वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 771–780
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 771–780
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वेदार्थपारिजातः १६६ ९ निरुक्तमपि वेदाङ्गम् | अर्थावबोधे निरपेक्षतया पदजात यत्रोक्त तन्निरुक्तम्- 'गौ. ग्मा ज्मा क्ष्मा क्षा इत्यारभ्य वसव, वाजिन, देवपत्न्यो देवपत्न्य इत्यन्तो य पदाना समाम्नाय समाम्नात, तदेतत् त्रिकाण्ड निरुक्तम् । 'आद्य नैघण्टुक काण्ड द्वितीयं नैगम तथा । तृतीय दैवत चेति समाम्नायस्त्रिधा स्थित ॥ ' इत्यनुक्रमणिकाभाष्ये । एकार्थवाचिनां पर्याय- शब्दाना सङ्घो यत्र प्रायेणोपदिश्यते तत्र निघण्टुशब्द । तत्र त्रयोऽध्याया । प्रथमे पृथिव्यादिलोक-दिक्कालादिद्रव्यविषयाणि नामानि । द्वितीये मनुष्य तदवयवादिद्रव्यविषयाणि नामानि । तृतीये तदुभयद्रव्यगततनु- बहुत्व- ह्रस्वत्वादिधर्मविपयाणि नामानि । निगमशब्दो वेदवाची । तत्र निगमे वर्तमानाना शब्दाना चतुर्थाध्याये उपदेश । पञ्चमाध्यायरूपस्य तृतीयकाण्डस्य दैवतत्वं स्पष्टम् । पञ्चाध्यायरूपकाण्डत्रयात्मके तस्मिन् परनिरपेक्षतया पदार्थस्योक्तत्वान्निरुक्तत्वम् । तस्यास्तस्यास्तद्भाव्यमनुभवत्यनुभवतीत्यन्तैर्द्वादशभिरध्यायैर्यास्को यन्निर्ममे तदपि निरुत्तमुच्यते । एकैकस्य पदस्य संभाविता अवयवार्थास्तत्र नि.शेषेणोच्यन्त इति तन्निरुक्तं । तत्रोच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्नीति निपातादिस्वरूपनिर्वचनतदुदाहरणान्युक्तानि । --निर्वचनाना न निर्मूलत्वमिति ब्राह्मणोक्तानि कानिचिन्निर्वचनान्युदाहृतानि । यथा - 'तदाहुतीनामाहुतित्वम्', ' तमिदन्द्रं - सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते ' इति । केषाञ्चिन्निर्वचनाना व्याकरणबलेन सिद्धावपि न सर्वेषा सिद्धिः ॥ अत एवोक्तम्— 'तदिदं विद्यास्थानं व्याकरणस्य कात्स्न्यं स्वार्थसाधक च' ( नि० १।१५ ) । वेदार्थावबोधे निरुक्तमपि नितरामपेक्षितम् । तथा छन्दोऽपि वेदे उपयुज्यते, ' तस्मात् सप्त चतुरुत्तराणि उन्दासि प्रातरनुवाकेऽनुच्यन्ते ' इत्याम्नानात् । गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपक्तित्रिष्टुब्जगतीत्येतानि सप्त छन्दासि । चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री, अष्टाविंशत्युत्तरोष्णिक्, एव- मुत्तराधिकाऽनुष्टुवादय । 'गायत्रीभिर्ब्राह्मणस्य दध्यात् त्रिष्टुब्भी राजन्यस्य, जगतीभिवेश्यस्य' ( तै० ब्रा० १११।९।६-७ ' । निरुक्त भी वेद का एक अग है । अर्थ का ज्ञान कराने के लिये निरपेक्ष रूप से पदो की जहाँ व्याख्या की जाती है, उसे निरुक्त कहते है । 'गो ग्मा' इत्यादि से आरम्भ करके 'देवपत्न्यो देवपत्म्य ' यहाँ तक जो पदो का उपदेश किया गया है, वही तीन काण्ड वाला निरुक्त है । इनमे पहला काण्ड नैघण्टुक, दूसरा नैगम और तीसरा दैवत नाम से प्रसिद्ध है । अनुक्रमणिका भाष्य में इसको स्पष्ट किया गया है । एक ही अर्थ को बताने वाले पर्यायवाची शब्दो का समूह जिसमें उपदिष्ट होता है, उसे निघण्टु कहते है । इसमें तीन अध्याय हैं । प्रथम अध्याय में पृथिवी प्रभृति लोक और दिशा, काल प्रभृति द्रव्यो के नाम गिनाये गये हैं । दूसरे में मनुष्य और उसके अवयव आदि द्रव्यो के नाम आये है और तीसरे अध्याय में इन दोनो ही प्रकार के द्रव्यो मे विद्यमान तनुत्व, बहुत्व, ह्रस्वत्व आदि घर्मो के नाम परिगणित है । निगम शब्द वेद का बोधक है । निगम में विद्यमान शब्दो का चतुर्थ अध्याय में विवेचन आता है, जो कि द्वितीय काण्ड का एक भाग है । पचम अध्याय तृतीय काण्ड का भाग है, इसमे देवताओ का विवेचन किया गया है । इन पाँच अध्याय और तीन काण्ड वाले निरुक्त मे स्वतन्त्र रूप से बिना किसी दूसरे शास्त्र का सहारा लिये पदार्थ का विवेचन किया गया है, अतः इसका यह नाम सार्थक है । इसके आगे ' तस्यास्तस्यास्तद्भाव्यमनु भवत्यनुभवति' यहाँ तक बारह अध्याय पर्यन्त यास्क ने जिस ग्रन्थ की रचना की, उसका नाम भी निरुक्त ही है । एक एक पद के जितने भी संभावित अर्थ हो सकते हैं, उन सबका पूरी तरह से निर्वचन होने से इसको निरुक्त कहा गया है । निरुक्त में निपात शब्द के स्वरूप का निर्वचन इस प्रकार से किया गया है कि निपात शब्दो के अर्थ में इधर-उधर का परिवर्तन कर देते हैं । इसी तरह के निर्वचन के अनेको उदाहरण वहाँ दिये गये है । कुछ ब्राह्मण-ग्रन्थो में प्रदर्शित निर्वचन भी यही उदाहृत है । इस तरह से यह सिद्ध किया गया है कि ये निर्वाचन सर्वथा निर्मूल नही हैं । कुछ निर्वचन व्याकरण की दृष्टि से सिद्ध हो जाते हैं, किन्तु सभी जगह ऐसा नही देखा जाता । इसीलिये निरुक्त में कहा गया है कि यह निरुक्त नामक विद्या व्याकरण की पूर्णता के लिये हैं, व्याकरण की कमी को पूरा करने वालो है और निर्वचन के माध्यम से अपनी स्वतन्त्र सत्ता भी स्थापित करती है । इस तरह से वेद मन्त्रो का अर्थ जानने में निरुक्त से भी बडी सहायता मिलती है । छन्दों के ज्ञान का भी वेदाध्ययन में उपयोग है । कहा जाता है कि प्रातरनुवाक मे सात छन्दो का प्रयोग किया जाता है, जो कि चार चार अक्षरो के क्रमशः बढने से बनते है । गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप् बृहती, पक्ति, त्रिष्टुप् और जगती से सात छन्द वेद मे होते हैं । गायत्री छन्द २४ अक्षर का, उष्णिक् २८ अक्षर का, अनुष्टुप् छन्द ३२ अक्षर का" इस तरह से चार चार अक्षरो की वृद्धि
