वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 821–830
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 821–830
पृष्ठ 821
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७१ ९ यदुक्तम् —'ऋच स्तुतो, यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु' साम सान्त्वने षोऽन्तकर्मणि, थर्वतिश्चरतिकर्मा तत्प्रतिषेधः । ' ( नि० ११।१८) 'चर संशये' अनेनाथवंशब्द' सशयनिवारणार्थो गृह्यते' ( पृ० ३८६ ), इत्यादि, तदपि तुच्छम्, ऋगादिशब्दानां योगरूढत्वात् । अन्यथा लौकिकस्तवनसाधनसङ्गतिकरणादिसाधन सात्वनसमाप्तिसंशयनिवारकेषु ऋगादि- प्रयोगापत्तिः स्यात् । निरुक्तार्थस्तु न थर्वन्तीत्यथर्वाणः स्थिरप्रकृतयो हि ते । तेषामेषा साधारणा भवति ( नि० ११।१८) तेषा- मङ्गिर प्रभृतीनामित्यर्थः । ऋषिदेवताछन्दःस्वरनिर्देशप्रयोजनमपि तदुक्तमसङ्गतमेव । प्रत्येक मन्त्रस्योपरि ऋषिदेवताछन्दः स्वराः किमर्थं लिख्यन्त इति प्रश्नस्य प्रतिवचने यदुक्तम्-'वेदानामीश्वरोक्त्यनन्तरं येन येनर्षिणा यस्य यस्य मन्त्रस्यार्थो यथावद्विदितस्त- स्मात् तस्य तस्योपरि तत्तदृषेर्नामोल्लेखनं कृतमस्ति । कुतः । तैरीश्वरध्यानानुग्रहाभ्या महता प्रयत्नेन मन्त्रार्थस्य प्रकाशितत्वात्, तत्कृतमहोपकारस्मरणार्थ तन्नामलेखनं प्रतिमन्त्रस्योपरि कर्तुं योग्यमस्त्यतः' ( पृ० ३८८ ) इति, तदपि विसङ्गतम्, निष्प्रमाणत्वात् । न च 'यो वाच श्रुतवान् भवत्यफलामपुष्पाम्' इत्यादिनिरुक्तं प्रमाणमिति वाच्यम्, तस्यान्यार्थत्वात् । 'यो वाच श्रुतवान् भवत्यफलामपुष्पामित्यफलाऽस्मा अपुष्पा वाग्भवतीति वा किञ्चित्पुष्पफलेति वा । अथं वाचः पुष्पफलमाह । याज्ञदेवते पुष्पफले देवताध्यात्मे वा । साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुस्तेऽसाक्षात्कृतधर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादु । उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे विल्मग्रहणायेमं ग्रन्थ समाम्नासिषुर्वेदं च वेदाङ्गानि च । विल्म भिल्म भासनमिति वा । एतावन्तः समानकर्माणो धातवः । धातुर्दधाते । एतावन्त्यस्य सत्त्वस्य नामधेयानि । एतावतामर्थानामिदमभिधानम् । नैघण्टुकमिद देवता- वे आगे लिखते है -'ऋच स्तुती, यज देवपूजा संगतिकरणवानेषु षो अन्तकर्मणि और साम सान्त्वने, थर्वतिश्चरितकर्मा इन अर्थों के विद्यमान होने से चार वेदों अर्थात् ऋक्, यजुः साम और अथर्व की ये चार संज्ञाएँ रखी गई है । तथा अथर्ववेद का प्रकाश ईश्वर ने इसलिये किया है कि जिससे तीनों वेदो की अनेक विद्याओ के सब विघ्नो का निवारण हो और उनकी गणना अच्छी तरह से हो सके' ( पृ० ३८७-३८८ ), किन्तु यह सब भी गलत है, क्योकि यहाँ ये शब्द योगरूढ है । अन्यथा