वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 721–730
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 721–730
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वेदार्थपारिजातः १६१ ९ aralsविषयत्वमुक्तम् । महात्मना गोस्वामिना तुलसीदासेनापि रामचरितमानसाख्ये निबन्धे तदेवानुदितम्- 'मन समेत जहँ जाइ न बानी' इति 1। तथात्वे त्वदीयस्य निराकारस्य सगुणस्येवावाग्विषयत्वादनुपास्यत्वापत्तिः । ननु तर्हि - 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' ( भ० गी० १५/१५ ), ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति' ( कठो० २।१५ ), 'तत्वोपनिषद पुरुष पृच्छामि' (बृ० उ०३।९ ।२६ ) इत्यादिभिर्वाचोविषयत्व ब्रह्मणः प्रतिपाद्यते । उपर्युक्तरीत्या सर्वथा वाचोऽ विषयत्वेन वेदानामपि वाग्रूपत्वात् कथ तद्विषयत्वोक्तिः सङ्गच्छते, इति चेन्न, लोकाध्यारोपापोहार्थत्वात् शास्त्रस्योक्तशङ्का- नवकाशात् । तथाहि -'नेति नेति, (वृ ० उ० २| ३| ६ ) अस्थूलमनणु ' ( वृ० ड ० ३८१८) ' अतद्व्यावृत्त्या य चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ' ( शिवमहिम्नस्तोत्रे, श्लो० २), ' निषेधशेषो जयतादशेषः' ( श्रीमद्भागवते ८| ३| ) इत्यादिवचनैरतद्व्यावृत्त्यैव स्वप्रकाशस्य ब्रह्मणः प्रकाशनिपेक्षत्वेन प्रकाशोपपत्तेः । मर्तिपूजानिषेधगन्धोऽपीह वचनेषु नास्ति । वाणी येन विदिता तद्ब्रह्मेत्यपि न सङ्गतम्, वाणीविज्ञानस्य प्रत्यगात्मनिष्ठत्वात् । किं प्रत्यगात्मनो ब्रह्मत्वमभ्युपेयते युष्माभिः? तथाभ्युपगमे सिद्धान्तहानिः । विद्वासो यन्निराकारमित्यादिकं तत्कपोलकल्पितम्, श्रुत्यक्षरासम्बन्धात् । अत एव - प्रतिमानां च भेदक: ', ' देवतान्यभिगच्छेत्तु ', ' देवताभ्यर्चनं चैव', ' देवतानां च कुत्सनम्', ' देवता-यतनानि च', 'देवताना छायोलङ्घननिषेध:', 'प्रदक्षिणानि कुर्वीत देवब्राह्मणसन्निधी ', ' देवतागारभेदकान् ' इत्यादिमनुवचना- नुसारं देवतानां मन्दिराणि देवताना पूजनं च सिद्धयन्ति । देवताना प्रतिमाभेदनेन देवतागारभेदनेन च दण्डनीयता स्मर्यंते । यत्तु विद्वांसो हि देवा इत्यनेन विदुषामेव देवत्वयुक्तम्, तत्तुच्छम्, वचनसहस्रैर्मनुष्यभिन्नाना देवतात्वसाधनात् । देवब्राह्मण- ',जहं जाइ न बानी । इस परिस्थिति में आपके मत से निराकार ब्रह्म जब वाणी का विषय नही है तो इस मन्त्र मे इदं शब्द से बोषित ब्रह्म वाणी का विषय हो जाने से कैसे उपास्य माना जा सकता है? इस पर प्रश्न होता है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वैद्य ', 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति', 'त त्वोपनिषद' पुरुषं पृच्छामि' इत्यादि ,गीता और उपनिषदो के वचनो से ब्रह्म के वाणी का विषय होने की बात सिद्ध होती हैं उक्त रीति से ब्रह्म को सब तरह की वाणी का अविषय माना जाय तो वेद भी तो वाणीमय है, तब ब्रह्म को वेदो से भी व्यवेद्य मानना पडेगा और इन श्रुतियो को अप्रमाण मानना पड जायगा । किन्तु इसका सीधा सा समाधान यह है कि ब्रह्म को वाणी का अविषय बताने वाली श्रुतियो का तात्पर्य इतना ही है कि लौकिक अध्यारोपित और कल्पित धर्मों का ब्रह्म में अभाव है । इस तरह से दानो प्रकार की श्रुतियों में समन्वय स्थापित हो जाता है । इसीलिये ' नेति नेति', ' अस्थूलमनणु' इत्यादि श्रुतिवचनो के आधार पर महिम्नस्तोत्रकार कहते है कि श्रुतियाँ भी ,इस ब्रह्म को बार बार आश्चर्यमय स्वरूप का बताती है और भागवतकार समस्त निषेधो के बाद बचा हुआ स्वरूप ही ब्रह्म है ऐसा कहते है ॥ ब्रह्म स्वयं अपने आप प्रकाशित होता है । अपने प्रकाश के लिये इसको किसी दूसरे प्रकाश को आवश्यकता , 'नही पड़ती इतना ही इन सब श्रुतियो का तात्पर्य है । इसमें र्तिपूजा के निषेध की गन्ध भी नही आती । वाणी जिससे ज्ञात होती है, वह ब्रह्म है' यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि वाणी को जानने का काम जीवात्मा का है । क्या आप ( ), 'प्रत्यगात्मा जीव को ब्रह्म मानते हैं । यदि ऐसा मानेंगे तो यह बात आपके निराकार ब्रह्मबाद के विपरीत पडेगी । विद्वान् , -,जिसको निराकार मानते है इस तरह की व्याख्या केवल दयानन्द की अनोखो कल्पना की हो सूझ बूझ है क्योकि इसका श्रुति के अक्षरों से कोई किसी प्रकार का संबन्ध नहीं है । इसीलिये 'प्रतिमाना च भेदक:', ' देवतान्यभिगच्छेत्तु', ' देवताऽभ्यर्चनं चैव', ' देवताना च कुत्सनम्', 'देवतायतनानि च', 'देवतानां छायोल्लडुवननिषेधः', 'प्रदक्षिणानि कुर्वीत', ' देवतागारभेदकान्' प्रभृति मनुस्मृति के स्वामी दयानन्द द्वारा ( पृ० ३४४) उद्धव वचनो के आधार पर ही देवताओं के मन्दिरों एवं उनकी पूजाविधि की सत्ता सिद्ध हो जाती है । यहाँ स्पष्ट ही देवताओ की प्रतिमा और मन्दिरों के तोड़ने पर दण्ड देने की बात कही गई है । 'विद्वासो हि देवा:' इस श्रुति के आधार पर विद्वान् मनुष्यों को ही देवता मानने की बात भी गलत है । देवता मनुष्य जाति से भिन्न हैं, इसको अनेक प्रमाणों से बताया जा चुका है । 'देवब्राह्मणसंनिधी' इस
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वेदार्थपारिजातः १६२० सन्निधावित्यत्र देवपदप्रयोगे तत्सन्निधो ब्राह्मणपदप्रयोगवैयथ्यं च । त्वद्रीत्या विदुषामेव ब्राह्मणत्वात्, मूर्खाणां च शूद्रत्वात् । सस्कारविधौ १ ९ ४ पृष्ठे तथा सामाजिकाना सन्ध्यायामपि प्राची दिगग्निरधिपतिरित्यादिभिर्मनसेश्वरपरिक्रमणं विहितम् । मूर्तिमन्तरा मानसमपि तत्कथं सम्भवति? उलूखलमुसलाभ्या नैवेद्यनिवेदनं किं मूर्तिपूजन भवति न वा? आर्याभिनये -' वायवायाहि दर्शतेमे सोमा असस्कृता । तेषा पाहि श्रुधी हवम् ॥ ' ( ऋ ० सं ० १ २।१ ) इति मन्त्रेण परेशाय सोमवल्ल्यादिरसः समर्प्यते । 