वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 681–690
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 681–690
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पदार्थपारिजातः १५७६ हल्यादीनि पात्राण्यपि नापलापार्हाणि । सति कुड्ये चित्रोल्लेखसम्भवेन तस्यामैतिहासिक्या कथायामेवाध्यात्मिकाधि- दैविकादयोऽप्यर्था. सङ्गच्छन्ते । 'उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति । विवक्ति वह्नि स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती ॥ ' (ऋ ० सं० १०।११।६) इति मन्त्रे आदित्यो जार उक्त, रात्रेश्चन्द्रादिभासा च जरयितृत्वात् । यथा जार आदित्यो भगं भजनीय भौममान्तरिक्ष रस स्व ज्योतिरूर्ध्वमुदीरयति, तथा हे अग्ने, सर्वगत सन्तमात्मान विशेषात्मलाभायोदीरय उद्गमय । अरणी पितरौ प्रति द्यावापृथिव्यौ अहोरात्रे वा । 'मातुर्दिधिषुमब्रव स्वसुर्जार शृणोतु न । भ्रातेन्द्रस्य सखा मम ॥ ' (ऋ ० स० ६।५५।५ ) इत्यत्र च रात्रिरादित्यस्य मातोक्ता, प्रसवकाले स्त्रिया जघने कुमारस्येव रात्रेर्जघने तस्योदयात् । तस्याः स एव रोद्धा धारयिता रोद्धान्त स मातुर्धारयिता दिधिषुरुच्यते । स्वसृपदेन उषा उच्यते, साहचर्याद्रसहरणाच्च । स्वस्रा साकं बाल्ये नित्यं चरति तथा चोषसादित्य, तस्या उषसो जरयितृत्वात् स स्वसुर्जार उक्त । तत्रैव निरुक्ते जार आ भगमित्यत्र मनुष्यजार एवाभिप्रेतः स्यात् स्त्रीभगस्तथा (नि० ३| १६) । यथा पारजायिको जारो भग स्त्रिया भगमुपस्थमिवात्मानमरणी प्रत्युदीरयति । तथा च यत्राहल्या महर्षेर्गोतमस्य पत्नी इन्द्रश्च देवराजस्तत्र पारजायिकत्वादेव जारशब्दप्रयोग. । तत्र गोतमशापादहल्याया. पाषाणत्वमिन्द्रस्य च सहस्रभगत्व रामचरणरज. स्पर्शात्तस्या उद्धारः, तपस्यया शिवाराधनेन च शिवधनुर्भङ्गध्वनिश्रवणाद् इन्द्रस्य सहस्रनयनत्वं च सवृत्तम् । इन्द्रियग्रामो दुर्धर । तत्र न जातु विश्वसेत् । भगवदाराधनेन तपस्यया च महान्त्यपि पातकानि नश्यन्ति इत्युपदेशपरमिदमैतिहासिकाख्यानम् । यदुक्तम्–'एवमेवेन्द्र. कश्विद्देहधारी देवराज आसीत् । तस्य त्वष्टुरपत्येन वृत्रासुरेण सह युद्धमभूत् । वृत्रासुरेणेन्द्रो निगलितोऽतो देवाना महद् भयमभूत् । ते विष्णुशरण गता । विष्णुरुपायं वर्णितवान् । मया प्रविष्टेन वर्णित इन्द्र, अहल्या प्रभूति पात्रो का अपलाप भी नही किया जा सकता । हमने अभी बताया है कि किसी आधार के रहने पर ही चित्र बनाया जा सकता है, अतः उस ऐतिहासिक कथा को स्वीकार कर लेने पर ही आध्यात्मिक, आधिदैविक प्रभृति अर्थ भी किये जा सकते है, अन्यथा नही । 'उदीरय पितरा०' इस मन्त्र में आदित्य को जार बताया गया है, क्योकि वह रात्रि और चन्द्रमा के प्रकाश को नष्ट कर देता है । जैसे जार आदित्य भग, अर्थात् अभिप्रेत पृथिवी सबन्धी और अन्तरिक्ष संबन्धी रस को अपने किरणों के सहारे ऊपर खीच लेता है, इसी तरह से हे अग्ने, आप अपनी सर्वव्यापकता के साथ किसी विशिष्ट स्वरूप को भी स्वीकार कीजिये । दो अरणिया अग्नि के माता-पिता हैं । द्यावापृथिवी अथवा अहोरात्र को दो अरणियो के रूप मे बताया जाता है । ' मातुविधिषु ० ' इस मन्त्र में रात्रि को आदित्य की माता बताया गया है । प्रसव काल मे स्त्री के जघन से जैसे बालक पैदा होता है, उसी तरह से रात्रि के जघन से आदित्य का उदय होता है । उस रात्रि का धारयिता आदित्य है, अतः उसको मातुदिधिषु ( माता का धारक) कहा जाता है । इस आदित्य की स्वसा ( बहिन) उषा कहलाती है, क्योकि वह इसके साथ रहती है और आदित्य के रसग्रहण में सहायक भी बनती है । जैसे बचपन में भाई सदा बहिन के साथ खेलता है, उसी तरह से आदित्य बचपन में उषा के साथ विचरण करता है । उस उषाकाल को भी यह खा जाता है, अतः इसको ( आदित्य को ) स्वसा का जार कहा गया है । इसी स्थल मे निरुक्त में मनुष्य जार और स्त्री के भग का ही स्पष्ट वर्णन किया गया लगता है । जैसे परस्त्री लम्पट जार स्त्री के उपस्थ को अपने अरणि दण्ड के प्रति आकृष्ट करता है । इस अर्थ को स्वीकार करने पर अहल्या महर्षि गोतम की पत्नी के प्रति आकृष्ट देवराज इन्द्र को परस्त्रीगमन में रत होने के कारण ही जार कहा गया है । गोतम मुनि के शाप से अहल्या शिला बन गई और इन्द्र के शरीर में सहस्र भग प्रकट हो गये । राम की चरण रज के स्पर्श से अहल्या का उद्धार हुआ और तपस्या से शिव को संतुष्ट करने पर रामचन्द्र के द्वारा शिव के धनुष को तोड़ने की आवाज सुन कर इन्द्र के हजार नेत्र हो गये! मनुष्य की इन्द्रियो को वश में रखना बडा कठिन है । इन पर कभी विश्वास नही करना चाहिये । भगवान् की आराधना और तपस्या से बड़े बड़े पातक और संकट भी दूर हो जाते हैं, इन्हीं सब बातों को समझाने के लिये शास्त्रो में इस तरह के ऐतिहासिक उपाख्यान बीच बीच में दिये रहते है ।
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वेदार्थपारिजाता १५८० समुद्रफेनेनाय हतो भविष्यतीति ॥ ईदृश्यः प्रमत्तगीतवत् प्रलपिताः कथा पुराणाभासादिषु नवीनेषु ग्रन्थेषु मिथ्यैव सन्तीति भद्रे विद्वद्भिर्मन्तव्यम् । कुत.? एतासामप्यलङ्कारवत्त्वात् ( पृ० ३२३ ) इति, तदपि तुच्छम् अलङ्कारवत्त्वस्य मिथ्यात्वा-प्रयोजकत्वात् । मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च बहुत्र त्वयाऽलङ्कारा अभ्युपगताः । न तावतापि तेषा तत्प्रतिपाद्यार्थाना वाऽलङ्कारवत्त्वेऽपि त्वया मिथ्यात्वमवगम्यते । किञ्च, कतमः कीदृशश्वालङ्कारः? इत्यपि वक्तव्यम् । तदवचन त्वदुक्तेरेवाप्रामाण्यमावेदयति । 'एवं सत्यशास्त्रेषु परमोत्तमायामलङ्कारयुक्ताया कथाया सत्या ब्रह्मवैवर्तादिनवीनपुराणाभासेष्वेता अन्यथा कथा उक्तास्ता. शिष्ठैः कदाचिन्नैवाङ्गीकर्तव्या.' ( पृ० ३२७ ) इत्युक्तिरपि चर्वितचर्वणमेव 1। तत्रापि न कश्चिदलङ्कारः प्रदर्शित. । - यच्च —' ( इन्द्रस्य) सूर्यस्य परमेश्वरस्य वा' इत्युक्तम्, तदपि न युक्तम्, असामञ्जस्यात् । यद्यत्र परमेश्वरपद शक्तिविधया परमात्मनि शक्तम्, तदा वक्ष्यमाणग्रन्थस्य मन्त्रार्थस्यासङ्गतिरेव स्यात् । तत्र सर्वत्रापि प्रकरणे दृश्यसूर्यस्यैवाभि-हितत्वात् । यदि परमेश्वरशब्दस्य यौगिकवृत्तिमादाय सूर्यविशेषणत्वमुच्येत, तदापि न सङ्गति, भौतिके सूर्ये पारमैश्वर्यस्या-सम्भवात्, सर्वव्यापिनि परमात्मन्येव वत्सम्भवात् । सूर्याधिष्ठात्र्याः कस्याश्विदैश्वर्यशालिन्या देवताया अभ्युपगमे तवैव सिद्धान्तहानि । यत्तु— 'इन्द्रस्य नु वीर्य्याणि प्र वोच यानि चकार प्रथमानि वज्री । ( | | ) अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम् । ऋ ० स० १ ३२ १ ' अहन्नहि पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्र स्वयं ततक्ष । वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्ज समुद्रमव जग्मुरापः ॥ ' (ऋ० स १।३२।२) आगे स्वामी दयानन्द लिखते है -' तीसरी इन्द्र और वृत्रासुर की कथा है । इसको भी पुराण वालो ने ऐसा घरा है कि वह प्रमाण और युक्ति इन दोनो से विरुद्ध जा पडती है । जैसे कि त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुर ने देवो के राजा इन्द्र को निगल लिया । तब सब देवता लोग बडे भययुक्त होकर विष्णु के समीप में गये और विष्णु ने उसके मारने का उपाय बताया कि मैं समुद्र के फेन में प्रविष्ट होऊँगा । तुम लोग उस फेन को उठाकर उससे वृत्रासुर को मारना, वह मर जायगा । इस तरह की पागलो की सी बताई हुई पुराण ग्रन्थो की कथा सब मिथ्या है । श्रेष्ठ लोगो को उचित है कि इनको कभी न मानें, क्योंकि इनमें तो आलंकारिक वर्णन है ' ( पृ० ३३४ ), किन्तु यह कथन भी निराधार है, क्योकि आलंकारकिता के होते कोई बात मिथ्या नही हो जाती । मन्त्रो मे और ब्राह्मणो में अनेक स्थलों पर आपने अलकार माने है, जिन्तु इतने से आपने उनको कही भी मिथ्या नही माना है । किसी बात को आलकारिकता के आधार पर मिथ्या बताने से पहले आपको उस अलंकार का परिचय बताना चाहिये कि किस स्थल पर कौन सा अलकार है और उसके कारण कोन कौन सी बात मिथ्या सिद्ध होती है । ऐसा न करने से तो आपकी बात ही मिथ्या सिद्ध हो जाती है । 'इस तरह से सत्य ग्रन्थो की अलंकार रूप कथा को छोडकर छोकरो के समान अल्प बुद्धि वाले लोगो ने ब्रह्मवैवर्त और श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों में मिथ्या कथा लिख रक्खी है, उनको श्रेष्ठ पुरुष कभी न माने ' ( पृ० ३२८) यह कथन भी वर्जित का चर्षण मात्र हैं, क्योंकि पहले की ही तरह इस स्थल पर भी उन्होने किसी अलंकार को नहीं दिखाया है । अपि च, स्वामी दयानन्द ने इन्द्र का अर्थ सूर्य अथवा परमात्मा किया है, यह भी उचित नहीं है, क्योकि इसकी प्रस्तुत मन्त्र में कोई संगति नहीं बैठती । यदि दयानन्द प्रदर्शित परमेश्वर पद शक्ति वृत्ति से परमात्मा अर्थ का बोधक है, तो आगे के मन्त्रो से प्रस्तुत मन्त्र के अर्थ की कोई संगति नही बैठेगी, क्योंकि उन मन्त्रो में सब जगह दिखाई पडने वाले सूर्य का ही उल्लेख मिलता है । यदि परमेश्वर शब्द को यौगिक मान कर उसको सूर्य का विशेषण माना जाय, तब भी अर्थ की संगति नही बैठती, क्योकि भौतिक सूर्य में परम ऐश्वर्य की सत्ता नही बन सकती, वह तो सर्वव्यापी परमात्मा में ही विद्यमान है । सूर्य की अधिष्ठात्री किसी ऐश्वर्यशालिनी देवता को स्वीकार करने पर तो आपके ही सिद्धान्त की ही हानि होगी, क्योकि मनुष्य से भिन्न इस तरह की किसी देवता को मानने के पक्ष में आप नही हैं । स्वामी दयानन्द ने ' इन्द्रस्य नु वीर्याणि०' प्रभूति दो मन्त्रो को उद्धृत कर उनकी व्याख्या इस प्रकार की है— ' यहां सूर्य अथवा परमात्मा का नाम इन्द्र है । उसके किये हुए पराक्रमों को हम लोग कहते है, जो कि परमैश्वर्य होने का हेतु, अर्थात् बड़ा तेजघारी है । वह अपनी किरणों से वृत्र अर्थात् मेघ को मारता है । जब वह मरकर पृथिवी पर गिर पड़ता है, तब अपने जल रूप
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वेदार्थपारिजातः १५८१ मन्त्राविमा उद्धृत्य ' इन्द्रस्य सूर्यस्य परमेश्वरस्य वा तानि वीर्याणि पराक्रमानह प्रवोच कथयामि यानि ,,,. '.' प्रथमानि पूर्वम् नु इति वितर्केवितर्के वज्रीवज्री चकार । वज्री वज्र प्रकाश प्राणो वाऽस्यास्तीति । वीर्यं वै वज्र (श० ७| ३| १ | १ ९ )स अहि मेघमहन् हतवान् । त हत्वा पृथिव्यामनु पश्चादपस्ततर्द विस्तारितवान् । ताभिरद्भि प्रवक्षणा नदीस्ततर्द जलप्रवाहेण हिंसितवान् तटादीना च भेद कारितवानस्ति । कीदृश्यस्ता नद्य? पर्वताना मेघाना सकाशाद् उत्पद्यमाना, यज्जलमन्तरिक्षाद्धिसित्वा निपात्यते तद् वृत्रस्य शरीरमेव विज्ञेयम् । त्वष्टा सूर्यस्त मेघमहन् हतवान्, अस्मै वृत्रासुराय मेघाय पर्वते मेघे शिश्रियाण श्रित स्वयं प्रकाशमय वज्र स्वकिरणजन्य विद्युत् प्रक्षिपति । येन वृत्रासुर मेघ ततक्ष कणीकृत्य भूमौ पातयति । पुनर्भूमौ गतमपि जल कणीकृत्याकाश गमयति । ता आप समुद्रमवजग्मु गच्छन्ति । कथम्भूता आप:? (अञ्ज. ) व्यक्ता., ( स्यन्दमाना.) चलन्त्य । का इव? वाश्रा वत्समिच्छवो गाव इव । आप एव वृत्रासुरस्य शरीरम् । यदिद वृत्रशरीराख्यजलस्य भूमौ निपातनम्, तदिद सूर्यस्य स्तोतुमर्ह कर्मास्ति ' (पृ ० ३३४ ) इति च व्याख्याय देवानामसुराणा चापलापाय यतितम्, तदप्यविचारितरमणीयम् तादृशस्य भौतिकस्यार्थस्यैव बुधोधयिषितत्वे वृत्रासुरादिप्रयोगस्य नैरर्थक्या- पातात् । पर्वतशब्दस्य मुख्यार्थबाध एव मेघार्थता युक्ता । किञ्च दयानन्दो मन्त्र मेघमहिमत्वेन वर्णितवान्, तमेव च पर्वते मेघे श्रितमित्युक्तवानिति कथ न पूर्वापरविरोध? हिन्दीव्याख्यानेऽपि स एव मेघ आकाशादधो निपत्य पर्वते पर्वतमर्था- मेघमण्डलं पुनराश्रयते । नहि मेघ एव मेघमण्डलमाश्रयत इति युक्तम् । शब्दार्थस्तु प्रायः सायणभाष्यादेव चोरित । किञ्च श्रौतसूत्राणां प्रामाण्यमभ्युपगत दयानन्देन । आश्वलायनेन च 'इन्द्रस्य नु वीर्याणीत्येतस्मिन्नेन्द्री निविदं दध्यात्' (आ ० श्रौ० सू० ५।१५ ) इत्यग्निष्टोमे माध्यन्दिने सवमे निष्केवल्यशस्त्रे ऐन्द्री निविद दध्यादिति विहितम् । विषुवत्यपि तस्मिन् शस्त्रे एतद्विनियुक्तम् । 