वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 691–700

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 691–700

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वेदार्थपारिजात. १५८६ -- यत्तु — 'देवा अनुराश्च मयत्ता सज्जा युद्ध कर्तुं तत्परा आमन, भवन्तीति शेप । के ते देवानुरा इन्यत्रोच्यते- 'विद्वासो हि देवा ' ( श० ३।७।३| १० ) । हीति निश्चयेन, विद्वासो देवास्तद्विपरीता अविद्रामोऽमुरा । ये देवास्ते विद्यावत्त्वात् प्रकाशवन्तो भवन्ति । ये ह्यविद्वामस्ते खल्वविद्यावत्त्वाद् ज्ञानरहितान्धकारिणो भवन्ति । एपामुभयेषा परस्पर युद्धमिव वर्ततेऽयमेव दैवासुरसग्राम ' ( पृ० ३२९) इति, तदिर्तिनि सारम् पूर्वोक्तद्राह्मणवचनानरास्वारस्यात्, होति निश्चयेन देवा विद्वासो भवन्तीत्यस्यैव तदर्थत्वात् । 'छिद्र हि मृगयन्त्येते विद्वासो ब्रह्मराक्षमा 4 वृति वाल्मीकवचनवत् । नह्यत्र ,, विद्वासो ब्रह्मराक्षसा भवन्तीत्यर्थो भवति किन्तु ब्रह्मराक्षमा विद्वासो भवन्ति अनन्त यज्ञवेदितार मन्तो यज्ञेपु छिद्रं मृगयन्ति । देवतानिरूपणप्रसङ्गे विस्तरेण कृतव्याख्यानमेतद् वाक्यम् 1। 'अविद्वासोऽयुग इत्यपि न वक्तु शक्यते, तत्र प्रमाणा- भावात् । 'विद्वासो हि देवा ' ( श० ३| ७| ३ | १० ) इत्यनेन कथञ्चिद् विदुषा देवत्व वक्तु शक्त, न तु तेनैवाविदुपामसुरत्वमिति । किञ्च, कियत्या विद्यया मनुष्याणा देवत्व भवतीत्यपि वक्तव्यम्, केनचिदशेन सर्वपामे विद्वत्त्वात् कात्र्त्स्न्येन सर्वेषामेवा- विद्वत्त्वात् । तथात्वे समेषा देवत्वम शेनाशान्तरेण चासुरत्वम् । कुतो व्यवस्था स्यात् । लोक नु केचन साधनमम्बन्धिसाधारण- ज्ञानवन्तोऽपि शान्ता गदाचारिण सात्त्विकविचारवन्तो भवन्ति, अन्ये बहुग्रन्थवेपि बहिर्मुखा दुराचाराश्च दृश्यन्ते । तदेतन्महदसमञ्जसम् । यदप्युक्तम् — 'ये सत्यवादिन सत्यमानिन सत्यकारिणश्च ते देवा । ये चानृतवादिनोऽनृतकारिणोऽनृतमानिनश्च ते मनुष्या असुरा एव । तयोरपि परस्पर विरोधो युद्धमिव भवत्येव । मनुष्यस्य पत्मनस्तद् देवा, प्राणा असुरा ॥ कही बनती नही । स्वामीजी ने कोई अलंकार यहाँ बताया भी नहीं । केवल अलकार पद का प्रयोग कर देने से सत्य कथा की काई हानि नही होती, अर्थात् आलकारिक भाषा मे वर्णन करने से देवासुर युद्ध की कथा मिथ्या नही मान ली जायगी । देवासुर युद्ध की व्याख्या स्वामी दयानन्द ने इस प्रकार की है - 'देव और असुर अपने अपने बाने में सज कर सब दिन युद्ध किया करते है । ये देव और असुर कौन है? इसके उत्तर में शतपथ ब्राह्मण में बताया गया कि विद्वान् मनुष्य ही देवता है । इस बात में किसी को भी किसी प्रकार का सन्देह नही रहना चाहिये । जब विद्वान् मनुष्य देवता है, ता मूर्ख मनुष्य असुर कहे जायगे । देवता ( विद्वान्) विद्या के प्रकाश से प्रकाशित रहते है और जो मूर्ख है, वे अपने अज्ञान के कारण अन्धकार में पड़े रहते हैं । इन दोनो का संघर्ष निरन्तर चलता रहता है । सही माने मे यही देवासुरसंग्राम है' ( पृ० ३३१ ), उनका यह कथन भी अत्यन्त निसार है क्योकि वे शतपथ ब्राह्मण के उक्त वचन का सही अभिप्राय नही समझ पाये है । वास्तव में उसका अर्थ यह है कि निश्चय हो देवता विद्वान् होते है । वाल्मीकि रामायण के 'छिद्र हि' इत्यादि वाक्य का अर्थ यह होता है कि ये विद्वान् ब्रह्मराक्षन निश्चय ही मनुष्य की किसी त्रुटि को खोजते रहते हैं । जैसे इस वाक्य का यह अर्थ नही किया जा सकता कि विद्वान् मनुष्य ब्रह्मराक्षस होते हैं, किन्तु यही अर्थ किया जायगा कि ब्रह्मराक्षस भी विद्वान् होते हैं, इसीलिये वे यज्ञ की सारी प्रक्रिया के जानकार होते हे और उनमें विघ्न डालने के लिये छिद्रान्वेषण करते रहते हैं । इस वाक्य की हमने देवता स्वरूप का निरूपण करने में प्रसंग में विस्तार से व्याख्या की है । अविद्वान् व्यक्ति असुर होते है, ऐसा भी नही कहा जा सकता, क्योकि इसमें कोई प्रमाण नही है । उक्त शतपथ वाक्य से किसी तरह से विद्वानो को देवता कहा जा सकता है, किन्तु इसका यह अभिप्राय किसी प्रकार नही निकल सकता कि अविद्वान् मनुष्य असुर होता है । विद्वान् को देवता बताते समय आपको यह भी बताना पडेगा कि मनुष्य कितनी विद्या पढकर देवता बन जाता है । कुछ अश में तो सभी विद्वान् होते हैं और समग्र रूप से कोई भी सर्वज्ञ विद्वान् नहीं मिलेगा । इस तरह से तो सभी कुछ अग मे देवता और कुछ अंश में असुर माने जायगे, तब इन शब्दो की व्यवस्था कैसे हो पावेगी? लोक में तो आपके मत के विपरीत यह स्पष्ट देखा जाता है कि साधारण ज्ञान वाले पुरुष भी बहुत ही शान्त, सदाचारी और सात्विक विचार वाले होते है और अनेक ग्रन्थो के परिष्कृत विद्वान् भी बहिर्मुख और दुराचारी देखे जाते है | आपको व्याख्या की यह बड़ी भारी असंगति है, जिसका कि परिहार नहीं हो सकता । आगे स्वामी दयानन्द ने लिखा है- 'जो लोग विद्वान्, सत्यवादी, सत्यमानो और सत्य कर्म करने वाले हैं, वे तो देव और जो अविद्वान्, झूठ बोलने वाले, झूठ मानने और मिथ्याचार करने वाले हैं, वे असुर कहलाते है । उनका परस्पर नित्य विरोध

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वार्थपारिजातः १५६० एनपोरपि विरोधो भवति । मनसा विज्ञानबलेन प्राणाना निग्रहो भवति । प्राणवलेन मनसश्चेति युद्धमिव प्रवर्तते' (पृ० ३३० ) इति, तदपि नि सारम् यतो हि मत्यानृतमये मनुष्यलोके सत्यावृतसाङ्कर्येण देवत्वासुरत्वनिर्णयासम्भवात् । अनृतबाहुल्येनामुरत्वम्, सत्यबाहुल्येन देवत्वमित्यपि न सम्भवति तथात्वे देवत्वासुरत्वयोर्विरोधासभवादेवासुरसग्रामा- सम्भवात् । किञ्च, मनसो देवत्वेन प्राणन्य चासुरत्वेनोभयो सर्वत्र सत्त्वेनापि देवत्वासुरत्वव्यवस्था सर्वथा दुर्भणा स्यात् । ,विज्ञानबलेन प्राणाना निग्रह प्राणबलेन मनमो निग्रह इत्यप्यसङ्गतम् प्राणनिरोधेन मनोनिग्रहसम्भवेऽपि प्राणबलेन मनोनिरोधासम्भवात् । निर्मूल चैतन्मनसो देवत्वादिकम् उक्तवचनस्य तदननुरोधित्वात् । यञ्च्च - 'प्रकाशाख्यात् सोर्देवान् मन पठानीन्द्रियाणि ईश्वरोऽसृजत । अतस्ते प्रकाशकारका । असोरन्धकाराख्यात् पृथिव्यादेरसुरान् पञ्चकर्मेन्द्रियाणि प्राणाश्चामृजत । एतयोरपि प्रकाशाप्रकाशसाधकतमत्वानुरोधेन सग्रामवत्' (पृ० ३३० ) ---- इत्यादि, तदपि तुच्छम्, निर्मूलत्वात्, निरुक्तवचनाननुमारित्वाच्च । तदर्थस्त्वेवम् — असुरा असुरता स्थानेषु, स्थानेषु ये सुष्ठु नरतास्तेअसुरा., चपला इत्यर्थं । अथवा अस्ता प्रच्याविता स्थानेभ्यो