'घृते साता मधुना समज्यता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः! ऊर्जस्वती पयसा पिन्वमानास्मान् सीते पयसाभ्याववृत्स्व ||' ' सब अन्नादि पदार्थो को इच्छा करने वाले विद्वान् मनुष्यो की आज्ञा से प्राप्त हुआ जल वा दुग्ध से पराक्रम सम्बन्धी सीचा वा सेवन किया हुआ पटेला घो तथा सहत वा शक्कर आदि से संयुक्त करो । पटेला हम लोगो को घी आदि पदार्थों से युक्त करेगा इस हेतु से जल से बार बार बर्तावो' अत्र काष्ठपटेला ( येन काष्ठेन विषमा क्षेत्रभूमिः समीक्रियते तत्काष्ठं पटेला वा हेंगा वा कथ्यते ) पूजनं मूर्तिपूजनमेव । सिक्खमतखण्डनप्रसङ्गे दयानन्देन सत्यार्थप्रकाशे स्पष्टमुक्तम् - 'कस्यचिदपि जडस्य समर्थनं शिरोनमनमञ्ज लिबन्धनं मूर्तिपूजनमेव । यदुक्तम् —' सूर्यादिग्रहपीडाशान्तये बालबुद्धिभि: 'आ कृष्णेन रजसा' इत्यादिमन्त्रा गृह्यन्ते । अयमेषां भ्रम एव, कुतस्तत्र तेषामर्थानामग्रहणात् । तद्यथा -आकर्षणानुकर्षण प्रकरणेऽस्य मन्त्रस्यार्थं उक्तः' इति, तदपि तुच्छम् त्वदुक्तस्यार्थस्य तत्रैव खण्डितत्वात् । यदुक्तम्—' इम देवा. ' इति चन्द्रस्य, अग्निर्मूर्धेति मङ्गलस्य, उदबुद्धयस्वाग्ने इति बुधस्य, बृहस्पत इति बृहस्पतेः, शुक्रमन्धस इति शुक्रस्य, शन्नो देवीरिति शनेः, क्यानश्चित्र इति राहोः, केतुं कृण्वन्निति केतोर्मन्त्रा उच्यन्ते । न चैतैमंन्त्रेस्तेषां ग्रहाणां सम्बन्धः । शन्नोदेवीरित्यादी शब्दसादृश्यमात्रादेव शन्यादिग्रहपरत्व मन्त्राणां कल्पितम्' इति, तन्न, वचन में आपके मत के अनुसार तो देव पद का प्रयोग करने के बाद ब्राह्मण पद का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा । क्योकि आपके मत से तो विद्वान् ही ब्राह्मण होते है और शूद्र सूर्ख होते हैं । संस्कारविधि मे तथा आर्यसमाजियों की सन्ध्याविधि में 'प्राची ( पूर्व ) दिक्' प्रभृति मन्त्रो का उच्चारण करते हुए मन से ईश्वर की परिक्रमा करने की बात कही गई है । भगवान् की मूर्ति को माने बिना मानस परिक्रमा भी कैसे हो सकती है? ऊखली और मूसल को नैवेद्य चढाना क्या मूर्तिपूजा नही है? इसी तरह से आर्याभिविनय ग्रन्थ मे 'वायवायाहि० ' प्रभृति मन्त्र का उच्चारण करते हुए परमेश्वर के लिये सोमलता के रस को समर्पित करने की बात कही गई है । 'घृते सीता०' आदि मन्त्र की व्याख्या करते हुए कहा गया है— ' सब अन्न आदि पदार्थो की इच्छा करने वाले विद्वान् मनुष्यो की आज्ञा से प्राप्त हुआ जल वा दुग्ध से पराक्रम सम्बन्धी सीचा वा सेवन किया हुआ पटेला घी तथा सहत वा शक्कर आदि से संयुक्त करो । पटेला हम लोगों को घी आदि पदार्थों से युक्त करेगा, इस हेतु से जल से बार बार बर्तावो' । यहाँ पटेला काठ का बना एक जड़ पदार्थ है, जिससे कि खेत की ऊबड खाबड जमीन को ढेले तोड़ कर बराबर की जाती है । इसी को हेगा भी कहते हैं । इस जड पदार्थ की पूजा आपकी व्याख्या के अनुसार मूर्तिपूजा ही हुई । क्योंकि सिक्ख मत का खण्डन करते समय स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश मे स्पष्ट कहा है कि किसी भी जड पदार्थ के लिये सिर झुकाना, हाथ जोडना आदि मूर्तिपूजा के ही प्रकार है । ग्रहपूजा को असत्य, शास्त्रविरुद्ध सिद्ध करते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं-'इसी प्रकार से अल्प बुद्धि मनुष्यों ने ' आकृष्णेन रजसा० ' इत्यादि मन्त्रो को सूर्य आदि ग्रहों की पीड़ा की शान्ति के लिये ग्रहण किया है । सो उनका केवल भ्रममात्र है । मूल अर्थ से इनका कुछ सम्बन्ध नहीं है, क्योकि सन मन्त्रों में ग्रहपीड़ा निवारण करना, यह अर्थ ही नहीं है । 'आकृष्णेन. ' इस मन्त्र का अर्थ आकर्षणानुकर्षण प्रकरण में लिखा जा चुका है' ( पृ ० ३४८), किन्तु दयानन्द के उस अर्थ का खण्डन हमने उसी प्रकरण में कर दिया है । स्वामी दयानन्द का यह भी कहना है कि 'इमं देवाः' यह मन्त्र चन्द्रमा का 'अग्निर्मूर्धा ' यह मंगल का, 'उद्बुद्धय-' स्वाग्ने' यह बुध का 'बृहस्पते' यह बृहस्पति का, 'शुक्रमन्वस' यह शुक्र का, 'शन्नो देवी: ' यह शनि का 'कया नचित्र' यह राहु का और 'केतुं कृण्वन्' यह मन्त्र केतु का कहा जाता है, किन्तु इन मन्त्रों का इन ग्रहो से कोई सम्बन्ध नही है । 'शन्नो देवीः' प्रभृति मन्त्रों L
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वेदार्थपारिजातः १६२१ दयानन्दं प्रत्येव तथोक्ते सुवचत्वात् । तेनैव ' तरुतारम्' ( ऋ० सं ० १ ११९| १० ) इत्यत्र तारमिति पद दृष्ट्वा ताराख्यं यन्त्रमित्यर्थः कल्पितः । ग्रहाणां पूजनं तु महर्षिभिरुक्तम् - ' ग्रहनक्षत्रचरितैर्वा जनपदा उपध्वंस्यन्ते ' ( चरकसूत्रस्थाने ६।२० ) । ' यस्य वक्रानुवक्रगा ग्रहा गर्हितस्थानगताः पीडयन्ति जन्मक्षं वा स विनश्यति' ( सू० ३२/४ ) एवमुपवेदभूताया सुश्रुतसंहिताया वचनैर्ग्रहपीडा. सूचिता । तेषा शान्त्यर्थं पूजादिकमपि विहितम् । ' शन्नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा । शन्नो मृत्युर्धूमकेतुः' ( अथर्व ० १९ ९| १० ), 'शन्नो दिवि चरा ग्रहाः' ( अथर्व० १ ९ / ९/ ७ ) इत्यादिमन्त्रेष्वपि ग्रहशान्तय उक्ता एव । वेदाङ्गज्योतिषप्रोक्ता ग्रहपूजानि तदङ्गिभूताद्वेदादेवा- गता । यथा -'सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्तसिन्धवः' ( ऋ० सं० ८/ ६९।७२ ) अत्र सप्तनद्य इत्यस्यार्थस्य स्पष्टत्वेऽपि यथा महाभाष्यकारो व्याकरणपरत्वमस्य मन्त्रस्य वक्ति । 'द्वादश प्रधयश्चक्रमेकम्' ( ऋ० स० १।१६४ ४२ ) इति मन्त्रः संवत्सर- कालपर: । 'षष्टिश्च ह वै त्रोणि च शतानि संवत्सरस्याहोरात्रा:' ( नि० ४।२७ ) इति यास्केनापि सवत्सर एवार्थः कृतः । तथापि दयानन्देन सर्वमेतदपरिगणय्य वायुयानपरत्वमस्य मन्त्रस्योक्तम् । तत्र कथ नापत्तिः क्रियते । ' य वै सूर्य स्वर्भानुस्तम- साविध्यदासुरः' ( ऋ ० सं ० ५१४० /९ ) इति मन्त्रे त्वसुरवंशीयेन राहुणा सूर्यग्रहणं स्पष्टमुक्तम् । राहुर्ग्रहविशेष इष्ट एव । दयानन्देनाप्युणादिकोषे ( ११३ ) राहुर्ग्रहविशेष इत्यङ्गीकृतमेव । तेन सत्यार्थप्रकाशेऽपि प्रथमसमुल्लासे नव ग्रहा अङ्गीकृताः । किन्तु तन्नाम्नां परमात्मार्थकत्वमुक्तम् । एव व्युत्पत्तिवशात्तु आर्यसमाजपदस्यापि परमात्मपरत्वं योजयितुं शक्यत एव । उणादिकोषे ११७४ इत्यत्र केतुर्ग्रहः पताका वा, धूमकेतुरुत्पात इति दयानन्देनापि लिखितम् । श्रौतसूत्रगृह्यसूत्रोक्तविनियोगानुसारेणापि मन्त्रार्थो ज्ञातुं योग्य, अर्थानुसारेणैव विनियोगकल्पनात् । क्वचिच्च विनियोगेषु मन्त्राणां मुख्योऽर्थः सर्वथा न घटते । अत एवैकस्य मन्त्रस्यानेकत्र विनियोगा दृश्यन्ते । तत्रैवं सति प्रतिविनियोग- में केवल शब्दो की समानता के आधार पर शनि प्रभृति ग्रहो का इनसे सम्बन्ध स्थापित कर दिया गया है' । किन्तु यह सारा कथन दयानन्द जैसे महात्मा के लिये ही शोभा की बात हो सकती है, क्योकि वे 'तरुतारम्' प्रभृति मन्त्र में तार पद को देखकर कहते है कि वेद मे तार ( टेलिग्राफ ) देने की विधि वर्णित है । इन मन्त्रो से ग्रहो के पूजन की बात को तो प्राचीन ऋषियो ने माना है । चरकसंहिता मे बताया गया है कि 'ग्रहो और नक्षत्रो के प्रभाव से बडे बडे जनपद उजड जाते है । ' जिस व्यक्ति के ग्रह वक्री हो जाते हैं, गर्हित स्थान में आ जाते है, अथवा जन्मनक्षत्र को बुरी दृष्टि से देखने लगते है, तो वह विनष्ट हो जाता है' । यह सुश्रुतसंहिता का वचन है आयुर्वेद को उपवेद माना जाता है । आयुर्वेद की इन प्राचीन संहिताओ में ग्रहपीडा की स्पष्ट सूचना मिलती है । इनकी शान्ति के लिये वहाँ पूजा का भी विधान किया गया है । 