'विषुवान् दिवाकीर्त्य. ' इति खण्डे सूत्रितम् 'इन्द्रस्य नु वीर्याणीत्येतस्मिन्नैद्री शस्त्वा ( आश्व श्री० सू० ८| ६) शस्त्रभूतैर्मन्त्रैर्देवताना शंसन भवति । गसन च प्रशंसनमेव । त्वद्रीत्या जडस्य सूर्यस्येन्द्रत्वे कथ प्रशंसनमुपपद्यते । परमेश्वस्य वेन्द्रत्वे कथ तस्य वृत्रहन्तृत्वादिकमुपपद्यते? तस्मात् श्रौतसूत्रब्राह्मणादिसम्मतमेव व्याख्यानं शरीर को सारी पृथिवी पर फैला देता है । फिर उससे अनेक बडी बडी नदी परिपूर्ण होकर समुद्र मे जा मिलती है । कैसी वे नदिया हैं कि पर्वत अर्थात् मेघो से उत्पन्न होकर वे जल को ही बहाने के लिये होती है । जिस समय इन्द्र मेघरूप वृत्रासुर को मारकर आकाश से पृथिवी पर गिरा देता है, तब वह पृथिवी मे सो जाता है । फिर वही मेघ आकाश में से नीचे गिरकर पर्वत, अर्थात् मेघमण्डल का पुन. आश्रय लेता है । जिसको सूर्य अपनी किरणों से फिर हनन करता है । जैसे कोई लकडी को छीलकर सूक्ष्म कर देता है, वैसे ही वह मेघ को भी बूंद- बूंद करके पृथिवी पर गिरा देता है और उसका शरीर रूप जल सिमट - सिमट कर नदियों के द्वारा समुद्र को ऐसे प्राप्त होता है, जैसे कि अपने बछडो से गाय दोड़कर मिलती है' (पृ० ३२५ ) । ऐसी व्याख्या करके वे देवता और असुरो की सत्ता को अस्वीकार कर देते हैं, किन्तु उनका यह सारा मन्तव्य ढकोसला मात्र है, यदि इस तरह का भौतिक अर्थ ही मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय माना जाय, तो उसके लिये वृत्र, असुर प्रभूति पदो के प्रयोग की आवश्यकता नही रहेगी । पर्वत शब्द के मुख्य अर्थ का बाघ मानने के बाद ही उसका अर्थ लक्षणा के द्वारा मेघ किया जा सकता है । इस प्रसंग में यह भी विचारणीय प्रश्न है कि दयानन्द पहले तो मन्त्र मे मेघ की महिमा का वर्णन करते है और फिर उसी मेघ को पर्वत पर आश्रित मानते है । इसमें क्या स्पष्ट ही पूर्वापरविरोध नही है? हिन्दी व्याख्या में भी बताया गया है कि 'वही मेघ आकाश से गिरकर पहाड पर पुनः मेघमण्डल का आश्रय लेता है' । इस स्थल में विचारणीय बात है कि मेघ ही मेघमण्डल का आश्रय कैसे लेगा? इसके अतिरिक्त इन मन्त्रों का अर्थ तो प्रायः सायण भाष्य से ही चुराया गया है । स्वामी दयानन्द श्रौतसूत्रो का प्रामाण्य स्वीकार करते है । आश्वलायन ने अग्निष्टोम यज्ञ में माध्यन्दिन सवन में निष्केवल्य शस्त्र में इन्द्र सम्बन्धी निविद् के आधान का विधान किया है । इसका विनियोग विषुवत् शस्त्र के लिये भी 'विषुवान् दिवाकीर्त्य:' इस सूत्र में किया गया है । वहीं बताया गया है कि 'इन्द्रस्य तु वीर्याणि' इस ऋचा से इन्द्र की स्तुति करने के बाद अन्य शस्त्र मन्त्रो से देवताओं को भी स्तुति की जाती है । शंसन (स्तुति) एक प्रकार की प्रशंसा ही है । आपके मत से जब जड़ सूर्य ही इन्द्र है, तो उसकी क्या प्रशसा हो सकती है? यदि इन्द्र परमेश्वर को माना जाता है, तो वह वृत्र को मारने वाला कैसे
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वेदार्थपारिजातः १५८२ ग्राह्यम् | 'चतत्र सती. षड् बृहतीः करोतीन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम्' ( ऐ० आ० ५/२/२) । तथाहि वज्री वज्रहस्त इन्द्रो देवविशेष प्रथमानि पूर्वंसिद्धानि मुख्यानि वा यानि वीर्याणि पराक्रमयुक्तानि कर्माणि चकार इन्द्रस्य तानि वीर्याणि नु क्षिप्रं प्रब्रवीमि । कानि वीर्याणीति तदुच्यते --अहि मेघमहन्नित्येक वीर्यम्, अनुपश्चात् अपो जलानि ततर्द हिसितवान् भूमौ पातितवानिति द्वितीयम्, पर्वताना सम्बन्धिनी वक्षणा. प्रवहणशीला नदीरभिनद् भिन्नवान् कूलद्वयकर्षणेन प्रवाहितवा-निति तृतीयम् । सिद्धान्ते वज्री इन्द्रो देवविशेष एव स्वीयदिव्यशक्त्या मेघं हन्ति, स एव जल भूमौ पातयति, स एव च नदीभित्त्वा प्रवाहयति । नहि जडो वायु सूर्यो वा तत्कर्तुं प्रभवति । 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' ( ब्र० सू० ११११५ ) इति न्यायात् । यथा चेतनादश्वात् सारथेश्चाचेतनाना रथादीना गतिर्भवति न स्वातन्त्र्येण, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । न च परमेश्वस्य सर्वकारणस्य मेघजलादिहन्तृत्वनदीकूलकर्षणादिभिस्तत्प्रवाहयितृत्वादिविशेषण. सस्तवः सम्भवति, सर्वाधिपतेर्ग्रामाधिपतित्वे-नेव । अहन्नहि स एवेन्द्र पर्वते शिश्रियाणम् अहि मेघम् अहम् हतवान् । अस्मै इन्द्राय स्वयं सुष्ठु प्रेरणीयं (ऋ गतौ ) यद्वा शब्दनीयं स्तुत्यम्, (स्वृ शब्दोपतापयो.) व्यति सज्ञापूर्वक विधेरनित्यत्वाद् वृद्धयभावे रूपम् ॥ वज्रं त्वष्टा विश्वकर्मा ततक्ष तनूकृत्य निर्मितवात् । तेन वज्रेण मेघे भिन्ने सति स्यन्दमाना प्रस्रवणयुक्ता आपः समुद्रम् अञ्ज सम्यग् अवजग्मु प्राप्ताः । तत्रैवोपमान वाश्राः ( वाशू शब्दे ) वत्सान् प्रति हम्भारवोपेता धेनव इव । ता यथा हम्भारवोपेता वत्सगृहे गच्छन्ति, तथैव कलकलादिशब्दोपेता आप समुद्रमुपयान्तीत्यर्थः । तदेतदपि देवविशेषस्येन्द्रस्यैव कार्यम् । यदपि च- 'अहन् वृत्रं वृत्रता व्यसमिद्रो वज्रेण महता वधेन । स्कन्धासीव कुलिशेना विवृक्णाहि शयत उपपृक् पृथिव्या ॥ ' (ऋ ० स० ११३२/५ ) | अपादहस्त अपतन्यदिन्द्र मास्य वज्रमधिसानौ जघान । वृष्णो वधिः प्रतिमान बुभूषन् पुरुत्रा वृत्रो अशयद् व्यस्त. ॥ ' (ऋ० स० १।३२।७) । इन्द्रशत्रुरिन्द्रोऽस्य शमयिता शातयिता वा, तस्मादिन्द्रशत्रु । तत्क.? हो सकता है? इसलिये श्रौतसूत्र, ब्राह्मण प्रभृति ग्रन्थो का अनुवर्तन करते हुए ही इस मन्त्र की व्याख्या को जा सकती है । ऐतरेय आरण्यक में बताया गया है कि इन्द्र चार सृतियो का तथा छः बृहतियो का निर्माता है, अतः इन्द्र के वीर्य का वर्णन करना उचित है । इसका अभिप्राय है कि वज्र हाथ में लिये हुए देवविशेष इन्द्र ने पूर्वकाल में पराक्रम से भरे जिन मुख्य कार्यों को किया है, उन इन्द्र के कार्यों का मैं शीघ्रता से वर्णन कर रहा हूँ । वे पराक्रम के कार्य कौन कौन से हैं? इसने सबसे पहले अहि अर्थात् मेव को अपने वज्र से तोड़ दिया । उसके बाद उन मेघो में विद्यमान जल को चारो तरफ फैला दिया । तीसरा काम उसने यह किया कि उसने पहाडो से अपने दोनों किनारो को वहाँ ले जाने वाली नदियाँ प्रवाहित कर दी । इस वर्णन के अनुसार हमारे मत में वज्री, देवराज इन्द्र अपनी दिव्य शक्ति से मेघो को छिन्न -भिन्न कर देते है, वही पृथ्वी पर जल बरसाते है और वही नदियो में बाढ ला देते हैं । जड वायु अथवा सूर्य में इस प्रकार की सामर्थ्य नही मानी जा सकती । ' ईक्षतेर्नाऽशब्दम्' यह ब्रह्मसूत्र इसमें प्रमाण है । जैसे चेतन अरब और