देवैरित्यसुरा । अपि वा असुरिति प्राणनाम । स हि अस्त क्षिप्त इव शरीरे भवति, तस्य तत्र नित्यावस्थानात् । तस्मान्मत्वर्थीयरप्रत्ययाद् असुरा प्राणवन्त इत्यर्थं । अथवा ब्राह्मणोक्तमन्यन्निर्वचनम्—'सोर्देवानसृजत । सुरिनि प्रशस्तनाम । प्रशस्तादात्मन प्रदेशादास्यात् प्रजापति सुरानसृजत । ऊर्ध्वेभ्य. प्राणेभ्यो वा ऊर्ध्वमुदतृणत् पूर्वपक्ष पञ्चदशस्तेन देवान् असृजत्' ( मै० स० ११ ९/ ३ ) । असुरिति प्रशस्तनिषेधः, अप्रशस्तात् पायुप्रदेशात् प्रजापतिरमुरानसृजन 'अवाड् वातिरदपरपक्षस्तेनासुरानसृजत्' (मै ० स० ११ ९/ ३) इति । होना ही युद्ध के समान है । इसी प्रकार मनुष्य का मन और ज्ञानेन्द्रिया भी देव कहलाते हैं, उनमें राजा मन और सेना इन्द्रिय है, तथा सब प्राणो का नाम असुर है, उनमे राजा प्राण और अपान आदि सेना है । इनका भी परस्पर विरोधरूप युद्ध हुआ करता है । मन के विज्ञान को बढाने से प्राणो की जय और प्राणो के बढने से मन की विजय हो जाती है ' ( पृ ० ३३१ ), किन्तु यह कथन भी अत्यन्त निसार है, क्योकि मनुष्य लोक मे सचाई और झुठाई का एक अजब मेल है, इसमें कौन देव है और कौन असुर? इसका निर्णय कर पाना कठिन है । असत्य का आधिक्य रहने पर असुरभाव और सत्य का बाहुल्य रहने पर देवभाव हो, ऐसा भी नही हो सकता, क्योकि ऐसा होने पर देवत्व और असुरत्व में कोई विरोध न होने से देवासुर युद्ध की कोई स्थिति नही बनेगी । आपके मत के अनुसार मन को देवता और प्राण को असुर मानने से इन दोनो की भी सर्वत्र समान स्थिति है और इस तरह से देवासुरसग्राम की बात कहना बडा कठिन हो जायगा । विज्ञान के बल से प्राणो का और प्राण के बल से मन का निग्रह होगा, यह कथन भी असंगत है, क्योकि प्राण के निरोध का अभ्यास करने से यद्यपि मन का निग्रह हो सकता है, किन्तु प्राण के बल से मन का निरोध कभी नही हो सकता । फिर मन को देवता और प्राण को असुर मानने मे कोई श्रुतिवचन प्रमाण रूप में उद्धृत नही किया गया है । जो वचन उद्धृत किया गया है, उसका भी तात्पर्य नही है । 'सु अर्थात् प्रकाश के परमाणुओं से मन और पाच ज्ञानेन्द्रिय, उनके परस्पर संयोग तथा सूर्य आदि को ईश्वर रचता है और अन्धकार रूप परमाणुओ से पाँच कर्मेन्द्रिया, दस प्राण और पृथिवी आदि को रचता है, जो कि प्रकाश रहित होने से असुर कहलाते है । प्रकाश और अप्रकाश के विरुद्ध गुण होने से इनकी भी संग्राम संज्ञा मानी जाती हैं ' ( पृ० ३३२ ) यह व्याख्या भी निःसार है, क्योकि न तो इसमे कोई प्रमाण दिया गया है और निरुक्त के वचन से भी इसका कोई सीधा संबन्ध नहीं है । निरुक्त वाक्य का वास्तविक अर्थ यह है - किसी भी स्थान पर जो ठीक से टिककर नही रहते, अर्थात् जो स्वभाव से ही चंचल है, वे असुर कहलाते है । अथवा असुर वे लोग कहलाते हैं, जिनको देवताओ ने उनके स्थान से च्युत कर दिया है, हटा दिया है । अथवा असु प्राण का नाम हैं, क्योंकि उनको शरीर में फेंक सा दिया जाता है, जहा कि वे जीवन पर्यन्त सदा बने रहते हैं । असु शब्द से मत्वर्थीय र प्रत्यय लगाने पर असुर पद बनेगा, जिसका कि अर्थ हुआ प्राणवान् । अथवा ब्राह्मण ग्रन्थ में बताये निर्वचन के अनुसार भी असुर शब्द की निष्पत्ति हो सकती है कि सु यह प्रशस्त अर्थ का वाचक है । प्रशस्त स्थान मुख से प्रजापति ने सुर ( देवता ) की सृष्टि की है । वह प्रजापति प्राणो से ऊपर उठ गया है और शुक्ल पक्ष मे उसने देवताओ की रचना की । 'असु ' इस शब्द से प्राशस्त्य का निषेध किया गया है । अप्रशस्त (अपवित्र) स्थान पायु प्रदेश से प्रजापति ने असुरो की सृष्टि की । कृष्ण पक्ष में सृष्टि होने से यह सृष्टि असुर नाम से प्रसिद्ध हुई ।

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वेदार्थपारिजात ' * e * -' ' ( ): यत्तु देवासुरा संयत्ता आसन् श० १३/३/४/१ सुरानसिसर्व देवा । अनुरा अनु रता स्थानेष्वस्ता तेन नन्न मोवानसृजत तत्सुराणा मुरत्वममोरमुरानसृजत स्थानेभ्य इति वा । अपि वासुरिति' (प्राणनामास्त), 'गरीरे भवति, तदसुराणामसुरत्वमिति विज्ञायते नि० ३८ देवानामनुरत्वमेन्ट प्रज्ञा वाजवत्व वापि वासुरिति प्रजानामाम्यत्य- नर्थानस्ताश्चास्यामर्था असुरत्वमादिलुप्तम्' (नि० १० १३४ ) ( पृ० ३३८) इत्यादि निरुक्तोद्धरणम् तदपि प्रमादग्रस्तम्, कृतेऽप्युद्ध- रणेऽस्य वचनस्य व्याख्यानाभावात् । 'देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूप. पुपोप प्रजा पुरुधा जजान । इमा च विश्वा भुवनान्यस्य महद् देवानामसुरत्वमेकम् || ' (ऋ० स० २५५ | १९) इतीम मन्त्र व्याचक्षाणेन निरुक्तकारेणोक्तम् - देवानामसुरत्वमित्यादि । मन्त्रार्थस्त्वेवम्— त्वष्टा देवो मध्यम सविता सर्वस्य भूतग्रामस्य प्रसवितोदकमम्प्रदानद्वारेण न केवलमुत्पादयितैव, किन्तु पुपोष प्रजा पुष्णाति रसानुत्पाद्य पुरुधा जजान बहुधा चैता जनयति वर्धयति । केन पुष्णाति जनयति च? इमा च विश्वा भुवनान्यस्य इमानि विश्वानि भुवनानि उदकानि अस्य यन स्वसत्ताया वतन्ते नम्माज्जनयति वर्धयनि च । अतश्च सर्वमिदं शक्त कर्तु यतो महद्देवानामसुरत्वम्, असुरिति प्रज्ञानाम, तया तद्वत्त्वम् । तया महत्या प्रज्ञया उदकेन साधनेन सर्वमिद , जनयति पुष्णाति वर्धयति च । अप्रज्ञ साधनसम्पत्तावपि न किञ्चित् कतु स्यति । अथवा अनवत्त्वममुरत्वम् असुः प्राण- स्नद्वत्त्वम् । प्राणेनैव शक्यत एतत्सर्वं कर्तुम्, अप्राणस्नाकिञ्चित्करत्वात् । अत्रवत्वमित्यपि केचित् । तेषामन्नहेतुकेनोदकेना- सुरत्वम् । असुरिति कस्मात् प्रज्ञानाम, अस्थति अनर्थान् प्रज्ञयैव प्रज्ञावतार्थनाशदर्शनात् । अस्ता न्यस्ताश्चास्यामर्था इत्यतोऽप्यसुरिति प्रज्ञानाम | अथवा यदेतदसुरत्वम्, वसुमतो भावो वनरत्वम्, रो मत्वर्थे, वकारलोपश्च । वसुनोदकेन तद्वानसौ त्वष्टा । तदेतत्सर्वं दुर्गाचार्यादिप्रोक्तमर्थमविज्ञायैव यत्किञ्चिदुक्त दयानन्देन । 