वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 731–740

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 731–740

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वेदार्थपारिजातः १६२९ ' शनेः शं प्रार्थ्यते मन्त्रशन्योः समानकुम्भ राशित्वाच्च । ज्योतिषदृष्ट्यापि कुम्भराशेः शनिः स्वामी भवति । तेनैव शनेः शमिति बीजमन्त्रः -शं शनैश्चराय नमः । यदि पाषाणोऽपि प्रतिष्ठावशाद् देवप्रतिमा निष्पद्यते, तदा कल्पकारविनियोग- बशाद् मन्त्रेऽपि शनिग्रहप्रतिष्ठा भवति 1। तेन शनिसम्बन्धः सम्पद्यते । अपशब्दस्य बहुवचनान्तत्वेन देवीरिति बहुवचनम् । शन्यभेदात्तत्रापि बहुवचनप्रयोगः । शनिपक्षे पूजायामपि बहुवचनं संगच्छते । दयानन्देन तु सत्यार्थप्रकाशे सन्ध्यायां कण्ठ- गतकफस्य जलद्वारान्तर्निगलनेऽयं मन्त्रो विनियुक्तः । तत्र किं प्रमाणमिति तु न वक्तुं शक्नोतीत्यादिकं सनातनधर्मालोके प्रपञ्चितम् । मन्त्रार्थस्तु - देवी देव्यः दीप्यमाना आपः तद्रूपाः शनिदेवा नोऽस्माकमभिष्टयेऽभिषेकाय अभीष्टाय पीतये पानाय च तृप्तयेशं सुखरूपा भवन्तु । यथाऽऽपोऽमाक स्नाने पाने च सुखपित्र्यस्तथैव पूज्याः शनिदेवा अपि सर्वकार्येषु सुखकरा भवन्तु । आप. शंयोः रोगाणा शमनं भयाना पवनं पृथक्करण चाभिस्रवन्तु, शनिदेवा अस्माक भयरोगनाशं कुर्वन्तीत्यर्थः । ' ' ( ), ' ' ( | ) काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती वा० सं० १३/२० कया नश्चित्र वा० सं० २७ ३ ९ इति मन्त्राभ्या राहुपूजनम् । प्रथमो दूर्वामन्त्रः । मूलाग्रवती दूर्वा तस्या पुरस्ताद् भूमिप्राप्ता काण्डात्काण्डादिति' ( कात्यायन श्री० सू० १७| ४| १८ ) तस्यां स्वयमातृष्णायां काण्डादिति ऋग्द्वयेन पुरस्ताद् भूमिगताना मूलाग्रयुता दूर्वामुपदधातीति सूत्रार्थः । मन्त्रार्थस्तु - हे दुर्वे दूर्वेष्टके, काण्डात् काण्डात् प्रतिकाण्डं परुष. परुषः प्रतिपरुः भूमिसम्बद्धा सम्बद्धेभ्यः सर्वपर्वभ्यः सकाशाद्यथा त्वं परि समन्तात् प्ररोहन्ती अङ्कुरवती वर्तसे, एवं स्वाङ्कुरविस्तारवत् सहस्रेण शतेन च असंख्यैः पुत्रपौत्रनप्त्रादिभिर्नोऽस्मान् माना गया है । इसी लिये शनि का बीज मन्त्र 'श' है । 'शं शनैश्चराय नम ' यह शनि का सबीज मन्त्र है । यदि पाषाण ( पत्थर ) भी प्रतिष्ठा संस्कार के द्वारा देव प्रतिमा बन जाता है, तो कल्पसूत्रकारो द्वारा विहित विनियोग के आधार पर मन्त्र मे शनि ग्रह की प्रतिष्ठा हो जाने में क्या आपत्ति उठाई जा सकती है? मन्त्र में शनि की प्रतिष्ठा हो जाने से उसके साथ शनि का सम्बन्ध हो ही जायगा । अप् शब्द का प्रयोग बहुवचन में होता हैं, अत. ' देवी ' इस विशेषण में भी बहुवचन का प्रयोग किया गया है । जब से शनि अभिन्न है, अतः इस अर्थ मे भी बहुवचन की संगति बैठ जाती है । शनि के पक्ष में दूसरा समाधान यह भी दिया जा सकता है कि उसके प्रति आदर प्रकट करने के लिये बहुवचन का प्रयोग किया है । स्वामी दयानन्द ने तो सत्यार्थप्रकाश मे सन्ध्या करते समय कण्ठगत कफ को जल से निगल जाने के लिये इस मन्त्र का विनियोग बताया है । इसमें क्या प्रमाण है, यह बता पाना कठिन है । इस विषय को विस्तार से सनातनधर्मालोक नामक ग्रन्थ मे उठाया गया है । 'शन्नो देवी० ' इस मन्त्र का अर्थ यह है-हे दिव्य स्वरूप जल देवता, शनि देवता, आप हमारे अभिषेक ( स्नान )) के लिये और अभीष्ट पान के लिये, तृषा की शान्ति के लिये, सुख स्वरूप बनिये । जैसे जल देवता स्नान और पान के द्वारा हमें सुख पहुँचाते हैं, उसी तरह हमारे पूज्य शनि देव भी हमारे सभी कार्यो को सुखकर बनावें, बिना विघ्नबाधा के पूरा होने दें । जल देवता हमारे रोगों का शमन करें और भय को दूर करें । इसी तरह से शनिदेव भी हमारे भय को दूर करने वाले और रोग को नाश करने वाले होवें । ' काण्डात् काण्डात्० ' तथा ' कया नश्चित्र ० ' इन दो वाजसनेय सहिता के मन्त्रों से राहु की पूजा की जाती है । इनमें से पहला दूर्वा का मन्त्र है । ' मूलाग्रवती' इस कात्यायन श्रौतसूत्र में दूर्वा का संग्रह करने में इस मन्त्र का विनियोग बताया गया है कि भूमि पर अपने आप फैली दुर्वा को अग्र भाग से लेकर मूल भाग का अनुसन्धान करते हुए इस मन्त्र का उच्चारण करके उखाडे । मन्त्र का अर्थ यह है- हे दुर्वे, तुम्हारा प्रत्येक काण्ड और प्रत्येक पर्व भूमि से जुडकर जैसे चारों तरफ अंकुरित होकर फैल जाता है, इसी तरह से अपने अंकुरो के जाल के विस्तार की तरह असंख्य पुत्र, पौत्र, दौहित्र प्रभृति के रूप में तुम हमारे परिवार का विस्तार करो | इस मन्त्र का देवता दुर्वा ही है । याज्ञवल्क्यस्मृति के आचाराध्याय में उदुम्बर आदि ग्रहों के हवन की समिधा का वर्णन करते समय राहु के लिये दुर्वा की हवि का विधान किया है । 'यज्ञ मे जिस देवता को प्रधान हवि दी जाती है, उसी देवता का

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वेदार्थपारिजातः १६३० प्रतनु विस्तारय ॥ अस्य मन्त्रस्य दूवैव देवता । 'उदुम्बर शमो दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्' ( याज्ञवल्क्यस्मृती आचा- राध्याये ३०१ ) दुर्वैव राहोर्हविर्द्रव्यम् । ' यद्देवतः स यज्ञो यज्ञाङ्गो वा तद्देवता भवति' ( नि० ७१४ ) यद्देवतप्रधानं हविः स यज्ञस्तद्दैवतः । तम्मादय मन्त्रोऽपि राहुदेवतः । दुर्वास्तुत्या तद्देवतास्तुतिर्भवति । कया नश्चित्र इति मन्त्रोऽपि शिष्टाचारेण राहुयजने विनियुक्त ' । 'शन्नो ग्रहाश्चान्द्रमसा शमादित्यश्च राहुणा' ( अथर्व० १ ९९१ १० ) इति वेदमन्त्रेण राहो. कल्याणं प्रार्थ्यते । 'कया न' इति मन्त्रस्येन्द्रो देवता । 'इन्द्रश्च सर्वा देवता.' ( श० ३।४।२१२ ) । तस्मादिन्द्रस्तुत्या राहुरपि स्तूयते । तदर्थस्तु - तिस्र इन्द्रदेवत्या वामदेवदृष्टा गायत्र्यः, इन्द्रः कया ऊती ऊत्या केन अवनेन तर्पणेन प्रीणनेन वा नोऽस्माकं सखा सहाय आभुवद् आभिमुख्येन भवति । तथा कया वृता वर्तत इति वृत् तथा वृता वर्तमानया कया शचिष्ठया अतिशयेन शची शचिष्ठा तथा अतिशयवत्या यागक्रिययाऽस्माकं सखा भवति । शचीति कर्मनाम । तया यागक्रियया शच्यातत्पल्या अपि विशिष्टयेत्यर्थः । अर्थान्न किमपि तर्पणं न वा काचिद्यागक्रिया मयि वर्तते, येन स सखा स्यात् किन्त्वकारणकरुण. स करुणयैव न. सखा सहायो भवतीत्यर्थः । कीदृश इन्द्रश्चित्रो विचित्र:, आश्चर्यगुणकर्ममाहात्म्यः पूज्यो वा । सदा वर्धत इति सदावृधः सदा वर्धमानः । ' केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे । समुषद्भिरजायथा ॥ ' ( वा० सं० २९ | ३७ ) अग्निदेवत्या गायत्री मधुच्छन्दोदृष्टा । हे अग्ने, त्वमुषद्भि होमकर्तृभिः कृत्वा अजायथा उत्पन्नोऽसि । उषन्ति हविर्दहन्ति ते उषन्तोऽग्निहोम- कर्तारः । कीदृशस्त्वं न केतुः प्रज्ञान यस्य तस्मै अकेतवे अज्ञाताय, मर्या मर्याय मनुष्याय, केतु ज्ञान कृण्वन् कुर्वन् । अपेशसे नास्ति पेशः सुवर्णं यस्य स अपेशास्तस्मै, अर्थाद् ज्ञानहीनाय ज्ञानं सुवर्णहीनाय सुवर्णं सम्पादयन् जायस इत्यर्थः । उणादिकोषे ( ) | ' ( ११७४ केतुर्ग्रहः पताका वेति दयानन्द शंमादिश्च राहुणा शन्नो मृत्युर्धूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः । अथर्व ० वह यज्ञ हो जाता है, अन्य सारे अङ्गो का विनियोग भी उसी प्रधान देवता के लिये हो किया जाता है' इस निरुक्त के सिद्धान्त के अनुसार यहाँ दुर्वा की हवि राहु ग्रह के निमित दी जाती है, अतः इस मन्त्र का देवता भी राहु हो जाता है । दूर्वा की स्तुति उसके अधिष्ठाता देव की स्तुति मानी जाती है । ' कया नश्चित्र ० ' शिष्टाचार के अनुसार इस मन्त्र का भी विनियोग राहु की पूजा मे किया जाता है । 'शन्नो ग्रहा ०' इस अथर्ववेदीय मन्त्र में राहु से कल्याण की प्रार्थना की गई है । इस मन्त्र का देवता इन्द्र है । इन्द्र मे सभी देवता समाविष्ट हैं । इस लिये इन्द्र की स्तुति करने से राहु की भी स्तुति हो जाती है । इस मन्त्र का अर्थ इस तरह से किया गया है—'कया नश्चित्र० ' प्रभूति, तीन ऋचाओ का देवता इन्द्र है, ऋषि वामदेव और छन्द गायत्री हैं । इन्द्र को किस तरह से हम तृप्त कर प्रसन्न करें कि वह हमारा सब तरह से सहायक बन जाय' तथा किस पवित्रतम रूप में वर्तमान याग क्रिया से वह हमारा मित्र बनता है? शची यह याज्ञिक कर्म का पर्यायवाची शब्द है । इससे यह भी ध्वनित होता है कि वह इन्द्र अपनी पत्नी के साथ है । इसका अभिप्राय यह है कि स्वर्ग में देवताओं को प्राप्त होने वाली तृसि भी बिना यागक्रिया के संभव नही हो सकती । इसलिये इन्द्र को यागक्रिया के संपादन से तुम करने वाले हम मनुष्य उसके मित्र हैं । इन्द्र भी बिना कारण के ही सब पर करुणा की वर्षा करता रहता है, अतः वह हमारे कार्यों पर बिना ध्यान दिये ही हमारा सहायक हो जाता है । यह इन्द्र आश्चर्यजनक विचित्र गुणो से और कर्मों से विभूषित है । अपनी महत्ता (माहात्म्य ) के कारण यह सदा पूजनीय हैं । इसका ऐश्वर्य सदा बढ़ता रहता है । 'केतुं कृण्वन्तकेतवे० ' इस मन्त्र के देवता अग्निन्न छन्द गायत्री और ऋषि मधुच्छन्दा है । इसका अर्थ यह है- हे अग्ने, तुम हवन कराने वालो के द्वारा उत्पन्न किये गये हो । अग्नि में हवन करने वाले ऋत्विग्गण हवि प्रदान कर अग्नि को प्रज्वलित करते रहते हैं । यह अग्निदेव कैसे हैं? अज्ञानी मनुष्य को ज्ञान देने वाले है और सुवर्णहीन अर्थात् दरिद्र मनुष्य को धन देने वाले हैं । इसका अभिप्राय यह है कि जो व्यक्ति आहुति आदि देकर तुमको सदा प्रज्वलित रखते है, उनको तुम ज्ञान और धन से सदा भरते रहते हो । उणादिकोष में दयानन्द ने केतु शब्द का अर्थ ग्रहविशेष और पताका किया है ।' 'शमादित्यश्च राहुणा । इस अथर्ववेदीय मन्त्र में राहु का उल्लेख है | केतु ग्रह राहु की ही छाया माना जाता है । इस केतु ग्रह की सिद्धि इसी मन्त्र से होती है और उसका पूजन भी इसी F

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वेदार्थपारिजातः १६३१ १ ९/ ९/ १०) । राहोश्छाया स्मृतः केतु' । तादृशस्य केतुग्रहस्यानेनैव मन्त्रेण सिद्धिरर्चन च । धूमकेतुरपि - शन्नो मृत्युघूमकेतुः ' ( / / ), अथर्व० १ ९ ९ १० इति मन्त्रण सिद्धयति । पताकार्थकेनापि केतुना केतु सिद्धयति पताकाया केतुलिङ्गत्वात् । पताकावदेव केतोराकृतिर्निर्मीयते । 'के तोर्ध्वजम्' ( 'जैमिनिगृह्यसूत्र, २।१ ९) इति वचनात् । ' केतवे ध्वजम्' ( बोधायनगृह्यसूत्रे १।१६।५ ) इति वचनाच्च । पञ्चाङ्गेष्वपि पताकाधारिण केतुग्रहस्य दर्शनं भवति । केतुपूजनेन केतुमतो राष्ट्रस्य पूजनवत् पताकापूजनेन पताकावतो ग्रहस्यापि पूजन सम्पद्यते । निरुक्ते सप्तमेऽध्याये देवताया वाहनायुधस्तुत्यापि देवतास्तुतिर्भवति, तद्वत् । केतुं कृण्वन्नित्यग्निदेवत्यो मन्त्र इत्युक्तमेव । ' केतु कृण्वण्नग्निसुनो.' (वृहत्पराशरस्मृतौ ०६६ ५ इति केतुग्रहोऽग्नि- सूनुत्वेन वर्णितः । ' आत्मा वै पुत्रनामासि' इति रीत्या अग्निस्तुत्या तदात्मरूपः केतुरपि स्तूयते । अग्नेः केतुः प्रज्ञापको धूमो भवति । तत एवाग्निर्धूमकेतुरुच्यते । तत एवाग्निपुत्रः केतुरपि धूम इव तमोभयो भवति 1। केतो राहोश्छायात्वेऽपि पृथक्सत्ता भवति, भिन्नदिशि सत्त्वात् षड्रा शिव्यवहितत्वाच्च । सूर्यचन्द्रादिग्रहणमपि कदाचिद्राहुणा कदाचित्केतुना भवति । पुराणेषु राहुः शिरः, कबन्धश्च केतुरुच्यते । ' शनि- राहु- केतूरग.रक्षो' ( मैत्रायणीयारण्यके ७/६ ) इत्यारण्यकेऽपि शनि- राहुकेतूनां वर्णनं दृश्यते । -- ', यत्तूक्तम् गृह्यसूत्रादिग्रन्थाः पञ्चसहस्रवर्षेभ्योऽर्वाचीनास्तैरैव वेदमन्त्राणा ग्रहपूजासु विनियोगः कृत न तावतापि ग्रहपरत्वेन वेदमन्त्रव्याख्यान युक्तम्', इति, तत्तुच्छम्, तद्रीत्या वेदानामपि महाभारतात्किञ्चित्पूर्वंकालिकत्वेनाव- चीनत्वाविशेषात् । किन्तु पाश्चात्त्याना मतमिद न पौरस्त्यानाम् । वात्स्यायनादिरीत्या तु य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारस्त एव धर्मशास्त्रस्येतिहासपुराणानां च स्मर्तार है नाङ्गानि अन्तरा अङ्गी सम्भवति । श्रोतगृह्यादिसूत्राणा- मन्त्र से किया जाता है । 