वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 761–770
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 761–770
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वेदार्थपारिजात १६५९ (तै ० उ० १1१ ) इति श्रुतेः । वर्णोऽकारादिः, स चाङ्गभूतशिक्षाग्रन्थे स्पष्टमुक्तः । ' त्रिषष्टिश्चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः । प्राकृते संस्कृते वापि स्वयं प्रोक्ताः स्वयम्भुवा ॥ ' ( पा० शि० ३ ) । अत्र स्वयम्भुवा ब्रह्मणा वर्णा उक्ताः । चेतना देवता- मनभ्युपगच्छता कथमेतदर्थोऽवगन्तुं शक्य. । स्वर उदात्तादि, सोऽपि तत्रैवोक्त । 'उदात्तश्चानुदत्तश्च स्वरितरच स्वरास्त्रयः (पा० शि० ११ ) | मात्रा ह्रस्वादि । सापि तत्रोक्ता 'ह्रस्वो दीर्घः प्लुत इति कालतो नियमा अपि । ( ० शि०११ ) बल स्थान प्रयत्नौ । 'तत्राष्टो स्थानानि वर्णानाम् ( पा ०शि० १३ ) इत्यादिनोक्तम् । ' अचोऽस्पृष्टा यणस्त्वीवत्' (पा० शि० ३८) इत्य. दिना प्रयत्न उक्तः । सामशब्देन साम्यमुक्तम् । अतिद्रुतातिविलम्बितगीत्यादिदोषराहित्येन माधुर्यादिगुणयुक्तत्वेनोच्चारणं साम्यम् । 'गीती शीघ्री गिर कम्पी' (पा० शि० ३२) इत्यादिना । 'उपाशुदष्ट त्वरितम्' | ( पा ०शि० ३५ ) इत्यादिना दोषा उक्ता । ' माधुर्यमक्षरव्यक्तिः ' ( पा ० शि० ) इत्यादिना गुणा उक्ता । सन्तानः संहिता, 'वायवा याहि' (ऋ० स०१।२।१ ) इत्यत्रावादेशः । इन्द्राग्नी आगतम्' ( ऋ ० सं० ३।१२।१ ) इत्यत्र प्रकृतिभावः । एतच्च व्याकरणेऽभिहितत्वात् शिक्षायामुपेक्षितम् । शिक्ष्य- माणवर्णादिवैकल्ये बाध उदाहृत एव । तस्मात् स्वरवर्णाद्यपराधपरिहाराय शिक्षाग्रन्थोऽपेक्षितः । नैनादेव, किन्तु कल्पो- ( आश्वलायन-कात्यायनापस्तम्ब बोधायनादिसूत्रादिरूपो ) प्यपेक्षित, कल्प्यते समर्थ्यंते यागप्रयोगोऽत्रेति व्युत्पत्तेः । यद्यपि - 'दर्शपूर्णमासी तु पूर्वं व्याख्यास्यामः' ( आश्व ० श्री ० सू० १1१ ) इत्युपक्रान्तत्वात् ' अग्निमीळे, (ऋ० सं० १ | १ | १ ) इत्यादिमन्त्राणां दर्शपूर्णमासयोरविनियुक्तत्वान्न मन्त्रक्रमानुरोधेनाश्वलायनप्रवृत्ति, न वा ब्राह्मणक्रमेण तत्त्र- वृत्ति:, 'आग्नावेष्णवं पुरोडाशं निर्वपन्ति दीक्षणीयमेकादशकपालम् ( ऐ० व्रा० १११ ) इति ब्राह्मणे दीक्षणोयेष्टे प्रकान्तत्वात्, तथापि विशेषविनियोगान्मन्त्राणा श्रुतिलिङ्गवाक्यादिप्रमाणान्युपजीव्य तत्प्रवृत्तिरिति वेदितव्यम् ॥ मन्त्रकाण्डस्तु ब्रह्मयज्ञादिजपक्रमेण प्रवृत्तो न यागानुष्ठानक्रमेण । ब्रह्मयज्ञश्चैवं विहित -' यत्स्वाध्यायमधीयीतैकामप्यच यजु साम करते समय यही बताया गया है । अकार आदि वर्ण कहे जाते है । इनका पाणिनि शिक्षा मे स्पष्ट वर्णन है कि शिव के मत के अनुसार वर्णों की संख्या ६३ या ६४ है । प्राकृत अथवा संस्कृत भाषा के लिये भी स्वयं ब्रह्मा ने इनका उपदेश किया है । यहाँ स्वयंभू ब्रह्मा ने वर्णों का उपदेश किया है । चेतन देवता को न मानने वाला इनका अर्थ कैसे समझ सकता है । उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन प्रकार के स्वर भी पाणिनि शिक्षा में बताये गये है । हस्व, दीर्घ और प्लुत ये तीन मात्राएँ भी काल के नियम के अनुसार वही बताई गई हैं । बल शब्द से स्थान और प्रयत्न गृहीत होते हैं । पाणिनि शिक्षा में वर्णों के आठ स्थान और स्पृष्ट आदि प्रयत्न बताये गये हैं । साम शब्द से साम्य का बोध होता है । अतिदुत, अतिविलम्बित आदि गान के दोष होते हैं, इन दोषो से मुक्त और माधुर्य प्रभृति गुणों से युक्त उच्चारण का नाम साम्य है । पाणिनि शिक्षा में ही 'गीती शीघ्री' तथा 'उपाशु दष्टं० ' इत्यादि श्लोको से दोषो का और ' माधुर्य-मक्षर० ' इत्यादि से गुणों का वर्णन किया गया है । संहिता को सन्तान कहते है । 'वायवा याहि' यहाँ अवादेश और 'इन्द्राग्नी आगतम्' यहाँ प्रकृतिभाव संहिता अर्थात् सन्धि ( सन्तान) के उदाहरण है । इनका विवेचन व्याकरण नामक अंग मे होने से शिक्षा-ग्रन्थो में इसको छोड दिया गया है । सिखाये गये वर्ण, स्वर आदि के उच्चारण में गलती होने पर दोष ऊपर बता दिया गया है । इसलिये स्वर, वर्ण आदि के उच्चारण के अपराध ( दोष ) से बचने के लिये शिक्षा नामक ग्रन्थ का अध्ययन आवश्यक है । इतना ही नही, इसके लिये आश्व-लायन, कात्यायन, आपस्तम्ब, बोधायन प्रभृति के कल्प ग्रन्थों से भी सहायता लेनी पडती है । इनके ग्रन्थों को ( कल्पसूत्रों को ) कल्प इस-लिये कहा जाता है, कि इनमें विविध याग प्रयोगो का स्वरूप विस्तार से समझाया जाता है । यद्यपि आश्वलायन श्रौतसूत्र के प्रारम्भ में दर्शपूर्णमास की व्याख्या की गई है और 'अग्निमीले' इत्यादि ऋग्वेद के प्रारम्भिक मन्त्र का दर्शपूर्णमास मे कोई सम्बन्ध नही है, अतः यह मानना पडता है कि मन्त्र के क्रम के अनुसार आश्वलायन श्रौतसूत्र की प्रवृत्ति नहीं हुई और न उसकी प्रवृत्ति ऐतरेय ब्राह्मण के क्रम से ही हुई है, क्योंकि ऐतरेय ब्राह्मण में प्रारंभ में दीक्षणीय इष्टि का विधान है, दर्शपूर्णमास का नही, तो भी विशेष विनियोग के आधार पर मन्त्रो के श्रुति, लिंग, वाक्य आदि षड्विध प्रमाण के सहारे विभिन्न अर्थ कर उनकी सहायता से दर्शपूर्णमासपरक मन्त्रों की व्याख्या के रूप में श्रौतसूत्रों की प्रवृत्ति मानी जाती है । ऋग्वेदीय मन्त्रकाण्ड की प्रवृत्ति ब्रह्मयज्ञ के रूप में मानी जाती है, इसमें यागादि के अनुष्ठान का क्रम अभिप्रेत नहीं है । तैत्तिरीय भारभ्यक में