'सोऽञ्छ्राम्यंश्चचार प्रजाकामः । स आत्मन्येव प्रजातिमधत्त । म आस्येनैव देवानसृजत । ते देवा दिवमभि- पद्यासृज्यन्त, तद्देवाना देवत्व यद्दिवमभिपद्यासृज्यन्त । तस्मै ससृजानाय दिवेवास, तदेव देवाना देवत्व यदस्यै ससृजानाय इस प्रसग में स्वामी दयानन्द ने शतपथ ब्राह्मण और निरुक्त के वचनो को उद्धृत किया है ( पृ० ३२८ ), किन्तु ऐसा करते समय भी प्रमाद ने उनका पिण्ड नही छोडा है । वचनो को उद्धृत करने के बाद भी उन्होने इनकी व्याख्या नही की है । वास्तव में ' देवस्त्वष्टा ० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए निरुक्तकार ने ' देवानाममुरस्य०' इत्यादि वाक्य लिखा है । इस मन्त्र का अर्थ यह है - मध्यम स्थानीय सविता त्वष्टा देवता सभी प्राणियो को वृष्टि द्वारा जल प्रदान करके न केवल उत्पन्न ही करता है, किन्तु उनको पुष्ट भी करता है । वह वर्षा करके रसो को उत्पन्न करता है और उसी को सहायता में भांति-भाँति की प्रजा को उत्पन्न कर उनका पोषण करता रहता है, उनको बढाता है । ससार का सारा जल इसी पूषा देवता के अधीन है, अतः इसी की सहायता से वह सारे जगत् को उत्पन्न करता है और बढाता है । वह सब कुछ करने में समर्थ है क्योकि देवनाओ की सामर्थ्य बडी अद्भुत है । असु यह प्रज्ञा ( बुद्धि) का नाम है । इस अद्भुत प्रतिभा और जल रूपी साधन की सहायता से यह सविता देवता सारे जगत् को उत्पन्न करता है मोर पुष्ट करता है । सारी साधन सामग्री के उपस्थित रहने पर भी मन्द बुद्धि व्यक्ति उसका कुछ उपयोग नही कर सकता । अथवा असु का अर्थ प्राण होगा, जिसकी सहायता से कि सदा प्राणन क्रिया चलती रहती हैं । प्राणवान् व्यक्तिही यह सब कुछ कर सकता है, प्राणहीन व्यक्ति कुछ भी करने में असमर्थ है । कुछ लोग असुर पढ का अर्थ अन्नवान् करते हैं । अन्न की उपज के प्रमुख कारण जल के कारण वह असुर कहलाता है ॥ निरुक मे प्रज्ञा के अर्थ में भी असु शब्द का निर्वाचन किया गया है, क्योकि बुद्धिमान् व्यक्ति अपनी प्रज्ञा के कारण ही अपने ऊपर आने वाले अनर्थ (आपत्ति ) का निवारण करता है । अमु को प्रज्ञा इसलिये भी कहा जाता है कि इसमें सभी प्रयोजनो की उपलब्धि का उपन्यास ( समाधान) विद्यमान रहता है । वसुर शब्द से भी असुर शब्द की निष्पत्ति होती है । वसुमान् का भाव वसुरत्व कहलाता है । र प्रत्यय यहाँ मतुप् प्रत्यय के अर्थ मे होता है साथ ही बकार का भी लोप हो जाता है और इस तरह से असुर शब्द बनता है । इसका अर्थ हुआ वसु अर्थात् उदक से संपन्न त्वष्टा । निरुक्त का यह विस्तृत अर्थविवेचन दुर्गाचार्य प्रभृति व्याख्या-कारो के ग्रन्थो में मिलता है । इसको बिना समझे बूझे स्वामी दयानन्द मनमाना अर्थ करते है, जो कि उचित नही है । इसके आगे शतपथ ब्राह्मण के लंबे चोडे ' सोऽचंत्' इत्यादि वाक्य को उद्धत कर स्वामी दयानन्द कहते हैं - 'सृष्टि करने की इच्छा से परमेश्वर ने अपने मुँह के प्रकाश के परमाणुओं से सूर्य प्रभृति प्रकाशमय लोको की और उनमें रहने वाले उत्तम गुण

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वेदार्थपारिजातः १५३२ दिवेवास । अथ योऽयमवाप्राणम्ननामुरानसृजत । त इमामेव पृथिवीमभिसम्पद्यासृज्यन्त । तस्मै ससृजानाय तम इवास || सोऽवेत् । पाप्मान वा असृक्षि | यस्यै मे ससृजानाय तम इवाभूदिति । तास्तत एव पाप्मनाविध्यत्, ते तत एव पराभव- स्तस्मादाहुनैतदस्ति यद्देवामुरम् । यदिदमन्वाख्याने त्वदुद्यत इतिहासे त्वत्, ततो ह्येव तान् प्रजापति पाप्मनाविध्यत्, -ते तत एव पराभवन्निति । तदेतदर्पिणाभ्यनूक्तम्—'न त्व युयुत्से कतमच्चनाहर्न तेऽमित्रो मघवन् कश्चनास्ति । मायेत्सा ते 'यानि युद्धान्याहुन शत्रु न पुरा युयुत्स । इति । स यदस्मै देवान् ससृजानाय दिवेवास तदहरकुरुताथ यदस्मा असुरान् ससृजनाय तम इवास ता रात्रिमकुरुत । ते अहोरात्रे । स ऐक्षत प्रजापति ||' ( श० ११ ११६| ७-१२ ) इति ब्राह्मणमुद्धृत्य यदुक्तम्—' प्रजाकाम परमेश्वर आस्येन अग्निपरमाणुमयात् कारणात् सूर्यादीन् प्रकाशवतो लोकान् मुख्यगुणकर्मभ्यो यानसृजत, ते देवा द्योतमाना दिव प्रकाशं परमेश्वरप्रेरितमभिपद्य प्रकाशादिव्यवहारानसृज्यन्त । तदेव देवाना देवत्व यतस्ते दिवि प्रकाशे रमन्ते । अथानन्तरमर्वाचीनो योऽय प्राणो वायुः पृथिव्यादिलोकश्वेश्वरेण सृष्टस्तेनैवासुरान् प्रकाशरहितान-सृजत । ते पृथिवीमभिपद्यौषध्यादीन् पदार्थानसृज्यन्त । ते सर्वे सकार्या प्रकाशरहितास्तयोस्तम प्रकाशवतोरन्योन्य विरोधो युद्धमिव प्रवर्तते । तस्मादिदमपि वामुरयुद्धमिति विज्ञेयम् । तथैव पुण्यात्मा मनुष्यो देव पापात्मा ह्यसुरश्च । एतयोरपि परस्परं विरुद्धस्वभावाद्युद्धमिव भवति ( पृ० ३३० ) इत्यादिकम्, तत्सर्वमपि निरर्गल निर्मूल च, ब्राह्मणाक्षराननुगमात् । पुण्यात्मा मनुष्यो देव, पापात्मा असुर इत्येतत्तु सर्वथा ब्राह्मणाक्षरासस्पृष्ट तत्कपोलकल्पितमेव । आस्यपदेनाग्निपरमाणु. केन प्रमाणेन गृह्यते? आस्येनाग्ने क सम्बन्ध? परमेश्वरस्य निराकारत्वादमुखस्य ' मुखादग्निरजायत' इत्यपि कथमुपपद्यते? यदि मुखादग्नेरुत्पत्तिरभ्युपेयते, नहि क सङ्कोच आस्याद्देवानामुत्पत्त्यङ्गीकारे? सूर्यादीना देवत्वे कथ विदुषा मनुष्याणा-मेव देवत्वमिति पक्ष स्थास्यति? व्यवहारानसृज्यतेति कथङ्कारेण व्याकरणशास्त्रेण साधीय? प्राणस्यार्वाचीनत्व किमित्यपि वक्तव्यम् । इमामेव पृथिवीमभिपद्येत्यनेन पृथिव्यादिलोकसृष्टि कथ ज्ञायते? अनेकानि पदानि तु व्याख्यार्थं न स्पृष्टान्येव ॥ एवमेव दिन देवो रात्रिरसुर इत्युक्तिस्तु सर्वथोच्छृङ्खलत्वमेवास्य प्रकटयति, ब्राह्मणाक्षरविरुद्धत्वादिति विद्वासो विदाङ्कुर्वन्तु । अत्र तद्वैपरीत्येन देवेष्वपि प्रज्ञादिमत्वेनामुरत्वमुक्तमिति तदीया सर्वा अप्यसुरपरिभाषा बाधत एवेद निरुक्तवचनम् । कर्म वाले जिन व्यक्तियो की सृष्टि की वे देवता कहलाए । इन प्रकाशमय देवताओ ने परमेश्वर के द्वारा प्रेरित प्रकाशगुग व्यवहारो को संपन्न किया । देवताओ का देवत्व यही है कि वे सदा प्रकाशमय व्यवहार मे रमते है, अर्थात् जिनको निष्कपट व्यवहार पसन्द है । इसके बाद यह जो अर्वाचीन प्राण वायु और पृथिवी प्रभृति लोक है, उनको भगवान् ने रचा । इसी लिये असुर सृष्टि प्रकाश से रहित हैं । इन असुरो ने पृथिवी पर औषधी प्रभृति पदार्थों की रचना की । इनके ये सब कार्य प्रकाश से रहित है । अतः ये देव और असुर प्रकाश और अन्धकार स्वभाव होने से इनका परस्पर विरोध है, मानो इनका परस्पर युद्ध चलता रहता है । इसको ही रूपकालकार मे देवासुर का संग्राम मान लिया गया है । इसी तरह से पुण्यात्मा मनुष्य देव और परमात्मा दुष्ट लोग असुर कहलाते है । उनका भी परस्पर विरोध रूप युद्ध नित्य होता रहता है' ( पृ० ३३२ ), किन्तु यह सारी बात भी निरगल और प्रमाणरहित है, उक्त ब्राह्मण वाक्य में विद्यमान पदो से इसका कोई भी संबन्ध नही है | पुण्यात्मा मनुष्य देव और पापात्मा मनुष्य असुर है, यह कथन तो सर्वथा उक्त ब्राह्मण वाक्य के विपरीत उनकी अपनी मनमानी कल्पना है । भाष्य पद से अग्नि के परमाणुओ का ग्रहण किस प्रमाण से होगा? आस्य से अग्नि का क्या