लौकिक स्तुति के साधन, संगतिकरण के साधन, सान्त्वन, समाधि और संशय का निवारण करने वाले वाक्यो में भी ऋक् प्रभृति शब्दो का व्यवहार होने लग जायगा । निरुक्तकार ने अथर्व शब्द का अर्थ न थर्वति अर्थात् जो चल नहीं है, स्थिर स्वभाव का है, ऐसा किया है । आगे उन्होने कहा है कि यह स्थिर स्वभाव केवल अथर्ववेद का ही नही, सभी वेदों का समान गुण है । स्वामी दयानन्द का बताया हुआ ऋषि, देवता, छन्द, स्वर आदि के निर्देश का प्रयोजन भी असंगत है । प्रत्येक मन्त्र के ----साथ ऋषि, देवता, छन्द और स्वर किसलिये लिखते है? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होने लिखा है -'ईश्वर जिस समय आदि सृष्टि में वेदों का प्रकाश कर चुका, तभी से प्रचलित लोग वेद मन्त्रो के अर्थो का विचार करने लगे । फिर उनमें से जिस जिस मन्त्र का अर्थ जिस जिस ऋषि ने प्रकाशित किया, उस उस का नाम उसी मन्त्र के साथ स्मरण के लिये लिखा गया है । इसी कारण से उनका ऋषि नाम भी हुआ है । उन्होंने ईश्वर के ध्यान और अनुग्रह से बडे- बडे प्रयत्न के साथ वेद मन्त्रो के अर्थ को यथावत् जानकर सब मनुष्यों के लिये पूर्ण उपकार किया है, इसलिये विद्वान् लोग वेदमन्त्रों के साथ उनका स्मरण रखते है' ( पृ० ३८ ९ -३ ९० ), किन्तु इसमें कोई तुक नहीं मालूम पडता और इसमें कोई प्रमाण भी नहीं है । 'यो वाच श्रुतवान्' यह निरुक्त वचन भी इसमें प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसका अर्थ कुछ दूसरा ही है ॥ ' " " ' ' यो वाचं श्रुतवान् नैघण्टुकं तत् इस निरुक्त वाक्यावली की व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं- जो मनुष्य अर्थ को समझे बिना अध्ययन वा श्रवण करते हैं, उनका सब परिश्रम निष्फल होता है । प्र० - वाणी का फल क्या है? उ०- अर्थ को ठीक -ठीक जानकर उसी के अनुसार व्यवहारों में प्रवृत्त होना वाणी का फल है । जो लोग इस नियम पर चलते हैं, वे साक्षात् धर्मात्मा अर्थात् ऋषि कहलाते हैं' ( पृ ० ३ ९ ० ), किन्तु यह कथन असंगत है, क्योंकि यह अर्थ आपकी कपोलकल्पना है, मूल में इस अर्थ के बोधक पद विद्यमान नहीं है । साथ ही आपने किंचित् पुष्पफला, याज्ञदैवते इत्यादि पदों की व्याख्या भी नही की है । आगे आप लिखते हैं-
पृष्ठ 822
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७२० नामप्राधान्येनेदमिति । तद्यदन्यदेवते मन्त्रे निपतति नैघण्टुकं तत् । ' (नि० ११२० ) अत्र यदुक्तम्-'यो मनुष्योऽर्थविज्ञानेन विना श्रवणाध्ययने करोति तदफलं भवति । ( प्रश्न: ) वाचो वाण्याः किं फलं भवतीति? ( उत्तरम्) अत्राह - विज्ञानं तथा तज्ज्ञा- नानुसारेण कर्मानुष्ठानम् । य एवं ज्ञात्वा कुर्वन्ति त ऋषयो भवन्ति' ( पृ० ३८९ ) इति, तदसङ्गतमेव, य एव ज्ञात्वा कुर्वन्ति त ऋषयो भवन्तीत्यर्थस्य त्वत्कपोलकल्पितत्वात्, मूले तद्बोधकपदाभावात् । किञ्चित्पुष्पफला, याज्ञदैवते इत्यादिपदानामव्या- ख्यानाञ्च । यत्तु –'साक्षात्कृतधर्माण: । यैः सर्वा विद्या यथावद्विदितास्त ऋषयो बभूवुः 1। तेऽवरेभ्योऽसाक्षात्कृतवेदेभ्यो मनुष्येभ्य उपदेशेन वेदमन्त्रान् सम्प्रादुः, मन्त्रार्थाश्च प्रकाशितवन्तः' ( पृ० ३८ ९ ) इति, तदप्यसङ्गतम्, धर्मपदस्य विद्यार्थकत्वे माना- भावात् विप्रतिषिद्धत्वाच्च । एकत्र धर्मपदेन विद्या गृहीता, अपरत्र च वेदो गृहीतः । यदि साक्षात्कृतधर्माण इत्यस्य विदित- सर्वविद्या इत्यर्थः तर्हि असाक्षात्कृतधर्माण इत्यनेनाविदितसर्वविद्या इत्येवार्थो ग्राह्यः । धर्मशब्दस्य वेदोऽपि नार्थः, प्रमाणशून्यत्वात् । मन्त्रार्थान् प्रकाशितवन्त इति कस्य वाक्यस्यार्थ.? नहि मन्त्रशब्दस्यैव मन्त्रार्थपरत्वं युक्तम् । शक्यार्थो- पपत्तौ भाक्तस्यार्थस्यासङ्गतत्वात् । एवमुत्तरोत्तरं वेदार्थप्रचारयेत्यपि न प्रकृतवचनार्थः, उपदेशायेत्यस्योत्तरेण सम्बन्धात् । यदपि — ' ये चावरेऽध्ययनायोपदेशाय च ग्लायन्ति तान् वेदार्थविज्ञानायेमं नैघण्टुक निरुक्ताख्य ग्रन्थं ते ऋषयः समाम्नासिषुः, येन वेद वेदाङ्गानि च जानीयुः ' ( पृ० ३८९) इति, तन्न, निर्मूलत्वात् । वस्तुतस्तु नेदं निरुक्तवचनं दयानन्दीयाभीष्टसाधकम्, तत्र ऋषिपदनिर्वचनाभावात् । वस्तुतस्तु निरुक्तार्थं एवं वेदितव्य -यः श्रुतवान् भवत्यन्येभ्यो वेदान् श्रुत्वा दृढग्राहेणावस्थितो भवत्यध्ययना- दृते नान्यत्किञ्चिद् वाचि मृग्यं मन्यते, अस्मै वेदलक्षणेयं वाग् अफलैवापुष्पैव च भवति । किञ्चित्पुष्पफला, अल्पपुष्पाल्प-फला वा । अध्ययनमात्रेणापि मुख्यफलाभावेऽपि व्रात्यत्वापनयनघृतकुत्यादिस्वल्पफलस्य सत्त्वात् । किं पुनर्वाचो मुख्यं पुष्पफलमिति चेदुच्यते - अर्थं वाचः पुष्पफलमाह । कः पुनरसावर्थः? याज्ञं दैवतमध्यात्ममित्येष वाच. समासतोऽर्थः । एष एव रूपकल्पनया पुष्पफलविभागेन द्विधा विभज्यते । याज्ञदेवते पुष्पफले देवताध्यात्मे वा । यज्ञपरिज्ञान याज्ञं, देवतापरिज्ञानं 'इसलिये जिन्होने सब विद्याओ को यथावत् जाना था, वे ही ऋषि हुए थे । उन्होंने अपने उपदेश से अवर अर्थात् अल्पबुद्धि मनुष्यो को वेदमन्त्रों के अर्थों का प्रकाश कर दिया है' ( पृ ० ३ ९ ० ), किन्तु यह अर्थ भी आपका असंगत है, क्योंकि धर्म पद का अर्थ विद्या हो, इसमें कोई प्रमाण नही है, आपका यह अर्थ परस्पर विरुद्ध भी हैं, इसलिये कि एक स्थान पर आप धर्म का अर्थ विद्या और दूसरे स्थान पर वेद करते है । यदि 'साक्षात्कृतधर्माण ' इस पद का अर्थ आप सब विद्याओ को यथावत् जानने वाले करते हैं, तो 'असाक्षात्कृत-धर्माण:" का