'शन्नो ग्रहाः', 'शन्नो दिवि चरा ग्रहा.' प्रभृति अथर्ववेदीय मन्त्रो में भी ग्रहशान्ति की बात कही गई है । वेदाग ज्योतिष नामक ग्रन्थ मे प्रतिपादित ग्रहपूजा वेद से ही ली गई हैं, क्योकि ज्योतिष प्रभृति वेद के षडंग अंगी वेद में प्रतिपादित विषयो के स्पष्टी-करण के लिये भी ऋषियो के द्वारा रचित है । जैसे ' सुदेवो असि' प्रभृति मन्त्र का सात नदियों वाला अर्थ स्पष्ट है, तो भी महाभाष्यकार पतंजलि ने इस मन्त्र की व्याकरण शास्त्रपरक व्याख्या की है । 'द्वादश प्रधयश्चक्रमेकम्' इस ॠग्वेदीय मन्त्र का संवत्सर काल अर्थ किया जाता है और 'षष्टिश्च ह' इत्यादि व्याख्या करके निरुक्तकार यास्क इस मन्त्र के संवत्सरपरक अर्थ को स्पष्ट करते हैं, तो भी स्वामी दयानन्द इन सबकी परवाह न कर इस मन्त्र से वायुयान की सिद्धि करते है । क्या यह आपत्तिजनक बात नही है? ' यं वै सूर्य' प्रभृति ॠग्वेदीय मन्त्र में असुर वंश मे उत्पन्न राहु सूर्यग्रहण का कारण बताया गया है । राहु की ग्रहों में गणना होती है । दयानन्द वे भी उणादिकोष में राहु को एक विशेष ग्रह स्वीकार किया है । उन्होंने सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में भी नौ ग्रह माने हैं, किन्तु उनका वास्तविक अर्थ उन्होंने परमात्मा किया है । इस तरह से व्युत्पत्ति के आधार पर तो ' आर्यसमाज' शब्द को भी किसी तरह से परमात्मा से जोड़ा जा सकता है । उणादिकोष मे तो दयानन्द ने केतु शब्द का अर्थ ग्रह, पताका, धूमकेतु अथवा उत्पात किया है । श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र में बताये गये विनियोग के अनुसार मन्त्र का अर्थ जाना जा सकता है । अर्थ के अनुसार ही मन्त्र का विनियोग किया जाता है । विनियोगो में कही कही मन्त्रो का मुख्य अर्थ पूर्णतः घटित नही होता । इसीलिये एक ही मन्त्र का अनेक
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वेदार्थपारिजात १६२२ मस्यान्येनार्थेन भवितव्यम् । त एते वक्तुरभिप्रायवशाद् अन्यत्वमपि भजन्ते मन्त्राः । नह्येतेषु अर्थस्य इयत्तावधारणमस्ति । महार्था ह्येते दुष्परिज्ञानाश्च । यथाश्वारोहवैशिष्ट्याद् अश्वः साधु साधुतर च वहति, एवमेव वक्तृवैशिष्ट्यात् साधून् साधु- तराश्चार्थान् स्रवन्ति शब्दाः । तस्मादेतेषु यावन्तोऽर्था उपपद्येरन् अधिदेवाध्यात्माधियज्ञाश्रयाः सर्व एव ते योज्या इति 'नात्रापराधोऽस्ति' ( नि० २८ ) इत्यत्र दुर्गाचार्यः । विनियोगविपरीतार्थंकरणादेव दयानन्दभाष्यमनादरणीयं विदुषाम् । गृह्यसूत्रेषु स्मृतिषु शनैश्चरादिग्रहेषु विनियोगदर्शनादेव शन्नो देवीरित्यादिमन्त्राणां शनैश्चरादिग्रहपरत्वमास्थीयते आस्तिकै । : ( ), (,याज्ञवल्क्यस्मृतो आचाराध्याये ग्रहशान्तिप्रकरणे क्रमेण मन्त्राणा विनियोगा उक्ता ॥ १ आकृष्णेन २ इमं देवाः ( ) ( ) ), ( ):, ३ अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत् । ४ उद्बुद्धयस्वेति च ऋचो यथासंख्यं प्रकीर्तिताः ॥ ३०१ ५ बृहस्पते अति यदर्य ( ) ( ):, ( ), ( ) ( ) ६ तथैवान्नात् परिस्रुतः । ७ शन्नो देवी ८ तथा काण्डात् ९ केतु कृण्वन्निमास्तथा ॥ ३०१ इति सूर्यचन्द्र- भोम बुधबृहस्पति शुक्रशनिराहुकेतुनवग्रहाणा मन्त्रा उक्ताः । येन समाधिद्वारा शुक्लयजुर्वेदस्य मन्त्रसहिता ब्राह्मणानि च प्रत्यक्षीकृतानि तेन याज्ञवल्क्येन कि मन्त्राणामर्था न ज्ञायन्ते? वात्स्यायनेन महर्षिणा मन्त्रब्राह्मणानां स्मृतीनां च समान-प्रवक्तृकत्वमुक्तम् — ' द्रष्टृप्रवक्तृसामान्याच्च धर्मशास्त्रस्याप्रामाण्यानुपपत्तिः । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य च' ( गो० सू० ४| १ | ६२ इत्यत्र भाष्यम् ) इति । केचिदृषीणामायुषि सशेरते । तैः ‘ शतं ते अयुतं हायनान् द्वे युगे त्रीणि चत्वारि कृण्मः' ( अथर्व० ८ २२१ ) इति मन्त्रेण सिद्धानि पुरुषाणां चतुर्युगपरिमितान्या- यूषि ज्ञातव्यानि । तादृशमेव दीर्घमायुर्याज्ञवल्क्यस्य । ' मयादित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप' ( म० मा० शा० प० ), '.... ' ( )३१८।२ ततः शतपथं कृत्स्नम् चक्रे सपरिशेष च म० मा० शा० प० ३१८ १६ इति महाभारतवचनात् । शतपथीयचतुर्दशकाण्डेनापि जनकयाज्ञवल्क्यसम्बन्धो ज्ञायते । याज्ञवल्क्यस्मृतावपि - मिथिलास्थः स योगीन्द्रः क्षणं ध्यात्वाऽ- कार्यों में विनियोग देखा जाता है । ऐसा होने पर प्रत्येक विनियोग के अनुसार मन्त्र का अर्थ भी भिन्न हो जायगा । वक्ता के अभिप्राय के भेद से भी मन्त्रों का अर्थ भिन्न हो जाता है । मन्त्रो के अर्थ को सीमित नही किया जा सकता । मन्त्रो के अनेकविध अर्थ होते है । इनको जानना सरल कार्य नही है । जैसे घुडसवार की विशिष्टता के आधार पर एक ही घोडा तेजी और बहुत तेजी से दौडता है, उसी तरह से वक्ता के अभिप्राय की विशिष्टता के आधार पर मन्त्र भी अनेक विशिष्ट अर्थों को अभिव्यक्त करते है । इसलिये इन मन्त्रों के जितने भी देवताश्रयी, ब्रह्माश्रयी और यज्ञाश्रयी अर्थ निकल सकते हो, उन सबकी संगति बैठानी चाहिये | दुर्गाचार्य का कहना है कि ऐसा करने में कोई दोष नही है । विनियोगों के विपरीत अर्थ करने के कारण ही दयानन्द के भाष्य का विद्वानो मे आदर नही है । गृह्यसूत्र और स्मृतियों में शनैश्वर प्रभृति ग्रहों के निमित्त विनियोग होने से ही 'शन्नो देवी:' प्रभृति मन्त्रों का शनैश्वर प्रभृति ग्रहों की पूजा में आस्तिक जन उपयोग करते हैं । याज्ञवल्क्यस्मृति के आचाराध्याय मे ग्रहशान्ति के प्रकरण मे 'आ कृष्णेन' प्रभृति मन्त्रों का सूर्य प्रभृति नव ग्रहों की पूजा में विनियोग बताया गया है । जिस याज्ञवल्क्य ने समाधि अवस्था में शुक्ल यजुर्वेद के मन्त्रसंहिता भाग और ब्राह्मणभाग का प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया, क्या