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वेदार्थपारिजात. १६७० भगणयगणादिसाध्यो गायत्र्यादिविवेकश्छन्दोग्रन्थमन्तरेण न मुज्ञेयः । 'यो ह वा अविदितार्षेये च्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण वा याजयति बाध्यापयति वा स्थाणु वच्छेति गतं वा पद्यति प्र वा मीयते पापीयान् भवति । तस्मादेतानि मन्त्रे मन्त्रे विद्यात् । ' ( आर्षेयब्रा० १.१ ) । तथैव यज्ञकालनिर्णयाय ज्योतिषग्रन्थस्याप्युपयोग । 'यज्ञकालार्थसिद्धये' ( वेदाङ्गज्योतिषे ३ ), ' सवत्सर- मेतद्व्रतं चरेत्' ( तै ० आ ० १।३२। १ ), ' वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्य:' (तै० ब्रा ० १ | १ | २| ६| ७ ) इति श्रुते । 'एकाष्टकायां दीक्षेरन् फाल्गुनीपूर्णमासे दीक्षेरन्' ( तै ० ब्रा० ७४१८११, 'प्रातर्जुहोति', 'साय जुहोति', 'कृत्तिकास्वादधीत' ( तै ० ब्रा० १ १ २ १ ) इत्यादिविधीना ज्योतिषशास्त्रज्ञानमन्तराऽर्थज्ञानासम्भवात् 1। तदुक्तम्— 'छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तो कल्पोऽथ पठ्यते । ज्योतिषामयन चक्षुनिरुक्त श्रोत्रमुच्यते ॥ शिक्षा घ्राण तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् । तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥ ' ( पा० शि० ४१-४२ ) । षडङ्गवत् पुराणादीनामपि वेदार्थज्ञानोपयोगित्वम् । तथाहि - 'पुराणन्यायमीमासा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिता । : ' ( ), ' - वेदा स्थानानि विद्याना धर्मस्य च चन्र्दश ॥ याज्ञ० १ ३ इतिहासपुराणाभ्या वेदार्थमुपबृहयेत् । बिभेत्यल्प श्रुताद्वेदो मामय प्रहरिष्यति ॥ ' इति । ऐतरेयतैत्तिरीयकाठकादिशाखासूक्तानि हरिश्चन्द्रनाचिकेताद्युपाख्यानानि धर्मंब्रह्म- बोधोपयोगीनि । उपनिषदुक्ताः सृष्टिस्थितिलयादयस्तत्रेतिहासपुराणेषूपलभ्यन्ते । एवं न्यायशास्त्रे प्रमाणप्रमेयसशय प्रयोजनदृष्टान्तादीना निरूपणात् तदनुसारेण वाक्यमस्मिन्नर्थे प्रमाणम् ॥ पूर्वोत्तरमीमासयोरपि वेदार्थनिर्णये उपयोगः । मन्वत्रिविष्णुहारीतादिप्रोक्तासु स्मृतिषु वेदोक्तसन्ध्यादिविधयः प्रपञ्चिताः । 'शास्त्रयोनित्वात्' ( ब्र ० सू० १ १ ३ ) इति वैयासिकसूत्रीयेण 'शास्त्रादेव प्रमाणाज्जगज्जन्मादिकारणं ब्रह्माधिगम्यते' इति होते जाने से बृहती आदि छन्द बनेंगे । गायत्री छन्द से ब्राह्मण के लिये, त्रिष्टुप् से क्षत्रिय और जगती छन्द से वैश्य के लिये अग्नि का आधान करे । भगण, यगण आदि से जाना जानेवाला गायत्री प्रभृति छन्दो का ज्ञान हमको छन्द शास्त्र के ग्रन्थो के बिना नही हो सकता | आर्षेय ब्राह्मण में बताया गया है कि मन्त्र के छन्द, देवता, ऋषि आदि का बिना ज्ञान प्राप्त किये विनियोग करने वाला व्यक्ति पाप का भागी होता है । अत छन्द का ज्ञान भो बेदार्थ के ज्ञान में परम सहायक है । इसी तरह से यज्ञ के अनुष्ठान का समय निश्चित करने के लिये ज्योति शास्त्र आवश्यक होता है । यज्ञ काल, संवत्सर, वसन्त आदि ऋतु इन सबका ज्ञान ज्योतिष शास्त्र से होता है । तिथि और नक्षत्रों का ज्ञान भी ज्योति शास्त्र से ही होता है । वसन्त आदि ऋतुओं और कृत्तिका प्रभृति नक्षत्रो का ज्ञान बिना इसके हो ही नही सकता । इसलिये पाणिनि शिक्षा में कहा गया है कि छन्द:-शास्त्र वेद के पैर हैं, कल्पसूत्र हाथ, ज्योतिःशास्त्र नेत्र, निरुक्त श्रोत्र (कान ), शिक्षा घ्राण और व्याकरण मुख है । इस तरह से अंगो के साथ वेद का अध्ययन करने पर ही मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है । छः अंगों के समान पुराण प्रभृति ग्रन्थो की भी वेदार्थ ज्ञान में उपयोगिता है । पुराण, न्याय, मीमासा और धर्मशास्त्र, छः अंगो और चार वेदों को मिलाकर विद्या के चौदह स्थान ( भेद) होते है । इन्ही की सहायता से धर्म का भी ज्ञान होता है । शास्त्रो में इतिहास और पुराण की सहायता से वेदो के अर्थ का विस्तार करने की बात कही गई है । साथ ही यह भी कहा गया है कि अल्पश्रुत व्यक्ति से वेद डरता रहता है कि यह कही मेरे ऊपर प्रहार न कर दे, अर्थात् अपने अज्ञान के कारण यह अर्थ का अनर्थ न करने लगे । ऐतरेय, तैत्तिरीय, काठक प्रभृति शाखाओ में वर्णित हरिश्चन्द्र, नचिकेता प्रभृति के उपाख्यान धर्म और ब्रह्म दोनो के ज्ञान में सहायक होते हैं । उपनिषद् मे बताये गये सृष्टि, स्थिति, लय प्रभृति का पुराणों में विस्तार से वर्णन मिलता है । इसी तरह से न्यायशास्त्र में प्रमाण, प्रमेय आदि का निरूपण किया गया है । इनका तथा पूर्व और उत्तर मीमासा के न्यायों का भी वेदों के अर्थ के निर्णय में उपयोग किया जाता है । मनु, अत्रि, विष्णु आदि स्मृति ग्रन्थो में वेदोक्त विधियो का विस्तार बताया गया है । 'शास्त्रयोनित्वात्' इस सूत्र के शाङ्कर भाष्य में बताया गया है कि केवल शास्त्ररूपी प्रमाण से हो जगत् के जन्म आदि के कारणभूत ब्रह्म का ज्ञान हो सकता है । 'उस ब्रह्म को बिना वेदों की सहायता के नही जाना जा सकता' इस श्रुति पर किये गये
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वेदार्थपारिजातः १६७१ ङ्करभाष्येण, ' नावेदविन्मनुते त वृहन्तम्' (तै ० ब्रा० ३| १२| ९/ ७ ) इति श्रुतिममनुगृहोनेन, 'सम्बन्धन्तु वेदस्य धर्मब्रह्मभ्या ; प्रतिणद्यप्रतिपादकभाव.' इति सायणभाष्येण च स्पष्टमेव वेदाना धर्मब्रह्मविषयत्व विज्ञायते । दयानन्देन कथ नैतद्दृष्ट- स्वाश्वर्यम्, 'नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति' इत्याभाणश्चारिताप्यं नीतस्तेन 1 भाष्यकरणशङ्कासमाधानन् यत्तु केनचित् --'वेदे द्वौ काण्डी कर्मकाण्डो ब्रह्मकाण्डश्च । बृहदारण्यकाख्यो ग्रन्थो ब्रह्माण्ड. तद्व्यतिरिक्त पथब्राह्मण सहिता चेत्यनय.. कर्मकाण्डत्वमिति काण्वभाष्यमाश्रित्य बृहदारण्यकातिरिक्तस्य सर्वस्यैव वेदस्य कर्मकाण्डत्व- सायणेन ' इति, तदपि मन्दम्, तत्र बृहदारण्यकपदस्यानन्यशेषब्रह्मपरमन्त्रब्राह्मणपरत्वेनादोषात् । तद्रीत्या मन्त्रब्राह्मणयो- योरपि वेदत्वाविशेषात् । अपि च 'द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च। तत्रापरा A वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद. शिक्षा कल्पा व्याकरण निरुक्त छन्दो ज्योतिषमिति । जथ परा यया तदक्षरमधिगम्यने' [ण्डकोप० १।