वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 751–760
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 751–760
पृष्ठ 751
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १६४ ९ सुश्रुतानुसारेण अशुभलक्षणानामकुलीनाना शूद्राणा च वेदसहिताधिकारी नास्ति ( सत्यार्थप्रकाशे २५ ), तथैव ४४ पृष्ठे तु समेषामधिकारो वर्णितः । यथा ब्राह्मणादीनामुपनयनकालो वसन्तादिः पालाशादिर्दण्ड., वर्णानुसारेण सम्बोधनं पौर्वापर्येण विहितम्, न तथा शूद्रातिशूद्राणा स्त्रीणा चोपनयनकालादिरुक्त । पद्युपनयन वेदाधिकारप्रयोजकं तहि कुतो न शूद्रातिशूद्राणां कृते उपनयनतत्कालतदुचितदण्डादिविधान कृतम्? सामाजिकाना तृतीये नियमे आर्याणा वेदपठनपाठ- नादिकमुक्तम्, अष्टमसमुल्लासे शूद्राणामनार्यत्वमुक्तम्, अत्र मन्त्रे तेषामनार्याणामेव वेदाध्ययनाधिकारो दत्त इति परस्पर विरोध । यजुर्वेदभाष्ये - अरणायेत्यनेनोत्तमलक्षणवतोऽन्त्यजस्य वेदाधिकारोऽङ्गीकृतः । तेनाधमलक्षणवतोऽन्त्यजस्यानधि- कारेण मनुष्यमात्रस्याधिकार इत्यपि खण्डितमेव । वस्तुतस्तु 'या तेनोच्यते सा देवता' ( सर्वानुक्रमणी २१५ ) इत्यत्र तेन वाक्येन यत्प्रतिपाद्य वस्तु सा देवता' इति षड्गुरुव्याख्यानरीत्या ' यत्काम ऋषिर्यस्या देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुक्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति' (नि०७/ १ ) यस्या देवताया येन मन्त्रेण स्तुत्यार्थपत्यं कामयते स देवता इत्यादिरीत्या च मन्त्रप्रतिपाद्यो विषय स्तोतव्य सबोधनीयो ----वा देवता भवति । प्रतिपादकः संबोधयिता वा ऋषिर्भवतीति । बृहद्देवतानुसारेण च - 'सवादे ( सूक्ते )ष्वाह वाक्यं यः स तु तस्मिन् भवेदृषिः । यस्तेनोच्येत वाक्येन देवता तत्र सा भवेत् । ' ( २/ ९ ० ), 'यस्य वाक्यं स ऋषि:' ( २३४ ) सर्वानु- क्रमणी । मन्त्रस्य वाच्यं देवता ( ११ ) (वा० स० ) । सवादेषु च सर्वेषु स ऋषिर्यस्य वाक्यम् आत्मस्तवेषु य ऋषिर्देवता स एवोच्यते । तेन वाक्येन यः प्रतिपाद्यते स स्याद् देवता । ( १।१६५।११ ) त्यज्यमानद्रव्ये उद्देश्यविशेषो देवतामन्त्रस्तुत्या च यथा यमयसीसूक्ते यम ऋषियंमी देवता ( ऋ ० सं ० १,३,५,७,११,१३ मन्त्रेषु, ऋग्वेदम० १०/५५/१, ३, ६, ८–१०, १२, १४ सत्यार्थप्रकाश में एक जगह कहा गया है कि सुश्रुतसंहिता के अनुसार अशुभ लक्षण वाले अकुलीन शूद्रो को वेद- संहिता के अध्ययन का अधिकार नही है, वही दूसरी जगह सबके वेदाध्ययन करने की बात दुष्ट की गई है । यह सब बातें परस्पर विरोधी है । ब्राह्मण प्रभृति के लिये वसन्त प्रभृति उपनयन संस्कार का समय, पालाश प्रभृति का दण्ड, वर्ण के अनुसार संबोधन, ये सब बाते क्रमशः बताई गई हैं, किन्तु उन स्थलो पर कही भी शूद्र, अतिशूद्र और स्त्रियों के उपनयन काल आदि का वर्णन नही मिलता । यदि उपनयन को वेदाध्ययन का प्रयोजक माना जाता है, तो उस स्थिति में इनके लिये भी उपनयन के समय दण्ड मादि का विधान होना चाहिये था । आर्यसमाजियों के तीसरे नियम में आर्यों के वेदो के पढने पढ़ाने की बात कही गई है और सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में शूद्रों को अनार्य माना है । अब इस मन्त्र की सहायता से उन अनार्यो को वेदाध्ययन का अधिकार दिया जा रहा है । ये सब बातें परस्पर एकदम विरुद्ध हैं । यजुर्वेदभाष्य में अरणाय पद का अर्थ उत्तम लक्षण वाला अन्त्यज करके उसको वेदाध्ययन का अधिकारी बताया गया है । किन्तु उसी से यह सिद्ध हो जाता है कि अधम लक्षण वाले अन्त्यज को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है । इस तरह से मनुष्यमात्र के अधिकार की बात का खण्डन आपके अपने वचनो से ही हो जाता है । वस्तुतः विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि जिस मन्त्र वाक्य में जिस द्रव्य-देवता आदि का प्रतिपादन होता है, वही उसका देवता माना जाता है । सर्वानुक्रमणी, उसके षड्गुरु शिष्यविरचित भाष्य, निरुक्त आदि के वचनों का यही निष्कर्ष निकलता है | यह उचित ही है कि अपनी जिस किसी भी कामना की पूर्ति के लिये जो व्यक्ति जिस देवता की स्तुति जिस मन्त्र में करता है, वही उसका स्तोतव्य देवता और स्तुतिकर्ता ऋषि होगा । बृहद्देवता नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है कि संवाद सूक्तो मे जो वाक्यों का उच्चारण करता है, वह ऋषि और जिसकी स्तुति की जाती है, वह उसका देवता माना जाता है । वाजसनेय संहिता, शतपथब्राह्मण आदि के वचनो से भी यही सिद्ध होता है जिसका यह वाक्य होता है, वही उसका ऋषि और जो उसका वाच्य होता है, वही उसका देवता होता है । जिस देवता को उद्दिष्ट कर यज्ञ में आहुति दी जाती है और जिसकी स्तुति को जाती है, वही उसका देवता माना जाता है । इस सिद्धान्त के अनुसार यमयमीसूक्त में यम ऋषि है और यमी देवता ॥ इसी तरह से मूल में उद्धृत ऋग्वेदीय मन्त्रो के पुरूरवा ऋषि और उर्वशी देवता है । इसके विपरीत यही के कुछ अन्य मन्त्रों में उर्वशी ऋषि और पुरूरवा देवता हो जाते है । इस तरह का निर्णय प्रति-पाद्य (देवता ) और प्रतिपादक (ऋषि ) को कसोटी मानकर किया जाता है । इस कसौटी पर यदि ' यथेमा वाच' प्रभृति मन्त्र को परीक्षा २०७
पृष्ठ 752
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात. १६५० मन्त्रेषु प्रतिपादकः पुरूरवा ऋषि प्रतिपाद्य उर्वशी देवता २,४,५, ७, ११, १३, १५, १६, १८ मन्त्रेषु प्रतिपादकत्वादुवंशी ऋषिका प्रतिपाद्यत्वात् पुरूरवा देवता । अनेन निकषेण 'यथेमा वाचं कल्याणी० ' इत्यत्रापि यदीश्वरो देवता स्यात् तदा म एव प्रतिपाद्य स्यान्न प्रतिपादक, देवता स्तोतव्या संबोध्या प्रार्थनीया भवति, प्रार्थयित्रा स्तोत्रा सबोधयि- ऋषिणा । यदीश्वरोऽत्र ऋषि स्यात् तदा स प्रतिपादको भविष्यति न प्रतिपाद्यः । 'यथेमाम् इति' मन्त्रात् पूर्वस्मिन् मन्त्रे परमात्मोच्यत इत्युव्वट' । परमात्मानं प्रत्युच्यत इति महीधरः ॥ तेनात्र ' आवदानि' इति क्रियायाः प्रार्थनायाश्च कर्ता ऋषिर्न परमेश्वर: ईश्वरस्तु देवतात्वेनात्र प्रतिपाद्यो न प्रतिपादकः । तत एव 'अध्वनस्कुरु संज्ञानमस्तु मेऽमुना त्वं नोऽस्माकमध्वनः सकामान् कुरु! अमुना सह मे संज्ञान संगतमस्तु ' इत्यादि प्रार्थना युज्यते । नेश्वरस्य वक्तृत्वे तद्युज्यते, तस्य पूर्णकामत्वेन तत्कर्तृकतया प्रार्थनानुपपत्ते । अत एवोन्टादिभिः -'अनुद्वेजिनी दीयता भुज्यतामित्येवमादिका कल्याणी वाचमावदानि सर्वतो ब्रवीमि इति मन्त्रयोरर्थ. कृत । हे स्वामिन्, हे परमात्मन्, यस्य तव सप्त संसदः सप्त ससदानि अधिष्ठानानि अग्निवाय्वन्तरिक्षादित्य द्युलोकाम्बु- वरुणाख्यानि, तत्राष्टमी भूतसाधनी पृथ्वी भूतानि साधयत्युत्पादयतीति भूतसाधनी, भूमिमन्तरा भूतोत्पत्तेरसम्भवात् । अतः सर्वाधिष्ठानभूतस्त्वमध्वनो मार्गान् सकामान् कुरु । येषु मार्गेषु मया गम्यते तत्रास्माकं कामप्राप्तिरस्त्वित्यर्थं । मे मम अमुना देवदत्तादिना संज्ञानमस्तु इष्टेन मम प्रीतिरस्तु | विज्ञानात्माप्यत्र देवतात्वेन वक्तुं शक्यते । यस्य तव पञ्च बुद्धीन्द्रि- याणि मनो बुद्धिश्चेति सप्तायतनानि अष्टमी भूतसाधनी भूतवशकरी वाक् च संसदोऽधिष्ठानानि स त्वं नोध्वनः सकामान् कुरु । इमां कल्याणीमनुद्वेजिनी वाचमहं यथा येन प्रकारेण यतो वा आ वदानि सर्वतो वदामि दीयतां भुज्यतामिति सर्वेभ्यो वच्मि । केभ्यः? ब्रह्मराजन्याभ्या शूद्राय अर्थ्याय वैश्याय स्वाय आत्मीयाय अरणाय पराय शत्रवे वा । अरण. अपगतोदकः शत्रुः, नास्ति करें, तो उस स्थिति में परमेश्वर को इस मन्त्र का देवता मानने पर वह प्रतिपाद्य (स्तोतव्य) होगा, प्रतिपादक (वक्ता ) नही । प्रार्थना करने वाला स्तोता और सबोधक ऋषि होता है और जिसकी स्तुति की जाय, जिससे प्रार्थना की जाय, जिसे संबोधित किया जाय, वह देवता । यदि प्रस्तुत मन्त्र का वक्ता ईश्वर को माना जाता है, तो प्रतिपादक ( स्तावक ) होगा, ( स्तोतत्य ) नही । उम्वट का कहना है कि इससे पहले के मन्त्र मे परमात्मा को संबोधित किया जाता है । महीघर का भी यही अभिप्राय है । इस तरह से इस मन्त्र को 'आवदान' इस क्रिया का और प्रार्थना का भी कर्ता, अर्थात् ऋषि परमेश्वर नही है । वह तो देवता है । अतः प्रतिपाद्य होने से वह प्रतिपादक नही हो सकता | इसीलिये ' अध्वनस्कुरु० ' इत्यादि मन्त्र के द्वारा ईश्वर की प्रार्थना उचित ही है । ईश्वर को इस मन्त्र का वक्ता (ऋषि ) मानने पर यह संभव नही हो सकता, क्योंकि वह तो पूर्णकाम है, वह किसी कामना की पूर्ति के लिये प्रार्थना करे, ऐसा मानना उचित नहीं हो सकता । इसीलिये उन्वट प्रभृति ने इन दोनों ही मन्त्रों का संमिलित अर्थ किया है कि ,, खूब दान करो खून भोग करो इस तरह की किसी के भी मन को उद्विग्न न करने वाली कल्याणमयी वाणी में सदा बोलता रहूँ | मन्त्र का सही अर्थ यह है कि हे स्वामिन्, हे परमात्मन्, अग्नि, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, चुलोक, जल, वरुण -ये सात आपके स्थान है । इनमे आठवी भूमि भूतसाधनी, अर्थात् सभी प्राणियो को उत्पन्न करने वाली है, क्योकि बिना पृथिवी के भूतो की उत्पत्ति नही हो सकती । इस तरह से आप सभी अधिष्ठानो (स्थानो ) के अधिपति स्वामी है, इसलिये आप हमारे सभी मार्गो को सकाम (सफल ) बना दीजिये । आपकी कृपा से हमारी कामनाओ के मार्ग के सरल हो जाने पर हमारे मनोरथ की सिद्धि शीघ्र हो सकेगी, यह कहने का अभिप्राय है । मेरी देवदत्त प्रभृति अपने इष्ट जनो से A मित्रता, प्रीति बढे । विज्ञानात्मा को भी यहाँ देवता माना जा सकता है । जैसे कि पाँच ज्ञानेन्द्रियां और मन एवं बुद्धि इन सात स्थानों के साथ आठवी वाणी इस पक्ष में भूतसाधनी मानी जाती है । वाणी की सहायता से ही विज्ञानात्मा अपना व्यवहार चलाता है । हे विज्ञानात्मन् आप हमारे मनोरथों को सफल बनाइये । मैं किसी को भी उद्विग्न न करने वाली खूब दान करो, खूब उपभोग करो, इस तरह की वाणी को जिस प्रकार और जिस कारण से भी बोल सकूँ, वैसा आप कीजिये । मैं इस तरह की वाणी ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, अपने हितकारी और शत्रु के लिये भी प्रयुक्त करना चाहता हूँ । L 4
पृष्ठ 753
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात १६५१ रणः शब्दो येन सह स वाक्सम्बन्धरहितः शत्रु । यथेति पूर्वमुक्तस्तथेत्यध्याहार्यम् । यतो वाऽहं ब्राह्मणादिभ्य. कल्याणी वाच वदामि, तथा तेन प्रकारेण वा ततो वाहं देवाना प्रियो भूयासम् । इह ससारे दक्षिणायै दक्षिणाया दातुश्च प्रियो भूयासम् । देवा दक्षिणादातारश्च मयि प्रीति कुर्वन्त्वित्यर्थः । किञ्च, ममायं काम. समृद्धयतां सफलो भवतु | अयमिति नामनिर्देशः । धनपुत्रादिलाभो मे सम्पद्यतामित्यर्थः । किञ्चाद इति इष्टनामग्रहणम् । देवदत्तादिर्मा ना उपनमतु प्रोर्णमतु । इमामित्यनेन सन्निहिता वागेव ग्रहीतु शक्या, इदमस्तु सन्निकृष्टे इत्यादि प्रसिद्धेः । न चतुर्वेदलक्षणा वाक् सन्निकृष्टा विद्यते । नात्र वेदो वेदवाणी वा सन्निहिता प्रकृता वा? नायं वेदस्यादिमो न वान्तिमो मन्त्र । अधिकारानधिकारप्रकरणमपि नास्ति । न वा बुद्धिस्था वेदचतुष्टयी । तस्मादनुद्वेजिका वागेवात्र ग्राह्या । सा च भूतसाधनी वाक् पूर्वमन्त्रान्ते समायाता । दीयतां भुज्यतामिति मधुरवागेव सर्वभूतवशंकरी सैव भूतसाधनी । तत्रेश्वर ऋषि । तस्मादावदानीत्यस्याः क्रियाया नेश्व: कर्ता । परमेश्वरस्तु प्रतिपाद्यः । तस्मात्तदीयां वेदवाणीमहमावदानीति यजमान ऋषिर्वक्तु शक्नोति । तस्मादनेन मन्त्रेणर्षिणा यजमाने परमात्मा प्रार्थ्यते । तृतीययापि कण्डिका बृहस्पते अतियदर्यो अर्हाद् घुमद्विभाति । हे बृहस्पते, बृहता वेदानां पते पालक चित्रं नानाविधं द्रविणमस्मासु यजमानेषु धेहि धारय स्थापय देहीत्यर्थः । तत्किम्? अय्यः स्वामी यद्धनमर्हति अर्यो यद्धनमर्हति पूजयति । यद्धनं जनेषु लोकेषु विभाति विविध शोभते । कीदृशं द्युमत् कान्तिमत् क्रतुमत्, येन यज्ञा. क्रियन्ते, यद् धन शवसा बलेन दीदयत दापयति प्रापयति वा धनान्तरम् अर्थानुबन्धमर्थरूप वा ( दय दानगतिहिसाद नेषु ) उपयामेन पात्रेण गृहीतोऽसि । बृहस्पतयेऽर्थाय त्वा गृह्णामि । स्थापयति - एष ते योनिः स्थानम्, बृहस्पतये त्वा सादयामि | जिसके साथ उदक सम्बन्ध नही है, अथवा जिसके साथ बातचीत नही है, उसको अरण अर्थात् शत्रु कहा जाता है । यथा शब्द का पहले मन्त्र में प्रयोग होने से यहाँ तथा शब्द का अध्याहार किया जाता है । क्योकि मैं ब्राह्मण प्रभृति सभी के साथ मधुर वाणी बोलता हूँ, इसलिये मैं चाहता हूँ कि सभी देवता मुझ पर प्रमन्न रहे । इस संसार मे दक्षिणा देने वाले का भी मै प्रिय होऊँ । कहने का अभिप्राय यह है कि देवगण और दक्षिणा देनेवाले यजमान नृपति आदि मेरे ऊपर सदा प्रसन्न रहें । मेरी यह कामना भी पूरी हो जाय । 