अर्थ सब विद्याओं को न जानने वाले होगा, जो कि आपने नही किया । धर्म शब्द का अर्थ वेद भी नही होगा, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । मन्त्रो के अर्थो को प्रकाशित किया, यह अर्थ किस वाक्य का होगा । मन्त्र शब्द मन्त्र के अर्थ में प्रयुक्त नही हो मुख्य अर्थअर्थ हो सकता है, तो गौण अर्थ स्वीकार नही किया जाता,सकता जब । उत्तरोत्तर काल में वेद प्रचार की बात भी प्रस्तुत वाक्यसे नहीं निकलती, क्योकि 'उपदेशाय' इस शब्द का सम्बन्ध अगले वाक्य से है । 'जो लोग वेदशास्त्र आदि पढने मे कम समर्थ हैं, वे जिससे सुगमता से वेदार्थ जान लेवें, इसलिये उन्होने निघण्टु और निरुक्त आदि ग्रन्थ भी बना दिये हैं, जिससे सब मनुष्य वेद और वेदाग को ज्ञानपूर्वक पढ़कर उनके सत्य अर्थ को जान लेवें' यह कथन भी निर्मूल है । वास्तव में निरुक्त का यह वचन दयानन्द के अभीष्ट मत का साधक नहीं हो सकता, क्योकि इसमें ऋषि पद की व्याख्या की ही नहीं गई है । इस निरुक्त वाक्यावली का सही अर्थ इस प्रकार है- जो व्यक्ति दूसरो से वेदों को सुनकर तृप्त हो जाता है और इस मूढ आग्रह से बंधा रहता है कि अध्ययन के अतिरिक्त इसका दूसरा कोई प्रयोजन अन्वेषणीय नही है, तो ऐसे व्यक्ति का अध्ययन अफल हो जाता है । बकार यहाँ अल्प अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् ऐसा मानने वाले को उसका फल थोडा ही मिलता है । अध्ययन कर लेने से यद्यपि मुख्य फल नहीं मिलता, किन्तु वेद का अध्ययन न करने से जो व्रात्यत्व दोष आता, उससे यह छूट जाता है और वेदाध्यायी को घृत-दुरष आदि भोग्य सामग्री भी प्राप्त होती है । वह मुख्य फल क्या है? जो कि वेदाध्यायी को नहीं मिलता? वह मुख्य फल मन्त्र
पृष्ठ 823
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेवार्थपारिजातः १७२१ दैवतम् । आत्मन्यधिवर्तत इत्यध्यात्मम् । सर्वोऽपि मन्त्रब्राह्मणराशिर्वेदस्त्रिधा विभक्तः । अध्ययनलक्षणधर्मविवक्षायां याज्ञं पुष्पं दैवतं फलं यथा पूर्वं पुष्प फलार्थं भवति, तथैव याज्ञमपि पूर्वं देवतार्थं प्रवर्तते । निःश्रेयसलक्षणधर्मविवक्षाया याज्ञदेवते पुष्पत्वमेवोपगच्छतः, दैवते याज्ञस्यान्तर्भावात् । अध्यात्मं च फल भवति । यथा पुष्पं फलभावाय कल्पते, तथैव याज्ञं दैवत च ब्रह्मात्मभावाय परिकल्पते, सर्वपुरुषार्थानां तत्रैब पर्यवसानात् । तस्मादर्थज्ञानायैव निरुक्तप्रादुर्भाव इत्याह-साक्षात्कृतधर्माण ऋषय इति 1। यैर्विशिष्टेन तपसा धर्मः साक्षात्कृतस्ते साक्षात्कृतधर्माणिः 1। के पुनस्त इति ऋषयः । ऋषन्त्यमुष्मात्कर्मण एवमर्थ-वता मन्त्रेण संयुक्तादमुना प्रकारेण एवं लक्षणफलविपरिणाम इति ऋषयः । तदेतत्कर्मणः साक्षात्फलविपरिणामदर्शनमौपचा- रिक्या वृत्त्या साक्षात्कृतधर्माण इत्युच्यते । अत्यन्तापूर्वस्य धर्मस्य प्रत्यक्षदर्शनासम्भवात् 4 न च तपसाऽपि धर्मसाक्षात्कारः सम्भ- वति, तस्य वेदैकसमधिगम्यत्वात् । अन्यथा बुद्धमहावीरादीनामपि कुतो न धर्मसाक्षात्कारः सम्भवेत् । 