४-५ ) इति श्रुतेरेव साधनभूतधर्मज्ञानहेतुत्वात् पडङ्गमहिताना वेदानामपरविद्यात्वम्, परमपुरुषार्थ भूतब्रह्म- हेतुत्वादुपनिषदां परविद्यात्वमुक्तम् । तदेव वदना सायणेन किमपराद्धम्? उपनिषत्सु ईशावास्यादयो सन्त्रा अपि न्ति । तलवकाराणा श्वेताश्वतरादीना च मन्त्रा अध्यनन्यशेषा ब्रह्मपरा एव । तत्र यद्यपि बुद्धिशुद्धिद्वारा कर्मोपासन. णामपि मन्त्रब्राह्मणाना ब्रह्मपर्यवसायित्वमेव, ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति' इति श्रुतेः, तथापि तेषामवान्तरतात्पर्येण परत्व नापलपितु शक्यम्, पदवाक्यादिविरोधात् । किञ्च त्वया ब्राह्मण वेदव्याख्यानमभ्युपगम्यते । तत्र च स्पष्टमेवाधिकसख्याकानां मन्त्राणा कमपरत्वमेव ण भाष्य के अनुसार भी यह स्पष्ट हो जाता है कि वेद का धर्म और ब्रह्म के साथ प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध है, अर्थात् धर्म ब्रह्म का ज्ञान वेदो से ही हो सकता है । दयानन्द इस बात को कैसे नही समझ पाये, यह एक आश्चर्य की बात है । 'यह स्थाणु ठ ) का अपराध नही है कि उसको अन्धा नहीं देख पाता इस आभाणक को स्वामी दयानन्द ने यहां सही माने मे चरितार्थ कर गया है । भाष्यविषयक शंका-समाधान ' वेद में दो काण्ड है— कर्मकाण्ड और ब्रह्मकाण्ड | बृहदारण्यक ब्रह्मकाण्ड का ग्रन्थ है । इसके अतिरिक्त सारा शतपथ ब्राह्मण सहिता कर्मकाण्ड के अन्तर्गत आते हैं । यह बात काण्वसंहिता के भाष्य में सायण ने कही है । इसके आधार पर वृहदारण्यक के रिक्त सारे वेद को कर्मकाण्ड के अन्तर्गत सायण ने माना है, ऐसा आक्षेप किया गया है' ( पृ० ३६४ ) | किन्तु यह कथन एक दम है, क्योंकि सायण की उक्ति में बृहदारण्यक का अभिप्राय ब्रह्म के बोधक मन्त्रब्राह्मणात्मक समस्त वाड्मय से है । सायण के मत के र मन्त्र और ब्राह्मण दोनो ही वेद के अन्तर्गत हैं । मुण्डक श्रुति में परा और अपरा विद्या के दो भेद बताकर ऋग्वेद आदि पराविद्या तथा ब्रह्मविद्या को परा विद्या कहा गया है । यह श्रुति हो ब्रह्मविद्या के साधनभूत धर्म का भी ज्ञान कराती है । तरह से षडङ्ग सहित चारो वेद अपर विद्या के और परम पुरुषार्थभूत ब्रह्मज्ञान के उपदेशक उपनिषद् पर विद्या के अन्तर्गत आते सायण ने इसी बात को ऊपर के शब्दों मे कहा है, तो उसने क्या अपराध किया है? उपनिषदों में ईशावास्य प्रभृति मन्त्रभाग रिगणित हैं । तलवकार और श्वेताश्वतरीय शाखाओ के मन्त्र भी ब्रह्म से भिन्न अन्य किसी विषय को नही छूते । यद्यपि गण्ड और उपासनापरक मन्त्र और ब्राह्मणभाग भी बुद्धि की शुद्धि के द्वारा ब्रह्मज्ञान मे हो विनियुक्त होते हैं, क्योकि श्रुति मे गया है कि सारे वेद उसी पद का विवरण देते है, तो भी उनका अवान्तर तात्पर्य धर्म के प्रतिपादन से हैं, इसका अपलाप किया जा सकता । ऐसा करने पर पदों और वाक्यों की अर्थ पतिपादन शैली से स्पष्ट विरोध होगा, जो कि उचित नहीं माना नकता । एक बात यह भी है कि आप तो ब्राह्मण भाग को वेद की व्याख्या मानते है । ब्राह्मण ग्रन्थों में स्पष्ट हो अधिक संख्या
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१६७२ वेदार्थपारिचातः दृश्यते । ब्रह्मात्मबोधका अपि मन्त्रा यदि क्वचिद्विनियोगेनान्यपरास्तदा प्रत्यक्षादिविरोधे तेषा नाद्वितीयब्रह्मबोधकत्वं सम्भवति, अन्यपरत्वेन निर्बलत्वात् । तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयासि' इति न्यायात् । तत एव ईशावास्यादीनामन्य- त्राविनियुक्तत्वाद् ब्रह्मपरत्वेन तत्प्रधानत्वात् प्रत्यक्षादिबाधेनाप्यद्वितीयब्रह्मबोधकत्वं सम्भवति । केनचिद्यदुक्तम् --' ईशावास्यादयो मन्त्रा. कर्मसु विनियुक्ताः, मन्त्रत्वात् इषे त्वादिमन्त्रवत्' इति, तत्तुच्छम्, विनियोजक प्रमाणसत्त्वस्य तत्रोपाधित्वेनोपाध्यभावेन साध्याभावानुमानेन तद्विरोधात् । ईशावास्यादयो मन्त्रा. कर्मस्व- विनियुक्ताः, विनियोजकप्रमाणासत्त्वात् ॥ न च लिङ्गबलेन विनियोगकल्पनम् तेषामकर्मशेषस्यात्मनो याथात्म्यप्रतिपाद- कत्वेन कर्मकर्तृदेवतादिप्रतिपादकत्वासम्भवात् । यच्च ' इन्द्रं मित्र वरुणम्' इति मन्त्रस्यार्थोऽन्यथैव वर्णित, तथाहि -'तत्रेन्द्रशब्दो विशेष्यतया गृहीतः, मित्रादयश्च विशेषणतया । अत्र खलु विशेष्योऽग्निशब्द । इन्द्रादीना विशेषणाना सङ्गेऽन्वितो भूत्वा पुन. स एवब्रह्म- विशेषणं भवति । एवमेव विशेष्यं प्रति विशेषणं पुनः पुनरन्वित भवति । न चैव विशेषणम् । एवमेव शत सहस्र वैकस्य विशेष्यस्य विशेषणानि स्युर्यत्र तत्र विशेष्यस्य पुनरुच्चारण भवति, विशेषणस्यैकवारमेवेति 1। तथैवाग्रे परमेश्वरेणाग्निशब्दो द्विरुच्चारितो विशेष्यविशेषणाभिप्रायत्वात् । इद सायणाचार्येण नैव बुद्धम् । निरुक्तकारेणाप्यग्निशब्दो विशेष्य- विशेषणत्वेनैव वर्णितः । तद्यथा - ' इममेवाग्नि महान्तमात्मानमेकमात्मानं बहुधा मेवाविनो वदन्तीन्द्रं मित्रं वरुण स चैकस्य में मन्त्रो की कर्मकाण्डपरक व्याख्या की गई है । ब्रह्मात्मतत्व के बोधक मन्त्र भी यदि किसी विनियोग के अनुसार अन्य कार्य युक्त है, तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो का विरोध होने से उनकी अद्वितीय ब्रह्मबोधकता नही सभव हो सकती, क्योकि अन्यपरक होनेमे विनि- प्रत्यक्ष आदि प्रमाण से निर्बल हो जायँगे । तत्प्रधान वाक्य अतत्प्रधान वाक्यो से निर्बल माने जाते है । इसलिये ईशावास्य से वे का अन्यत्र कही विनियोग न होने से और ब्रह्म मे ही प्रधानता होने से प्रत्यक्ष प्रभृति प्रमाणो से विरोध होने पर भी उनकोप्रभृति मन्त्रो बाघ कर अद्वितीय ब्रह्म की बोधकता ही उनकी मानी जायगी । 