दुहितृपदयोर्निरुक्तवृत्त्या द्युपृथिवीपरत्वात् । अत एव द्यावापृथिव्योः सर्वभूताना मातापितृत्वं प्रसिद्धमिति नात्राश्लील-त्वादिकम्, द्यौरेव चात्र पर्जन्यशब्देनोक्तेत्यप्युक्तमेव । यदुक्तम् - 'अयमपि मन्त्रोऽस्यैवालङ्कारस्य विधायकोऽस्ति' ( पृ० ३२० ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, तथात्वेऽ-लङ्कारविधायकत्वेऽलङ्कारदैवत्यमेवास्य मन्त्रस्य स्यात् । न च तत्सङ्गतम्, अत एव निरुक्तब्राह्मणादिषु न क्वापि रूपकालङ्कार-विधायिनी कथाख्याता । एवमेव –'सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्व इत्यपि निगमो भवति । सोऽपि गौरुच्यते' (नि० २२६) इति निरुक्तोल्लेखोऽप्यनुपयोगी, प्रकरणार्थेऽसम्बद्धत्वात् । 'द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र' इति येयं द्यौरुपरिस्था एषैव मम पिता जनितोत्पादयिता, यतोऽत्र नाभिः, नहनमेव नाभिः । अत्रैतस्मिन् द्युलोकलक्षणे पितरि उदकदानेनानुग्रहीतरि सति सन्तानोत्पत्तिक्रमेणैव शुक्रात्मनोत्पत्तिरुपपद्यते, को धारण करता है, तब उससे गर्भ रहकर ओषधी आदि अनेक पुत्र उत्पन्न होते है' ( पृ० ३२१ ), यह कथन भी सर्वथा असंगत है और निरुक्त के विपरीत भी है । स्वामी दयानन्द प्रस्तुत स्थान में, जैसा कि मन्त्र मे पढा गया है, उसी रूप में पृथिवी की कन्या के रूप में कल्पना करके उसी में उस पृथिवी के उत्पादक पर्जन्य के वीयं के आधान की बात लिखकर यह बताते है कि इस तरह से वह पृथिवी अपने पिता के वीर्य से गर्भवाली हो जाती है और पुत्र को उत्पन्न करती है । इस तरह से वे स्वय ही इस मन्त्र की अश्लीलता भरी व्याख्या करते है और दूसरे आचार्यों के किये गये भले अर्थ को भी गलत मान उस पर दोषारोपण करते है ॥ इस तरह से वे सही बात को भी गलत समझ कर, गुणपक्ष को भी दोषपक्ष में ही डालकर, कुछ भी लज्जित नही होते । निरुक्त की दृष्टि से तो मन्त्र का अर्थ इस तरह से होगा -पिता पद का अर्थ यौगिक वृत्ति के आधार पर रक्षा करने वाला अथवा पालन करने वाला होगा । पर्जन्य भी सारे लोक की रक्षा करने वाला अथवा पालन करने वाला होने से पिता कहलाता है, क्योकि आकाश से जब जल बरसता है, तो वह पृथिवी के साथ मिलकर ओषधी के रूप में परिणत होकर सभी प्राणियो के शरीर की रक्षा और पालन करने में समर्थ होता है । इसी आधार पर यहाँ पिता शब्द आकाशस्थित जल के अर्थ का ( पर्जन्य ) बोधक है । दुहिता पद से यहाँ पृथिवी का बोध होता है, क्योकि वह आकाश बहुत दूर विद्यमान है, अथवा वह आकाश का दोहन करती है । इस तरह से निरुक्त के अनुसार पिता पर्जन्य और दुहिता पृथिवी का लोक में प्रसिद्ध पिता -पुत्री वाला संबन्ध न रखकर निरुक्त मे प्रदर्शित निर्वचन के अनुसार द्युलोक और