'शन्नो मृत्युर्धूमकेतु ' इस अथर्ववेदीय मन्त्र से धूमकेतु की सिद्धि होती है । पताका अर्थवाले केतु शब्द से भी केतु ग्रह की सिद्धि होती है, क्योकि पताका में केतु का चिह्न रहता है, अर्थात् केतु ग्रह का चिह्न पताका को ही माना जाता है, केतु की आकृति पताका के आकार की बनाई जाती है । जैमिनि गृह्यसूत्र और बोधायन गृह्यसूत्र में भी केतु ग्रह का चिह्न ध्वज को ही माना गया है । पञ्चाङ्गो मे भी पताकाधारी केतु का चित्र देखने को मिलता है । केतु ( ध्वज) की पूजा करने से जैसे उस राष्ट्र की पूजा मानी है, जिसका कि वह ध्वज है, उसी तरह से पताका का पूजन करने से उस पताका वाले ग्रह की भी पूजा हो जाती है । निरुक्त के , सातवें अध्याय में बताया गया है कि देवता के वाहन आयुध आदि की स्तुति करने से भी देवता का स्तुति मानी जाती है । ' केतु कृण्वन्० ' इस मन्त्र का देवता अग्नि है, यह अभी बताया गया है । बृहत्पराशरस्मृति में केतु ग्रह को अग्नि का पुत्र बताया गया है । पुत्र पिता की आत्मा ही माना गया है, जैसा कि 'आत्मा वै पुत्रनामासि' इस श्रुति में वर्णित है । इस तरह अग्नि की स्तुति करते से केतु की भी स्तुति हो जाती है, क्योकि वह अपने पिता अग्नि का ही स्वरूप है । अग्नि का बोध कराने वाला धूम होता है, इसीलिये अग्नि को धूमकेतु, अर्थात् धूम की ध्वजा वाला कहा जाता है । धूम की तरह ही अग्नि का पुत्र केतु भी तमो- मय, अन्धकाररूप होता है । केतु को यद्यपि राहु की छाया माना जाता है, किन्तु उसकी अलग से सत्ता रहती है, क्योकि दोनो की दिशा एक दूसरे से विपरीत होती है और इन दोनो में परस्पर छः राशियो का अन्तर सदा रहता है । सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण भी कभी राहु के कारण और कभी केतु के कारण होते है । पुराणो मे शिरोभाग को राहु तथा धड़ ( कबन्ध ) को केतु कहा गया है । मैत्रायणीय आरण्यक में शनि, राहु, केतु इत्यादि का वर्णन मिलता है । कुछ आर्यसमाजियो का कहना है कि गृह्यसूत्र प्रभृति ग्रन्थ आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले बने । इन्हीं में वैदिक मन्त्रो का ग्रहपूजा में विनियोग किया गया है । इन नवीन ग्रन्थों का अनुवर्तन कर वैदिक मन्त्रों की ग्रहपूजापरक व्याख्या करना ठीक नहीं है, किन्तु उनका यह कहना एकदम गलत है । क्योकि इनकी पद्धति को मानने पर तो गृह्यसूत्रों की भांति वैदिक सहिताओ की भी स्थिति महाभारत काल से कुछ हो पहले मानने से इनकी भी अर्वाचीनता माननी पड जायगी । यह सब पाश्चात्त्यों का मत है, हम लोगो का नही । वात्स्यायन प्रभृति प्राच्य विद्वानों के मत के अनुसार तो मन्त्र और ब्राह्मण भाग के द्रष्टा और प्रवक्ता ऋषि ही धर्मशास्त्र,

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वेदार्थपारिजातः १६३२ मर्वाचीनत्वे संस्कारेष्वपि कथं मन्त्राणां विनियोगः सिद्धयति । नहि नामकरणोपनयनसन्ध्यादिषु मन्त्राणां विनियोगास्त्वद- भिमतेषु वेदेषु सन्ति । वेदवदेव वेदाङ्गान्यप्यनादीन्येव । 'नक्षत्रकल्पो वैतानस्तृतीय. सहिताविधिः । तुल्य आङ्गिरस. कल्पः शान्तिकल्पस्तु पञ्चमः ॥ ' (वा०पु ० ६१।५४ ) नक्षत्र कल्पे नक्षत्राणां शान्तय उक्ताः । वैतानसूत्रे दर्शपूर्णमासी, आयाधान-विधानानि । तृतीये सहिताविधी कौशिकसूत्रे शत्रुच्चाटनभूतप्रेतपिशाचबालग्रहादिनिवारणविधानानि दुःस्वप्न- निवारणपापनक्षत्रोत्पत्ति शान्तिरपशकुनशान्तिराभिचारिककर्मेंनिवारणादिविधय उक्ताः । आङ्गिरसकल्पे आभिचारिक- कर्मणां स्वातन्त्र्येण निरूपणम् । शान्तिकल्पे विनायक ( गणपति)ग्रहादिपूजा ग्रहयज्ञादय उक्ताः । अथर्वसम्बन्ध्येव नक्षत्र- ग्रहोत्पातलक्षणग्रन्थोऽस्ति । अथर्ववेदे - 'सहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी च स्तु भद्र मृगशिरः शम् आर्द्रा । पुनर्वसु सूनृता चारु पुष्यो भातुरश्लेषा अयन मधा | ' ( १९ ७२) 'पुण्य पूर्वाफल्गुन्यौ चात्र हस्त चित्रा शिवा स्वाति सुखो मे अस्तु राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा मुनक्षत्रमरिष्टमूलमन्न पूर्वारासता मे आषाढा ऊर्जं देवी उत्तरा आवहन्तु, अभिजित् मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठा कुर्वतां सुपुष्टिम् । आमेहत् शतभिष वरीय आ में दया प्रोष्ठपदा सुशर्म आरेवती अश्वयुजो भग मे आ में रयि मरण्य आवहन्तु ' ( अथर्व० १ ९ / ७/ ५ ) इत्याथर्वणश्रुतेर्त्रहनक्षत्रादिपूजा वैदिक्येव । ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य (वेदस्य) :' ( | ), ' ' ( ), ' - विषय न्यायदर्शने ४ १/६२ इत्यत्र भाष्ये चत्वारो वेदास्तैर्यज्ञस्तायते गोपथब्रा ० ११४/२४ वेदास्नावद् यज्ञकर्म प्रवृत्ता ' ( सिद्धान्तशिरोमणिगणिताध्याये, मध्यमाधिकारे, कालमानाध्याये ९ ), 'दुदोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजु. सामलक्षणम्' ( अ० १११३ ), ' वेदे मन्त्रा अवश्य यज्ञगतेन पुरुषेण विपरिणमयितव्याः । याज्ञे कर्मणि स प्रोक्तो नियमः' ( महाभाष्ये पस्प- शाह्निके ), ' वेदमन्त्रैर्विना कश्चिद विधिर्नास्ति द्विजन्मनाम्' ( वृहत्पराशरस्मृती ९।६७ ) । ग्रहपूजाया अभावादेव सती-विवाहो नानुकूलफलदः सवृत्तः । दक्षकन्या यदाह वै पित्रा दत्ता यदा तव । यथोक्तविधिना तत्र विवाहो न कृतस्त्वया । न ग्रहाः पूजितास्तेन दक्षेण जनकेन मे । ग्रहाणां विषयस्तेन सच्छिद्रोऽयं महानभूत् ॥ ' (शिवमहापुराणे, २९/ १२-१३ ), नक्षत्राणि इतिहास, पुराणों के स्मर्ता है । अंगों के बिना अंगी ( शरीर ) की स्थिति नही बन सकती । श्रौत और गृह्यसूत्रों को यदि नवीन माना जाता है, तो फिर उनमें बताया गया मन्त्रो का संस्कारो के लिये उपयोग भी सही नही माना जाना चाहिये । आप जितने अंश को वेद मानते है, उनमें तो कही भी मन्त्रो का विनियोग नामकरण, उपनयन प्रभृति संस्कारों के लिये नही बताया गया है । वेदो की तरह वेदांग भी अनादि हैं । वायुपुराण में अथर्ववेदीय नक्षत्रकल्प, वैतानकल्प, संहिताकल्प, आगिरसकल्प और शान्तिकल्प इन पाँच कल्प ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है । नक्षत्रकल्प में नक्षत्रो की शान्ति विधि बताई गई है । वैतानसूत्र मे दर्शपूर्णमास, अग्न्याधान आदि का वर्णन है । तीसरी संहिताविधि अर्थात् कौशिकसूत्र में शत्रु का उच्चाटन, भूत, प्रेत, पिशाच, बालग्रह आदि का निवारण, दुस्वप्न निवारण, पापनक्षत्र में उत्पन्न होने की शान्ति, अपशकुन शान्ति, अभिचारिक कर्मनिवारण प्रभूति विधियां वर्णित हैं । आगिरसकल्प में आभिचारिक कार्यो का स्वतन्त्र रूप से वर्णन है । शान्तिकल्प मे विनायक (गणपति), ग्रह आदि की पूजा और ग्रहयज्ञ आदि का वर्णन है । नक्षत्र तथा ग्रह के उत्पातो का वर्णन एव उनकी शान्ति की विधि को बताने वाला ग्रन्थ अथर्ववेद से हो संबद्ध है । अथर्ववेद के ' सहवमग्ने