'ईशावास्य प्रभृति मन्त्रो का विनियोग कर्म के लिये होता है, क्योकि ये भी ' इषे त्वा' प्रभृति मन्त्रो ( ' इस अनुमान का प्रयोग इसलिये गलत होगा कि इसमे विनियोजक प्रमाणसत्त्व उपाधि । साध्याभाव कर्मकीके तरहलिये मन्त्र ही हैं । • ) अभाव को सिद्ध करने वाले दूसरे उपाधिरहित अनुमान से इसका विरोध भी होगा कि ईशावास्य प्रभृति विनियोग का, नही है क्योकि इनको कर्म मे विनियुक्त करने वाले वचन उपलब्ध नहीं है । लिंग के आधार पर भी मन्त्र कर्म के लिये विनियुक्त,, सकती क्योकि ये मन्त्र किसी कर्म के अंग नही है अतः ये केवल आत्मतत्त्व के वास्तविक स्वरूप विनियोग की कल्पना नही की जा को बताते हैं, किसी कर्म, कर्ता या देवता का प्रतिपादन इनसे नही किया जा सकता । स्वामी दयानन्द सायणाचार्य पर पुनः आक्षेप करते है - ' ऐसे ही सायणाचार्य ने ' इन्द्रं मित्रं ०, ' भ्रान्ति से बिगाड़ा है क्योकि उसने इस मन्त्र मे विशेष्य और विशेषण को अच्छी तरह से न समझ कर इस मन्त्र का अर्थ भी, वर्णन किया और मित्र आदि शब्द उसके विशेषण ठहराये है । यह उनको बडा भ्रम हो गया क्योकि मन्त्रइन्द्रमे शब्दअग्निकोशब्दतो विशेष्यविशेष्य करकेऔर इन्द्र आदि शब्द उसके विशेषण है । इसलिये विशेषणो में से एक का विशेष्य के साथ अन्वय होकर विशेष्य का अन्वय कराना होता है और विशेषण का एक बार ही विशेष्य के साथ अन्वय होता है । पुन दूसरे दूसरे विशेषण के साथ सैकडों या हजारो विशेषण होते हैं, वहाँ वहाँ भी विशेष्य का सैकडों या हजारो बार उच्चारण होता इसी प्रकार जहाँ जहाँ एक के कहे हैं । यह बात सायणाचार्य ने नही की इच्छा से ईश्वर ने अग्नि शब्द का दो बार उच्चारण किया और अग्नि आदि ब्रह्म के नाम है । वैसे ही इस मन्त्र में विशेष्य जानी । इससे उनकी यह भ्रान्ति सिद्ध होती है । इसी प्रकार निरुक्तकार ने भी अग्नि शब्द को विशेष्यहो वर्णन किया है । 'इममेवाग्नि' निरुक्त के इस वाक्य में अग्नि और इन्द्र इत्यादि नाम एक सद्वस्तु ब्रह्म के ही माने गये है, क्योकि ' ( ) और अग्नि आदि ब्रह्म के नाम है पृ० ३६६-६७ । किन्तुयह सब अज्ञान का ही प्रसाद इन्द्र आदि शब्द अग्नि के विशेषण'निग्रहस्थानं माना जाता है, जहाँ पर कि कोई दोष विद्यमान न हो तो भो दोष दिखायाहै ।जायऐसे ही स्थलो पर अपर्यनुयोज्यानुयोग नामक । इन्द्र पद प्रथम उपस्थित है, अतः
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वेदार्थपारिजातः १६७३ सद्वस्तुनो ब्रह्मणो नामास्ति । तस्मादग्न्यादीनीश्वरस्य नामानि सन्तीति बोध्यम्' ( पृ० ३६४-३६५ ) इति, तदप्यज्ञान- विजृम्भितम् अपर्यनुयोज्यानुयोगेन निग्रहस्थानपतितत्वात् । प्रथमोपस्थितत्वात् प्रमाणसङ्गतत्वाच्च सायणेनेन्द्रपदमेव विशेष्यमुक्तम् । ' इन्द्रं मित्र सोयम्' इत्यनुक्रमणीवचनात् सूर्योऽस्य मन्त्रस्य देवतेति सायणेन सूर्यपरोऽयं मन्त्रो व्याख्यातः । सूर्यो महानात्मा हिरण्यगर्भ एव, 'एकैव महानात्मा देवता स सूर्य इत्याचक्षते' इत्युक्तत्वात् । तथाहि - अमुमादित्यमैश्वर्य- विशिष्टमिन्द्र प्राहुः, तथा मित्रं प्रमीतेर्मरणात् त्रातारमहरभिमानिन तन्नामकं देवं प्राहुः । पापस्य वारकत्वाद् वरुणं रात्र्यभिमानिनं देवमाहुः, तथाग्निमङ्गनादिगुणविशिष्टमेतन्नामकमाहुः । अथो अपि । अयमेव दिवि भवो दिव्यः सुपर्णः सुपतनः । गरुत्मान् गरणवान् पक्षवान् वा । एतन्नामको यः पक्ष्यस्ति सोऽप्ययमेव । कथमेकस्य नानात्वमिति चेत् उच्यते-- मु- मादित्यमेकमेव वस्तुतः सन्तं विप्रा मेधाविनो देवतातत्वविदो बहुधा वदन्ति तत्तत्कार्यकारणेन इन्द्राद्यात्मान वदन्ति । किञ्च, | तमेव वृष्ट्यादिकारणं वैद्युतमग्नि मं नियन्तार मातरिश्वानमन्तरिक्षे श्वसन्त वायुमाहुः सूर्यस्य ब्रह्मणोऽनन्यत्वेन सार्वात्म्ययुक्तं भवति । सायणस्यानभिज्ञत्वकथन च ' अशक्तास्तत्पदं गन्तु ततो निन्दा प्रकुर्वते' इत्युक्तिमेवानुसरति । दयानन्दो यं पक्षं कथयति सोऽपि तेन दयानन्दात् पूर्वमेव लिखितः । अत्र ये केचित् 'अग्निर्वा सर्वा देवाः' ( ऐ० ब्रा० २१३ ) इत्यादिश्रुतितोऽयमेवाग्निरुत्तरे अभि ज्योतिषी इति मत्वा अग्नेरेव सार्वात्म्यप्रतिपादकोऽयं मन्त्र इति wed वदन्ति । तत्पक्षेऽग्निशब्द उद्देश्यः । तमग्निमुद्दिश्येन्द्राद्यात्मकत्वकथनम् । अयं मन्त्रो निरुक्ते एवं व्याख्यात इत्युक्त्वा 'इममेवाग्नि महान्तमात्मानमेकमात्मानं बहुधा मेधाविनो वदन्ति इन्द्रं मित्रं वरुणमग्नि दिव्यं न गरुत्मन्तं दिव्यो गरुत्मान् गरणवान् गुर्वात्मा महात्मेति वा । तस्मात् सायण इममर्थं न बुद्धवानिति दयानन्दोतिर्मूर्खजनप्रनारणायैव । वस्तुतस्तु अन्य प्रमाणों का भी सहारा लेकर सायण ने इस मन्त्र मे इन्द्र को ही विशेष्य माना है । अनुक्रमणी के अनुसार इस मन्त्र का देवता सूर्य है, अतः सायण ने इस मन्त्र की व्याख्या सूर्यपरक ही की है । यहाँ सूर्य महान् आत्मा हिरण्यगर्भ से अभिन्न है । श्रुति में इस सूर्य को महान् आत्मा कहा गया है । मन्त्र का अर्थ यह है कि इस आदित्य ( सूर्य ) को ही ऐश्वर्यं विशिष्ट इन्द्र कहा जाता है और इसी को दिन का अभिमानी देवता मित्र कहा जाता है । इसको मित्र इसलिये कहते हैं कि यह देवता मृत्यु से जीवो की रक्षा करता है । इसी को पापो से निवृत्त करने वाला देव वरुण कहा जाता है, जो कि रात्रि का अभिमानी देवता है । इसी को प्रकाश गुण वाला अग्नि भी कहा जाता है । यही आकाश में उत्पन्न होने वाला, आकाश मे अप्रतिहत विचरण करने वाला सुपर्ण, गरुड है, जो कि विषधर सर्पों को निगल जाने वाला और पक्षियो में श्रेष्ठ माना जाता है । एक ही सूर्य इन नाना रूपों में कैसे दिखाई पड़ सकता है? इस शंका का समाधान करने के लिये ही मन्त्र में बताया गया है कि यद्यपि यह आदित्य ( सूर्य ) एक ही है, किन्तु मेघावी ब्राह्मण, जो कि देवताओं के रहस्य को जानने वाले हैं, इस सूर्य का कार्य और कारण के भेद के अनुसार इन्द्र प्रभृति अनेक रूपों में देखते हैं । जैसे कि जब यह सूर्य अग्नि का कारण बनता है, तब वह विद्युत् स्वरूप अग्नि बन जाता है, प्राणियो का नियमन करने पर यम और अन्तरिक्ष में बहने पर मात-रिश्वा ( पवन ) कहलाने लगता है । सूर्य ब्रह्म से भिन्न नही है । इस तरह से सूर्य की यह सर्वात्मकता का प्रतिपादन उचित ही है । सायण को वेदार्थ का ज्ञान नही है, ऐसा कहना 'अंगूर खट्टे है ' वाली कहावत को चरितार्थ करना है । जिस पक्ष की चर्चा दयानन्द करते है, वह भी उनसे बहुत पहले स्वयं सायण के द्वारा ही बता दिया गया है । कुछ लोगो बा कहना है कि 'अग्नि ही सभी देवताओं का प्रतिनिधि है' इस श्रुति के अनुसार यह अग्नि ही सूर्य आदि ज्योतियों का भी प्रकाशक है, अतः इस मन्त्र मे भी अग्नि की सर्वात्मकता का ही प्रतिपादन हुआ है । इस पक्ष मे प्रथम अग्नि शब्द उद्देश्य है । इसी अग्नि को उद्दिष्ट कर उसको इन्द्र, मित्र आदि देवताओ के रूप में प्रतिपादित किया गया है । यह मन्त्र निरुक्त में इस प्रकार व्याख्यात है, ऐसा कहते हुए सायण ने लिखा है कि इसी अग्नि को, महान् आत्मा के रूप में एक होते हुए भी मेघावी ब्राह्मण अनेक रूपों में इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य गरुत्मान् के रूप में वर्णित करते हैं । इस तरह से सायण इस अर्थ को नही जानते थे, ऐसा कहना केवल मूर्ख लोगो को बहकाना है । वास्तव में हिरण्यगर्भ ही एकमात्र देवता है । उसी का कहीं आदित्य के रूप में और कही अग्नि के रूप में वर्णन मिलता है । इसलिये निरुक्त की व्याख्या जैसे ऋषि प्रणीत है, उसी तरह से ऋषि प्रणोत अनुक्रमणी के आधार पर की गई सायण की २१०
