वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 701–710

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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पारिजात. १५६६ वैज्ञानिकानामपि परमात्मनिर्मितत्वाविशेपात् । अत एव साक्षात् पारम्पर्येण वा सर्वमीशजन्यमित्येव मन्तव्यम् । यथा वृक्षघासादीना मनुष्यजन्यत्व नोपपद्यते, तथैव निराकारेशजन्यत्वमपि घासादीना न सम्भवति, पृथिवीजन्यत्वदर्शनविरोधात् । कश्यपश्च प्रजापतिरभिप्रेतो मनुष्यसामान्य, हिरण्यगर्भो विराट् च समष्टिसूक्ष्मम्थूलप्रपञ्चाभिमानिनौ तदन्तर्यामिणो ईश्वरावेव ।. ताभ्या यथा जगदुत्पत्तिस्तथैव कश्यपोऽपि विशिष्ट प्रजापति । स दक्षकन्यासु दैत्यादीनुत्पादयितुं शक्नोत्येव । ईश्वरस्यापि कश्यपादिनामभेदा उपाधिभेदादेव वक्तव्या, अन्यथेश्वरनाम्नैव तत्तद्व्यवहारोपपत्तौ पृथङ्नाम्ना नैरर्थक्यापत्ते । यथाऽध्यात्म- क्षेत्रे गोतमभरद्वाजादीना चक्षुरादिप्राणपरत्वेऽप्यैतिहासिकगोतमादीना नापलाप सम्भवति, तथैवाध्यात्मिक क्षेत्रे कश्यप- शब्दस्यान्यार्थत्वेऽप्यैतिहासिकस्य कश्यपस्य नापलाप सम्भवति । अत एव वशिष्टगोतमभरद्वाजादिगोत्राणामिव कश्यपगोत्रस्य पृथक् सत्तापि प्रामाणिकी । प्रकृते तु कश्यपस्यैव कूर्मेति नामान्तरेण सर्वकर्तृत्व साध्यते । एवमेवाध्यात्मक्षेत्रे प्राणाना गयपदवाच्यत्वेऽपि गयादितीर्थाना न निषेध. शक्यसमर्थन । यत्तु-(प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितम्, तस्मादाहुर्बल सत्यादोजीय । इत्येव वेषा गायत्र्यध्यात्म प्रतिष्ठिता । सा हैषा गयास्तत्रे । प्राणा वै गयास्तत्प्राणास्तत्रे । तद्यद्गयास्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम' ( श० १४| ८| १५ १६-७) इति ब्राह्मणमुद्धृत्य गयपदेन प्राणाना ग्रहणेन गयादितीर्थखण्डन लिखितम्, तदपि न न्याय्यम्, उपर्युक्तब्राह्मणे गयपदेन प्राणार्थविवक्षायामपि तेनैव प्रसिद्धगया- तीर्थखण्डनेऽप्यर्थद्वयपर्यवसानेन वाक्यभेदापत्ते । प्राणाना गयत्वबोधने नीर्थविशेषाभावत्वबोधने च स्पष्टमेव वाक्यभेद स्यात् । अत एव 'गय इत्यपत्यनामसु ( निघण्टु २१२ ) इति प्राणाना गयत्वेऽपि यथा नापत्यनामत्वापलाप सम्भवति, तद्वत् । द्वारा आविष्कृत यन्त्र भी परमात्मा के ही बनाये हुए है, क्योकि ये वैज्ञानिक भी तो परमात्मा की सृष्टि के अंग है । इसीलिये साक्षात् अथवा परम्परा से सब कुछ भगवान् की ही कृति मानी जाती है । जैसे वृक्ष, घास आदि को मनुष्यो की रचना नही माना जाता, उसी तरह से निराकार ईश्वर भी इनका स्रष्टा नही हो सकता । कश्यप सामान्य मनुष्य न होकर प्रजापति माने जाते हैं । हिरण्यगर्भ और विराट् ये सूक्ष्म और स्थूल समष्टि प्रपंच के अभिमाना और इनमें अन्तर्यामी रूप से विद्यमान ईश्वर के ही रूप है । जैसे ये सारी स्थूल और सूक्ष्म समष्टि प्रपंच की सृष्टि करते है, उसी तरह से कश्यप नाम के ये विशिष्ट प्रजापति भी सृष्टि का विस्तार करने वाले माने जाते है । यह कश्यप प्रजापति दक्ष की कन्याओ में दैत्य, मानव प्रभृति को उत्पन्न करने में सर्वथा समर्थ है । ईश्वर के भी कश्यप प्रभृति भिन्न भिन्न नाम उपाधियो के भेद के आधार पर ही माने जाते है । ऐसा न मान कर जब ईश्वर के नाम से ही सभी तरह के व्यवहारो की निष्पत्ति मानी जायगी, तब अन्य नामो की आवश्यकता ही क्या रह जायगी । जैसे आध्यात्मिक पक्ष में गोतम, भरद्वाज प्रभृति शब्दो को चक्षु प्रभूति प्राणो का वाचक मानने पर भी उनकी ऐतिहासिक गौतम आदि की वाचकता का निषेध नही किया जा सकता, उसी तरह से आध्यात्मिक पक्ष में कश्यप शब्द का भले ही दूसरा अर्थ कर लिया जाय, किन्तु ऐतिहासिक कश्यप प्रजापति का उनके कारण अपलाप ( निषेध ) नही किया जा सकता । इसीलिये वसिष्ठ, गौतम, भरद्वाज प्रभृति गोत्रो के समान ही कश्यप गोत्र की भी अलग से प्रामाणिक रूप से स्वीकृति प्राप्त है । प्रकृत स्थल मे तो कश्यप का ही कूर्म के रूप में वर्णन किया गया है । यह एक तरह से दूसरे नाम से कश्यप प्रजापति की सारी सृष्टि का परिचय कराता है । इसी पद्धति से आध्यात्मिक पक्ष में यद्यपि गय शब्द प्राण का वाचक है, तो भी इससे इस बात को समर्थन नही मिल सकता कि यह शब्द गया तीर्थ का बोधक नहीं हो सकता । इस प्रसग में 'प्राणो वै बलम्०' इस ब्राह्मण वाक्य को उद्धृत कर दयानन्द ने गया पद को प्राणो का ही वाचक मान कर गया प्रभृति तीर्थ स्थानो की पवित्रता का निषेध किया है, किन्तु उनका यह कथन उचित नहीं है । इस ब्राह्मण वाक्य में गया पद प्राण का वाचक अवश्य है, किन्तु इसी वाक्य से आप यह भी सिद्ध करें कि यहाँ का गया पद प्रसिद्ध तीर्थस्थानो का निषेधक है, तो इसमें वाक्यभेद दोष लग जायगा, क्योंकि इस तरह से एक ही वाक्य को आप दो भिन्न अर्थों का प्रतिपादक मान रहे हैं । आप पहले कहते है कि गया पद प्राण का वाचक है और बाद में कहते है कि इसी से यह भी सिद्ध हो जाता है कि गया पद गया तीर्थ का वाचक नही है । इस तरह से यहाँ वाक्यभेद दोष स्पष्ट हैं । इसीलिये निघण्टु के प्रमाण पर गय शब्द अपत्य ( सन्तान) अर्थ मे भी प्रयुक्त होता है । ऊपर गय शब्द को प्राण का वाचक माना गया है, किन्तु उससे इसका मपत्य अर्थ मे प्रयोग निषिद्ध नही हो जाता, उसी तरह से प्रस्तुत स्थल गया तीर्थ के अर्थ में भी उसका प्रयोग निषिद्ध नही हो सकता ।

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वेदार्यपारिजानः १५०० www यत्तु —' तीर्थमेव प्रायणीयोऽतिरात्रस्तीर्थेन हि प्रस्नान्ति । तीर्थमेवोदयनीयेऽतिरात्रस्तीर्थेन ह्युत्स्नान्ति' ( श ०१२।२। १।१, ५ ), ' अहिसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्य ' (छा० ८।१५ ), 'समानतीर्थेवासी ' (पा० सू० ४| ४| १०७ ) 'त्रय स्नातका भवन्ति विद्यास्नातको व्रतस्नातको विद्याव्रतस्नातकश्चेति । यो व्रत समाप्य विद्यामममाप्य समावर्तते स व्रतस्नातक ' (पारस्करगृ० २/५/३५ ) 'नमस्तीर्थ्याय च' (वा० स० १६/४२ ), 'ये तीर्थानि प्रचरन्ति' ( वा० स १६। ६१ ) इत्यादिवचनैर्गयादितीर्थापलापाय प्रयतितम्, तत्तु बालविलसितम् तात्पर्यानववोधात् । त्वयैव यज्ञातिरिक्तस्थापि शास्त्राचार्यादेरपि तीर्थत्वाभ्युपगमात् । उपरिनिर्दिष्टानि स्थलान्युद्धृत्य तत्र यद् भाष्यरूपेणोक्तम् -'प्राण एव बलमिति विज्ञायते, बलमोजीय । तत्रैव सत्य प्राणेऽध्यात्मं प्रतिष्ठितम् । तत्र च परमेश्वर प्रतिष्ठितस्तद्वाचकत्वात् । गायत्र्यपि ब्रह्मविद्यायामध्यात्म प्रतिष्ठिता, ता गायत्री गयामाह । प्राणाना गयेति सज्ञा, 'प्राणा वै गया' इत्युक्तत्वात् । तत्र गयाया श्राद्ध कर्तव्यम्, अर्थाद् गयाख्येषु प्राणेषु श्रद्धया समाधिविधानेन परमेश्वरप्राप्तावत्यन्तश्रद्दधाना जीवा अनुतिष्ठेयुरित्येक गयाश्राद्धविधानम् । गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री' ( पृ० ३३४ ) इति, तदपि न विचारसहम्, असामञ्जस्यात् । तथाहि-'प्राण एव बलम्, बलमोजीय, इत्येव सङ्गति, मूले तु बलहेतुत्वात् प्राणे बलत्वव्यवहार । तच्च प्राणे प्रतिष्ठितम् ॥ तत्र सत्याद्वलमोजीय इत्युक्तम् । त्वया तु सत्यपदेन परमेश्वर उक्त । न च परमेश्वरात् कस्याप्योजीयस्त्व सम्भवति । न च तत्प्राणे प्रतिष्ठितमित्यत्र तत्पदेन सत्य ग्रहीतुं शक्यम्, तस्याप्रकृतत्वात् सर्वनाम्ना च प्रकृतपरामशित्वात् । तत्रैव सत्य प्राणेऽध्यात्म प्रतितिमित्यपि न सङ्गतम्, निर्मूलत्वात् । न च तत्र वचन पद वा मूलम्, तदभावात् । तत्र च परमेश्वर प्रतिष्ठित इत्यप्यसङ्गतम्, निष्प्रमाण-त्वात् । न च तद्वाचकत्वादिति हेतु सम्भवति तथा व्याप्त्यदर्शनात् । नहि यस्य वाचकं यत्र प्रतितिष्ठति सोऽपि तत्रैव प्रतितिष्ठति । वाचक नाम मुखे तिष्ठति, नामी पदार्थस्तु भूम्यादिषु तिष्ठति । गायत्री ब्रह्मविद्यायामध्यात्म प्रतिष्ठितेत्यपि 'तीर्थमेव प्रायणीयो ', 'अहिंसन्०', ' समानतीर्थे० ', 'त्रयः स्नातका भवन्ति', 'नमस्तीर्थाय च', ' ये तीर्थानि० ' इत्यादि वचनों को उद्धृत करके स्वामी दयानन्द ने ( पृ ० ३३४ ) गया प्रभृति तीर्थों की सत्ता को न मानने के लिये बडा जोर लगाया है, किन्तु यह सब बच्चों का सा खिलवाड है, वे इन सब मन्त्रो का अभिप्राय नही समझ पाये है । यज्ञ से अतिरिक्त शास्त्री, आचार्य, तीर्थ प्रभृति उपाधियो के अर्थ में भी इन शब्दो का प्रयोग उन्होने स्वीकार किया है । ------ ऊपर उद्धृत वचनो का उल्लेख करने के बाद स्वामी दयानन्द ने उनका भाष्य करते हुए कहा है-' इन वचनो का अभिप्राय यह है कि अत्यन्त श्रद्धा से गया संज्ञक प्राण आदि में परमेश्वर की उपासना करने से जीव की मुक्ति हो जाती है । प्राण मे बल और सत्य प्रतिष्ठित है, क्योकि परमेश्वर प्राण का भी प्राण है और उसका प्रतिपादन करने वाला, रक्षा करने वाला गायत्री मन्त्र है, जिसको कि गया कहते है । यह इसलिये है कि उसका अर्थ जानकर श्रद्धा सहित परमेश्वर की भक्ति करने से जीव सब दुःखो से छूट कर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है । प्राण का भी नाम गया है । उसको प्राणायाम की विधि से रोक कर परमेश्वर की भक्ति के प्रताप से पितर बर्थात् ज्ञानी लोग सब दुःखो से रहित होकर मुक्त हो जाते है, क्योकि परमेश्वर प्राणो की रक्षा करने वाला है । इसलिये ईश्वर का नाम गायत्री और गायत्री का नाम गया है' ( पु ० ३३ ९ ), किन्तु यह व्याख्या भी विचार करने पर सही नही टिकतो, क्योंकि इनकी परस्पर संगति नही बैठती । पहले वाक्य की संगति तभी बन पाती है, जब कि प्राण ही बल है और बल ही ओज का संपादक है, यह अर्थ किया जाय । मन्त्र में बल का संपादक होने से प्राण को बल बताया गया है । यह बल प्राण में ही प्रतिष्ठित है । मन्त्र में सत्य से बल को अधिक तेजस्वी माना गया है । आप जब सत्य पद का अर्थ परमेश्वर करते है, तो उस परमात्मा से अधिक तेजस्वी तो दूसरा कोई हो नही सकता । इस वाक्य में आये ' तत्' पद से सत्य का ग्रहण नही हो सकता, क्योकि उसका यहाँ कोई प्रसंग नही है और सर्वनाम पद प्रकृत को ही पकड सकते है । सभी प्राणियों में यह सत्य स्वरूप परमात्मा प्रतिष्ठित है, यह कथन भी संगत नहीं है, क्योंकि ऐसा अर्थ करने में कोई प्रमाण नही है । इसमें श्रुति का कोई वाक्य अथवा पद प्रमाण रूप से नही दिखाया गया है, क्योंकि उनका नितान्त अभाव है । इस प्राण में परमेश्वर प्रतिष्ठित है, अर्थात् वह प्राण का भी प्राण है, यह अर्थ भी असंगत है, क्योकि इसमें भी कोई प्रमाण नही है । 'तद्वाचकत्वात्' यह हेतु भी नही बन सकता, क्योकि इस तरह की व्याप्ति देखी नही गई है । जिसका वाचक जहाँ रहता है, उसका वाच्य भी उसी स्थल पर हो ऐसा देखा नही जाता । वाचक शब्द तो मुँह में रहता है और वाच्य ( नामी पदार्थ घट मट आदि) पृथ्वी आदि अलग अलग स्थानों में रहते है । गायत्री ब्रह्मविद्या की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित है, यह कथन भी निर्मूल है,

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वेदार्थपारिजातः १६०१ निर्मूलम्, प्रमाणानुदाहरणात् । ब्रह्मविद्यायामित्यस्य केन कथ सम्बन्धः? किं ब्रह्मविद्याया जाताया साध्यात्मं प्रतितिष्ठति? यदि ओमिति, तर्हि प्रतिष्ठापि कृतकैव स्यात् 1। हेतुमत्त्वेन कार्यत्वात् । 'ता गायत्री गयामाह' इत्यपि मिथ्यैव, मूले प्राणानामेव गयेति नामनिर्देशात् । तत्र गय इति पुल्लिङ्गस्य निर्देशो न गयेति त्रीलिङ्गस्य । तत्र गयाया श्राद्ध कर्तव्यमिति कत्यं वचनम्? वेदवचनं चेत्, स्थलं निर्देष्टव्यम् । पौराणं चेदपसिद्धान्तापत्ति । श्रद्धया कृतस्य विवाहस्य च श्राद्धत्वापत्तिः स्यात् । न चेष्टापत्ति, तथात्वे यागादिभ्य पृथक् श्राद्धपदप्रयोगानापत्ते, विवाहोत्सवे श्राद्धपदव्यवहारापत्तेश्च । गयाना प्राणाना त्रातृत्वेन गायत्र्या गायत्रीत्व समर्थितम्, न गायत्र्या गयात्वमुक्तम् । तस्मादुन्मत्तप्रलपितमिव दयानन्दीय व्याख्यानम् । 'एवं गृहस्यापत्यस्य प्रजायाश्च गयेति नामास्ति' (पृ ० ३३४ ) इति यदुक्तम्, तदप्यसङ्गतम्, मूले गृहस्येति पदाभावात् । ‘अत्रापि सर्वैः श्रद्धातव्यम्' इत्यपि बालविलसितम् असामञ्जस्यात् । तथाहि - लोके पित्रादिगुरुजनेषु श्रद्धा विधीयते, सामाजिकेषु तु केवलं दयानन्देनापत्यादिपु । यद्येतेन दयानन्दीयवचनेन सामाजिकाः श्रद्धाविधाने प्रवर्तेरन्, तदा सामाजिकेषु पित्रादिभिरेव पुत्रादिश्राद्ध कर्तव्यम्, न पुत्रादिभिः पित्रादिश्राद्धं कार्यम् । गृहकृत्येषु श्रद्धावश्य विधेयेत्यपि तत्कपोलकल्पितमेव, मूले तादृशपदाभावात् । मातु पितुराचार्यस्यातिथेश्चान्येषा मान्याना श्रद्धया सेवाकरण गयाश्राद्धमित्युच्यते, इत्यपि पूर्वोक्तस्ववचोविरुद्धमेव । श्रद्धया सेवाकरणमेव श्राद्धम्, न श्रद्धया विवाहकरणं श्राद्धमिति राजाज्ञास्ति । तथैव स्वापत्येषु शिक्षाकरणे ह्युपकारेऽपि श्रद्धावश्य सर्वे कार्येत्यप्यनर्गलप्रलाप एव, विकल्पानुपपत्तेः । कि क्योकि इसमें कोई प्रमाण नही दिया गया है । 