वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 741–750
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 741–750
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वेदार्थपारिजात. १६३ ९ पयन्तीति तद्रीत्या मन्त्राणामनुष्ठानार्थसङ्गतिरपेक्षिता । यद्यपि ब्राह्मणैरप्यनुष्ठानोपविकार्यम्मृति सम्भवत्येव तथापि विनियोगवशान्मन्त्रैरेव द्रव्यदेवते स्मर्तव्ये इति नियमोऽदृष्टजननार्थं मन्त्रैरेव द्रव्यदेवते स्मृत्वा कर्माणि हर्तव्य नोत्युक्तम् । अधिकारानधिकारिविषयः ', यदुक्तम्- वेदादिशास्त्रपठने सर्वेषामधिकारोऽस्ति वेदानामीश्वरोक्तत्वात् सत्यविद्याप्रकाशकत्वाच्च । "यद्यद्धि परमेश्वरचितम्, तत्सर्वार्थमिति जानीमः' ' पृ ० ३५३ इति, तत्तुच्छम् तथात्वे परमेश्वरनिर्मिताया दुहितरि सर्वेषामधिकारापत्त्या विवाहादिव्यवस्थालोपापत्तेः । तस्मात् परमेश्वनिर्मितत्व न सर्वाधिकारप्रयोजकम् । सत्यविद्याप्रकाश- कत्वमपि न सर्वाधिकारप्रयोजकम् पश्वादिषु व्यभिचारात् । सत्यविद्याप्रकाशत्वेऽपि वेदेषु न पशूनामधिकारः, सामर्थ्या- भावात् । न च पश्वादीनां सामर्थ्याभावेनानधिकारित्वेऽपि शूद्रादिषु सामर्थ्यसत्त्वेन कुतोऽनधिकार इति वाच्यम्, लौकिक- सामर्थ्यसत्त्वेऽपि तत्र शास्त्रोयसामर्थ्याभावेनानधिकारात् । तथाहि--उपनयन वेदाध्ययनाङ्गम्, उपनयन च ब्राह्मणक्षत्रिय-, ',, ' वैश्यानामेव विहितम् । न स्त्रीणा न शूद्राणाम् वसन्ते ब्राह्मणमुपनयोत ग्राष्मे राजन्यम् शरदि वैश्यम् इत्यादिश्रुतिभ्य । एवमेव एतेषामेव त्रयाणा कृते पालाशवैल्वखादिरदण्डविधानम्, न शूद्रादीनाम् । तस्माच्छास्त्रीयसामर्थ्याभावेन पूर्वोतर- मीमांसयोरपशूद्राधिकरणविरोधाच्च न वेदाध्ययने सर्वाधिकार । अतस्तेषामनुग्रहार्थमेत्र पुराणौतहासादिभिर्वेदाना सारस्तेभ्य समर्थ्यते । 'स्त्रीशूद्र द्वेजबन्धूना त्रयी न श्रुतिगोचरा । कर्मश्रेयसि मूढाना श्रेय एवं भवेदिह ॥ ' इति भारत- का खण्डन किस आधार पर कर सकते है कि ये मन्त्र ग्रह पूजा के नहीं है । अत आपका यह निषेध निराधार सिद्ध हो जाता है । इसके विपरीत सीमासक गण मन्त्रो का उपयोग अनिवार्यत द्रव्य और देवता को याद करने मे करते है । यह कार्य तब तक नही हो सकता, जब तक कि उसका विनियोग के अनुसार अर्थ न होता हो । अतः इनके मत के अनुसार उन मन्त्री वा विनियोग ग्रहपूजा में किया ही , नही जा सकता जो कि उन उन ग्रहो और उनके निमित्त अर्पित किये जाने वाले द्रव्यो का स्मरण न करावें । मानो का मनमाना अर्थ कर आर्यसमाजी भले ही छूट जाय, किन्तु सनातनी को इससे छुटकारा नही मिल सकता, क्योकि वह शास्त्रीय व्यवस्था से निय न्त्रित है । अन ग्रहपूजा वेदनिर्दिष्ट नहीं है, ऐसा मानता निरा भ्रम है । वेदाध्ययन के अधिकार का विवेचन वेत्र आदि शास्त्रों को पढने का सबको अधिकार है या नहीं? इस विषय को उठाते हुए स्वामी दयानन्द ने लिखा है ',, | कि पढने का सबको अधिकार है क्योकि जो ईश्वर की सृष्टि है उसमें किमी का अधिकार नही हो सकता देखिये कि जो जो पदार्थ ईश्वर से प्रकाशित हुए है, सो-सो सबके उपकारार्थ है' ( पृ० ३५४ ) । किन्तु यह कथन एकदम निराधार है । ईश्वर की सृष्टि मे किसी का अनधिकार नही हो सकता, स्वामी दयानन्द से इस हेतु को सही मान लिया जाय तो परमेश्वर की बनाई हुई पुत्री मे सबका समान अधिकार मानना पड जायगा और इस तरह से विवाह आदि की व्यवस्था का कोई अर्थ नहीं रह जायगा । इसलिये पर- मेश्वर की बनाई चीज मे सबका समान अधिकार है, इस बात को सही नहीं माना जा सकता | सत्य विद्या का प्रकाशक होने से भी वेद मे सबका अधिकार नही माना जा सकता, क्योंकि पशु प्रभृति का इसमें अधिकार नही है, क्योकि उनमें वेद का अध्ययन करने की शक्ति नही है । पशु प्रभृति का शक्ति के अभाव में भले ही वेदाध्ययन में अधिकार न हो, शूद्र प्रभृति में तो यह सामर्थ्य है, अत. उनको तो वेदो के अध्ययन का अधिकार होगा? किन्तु ऐसा सोचना गलत है, क्योकि लौकिक सामर्थ्य के रहते हुए भी शूद्र प्रभृति में शास्त्रीय योग्यता का अभाव होने से उनको वेदाध्ययन का अधिकार नही दिया जा सकता । उपनयन संस्कार के बाद ही वेदाध्ययन का अधिकार मिलता है । यह उपनयन संस्कार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का ही होता है, शुद्र और स्त्रियों का नहीं । वेद प्रभृति शास्त्रो मे ऐसा ही विधान है और त्रैवर्णिक के लिये ही उपनयन संस्कार के द्वारा धारण किये वाले दण्ड प्रभृति चिह्नों का भी विधान है, शूद्र प्रमृति के लिये नही । इम शास्त्रीय सामर्थ्य के न रहने से और पूर्व एवं उत्तर मीमांसा के अपशूद्राधिकरण की व्यवस्था के अनुसार भी वेदों का अध्ययन करने का सबको अधिकार नही दिया गया है । इसीलिये शूद्र, स्त्री प्रभृति के कल्याण के लिये ही
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१६४० वेदार्थपारिजात माख्यान कृपया मुनिना कृतम् । दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्रीशूद्रादिभिरप्युत ||' ( श्री० भा० म० पु ० ) । इतिहासपुराणानामपि पञ्चमवेदत्वमेवोक्तम् । अतस्तच्छ्रवणेनापि वेदप्रयोजनं सिद्धयत्येव । ' इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदाना वेदम्' इति । अपरं च किमीश्वरोक्तत्वाद् वेदाः सर्वकर्तृकाध्ययनविषयाः? ओमिति चेन्न त्वद्रीत्या कण्ठताल्वादिहीनस्य निराकारस्येश्वरस्योच्चारयितृत्वासम्भवेन तदुक्तत्वासम्भवात् । अन्यथा पश्वादीनामपि वेदोच्चारण स्यात् । सर्वशक्तिमतोऽपि प्रकृतिविरुद्ध कार्यकर्तृत्वासम्भव एव । अन्यथा बीजादपि निम्बाङ्कुरोत्पत्तिप्रसङ्गात् । रिकार्डादिषु तु पुरुषोच्चरितशब्दाना-. मेवाभिव्यक्ति: । अथेश्वर कर्तृकत्वादेव सर्वकर्तृकाध्ययनविषयत्व वेदाना सिषाधयिषितमिति, तदपि तुच्छम्, क्षित्यादी हेतोः सत्त्वेऽपि सर्वाध्ययनविषयत्वाभावेन व्यभिचारात् । न चाध्ययनविषयत्वाभावेऽपि सर्वभोगाविषयत्वेनैव सर्वाध्ययनविषयत्व- मस्त्येव, अध्ययनस्यापि भोगविशेषत्वादिति वाच्यम्, भोग्यजातस्य सर्वत्रासम्भवेन सर्वकर्तृकत्वासम्भवात् । विचित्रकर्मवशाद् विचित्रभोगभाज प्राणिनो भवन्ति । कण्टकाः क्रमेलक प्रति सुखहेतव इति न देवदत्तस्यापि तथाभवेय् । न वा देवदत्तः पङ्गु रिति यज्ञदत्तोऽपि तथा स्यात् । किञ्च, सत्यविद्याप्रकाशकत्वाद् वेदाना सर्वाध्ययनविषयत्वेऽसत्यविद्याप्रकाशकत्वस्य सर्वकर्तृकाध्ययनविषयत्वं न प्राप्नोति । दृश्यते चासत्यविद्याप्रकाशस्यापि सर्वकर्तृकाध्ययनविषयता । अत्र वेदेतरत्वमुपाधिः । न च पक्षेतरत्व नोपाधि, इतिहास, पुराण प्रभृति ग्रन्थो में वेदो का सार सगृहीत कर दिया गया है । शास्त्रों में बताया गया है कि स्त्री, शूद्र, अन्त्यज प्रभृति के कानो में श्रुति का उपदेश नही पहुँच सकता । इसलिये वे क्या शुभ है क्या अशुभ है? इसका निर्णय करने मे वे असमर्थ हो जाते हैं । इनके कल्याण के लिये ही मुनि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की है, जिसमे कि स्त्री, शूद्र प्रभृति के लिये भी उचित धर्म मार्ग का निर्देश किया गया है, अत इनका श्रवण करने से भी वेद का प्रयोजन, हित और अनहित का विवेक सिद्ध हो जाता है । छान्दोग्य उपनिषद् में बताया गया है कि इतिहास-पुराण वेदो में पाचवा वेद है । क्या आप ईश्वर के द्वारा उपदिष्ट होने से वेदो के अध्ययन में सबका समान अधिकार मानते है? यदि हाँ, तो आपके मत से तो ईश्वर निराकार होने से कण्ठ, तालु प्रभृति अवयवो से रहित है, तब वह वेदो का उच्चारण कैसे करेगा? उच्चारण न कर सकने पर वेदो को उनके द्वारा उपदिष्ट कैसे माना जा सकता है? बिना कण्ठ आदि अवयवो के हो उच्चारण मानने पर तो पशु प्रभृति को भी वेद का उपदेश और उसके उच्चारण की सामर्थ्य मिल जानी चाहिये । वास्तव में तो ईश्वर भले ही सर्व शक्तिमान् हो, किन्तु संसार की व्यवस्था चलाने के लिये वह भी प्रकृति के विरुद्ध कोई कार्य नही करता । ऐसा न होने पर आम की गुठली में से नीम का पेड पैदा न होने में क्या बाधा मानो जायगी? आजकल प्रचलित सिनेमा आदि के रिकार्डो में पुरुष के द्वारा उच्चारित शब्दो की ही अभिव्यक्ति होती है । ईश्वर की कृति होने से ही वेदो में सबके अध्ययन को सिद्ध करना भी गलत है, क्योंकि ईश्वर की कृति तो पृथिवी प्रभृति पदार्थ भी है, किन्तु वे सबके अध्ययन का विषय नही होते, इस तरह से आपका ईश्वरकर्तृकत्व हेतु पृथिवी में व्यभिचरित हो जाता है, क्योंकि उसमें सर्वाध्ययनकर्तुत्व की स्थिति नहीं है । यदि आप कहे कि पृथिवी में सर्वाध्ययनकर्तृत्व भले ही न हो, किन्तु सर्वभोग- विषयत्व तो उसमे रहता ही है, अध्ययन भी एक प्रकार का भोग ही है, इस तरह से पृथिवी में भी सर्वभोगविषयत्व के रूप मे सर्वा- व्ययनकर्तृत्व की स्थिति रहने से उक्त व्यभिचार नही होगा, तो इसका उत्तर यह है कि ईश्वरनिर्मित पृथिवी प्रभृति में सर्वत्र भोग्य स्थिति समान रूप से रहती ही हो, सब कोई समान रूप से उसका उपभोग कर सकते हो, ऐसी स्थिति नही रहती । अपने अपने कर्मो की विचित्रता के अनुसार विचित्र भोग भोगने की सामर्थ्य प्राणियो में उत्पन्न होती है । कांटेदार पेडो की पत्तियो को ऊँट बडी प्रसन्नता से खाता है, तो देवदत्त के लिये भी यही स्थिति नही रहेगी । देवदत्त के लगडे हो जाने से यज्ञदत्त भी लगडा नही हो जायगा । कहने का अभिप्राय यह है कि ईश्वर की कृति पृथिवी प्रभृति का जैसे कोई समान रूप से उपभोग नही कर सकता, उसी तरह से ईश्वर की कृति वेदों का भी समान रूप से अध्ययन का सबको अधिकार नही मिल सकता । सत्यविद्या के प्रकाशक होने से वेदाध्ययन में सबका अधिकार माना जाय, तो असत्य विद्या के प्रकाशक शास्त्रों के अध्ययन का सबको अधिकार नहीं होना चाहिये, किन्तु देखा तो यह जाता है कि इनके अध्ययन का सबको अधिकार है । इस तरह से सत्यविद्य ।
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वेदार्थपारिजात. १६४१ तस्य बाधानुन्नीतविषयकत्वात् । अत्र तु वेदे सर्वकर्तृकाध्ययनविषयत्वस्य त्रैर्वाणकस्यैवाधिकारं वदता शब्देन बाधः । तथा च वेदेतरत्वस्य सर्वकर्तृकाध्ययनविषयत्वस्य च नास्तिकादिग्रन्थेषु विद्यमानत्वात् साध्यव्यापकता । तत्रैव च सत्यविद्याप्रकाश- कत्वमिति साधनाव्यापकत्वमपि । वेदानुकूलशास्त्राणा वेदाङ्गोपाङ्गत्वे तदात्मतया वेदत्वासिद्धो न साधनव्यापकता । तथा च 'वेदा न सर्वकर्तृकाध्ययनविषयाः, वेदेतरत्वाभावात्' इत्यनुमानेन सर्वकर्तृकाध्ययनविषयत्वाभावत्वमेव वेदानां सिद्धयति । ब्रह्मसूत्रेऽपशूद्राधिकरणे ( १८ ), जैमिनिसूत्रे शूद्रस्यानधिकाराधिकरणे ( ६/७ ), पारस्करादिभिः सूत्रकारैः मन्वादिस्मृतिकारैश्च रामायणमहाभारतादिनिर्मातृभ्यां वाल्मीकिबादरायणाभ्या शङ्कररामानुजमध्ववल्लभवेङ्कटसायणा- दिभि: स्पष्टमेव स्त्रीणां शूद्राणां वेदाध्ययनानधिकार उक्तः । दयानन्देन मनोः प्रामाण्यमभ्युपेतम् । मनुना च- 'एकमेव तु शूद्रस्य प्रभु कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ ' ( ११ ९ १ ), 'अतोऽन्यद् यद्धि कुरुते तद्भवत्यस्य निष्फलम्' ( १०।१२३ ), 'परिचर्यः स्त्रिया साध्व्या देववत् पतिः' ( ५।१५१ ), 'नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतो नाप्युपोषणम् । पति शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते ॥ अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् । शौचे धर्मेऽन्नपक्त्या च १ ( ९| १८ ) एभिर्वचनैः स्त्रीणां शूद्राणां च पतिशुश्रूषाद्विजशुश्रूषाव्यतिरिक्तानामुपनयनवेदाध्ययनादिकर्मणां न केवलम विधानमेवापि तु नैष्फल्यमपि निगदव्याख्यातम् । 'अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः' ( २/६६ ), 'वैवाहिको विधिः स्त्रीणा संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिथा ॥ ' ( २२६७ ) इत्यादिभिश्च स्त्रीणां शूद्राणां द्विजातिपतिसेवाति- रिक्तानां गुरुकुलवासादिकर्मणां निषेध एव पर्यवसीयते । 