वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 711–720

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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वेदार्थपारिजातः १६० ९ अत्र गायत्रीविज्ञानप्रसङ्गे औद्गात्रकरणाद् वागादीनामुद्गातृत्वाद् गयत्वमुक्तम् । तेषा त्राणहेतुत्वात् सूत्रात्म-रूपा सावित्री गायत्री प्रोच्यते । न चैतावता प्रघट्टेन पुराणोक्तगयासुरकथापलाप । प्रत्युत गयाना वागादीनामासुरपाप्म- विद्धत्वादासुरत्व जातम् । हिरण्यगर्भाख्यो मुख्यप्राणरूपो विष्णुस्तेषा पाप्मनोऽपहत्य दिशामन्तं गमयित्वा तेषामग्न्यादि-रूपत्वेन पावनत्व सम्पादितवान् । पुराणेषु तस्या औपनिषद्याः कथाया रूप प्रपञ्चितम् । विष्णुपदाधिष्ठितत्वेनासुरपाप्मविद्ध- गयाना पावनत्व पितृतारकत्वमुक्तम् । , सनातनिभिरप्याचार्यशास्त्रादीनि तीर्थानि स्वीक्रियन्त एव तथापि सरावरादिगताना स्नानघट्टानामपि तीर्थत्व न वार्यते । तथैव पुराणादिप्रामाण्यवशाज्जलस्थलमयान्यपि तीर्थानि नापलपितु शक्यानि । तोर्थमेव प्रायणीयोऽतिरात्र इत्यनेनापि न गाजादितीर्थापलापः सम्भवति ।' अहिसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः' तीर्थेभ्य: शास्त्रानुज्ञाविषयेभ्यो यज्ञादि-भ्योऽन्यत्र सर्वाणि भूतान्यहिंसन् इत्यर्थः । तीर्थं शास्त्रानुज्ञाविषय इति शाङ्करभाष्यम् । यज्ञादिपु विहितानि हिंसनायहसैवेति मन्तव्यम् । अपराधिनामुपरि हिंसनमिति उपरिपदप्रयोगो व्यर्थं एव । ' तस्य तीर्थमेव प्रायणीयोऽतिरात्रः ' इत्यस्य पूर्ण रूपमित्थम्-' समुद्रं वा एते प्रतरन्ति । ये सवत्सराय दीक्षन्ते । तस्य तीर्थमेव प्रायणीयोऽतिरात्रः । तीर्थेन हि प्रस्तान्ति । तद्यत्प्रायणीयमतिरात्रमुपयन्ति । यथा तीर्थेन समुद्र प्रस्नायुः । तादृक् तत् । ' ( श ० १२| २| १ | १ ) इति 1। अत्रोदयनीयातिरात्रप्रसंसा । ' समुद्र वा' एताभिः पञ्चभि. कण्डिकाभि. सवत्सरे समुद्र गायत्री के वैज्ञानिक महत्त्व को स्थापित करने वाले इस प्रकरण मे वाणी प्रभृति को गय नाम से इसलिये अभिहित किया गया है कि ये गायत्री के उद्गाता है, गायक है । वाणी प्रभृति को, जो कि गय नाम से अभिहित है, रक्षक होने से यह गायत्री सूत्र रूप में सावित्री कही जाती है । इस पूरे प्रकरण से प्राणवाचक गय की सिद्धि अवश्य होती है, किन्तु इसमे पुराणो में प्रतिपादित गयासुर की कथा का निषेध नही होता, प्रत्युत बाणी प्रभृति के गय शब्द से अभिहित होने वाले प्राणो की आसुरी पापवृत्ति से घिरे रहने के कारण वे आसुर सृष्टि में परिगणित होगी । हिरण्यगर्भ के नाम से प्रसिद्ध मुख्य प्राण ही विष्णु कहलाता है, वह इन वाणी प्रभृति अवान्तर प्राणो के दुरित का नाश करके उनको इस सासारिक प्रपच से दूर ले जाकर उनको अग्नि प्रभृति आधिदैविक रूप प्रदान कर पवित्र बना देता है, सभी तरह के पापो से मुक्त करा देता है । पुराणो मे इसी औपनिषद कथा को नया रूप दिया गया है कि विष्णु न जहाँ पर गयासुर का वध किया, वह गयानामक तीर्थस्थान विष्णु के चरणो के स्पर्श से पवित्र हो गया है, वहाँ श्राद्ध करने से पितरो के सभी तरह के पाप छूट जाते है और वे शुभ गति को, स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं । सनातनी लोग भी अपने -अपने विषय के आचार्य, शास्त्रो प्रभृति को तीर्थ अवश्य मानते है, किन्तु इससे सरोवर, नदी आदि के तोर पर स्नान के लिये बनाये गये घाटो के अर्थ में तीर्थ पद का प्रयोग निषिद्ध हो गया हो, ऐसा नही माना जाता । इसी तरह से पुराण प्रभृति ग्रन्थो के प्रमाण के आधार पर जल और थलमय तीर्थो का भी अपलाप नही किया जा सकता । 'तीर्थमेव प्राय-णीयोऽतिरात्र ' इत्यादि वचनो से भी गंगा प्रभृति तीर्थो का निषेध नही होता । ' अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तोर्थेभ्य ' इस छान्दोग्य वाक्य में तीर्थ शब्द का अर्थ वेदशास्त्र से अनुज्ञात यज्ञ आदि है । इन यज्ञ आदि कर्मों के अतिरिक्त कही भी प्राणियों की हिंसा नही करनी चाहिये, यह उस श्रुति का अर्थ होता है । शाकरभाष्य में भी यही अर्थ किया गया है । यज्ञ प्रभृति में की गई हिंसा हिंसा नहीं मानी जाती । इसी तरह से अपराधियो की हिंसा करने में भी इस शब्द का प्रयोग उचित नही है, अर्थात् उनकी हिंसा भी हिंसा न कहलाकर यज्ञीय हिंसा के समान एक पुण्य कार्य ही है । ' तस्य तीर्थमेव० ' प्रभृति ब्राह्मण वाक्य को स्वामी दयानन्द ने पूरा इसलिये उद्धृत नही किया है कि कही उनकी पोल न खुल जाय । मूल मे पूरा वाक्य उद्धृत किया जा रहा है । इस वाक्य मे उदयनीय अतिरात्र की प्रशंसा की गई है । इन पांच कण्डिकामो में वर्ष में किसी समय समुद्र प्रतरण उपासना का विधान है | तीर्थ, गाध, अध्युत्तरण, पुन प्रतरण ये सब प्रायणीय प्रभृति के नाम है । २०२

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वेदार्थपारिजातः १६१० प्रतरगोणसनमुच्यते । तीर्थंगाधोद्ध्युत्त रणपुनःप्रतरणानि च प्रायणीयादीनां नामान्येतानि प्रदर्श्यन्ते । उपासनारूपत्वाच्च फलम् । सवत्सरोऽप्यत्र ईदृश एव द्रष्टव्यः । 'प्रस्नान्ति' 'ष्णा शोचे' ( अदादि ४२) इत्येष • प्रपूर्व प्रतरणे वर्तते । प्रतरतीत्यर्थः । प्रम्नायु. प्रतरेयुः । 'गाधमेव प्रतिष्ठा महाव्रतम् । यथोपपक्षदध्न वा कण्ठदन वा यतो विश्रम्यं त्स्नान्ति । तीर्थमेवो. दयनीयोऽतिरात्रः । तीर्थेन हि उत्स्नान्ति । तद् यदुदयनीयमतिरात्रमुपयन्ति । यथा तोर्थेन समुद्रं प्रस्ताय तीर्थेनोत्स्नायु । तादृक् तत् । ' ( श० १२/२/१/५) | उत्स्नान्ति उत्तरन्ति । तेन नात्र प्रसिद्धतीर्थानामपलापो वाक्यार्थो न वा व्यङ्गयोऽर्थः । , -',, ( ), अपि च कोषादौ क्षेत्रादीनामपि तीर्थपदार्थत्वोक्तिः । तथाहि तीर्थं शास्त्रे शास्त्रानुज्ञाविषये अध्वरे यज्ञे क्षेत्र (पुण्यक्षेत्र ), उपाये, नारीरजसि, अवतारे ( जलावतारे ), ऋषिजुष्टाम्बुनि, पात्र ( विद्याया: पात्र ) ' ब्रह्मचारी धनदायी मेधावी श्रोत्रियः प्रियः । विद्यया विद्या यः प्राह तानि तीर्थानि षण्मम ॥