वह मन्त्रों के अर्थ को नहीं जानते थे? महर्षि वात्स्यायन ने मन्त्र, ब्राह्मण और स्मृतियों के प्रवक्ताओं में भेद नही माना है । उनका कहना है कि द्रष्टा और प्रवक्ता ऋषियों की समानता के आधार पर धर्म- शास्त्रो को अप्रमाण नहीं माना जा सकता । जो ऋषि मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग के द्रष्टा और प्रवक्ता है, वे ही इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र के भी उपदेष्टा हैं । कुल लोग ऋषियों की आयु के विषय में सन्देह उठाते है । उनको 'शतं ते' इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्र में बताई गई सिद्ध पुरुषो की चार युग को आयु को याद करना चाहिये । इस तरह की लम्बी आयु वाले ऋषि याज्ञवल्क्य भी थे । महाभारत में याज्ञवल्क्य जनक से कहते हैं कि हे मिथिलेश, मैने यजुर्वेद को भगवान् आदित्य ( सूर्य ) से प्राप्त किया है, वही यह भी बताया गया हैं कि याज्ञवल्क्य ने सम्पूर्ण शतपथ ब्राह्मण की रचना की । शतपथ ब्राह्मण के चौदहवें काण्ड से भी जनक और याज्ञवल्क्य के सम्बन्ध पर प्रकाश पडता हैं । याज्ञवल्क्य स्मृति में भी मिथिला में स्थित योगीन्द्र याज्ञवल्क्य को मुनियो के प्रति बातचीत की चर्चा है । वहीं यह भी कहा गया है कि मैंने भगवान् आदित्य से बृहदारण्यक को प्राप्त किया । इससे स्पष्ट होता है कि शतपथ ब्राह्मण के द्रष्टा याज्ञ-
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वेदार्थपारिजातः १६२३ ब्रवीन्मुनीन्' ( १।२ ) । तत्रैव - 'ज्ञेयं चारण्यकमह यदादित्यादवाप्तवान्' ( याज्ञवल्क्यस्मृति ३। ११० ) एतेन शतपथद्रष्टा याज्ञवल्क्य एव याज्ञवल्क्यस्मृतिप्रणेतेति निश्चीयते । तथा चोक्तमन्त्राणा ग्रहपूजने विनियोग औपयिक एव ॥ एवमेव — 'आकृष्णेनेति तीव्राशोरिम देवा निशाकरम् । अग्निर्मूर्धेति भूसूनो उद्बुध्यस्व बुधस्य च ॥ बृहस्पते अति गुरो: अन्नात्परिस्रुतो भृगोः । शन्नो देवीः शनैर्गन्तुः काण्डात्काण्डात्परस्य च । केतुं कृण्वन्नग्निसूनोः इति मन्त्राः प्रकीर्तिताः ॥ ' ( बृहत्पराशरस्मृति: ९।६६ ) । ' वेदमन्त्रैर्विना कश्चिद् विधिर्नास्ति द्विजन्मनाम्' ( बृ ० पराशरस्मृ० ९।६७ ) । गृह्यसूत्रेषु बोधायनगृह्यसूत्रेऽपि - आसन्येन इत्यादित्याय, अग्निर्मूर्धानमित्यङ्गारकाय, पवश्शुक्राय इति शुक्राय, आप्यायस्वेति सोमाय, उद्बुध्यस्वेति बुधाय, बृहस्पते अति यदर्यो अर्हादिति बृहस्पतये, शन्नो देवीरभीष्टय इति शनैश्चराय, कया नश्चित्र आभुवदति राहवे, केतु कृण्वन्निति केतवे ' ( १/६/२२ ) । किमय बोधायनोऽपि वेदार्थान्न जानाति? अग्निवेश्मगृह्यसूत्रेऽपि द्वितीयाध्याये पञ्चमप्रश्ने ईदृशा एव ग्रहाणा मन्त्र उक्ताः । जैमिनिगृह्यसूत्रेऽपि - आ सत्येनेत्यादित्यम्, अग्निर्मूर्धानं दिव इत्यङ्गारकाय । वैखानसगृह्यसूत्रेऽपि - अथ ग्रहशान्ति व्याख्यास्याम, गृहायत्ता लोकयात्राः, यथाक्रमेण आसत्येन सामो धेनु अग्निर्मूर्धा उद्बुध्यस्व बृहस्पते शुक्र ते अन्यत् शन्नो देवी कया नश्चित्र केतु कृण्वन् ( चतुर्थे प्रश्ने त्रयोदशे खण्डे ) । एव गृह्यसूत्र- काराणां ग्रहेषु मन्त्राणां विनियोगे सत्यपि तदप्रामाण्यकथनं मूर्खजनप्रतारणमेव । मत्स्यपुराणेऽपि - 'आ कृष्णेनेति सूर्याय होम: कार्यो द्विजन्मना । ' ( १ ९ ३| ३३ ), ' आप्यायस्वेति सोमाय मन्त्रेण जुहुयात् पुनः । अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्र इति भौमाय कीर्तयेत् ॥ ' ( १ ९ ३।३४ ), 'अग्ने विवस्वदुषस इति सोमसुताय वै । बृहस्पते परिदीया रथेनेति गुरोर्मतः ॥ ' ( १ ९ ३।३५ ), 'शुक्रं ते अन्यदिति च शुक्रस्यापि निगद्यते । शनैश्चरायेति पुनः शन्नो देवीति होमयेत् ॥ ' ( १९ ३।३६ ), 'कयानश्चित्र आभुवदिति राहोरुदाहृतः । केतु कृण्वन्नपि ब्रूयात् केतूनामपि शान्तये ॥ ' ( १ ९ ३ | ३७ ) । एवमेव भविष्यपुराणेऽपि- 'आकृष्णेनेति मध्यमपर्वद्वितीयभागे २०/६०, इम देवा इति २०/६५, अग्निमीलेति मन्त्रेण २०/७०, उद्बुध्यस्वेति मन्त्रेण २०७४, बृहस्पतय इति मन्त्रेण २०१७८, जयन्नन्नात् परिस्रुतः २०/८४ शन्नो देवीति मन्त्रण २०१८९, केतुं कृण्वन्निति २०१ ९ २, एतेषां प्रमाणानामप्रामाण्यकथन दयानन्दस्य धाष्टर्यमेव । केषाञ्चिन्मन्त्राणां प्रत्यक्षवृत्त्या तथार्थत्वेपि विनियोगानुसारेणार्थो भवति, यथा -' ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठत' इति विनियोगानुसारेणेन्द्रपराया अप्येन्द्रया ऋचो गार्हपत्योऽग्निरर्थो भवत्येव । सूर्यादेवतापरस्यापि मन्त्रस्य विनियोगवशा- वल्क्य ही याज्ञवल्क्य स्मृति के भी प्रणेता है । इस तरह से इस याज्ञवल्क्य स्मृति के प्रमाण पर उक्त मन्त्रो का नवग्रह पूजन मे विनियोग किया जाय, यह उचित ही है । इसी तरह से बृहत्पराशर स्मृति में भी इन्ही मन्त्रो का विनियोग नवग्रहो की पूजा के लिये करते हुए कहा गया है कि बिना वेदमन्त्रो के द्विजाति के यहाँ कोई कार्य नही होता । बोधायन गृह्यसूत्र में भी नवग्रहो की पूजा के लिये विनियुक्त होने वाले इन मन्त्रो का उल्लेख किया गया है । क्या बोधायन भी इन वेद मन्त्रो का अर्थ नही जानते थे? अग्निवेश्य गृह्यसूत्र मे भी दूसरे अध्याय के पंचम प्रश्न में इसी तरह के मन्त्र ग्रहो की पूजा के लिये निर्दिष्ट है । जैमिनि गृह्यसूत्र और वैखानस गृह्यसूत्र में भी ग्रहशान्ति प्रकरण मे सारी लोकयात्रा ग्रहो के अधीन बताते हुए उनकी शान्ति के लिये उक्त मन्त्रो का ही विनियोग किया गया है । इस तरह से जब इतने गृह्यसूत्रकार महर्षिगण ग्रहो की शान्ति के लिये इन मन्त्रो का विनियोग बताते हैं, तो इस बात को अप्रामाणिक कहना केवल भोले-भाले आदमियों को ठगने के लिये ही है । इसी प्रकार मत्स्यपुराण में भी 'आ कृष्णेनेति' इत्यादि श्लोको से इन मन्त्रो का विनियोग नवग्रह की पूजा में बताया गया है । इसी तरह से भविष्यपुराण में भी यह विनियोग लिखा गया है । इन सब प्रमाणों को अप्रमाण मानना दयानन्द की घृष्टता ही कही जायगी । कुछ मन्त्रो का प्रत्यक्षतः वैसा अर्थ न भी हो, तो भी मन्त्रो का अर्थ विनियोग के अनुसार किया जाता है । जैसे कि 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' इस विनियोग के अनुसार इन्द्र देवता का निर्देश करनेवाली ऋचा से गार्हपत्य अग्नि की स्तुति की जाती