'मनुस्मृतिः सृष्ट्यादौ निर्मिता' इति दयानन्दः सत्यार्थप्रकाशे ११ प्रकाशकत्व यह भी असद्धेतु है, क्योकि इसमें वेदेतरत्व उपाधि है । वेदेतरत्व उपाधि में तो बाघ उपस्थित है, क्योंकि वेद में सबके अध्ययन का समान अधिकार बताने वाला हेतु त्रैवर्णिक के ही अधिकार को बताने वाले शास्त्रवचन से बाधित हो जाता है । सोपाधिक हेतु वह होता है, जो कि साध्य में व्यापक हो और साधन मे अव्यापक हो । यहाँ वेदेरतत्व और सर्वकर्तृकाध्ययनविषयत्व दोनो की नास्तिक आदि के ग्रन्थो में स्थिति रहने से साध्यव्यापकता विद्यमान है । नास्तिक आदि के ग्रन्थो में सत्यविद्याप्रकाशकत्व की स्थिति है और वेदा- नुकूल किन्तु वेदेतर वेदांग, उपांग आदि भी सत्यविद्या के ही प्रकाशक हैं, असत्य विद्या के नहीं, इस तरह से उनमें असत्यविद्या प्रकाश- कत्व की स्थिति न रहने से आपका यह हेतु साधन में व्यापक नही है । अन्तत वेदों के अध्ययन में सबका अधिकार नही है, क्योकि ये वेदो से भिन्न नही है, इस अनुमान से वेदो के अध्ययन में सबके अध्ययन का अधिकार निषिद्ध हो जाता है । ब्रह्मसूत्र के अपशूद्राधिकरण मे, जैमिनिसूत्र के शूद्रानधिकाराधिकरण मे, पारस्कर प्रभृति के सूत्रग्रन्थों में, मनु प्रभृति के स्मृति ग्रन्थो मे, रामायण-महाभारत प्रभृति ग्रन्थों में वाल्मीकि, बादरायण प्रभृति ऋषियो ने, शंकर, रामानुज, मध्व, वल्लभ, वेङ्कट, सायण प्रभृति आचार्यों ने स्पष्ट ही लिखा है कि स्त्रियो और शूद्रो को वेदो के अध्ययन का अधिकार नही है । दयानन्द ने मनु को प्रमाण माना है । मनु ने स्पष्ट लिखा है कि भगवान् ने शूद्र के लिये एक ही काम बताया है कि वह त्रैवर्णिकों को शुद्ध मन से सेवा करे । इसके सिवाय वह अन्य कुछ भी कार्य करता है, तो वह निष्फल जाता है । साध्वी स्त्री को अपने पति की देवता के समान सेवा करनी चाहिये । स्त्रियों के लिये अलग से किसी यज्ञ, व्रत अथवा उपवास का विधान नही है । वह जो पति की सेवा करती है, उसी से वह स्वर्ग मे धर्मसुखोपभोग करती है | पति को चाहिये कि वह पत्नी को धन का संचय और व्यय करने में नियुक्त कर दे । वही घर की पवित्रता, का आचरण और अन्नदान जैसे कार्यों को भी देख-भाल करे । मनुस्मृति के इन वचनो से स्पष्ट है कि स्त्रियों और शूद्रों को पति की सेवा और द्विजों की सेवा को छोड़कर उपनयन, वेदाध्ययन प्रभृति कर्मों में कोई अधिकार नहीं है, साथ ही यदि वे इन कर्मो का आचरण करते हैं, तो उनको कोई फल नही मिलेगा । स्त्रियों के ये सब संस्कार बिना मन्त्रोच्चार के किये जाने चाहिये । विवाह संस्कार ही स्त्रियों का वैदिक पद्धति से किया जाता है । पति की सेवा करना ही उनका गुरुकुल में निवास की तरह है और गृह कार्य ही अग्नि का पूजन है । इन सब मनु वचनों से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि स्त्रियों और शूद्रो के लिये द्विजाति और पति की सेवा के अतिरिक्त गुरुकुल में रहना आदि सभी कर्म वर्जित हैं । मनुस्मृति सृष्टि के आरम्भ मे बनी थी, स्वयं स्वामी दयानन्द सत्यार्थप्रकाश के ११ वें २०६
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वेदार्थपारिजातः १६४२ समुल्लासे उक्तवान् । अत एव मनुः -( २।१६८ ) वेदाध्ययनरहितस्य शूद्रत्वार्थवादः । महाभारते सभापर्वणि ४५ १६, उद्योगपर्वणि २९।२६, सभापर्वणि ३६।८९, शान्तिपर्वणि ६० ३७, शूद्रस्य वेदाध्ययनाधिकारो निषिद्धः । वाल्मीकीये रामायणे ( १।६।१ ९ ) शूद्रस्य सेवैव स्वधर्मं उक्तः । सीतायाः षष्ठे वर्षे विवाह उक्तः । उपनयनं तु नोक्तम् । ' अपि वा वेदनिर्देशादप- शूद्राणा प्रतीयेत' ( मी० सू० ६| १ | ३३ ) अत्र वेदनिर्देशात् शूद्राणामुपनयननिषेधः । षष्ठाध्यायस्य प्रथमपादे सप्तमा- धिकरणे यागे शूद्रस्यानाधिकाराधिकरणे शूद्रानधिकार उक्त एव ब्रह्मसूत्रे ( ११३१३४ - ३८ ) स्पष्टमेव शूद्राणा वेदाध्ययना- धिकारो निषिद्धः । यच्च- ' यथेमा वाचं कल्याणीमा वदानि जनेभ्यः । ब्रह्मराजन्याभ्या शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च । प्रियो देवाना दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु ||' ( वा० सं ० २६।२ ) अस्यायमभिप्रायः- ' परमेश्वरः सर्वमनुष्यैर्वेदाः पठनीया पाठ्या इत्याज्ञा ददाति । तद्यथा येन प्रकारेण इमा प्रत्यक्षभूतामृग्वेदादिवेदचतुष्टयी कल्याणी कल्याणसाधिका वाच वाणी जनेभ्यः सर्वेभ्यो मनुष्येभ्योऽर्थात् सकलजीवोपकाराय आवदानि आसमन्तादुपदिशानि, तथैव सर्वैर्विद्वद्भिः सर्वमनुष्येभ्यो वेदचतुष्टयी वागुपदेष्टव्या । कस्य कस्य वेदश्रवणेऽधिकारोऽस्ति? इत्याकाङ्क्षायामुच्यते - ब्रह्म- राजन्याभ्या ब्राह्मणक्षत्रियाभ्या स्वाय स्वात्मीयपुत्राय भृत्याय च सर्वैः सैषा वेदचतुष्टयी श्राव्या । यथाहमीश्वरः पक्षपातं विहाय सर्वोपकारकरणेन सह वर्तमानः सन् देवाना विदुषा प्रियो दातुर्दक्षिणाये सर्वस्वदानाय प्रियश्च भूयासं स्याम्, तथैव भवद्भिः सर्वोपकारं सर्वप्रियाचरण मत्वा सर्वेभ्यो वेदवाणी श्राव्येति । यथायं मे काम समृद्धयते, तथैवैवं कुर्वतामयं कामः समुल्लास में इस बात को स्वीकार करते है । मनुस्मृति में वेद का अध्ययन न करने वाले ब्राह्मण को शूद्र बताया है, यह केवल अर्थवाद है कि ब्राह्मण को वेद अवश्य पढना चाहिये, अन्यथा उसमे और शूद्र में कोई अन्तर नही रह जायगा । महाभारत के सभापर्व मे, उद्योगपर्व में और शान्तिपर्व में शूद्र का वेदाध्ययन निषिद्ध है । वाल्मीकीय रामायण मे सेवा करना ही शूद्र का अपना धर्म बताया गया है । वहाँ छठे वर्ष मे सीता के विवाह की तो चर्चा है, किन्तु उपनयन संस्कार का कही वर्णन नहीं मिलता । ' अपि वा वेद ० ' इस मीमासा सूत्र में वेद के निर्देश के अनुसार शूद्र का वेदाध्ययन का अधिकार निषिद्ध माना है । छठे अध्याय के पहले पाद के सातवें अधिकरण में यज्ञ-यागादि में शूद्र का अधिकार निषिद्ध घोषित कर दिया गया है । ब्रह्मसूत्र में भी स्पष्ट शब्दो में शूद्र के वेदाध्ययन के अधिकार का निषेध कर दिया गया है । सब स्त्री -पुरुषों को वेदादि शास्त्र पढने का अधिकार है, इसके प्रमाण में स्वामी दयानन्द ने ' यथेमां वाचं कल्याणी. ' इस यजुर्वेदीय मन्त्र को उद्धृत किया है और उसकी व्याख्या इस तरह से की है - 'इस मन्त्र का अभिप्राय यह है 1 कि वेदों के पढ़ने - पढ़ाने का सब मनुष्यों को अधिकार है और विद्वानों को उनके पढ़ाने का । इसलिये ईश्वर आज्ञा देता है कि हे मनुष्य लोगो, जिस प्रकार मैं तुमको चारो