, उपाध्याये, गुरो, मन्त्रिणि, सत्रिणि, योनी, दर्शने, निपाने, नद्यवतारप्रदेशे ( घट्टे), उपकूपजलाशये, मद्ये, विप्रे च । तीर्यतेऽनेन तरन्ति वानेनेति तीर्थम् । ' अडगुल्यग्रे देव तीर्थं स्वल्पाङ्गुल्यो- र्मूले कायम् । मध्येऽङ्गुष्ठाङ्गुल्योः पित्र्य मूले ह्यङ्गुष्ठस्य ब्राह्मम् ॥ ' तीर्थं त्रिविधम् जङ्गममानसस्थावरभेदात् । तथाहि- 'ब्राह्मणा जङ्गमं तीर्थं निर्मल सार्वकामिकम् । येषा वाक्योदयेनैव शुद्धयन्ति मलिना जना ॥ ' अगस्तिरुवाच-' शृणुतीर्थानि गदतो मानसानि ममानघे । येषु सम्यङ् नरः स्नात्वा प्रयाति परमा गतिम् ॥ सत्य तीर्थं क्षमा तीर्थ तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः । सर्व- भूतदया तीर्थं सर्वत्रार्जवमेव च ॥ दान तीर्थ दमस्तीर्थं सन्तोषस्तीर्थमुच्यते । ब्रह्मचर्यं पर तीर्थं तीर्थं च प्रियवादिता । ज्ञान तीर्थं धृतिस्तीर्थं पुण्यतीर्थमुदाहृतम् । तीर्थानामपि तत्तीर्थं विशुद्धिर्मनस परा ॥ एतत्ते कथित देवि मानस तीर्थंलक्षणम् । भौमाना- मपि तीर्थानां पुण्यत्वे कारण शृणु ॥ यथा शरीरस्योद्देशाः केचिन्मेध्यतमाः स्मृताः । तथा पृथिव्यामुद्देशाः केचित्पुण्यतमाः उपासना रूप होने से ये ही अतिरात्र याग के फल भी है । संवत्सर भी यहाँ फलस्वरूप ही माना गया है । 'प्रस्तान्ति' पद मे प्र उपसर्ग पूर्वकस्ना धातु प्रतरण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । ' गावमेव प्रतिष्ठा महाव्रतम्' इत्यादि वाक्य मे आये ' उत्स्नान्ति' पद का अर्थ उत्तरण है । इस तरह से इस पूरे प्रकरण में लोक प्रसिद्ध तीर्थो का अपलाप करने वाला न तो कोई वाक्य या पद ही है और न व्यग्यार्थ के माध्यम से ही उनका निषेध किया जा सकता है । कोश प्रभृति ग्रन्थो में क्षेत्र प्रभृति के अर्थ में भी तीर्थ पद का प्रयोग विहित है । जैसे कि तीर्थ शब्द का प्रयोग शास्त्र के लिये, शास्त्र की आज्ञा के लिये, यज्ञ के लिये, पुण्य क्षेत्र के लिये तथा उपाय, स्त्रीरज, जल मे उतरने की सीढी, ऋषि द्वारा स्वीकृत जल और विद्या की पात्रता वाले व्यक्ति के लिये भी होता है । विद्या की पात्रता वाले व्यक्ति ये हैं -ब्रह्मचारी, धन देनेवाला, मेघावी पुरुष, श्रोत्रिय, प्रिय व्यक्ति और एक विद्या के बदले दूसरी विद्या देने वाला । आथर्वण श्रुति के अनुसार ये छः तीर्थ होते है । उपाध्याय, गुरु, मन्त्री, सत्री ( यज्ञकर्ता ), योनि, दर्शन, निपान ( कुँआ या हौज ), नदी आदि का घाट, जलाशय का तीर, मद्य, विप्र (ब्राह्मण) इन सबके लिये भी तीर्थ शब्द का प्रयोग होता है । ' तीर्यतेऽनेन ' अथवा 'तरन्ति अनेन' इन दोनो विग्रहो में तीर्थ शब्द बनता है । अमरकोश में बताया गया है कि अंगुली के अग्रभाग में देव तीर्थ, कानी अंगुली के मूल मे काय तीर्थ, अंगुष्ठ और अगुलियों के बीच मे पित्र्य तीर्थ और अंगुष्ठ के मूल मे ब्राह्म तीर्थ की स्थिति है । तीर्थ तीन तरह के होते हैं -स्थावर, जंगम और मानस । इनमें ब्राह्मण जंगम ( चलता फिरता ) तीर्थ हैं । यह निर्मल तीर्थं सभी कामनाओ को पूरा करने वाला है । इन ब्राह्मणो के मुख से शुभ वाक्य निकलते ही मलिन ( पापी ) आदमी भी पवित्र हो जाते है । मानस तीर्थो का वर्णन करते हुए अगस्ति ऋषि कहते हैं — हे अनघे, अब मैं मानस तीर्थों का वर्णन कर रहा हूँ । उनके नाम तुम सावधानी से सुनो । मनुष्य इन तीर्थों में स्नान करके परम गति को प्राप्त करता है । सत्य बोलना, क्षमा करना, इन्द्रियो को वश में रखना, सब प्राणियो पर दया करना, सबके साथ सीधा-सादा व्यवहार रखना, दान देना, इन्द्रियो को गलत रास्ते पर जाने से रोकना, सन्तोष रखना, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना, सबके साथ मीठी बोली बोलना, ज्ञान और धैर्य का संचय करना, पुण्य कार्य करना --ये सब मानस तीर्थ है । इनमे सबसे बडा जीर्थ मन की परम विशुद्धि (पवित्रता ) है । हे देवि, इस तरह से मैने तुम्हें मानस तीर्थ का लक्षण समझाया है । भौम ( पृथिवी संबन्धी ) संबन्धी तीर्थ क्यों पवित्र होते हैं, इसका कारण भी मै तुम्हें समझा रहा हूँ । जैसे शरीर के कुछ अंग अत्यन्त पवित्र माने जाते हैं, उसी तरह से पृथिवी के भो कुछ स्थान अत्यन्त पवित्र माने गये हैं । भूमि के अद्भुत प्रभाव से तथा सलिल ( जल ) की तेजस्विता के कारण, साथ ही

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वेदार्थपारिजात १६११ स्मृता• ॥ प्रभावादद्भुताद् भूमेः सलिलस्य च तेजसा । परिग्रहान्मुनीना च तीर्थाना पुण्यता स्मृता ॥ तस्माद् भौमेषु तीर्थेषु मानसेषु च नित्यशः । उभयोरपि य. स्वाति स याति परमां गतिम् ॥ ' इति तीर्थागमने दोषो यथा - ' अनुपोष्य त्रिरात्राणि तीर्थान्यनभिगम्य च । अदत्त्वा काञ्चन गाश्च दरिद्रो नाम जायते ॥ ' तीर्थंगमने फलं यथा— अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञेरिष्ट्रा विपुलदक्षिण । न तत्फलमवाप्नोति तीर्थाभिगमनेन यत् ॥ तीर्थान्यनुस्मरन् धीरः श्रद्दधानः समाहितः । कृतपापो विशुद्धथेत किं पुनः शुद्धकर्मकृत् ॥ तिर्यग्योनिं न वै गच्छेत् कुदेशे न च जायते । न दु.खी स्वर्गभागी च मोक्षोपाय च विन्दति ॥ तीर्थफलभागिनो यथा - ' यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसयतम् । विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफल- मश्नुते ॥ प्रतिग्रहादुपावृत्तः सन्तुष्टो येन केनचित् । अहङ्कारविमुक्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥ अदाम्भिको निरारम्भो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय । विमुक्तः सर्वसङ्घर्यः स तीर्थफलमश्नुते ॥ अकोपनोऽमलमतिः सत्यवादी दृढव्रतः । आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफल- मश्नुते || अश्रद्दधानः पापात्मा नास्तिकोऽच्छिन्नसशयः । हेतुनिष्ठश्च पञ्चैते न तीर्थफलभागिनः ।' इति काशीखण्डम् । 'कृते तु पुष्करं तीर्थं त्रेतायां नैमिष तथा । द्वापरे तु कुरुक्षेत्र कलौ गङ्गा समाश्रयेत् ॥ ' इति शब्दचिन्तामणिः । तस्माद् गङ्गादीनि न तीर्थानीति रिक्त वचः । एवं पुराणादिप्रामाण्याद् गङ्गावाराणस्यादिरूपाणि जलस्थलरूपाणि तीर्थान्यपि मनुष्यान् तारयन्त्येव 1। यदुक्तम् —'जलस्थलादीनि नौकादिभिर्याने पद्भ्या बाहुभ्यां च जनास्तरन्ति । तानि च कर्मकारकान्वितानि भवन्ति, करण- सुनियो के द्वारा अपने निवास के रूप मे स्वीकार किये जाने के कारण ये स्थल पवित्र हो जाते है । इस तरह से जो व्यक्ति भूमि सबन्धी तीर्थों में और ऊपर वर्णित मानस तीर्थो मे नित्य स्नान करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है । शास्त्रों में तीर्थयात्रा न करने पर दोष भी बताया गया है -तीन रात्रि तक जो उपवास नही करता, तीर्थयात्रा नही करता, सुवर्ण और गायो का दान नही करता, वह व्यक्ति दूसरे जन्म मे दरिद्र होता है । तीर्थयात्रा का फल इस तरह से वर्णित है - तीर्थयात्रा करने से जो फल मिलता है, वह भारी दक्षिणावाले अग्निष्टोम प्रभृति यज्ञो के अनुष्ठान से भी नही मिलता । घीर व्यक्ति इन तीर्थों का स्मरण करके, इन पर श्रद्धा रखकर, अपने मन को स्थिर रखकर तीर्थयात्रा करता है, तो वह भले ही पाप कर्मों का ही आचरण करता हो, शुद्ध हो जाता है । फिर जो व्यक्ति पुण्यवान् है, उसके लिये कहना ही क्या है? तीर्थयात्रा करनेवाला व्यक्ति कभी तिर्यग् योनि में जन्म नही लेता, कुदेश में पैदा नही होता और वह कभी दुखी नही होता । वह स्वर्ग को प्राप्त करता है और मोक्ष की प्राप्ति के उपाय को भी वह पा लेता है । तीर्थयात्रा का फल इनको मिलता है -' जिसके दोनो हाथ पैर और मन अपने वश में है, जो विद्या, तप और कीर्ति से सम्पन्न है, वही तीर्थयात्रा के फल को प्राप्त करता है । जो किसी से दान नही लेता, जो कुछ मिल जाता है उसी से खुश रहता है, जो अहंकारी नही है, उसीको तीर्थयात्रा का फल मिलता है । जो दम्भ नही करता, बहुत हाथ-पैर नही मारता, थोडा आहार करता है, जितेन्द्रिय है, सभी तरह की आसक्तियो से रहित है, वही तीर्थयात्रा का लाभ उठाता है । जो क्रोधी नही है, निर्मल बुद्धिवाला, सत्यवादी, दृढ़ विश्वासवाला और सभी प्राणियों को अपने ही समान देखनेवाला है, उसी को तीर्थयात्रा फलदायक होती" है । जो श्रद्धा से रहित है, पापी, नास्तिक, संशयालु और मिथ्या तर्कों का सहारा लेनेवाला है, उसको तीर्थयात्रा का फल कभी नही मिलता । ये सब वचन स्कन्दपुराण स्थित काशीखण्ड के है | शब्दचिन्तामणि मे बताया गया है कि सत्ययुग का तीर्थ पुष्कर है, त्रेता का नैमिषारण्य, द्वापर का कुरुक्षेत्र और कलियुग का तीर्थं गंगा है । इन सब प्रमाणो को देखते हुए यह निरी खोखली बात है कि गंगा प्रभृति पवित्र स्थल तीर्थ नही कहलाते । इसी तरह से पुराण प्रभृति ग्रन्थों के आधार पर गंगा, वाराणसी प्रभृति जलमय अथवा स्थलमय तीर्थ भी मनुष्यो को तारने वाले माने जाते हैं । इस विषय मे स्वामी दयानन्द कहते है --' तीर्थ शब्द. करणकारक युक्त लिया जाता है, जो जल या स्थान

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१६१- वेदार्थपारिजातः कारकान्वितानि तु नौकादीनि 1। नैवं जल स्थल च तारकं यदाचिद् भवितुमर्हति तत्र सामर्थ्याभावात् करणकारकव्युत्पत्त्य- भावाञ्च' ( पृ०३३७ ) इति । तदेतद् दृढाज्ञानविजृम्भितम् । यज्ञाचार्यशास्त्रेषु त्वदभिमततीर्थेष्वपि तारकसामर्थ्याभावेना- तीर्थत्वप्रसङ्गात् । यदि तत्र परोपकारज्ञानादिजननद्वारा तारकत्वमभ्युपेयते, तदा तथैव जलस्थलादीनामपि गमनस्नानादिभि. पुण्यजननप्रभावद्वारा तारकत्वोपपत्ते । करणव्युत्पत्त्यैव कारकत्वे नौकावाहनादीनामपि तोर्थत्वापत्ति स्यात् । नौकादिवद्य- ज्ञादीनां तरणसाधनत्वाभावेन तेषामप्यतीर्थत्वापत्तेश्च । वस्तुतस्तु वेदविहितानि यज्ञादिकर्माण्यपि पुण्यजननद्वारैव तारकाणि भवन्ति, तथैव काशीप्रयागपुष्करगङ्गायमुनादीनामपि तोर्थसज्ञाऽक्षुण्णैव । किञ्च, ' आप पुनन्तु पृथिवी पृथ्वी पूता पुनातु माम्' इत्यादिभिरपां पावनत्व प्रसिद्धमेव । गङ्गाजले तु पाश्चात्यैवैज्ञानिकैरपि विविध रोगाणुनाशकत्वमिष्यते । डाक्टर ई० एच० हैकिन्समहाशय, यो ब्रिटिशशासनकाले मध्यप्रान्ते 'केमिकल एग्जामिनर' ( रसायनपरीक्षक ) पदे नियुक्त आसीत् गङ्गाजल परीक्षितवान् । तेन वाराणस्या गङ्गाया पतन्त्यो मलनालिका अनन्तानन्तप्लेगादिभीषण रोगकीटायुक्ता दृष्टा । गङ्गाजले पातानन्तरमेव लुप्यमाना. कीटाणवो दृष्टाः । तेनैकदा गङ्गाजलपूर्णेषु कूपजलपूर्णेषु च काचपात्रेषु विषूचिकाकोटाणवो निक्षिप्ता । षड्ङ्घण्टासमनन्तरमेव गङ्गाजलपात्रगता ., कीटाणवो नष्टा कूपजलपात्रगताश्च वृद्धि गताः । प्रसिद्धो यात्री मार्केटुइन् महाशयः स्वकीये संसारयात्रापुस्तके लिखित- वान् - 'मया गङ्गाजल परीक्षितम् । तत्र रोगाणुनाशिनी शक्तिरस्ति । तत्पानाद् बहवो रोगा नश्यन्ति' इति । डाक्टररिचर्डसन्- ' महाशयेनोक्तं गङ्गानामोच्चारणाद् गङ्गादर्शनाच्च मानव हृदयेषूत्तमप्रभावो भवति । गुड हेल्थ पत्रे मिस्टर सी ० ई० नैल्सन- महाशयस्य कश्चन गङ्गाजलसम्बन्धे लेख: प्रकाशित । तत. 'लीडर', स्टेटसमैन' पत्रयोरपि स लेख उद्धृतः । गङ्गाजलस्य विशेष अधिकरण या कर्मकारक होते हैं, उनमें नाव आदि अथवा हाथ और पैर से तैरते हैं । इससे जल या स्थल कभी तारने वाले नही हो सकते । इसलिये कि यदि जल में हाथ या पैर न चलावे या नौका आदि पर न बैठे, तो कभी नही तर सक्ते । इस युक्ति से काशी, प्रयाग, गंगा, यमुना, समुद्र आदि तीर्थ नही सिद्ध हो सकते' ( पृ० ३४२ ) यह कथन भी उनके घोर अज्ञान को ही उजा-गर करता है, क्योकि शास्त्रो मे आपके द्वारा बताये गये ( स्वीकार किये गये ) तीर्थों ( यज्ञ आदि साधनो ) में भी पार पहुँचाने की सामर्थ्य न रहने से इस पद का प्रयोग गलत होने लगेगा । यदि ऐसे स्थलो पर परोपकार और ज्ञान आदि को उत्पत्ति के द्वारा उनकी तारकता मानी जाती है, तो उसी तरह जलमय और स्थलमय तीर्थ स्थानों में स्नान करने से और जाने से पुण्य प्रभाव की उत्पत्ति के द्वारा तारकता स्वीकार की ही जा सकती है । करण व्युत्पत्ति के आधार पर ही यदि कारकता मानी जाय, तब तो नौका अथवा किसी भी वाहन को तीर्थ कहना पडेगा । नौका आदि की तरह यज्ञ आदि में भी तारकता नही देखी जाती, तब उनको भी तीर्थ पवित्र कार्य ) की कोटि से हटा देना पडेगा । वास्तव मे तो जैसे वेद विहित यज्ञ प्रभृति पवित्र कर्म पुण्य को उत्पन्न करके कर्ता को तारते हैं, उसी तरह से काशी, प्रयाग, गंगा, यमुना प्रभृति पुण्य स्थलो की यात्रा से भी पुण्य उत्पन्न होता है और मनुष्य आवागमन के क्रम से छुटकारा पाता है, अत इनको तीर्थ नाम से पुकारने में कोई दोष नहीं है । 