'ब्रह्मविद्या' पद का किस पद के साथ कैसा सबन्ध आप मानते है? क्या गायत्री ब्रह्मविद्या के उत्पन्न होने पर उसमें प्रतिष्ठित होती है? यदि आप इस बात को स्वीकार करें तो यह प्रतिष्ठा भी कृतिसाध्य मानी जायगी, क्योकि कारण से उत्पन्न होने से यह कार्यरूप ही सिद्ध हो पाती है । उस गायत्री को गया मानना भी गलत है, क्योकि मूल वाक्य मे तो प्राणो को ही गया माना गया है । इस वाक्य में पुंलिङ्ग गय शब्द आया है, स्त्रीलिंग गया शब्द नही । गया में श्राद्ध करना चाहिये, यह वचन आप कहाँ का उद्धृत कर रहे है? यदि यह वेद का वचन है, तो उसका स्थल बताना चाहिये था । यदि यह पुराण का वचन है, तो उसको आप प्रमाण मानते नही और प्रमाण के रूप में उसको यदि आप उद्धृत करते है तो वह आपके सिद्धान्त के विपरीत पडेगा । फिर आपकी इस व्याख्या के अनुसार तो श्रद्धापूर्वक किया गया विवाह भी श्राद्ध कहलाने लगेगा । यदि इस आपत्ति को आप स्वीकार करते है, तो फिर याग आदि से अलग श्राद्ध पद का प्रयोग करने की आवश्यकता हो क्या रह जायगी और विवाह आदि उत्सवो के लिये भी श्राद्ध पद का प्रयोग होने लगेगा । गय अर्थात् प्राणो के रक्षक के रूप में गायत्री पद का निर्वचन ऊपर बताया गया है, वहीं कही भी गायत्री को गया के रूप में प्रदर्शित नही किया गया है । इस तरह से दयानन्द की यह सारी व्याख्या पागलो के प्रलाप सी लगती है । 'निघण्टु में घर, सन्तान और प्रजा का नाम भी ' गया' बताया गया है' ( पृ० ३३ ९ ) यह कथन भी असंगत है, क्योंकि मूल में गृह पद का उल्लेख नही है । ' मनुष्यो को इनमें अत्यन्त श्रद्धा रखनी चाहिये' ( पृ० ३३ ९ ) यह भी बच्चो की सी बात है, क्योंकि इन वाक्यों का परस्पर कोई सामंजस्य नही बैठता । लोक व्यवहार में देखा जाता है कि श्रद्धा पिता प्रभुति गुरुजनो के प्रति ही रखो जाती है । दयानन्द की इस व्याख्या के अनुमार आर्यसमाजियो को अपने अपत्य प्रभृति के प्रति श्रद्धा रखनी पडेगी । यदि इस वाक्य के अनुसार सामाजिको मे श्रद्धा का दौरदौरा चले, तो उसके अनुसार पिता प्रभृति को हो पुत्र आदि का श्राद्ध करना पडेगा, पुत्र प्रभृति पिता आदि का श्राद्ध नही करेंगे । गृह कार्य में अवश्य श्रद्धा रखनी चाहिये, यह कथन भी उनकी निराधार कल्पना ही है, क्योंकि मूल में इस अर्थ के बोधक पद विद्यमान नही है । 'इसी प्रकार माता, पिता आचार्य और अतिथि की सेवा तथा सबके उपकार और उन्नति के कार्यों की सिद्धि करने में अत्यन्त श्रद्धा करना ही गया श्राद्ध कहलाता है' ( पृ० ३३ ९ ) यह कथन भी अपने पहले के वचन के विपरीत पडता है । फिर यह कोई राजा की आज्ञा नही है कि श्रद्धापूर्वक सेवा करना हो श्राद्ध कहा जायगा और श्रद्धापूर्वक विवाह किया जाय तो उसको श्राद्ध नहीं कहा जायगा । 'तथा अपने सन्तानो को सुशिक्षा से विद्या देना और उसके पालन में अत्यन्त प्रीति करना इसका नाम भी गया श्राद्ध है' ( पृ० ३३ ९ ) यह कथन भी अनर्गल प्रलाप मात्र है, क्योंकि आपके पास इस विकल्प का कोई समाधान नहीं है कि केवल श्रद्धा करना ही श्राद्ध है या बालकों की शिक्षा का प्रबन्ध करना श्राद्ध है? पहला पक्ष इसलिये नहीं बनेगा, जैसा कि पहले बताया गया है कि श्राद्ध की यह व्याख्या करने पर विवाह प्रभूति उत्सवो २०१

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वेदार्थपारिजातः १६०२ श्रद्धा कार्येति श्रद्धाकरणमेव श्राद्धम्, बालादिशिक्षाकरणमेव वा श्राद्धम्? नाद्यः पक्षः, पूर्वोक्तिविरोधात् । नान्त्यः, शिक्षणादौ श्राद्धशब्दप्रयोगादर्शनात् । यथेच्छमेव प्रयोगे शाब्दनयेऽराजकतापत्तेः । किञ्च गयाया श्राद्धं कार्यम्, विष्णुपदे श्राद्धं कार्यमिति पुराणप्रसिद्धि । गया विष्णुपदं च लोकव्यवहारसिद्धम् । शक्तिग्राहकेषु लोकव्यवहारस्यैव मूर्धन्यत्वात् । पुराणं च वात्स्यायनेन--'प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणाना प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' इति वदता प्रमाणत्वेनाङ्गी- कृतमेव । त्वया तु तदनभ्युपगच्छतापि लोकप्रतारणायैव स्वाभ्यूहितस्य यस्य कस्यचिदपि गयाश्राद्धत्व विष्णुपदत्वं च निर्मूलं व्यवस्थाप्यते, तदेतच्चित्रम् । यत्तु –'स यत्कूर्मो नाम इत्यस्य व्याख्याने –' परमेश्वरेणेद सकल जगत्क्रियते' इत्याद्युक्तम्, तत्तु विशृङ्खलमेव, तस्याभिप्रायान्तरत्वात् । एष हि कूर्मोपधानप्रशसार्थमर्थवाद । तथाहि -'स यत्कूर्मो नाम । एतद्वै रूप कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत अकरोत्तत् । यदकरोत् तस्मात् कूर्म । कश्यपो वै कूर्म । तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः' ( | | | ) — श० ७ ५ १ ५ इति । अथ कूर्म इति नाम्नः प्रवृत्तिनिमित्त दर्शयति स यत्कूर्म इति । एतत् कूर्मसम्बन्धि रूपम् आत्मनः कृत्वा प्रजापति प्रजा असृजत । 'असृजत' इत्यस्य व्याख्यान यदसृजताकरोदिति । 'असृजत्' इति यत् तत् अकरोद् इत्यर्थः । ‘तत्’ तेन कूर्मरूपेण ' अकरोत्' इति यत् तस्मादकरोदिति । 'कूर्म:' इति कूर्मशब्दो नामधेयमित्यर्थः । 'करोतेरोणादिके' ( पा० सू ० उ० १।१५० ) यक्प्रत्यये ' बहुलं छन्दसि' (पा० सू० ७| १ | १०३) इत्युत्वे कृते 'हलि च' ( पा० सू० ८| २| ७७) इति दीर्घे च कृते कूर्म इति रूपं भवति । 'कश्यपो वा' इत्यादिकस्यायमर्थः - कूर्मशब्दस्य करण प्रवृत्ति - निमित्तकत्वात् कश्यपस्य प्रजापतित्वेन प्रजाकारकत्वात् कश्यपः कूर्म खलु । अत एव सर्वाः प्रजा. काश्यप्य इत्याहुर्जनाः । अतश्च कूर्मस्य कश्यपात्मकत्वात् तदुपधान प्रशस्तमिति भावः । नहि परमात्मन उपधानं सम्भवति । न वा तेन कूर्मोपधान- प्रशंसा सम्भवति । तस्माद् दयानन्दोक्तोऽर्थोऽसम्बद्ध एव । के लिये भी इस शब्द का प्रयोग करना पड जायगा । दूसरा पक्ष इसलिये नही बनेगा कि बालकों की शिक्षा प्रभृति कार्यों के लिये भी श्राद्ध शब्द का प्रयोग नही होता । यदि मनमाने तरीके से मनमाने अर्थों में मनमाने शब्दों का प्रयोग किया जाय, तो शब्दो के प्रयोग में अराजकता फैल जायगी, जब कि एक व्यक्ति एक शब्द का किसी एक अर्थ में और दूसरा व्यक्ति उसी शब्द को दूसरे अर्थ में प्रयोग करने लगेगा । गया मे श्राद्ध करना चाहिये, विष्णु पद पर श्राद्ध करना चाहिये, यह व्यवहार पुराणो के प्रमाण पर प्रचलित है । गया और विष्णुपद लोक व्यवहार में एकमत से प्रसिद्ध है । शब्द की शक्ति के