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१६६० वेदार्थपारिजात. वा तद् ब्रह्मयज्ञः' ( तै० आ ० २( १० ) । सोऽय ब्रह्मयज्ञो जपः ' अग्निमीळे' इत्याम्नायक्रमेणैवानुष्ठेयः । तथा सर्वा ऋचः सर्वाणि यजूंषि सर्वानि सामानि वाचः स्तोमे पारिप्लवं शंसन्ति' इति विधीयते । तथा 'आश्विने शस्यमाने सूर्यो नोदियादपि सर्वा दाशतयोरनुब्रूयात्' इति विधीयते । तथा 'रिच्यत इव वा एष प्रेव रिच्यते यो याजयति प्रतिगृह्य अनश्नन् त्रिः स्वाध्यायं वेदमधीयीत' (तै ० आ ० २।१६ ) इति प्रायश्चित्तरूप वेदपारायण विहितम् । 'इत्यादिषु कृत्स्नमन्त्रकाण्डविनियोगेषु सम्प्रदाय- पारम्पर्यागत एव क्रम आदरणीय.' इत्याश्वलायने मन्त्रकाण्डक्रमाभावेऽपि न विरोधः । इषे त्वेत्यादियजुर्मंन्त्रास्तु क्रत्वनुष्ठानक्रमेणैवाम्नाता इत्यापस्तम्बादयस्तेनैव क्रमेण प्रवृत्ताः । तत्र जपादिष्वपि स एव क्रमः । यद्यपि बाह्मणे दोक्षणीयेष्टिरुपक्रान्ता, तथापि तस्या दर्शपूर्णमासविकृतित्वेन तदपेक्षत्वादादौ दर्शपूर्णमास- व्याख्यानं युक्तमेव । अतो मन्त्रविनियोगेन कल्पः क्रत्वनुष्ठानमुपकरोति । ननु 'प्र वो वाजा' ( ऋ ० सं० ३।२७/ १ ) इत्यादीनां ' ' ( ) सामिधेनीनामृचामेव विनियोग ब्रवीतु नमः प्रवक्ते आश्व ० श्री० सू० ११२ इत्यादयस्त्वनाम्नाताः कथं विनियुज्यन्ते तेनेति चेन्न शाखान्तरसमाम्नातानां नानाब्राह्मणान्तरसिद्धस्य विनियोगानामपि गुणोपसंहारन्यायेन वक्तव्यत्वेनादोषात् ' सर्वशाखाप्रत्ययमेक कर्म' इति जैमिनिसूत्रात् । व्याकरणमपि प्रकृतिप्रत्ययाद्युपदेशेन पदस्वरूपतदर्थनिश्चायकत्वेनोपयुज्यते । तथा चन्द्रवायवग्रहब्राह्मणे 'वाग्वं पराच्यव्याकृतावदत्ते देवा इन्द्रमब्रुवन्निमां नो वाचं व्याकुर्विति । सोऽब्रवीत् । वरं वृणै मह्यं चैवैष वायवे च सह गृह्याता इति तस्मादैन्द्रवायवः सह गृह्यते । तामिन्द्रो मध्यतोऽवक्रम्य व्याकरोत् । तस्मादियं व्याकृता वागुद्यते' ब्रह्मयज्ञ की व्याख्या यह की गई है कि ऋक्, यजु अथवा सामवेद की एक भी ऋचा का पाठ (स्वाध्याय ) किया जाय, तो वह ब्रह्मयज्ञ कहलाता है । यह ब्रह्मयज्ञ रूपी जप संहिता के क्रम के अनुसार ही किया जाता है । पारिप्लव स्तोम में सभी ॠग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के मन्त्रों का पारायण किया जाता है । आश्विन शस्त्र में सूर्योदय से पहले पूरे दस मण्डल के ऋग्वेद के पारायण का विधान है । तैत्तिरीय आरण्यक में प्रायश्चित्त के रूप में भी वेद के स्वाध्याय का विधान है । इन सभी प्रसंगो में पूरी मन्त्र -संहिता का पारायण सम्प्र- दाय परम्परा से प्राप्त क्रम से ही किया जा सकता है । इस तरह से विनियोग के भेद के आधार पर मन्त्र -संहिता के क्रम में और आश्व- लायन श्रौतसूत्र के क्रम में भिन्नता रहने पर भी कोई विरोध नही उपस्थित होता । ' इषे त्वा' इत्यादि यजुर्वेद के मन्त्र तो दर्शपूर्णमास याग के क्रम से ही पढ़े गये हैं, अतः आपस्तम्ब प्रभृति श्रौतसूत्रों का बारम्भ उसी क्रम के अनुसार हुआ है । यहाँ ब्रह्मयज्ञ के पाठ का क्रम भी वही है । यद्यपि ब्राह्मण में प्रारम्भ में दीक्षणीय इष्टि का निरूपण किया गया है, किन्तु यह दर्शपूर्णमास याग की विकृति है । इसके लिये पहले दर्शपूर्णमास का निरूपण आवश्यक होने से पहले उसकी व्याख्या की गई है । इस तरह से दोनों ही प्रकारो में मन्त्रो का विनियोग बताने के कारण यज्ञीय अनुष्ठान में कल्पसूत्र सहायक होते हैं । यहाँ शंका उठती है कि आश्वलायन श्रौतसूत्र ऋग्वेदीय मन्त्रो का विनियोग बतावे, यहाँ तक तो बात उचित मालूम होती है, किन्तु ऋग्वेदसंहिता में अनिबद्ध 'नम. प्रवक्त्रे' प्रभृति मन्त्रों का विनियोग किस आधार पर बतावेगा? किन्तु इसका समाधान यह है है कि मोमासा के सिद्धान्त के अनुसार भिन्न भिन्न शाखाओ में वर्णित दर्शपूर्णमास प्रभृति याग भिन्न भिन्न न होकर एक ही माने जाते | इसका स्वरूप इन नाना शाखाओ और नाना ब्राह्मणो में वर्णित विधि को समन्वित कर निर्धारित किया जाता है और इसका निर्णय गुणोपसंहार न्याय से किया जाता है, अर्थात् किसी शाखा में कोई एक कर्म प्रधान और अन्य गौण होते है, इतना ही उनमें अन्तर रहता है, अतः यह उचित ही है कि अपनी शाखा के प्रधान कर्म के वर्णन के साथ-साथ अन्य शाखा के गौण कर्मों का वर्णन करते समय उन उन मन्त्र - संहिताओं के मन्त्रों का भी प्रसंगवश विनियोग बताया जाय । प्रकृति और प्रत्यय ज्ञान कराने में और पद के स्वरूप एवं उसके अर्थ का निश्चय कराने के कारण व्याकरण की भी वेद के साथ उपयोगिता जुड़ी है । जैसे कि इन्द्र और वायु देवता सम्बन्धी एक ही पात्र का ग्रहण क्यों किया जाता है, इस बात को 'वा ११ पराणीव' इस तैत्तिरीय श्रुति में समझाते समय कहा गया है कि 'अग्निमीले' प्रभृति यह मन्त्रमय वाणी पहले समुद्र की ध्वनि के समान
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वेदार्थपारिजात १६६१ (तै० सं० ६|४/७/३) इति । अयमभिप्रायः 'अग्निमीले ' इत्यादिवाक् पूर्वस्मिन् काले पराची समुद्रादिध्वनिवदेकात्मिका सभी अव्याकृता प्रकृतिः प्रत्ययः पद वाक्यमित्यादिविभागकारिग्रन्थरहिता आसीत् । तदानी देवे प्रार्थित इन्द्र एकस्मिन्नेव पात्रे वायोः स्वस्य च सोमरसग्रहणरूपेण वरेण तुष्टस्तामखण्डा वाचं मध्ये विच्छिद्य प्रकृतिप्रत्ययादिविभाग सर्वत्राकरोत् । तस्मादियं वाग् इदानीमपि पाणिन्यादिमहर्षिभिव्यकृता सर्वः पठ्यते । तस्यैतस्य व्याकरणस्य प्रयोजनविशेषो वररुचिना वार्तिके प्रदर्शितः--'रक्षोहागमलंघ्वसदेहाः प्रयोजनम्' । स्पष्टीकृत चैतन्महाभाष्यकृता - रक्षार्थं वेदानामध्येय व्याकरणम् । लोपागमवर्णविकारज्ञो सम्यग् वेदान् परिपालयिष्यति, वेदार्थं चाध्यवस्यति । ऊहः खल्वपि-न सर्वेलिङ्गेर्न सर्वाभिविभक्तिभिर्वेदे मन्त्रा आम्नाताः । ते चावश्यं यज्ञगतेन विपरिण- मयितव्याः । तान्नावैयाकरण शक्नोति विपरिणमयितुम् । आगम. खल्वपि- ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्म. षडङ्गो वेदोऽध्येयो - ज्ञेयश्च । प्रधानं षट्स्वङ्गेषु व्याकरणम् । लघ्वर्थं चाध्येयं व्याकरणम्– बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम । बृहस्पतिश्च वक्ता इन्द्रश्चाध्येता | दिव्य वर्षसहस्रमध्ययनकाल: । अन्तं च न जगाम । ( सामाजिकास्तु मनुष्य भिन्नानामिन्द्रबृहस्पत्यादीना सत्ता नाङ्गीकुर्वन्ति । तद्रोत्या कथमिन्द्रबृहस्पत्योदिव्य वर्ष- सहस्रमध्ययनमध्यापन चेति त एव विजानन्तु ) । अद्य तु पुनर्यदि परमायुर्भवति स वर्षशतं जीवति । तत्र कुत. प्रतिशब्द- पाठेन सकलपदावगमः । कुतस्तरा प्रयोगेण । असन्देहार्थं चाध्येयं व्याकरणम् –'स्थूल पृषतीमनड्वाहीमालभेत ' तत्र न ज्ञायते स्थूलानि पृषन्ति यस्यां सा स्थूलपृषती, किं वा स्थूला चासो पृषतीति स्थूलपृषती । ता नावैयाकरणः स्वरतोऽध्यवस्यति । मिली हुई भी, एकाकार भी, प्रकृति और प्रत्यय का विभाग पहले नही था । इस अवस्था में देवताओ की प्रार्थना सुन कर इन्द्र