पृथिवीलोक अर्थ है । इसलिये आकाश और पृथिवी को सभी प्राणियों का माता-पिता सर्वत्र कहा जाता है । इसमें अश्लीलता का थोडा सा भी प्रसंग नहीं है । इस मन्त्र में द्युलोक को ही पर्जन्य शब्द से अभिहित किया गया है, यह बात पहले भी कही जा चुकी है । ' शासद्वह्नि० ' यह मन्त्र भी इसी रूपकालंकार का विधायक है ' ( पृ० ३२० ) यह कथन भी असंगत है । यदि यह मन्त्र अलंकार का विधायक होता, तो इस मन्त्र का देवता अलंकार को होना चाहिये था । यह तो ठीक बैठता नहीं । इसीलिये निरुक्त, ब्राह्मण प्रभृति ग्रन्थों में कही भी रूपकालंकार का विधान करने वाली कोई कथा नही मिलती । इसी तरह से 'सूर्यरश्मि० ' इत्यादि निरुक्त के वचन का उल्लेख भी इस प्रकरण से संबद्ध नही है, क्योंकि प्रस्तुत प्रकरण में गो ( पृथिवी ) के पर्याय के रूप में सूर्यरश्मि, चन्द्रमा अथवा गन्धर्व का उल्लेख करने से कोई बात नही बनती । 'द्यौर्मे पिता ' इत्यादि श्रुति का सही अर्थ इस प्रकार है - यह ऊपर दिखाई पडने वाला आकाश ही मेरा पिता है, मुझे उत्पन्न करने वाला है, क्योंकि नाभिस्थल यही है । इस आकाश रूपी पिता के द्वारा जलवर्षारूप कृत्य से अनुगृहीत होकर ही लोक
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वेदार्थपारिजातः १५७६ अतो द्युलोकस्य पितृत्वम् । अङ्गसम्बन्धकरणाद् बन्धु । मही महती पृथिवी मे माता द्यौरहं पृथिवीत्वम् ( आश्वलायनगृह्यसूत्र १/७/६ ) । वैवाहिके कर्मणि मन्त्रेणानेन द्यावापृथिवीरूपाभ्या मातापितृभ्या सम्पृश्व्यमात्मान दृष्ट्वा मन्त्रदृगाह --तत्कृतस्योप-कारस्याभावे मातापितरावकिञ्चित्करी भवतः । किमेतयोरन्यानपेक्षतया मातापितृत्वमुत किञ्चिदपेच्येत्याकाङ्क्षायामुच्यते---अनयोश्चम्वोः पृष्ठे सूत्रात्मना प्राणेन विधृतयोर्द्यावापृथिव्योरुत्तानयोरूर्ध्वमेव तानयोविस्तारितयोरत्रोर्द्यावापृथिव्योर्य एषोऽन्तरिक्षाख्योऽन्तर्मध्ये योनिरत्रास्मिन्नवकागदानोपकारत्वे प्रवृत्ते सति तदपेक्ष्यैव द्यावापृथिव्योर्मातापितृत्वम् । पिता पर्जन्यः । द्यौरेव हि रसान् प्रार्जयति तस्मात् सैव पर्जन्यशब्देनोच्यते । दुहितु. दूरे हितायाः पृथिव्या उपरि गर्भ सर्वभूतगर्भोत्पत्ति-हेतुभूतोदकमाधाद् आदधातीत्यर्थः । द्यावापृथिव्यामन्तरिक्षेण चावकाशदानेनानुगृह्यमाणान्येव भूतान्युत्पद्यन्त इत्यर्थः । 