'अयम्' शब्द से यहां धन ", पुत्र आदि के लाभ की कामना का,, जो भी प्रार्थना करने वाले को अभीष्ट हो, उसका उच्चारण अभीष्ट है और 'अद ' शब्द से भी उन देवदत्त आदि के नाम का ग्रहण करना चाहिये, जो कि उसकी अभीष्ट कामना की सिद्धि में सहायक हो । इसी तरह से ' इमाम्' इस शब्द से संनिहित, अर्थात् अभी अभी जिसकी चर्चा की गई, उस वाणी का ग्रहण होता है । इदं शब्द का प्रयोग समीप की वस्तु के लिये ही किया जाता है । अतः वाक् शब्द से यहाँ चतुर्वेद स्वरूप वाणी का ग्रहण नही होगा, क्योकि वह सनिहित नही है और न प्रकृत में उसका कोई उपयोग ही है । यह न तो वेद का पहला अथवा अन्तिम मन्त्र है, अधिकारी अथवा अनधिकारी का निर्णय करने वाला प्रकरण भी इसमे नही है और न वेदचतुष्टयी को बुद्धि मे रखकर उसके सम्बन्ध में कुछ कहा ही गया है । इसलिये किसी को भी उद्विग्न न करने वाली वाणी का ही यहाँ ग्रहण करना चाहिये । पहले मन्त्र के अन्त में भूतसाघनी वाणी की चर्चा है । खूब दान करो, खूब उपभोग करो, इस तरह की सबके मन को आह्लादित कर देने वाणी मधुर वाणी ही भूतसाघनी कही जा सकती 'आवदानि' इस क्रिया का कर्ता ईश्वर नही है । वह तो इस मन्त्र काहै । ईश्वर इन मन्त्रो का ऋषि नही है । इसलिये प्रतिपाद्य है, अर्थात् ऋषि अथवा यजमान ईश्वर से प्रार्थना करता है कि मैं इस तरह की कल्याणमयी वाणी बोलने में समर्थ होऊँ । ' बृहस्पते अति यदर्यो०' इस तीसरी कण्डिका में भी ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि हे वृहस्पते, अर्थात् वेदों के पालक ईश्वर, आप हम यजमानों को नाना प्रकार की सम्पत्ति से संपन्न बनाइये । उस तरह से आप हमें संपन्न कीजिये, जिस समृद्धि से कि कोई स्वामी सम्पन्न रहता है और उसकी आज्ञा के अनुसार, यज्ञ, याग, पूजन आदि में ऋत्विक् गण प्रवृत्त होते हैं । यह सम्पत्ति मनुष्यो में अपने अनेक रूपों में निवास करती है । इसी से मनुष्य कान्तिमान् बनता है, इसी की सहायता से वह यज्ञ-याग आदि करने में समर्थ होता है, यह सम्पत्ति ही अपनी सामर्थ्य से धनागम के अनेक मार्ग प्रशस्त कर देती है ।
पृष्ठ 754
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात. १६५२ 'नून सा ते प्रतिवरं जरित्रे दुहोयादिन्द्र दक्षिणा मघोनी । शिक्षा स्तोतृभ्यो मातिधग् भगो नो बृहद् वदेम विदथे विदथे यज्ञे बृहद्वदेम दीयता सुवीराः ॥ ' ( ऋ० सं० २।११।२१ ) । अत्र मन्त्रे धन प्रार्थ्यते । हे इन्द्र, मह्यमेतावद् धनं देहि येन भुज्यतामिति कल्याणी वाचं वदेम | दुर्गाचार्येण निरुक्त व्याख्यानेऽस्य मन्त्रस्यैवमर्थ उक्तः - 'सा दक्षिणा यजमानाय प्रति-दुग्धाम् । धनं नोऽस्तु येन किं कुर्याम । बृहद् वदेम महद् ऊर्जितं वदेम दीयता भुज्यतामिति । क्व विदथे यज्ञे' ( नि० १1७ ) । वेङ्कटमाधवेनापि ( २।१।१६ ) मन्त्रे यज्ञे दीयता भुज्यतामिति बृहद्वचन वदेम सुपुत्रा । यज्ञसमाप्तो ब्राह्मणक्षत्रियवेश्येभ्यः शूद्रेभ्योऽतिशूद्रेभ्यः स्वात्मीयेभ्यः परेभ्यः शत्रुभ्यो मित्रेभ्यः सर्वेभ्य एव भोजनादि ससम्मानमर्त्यते । अत्र सर्वत्र लोट्लकार- प्रयोग । आवदानि समृद्धयताम् उपनमनु, आशिषि चाय लकार । सर्वाश्चैताः प्रार्थना. परमेश्वरे क्रियन्ते । इयमेव कल्याणी --वाक् सर्वेषामभिमता । यज्ञपरश्चायमध्यायः । ययोक्त मुव्वटेन अग्निष्टोमसौत्रामण्यश्वमेध पुरुषमेध सर्वमेधपितृमेधप्रव्रज्यो- पनिषत्सम्बद्धा मन्त्रा व्याख्येया । अत एव महाभारते - ' दीयता दीयतामन्न वासासि विविधानि च । भुज्यता चैव विप्राणा वदतां च महास्वनः ॥ अनिशं श्रूयते तत्र मुदिताना महात्मनाम् ॥ दोयता दीयतामन्नं भुज्यता भुज्यतामिति । एव प्रकाराः संजल्पाः श्रूयन्ते स्मात्र नित्यशः ॥ ' ( म० भा० स० प० ३३।५५-५६ ) सामाजिकानामजमेरप्रकाशिताया मूलयजुर्वेदसहितायामस्य मन्त्रस्येश्वरो देवतेत्युक्तम् । किञ्चाचैवग्वेदादि- भाष्यभूमिकायामुक्तम् — ' यथेमाम्' इति मन्त्रस्यायमेवेश्वर सम्बन्धी अर्थोऽस्ति । 'बृहस्पते अति यदयं इत्युत्तरस्मिन् मन्त्रे हीश्वरार्थस्यैव प्रतिपादनात्' ( पृ ० ३५४ ) । यद्युत्तरमन्त्रानुसारेणेश्वर एव प्रतिपाद्यो न प्रतिपादकस्तदा तु नेश्वरोऽत्र वक्तेति तद्वचनेनैव सिद्धम् । उत्तरस्मिन् मन्त्रे स्पष्टमेव तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रमिति धनमीश्वरो याच्यते ऋषिणा । अत्रापि 'नूनं सा ते० ' इस मन्त्र में धन की प्रार्थना की जाती हैं । हे इन्द्र, आप हमे इतना धन दीजिये कि हम लोग यज्ञ के अब-सर पर खूब दान करो, खूब खाओ-पीओ, इस तरह की मगलमय वाणी बोलने में समर्थ हो सकें । दुर्गाचार्य ने निरुक्त की व्याख्या मे इस मन्त्र का यह अर्थ किया है— वह दक्षिणा यजमान की सब कामनाओ का पूर्ण करे । हमें धन प्राप्त हो, जिससे कि हम यज्ञ के अवसरो पर खूब दान करने और उपभोग करने वाली ओजस्विनी वाणी बोल सकें । वेंकट माधव ने भी यही व्याख्या की है कि हम सुपुत्र (सपूत ) हैं, इस यज्ञ में खून दान करो, खूब खाओ-पीओ, इस तरह की मधुरवाणी बोलना चाहते है | यज्ञ की समाप्ति होने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अतिशूद्र, स्वात्मीय जन, शत्रु -मित्र, सबको संमानपूर्वक भोजन आदि कराया जाता है । इन स्थानो पर सर्वत्र लोट् लकार का प्रयोग आशीर्वाद के अर्थ मे किया गया है और इस तरह की सभी प्रार्थनाएँ ईश्वर से की जाती है । सभी भाष्यकार इसी की कल्याणी वाकू, मंगलमयी वाणी कहते है । इस अध्याय मे यज्ञ का प्रकरण है । उव्वट ने स्पष्ट कहा कि इस अध्याय में अग्निष्टोम सौत्रामणी, अश्वमेघ, पुरुषमेध, सर्वमेघ, पितृमेध, प्रव्रज्या और उपनिषद् से सबद्ध मन्त्रो की व्याख्या की गई है । इसीलिये महाभारत में यज्ञ का वर्णन इन मन्त्रों की पद्धति पर ही किया गया है । जैसे कि -'यज्ञ में पधारे सब लोगो को नाना प्रकार के अन्न और वस्त्रों का दान करो, अर्थात् पहले