ने एक ही पात्र में अपने लिये और वायु देवता के लिये सोमरस का ग्रहण करते समय उस अखण्ड वाणी को बीच में विच्छिन्न कर उसको प्रकृति और प्रत्यय के रूप में विभक्त कर दिया । इसीलिये आज भी इस वाणी को पाणिनि आदि के द्वारा बताये गये प्रकृति- प्रत्यय के विभाग से समझा जाता है । इस व्याकरण के अध्ययन के विशेष प्रयोजनो का वर्णन वररुचि ने अपने ' रक्षोह० ' इस वार्तिक में किया है । महाभाष्यकार पतंजलि ने इसका स्पष्टीकरण इस तरह से किया है कि वेदो की रक्षा के लिये व्याकरण पढना चाहिये । लोप, आगम, वर्ण-विकार आदि का जिसको ज्ञान है, वह ठीक तरह से वेद की रक्षा कर सकेगा और वेद का अर्थ भी जान सकेगा । ऊह भी व्याकरण के अध्ययन का एक प्रयोजन है । मभी लिंग और विभक्तियों में वेद मन्त्र नहीं पढे गये हैं । यज्ञ के अवसर पर इनमें लिग और विभक्ति का परि- वर्तन आवश्यक हो जाता है | व्याकरण से अनभिज्ञ व्यक्ति आवश्यकता के अनुसार मन्त्रों में लिङ्ग और विभक्ति के परिवर्तन के रूप में कह कहने में समर्थ नही हो सकता । अतः यह ऊह भी व्याकरण के अध्ययन का एक प्रयोजन है । आगम ( शास्त्र ) का कहना कि ब्राह्मण को कोई प्रयोजन न रहने पर भी षडंग वेद का अध्ययन और उसके अर्थ का परिज्ञान होना चाहिये । छ: अगों में व्याकरण प्रधान है, अतः इस शास्त्रवचन के आधार पर भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक हैं । लाघव के लिये भी व्याकरण पढ़ी जाती है । इस प्रसंग में एक कथा दी गई है कि बृहस्पति इन्द्र को एक हजार दिव्य वर्ष पर्यन्त शब्दो का उपदेश करते रहे, किन्तु उनका अन्त नही हुआ । यहाँ बृहस्पति जैसा वक्ता और इन्द्र जैसा श्रोता है और एक हजार दिव्य वर्ष का समय है । तो भी शब्दों का अन्त नही आया ( आर्यसमाजी विद्वान् मनुष्यों से भिन्न इन्द्र, बृहस्पति प्रभृति देवताओ की सत्ता नही मानते । उसके मत के अनुसार एक हजार दिव्य वर्ष पर्यन्त यह अध्ययन-अध्यापन कार्य जैसे चला, इसका उत्तर वे ही दे सकते हैं ) । आज यदि कोई अधिक से अधिक जीवित रहता है, तो वह सौ वर्ष तक जीवित रहेगा । एक एक शब्द को वह कब तक समझता रहेगा और उनका प्रयोग करना तो और भी कठिन कार्य होगा, अतः सरल तरीके से प्रकृति और प्रत्यय के विभाग द्वारा ही वह थोडे समय में व्याकरण की सहायता से शब्दों को जान सकता है । असन्देह के लिये भी व्याकरण पढना आवश्यक है । वेद में स्थूल पृषती का आलभन विहित है । स्थूल पृषती शब्द में कर्मधारय समास है या बहुव्रीहि? इसका निर्णय अवैयाकरण नही कर सकता । व्याकरण पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही यह निश्चय कर सकेगा कि यदि इसमें समास के अन्त में माने वाला उदात्त स्वर है, तो यहाँ कर्मधारय समास होगा और पूर्व पद प्रकृति का स्वर है,
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१६६२ वेदार्थपारिजातः यदि समासान्तोदात्तत्वं तदा कर्मधारयः, अथ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्व ततो बहुव्रीहिरिति । अन्यनि च प्रयोजनान्युक्तानि तत्रैव । म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः, म्लेच्छा मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । ' यदधोतमविज्ञात निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥ ' अविज्ञातमनर्थकं च माधिगीष्महीत्यध्येयं व्याकरणम् । अर्थज्ञानमन्तरा पाठमात्रेणाध्ययनेनानग्नो शुष्केष इव तदध्ययनं न प्रकाशते । 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ' ( ऋ ० सं ० १ । १६४ ३९ ) ऋच ऋप्रधाना अपरविद्यात्मकाः साङ्गाश्चत्वारो वेदा अक्षरे अदृश्यादिगुणके क्षरण- रहितेऽनश्वरे नित्ये व्याप्ते ब्रह्मणि निषेदुस्तत्रैव महातात्पर्यवन्तः, बुद्धिशुद्धिद्वारा कर्मादिपराणामपि तत्रैव पर्यवसानात् । ' वेदानु- वचनेन विविदिषन्ति' (बृ० उ० ४/४/२२) इति श्रुतेः । कीदृशे परम उत्कृष्टे निरतिशये व्योमन् व्योमसदृशे व्यापकेऽसङ्ग च । यद्वा व्योमन् विशेषेण सर्वस्य रक्षके, स्वाध्यस्ते प्रपञ्चे सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेनाधिष्ठानभूतब्रह्मण एव रक्षकत्वात् । यस्मिन् ब्रह्मणि विश्वेदेवा अधिनिषेदुः निषीदन्ति । यो मर्त्यस्तादृशं देवादीना स्वरूपतालाभास्पदं सकलसच्छास्त्रतात्पर्यंगोचरवस्तुन जानाति, स ऋचा पूर्वोक्तेन शब्दजालेन कि करिष्यति? वेदनसाधनेन वेदेन वेद्यमविदित्वा किं साधयति? य इत् य एव तत् तत्त्वं विदुः, त इमे ज्ञातारः समासते सम्यक् तिष्ठन्ति, अपुनरावृत्त्या स्वस्वरूपेऽवतिष्ठन्ते । यद्वा गवामनयनादिसहस्रसंवत्सरसत्रपर्य- न्तानि सहोपयन्ति । सहार्थे संशब्दः । सत्रादधिकाना यागानामभावात्तेषामपि फलं ते प्राप्नुवन्ति । ' यथाकृताय विजिताया- धरेयाः सयन्ति ', ' सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते' (भ० गी० ४।३३ ) इत्यादि वचनेभ्यः । यत्तु - 'विद्वासो मनुष्यादयो यदाधारेण निषण्णास्तद् ब्रह्म विज्ञेयम्' इति, तत्तुच्छम् तदाधारत्वेन देवपदो - तो बहुव्रीहि होगा । इसी तरह के दूसरे भी बहुत से प्रयोजन व्याकरण अध्ययन के वहाँ बताये गये है | अपशब्द का उच्चारण करना एक प्रकार का म्लेच्छपन है । इससे छुटकारा पाने के लिये भी व्याकरण पढना चाहिये । अर्थ को बिना समझे मन्त्रो का केवल पाठ करने से वह उसी तरह से सफल नही होता, जैसा कि बुझी हुई आग मे सूखी लकडी लगाने पर भी वह जलती नही । इस दोष की निवृत्ति के लिये भी व्याकरण का पढना आवश्यक हो जाता है । इस प्रसंग में स्वामी दयानन्द ने 'ऋचो अक्षरे० ' प्रभृति मन्त्रो को उद्धृत किया है । इनमें से प्रथम मन्त्र का अर्थ यह है कि ऋक् प्रभृति अपर विद्या स्वरूप चारों वेद अपने छ: अंगों के साथ अक्षर, अदृश्य, क्षरण रहित गुण वाले, अविनश्वर, नित्य, व्यापक ब्रह्म को ही वास्तविक रूप से बताते है । कर्म के प्रतिपादक मन्त्रो का भी बुद्धि को शुद्धि के द्वारा इसी ब्रह्म में वास्तविक तात्पर्य है । ' वेदानुवचनेन ० ' प्रभृति श्रुति इसमें प्रमाण है । यह ब्रह्म परम उत्कृष्ट है, आकाश के समान निरतिशय व्यापक और असंग है । अथवा वह व्योम इसलिये कहलाता है कि वह विशेष रूप से सबका रक्षक है । अपने में अध्यस्त प्रपंच को