'एवं तद्विद्योपदेशार्थालङ्कार[ भूत][या भूषणरूपाया सच्छास्त्रेषु प्रणीताया कथायां सत्या या नवीनग्रन्थेषु पूर्वोक्ता मिथ्याकथा लिखितास्ति, सा नैव मन्तव्या' ( पृ० ३२२ ) इति दयानन्दोक्तौ सद्विद्योपदेश एवालङ्कारत्वेन विवक्षितः, न चालङ्कारग्रन्थेषु तादृशालङ्कारो वर्ण्यते । यदप्युक्तम् -'कश्चिद् देहधारीन्द्रो देवराज आसीत् । स गोतमस्त्रिया जारकर्म कृतवान् । तस्मै गोतमेन शापो दत्तस्त्व सहस्रभगो भवेति । तस्यै अहल्यायै शापो दत्तस्त्वं पाषाणशिला भवेति । तस्या रामपादरज. स्पर्शेन शापस्य मोक्षण जातमिति । तत्रेदृश्यो मिथ्यैव कथाः सन्ति । कुतः? आसामप्यलङ्कारार्थत्वात् । तद्यथा--इन्द्रागच्छेति । गौरावस्कन्दिन् अहल्यायै जारेति । तद्यान्येवास्य चरणानि तैरेवैनमेतत् प्रमुमोदयिषति' ( श० ३| ३| २ | १८ ), 'रेत. सोम ' ( श ० ३| ३| २| १ ), 'रात्रिरादित्यस्यादित्योदयेऽन्तर्धीयते' (नि० १२| ११ ), 'जार आ भगम्' जार इव भगम् | आदित्योऽत्र जार उच्यते, रात्रे- शुक्रके माध्यम से सन्तान की उत्पत्ति करता है । इसलिये आकाश को सबका पिता कहा जाय, यह उचित ही है । अंगो से संबन्ध स्थापित कराने से यह बन्धु है | यह महती ( विशाल ) पृथिवी मेरी माता है । आश्वलायन श्रौतसूत्र में विवाह संबन्धी कृत्यों के अवसर पर इस मन्त्र का विनियोग बताया गया है । तदनुसार इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए वर वधू से कहता है कि आकाश और पृथिवी जैसे सबके माता-पिता है, उस तरह से हम भी अपनी सन्तति के माता-पिता बनने वाले हैं । इस अवसर पर यदि हम सारे जगत् के माता-पिता आकाश और पृथिवी का उपकार न मानेंगे, तो हमारा माता-पितृत्व व्यर्थ हो जायगा । किसी की सहायता से ये माता-पिता बनते हैं, या इनको किसी की अपेक्षा नहीं रहती? इस आकाक्षा (जिज्ञासा ) का उत्तर मन्त्र में ही दिया गया है कि सूत्रात्मक प्राण के आतान-विज्ञान से धारण किये गये आकाश और पृथिवी के बीच में एक अन्तरिक्ष रूपी योनि है । वही अवकाश प्रदान कर इनका उपकार करती रहती है । उसी की सहायता ये ये सारे जगत् के माता-पिता बन पाते है । इनमें पिता पर्जन्य है, क्योकि यह पर्जन्य रूपी आकाश ही सब जगह से रस का संचय करता है, अतः उसी को पर्जन्य कहा जाता है । यह पर्जन्य ही दुहिता अर्थात् बहुत दूर स्थित पृथिवी के गर्भ में सभी प्राणियों को उत्पत्ति में सहायक उदक की वर्षा करता है । इसका अभिप्राय यह है कि आकाश, पृथिवी और अन्तरिक्ष के अवकाश देने पर हो, अर्थात् इन सबके अनुग्रह से ही सारे प्राणियो की उत्पत्ति होती है । 'इस उत्तम रूपक अलंकार विद्या को अल्प बुद्धि पुरुषो ने बिगाड के सब मनुष्यों में हानिकारक फल घर दिया है । इसलिये सब सज्जन लोग पुराणोक्त मिथ्या कथाओं को मूल से ही त्याग कर दें' ( पृ ० ३३३ ) । दयानन्द ने इस जगह सद्विद्या के उपदेश को ही अलंकार मान लिया है, किन्तु किसी भी अलंकार ग्रन्थ में इस नाम का अर्थालंकार दृष्टिगोचर नही होता । प्रजापति और उसकी पुत्री की कथा पर विचार समाप्त कर स्वामी दयानन्द ने इन्द्र और अहल्या की कथा की चर्चा उठाई है । इस प्रसंग