सारथि के रहने पर भी अचेतन रथ आदि को गति प्राप्त होती है, स्वतन्त्र रूप से जड़ पदार्थ मे गति नही रहती, उसी तरह से प्रकृत उदाहरण में भी समझना चाहिये । सारी पृथ्वी के सम्राट् को एक गाँव का स्वामी मानने पर जैसे यह उसकी स्तुति नही होगी, उसी तरह से इस सारी सृष्टि के संचालक अन्तर्यामी परमेश्वर को यदि उक्त विशेषणो से मंडित किया जाय तो यह उनकी स्तुति नही होगी । वह इन्द्र ही पर्वत पर विश्राम कर रहे मेघ को छिन्न -भिन्न कर देता है । इस पराक्रम-शाली इन्द्र के लिये त्वष्टा ने सर्वत्र अप्रतिहत गति वाले अथवा अत्यन्त प्रशंसनीय शक्तिवाले शस्त्र वज्र का निर्माण कर दिया था । उस वज्र से छिन्न-भिन्न होकर बादलों से बरसा हुआ पानी बहकर समुद्र तक पहुँच गया । जैसे कि सायंकाल घर आते समय गायें रंभाती हुई अपने बछडो के पास पहुँच जाती है, उसी तरह से कल-कल शब्द के साथ पहाड़ो से उतर कर नदियों में बहता हुआ जल समुद्र तक पहुँच जाता है । यह भी देवराज इन्द्र का ही कार्य है । इसके आगे स्वामी दयानन्द ने ' अहन् वृत्रं ० ' इत्यादि मन्त्रो को और निरुक्त के वचनो को उद्धृत करते हुए उनकी व्याख्या इस तरह से की है-'जब सूर्य उस अत्यन्त गर्वित मेघ को छिन्न-भिन्न करके पृथिवी पर ऐसे गिरा देता है, जैसे कि कोई मनुष्य आदि के शरीर को काट-काट कर गिराता है, तब वह वृत्रासुर भी पृथिवी पर गिरा हुआ मृतक के समान शयन करने वाला हो जाता है । निघण्टु में मेघ का नाम वृत्र है । वृत्र का शत्रु अर्थात् निवारक सूर्य है । सूर्य का नाम त्वष्टा है । उसकी सन्तान मेघ है,
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वेदार्थपारिजातः १५८३ वृत्रो मेघ इति नैरुक्ता । त्वाष्ट्रोऽसुर इत्यैतिहासिका । वृत्रं जघ्निवान् अपववार तद् । वृत्रो वृणोर्वा वर्ततेर्वा वर्धतेर्वा । यदवृणोत्तद् वृत्रस्य वृत्रत्वम् । यदवर्धत यदवर्धत तद्वा वृत्रस्य वृत्रत्वम् । यथा कस्यचिन्मनुष्यादेरसिना छिन्नं सदङ्ग पृथिव्या पतति, तथैव स मेघोऽप्यशयत । पृथिव्या शयान इवेन्द्रेण सूर्येणापादहस्तो व्यस्तो भिन्नाङ्गकृतो वृत्रो मेघो भूमावशयत । (निघण्टौ १।१० वृत्र इति मेघस्य नाम) । त्वष्टा सूर्यस्तस्यापत्यमसुरो मेघ । कुत? सूर्यकिरणद्वारैव रसजलसमुदायभेदेन यत्कणीभूतं जलमुपरि गच्छति, तत्पुनर्मिलित्वा मेघरूप भवति, तस्यैवासुरसज्ञत्वात्' ( पृ० ३२५ । ३२६ ) इत्यादि, तदपि नोचितम्, भौतिकस्यार्थस्य तथाभूतस्य गौणस्यार्थस्य सत्त्वेऽपि यथाश्रुतार्थस्येतिहासपुराणादिवणितस्यार्थस्य बाधे मानाभावात् । नहि यस्य हस्तपादादीन्यङ्गानि न सन्ति तस्य भिन्नागता अपादहस्तता च सम्भवति । मन्त्रार्थस्त्वेवम्मन्त्रार्थस्त्वेवम् —- अयमिन्द्रोअयमिन्द्रो व्रजेण सम्पादितो यो महान् वधस्तेन वज्रेण वृत्रतरम् अतिशयेन लोकानामावरक- मन्धकाररूपम् । यद्वा वृत्रैरावणै सर्वान् शत्रून् तरति तं वृत्रम् एतन्नामकमसुर व्यस विगतासं छिन्नबाहुर्यथा भवति तथा अहन् हतवान् । असच्छेदे दृष्टान्त –कुलिशेन कुठारेण विवृक्णा विशेषतरिछन्नानि स्कन्धांसीव यथा वृक्षस्कन्धा छिन्ना भवन्ति तदृत् । तथा सति अहि वृत्र पृथिव्या उपरि उपपृक् सामीप्येन संपृक्त रायते, छिन्नकाष्ठवद् भूमौ पततीत्यर्थं । ( वृतु वर्तने ) इत्यस्माद् रक्प्रत्यय I। अपादहस्त इति । अपाद् वज्रेण छिन्नत्वात् पादरहित, अहस्तो हस्तरहित, वृत्र इन्द्रमुद्दिश्य अपृतन्यत पृतना युद्धमैच्छत् ॥ द्वेषाधिक्येन बहुधा विद्धोऽपि युद्ध न परित्यक्तवान् । अस्य हस्तपादहीनस्य वृत्रस्य सानौ पर्वतसानुसदृशे प्रौढस्कन्धे अधि उपरि वज्रमाजघान इन्द्र, आभिमुख्येन प्रक्षिप्तवान् । अशक्तस्यापि युद्धेच्छाया दृष्टान्तः —वधिश्छिन्नमुष्क. पुरुषो वृष्णो रेत सेचनसमर्थस्य पुरुषान्तरस्य प्रतिमान सादृश्य बुभुषन् प्राप्तुमिच्छन् यथा न शक्नोति, तद्वदयमिति शेष ॥ स वृत्रः पुरुत्रा बहुष्ववयवेषु व्यस्तो विविधं क्षिप्त सन् अशयत् भूमौ पतितवान् । ' यत्तु — व्यस्तो भिन्नाङ्गकृतो वृत्र ' इति, तन्न शोभनम् कृतभिन्नाङ्गो वृत्र इत्यस्यैव युक्तत्वात् । श्रीमद्भागवतादिषु वृत्रासुरस्य कथोपवणतास्ति । इन्द्रेण वज्रेण कृत्तहस्तपादोऽपि वृत्रो महागजेन्द्र रावतसहितमिन्द्र व्यात्तेन मुखेन जग्राह । क्योकि सूर्य की किरणो के द्वारा जल कण-कण होकर ऊपर को जाकर वहाँ मिलकर मेघरूप हो जाता है । मेघ का नाम वृत्र इसलिये है कि वह स्वीकार करने योग्य है, उसको असुर इसलिये कहते है कि वह प्रकाश का आवरण करने वाला है' ( पृ० ३२६ ), किन्तु यह व्याख्या भी सही नही है, भौतिक दृष्टि से यदि अर्थ किया जाय तो गोणी वृत्ति के सहारे ऐसा अर्थ भी किया जा सकता है, किन्तु इससे इतिहास -पुराण आदि में वर्णित तथा लोक में प्रसिद्ध मुख्य अर्थ का अपलाप नही किया जा सकता । फिर जिसके हाथ-पैर आदि अंग है ही नही, उसके संबन्ध मे यह वर्णन कहा तक उचित हो सकता है कि उसके अंग काट लिये गये और वह बिना हाथ - पैर का हो गया । इससे स्पष्ट है कि मन्त्र में हाथ-पैर प्रभृति अगो से युक्त वृत्रासुर का मुख्यतया वर्णन है और गौणी वृत्ति से इसका मेघपरक अर्थ भी किया जा सकता, किन्तु ऐसा करने पर मन्त्राक्षरो की पूरी संगति नही बैठेगी । मन्त्रो का अर्थ इस प्रकार है - इस इन्द्र ने अपने वज्र नाम के आयुध की सहायता से लोगो को अत्यन्त त्रास देने वाले अन्धकार को अथवा अपने सारे शत्रुओ को त्रस्त कर देने वाले वृत्र नाम के असुर को, उसकी भुजाओ को काट कर मार डाला । इन्द्र ने उस वृत्रासुर की भुजाओ को अपने वज्र से उसी तरह काट डाला, जैसे कि कुल्हाडी से काट देने पर वृक्ष की टहनियाँ कट कर जमीन पर गिर पड़ती है । ऐसा करने पर वह वृत्रासुर कटी हुई लकड़ी की तरह जमीन पर गिर पडता है । बज्र से अपने हाथ और पैर कट जाने के बाद भी वह वृत्रासुर इन्द्र से युद्ध करने को तैयार था । उस इन्द्र से वृत्र को इतना द्वेष था कि वह इतना घायल हो जाने के बाद भी उससे युद्ध बन्द नही कर रहा था । तब इन्द्र ने इस कटे हाथ- पैर वाले वृत्रासुर के पहाड़ को चोटी की समतल भूमि के समान विस्तीर्ण एवं मजबूत कन्धों पर बज्र से प्रहार किया । इस प्रकार वृत्रासुर का यह युद्धोन्माद उसी प्रकार का निष्फल था, जैसा कि किसी व्यक्ति के अण्डकोश निकाल लिये गये हो और वह पुरुष वीर्यसेचन में समर्थ पुरुष की बराबरी करने चले, तो उसका यह कार्य निष्फल एवं उपहासास्पद होता है । इस वज्र के प्रहार से वह वृत्रासुर टुकडे -टुकड़े होकर भूमि पर बिखर गया, अर्थात् उसके शरीर के टुकडे चारों तरफ छटक कर भूमि पर बिखर गये ।