सत्ता और स्फूर्ति देने के कारण अधिष्ठानभूत ब्रह्म ही सबका रक्षक है । जिस ब्रह्म में सभी देवता निवास करते है, उस ब्रह्म को जो मनुष्य नही जान पाता कि वही सभी देवताओं को अपने अपने स्वरूप मे प्रतिष्ठित करता है और समस्त शास्त्रो का परम तात्पर्य उसी को समझने के ?,लिये वह पूर्वोक्त ऋग्वेद आदि के शब्द जाल को पढकर भी क्या करेगा वेद से जिसका ज्ञान होना चाहिये उसको यदि वह जान नही पाता, तो उसका यह सारा परिश्रम व्यर्थ है । इसके विपरीत जो मनुष्य इस परम तत्त्व को जान लेते है, वे अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाते है । फिर उन्हें पुनरावृत्ति, आवागमन के चक्र मे नही पडना पडता । अथवा गवानयन प्रभृति शुभ कर्मों के अनु-ष्ठान से हजारों वर्षों तक वे साथ साथ रहते हैं । सं शब्द यहाँ साथ के अर्थ में है । सत्र से अधिक बड़े यज्ञ नही होते । इनका फल भी वे प्राप्त करते हैं । छान्दोग्य श्रुति और गीता वचन इसमें प्रमाण है कि ज्ञान की स्थिति में कर्म की सारी अवस्थाएँ समाप्त हो जाती है ।. 'जिसमे सम्पूर्ण विद्वान् मनुष्य आदि स्थित है, वह परमेश्वर कहलाता है' ( पृ० ३६१ ) यह व्याख्या उचित नही है, क्योंकि ऐसा मानने पर इस मंत्र में 'देव' पद को रखना व्यर्थ हो जायगा । 'सबका उपकार करने वाली ईश्वर की आज्ञा को जो ठीक
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वेदार्थपारिजात १६६३ पादानवैयर्थ्यात् । 'सर्वोपकारकरणार्थमीश्वराज्ञाया यथावन्न वर्तन्ते' इत्यादिकमपि निर्मूलम् । धर्मार्थकाममोक्षाख्यं फल- मित्यपि निर्मूलम्, अक्षरबाह्यत्वात् । वस्तुतस्तु धर्मज्ञानेनापि वेदाध्ययनस्य सार्थक्यं भवत्येव S स्वर्गब्रह्मलोक| दिप्राप्ति बुद्धिशुद्धिक्रमेण परमात्मप्राप्ति- हेतुत्वात्, वेदाध्ययनस्य मुख्यं फल ब्रह्मज्ञानमित्यर्थं एवास्या ऋच उदाहर्तव्यत्वात् । तस्मादस्मिन् प्रसङ्गे–'स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत्सकल भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपात्मा ॥ ', 'यद् गृहीत- मविज्ञातम्' इति मन्त्रद्वयमेव सङ्गतम् । योऽर्थज्ञ इत्यर्धेन वेदार्थज्ञान प्रशस्यते, इतरेणार्धत्रयेण ज्ञानराहित्यं निन्द्यते । यो वेदार्थं जानाति सोऽयमिह लोके सकलं श्रेयः प्राप्नोति तथा तेनैव पापक्षये सति मृतः स्वर्गमवाप्नोति । तदेतद् ऐहिका- - मुष्मिकं फलं तैत्तिरीया आमनन्ति । ' तदेषाभ्युक्ता –ये अर्वात वा पुराणे वेदं विद्वांसमभितो वदन्त्यादित्यमेव ते परि- वदन्ति । सर्वे अग्नि द्वितीयं तृतीयं च हसमिति यावतीर्वे देवतास्ताः सर्वा वेदविदि ब्राह्मणे वसन्ति । तस्माद् ब्राह्मणेभ्यो वेदविदुद्भ्यो दिवे दिवे नमस्कुर्यान्नाश्लील कीर्तयेदेता एव देवता. प्रीणाति ।' इति । नहि विद्वास सर्वे मनुष्या वेदविदि ब्राह्मणे वसन्ति । 'विद्वांसो मनुष्या एव देवा:' दयानन्दीय मतमत एव नादर्तव्यम् । योऽर्थाभिज्ञः पुरुषस्तं प्राचीन व्यासा- दिकमाधुनिकं च ये विद्याधनकुलादिमदोपेता दूषयन्ति, ते आदित्यमेव प्रथम दूषयन्ति । आदित्यापेक्षया द्वितीयमग्नि तृतीय हसं वायुं (हन्ति सदागच्छतीति हंसो वायुः ) दूषयन्ति । अतस्तान् दृष्ट्वा प्रतिदिनं नमस्कुर्यान्न तु तत्र विद्यमानमपि दोषं कीर्तयेत् । यस्तु वेदमधीत्याप्यथं न जानाति सोऽय भारमेव हरति । छिन्नशाख शुष्क तरुमूल स्थाणुः । स च यथा इन्धनार्थमेवोपयुज्यते, न पुष्पफलार्थम्, तथा केवलपाठकस्य व्रात्यत्व न भवतीत्येव फलम्, नाग्निहोत्राद्यनुष्ठान स्वर्गादिर्वा फलं भवति । किलेति लाकप्रसिद्धिरुच्यते । लोके पाठकापेक्षया विदुषि सत्काराधिक्यदर्शनात् । अर्थज्ञानरहितं पाठमात्र न तरह से नही समझते हैं' ऐसा अर्थ करना भी निराधार है । इसी तरह से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी फल की चर्चा भी बिना प्रसग की यहाँ उठा दी गई है । वास्तव में तो धर्म के ज्ञान से भी वेदाध्ययन की सार्थकता हो जाती है, क्योकि वह धर्म स्वर्ग और ब्रह्मलोक की प्राप्ति के क्रम से और बुद्धि की शुद्धि के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति का कारण बनता है । वेदाध्ययन का मुख्य फल ब्रह्मज्ञान ही है । इस मन्त्र का मुख्य अर्थ यही मानना पड़ेगा । इसी प्रसंग मे 'स्थाणुरयं' और ' यद् गृहीत ० ' इन दो मन्त्रो की ही संगति बैठती है । इनमें से 'योऽर्थज्ञ:' यह मन्त्रार्थ वेदार्थ ज्ञान की प्रशंसा करता है और बाकी तीन पंक्तियां अर्थज्ञान से रहित की निन्दा करती है । जो मनुष्य वेद के अर्थ को जानता है, वह इस लोक में सकल कल्याण को प्राप्त करता है और उसी से पापो का क्षय हो जाने पर मरने के उपरान्त स्वर्ग को प्राप्त करता है । इसी तरह के ऐहिक ( इस लोक के ) और आमुष्मिक ( परलोक के ) फल की प्राप्ति की बात ' तदेषाऽस्युक्ता' इत्यादि वाक्य में तैत्तिरीय शाखा के अध्येता कहते है । इसके अनुसार वेद के जानने वाले ब्राह्मण के शरीर मे सभी देवताओं का निवास माना जाता है । देवता शब्द का अर्थ यदि विद्वान् मनुष्य किया जाय, तो वे किसी वेदो के वेत्ता ब्राह्मण में रहते देखे नही जाते । इसलिये दयानन्द का यह अर्थ आदरणीय नही हो सकता । जो पुरुष वेदो के अर्थ को जानने वाला है, वह प्राचीन व्यास प्रभृति हो या आधुनिक, उस वेदार्थवित् की जो व्यक्ति विद्या, घन, कुल आदि के मद में पड़कर निन्दा करता है, वह पहले आदित्य ( सूर्य ) को दूषित करता है, दूसरे अग्नि और तीसरे हंस अर्थात् सदा गतिशील वायु को भी दूषित करता है । अत. मनुष्यो को चाहिये कि वे वेदार्थवेत्ता ब्राह्मण की कभी निन्दा न करे, उनमे विद्यमान दोषो की भी चर्चा न कर उनको सदा नमस्कार कर | जो व्यक्ति वेदों को पढ कर भी उनका अर्थ नही जानता, वह केवल बोझा ढोने वाला है । जिसकी शाखाएँ सूख गई हैं, पेड़ के ऐसे ठूंठ को स्थाणु कहते हैं । उसका उपयोग जैसे केवल ईंधन के लिये हो सकता है, उससे फल और पुष्प को कोई आशा नही रखो जा सकती, उसी तरह से वेदपाठी का इतना ही फल है कि वह व्रात्य नही होता, वह अग्निहोत्र के अनुष्ठान में अथवा स्वर्ग आदि की प्राप्ति में समर्थ नही हो सकता । किल शब्द लोकप्रसिद्धि के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । लोक में यह देखा गया है कि वेदपाठी -की अपेक्षा उनके अर्थ को जानने वाला का आदर अधिक होता है । अर्थज्ञान के बिना केवल पाठ करने पर, बार बार उच्चारण