सब को खूब भोजन परोसो और भोजन कर चुकने पर उनको आदरपूर्वक वस्त्र दो, उस यज्ञस्थल में भोजन करने वाले ब्राह्मणों और परोसने वाले व्यक्तियो की चारो ओर से यही भारी बावाज रात-दिन सुनाई पड़ रही है । सभी पुण्यात्मा जन उस समय परोसने वालों से बोल रहे थे कि बार बार अन्न परोसो और खाने वालो से कह रहे थे कि अभी आप लोग और भोजन कीजिये । उस यज्ञ के अवसर पर सभी ओर से इसी तरह की बातचीत सदा सुनाई पडती थी' । आर्यसमाजियो की अजमेर से प्रकाशित मूल यजुर्वेदसंहिता में इस मन्त्र का देवता ईश्वर बताया गया है । यहाँ इसी स्थल पर ऋग्वेदादिभूमिका में लिखा गया है कि 'यथेमा' इस मन्त्र का यही अर्थ ठीक है, क्योकि इससे अगले मन्त्र 'बृहस्पते अति यदर्य ' में भी परमेश्वरं का ही ग्रहण किया है' ( पृ० ३५५ ) । अब इसमें सोचने की बात यह है कि अगले मन्त्र के अनुसार यहाँ ईश्वर प्रतिपाद्ये हैं, प्रतिपादक नहीं, तो उस परिस्थिति में इस मन्त्र का वक्ता ईश्वर नही है, यह बात उनके कहने से भी सिद्ध हो जाती हैं, क्योंकि आगे के मन्त्र में यह स्पष्ट बताया गया है कि हमें आप नाना प्रकार का धन दीजिये । इस तरह से यजमान ऋषि ईश्वर से
पृष्ठ 755
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १६५३ घेहीति लोट्लकारः । तद्वदेव यथेमामित्यत्रापि परमेश्वरः प्रार्थ्यते यजमानेन । अहमिमां कल्याणी वाचमावदानि जनेभ्यः | अहं प्रियो देवानां दक्षिणादातुश्च भूयासम्, अयं मे काम समृद्ध्यताम् 1। सर्वथापि नात्र परमेश्वरः प्रार्थयिता । उत्तरमन्त्रस्य दयानन्दीयभाष्येऽपि परमेश्वरः प्रतिपाद्यत्वेनोक्तः । अत एवावदानीत्यस्य लोट्लकाररूपत्वेन वदामि व्रवीमीति नार्थः, किन्त्वासमन्ताद् ब्रुवाणीत्येवार्थः । तथा च ' यथाहमीश्वरो ब्राह्मणादिभ्यो वेदचतुष्टयी वाच वदामि तथा युष्माभिरपि सर्वेभ्यो वेदा उपदेष्टव्या ' ( पृ० ३५३ ) इति सर्वथाऽशुद्धोऽर्थं । प्रकृते तु आवदानीति यजमानस्याशीरूपा प्रार्थनेव, तच्चे- वरे नोपपद्यते । यत्तु केनचिन्मन्त्रप्रतिपाद्यत्वाभावेऽपि दानाद्वा दीपनाद्वा देवतात्वाद् दानादीश्वरोऽत्र देवता, इति, तदपि न युक्तम्, तथात्वे हि दानादेव परमेश्वर एवोत्तरमन्त्रेऽपि वक्ता स्यात्, तथात्वे चान्यमन्त्राणामीश्वरोक्तत्वं न स्यात् । यदुक्तम्— 'यजमानः स्वयं यज्ञकर्ता दक्षिणादाता भवति । स कथमेवं कथयिष्यति दक्षिणादातुरहं प्रियो भूयासम्' इति, तदपि तुच्छम् ऋषेर्यजमानस्य धनरहितत्वादेवान्यतः परमेश्वराद् राज्ञो वा धनमानीय यज्ञनिर्वाहो भवति । ततो एवोत्तरमन्त्रेऽपि द्रविणं धेहि, बृहद्वदेम इत्यादिप्रार्थना भवति । तस्माद्दक्षिणादातुरीश्वरस्य राज्ञो वाह प्रियो भूयासमिति यजमानप्रार्थनाया न काचिदनुपपत्तिः । यदुक्तम् — ---वर्णाश्रमा अपि गुणाचारतो भवन्ति, यथाह मनुः -'शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् । क्षत्रियाज्जातमेव तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ ' ( म ० १०।६५ ) । शूद्रः पूर्णविद्यासु शीलतादिब्राह्मण गुणश्चेद् ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणभावं धन की प्रार्थना करता है । इस मन्त्र मे 'घेहि' यह लोट् लकार का रूप है । उसी तरह से ' यथेमाम्' इस मन्त्र में भी यजमान ईश्वर से प्रार्थना करता है कि मैं सभी मनुष्यो के प्रति कल्याणी वाणी बोलने में समर्थ होऊं, मैं देवताओ का और दक्षिणा देने वाले यजमान नृपति आदि का प्रिय बनूँ, मेरी यह कामना पूरी हो । किसी भी दृष्टि से विचार किया जाय, ईश्वर इस मन्त्र मे प्रार्थयिता के रूप मे नही माना जा सकता । अगले मन्त्र के दयानन्द भाष्य मे भी परमेश्वर को प्रतिपाद्य ही माना है । इसीलिये लोट् लकार का रूप होने से ' आवदानि' इस पद का अर्थ 'बोलता' हूँ यह नही होगा, किन्तु ' सब तरह से बोलू' यही अर्थ होगा । इस तरह से 'जैसे मैं ईश्वर ब्राह्मण आदि सभी मनुष्यों को चारों वेदो का उपदेश करता हूँ, उसी प्रकार से तुम भी उनको पढ के सब मनुष्यो को पढ़ाया और सुनाया करो' ( पृ० ३५४ ) दयानन्द का यह अर्थ सर्वथा अशुद्ध है । वस्तुतः प्रकृत मन्त्र में 'आवदानि' यह यजमान की आशीर्वादात्मक प्रार्थना है । इस तरह की प्रार्थना ईश्वर में ठीक नही बैठती । किसी का कहना कि मन्त्र के द्वारा भले ही न प्रतिपादित हो, किन्तु दान, दीपन ( प्रकाशन ), प्रभृति गुणो के कारण ईश्वर को ही इस मन्त्र का देवता मानना चाहिये, किन्तु इस मन्तव्य में दोष यह है कि दान-दीपन आदि गुणो के आधार पर ही अगले मन्त्र का भी बक्ता ईश्वर ही हो जायगा और जिन मन्त्रो में दान -दीपन आदि गुणों का वर्णन नही है, वे मन्त्र ईश्वर के द्वारा उपदिष्ट नही माने जायेंगे | यह कहना कि 'यजमान तो स्वयं यज्ञ करने वाला है, वही दक्षिणा भी देता है, वह ऐसा क्यों कहेगा कि दक्षिणा देने बालों का मै प्रिय होऊँ', किन्तु ऐसा कहना अपने ही अज्ञान को प्रकट करना है, यजमान केवल राजा ही नहीं, साधनहीन ऋषि भी होते हैं, उनके पास धन नही रहता, वे किसी राजा या धनी व्यक्ति से धन प्राप्त करके हो यज्ञ-याग आदि धार्मिक कृत्य सम्पन्न करते है । अतः दाता के प्रिय बनने की बात ऋषि आशीर्वादात्मक श्रुति में चाहे, यह उचित ही है । इसीलिये आगे के मन्त्र में धन दो, हम जनता के लिये बड़े बड़े काम कर सकें, इस तरह की प्रार्थना की गई है । इसलिये दक्षिणा देने वाले अपने स्वामी अथवा राजा आदि का मै प्रिय बनूँ, इस तरह की प्रार्थना यदि यज्ञ करने वाला गरीब यजमान करे, तो इसमें क्या आपत्ति की बात हो सकती है । इसी प्रसंग में स्वामी दयानन्द आगे लिखते है-' वर्णाश्रम व्यवस्था भी गुण-कर्मो के आचार विभाग से होती है । इसमें मनुस्मृति का भी प्रमाण है कि 'शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है । अर्थात् गुण-कर्मों के अनुकूल ब्राह्मण हो तो ब्राह्मण रहता I
पृष्ठ 756