वेदो का उपदेश करता हूँ, उसी प्रकार से तुम भी उनको पढ़ कर सब मनुष्यों को पढाया और सुनाया करो, क्योकि यह चारो वेदरूप वाणी सबका कल्याण करने वाली है । जैसे सब मनुष्यों के लिये मैं वेदो का उपदेश करता हूँ, वैसे ही तुम भी किया करो । प्रश्न - ' जनेभ्य:' इस पद से द्विजो का ही ग्रहण करना चाहिये, क्योकि जहाँ-कही सूत्र और स्मृतियों में पढ़ने का अधिकार लिखा है, वहाँ केवल द्विजो का ही ग्रहण किया गया है? उत्तर -यह बात ठीक नही है, क्योकि जो ईश्वर का अभिप्राय द्विजो के ही ग्रहण का होता, तो मनुष्यमात्र को उनके पढने का अधिकार कभी न देता । जैसा कि इस मन्त्र के उत्तरार्ध में प्रत्यक्ष विधान है- 'ब्रह्मराजन्याम्यां शूद्राय' इत्यादि । अर्थात् वेदाधिकार जैसा ब्राह्मण वर्ण के लिये है, वैसा सी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पुत्र, भृत्य और अतिशूद्र के लिये भी बराबर है, क्योंकि वेद ईश्वरप्रकाशित है । जो विद्या की पुस्तक है, वह सबकी हितकारक होती है । ईश्वररचित पदार्थो के दायभागी सब मनुष्य अवश्य होते हैं । इसलिये उनका जानना सब मनुष्यो को उचित है । सबके पिता परमात्मा का सब माल सब पुत्रों के लिये है, किसी वर्णविशेष के लिये नहीं । जैसे मैं इस वेदरूप सत्यविद्या का उपदेश करके विद्वानों की आत्मा में प्रिय हो रहा हूँ, तथा जैसे 'दानी या शीलवान् पुरुष को मैं प्रिय होता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी पक्षपातरहित होकर वेदविद्या को सुनाकर सबके प्रिय होवो | जैसे यह वेदों का प्रचार रूप मेरा काम ससार के बीच में यथावत् प्रचारित होता है, उसी प्रकार की इच्छा तुम लोग भी करो, जिससे कि
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F AlthiaMenthal the INDIANA MILA tulis Bol held titha Jadhaoshoth kulholde वेदार्थपारिजात. १६४३ समृद्ध्यताम् इयमिष्टसुखेच्छा सम्यग्वर्धताम् ॥ यथादः सर्वमिष्टसुखं मामुपनमति, तथैव भवतोऽपि सर्वमिष्टमुपनमतु । मया युष्मभ्यमाशीर्वादो दीयते । ' बृहस्पते अति यदर्यः' इत्युत्तरस्मिन् मन्त्रे हीश्वरार्थस्य प्रतिपादनान्मन्त्रस्यायमेवार्थः । इत्यादि' ( ० ३५३- ३५४ ) इति । दयानन्दीययजुर्वेदभाष्ये तु - 'हे मनुष्यो मैं ईश्वर जैसे ब्रह्मराजन्याभ्या ब्राह्मण क्षत्रिय के लिए आर्य वैश्य के लिये ( च ) भी ( जनेभ्यः ) इन उक्त शूद्रऔर अपने स्त्री सेवक आदि के लिए अरण उत्तम लक्षण प्राप्त हुए अन्त्यज के लिए मनुष्यों के लिए ( इह) संसार मे प्रकट की हुई ( कल्याणी) सुख देने वाली (वाचं ) चारो वेदरूप वाणी का उपदेश करता हूँ । वैसे ही आप लोग भी अच्छे प्रकार उपदेश करें | जैसे मैं ( दातुः ) दान वाले के संसर्गी ( देवाना) विद्वानो की दक्षिणा, अर्थात् दान के लिए प्रिय मनोहर पियारा होऊं और मेरी यह कामना उत्तमता से बढे तथा मुझे वह परोक्ष सुख प्राप्त हो, वैसे आप लोग भी होवें और वह कामना तथा सुख आपको प्राप्त होवे' इति । एताभ्यामुद्धरणाभ्यां स्पष्टं विज्ञायते यदीश्वरो ब्राह्मणक्षत्रियो वैश्यं शूद्रं स्वस्त्रीसेवकान् अन्त्यजं च वेदानध्या- पयति, ईश्वरस्य च स्त्रीसेवकाः सन्तीति, स च ब्राह्मणादीन् वेदानध्यापयतीति दयानन्दीयोऽभिप्रायः । तत्रेदं विचारणीयं यद् एतत्सर्वं निराकारस्य देहेन्द्रिय कण्ठताल्वादिरहितस्य किं सम्भवति? यदि साकारत्वं स्त्रीसेवकादिमत्त्वमुपेयते, तदा पूर्वं कथमीश्वरस्य निराकारत्वमुक्तम् । ' मा नो वधीरिन्द्र' ( आर्याभिनये, म० ४९ ) हे इन्द्र परमेश्वर्ययुक्तेश्वर हमारा वध मत कर, अपने से अलग हमको मत गिरावे..... हमारे प्रिय लोगों को मत चोरवाये गर्भो का विदारण मत कर.... हे समर्थ हमारे पुत्रों का विदारण मत करे, हमारे भोजनाद्यर्थं सुवर्णादि पात्रों को हमसे अलग मत कर! जो जो हमारे सहज अनुषक्त स्वभाव से उक्त विद्या आगे को भी सब मनुष्यों में प्रकाशित होती रहे । जैसे मुझमें अनन्त विद्या से सब सुख हैं, वैसे जो कोई विद्या का ग्रहण और प्रचार करेगा, उसको भी मोक्ष तथा संसार का सुख प्राप्त होगा । यही इस मन्त्र का ठीक अर्थ है, क्योकि इसके अगले मन्त्र 'बृहस्पते अति यदर्य० ' मे भी परमेश्वर का ही ग्रहण किया गया है । इससे सिद्ध होता है कि वेद पढने का अधिकार सब कोई को है' ( पृ० ३५४ - ३५५ ) । इसी मन्त्र का अपने यजुर्वेदीय भाष्य मे दयानन्द ने दूसरी तरह से अर्थ किया है । जैसे कि-'हे मनुष्यो, मै ईश्वर जैसे ( ब्रह्मराजन्याभ्या ) ब्राह्मण- क्षत्रियों के लिये, आर्य वैश्य के लिये, शूद्र और अपने स्त्री-सेवक आदि के लिये, अरण उत्तम लक्षण प्राप्त हुए अन्त्यज के लिये ( च ) भी ( जनेभ्यः ) इन उक्त मनुष्यो के लिये ( इह ) संसार मे प्रकट की हुई, ( कल्याणी ) सुख देने वाली ( वाचं ) चारों वेद रूप वाणी का उपदेश करता हूँ, वैसे ही आप लोग भी अच्छे प्रकार से उपदेश करें । जैसे मै ( दातुः ) दान वाले के ससर्गी ( देवाना ) विद्वानो की दक्षिणा अर्थात् दान के लिये प्रिय, मनोहर, पियारा होऊँ और मेरी यह कामना उत्तमता से बढे तथा मुझे वह परोक्ष सुख प्राप्त हो, वैसे आप लोग भी होवें और वह कामना तथा सुख आपको भी प्राप्त होवे । इन दोनों उद्धरणो से दयानन्द का यह स्पष्ट अभिप्राय प्रतीत होता है कि ईश्वर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र को तथा स्त्री, सेवक और अन्त्यज--सबको वेद का अध्ययन कराते है । इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर के स्त्री, सेवक प्रभृति हैं । इसमे विचारणीय बात यह है कि निराकार ईश्वर के जब शरीर और कण्ठ, तालु आदि अवयव नही है, तो यह सब कैसे हो सकेगा? यदि ईश्वर को साकार एवं स्त्री-सेवक प्रभृति से युक्त मानते हैं, तो ईश्वर को निराकार आपने कैसे माना? ' मा नो वधी ० ' इस मन्त्र का दयानन्द ने आर्याभिनय में यह अर्थ किया है-हे इन्द्र, परमैश्वर्ययुक्त ईश्वर, हमारा वध मत कर, अपने से अलग हमको मत गिरावे " हमारे प्रिय लोगों को मत चोर या उनके गर्भों का विदारण मत कर "" हे समर्थ, हमारे पुत्रों का विदारण मत कर, हमारे भोजन आदि के लिये जुटाये गये सुवर्ण आदि के पात्रों को हमसे अलग मत कर । जो जो हमारे सहज अनुषक्त स्वभाव से अनुकूल मित्र हैं, उनको आप मत नष्ट करें, अर्थात् पूर्वोक्त पदार्थों की यथावत् रक्षा करें । इस व्याख्या में परमेश्वर