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वेदार्थपारिजातः १६७४ । तथैव हिरण्यगर्भ एवेको देवः । स एव क्वचिदादित्यरूपेण कचिदग्निरूपेण वर्णितः । अतो निरुक्तब्याख्यानमप्यार्षम् ० १।४।६ ) सायणव्याख्यानमप्यनुक्रमणीसम्मतत्वादार्षमेव । 'एतस्यैव सा विसृष्टि: ', 'एष उ ह्येव सर्वे देवा:' ( बृ०' उ( बृ० ११४ ) इति हिरण्यगर्भस्यैव सर्वदेवरूपत्वमुक्तम् । न च स एव सर्वेश्वरोऽपि, 'सोऽबिभेत् तस्मादेकाकी न रमते । न त्वग्नेः परमात्मत्वमत्रइति तत्रैव तस्य भयारत्यादिश्रवणात् । अग्नेरपि हिरण्यगर्भरूपत्वेन सार्वात्म्यमुच्यते विवक्षितम् । यास्कोऽपीममेवाग्नि महान्तमात्मानमिति हिरण्यगर्भमेवाग्निमाह । न परमात्मानम् । महान् महत्तत्त्वं हिरण्यगर्भ एव -'एतमेके वदन्त्यग्नि मनुमन्ये प्रजापतिम्', ' स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदिकर्ता७| १८ ), ' ', ' (स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत ॥ इति मनुरपि । यस्मै हविनिरूप्यते अयमेव सोऽग्निरिति नि० ' ', ' ', ' अग्नि प्रणय' इत्यादिभिरग्निशब्दस्य पार्थिवज्योतिषैव सम्बन्धात् । आग्नेयमष्टाकपालं निर्वपेत् अग्निमानय 'न च त्वद्रीत्या काचिदग्निर्देवता स्वीकृता न वा तदर्थं हविर्निरुध्यते त्वन्मते होमादेर्वायुशुद्धयर्थमेव प्रयुक्तत्वात् । तस्मान्निरुक्तविरुद्धमेव तन्मतम् । - यदुक्तम् — ' विशेष्योऽग्निशब्दो विशेषणानां सङ्गेऽन्वितो भूत्वा पुनः स एव सद्वस्तुब्रह्मविशेषणं भवति' इति, तत्तुच्छम्, अग्निशब्दस्य मुख्यपरमात्मपरत्वे सद्विशेषणत्वानुपपत्तेः । यदि सदेव विशेष्यं तदा यथेन्द्रादिपदानि विशेषणानि, तथैवाग्निपदमपि विशेषणमेव न विशेष्यम् । यत्तु - विशेष्यं प्रति विशेषण पुनः पुनरन्वितं भवति न चैव विशेषणम् । यत्र शतं सहस्रं वेकस्य विशेष्यस्य विशेषणानि स्युस्तत्र विशेष्यस्य पुनः पुनरुच्चारणं विशेषणस्यैकवारमेव । तथैवात्र मन्त्रे परमेश्वरेणाग्निशब्दो द्विरुच्चारितो विशेषणविशेष्याभिप्रायेणैव ' इति, तदपि न विचारचारु, विप्रतिषिद्धत्वात् । तथाहि नहि क्वचिदपि विशेष्यस्य मूलवचने प्रतिविशेषणमुच्चारणं दृश्यते । व्याख्यातारस्तु बोधसौकर्याय क्वचिद् विशेष्यं प्रति- व्याख्या भी आर्षपरम्परा के अन्तर्गत ही आवेगी । बृहदारण्यक उपनिषद् में हिरण्यगर्भ को सभी देवताओ का स्वरूप माना है, किन्तु है ।साथ ही वह सभी का स्वामी भी नही है, क्योकि उसी स्थल पर उस हिरण्यगर्भ मे भय, अरति आदि भावों की सत्ता भी प्रतिपादित इसी तरह से अग्नि को हिरण्यगर्भ का ही प्रतिनिधि माना जाता है, परमात्मा नही । हिरण्यगर्भ के रूप में ही अग्नि की सर्वात्मकता भी प्रतिपादित है । यास्क भी इस अग्नि की सर्वात्मकता हिरण्यगर्भ के रूप मे ही मानते हैं, परमात्मा के रूप में नही । महान् अर्थात् महत्तत्त्व का प्रतिनिधि हिरण्यगर्भ है । 'इसी को कुछ लोग अग्नि, मनु, अथवा प्रजापति कहते है ', 'वही प्रथम शरीरधारी कहलाता हैं, इसी को पुरुष कहते हैं । सभी प्राणियो की सृष्टि करने वाला ब्रह्मा इन सबसे पहले विद्यमान था' इस तरह से मनुस्मृति में इसी हिरण्यगर्भ का प्रतिपादन किया गया है । 'जिसको हवि अर्पित की जाती है,J वही यह अग्नि देवता है' इस निरुक्त वाक्य में तथा अन्य अनेक श्रुतियों में अग्नि शब्द का पार्थिव ज्योति से ही सम्बन्ध बन सकता है, परमात्मा के वाचक अग्नि शब्द से नही । आपके मत के अनुसार तो कोई अग्नि देवता मानी नहीं जाती, जिसके लिये कि हवि अर्पित की जाय । आप तो केवल बायु शुद्धि के लिये ही यज्ञ-याग आदि का विधान मानते हैं । इस प्रकार आपका मत यहाँ उद्धत निरुक्त के वाक्य से सर्वथा विरुद्ध, अत एव अप्रामाणिक माना जायगा । अग्नि शब्द को विशेष्य मानकर इन्द्र प्रभृति विशेषणो के साथ उसके सम्बन्ध को जो बात आपने कही है, वह भी गलत है, क्योकि अग्नि शब्द यदि मुख्य परमात्मा का वाचक माना जाता है, तो वहाँ विशेषण के रूप मे सत् शब्द की कोई आवश्यकता नही रह जाती । यदि सत् को ही विशेष्य माना जाय, तब तो इन्द्र प्रभृति पद जैसे विशेषण है, उसी तरह से अग्नि पद भी विशेष्य न होकर विशेषण के रूप में ही माना जायगा । आगे आपने विशेष्य के प्रति विशेषण के बार बार अन्वित होने की बात कही है, किन्तु विचार करने पर यह भी जँचती नहीं, क्योकि यह बात परस्पर विरुद्ध है । किसी भी मूल वचन में कही भी विशेष्य का बार बार उच्चारण I. नहीं किया जाता कुछ व्याख्याकार हो अर्थ को सरलता से समझाने के लिये प्रत्येक विशेषण के साथ विशेष्य को जोड़ देते हैं । 'द्वा सुपर्णा ' इस मन्त्र में सुपर्ण पद विशेष्य है, इसका एक बार ही उच्चारण किया गया है । यदि विशेष्य का बार बार उच्चारण अभिप्रेत होता, तो इस मन्त्र में भी अग्नि शब्द का उच्चारण इन्द्र आदि पदों के साथ अनेक बार किया जाना चाहिये था । यहाँ तो