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात १६५४ प्राप्नोति योऽस्ति ब्राह्मणस्याधिकारस्त सर्वं प्राप्नोत्येव । एवमेव कुचर्याधर्माचरणनिर्बुद्धिमूर्खत्वपराधीनतापरसे वादिशूद्रगुणैर्युक्तो ब्राह्मणश्चेत् स शूद्रतामेति शूद्राधिकार प्राप्नोत्येव । एवमेव क्षत्रियाज्जातं वैश्याज्जातं प्रति च योजनीयम् । अर्थाद्यस्य वर्णस्य गुणैर्युक्तो यो वर्णः, स तदधिकारं प्राप्नोत्येव' इति ॥ एवमेव-' धर्मचर्यया जघन्यो वर्ण. पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जाति- परिवृत्ती', ' अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्ती' ( प्रश्न २ पटल ५ खण्ड ११ सूत्र १०।११ ) इत्यापस्तम्बधर्मसूत्रस्थं सूत्रद्वयमुद्धृत्य यद् व्याख्यातम् -' सत्यधर्माचरणेनैव शूद्रो वैश्यं क्षत्रिय च वर्णमापद्यते, समन्तात् प्राप्नोति सर्वाधिकारमित्यर्थः । जातिपरिवृत्तावित्युक्ते जातेर्वर्णस्य परितः सर्वतो या वृत्तिराचरण तत्सर्वं प्राप्नोतीत्येवमेवा- सत्यलक्षणेनाधर्माचरणेन पूर्वो वर्णो ब्राह्मणो जघन्य स्वस्मादध स्थित क्षत्रियं वैश्यं शूद्र च वर्णमापद्यते 1। धर्माचरणमेवोत्तम-, वर्णाधिकारे कारणमस्ति अधर्माचरणमेव कनिष्ठवर्णाधिकारप्राप्तेश्च । यत्र यत्र शूद्रो नाध्यापनीयो न श्रावणीयश्चेत्युक्तं तत्र शूद्रस्य प्रज्ञाविरहत्वाद् विद्यापठनधारणविचारासमर्थत्वात् । तस्याध्यापनं श्रावणं व्यर्थमेवास्ति, निष्फलत्वाच्च' ( पृ० ३५५-३५६) इति, तदपि न संगतम्, पूर्णविद्यासुशीलत्वादिब्राह्मणगुणयुक्तश्चेदित्यर्थस्याक्षरबाह्यत्वात् । तथाविधशूद्रो योऽस्ति स ब्राह्मणस्य सर्वाधिकारं प्राप्नोतीति प्रयोगोऽपि न धर्मशास्त्राभिज्ञस्य सम्भवति । किञ्च यदि त्वद्रीत्या मनुष्यमात्रस्य वेदाध्ययनाधिकारस्तदा वेदोक्तेषु कर्मस्वपि सुतरामधिकारः सिद्धयत्येवेति कुतो वर्णान्तरप्राप्तिरभिप्रेयते । एतेन विज्ञायते यत् सर्वप्रसिद्धार्थमपलप्यापि न तत्र विश्वामः । मन्वादिवचनानामपि न त्वदभिप्रेतोऽर्थः सम्भवति, विपरीतार्थस्यापि सुवचत्वात् । तथाहि ' शूद्राया ब्राह्मणा- ज्जातः श्रेयसा चेत् प्रजायते । अश्रेयान् श्रेयसी जाति गच्छत्यासप्तमाद्युगात् ॥ ' ( म ०१०१६४ ) इत्यत्र कुल्लूकभट्ट. -'शूद्राया ब्राह्मणाज्जातः पारशवाख्यो वर्णः प्रजायते । सामर्थ्यात् स्त्रीरूपः, सा स्त्रो यदि ब्राह्मणेनोढा सती प्रसूयते दुहितरमेव है, तथा जो ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के गुण वाला हो, तो वह क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र हो जाता है । वैसे ही शूद्र भी मूर्ख हो तो वह शूद्र रहता है और जो उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य हो जाता है, वैसे ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में भी जान लेना चाहिये' । इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि यदि शूद्र को वेद आदि पढने का अधिकार न होता, तो वह ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के अधिकार को कैसे प्राप्त कर सकता था? इससे यह निश्चित जाना जाता है कि पचीसवें वर्ष मे वर्णों का अधिकार ठीक ठीक होता है, क्योकि पचीस वर्ष तक बुद्धि बढती है । इसलिये उसी समय गुण- कर्मो को ठीक-ठीक परीक्षा करके वर्णाधिकार निश्चित करना उचित है । आपस्तम्ब सूत्र में भी लिखा है कि धर्माचरण करने से नीचे के वर्ण पूर्व पूर्व वर्ण के अधिकार को प्राप्त हो जाते है । सो केवल कहने ही मात्र को नही, किन्तु जिस जिस वर्ण को जिन जिन कर्मों का अधिकार है, उन्हीं के अनुसार वे यथावत् प्राप्त होते हैं । इसी तरह से अधर्माचरण करके पूर्व पूर्व वर्ण नीचे नीचे के वर्णों के अधिकारो को प्राप्त होते हैं ॥ इससे यह सिद्ध हुआ कि वेदों के पढने -सुनने का अधिकार सब मनुष्यों को बराबर है' ( पृ ० ३५६ ), किन्तु पूरा कथन असंगत बातों से भरा है । मूल मनुस्मृति के वचन में शूद्र के विशेषण के रूप में पूर्णविद्या तथा सुशीलता आदि ब्राह्मण के गुणों वाला, इस अर्थ के प्रतिपादक शब्द नही मिलते | इस तरह के गुणो वाला शूद्र ब्राह्मण के सभी अधिकारो को प्राप्त कर लेता है, इस तरह की बात भी वह आदमी तो नही कहेंगा, जो कि धर्मशास्त्र की पद्धति से परिचित हो । यदि आपके मत के अनुपार मनुष्यमात्र को वेदाध्ययन का अधिकार दे दिया जाय, तो वेदविहित कर्मों में भी अपने आप सबको समान अधिकार मिल जायगा । ऐसी स्थिति मे वर्ण परिवर्तन के बखेडे को खडा करने का क्या तुक है? इसी से आपके मन की यह छिपी बात प्रकट हो जाती है कि प्रसिद्ध अर्थ का अपलाप तो आपने कर दिया है, किन्तु उस पर अभी आप को भी पूरा विश्वास नही है । मनु प्रभृति के वचनों का भी वह अर्थ नहीं है, जो कि आपने किया है । इसके विपरीत बडी सरलता से ज्ञात होने वाला अर्थ टोकाकारों ने किया है । 'शूद्राया ब्राह्मणाज्जातः इस श्लोक की व्याख्या में मनुस्मृति के टीकाकार कुल्लूक भट्ट कहते हैं कि 'शूद्रा स्त्री में ब्राह्मण से पैदा हुआ शिशु पारशव वर्ण का कहलाता है । वह यदि स्त्री हो, इसका ब्राह्मण के साथ विवाह हो और उससे भी स्त्री Gae अपत्य पैदा हो और उसका भी ब्राह्मण के साथ विवाह होकर उससे भी स्त्री अपत्य पैदा हो तो इस परिस्थिति में सातवीं पीढ़ी में
पृष्ठ 757
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात. १६५५ जनयेत्, सापि ब्राह्मणेनोढा दुहितरमेव जनयेत्, साप्येवमिति सप्तमे युगे जन्मनि स पारशवाख्यो वर्णो वीर्यंप्राधान्याद् ब्राह्मण्यं प्राप्नोति । तदनन्तरमेव ' शूद्रो ब्राह्मणतामेति' इति पद्यम् । अस्याप्ययमर्थः -एव पूर्वश्लोकोक्तरीत्या शूद्रो ब्राह्मणता- h मेति ब्राह्मणश्च शूद्रतामेति । ब्राह्मणपदेनात्र शूद्राया ब्राह्मणादुत्पन्नः पारशवो ज्ञेय । स यदि पुमान् केवलशूद्रोद्वाहेन तस्यां पुमासमेव जनयति सोऽपि केवलशूद्रोद्वाहेनान्यं पुमासमेव जनयति सोऽप्येवम्, तदा स ब्राह्मणः सप्तम जन्म प्राप्त. केवलशूद्रतां बीज निष्कर्षात् क्रमेण प्राप्नोति । एव क्षत्रियाद् वैश्याच्च शूद्राया जातस्योत्कर्षापकर्षो जानीयात् । ' जात्युत्कर्षो युगे ज्ञेयः सप्तमे पञ्चमेऽपि वा' इति याज्ञवल्क्यवचनदर्शनाच्च क्षत्रियाज्जातस्य पञ्चमे जन्मन्युत्कर्षापकर्षो बोद्धव्यो । वैश्याज्जातस्य ततोऽप्युत्कर्षाद् याज्ञवल्क्येनापि वाशब्देन पक्षान्तरस्य सगृहीतत्वाद् वृद्धव्याख्यानुरोधाच्च तृतीयजन्म- न्युत्कर्षापकर्षो ज्ञेयौ । अनेनैव न्यायेन ब्राह्मणेन वैश्याया जातस्य पञ्चमे जन्मन्युत्कर्षापकर्षो क्षत्रियाया जातस्य तृतीये