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वेदार्थपारिजातः १६४४ विदारयि- अनुकूल मित्र हैं, उनको आप मत नष्ट करें, अर्थात् पूर्वोक्त पदार्थो की यथावत् रक्षा करें' अत्र परमेश्वरस्य तृत्वमुक्तम् । ' अश्वस्य त्वा वृष्णः शक्ना धूपयामि' ( वा० स० ३७१ ९) दयानन्दीयभाष्ये -' वृष्णः यज्ञस्थल मे वेगवान् अश्वस्य के शीर्ष्णे उत्तम घोड़े के शक्ना लीद ( लँड़ी ) से त्वा तुमको भरवाये, पृथिव्यादि के ज्ञान के लिए तुमको भरवाये, तत्त्व बोध ? दयानन्दस्यैता-अवयव के लिए त्वा तुमको यज्ञसिद्धि के लिए धूपयामि तपाता हूँ' किमेतत् सर्वं निराकारस्य सम्भवति तादृश एव वेदार्थः । 'वेदमाता प्रचोदयन्तां पवमानी द्विजानाम्' ( अथर्व० १ ९। ७१ ।१ ) इति द्विजानामेव वेदेऽधिकार उक्त ' । तथा च शूद्रादीनां वेदाध्ययनेऽधिकारबोधने परस्परं व्याघातः । 'तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्कदोषेभ्य. ' ( गो० सू० २।१।५७ ) इति रीत्याऽप्रामाण्यापत्तिर्वेदानां स्यात् । किञ्च यथेमा वाचमत्र वेदपदं नास्ति, 'वेदमाता द्विजानाम्' इत्यत्र तु वेदपद-मस्ति । तेन वेदे द्विजानामधिकारः, वेदातिरिक्तवाचि समेषाधिकारः । 'अयं स होता यो द्विजन्मा' ( ऋ० सं० १।१४ ९ ।५ ) इति द्विजन्मनामेव वेदाध्ययने तद्बोधिते यागादावधिकारः । यथेमा वाचमावदानीत्यत्रोत्तमपुरुषप्रयोगान्मन्त्रस्यास्येश्वरो देवतेति भ्रमः, परमेतदन्तिमाशेन विरुद्ध्यते, नह्याप्तकामस्येश्वरस्य मे कामः समृद्धयतामित्याशीः सम्भवति । सस्कारविधि- पुस्तके ब्राह्मणक्षत्रियविशामष्टेकादशद्वादशवर्षवयस्क बालकानामेवोनपयनवेदारम्भसंस्कारावुक्तो न स्त्रियां न वा शूद्र बालका-नाम् । तदभावे कथं वेदाध्ययनं सम्भवति । यद्युत्तमपुरुषप्रयोगादीश्वरोऽस्य मन्त्रस्य वक्ता स्यात्तदा 'अग्निमीळे पुरोहितम्' मे विदारण की सामर्थ्य स्वीकार की गई है, बिना शरीर धारण किये इस मन्त्र में निषेधक रूप में निर्दिष्ट कार्य परमेश्वर कैसे कर सकता है? 'अश्वस्य त्वा वृष्ण:' इस मन्त्र का दयानन्दीय भाष्य यह है -'( वृष्णः ) यज्ञस्थल मे वेगवान् ( अश्वस्य ) घोडे के ( शक्ना ) लीद ( लेंडी ) से ( त्वा ) तुमको भरवाये, पृथिवी आदि के ज्ञान के लिये तुमको भरवाये, तत्त्व बोध के ( शीर्णे ) उत्तम अवयव के लिये ( त्वा ) तुमको यज्ञसिद्धि के लिये ( धूपयामि ) तपाता हूँ' । क्या ये सब बातें ईश्वर को निराकार मानने पर संभव हो सकती हैं? स्वामी दयानन्द ने सब जगह वेदों का इसी तरह का अर्थ किया है । 'वेदमाता प्रचोदयन्ता पवमानी ' इस अथर्ववेदीय मन्त्र मे वेदों के अध्ययन में द्विजों को ही अधिकार दिया गया है । इस तरह से शूद्र प्रभृति का वेदाध्ययन का अधिकार बताने वाली श्रुति का इस श्रुति से विरोध होगा । श्रुतियो का इस तरह का परस्पर विरोध व्याघात कहलाता है । न्यायसूत्र में बताया गया है कि इस दोष की उपस्थिति में श्रुति अप्रमाण हो जायगी, क्योंकि एक श्रुति दूसरी श्रुति का बाघ करेगी, तब यह निश्चय हो पाना कठिन होगा कि इनमें कौन सी श्रुति सही है । फलतः दोनों ही भूतियाँ परस्पर विरुद्ध होने से अप्रमाण मान ली जायगी । वस्तुतः 'यथेमा वाचं ' इस मन्त्र में 'वेद' शब्द नही है और ' वेदमाता द्विजानाम्' इस में वेद शब्द विद्यमान है । इससे यह सिद्ध होता है कि वेदो के अध्ययन मे केवल द्विजो का अधिकार है और वेद से भिन्न शास्त्रो के अध्ययन में सबका अधिकार है । इस तरह से इन दोनों श्रुतियो का परस्पर विरोध हट जाता है । 'अयं स होता यो द्विजन्मा' इस ॠग्वेदीय मन्त्र के अनुसार वेदों का अध्ययन करने में और तदनुसार यज्ञ के संपादन मे केवल द्विज को ही अधिकार है । 'यथेमा वाचमावदानि' इस मन्त्र में उत्तम पुरुष का प्रयोग होने से यह भ्रम हो जाता है कि इस मन्त्र का वक्ता ईश्वर ही है, किन्तु इसी मन्त्र के अन्तिम अंश से इसकी निवृत्ति हो जाती है, क्योंकि ईश्वर आप्तकाम है उसको सब कुछ प्राप्त है, अतः ईश्वर के लिये यह आशीर्वचन सार्थक नही हो सकता कि मेरी सब कामनाएँ पूरी हों । स्वामी दयानन्द ने अपनी संस्कारविधि नामक पुस्तक में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के क्रमशः आठ, ग्यारह और बाहर वर्ष के बालकों के ही उपनयन और वेदारम्भ संस्कारों का वर्णन किया है, स्त्रियों और शूद्र बालको के लिये यह विधि नहीं बताई गई । उपनयन और वेदारम्भ नामक संस्कारों के अभाव में वे वेदों के अध्ययन के कैसे अधिकारी होंगे? यदि इस मन्त्र में उत्तम पुरुष के प्रयोग के अनुसार ईश्वर को इस मन्त्र का वक्ता माना जाय, तो 'अग्निमीले' इस मन्त्र में भी उसी को वक्ता मानकर मन्त्र का यह अर्थ करना पड़ेगा कि मैं ईश्वर भक्ति की पूजा करता हूँ । यदि परमात्मा को ही अग्नि भो माना जाता है, तो
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वेदार्थपारिजातः १६४५ ( ऋ ० सं० १1१1१ ) इत्यस्य मन्त्रस्य अहमीश्वरोऽग्नि पूजयामीत्येवार्थ. स्यात् । यदि परमात्मैवाग्निरपि तदा स्तोतृस्तुत्ययो- रैक्यमेव स्यात् । अन्यथा परमात्मद्वित्वं स्यात् । ' अहं देवानां प्रियो भूयासं दक्षिणाया दातु प्रियो भूयासमयं मे कामः समृद्ध्यतामदो मा उपनमतु ' इत्यादिप्रार्थना पूर्णकामस्य न कथञ्चिदपि सम्भवति । यच्च सर्वशक्तिमत्त्वेन कण्ठताल्वादिराहित्येऽपि परमेश्वरस्योपदेशकत्वमुक्तम्, तत्तृच्छम्, सर्वशक्तिमत्त्वेन साका- रत्वापत्तेरपि दुर्वारत्वात् । सत्यार्थप्रकाशे तृतीयसमुल्लासे दयानन्देनोक्तम् -' अत्र सृष्टिक्रमानुकूलं यत् यत्तदेव सत्यम्, यत्तद्विरुद्धं तदसत्यमेव । जो जो सृष्टि क्रम से अनुकूल है, वह वह सत्य है । उससे विरुद्ध असत्य है' ( तीन समुल्लास ५-३१ ) । ', परन्तु क्या सर्वशक्तिमान् वह कहाता है कि जो असम्भव बात को भी सम्भव कर सके जो स्वाभाविक नियम है उनको विपरीत गुण वाला ईश्वर भी नही कर सकता' ( सत्यार्थप्रकाश, पृ ० १३३ ), 