कृत्तिका० ', ' पुण्यं पूर्वाफल्गुम्यो' प्रभृति मन्त्रो मे नक्षत्रों की नामावली मिलती है । इससे स्पष्ट होता है कि ग्रह, नक्षत्र आदि की पूजावैदिक है । न्यायभाष्य में बताया गया है कि मन्त्र और ब्राह्मण भाग का प्रतिपाद्य विषय यज्ञ है । गोपथब्राह्मण का कहना कि चारों वेद यज्ञ का विस्तार करते है । सिद्धान्तशिरोमणि के गणिताध्याय में बताया गया है कि वेद यज्ञकर्मों का विधान बताने में प्रवृत्त हैं । मनुस्मृति में कहा गया है कि यज्ञ कर्म की सिद्धि के लिये हो ब्रह्मा ने ऋक्, यजु और सामवेद को दुहा । महाभाष्य पस्पशा-ह्निक में बताया गया है कि वेद मन्त्रो में याज्ञिक कर्मों का संपादन करनेवाला व्यक्ति प्रस्तुत कर्म के अनुसार आवश्यक परिवर्तन कर सकता है । यज्ञीय कर्म का यह मान्य नियम है । बृहत्पराशरस्मृति में बताया गया है कि बिना वेद मन्त्रों के द्विजाति की कोई भी क्रिया सम्पन्न नहीं हो सकती । ग्रहो को पूजा न करने से ही सती का विवाह अनुकूल शुभ फल न दे सका । शिवमहापुराण में बताया गया है कि दक्षकन्या सती का जब शिवजी के साथ विवाह हुआ, तत्र दक्ष ने ग्रहो की पूजा नहीं की और इस तरह से विवाह की विधिय पुरो न हो सकी । इसलिये ग्रहों को पूजा न होने से इसमें अन्ततः भयंकर दुष्परिणाम हुए । इसीलिये सभी नक्षत्रों, ग्रहों और

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वेदार्थपारिजातः १६३३ .' ( | | )च सर्वाणि ग्रहाश्च सह देवते पान्तु त्वाम् ग्राह्या ग्रहा संसृज्यन्ते स्त्रिया यम्रियते पति अथर्व० १२ २ ३९ ग्रहाणा ग्राह्या( विशेषग्रहदशा ) योगेन स्त्रीणा वैधव्यमुक्तम् ॥ तच्छान्त्यर्थं 'शन्नो दिविचरा ग्रहाः' ( अथर्व० १९ / ९/ ७ ) इति शान्तय उक्ता: । 'ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहा सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवा. शिवतरा सदा ॥ ' सर्वथापि नक्षत्रग्रहादयो वैदिकाः पूज्याश्च । तद्यजने मन्त्राश्च गृह्यसूत्रादिविनियुक्ता इति विनियोगानुसारिभिस्तदर्यश्च भाव्यम् । मन्त्राणामनेकार्थत्वं च समर्थितमेव निरुक्ते टीकायां दुर्गाचार्यादिभिः । 'ऐन्द्रथा गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' इति श्रुतिबलाद् ऐन्द्री ऋगपि गार्हपत्याग्निपरत्वेन व्याख्यायते मीमासकैः । कि बहुना, यत्र सर्वथापि विनियोगानुसारी नार्थ सम्भवति, तत्रापि दण्डस्फ्यादिद्रव्यविधयापि मन्त्राणामुपयोगः । यथा 'दण्डी प्रेषानन्वाह' इत्यादिबलाद् दण्डस्यादोना द्रव्याणामर्थ-, प्रतिपादकत्वाभावेऽपि द्रव्यत्वविधया विनियोगोऽदृष्टार्थमेव तथैव मन्त्राणामप्यर्थस्मारकत्वाभावेऽपि द्रव्यत्वेन रूपेणा- दृष्टार्थतया विनियोगबलादुपयोगः, मीमासकै शब्दस्य द्रव्यत्वाभ्युपगमात् । यत्तु – ' ( अयमग्निः ) परमेश्वरो भौतिको वा । दिव ) प्रकाशवल्लोकस्य ( पृथिव्या: ) प्रकाशरहितस्य च ( पति ) पालयिता । ( मूर्धा ) सर्वोपरि विराजमानः ( ककुत्पति ) ककुभा दिशा च मध्ये व्यापकतया सर्वपदार्थाना पालयिता ( अपां रेतासि ) अयमेव जगदीश्वरो भौतिकश्चाग्निः प्राणाना जलानाञ्च रेतासि वीर्याणि ( जिन्वति ) पुष्णाति । एवं चाग्निविद्युद्रूपेण सूर्यरूपेण च पूर्वोक्तस्य रक्षक. पुष्टिकर्ता चास्ति' ( पृ० ३४८ ) इति, तत्तु विश्वङ्खलमेव, अग्न्युपस्थान- प्रसङ्गेऽग्निदेवतापरत्वेन व्याख्यानस्यचित्येन ककुत्पदेन ककुभा ग्रहणे मानाभावात् । लोके ककुच्छब्दो गोपृष्ठोन्नतावयववाचक-त्वेन प्रसिद्धश्च । 'ककुदमिति महन्नाम' ( निघण्टु० ३ | ३| १ ९ ) इति वचनमिति यथाश्रुतस्य सार्थकत्वे बाहुलकत्वादन्यथान- देवताओ से पति की रक्षा की प्रार्थना की जाती है । अथर्ववेद में बताया गया है कि विशेष ग्रहो की कुटिल दृष्टि के कारण ही स्त्रियो को वैधव्य प्राप्त होता है । वहाँ इनकी शान्ति की विधियां भी बताई गई हैं । ग्रहो की शान्ति करने से आकाशमंडल के सूर्य प्रभृति जो भी ग्रह दारुण फल देने वाले होते है, वे सौम्य और मगलमय हो जाते है । इन सब वचनो पर भलीभाँति विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि नक्षत्र, ग्रह प्रभृति की पूजा वेदविहित है । इनकी पूजा के लिये वैदिक मन्त्रो का विनियोग गृह्यसूत्र प्रभृति में बताया गया है, अत: उनका अर्थ भी उसी के अनुसार होना चाहिये । मन्त्रो के अनेक प्रकार के अर्थ होते है, इस बात का समर्थन निरुक्त की टीका में दुर्गाचार्य प्रभृति ने किया है । श्रौतसूत्र के प्रमाण से ही मोमासक गण इन्द्र सम्बन्धी ऋचा का विनियोग अग्नि के उपस्थापन मे करते है । मीमासाशास्त्र में तो यहाँ तक विचार किया गया है कि जिस मन्त्र का विनियोग के अनुसार अर्थ हो ही न सकता हो, वहीं भी दण्ड, स्पय प्रभृति द्रव्यों को दिये गये निर्देशों के अनुसार अर्थ करना चाहिये । जैसे 'दण्डी प्रेषानन्वाह' प्रभृति वाक्यों के सहार दण्ड स्फ्य प्रभृति जड द्रव्यो मे अर्थप्रतिपादक शक्ति का अभाव होते हुए भी द्रव्य के विधान मात्र में अदृष्ट की उत्पत्ति के लिये विनियोग मान लिया जाता है, उसी तरह से कुछ स्थलो में मन्त्रो की अर्थस्मारकता के अभाव में भी द्रव्य के रूप में ही अदृष्ट की उत्पत्ति मे सहायक होने मात्र के लिये विनियोग के सहारे उपयोगिता मान ली जाती है । यहाँ इस बात को ध्यान मे रखना चाहिये कि मीमा- सक शब्द को द्रव्य ही मानते है । ' अग्निर्मूर्धा ० ' इस मन्त्र का स्वामी दयानन्द ने यह अर्थ किया है-' यह जो अग्निसंज्ञक परमेश्वर या भौतिक अग्नि है, वह प्रकाश वाले और प्रकाशरहित लोकों का पालन करने वाला तथा सब पर विराजमान और दिशाओ के मध्य में अपनी व्यापकता से सब पदार्थों का राजा है । 'व्यत्ययो बहुलम्' इस सूत्र से 'ककुभ्' शब्द के भकार को नकारादेश हो गया है । वही जगदीश्वर प्राण और जल के वीर्यों को पुष्ट करता है । इस प्रकार भूताग्नि भी विद्युत् और सूर्यरूप से पूर्वोक्त पदार्थों का पालन और पुष्टि करने वाला है' ( पृ० ३४८ ) । किन्तु यह अर्थ सर्वथा आधार रहित है, क्योकि जब मन्त्र का विनियोग अग्नि के उपस्थान में किया जाता है, तो उसकी व्याख्या अग्निदेवता से ही संबद्ध की जानी चाहिये और तब ककुद् शब्द का अर्थ दिशा नही किया जा सकता । लोक में ककुद् शब्द गाय-बैल की पीठ पर उठे हुए भाग के लिये प्रसिद्ध है । निघण्टु में महत् के अर्थ मे ककुद् शब्द का प्रयोग किया गया है । जब यथाश्रुत पद का ही प्रकरण सगत अर्थ किया जा सकता है, तो व्यत्यय के आधार पर अर्थ मे परिवर्तन करना उचित नहीं है । इसके बाद भी दिशा २०५