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वेदार्थपारिजात १६२४ न्मानुषीवधूपरत्व भवति । अत एव निरुक्त ( २८ )व्याख्याने दुर्गाचार्य: -'तदेवं मन्त्रेषु शब्दगतिविभुत्वादुभयमप्युपपद्यत एव । तद्यथा -दधिक्राव्णो इत्येष मन्त्रोऽग्न्युपस्थानेऽग्निहोत्र दधिभक्षणे, अश्वमेधेऽश्वसन्निधौ पत्नीसंनिवेशे । तत्र वं सति प्रतिविनियोगमस्यान्येनान्येनार्थेन भवितव्यम् । तस्माद् विनियोगानुसारेण ग्रहपरत्वपि मन्त्राणामस्त्येव । आ कृष्णेनेति मन्त्रस्तु सूर्यपर इति प्रत्यक्षवृत्त्यैव सिद्धम् । सविता सूर्यः, हिरण्ययेन रथेनावर्तमानो भ्रमणं कुर्वाणो भुवनानि पश्यन्नायाति । अस्य मन्त्रस्य सविता देवता ततोऽस्याकर्षण मन्त्रत्वकथनं तद्विरुद्धमेव । ' इम देवा विश' इति 'एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना राजा' ( वा० सं० ९१४० ) अस्मिन् मन्त्र ब्राह्मणः क्षत्रियस्य राज्ञोऽभिषेक कुर्वन् प्रजाः प्रबोधयति -वः युष्माकमेष राजा, अस्माकं ब्राह्मणाना तु सोमो राजा सोमशब्देन सोमो रसस्तदधिष्ठातृदेवतचन्द्रोऽपि बोध्यते । ‘ द्विजराजः' ( अमरकोषे १।३।१५ ) | गृह्यसूत्रकारैरयं मन्त्रश्चन्द्रपूजने विनियुक्तः । 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत् पतिः पृथिव्या अयम् । अपांसि रेतासि जिन्वति ॥ ' ( वा० सं ० ३।१२ ) अयं भौममन्त्रः । भौमः पृथिव्या अशोऽभ्युपेयते, भूमेरयं इति व्युत्पत्तेः । पृथिव्या अय पतिः पालकः । अग्निवद्रक्तवर्णत्वाद् अग्निरप्युच्यते । दिव आकाशस्य ककुत् ककुद्वत् प्रधानभूतो ललामरूपो वा । अग्निरूपत्वादेव अपां द्युलोकाद् वृष्टिरूपेण पतन्तीनामपा रेतासि साराणि ब्रीहियवादिरूपेण परिणतानि जिन्वति प्रीणयति वर्धयतीत्यर्थः । यद्वा अपां रेतांसि कारणानि जिन्वति पुष्णाति । ' चलत्यङ्गारके वृष्टिः' इति ज्योतिष- शास्त्रवाक्येनास्यानुकूल्य वृष्टिकारणमपि भवति । उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथामयं च । अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत ॥ ' ( वा० सं ० १५/५४ ) श्रीतविनियोगानुसारी मन्त्रस्यास्यायमर्थ: - हे अग्ने त्वमुद्बुध्यस्व उद्बुद्धो भव । एनं यजमानं प्रतिजागृहि प्रतिदिनं जागरूकं सावधान कुरु । तत इष्टापूर्ते श्रौतस्मार्ते कर्मणी संसृजेथा यजमानेन सह संसृष्टे भवताम् । त्वत्प्रसादाद्यजमान इष्टापूर्ताभ्यां ससृज्यतामित्यर्थः । हे विश्वेदेवा, यूयं कृतेष्टापूर्तो है | इस विनियोग के अनुसार मन्त्र का इन्द्रपरक अर्थ न स्वीकार कर अग्निपरक अर्थ माना जाता है । इसी आधार पर सूर्या नामक देवता के मन्त्र का विनियोग मनुष्य जाति की वधू के लिये किया जाता है । इसीलिये निरुक्त की व्याख्या में दुर्गाचार्य का कहना है कि इस तरह से मन्त्रों में शब्दों की व्यापकता के आधार पर दोनों ही अर्थ संभव हो सकते है । जैसे कि ' दधिक्राव्णो' यह मन्त्र अग्नि के उपस्थान (स्तुति ) के लिये, अग्निहोत्र याग में दधि का भक्षण करने के लिये और अश्वमेघ यज्ञ में यजमान पत्नी के यज्ञीय अश्व के पास शयन करते समय भी विनियुक्त होता है । ऐसा करते समय प्रत्येक विनियोग मे इसका अर्थ भिन्न भिन्न हो जाता है । एवं च विनियोग के अनुसार इन मन्त्रों का विनियोग नवग्रह की पूजा के लिये किया जाय, इसमे कोई आपत्ति की बात नहीं हो सकती । ' आ कृष्णेन ' यह मन्त्र तो प्रत्यक्षतः अपने अर्थ द्वारा2 सूर्य को ही बोधित करता है । सबिता अर्थात् सूर्य अपने सुवर्णमय रथ से घूमता हुआ सारे भुवनो को देखता हुआ आता है । इस मन्त्र का देवता सविता है । अत इस मन्त्र के अर्थ को आकर्षण प्रक्रिया से जोड़ना एकदम विपरीत है । ' इमं देवा... एषवोऽमी ' इस मन्त्र में ब्राह्मण क्षत्रिय राजा का राज्याभिषेक करते हुए प्रजा को संबोधित करता है कि हे प्रजाओं, यह आप लोगों का राजा है । हम ब्राह्मणो का राजा तो सोम है । यहाँ सोम शब्द से सोम रस और उसके अधिष्ठात्री देवता चन्द्रमा का बोध होता है । अमरकोष में चन्द्र को द्विजराज कहा गया है । गृह्यसूत्रकारो ने इस मन्त्र का विनियोग चन्द्रमा के पूजन के लिये किया है । 'अग्निर्मूर्धा ०' यह मंगल ग्रह का मन्त्र है । मंगल पृथिवी का अंश माना जाता है । भौम का अर्थ है भूमि सम्बन्धी । यह पृथिवी का पालक है । अग्नि के समान लाल वर्ण वाला होने से यह अग्नि भी कहलाता है । इसको आकाश में प्रधान स्थिति है, अथवा यह आकाश की शोभा है । अग्निरूप होने से ही यह आकाश से वृष्टि के रूप मे बरसने वाले जल के कणों को व्रीहि, यव आदि के रूप में परिणत कर सस्य सम्पदा की वृद्धि करता है । अथवा वृष्टि के कारणो को, साधन सामग्री को, संकलित कर देता है । ज्योतिष शास्त्र मे बताया गया है कि भौम के चलने पर वृष्टि होती है । इस तरह से यह वृष्टि कराने में, उसके लिये अनुकूल मौसम बनाने में सहायक होता है । 'उद्बुध्यस्वाग्ने' इस मन्त्र का श्रोत विनियोग के अनुसार यह अर्थ होगा-'हे अग्ने, आप उबुद्ध होइये । इस यजमान को प्रतिदिन सावधान रखिये । इस तरह से श्रौत और स्मार्त ( इष्टापूर्त ) कर्मों को करने मे यजमान आपकी कृपा
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दार्थपारिजातः १६२५ यजमानश्च सधस्थे देवैः सह स्थितियोग्ये अस्मिन्नुत्तरस्मिन् सर्वोत्कृष्टे द्युलोके सीदत अधिक तिष्ठतेत्यर्थः । अत्र विश्वेदेवैर्यंज- मानस्य सालोक्य प्रार्थ्यते । पूर्वोक्तगृह्यसूत्रविनियोगानुसारेण तु बुधग्रहपरतास्य मन्त्रस्य वक्तव्या । तेन हे अग्ने, त्वं बुध्यस्व बुध इत्या- ख्यायमानो भव 'तत्करोति तदाचष्टे' ( वा० ग० सू० ) इति ' आचष्टे' इत्यर्थे णिच् । बुधमाचष्टे बुधयति कर्मणि लोटि. बुध्यस्वेति रूपम् । पुराणाद्यनुसार्यपि युक्त एवार्थः, ' इतिहासपुराणाभ्या वेदार्थमुपबृंहयेत्' ( म० भा० १११/२६७ ) इति , वचनात् । मन्त्रोक्तमाहात्म्योऽग्निर्बुधरूपेण स्तूयते । बुधोऽपि ज्ञानप्रकाशमयत्वेनाग्निरिव प्रकाशमानः अग्नितत्त्वप्रधानो बुधोऽतोऽग्निमन्त्री बुधमन्त्रोऽपि भवति, पूर्वोक्तैर्गृह्यसूत्रवचनैः पुराणवचनैश्चाग्निदेवतानां मन्त्राणा बुधग्रहपूजने विनियोगात् । मत्स्यपुराणे 'अग्ने विवस्वदुषसः' इति मन्त्रो बुधग्रहपूजने विनियुक्तः । अग्नितत्त्वप्राधान्यादेव बुधस्यातितीव्रगतिर्भवति । शनिः सार्धद्वयवर्षेणैकराशिमाक्रामति, बुधस्तु एकविंशतिदिवसैरतिक्रामति । 'अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्' ( ऐ० आ ० | | ) २ ४ २४ इत्यग्नेर्वाग्भावो विज्ञायते । अग्निरूपो बुधोऽपि वाचमधितिष्ठति । बृहत्पराशरहोराशास्त्रे ग्रहप्रादुर्भावाध्याये ' बुधो वाणीप्रदायकः' इत्युक्तम् । 'सद्बुद्धिं च बुधो गुरुश्च गुरुताम्' इत्यादिष्वपि बुधस्य बुद्धिप्रदायकत्वमुक्तम् । गायत्र्यपि बुद्धिप्रदायिका | गायत्री चाप्यग्निरूपोक्ता । गायत्र्याः सावित्र्या अधिष्ठाता सूर्यः । न पार्थिवाग्निरेवाग्निः, किन्तु विद्युत्सूर्या- वप्यग्नी उच्येते ' ' स न मन्येत अयं पार्थिव एवाग्निरिति । अपि एते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते' ( नि० ७ १६ ) इति निरुक्तवचनात् । अग्निरूपात् सूर्यादेव गायत्रीमन्त्रण बुद्धिः प्रार्थ्यते ' धियो यो नः प्रचोदयात्' इति । 'ब्रह्म जज्ञानम्' ( वा० सं ० १३।३ ) इति मन्त्रस्यापि सूर्यो देवता । जैमिनिगृह्यसूत्रेऽयमेव मन्त्रो बुधसम्बन्धी । मत्स्यपुराणानुसारेण 'अग्ने विवस्वदुषसः ' से सदा सावधानी से लगा रहे । हे विश्वेदेवो, आप लोग और आपके साथ इष्टापूर्त कर्मो को करने वाला यह यजमान इस उत्कृष्ट द्युलोक में देवताओ के साथ सदा निवास करते रहें । इस तरह से इस मन्त्र में विश्वेदेवो के साथ यजमान के सालोक्य की, एक ही लोक में निवास करने की प्रार्थना की गई है । पूर्वोक्त गृह्यसूत्र के अनुसार तो इस मन्त्र का विनियोग बुध ग्रह को पूजा मे किया जाता है । तब इस मन्त्र का अर्थ इस --तरह से किया जायगा —हे अग्ने, आप ' बुध' इस नाम से प्रख्यात होइये । 'तत्करोति तदाचष्टे' इस पाणिनि सूत्र से 'आचष्टे' अर्थ मे णिच् प्रत्यय होकर कर्म में लोट् लकार में 'बुध्यस्व' यह रूप बनेगा । पुराण प्रभृति से भी इस बात की पुष्टि होती है । इतिहास और पुराण की सहायता से वेद के अर्थ का उपबृंहण किया जाता है । इस मन्त्र मे जिस अग्नि का माहात्म्य वर्णित है, उसी की बुध के रूप में स्तुति की जाती है । बुध ग्रह भी ज्ञानमय और प्रकाशमय होने से अग्नि के समान प्रकाशित होता है । इस तरह से बुध में अग्नि तत्त्व की प्रधानता होने से अग्नि का मन्त्र बुध का भी मन्त्र हो जाता है । पूर्वोक्त गृह्यसूत्रों और पुराणो के वचनों से अग्नि देवता वाले मन्त्रों का विनियोग बुध ग्रह की पूजा में भी किया जाता है । मत्स्यपुराण मे 'अग्ने विवस्वदुषस ' यह मन्त्र बुध ग्रह की पूजा मे विनियुक्त है ॥ अग्नि तत्व की प्रधानता होने से ही बुध ग्रह की गति बड़ी तेज होती है । शनि ग्रह ढाई वर्ष में एक राशि पार करता है । इसकी अपेक्षा बुध एक राशि को २१ दिन में ही पार कर लेता है । ऐतरय श्रुति के अनुसार अग्नि वाणी बनकर मुँह मे प्रविष्ट हो जाता है । इस तरह से अग्नि ही वाणी बन जाता है । यह अग्निस्वरूप बुध भी वाणी का अधिष्ठाता है । बृहत्पराशर के होराशास्त्र में ग्रह प्रादुर्भाव नामक अध्याय में बुध को वाणी का प्रदाता माना है । 'बुध हमें सद्बुद्धि दे और गुरु गौरव प्रदान करे' इस श्लोक में भी बुध को बुद्धि का दाता माना है । गायत्री मन्त्र से भी बुद्धि निर्मल होती है । यह गायत्री अग्निस्वरूप है । गायत्री ( सावित्री ) का अधिष्ठाता सूर्य है । पार्थिव अग्नि को ही केवल अग्नि नही कहा जाता, किन्तु बिजली (विद्युत् ) और सूर्य भी अग्नि कहे जाते हैं । निरुक्त मे बताया गया है कि कोई भी व्यक्ति केवल पार्थिव अग्नि को ही अग्नि न मान बैठे, किन्तु ये अन्तरिक्ष और द्युलोक में रहने वाली ज्योतियाँ (विद्युत और सूर्य) भी अग्नि ही मानी जाती है । अग्नि स्वरूप सूर्य से ही गायत्री मन्त्र का जप करके बुद्धि की निर्मलता की प्रार्थना की जाती है | 'ब्रह्म जज्ञानम्' इस मन्त्र का भी देवता सूर्य है, किन्तु जैमिनि गृह्यसूत्र में यह मन्त्र बुध की पूजा में विनियुक्त है । मत्स्य-पुराण के अनुसार ' अग्ने विवस्वदुषसः' यह मन्त्र बुध की पूजा के लिये निर्दिष्ट है । निरुक्त में बताया गया है कि अग्नि सभी देवताओ २०४
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LINES this admittelbimaizes dictations tent O MANAS वेदार्थपारिचातः १६२६ ( ऋ० ११४४। १ ) इत्ययं मन्त्रो बुधपूजने विनियुक्तः । 'अग्निर्वै सर्वा देवता:' ( नि० ७ १७ ), 'देवतानां माहाभाग्यादेकैकस्या अपि बहूनि नामधेयानि भवन्ति' ( नि० ७/५ ) । तेनाग्निबुधयोरुभयोरपि बुद्धयधिष्ठातृतयाऽभेदादग्निमन्त्रण बुधस्तुतिः श्लिष्यते । 'यां मेधा देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ||' ( वा ० सं ० ३२ | १४ ), 'यया त्वमग्ने समिधा समिध्यस एवमहमायुषा मेधया प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन समिन्धे ' ( पारस्करगृह्यसूत्र ) इत्यादिभिर्मन्त्र- धार्थमग्निः प्रार्थ्यते । ' बुध त्व बुद्धिजननो बोधदः सर्वदा नृणाम्' इति भविष्योत्तरवचनाद् बुधोऽपि बुद्धयथं प्रार्थ्यते । 'तत्र संस्थानेकत्वं सम्भोगेकत्व च' ( नि० ७/५ ) इति रीत्योभयोरैक्यमेव मन्तव्यम् । अत एव ॠग्वेदसहितायाम् ' उद्बुध्यस्व ' ( ऋ० सं० १०/१०१११ ) इति मन्त्रस्य ऋषिरपि सौम्यो बुध एव । 'बृहस्पते अति यदर्यो' ( वा० स० २६।३ ) इत्यस्मिन् मन्त्र स्पष्टमव बृहस्पतेर्वर्णनं दृश्यते, सर्वग्रहापेक्षया बह- स्वाद् देवगुरुत्वाद् बृहता पतित्वाद् बृहस्पति । 'वाग्घ वे बृहती तस्या एष पतिः' (छान्दोग्ये १/२/११ ) इति वाचामधिष्ठाता स' | ' कुक्कुट्यादीनामण्डादिषु ' ( पा ० सू० ६ | ३ | ३५ इत्यत्र वार्तिकम्) इति पुवद्भावेन सिद्धिः । हे ऋताद् ब्रह्मण: प्रजात चित्र नानाविधं द्रविणमस्मासु धेहि ॥ कीदृश द्रविणम्? अयं ईश्वरो यद्धनमहत् पूजयेत् । लोटो रूपम् ॥ ' अर्यः स्वामिवैश्ययोः ' (पा० सू० ३| १| १०३) इति वैश्येऽयं शब्द आद्युदात्त, स्वामिन्यन्तोदात्तः । तस्मादन्तोदात्तत्वात् प्रकृते स्वामी ईश्वर एवार्थः । ईश्वरयोग्यं द्रविणं देहीत्यर्थ: । यच्च जनेषु लोकेषु विभाति विविधं शोभते, यद् द्युमत् द्यौः कान्तिरस्यास्तीति द्युमत्, ऋतुमत् क्रतवो यज्ञा विद्यन्ते यत्र येन यज्ञाः क्रियन्ते तादृशं धनं देहि । शवसा बलेन दीदयत दापयति पालयति वा । 