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IIII वेदार्थपारिजातः भगवच्छतथोपवृहित इन्द्रो वृत्र जघान । कथेयं न प्रमाणान्तरसिद्धा न वा विरुद्धेति भूतार्थवादेन सिद्धा स्वार्थेऽप्यवान्तर- तात्पर्यवती । तत एव त्वाष्ट्रोऽसुर इत्यैतिहासिका इत्येवं प्रतिपादयन् निरुक्तकारो यास्कोऽपि स्पष्टयाम्बभूव । एव पुराणादि- सकलसच्छास्त्रेषु प्रतिपादितास्तास्ता. परमोत्तमा कथा दयानन्दसहस्त्रैरपि नान्यथयितुं शक्यन्ते । 'अतिष्ठन्तीनामनिवेशनाना काष्ठाना मध्ये निहितं शरीरम् । वृत्रस्य निण्य वि चरन्त्यापो दीर्घं तम आशय- दिन्द्रशत्रु ॥ ' (ऋ ० स ० १ ३२ १० ) । 'नास्मै विद्युन्न तन्यतु सिषेध न या मिहमकिरद्धादुनि च । इन्द्रश्च यद्युयुधाते अहिश्चोता परीभ्यो मघवा विजिग्ये ॥ ' (ऋ० स ० १।३२।१३ ) । 'वृत्रो ह वा इदं सर्वं वृत्त्वा शिश्ये । यदिदमन्तरेण द्यावापृथिवी । स यदिदं सर्वं वृत्त्वा शिश्ये तस्माद् वृत्रो नाम । तमिन्द्रो जघान स हतः पूति सर्वत एवापोऽभिसुस्राव । सर्वत इव ह्यय समुद्रस्तस्मादु हैका आपो बीभत्साञ्चक्रिरे । ता उपर्युपर्यतिपुविरेत इमे दर्भास्ता हैता अनापूयिता आपोऽस्ति वा इतरासु संसृष्टमिव यदेना वृत्र पूतिरभिप्रास्रवत्त- देवासामेताभ्या पवित्राभ्यामपहन्त्यथ मेध्याभिरेवाद्भि प्रोक्षति, तस्माद्वा एताभ्यामुत्पुनाति' ( श० १| १ | ३| ४| ५ ), 'तिस्र एव देवता इति नैरुक्ताः I। अग्नि पृथिवीस्थानो वायुर्वेन्द्रो वान्तरिक्षस्थानः सूर्यो घुस्थान इति' (नि० ७/५) | एभिर्मन्त्रैर्ब्राह्मण- वचनैश्च मेघ एव वृत्र । वृत्रस्य शरीरमापो दीर्घं तमश्चरन्ति । अत एवेन्द्रशत्रुर्मेघो भूमावशयत्, आसमन्ताच्छेते । नास्मै इति । वृत्रेण मायारूपप्रयुक्ता विद्युत् तन्यतुश्चास्मै सूर्यायेन्द्राय न सिषेध निषेद्धु न शक्नोति । अहिर्मेघः" इन्द्रः सूर्याश्च द्वौ परस्पर युयुधाते । यदा वृत्रो वर्धते तदा सूर्यप्रकाश निवारयति । यदा सूर्यस्य तापरूपसेना वर्धते तदा मेघ निवारयति । परन्तु मघवा इन्द्र. सूर्यस्तं वृत्र मेघं विजिग्ये जितवान् । स वृत्र इद सर्वं विश्व वृत्त्वा आवृत्य शिश्ये शयन करोति तस्माद् वृत्रो नाम ॥ त वृत्र मेघमिन्द्रः सूर्यो जघान ॥ स हत. सन् पृथिवी प्राप्य सर्वत. काष्ठतृणादिभि. सयुक्त पूतिर्दुर्गन्धो भवति । पुराकाशस्थो भूत्वा सर्वतोऽपोऽभिसुस्राव । अय हतो वृत्र. समुद्रं प्राप्य तत्रापि भयङ्करो जात । अत एव तत्रस्था आपो स्वामी दयानन्द ने यहाँ अर्थ किया है कि मेघ छिन्न-भिन्न हो गये (भिन्नाङ्गकृतो वृत्र ), किन्तु यह उचित नही है । क्योकि मन्त्र पद से 'भिन्नाङ्गो वृत्रः' यही अर्थ निकल सकता है । श्रीमद्भागवत प्रभृति पुराणो में वृत्रासुर की कथा वर्णित है कि इन्द्र के वज्र से हाथ-पैर कट जाने के बाद भी वृत्रासुर ने ऐरावत हाथी के साथ इन्द्र को अपने खुले मुँह में लपक लिया था, किन्तु भगवान् से शक्ति पाकर इन्द्र ने वज्र की सहायता से वृत्रासुर को मार डाला । यह कथा किसी दूसरे प्रमाण से न तो सिद्ध ही है और न विरुद्ध ही है, अतः भूतार्थवाद के रूप में स्वीकार की जाती है । भूतार्थवाद का अपने स्वार्थ में भी अवान्तर तात्पर्य मान्य है । इसीलिये निरुक्तकार ने ऐतिहासिक पक्ष का विवेचन करते हुए इस बात को स्पष्ट किया है कि वे ऐतिहासिक त्वाष्ट्र नाम के एक असुर की सत्ता स्वीकार करते है । पुराण प्रभृति सभी सच्चे शास्त्रों में इसी तरह की एक से एक उत्तम कथाएँ वर्णित हैं, जिनको कि दयानन्द जैसे हजारों व्यक्ति भी असत्य सिद्ध नही कर सकते । इसके आगे पुनः स्वामी दयानन्द ' अतिष्ठन्तीना० ' इत्यादि दो मन्त्रों को शतपथ ब्राह्मण और निरुक्त के वचनों को उद्धृत कर उनकी व्याख्या इस तरह से करते है - ' इन मन्त्रो से और ब्राह्मण वचनो से मेघ ही वृत्र के नाम से प्रसिद्ध है । वृत्र के इस जलमय शरीर से बडी बडी नदियाँ उत्पन्न होकर अगाध समुद्र में जाकर मिलती है और जितना जल तालाब या कूप आदि में रह जाता है, वह मानो पृथ्वी में शयन कर रहा है । वह वृत्र अपने बिजली और गर्जनरूप आयुध से भी इन्द्र को कभी नहीं जीत सकता । इस प्रकार अलंकार रूप वर्णन से इन्द्र और वृत्र ये दोनो परस्पर युद्ध के समान व्यवहार करते हैं, अर्थात् जब मेघ बढता है, तब तो वह सूर्य के प्रकाश को हटाता है और जब सूर्य का ताप अर्थात् तेज बढ़ता है, तब वह वृत्र नाम मेघ को हटा देता है । परन्तु इस युद्ध के अन्त में इन्द्र नाम सूर्य की ही विजय होती है । जब जब मेघ वृद्धि को प्राप्त होकर पृथिवी और आकाश में विस्तृत होकर फैलता है, तब तब उसको सूर्य हनन करके पृथिवी पर गिरा देता है । पश्चात् वह अशुद्ध भूमि, सडे हुए वनस्पति, काष्ठ, तृण तथा मल- मूत्र से भरा होने से कही कही दुर्गन्ध रूप भी हो जाता है । फिर उसी मेघ का जल समुद्र में जाता है । तब समृद्र का जल देखने में भयकर मालूम
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वेदार्थपारिजातः १५८५ भयप्रदा भवन्ति । इत्थ पुन पुनस्तास्ता नदीसमुद्रपृथिवीगता आप सूर्यद्वारेणोपर्युपर्यन्तरिक्ष पुविरे गन्छन्ति, ततोऽभि- वर्षन्ति च । ताभ्य एवेमे दर्भाद्यौषधिसमूहा जायन्ते । यौ वाय्खिन्द्रौ सूर्यपवनावन्तरिक्षस्थानौ सूर्यश्व द्युस्थाने, अर्थात् प्रकाशस्थ । एव सत्यशास्त्रेषु परमोत्तमायामलङ्कारयुक्ताया कथाया सत्या ब्रह्मवैवर्तादिनवीनग्रन्थेषु पुराणाभासेष्वेता अन्यथा कथा उक्तास्ताः शिष्ट. कदाचिन्नैवाङ्गीकर्तव्या ' (पृ० ३२६-३२७ ) इति, तदपि विशृङ्खलम्, तत्र हेत्वनुते । मन्त्राणा ब्राह्मणाना च तथोक्तार्थत्वेऽपि पुराणेतिहासोक्तकथाना देवराजेन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णने तात्पर्याङ्गीकारेऽपि बाधा- भावात् । मन्त्रैर्ब्राह्मणैश्च येऽर्था उच्यन्ते ते पुराणेतिहासोक्तानामर्थाना विरोधाभावात् । मेघो वृत्र सूर्य इन्द्र इत्युक्तावपि न वृत्रासुरो वृत्र, न देवराज इन्द्र इत्यनुते । अर्थद्वयोक्तौ वाक्यभेदप्रसङ्गात् । समुद्धृतशतपथवचनस्य तु पवित्राभ्या-., मुत्पुनातीत्युत्पवनशेषयो पवित्रयो स्तुतौ तात्पर्यम् न देवराजवृत्रासुरसत्त्वनिषेधे ॥ पवित्रे करोतीति दर्भद्वयेन पवित्रनिर्माण तस्य पवनरूपेणैकत्वम्, प्राणापानरूपेण द्वित्वम् । अपस्ताभ्यामुत्पुनाति, उत्पूताभिरद्भि प्रोक्षणविधानात् । तत्रोत्पवननिवर्त्याशुद्धिप्रदर्शनाय 'वृत्रो ह वा' इत्यादयोऽर्थवादा, 'विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीना स्यु ' इति न्यायात् । प्रथममन्त्रस्य त्वयमर्थं सायणसम्मत – वृत्रस्य शरीरमापो विचरन्ति, उपरि आक्रम्य प्रवहन्ति, वृत्रशरीर-माक्रम्य तदुपर्याप प्रवहन्तीत्यर्थं । कीदृश शरीरं निण्य निर्नामधेय 'निण्य निर्णाम विचरन्ति विजानन्ति' (नि० २।१६ ) इति निरुक्तवचनात् । तदेव स्पष्टीक्रियते —काष्ठानामपा मध्ये निहित नि. क्षिप्तम्, क्रान्त्वा स्थिता. काष्ठा आप ' पृषोदरादित्वात्, पडने लगता है । इसी प्रकार मेघ बार- बार बरसता रहता है । फिर सब स्थानो से जल उड उड कर आकाश मे चढता है । वहाँ इकठ्ठा होकर फिर फिर वर्षा किया करता है । उसी जल और पृथिवी के सयोग से ओषधि आदि अनेक पदार्थ उत्पन्न होते है । इसी मेघ को ' वृत्रासुर' के नाम से जानते है । वायु और सूर्य का नाम इन्द्र' है । वायु अन्तरिक्ष में और सूर्य प्रकाश स्थान में स्थित है । इन्ही वृत्रासुर और इन्द्र का आकाश मे युद्ध हुआ करता है, जिससे कि अन्त मे मेघ की पराजय और सूर्य की विजय निःसन्देह होती है । इस प्रकार की सत्य ग्रन्थो की अलंकार रूप कथा को छोड़कर छोकरो के समान अल्प बुद्धि वाले लोगो ने ब्रह्मवैवर्त और श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थो में मिथ्या कथाएँ लिख रखी है, उनको श्रेष्ठ पुरुष कभी न माने ' (पृ० ३२७-३२८), किन्तु यह सारा कथन भी वैमतलब का है, क्योंकि ऐसा मानने मे उन्होने कोई कारण नही बताया । फिर मन्त्रो और ब्राह्मणो में जिस तरह से ये कथाएँ आई है, उनको देखते हुए यह कही प्रतीत नही होता कि उनका पुराण -इतिहास ग्रन्थो में वर्णित कथाओ से कोई विरोध है, उनका तात्पर्य भी देवराज इन्द्र और वृत्रासुर के युद्ध के साथ भलो-भाँति लगाया जा सकता है । मन्त्र और ब्राह्मण भाग में इन कथाओ का जिस तरह से वर्णन किया गया है, उनका कही भी पुराण- इतिहास वर्णित कथाओ से किसी प्रकार का विरोध नही है । मन्त्र भाग मे वृत्र को मेघ, इन्द्र अथवा सूर्य का पर्यायवाची माना है, इसका अर्थ यह नही हुआ कि वृत्र वृत्रासुर नही है अथवा इन्द्र देवराज नही है, यदि आप उनका यही तात्पर्य निकालें तो यह संभव नहीं है, क्योकि एक वाक्य दो अर्थों का प्रतिपादक नही माना जाता । ऐसा मानने में वाक्यभेद दोष आ जाता है । आपने ऊपर जिस शतपथ ब्राह्मण के वचन को उद्धृत किया है, उसका विनियोग तो उत्पवन से बचे हुए पवित्रों की स्तुति में है । इससे देवराज इन्द्र अथवा वृत्रासुर की सत्ता का निषेध नही सिद्ध होता । दो दर्भों को मिला कर पवित्र बनाया जाता है । पवन के रूप में यह एक है और प्राण और अपान के रूप में दो । अत इन दो पवित्रो से वह जल को पवित्र करता है । इस पवित्र जल से ही सारी यज्ञ सामग्री को प्रोक्षित किया जाता है । इस प्रोक्षण से वे सब पदार्थ पवित्र हो जाते है । इस प्रोक्षण की प्ररोचना (स्तुति ) के लिये ही ' वृत्रो ह वा' इत्यादि ऊपर शतपथ श्रुति का वाक्य है । यह अर्थवाद वाक्य विधिवाक्य के साथ मिलकर ही उससे एकवाक्यता स्थापित करता है, अर्थात् विधि की स्तुति कर उसमें मनुष्य को प्रवृत्त कराता है । प्रथम मन्त्र का सायण द्वारा किया गया अर्थ इस प्रकार का है -वृत्र के शरीर पर आक्रमण करता हुआ जल बहता है । उसका शरीर कैसा है? दह बिना नाम का है । निरुक्त में यही अर्थ किया गया है । इसी बात को स्पष्ट दिया गया है कि यह दिशाओ के बीच में फैले हुए जल में फेंक दिया गया है । पृषोदरादि गण मे पाठ होने मे काष्टा शब्द जल का भी पर्यायवाची है । यह काष्ठा कैसी १ ९९
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दार्थपारिजात १८८६ आपोप काष्ठा उच्छन्ते । कीदृशाना काष्ठानाम्? अतिष्ठन्तीना स्थितिरहिताना प्रवणशीलत्वान्मनुष्यवन्नासा क्वचिदवस्थान सम्भवति । अत एवानिवेशनानाम् । एवमिन्द्रशत्रुर्वृत्रो जलमध्ये शरीरे क्षिप्ते सति दीर्घं तम दीर्घनिद्रात्मक मरण यथा स्यात्तथा अशयत् सर्वत पतितवान् । एवमय मन्त्रो वृत्रासुरपरत्वेनाञ्जस्येन सङ्गच्छते । अग्निष्टोमे निष्कैवल्य नाम शस्त्र तत्र निविद्धानीय यत्सूक्त तत्रैते द्वे अपि शस्येते (आव० श्री० सू० ५/१५ ) । वृत्रो द्यावापृथिव्योर्मध्ये यदासीत्तत्सर्वं वृत्त्वा शिश्य । स हत पूर्तिर्दुर्गन्ध सर्वत एवापोऽभिलक्ष्य प्रस्रुतोऽभूत् ॥ अत एव खल्वयमपि समुद्रः सर्वत. सर्वमावृत्य वर्तते । तस्माद् दुर्गन्धात् स्रुताद् वृत्रादिमा आपो बीभत्साञ्चक्रिरे जुगुप्सन्ते स्म । ता आपस्तत्सस्पर्शं परिहर्तुमुपर्युपरि वर्तमाना अतिपुप्लुविरे जलाशयमतिक्रम्य तीरदेश प्राप्ता. । प्लुताश्च ता आपो दर्भात्मना परिणता । 'इन्द्रो वृत्रमहन् सोऽपोभ्यम्रियत । तासा यन्मेध्य यज्ञिय स देवमासीत्तदपोदक्रामत । ते दर्भा अभवन्' (तै ० ब्रा० ३/२/५1१ ) | अनापुयिता दौर्गन्ध्यमप्राप्ता दर्भा जाता । ( पूयी विशरणे दुर्गन्ध च भ्वादि ) इतरासु दर्भात्मना परिणत- जलव्यतिरिक्तास्वमेध्यत्वापादक किञ्चित्ससृष्टमिव भवति । एवमनापूयिताब्बिकारदर्भमयाभ्या पवित्राभ्यामासामुत्पवन कुर्वन् पूयससर्गकृत तदमेध्यत्वमपहन्ति । ततश्च विधास्यमानः प्रोक्षणमपि मेघार्हाभि शुद्धाभिरद्भि कृत भविष्यति । तदेतत्सर्व- मज्ञात्वैव दयानन्देन यत्किञ्चित् प्रलपितम् । मेघपक्षे तु -अतिष्ठन्तीना मेघोदरान्तर्गताना स्थितिरहितानामनिवेशनाना यावज्जलाशय न प्राप्नुवन्ति, तावद- निविगमानाना काष्ठानामपा मध्ये बाह्यतो मेघाख्य निहितमवस्थापित धात्रा शरीरमावृत्यापस्तासामेव गुप्तये ता पुनस्तस्य मेघस्यवृत्रस्य निण्यं निर्णाम यत्रासौ नीचैर्न भाति त प्रदेश विजानन्तीव, यतस्तेन प्रदेशेन विचरन्ति प्रचरन्ति निम्नानु-सारिण्यो हि ताः । असावपि वृत्रस्तासु प्रक्षरन्तीषु