ग्राहक प्रमाणों में लोक व्यवहार को सबसे ऊपर माना जाता है । वात्स्यायन प्रभृति महर्षियो ने न्यायभाष्य मे स्पष्ट प्रतिपादित किया है कि प्रमाणभूत ब्राह्मण ग्रन्थो के प्रमाण पर इतिहास और पुराण ग्रन्थों को भी प्रामाणिक माना जाता है । वात्स्यायन के वचन को प्रामाणिक मानते हुए भी आप केवल अबोध व्यक्तियो को ठगने के लिये ही मनमाने तरीके से गयाश्राद्ध और विष्णुपद शब्दों का गलत अर्थ करते है । इस तरह की निर्मूल बातो का प्रतिपादन बडा ही चिन्तनीय विषय है । ' स यत् कूर्मो नाम' इस शतपथ वाक्य की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने कहा है कि परमेश्वर ही इस सारे जगत् को बनाता है ( पृ० ३३३ ), किन्तु यह सारी व्याख्या भी कल-जलूल है । वस्तुत: उस वाक्य का अभिप्राय एकदम दूसरा है । इस वाक्य में कूर्म के उपधान बनाने की प्रशंसा की गई है । पहले इस वाक्य में कूर्म इस नाम की प्रवृत्ति का निमित्त बताया गया है कि इस कूर्म का रूप धारण कर प्रजापति ने प्रजा की सृष्टि की । ' असृजत्' पद का अर्थ ' अकरोत्' स्वयं श्रुतिवाक्य में ही बताया गया है । उस कूर्म रूप को धारण कर प्रजापति ने प्रजा की सृष्टि की, अतः इसका नाम भी कूर्म हो चला है । कूर्म पद की निष्पत्ति कृन् धातु से मोणादिक यक् प्रत्यय होकर छान्दस विधि के अनुसार उत्व और उसका दीर्घ होने पर होती है । 'कश्यपो वा' इसका अर्थ यह होगा --कूर्म शब्द प्रजा को सृष्टि करने के कारण प्रजापति के लिये प्रवृत्त हुआ है । यह प्रजापति कश्यप ही है । अतः प्रजा की उत्पत्ति करने वाला कश्यप ही कूर्म है । इसीलिये लोक में यह प्रसिद्ध है कि सारी प्रजा कश्यप को सन्तान है । इस तरह से कूर्म के कश्यप रूप होने से उसका उपधान प्रशस्त माना जाता है । परमात्मा का तो उपधान किया नही जा सकता और न उससे कूर्म के उपधान की प्रशंसा ही हो सकती है । अतः दयानन्द का किया गया अर्थ पूरी तरह से असंबद्ध ही माना जायगा ।

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वेदार्थपारिजात १६०३ ' यदुक्तम्- भ्रान्त्या विष्णुगयेति च पदद्वयोरर्थविज्ञानाभावान्मगवदेशंकदेशे पाषाणस्योपरि शिल्पिद्वारा मनुष्यपादचिह्न कारयित्वा तस्यैव कैश्चित् स्वार्थसाधनतत्परैरुदर भरैर्विष्णुपदमिति नाम रक्षितम्, तस्य स्थलस्य गयेति च, तद् व्यर्थमेव । कुतः? विष्णुपदं मोक्षस्य नामास्ति, गयपद प्राणगृहप्रजाना च' ( पृ० ३३५ ) इति, तदप्यशुद्धम्, निर्मूलं प्रलापमात्रम्, पदद्वयस्येत्यस्यैव साधुत्वे पदद्वयोरित्यसङ्गतेः । तत्रापि पदद्वययोरिति भाव्यं न पदद्वयोरिति । गया-विष्णुपदादि- स्थानानां भ्रान्त्या तत्तन्नामत्वे भारतवर्षादिनाम्नामपि तथात्वापत्त्या सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गः, भारतवर्षादिपदानामप्य- न्यार्थत्वसम्भवात् । ‘ उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति ॥ ' ( वि० पुरा०) इत्यादिपुराणप्रामाण्यादेव देशविशेषस्य तत्तन्नामत्वसिद्धेः । गया- विष्णुपदादिप्रदेशस्य कदारभ्य भ्रान्त्या गया -विष्णुपदनामत्व- मिति त्वयापि न वक्तुं शक्यम् । विकृतमस्तिष्कैस्तु वेदादिमम्बन्धेऽप्यजाविपालगीतेष्वेव भ्रान्त्याऽनादित्वापौरुषेयत्वादि- व्यवहारोऽभ्युपेयते । यत्तु —' इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पासुरे स्वाहा ||' ( वा० सं० ५।१५ ) । यदिदं किञ्च तद्विक्रमते विष्णुस्त्रिधा निधत्ते पदम् । त्रेधाभावाय पृथिव्यामन्तरिक्षे दिवीति शाकपूणिः । समारोहणे विष्णुपदे गयशिरसीत्यौर्णवाभः । समूढमस्य पासुरेप्यायनेऽन्तरिक्षे पदं न दृश्यतेऽपि वोपमार्थे स्यात् समृढमस्य पांसुल इव पदं न दृश्यत इति । पासवः पादे. सूयन्त इति वा, पन्नाः शेरत इति वा, पंसनीया भवन्तीति वा' ( नि० १२ १ ९ ) । अस्यार्थ यथावद- विदित्वा भ्रमेणेयं कथा प्रचारिता । विष्णुर्व्यापकः परमेश्वरः सर्वजगत्कर्ता तस्य विष्णुरिति नाम । ' पूषेत्यथ यद्विषितो भवति तद्विष्णुर्भवति । विष्णुर्विशतेर्वा व्यश्नोतेर्वा । तस्यैषा भवति । इदं विष्णुरित्युक्' ( नि० १२। १७ ) चराचर जगद् 'भ्रमवश विष्णु और गया इन दोनो पदो के अर्थ का ठीक से ज्ञान न होने के कारण मगध देश के एक स्थान पर पत्थर के ऊपर किसी शिल्पी से मनुष्य के पैर का चिह्न बनवाकर अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये, अपना पेट भरने के लिये, कुछ लोगो ने ,,उसको विष्णुपद नाम दे दिया और जहाँ वह विष्णुपद प्रतिष्ठित है उस स्थल का नाम गया रख दिया किन्तु यह सब व्यर्थ की बाते है? क्योकि विष्णुपद मोक्ष का और गय पद प्राण, गृह और प्रजा का वाचक है' ( पृ० ३३ ९ ) यह पूरा कथन भी अशुद्ध, निर्मूल और बकवासमात्र है । यहां की भाषा भी अशुद्ध है । 'पदद्वयोः' इसके स्थान पर 'पदद्वयस्य' होना चाहिये था, अथवा 'पदद्वययोः' यह प्रयोग भी किसी तरह से चल सकता था, किन्तु 'पदद्वयोः' यह तो सर्वथा अशुद्ध है । गया, विष्णुपद प्रभृति नामो की प्रवृत्ति को यदि भ्रम के कारण मानने लगे, तो ' भारतवर्ष प्रभृति नामो की भी ऐसी ही स्थिति मानने पर किसी को कही भी विश्वास हो नही रह जायगा । भारतवर्ष प्रभृति शब्दों का भी दूसरा अर्थ संभव हो सकता है । विष्णुपुराण के अनुसार समुद्र के उत्तर मे और हिमालय के दक्षिण मे जो भूभाग अवस्थित है, उसका नाम भारतवर्ष है, जिसमें भारती प्रजा निवास करती है । इसी तरह से पुराणो के आधार पर ही हम देशविशेष के नामविशेष से परिचित होते हैं । गया, विष्णुपद प्रभुति प्रदेशो की यह भ्रान्त प्रवृत्ति कब से चली, इस बात को आप भी नही बता सकते | जिनका दिमाग विकृत हो गया है, ऐसे बहुत से आधुनिक विचारक तो वेद आदि के सम्बन्ध में भी यही कहते है कि ये तो बकरी और भेड चराने वालों के गीत है । इन्ही को भारतीय जन भ्रमवश अनादि और अपौरुषेय मान लेते है । इस तरह से ये लोग दयानन्द से चार हाथ आगे है । इस प्रसंग में स्वामी दयानन्द ने 'इदं विष्णु विचक्रमे०' प्रभृति मन्त्र को उद्धृत कर निरुक्तकार द्वारा की गई इसकी व्याख्या का उल्लेख करते हुए कहा है- 'देखो यहाँ निरुक्तकार ने कहा है कि ' विस्तृ' धातु का अर्थ व्यापक होना, अर्थात् सब चराचर जगत् में प्रविष्ट रहना या जगत् को अपने में स्थापन कर लेने का है । इसलिये निराकार ईश्वर का नाम विष्णु है । 'क्रमु पादविक्षेपे' यह धातु दूसरी वस्तु को पैरों से दबाने या स्थापित करने के अर्थ को बताती है । इसका अभिप्राय यह है कि भगवान् अपने पाद अर्थात् प्रकृति, परमाणु आदि सामर्थ्य के अंशों से सब जगत् को तीन स्थानों में स्थापन करके धारण कर रहा है । अर्थात् भार सहित और प्रकाशरहित जगत् को पृथिवी में, परमाणु आदि सूक्ष्म द्रव्यों को अन्तरिक्ष में तथा प्रकाशमान सूर्य और ज्ञानेन्द्रिय आदि को प्रकाश