'दय दानगतिहिंसा- दानेषु' इति णिजन्ताल्लुङि रूपम् | अर्थानुबन्धो धर्मानुबन्धश्चार्थोऽत्र प्रार्थितः । उपयामेन पात्रेण गृहीतोऽसि बृहस्पतयेऽर्थाय - वत्वा गृह्णामि । एष ते योनिः स्थानं बृहस्पतये त्वा सादयामि । का प्रतिनिधि है | यह देवताओं का महान् ऐश्वर्य (प्रभाव ) ही है कि जिसकी सहायता से एक देवता के अनेक नाम होते हैं । इस तरह से अग्नि और बुध दोनों ही बुद्धि के अधिष्ठाता देव होने से एक ही हैं और इसी आधार पर अग्नि के मन्त्र से बुध की भी स्तुति की जाती है | ' या मेघा देव ० ', 'यया स्वमग्ने० ' इत्यादि मन्त्रों का विनियोग पारस्कर गृह्यसूत्र में मेघा ( बुद्धि ) के लिये अग्नि से प्रार्थना करने मे बताया गया है । इसी तरह से भविष्योत्तर पुराण में भी बुध को बुद्धि देने वाला और मनुष्यो को सही मार्ग पर चलाने वाला कहा गया है । इसी के लिये बुध से प्रार्थना की जाती है । निरुक्त के अनुसार अवयव संस्थान और संयोग की एकता के आधार पर अग्नि और बुध को एक ही माना जाता है । इसीलिये ऋग्वेद संहिता में ' उद्बुध्यस्व ० ' इस मन्त्र का ऋषि भी सौम्य बुध ही बताया गया है । 'बृहस्पते अति यदर्थो० ' इस मन्त्र में बृहस्पति का वर्णन स्पष्ट है । सभी ग्रहो मे यह सबसे बड़ा है, यह देवताओं का और बृहती छन्द का पति होने से भी बृहस्पति कहलाता है । छान्दोग्य श्रुति में बताया गया है कि बृहती वाणी का नाम है, यह बृहस्पति उस वाणी का अधिपति है । ' कुक्कुट्यादीनामण्डादिषु' इस पाणिनि सूत्र से बृहती शब्द का पुंवद्भाब होने पर 'बृहस्पति' शब्द बनाता है । है ऋत अर्थात् ब्रह्म से उत्पन्न बुहस्पते, आप मुझे नाना प्रकार के रत्न, माणिक्य आदि के रूप मे धन दीजिये, जिससे कि मै ईश्वर अर्थात् स्वामी बनने की योग्यता धारण कर सकूँ । अर्थ शब्द के स्वामी और वैश्य ये दो अर्थ होते है । वैश्य अर्थ मे यह पद अनुदात्त और स्वामी के अर्थ मे मन्तोदात्त होता है । इस मन्त्र में अन्तोदात्त अर्य पद है, अत इसका अर्थ स्वामी होगा । अभिप्राय यह है कि स्वामी बनते योग्य घृत आप मुझे प्रदान कीजिये, प्रार्थी बृहस्पति से यह प्रार्थना कर रहा है । वह यह भी प्रार्थना करता है कि उस धन से जनता में मेरा नाम हो जाय, मेरा ऐश्वर्य और कान्ति बढ जाय, तथा उस घन की सहायता से मैं नाना प्रकार के यज्ञ-याग आदि सम्पन्न कर सकूँ । यह बृहस्पति अपने पराक्रम से सबका भरण-पोषण करने वाला अथवा पालन करने वाला है । दान, गति, हिंसा और मदान अर्थ वाली णिजन्त दय धातु के लुड् लकार का यह रूप है । इस तरह से धन की और धर्म की भी बृहस्पति से प्रार्थना की गई है । उपयाम पात्र से मैं तुमको धन की प्राप्ति के लिये ग्रहण करता हूँ । यह पात्र ही आपके रहने का स्थान है, धन की प्राप्ति के लिये मैं तुमको यहाँ बैठाता है ।
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वेदार्थपारिजात १६२७ 'अन्नात् परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपबत् क्षत्रं पय साम प्रजापति । ऋतेन सत्यमिन्द्रियमिद पयोऽमृत मधु । ' ( वा० स० १९/ ७५ ) इति मन्त्र शुक्रपूजाया विनियुक्तः । प्रजापतिः प्रथमशरीरी हविर्लक्षणादन्नात् परिस्रुतो रस ब्रह्मणा गायत्रीलक्षणेन व्यपिबत् विविच्न पीतवान् क्षत्रं च व्यपिबत् वशीचकार । क्षत्रियस्य वशीकरणमेव पानम् । पयः सोम च व्यपिबत् । अमृतं मधु मधुरं च भवतु । अनेन सत्येनेन्द्रियं वीर्यप्रद पयोऽमृत मधु मधुर च भवतु । शुक्रग्रहस्यापि शुक्लं रूपं शुक्राधिष्ठातृत्वात् । तस्यापि हविलक्षणादन्नात् परिस्रुतेन निष्पन्नेन शुक्रेण सम्बन्ध । सोऽपि रसं पीतवान् क्षत्रं च वशीकृतवान् । पुराणाद्यनुसारेण दैत्यराज्यस्य शुक्राधीनत्वं स्मर्यते । स एव प्रह्लादविरोचनवलिवृषपर्वप्रभृतीना गुरु. शुक्र. नीतेश्चनिर्माता । तस्माद्युक्तमेवानेन मन्त्रेण शुक्रसमर्चनम् । ननु ' शन्नो देवीरभिष्टय' ( ऋ० १० / ९/ ४; पैप्पल सं० १ | १ | १ ) इति मन्त्रस्य आपो देवतेति कुतो ग्रह- विशेषपरत्वमिति चेन्न, दयानन्देनास्य परमात्मपरत्वेन व्याख्यानात् । श्रौतगृह्यसूत्राणि वेदार्थज्ञानकुचिकेति सामाजिकैरपि कैश्चिदुपेयते । ग्रहाश्च पञ्चतत्वात्मका भवन्ति । शनिस्त्वप्तत्त्वप्रधानः । जलस्य शनेश्च सूर्यादुत्पत्तिश्रवणात् । न तयोरभेद एव । अप्प्राधान्यादेव शनैश्चरस्य मन्दगतित्वाद् मन्देति नाम्ना व्यवहारः । शीतस्पर्शवत्य आपः । अत एव ' शीतोष्णाभ्या कारिणि' ( पा० सू० ५।३।७३ ) इति सूत्रे ' शीतक: अलसः ' इत्युक्तम् । ' अग्नेरापः ' इति श्रुतावग्नेरपामुत्पत्ति- रुक्ता । सूर्याग्नेिश्च शनैश्चरस्योत्पत्तिः । 'एकस्यात्मनोऽन्ये देवा. प्रत्यङ्गानि भवन्ति' ( नि० ७१४ ) | ग्रहप्रादुर्भावाध्याये कूर्मो भास्करपुत्रस्येति पद्ये शनेः कच्छपरूपत्वमुक्तम् । यथा -के जले मठो यस्य स कमठः, जले स्थित्वा पृथिवी रक्षति, तथैव शनिरपि जलं द्वारीकृत्य पृथिव्याः प्राणिनो रक्षति । ' यथा पृथिव्यां मनुष्या. पशवो देवा इति स्थानैकत्वं सम्भोगैकत्वं ' अन्नात् परिस्रुतो ० ' यह मन्त्र शुक्र की पूजा के लिये विनियुक्त है । सर्वप्रथम शरीर धारण वाला प्रजापति हवि के रूप में प्राप्त अन्न से चू गये रस को गायत्री लक्षण ब्रह्म की सहायता से पी जाता है । वह क्षात्र बल को भी पो जाता है, अर्थात् अपने वश मे कर लेता है | क्षत्रिय को वश मे कर लेना ही उसका पान कहलाता है । वह जल और सोम को भी पी जाता है । अमृत मेरे लिये मधुमय, मधु सदृश मधुर हो जावे । शुक्र ग्रह का भी रूप शुक्ल होता है । शुक्र (वीर्य ) का अधिष्ठाता होने से शुक्र का अन्न के रससे चू कर बने हुए शुक्र ( वीर्य) से सम्बन्ध है । यह शुक्र भी रस को पीकर और क्षत्र ( बल ) को अपने वश में रखकर बनता है । पुराण आदि के अनुसार दैत्यों का राज्य शुक्राचार्य के अधीन माना जाता है । शुक्राचार्य ही प्रह्लाद, विरोचन, बलि, बृषपर्व प्रभृति दैत्य-दानवो का गुरु है । वही शुक्रनीति का निर्माता है । इस तरह से इस मन्त्र से शुक्र की पूजा की जाय, यह उचित ही है । ' शन्नो देवीरभिष्टय ० ' इस मन्त्र का देवता जल है, इससे शनि ग्रह का ग्रहण कैसे हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि दयानन्द ने इस मन्त्र की व्याख्या जलपरक न कर परमात्मपरक की है, उसी तरह से इसकी शनिपरक व्याख्या भी की जा सकती है । श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र वेदार्थ को जानने की कुंजी है, इस बात को कुछ आर्यसमाजी भी मानते थे । सभी ग्रह पाँच तत्त्वो से बने हैं । इनमें से शनि ग्रह मे जल तत्व की प्रधानता है । जल और शनि दोनों की उत्पत्ति सूर्य से मानी जाती है । इस तरह से दोनो की अभिन्नता मानी जाती है । अप्तत्त्व की प्रधानता होने से ही शनैश्वर की गति मन्द होती है और इसको 'मन्द' नाम से ही पुकारा जाता है । जल शीतल स्पर्श वाला होता है । 