'आप, पुनस्तु०' प्रभृति मन्त्रो मे जल को पवित्र माना हो गया है । गंगाजल में तो पाश्चात्य वैज्ञानिको ने भी विविध रोगो के कीटाणुओं को नष्ट कर देने की शक्ति मानी है । डाक्टर ई० एच० हैकिन्स महाशय ने ( जो कि ब्रिटिश शासन काल में मध्य प्रान्त में रासायनिक परीक्षक ( केमिकल एग्जामिनर ) ये गंगा जल की परीक्षा की थी । उसने देखा कि वाराणसी में गंगा में गिरने वाले गन्दे नाले-नालियों में हजारो-हजार प्लेग प्रभृति भीषण रोगो के कीटाणु विद्यमान थे, किन्तु गंगा के जल में गिरने के बाद ये सब कीटाणु अपने आप नष्ट हो गये । उसने एक बार गंगा जल से भरे हुए और कुएँ के जल से भरे हुए काच के बर्तनो मे हैजे के कीटाणु डाल दिये । छः घंटे के बाद गंगाजल में गिराये गये कीटाणु नष्ट हो गये और कुएँ के गिराये गये कीटाणुओं की सख्या वढ गई । इसी तरह से प्रसिद्ध यात्री मार्क-टुइन ने अपनी संसार यात्रा का विवरण देने बाली पुस्तक में लिखा है कि मैने गंगा जल की परीक्षा की है, उसमें रोगाणुओं को नष्ट कर देने की शक्ति है । उसके पीने से बहुत से रोग नष्ट हो जाते है । डाक्टर रिचर्डसन् महाशय ने कहा है कि गंगा का नाम लेने से और उसका दर्शन करने से मनुष्यों के हृदय पर अच्छा प्रभाव पडता है । मिस्टर सी० ई० नेल्सन महाशय ने ' गुड हेल्थ' नामक पत्र मे गंगा

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वेदार्थपारिजात १६१३ पावित्र्य सर्वमान्यम् । अत्र विपूचिकापाकव्रणादिनाशिन्यो विलक्षणा. शक्तय सन्ति । ताम्रपात्रे रक्षित गङ्गाजलमनेकवर्ष- पर्यन्तमपि न विकृतिमुपैति । अन्यजलेषु शीघ्रमेव विकारो जायत इति प्रत्यक्षमेव । तत एव ' इम मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि' (ऋ० स० १०/७५/५ ) इति मन्त्रे गङ्गा संस्तुता । 'सितासितं सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुताम दिवमुपतन्ति । ये वै तन्व विसृजन्ति धीरास्ते जनासोऽमृतत्वं भजन्ते ॥ ( ऋ० सं ० ) इति मन्त्रे गङ्गायमुनयो सङ्गमस्तानेन स्वर्ग- प्राप्तिरुक्ता । 'स्रोतसामस्मि जाह्नवी' इति गीतयापि गङ्गाया भगवद्विभूतिरूपत्वमुक्तम् । वाल्मीकीये रामायणे सीतयापि गङ्गापूजन कृतम् । चरकसहितायामपि गङ्गाजल पथ्यमुक्तम् । पुराणेतिहासादिप्रमाणतो वेदशास्त्रानुयायिनामनादिकालात् पौर्णमास्या हरिद्वार- कनखल-प्रयाग-वाराणसी -गङ्गासागरादिस्थानेषु गङ्गा नानसमारोहदर्शनाद् वीतरागाणा ब्रह्मविद्वरिष्ठानां नि सङ्गानां गङ्गाश्रयणदर्शनाच्च लोकोत्तर गङ्गादिमाहात्म्यं प्रत्येतव्यम् । इदानी कुम्भाद्यवसरेषु सामाजिका अपि हरिद्वार- प्रयागादिषु यान्ति, प्रचारशिबिराणि च सयोजयन्ति । यदि ते गङ्गादीना तारकत्वं पापनाशकत्व नाभ्युपयन्ति, तर्हि कर्म- नाशादिषु कथ न यान्ति स्नान्ति च । साक्षात्तारकत्व ब्रह्मात्मसाक्षात्कार एवास्ति । पारम्पर्येण तु देवविप्रसद्गुरुशास्त्रादिषु यथा तारकत्वम्, तथैव तपोवज्ञदानादिसत्कर्मसु गङ्गा-प्रयाग-पुष्करादिजलस्थलतीर्थेष्वप्यस्त्येव तारकत्वम् । -- यत्तूक्तम् - 'इडा -पिङ्गला-सुषुम्णा- कूर्मनाड्यादीना गङ्गादिसज्ञास्तीति । तासा योगसमाधौ परमेश्वरस्य ग्रह- णात्' ( पृ ० ३३८ ) इति, तत्तुच्छस्, प्रसिद्धार्थपरित्यागेऽप्रसिद्धार्थग्रहणे च मानाभावात् । तासा योगसमाधी परमेश्वरस्य ग्रहणादित्यसङ्गतेश्च ॥ तास्वित्यस्यैव साधुत्वात् । किञ्च योगग्रन्थे तु पावनत्वगुणयोगादेवेडादिषु गङ्गादिशब्दप्रयोगः कृतः, अनेकार्थे शक्तिस्वीकारे गौरवात् । किञ्च कुत्र नाड्या गङ्गापदप्रयोग, क्व यमुना, क्व वा सरस्वती । क्व वा शुतुद्रि इति वक्तव्यम्, यथेच्छप्रयोगेऽव्यवस्थायाति । तस्मात् प्रसिद्धनदीषु गङ्गादिप्रयागदर्शनान्नदीवाचकान्येव गङ्गादिपदानि मुख्यानि, जल के सम्बन्ध मे एक लेख छपवाया था । इम लेख को बाद मे लीडर और स्टेट्समैन ने जो उद्धृत किया था । गंगा जल की पवित्रता को सब कोई स्वीकार करते है । इसमे हैना, कोढ प्रभृति रोगो के जीवाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत शक्ति है । तांबे के बर्तन में रखा गया गंगा जल अनेक वर्षो तक नहीं बिगडता । दूसरे जल शीघ्र ही विकृत हो जाते हैं, यह प्रत्यक्ष ही देखा जाता है । इसीलिये ' इमं मे गङ्गे० ' प्रभृति मन्त्र में गङ्गा की स्तुति की गई है । सितासिते सरिते ० ' प्रभृति मन्त्र मे गङ्गा और यमुना के सङ्गम मे स्नान करने से स्वर्ग की प्राप्ति की बात कही गई है । गीता के विभूति अध्याय में नदियो मे जाह्नवी ( गङ्गा ) को भगवान् की विभूति बताया गया है । वाल्मीकि रामायण में सीता के भी गङ्गा के पूजन करने का वर्णन है । चरक संहिता में भी गङ्गा जल को पथ्य माना हैं । पुराण, इतिहास आदि ग्रन्थो के प्रमाण पर वेद शास्त्रो के अनुयायी अनादि काल से पूर्णमासी के दिन हरिद्वार, कनखल, प्रयाग, वाराणसी, गङ्गासागर प्रभृति स्थानो मे बड़े समारोह के साथ गङ्गा स्नान करते देखे गये है, बडे बडे ब्रह्मवेत्ता, वीतराग, सभी तरह के ससार के सग ( आसक्ति ) से रहित महात्मा भी गङ्गा के तीर का सहारा लेते देखे गये है । इन्ही सब कारणो से गङ्गा का लोकोत्तर माहात्म्य प्रतीत होता है । आज कल कुम्भस्नान आदि के अवसरो पर आर्यसमाजी भी हरद्वार, प्रयाग आदि तीर्थ स्थानों में जाते है और अपने मत का प्रचार करने के लिये शिबिर लगाते है । यदि वे गङ्गा प्रभृति को तारक और पापनाशक नही मानते तो तो फिर वे कर्मनाशा प्रभृति नदियों के किनारे अपना शिबिर क्यों नही लगाते? और उनमे स्नान क्यो नही करते / साक्षात् तारकता यद्यपि ब्रह्मात्मसाक्षात्कार में ही मानी जाती, किन्तु देव, ब्राह्मण, सद्गुरु, सच्छास्त्र आदि मे जैसे परम्परया तारकता मानी जाती है, उसी भाँति तप, यज्ञ, दान प्रभृति सत्कर्मों में और गङ्गा, यमुना, पुष्कर प्रभृति तीर्थो मे भी तारकता विद्यमान है । स्वामी दयानन्द आगे कहते हैं कि 'इम मे गङ्गे०' प्रभूति मन्त्र में गङ्गा प्रभृति पद इडा पिंगला, सुषुम्णा, कूर्म और जठराग्नि की नाडियो के है । इनमें योगाभ्यास से परमेश्वर की उपासना करने से मनुष्य सब दुखों से तर जाते हैं' ( पृ० ३४२ ), किन्तु यह कथन एक दम निराधार है, क्योकि इस तरह से गङ्गा प्रभृति का प्रसिद्ध अर्थ छोडकर अप्रसिद्ध अर्थ करने में कोई प्रमाण आपके पास नही है । इनकी योग समाधि में परमेश्वर का साक्षात्कार होने की बात भी गलत है, क्योकि इन नाडियो में समाधि का अभ्यास किया जाता है, अतः यहाँ षष्ठी विभक्ति का प्रयोग न कर सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होना चाहिये । योगाशास्त्र के ग्रन्थो मे