में वे कहते है- ' अब जो दूसरी कथा इन्द्र और अहल्या की है, जिसको कि मूढ लोगो ने अनेक प्रकार से बिगाड़ कर लिखा है । इस कथा को उन्होने ऐसा मान रक्खा है कि देवों का राजा इन्द्र देवलोक में देहधारी देव है । वह गौतम ऋषि की स्त्री अहल्या के साथ जार कर्म किया करता था । एक दिन जब उन दोनो को गौतम ने देख लिया, तब इस प्रकार शाप दिया कि है इन्द्र, तू हजार भग वाला हो जा । तथा अहल्या को शाप दिया कि तू पाषाण रूप हो जा । परन्तु जब उन्होंने गौतम से प्रार्थना की कि हमारे शाप का छुटकारा कैसे या कब होगा? तब इन्द्र से तो कहा कि तुम्हारे हजारों भग के स्थान पर नेत्र हो जाय और अहल्या को"
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वेवार्थपारिजाता १५७७ र्जरयिता' (नि० ३।१६) (एष एवेन्द्रो य एष तपति' ( श० १२६। ४। १८ ) इन्द्र सूर्यो य एष तपति, भूमिस्थान् पदार्थाश्च प्रकाशयति अस्येन्द्रेति नाम परमैश्वर्यप्राप्तेर्हेतुत्वात् । स अहल्याया जारोऽस्ति । सा सोमस्य स्त्री तस्य गोतम इति नाम । गच्छतीति गौरतिशयेन गौरिति गोतमश्चन्द्र । तयो स्त्रीपुरुषवत् सम्बन्धोऽस्ति । रात्रिरहल्या । कस्मात्? अहर्दिन लीयतेऽस्या तस्माद्रात्रिरहल्योच्यते ॥ स चन्द्रमा सर्वाणि भूतानि प्रमोदयति, स्वस्त्रियाऽहल्यया सुखयति । अत्र स सूर्य इन्द्रो रात्रेरहल्याया गोतमस्य चन्द्रस्य स्त्रिया जार उच्यते । कुत? अय रात्रेर्जरयिता । 'जुष वयोहानौ' इति धात्वर्थोऽभिप्रेतोऽस्ति । रात्रेरायुषो विनाशक इन्द्र सूर्य एवेति मन्तव्यम् । एवं सद्विद्योपदेशार्थालङ्कार [भूत][या भूषण- रूपाया सच्छास्त्रेषु प्रणीताया कथाया सत्या या नवीनग्रन्थेषु पूर्वोक्ता मिथ्या कथा लिखितास्ति, सा केनचित् कदापि नैव मन्तव्या' ( पृ ० ३२१-३२२ ) इति महता प्रघट्टकेन, तदपि नास्तिक्यमूलकम्, रूपकालङ्कारस्यापि निराधारत्वायोगात् । सति कुड्ये चित्रोल्लेख. । केनचिद्रूपेण विद्यमानायामेव कथाया रूपकालङ्कारेणार्थान्तरवर्णन युज्यते नासत्याम् । यथा रामरावणकथाया रामायणे प्रसिद्धायामेव राम आत्मा विज्ञान वा, रावणोऽहङ्कार, शरीर लङ्का, शुद्धमनो हनूमान् इत्यादि- कल्पना भवति । तथा च प्रसिद्धः श्लोकः --' विद्यासीतावियोगक्षुभितनिजसुख. शोकमोहाभिपन्नश्वेतः सौमित्रिमित्रो भवगहनगतः शास्त्रसुग्रीवसख्य । हत्वास्ते दैन्यबालि मदनजलनिधौ धैर्यसेतुं प्रबद्धय प्रध्वस्ताबोधरक्षःपतिरधिगतचिज्जानकिः स्वात्मरामः ॥ ' इति । एवमेव कौरवपाण्डवसग्रामे सत्येव तत्र देवासुरसग्रामकल्पना जायते । राजसतामसवृत्तिषु सात्त्विक- वृत्तिषु च देवासुरसग्रामस्यापि कल्पनाऽभिप्रेयते । किञ्चानेकै राचार्यैर्वेदमन्त्राणामाध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकभेदेनानेकेऽर्था वचन दिया कि जिस समय रामचन्द्र अवतार लेकर तेरे पर अपना चरण लगावेंगे, उस समय तू फिर अपने स्वरूप में आ जावेगी । इस प्रकार पुराणो में यह कथा बिगाड कर लिखी गई है । सत्य ग्रन्थो में ऐसा नही है, क्योकि ये भी रूपकालंकार में वहीं किसी दूसरे ही अभिप्राय को प्रकट करती है । अर्थात् उनमें इस रीति से कथा वर्णित है - सूर्य का नाम इन्द्र, रात्रि का नाम अहल्या तथा चन्द्रमा का नाम गोतम है । यहीं रात्रि और चन्द्रमा का स्त्री-पुरुष के समान रूपकालंकार है । चन्द्रमा अपनी स्त्री रात्रि से सब प्राणियो को आनन्द कराता है और उस रात्रि का जाग आदित्य है । अर्थात् उसके उदय होने से रात्रि अन्तर्धान हो जाती है । जार अर्थात् यह सूर्य ही रात्रि के वर्तमान रूप शृङ्गार को बिगाडने वाला है । इसलिये यह स्त्री - पुरुष का रूपक अलंकार बांधा है कि जैसे स्त्री- पुरुष मिलकर रहते है, वैसे ही चन्द्रमा और रात्रि भी साथ साथ रहते हैं । चन्द्रमा का नाम 'गोतम' इसलिये हैं कि वह अत्यन्त वेग से चलता है और रात्रि को 'अहल्या' इसलिये कहते हैं कि वह उसमे दिन का लय हो जाता है । सूर्य इस रात्रि को निवृत्त कर देता है, इसलिये वह उसका ' जार' कहलाता है । इस उत्तम रूपक अलंकार में कही गई विद्या को अल्पबुद्धि पुरुषो ने बिगाड कर सब मनुष्यो में हानिकारक रूप घर दिया है । इस लिये सब सज्जन लोग पुराणोक्त मिथ्या कथाओ को मूल से ही त्याग दें' ( पृ ० ३२३-३२३ ) । स्वामी दयानन्द ने प्रबल प्रमाणो के सहारे अपनी बात को रखने का प्रयत्न किया है, किन्तु यह सारा प्रयत्न उनके नास्तिक स्वभाव को ही प्रकट करता है । रूपक अलंकार भी निराधार नहीं रह सकता । दीवाल, कपडे आदि आधार के रहने पर ही उस पर चित्र बनाया जा सकता है । किसी न किसी रूप में कथा के रहने पर ही उसके आधार पर रूपक अलंकार के सहारे अन्य कल्पनाएं की जा सकती है, निराधार कल्पना नही को जा सकती । जैसे राम और रावण की कथा के रामायण में प्रसिद्ध रहने पर ही राम की आत्मा अथवा विज्ञान के रूप में, रावण की अहंकार के रूप में, शरीर की लंका के रूप मे और शुद्ध मन की हनूमान् के रूप में कल्पना हो सकती है । इसी तरह की कल्पना के आधार पर इस श्लोक की रचना की गई है - 'विद्यारूपी सीता के वियोग से क्षुब्ध यह राम रूपी आत्मा अपने सुखमय स्वरूप को भूल बैठा है और शोक एवं मोह से अभिभूत हो गया है । यह गहन संसार में जब लक्ष्मण जैसे सहायक को पाकर चित्त सुग्रीव के समान शास्त्रो से मित्रता स्थापित करता है, तो वह अपने दैत्य सदृश शत्रु बालि को मार डालता है, मदन (काम ) रूपी सागर में धैर्य रूपी पुल बाँध लेता है और अज्ञान रूपी रावण को मारकर पुनः विद्यारूपी जानकी को प्राप्त