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वेदार्थपारिजात १६६४ कदाचिज्ज्वलति स्वार्थं प्रकाशयति पुन पुनरुच्चार्यमाणमपि यथाग्निरहिते प्रदेशे प्रक्षिप्त शुष्ककाष्ठ न ज्वलति तद्वत् । अलोकिक पुरुषार्थोपाय वेत्यनेनेति वेद इति मुख्यवेदत्वसिद्धये तदर्थोऽपि ज्ञातव्य । यत्तु —' विज्ञायापि धर्मं नाचरति स मनुष्यः शुष्ककाष्ठवद् भवति' ( पृ ० ३६० ) इति तदशुद्धम्, मूले तादृशार्थबोधकपदाभावात् । पत्ये उशती 'उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव न वेत्ति तंसुवासा ॥ ' ( ऋ ० सं ० १०।७१।४ ) | अप्येकः पश्यन्न पश्यति वाचमपि च शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । यः पुमानर्थं प्रत्याह -एकः पुरुष ' पाठमात्रपरायणो वेदरूपां बाच पश्यन्नपि न सम्यक् पश्यति' एकवचनबहुवचनादिविवेकाभावे पाठ-शुद्धेरपि कर्तुमशक्यत्वात् । 'वायव्यं श्वेतमालभेत 'वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधावति, स एवैनं भूतिं गमयति, आदित्यानेव स्वेन भागधेयेनोपधावति, त एवैन भूतिं गमयन्ति' ( तै० सं० २| १| १ | १ ) इति नाव्युत्पन्नो ज्ञातु शक्नोति । अन्यः कश्चि-दर्थज्ञानाय व्याकरणाद्यङ्गानि शृण्वन्नपि मीमांसाराहित्यादेना वेदरूपा वाच सम्यङ् न शृणोति । यावतोऽश्वान् प्रति-गृह्णीयात्तावतो वारुणान् चतुष्कपालान् निर्वपेत् ' ( तै ० सं ० २।३।१२।१ ) इत्यत्र व्याकरणमात्रेण प्रतिग्रहीतुरिष्टिः प्रतीयते । 1 ' ' ( | | )मीमासाया तु प्रजापतिर्वरुणायाश्वमनयत् इत्युपक्रमानुरोधेन प्रतिग्राहयितुरिष्टिनिर्धारिता मी० सू० ३ ४ ३० । उभयविधमप्यविद्वासमाह - अप्येकस्मै तन्वं विसत्रे स्वमात्मानं विवृणुते स्वार्थ प्रकाशयति । अपिशब्दपर्याय उतशब्दः । पूर्वोक्तानभिज्ञवैलक्षण्यद्योतनार्थं । यो व्याकरणाद्यङ्गः स्वशब्दार्थ मीमासया तात्पर्यं शोधयितुं प्रवृत्त, तस्मै एकस्मै वेदः स्वकीयां तनु विसस्रे । तत्रोपमा ---यथोशतो कामयमाना जाया सुवासा पत्ये तन्वं विससे । यथा स पतिरेना जाया साकल्येनादरयुक्तः पश्यति, तथा चोक्तमर्थं हितबुद्ध्या शृणोति, तथाय चतुर्दशविद्यास्थानपरिशीलनोपेतो वेदार्थरहस्य सम्यक् शृणोति हितबुद्धया स्वीकरोति 1। यत्तु -' मनुष्योऽर्थज्ञानपूर्वकं वेदाध्ययनं करोति, तस्मै वाक् तन्वं विविधतया प्रकाशयति' करने पर भी वह उसके अर्थ को प्रकाशित करने में समर्थ नही हो सकता, जैसा कि अग्नि से रहित स्थान में सूखी लकडी डाल देने पर भी वह जलती नही । वेद पद का अर्थ यह है कि इसकी सहायता से अलौकिक पुरुषार्थ को भी मनुष्य जान लेता है । इसके लिये वेद का अर्थज्ञान आवश्यक है, तभी वह वेद की सहायता से उसको जान सकता है । ' अर्थ को जानकर भी जो मनुष्य धर्म का आचरण नही करता' यह अर्थ तो गलत है, क्योकि मूल में इस अर्थ को बनाने बाला कोई शब्द नही है । 'उत स्व:' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है - एक व्यक्ति देखते हुए भी नही देखता और इस बाणी को सुनते हुए भी नहीं सुनता । जो पुरुष वेद के अर्थ को नही जानता, उसके लिये कहा जाता है कि वह पुरुष जो केवल वेद के पाठ मे लगा है, वह वेद रूपो वाणी को देखते हुए भी नही देखता, क्योकि एक वचन बहुवचन का ज्ञान न होने पर वह शुद्ध पाठ भी नही कर सकता | 'वायव्यं श्वेतमालभेत' इत्यादि वेद वाक्यों का अर्थ अव्युत्पन्न व्यक्ति नही कर सकता । दूसरा व्यक्ति अर्थज्ञान में सहायता के लिये व्याकरण आदि अंगों को सुनता हुआ भी मीमासा आदि शास्त्रों का ज्ञान न होने पर इस वेदरूपी वाणी को ठीक तरह से नही सुन पाता । 'यावतोऽश्वान्' इस वेदवाक्य का व्याकरण के अनुसार तो यह अर्थ प्रतीत होता है कि प्रतिग्रहीता के लिये इष्टि का विधान है, किन्तु मीमांसा के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि क्रम के अनुसार यहां प्रतिगाहयिता के लिये यह इष्टि निर्धारित की गई है । इन दोनों के विपरीत जो व्यक्ति अर्थ में सहायक सभी शास्त्रो का ज्ञाता है, उसके प्रति यह वेदवाणी अपने अर्थ को पूरी तरह से प्रकाशित कर देती हैं । यहाँ उत शब्द अपि ( भी ) के अर्थ में प्रयुक्त है । यह पूर्वोक्त दोनो प्रकार को अनभिज्ञता से विलक्षणता का द्योतक है । जो व्यक्ति व्याकरण प्रभृति अंगों की सहायता से शब्दो के अर्थ का और मीमांसा की सहायता से वेदो के तात्पर्य का शोधन करने में लगा है, उस व्यक्ति के संमुख वेद अपने स्वरूप को स्पष्ट रूप से प्रकट कर देता है । इस विषय में स्त्री की उपमा दी जाती है कि जैसे सजी- सवरी स्त्री कामना करने पर अपने पति को अपना शरीर सौंप देती है । जैसे उसका पति अपनी पत्नी को आदरपूर्वक देखता है और उसकी बात को हितबुद्धि से सुनता है, उसी तरह से यह विद्वान् मनुष्य भी चौदह विद्याओं के अभ्यास में आदरपूर्वक लगा रहता है गौर वेदार्थ के रहस्य को भलीभांति जान कर हितबुद्धि से उसे स्वीकार करता है । 'जो मनुष्य शब्द- अर्थ सम्बन्ध तथा विद्या के प्रयोजन को यथावत् जान लेता है, ऐसे ही श्रेष्ठ पुरुष को विद्या के स्वरूप के ज्ञान से परमानन्द रूप फल भी मिलता है' ( पृ० ३६२ ) यह
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वेदार्थपारिजात १६६५ ( ) पृ० ३६० इत्यादिकम् । तत्तु यत्किञ्चित् वाक्पदस्य विद्यार्थत्वे मानाभावात् । अर्थज्ञानातिरिक्तस्य प्रकाशस्थान-पेक्षितत्वाच्च । ' उतत्व सख्ये स्थिरपीतमाहुर्नेन हिन्वन्त्यपि वाजिनेषु । अधेन्वा चरति माययैष वाच शुश्रुवा अफलामपुष्पाम् ॥ ' ( ऋ ० स० १०।७१।४ ) । पूर्वोक्तार्थस्यैव भूयसे निर्वचनायेयमृक् । अपि चैक चतुर्दशविद्यास्थानकुशल पुरुषं वेदरूपाया वाचः सख्ये स्थित्वा स्थैर्येण वेदोक्तार्थामृतपानयुक्तमाहुस्तज्ज्ञा । 'सखिविद सखायं' ( तै० आ ० २।