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वेदार्थ पारिजातः १६०४ व्यश्नुते व्याप्नोति वा स विष्णुर्निराकारत्वात् सर्वगत ईश्वरोऽस्ति । इदं सकलं जगत् त्रेधा त्रिप्रकारकं विचक्रमे विक्रान्तवान् । ( क्रमु पादविक्षेपे ) पादे प्रकृतिपरमाण्वादिभिः स्वसामर्थ्याशैर्जगदिदं पदं प्राप्तव्य सर्वं वस्तुजातं त्रिषु स्थानेषु निघत्ते स्थापितवान् || अर्थाद् यावद् गुरुत्वादियुक्तं प्रकाशरहित तत्सर्वं जगत् पृथिव्याम्, यल्लघुत्वादियुक्तं वायुपरमाण्वादिकं तत्सर्वमन्तरिक्षे, यच्च प्रकाशमय सूर्यज्ञानेन्द्रियजीवादिकं तत्सर्वं दिवि द्योतनात्मके प्रकाशमयेनो वा । एवं त्रिविधं जगदीश्वरेण रचितम् । एषा मध्ये यत्समूढ मोहेन सह वर्तमानं तत्पासुरेऽन्तरिक्षे परमाणुमयं रचितवान् । सर्वे लोका अन्तरिक्षस्याः सन्तीति बोध्यम् । तदिदमपि धन्यवादाहं स्तोतव्य कर्मास्तीति बोध्यम् । अयमेवार्थो यास्काचार्येण वर्णितः । यदिदं किञ्च जगद् वर्तते तत्सर्व विष्णुर्व्यापक ईश्वरो विक्रमते रचितवान् । त्रेधाभावाय त्रिप्रकारस्य जगतो भवनाय तदुक्त- मेव । तस्मिन् विष्णुपदे मोक्षाख्ये समारोहणे समारोढुम गयशिरसीति प्राणाना प्रजाना च यदुत्तमाङ्गं प्रकृत्यात्मकं शिरो यथा भवति, तथैवेश्वरस्यापि सामथ्यं गशिर. प्रजाप्राणयोरुपरिभागे वर्तते । यदीश्वरस्यानन्तं सामर्थ्यं तस्मिन् गयशिरसि विष्णुपदे होश्वरसामर्थ्येऽस्तीति कुतः, व्याप्यस्य सर्वस्य जगतो व्यापके परमेश्वरे वर्तमानत्वात् पासुरेऽप्यायनेऽन्तरिक्षे पदं पदनीयं परमाण्वाख्यं यज्जगत् तच्चक्षुषा न दृश्यते, ये च पांसवः परमाणुसघाताः पादैस्तद्रव्याशैः सूयन्ते उत्पद्यन्ते । अत एव- मुत्पन्नाः सर्वे पदार्था दृश्या भूत्वेश्वरे शेरत इति विज्ञायते । इममर्थमविज्ञाय मिथ्याकथाव्यवहारः पण्डिताभासैः प्रचारित: ' ( पृ० ३३५-३३६ ) इति, तदपि मिथ्यैव, अनुपपत्तेः 1। निराकारस्य पादाभावेन तद्विक्षेपरूपस्य क्रमणस्यात्यन्तासम्भवात् । यत्तु --' पादैः प्रकृतिपरमाण्वादिभिः स्वसामर्थ्याशैर्जगदिदं पदं प्राप्तव्यं सर्वं वस्तुजारा त्रिषु स्थानेषु स्थापितवान्' इत्युक्तम्, तदपि तुच्छम्, शक्त्योपस्थितं मुख्यार्थं परित्यज्यानुपस्थितस्य लाक्षणिकार्थस्य कल्पने मानाभावात् । अप्राप्त हि प्राप्तव्यं भवति, न नित्यप्राप्तम् । नहि मृत्तिकाया घटः प्राप्यते, तद्रूपत्वात् । सर्वस्य प्रपञ्चस्येश्वरसामर्थ्येन जातत्वान्न तस्य प्राप्तव्यत्वं सम्भवति । न चेश्वरसामर्थ्येऽशाशिभावकल्पना युक्ता, तस्य दुर्भेद्यत्वात् । यत्तु - 'प्रकृतिपरमाण्वादय ईश्वर-सामर्थस्यांशाः' इति हिन्दीव्याख्यान उक्तम्, तत्सर्वथाऽसङ्गतम्, सामर्थ्यस्य परमेश्वरशक्तिरूपत्वेन बाह्यपरमाण्वादिरूपत्वा- में । इस रीति से तीन प्रकार के जगत् को ईश्वर ने रचा है । फिर इन्हीं तीन भेदो मे एक मूढ अर्थात् ज्ञानरहित जो जड जगत् है, वह अन्तरिक्ष अर्थात् पोल के बीच में स्थित है । सो यह केवल परमेश्वर की ही महिमा है कि जिसने ऐसे ऐसे अद्भुत पदार्थ रचकर सबको धारण कर रक्खा है । इस विष्णुपद के विषय में यास्क मुनि ने भी इस प्रकार व्याख्यान किया है कि यह सब जगत् सर्वव्यापक परमेश्वर ने बनाकर त्रिधा इसमें तीन प्रकार की रचना दिखलाई है, जिसमें मोक्ष पद को प्राप्त होते है, वह 'समारोहण' कहलाता है । सो विष्णुपद गयशिर अर्थात् प्राणो के परे है, उसको मनुष्य लोग प्राण में स्थिर होकर, प्राण से प्रिय अन्तर्यामी परमेश्वर को प्राप्त होते होते हैं, अन्य मार्ग से नही । क्योंकि प्राण का भी प्राण और जीवात्मा में व्याप्त जो परमेश्वर है, उससे दूर जीव या जीव से दूर वह कभी नही हो सकता । किन्तु जब कोई पदार्थ परमाणुओं के संयोग से स्थूल हो जाता है, तभी वह नेत्रों से देखने में आता है । यह दोनों प्रकार का जगत् जिसके बीच में ठहर रहा है और जो उसमें परिपूर्ण हो रहा है, ऐसे परमात्मा को विष्णुपद कहते हैं । इस सत्य अर्थ को न जानकर अविद्वान् लोगों ने पाषाण पर जो मनुष्य के पैर का चिह्न बनाकर उसका नाम विष्णुपद रख छोडा है, यह सब मिथ्या बातें है' ( पृ० ३३ ९ -३४० ) । किन्तु यह सारी व्याख्या भी गलत है । आपके मत के अनुसार यह संभव ही नही हो सकता । परमेश्वर तो आपके मत में निराकार हैं, जब उसके पैर ही नही है, तब वह किसी वस्तु को बांधकर कहाँ पैर रखेगा । इस आक्षेप से बचने के लिये आपने पाद का अर्थ पैर न करके प्रकृति, परमाणु आदि अपनी सामर्थ्य के अंशों से इस प्राप्तव्य जगत् की सारी वस्तुओं को तीन स्थानों पर स्थापित कर दिया, ऐसा अर्थ किया है, किन्तु आपकी यह पद्धति प्रमाणविरुद्ध है । शब्द को साक्षात् शक्ति से उपस्थित मुख्य अर्थ को छोड़कर अनुपस्थित लाक्षणिक अर्थ को स्वीकार करने में कोई प्रमाण नही है । अप्राप्त वस्तु ही प्राप्त हो सकती है, नित्य प्राप्त वस्तु की प्राप्ति कैसी? क्या मृत्तिका से घट की प्राप्ति होती है? घट तो मृत्तिका ही है । इसी तरह से सारा प्रपंच परमेश्वर की सामर्थ्य से ही पैदा होता है, तो परमेश्वर के उसको प्राप्त करने का प्रसंग ही कहाँ उठता है । परमेश्वर

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वेदार्थपारिजातः १६०५ , सम्भवात् । अत एव न तेषां पादत्वमपि । त्रधेति त्रिप्रकारमुच्यते न त्रिषु स्थानेषु । अत एव यावद् गुरुत्वादिकं प्रकाश- रहितं तत्पृथिव्या यहलघुत्वादियुक्तं वायुपरमाण्वादिकं तदन्तरिक्षे, यच्च प्रकाशमयं सूर्यादिक तद्दिवि द्योतनात्मकेऽग्नो वा' इत्यपि निरर्थकम्, योग्यतानुसारेण यत्र यानि वस्तूनि सृष्टानि तानि तत्र व सन्त्येवेति, तेषा पृथिव्यादिषु स्थापनोतेर्नै- रक्यात् । ' यन्मोहेन सहितं ज्ञानवर्जितं तत्पासुरेऽन्तरिक्षे परमाणुमयं रचितवान् । सर्वे लोका अन्तरिक्षस्थाः सन्ति' इत्यपि पूर्वापरविरुद्धमेव । पूर्वं पृथिव्यादित्रिषु स्थापितवानित्युक्तम्, इदानी पृथिव्यामेवेति । जीवानपहाय सर्वमपि ज्ञानवर्जितमेव तत्सर्व- मन्तरिक्षे रचितम् । तत्र वास्ति चेन्मुधैव त्रिषु स्थानेषु स्थापनोक्तिः । किञ्चान्तरिक्षोऽपि लोकः । तस्य