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वेदार्थपारिजातः १६१४ अन्यत्र तु गौणान्येव । यत्तु -' नहीद नदीपद भूमिस्थजलधारावाचकमेव' ( ३३८ पृ० टि० ) इति, तत्तुच्छम्, अन्यत्र नदीपद- प्रयोगाप्रसिद्धे । यदुक्त टिप्पण्याम्- 'वैदिकपदानां यौगिकत्वात्' इति, तदपि तुच्छम् नहि गोतक्षपरिव्राजकशब्दाना यौगिकार्थत्वेऽपि सर्वत्र गमनशीलतक्षणादिकार्यरतेषु प्रयोगः सम्भवति । तस्मादकामेनापि योगरूढत्वमेवाभ्युपेतव्यम् । अर्थ-निश्चयायोपक्रमोपसहारादिव्यवस्था सामाजिकैर्नहि सूक्तेष्वङ्गीक्रियते । नहि किरणमेघादिपदार्थेषु धाराशब्दप्रयोग. क्वचन दृश्यते । गङ्गायमुनयोः सङ्गममधिकृत्य यदुक्तम्- 'नैव तत्राप्लुत्य स्नान कृत्वा दिव द्योतनात्मक परमेश्वरं सूर्यलोकं वोत्पतन्ति गच्छन्ति, किन्तु पुनः स्वकीयं स्वकीय गृहमागच्छन्ति' ( पृ ० ३३८ ) इति, तत्तुच्छम्, ' वारिदस्तृप्तिमाप्नोति' इति- वत् कार्यकारणभावबोधने वाक्यस्य तात्पर्यात् । यथा नहि वारिदस्तत्कालमेव तृप्तिमाप्नोति, ' अग्निहोत्र जुहुयात् स्वर्गकाम ' इत्युक्त्याऽग्निहोत्रहोमानन्तरमेव स्वर्गमवाप्नोति, किन्तु यथा देहपातानन्तरमेव स्वर्गादिप्राप्तिस्तत्रेष्यते, तथैव प्रकृतेऽपि बोध्यम् । यत्तु -' सितशब्देनेडाया असितशब्देन पिङ्गलायाश्च ग्रहणम् । यत्रैतयोर्नाड्योः सुषुम्णाया समागमो मेलन भवति, तत्र कृतस्नाना. परमयोगिनो दिव प्राप्नुवन्ति' ( पृ० ३३८ ) इति, तदपि निर्मूलम्, सितासितशब्दयोः श्वेतकृष्णवर्णयोः प्रसिद्धावपि ' सरिते' इति विशेष्यपदोपादानाद् गङ्गायमुनयोरर्थयोस्तयोर्ग्रहणेऽपीडापिङ्गलयोस्तयोरर्थयोर्ग्रहणे मानाभावात् । नहि ते नाड्यौ सितासिते स्त इत्यत्र मानमस्ति । न वात्र यौगिकोऽर्थस्तथाविधः सम्भवति, ( षिञ् बन्धने ) इत्यस्य धातो- गङ्गा प्रभृति नदियो की तरह ही इन नाड़ियों मे भी पावनता गुण की विद्यमानता के कारण गौण प्रयोग किया गया है, क्योकि पद भी अनेक अथो में मुख्य वृत्ति मानने पर गौरव दोष आता है । फिर आप यह नहीं बता सकते कि किस नाडी के लिये गङ्गा पद का, किसके लिये यमुना पद का और किसके लिये सरस्वती और शुतुद्रि पद का प्रयोग किया गया है । मनमाना प्रयोग करने पर तो अव्य-वस्था हो जायगी । इन सब बातो को देखते हुए यही मानना पडेगा कि प्रसिद्ध नदियो में ही गङ्गा प्रभृति पदो का मुख्य प्रयोग होने से वही इनका मुख्य अर्थ है और अन्यत्र नाडी आदि में इनका प्रयोग गौण रूप से किया जाता है । पृ ० ३३८ की टिप्पणी में कहा गया है कि यहाँ नदी पद का प्रयोग भूमि पर बहती हुई जल धारा के लिये नही किया गया है, किन्तु यह कथन भी एकदम निसार है, क्योंकि इसके सिवाय किसी दूसरे अर्थ में नदी शब्द का प्रयोग होता ही नही । टिप्पणी में यह भी कहा गया है कि वैदिक पद यौगिक होते किन्तु यह भी गलत है, क्योंकि गो, तक्षा, परिव्राजक प्रभृति शब्दो को यद्यपि यौगिक माना जाता है, किन्तु उनका प्रयोग सदा चलने वाली आदमी आदि में न होकर इन कार्यों को, गाय लकडी छोलते हुए करने वाले व्यक्तियों में होता है । इस तरह से न चाहते हुए भीआपको शब्दों की योगरूढता माननी पडेगी । सूक्तों के अर्थ का निश्चय करने के लिये उपक्रम, उपसहार प्रभृति लिंगों की व्यवस्था आर्यसमाजी नही स्वीकार करते । किन्तु यह स्पष्ट है कि किरण, मेघ प्रभृति पदार्थों में धारा शब्द का प्रयोग कही नही देखा गया है । गङ्गा और यमुना के संगम प्रयागराज के विषय में कहा गया है-'इस संगम में स्नान करके कोई प्रकाश स्वरूप परमेश्वर अथवा सूर्यलोक मे नही पहुच जाता, किन्तु स्नान करके सब कोई अपने अपने घर हो जाते हैं, किन्तु यह कथन भी बच-कानापन है । ( पितरो को ) 'जल देने वाला तृप्ति प्राप्त करता है' इस वचन मे कार्यकारणभाव को बताना वाक्य का प्रयोजन है । जैसे जल देनेवाला तत्काल तृप्त नही होता, अग्निहोत्र करने के तुरन्त बाद स्वर्ग नही मिल जाता, किन्तु देहपात के बाद ही वह स्वर्ग मे जाता है, उसी तरह से प्रकृत स्थल में भी समझना चाहिये । 'सित शब्द इडा और असित शब्द पिंगला का वाचक है । ये दोनो नाडियाँ जहाँ सुषुम्णा में मिली है, उसमें परम योगी लोग योगाभ्यास से स्नान करके शुद्ध हो जाते हैं । फिर शुद्ध रूप परमेश्वर को प्राप्त होकर सदा आनन्द में रहते है ' ( पृ० ३४२ ) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि सित और असित शब्द यद्यपि शुक्ल और कृष्ण वर्ग के अर्थ में ही प्रसिद्ध है, किन्तु 'सरिते ' इस विशेष्य पद के आधार पर इनसे गङ्गा और यमुना अर्थ का ग्रहण तो हो सकता है, किन्तु इनका इडा और पिंगला अर्थ किसी भी प्रमाण

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वेदार्थपारिजातः १६१५ रर्थाननुगमात् । यदि त्वर्थानुगमेत नाडीना श्वासबन्धनहेतुत्वेन प्रयोगोऽभीष्टश्चेत्तर्ह्य भयत्रापि सिताशब्दप्रयोगापत्ति | सुषुम्ना च स्वतन्त्रा नाडी भवति । नहि तत्रोभयोर्नाड्योः सङ्गमो भवति । नह्य भयोः मङ्गपरूपेण क्वचिदपि सुषुम्णा वर्ण्यते, किन्तु स्वातन्त्र्येणैव । इांस्तु विशेष इडापिङ्गलाभ्यामेकैकनासाछिद्रेण श्वास प्रचलति, सुषुम्नया तुभाभ्यामिति । कथ च तत्र स्नान सम्भवति? अत्रापि नहि सुषुम्णाया सत्तया ज्ञानेन वा परमात्मविज्ञानं परमात्मप्राप्तिर्वा भवति, तथाऽ- दर्शनात् । तथा च गङ्गायमुनयोः समरूपे प्रयागे तु स्नानेन पुण्यमयमदृष्ट जायते । तेन जीवनदशाया पापक्षयेण स्वान्त.- शुद्धिर्भवति । मरणानन्तरं ब्रह्मलोकादिप्राप्तिर्भवति ॥ यत्तु — "सितासितयो. प्रकाशान्धकारयोः सूर्यादिपृथिव्यादिपदार्थयोयंत्र श्वरसामर्थ्ये समागमो भवति, तत्र कृतस्नानास्तद्विज्ञानवन्तो दिवमुत्पतन्ति' ( पृ० ३३८ ) इति, तदपि तुच्छम् असम्भवात् । प्रकाशान्धकारयोर्विरोधेनैकत्र स्थानासम्भवेन सङ्गमासम्भवात् । पृथिव्याश्च सूर्यसम्बन्धदर्शनात् पृथिव्यादेरन्धकाररूपत्वासम्भवाच्च । नह्यन्धकारस्य प्रकाशसापेक्षेण चक्षुषा प्रकाश, प्रकाशे सत्यन्धकारस्य निवृत्ते । पृथिव्यास्तु प्रकाशसापेक्षेणैव चक्षुषा प्रकाशो भवति, न प्रकाशनिरपेक्षेणेति महान् भेद! ईश्वरसामर्थ्ये सूर्यपृथिव्यो. सङ्गमोऽपि न सम्भवति, सामर्थ्यस्यामूर्तत्वेन तत्र तयोरसम्भ- वेन सङ्गमस्याप्यसम्भवात् । कारणदशाया कार्यस्यासत्त्वात् । न च शक्त्यात्मन्यप्यवस्थानं सम्भवति, शक्तेः सामर्थ्यानिति- रिक्तत्वात् । न च तज्ज्ञानेऽपि परमात्मप्राप्ति सम्भवति, ब्रह्मात्मयाथात्म्यज्ञानादेव तत्प्राप्तिश्रवणात् । ' तमेव विदित्वाति- मृत्युमेति नान्य. पन्था विद्यतेऽयनाय' इत्यादिश्रुतिभ्य | परमात्मसामर्थ्यात् सर्वं जगदुत्पद्यत इति ज्ञानस्य श्रुति- के आधार पर नही हो सकता । ये दोनो नाडियां शुक्ल और कृष्ण वर्ण की है, इसम कोई शास्त्रीय वचन प्रमाण रूप में मिलता भी नही है । इस तरह का यौगिक अर्थ भी नही हो सकता । षिञ् धातु बन्धन के अर्थ में प्रयुक्त होता है । सित शब्द को इस धातु से बनाकर ये नाडियाँ भी श्वास को बाँधने वाली है, इस रूप में नाडियो को भी सित कहा जा सकता है, किन्तु उस अवस्था मे इडा और पिंगला दोनो ही नाडियो के लिये 'सिता' शब्द का ही प्रयोग होगा, असिता का नही । फिर सुपुम्ना एक स्वतन्त्र नाडी है । इसमें इडा और पिंगला का सगम नही होता । इस रूप मे सुषुम्णा का वर्णन कही नही मिलता, किन्तु यह सर्वथा एक स्वतन्त्र नाडी मानी जाती है । इनमें विशेषता इतनी ही है कि इडा और पिंगला नाडियो के सहारे एक एक नासिका छिद्र से श्वास चलता है और सुषुम्णा नाडी को सहायता से दोनो नाडियो में इसका समान रूप से संचार होता है । इन नाडियो में स्नान कैसे किया जा सकता है? सुषुम्णा की सत्ता मात्र से या उसका ज्ञान हो जाने मात्र से परमात्मा का ज्ञान अथवा उसकी प्राप्ति नही हो जाती, क्योकि ऐसा देखा नही जाता । गङ्गा औरयमुना के सगम स्थल प्रयाग मे तो स्नान करने से पुण्यमय अदृष्ट पैदा होता है । इससे जब तक मनुष्य जीवित रहता है, उसके पापों के क्षय हो जाने से चित्त की शुद्धि होती है और मृत्यु के बाद ब्रह्मलोक आदि की प्राप्ति होती है । आगे स्वामी दयानन्द लिखते है 'सित और असित, प्रकाश और अन्धकार स्वरूप सूर्य और पृथिवी प्रभृति पदार्थो का जब ईश्वर की सामर्थ्य से संपर्क होता है, तो इस अवस्था में प्रविष्ट व्यक्ति परमेश्वर का साक्षात्कार पाकर आनन्द लोक में प्रविष्ट हो जाते है' किन्तु यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि ऐसा सम्भव नही है । प्रकाश और अन्धकार एक ही जगह नही रहते, उनका संगम कैसे हो सकता है? इसके विपरीत सूर्य और पृथिवी का तो परस्पर संबन्ध बन सकता है । पृथिवी आदि को अन्धकार रूप माना भी नही जाता । प्रकाश की सहायता से चक्षु अन्धकार को प्रकाशित नही कर सकता, क्योकि प्रकाश होने पर वो अन्धकार दूर हो जायगा । इसके विपरीत पृथिवी तो प्रकाश की सहायता लेकर चक्षु से प्रकाशित होती है, बिना प्रकाश की सहायता लिये नहीं । इस तरह से भी अन्धकार और पृथिवी मे बड़ा अन्तर है । ईश्वर की सामर्थ्य में सूर्य और पृथिवी का संगम भी नही हो सकता, क्योकि सामर्थ्य तो अमूर्त पदार्थ है, अतः इसमें सूर्य और पृथिवी जैसे मूर्त पदार्थों का संगम कैसे हो सकता है? कारण दशा मे तो कार्य की सत्ता मानी नही जाती । शक्ति के रूप में भी इनकी सत्ता नही मानी जा सकती, क्योकि शक्ति कोई सामर्थ्य से अतिरिक्त पदार्थ नही है । ईश्वर के सामर्थ्य के ज्ञान से परमात्मा की प्राप्ति नही हो जाती, क्योकि उसकी प्राप्ति तो ब्रह्मात्मतत्त्व के यथावत् ज्ञान से होती है | श्रुति मे बताया गया है कि ब्रह्मात्मतत्त्व को जान करके ही मनुष्य इस संसार से मुक्त हो सकता है, इसके लिये दूसरा कोई मार्ग नही है । परमात्मा की सामर्थ्य से ही सारा जगत् उत्पन्न होता है, इसका ज्ञान भी श्रुति और तर्क की सहायता से ही मिलता

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वेदार्थपारिजात १६१६ युक्तिभ्या सौलभ्यात् । शास्त्रज्ञा अनुमन्तारश्च जानन्त्येवैतत् । ब्रह्मात्मयाथात्म्यसाक्षात्कारस्तु मनननिदिध्यासनसहकृत वेदान्त- श्रवणाद्यभ्याससाध्यः । मूर्तिपूजासमर्थनम् यच्च - 'तन्त्रपुराणादिग्रन्थोक्तस्य नामस्मरणस्य मूर्तिपूजादीनां च मिथ्यात्वम्, वेदादिसत्यग्रन्थे तस्य विधा- नाभावात्' ( पृ ० ३४२ ) इत्युक्तम्, तदपि तुच्छम् शास्त्रानवबोधात् । 'एाश्मानमातिष्ठ अश्मा भवतु ते तनू.' 'विष्णोर्नाम चिद्विवचन' इत्यादिवैदिकवाक्येषु मूर्तिपूजादिविधानदर्शनात् ॥ 'प्रश्नः वेदेषु -- प्रतिमा शब्दोऽस्ति न वा? उत्तरम्--अस्ति । प्र० पुन. किमर्थो निषेध? उ० -नैव प्रति- मार्थेन मूर्तयो गृह्यन्ते । किं तर्हि? परिमाणार्थी गृह्यन्ते ' 'इति स्वोक्तिविरोधस्य स्पष्टमुदीयमानत्वात् । प्रतिपादेन मूर्तिग्रहण न सम्भवति, परिमाण तु बोध्यत इत्यस्यैवार्थस्यास्माद्वाक्यात् प्रतीयमानत्वात् । अतो 'न तस्य प्रतिमा अस्ति' ( वा० सं ० ३२ ३ ) इति मन्त्रे प्रतिमाशब्देन मूर्तिग्रहणं कुर्वाणस्य तस्य कथं न स्वोक्तिविरोध:? मूर्तिपूजानिषेधकवाक्यानुपलम्भाच्च मूर्तिपूजानिषेधोऽप्रामाणिक एव । ' सवत्सरस्य प्रतिमा या त्वा रात्र्युपास्महे । सा न आयुष्मती प्रजा रायस्पोषेण ससृज || ' ( अथर्व० ३ | १०| ३ ) इति मन्त्रस्यैव मूर्तिपूजाप्रतिपादनार्थत्वात् । दयानन्देनेवास्य मन्त्रस्य मूर्तिपूजार्थत्वप्रतिपादनात् । तथाहि मन्त्रस्यास्य दया- नन्दीयोऽर्थ: -' विद्वास. संवत्सरस्य यां प्रतिमा परिमाणमुपासते वयमपि त्वा तामेवोपास्महे ' ( पृ० ३४४ ) इति । अयमभिप्रायः- मूर्तिपूजाऽचेतनत्वादेव मूर्तेर्नाङ्गीक्रियते सामाजिकैः । नित्य चैतन्यस्य विभोः परमात्मन एवोपासनं तैरङ्गीक्रियते । परमस्मिन् है । शास्त्रज्ञ विद्वान् और उनके वचनो का आदर करने वाले इस बात को स्वीकार करते ही है । ब्रह्मात्मतत्त्व का यथार्थ ज्ञान मनन और निदिध्यासन के साथ वेदान्तशास्त्र का निरन्तर श्रवण और अभ्यास करने से ही हो सकता है । मूर्तिपूजा का समर्थन आगे स्वामी दयानन्द ने मूर्तिपूजा और नाम स्मरण आदि को ढोग बताते हुए लिखा है - ' अब इसके आगे जो नवीन कल्पित तन्त्र और पुराण ग्रन्थ हैं, उनमें पत्थर आदि की मूर्तिपूजा तथा नाना प्रकार के नामस्मरण अर्थात् राम-राम, कृष्ण-कृष्ण काष्ठ आदि की माला, तिलक आदि का विधान करके उनको अत्यन्त प्रीति के साथ जो मुक्ति पाने के साधन मान रखे है, ये सब बातें भी मिथ्या ही जाननी चाहिये, क्योकि वेद आदि सत्य ग्रन्थो में इन बातो का कही चिह्न भी नही पाया जाता' ( पृ० ३४५ ), किन्तु यह कथन भी निराधार है । स्वामी दयानन्द शास्त्रो के अभिप्राय को ठीक से समझ नही पाये है । 