तत्प्रक्षरणनिरोध चिकीर्षु स्वशरीरविवृद्धया दीर्घ तम सतत्त्व एव है? कही ठहरती नही । जल सदा बहता रहता है, अतः मनुष्य के समान वह कही एक जगह ठहर कर नही रहता, अत. इनका कोई घर नही हैं । इस तरह से इन्द्र का शत्रु वृत्र जब जल के बोच मे फेंक दिया जाता है, तो वह गाढ निद्रामय मृत्युशय्या पर गिर पडता है और फिर कही टिक नही पाता । इस अर्थ मे मन्त्र का विनियोग बडी सरलता से वृत्रासुर की कथा से जोडा जा सकता है । आश्वलायन श्रौतसूत्र के अनुसार इन दोनो मन्त्रो का विनियोग अग्निष्टोम यज्ञ में निष्केवल्य नामक शस्त्र में मिविद् के आधान के समय स्तुतिगान के रूप मे किया जाता है । इन्द्र ने जब वृत्रासुर को मार डाला तो वह आकाश और पृथिवी के बीच में जो कुछ था, उसको ढक कर गिर पडा । मारे जाने के साथ ही उनके शरीर की दुर्गन्धि जल के साथ ही बह कर फैत्रने लगी । उसी वृत्र के दृष्टान्त पर आज भी समुद्र सारी पृथ्वी को घेरे हुए है । वृत्र के शरीर से निकली दुर्गन्ध से भरा जल बहुत ही घिनौना हो गया । ऐसी स्थिति में उस वृत्र के शरीर को न छूते हुए जल ऊपर ऊपर बहने लगा । वह जलाशय को छोड कर किनारे से बहने लगा और बाद में वही जल दर्भ के रूप में परिणत हो गया । तैत्तिरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि जल से दुर्गन्ध के हट जाने पर वे दर्भ के रूप में परिणत हो गये । इस तरह से जो जल दर्भ के रूप में परिणत नही होता, उसमें वृत्रासुर संबन्धो यह अपवित्रता कुछ न कुछ अंश में बनी रहती है । इस प्रकार दुर्गन्ध रहित जल के परिणामभूत दर्भ से बने पवित्रो से यज्ञीय सामग्री पर जल का छिड़काव करने से वृत्रासुर की दुर्गन्ध के संपर्क के कारण आई अपवित्रता दूर हो जाती है । प्रत्येक यजीय कर्म में किया जाने वाला यह पवित्रों के द्वारा यज्ञीय सामग्रा का प्रोक्षण उतना ही पवित्र माना जाता है, जितना कि मेघ के शुद्ध जल से किया गया प्रोक्षण । इस पूरे यशीय रहस्य को जाने बिना ही दयानन्द ने मनमानी बकवास की है । मेघ के पक्ष मे इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार होगा - मेघ के उदर में रहते हुए भी जिनकी किसी एक जगह पर स्थिति नही है, अर्थात् मेघ का जल जब तक बरस कर किसी जलाशय में इकट्ठा नही होता, तब तक वह कही एक जगह टिक कर नही रह पाता । इस प्रकार के स्वभाव वाले इस जल का स्वरूप ऊपर में देखने में विधाता ने मेघ के रूप में बनाया है । मेघों के इस रूप को उन्ही की रक्षा के लिये ढक कर यह जल नीचे की ओर भी फैल जाता है, जहां कि वे मेघ नही पहुँच सकते । यह वृत्र भी जब जमीन पर जल बहने लगता है, तो उसको रोकने के लिये अपने शरीर को बढा कर भयानक अन्धकार के रूप में चारो तरफ फैल जाता है,
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दार्थपारिजातः १५८० धूमादिप्रभवत्वाद् आतत्य आशयत आशेते । तत्र को वृत्र इत्यात्रय - 'मेघ इति नैरुना, त्वाष्ट्रोऽसुर इत्यैतिहासिका (नि० २।१६) इति निरुक्तदृष्ट्या मेघस्यैव वृत्रत्तमैतिहासिकदृष्ट्या तु वृत्रासुर पुराणादिषु प्रसिद्ध एव ग्राह्य । नास्मै इति । इन्द्र निषेद्धु यान् विद्युदादीन् मायया निर्मितवान् ते सर्वेऽप्येन निषेद्धुमगता इत्यनेनोच्यते । अस्मै इन्द्राय निर्मिता विद्युद् न सिषेध इन्द्र प्राप्नोत् तथा तन्यतु गर्जन या मिह सेचन या वृष्टिमकिरद् वृत्रो विक्षिप्तवान् सापि न सिषेध | ह्रादुन च अशनिमपि या वृत्र प्रयुक्तवान् सापि न सिषेध । इन्द्रश्वाहिश्व इन्द्रवृत्रावुभावपि यद् यदा युयुधाते युद्ध कृतवन्तौ तदानी विद्युदादयो न प्राप्ता इति पूर्वेणान्वय । उत अपि मघवा धनवानिन्द्र, अपरीभ्य अपराभ्यः, अन्यासा- मपि वृत्रनिर्मिताना मायाना सकाशाद् विजिग्ये विशेषेण जितवान् । ' अयोद्धेव दुर्मद आहि जुह्वे महावीर तुविबाधमृजीषम् । नातारीदस्य समृति वधाना सं रुजाना पिपिष इन्द्रशत्रु ॥ ' ( ऋ ० स० १ ३ २ ६) । दुर्मदो दुष्टमदोपेतो दर्पयुक्त वृत्र, अयोद्धेव योद्धृरहित इव, इन्द्र हि आजुह्वं आहूतवान् । कीदृशमिन्द्र महावीर गुणैर्महान् भूत्वा शौर्योपेत तुविबाध बहूना बाधक तुवीन् प्रभूतान् बाधत इति तुविबाधस्तम्, ऋजीष शत्रूणामपमार्जकम् । अस्येदृशस्येन्द्रस्य सम्बन्धिनो ये शत्रुवधा सन्ति तेषा समृति सगम नातारीत् पूर्वोक्तो दुर्मदो वृत्रस्तरीतुं नाशक्नोत् । इन्द्रशत्रु इन्द्र शत्रुर्बाधको यस्य स तादृशो वृत्र इन्द्रेण हतो नदीषु पतितो रुजाना नदी. सम्पिपेष पिष्टवान् । सर्वाल्लोकानावृण्वतो वृत्रदेहस्य पातेन नदीना कूलानि तत्रत्यपाषाणादिक च चूर्णीभूतमित्यर्थः । मेघे गौण्या वृत्त्या (भक्तया ) एवास्य मन्त्रस्य प्रवृत्तिस्त्वाष्ट्रे तु शक्त्येति स्पष्टमेव । 'नीचावया अभवद् वृत्रपुत्रेन्द्रो अस्या अववधर्जभार । उत्तरासूरधर. पुत्र आसीद्दानु. शये सह वत्सा न धेनुः ॥ ' (ऋ० स० १।३२।९) । वृत्र पुत्रो यस्याः सा सेयं तन्माता वृत्रपुत्रा नीचावया न्यग्भाव प्राप्ता हता अभवत् पुत्र प्रहाराद्रक्षितुं क्योकि मेघ अन्धकार सदृश घूम आदि से मिलकर ही बनता है । यह वृत्र कौन है? इस प्रश्न के उत्तर मे निरुक्तकार ने बताया है कि निरुक्तकारो के अनुसार मेघ हो वृत्र है और ऐतिहासिको की दृष्टि में वृत्रासुर हो वृत्र माना गया है, जैसा कि उसका स्वरूप पुराण-इतिहास ग्रन्थो में वर्णित है । ' नाम्मै० ' इत्यादि द्वितीय मन्त्र में बताया गया है कि इन्द्र को अपने ऊपर आक्रमण करने से रोकने के लिये विद्युत् आदि के रूप मे जो तरह तरह की माया फैलाई, वे भी इन्द्र को रोकने में समर्थ न हो सकी । वृत्र के द्वारा निर्मित विद्युत् (बिजनी ) इन्द्र को न रोक सकी । इसी तरह से वृत्र ने गड़गड़ाहट के साथ जब जोरो का पानी बरसाया, तो वह भी इन्द्र को उस पर आक्रमण करने से रोक न सका । जब वृत्र ने अशनि का प्रयोग किया तो वह भी इन्द्र की गति को रोक न सकी । इसका अभिप्राय यह है कि इन्द्र और वृत्र का जब परस्पर युद्ध होने लगा, उस समय इनके बीच में विद्युत् प्रभृति कोई भी इनके अवरोधक न हो सके । इतना नही, वृत्र ने इसके सिवाय जितनी भी भांति भांति की मायाओ का निर्माण किया, इन्द्र ने उन सबको जीत लिया, नष्ट कर दिया । इन्द्र और वृत्रासुर के युद्ध की चर्चा