'शीतोष्णाभ्या कारिणि ' इस पाणिनि सूत्र में 'शीतल' •शब्द आलसी के अर्थ में प्रयुक्त होता है । श्रुति में अग्नि से जल की उत्पत्ति वर्णित है । शनैश्चर की उत्पत्ति भी सूर्यरूपी अग्नि से मानी गई है । निरुक्त मे बताय! गया है कि एक प्रधान देवता के अन्य देवता अंगभूत हो जाते हैं । ग्रहो के प्रादुर्भाव ( उत्पत्ति ) का वर्णन करने वाले अध्याय में कूर्म को भास्कर ( सूर्य ) का पुत्र बताया गया है । यह कूर्म (कछुआ) का रूप शनि का माना गया है । जैसे क अर्थात् जल मे मठ (स्थान ) बनाकर कमठ ( कच्छप ) पृथिवी की रक्षा करता है, उसी तरह से शनि भी जल की सहायता लेकर पृथिवी के प्राणियों की रक्षा करता है । इस बात को स्पष्ट रूप से समझने के लिये 'यथा पृथिव्या मनुष्या ' निरुक्त के इस वाक्य का दुर्गाचार्य कृत भाष्य अवलोकनीय है । वे कहते हैं कि देवताओ की भिन्नता में एकता सस्थान और संभोग की एकता के आधार पर निर्धारित होती है । यह संस्थान और संभोग की एकता युक्तियों की सहायता से जानी जाती है । उदाहरण देकर इसको इस तरह से समझाया जा सकता है कि जैसे मनुष्य, पशु आदि सब
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वेदार्थपारिजात १६२८ दृश्यते, यथा पृथिव्या पर्जन्येन च वाय्वादित्याभ्या च सम्भोगोऽग्निना चेतरस्य लोकस्य' (नि० ७/५ ) । इत्यत्र दुर्गाचार्य: --तत्र तस्मिन् पृथक्त्वे सति संस्थानैकत्वं सम्भोगेकत्वं चोपपत्तित ईक्षितव्यम् । तत्र दृष्टान्तः- यथा पृथिव्या मनुष्याः पशव इत्यादि सहस्थानतया एकत्वं संस्थानेकत्व पृथिवीत्युक्त यावता सहभावेन समान स्थानं ते सर्वे तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते । सम्भोग-,, हेतुकमेकत्वम् । सम्भोगो नामेतरेतरोपकारित्वम् समानकार्यतेत्यर्थः । सा पुनभिन्नस्थानानामपि भवति किमङ्ग पुनः समानस्थानानाम् । यथा पृथिव्याः पर्जन्येन वाय्वादित्याभ्या च सम्भोगः, पृथिवी ओषध्युत्पत्त्यै स्वकर्मारम्भे पर्जन्य- वाय्वादित्यक्कृतमुपकारमपेक्षते । तेनैवाप इत्यनेन जलवासी कमठः शनैश्चरश्च बोध्येते । मन्दचलनादिसमानकार्यत्वाच्चापां ग्रहणेन शनिग्रहणमायाति । कच्छपोऽपि मन्दगतिः । तत एव शनिरपि मन्दगतित्वात् कूर्म उक्त । ज्योतिषग्रन्थेषु ' त्रिधा वृष्टिः शनैश्चरे' इत्युक्त्या शनैर्वृष्टिकर्तृत्वमपि । सूर्यपुत्रत्वात्तद्युक्तमेव, जलाभावे वृष्टयसम्भवात् । सूर्यदेवस्य जलदेवोऽपि सहयोगं ददाति । तेन समानकार्यत्वाद् आप इत्यनेन शनैर्ग्रहण युक्तमेव । तदुक्तं मन्त्ररामायणे - 'एकैकस्मिन् यथादर्श: प्रासादा मुहुरान्तरै । दृश्यन्ते सहितो देवेष्वेवं लोकः सुरान्तरैः ॥ तस्मात् स्युर्देवताः सर्वा प्रत्येकं विश्वयोनयः। अन्योन्ययोनयश्चैव यथा यास्कमुनीरितम् । सर्वासा देवतानां विश्वयोनित्वा- देकैकदेवतास्तुतिरपि रामस्तुतिं प्रकटयति, तथैव शनिदेवोऽपि जलदेवाद् व्यज्यते । तस्माज्जलस्तुतिरपि शनिस्तुतिरेव । तत एव धर्मशास्त्रकारैर्जलस्तावकमन्त्र शनिपूजाया विनियुक्तः, 'माहाभाग्याद्देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते' ( नि० ७१४ ) इति निरुक्तवचनान् । जलप्रधानत्वाज्जलस्तुत्या तत्प्रधानस्य शनेः स्तुति । ज्योतिषरीत्या विशं शनिरिति प्राणी पृथिवी पर एक साथ रहने से एक संस्थान वाले है ॥ पृथिवी शब्द का उच्चारण करने से पृथिवी पर जितने भी प्राणी एक साथ रहते है, उन सबका ग्रहण एक साथ हो जाता है । संभोग की एकता के आधार पर भी एकता बनती है । संभोग का अर्थ है आपस मे एक दूसरे की सहायता करना । संभोग की एकता तो भिन्न-भिन्न स्थानो मे रहने वालो की भी हो सकती है, तब एक स्थान पर रहने वालो को एकता हो, इसमे सन्देह ही कहाँ रह जाता है । जैसे कि पृथिवी का पर्जन्य के साथ और वायु तथा आदित्य से भी सभोग के आधार पर ऐक्य है, क्योंकि पृथिवी को बोषधी आदि की उत्पत्ति के लिये पर्जन्य (वर्षा ), वायु और सूर्य की गरमी की आवश्यकता है । जल और शनि की एकता भी संस्थान और संभोग की एकता के आधार पर बनती है । 'आप:' इस शब्द से जल में रहनेवाला कच्छप और शनैश्चर दोनो बोधित होते है । मन्द गति शनैश्चर ग्रह और जल दोनों का समान धर्म है । कच्छप की गति भी मन्द है । इसीलिये मन्द गति के आधार पर ही शनि को कूर्म भी कहा जाता है । ज्योतिष के ग्रन्थों में शनैश्चर भी वृष्टिकारक ग्रह बताया गया है । शनि सूर्य का पुत्र है, अतः वह वृष्टिकारक ग्रह हो, यह उचित ही है । जल के अभाव मे वृष्टि नही हो सकती, अतः वृष्टि कराने में सूर्य भी जल की सहायता करता है । इस तरह से संभोग की एकता के आधार पर भी जल शब्द से शनि ग्रह का ग्रहण करना उचित ही है । इस विषय को मन्त्ररामायणकार ने भी उठाया है । उनका कहना है कि एक ही दर्पण में जैसे अनेक प्रासाद आदि से मण्डित इस जगत् का विविध रूप प्रतिबिम्बित होता है और इनका अनुभव हमारे जैसे अज्ञ जीव भी करते है । उसी तरह से यह सारा उसमें विद्यमान विभिन्न देवगण भी अपने से भिन्न प्रत्येक देवता मे प्रतिबिम्बित है, इस बात को उन देवताओं में से प्रत्येक जगत्और जानता है । इसलिये प्रत्येक देवता इस जगत् का कारण है । ये परस्पर एक दूसरे के भी कारण होते हैं । इस बात को यास्क मुनि ने भी मानी है । इस तरह से किसी भी देवता की स्तुति की जाय, उससे भगवान् राम की भी स्तुति हो जायगी, इसमें कुछ भी संदेह , - नहीं हैं । सभी देवता इस जगत् के कारण हैं अतः एक एक देवता की स्तुति करने से भी राम की स्तुति हो जाती है । प्रकृत में शनिदेव की जल से अभिव्यक्ति होती है । इसलिये जल की स्तुति करना भी शनि की स्तुति ही मानी जाती है । इसीलिये धर्मशास्त्रकारों ने जल की स्तुति करने वाले मन्त्रों का विनियोग शनि की पूजा मे किया है । देवता के महान् प्रभाव के कारण 1 एक ही देवता की अनेक रूपों में स्तुति की जाती है, यह निरुक्त का भी कथन है । शनि ग्रह जल गुण प्रधान है, अतः जल को स्तुति से जल गुण प्रधान शनि की स्तुति भी हो जाती है । ज्योतिष की पद्धति से भी शं यह शनि का प्रतीक है, अतः शनिग्रह से सुख को प्रार्थना की जाती है । मन्त्र और शनि दोनो की एक ही कुम्भ राशि है । ज्योतिष शास्त्र मे कुम्भ राशि का स्वामी शनि को