'एह्यश्मानमातिष्ठ ', 'विष्णोर्नाम चिद्विवक्कन० ' प्रभृति वैदिक वाक्यों में स्पष्ट ही मूर्तिपूजा की विधि निर्दिष्ट है । मूर्तिपूजा को न स्वीकार करना अथवा वेद में प्रतिमा शब्द की सत्ता न मानना दयानन्द के अपने शब्दों से भी विरुद्ध है । उन्होंने इसी प्रकरण में प्रश्न किया है कि ' वेद मे प्रतिमा शब्द है या नहीं? इस प्रश्न का हाँ में उत्तर देकर उन्होंने पुनः प्रश्न किया है तब इसका निषेध आप क्यों करते है? तब वे उत्तर देते हैं कि प्रतिमा शब्द से मूर्ति का ग्रहण नही होता, किन्तु प्रतिमा शब्द यहाँ परिमाण का वाचक है' ( पृ० ३४३ ) उनके इस कथन से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि 'न तस्य प्रतिमा इस मन्त्र मे प्रतिमा शब्द मूर्ति का वाचक न होकर परिमाण का बोधक है । वही व्यक्ति यदि यह कहे कि ' न तस्य प्रतिभा अस्ति ' इस मन्त्र मे प्रतिमा शब्द से मूर्ति का निषेध किया है, तो क्या यह उनकी दोनों बाते परस्पर विरुद्ध नही पड़ेगी? मूर्तिपूजा का निषेध करने वाला कोई भी वाक्य वेद में उपलब्ध नही है, अत · मूर्तिपूजा का खण्डन करना सर्वथा अप्रामाणिक है । 'संवत्सरस्य प्रतिमा० ' प्रभृति मन्त्र भी मूर्तिपूजा का ही प्रतिपादक है । दयानन्द ने स्वयं ही इसकी व्याख्या इस तरह से की है कि उससे यह मन्त्र मूर्तिपूजा का समर्थक हो जाता है । मन्त्र का दयानन्द ने यह अर्थ किया है-' विद्वान् लोग संवत्सर की जिस क्षण आदि काल के विभाग करने वाली रात्रि की उपासना करते है, हम लोग भी उसी का सेवन करे । ' ( पृ० ३४६ ) | इस पर हमारा कहना है कि आर्यसमाजी मूर्तिपूजा को इसलिये नही मानते कि पत्थर की मूर्ति अचेतन है । सदा चैतन्य गुणविशिष्ट

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वेदार्थपारिजात १६१७ मन्त्रे संवत्सरस्य प्रतिमोपासनमङ्गीकृतम् । इदमप्यचेतनास्यैवोपासनम् । परिमाणरूपस्य गुणस्य सर्वेरप्यचेतनत्वाङ्गी- कारात् । संवत्सरोऽपि वर्षपरिमित कालविशेष एव । तन्निष्ठो गुणविशेष एव परिमाणम् । उभावप्यचेतनावेव । यदि पवत्सरकालाधिष्ठात्री काचिचेतना देवतोपास्यत्वेनाङ्गीक्रियते, तदा तवापसिद्धान्त एव स्यात् । संस्कारविधौ च स्वामिना दयानन्देन लिखितम् - ' ओषधे त्रायस्व' भो ओषधे बालं त्रायस्व, 'मैनं हँसी:' एनं मा हिसी: । अत्र कुशरूपौषधि प्रार्थ्यते ( पृ ० ७४) । तृणस्याचेतनत्वात् तत्प्रार्थनं मूर्तिपूजनमेव । ॐ विष्णोदंष्ट्रोऽसि ' मत्र क्षुरस्य विष्णुदष्ट्रात्वमुक्तम् 1। कि निराकारस्यापि दंष्ट्रादिकं भवति? इदमप्यचेतनाचंन मूर्तिपूजनमेव । ॐ शिवो नामासि वधितिस्ते पिता नमस्ते मा मा हिंसीः । हे स्वधिते, हे क्षुर, एनं मा हिसी: ' इति १ ९ ३३ सवत्सरे प्रकाशिते संस्कारविधि- पुस्तके । तद्व्याख्यानं 'हे छुरे, तू इस बच्चे को मत मार' । इदानीन्तनेषु पुस्तकेषु तद्व्याख्यान नोपलभ्यते । मन्ये सिद्धान्त- ङ्गभीत्यैव तदपसारितं सामाजिकैः । तथाप्यन्येरपि सामाजिकेरस्य मन्त्रस्यायमेवार्थो लिखितः । वेदेषु तु -'नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे ' इत्यादिभिर्बहुभिर्मन्त्र विद्युदादीना तदधिष्ठात्रीणां देवतानां मस्कारादिकं दृश्यते । दयानन्देनानि - ॐ प्रतिपदे स्वाहा, ब्रह्मणे स्वाहा, अश्विन्यै स्वाहा, अश्विभ्या स्वाहा' नामकरण- सङ्गे एता आहुत उक्ताः । ' सानुगायेन्द्राय नमः' सानुगाय यमाय नमः, सानुगाय वरुणाय नमः, सानुगाय सोमाय नमः, [रुद्भ्यो नमः, वनस्पतिभ्यो नमः श्रियै नमः, भद्रकाल्यै नमः, एताभ्यो देवताभ्य एकैकग्रासो देयः, इत्युक्तम् । नहि सानुगस्य नुष्यस्यैकग्रासेन तृप्तिः सम्भवति, तस्मान्मनुष्यभिन्ना एव देवा इति तद्रीत्यापि सिद्धयति । सत्यार्थप्रकाशे १०० पृष्ठे ' वास्तु- वित्र व्यापक परमात्मा की ही उपासना का वे विधान करते है । परन्तु इस मन्त्र मे सवत्सर की प्रतिमा की उपासना विहित है । ह भी अचेतन की ही उपासना हुई । परिमाण रूप गुण को सब कोई अचेतन मानते है । संवत्सर भी एक वर्ष के परिमाण वाला ल ही है । उसमें रहने वाला गुणविशेष ही परिमाण है । यह काल और उसमे रहने वाला गुण दोनो अवेतन है । यदि आप संवत्सर काल की अविष्ठात्री किसी चेतन देवता को उपास्य के रूप मे स्वीकार करें, तो यह बात आपके स्वीकृत मत के विरुद्ध ढ़ेगी । इस तरह से अचेतन काल को उपासना का विधान करने वाला उक्त मन्त्र स्वतः मूर्तिपूजा का समर्थक बन ताहै । इतना ही नही, संस्कारविधि में स्वामी दयानन्द स्वयं लिखते है-' औषधे, त्रायस्व' हे औषध, तुम इस बालक की क्षा करो, इसको कुछ भी नुकसान न पहुचावो । यह प्रार्थना कुशा से की जाती है । अचेतन तृण की प्रार्थना करना मूर्तिपूजा ही तो है । विष्णोदंष्ट्रोऽसि' इस मन्त्र मे क्षुर (छुरा) को विष्णु की डाढ बताया गया है । क्या निराकार की भी डाढ हो सकती है? अचेतन रे की प्रार्थना भी मूर्तिपूजा ही तो है । ॐ शिवो नामासि' इस मन्त्र में भी छुरे से प्रार्थना की गई है । संवत् १ ९ ३३ मे प्रकाशित स्कारविधि नामक अपनी पुस्तक में स्वामी दयानन्द ने इसकी व्याख्या की है- 'हे छुरे, तू इस बच्चे को मत मार । आजकल की छपी स्कारविधि की प्रतियो मे यह व्याख्या नही दिखाई पडती । लगता है अपने सिद्धान्त ( मत) के विपरीत इस बात को मानकर ही ार्यसमाजियों ने नये संस्करणो मे से उस व्याख्या को निकाल दिया है । इतने पर भी अन्य आर्यसमाजी विद्वानों ने इसी अर्थ को कार किया है । वेदो में तो 'नमस्ते अस्तु विद्युते ०' इस तरह के मन्त्रो मे विद्युत प्रभृति पदार्थों की अधिष्ठात्री देवताओ को नमस्कार या गया है । स्वयं स्वामी दयानन्द ने भी प्रतिपत्, ब्रह्मा, अश्विनी, अश्विनीकुमार प्रभृति को नामकरण संस्कार के अवसर पर आहूति ने की बात लिखी है और बताया है कि सानुचर इन्द्र, यम, वरुण, सोम, मरुद्गण, आपोदेवता, वनस्पति, श्री, भद्रकाली प्रभृति ताओं के निमित्त एक-एक ग्रास देना चाहिये । अपने अनुचर के साथ कोई भी मनुष्य एक ग्रास से तृप्त नहीं हो सकता । इसलिये तुष्यों से भिन्न देवताओं को सत्ता आपकी ही इस तरह की बातों से सिद्ध हो जाती है । 'सत्यार्थप्रकाश' ( पृ० १०० ) पर 'वास्तुपतये म:' इस मन्त्र का उच्चारण कर एक ग्रास वास्तुदेवता के निमित्त देने की बात लिखी है । आर्यसमाजियो के घर में वास्तुदेवता २०३