१५ ) इति मन्त्रे वेदस्य सखित्वमुक्तम् । यद्वा देवाना सख्ये स्थित्वाऽतिशयेन पीतामृतमाहुः । वाचामिना ईश्वरा. सभासु प्रगल्भा वा वाजिनास्तेषु मध्येऽप्येनं वेदार्थकुशल न हिन्वन्ति नैनं केऽपि पर्यनुयोक्त प्रभवन्ति, तेन सह विवदितुमसमर्थत्वात् । यस्त्वन्य पाठमात्रपरः पुष्पफलरहिता वाच शुश्रुवान् भवति, धर्मस्य ज्ञानं पुष्पम् ब्रह्मणो ज्ञानं फलम् । यथा पुष्पं फलस्योत्पादकं भवति, तथैव वेदानुवचनादिधर्मज्ञानमनुष्ठानद्वारा फलात्मक ब्रह्मज्ञानेच्छामुत्पादयति, ' तमेतं वेदानुवचनेन विविदिषन्ति' इति श्रुते । यथा फल तृप्तिहेतुस्तथा ब्रह्मज्ञानं कृतकृत्यत्वहेतुः । तादृशपुष्पफलरहितो वेदपाठकोऽधेन्वा मायया सह चरति । नवप्रसूतिका क्षीरदोग्ध्री गौः प्रीतिहेतुत्वाद् धिनोतीति धेनुरुच्यते । पाठमात्रपर प्रति वेदरूपा वाग् धर्मज्ञानरूपं क्षीरं न दोग्धीत्यधेनुरुच्यते । अत एवासौ माया कपटरूपा, ऐन्द्रजालिकनिर्मितगोसदृशरूपत्वात् । तया सह चरन्नयं परमपुरुषार्थं न लभते । यच्च स्तूयते तद्विधीयत इति न्यायेन सार्थज्ञानमध्ययनं विधीयते । पूर्वमप्येषा व्याख्याता सामाजिकपक्षनिराकरणप्रसङ्गेन । —' यत्तु सख्ये यथा सर्वेषा प्राणिना मित्रभावकर्मणि उत त्वमन्यमनूचानं पूर्णविद्यायुक्तं स्थिरपीतं धर्मानुष्ठानेश्वरप्राप्तिरूप मोक्षफलं पीतं प्राप्त येन तं विद्वास परमसुखप्रद मित्रं प्राहु:' ( पृ० ३६० ) इति, तदतीव अर्थ तो गलत है, क्योकि वाक् पद का अर्थ विद्या करने में कोई प्रमाण नही है । अर्थज्ञान के अतिरिक्त विद्या का कोई प्रकाश यहाँ अपेक्षित भी नही है । ' उत त्व सख्ये ० ' यह ऋचा पूर्वोक्त अर्थ को ही फिर से समझाने के लिये कही गई है कि चतुर्दश विद्याओ मे प्रवीण पुरुष को वेदरूपी वाणी के साथ मित्रता रखते हुए स्थिरता के साथ वेदोक्त अमृत के पान में निरत माना जाता है । ' सखिविदं सखा- यम्' इस मन्त्र में वेद मन्त्र को सखा बताया गया है । अथवा इसका अर्थ यह भी किया जा सकता है कि देवताओ से मित्रता करके वह छक कर अमृतपान करने वाला कहा जाता है । सभा, शास्त्रार्थ आदि में प्रगल्भ व्यक्तियो के बीच मे भी कोई इस वेदार्थकुशल व्यक्ति को पराजित नही कर सकते, क्योकि वे लोग इसके साथ विवाद करने में असमर्थ सिद्ध हो जाते हैं । जो व्यक्ति केवल वेद का , पाठ ही करता रह जाता है वह फल और पुष्प से रहित इस वाणी की सेवा करता है । धर्म के ज्ञान को पुष्प और ब्रह्म ज्ञान को फल कहा जाता है । केवल वेदपाठी को इन दोनों का ज्ञान नही हो पाता । जैसे पुष्प से फल उत्पन्न होता है, उसी तरह से वेदानु-वचन आदि धर्म का ज्ञान अनुष्ठान के माध्यम से फलस्वरूपिणी ब्रह्मज्ञान की इच्छा को उत्पन्न करने वाला है । 'तमेत ' इत्यादि बृहदा-ture श्रुतिसमें प्रमाण है । जैसे फल के खाने से तृप्ति होती है, उसी तरह से ब्रह्म का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, फिर उसको कुछ करना नही रहता । इस तरह के फल और पुष्प से रहित वेदपाठी केवल मायाजाल में पडा रहता है । नवप्रसूता दूध देने वाली गाय को धेनु कहते है । केवल वेदपाठी व्यक्ति को वेदरूप वाणी धर्म-ज्ञान रूप दूध न देने के कारण अधेनु बन जाती है । इसीलिये वह मायामय, कपटरूप, ऐन्द्रजालिक ( जादूगर ) की बनाई गाय के समान हो जाती है । इसका साथ करने पर वह कभी परम पुरुषार्थं को नही प्राप्त कर सकता । जिसकी स्तुति की जाती है, उसी का विधान किया जाता है, इस न्याय के अनुसार अर्थज्ञान के साथ वेदाध्ययन की स्तुति होने से उसीकी विधि मानी जाती है । इस मन्त्र की व्याख्या पहले भी आर्यसमाजियो के मत का खण्डन करते समय की जा चुकी है । स्वामी दयानन्द ने इस मन्त्र का अर्थ करते हुए लिखा है - ' सब मनुष्यों को उचित है कि विद्वानों के साथ प्रीति करें, अर्थात् जैसे सम्पूर्ण मनुष्यों के साथ मैत्री करने योग्य मनुष्य को सब लोग सुख देते हैं, वैसे ही तू भी जो वेदादि विद्या और विज्ञानयुक्त पुरुष है, उसको अच्छी प्रकार सुख दे कि जिससे तुझे विद्यारूप लाभ सदा होता रहे । विद्वान् नाम उसका है, जो कि अर्थ सहित विद्या २०९
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९ ६६६ वेदार्थपारिजात , मन्दम् वेदार्थप्रशसासम्बद्धत्वात् । सर्वेषा प्राणिना सख्ये स्थितेर्वेदार्थज्ञान प्रत्यहेतुत्वात् । परमसुखप्रदं मित्रमित्यपि मूलार्थासम्बद्धमेव 1। स्थिरशब्दस्यार्थस्तु नोक्तः । धर्मानुष्ठानमन्यद् ईश्वरप्राप्तिरूप फलमन्यत् । तयोः कथ पेयत्वम् । पीतमित्यस्य प्राप्तमिति च कथमर्थं । ईदृश विद्वांसं न केऽपि हिरन्ति तस्य सर्वप्रियकारकत्वात् । अनेनापि न |. वेदविद्याप्रागल्भ्य व्यज्यते । अन्यदपि सर्वं मुलाक्षरासस्पर्शि कपोलकल्पित यत्किञ्चिदेव निरुक्तविरुद्धश्चागमथ । ' ' ( ) यास्काचार्यस्तु तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय नि० ११ ९ इति पूर्वोन्स्य प्रकृतस्य ज्ञान प्रशसाख्यस्यार्थस्य ----' फलाभिधानद्वारा भूयसे निर्वचनायोत्तरोदाहृतेत्याह तत्रैव च अप्येकं वाक्सख्ये स्थिरपीतमाहू रममाण विपीतार्थं ! --- गृहीतार्थामृतमित्येवार्थं यद्वा देवसख्ये देवाना समानाख्यानतायां देवसायुज्ये या या देवता निराह तस्यास्तस्या- स्तादात्म्यमनुभवताति' ( नि० १।१३ ) | देवसख्ये रमणीये स्थाने यस्मिन् देवाना सखिभावस्तस्मिन् देवसख्ये रम-. | णीये देवलोके स्थिरमविचालित रममाणं पीतार्थम् आपोतार्थ गृहीतार्थमेनमाहु विज्ञातार्थं व नाप्नुवन्ति वाग्ज्ञेयेषु बलवत्स्वपि वाजिनेषु वाग्ज्ञेयेष्वर्थेषु बलवत्स्वपि उन्नेयेषु समुद्रविहितरत्नोपमेषु देवतापरिज्ञानादिषु तं वागर्थज्ञं न हिन्वन्ति न केऽपि तमनुगन्तु शक्नुवन्ति स हि तान् व्याकर्तुं शक्नोति, नेतरे मन्दबुद्धयो बहवोऽपि समागताः शक्नुवन्ति तानर्थान् व्याकर्तुमिति दुर्गाचार्याऽपि । यदप्युक्तम् -' यो ह्यविद्वान् अपुष्पा कर्मोपासनानुष्ठानाचा रविद्यारहिता अफला धर्मेश्वरविज्ञानाचारविरहा शुश्रुवान् श्रुतवान् तयार्थज्ञानसुशिक्षारहितया मायया कपटयुक्त्या वाचास्मिल्लोके चरति नैव स किञ्चित् प्राप्नोति ' ( पृ० ३६१ ) इति, तदपि यत्किञ्चिदेव, कर्मानुष्ठानाचारविद्याधर्मेश्वरविज्ञानाचारविद्ययो: पुष्पफलभावस्यानिरूपणात् । ,, मायापदेन कपटयुक्ता वाक् कथमुच्यते किं तत्र मूलमित्यस्य वक्तव्यत्वात् निरुक्तविरुद्धत्वाच्च । निरुक्ते तु को पढ कर वैसा ही आचरण करे, जिससे कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और परमेश्वर की प्राप्ति यथावत् हो सके । इसी को 'स्थिरपीत' कहते है । ऐसा जो विद्वान् है, वह ससार को सुख देने वाला होता है' ( पृ० ३६२ ), किन्तु यह अर्थ एक दम गलत है । इस मन्त्र में वेदार्थ की प्रशंसा की गई है । सभी प्राणियों से मित्रता रखने से वेदार्थ ज्ञान का कोई सम्बन्ध नही है । 