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वेदार्थपारिजातः १६३४ यतस्यायुक्तत्वाच्च । तत्र मञ्चाः क्रोशन्तीतिवत् तात्स्थ्यात् तत्र स्थितेषु वस्तुषु लक्षणाश्रयणगौरवाच्च । तस्मात् पूर्वोक्त- व्याख्यानमेव युक्तम् । एवमेव ' उद्बुध्यस्व ' इत्यत्र यदुक्तम्-' हे अग्ने परमेश्वर, अस्माक हृदये त्वमुबुध्यस्व प्रकाशितो भव । अविद्या- न्धकारनिद्रातः सर्वान् जीवान् पृथक्कृत्य विद्यार्कप्रकाशे जागृतान् कुरु । हे भगवन्, अयं जोवो धर्मार्थकाममोक्षसामग्र्याः पूर्ति सृजेत् । त्वमस्येष्ट सुखं सृजे । एव परस्परं द्वयोः सहायपुरुषार्थाभ्यामिष्टाभ्यामिष्टापूर्वे ससृष्टे भवेताम् | अस्मिल्लोके शरीरे चाध्युत्तरास्मिन् परलोके द्वितीयजन्मनि विश्वेदेवा यजमानश्च सोदत, सर्वे विद्वांसो यजमानो विद्वत्सेवाकर्ता च कृपया सदा सीदन्तु वर्तन्ताम् । यतोऽस्माक मध्ये सदैव सर्वा विद्याः प्रकाशिता भवेयुः ' ( पृ ० ३४८ ) इति । एतद् व्याख्यानमपि प्रकरण- विरुद्धमेव, 'पञ्चम्यामन्तेष्वश्विनीवदसपत्नानग्ने जातानिति प्रतिमन्त्रम्' ( का० श्री ० सू० १७| ११ | १-३ ) पञ्चम्या चितौ अश्विनीवद् असपत्नसज्ञा इष्टका अन्तेषूपदधाति---अग्ने जातः नित्यादय । हे अग्ने, उद्बुध्यस्वेति सावधानो भवेत्येवार्थः । एवं यजमान प्रतिजागृह सावधान कुरु । इष्टापूर्ते ससृजेथाम् इष्टापूर्ते श्रौतस्मार्तकर्मणी एव । इष्टं दर्शपूर्णमासादय, पूतं वापीकूपतडागादय । ताभ्यामय ससृष्टो भवत्वित्यर्थः । ' अय धर्मार्थकाममोक्षसामक्या पूर्ति सृजेत्' इत्यपि निर्मूलम्, पूर्ति- सृजिशब्दयोरभावात् । त्वमस्येष्टं सृजेरित्यपि निर्मूलम् तादृशपदाभावात् । तस्मादिष्टापूर्ते ससृजेथा संसृष्टे भवेतामित्ये- वार्थ, उपस्थित परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात् ॥ किञ्च सर्वे विद्वास एकेन सेवकेन इह जन्मनि परस्मिन् वा सीदन्तीत्यपि निर्मूलम्, असम्भवात् । तस्मादनेन मन्त्रेण विश्वैर्देवैः सायुज्यमेव यजमानस्य प्रार्थ्यत इति महीधरोक्तमेव युक्तम् । पद से दिशाओ में विद्यमान वस्तुओ का ग्रहण करना उसी तरह से गौरव का कारण बन जाता है, जिस तरह से कि ' मञ्च क्रोशन्ति' इस वाक्य में लक्षणा का सहारा लेकर मच स्थित पुरुषो का मन्च पद से ग्रहण करने मे गौरव माना जाता है । इसलिये इस मन्त्र की हमारी पूर्व प्रदर्शित व्याख्या ही सही है । इसी तरह से 'उद्बुध्यस्व' इस मन्त्र की व्याख्या स्वामी दयानन्द ने इस तरह से की है -' हे परमेश्वर । हमारे हृदय मे प्रकाशित होइये | अविद्या की अन्धकार रूप निद्रा से हम सब जीवों को अलग करके विद्यारूप सूर्य के प्रकाश से प्रकाशमान कीजिये, जिससे कि हे भगवन्, मनुष्यदेह धारण करनेवाला जो जीव है, वह जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सामग्री की पूर्ति कर सके, वैसे आप इष्ट सिद्ध कीजिये । इस लोक और इस शरीर तथा परलोक और दूसरे जन्म में आपकी कृपा से सब विद्वान् और यजमान, अर्थात् विद्या के उपदेश के ग्रहण और सेवन करने वाले मनुष्य लोग सुख से सदा वर्तमान बने रहे, जिससे कि हम लोग विद्या से युक्त होते रहें । 'व्यत्ययो बहुलम्' इस सूत्र मे ' संसृजेथाम्' और 'सोदत' इन प्रयोगों मे पुरुष व्यत्यय, अर्थात् प्रथम पुरुष की जगह मध्यम पुरुष हुआ है' ( पृ० ३४८- ३४ ९ ) । किन्तु यह व्याख्या भी प्रस्तुत प्रकरण के विरुद्ध है । कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार इस मन्त्र का विनियोग असपत्न नामक इष्टका के उपधान में किया जाता है । अतः ' उद्बुध्यस्व ' पद का अर्थ 'सावधान हो जाओ' यह होगा । हे अग्ने, तुम सावधान हो जाओ और इस यजमान को भी सावधान कर दो । इष्टापूर्त शब्द श्रौत और स्मार्त कर्मों के लिये प्रयुक्त होता है । दशपूर्णमास प्रभृति श्रौत कर्म ' दृष्ट' तथा वापी, कूप, तडाग आदि का स्मार्त विधि मे निर्माण 'पूर्त' कहलाता है । इन दोनों तरह के श्रोत और स्मार्त कर्मों के फल से यह यजमान संपन्न होवे । यही मन्त्र का सरल अर्थ है । 'वह वर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सामग्री की पूर्ति कर सके ' यह अर्थ निराधार है, क्योकि मन्त्र में पूर्ति और सृजि दोनो शब्दों का अभाव है । 'आप इसका इष्ट सिद्ध कीजिये' यह भी निर्मूल है, क्योकि इसके बोधक पद मन्त्र में नही है । इसलिये इष्ट और पूर्त कर्म यजमान से संसृष्ट हों, यही अर्थ मही माना जायगा | उपस्थित अर्थ को छोडकर अनुपस्थित अर्थ की कल्पना प्रामाणिक नही मानी जाती । सारे विद्वान् एक ही सेवक के साथ इस जन्म में और दूसरे जन्म में भी रहते है, ऐसा अर्थ करना भी सरासर गलत है, ऐसा हो ही नही सकता । इसलिये इस मन्त्र से यजमान की विश्वेदेवों के साथ एक लोक में निवास को ( सायुज्य ) प्रार्थना कीजाती है, महीधर का यह कथन ही सही है ।

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' वेदार्थपारिवान १६३५ यदपि ' बृहस्पते अति' इत्यत्रोक्तम्-' हे बृहता वेदाना पते पालक ऋतप्रजात वेदविद्याप्रतिपादित जगदीश्वर, त्वं जनेषु यज्ञकारकेषु विद्वत्सु लोकलोकान्तरेषु क्रतुमद् भूगास क्रतवो भवन्ति यस्मिन् तत्, घुमत् सकलव्यबहारपकाशो भवति यस्मिन्, दानयोग्यं शवसो बलस्य प्रापकं येन विद्यादिधनेन युक्तः सन्नर्य स्वामी, राजा वणिग्जनो वा विभाति, चित्रमद्भुतं यद् धन तदस्मासु द्रविणं घेहि' ( पृ० ३४ ९ ) इति, तदपि विशृङ्खलमेव, बृहस्पतिसवे बार्हस्पत्यग्रहग्रहणेऽस्या सोपयामाया विनियोगात् । प्रजातेत्यस्य चोत्पत्तिरर्थो न प्रतिपादनम् । तेन ऋताद् ब्रह्मण. सकाशात् प्रकृष्ट जातं जन्म यस्य ग ऋत- प्रजातेत्येवार्थः ॥ चित्र नानाविधं द्रविणमस्मासु धेहीति ॥ यद् धनमर्यं ईश्वर अर्थात् पूजयेत् यच्च द्युमत् क्रतुमत् । वस्तुतस्तु महोधरोक्तदिशा पदार्थान् ज्ञात्वापि स्वकीयार्थस्य वैलक्षण्यबोधनायैव विकृतिमुपनीत व्याख्यानम् । ' अन्नात् परिस्रुतो रसं ' इत्यत्र यदुक्तम् '( क्षत्रं ) यद्राजकर्म क्षत्रियो वा ( ब्रह्मणा ) वेदविद्भिश्च गह ( पन ) अमृतात्मकं ( सोमं ) सोमाद्योषधिसम्पादित ( रमं ) बुद्धयानन्दशौर्यधैर्यबलपराक्रनादिसद्गुणप्रदम् ( व्यपिबत् ) पानं करोति, तत्र स समाध्यक्षो राजन्यः ( ऋतेन ) यथार्थवेदविज्ञानेन ( सत्य ) धर्मं राजव्यवहारं च ( इन्द्रिय ) शुद्धविद्यायुक्तं शान्तं मन, ( विपानं ) विविधराजधर्मरक्षण ( शुक्रं ) आशु सुखकरम् ( अन्धसः ) शुद्धान्नस्य इच्छाहेतुम् ( पय ) सर्वपदार्थ- सारविज्ञानयुक्तम् ( अमृतं ) मोक्षसाधकं ( मधु ) मधुरं सत्यशीलस्वभावयुक्त ( इन्द्रस्य । परमैश्वर्ययुक्तस्य ईश्वरस्य कृपया ( इन्द्रियम् ) विज्ञानयुक्त मनः प्राप्य ( इदम् ) सर्व व्यावहारिकपारमार्थिकं सुखं प्राप्नोति । ( प्रजापतिः ) परमेश्वर एव-माज्ञापयति यः क्षत्रिय प्रजापालनाधिकृतो भवेत् स एवं प्रजापालन कुर्यात् ( अन्नात् परिस्रुत । स चामृतात्मको रसोऽन्नाद् भोज्यात् पदार्थात् परितः सर्वतः स्रुतश्च्युतो यक्तो वा कार्य: । यथा प्रजायामत्यन्त सुखं सिध्येत् तथैव क्षत्रियेण कर्तव्यम् । ' ( पृ० ३४९ ) इति, तत्तु सर्वथानृतमेव, एवमाज्ञापयतीति पदस्य मूलेऽभावात्, अन्नाद् भोज्यपदार्थात् कथममृतात्मको 'बृहस्पते अति० ' इस मन्त्र की ब्याख्या इस तरह से की गई है - 'हे वेदविद्यारक्षक! वेदविद्या से प्रसिद्ध जगदीश्वर! आप जो सत्यविद्या रूप अनेक प्रकार का अद्भुत धन है, सो हमारे बीच मे कृपा करके स्थापन कीजिये । कैसा वह धन है कि विद्वानो और लोक-लोकान्तरो मे जिससे बहुत से यज्ञ किये जाँय, जिसमे सत्य व्यवहार के प्रकाश का विधान हो, बल को रक्षा करनेवाला, धर्म और सबके सुख का प्रकाश करने वाला है, तथा जिसमे धर्मयुक्त योग्य व्यवहार के द्वारा राजा और वैश्य प्राप्त होकर धर्मव्यवहार अथवा धार्मिक श्रेष्ठ पुरुषो मे प्रकाशमान होता है, उस संपूर्ण विद्या युक्त धन को हमारे बीच मे निरन्तर धारण कीजिये, ( पृ० ३५० ), किन्तु यह व्याख्या भी निराधार है । वस्तुतः इस मन्त्र का बृहस्पति सब में बार्हस्पत्य पात्र के ग्रहण में विनियोग किया गया है, अत ऋत अर्थात् ब्रह्मा से जिसकी उत्पत्ति हुई है, वह बृहस्पति ही यहाँ ऋतप्रजात शब्द से गृहीत होगा । चित्र अर्थात् नाना प्रकार के धन को हमे दो । वह धन स्वामित्व का संपादक, आदर दिलानेवाला और यज्ञो का संपादक हो । वास्तव मे स्वामी दयानन्द मन्त्रो का अर्थ समझने के लिये तो महीधर भाष्य का ही सहारा लेते है, किन्तु कुछ अपनी विलक्षणता और वैशिष्ट्य जताने के लिये वे उसको बिगाड देते हैं । 'अन्नात् परिस्रुतो रस० ' इस मन्त्र की व्याख्या इस तरह से की गई है-' जो राजकर्म अथवा क्षत्रिय हैं, वह सदा न्याय से वेदवित् पुरुषो के साथ मिलकर ही राज्यपालन करे । इसी प्रकार जो अमृतरूप सोमलता आदि ओषधियो का भार तथा जो बुद्धि, आनन्द, शूरता, धीरज, बल और पराक्रम आदि उत्तम गुणो का बढानेवाला है, उनको जो राजपुरुष अथवा प्रजास्थ लोग वैद्यक शास्त्र की रीति से पीते हैं, वे सभासद् और प्रजास्थ मनुष्य लोग वेदविद्या को यथावत् जानकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, शुद्धविद्यायुक्त शान्त स्वरूपपन, यथावत् प्रजा का रक्षण, शीघ्र सुख कराने वाला, शुद्ध अन्न की इच्छायुक्त, सब पदार्थों का सार, विज्ञानसहित मोक्ष के ज्ञान आदि साधन, मधुर वाणों और शील आदि जो श्रेष्ठ गुण हैं, उन सबसे परिपूर्ण होकर परमेश्वर्य युक्त व्यापक ईश्वर की कृपा से विज्ञान को प्राप्त होते हैं । इसलिये परमेश्वर सब मनुष्यों और राजपुरुषों को आज्ञा देता है कि तुम लोग पूर्वोक्त व्यवहार 4 और विज्ञान विद्या को प्राप्तकर धर्म से प्रजा का पालन किया करो । उक्त अमृतस्वरूप रस को उत्तम भोजन के पदार्थों के साथ मिलाकर सेवन किया करो, जिससे कि प्रजा में पूर्ण सुख की सिद्धि हो' ( पृ० ३५० ) | किन्तु यह व्याख्यान एकदम गलत है, क्योंकि आज्ञा का प्रदर्शक कोई पद मन्त्र में विद्यमान नही है । अन्न अर्थात् भोज्य पदार्थ से अमृतस्वरूप रस को कैसे चुवाया जायगा, अथवा अन्न में अमृत कैसे

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वेदार्थपारिजातः १६३६ रसश्च्युतो युक्तो वा कार्य इत्यस्यानिरूपणात् । एव बुद्धयानन्दादिप्रद रस व्यपिबत् इत्यत्रापि किमूलम्? विपान विविधराज - धर्मरक्षणमित्यपि निर्मूलम्, अन्धसः शुद्धान्नस्येच्छाहेतुमित्यपि स्वकपोलकल्पितमेव व्याख्यानम् । कृपयेत्यपि निर्मूलम् । प्राप्नोतीत्यपि निर्मूलम् । उव्वटमहीधरानुसारेण तु हविर्लक्षणादन्नात् परिस्रुतः प्रथमशरीरी प्रजापति रसं ब्रह्मणा गायत्री-लक्षणेन व्यपिबत् । विविच्य पीतवान्, क्षत्रं च व्यपिबत्, पय सोम च व्यपिबदित्येवार्थः । शन्नो देवीरित्यत्रापि - ' देव्य आपः सर्वव्यापक ईश्वर अभिष्टये इष्टानन्दप्राप्तये पीतये पूर्णानन्दभोगेन तृप्तये नः श कल्याणकारिका भवन्तु । ता आपो देव्यः स एवेश्वरो नोऽस्माकमुपरि शंयो सर्वत सुखस्य वृष्टिं करोतु | अत्रापः- शब्देन परमात्मनो ग्रहणे प्रमाणमुक्तम्- 'यत्र लोकाश्च कोशाश्चापो ब्रह्म जना विदुः । असञ्च यत्र सच्चान्तः स्कम्भं त ब्रूहि कतम स्विदेव सः ॥ ' ( अथर्व ० १०| ७| १० ) तदर्थोऽप्येवमुक्त: -'विद्वास आपो ब्रह्मणो नामास्तीति जानन्ति । यस्मिन् परमेश्वरे सर्वान् भूगोलान् निधीश्च यस्मिश्चानित्यं कार्यं जगदेतत् नित्य कारण च स्थितं जानन्ति स जगद्धाता सर्वेषा पदार्थाना मध्ये कतमोऽस्ति विद्वंस्त्व ब्रूहि इति पृच्छयते । ( अन्त.) स जगदीश्वरः सर्वेषा जीवादिपदार्थानामभ्यन्तरेऽन्तर्यामिरूपेणावस्थि-तोऽस्तीति भवन्तो जानन्तु ' (पृ० ३५१ ) इति, तदपि मन्दम्, प्रसिद्धार्थत्यागे कारणाभावात्, ' अब्देवत्या गायत्रीति' उव्वटादि-वचनविरोधाच्च । पीतय इत्यस्य पानायेत्यर्थपरित्यागे नवीनतृप्त्यर्थंकल्पने मानाभावाच्च । शंयोः सर्वतः सुखस्य वृष्टि करोतु, इत्यपि निर्मूलम्, वृष्टिबोधकपदाभावात् । 'शमनं रोगाणा यावनं च भयानाम्' ( निरुक्त ४।२१ ) इति निरुक्त-विरोधाच्च ॥ यत्र लोकांश्चेत्यस्य त्वयमर्थं --p यत्र लोकान् कोशानपश्च जना जानन्ति यत्रासत्कारणं सत् कार्यं च भवति तं स्कम्भ ब्रूहीति प्रश्न । मिलाया जायगा, इसकी कोई विधि भी यहाँ नही बताई गई है । इसी तरह बुद्धि को आनन्द से भर देने वाले रस को पीने की बात भी कहाँ से निकलेगी? विपान शब्द का अर्थ यथावत् प्रजा का रक्षण भी कैसे होगा? 