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वेदार्थपारिजातः १६७५ विशेषणमुच्चारयन्ति । 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' ( ऋ० सं० १११६४/२० ) इत्यादी सुपर्णपदस्य विशेष्यस्य सकृदेवोच्चरित-त्वात् । अन्यथात्रापि प्रतिविशेषणमग्निशब्दः परमेश्वरेणोच्चार्येत, किमर्थं द्विरेवोच्चारितम्? यदि त्विन्द्रादयोऽग्नेविशेषणानि, अग्निस्तु सतो विशेषणमिति विवक्षया द्विरग्निशब्दोच्चारणमित्युच्येत 1 तदपि न शोभनम्, सदग्निशब्दयोरुभयोरपि परमात्मवाचकयोर्विशेष्यविशेषणभावानुपपत्तेः । नहि घटः कुम्भ इत्यत्र सम्भवति विशेषणविशेष्यभावः । यदि सदेव ब्रह्मेति, तदेव विशेष्यं तन्द्रादिवद् अग्नेरपि विशेषणत्वमेवेति किमर्थं त प्रतीन्द्रादयो विशेषणानि भवेयु., अग्नेरप्यप्राधान्याविशेषात् । एकं प्रधानमेव विशेष्य भवति, तत्प्रत्येव सर्वाण्यप्रधानानि विशेषणान्येव भवन्ति । नहि तेषु विशेष्यविशेषणभावः । तथात्वे ब्रह्मपर एवाग्निशब्द इति रिक्तं वच । यथाग्निः सद्वस्तुनो नाम, तथैवेन्द्रादयोऽपि तन्नामान्येव । सिद्धान्ते त्विन्द्रपदेनादित्यो ज्योतिः, प्रथमाग्निशब्देन पार्थिवोऽग्निः, द्वितीयाग्निशब्देन वैद्युत ज्योतिर्गृह्यते । सत्पदं तु विशेष्यस्य विशेषणमेव । एकमेव सन्तमग्नि वादित्यं वा विप्रा मेधाविनो बहुधा वदन्ति । ' इन्द्रं मित्र वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य. स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ॥' ( ऋ० सं० १ ९ ६४।४६ ) इति । यदुक्तम् G –' सर्वैरपि परमेश्वर एव हूयते । तथा राज्ञः पुरोहितस्तदभीष्ट सम्पादयति, यद्वा यज्ञस्य सम्बन्धिनि पूर्वभागेऽवस्थितम् ' इत्युक्तम्, इदमपि पूर्वापरविरुद्धम् । ' सर्वैर्नामभिः परमेश्वर एव हूयते चेत्पुनस्तेन होमसाधकाहवनीयरूपेणा-वस्थितो भौतिकोऽग्निः किमर्थों गृहीतः' (पृ० ३६८ ) इति, तदपि तदीयतात्पर्यानभिज्ञानमूलकम्, अग्निशब्दस्य पर्यवसानदृष्ट्या परमेश्वरत्वेऽप्यग्निशब्दस्य मुख्योऽर्थः पार्थिवोऽग्निरेव ' अग्नि प्रणय', 'अग्निमानय' इत्यादिव्यवहारस्य तत्रैव प्रवृत्ते ', प्रसिद्धिबाधस्यान्याय्यत्वात्, शास्त्रचोदितानां धवखदिरपलाशानामपि लोकप्रसिद्धित एव प्रतीयमानत्वात् । आहवनीयादि- केवल दो बार अग्नि पद का उच्चारण किया गया है, ऐसा क्यो? यदि आप कहे कि इन्द्र प्रभृति शब्द अग्नि के विशेषण है और स्वयं अग्नि शब्द 'सत्' का विशेषण है, इन दो बातो को बताने के लिये अग्नि शब्द का उच्चारण दो बार किया गया है, तो यह कहना भी इसलिये ठीक नही है कि जब सत् और अग्नि ये दोनो ही शब्द परमात्मा के वाचक है, तो इनका परस्पर विशेष्य - विशेषणभाव कैसे बन सकेगा? घट और कुम्भ शब्द का परस्पर विशेष्य-विशेषणभाव नही बनता । यदि सत् ही ब्रह्म है और वही विशेष्य भी है, तो इस अवस्था में इन्द्र प्रभृति शब्दों के समान अग्नि शब्द भी विशेषण ही माना जायगा, तब इन्द्र प्रभृति शब्द इस अग्नि के विशेषण कैसे सभीहोगे? इस अवस्था में तो इन्द्र प्रभृति की तरह अग्नि भी अप्रधान ही है । एक प्रधान ही विशेष्य माना जाता है, इसके अतिरिक्तयह कथन अप्रधान पदार्थ विशेषण ही होते हैं । इन अप्रधानो मे परस्पर विशेष्य-विशेषणभाव नही बन सकता । इस स्थिति में आपका मिथ्या सिद्ध हो जाता है कि अग्नि शब्द यहाँ ब्रह्म का वाचक है । जैसे अग्नि सद्वस्तु ब्रह्म का नाम है, उसी तरह से इन्द्रद्वितीयप्रभृतिअग्निभी उसी के नाम है । हमारे मत के अनुसार तो इन्द्र पद से आदित्य नामक ज्योति, प्रथम अग्नि शब्द से पार्थिव अग्नि और शब्द से विद्युत् सम्बन्धी ज्योति का ग्रहण किया जाता है । 'सत्' पद भी विशेषण ही है, विशेष्य नहीं । अग्नि अथवा आदित्य यद्यपिसंमतएक ही हैं, तो भी मेधावी ब्राह्मण उनका अनेक रूपों में वर्णन करते हैं । ' इन्द्रं मित्रं० ' इत्यादि ऋग्वेदीय मन्त्र का इस तरह से सायण अर्थ ही उचित है । स्वामी दयानन्द आगे लिखते हैं- 'ऐसे सायणाचार्य ने और भी बहुत से मन्त्रो की व्याख्याओं में शब्दों के अर्थ उलटे किये हैं, तथा उन्होने --- 'सब पुरुषों से परमेश्वर ही पुकारा जाता है, जैसे राजा का पुरोहित राजा के हित का ही काम सिद्ध करता है । अथवा जो अग्नि यज्ञ के सम्बन्धी पूर्व भाग में ( आहवनीय के रूप में ) हवन करने के लिये ( स्थित ) है, ऐसा कहा है । यह सायणा-चार्य का कथन अयोग्य और पूर्वापरविरोधी होकर आगे पीछे के सम्बन्ध को तोडता है, क्योंकि जब सब नामों से परमेश्वर का ही ग्रहण करते हैं, तो फिर जिस भौतिक अग्नि में हवन करते हैं, उसको किस लिये ग्रहण किया है?" ( पृ० ३६७ ), किन्तु यह कथन भो सायण के अभिप्राय को ठीक से समझ न पाने के कारण है, क्योकि अग्नि शब्द यद्यपि पर्यन्ततः ईश्वर का वाचक है, किन्तुकाउसकाबाघ कभीमुख्य अर्थ तो पार्थिव अग्नि ही होता है, अग्निप्रणयन आदि व्यवहार इस पार्थिव अग्नि में ही सम्पन्न होते हैं । प्रसिद्धि उचित नहीं माना जाता । शास्त्र में उपदिष्ट घन, खदिर आदि शब्दों का भी अर्थ लोकप्रसिद्धि के अनुसार ही किया जाता है ।
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वेदार्थपारिजातः १६७६ शब्दाना त्वाधानसंस्कृतेऽग्नौ प्रयोगः | 'आग्न्येयोऽष्टाकपालो भवति' इत्यादावग्न्यधिष्ठात्री देवता गृह्यते, केवलस्य भौतिकस्य पार्थिवाग्नेर्हविर्भाक्त्वानुपपत्ते, ' अभिमानिव्यपदेशस्तु' ( व्र ० सू० २ ११५ ) इति न्यायाच्च । देवताश्च प्राणपर्यवसायिन्य, प्राणस्तु परमेश्वरपर्यवसायी । परमेश्वरेण देवा अभिन्नस्तद्विभूतित्वात् परस्परं च भिन्नाः । यथा मृदा घटादयोऽभिन्नाः परस्परं तु भिन्ना इत्यसकृदुक्तत्वात् । अतो मन्त्रेषु क्वचित्परमात्मपरोऽग्निशब्द, क्वचिद्देवतापरः क्वचिच्चाहवनीयादिपर एवेति सुष्ठुक्तम् । यद्वा —यज्ञस्य सम्बन्धिनि पूर्वभागेऽवस्थितम् । एवमिन्द्रादिशब्देनापि क्वचित्परमेश्वरः क्वचिद्देवताविशेषो , गृह्यते । इन्द्रादिनामभिरपि परमेश्वर एवोच्यते तथापि परमेश्वरस्यैवेन्द्रादिरूपेणाप्यवस्थानादविरोध इत्यविरोधो युक्त एव । यदुक्तम्-' यदीन्द्रादिनामभि. परमेश्वर एवोच्येत, तर्हि परमेश्वरस्येन्द्रादिरूपेणावस्थितिरनुचिता, ' अज एकपात्' ( ऋ० सं० ७।३५।१३ ), ' स पर्यगाच्छुक्रमकायम्' ( वा० सं ० ४०१८ ) इत्यादिभिः परमेश्वरस्य जन्मरूपवत्त्वशरीरधारणादि- ',, ' ' ( ), ' ' ( ) निषेधात् इति तदपि तुच्छम् अजायमानो बहुधा विजायते वा० स० नमो हिरण्यबाहवे वा ० सं ० ':' ( ) नीलग्रीवाः शितिकण्ठा वा० स० इत्यादिभिरजस्यापि परमेश्वरस्य मायया बहुभवनरूपवत्त्वादिश्रवणेन तदविरोधस्यासकृदुक्तत्वात् । यदपि महीधरभाष्यदोषप्रदर्शनाय 'गणाना त्वा गणपतिम्' ( वा० स० ) इति मन्त्रस्य भाष्यमुद्धृतम्, तदप्युप- हासास्पदमेव, तत्रादोषस्य प्रदर्शितत्वात् । अस्मिन् मन्त्रे गणपतिशब्दादश्वो वाजी ग्रहीतव्यः । तद्यथा महिषी यजमानस्य पत्नी यज्ञशालाया पश्यता सर्वेषामृत्विजामश्वसमीपे शेते । शयाना सत्याह हे अश्व! गर्भध गर्भ दधाति गर्भध गर्भधारकं आहवनीय शब्द का प्रयोग आधान के द्वारा संस्कृत अग्नि मे किया जाता है । 