'परम सुख देने वाला मित्र' इस अर्थ का भी मूल पद से कोई सम्बन्ध नहीं है । स्थिर शब्द का अर्थ यहाँ बताया ही नही गया । धर्म का अनुष्ठान करना एक बात है और ईश्वर की प्राप्ति दूसरी बात | इसको किया कैसे जायगा? पीत शब्द का अर्थ प्राप्त कैसे हो सकता है? ऐसे विद्वान् को कोई दुःख नही पहुँचाता, क्योकि वह सबका प्रिय करने वाला है, इस बात से भी वेद विद्या का महत्त्व नही प्रकट होता । इसी तरह को दूसरी बाते भी मूल अक्षरो से बहुत दूर, कपोलकल्पित और भ्रान्त है । यह अर्थ निरुक्त के भी विपरीत पडता है । यास्काचार्य के 'तस्यो- तरा० ' इत्यादि कथन का अभिप्राय यह है कि प्रकृत मन्त्र मे अर्थज्ञान की जा प्रशंसा की गई है, इसी बात को पुन. पुष्ट करने के लिये आगे का मन्त्र पढा गया है, क्योकि इसमें अर्थज्ञान का फल भी बताया गया है । निरुक्तकार पुन आगे लिखते है कि उस रमणीय देवलोक में, जहां कि उसकी देवताओ के साथ मित्रता होती है, वह वेदार्थज्ञ विद्वान् अविचल रूप से उन देवताओ के साथ आनन्द मनाता है । समुद्र में छिपे रत्नों के समान अत्यन्त छिपे हुए अर्थों को भी वह विद्वान् समझ लेता है, उसकी बुद्धि कही कुण्ठित नही होती, क्योकि इस तरह के रहस्यमय देवता विज्ञान को भी वह सरलता से समझ लेता है, जिसको कि मन्द बुद्धि वाले मनुष्य कभी नही समझ पाते । ' अप्येकं वाक्मख्ये ' इत्यादि निरुक्त वाक्य को दुर्गाचार्य ने इस तरह से विस्तृत व्याख्या को है । इस व्याख्या का भी स्वामी दयानन्द की व्याख्या से कोई मेल नही मिलता । 'जो कोई अविद्या रूप अर्थात् अर्थ और अभिप्राय रहित वाणी को सुनता और कहता है, उसको कभी कुछ भी सुख प्राप्त , किन्तु शोकरूप शत्रु उसको सब दिन दुःख ही देते रहते हैं, क्योकि विद्याहोन होने से वह उन शत्रुओ को जीतने मेf नहीं हो सकता समर्थ नहीं हो सकता' ( पू० ३६३ ) | यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि कर्मानुष्ठान, आचार विद्या, धर्म और ईश्वर का विज्ञान तथा आचार विद्या का कही भी परस्पर पुष्प और फलभाव वर्णित नही है । माया पद से कपट भरी वाणी कही जाती है, इसमें भी प्रमाण की आवश्यकता है और यह अर्थ निरुक्त की व्याख्या के स्पष्ट विपरीत है । निरुक्त में माया पद का अर्थ वाणी का प्रतिरूप किया है ।
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वेदार्थपारिजातः १६६७ ( ) ' ' १।२० इत्यत्र मायया वाक्प्रतिरूपया इत्युक्तम् । सा च न कपटयुक्ता वाक् किन्तु वाक्प्रतिरूपा मायाविनिर्मिता मायामयी गौरिव मायामयी वाग्रूपा, तथा चरत् न पुरुषार्थं लभत इत्यर्थं । वाच: पुष्पफलमाह -'याज्ञदेवते पुष्पफले देवताध्यात्मे वा' । नि० १।२० ) इति, तत्रैव पुष्पफलव्याख्यानमदि कृतम् । विवृत च दुर्गाचार्येण - यज्ञपरिज्ञान याज्ञम्, देवतापरिज्ञानं दैवतम् । यदाभ्युदयलक्षणो धर्मोभयते तदा याज्ञ पुष्पं दैवत फलम् पूर्वं हि पुण्यं फलार्थं भवति । याज्ञमपि पूर्वं तन्मते दवतार्थम् । दैवतं देवतापरिज्ञान्तद्भावप्राप्तिर्यज्ञफल भवतीति प्रसिद्धमेव । सर्वो मन्त्रब्राह्मणराशि- निश्रेयस्परश्चेदभिप्रेयते तदा याज्ञदैवते पुष्परूपे एव । दैवते हि याज्ञमन्तर्भूतमेव, तदर्थत्वात् । अधिदैवतमपि एवं कार्यकारणा- धिगमद्वारेणाध्यात्ममेव सम्पादयति मुमुक्षु ' तदा स आत्मयाज्येव भवति । तस्माद्दैवत पुष्पमध्यात्म फल भवति । तस्मा- न्निरुक्तादिविरुद्ध मेव दयानन्दीय व्याख्यानम् । वस्तुतस्तु किञ्चित् पुष्पफलेति वा' ( नि० ११२० ) इति रीत्या अर्थज्ञानहीन- स्थापि किञ्चित् पुष्प फल च भवत्येव । तस्मादल्पफला अल्लपुष्पा च भवति । अस्ति ह्यध्ययनमात्रेऽपि किश्चिदल्प फलम् । नापि परिश्रमो व्यर्थं इति भाष्यकाराभिप्राय । ' यस्तु प्रयुक्ते कुशलो विशेषे शब्दान् यथावद व्यवहारकाले । सोऽनन्तमाप्नोति जयं परत्र वाग्योगविद् दुष्यति चापशब्दः ||' एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रशा: । नह्यज्ञान शरण भवति । नह्यजानन् ब्राह्मण हन्यात् सुरा वा पिबेत् सोऽपि मन्ये पतित एव स्यात् । यथा कूपखानको रजोभिः सृज्यते खननकाले, तथापि तदुद्भूतजलेन तत्प्रक्षालयति, तथैव वाग्योगविद् सम्यक्शब्दज्ञानजनितपुण्येनापशब्दज्ञानजनितमधमं प्रक्षालयति । एवं प्रयाजाः सविभक्तिकाः कर्तव्या इति यह वाणी छल-कपट वाली नही है, किन्तु वाणी का प्रतिरूप है । जादू से बनाई गई जादू की गाय की तरह इस तरह की वाणी भी जादू की बनाई हुई सी रहती है । जैसे जादू की गाय दूध नही देता, उसी तरह से बिना अर्थज्ञान के मन्त्रोच्चार द्वारा खडी की गई वाणी स्वर्ग आदि फल को देने में समर्थ नही हो पाती । वाणी के पुष्प और फल निरुक्त में बताये गये है कि यज्ञ और देवता अथवा देवता और अध्यात्म ज्ञान, ये ही वाणी के पुष्प और फल है । निरुक्त मे इनकी व्याख्या भी की गई है । उसका स्पष्टीकरण दुर्गाचार्य ने --- इस तरह से किया है यज्ञ का परिज्ञान याज्ञ और देवता का परिज्ञान दैवत कहलाता है । जब अभ्युदय लक्षण वाला धर्म व्यक्ति है अभिप्रेत रहता है, जब यज्ञसम्बन्धी ज्ञान पुष्पस्थानीय और देवतासम्बन्धी ज्ञान फलस्थानीय रहता है । पुष्प पहले होता है बाद मे फल, यज्ञीय अनुष्ठान से देवताभाव की प्राप्ति होती है, प्रथम यज्ञ का यही तात्पर्य है । मन्त्र और ब्राह्मणात्मक सारे वेद का विनियोग यदि निश्रेयस ( मोक्ष ) के लिये किया जाता है, तब यज्ञीय और देवता सम्बन्धी ज्ञान पुष्पस्थानीय हो जायंगे । दैवत कर्म मे यज्ञ का अन्तर्भाव हो ही जाता है, क्योकि यज्ञ उन्ही के लिये किया जाता है । देवता सम्बन्धी सारी कार्यविधि कार्यकारण परम्परा से अन्ततः अध्यात्म ( आत्मसम्बन्धी ) के किये मानी जाती है, अर्थात् मुमुक्षु व्यक्ति उनका उपयोग अभ्युदय के लिये न कर निःश्रेयस के लिये करता है । इस स्थिति में वह आत्मयाजी बन जाता है । तब साग दैवत कर्म पुष्पस्थानीय और अध्यात्म फलस्थानीय हो जाता है । इस तरह से स्पष्ट प्रतीत हो जाता है कि स्वामी दयानन्द