'अन्धस ' पद का अर्थ शुद्ध अन्न की इच्छायुक्त करना कोरी मनमानी है । ईश्वर की कृपा की बात निकालना भी निराधार है । 'प्राप्नोति' पद का अध्याहार भी बिना प्रमाण का है । उव्वट और महीघर के अनुसार तो हविःस्वरूप अन्न से निकला प्रथम शरीरधारी प्रजापति गायत्री मन्त्र की सहायता से सभी पदार्थो के सार स्वरूप का विवेकपूर्वक पान करता है, वह बल का, जल और सोम का भी पान करता है । यह सीधा सा अर्थ इस मन्त्र का है । ' शन्नो देवी ० ' इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्वामी दयानन्द कहते है -'आप्लु व्याप्तौ' इस धातु से अप् शब्द सिद्ध होता है । यह सदा स्त्रीलिंग और बहुवचनान्त प्रयुक्त होता है । 'दिवु ' धातु के क्रीडा आदि अर्थ हैं, उससे ' देवी ' शब्द सिद्ध होता है । ' देवी:' अर्थात् जो ईश्वर सबका प्रकाश और सबको आनन्द देनेवाला, सर्वव्यापक है, वह इष्ट आनन्द और पूर्णानन्द की प्राप्ति के लिये हमको सुखी होने के लिये कल्याणकारी हो । वही परमेश्वर हम पर सुख की वृष्टि करे । इस मन्त्र में ' आप ' शब्द से परमात्मा के ग्रहण होने मे 'यत्र लोकाश्च० ' यह मन्त्र प्रमाण है । इसका अर्थ यह है कि विद्वान् लोग ऐसा जानते हैं कि 'आप ' परमात्मा का नाम है । प्रश्न -सुनो जी! जिसमें पृथिवी आदि सब लोक, सब पदार्थ स्थित है, तथा जिससे अनित्य कार्य जगत् और नित्य सब वस्तुओं का कारण, ये सब स्थित हो रहे है, वह सब लोको को धारण करने वाला कौन पदार्थ है? उत्तर-1 जो सब पृथिवी आदि लोक और जीवों के बीच में अन्तर्यामी रूप से परिपूर्ण भर रहा है । ऐसा जानकर आप लोग उस परमेश्वर को अपने ही अन्तकरण में खोजो' ( पृ० ३५१-३५२ ) । किन्तु यह सारी व्याख्या भी एक दम लचर है । प्रसिद्ध अर्थ को छोड देने का कोई कारण यहाँ नही दिखाई पड़ता । उव्वट और महीधर ने इस मन्त्र का छन्द गायत्री और देवता यज्ञ बताया है । 'पीतये' शब्द का सीधा-सादा अर्थ पीने के लिये है, उसको छोड़ कर ' तृप्ति के लिये' इस नये अर्थ की कल्पना में कोई प्रमाण नही है । 'शंयो ' पद का सब तरह से सुख की वृष्टि करो, यह अर्थ भी निराधार हैं, क्योंकि मन्त्र में वृष्टि का बोधक कोई पद नही है । ऐसा करने पर उस निरुक्त वाक्य से भी विरोध पड़ेगा, जिसमें कि रोगों के शयन और भय के अपाकरण की बात कही गई है । ' यत्र लोकाश्च' इस मन्त्र का संक्षिप्त अर्थ यह है -- मनुष्य जिस मूल कारण में सारे लोको1, कोशो और इस जलमय सृष्टि को जानने का प्रयत्न करते हैं, जहां कारण और कार्य दोनों को स्थिति रहती है, उस मूल कारण का तुम वर्णन करो । इस तरह से पूरे मन्त्र में केवल प्रश्न ही किया गया है ।

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वेदार्थपारिजात १६३७ एवमेव -'कया नश्चित्र ' इत्यत्र यदुक्तम् -'( क्या ) उपासनारीत्या ( शचिष्ठया ) अनिशयेन सत्कर्मानुष्ठान- प्रकारया ( वृता ) शुभगुणेषु वर्तमानया ( कथा ) सर्वोत्तमगुणालङ्कृतया सभया प्रकाशितः, ( चित्रः ) अद्भुतानन्तशक्तिमान् ( सदावृध ) सदानन्देन वर्धमान इन्द्र परमेश्वर ( नः ) अस्माक ( सखा ) मित्र ( आभुवत् ) यथाभिमुखो भूत्वा ( ऊती ) स जगदीश्वरः कृपया सर्वदा सहायकरणेनास्माकं रक्षको भवेत्, तथैवास्माभि स सत्यप्रेम भक्त्या सेवनीयः' ( पृ० ३५१ ) इति, तदेतत्सर्वं कुशकाशावलम्बनमात्रमेव, मूलास्पर्शित्वात् । ( वृता ) शुभगुणेषु वर्तमानयेति विसङ्गतमेव, शुभगुणेष्वित्यध्या- हारे बीजाभावात् । असङ्गतेश्च । शुभगुणेषु वर्तमाना क्रिया सभा वा? नाभयमिह सम्भवति, गुणाना निष्क्रियत्वात् । , द्रव्याश्रितत्वेन द्रव्याश्रयत्वासम्भवाच्च । मित्र इत्यशुद्धम् मित्रशब्दस्य नियतनपुसकलिङ्गत्वात् । अन्यत् सर्वं तु मन्त्राक्षरबाह्यमेव । 'केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे । समुषद्भिरजायथाः ||' ( वा० सं ० २ ९ १३७ ) इत्यत्र यदुक्तम् -' हे मर्या मनुष्याः, उषद्भिः परमेश्वर कामयमानैस्तदाज्ञायां वर्तमानैर्विद्वद्भिर्युष्माभिः सह समागमे कृते सत्येव अकेतवे अज्ञानविनाशाय केतुं प्रज्ञानम् अपेशसे दारिद्र्यनाशाय ( पेश ) चक्रवर्ति राज्यादिसुखसम्पादकं धनं च कृण्वन् कुर्वन् सन् जगदीश्वर: ( अजायथाः ) प्रसिद्धो भवतीति वेदितव्यम्' ( पृ० ३५१ ) इति, तदपि न मनोज्ञम्, ' उष दाहे' इति धातोर्निष्पन्नस्योषद्भि- रिति पदस्य कामयमानैरिति नार्थं सम्भवति, धात्वर्थविरुद्धत्वात् । विद्वद्भि: सह समागमे कृते सत्येव " ईश्वरः अजायथाः प्रसिद्धो भवतीत्यर्थस्यानुपपत्ते । नहि मूले तादृशः शब्दोऽस्ति यस्येदृशोऽर्थः स्यात् । 'उषद्भिरजायथाः' इत्येव तु पाठः । नहि त्वद्रीत्या परमात्मा जायते, तस्य नित्यत्वादवतारानङ्गीकाराच्च । मध्यमपुरुषप्रयोगश्च दोपपद्यते । कि बहुना, जगदीश्वर- इसी तरह से 'कया न चित्र० ' इस मन्त्र की व्याख्या में कहा गया है-'जो किसी उपासना रीति और सत्य धर्म के आचरण से सभासद् सहित सत्य विद्या आदि गुणो मे प्रवर्तमान सुखरूप वृत्ति सहित सभा से प्रकाशित, अद्भुतस्वरूप, आनन्दस्वरूप और आनन्द बढाने वाला परमेश्वर है, वह हमारी आत्माओ मे प्रकाशित हो । किस प्रकार वह जगदीश्वर हमारा सदा सहायकहाकर कृपा से नित्य रक्षा करे, इसके लिये प्रार्थना की जाती है कि हे अग्ने | जगदीश्वर! आपकी आज्ञा से जो रमण करने वाले है, उन्ही पुरुषो से आप जाने जाते है और उन्ही धार्मिक पुरुषो के अन्त करण में आप अच्छी तरह से प्रकाशित होते रहे' ( पृ० ३५२ ) । किन्तु यह सारा कथन भी ' डूबते को तिनके का सहारा' वाली कहावत को चरितार्थ करने वाला है, क्योकि इस व्याख्या का मन्त्र में विद्य- मान शब्दो से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नही है । 'वृता' पद का सत्यविद्या आदि गुणो में प्रवर्तमान, यह अर्थ असंगत है, क्योंकि 'शुभ- गुणेषु' इस पद के अध्याहार का कोई तुक नही है, साथ ही यह असगत भी है । शुभ गुणो मे विद्यमान क्रिया योगी या सभा? दोनों ,, को ही स्थिति शुभ गुणो मे नही हो सकती क्योकि गुणो मे क्रिया नहीं होती । गुण स्वयं द्रव्य के आश्रित है वे स्वयं किसी के आश्रय नही हो सकते । मित्र शब्द का पुल्लिङ्ग में प्रयोग भी गलत है, क्योंकि इस अर्थ मे यह नित्य नपुंसक लिंग में प्रयुक्त होता है । इसके सिवाय अन्य दूसरी बातों का मन्त्र से कोई सम्बन्ध नही है । 