पृष्ठ 720

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 720 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजाता १६१८ पतये नमः ' इति मन्त्रमुच्चार्य एक ग्रासो देय इत्युक्तम् । नहि सामाजिकानां गृहेषु वास्तुदेवतानाम्ना कश्चिद् विद्वान् मानवो देवो निवसति, येन तदर्थमेकग्रासो देयः स्यात् । सर्वाभ्यो ब्रह्मादिभ्यस्तीर्थदेवताभ्योऽश्विन्यादिनक्षत्रदेवताभ्यो घृताहुतयो विहिताः । यद्येते देवा मनुष्या एव भवेयुस्तदा तेभ्यः प्रत्यक्षमेव घृतदानविधानं कुर्यात् । यत्तु -'यद्वाचानभ्युदित येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्व विद्धि नेद यदिदमुपासते ॥ ' इति ( सामवेदीयतलव- कारोपनिषदि १1४ ) मन्त्रमुद्धृत्य व्याख्यातम्—' यदसंस्कृतवाण्या अविषयम्, येन वाणी विदितास्ति तद् ब्रह्म हे मनुष्य, त्वं विद्धि । यत इद प्रत्यक्षं जगदस्ति नैवैतद् ब्रह्मास्ति । किन्तु विद्वासो यन्निराकारं सर्वव्यापकमजं सर्वनियन्तृ सच्चिदानन्द- लक्षणं ब्रह्मोपासते, त्वयापि तदेवोपासनीयम्, नेतरदिति' इति, तदपि तुच्छम्, तात्पर्यानवबोधात् । तथाहि -इदन्तास्पदत्वेन ब्रह्मण उपास्यत्वनिषेधापत्तेः । वस्तुतस्तु जातिगुणक्रियास्वरूपसम्बन्धानाश्रित्य शब्दानां प्रवृत्तिर्भवति ब्रह्मण एकत्वान्न तत्र ब्राह्मणत्वादिवज्जात्याश्रयेण शब्दप्रवृत्ति | निर्गुणत्वान्नीलमुत्पलमितिवद् गुणाश्रयेणापि न तत्र शब्दप्रवृत्तिः । निष्क्रियत्वात् पाचको लावक इतिवत् क्रियायोगेनापि नो प्रवृत्तिः । असङ्गत्वाद् धनी गोमानितिवच्च न ब्रह्मणि शब्दप्रवृत्तिः । असङ्गत्वादेव शक्त्या लक्षणया गोण्या वा वृत्त्या न ब्रह्मणि शब्दप्रवृत्तिः सम्भवति । शक्तिरपि सम्बन्धग्रहसापेक्षा । गङ्गायां घोष इत्यादिवत् शक्यार्थसम्बन्धाभावान्न ब्रह्मणि लक्षणयाऽपि शब्दप्रवृत्तिः लक्ष्यमाणशौर्यक्रौर्यादिगुणयोगात् सिंहो देवदत्त इत्यत्र गोण्या वृत्त्या शब्दप्रवृत्तिः । 'असङ्गो नहि सज्जते ' इति श्रुत्या सम्बन्धनिषेधाद् ब्रह्मणः संस्कृताया असंस्कृताया वा वाण्याः सर्वथाऽविषयत्वमेव । 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' ( तै० उ० २।४ ) इत्यादिश्रुतिभिः सर्वथाऽपि ब्रह्मणो नाम का कोई विद्वान् मनुष्य नही रहता, जिसके लिये कि एक ग्रास दिया जाय । ब्रह्मा प्रभृति सभी तीर्थ देवताओं के निमित्त तथा अश्विनी प्रभृति नक्षत्र देवताओं के लिये घृत की आहुतियां देने की बात कही गई है । यदि ये सब देवता विद्वान् मनुष्यों के रूप मे ही स्वीकार किये जाते हैं, तो इनको सीधे घी का दान करने की बात लिखनी चाहिये । आगे स्वामी दयानन्द ने ' यद्वाचानभ्युदितं येन० ' इस सामवेदीय तलवकारोपनिषद् के मन्त्र को उद्धृत कर उसकी व्याख्या इस तरह से की है-'जो कि अविद्यायुक्त वाणी से प्रसिद्ध नही हो सकता, जो सबकी वाणियों को जानता है, हे मनुष्यो! तुम लोग उसीको परमेश्वर जानो, न कि मूर्तिमान् जगत् के पदार्थों को, जो कि उसके बनाये हुए है । अर्थात् निराकार, व्यापक, सब पदार्थो को नियमित करनेवाला और सत्, चित्" आनन्द आदि लक्षणो से युक्त जो ब्रह्म है, उसी की उपासना तुम लोग करो । यह उपनिषत्कार ऋषियों का मत है' ( पृ० ३४६ ), किन्तु यह व्याख्या भी निराधार है । स्वामी जी ने मन्त्र का अभिप्राय ही ठीक से नही समझा है । यदि आपके मत के अनुसार इस मन्त्र का अर्थ किया जाय तो ब्रह्म का इदन्ता पदसे बोध होने के कारण ब्रह्म की भी उपासना निषिद्ध हो जायगी । वास्तव में जाति, गुण, क्रिया स्वरूप सम्बन्धो के सहारे ही शब्दों की प्रवृत्ति होती है । जब ब्रह्म एक है तो उसमें ब्राह्मणत्व प्रभृति की तरह की अनेक व्यक्तियो में रहने वाली कोई जाति नही रहेगी, अतः जाति के सहारे उसमें शब्द की प्रवृत्ति नही होगी । ब्रह्म के निर्गुण होने से 'नीलमुत्पलम्' (नीला कमल ) के समान गुण के सहारे भी शब्द की प्रवृत्ति नही होगी । इसी तरह से निष्क्रिय होने से पाचक, लावक प्रभृति शब्दो के समान क्रिया के सहारे से भी शब्द की प्रवृत्ति नही होगी । असंग होने से धनी, गोमान् प्रभृति शब्दों की तरह से भी ब्रह्म में किसी शब्द की प्रवृत्ति नही होगी । इसीलिये शक्ति, लक्षणा अथवा गौणी वृत्ति से भी ब्रह्म में शब्द की प्रवृत्ति नही होगी, क्योकि शक्ति की प्रवृत्ति संबन्ध का ग्रहण होने पर ही होता है । 'गङ्गायां घोष:' ( गंगा में आभीरों का गाँव है ) इत्यादि लक्षणा वाक्य की तरह ब्रह्म में लक्षणा के द्वारा भी शब्द की प्रवृत्ति नही होगी, क्योकि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध ब्रह्म में प्रवृत्त नही होता । लक्षणा के द्वारा प्रतीत हो रहे शौर्य, क्रौर्य प्रभृति गुणो से संपन्न देवदत्त का बोध 'सिहो देवदत्तः' ( देवदत्त सिंह के समान है ) इस वाक्य से गौणी वृत्ति के सहारे होता है । ब्रह्म मे तो 'असङ्गो नहि सज्जते ' इस तरह की श्रुतियाँ सभी प्रकार के संबन्धों का निषेध कर देती है, अतः ब्रह्म संस्कृत अथवा असंस्कृत किसी भी वाणी का किसी प्रकार से कभी भी विषय नही बन सकता । इसीलिये 'यतो वाचो निर्वतन्ते' प्रभृति श्रुतियां ब्रह्म को सर्वथा वाणी का और मन का भी अगोचर, अविषय मानती है । महात्मा गोस्वामी तुलसीदाप ने भी अपने रामचरित मानस नामक ग्रन्थ में इसी श्रुति को इस तरह से अनूदित किया है- मन समेत