'ईश्वर भी पूर्वकृत नियम को उलटा नहीं कर सकता' ( सत्यार्थप्रकाश, पृ० ३१७ ) | यदि सृष्टिनियमविरुद्धं कर्तुं शक्नुयादीश्वरस्तदेव शरीरमुखकण्ठताल्वादिमन्तरा वक्तुमुपदेष्टुं वा शक्नुयात् । किञ्च, ब्राह्मणादयोऽन्त्यजान्ताः परमेश्वरस्य छात्राः साकारा निराकारा वा? न निराकारा प्रमाणा- भावात् । नापि सर्वदेशिन, त्वया जीवानामणुत्वाभ्युपगमात् । परमेश्वरोऽप्येकदेशीभूत्वाऽध्यापितवान् सर्वव्यापक एव वा? न प्रथमः, अपसिद्धान्तापातात् । नान्त्यो निष्प्रमाणत्वात् । किञ्च, विश्वान्तर्गतेभ्यः सर्वेभ्यो ब्राह्मणादिभ्यो वेदोपदेशं कृतवान्, कतिपयेभ्य एव वा? नान्त्य पक्षः सम्भवदुक्तिकः, प्रामाणिकत्वे तेषां नामोल्लेखः कर्तव्यः, अप्रामाणिकत्वेऽनास्थाक्रान्त- स्वात् । नाद्यः पक्षः, तथात्वे बहूनां वेदानभिज्ञत्वानापत्तेः । किञ्च भूतकालिकेभ्य उपदिष्टवान् वर्तमानकालिकेभ्यो वा? फिर स्तोता ( स्तुति करने वाले ) और स्तुत्य ( जिसकी स्तुति की जाती है ) में क्या अन्तर रह जायगा? अर्थात् ये दोनो एक हो मानने पड जायेंगे । ऐसा न मानने पर दो परमात्मा मानने पडेंगे । मै देवता को प्रिय हो जाऊँ, दक्षिणा देने वाले का प्रिय हो जाऊँ, मेरी यह कामना पूरी हो, वह मुझे स्वर्गलोक में पहुँचाये, इस तरह की प्रार्थना पूर्णकाम परमात्मा के लिये उचित नही मानी जा सकती । कहने का अभिप्राय यह है कि इन सब मन्त्रो में उत्तम पुरुष का प्रयोग जैसे यजमान अथवा ऋत्विक् को निमित्त बनाकर होता है, उसी तरह ' यथेमां' इस मन्त्र में भी 'आवदानि' इस उत्तम पुरुष की क्रिया का प्रयोग ईश्वर के लिये न होकर यजमान, ऋत्विक् आदि के लिये ही माना जाता है । ईश्वर सर्वशक्तिमान् है, अतः कण्ठ, तालु आदि के अभाव मे भी वह वेदो का उपदेश कर सकता है, यह कथन भी इस लिये गलत है कि ऐसा मानने पर तो सर्वशक्तिमत्ता के आधार पर उसकी साकारता भी सिद्ध हो जायगी, जो कि आपके सिद्धान्त के विपरीत होगी | सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास में स्वामी दयानन्द ने कहा है कि 'जो जो सृष्टिक्रम से अनुकूल है, वह वह सत्य है । उससे विरुद्ध असत्य है ' । आगे वे कहते हैं - 'परन्तु क्या सर्वशक्तिमान् वह कहाता है, जो कि असम्भव बात को भी सम्भव कर सके...? जो स्वाभाविक नियम हैं, उनको विपरीत गुणवाला ईश्वर भी नही कर सकता """ ईश्वर भी पूर्वकृत नियम को उलटा नही कर सकता' । स्वामी दयानन्द के इस कथन के विपरीत, सृष्टि के नियम के विपरीत काम करने पर ही ईश्वर शरीर, सुख, कण्ठ, आदि के न रहने पर भी बोलने और उपदेश देने में समर्थ हो सकता है । यदि वह सृष्टि के नियमो का अनुसरण करता है, तो फिर बिना कण्ठ, तालु आदि के वह कैसे उच्चारण कर सकता है? इस आपत्ति के रहते भी यदि आप परमात्मा को वेदों का उपदेष्टा मानते है, तो आपको इन प्रश्नों का उत्तर देना पड़ेगा कि ब्राह्मण से लेकर अन्त्यज पर्यन्त ये परमात्मा के शिष्य साकार है या निराकार? प्रमाण के अभाव मे शिष्यों को निराकार नही मान सकते और न वे सर्वत्र व्यापक ही माने जा सकते है, क्योंकि आप तो जीवों को अणु मानते है । परमेश्वर ने भी इन सब शिष्यो को किसी एक जगह पर बैठ कर पढाया अथवा वह सर्वत्र व्यापक था । इसमें पहला पक्ष मानने पर परमेश्वर की सर्वव्यापकता समाप्त हो जाती है और अन्तिम पक्ष में ऐसा कोई प्रमाण नही मिलता कि संसार में सर्वत्र व्याप्त परमेश्वर ने अपने सभी पूर्वोक्त शिष्यो को वेद पढाया । आपको इस बात का भी उत्तर देना पड़ेगा कि जगत् में विद्यमान सभी ब्राह्मण आदि को ईश्वर ने वेदों का उपदेश किया, भथवा कुछ हो
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१६४६ वेदार्थपारिजात ' यदि प्रथमः पक्षस्तदा यथोक्तमृग्वेदादिभूमिकायामेव 'सृष्टेरारम्भसमये ( पठनपाठनक्रमो ग्रन्थश्च कश्चिदपि नासीत्, तदानी- मीश्वरोपदेशमन्तरा न च कस्यापि विद्यासम्भवो बभूव' इति, तदा वेदे भूतकालेतिहासवर्णनं प्रसज्येत । तदानी तद्रीत्या वेदानित्यत्वमपि स्यात् । वर्तमानकाले तु न ब्राह्मणादिभ्यो वेदमुपदिशन् दृश्यते । उपदेशसमयेऽपि यथेमामिति मन्त्र आसीन्न वा? यद्यासीत्तर्हीतिवृत्तमायातम् । 'यस्येतिवृत्तं तत्तज्जन्मानन्तरमेवोल्लिख्यते' ( सत्यार्थप्रकाशे, ७ समुल्लासे, पृ० १२७ ) । तथा चायं मन्त्रः प्रक्षिप्तः स्यात् । यदि सर्वदैव सर्वान् पाठयति, तदा कोटिकोटिपुरुषाणां वेदानभिज्ञत्वं न स्यात् । परमेश्वरो- पदेशादेव सर्वेषां विद्वत्वेन वेदार्थेषु विवादोऽपि न स्यात् । तथात्वे महाविद्यालयविश्वविद्यालयादिनिर्माणस्यापि किं प्रयोज- नम्? किञ्च परमात्मा आर्यानेव वेदान् पाठयति, आहोस्विद् ईसायीमुसलमानानपि? आर्यानेवेति चेत्, तस्य सङ्कीर्ण- विचारत्वमायातम् । यदीसायीमुसलमानानपि पाठयति, तदा तन्नोमोल्लेखः कथं न दृश्यते? यदि जनेभ्य इत्यनेन तेऽप्यागता- स्तदा तेनैव ब्राह्मणादीनामपि ग्रहणसम्भवे पृथक् तन्नामोल्लेखोऽपि न स्यात्? यदि तेषां नामानुल्लेखेन नाधिकारस्तदा परमेश्वरनिर्मिते वस्तुनि मनुष्यमात्रस्याधिकार इति प्रतिज्ञाहानिः । तथात्वे द्विजानामेवाधिकार इत्यास्तिकमतमेव कथं नास्थीयते? स्वायेति पदेन स्त्रीसेवकाः कथं गृह्यन्ते? किञ्च तत्र मानम्? अरणपदस्यातिशूद्रोऽर्थ इत्यत्रापि कि मूलम्? वस्तु- व्यक्तियो को? अन्तिम पक्ष को इसलिये नही माना जा सकता कि यदि ईश्वर ने कुछ ही व्यक्तियों को वेदो का उपदेश किया, तो उनके नाम का उल्लेख होना चाहिये था । ऐसा उल्लेख न होने से बिना प्रमाण के ऐसी बातो पर विश्वास कैसे किया जा सकता है? प्रथम पक्ष भी इसलिये नही माना जा सकता कि यदि ईश्वर ने सबको वेदो का उपदेश किया, तो फिर अनेक व्यक्ति वेदो से अपरिचित कैसे रह जाते हैं? आपको इस बात का भी समाधान करना पडेगा कि उस ईश्वर ने भूत काल के व्यक्तियो को उपदेश दिया अथवा वर्तमान काल के? यदि यह माना जाय कि ईश्वर ने भूत काल मे वेदो का उपदेश किया था, जैसा कि स्वयं स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्य- भूमिका मे बताया है कि सृष्टि का जब आरम्भ हुआ, उस समय पठन-पाठन की व्यवस्था अथवा कोई ग्रन्थ विद्यमान