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म. ' ( मी ० सू० १ १ २ ), ' तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ ' (भ ० गी ० १६।२४ ) इत्यादिवचनविरोधाच्च । ते साक्षात्कृतधर्माण ऋषयः । अवरेभ्योऽर्वाक्कालिकेभ्यः शक्तिहीनेभ्यः श्रुतर्षिभ्य उपदेशेन शिष्योपाध्यायिकया वृत्त्या मन्त्रान् ग्रन्थतोऽर्थतश्च सम्प्रादुः सम्प्रत्तवन्तः । ते चोपदेशेनैव जगृहुः 1। श्रुत्वा पश्चादृषित्व जायते। साक्षात्कृतधर्मणां तु श्रवणमन्तरेणैव । ते श्रुतर्षयोऽपि उपदेशायोपदेशाथं सौकर्येणोपदेशग्रहणाय कथं नामोपदिश्यमानमेते शक्नुयुर्ग्रहीतुमित्यर्थमधिकृत्य ग्लायन्तः खिद्यमानाः, तदनुकम्यया तेषामायुषः सङ्कोच कालानुरूपां ग्रहणशक्ति चावेक्ष्य बिल्मग्रहणायेमं ग्रन्थं गवादिदेवपत्न्यन्तं निरुक्ताख्य वेदं वेदाङ्गानि चेतराणि च समाम्नातवन्तः । भाष्यवाक्यप्रसक्तं विल्म- का अर्थ है, जो कि वाणी का पुष्प और फल है । यह अर्थ क्या है? संक्षेप में याज्ञ, दैवत और अध्यात्म ही मन्त्र का अर्थ है । इसी को यहाँ रूपक की भाषा मे पुष्प और फल के रूप में दिखाया गया है कि- एक पक्ष में याज्ञ और दैवत अर्थ पुष्प और फल के सदृश है और दूसरे पक्ष मे दैवत और अध्यात्म अर्थ पुष्प और फल के सदृश है । यज्ञ का ज्ञान कराने वाला भाग याज्ञ, देवता का ज्ञान कराने वाला दैवत और आत्मा का ज्ञान कराने वाला भाग अध्यात्म नाम से जाना जाता है । इस तरह से मन्त्रब्राह्मणात्मक यह पूरा वेद इन तीन विषयों के प्रतिपादन में ही विनियुक्त है । जब वेदाध्ययन का प्रयोजन धर्म की जिज्ञासा होता है, तब याज्ञ कर्म पुष्प और देवत ज्ञान फल होता है, अर्थात् पुष्प से जैसे फल बनता है, उसी तरह से सारी यज्ञीय प्रक्रिया भी देवता के ज्ञान कराने मे विनियुक्त होती है । जब मोक्ष की कामना से वेद का अध्ययन किया जाता है, तो याज्ञ कर्म और दैवत ज्ञान पुष्प का स्थान ग्रहण कर लेते हैं । यहाँ दैवत शब्द से याज्ञ कर्म का भी ग्रहण हो जाता है । इस पक्ष में अध्यात्म फलस्थानीय है । जैसे पुष्प से ही फल बनता है, उसी तरह से यज्ञीय और देवत ज्ञान का उपयोग ब्रह्मज्ञान मे होता है, क्योकि अन्ततः सभी पुरुषार्थो का पर्यवसान मोक्ष दशा में ही होता है । अर्थज्ञान की इस महिमा को बताकर आगे यह कहा गया है कि - इस मन्त्रार्थ के ज्ञान के लिये ही निरुक्त नामक शास्त्र की रचना की गई है । जिन्होने विशिष्ट तपस्या करके धर्म का