संबन्ध है? परमेश्वर तो आपके मत से निराकार है । जब उसके मुंह नहीं है, तो मन्त्र के अनुसार परमेश्वर के मुख से अग्नि की उत्पत्ति कैसे मानी जा सकती है? यदि आप परमेश्वर के मुख से अग्नि की उत्पत्ति मान लेते है, तो फिर आपको सुख से देवताओ की उत्पत्ति मानने में क्यो सकोच हो रहा है? इस तरह से जब सूर्य प्रभूति भी देवता मान लिये जायेंगे, तो केवल मनुष्यो को ही देवता मानने वाला आपका पक्ष कैसे टिक पावेगा । ' व्यवहारानसृज्यत' यह वाक्य भी व्याकरणशास्त्र की दृष्टि से कैसे बन पायेगा? प्राण को आप अर्वाचीन किस प्रमाण के आधार पर कहते है? ' इस पृथिवी को प्राप्त कर' इस वाक्य से पृथिवी प्रभूति लोको की सृष्टि होती है, यह आप कैसे जानते हैं? आपकी व्याख्या में उक्त ब्राह्मण वाक्य के अनेक पद स्पष्ट नही किये गये हैं । इसी तरह से दिन को देवता और रात्रि को असुर बताने वाली व्याख्या भी ( पृ० ३३२ ) सर्वथा उच्छृङ्खलता का ही उदाहरण हो सकती है, इसका ब्राह्मण-वाक्यगत पदों से सर्वथा विरोध है । विद्वद्गण ही इस पर विचार करें कि यह कहाँ तक उचित है । वास्तव में तो दयानन्द के मत के

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पारिजात T सायणादिसम्मनस्तु पूर्वोक्तश्रुतिप्रघट्टकस्यैवमर्थो ज्ञातव्य । यथा - सोऽर्थन्निति । स सहस्रायुर्जज्ञे । स यथा नद्यै पार परापश्येदेव स्वस्यायुष पार पराचख्यौ । स प्रजापति सहस्रसवत्नरजीवनोपेतो जज्ञे जातो बभूव । यथा दूरदर्शी अत्यन्तं विस्तृताया नद्या पार परतीर परापश्यति तथा प्रजापति स्वकीयस्य सहस्रमवत्मररूपस्यायुप परमवसान पराचख्यौ दूरगमनशीलेन मनसा ददर्श । सोऽर्चन् स स्वीयस्यायुष परिच्छेद जानन् तत प्रागेव प्रजासर्जनरूप स्वकार्य निर्वर्तयितुकाम, अर्चन् स्वकर्तव्य परामृशन् श्राम्यन् तच्चिन्तनेन श्रान्त सन् चचार ववृते । तत स आत्मन् स्वशरीर एव प्रजाति प्रजोत्पत्तिसाधन योनिमधत्त धारणया निश्चितवान् । तत स आस्येन मुखेनैव देवानसृजत । ते देवा दिव द्युलोकमभिपद्य द्युलोकमवष्टभ्य असृज्यन्त सृष्टा अभवन् । यस्माद्दिवमभिपन्नास्तस्मात् द्युनम्बन्धाद् देवाना देवत्व देवतापदाभिधेयता सम्पन्ना । यस्माद्दिवोऽभिपदनात् ससृजानाया देवान् सृष्टवते प्रजापतये सा देवसृष्टिदेववास प्रकाश इव बभूव । अथ देवसृष्ट्यनन्तर योऽयमवाङ्मुखो गुदाख्य प्राणस्तेनासुरानसृजत । ते असुरा इमामेव पृथिवीमेवाभिपद्य असृज्यन्त सृष्टा अभवन् । तस्मै सृष्टवते प्रजापतये सा असुरसृष्टि तम इव बभूव । सोऽवेत् । स प्रजापतिरजानात् पापमेव खलु अहमसृक्षि सृष्टवान् अस्मि । यस्मै इयमसुरसृष्टि तम इवाभूत् अन्धकार इव सर्वस्यावरणशीलाभूत् । एव पर्यालोच्य तानसुरान् तेनैव तमोरूपेण पाप्मनाऽविध्यद् । विद्धास्तत्सहितानकरोत् । ते तमसा विद्धा. पराभवन् पराभव प्राप्ता । यत एव सृष्टिसमये प्रापतिना निराकृता असुरास्तस्मादाहुरभिज्ञा नैतदस्ति यद्देवासु म् । देवाश्चासुराश्चाधिकृत्य प्रवृत्त युद्धादिक यदस्ति तन्नैवास्ति । कुतस्तर्हि देवासुरस्य व्यापारस्य प्रतिपादनमस्ति? अन्वाख्याने सृष्ट्युपक्रमकथनरूपेऽस्मिन् ब्राह्मणे यदिद देवै सार्ध सुरसृष्टिप्रतिपादनं तदेक तावदिदमन्यत्राप्युपपयते । अत्र प्रवृत्ते इतिहासे यद् देवासुरप्रतिपादनं विपरीत देवताओ मे भी असुर का अर्थ प्रज्ञावान् करके असुरत्व की विद्यमानता बताई गई है । इस तरह से दयानन्द के द्वारा उद्धृत यह निरुक्त का वचन उनके सारा की गई असुर की परिभाषा को सर्वथा बाधित कर देता है । पूर्वोक्त शतपथ श्रुति के पूरे प्रघट्टक का सायणादिसमत अर्थ यह है - वह प्रजापति हजार वर्ष की आयु लेकर पैदा हुए । जैसे दूर दृष्टि वाला व्यक्ति अत्यन्त विस्तृत नदी के दूसरे तट को भी देख सकता है, उसी तरह स प्रजापति भा हजार वर्ष के बाद होने वाले अपनी आयु के पर्यवसान को अपनी मानसिक दूरदृष्टि से देख लेते है । वह अपनी आयु की इयत्ता को जानकर उससे पहले ही सब तरह की प्रजा की सृष्टि के कार्य को पूरा कर देने के अभिप्राय से अपने कर्तव्य का निर्धारण कर पूरे परिश्रम से उसको पूरा करने में लग जाते है । ऐसा निश्चय करने के उपरान्त वह अपने शरीर मे ही सारे जगत् की उत्पत्ति मे कारणभूत योनि की अवधारणा भावना करते हैं । वह अपने मुँह से देवताओ की सृष्टि करते हैं । इन देवताओ की सृष्टि वह स्वर्गलोक में रहकर करते है । इनकी सृष्टि प्रजापति ने द्युलोक में रहते हुए की, इसलिये द्युलोक से सबद्ध होने से यह सृष्टि देवता पद से अभिहित हुई, क्योकि द्युलोक का सहारा लेकर देवताओ की सृष्टि करने वाले प्रजापति के लिये वह देव सृष्टि दिवस के समान प्रकाश का काम करने वाली थी, अर्थात् आगे होने वाली सृष्टि के मार्ग को प्रकाशित करने वाली थी । अब देवताओ को सृष्टि कर लेने के बाद यह जो नीचे की ओर प्रवाहित होने वाला अपानरूप प्राण है, उसकी सहायता से प्रजापति ने असुरो की सृष्टि की । इन असुरो की सृष्टि इस पृथ्वी का ही सहारा लेकर की गई । सृष्टि करने में उद्यत उस प्रजापति के लिये यह असुर सृष्टि अन्धकार रूप थी । इस सृष्टि का पूरा कर लेने पर उसको मालूम हुआ कि मेरी यह सृष्टि तो पापमय है । क्योकि यह सृष्टि अन्धकार के समान सब पर आवरण डालने वाली थी, अतः सोचते सोचते प्रजापति ने इन असुरो को तमोमय पाप से आवृत कर दिया । जब असुर इस अन्धकारमय पाप से आवृत हो गये तो देवो के साथ हुए युद्ध मे ये पराजित हो गये । इस तरह से सृष्टि का प्रारंभ करते समय ही प्रजापति ने असुरो को पराजित अवस्था में पहुँचा दिया था, अतः अभिज्ञ विद्वान् व्यक्तियो का कहना है कि यह देवासुर युद्ध नाम की कोई घटना नही | तब इस युद्ध का वर्णन यत्र तत्र क्यों मिलता है? इस सृष्टि कथा का उपक्रम करने वाले इस ब्राह्मण में यह जो देवताओ के साथ असुरो की सृष्टि बताई गई है, इससे अन्य प्रकरणो की सहायता से यही अर्थ निकाला जा सकता है कि यह सृष्टि एक ही थी, अर्थात् इस कथा में देवताओ और असुरो की यद्यपि अलग अलग सृष्टि बताई गई है, किन्तु बाद में जब यह कह दिया गया कि असुरो की सृष्टि को प्रजापति ने तमोमय पाप से ढक दिया तो, उस दशा में केवल एक देव सृष्टि ही बच रहती है, क्योंकि जब अमुरों की २००