कर अपने सुखमय स्वरूप में लीन हो जाता है । इसी तरह से कौरव और पाण्डवो का संग्राम होने पर ही इस युद्ध मे देवासुर संग्राम की कल्पना की जाती है । राजस और तामस वृत्तियों के साथ सात्त्विक वृत्ति के युद्ध के लिये भी देवासुरसग्राम की कल्पना की जा सकती है । अनेक आचार्यों ने वैदिक मन्त्रों के आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक के भेद से अनेक अर्थ किये हैं । निरुक्तकार यास्क १ ९८
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१५७८ वेदार्थपारिजाता वर्ण्यन्ते । निरुक्तकारोऽपि पौराणिकपक्षमुपस्थापयति ॥ तेन विशिष्टेषु राजादिमनुष्येषु देवादिषु तासु तासु वृत्तासु घटनासु यथाश्रुतासु सतीष्वप्याध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकार्थकल्पन न विरुद्धयते । किञ्च यथाश्रुतार्थानुपपत्तौ सत्यामेव लक्षणा गौणी वा वृत्तिमाश्रित्य कल्पना भवति, तदपलापे मानाभावात् । न च शिष्यते हितमुपदिश्यतेऽनेनेति शास्त्रमिति निरुक्त्या- ऽनिष्टपरिजिहीर्षूणामनिष्टपरिहारोपायोपदेशेनेष्टप्रेप्सुनामिष्टप्राप्त्युपायोपदेशेनैव शास्त्रत्व सङ्गच्छते ॥ कथामात्रस्य च तद्भिन्नत्वाद् अशास्त्रत्वमेव स्यादिति वाच्यम्, अर्थवादरूपेण कथाना विधिप्राशस्त्यादिपरत्वेन शास्त्रत्वाव्याघातात् । तदुक्तं - ' '. जैमिनिना विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीना स्यु इति । अर्थवादाश्च प्रमाणान्तरविरोधे गुणवादिन प्रमाणान्तरसिद्धावनुवादिनोऽविरोधेऽसिद्धौ च भूतार्थवादिन इति देवतानिरूपणप्रसङ्गे विस्तरेणोक्तम् । तत्रैव कणेहत्या- लोचनीयम् । यदपि चाहल्या रात्रिरुच्यते, गोतमश्चन्द्र तयो ' स्त्रीपुरुषवत् सम्बन्धोऽस्ति । इन्द्र सूर्यश्वास्य स्त्रिया जार उच्यते । सूर्योदये रात्रिर्नश्यति । इदमेव च तया सह सूर्यस्य जारकर्मेति, तदपि न सिद्धान्तबाधकम्, पुराणप्रतिपादितायाः कयाया अपि तदभिप्रायत्वाभ्युपगमात् । जारकर्म कृत्वा यदोदेति सूर्यस्तदा क्रमश एधमानः सहस्रभगता भजते । सहस्रभगः सहस्रकिरण सर्वात्मना प्रकाशते । तत एव लोके सहस्ररश्मिः सूर्य उच्यते । रात्रिश्च पोषणशिलेव निश्चेष्टा सर्वथापि स्तब्धा भवति । सुप्तप्रायं जगदप न किञ्चिच्चेष्टते, दिवस एव कर्मणा लब्धसत्ताकत्वात् । रामचन्द्रपादकिरणस्पर्शेन सा पत्या चन्द्रेण मोदते, तदानी जरयितु. सूर्यस्यासत्वात् । ऐतिहासिकमप्यर्थ तत्र निरुक्तकारो ब्रवीति । रामायणकथागतानीन्द्रा- अन्य अर्थों के साथ पौराणिक पक्ष का भी समर्थन करते हैं । इसलिये उन उन विशिष्ट राजाओ से > मनुष्यों से, देवताओ से संबद्ध घटनाओ का मन्त्रो में वर्णन मिलने पर भी उनका आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक अर्थ करने