साक्षात्कार किया है, वे ऋषि है । इनको ऋषि इसलिये कहते है कि वे इस बात को जानते है कि इस कर्म से, इस अर्थ वाले मन्त्र से, इस तरह से किसी फल की प्राप्ति होती है । कर्म की इस फलोन्मुख परिणति को साक्षात् देखने वाले ऋषि 'साक्षात्कृतधर्माण:' इस विशेषण से जाने जाते है । यह एक प्रकार का औपचारिक प्रयोग है, क्योंकि धर्म तो अपूर्व के रूप में कभी देखा नही जा सकता । तप से भी उसका साक्षात्कार नही हो सकता । वह तो एकमात्र वेद से ही जाना जा सकता है । अन्यथा बुद्ध, महावीर प्रभृति को भी धर्म का साक्षात्कार हो, इसमे क्या बाधा उठाई जा सकती है? ऐसा मानने पर मीमांसासूत्र ( चोदना० ) और गीता के वचन ( तस्माच्छास्त्र० ) से भी विरोध पडेगा । इसलिये ऋषि लोग धर्म का साक्षात्कार करते है । इसका अभिप्राय इतना ही है कि उनका धर्मविषयक ज्ञान हमारी अपेक्षा उत्कृष्ट कोटि का है । धर्म का साक्षात्कार करने वाले ये ऋषि बाद में पैदा हुए फल शक्ति वाले मनुष्यों को अपने उपदेश से शिष्य-उपाध्याय की परम्परा से मन्त्रों को पढाते रहे हैं और उनका अर्थ भी बताते रहे हैं । ये लोग श्रुतषि के नाम से प्रसिद्ध होते है, क्योंकि सुनने के बाद इनमें मन्त्र दर्शन का सामर्थ्य आता है, मन्त्र के रहस्य को समझ पाते हैं । साक्षात् ऋषियों में यह सामर्थ्य स्वाभाविक रहता है । ये श्रुतर्षिगण भी बाद में इस चिन्ता में पड गये कि आगे होने वाली अल्पबुद्धि की इस सन्तति में हम इस दिव्य ज्ञान का प्रसार निरन्तर किस प्रकार करते रहें? इस अल्पबुद्धि प्रजा पर अनुकम्पा करने की दृष्टि से उनकी आयु और मेघाशक्ति के अनुरूप संक्षेप में सब बातों को और वैदिक मन्त्रों के अर्थ को जानने की २१६
पृष्ठ 824
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७२२ । शब्दं निर्ब्रवीति भिल्मं वेदानां भेदनम् । भेदो ब्यासः, एकं सन्त वेदमतिमहत्त्वाद् दुरध्येयमनेकशाखाभेदेन समाम्नातवन्तः , चतुर्दशधा निरुक्तमित्यादि ।एकविंशतिघा बाह्यच्यम्, एकशतधाध्वर्यवम् सहस्रधा साम, नवधाथर्वाणम्, अष्टधा ब्याकरणम् भासनमिति वा बिल्मशब्देनोच्यते, वेदाङ्गविज्ञानेन वेदार्थस्य प्रकाशनात् । ये च साक्षात्कृतधर्माण ऋषयस्ते तु श्रवणमन्तरैव वेदान् वेदार्थाश्च पश्यन्ति । ते तु 'ऋषिदर्शनात् स्तोमान् ददर्शेत्योपमन्यवः । तद् यदेनांस्तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भ्वभ्यानषत् त ऋषयोऽभवंस्तदृषीणामृषित्वमिति विज्ञायते ' (तै ० आ ० २ ९ ) इत्यत्र निरूपिता यास्काचार्येण । तदर्थस्त्वेवम्-ऋषति पश्यति सूक्ष्मानप्यर्थानिति ऋषि । स्तोमा मन्त्रास्तानसौ तार-केण ज्ञानेन पश्यतीत्यौपमन्यव आचार्यो मन्यते । ब्राह्मणेनापि तदेवोच्यते । यद् यस्माद् एनास्तपस्यमानान् ब्रह्म