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वेदार्थपारिजात. II त्वत् एकमिद नदुभय नैवास्तीत्यत्र उक्तमर्थं हेतुत्वेन योजयति । ततो ह्येव तान् प्रजापति पाप्मनाविध्यत् तेन तेषा - पराभूतत्वात् । उक्तार्थदाढर्याय ऋचमुदाहरति—ऋषिणा मन्त्रेण न त्व युयुत्से युद्ध न कृतवान् त्वत्प्रतिभटानामसुराणा- मभावात् । कतमच्च किमपि शत्रुसैन्यं नावधी । हे मघवन् ते तव प्रकृतसृष्टौ अमित्र. कश्चन नास्ति । वृत्रादिभिरसुरैर्यानि तव युद्धान्याहु, सा मायेत् तव मायामात्रम्, न पारमार्थिकम् । ननु कुत इति चेत्, अद्य काले पुराकालेऽपि त्व शत्रून् न युयुत्से न प्रहृतवानसि । देवसृष्टिसमये यद् दिवेवासीत् स तदहरकुरुत स प्रजापतिस्तदेवाहदिनमकुरुत । देवासुरसृष्ट्यैव अहोरात्रे सृष्टे भवत । स ऐक्षत । सर्वं वा अहमसृक्षि सोऽह सर्व स्रष्टव्य कृत्स्न जगद् अत्सारिष छद्मगत्या प्राप्तवानस्मि ( त्सर छद्मगतौ), यस्मादेव सर्वं वा अत्सारिषम् इत्यवबोधयत्, तस्मात् स प्रजापति सवत्सरोऽभवत् । स एव परोक्षवृत्त्या सवत्सर उच्यते । तद्वेदनस्य फलमाह -य एन वेदितार पापरूपया मायया मिथ्यावरणशक्तया त्सरति कौटल्येन गच्छति स एनं नैवाभिभवति । वेदिता य बाधितुमिच्छेत् तमेन स्वयमभिभवत्येव । नात्र दयानन्दोक्तस्यार्थस्य मनागपि सकेतो दृश्यते । 'देवाश्च वा असुराश्च उभये प्राजापत्यास प्रजापते पितुर्दायमुपेयु ' (श० १/७/२) । अत्र दर्शपूर्णमासोभयसाधा- रणमवदानादिकं वषट्कारान्त धर्ममभिधाय तत्प्रसङ्गाद् यवादिशब्दाभिधानद्वारा दर्शपूर्णमासयागं प्रशसति-'प्रजापते. पुत्रादाय पैतृकं वित्तमुपेयु । कि तत्? एतौ प्रसिद्धौ अर्धमासौ मासस्याद्ध शुक्लकृष्ण पक्षौ । एव विभागे सति देवा कथ- मसुरेभ्यस्तदीयमपि भाग सवृजीमहि अपहरेमहि, इति कामयित्वा तत्साधन प्रयासेनान्विष्य दर्शपूर्णमासौ यागौ एवापश्यन् 'ते देवा अकामयन्त कथं न्विमा सवृञ्जीमहि योऽयमसुराणामिति । तेऽर्चन्त श्राम्यन्तश्चेरु । त एत हवियंज्ञ ददृशुर्यद्दर्शपूर्ण- मासौ । ताभ्यामयजन्त । ताभ्यामिष्ट्वैतमपि समवृञ्जन्त य एषोऽसुराणामासीदेतावेवार्धमासौ । य एवापूर्यते तं देवा उपायन् सृष्टि अपने पाप के कारण ही पराभूत हो गई, तो उस दशा मे देवताओ का कोई प्रतिद्वन्द्वी कहीं बच रहता है? इसी बात का दृढता से प्रतिपादन करने के लिये मन्त्र का प्रमाण दिया गया है । ऋषि पद यहाँ मन्त्र का वाचक है । मन्त्र का अर्थ यह है - हे इन्द्र, तुमने युद्ध नही किया, क्योकि तुम्हारे प्रतिद्वन्द्वी असुरो को तो कोई स्थिति ही नही है । साथ हो तुमने अपने किसी शत्रु को सेना का भी सहार नही किया है । हे मघवन्, इस वर्तमान सृष्टि में तुम्हारा कोई शत्रु विद्यमान नही है । वृत्र प्रभृति असुरो से जो तुम्हारे युद्ध हुए है, वह तो केवल तुम्हारी माया है, इसमें कोई सच्चाई नही है । ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसा इसलिये सही है कि आज की ही तरह पहले भी तुम ने किसी शत्रु पर प्रहार नही किया । देवताओ की सृष्टि करते समय दिन के समान प्रकाश था । उसी की सहायता से प्रजापति ने दिन की सृष्टि की थी । इस तरह देवताओ की सृष्टि के साथ दिन और असुरो की सृष्टि के साथ रात की सृष्टि हुई । इस सृष्टि को पूरा करके उस प्रजापति ने विचार किया कि मैंने सारी सृष्टि पूरी कर ली । अब मैंने सारे स्रष्टव्य जगत् को चतुराई से बना दिया है । जब प्रजापति को इस बात का बोध हो गया, उसी दिन से वह संवत्सर के नाम से जाना जाने लगा । इस तरह से प्रजापति ही परोक्ष वृत्ति के सहारे संवत्सर कहलाता है । इस बात को जान लेने से किस फल की प्राप्ति होती है? इसी को इस प्रघट्टक के अन्त में बताया गया है कि जो व्यक्ति इस प्रजापति को पापरूप माया, अर्थात् मिथ्या आवरण शक्ति का सहारा लेकर कुटिल मार्ग से प्राप्त करना चाहता है, वह इसको नही प्राप्त कर सकता, वह पाप पर भी विजय नही प्राप्त कर सकता । इसके विपरीत यह वेदिता प्रजापति जिसको अभिभूत करना चाहता हो, वह स्वयं हा अभिभूत हो जायगा । इस तरह से इस पूरे प्रघट्टक के अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका थोडा सा भी अश दयानन्द समर्पित अर्थ की ओर किसी भी प्रकार का संकेत नही करता । आगे दयानन्द ने ' देवाश्च ०' इत्यादि शतपथ वाक्य को उद्धृत किया है । दर्श-पूर्णमास इन दोनो कर्मों में समानरूप से होने वाले अवदान से लेकर वषट्कार पर्यन्त धर्मों को बताकर प्रसगवश यहाँ पर यव प्रभृति शब्दो के नाम से दर्शपूर्णमास याग की प्रशंसा की गई है कि प्रजापति के पुत्रो ने अपने पिता की संपत्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त किया । यह संपत्ति क्या है? यह प्रसिद्ध अर्धमास ही वह संपत्ति है, जो कि शुक्ल और कृष्ण पक्ष के नाम से प्रसिद्ध है । इस विभाग के हो जाने पर देवताओ ने सोचा कि ऐसा कोई उपाय किया जाय कि जिसकी सहायता से हम असुरो की संपत्ति के भी मालिक बन जाय । सोचते सोचते उन्होंने दर्शपूर्णमास याग 1 को इसके उपाय के रूप में देखा । तब वे दर्श और पूर्णमास याग का अनुष्ठान करने लगे और इसकी सहायता से उन्होने असुरो के भाग को भी प्राप्त कर लिया । देवताओ ने जिस भाग को प्राप्त किया वह अर्धमास ( पक्ष) के रूप मे था । जिस (शुक्ल ) पक्ष में चन्द्रमा पूर्ण होता जाता है, उसको देवताओं ने ले लिया था और जिसमें ( कृष्ण ) चन्द्रमा घटता है, वह असुरो के हिस्से में रह गया था । किन्तु इस

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वेदार्थपारिजातः १५६५ योऽपक्षीयते तमसुरा ' इति । अर्थात् ताभ्या कृष्णपक्षमपि स्वयमलभन्त । अत्र तु स्पष्टमेव मनुष्येभ्यो भिन्नानामेव देवानाम- सुराणा च वर्णनम्, तेषा दायप्राप्तिर्देवैश्च तदपहरणमुक्तन् । न च शक्तथा बोधितस्यार्थस्य वाधे किमपि कारणमुपलभ्यते ॥ न च मनुष्याणा दर्शपूर्णमासयज्ञहविर्भोक्तृत्वम् । न वा दर्गपूर्णमासयज्ञस्यान्यकृतस्यायै फलमुपभोक्तुं शक्यते । तस्मात् सर्वथा मनुष्यभिन्ना एवात्र देवाश्चासुराश्चेति । यञ्च्च-' द्वया ह प्राजापत्या.', (श० १४| ४| १ | १ ) इति ब्राह्मणमुद्धृत्योक्तम् –' ते इमे उभये प्रजापते परमेश्वरस्य पुत्रा इव वर्तन्ते । अत एव ते परमेश्वरस्य पदार्थानुपेता सन्ति । तेषा मध्ये असुरा. प्राणादयो ज्येष्ठा सन्ति, वायोः पूर्वोत्पन्न- त्वात् प्राणाना नन्मयत्वाच्च । तथैत्र जन्मतो मनुष्याः सर्वेऽविद्वासो भवन्ति पुर्नावद्वासश्च । तथैव वायोरेकादशादग्नेरुत्पत्ति. प्रकृतेरिन्द्रियाणा च । तस्मादसुरा ज्येष्ठा देवाश्च कनिष्ठा । एकत्र देवा सूर्यादयो ज्येष्ठा. पृथिव्यादयोऽसुराश्च कनिष्ठा । ते सर्वे प्रजापते. सकाशादुत्पन्नत्वात् तस्यापत्यानीव सन्ति । एषामपि परस्परं युद्धमिव वर्तते' ( पृ ० ३३० ) इति, तदपि वेदबाह्यमेव, वेदाक्षरासम्बद्धत्वात् । प्राणादयोऽसुरा इत्यपि निर्मूलम्, मूले तादृशार्थबोधकशब्दाभावात् । अत एव वायोः पूर्वोत्पन्नत्वादिति हेतुरपि नासुराणा ज्येष्ठत्वसाधक. प्राणानामसुरत्वस्याद्याप्यसिद्धे । सर्वे मनुष्या जन्मतोऽविद्वासो भवन्ति तेन त्वद्रीत्या सर्वेऽप्यसुरा एव भवन्ति, त एव विद्वासो भूत्वा देवा भवन्तीत्येव सति समेषा देवत्वमसुरत्व चेति कथ तेषु विरोध.? एवमेव वायोरसुरत्व तज्जन्यस्याग्नेर्देवत्वमित्यपि स्वाभ्यूहितमेव, प्रमाणशून्यत्वात् । देवा ज्येष्ठा असुरा कनिष्ठा इत्यपि प्रमाण- विरुद्धमेव, 'ज्यायसा असुरा ' ( श० १४| ४| १ | १ ) इति श्रुतिविरुद्धत्वात्, 'देवा ज्यायास.' इति श्रुतिवचनानुपलब्धेश्च । दर्श और पूर्णमास याग का अनुष्ठान कर देवताओ ने कृष्ण पक्ष को भी अपना बना लिया । यहाँ स्पष्ट ही मनुष्यो से भिन्न देवताओ और असुरो की सत्ता प्रतिपादित है और बताया गया है कि उनको किस प्रकार अपनी संपत्ति मिली । साथ ही यह भी बताया गया है कि असुरो के भाग को देवताओ ने किस तरह से छोन लिया । स्पष्ट रूप से अभिधा वृत्ति के सहारे जो अर्थ प्रतीत होता है, उसको न स्वीकार करने मे कोई कारण नही दिखाई पडता । मनुष्य दर्शपूर्णमास याग में दी गई हवि के भोक्ता नही माने जाते और न दूसरो के किये हुए दर्शपूर्णमास याग का फल उससे भिन्न किसी दूसरे को मिल सकता है । इस तरह से इस ब्राह्मण वाक्य में भी देवता और असुर सर्वथा मनुष्यों से भिन्न ही माने गये है । 'द्वया ह प्राजापत्याः' प्रभृति ब्राह्मण वाक्य को उद्धृत ( पृ ० ३२ ९ ) करके स्वामी दयानन्द ने उसकी व्याख्या इस तरह से की है - ' ये सब देव और असुर प्राजापत्य अर्थात् ईश्वर के पुत्र के समान कहे जाते हैं और संसार के सब पदार्थ इन्ही के अधिकार मे रहते है । इनमें से जो जो असुर अर्थात् प्राण आदि है, वे ज्येष्ठ कहलाते है, क्योकि वे प्रथम उत्पन्न हुए हैं । बाल्यावस्था मे सभी मनुष्य अविद्वान् होते है, बाद में विद्याध्ययन कर लेने पर ये विद्वान् बनते है । इसी तरह से वायु से अग्नि, प्रकृति और इन्द्रियो की उत्पत्ति होती है । इस प्रक्रिया में असुर ज्येष्ठ है और देवता कनिष्ठ । दूसरी दृष्टि से सूर्य प्रभृति ज्येष्ठ है और पृथिवी प्रभृति असुर कनिष्ठ । इन सबकी उत्पत्ति प्रजापति से हुई है, अतः ये सब उसकी सन्तानें है । इनका भी परस्पर युद्ध सा होता रहता है' ( पृ० ३३२ ) किन्तु यह सारी व्याख्या वेदविरुद्ध है, उक्त श्रुति में आये पदो से इसका कोई संबन्ध नही है । प्राण प्रभृति को असुर मानना सर्वथा निराधार है, क्योकि मूल में इस अर्थ का बोधक कोई पद नही है । इसीलिये 'वायु मे पहले उत्पन होने के कारण' यह हेतु भी असुरों की ज्येष्ठता को नही सिद्ध कर पाता, क्योकि प्राणो को आप असुर नही सिद्ध कर सके है । सभी मनुष्य जन्म से अविद्वान् होते है, आपके इस कथन के अनुसार तो ये सब असुर हुए । बाद में जब ये ही विद्याध्ययन करने के उपरान्त विद्वान् हो जाते है, तो ये ही आपकी दृष्टि के अनुसार देवता बन जाते है । इस तरह से तो सभी मनुष्यो में देवत्व और असुरत्व समान रूप से विद्यमान है, तो फिर इनमें परस्पर विरोध क्यों होगा? इसी तरह वायु को असुर तथा उससे उत्पन्न अग्नि को सुर ( देवता ) मानना आपकी कल्पना के सिवाय और क्या हो सकता है, क्योंकि अपनी बात के समर्थन में आपने कोई प्रमाण नही दिया है । दूसरी दृष्टि से देवताओं को ज्येष्ठ और असुरों को कनिष्ठ मानने वाली बात भी प्रमाण विरुद्ध है, क्योंकि श्रुति में तो असुरों को ही ज्येष्ठ माना गया है । देवताओं की ज्येष्ठता को बताने वाली कोई श्रुति उपलब्ध नही है ।

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वार्थपारिजा ५-६ शङ्करभगवत्पादसायणाचार्यादिमम्मतस्त्वयमर्थ -'प्रजापतेहिरण्यगर्भस्यातीतजन्मनि यजमानावस्थस्य अपत्यभृता गोकावस्था वागादय प्राजापत्या द्वि प्रकारा –देवाश्चासुराश्च । शास्त्रीयज्ञानकर्मवासनावासिता द्योतनात्मका देवा, प्रत्यक्षानुमानजनितदृष्टप्रयोजनकस्वाभाविकज्ञानकर्मवारनावासिता असुरा । स्वेष्वसुषु रमणाद् देवेभ्योऽन्यत्वाद्वा । कानीयसा देवा अल्पीयास, शास्त्रप्रवृत्ते रत्यन्तयत्नसाध्यत्वात् । ज्यायसा ज्यापासोपुरा 7 शास्त्रानाधेयस्वाभाविकप्रवृत्तेर्वहुलत्वात् । ते लोकेप्वस्पर्धन्त । ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु शास्त्रीयाशास्त्रीयज्ञानकर्मसाध्येषु निमित्तभूतेषु देवासुराणा सात्त्विकतामसत्वानुसारेण शमकामादिवृत्त्युद्भवाभिभवौ स्पर्धा । कदाचित् प्राणान्ते गास्त्रवृत्त्युद्भवाद् देवाना जये सति धर्मवृद्धेर्वागाद्युपहितस्य यजमानस्य धर्मप्राधान्याद् आ मानुषादा प्रजापतेरुत्कर्ष तद्विपर्ययादसुराणा जयेऽधर्मवृद्धेरा मानुषादा स्थाणोरपकर्ष । 'ते ह वाचमूचुस्त्व न उद्गायेति, तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्त देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याण वदति तदात्मने तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यत् । य स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूप वदति स एव पाप्मा । यदेवेदमप्रतिरूप जिघ्रति अप्रतिरूप पश्यति तदेव पाप्मा' इति । अत्रापि न त्वदुक्तास्यार्थस्यावकाश । अत्रासुरीवृत्तियोगात् प्रजापतेर्हरण्यगर्भस्य यजमानावस्थस्य वागादयः प्राणा एवासुरा भवन्ति । देवीवृत्तियोगात् त एव देवा अपि भवन्ति । आसुरीवृत्तेरनादित्वात् अप्रयत्नसाध्यत्वाज्ज्येष्ठत्वं प्राबल्य बाहुल्य च, दैव्या सात्त्विक्या प्रवृत्तेरत्यन्तप्रयत्नसाध्यत्वात् सादित्वात् कनिष्ठत्व दौर्बल्यमल्पत्व च भवति । इदमान्तर दैवासुरम् । इन्द्रवृत्रादियुद्ध तु बाह्यम् । रामरावणयुद्ध कौरवपाण्डवयुद्ध तत्प्रतीकभूतमेव । न तावतापि मन्त्रब्राह्मणपुराणेतिहास- प्रसिद्ध देवासुरं युद्धमपलापमर्हति । शकर भगवत्पाद और सायणाचार्य प्रभृति की पद्धति से इस शतपथ श्रुति का अर्थ यह होता है - प्रजापति हिरण्यगर्भ जब पूर्व जन्म में यजमान के रूप में प्रकट हुए तो उनकी वाणी प्रभृति इन्द्रिया, जिनका कि प्रस्तुत श्रुति में प्राजापत्थ शब्द से उल्लेख किया गया है, देव और असुर अवस्था के भेद से दो प्रकार की थी । इनमे देव इन्द्रिया वे थी ", जो कि शास्त्रीय ज्ञान और शास्त्रीय कर्म की वासना से सुवासित हो प्रकाशमान स्वभाव की थी । इसके विपरीत असुर स्वभाव की इन्द्रिया प्रत्यक्ष और अनुमान ज्ञान से उत्पन्न ऐहलौकिक प्रयोजन में लिप्त