क्षत्रियेण वैश्याया जातस्य तृतीय एव बोद्धव्यो । प्रकरणानुरोधात् शास्त्रान्तरसंवादाच्चायमेवार्थो युक्तः । यदुक्तम्—' प्रज्ञाविरहाद् विद्यापठनधारणविचारासमर्थत्वात् तस्याध्यापनं श्रावण व्यर्थमेवास्ति, निष्फल- त्वात्' इति, तदपि मन्दम्, प्रज्ञावता शूद्राणा श्रवणमननादौ समर्थाना विदुरधर्मव्याधप्रभृतीना महाभारतादिषु स्मरणात् । अत एवेतिहासपुराणादिश्रवणे चातुर्वर्ण्यस्याधिकारः, ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ' इति स्मरणात्, ' वेदपूर्वकस्तु नाधिकारः' इति शाङ्करभाष्यवचनाच्च । यत्तु ' धर्मचर्मया जघन्यो वर्ण. पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते ' इत्युक्तम्, तदपि न युक्तम्, 'जातिपरिवृती ' इत्यस्यार्थानव- जाकर वह पारशव वर्ण बदल कर वीर्य की प्रधानता के आधार पर 'ब्राह्मण वर्ण कहलाने लगता है' । इसी के आगे का श्लोक है ' शूद्रो ब्राह्मणतामेति०' । इसका अर्थ इस तरह से किया गया है - 'पूर्व श्लोक में बताई गई पद्धति से शूद्र ब्राह्मण बन जाता है मोर इसी तरह से ब्राह्मण भी शूद्र बन जाता है । यहाँ ब्राह्मण पद से शूद्रा स्त्री मे ब्राह्मण से उत्पन्न पारशव का ग्रहण किया जाता है । वहयदि पुरुष है और वह शूद्रा स्त्री से विवाह कर पुरुष सन्तति को पैदा करता है और यदि पुरुष सन्तति फिर शूद्रा स्त्री से विवाह कर पुरुष सन्तति को पैदा करता है, तो इस क्रम से सातवी पीढ़ी मे वह ब्राह्मण शूद्र वीर्य की प्रधानता के कारण केवल शूद्र रह जाता है । इसी पद्धति से क्षत्रिय और वैश्य पुरुष से शूद्र स्त्री मे उत्पन्न सन्तति का उत्कर्ष या अपकर्ष होता है । याज्ञवल्क्य स्मृति मे सप्तम अथवा पंचम पीढी मे भी जाति के उत्कर्ष और अपकर्ष की बात आई है । इसका अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न सन्तति का उत्कर्ष या अपकर्ष सातवी पीढी में होगा, किन्तु क्षत्रिय से शूद्रा में उत्पन्न सन्तति का उत्कर्ष या अपकर्ष पाँचवी पीढी में ही हो जायगा और वैश्य से शूद्रा में उत्पन्न सन्तति का उत्कर्ष या अपकर्ष तीन पीढी मे ही हो जायगा । याज्ञवल्क्य ने वा शब्द का प्रयोग कर इन पक्षो की सत्ता स्वीकार की है और वृद्ध व्यवहार ( परम्परा ) भी इसके पक्ष में है । इसी पद्धति से ब्राह्मण से वैश्या स्त्री से उत्पन्न सन्तति की जाति का उत्कर्ष या अपकर्ष पांचवी पीढी में और ब्राह्मण से क्षत्रिया में उत्पन्न सन्तति की जाति का उत्कर्ष या अपकर्ष तीसरी पीढी मे ही हो जायगा । इसी तरह से क्षत्रिय से वैश्या में उत्पन्न सन्तति की जाति का उत्कर्ष और अपकर्ष भी तीसरी पीढी में ही हो जायगा । प्रकरण के अनुसार और अन्य शास्त्रों से भी पुष्टि हो जाने से मनुस्मृति के उक्त श्लोक का यही अर्थ हो सकता है । 'शूद्र में प्रज्ञा ( बुद्धि ) का अभाव है, अर्थात् उसकी बुद्धि मन्द होती है, अतः वह विद्या पढने और उसको धारण करने में, उस पर विचार करने में असमर्थ रहता है । उसको पढाना और सुनाना सब व्यर्थ जाता है' ( पृ० ३५६ ) स्वामी दयानन्द का यह कथन भी व्यर्थ है, क्योंकि श्रवण और मनन आदि करने में समर्थ बुद्धिमान् विदुर, धर्मव्याध जैसे शूद्रो की कथा महाभारत में आती है । इसीलिये इतिहास, पुराण आदि के श्रवण में चारों वर्णों का अधिकार माना गया है । 'ब्राह्मण को आगे करके चारो वर्णों को महाभारत आदि का श्रवण कराना चाहिये ' ऐसा सुना जाता है । शांकर भाष्य में यह स्पष्ट बताया गया है कि वेदो के अध्ययन में इन सबका अधिकार नही है । ' धर्माचरण करने से नीचे के वर्ण पूर्व पूर्व वर्ण के अधिकार को प्राप्त कर लेते हैं यह कहना भी ठीक नही है, क्योंकि
पृष्ठ 758
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६५६ वेदार्थपारिजातः बोधात् । तत्र जातिशब्दस्य जन्मैवार्थः । तथा च जन्मपरिवृत्तौ धर्मचर्यया जघन्यो वर्ण उत्तमं वर्णमापद्यते । तथैवो- तमवर्णोऽप्यधर्मचर्यया जातिपरिवृत्तौ जन्मान्तरेऽपकृष्टवर्णमापद्यते । 'जातेर्वर्णस्य परितः सर्वतो या वृत्तिराचरणं तत्सर्वं ', प्राप्नोति इति तु मूलाक्षरबाह्यमेव तत्सर्वं प्राप्नोतीति पदस्य मूलेऽभावात् सप्तम्या असङ्गतेश्च । सिद्धान्तरीत्या तु जाति (जन्म) परिवर्तने सति वर्णो वर्णान्तरमापद्यत इति सङ्गति । त्वद्रीत्या तु धर्मचर्यया वर्णान्तरप्राप्तिस्ततस्तद्वर्णाधिकार- प्राप्तिरिति प्रथमयैव भाव्यम्, न सप्तम्या । तस्माच्छ्रुतायाः सप्तम्या अनुरोधेन धर्मचर्यया जन्मपरिवर्तने सति वर्णान्तर- प्राप्तिरित्येव श्लिष्टम्, श्वशूकरादिषु जन्मपरिवर्तनमन्तरा जातिपरिवर्तनादर्शनात् । पठनपाठनविषयः — पठनपाठनविषयेऽपि यदुक्तम् तत्रादौ पठनस्यारम्भे शिक्षारीत्या स्थानप्रयत्नस्वरज्ञानायाक्षरोच्चारणो- पदेशः कर्तव्यः । येन नैव स्वरवर्णोच्चारणज्ञानविरोधः स्यात् । तद्यथा - 'प' इत्यस्योच्चारणमोष्ठी संयोज्यैव कार्यम् । अस्योष्ठौ स्थानम्, स्पृष्टः प्रयत्न इति वेद्यम् । ' (पृ ०३५७ ) इत्यादि, तदपि विशृङ्खलमेव, उच्चारणोपदेशेनोच्चारणज्ञानस्यैव सम्भवात् । स्थान-प्रयत्न स्वरज्ञानस्योपदेशान्तरसाध्यत्वात् । ' प' इत्यस्योच्चारणमोष्ठौ संयोज्यैव कार्यम्' इत्यप्यसङ्गतम्, ओष्ठसंयोगमन्तरा तदुच्चारणस्यासम्भवेन एवकारव्यावर्त्याभावात् ॥ उन्होने 'जातिपरिवृत्ती' इसका अर्थ ठीक से नही समझा है । यहाँ जाति शब्द का अर्थ जन्म है । उक्त वचन का वास्तविक अर्थ यह है कि धर्माचरण से दूसरे जन्म मे नीच वर्ण का आदमी उच्च वर्ण में पैदा होता है । इसी तरह से अधर्म का आचरण करने वाला उच्च वर्ण का व्यक्ति जन्मान्तर मे नीच वर्ण मे पैदा होता है ॥ 