ऋग्वेद के इसी सूक्त के अन्य मन्त्रो में भी है । जैसे कि ' अयोद्धव ० ' प्रभृति मन्त्रों को देखा जाय । इनमें से पहले मन्त्र का अर्थ यह है -बुरी तरह से भयकर अहकार से भरा हुआ यह वृत्र कनाड़ो की तरह इन्द्र को युद्ध के लिये ललकारने लगा, उस इन्द्र को जो कि महान् पराक्रमशाली है और जो अकेला ही अनेक योद्धाओं को परास्त कर सकता है तथा जो शत्रुओ को चुन चुन कर मार डालने वाला है । इस तरह से अपने शत्रुओं का विनाश कर देने वाले इस इन्द्र के हाथ में पड़कर वह दुर्मंद वृत्र भी अपनी मृत्यु से बच नही सकता था । अन्ततः इन्द्र का शत्रु वह वृन इन्द्र के द्वारा मारा गया । मर कर गिरते हुए उसने नदियो के जल में उथल-पुथल मचा दी । गिरते हुए वृत्र ने जब अपने शरीर से सारे लोको को ढक दिया, तब नदियो के किनारे और पहाड़ों के पत्थर सब चूर्णं चूर्ण हो गये । इस अर्थ को देखने से स्पष्ट है कि स्पष्टत इस मन्त्र मे वृत्रासुर के वध की बात कही गई है । मेघ संबन्धी अर्थ तो गौणा वृत्ति का सहारा लेकर ही किया जा सकता है । इसी तरह से ' नीचात्रया' इस मन्त्र की भी परीक्षा को जाय । इसका सायण समत अर्थ यह है-- इन्द्र और वृत्रासुर का युद्ध जब अन्तिम क्षण मे पहुँचा और इन्द्र वृत्र को मारने को उद्यत हुआ, उस समय वृत्र को माता उसके शरीर पर तिरछी लेट
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११८८ देवार्थपारिजातः पुत्रदेहस्योपरि तिरश्चीना पतितवती । तदानीमयमिन्द्रोऽस्या मातुरधोभागे वृत्रस्योपरि वधो हननसाधनमायुध जभार प्रहृतवान् । हन्यतेऽनेनेति वध:, आसुनि हन्तेर्वधादेश । तदानी सू माता उत्तरा उपरिस्थिता आसीत् । सा च दानु दानवी वृत्रमाता शये मृता शयन कृतवती । तत्र दृष्टान्त -लोकप्रसिद्धा सह वत्सा धेनु, न इव, यथा सवत्सा धेनु शयन करोति तद्वत् । अयमपि मन्त्रो मेघे भक्तयैव प्रवर्तते, शक्तया तु त्वाष्ट्र एव । 'अहेर्यातार कमपश्य इन्द्र यत्ते जघ्नुषो भीरगच्छत्। नव च नवति च स्रवन्ती श्येनो न भीतो अतरो रजासि' | (ऋ० स० १०।३२।१४ ) । हे इन्द्र, जघ्नुषो वृत्र हतवतस्तव चित्ते यद् यदि भीर्भयमगच्छत् न हतवानस्मीति बुद्धया भय प्राप्नुयात् तर्हि अहे वृत्रस्य यातार हन्तार कमपश्य? त्वत्तोऽन्य क पुरुष दृष्टवानसि? तादृशस्य पुरुषान्तरस्याभावान्मा भूत्तव भयमित्यर्थ । यद् यस्मात् कारणात् त्व नव च नवतिं च स्रवन्तीम् एकोनशतसंख्याका वृहन्ती नदी प्राप्य रजासि तत्रत्यान्युदकानि, अतर तीर्णवानसि । तत्र दृष्टान्त – श्येनो न यथा श्येनो बलवान् पक्षी दूरगमनाद्बिभेति, तथा तव भयमासीत्, तद्भय मा भूदित्यभिप्राय । 'इन्द्रो वै वृत्र हत्वा नास्तृषीति मन्यमान परा परावतोऽगच्छत' (ऐ ० ब्रा० ३।१५) । अयमपि मन्त्र शक्त्या त्वाष्ट्रेऽसुरहन्तरि देवराज एव सङ्गच्छते, अन्येषा जडाना भयासम्भवात्, सम्बोध्यत्वासम्भवाच्च । यदुक्तम्-' एवमेव नवीनेषु ग्रन्थेषूक्ता अनेकविधा देवासुरसग्रामकथा अन्यथैव सन्ति । ता अपि बुद्धिमद्भि- मनुष्यैरितरैश्च नैव मन्तव्या । तासामप्यलङ्कारयोगात्' ( पृ ० ३२८) इति तत्रापि विपरीतमेव मन्तव्यम् | बुद्धिमन्तस्त्ववश्य तत् स्वीकरिष्यन्ति, मूर्खा एव न स्वीकरिष्यन्ति, 'तासामप्यलङ्कारयोगात्' इति हेत्वाभासस्य तदसाधकत्वात् । अलङ्कार योगत्वेन तासा सत्यकथात्वहान्ययोगात्, तादृशव्याप्यव्यापकभावादर्शनात् । नापि कश्वनालङ्कारः प्रदर्शित, केवलमलङ्कार-पदप्रयोगस्य सत्यकथात्वहानावतन्त्रत्वात्, अर्थाद् अलङ्कारयोगस्य देवासुरकथामिथ्यात्वासाधकत्वात् । गई, जिससे कि उसका पुत्र इन्द्र के प्रहार से बच जाय, किन्तु उस समय इन्द्र ने चतुराई से इसकी माता को बचा कर उसके नीचे छिपे हुए वृत्र के शरीर पर अपने आयुध वज्र से प्रहार किया । जब वृत्र भर रहा था उस समय उसकी दानवी माता उसके ऊपर ऐसी लेटी हुई थी, मानो गाय अपने बछड़े के साथ लेटी हुई हो । इस तरह से इस मन्त्र मे भी स्पष्टतः वृत्रासुर के वध का ही वर्णन है, मेघ सबन्धी अर्थ तो लक्षणा वृत्ति का सहारा लेकर ही किया जा सकता है । इसी प्रसंग में 'अहेर्यातार ०' प्रभृति एक और मन्त्र है, जिसमे कि इसी युद्ध का वर्णन है । इसका अर्थ यह है---हे इन्द्र, वृत्र को मारते समय तुम्हारे मन में यदि यह भय उत्पन्न हो जाय कि मै इसको नही मार सकता, तो फिर तुम्हारे सिवाय इसको मारने वाले तुम्हे कौन दिखाई पड़ता है? तुम्हारे सिवाय इसको मारने वाला दूसरा कोई नही है, अत: तुम्हे इसको मारते समय भयभीत नही होना चाहिये । तुम अपने को उससे कमजोर मत समझो । तुम ९९ बडी-बडी नदियो को अपने पराक्रम से पार कर चुके हो, जिनमें कि भयकर बाढ आई हुई थी । जैसे बलशाली बाज पक्षी दूर उड कर जाने से डरता रहता है, उसी तरह से तुम्हे भी उस वृत्र के साथ युद्ध करने से डर लगता है । किन्तु तुम्हे इससे डरना नही चाहिये और उस वृत्र पर विजय प्राप्त करनी चाहिये । ऐतरेय ब्राह्मण में वर्णित है कि इन्द्र वृत्र को मार चुका था । जब वह लौट रहा था, उस समय उसको विश्वास नही हो रहा था कि मैने वृत्र को मार डाला है । इन सब प्रसंगो पर विचार करने से यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि इन सब मन्त्रों में इन्द्र द्वारा वृत्र पर प्राप्त की गई विजय का ही मुख्यतया वर्णन है, क्योंकि सूर्य, मेघ प्रभृति अन्य जड पदार्थो को न तो भय ही हो सकता है और न उनको संबोधित करके ही कुछ कहा जा सकता है । इसके आगे स्वामी दयानन्द ने देवासुरसंग्राम की कथा को लेकर कहा है-'इसी तरह से नवीन पुराण- इतिहास ग्रन्थो में देवासुर संग्राम की कथा को बिगाड कर लिखा है । इन सब पर भी बुद्धिमान् अथवा साधारण मनुष्यो को विश्वास नही करना चाहिये, क्योंकि यह सब आलंकारिक वर्णन है, वास्तविक नही' ( पृ० ३२८ ), किन्तु यहाँ पर भी ठीक इसके विपरीत परिस्थिति है, क्योकि स्वामी दयानन्द के इस बहकावे में सामान्य जन ही आ सकते है, बुद्धिमान् व्यक्ति को तो उनकी बात कभी पसन्द नहीं आ सकती । उन्होंने अपनी बात को सिद्ध करने के लिये 'अलङ्कारयोगात्' यह हेतु दिया है, जो कि हेतु न होकर हेत्वाभासमात्र है । क्योकि कोई कथा यदि आलंकारिक भाषा मे लिखो गई है, तो इससे वह मिथ्या कैसे सिद्ध हो जायगी? इस तरह की व्याप्ति तो