स्वाभाविक, पामर जन सुलभ ज्ञान और कर्म की वासना से भरी हुई थी । अपने प्राणो में ही मगन रहने के कारण अथवा सुर ( देवता ) से भिन्न होने से विरोचन प्रभूति असुर कहलाते है । इनको प्राणविद्या ही परम उपास्य है । देवताओ की संख्या अल्प होती है, क्योकि शास्त्र में प्रवृत्ति बिना यत्न के होता नही । असुरो को संख्या बहुत अधिक होती है, क्योकि शास्त्रीय आदेशो पर बिना विचार किये स्वाभाविक रूप से स्वतन्त्र प्रवृत्ति रखने वालो की संख्या अधिक होती है । ये देवता और असुरगण परस्पर निरन्तर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने को स्पर्धा में लगे रहते है । शास्त्रीय और अशास्त्रीय ज्ञान और कर्म का अनुष्ठान करने से ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त यानियों में जन्म होता है । इसके लिये देवताओं और असुरो में यह स्पर्धा चलती रहती है कि सात्विक और तामस गुण के अनुरूप शम और काम नामक वृत्तियो का वे क्रमश प्राप्ति और दमन करे । ऐसा करते करते कभी प्राणान्त हो जाने पर शास्त्रीय राम वृत्ति का उद्रेक होने से, देवभाव की विजय होने से धर्म की वृद्धि होती हैं और वाक् प्रभृति इन्द्रियो को उपाधि को ओढने वाला यजमान प्रधानतया धर्म की आर प्रवृत्त होता है, तब उसका मनुष्य योनि से लेकर प्रजापति पर्यन्त उत्कर्ष होता जाता है । इसके विपरीत आचरण होने पर असुरभाव की विजय होती है और इनसे अधर्म की वृद्धि होने से यजमान का मनुष्य योनि से लेकर स्थाणु पर्यन्त अपकर्ष ( पतन ) होता है । 'यदेवेद ० ' इत्यादि श्रुति भो आपके अभिमत को नही सिद्ध कर पाती । यह पूरी श्रुति ऊपर मूल में उद्धृत की गई है । इसमें भी इसी बात को समझाया गया है कि आसुरी वृत्ति में पड जाने पर यजमान के रूप में अवतरित प्रजापति हिरण्यगर्भ की वाणी, प्राण प्रभृति सभी असुर स्वभाव के हो जाते हैं और देवी वृत्ति का सहारा लेने पर ये ही देवता बन जाते है । आसुरी वृत्ति अनादि काल से चली आ रही है, इसको पाने के लिये कोई प्रयत्न नही करना पडता, अतः यह ज्येष्ठ है, और इसका बाहुल्य भी है । देवी, सात्त्विको वृत्ति अत्यन्त प्रयत्न साध्य है, प्रयत्न करने से बाद में इसकी उत्पत्ति होने से यह अनादि नहीं है, इसीलिये आसुरी वृत्ति को दृष्टि से यह कनिष्ठ हैं, बाद में उत्पन्न हुई है, दुर्बल है और अल्प मात्रा में ही उपलब्ध होती है । देवभाव और असुरभाव का यह संग्राम आध्यात्मिक दृष्टि से निरन्तर चलता रहता है । इन्द्र और वृत्र प्रभृति का युद्ध बाह्य देवासुर युद्ध हैं । राम और रावण का, कोरवो और पाण्डवो का युद्ध इसी देवासुरसग्राम की याद दिलाता है । इस दृष्टि से भी मन्त्र, ब्राह्मण, पुराण, इतिहास प्रभूति ग्रन्थों में वर्णित देवासुरसंग्राम का हम अपलाप ( निषेध ) नहीं कर सकते ।

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वेदार्थपारिजात. १५६७ ', ' —' ऊर्गिति देवा मायेत्यमुरा इत्यत्र यदुक्तम् ये प्राणपोपका स्वार्थतसरा मायाविन कपटिनो मनुष्यास्ते अमुरा । ये च परोपकारका परदु खभञ्जना निष्कपटिनो धार्मिकास्ते देवा ' (पृ ० ३३१ ) इति, तदपि तुच्छम्, तत्र सर्वत्र गौणी- वृत्त्यैव देवत्वासुरत्वादिपदप्रयागात् । न चोद्धृतब्राह्मणवचनस्यायमर्थ. सम्भवति, तद्बोधकपदाभावात् । तथाहि- तत्प्रसङ्गस्तु ' तमेतमग्निरित्यध्वर्यव उपासते सामेति छन्दोगा उक्थमिति बह्वचा यातुरिति यातुविद सर्प इति सर्पविद ऊर्गिति देवा रयिरिति मनुष्या मायेत्यसुरा स्वधेति पितरो देवजन इति देवजनविदो रूपमिति गन्धर्वा गन्ध इत्यप्सरस । त यथायथो-पासते तदेव भवति । तद्वैनान् भूत्वावति तस्मादेनमेववित् सर्वेरेवैतैरुपासीत' ( श० १० | ५ | २ | २० ) । अस्यायमभिप्राय ---एवमधिदैवमध्यात्म य पुरुष परमात्मा ध्येयत्वेनोक्त, तस्य प्रशसार्थ नानारूपैरुपासन दर्शयति । ऐतरेयेऽपि 'एत ह्येव बह्वचा महत्युक्थे मीमासन्त एतमग्नावध्वर्यव एत महाव्रते छन्दोगा. । एतमस्यामेन दिव्येत वायवे तमाकाशे' इति प्रक्रम्य ' सर्वेषु भूते-ष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । यान्ति यदध्ययनेन स्वर्गापवर्गों त्रैवर्णिका ' इति । यातुरथर्ववेद, तद्वेदितारो यातुविद । यातुर्नाम अथर्वणवेदप्रमेय नानाविधप्रयोगलक्षणम् । अयमर्थो गुरूपदेशगम्य । तत्र युक्ति । इद सर्वमेतेन यत नियतम् । एतच्छासन- वर्तीत्यर्थं । मर्पा इति सर्पविद, तक्षकशेषाद्युपासका विषस्य सर्पप्रधानत्वात् सर्प इत्युपासते । ऊर्गिति देवाः । देवा इन्द्रादय ऊर्जयति भोक्तृन् इत्यूर्क, अन्न हविरादि, 'ऊर्जं बलप्राणनयो ' । रयिर्गजान्तलक्ष्मीरिति मनुष्या । मायेत्यसुरा मायाविनः । स्वधा तत्पूर्वकं कव्यमिति पितरोऽग्निष्वात्तादय । देवजन इति, जायन्ते ब्रह्मण. सकाशादिति जनाः, देवा एव जना देवजना, मखीजनवत् स्वार्थे जनशब्द | देवजनविदो देवोपासका । रूपमिति गन्धर्वाः, सौन्दर्यप्रधानत्वात् । गन्ध इत्यप्सरस, तासा-मङ्गरागप्रधानत्वात् । विष्णुरिति वैष्णवा । शिव इति शैवा । एव त परमेश्वर यथायथोपासते स तदेव भवति । तत्तदुपास्य-रूपेण प्रादुर्भूय परमेश्वर एवैनानुपासकान् अवति तत्फलप्रदानेन रक्षति । नात्र प्रसङ्गे सत्यवादिनो देवा. कपटिनोऽमुरा इति लक्षणपर किमपि वाक्य पद वा दृश्यते । तस्मादज्ञानविजृम्भितमेवात्र दयानन्दीय व्याख्यानमिति । 'ऊगिति देवा... मायेत्यसुरा ' इस शतपथ श्रुति की व्याख्या करते हुए लिखा गया है -' उनमे जो जो मनुष्य स्वार्थी और अपने प्राण को पुष्ट करने वाले तथा छल- कपट आदि दोषो से युक्त हैं, वे असुर है और जो लोग परोपकारी परदुःख भजक तथा धर्मात्मा है, वे देव' कहलाते है ' ( पृ ० ३३२ ) । किन्तु यह कथन भी सारहीन है । इन सब स्थलो मे गौणी वृत्ति से ही देवासुरग्राम का प्रयोग किया गया है । ऊपर उद्धृत ब्राह्मण वाक्य का यह अर्थ होता भी नही, क्योंकि इस तरह के अर्थ को बताने वाला कोई पद यहा नही है । उक्त श्रुति का प्रासंगिक विवरण इस प्रकार है - यजुर्वेदी इसको ( परमात्मा ) अग्नि के रूप में उपासना करते है, सामवेदी साम के रूप में, ऋग्वेदी उक्थ के रूप में, अथर्ववेदी यातु के रूप में, सर्पविद्या के जानकार सर्प के रूप में, देवता ऊर्क ( अन्न ) के रूप में, मनुष्य धन के रूप में, असुर माया के रूप में पितृगण स्त्रधा के रूप में, देवोपासक देवताओ के रूप मे, गन्धर्व रूप के रूप में, अप्सरा गन्ध के रूप में उपासना करते है । इस परमात्मा को जो जिस रूप में उपासना करता है, वह वैसा ही हो जाता है । यह है उक्त