'केतुं कृण्वन्नकेतवे ० ' इसकी व्याख्या में कहा गया है -'हे मनुष्यो, परमेश्वर के चाहने पर ही उसकी आज्ञा के अनु- सार चलने वाले आप जैसे विद्वानो के साथ रहने पर ही परमात्मा अज्ञान के नाश के लिये ज्ञान का प्रकाश करता है और दारिद्र्य के नाश के लिये चक्रवर्ती राज्य, नाना प्रकार के सुखो को देने वाले धन का अंबार लगा देता है, इस बात को अपने मन मे दृढता से बैठा लेना चाहिये । परमात्मा के प्रति ऐसा दृढ विश्वास अपने मन में बैठा लेने वाला व्यक्ति कभी दुःख को प्राप्त नही होता ' (पृ० ३५२) यह अर्थ भी ठीक नही है, क्योकि 'उष दाहे' इस धातु से निष्पन्न ' उषद्भि:' इस पद का अर्थ चाहने वाले कभी नही हो सकता, यह अर्थ धातु के अर्थ दाह ( जलाना ) से सर्वथा भिन्न है । विद्वानो के साथ रहने पर ही ईश्वर प्रसिद्ध होता है, इस अर्थ को मन्त्र के पदों से निकाल पाना कठिन है । मूल में 'उषद्भिरजायथाः' यही पाठ है । आपके मत से तो परमात्मा का अवतार भी नही होता, तब उसके उत्पन्न होने की बात आप कैसे मान सकते हैं । नित्य परमात्मा का तो जन्म होता नहीं । उसके प्रति मध्यम पुरुष का प्रयोग उचित नही माना जा सकता । प्रस्तुत मन्त्र मे जगदीश्वर परमात्मा का बोधक कोई पद है भी नही । हमारे मत से तो इस मन्त्र का छन्द गायत्री,

पृष्ठ 740

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 740 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः १६३८ बोधकोऽपि कश्चिच्छन्दो मूले नास्ति । सिद्धान्ते त्वग्निदेवत्या मधुच्छन्दो दृष्टेयं गायत्रीति हेतो: ' अग्ने ' इत्येव सम्बोधनम् । स चग्निः उषद्भिर्यजमाने, उषन्ति हविर्दहन्तीत्युषन्तो यजमाना अग्निहोत्रकर्तारो वजमाना एवात्र गृह्यन्ते धात्वर्था-,नुरोधात् । वसतेर्वा कृत सम्प्रसारणस्यैतद्रूपम् उषद्भिरग्नि प्रति निवमद्भिरुपासकैर्जायमा सन् समजायथा उत्पद्यसे इति वार्थः । तेषामेवाग्निररणिमन्थनैः स्तोत्रैश्चाविर्भयतीति तदभिप्रायेणाजायथा इत्युक्ति । मर्या इति न सम्बोधनपदम्, किन्तु विभक्तिव्यत्ययेन चतुर्थी वेदितव्या । हे अग्ने, त्वम् अकेतवे ज्ञानहीनाय मर्याय केतु प्रज्ञान कुर्वन् सुवर्णादिधनहीनाय सुवर्णं कुर्वन् होमकर्तृभिरजायथा मन्थनादिद्वाराविर्भवसीत्यर्थः । पेशः शब्दोऽपि सुवर्णाद्यर्थको न चक्रवर्तिराज्यसुखपर, प्रमाणाभावात् । सामाजिकैस्तु मन्त्राणामभ्यासार्थमेव यज्ञेषूच्चारणं क्रियते, यागादिश्च वायुजलशुद्धयर्थमेव । तथा सति मन्त्रा ग्रहार्थस्तावका बोधका वा भवन्तु, मावा भवन्तु तथापि मन्त्राणामभ्यासार्थमुच्चारणं यथान्यत्र यज्ञेषु कर्तव्यम्, तथैव ग्रहयागेष्वपि कर्त्तव्यमेव, तद्रीत्या विनियोगस्याकिञ्चित्करत्वात् । मीमासकास्तु द्रव्यदेवतास्मारकत्वेन मन्त्रोच्चारणमभ्यु- हो अत इस मन्त्र मे अग्नि को ही सम्बोधित किया जाता है । वह अग्नि अग्निहोत्र प्रभृति पवित्र देवता अग्नि और ऋषि मधुच्छन्दा । याज्ञिक कर्मों का अनुष्ठान करने वाले यजमानो केहाथो अरणि मन्थन की प्रक्रिया से पैदा किया जाता है । प्रज्वलित अग्नि में हबि प्रदान करने वाले यजमानो का बोध 'उषद्भि ' इस पद से होना है । यह अर्थ धातु के अपने अर्थ के अनुरूप है, क्योकि धातु का अर्थ जलाना है और यजमानो के द्वारा अग्नि में दी गई हवि भी जल जाती है । वस धातु का सम्प्रसारण कर देने पर भी यह रूप बनेगा | तब उसका अर्थ होगा कि अग्नि को उपासना के लिये उसके पास रहने वाले उपासको के द्वारा यह आग्न पैदा किया गया है । वे उपासक ही अणि काष्ठो का मन्थन करते हुए स्तोत्र-शस्त्र आदि का पाठ करके इसको पैदा करते है, इसी लौकिक प्रक्रिया के आधार पर अग्नि- देव की उत्पत्ति की बात मन्त्र में बताई गई है । ' मर्या' यह पद सम्बोधनात्मक न होकर विभक्ति का विपरिणाम करके चतुर्थ्यन्त माना जाता है । तब इस मन्त्र का सक्षिप्त अर्थ यह होगा कि हे अग्ने, तुम ज्ञानहीन अज्ञानी पुरुष को ज्ञान प्रदान करते हुए और सुवर्ण प्रभृति धन-सम्पत्ति से हीन पुरुष को घनवान् बनाते हुए मन्थन क्रिया से यजमानों के हाथो पैदा होते हो । यहाँ पेश शब्द भी सुवर्ण प्रभृति धन-सम्पत्ति का दावा है, 'चक्रवर्ती राज्य का सुख' इसका अर्थ नही है, क्रोकि ऐसा अर्थ करने मे कोश प्रभृति का कोई प्रमाण उपलब्ध नही है । आर्यसमाजियो का मन्तव्य है कि यज्ञ के अवसर पर मन्त्रो का उच्चारण वेवल इसलिये किया जाता है कि उनका अभ्यास, उनकी स्मृति बनी रहे और यज्ञ -याग प्रभृति का प्रयोजन भी केवल जल वायु की शुद्धि है । इस परिस्थिति मे Hearts अर्थ को बतावें या न बतावें,, तो भो मन्त्रों के अभ्यास के लिये जैसे अन्य यज्ञो के अवसर पर उनका उच्चारण किया जाता है उसी तरह से ग्रह याद के अवसर पर भी उनका उच्चारण कर लिया जाय, तो इसमें आपको क्या आपत्ति ? आपके मत से विनियोग निरर्थक होते है । आपके इस मत के विपरीत मीमासकगण द्रव्य और देवता के स्मरण के लिये किसी भी कर्म के अवसर पर मन्त्रो का उपयोग मानते हैं, अर्थात् उनके मत से मन्त्रों का उच्चारण इसलिये किया जाता है कि जिससे प्रस्तुत कर्म का देवता क्या है और उस कर्म से किस द्रव्य का उपयोग होगा, यह बात याद पड़ जाय । इनके मत के प्रत्येक मन्त्र की किसी भी अनुष्ठान के साथ स्पष्ट संगति बतानी पडेगी । इस मत के अनुसार ग्रहपूजा में उन मन्त्रो अनुसार का उपयोग हो हो नहीं सकता, जो कि उन उन ग्रहदेवताओं और उनके निमित्त अर्पित किये जाने वाले द्रव्यो का बोध न करावें । यद्यपि ब्राह्मण वाक्यो से भी अनुष्ठान के उपयोगी द्रव्य-देवता का स्मृति जाग सकती है, किन्तु विनियोग के आधार पर यह नियम मान लिया जाता है कि द्रव्य और देवता का स्मरण मन्त्रों का उच्चारण करके ही किया जाय । इस नियम के कारण अदृष्ट तभी उत्पन्न होगा, जब कि मन्त्रों की सहायता से द्रव्य और देवता का स्मरण कर अनुष्ठान किया जाय । इस तरह से मीमासकों के मत मे मन्त्र का उच्चारण अदृष्ट की उत्पत्ति के लिये अनिवार्य है । इस तरह की मन्त्रों के उच्चारण की अनिवार्यता आपके मत के अनुसार नही सिद्ध हो पाती । कहने का अभिप्राय यह है कि आप मन्त्रो का उच्चारण केवल उनकी स्मृति बनाये रखने के लिये करते है, तो यह कार्य तो किसी भी कर्म में किसी मन्त्र का उच्चारण कर पूरा किया जा सकता है, तब आप ग्रहपूजा के अवसर पर याद किये जाने वाले मन्त्रों