कथमन्तरिक्षस्थत्वम्, आत्माश्रयत्वापातात् । एवमेव त्रिप्रकारस्य जगतो भवनमित्यप्यसङ्गतम्, जगतस्त्रिप्रकारत्वासिद्धेः । साधर्म्यवैधम्र्म्याभ्यामपि तैयायिकाभिरनेकधा वर्णितत्वात् । मोक्षाख्यं विष्णुपदं न समारोढुमर्हम्, तस्य, ब्रह्मरूपत्वेन सर्वत्र वावस्थितत्वात् । प्राणानामङ्गाभावात् सुतरामुत्त- माङ्गाभावः । प्रजानामुत्तमाङ्ग तु शिर एवं प्रकृत्यात्मकम् । ईश्वरस्य सामर्थ्यमीश्वर एव भवति । शक्त्यपरपर्यायस्य सामर्थ्यस्य शक्तिमदाश्रयत्वाव्यभिचारात् । विषयविधया तु सर्वत्र कार्ये तत्सत्त्वं नोत्तमाङ्ग एव, हीनाङ्गानामपि तत्कार्यत्वात् । ' यदीश्वर- स्यानन्तं सामथ्यं वर्तते तस्मिन् गयशिरसि विष्णुपदे हीश्वरसामर्थ्येऽस्ति इति, तदपि प्रमत्तप्रलपितमेव, वाक्यानां परस्परा- सम्बद्धत्वात् । यदीश्वरस्यानन्त सामथ्यं वर्तते, तस्मिन् विष्णुपदे गयशिरसि हीश्वरसामर्थ्ये किमस्ति? ईश्वरसामर्थ्येऽनन्तं के सामर्थ्य को टुकडो में नहीं बाँटा जा सकता, क्योंकि वह तो दुर्भेद्य हैं, दुर्ज्ञेय है । हिन्दी व्याख्या मे प्रकृति, परमाणु आदि को ईश्वर का सामर्थ्य बताया है, यह भी सर्वथा असंगत है, क्योकि सामर्थ्य तो परमेश्वर की शक्ति है, यह बाहर प्रकृति, परमाणु आदि के रूप मे कैसे रह सकती है? इसीलिये प्रकृति, परमाणु आदि के रूप में स्थित यह सामर्थ्य निराकार होने से पैर के रूप में भी नही देखी जा सकती! त्रेधा पद से तीन प्रकारों का बोध होता है, तीन स्थानो का नही । इसीलिये भारसहित और प्रकाशरहित जगत् को पृथिवी में, परमाणु आदि सूक्ष्म द्रव्यों को अन्तरिक्ष मे तथा प्रकाशमान सूर्य और ज्ञानेन्द्रिय आदि को प्रकाश में स्थापित किया, यह कथन भी निरर्थक है, क्योकि योग्यता के अनुसार जो वस्तु जहाँ सृष्ट हुई, वह वहीं रहेगी ही । इसके लिये पृथिवी प्रभृति में उनकी स्थापना की बात करना व्यर्थ है । मोहसहित ( मूढ) और ज्ञानरहित जो जड जगत् है, वह अन्तरिक्ष अर्थात् पोल के बीच में स्थित है, वह परमाणुमय है, सारे लोक इस अन्तरिक्ष में विद्यमान है, यह कथन भी अपने पहले के कथन के विपरीत है । पहले पृथिवी प्रभृति लोकों में तीन स्थानो पर सब लोको की स्थापना की बात आपने मानी है और अब केवल पृथिवी मे सबकी स्थापना की बात करते है । जीवो को छोड़कर सब कुछ ज्ञान से शून्य ही हैं । उन सबकी अन्तरिक्ष मे रचना की बात आप करते है । यदि वही सब कुछ है तो फिर पहले आपने तीन स्थानों में सबको स्थापित करने की जो बात की, वह व्यर्थ हो जायगी । फिर अन्तरिक्ष भी तो एक लोक ही है, वह अपने में ही, अन्तरिक्ष में ही कैसे रहेगा? इस तरह से तो आत्माश्रयता दोष उठ खडा होगा, क्योकि कोई वस्तु अपने ही अपना आश्रय नही होती, अर्थात् आधाराधेयभाव दो भिन्न वस्तुओं में ही बन सकता है । इसी तरह से तीन प्रकार के जगत् की सृष्टि की बात भी असंगत ही है, क्योकि जगत् के तीन भेद किसी शास्त्र में प्रसिद्ध नही है । साधर्म्य और वैधर्म्य के आधार पर तो इसके अनन्त भेदों का वर्णन नैयायिको ने किया है । मोक्षनामक विष्णुपद पर चढ़ने का कोई प्रसंग म ही नहीं सकता, क्योकि मोक्षपद तो ब्रह्मरूप है और वह सर्वत्र विद्य-मान है । प्राण का जब कोई अंग ही नही है, तब उत्तमाग की स्थिति कैसे बनेगी । प्रजा का उत्तमाग तो शिर माना जाता है, वह प्रकृति स्वरूप कैसे माना जायगा? ईश्वर की सामर्थ्य ईश्वर से अभिन्न ही है । सामर्थ्य शक्ति का ही नाम है । यह शक्तिमान् से कभी अलग नहीं रह सकती । सामर्थ्य के विषय के रूप में विचार किया जाय तो इसकी स्थिति सर्वत्र कार्यरूप में दिखाई पड़ेगी । उस स्थिति मे केवल उत्तमांग में ही नही, किन्तु सभी हीन और उत्तम अंगों में उसकी समान रूप से स्थिति रहेगी । 'यदीश्वरस्य सामर्थ्येऽस्ति' यह तो निरा पागल का प्रलाप है, क्योंकि यह पूरा वाक्य ही परस्पर असंबद्ध है । यदि ईश्वर का अनन्त सामर्थ्य है, तो उस विष्णुपद गय-शिर अर्थात् प्राणों में ईश्वर के सामर्थ्य से क्या बनेगा? ईश्वर के सामर्थ्य में अनन्त सामर्थ्य है, यह वाक्य भी बेतुका है । विष्णुपद में

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१६०६ वेदार्थपारिजातः सामर्थ्यमस्तीत्यपि श्लिष्यते । विष्णुपदे प्रजानां प्राणानां प्रजानामुत्तमाङ्गं प्रकृत्यात्मकं कथ भवति । यथा विष्णुपदे प्राणानां प्रजाना प्रकृत्यात्मकं शिरो भवति, तथैवेश्वरस्य सामर्थ्यरूपं गयशिरः प्रजाप्राणयोरुपरि वर्तत इत्यपि कथमुपपद्यते १ व्याप्यस्य जगतो व्यापके परमेश्वरे वर्तमानत्वादिति हेतुरपि हेत्वाभास एव व्यापके बह्रो वर्तमानस्य दाहकत्वप्रकाशत्वादेर्व्याप्ये धूमेऽसत्त्वात् । पांमुरेऽप्यायनेऽन्तरिक्षे पदं पदनीयं परमाण्वाख्य चक्षुषा न दृश्यत इत्यपि विशृङ्खलमेव । पांसव. परमाणु- संघाताः पादैस्तद्रव्यांशै सूयन्त इत्यपि न सङ्गतम्, परमाणुभिर्द्वयणुकादिक्रमेणावयविन उत्पद्यन्ते, न सङ्घाताः । तथात्वे बोद्धवादापत्ते । न चोत्पन्ना दृश्या भूत्वा सर्वे पदार्था परमेश्वरे शेरते, किन्तु तन्मूलभूता. परमाणवोऽपि तत्रैव शेरते । वस्तुतस्तु स्वयमेव दयानन्दो मन्त्रार्थं निरुतार्थं चाविज्ञाय यत्किञ्चित् प्रलपति । अतएव संस्कृतव्याख्याने किमपि वक्ति, हिन्दी व्याख्याने किमप्यन्यदेव । उपर्युक्तस्याशस्य हिन्दीव्याख्यानम् - 'इसमें तीन प्रकार की रचना दिखलाई है, जिससे मोक्ष पद को प्राप्त होते है, वह ' समारोहण ' कहाता है । सो विष्णुपद गयशिर, अर्थात् प्राणो के परे है, उसको मनुष्य लोग प्राण में स्थिर हो के प्राण से प्रिय अन्तर्यामी को प्राप्त होते है............. क्योकि प्राण का भी प्राण और जीवात्मा में व्याप्त जो परमेश्वर है, उनसे दूर जीव वा जीव से दूर वह कभी नही हो सकता । उसमें से सूक्ष्म जो जगत् का भाग है, सो आँख से दीखने योग्य नही हो सकता' नेदं प्रट्टकं स्वेनैव विहितेन संस्कृतव्याख्यानेन दूरतोऽपि सम्बद्धयते । सायणादिसम्मतोऽर्थस्तु --विष्णुस्त्रिविक्रमावतारं कृत्वा इद विश्वं विचक्रमे विभज्य क्रमते स्म । तदेवोच्यते- त्रेधा पदं निदधे भूमावेक पदमन्तरिक्षे द्वितीयं दिवि तृतीयमिति क्रमादग्नि वायु- सूर्यरूपेण पांसवो भूम्यादिलोकरूपा विद्यन्ते यस्य तत्पांसुरं तस्मिन् पांसुरे अस्य विष्णोः पदे समूढ सम्यगन्तर्भूतं विश्वमिति शेष · । सर्वप्राणिनां भूतेन्द्रियमनोजीव- प्राणरूपी प्रजा का उत्तमाग प्रकृति के रूप में रहता है, यह कैसे बनेगा? इसी तरह से जैसे विष्णुपद में