'जाति अर्थात् वर्ण की सब तरह से वृत्ति, अर्थात् किस वर्ण को किस तरह का आचरण करना चाहिये, इस बात का भलीभाँति ज्ञान उसको हो जाता है' इस अर्थ का भी मूल वचन से कोई संबन्ध नही है । ' वह सब कुछ प्राप्त करता है' इस अर्थ के बोधक पद मूल वचन में है ही नही । दूसरी बात यह कि ऐसा अर्थ करने मे सप्तमी विभक्ति का प्रयोग असंगत हो जायगा । हमारे मत से तो जन्म का परिवर्तन होने पर एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण में पैदा होता है, इस तरह से सप्तमी विभक्ति की स्पष्ट संगति बैठती है । आपके मत के अनुसार तो धर्माचरण से वर्णान्तर की प्राप्ति और तब वर्णाधिकार की प्राप्ति होती है, इस तरह से यहाँ प्रथमा विभक्ति होनी चाहिये, सप्तमी नही । अतः जब हम देखते है कि आपस्तम्ब के वचन में स्पष्ट रूप से सप्तमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है, तो उसके अनुरोध से धर्म का आचरण करने से जन्म का परिवर्तन होने पर वर्णान्तर की प्राप्ति होती हैं, यही अर्थ संगत लगता है । श्वान ( कुत्ता ), शूकर प्रभृति में दूसरा जन्म हुए बिना जाति का परिवर्तन नही देखा जाता । कहने का अभिप्राय यह है कि जैसे इनमें दूसरे जन्म के बिना जाति परिवर्तन नही होता, उसी तरह से मनुष्यों का भी वर्ण परिवर्तन दूसरा जन्म हुए बिना नही हो सकता । पठन-पाठन विषयक विचार इस प्रकरण का आरम्भ करते हुए स्वामी दयानन्द ने लिखा है-' पठन- पाठन के आदि में लडको और लडकियों को ऐसी शिक्षा करनी चाहिये कि वे स्थान, प्रयत्न के योग से वर्णो का ऐसा उच्चारण कर सकें कि जिससे सबको प्रिय लगे । जैसे 'प' इसके उच्चारण में दो प्रकार का ज्ञान होना चाहिये, एक स्थान और दूसरा प्रयत्न का । पकार का उच्चारण ओठो से होता है, परन्तु दो ओठों को ठीक ठीक मिलाकर ही पकार बोला जाता है । इसका ओष्ठ स्थान और स्पृष्ट प्रयत्न है । किसी अक्षर के स्थान में कोई स्वर या व्यंजन मिला है, तो उसको भी उसी उसी स्थान में प्रयत्न से उच्चारण करना उचित है । इसका सब विधान व्याकरण और शिक्षा ग्रन्थो में लिखा है' (पृ० ३५८) । किन्तु यह पूरा कथन गलत है, क्योकि उच्चारण का उपदेश करने से उच्चारण का ज्ञान ही हो सकता है, वह किस तरह उच्चरित होगा, किस स्थान, प्रयत्न स्वर में इसका उच्चारण किया जायगा, यह तो बार बार बोलकर और बुलवा कर उच्चारण का परिष्कार करने पर ही आवेगा । 'प' का उच्चारण ओठों को ठीक ठीक मिलाकर हो होता है, यह कथन भी असंगत है, क्योकि बिना ओठों के मिलाए पकार का जब उच्चारण ही नहीं होता, तब एवकार के प्रयोग से आप किसकी व्यावृत्ति (निषेध ) करेंगे? अर्थात् किसी व्यावर्त्य के अभाव में 'एव' का प्रयोग यहाँ व्यर्थ ही किया गया है । 1 +
पृष्ठ 759
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १६५७ 'दुष्टः शब्द. स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्जो यजमान हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ ' ( महाभाष्य १1१1१ ) अत्र यदुक्तम् - ' नैव स्थानप्रयत्नयोगेन विनोच्चारणे कृतेऽक्षराणा यथावत् प्रकाशः पदानां लालित्यं च भवति । यथा मानकर्ता षड्जादिस्वरालापनेऽन्यथोच्चारणं कुर्याच्चेत् स तस्यैवापराधो भवेत्, तद्वद् वेदेष्वपि प्रयत्नेन सह स्वस्वस्थाने खलु स्वरवर्णोच्चारणं कर्तव्यम् । अन्यथा दुष्ट शब्दो दुखदोऽनर्थकश्च भवति । यथावदु- च्चारणमुल्लङ्घ्योच्चारिते शब्दे वक्कुरपराध एव विज्ञायते -त्वं मिथ्या प्रयोगं कृतवानिति । नैव म मिथ्याप्रयुक्त • शब्दस्त- मभिप्रेतमर्थमाह' ( १०३५७ ) इति, तदपि यत्किच्चित् गानकर्तेत्यस्य स्थाने गायक इत्यस्यैव युक्तत्वात् । अन्यथोच्चरितः कथं दुःखद इत्यस्य वक्तव्यत्वात् । दृष्टान्ते दान्ते चापराधभेदो वक्तव्य., अत्यन्ताभेदे दृष्टान्तानुपपत्ते । यदप्युक्तम् —'सकलं शकलम्, सकृत् शकृदिति । सकलशब्दः सम्पूर्णार्थवाची, शकल इति खण्डवाची, सकृदि- त्येकवारार्थवाची, शकृदिति मलार्थवाची च । अत्र सकारोच्चारणे कर्तव्ये शकारोच्चारणं क्रियते चेत् एव शकारोच्चारणे कर्तव्ये सकारोच्चारणं च तदा स शब्द ' स्वविषयं नाभिधत्ते । स वाग्वज्ञो भवति । यमर्थं मत्वोच्चारणं क्रियते सशब्दस्तदभि-प्रायनाशको भवति । तद्वक्तार यजमानं तदधिष्ठातारं च हिनस्ति, तेनार्थेन होन करोति । यथेन्द्रशत्रुरयं शब्दः स्वरस्थाप- राधाद् विपरीतफलो जातः । तद्यथा - इन्द्र सूर्यलोकस्तस्य शत्रुरिव मेघः | अत्रेन्द्रशत्रुशब्दे तत्पुरुषसमासार्थमन्तोदात्ते कर्तव्ये आद्युदात्तकरणाद् बहुव्रीहि समासः कृतो भवेत् । अस्मिन् विषये तुल्ययोगितालङ्कारेण मेघसूर्ययोर्वर्णन कृतमिति । ततोऽर्थवैपरीत्यं जायते । उत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषोऽन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहि समासो भवति । तत्र यस्येच्छा सूर्यस्य ग्रहणेऽस्ति तेनेन्द्रशत्रुशब्दस्तत्पुरुषसमासेनान्तोदात्त उच्चारणीयः यस्य च मेघस्य तेन बहुव्रीहिसमासमाश्रित्याद्युदात्त- 'दुष्ट' शब्द ' इस श्लोक को उद्धत कर उसका अर्थ करते हुए स्वामी दयानन्द कहते है -'फिर इस विषय में महाभाष्य-कार पतंजलि ने भी कहा है कि स्वर और वर्णो के उच्चारण में वियर्पय होने पर शब्द दुष्ट कहलाता है, अर्थात् वह मूल अर्थ को नही जनाता । तथा जैसे स्थान और प्रयत्न के योग के बिना शब्द का उच्चारण प्रसन्नता करानेवाला नही होता, वैसे ही स्वर से विपरीत उच्चारण और गानविद्या भी सुन्दर नही होती । गान करनेवाला षड्ज आदि स्वरो का उच्चारण उलटा करता है, तो यह अपराध उसी का समझा जाता है । इसी प्रकार वेद आदि ग्रन्थों में भी स्वर और वर्णों का उच्चारण यत्न से होना चाहिये । जो उलटा उच्चारण किया जाता है, वह दु:ख देने वाला झूठ ( अपशब्द ) समझा जाता है । जिस शब्द का यथावत् उच्चारण न हो, किन्तु उससे विपरीत किया जाय, तो वह दोष बोलनेवाले का गिना जायगा । विद्वान् लोग बोलनेवाले से कहते हैं कि तूने इस शब्द का शुद्ध उच्चारण नही किया, इससे यह तेरे अभिप्राय को यथार्थ नही कह सकता' ( पृ० ३५८ ) । किन्तु यह सारी व्याख्या अस्तव्यस्त है | गानकर्ता के स्थान पर गायक शब्द का प्रयोग होना चाहिये था । उलटा उच्चारण करने से शब्द दुःख देनेवाला कैसे हो जाता है, इसको समझाना चाहिये था । दृष्टान्त और दाष्टन्तिक मे अलग अलग अपराधों का स्पष्ट वर्णन होना चाहिये, यदि इनमें अत्यन्त अभेद हो, जैसा कि इस व्याख्या से प्रतीत होता है, तो दृष्टान्त बन ही नहीं सकता । आगे स्वामी दयानन्द लिखते है -'जैसे 'सकल' और 'शकल' में देख लो | अर्थात् ' सकल ' शब्द संपूर्ण का बोधक है । यदि उसमें तालव्य का उच्चारण किया जाय, तो वही फिर खण्ड (टुकडा) का वाचक हो जाता है । ऐसे ही 'सकृत्' और ' शकृत्' में दन्त्य सकार के उच्चारण से 'एक बार क्रिया' और उसी का तालव्य