नही था । उस समय ईश्वर के उपदेश के बिना किसी को विद्या आवे, ऐसा हो ही नही सकता था, तो इसमे यह आपत्ति आवेगी कि तब वेदों मे भूत काल के इतिहास का वर्णन मानना पडेगा और इस तरह से वेद अनित्य सिद्ध हो जायेंगे, उनकी शाश्वतता नही मानी जा सकेगी । यदि इस दोष से छुटकारा पाने के लिये यह कहे कि वह वर्तमान काल में वेदो का उपदेश करता है, तो ऐसा देखा तो नही जाता कि वह किसी ब्राह्मण आदि को उपदेश कर रहा हो । फिर उपदेश करते समय ' यथेमा वाचं ' यह मन्त्र विद्यमान था या नही? यदि विद्य- मान था तो फिर इसमे इतिहास का वर्णन मिलता है । स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में बताया है कि जिसका इतिवृत्त लिखा जाता है, वह उसके जन्म के बाद का ही लिखा हुआ माना जाता है । इस तरह से इतिवृत्त सूचक होने से इस मन्त्र को आपको प्रक्षिप्त मानना पडेगा । यदि ईश्वर निरन्तर वेदो को पढाता रहता है, तो फिर करोडों-करोड पुरुष वेदों से अनभिज्ञ कैसे मिलते हैं? यदि परमेश्वर के उपदेश से ही सब कोई वेदों का ज्ञान प्राप्त करते है, तो वेदो के विद्वानो मे उनके अर्थ के विषय मे परस्पर विवाद भी नही आना चाहिये । यदि ईश्वर ही सारे प्राणियों में वेदादि शास्त्रों का संचार कर देता है, तो फिर महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि की स्थापना की क्या आवश्यकता रह जायगी? फिर यह ईश्वर केवल आर्यो को ही वेद पढ़ाता है, अथवा ईसाई, मुसलमान प्रभृति सबको पढाता है? यदि वह केवल आर्यों को पढाता है, तो संकीर्ण विचारों का हो जायगा । यदि सबको पढाता है, तो उनका नाम वेदो में क्यो नही मिलता? यदि आप कहें कि ' जनेभ्यः' पद से सभी का ग्रहण हो जाता है, तो इसका मापके पास क्या उत्तर है कि इसी पद से ब्राह्मणो का भी तो ग्रहण हो जायगा, तब उनका अलग से मन्त्र में उल्लेख क्यों किया गया है? यदि मुसलमान आदि के नामों का उल्लेख न होने से उनका वेदाध्ययन का अधिकार नहीं माना जाता, तो फिर आपको इस बात का खण्डन हो जाता है कि परमेश्वर की बनाई हुई वस्तु में सभी मनुष्यो का समान अधिकार है । ऐसी स्थिति में आप आस्तिकों की इस बात को ही क्यों नही मान लेते कि वेदों के अध्ययन में केवल द्विजों का अधिकार है । 'स्वाय' पद से स्त्री, सेवक आदि का ग्रहण कैसे हो सकता है? इसमें आपको प्रमाण बताना होगा । अरण पद का
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वेदार्थपारिजातः १६४७ तस्तु स्वायेत्यस्य कुलजात इत्यर्थ, अरणायेत्यस्य अन्यकुलजात इत्यर्थः । 'परिषद्यं ह्यरणस्य रेक्णो ' ( ऋ० स० ७| ४|७ ), 'नहि प्रभाय अरण:' ( ऋ० सं० ७। ४। ८ ) इति मन्त्रेभ्य । किञ्च, वर्णव्यवस्थापि वेदोपदेशकेन परमेश्वरेण जन्मना गुणकर्मभ्या वाभिप्रेता? नाद्यः" त्वत्सिद्धान्तहानेः । नान्त्यः, वेदाध्ययनात् प्राग् ब्राह्मणत्वाद्यनुपपत्तेः । क्षत्रियादीना च कथं संज्ञा निर्णीता? जन्मना क्षत्रियादिसंज्ञाभावे क्षत्रियादीन् कथं वेदान् पाठयति? किञ्च, साम्येनैव सर्वान् पाठयति वैषम्येण वा? नान्त्यस्तत्र वैषम्यापत्तेः । पक्षपातोऽपि जन्मना गुणैर्वा? नाद्यः, जन्मना वर्णत्वापत्तेः । नान्त्यः, पाठनात्पूर्वं गुणवैषम्यानापत्तेः । यदि पूर्वजन्मकर्मभिर्वैषम्यमुपेयते तदा तु पूर्वजन्मकर्मवैषम्येणैव ब्राह्मणशूद्रादिवैषम्ये कुतो नोपेयते? यदि साम्येनैव सर्वान् पाठयति, तदा सर्वेषा साम्येनैकवर्ण-त्वमेव स्यात् । यद्येकद्वित्रिचतुर्वेदपाठनेन शूद्रादिसंज्ञा स्यात्तदा सर्वेभ्यो वेदचतुष्टयी वाचमुपदिशामीति त्वद्वचो बाध्येत । किञ्च, ब्राह्मणादयो वेदाङ्गव्याकरणादिशास्त्रज्ञातार आसन्न वा? प्रथमे तेषां वेदात् प्राचीनत्वमापतेत् । द्वितीये कथं तेषा वेदतदर्थंग्रहणशक्तिगयाता? किञ्च वेदा एव तैः पठिता वेदार्था अपि वा । वेदार्था अपि चेत्, तदा वेदार्थरूपा ब्राह्मणभागा अपि परमेश्वरोपदिष्टा इति तेऽपि वेदाः सिद्धाः । वेदा एव चेत्, कथं तेषां तदर्थज्ञानम्? किञ्च तदानीमग्निवायु सूर्याङ्गिरोरूपाश्चत्वारो दयानन्दाभिमता ऋषयोऽपि सम्मिलिता अध्ययने न वा? यद्यासंस्तदा तेषामस्मिन् मन्त्रे कथं न नामोल्लेख? किञ्च, दयानन्दरीत्या तु सृष्ट्यादी अग्न्यादिभ्य एकैकवेदा उपदिष्टाः अर्थ अतिशूद्र करने मे भी आपको प्रमाण देना पडेगा । वास्तव मे ' स्वाय' पद का अपने कुल में उत्पन्न और अरणाय पद का प्रयोग अन्य कुल में उत्पन्न पुरुष के दिये हुआ है । 'परिषद्य ारणस्य रेक्णो ० ', 'नहि प्रभाय अरण:' प्रभृति ॠग्वेदीय मन्त्रो में अरण पद इसी अर्थ में प्रयुक्त है । आपको इस बात का भी उत्तर देना पडेगा कि वेदो का सबको उपदेश करने वाले परमेश्वर ने वर्ण व्यवस्था जन्म से की है या गुण और कर्म के अनुसार? पहला सिद्धान्त तो आप मानते नही और दूसरी बात भी इसलिये नही बनेगी कि वेदो का अध्ययन करने से पहले ब्राह्मणत्व आदि जातियाँ आवेगी ही कहाँ से? क्षत्रिय आदि संज्ञाओं का निर्णय कैसे होगा? जन्म से यदि यह व्यवस्था नही है, तो क्षत्रिय प्रभृति को वह कैसे वेद पढाता है? इसका भी जबाब देना पडेगा कि वह सबको समान रूप से वेद पढाता है या उसमे कुछ अन्तर रहता है । अन्तिम पक्ष मानने पर ईश्वर पर पक्षपात का आक्षेप होने लगेगा । यह पक्षपात जन्म के आधार पर होगा या गुण के? पहला पक्ष मानने पर जन्म से वर्णव्यवस्था माननी पड जायगी और अन्तिम पक्ष इसलिये नही बनेगा कि जब तक ईश्वर पढावेगा नही, उससे पहले गुणों में विषमता नही आ सकती । यदि पूर्व जन्म के कर्मोके अनुसार यह विषमता मानी जाती है, तो पूर्व जन्म के कर्मों के वैषम्य के आधार पर ही ब्राह्मण, शूद्र आदि जातियो की विषमता मानने में आपको क्या आपत्ति हो सकती है? यदि आप यह मानते है कि परमेश्वर सबको समान रूप से वेद पढाते है, तो सब जीव एक से है, उनको एक हो वर्ण का क्यो न माना जाय? यदि एक, दो तीन और चार बेदो को पढाने के कारण शूद्र आदि चार वर्ण माने जाते हैं, तो वह परमात्मा सबको चारों वेद पढाता है, आपकी इस उक्ति से उसका विरोध पडेगा । आप इस बात का भी उत्तर दीजिये कि ब्राह्मण प्रभृति वर्ण वेदाग, व्याकरण आदि शास्त्रो के ज्ञाता