प्राणरूपी प्रजा का प्रकृत्यात्मक शिर होता है, उसी तरह से ईश्वर की सामर्थ्य रूप गयशिर भी प्रजा और प्राण के ऊपर रहता है, यह भी कैसे बनेगा ' व्याप्य जगत् के व्यापक परमेश्वर मे वर्तमान होने से, यह हेतु भी आपका सद्धेतु न होकर हेत्वाभास है, क्योकि व्यापक वह्नि मे वर्तमान दाहकत्व, प्रकाश-कत्व प्रभृति धर्म व्याप्य घूम में नही रहते । उसमें से जो सूक्ष्म जगत् का भाग है, वह आँख से दीखने योग्य नही हो सकता, यह कथन भी निराधार है । परमाणु संघात उसके द्रव्याशो से निकलते है, अर्थात् जब कोई पदार्थ परमाणुओ के सयोग से स्थूल हो जाता है, तभी वह नेत्रों से देखने मे आता है, यह कथन भी सही नही है, क्योकि परमाणुओं से द्व्यणुक प्रभृति के क्रम से अवयवी उत्पन्न होते हैं, संघात नही | संघात की उत्पत्ति मानने पर तो यह बौद्ध सिद्धान्त को मानना पड जायगा, जो कि आपको भी अभीष्ट नही होगा । परमाणुओ से उत्पन्न सघातात्मक सभी पदार्थ दृश्य होकर परमेश्वर में विश्राम लेते हों, ऐसी बात भी नही है, किन्तु इनके मूलभूत परमाणु ही उस परमेश्वर में ही विश्राम ग्रहण करते है । वास्तव मे तो दयानन्द को न तो मन्त्र का ही और न निरुक्त का ही सही अर्थ ज्ञात है, इसीलिये वह सब जगह मनमानी करते रहते हैं । वे संस्कृत व्याख्या में कुछ कहते हैं और हिन्दी व्याख्या में कुछ दूसरा ही । उपर्युक्त अंश की उन्होंने हिन्दी व्याख्या इस तरह से की है--'इसमें तीन प्रकार की रचना दिखलाई गई है, जिससे मोक्षपद को प्राप्त होते हैं, वह ' समारोहण' कहाता है । सो विष्णुपद गयशिर अर्थात् प्राणो के परे है, उसको मनुष्य लोग प्राण में स्थिर होकर प्राण से प्रिय अन्तर्यामी को प्राप्त होते हैं । क्योकि प्राण का भी प्राण और जीवात्मा में व्याप्त जो परमेश्वर है, उससे दूर जीव या जीव से दूर वह कभी नही हो सकता । उसमे से सूक्ष्म जो जगत् का भाग है, सो आँख से दीखने योग्य नही हो सकता' ( १०३४० ) । यह सारी हिन्दी व्याख्या अपने ही की गई संस्कृत व्याख्या से बिलकुल भी संबद्ध नही है । ' इदं विष्णु विचक्रमे' 'इस मन्त्र का सायण प्रभृति आचार्यों ने अर्थ इस तरह से किया है-- त्रिविक्रम अवतार धारण करके विष्णु ने इस जगत् को तीन भागों में बांट कर आक्रान्त कर लिया है, अर्थात् तीन डगों से नाप लिया है । उसने पहला पग भूमि पर, दूसरा डग अन्तरिक्ष में और तीसरा पैर आकाश में रक्खा । अर्थात् वह विष्णु अग्नि, वायु और सूर्य के रूप में इन तीनों लोकों में व्याप्त हैं । ये भूमि प्रभृति तीन लोक जिसके धूल भरे पग में लगे हुए है, इसीलिये वह सारा विश्व इस विष्णु के पद में भलीभांति

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वेदार्थपारिजातः १६०७ भावेनाविशतीति विष्णुः सर्वव्यापकः परमेश्वर एवं त्रिविक्रमावतारेण विश्व विचक्रमे । निर्गुणाभिप्रायेण त्वयमर्थः - अस्य विष्णोः पदं पद्यते ज्ञायत इति पदम् अद्वैताख्य स्वरूप समूढमन्तर्हितमज्ञातमकृतात्मभिः । कस्मिन्निव पासुरे ( लुप्तोपमानम् ) पांसुले रजस्वले प्रदेशे निहित यथा न ज्ञायते, तद्वत् । 'तद्विष्णो. परमं पद सदा पश्यन्ति सूरय.' ( वा० सं ० ६।५ ) इति मन्त्रवर्णात् । निरुक्तदृष्ट्या त्वयमर्थः -विष्णुरादित्य इद विविधविभागेनावस्थितं जगद्विक्रमते अधितिष्ठति । कथमित्यत आह -त्रेधा निदधे पदम् । त्रेधा पद निधत्ते । क्व? तत्र पृथिव्यामन्तरिक्षे दिवीति शाकपूणिः । पार्थिवोऽग्निर्भूत्वा पृथिव्या यत्किञ्चिदस्ति तद्विक्रमतेऽधितिष्ठति, विद्युद् भूत्वाऽन्तरिक्षे, सूर्यो भूत्वा दिवि सर्वमधितिष्ठति । समारोहण उदयगिरावुद्यन् एक पद निधत्ते । विष्णुपदे मध्यन्दिनेऽन्तरिक्षे गयशिरसि अस्तङ्गिरा इत्यौर्णवाभः । यास्काचार्यस्तु समूढमस्य पासुरे अस्मिन्नप्यायने सर्वसमृद्धिहेतुभूतेऽन्तरिक्षे यन्मध्यन्दिनं पदं विद्युदाख्य तत् समूढमन्तर्हित न नित्यं दृश्यते । तदुक्तम् - 'स्वयनमेतन्मध्यम ज्योतिरनित्यदर्शनम्' ( नि० ५/३ ) । तद्यदष्टो मासान् माध्यमिक ज्योतिनं दृश्यते, तस्मादनित्यदर्शनात् स्वयनमित्युच्यते । अपि वोपमार्थे स्यात् । समूढमिव पासुरे यथा पासुले प्रदेशे पदं न्यस्तमुत्क्षेपणसमनन्तरमेव पासुभिः , नावतिष्ठत इत्यर्थं । पासुर इति कीर्णत्वान्न दृश्यते, एवमस्य मध्यमविद्युदाख्य पदमापदमात्रिष्कृतिसमकालमेवत्रिष्कृति समकालमेव व्यवधीयते रो मत्वर्थः । अथ पासवः कस्मात्? ते हि पादैः सूयन्ते जन्यन्त इत्यर्थः । अथवा पन्ना पदाघातेनाधःपतिताः, पन्नं च्युत गलितमिति 1। शेरते । अथवा पिशनीया ध्वमनोया ध्वसनाहस्ते भवन्ति, तदाकीर्णस्य दुर्दर्शत्वात् । एवं नैरुक्तार्थे सत्यपि नहि नैरुक्त एवार्थी ग्राह्य इति राजाज्ञास्ति, निरुक्तकारण यास्काचार्येणापि तत्र तत्र याज्ञिकैतिहासिकार्थानामपि वर्णनात् । छिपा हुआ है । सभी प्राणियों में पंच महाभूत, इन्द्रिय, प्राण आदि जीवनदायिनी शक्तियो के रूप में यह विष्णु व्याप्त है । इसलिय यह सर्वव्यापक परमेश्वर ही त्रिविक्रम अबतार धारण कर सारे विश्व को नाप लेता है । मन्त्र का निर्गुण ब्रह्मपरक अर्थ इस प्रकार किया जाता है— इस परब्रह्म परमात्मा का अद्वैतमय स्वरूप अज्ञ जनो के लिये सदा अज्ञात ही रहता है । यह अद्वय स्वरूप अज्ञ जनों के लिये उसी प्रकार अज्ञात रहता है, जैसे कि धूल में छिपाई गई वस्तु भूल जाने पर मिल नही पाती । मन्त्र मे बताया भी गया है कि उस परब्रह्म परमात्मा के परम पद को विद्वान् मनुष्य ही जान पाते है । निरुक्त की दृष्टि से इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार होगा विष्णु अर्थात् आदित्य ( सूर्य) इस विविध रूपों में विभक्त जगत् का अधिष्ठाता है, क्योकि यह तीन तरह से अपने पैर रखता है । शाक- पूणि आचार्य के मत के अनुसार यह पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश में अपने पैर जमाता है । लौकिक अग्नि के रूप में यह पृथिवी मे जो कुछ भी है, उसका अधिष्ठाता बन जाता है । इसी तरह से विद्युत् के रूप मे अन्तरिक्ष में और सूर्य के रूप मे द्युलोक मे यह सभी पदार्थों का अधिष्ठाता बन जाता है । जब यह सूर्य उदयगिरि पर चढता है, तब वह पहला पैर रखता है, मध्याह्न में यह दूसरा पैर विष्णुपद मे, अर्थात् अन्तरिक्ष में रखता है और सायकाल गयशिरस् में अर्थात् द्युलोक में तीसरा पैर रखता है, यह व्याख्या और्ण- बाभ ऋषि के अनुसार है । यास्काचार्य इसका अर्थ यह करते है कि इस सबकी समृद्धि के कारणभूत अन्तरिक्ष मे जो मध्यन्दिन पद विद्युत् के रूप में वर्तमान है, वह छिपा रहता है, सदा नही दिखाई पड़ता । कहा भी गया है कि यह अन्तरिक्ष में विद्यमान माध्यमिक ज्योति ( विद्युत्) आठ महीने नही दिखाई पडती । केवल वर्षा ऋतु मे ही दिखाई पडती है । इस तरह से सदा न दिखाई पडने के कारण यह 'स्वयन' कहलाती है । जैसे धूल भरी जगह में पैर रखने पर उसके उठाने के साथ ही वह धूल से भर जाने के कारण नही दिखाई पडता, उसी तरह से यह विद्युत् स्वरूप मध्यम पद भी चमकने के साथ ही लुप्त हो जाता है, थोडी देर के लिये भी टिकता नही । 