की व्याख्या निरुक्त प्रभृति आर्ष ग्रन्थो के सर्वथा विपरीत है । सिद्धान्ततः देखा जाय तो निरुक्त के अनुसार अर्थज्ञान न होने पर भी केवल मन्त्र का उच्चारण करने से भी फल मिलता ही है । इसलिये अफला और अपुष्पा शब्द यहाँ अल्प फल और अल्प पुष्प के अर्थ में प्रयुक्त माने जाते है । इस तरह से वेदपाठी का परिश्रम भी एक दम व्यर्थ नही जाता | दुर्गाचार्य ने यहाँ यह उचित स्पष्टीकरण निरुक्त के अपने भाष्य के अनुसार किया है । महाभाष्यकार 'यस्तु प्रयुक्त' इस श्लोक को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि जो कुशल व्यक्ति व्यवहार करते समय उचित शब्दो का प्रयोग करता है, वह इस लोक मे विजय तथा परलोक में अनन्त फल प्राप्त करता है । इसके विपरीत अपशब्द का प्रयोग करने वाला व्यक्ति दोषभागी बनता है । एक एक साधु शब्द के अनेक अपभ्रंश होते है । अपने अज्ञान के कारण कोई पुरुष दोष से बच नही सकता । बिना जाने कोई ब्राह्मण की हत्या करे या सुरापान करे तो वह इन दोषो से बच नहीं सकता, वह तो अवश्य ही पतित हो जायगा । जैसे कुआ खोदने वाला पहले मिट्टी मे सन जाता है, तो भी बाद मे उसमे से निकले जल से वह मैल को धो लेता है, उसी तरह से वाणी का सही स्थान पर प्रयोग करने वाला अपने सही शब्दों के प्रयोग से उत्पन्न पुण्य के सहारे अपशब्दो के
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वेदार्थपारिजातः १६६८ याज्ञिका. पठन्ति । न चान्तरेण व्याकरण सविभक्तिकाः कर्तुं शक्यन्ते । तस्मादध्येयं व्याकरणम् । यो वा इमा पदश: स्वरशोऽक्षरशो वर्णशो वाचं विदधाति, स आत्विजीनो भवति । न तदपि व्याकरणमन्तरा सम्भवति ॥ 'चत्वारि शृङ्गास्त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्ष सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्या आविवेश ॥ ' ( ऋ ० स० ४/५८/१ ) अस्य नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्चत्वारि पदानि शृङ्गा भूतभविष्यवर्तमानाः कालास्त्रयः पादा द्वे शीर्षे सुप्तिङश्च सप्त विभक्तयो हस्तासः । उरसि कण्ठे शिरसि त्रिषु स्थानेषु बद्धो वृषभः कामाना वर्षणाद् रोरवीति शब्द करोति महादेवो मर्त्यान् आविवेश इति महता देवेन नस्तादात्म्य स्यादित्यध्येय व्याकरणम् । ' चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिण । गुहा त्रीणि निहिता तेजयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ' ( ऋ० स० १।१६४।४५ ) परा-पश्यन्ती -मध्यमा - वैखरीरूपाणि चत्वारि वचासि परिमितानि । तेषु त्रीणि गुहाया निहितानि नेजयन्ति न चेष्टन्ते न निमिषन्ति । तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति । उत त्व. पश्यन्न ददर्शेति वाङ् नो तत्त्वं विवृणुयादित्यध्येय व्याकरणम् । 'सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा वाचमक्रत । अत्र सखाय. सख्यानि जानते भद्रेषा लक्ष्मीनिहिताधि वाचि ॥ ' (ऋ० सं० १०।७१।२ ) । यथा तितउना शूर्पेण गालिन्या वा सक्तु पुनन्ति तथा धीरा मनसा प्रज्ञानेन वाचमक्रत व्याकरण- संस्कारवता मनसाऽपशब्देभ्यः साधुशब्दान् विविच्य शोधयन्ति । अत्र सखायः सख्यानि जानते सायुज्यानि जानते । एषा वैयाकरणाना वाग्योगविदा वाचि भद्रा लक्ष्मीनिहिता । याज्ञिकाः पठन्ति -आहिताग्निरपशब्द प्रयुञ्जानः प्रायश्चित्तीया सारस्वतीमिष्टि निर्वपेत् । प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येय व्याकरणम् । एव बहूनि प्रयोजनान्युक्तानि । प्रयोग से उत्पन्न अधर्म को धो डालता है ॥ इसी तरह से याज्ञिको का कहना है कि प्रयाजो का प्रयोग विभक्ति के साथ करनी चाहिये ॥ बिना व्याकरण पढे विभक्ति का प्रयोग करना नही आ सकता । इसलिये भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है ॥ ऋत्विक् उसी को कहा जाता है, जो कि पद, स्वर, अक्षर, वर्ण आदि की पूरी जानकारी रख कर वाणी का प्रयोग करता है । यह जानकारी व्याकरण का अध्ययन किये बिना नही मिल सकती, इसलिये भी व्याकरण का पढना आवश्यक है । 'चत्वारि शृङ्गा' इस मन्त्र का अर्थ यह है कि नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात ये चार प्रकार के पद जिसके सीग है, भूत, भविष्यत् और वर्तमान ये तीन काल जिसके तीन पैर है, सुप् और तिङ् जिसके दो शिर है, सात विभक्तियां जिसके हाथ हैं, ऐसा यह सभी कामनाओं को देने वाला वृषभ हृदय, कण्ठ और शिर इन तीन स्थानों में बाँधा जाने पर जोर से रंभाता है । यह महान् देवता शब्द के रूप मे मनुष्यो मे प्रविष्ट होता है । इस महान् देवता से हमारा तादात्म्य हो सके, इसके लिये भी व्याकरण का पढ़ना आवश्यक है । 'चत्वारि वाक्' इस मन्त्र का अर्थ यह है कि परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार स्वरूपों में वाणी परिमित हैं, विभक्त है । इनमें से वाणी के तीन रूप गुहा में छिपे हुए है, अत वे किसी प्रकार की चेष्टा नही करते और चौथी वैखरी नामक वाणी को मनुष्य बोलते है । ऊपर 'उत त्व " इत्यादि मन्त्रो से व्याख्यात वाणी अपना रहस्यमय स्वरूप हमारे सामने प्रकट करे, इसके लिये भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है । 'सक्तुमिव' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है कि जैसे चलनी अथवा सूप से सत्तू साफ किया जाता है, आटा चाला जाता है, उसी तरह से मनीषीगण अपनी प्रज्ञा से वाणी का परिष्कार करते हैं, व्याकरण के संस्कार से परिष्कृत मन से अपशब्दो में से साधु शब्दों को छाँट कर निकाल लेते है । इस दशा में उसको साधु शब्दों से मित्रता हो जाती है, साधु शब्दो के प्रयोग से मिलने वाले स्वर्ग का सायुज्य इनको मिल जाता है । इन वाणी के साधु प्रयोग को जानने वाले वैयाकरणो की वाणी में कल्याणकारिणी लक्ष्मी का निवास है । याज्ञिक लोगो का कहना है कि आहिताग्नि ( अग्निहोत्री ) व्यक्ति यज्ञीय कर्म करते समय अपशब्दो का प्रयोग करे, तो इसके प्रायश्चित्त I के रूप में सारस्वती इष्टि का अनुष्ठान उसको करना पडेगा । हम प्रायश्चित्ती न हो, इसके लिये भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है । इस तरह से व्याकरण के अध्ययन के अनेक प्रयोजन पातञ्जल महाभाष्य में विस्तार से बताये गये है ।