'आग्नेय' प्रभृति शब्दो मे अग्नि के अधिष्ठाता देवता का ग्रहण होता है, क्योकि केवल भौतिक अग्नि हवि का वाहक नही हो सकता । ब्रह्मसूत्र के अनुसार ऐसे स्थलो पर उन उन जड़ पदार्थों के अभिमानी देवता का ग्रहण किया जाता है । सभी देवताओं का पर्यवसान प्राण में और प्राण का पर्यवसान परमेश्वर में होता है । इस परमेश्वर से सब देवता अभिन्न इसलिये है कि ये सब उसी की विभूति है । ये देवता परस्पर में एक दूसरे से भिन्न है । जैसे मिट्टी से सभी घडे अभिन्न होते हुए भी परस्पर भिन्न होते है । इस बात को अनेक स्थलो पर कहा जा चुका है । इसलिये मन्त्रों में कही पर अग्नि शब्द परमात्मा का कही देवता का, कही आहवनीय अग्नि का और कही पार्थिव अग्नि का वाचक माना जाता है । इसलिये सायण का उक्त कथन उचित ही है । अथवा जैसे अग्नि शब्द कही आहवनीय अर्थ में प्रयुक्त होता है, कही परमात्मा के अर्थ में, उसी तरह से इन्द्र प्रभृति शब्दों से भी कही परमेश्वर तथा कही देवताविशेष का बोध होता है । इन्द्र प्रभृति नामों से ,भी परमेश्वर का ही बोध होता है । परमेश्वर हो तो इन्द्र प्रभृति के रूप में भी विद्यमान हैं अतः इनमें कहीं भी परस्पर विरोध विद्यमान नही । इस पर स्वामी दयानन्द कहते है -'जब इन्द्र आदि नामो से परमेश्वर का ही ग्रहण है, तो वह निराकार, सर्वशक्ति-मान्, व्यापक और अखण्ड होने से जन्म लेकर भिन्न भिन्न व्यक्तिवाला कभी नही हो सकता, क्योकि वेदों में परमेश्वर का एक, अज और अकाम अर्थात् शरीर सम्बन्ध रहित, आदि गुणो के साथ वर्णन किया है । इससे सायणाचार्य का यह कहना सत्य नही हो सकता' ( पृ० ३६७ ) । किन्तु उनका यह कथन भी एकदम गलत है, क्योकि 'अजायमानो' प्रभृति श्रुतियाँ परमेश्वर को अजन्मा मानती हुई भी माया के सहारे उसके अनेक कल्पित जन्मी और रूपों की सत्ता स्वीकार करती है । इस तरह से स्वामी दयानन्द के इस प्रदर्शित विरोध का समाधान अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर किया जा चुका है । स्वामी दयानन्द ने महीधर कृत भाष्य में दोष दिखाने के लिये ' गणानां त्वा' प्रभृति मन्त्र के भाष्य को उद्धृत किया है, यह भी उपहासास्पद ही है । इसमें कोई दोष नहीं है, इस बात का प्रतिपादन हमे पहले ही कर चुके है । स्वामी दयानन्द लिखते हैं-'इस मन्त्र में महीधर ने कहा है कि गणपति शब्द से घोडे का ग्रहण हैं । सो देखो महीघर का उलटा अर्थ कि 'सब ऋत्विजों के सामने यजमान को स्त्री घोड़े के पास सोवे और सोती हुई घोडे से कहे कि हे अश्व! जिससे गर्भधारण होता है, ऐसा जो तेरा चोर्य है,
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वेदार्थपारिजातः १६७७ रेतः, अहम् आ अजानि आकृष्य क्षिपामि । त्वं च गर्भधं रेत आ अजासि आकृष्य क्षिपसि' इत्युद्धृत्य 'अथ सत्योऽर्थं.' इत्युक्त्वा 'गणानां त्वा गणपतिं हवामह इति ब्राह्मणस्पत्यम्', ' ब्रह्म वे बृहस्पतिर्ब्रह्मणैवैन तद्भिषज्यति, प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामेति' ( ऐ० १२१ ), प्रजापतिर्वै जमदग्नि सोऽश्वमेधः । क्षत्र वाश्वो विडितरे पशवः । क्षत्रस्यैतद्रूप यद्धिरण्यम् । ज्योतिर्वै हिरण्यम्' ( श ० १३।२।२।१४- १७ ), ' राष्ट्रमश्वमे वो ज्योनिरेव तद्राष्ट्रे दधाति । क्षत्रायैव तद्विशं कृतानुकरामनु- वर्त्मानं करोति 1। अथो क्षत्र वा अश्त्र क्षत्रस्यैतद्रूपं यद्धिरण्यम् | क्षत्रमेव तत् क्षत्रेण समर्धयति । विशमेव तद्विशा समर्धयति' ( - ), ' श० १३/२/२/१६ १ ९ गणाना त्वा गणपति हवामह इति । पत्न्यः परियन्त्यपहृवत एवास्मा एतदतोऽन्ये- वास्यै हृवतेऽथो धुवत एवैनं त्रिः परियन्ति त्रयो वा इमेलोका एभिरेवैन लोकैर्धुवते, त्रि. पुनः परियन्ति षट् सम्पद्यन्ते, षड्वा ऋतव ऋतुभिरेवैनं धुवते । अप वा एतेभ्यः प्राणा क्रामन्ति ये यज्ञे धुवन तन्वते नवकृत्वः परियन्ति नव व प्राणाः प्राणानेवात्मन् दधते मैभ्यः प्राणा अपक्रामन्त्याहमजानि गर्भधमा त्वमजाति गर्भधमिति प्रजा वे पशवो गर्भः प्रजामेव पशूनात्मन् धत्ते ।' ( श० १३| २| ८| ४ - ५ ) इति वचनानि समुद्धृतानि । उपर्युक्तेर्ब्राह्मणवचनैर्मन्त्रस्य कः सम्बन्ध कश्च ब्राह्मणा- नुसारी मन्त्रार्थ इति विषये मौनमेवावलम्बितम् । ------' वयं गणानां गणनीयाना पदार्थसमूहानां गणपति पालकं स्वामिनं त्वा परमेश्वरं (हवामहे) गृह्णीम. । यत्तु- तथैव सर्वेषा प्रियाणामिष्टमित्रादीनां मोक्षादीना च प्रियपति स्वेति पूर्ववत् । एवमेव निधीना विद्यारत्नादिकोशाना निधि-पति पूर्ववत् । वसत्यस्मिन् सर्वं जगद्वा यत्र वसति स वसुः परमेश्वरः, तत्सम्बुद्धौ हे वसो परमेश्वर सर्वान् कार्यन् भूगोलान् स्वसामर्थ्ये गर्भवद्दधातीति गर्भध । त त्वामहं भवत्कृपया आजानि सर्वथा जानीयाम् । हे भगवन्, त्वं तु आसमन्ताज्ज्ञातासि । पुनर्गर्भधमित्युक्तथा वयं प्रकृतिपरमाण्वादीनां गर्भधानामपि गर्भधं त्वा मन्यामहे । नैवातो भिन्नः कश्चिद् गर्भधारकोऽस्तीति' ( पृ० ३६९ ) । एवमेव ऐतरेयशतपथब्राह्मणयोर्गणपतिशब्दार्थो वर्णितः । ब्राह्मणस्पत्यं अस्मिन् मन्त्रे ब्राह्मणो वेदस्य पतेर्भावो उसको मै खैच के अपनी योनि मे डालू, तथा तू उस वीर्य को मुझमे स्थापन करने वाला है' ( पृ० ३६८ ) । महीधर के इस अर्थ को गलत बताकर सही अर्थ बताने के लिये स्वामी दयानन्द इसके आगे ऐतरेय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण के अनेक स्थलो को उद्धृत करते हैं, किन्तु इन उद्धरणों का मन्त्र के साथ क्या सम्बन्ध है? अथवा इन ब्राह्मण वचनो के अनुसार इस मन्त्र का अर्थ क्या होता है, इस विषय में चुप्पी साध ली है । मन्त्र का अर्थ स्वामी दयानन्द ने इस प्रकार किया है— 'जो परमात्मा गणनीय पदार्थो का पति अर्थात् पालन करने वाला है, उसको हम