श्रुति का अर्थ । इसका अभिप्राय यह है कि इस तरह से अधिदैव और अध्यात्म दृष्टि से जिस परमात्मा का ध्येय के रूप में वर्णन किया गया है, उसकी प्रशंसा के लिये यहा उसकी नाना रूपों में उपासना बताई गई है । ऐतरेय ब्राह्मण में भी ठीक इसी तरह का वर्णन मिलता है । यातु पद का प्रयोग इन स्थलों पर अथर्ववेद के अर्थ मे किया गया है । अथर्ववेद के ज्ञाता को यातुविद् कहा जाता है । अथर्ववेद में जो नाना प्रकार के प्रयोग बताए गये है, उनको भी यातु कहा जाता है । ये सारी बातें गुरुपरम्परा से ही सीखी जा सकती हैं । तक्षक, शेष आदि के उपासक सर्पविद् कहे जाते है । सर्प का विष ही सब विषों में प्रधान होता है, अतः विषविद्या के जानकार गारुडिक इस नाम से अभिहित होते है । हवि आदि के रूप में देवता के लिये प्रदत्त अन्न ऊ कहलाता है । हाथी, घोड़ा, गाय प्रभृति सम्पति रयि के नाम से जानी जाती है । देवजन शब्द 'सखीजन' शब्द के समान स्वार्थ में जन प्रत्यय लगाकर बनता है । गन्धवं रूप अर्थात् सौन्दर्य के उपासक होते है । अप्सराओ को गन्ध का उपासक इस लिये माना गया है कि इनकी रुचि अंगराग आदि के द्वारा अपने शरीर को सुन्दर और सुवासित करने की होती है । इसी तरह से इस भगवान् की वैष्णवगण विष्णु के रूप में और शेवगण शिव के रूप में उपासना करते हैं । इस तरह से इस परमेश्वर को जो उपासक जिस रूप में देखता है, भगवान् उसी रूप में प्रकट होकर उसकी रक्षा करते है और

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 700 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजात. १५६८ 'मनो वै सविता प्राणो देवा.' ( श० ६| ३| १| १५ ) अत्रापि प्राणाना वागादोना प्रकाशात्मकत्वेन देवत्वमुक्तम् । 'प्राणो वा असुरस्तस्यैषा माया' ( श० ६ ६ २२६ ) अत्रापि प्राणानामसुरत्वमुक्त नासुरत्वम् । 'द्वयं वा इद न तृतीयमस्ति । सत्य चैवानृत च । सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्या । ' ( ग०१।१।१।४ -५ ) इत्यादिवचनमपि पूर्वमेव कृतव्याख्यानम् 1। सर्वथापि नैतैर्वचनै ' पुराणेतिहासकथाना मिथ्यात्वमप्रामाण्य वा साधयितु शक्यम् । यदप्युक्तम् — 'कश्यपगयादितीर्थकथा अपि ब्रह्मवैवर्तादिषु ग्रन्थेषु वेदादिसत्यशास्त्रेभ्यो विरुद्धा उक्ताः सन्ति । तद्यथा - मरीचिपुत्र कश्यप ऋषिरासीत् । तस्मै त्रयोदश कन्या दक्षप्रजापतिना विवाहविधानेन दत्ता । तत्सङ्गमे दितेर्दैत्याः, अदितेरादित्या, दनोर्दानवाः । एवमेव कवा सर्पा, विनताया पक्षिण, तथाऽन्यासा सकाशाद् वानरर्छवृक्षघासादय उत्पन्नाः । इत्यादयोऽन्धकारमय्य प्रमाणयुक्तिविद्याविरुद्धा असम्भवग्रस्ता • कथा उक्तास्ता अपि मिथ्या एव सन्तीति । तद्यथा- 'स यत्कूर्मो नाम । प्रजापतिः प्रजा असृजत, यदसृजताकरोत् तस्मात् कूर्मं । कश्यपो वै कूर्म । तस्मादाहु. सर्वाः प्रजा. काश्यप्य इति' ( श० ७।५।१।५ ) | परमेश्वरेणेद सकल जगत् क्रियते । तस्मात्तस्य कूर्म इति सज्ञा । 'कश्यपो वै कूर्म.' इत्यनेन परमेश्वर- स्यैव कश्यप इति नामास्ति 1। तेनैवेमा. सर्वा प्रजा उत्पादिता काश्यप्य उच्यन्ते । 'कश्यप कस्मात्? परयको भवति' इति निरुक्त्या पश्यतीति पश्य, सर्वज्ञतया सकल जगद्विजानाति स पश्य, पश्य एव निर्भ्रमतयाऽतिसूक्ष्ममपि वस्तु यथार्थं जानात्ये- वातः पश्यक इति । आद्यन्ताक्षरविपर्ययाद् हिसे. सिह, कृतेस्तर्कुरित्यादिवत् कश्यप इति ' हयवरट्' इत्येतस्योपरि महाभाष्य- प्रमाणेन पदं सिद्धयति ' (पृ० ३३२-३३३ ) इत्यादि, तदप्यविचारितरमणीयम्, परमेश्वरस्यामनस्कस्याशरीरस्य सत साक्षा- त्कर्तृत्वानुपपत्त्या तत्तद्द्वारैव स्रष्टृत्वोपपत्ते । यथा ' आकाशाद् वायु, वायोरग्नि, अग्नेराप ' इत्याकाशादिजन्यानामपि परमात्मजन्यत्वमेव, तथैव कश्यपादिजनितानामपि परमात्मजन्यत्वमेव । वैज्ञानिकादिनिर्मितयन्त्राणामपि परमात्मनिर्मितत्वमेव, उसके सुकृत-दुष्कृत का फल देते है । इस पूरे प्रसंग में देवता सत्यवादी है और असुर कपटी है, इस तरह का देव और असुर का लक्षण बताने वाला कोई वाक्य अथवा पद कही नही आता । इस तरह से दयानन्द का उक्त व्याख्यान उसके अज्ञान को ही उजागर करने वाला है । 'मनो वै सविता.'' प्राणो देवा.' इस शतपथ श्रुति में भी प्राण और वाक् प्रभृति की प्रकाशात्मकता के आधार पर इनको देवता माना गया है । 'प्राणो वा असुस्तस्यैषा माया' इस श्रुति वाक्य में भी प्राणो को असु माना है, असुर नही । इसी तरह से 'द्वय वा इदं न तृतीयमस्ति' इस श्रुति मे भी देवता या असुरो का वर्णन नही है । इस श्रुति वाक्य की विस्तृत व्याख्या पहले की जा चुकी है । किसी भी तरह से इन वचनो से पुराण- इतिहास प्रभृति ग्रन्थो में विद्यमान कथाओ को मिथ्या अथवा अप्रमाण नही सिद्ध किया जा सकता है, यह निश्चित है । 'इसी तरह से कश्यप की तथा गया, पुष्कर तीर्थ प्रभृति की कथा लोगो ने बिगाड कर प्रसिद्ध को है । जैसे कि मरीचि पुत्र कश्यप ऋषि हुए थे । उनको दक्ष प्रजापति ने विवाह-विधान से तेरह कन्याए दी, जिनसे कि सारे संसार की उत्पत्ति हुई । अर्थात् दिति से दैत्य, अदिति से आदित्य, दनु से दानव, कद्रू से सर्प और विनता से पक्षी तथा अन्य स्त्रियों से वानर, रीछ, घास आदि पदार्थ भी उत्पन्न हुए । इसी प्रकार चन्द्रमा को सत्ताईस कन्याएं दी, इत्यादि प्रमाण और युक्ति से विरुद्ध अनेक असंभव कथाएं लिख रक्खी है । उनको मानना किसी मनुष्य को उचित नहीं । ये ही कथाएँ सत्य शास्त्रो में इस प्रकार उत्तम रीति से लिखी गई है कि प्रजा को उत्पन्न करने से परमेश्वर को कूर्म तथा प्रजा को अपने ज्ञान से देखने के कारण ' कश्यप' भी कहते हैं । कश्यप शब्द ' पश्यक' शब्द के आदि और अन्त के वर्णों का विपर्यय करने से, बदल देने से बनता है । इस प्रकार की उत्तम कथाओ को समझ कर उन मिथ्या कथाओ का सब लोगो को परित्याग कर देना चहिये, जिससे कि सबका कल्याण हो' (पु ० ३३३ ) यह सारा कथन भी जब तक विचार की कसौटी पर न कसा जाय, तभी तक अच्छा लगता है, क्योकि परमेश्वर तो प्राण, मन और शरीर से रहित है, उसका कैसे साक्षात्कार हो सकता है? अतः वह परमात्मा कूर्म, कश्यप आदि के द्वारा ही इस सृष्टि को फैलाता है । आकाश से वायु की और वायु से अग्नि आदि की सृष्टि का क्रम वेद में बताया गया है । यहाँ जैसे आकाश आदि से उत्पन्न अग्नि प्रभूति की भी उत्पत्ति परमात्मा से ही मानों जाती है, उसी तरह से कश्यप आदि के द्वारा फैलाई गई सृष्टि भी परमात्मा की ही सृष्टि का प्रपंच माना जाता है । वैज्ञानिकों के