उच्चारण करने से 'विष्ठा' का बोध होता है । इसलिये शब्दों का उच्चारण यथावत् करने से ही ठीक ठीक अर्थ का बोध होता है, क्योकि विपरीत उच्चारण से वह वज्र के समान वक्ता के अभिप्राय का नाश करने वाला होता है । सो यह दोष बोलनेवाले का हो गिना जाता है । जैसे-' इन्द्रशत्रुः' यहां इकार में उदात्त स्वर बोलने से बहुव्रीहि समास और अन्य पदार्थ का बोध होता है, तथा अन्तोदात्त बोलने से तत्पुरुष समास और उत्तर पदार्थ का बोध होता है । सूर्य का इन्द्र और मेघ का वृत्रासुर नाम है । इसके सम्बन्ध में वृत्रासुर का वर्णन तुल्पयोगिता अलंकार से किया है कि जो इन्द्र अर्थात् सूर्य की उत्तमता चाहे, वह समस्त पद के स्थान में अन्तोदात्त उच्चारण करे और जो मेघ की वृद्धि चाहे वह आद्युदात्त उच्चारण करे । इसलिये स्वर का उच्चारण भी यथावत् करना चाहिये' ( पृ० ३५८ - ३५ ९ ) । यह सारा कथन भी यहां तक असंगत है कि संस्कृत और २०८
पृष्ठ 760
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६५८ वेदार्थपारिजात स्वरश्चेति नियमोऽस्ति । अत्रान्यथात्वे कृते मनुष्यस्य दोष एव गण्यते । अतः कारणात् स्वरोच्चारण वर्णोच्चारणं च यथा- वदेव कर्तव्यमिति, ( पृ०३५७) । हिन्दीव्याख्याने तु य इन्द्रस्योत्तमतामिच्छेत् सोऽन्तोदात्तमुच्चरेत्, यो मेघस्य वृद्धिमिच्छेत् स आद्युदात्तमुच्चरेत् ' इत्यादिक सर्वं निर्मूलमेव । नहि भाष्याक्षरेण हिन्दी व्याख्यानं सङ्गतम् । न वा तत्र किमपि मूलम् । सूर्यस्योत्तमता स्वभावतोऽस्त्येवेति नान्तोदात्तस्वरकृतं वैशिष्टयं तत्र सम्भवति । न वाद्युदात्तोच्चारणेन मेघवृद्धिः प्रमाण- सिद्धा । न चादृष्टमपूर्वं वा किमपि त्वयाऽभ्युपेयते I। अन्यथात्वे कृते न तमर्थमाहेत्यनेनेव गतार्थत्वे यथेन्द्रशत्रुरित्यादे- वैयर्थ्यापातात् । मनुष्यस्य नदतिरिक्त. को वा दोषो भवेदिति स्पष्टं वक्तव्यम् ॥ वस्तुतस्तु चार्वाकवददृष्टम पूर्वमनभ्युप- गच्छतोऽस्य वृष्टिजलवायुशुद्धयर्थं यज्ञहोमाद्यनुष्ठानमुपदिशतो जन्मशतैरप्यस्य मन्त्रस्यार्थाधिगमे सामर्थ्यं न भविष्यति । शिक्ष्यमाणवर्णादिवैकल्पे वाद्युदाहृतः, ' मन्त्रो हीनः स्वरत.' इत्यादि ( पा० शि ० ५२), ' तत्त्वष्टा आहवनीयमुपप्रावर्तयत स्वाहेन्द्र- शत्रुर्वर्धस्व ( तै० सं० २| ४| १२| १ ) इत्यस्मिन् मन्त्रे इन्द्रस्य शत्रुर्घातक इत्यस्मिन् विवक्षितेऽर्थे तत्पुरुषसमासे ' समासस्य' ( पा० सू० ६।१।२२३ ) इति तत्पुरुषत्वादन्तोदात्तेन भाव्यम् । आद्युदात्तस्तु प्रयुक्त । तथा सति पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वेन बहु- व्रीहिस्वाद् इन्द्र. शत्रुर्धातको यस्य स इत्यर्थः सम्पन्नः । तादृशस्वरापराधेन इन्द्रघातकस्य वृत्रस्य वृद्धिकामनया जपहोमादौ मन्त्र प्रयुक्तवतस्त्वष्टुर्यजमानस्याभीष्टविघातस्तद्वैपरीत्येन स्वरदोषादिन्द्र एव तद्धातको जातः । एव च स्वरवर्णादिदोष- राहित्येन मन्त्रोच्चारणेनानुकूलं मनोरथसाधकमदृष्टं जायते, अन्यथा प्रतिकूलं भवतीति मन्तव्यम् । त्वया तु केवलमभ्यासार्थ- मेव यज्ञेषु मन्त्रोच्चारणमङ्गीक्रियते । तथा च त्वद्रीत्याऽभिप्रायबोधबाधमन्तरा स्वराद्यपराधान्नान्यो दोषः कल्पयितुं शक्य. । सिद्धान्ते तु गम्भीरस्य वेदस्यार्थमवगमयितुं शिक्षादीनि षडङ्गानि प्रवृत्तानि । तत्र वर्णस्वराद्युच्चारणप्रकारो | ',,,, " यत्रोपदिश्यते सा शिक्षा शीक्षा व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः मात्रा बलम् साम सन्तान इत्युक्तः शीक्षाध्याय हिन्दी व्याख्या में भी कोई समानता नही है और न इस तरह को व्याख्या में कोई प्रमाण ही दिया है । सूर्य की उत्तमता तो उसके स्वभाव से ही है, अतः अन्तोदात्त स्वर का उच्चारण करने से उसमें कुछ विशिष्टता नही आती और न आद्युदात्त का उच्चारण करने से मेघ की वृद्धि होती है, यह बात अन्य किसी प्रमाण से सिद्ध हो पाती है । अदृष्ट अथवा अपूर्व तो आप मानते नही । अन्यथा उच्चा-रण करने पर वही सही अर्थ को नहीं बना पाता, इतना ही कहना पर्याप्त था । इसके बाद 'इन्द्रशत्रु ' शब्द का उदाहरण देने की क्या आवश्यकता थी? इसके अतिरिक्त वह मनुष्य का दोष किस तरह का होगा,, इस बात को समझाना चाहिये था । वास्तव में तो स्वामी दयानन्द चार्वाक की तरह किसी अदृष्ट अथवा अपूर्व की सत्ता नही स्वीकार करते, यज्ञ-याग आदि का वे वृष्टि, जल और वायु की शुद्धि की तरह का दृष्ट प्रयोजन ही मानते है । इस तरह के मन्त्रों का अर्थ समझने की शक्ति इनमे सौ जन्मो में भी नही आ सकती । हमारे मत से तो सिखाये गये वर्ण, स्वर आदि का विपरीत उच्चारण करने पर पाणिनि शिक्षा के अनुसार उसमे दोष बताया गया है । इसका स्पष्टीकरण ' तत् त्वष्टा० ' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति की सहायता से होता है । इस मन्त्र का उच्चारण स्वष्टा ने ' इन्द्र को मारने वाला' इस अभिप्राय से किया था । इस अर्थ की विवक्षा में तत्पुरुष समास होता है और उसका उच्चारण अन्तोदात्त स्वर से करना चाहिये । ऐसा न कर त्वष्टा ने इस मन्त्र का उच्चारण आद्युदात्त स्वर में किया, जो कि बहुव्रीहि समास होने पर होता है, तब उसका अर्थ हो जाता है -- इन्द्र जिसको मारनेवाला है । इस अपराध से अर्थात् स्वर का विपरीत उच्चारण करने से इन्द्र के नाशक ( शत्रु ) वृत्र की वृद्धि के लिये किया गया अनुष्ठान यजमान के अभिप्राय के विपरीत इन्द्र ही वृत्र का घातक हो गया । इस तरह से प्रस्तुत श्लोक का अभिप्राय यह है कि स्वर और वर्ण आदि के दोष से रहित मन्त्र का उच्चारण करने से मनोरथ की सिद्धि के अनुरूप अदृष्ट उत्पन्न होता है और ऐसा न होने पर विपरीत फल होता है । आप तो केवल अभ्यास के लिये ही यज्ञ के अवसर पर मन्त्रो का उच्चारण करते हैं, तब आपके मत के अनुसार स्वर आदि का विपर्यय हो जाने पर अभिप्राय का ठीक से ज्ञान न हो, इसके सिवाय दूसरा कोई दोष नहीं कल्पित किया जा सकता । हमारे मत के अनुसार तो वेद के गंभीर अर्थ को जानने के लिये शिक्षा प्रभृति छः अंगो की रचना की गई है । इनमें से शिक्षां नामक अंग में मन्त्र के वर्णों, स्वरों आदि के उच्चारण का उपदेश किया जाता है । तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षा की व्याख्या