में किसी प्रकार को बाधा नही रहती । वास्तविक बात यह है कि यथाश्रुत अर्थ की उपपत्ति न होने पर ही लक्षणा या गोणी वृत्ति का सहारा लेकर कोई कल्पना की जा सकती है, किन्तु यथाश्रुत अर्थ की उपपत्ति होती हो तो उसका अपलाप किसी भी कीमत पर नही किया जा सकता । यदि आप कहे कि जो हित का उपदेश करने वाला हो, उसे ही शास्त्र कहा जा सकता है, अत अनिष्ट का निवारण चाहने वाले को अनिष्ट के परिहार का और इष्ट वस्तु को चाहने वाले को उसकी प्राप्ति का उपाय बताने वाला ग्रन्थ ही शास्त्र कहला सकता है । केवल कथाएँ जहाँ वर्णित है, उन पुराण प्रभृति ग्रन्थो में शास्त्र के इस लक्षण के न रहने से वे शास्त्र नही कहला सकते, किन्तु आपका यह कथन सही नही है, क्योकि अर्थवाद के रूप मे कथाएँ भी विधि को प्रशसा अथवा निषेध्य की निन्दा करती है और इस तरह से उनमें भी प्रवृत्ति और निवृत्ति का उपदेश विद्यमान होने से शास्त्र का लक्षण मिल जाता है । जैसा कि जैमिनि आचार्य ने कहा है-' विधिवाक्य की स्तुति करके अर्थवाद वाक्य उसी के अंग बन जाते है' । ये अर्थवाद वाक्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के विपरीत दिखाई पडने पर गौणार्थंक और अन्य प्रमाणो के उपोद्बलक होने पर अनुवादक मात्र रह जाते हैं । किसी प्रमाण से विरुद्ध न हो और इनमें यदि किसी प्रमाणान्तर की उपोलकता सिद्ध न हो, तो ये भूतार्थवादी माने जाते है । इस बात को हमने देवतातत्त्व का निरूपण करने वाले प्रकरण में विस्तार से समझाता है । वही इस विषय का सूक्ष्म निरीक्षण किया जा सकता है । यदि अहल्या रात्रि कही जाती है, गोतम चन्द्रमा और इनका स्त्री और पुरुष के समान संबन्ध माना जाता है । इन्द्र अर्थात् सूर्य को इस रात्रि रूपी स्त्री का जारं माना जाता है, सूर्योदय होने पर रात्रि नष्ट हो जाती है, इसी को सूर्य का जार कर्म माना जाता है, तो इसमे हमारे सिद्धान्त की किसी प्रकार को हानि नही है । पुराण में प्रतिपादित कथा का यही अभिप्राय हम भी मानते है । उक्त जार कर्म को करके सूर्य जब उगता है और ऊपर आकाश में क्रमशः बढता हुआ उठता है, तब वह सहस्र भग वाला, अर्थात् हजारो किरणो से सब तरह से प्रकाशित हो उठता है । इसीलिये लोक में सूर्य को सहस्ररश्मि कहा जाता है । रात्रि पत्थर की शिला की तरह निश्श्रेष्ट, स्तब्ध रहती है । उस समय सोया हुआ सारा जगत् भी किसी तरह की चेष्टा नही करता, दिन मे ही सब कोई अपना सारा कार्य करते हैं । रामचन्द्र के चरण की किरणों का स्पर्श होने से वह अपने पति चन्द्रमा के साथ आनन्द मनाती है, क्योकि उस समय उसका जार सूर्य वहाँ उपस्थित नही रहता । निश्क्तकार ने इस मन्त्र का ऐतिहासिक अर्थ भी किया है । रामायण की कथा में