थे या नहीं? पहला पक्ष मानने पर ये वेदाग वेदो से भी प्राचीन सिद्ध हो जायंगे । दूसरा पक्ष मानने पर आपको इसका उत्तर देना पड़ेगा कि बिना व्याकरण आदि के ज्ञान के उनको वेदो को समझने की शक्ति कहाँ से आई । उन्होने केवल वेदों को ही पढाया या उनके अर्थो को भी? यदि साथ में वेदों का अर्थ भी पढाया तो ब्राह्मण भाग तो वेदों का अर्थ ही करते हैं, इस तरह से जब ब्राह्मण भाग का भी उपदेश ईश्वर ने किया तो इनको भी आपको वेद मानना पड़ेगा, जो कि आपके मन्तब्य के विपरीत है । यदि आप कहे कि ईश्वर ने केवल वेदो का ही अध्ययन कराया, तो फिर मनुष्य को अर्थ का ज्ञान कैसे हुआ? आपको इस बात का भी उत्तर देना पडेगा कि जब परमेश्वर ने सबको वेदो का अध्ययन कराया, उस समय अग्नि, वायु, सूर्य और अंगिरा नाम के दयानन्द के द्वारा स्वीकृत चार ऋषि भी उसमें सम्मिलित थे या नहीं? यदि संमिलित थे तो फिर इस मन्त्र में उनके नामों का उल्लेख क्यों नही किया गया? दयानन्द के मत के अनुसार तो सृष्टि के प्रारंभ में अग्नि प्रभृति को परमेश्वर
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वेदार्थपारिजात १६४८ परमात्मना । किं तदावीन्तना जनाः परमात्मना पाठितान् वेदान् विस्मृतवन्त? किमेतादृशः कश्चनेतिहासोऽस्ति? दयानन्द- रीत्या तु– 'अग्ने देवेषु प्रवोचः' हे जगदीश्वर, त्वं सृष्ट्यादी जातेषु पुण्यात्मपु अग्निवाय्वादित्याङ्गि रस्सु मनुष्येषु प्रोक्तवान् । किमयं वेदेषु क्रमिक इतिहासः । एते सर्वेऽग्न्यादयो ब्राह्मणा एव, तद्रीत्यात्र स्त्रीसेवकाः कथं न समावेशिताः? किञ्च श्रीदया-नन्देन पूर्णविद्वत्त्वेन ब्राह्मण्यम्, पूर्णमूर्खत्वेन च शूद्रत्वमङ्गीकृतम् । तस्माद् ब्राह्मणाय पूर्णविदुषे वेदपाठनं व्यर्थमेव स्यात् । तदध्यापने परमात्मप्रवृत्तौ तस्य भ्रान्तत्वापत्तिः । अत्यन्तमूर्खः शूद्रो भवति । यदि पाठनार्हान् शूद्रान् पाठयति तदनर्हान् न पाठयति, तर्हि मनुष्यमात्रस्य वेदपठनाधिकार इति रिक्तं वचः ( सत्यार्थप्रकाशे, ३ समुल्लास पृ० ४४ ) । अतो वर्णव्यवस्थात्र तद्रीत्यापि जन्मनेव समायाति । अतोऽत्र मन्त्रे नाहंपदार्थः परमेश्वरो न वा वाचमित्यस्य वेदवाणीमित्यर्थं । किश्ञ्च, ब्रह्मराजन्याभ्यामित्यत्र ब्रह्मराजन्यशब्दो रूढ्या ब्राह्मणक्षत्रिययोः प्रवर्तेते, यौगिकवृत्त्या वा? नाद्यः, सामाजिकाना रीत्या वेदे यौगिका एव शब्दा न रूढा इति तन्मतविरोधापत्तेः । नान्त्यः प्रकृते पञ्चानामपि वेदाध्ययन-रूपस्य कर्मणः समानत्वाद् यौगिकवृत्त्यनुपपत्तेः । तस्मादपि जन्मना वर्णव्यवस्थाऽभ्युपेया । किञ्च तेषामायूंषि समानानि, असमानानि वा? उपनयनादिकं तेषां केन कृतम्? तन्मातापित्रादय आसन्न वा? कानि च तेषां नामानीत्यपि वक्तव्यम् । भूमिकाया तु - (प्र० ) ईश्वरो न्यायकारी अस्ति वा पक्षपाती? ( उ० ) न्यायकारी । ( प्र ० ) तर्हि चतुर्णामेव हृदयेषु वेदाः प्रकाशिताः कुतो न सर्वेषाम्? ( उ० ) तेषामेव ( ऋषीणां ) पूर्वपुण्यमासीत्, अतः खल्वेतेषां हृदये वेदानां प्रकाशः कर्तुं भोग्योऽस्ति । वेदोत्पत्तिविषये ) । अत्र मन्त्रे तुतु सर्वान् मनुष्यान् वेदानध्यापयतीति परस्परविरुद्धभाषित्वमपि । ने एक-एक वेद का उपदेश किया था । क्या उस समय के मनुष्य परमेश्वर के द्वारा पढाये गये वेदो को भूल गये थे? क्या इस तरह का कोई इतिहास मिलता है? स्वामी दयानन्द ने 'अग्ने, देवेषु प्रवोच.' इसका अर्थ यह किया है कि हे जगदीश्वर, तुम सृष्टि के प्रारंभ मे उत्पन्न पुण्यात्मा, अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम के मनुष्यो को वेदो का उपदेश करते हो । क्या यही वेदों का क्रमिक इतिहास है? ये अग्नि प्रभृति सभी ब्राह्मण हैं । दयानन्द के मत के अनुसार यहाँ स्त्री और शूद्र का भी समावेश होना चाहिये था । एक विचित्र बात यह भी है कि स्वामी दयानन्द ने पूर्ण विद्वान् को ब्राह्मण और पूर्ण मूर्ख को शूद्र माना है । अब पूर्ण विद्वान् को यदि परमात्मा वेद पढाता है, तो यह व्यर्थ है । इसी तरह से निरे मूर्ख शूद्र को भी वेद पढाना व्यर्थ है । दोनों ही कार्यों में परमेश्वर की प्रवृत्ति भ्रमपूर्ण ही मानी जायगी । यदि आप यह उत्तर दें कि पढाने लायक शूद्रों को पढ़ाता है और नही पढाने लायक को नही पढाता, तो आपका पहले का यह कहना गलत हो जायगा कि वेदों के पढ़ने का मनुष्य मात्र को अधिकार है । इस तरह से आपके मत के अनुसार भी वर्णव्यवस्था का आधार जन्म ही सिद्ध होता है । इस तरह से 'यथेमा वाचं' प्रभृति ग्रन्थ में न तो अहंपद का अर्थ परमेश्वर ही होगा और न 'वाचम्' पद का अर्थ वेदवाणी हो । आप इस बात का भी उत्तर दीजिये कि ' ब्रह्मराजन्याभ्याम्' यहाँ ब्रह्म और राजन्य शब्द रूढि के आधार पर ब्राह्मण और क्षत्रिय के वाचक है, अथवा यौगिक वृत्ति के आधार पर? पहला पक्ष आपके इस मत के विपरीत पड़ेगा कि वेद मे केवल यौगिक शब्द होते है, रूढ़ नही । अन्तिम पक्ष भी इसलिये सही नही बनेगा कि प्रकृत स्थल में वेदाध्ययन तो ब्रह्म, राजन्य, शूद्र, अतिशूद्र आदि सभी करते हैं, तब केवल एक दो में ही यौगिक वृत्ति से इसकी प्रवृत्ति कैसे होगी? इस आधार से भी जन्म से ही वर्णव्यवस्था सिद्ध होती है । आप इस बात का भी उत्तर दीजिये कि उन सबकी आयु एक सी है, या उसमें कुछ अन्तर है? उनका उपनयन आदि संस्कार किसने किया? उनके माता- पिता आदि थे या नही? उनके नाम भी आपको बताने होंगे । स्वामी दयानन्द ने अपनी वेदभाष्य- भूमिका में पूछा है कि ईश्वर न्याय करता है अथवा पक्षपात? और इसका उत्तर दिया है कि ईश्वर केवल न्याय करता है । इस पर पूछा गया है कि तब वह केवल चार व्यक्तियों के हृदयों में वेदों को क्यों प्रकाशित करता है, सबके हृदयों में क्यों नही करता? और तब इसका उत्तर दिया है कि उन ऋषियों का ही यह पूर्वजन्म का पुण्य था, अतः उन्ही के हृदयो में इसका प्रकाश किया जाय, यह उचित ही है ( द्रष्टव्य- वेदोत्पत्तिविषयक प्रकरण ) । इस जगह पर स्वामी दयानन्द कहते हैं कि परमेश्वर सब मनुष्यों को. समान रूप से सृष्टि के आरम्भ में वेद पढाता है । इस तरह से उनका यह कथन परस्पर विरोधी है ।