लोग पूज्य बुद्धि से ग्रहण करते है । जो हमारे इष्ट मित्र और मोक्षसुख आदि का प्रिय पति तथा हमें आनन्द में रख कर सदा पालन करने वाला है, उसी को हम लोग अपना उपास्य देव जान कर ग्रहण करते है । जो विद्या और सुख आदि का निषि, अर्थात् हमारे कोशो का पति है, उसी सर्वशक्तिमान परमेश्वर को हम अपना राजा और स्वामी मानते हैं । जो व्यापक होकर सब जगत् मे और सब जगत् उसमे बस रहा है, इस कारण हम उसको 'वसु' कहते हैं । हे वसु परमेश्वर! आप अपने सामर्थ्य से जगत् के अनादि कारण मे गर्भ धारण करते है, अर्थात् सब मूर्तिमान् द्रव्यो को आप ही रचते है, इसी हेतु से आपका नाम 'गर्भव' है । मैं ऐसे गुणसहित आप को जानू । जैसे आप सब प्रकार से सबको जानते है, वैसे ही मुझको भी सब प्रकार से ज्ञानयुक्त कीजिये । दूसरी बार ' गर्भ ' शब्द का पाठ इसलिये है कि जो जो प्रकृति और परमाणु आदि कार्य द्रव्यो के गर्भरूप हैं, उनमे भी सब जगत् के गर्भरूप बीज को धारण करने वाले ईश्वर से भिन्न दूसरा कार्य जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय करने वाला कोई नही है' ( पृ० ३७१ ) । स्वामी दयानन्द आगे लिखते हैं --गणपति शब्द का यही अर्थ ऐतरेय और शतपथ ब्राह्माण में किया गया है । इस मन्त्र में ब्रह्म अर्थात् वेद के पति के भाव का वर्णन हैं । ब्रह्म ही बृहस्पति कहलाता है, इस श्रुति के अनुसार ब्रह्म ( वेद ) का उपदेश करके
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वेदार्थपारिजातः १६७८ वर्णितः, ब्रह्मवै बृहस्पतिरित्युक्तत्वात् । तेन ब्रह्मोपदेशेनैवैनं जीवं यजमान वा सत्योपदेष्टा विद्वान् भिषज्यति रोगरहितं करोति । आत्मनो भिषजं वैद्यमिच्छतीति भिषज्यति । यस्य परमेश्वरस्य प्रथ सर्वत्र व्याप्तो विस्तृतः, सप्रथश्च प्रकृत्याकाशा-दीना प्रथेन स्वसामर्थ्येन वा सह वर्तते स सप्रथः, तदिदं नामद्वयं तस्यैवास्ति । प्रजापतिः परमेश्वरो वै निश्चयेन जमदग्नि- संज्ञोऽस्ति' ( पृ० ३६ ९ ) इत्यादि जल्पता दयानन्देन कथं ब्राह्मणवचनानामर्थो योजित इति विद्वास एव विभावयन्तु । उपर्युक्तानि बहूनि वचनानि पदानि च नैव स्पृष्टानि । सत्यमेव ऋग्वेदालोचनस्य २२८ पृष्ठे नरदेवशास्त्रिणोक्तं यत्-'स्वामिना ( दयानन्देन ) यजुर्वेदभाष्यकारमहीधराचार्यस्य ऋग्वेदभाष्यकाराणां सायणाचार्यादीना च भाष्याणि तु खण्डि-तानि, किन्तु यानि शतपथादिवचनानि समाश्रित्य तादृश भाष्य कृतं तेषा सम्बन्धे मौनमेव साधितम्' इति । 'सर्वान् कार्यान् भूगोलात् परमेश्वरः स्वसामर्थ्ये गर्भवत् कथं दधाति? सामथ्यं तु शक्तिरेव । शक्तिश्च नहि कार्याधिकरणं भवति, किन्तु स्वस्वाधिकरणेष्वेव कार्याणि तिष्ठन्ति । 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति' (तै० उ० ३।१ ) इति वचनेन तु ज्ञायते यत् परमात्मन एव सर्वाणि भूतानि जायन्ते तेनैव जीवन्ति तस्मिन्नेवाभिसंविशन्ति । किञ्च, गर्भवदित्युक्तया गौण एवार्थो गृहीतस्त्वया, तेन गर्भशब्दस्य शक्योऽर्थोऽन्य एव । नहि मुख्यार्थे सम्भवति भाक्तोऽर्थो युक्त । किञ्च, गर्भधमिति पुनरुक्तया गर्भधानामपि गर्भधमिति कुतोऽर्थो गृहीतः? किञ्च, तत्र बीजम्? न चैकस्य पदस्य वैयर्थ्यापत्त्या तथार्थकल्पनस्, क्रियान्तरयोगेन तत्सार्थक्यात् । गर्भधमहमजानि त्वच गर्भधमजासीति क नैरर्थक्यम्? किञ्च, प्रजापतिः परमेश्वरो जमदग्निसज्ञोऽस्तीत्यस्य प्रकृते कः प्रसङ्ग? यत्तु - 'जमदग्नयः प्रजमिताग्नयो वा, प्रज्वलिताग्नयो वा, तैरभिहुतो भवति' ( नि० ७।२४ ) इति निरुक्तवचनं तत्र प्रमाणत्वेनोक्तम्, तदप्यकिञ्चित्करम्, ही सत्य का उपदेश करने वाला विद्वान् किसी जिज्ञासु प्राणी अथवा यजमान को रोगरहित करता है, शंका से मुक्त करता है । इस परमेश्वर की व्याप्ति ( प्रथ ) सब जगह है । प्रकृति, आकाश प्रभृति पदार्थों को रचने की सामर्थ्य होने से यह 'सप्रथ' कहलाता प्रथ और सप्रथ ये दोनों नाम इसीलिये ब्रह्म के ही बोधक है । प्रजापति अर्थात् परमेश्वर निश्चय हो 'जमदग्नि ' के नाम से भी प्रसिद्ध है' ( पृ० ३६ ९ ) इस तरह ऊलजलूल बात कह कर स्वामी दयानन्द ते उक्त ब्राह्मण वाक्यों का अर्थ कैसा किया है? इसकी परीक्षा स्वयं विद्वान् ही सावधानी से कर लें । इनमे उक्त ब्राह्मण वाक्यों के अनेक शब्दो को छुआ भी नही गया है । ऋग्वेदालोचन (१० २ ९ ८) मे नरदेव शास्त्री का यह कहना ठीक ही है--'स्वामी दयानन्द ने यजुर्वेद के भाष्यकार महीधराचार्य और ऋग्वेद के भाष्यकार सायणाचार्य प्रभृति के भाष्यों का तो खण्डन किया है, किन्तु जिन शतपथ ब्राह्मण आदि के वचनों के आधार पर अपना भाष्य लिखा है, उसकी व्याख्या करने में उन्होंने चुप्पी साध ली है' । सभी कार्यों को, भूगोलों को परमेश्वर अपनी सामर्थ्य में गर्भ की तरह कैसे धारण करता है? सामर्थ्य तो शक्ति को ही कहते हैं । यह शक्ति किसी कार्य का अधिकरण नही बन सकती, कार्य तो अपने अपने अधिकरणो में ही रहते है । 'यतो वा' इस श्रुति से तो ज्ञात होता है कि परमात्मा से ही सारे कार्य पैदा होते हैं, उसी से जीते हैं और उनका लय भी उसी में हो जाता है । 'गर्भवत्' इस शब्द से मतुप् प्रत्यय होने से गौण अर्थ ही यहाँ गृहीत होता है, गर्भ शब्द का वास्तविक अर्थ तो दूसरा ही है । जब तक मुख्य अर्थ हो सकता हो, तब तक गौण अर्थ नही किया जाता । 'गर्भधम्' इस पद की पुनरुक्ति करके गर्भ धारकों का भी गर्भधारक यह अर्थ किस प्रमाण के आधार पर आप करेंगे? एक अधिक पद का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा, उसकी सार्थकता के लिये भी ऐसा अर्थ नहीं किया जा सकता, क्योंकि दूसरी क्रिया का अध्याहार करके भी उस पद को सार्थक बनाया जा सकता है । मैं गर्भधा उत्पन्न हुआ हूँ और तुम भी गर्भधा रूप में ही उत्पन्न हो, ऐसा अर्थ करने पर दोनों ही पद सार्थक हो जाते हैं । प्रजापति परमेश्वर जमदग्नि नाम से प्रसिद्ध हैं, इस वाक्य की प्रकृत प्रसंग में क्या उपयोगिता है? 'जमदग्नयः' इत्यादि निक्क वचन को यहाँ प्रमाण के रूप में आपने उद्धृत किया है ( १०३६ ९ ), किन्तु उससे भी आपको कोई सहायता नहीं मिल सकती,