'पासुर' शब्द मे र प्रत्यय मतुप् के अर्थ में प्रयुक्त है । निरुक्त में पासु शब्द का निर्वचन तीन तरह से किया गया है- धूल की उत्पति पैरो के रखने से होती है, अथवा पैरो के आघात से गिर कर वही लेट जाती है, या यह धूल ध्वंस कर देने ( उड़ा देने ) लायक है, इसलिये कि धूल से भरी वस्तु दिखाई नही पडती । निरुक्त में ये सब अर्थ किये अवश्य गये है, किन्तु यह कोई राजाज्ञा नही है कि सब जगह निरुक्त द्वारा प्रतिपादित अर्थ ही स्वीकार किया जाय । निरुक्तकार यास्काचार्य स्वयं अपने ही अनेक स्थलों पर याज्ञिक, -ऐतिहासिक आदि अर्थों का भी वर्णन करते है । इस बात को हमने देवता तत्त्व का स्वरूप निर्धारण करते समय विस्तार से समझाया है । इस तरह से निरुक्तकार के द्वारा पुराणो का प्रामाण्य स्वीकृत होने से ऐतिहासिक दृष्टि के अनुसार त्रिविक्रम अवतार धारण कर

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 710 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजात १६०८ तच्च देवतानिरूपणप्रसङ्गे उक्तमेव । तस्मात् पुराणाना प्रामाण्यव्यवस्थापनादेतिहासिकरीत्या विष्णुना विश्वं विक्रान्तम् । नैरुतमते विष्णुपदमन्तरिक्षं गयशिरोऽस्ताचलरूपं तावतापि पौराणिकाना रीत्या गयायां विष्णुपदं न!बाध्यते । यथा सूर्यस्येन्द्रत्वेऽपि देवराजस्येन्द्रत्वं न बाध्यते, तद्वत् । यत्तु -'तद्वैतत्सत्यम्' इत्याश्रित्य जल्पितम्, तन्निरर्थकम्, तात्पर्यानवबोधात् । तथा हि--' तद्वैतत्सत्यं बले प्रतिष्ठितम् । प्राणो वै बलम् । तत्प्राणे प्रतिष्ठितम् । तस्मादाहुर्बलं सत्यादोजीयः । इत्येवं वैषा गायत्र्यध्यात्म प्रतिष्ठिता ।' ( श० १४/८/१५/६ ) । सत्यस्यापि स्वातन्त्र्यं वारयति - तदिति । एव त्रिपदा गायत्री अधिदेवते आदित्ये प्रतिष्ठिता । सा चाध्यात्मं चक्षुर्द्वारा प्राणे प्रतिष्ठिता इत्येव प्रणाड्या गायत्र्या सूत्रात्मत्व सिद्धम् | अध्यात्मम् | अध्यात्मे सर्ववेदाद्यात्मके सूत्रात्मभूते प्राणे प्रतिष्ठिता, अतोऽध्यात्मप्राणरूपा सती जगत आत्मा । 'ता हैषा गयास्तत्रे । प्राणा वे गयास्तत्प्राणांस्तत्र । तद्यद्गयास्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम । स यामेवाभूमन्वाहैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते । ' ( श० १४/८/१५/७ ) । इदानी गायत्रीनामनिर्वचनेन तस्या जगज्जीवनहेतुत्वमाह । सैषेश्वरात्मिका गायत्री । गायन्तीति गयाः । तत्रेत्रावती रक्षितवती । प्राणा वागादयो गयाः, शब्दनिष्पत्तिहेतुत्वात् । एव गायत्र्या प्राणजीवनत्वमुक्त्वा तस्या एव ब्राह्मण्यमूलत्वेन स्तुत्यर्थमाह -स आचार्योऽष्टवर्षं माणवकमुपनीय यामम् गायत्रीमेवं पादशोऽर्धर्चशः समस्तां चान्वाह अनुवक्ति ' पच्छोऽर्धर्चशः सर्वा च तृतीयेन सहानुवतयत्' इति गृह्यवाक्यात् ( पारस्करगृ ० सू० २१३ ) । सा माणवकायोपदेष्टव्या प्रसिद्धा एषैवोक्त- जगत्प्राणात्मिका गायत्र्येव नान्येत्यर्थ: । कुत एषा गायत्र्येवेति निश्चयः? इत्यत आह -स गायत्र्युपासक आचार्यः सादरः अन्यस्मै बटवे इमां गायत्रीमन्वाह अनुवक्ति ॥ तस्य प्राणान् सा नरकादिपतनात् यस्मात् त्रायते तस्माद् गायत्र्येवेति निश्चयो नात्र सन्देहः । विष्णु ने इस सारे जगत् को अपने तीन डगो से नाप लिया था । निरुक्त के मत के अनुसार यदि विष्णुपद अन्तरिक्ष का और गयशिर अस्ताचल का वाचक है, तो भी पौराणिक पद्धति से गया स्थान में विद्यमान विष्णुपद का बाघ इससे नही होता, जैसे कि सूर्य को इन्द्र मानने पर भी देवराज को इन्द्र न माना जाय, ऐसा नही होता । ' तत् सत्यम् ० ' ( पृ०३३३ - ३३४ ) इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के वाक्य को उद्धृत कर जो कुछ दयानन्द ने कहा है, वह भी निरर्थक है, वे उसका तात्पर्य हो नही समझ पाये है । इस ब्राह्मण वाक्य का आरंभ 'तद्वैतत् सत्यं बले प्रतिष्ठितम्' इस तरह से होता है । इस ब्राह्मण वाक्य में सत्य की भी स्वतन्त्रता का निषेध किया गया है । सत्य जैसे प्राण मे प्रतिष्ठत है, वैसे ही त्रिपदा गायत्री आदित्य देवता में प्रतिष्ठित है । आध्यात्मिक दृष्टि से चक्षु के द्वारा यह प्राण में प्रतिष्ठित है । इस प्रणाली में गायत्री की सूत्रात्मकता सिद्ध होती है, क्योंकि यह सभी वेदों की आत्मा के रूप में प्राण में प्रतिष्ठित है, अत आध्यात्मिक प्राण रूप में यह सारे जगत् की आत्मा है | ' सा हैषा गयांस्तत्रे' इस अग्रिम शतपथ वाक्य में गायत्री के नाम का निर्वाचन प्रस्तुत करते हुए यह भी बताया गया है कि यह गायत्री ही सारे जगत् के जीवन का कारण है । इस ईश्वरस्वरूपिणी गायत्री का गान होता है, अतः इसको गया कहा जाता है । गायत्री का गान करने वाले की यह रक्षा करती है । वाणी प्रभृति प्राण व्यापार भी गय नाम से कहे जाते हैं, क्योंकि ये शब्द की उत्पत्ति में कारण बनते है । इस तरह से गायत्री को प्राण या जीवन बताने के बाद उसी को ब्राह्मण्य का भी मूल कारण बताते हुए उसकी स्तुति करते हैं - वह आचार्य आठ वर्ष के बटुक को उपवीत धारण कराकर पहले एक पाद, फिर आधी ऋचा और फिर पूरे मन्त्र का उपदेश करता है । पारस्कर गृह्यसूत्र मे भो बताया गया है कि आचार्य पहले गायत्री का एक-एक पाद उपनीत शिष्य को सिखाता है, फिर आधी-आधी ऋचा और अन्त में पूरे मन्त्र को सिखावे । उपनीत माणवक ( बटु ) को जिसका उपदेश किया जाता हैं, वही प्रसिद्ध गायत्रो सारे जगत् की प्राणभूत मानी जाती है, वह कोई दूसरी गायत्री नही है । वह गायत्री ही कैसे हैं? इसके निश्चय के लिये बताया गया है कि वह गायत्री का उपासक आचार्य आदरपूर्वक अपने उपनीत बटु को इस गायत्री का उपदेश करता है । ऐसा करके वह उसके प्राणों को नरक में जाने से बचा लेता है,, इसीलिये इसको गायत्री कहते हैं, इसमें संदेह की कोई बात नही रह जाती ।