ऋग्यजुः-सामाख्यं स्वयम्भु अकृतकं अभ्यागच्छत्, अर्थाद् अनधीतमेव ते तपोविशेषेण तत्त्वतो ददृशु., तदृषीणामृषित्वम् । प्रकृते तु एतावन्तः समानकर्माणो धातव, एतावन्त्यस्य सत्त्वस्य नामधेयानि दधातेर्धातवः, स एष पदराशि- उत्तरे घण्टुकं नाम प्रकरणम् । एतावन्त इति धातुषु आख्यातपदेषु प्रतिनियता संख्या अभिप्रेयते । तद्यथा गतिकर्माण धातवो द्वाविंशं शतम् । कान्तिकर्माण उत्तरे धातवोऽष्टादशम् । ( नि० ३।९ ) एतावन्त्यस्य सत्त्वस्येति नामधेयप्रतिनियत-संख्याभिप्रेयते । तद्यथा- -' पृथिवीनामधेयान्येकविंशति ' ( नि० २२९ ), 'हिरण्यनामान्युत्तराणि पञ्चदश' ( नि० २।७ ) । यत्रैतावर्थौ प्रायेण चिन्त्येते प्रसङ्गतोऽन्यत् किञ्चित् तन्नैघण्टुकं नाम प्रकरणम् । यत्र पुनरेतावतामर्थानामिदमभिधानं प्रायेण चिन्त्यते, तद्यथा - 'आदित्योऽप्यकूपारः समुद्रोऽप्यकूपारः' ( नि० ४।१८ ) । अनवगतसस्काराश्च निगमा जहादयो यत्र चिन्त्यन्तेऽनुषङ्गतोऽन्यदपि तदेकपरिक नाम प्रकरणम् । अथ पुनर्यत्र नैघण्टुकं देवतानामस्मिन् मन्त्रे इदमन्यदत्र प्राधान्येन वर्तत इत्ययं विभागो यत्र चिन्त्यते तद्देवतं प्रकरणम् । तद्यदन्यदेवते मन्त्रे निपतति नैघण्टुकं तत् । नैघण्टुकमिदं देवतानाम् । प्राधान्येनेदम् | अन्या यस्मिन् प्रधानदेवता सोऽयमन्यदेवतः । तस्मिन्नन्यदेवते मन्त्रे स्वमर्थमन्यस्यां प्रधानायां मन्त्रदेवतायां प्रक्रिया को समझाने के लिये इस निरुक्त ग्रन्थ की तथा अन्य वेदाग ग्रन्थो की रचना हुई । निरुक्तवाक्यगत बिल्म शब्द का अर्थ यह है कि पहले सारा वेदराशि एक अखण्ड रूप में विद्यमान था, बाद में ऋषियों ने उसको अनेक शाखाओ मे विभक्त कर दिया, जिससे कि इस सारे वेदराशि का ज्ञान सरलता से हो सके । जो धर्म का साक्षात्कार करने वाले ऋषि है, उनको तो वेदो का तथा उनके अर्थों का ज्ञान अपने आप हो जाता है । ऐसे ही ऋषियों का वर्णन निरुक्तकार ने 'ऋषिर्दर्शनात्' इत्यादि वाक्यो से किया है । ये ऋषि स्तोम, मन्त्र आदि के साक्षात् द्रष्टा होते है, ऐसा उपमन्यु की शिष्य परम्परा में प्रसिद्ध हैं । तैत्तिरीय आरण्यक के अनुसार यह कथा प्रसिद्ध है कि जब ये ऋषिगण तपस्या कर रहे थे, तब इनके सामने ब्रह्म अर्थात् वेद स्वयं अपने आप प्रकट हो गये । य सब ऋषि इसलिये कहलाते हैं कि अन्यत्र दुरूह विषय भी इनके सामने सरल हो जाते है । बिल्म शब्द कानिर्वचन करने के बाद स्वामी दयानन्द द्वारा उद्धृत निरुक्त वचन में 'एतावन्तः समान ०' इत्यादि वाक्य से यह बताया गया है इस ग्रन्थ के नैघण्टुक प्रकरण में समान क्रिया में प्रयुक्त होने वाले घातुओं तथा समान वस्तु में प्रयुक्त होने वाले नामों ( पर्यायवाची शब्द ) का परिगणन किया गया है । जैसे कि इतने धातु गति अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ओर पृथिवी के पर्यायवाची शब्द इतने हैं, इत्यादि । इस नैघण्टुक काण्ड में इनके अतिरिक्त प्रसंगतः कुछ अन्य विषयो की चर्चा आ जाती है । इसके आगे एक- पदिक प्रकरण आता है, जिसमे कि अनेक अर्थो में प्रयुक्त होने वाले पदो पर विचार किया जाता है । जैसे कि अकूपार शब्द का प्रयोग आदित्य ( सूर्य ) के अर्थ में और समुद्र के अर्थ मे भी होता है । इस प्रकरण में उन शब्दो पर भी विचार किया जाता है, जिनका कि प्रकृति -प्रत्यय संस्कार ज्ञात नही है । प्रसंगतः कुछ अन्य विषयों पर भी विचार किया जाता है । दैवत प्रकरण में देवताओं के नामों का, उनके स्वरूप का विचार किया जाता है । इस प्रकरण की सहायता से गुणभूत देवता के अर्थ में विनियुक्त मन्त्र का प्रधान देवता में विनियोग सही पद्धति से जाना जा सकता है । जैसे कि 'अश्वं न त्वा' इस मन्त्र का निघण्टु के आधार पर परिज्ञात देवता अश्व है, किन्तु निरुक्त के इस दैवत प्रकरण से यह ज्ञात होता है कि इसका प्रधान देवता अग्नि है, अश्व तो उसका अंगदेवता है । इस तरह से जान
पृष्ठ 825
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७२३ निगमयन् पतति प्रयुज्यमानमङ्गभावं गच्छति, तन्नैघण्टुकमुच्यते । तदुदाहरण यथा - ' अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्नि नमोभिः सभ्राजन्तमध्वराणाम् || ' (ऋ ० सं० १ २७/१ ) अस्यामृचि अश्वो नैघण्टुको गुणभूता देवता, अग्निः प्रधानदेवता; शुनःशेप ऋषिः, वारवन्तीयानुशंसनेऽस्या विनियोगः । वारवन्तीयस्य साम्न एषा योनि । मन्त्रार्थस्तु — हे अग्ने अश्व न त्वा अश्वमिव त्वाम् अग्निम् अग्रनेतारं देवाना वारवन्तं वालवन्त वृषाश्वमिव नमोभिनमस्कारैरन्नैर्वा हविर्भिरुद्यतैस्त्वा वन्दध्ये वन्दामहै | अश्वो ह्यतितरा बालवान् भवति, स यथा वन्द्यते परिचर्यते न तथान्ये । क्वावस्थित कथ वा वन्दामह इति । सभ्राजन्तं देदीप्यमानम् अध्वराणा यज्ञाना मध्येऽवस्थितमुत्तरवेद्यादिषु धिष्ण्येष्वभिप्रेतार्थसिद्धये वन्दामहै | यदुक्तम् —'यत्र द्योत्याना पदार्थाना प्राधान्येन स्तुतिः क्रियते, तत्र सैवेय मन्त्रमयी देवता' ( पृ० ३८९ ) इति, तदतीव मन्दम्, पूर्वोक्तनैरुक्त पदवाक्याना तदर्थत्वाभावात् | अर्थाना प्राधान्येन स्तुतावर्थस्यैव देवतात्वं स्यादिति कुतस्तस्या मन्त्रमयोत्वम् । यदुक्तम् —' यच्च मन्त्राद्भिन्नार्थस्यैव संकेतः प्रकाश्यते, तदपि नघण्टुक व्याख्यानम्' ( पृ ० ३८९ ) इति, तदपि न किञ्चित् सर्वत्रैव मन्त्राद्भिन्नस्यैवार्थस्य प्रकाशनात् । नहि मन्त्रात् सङ्केत प्रकाश्यते, किन्तु सङ्केतग्रहपूर्वका- न्मन्त्रान्मन्त्रार्थः प्रकाश्यते । यद्यपि मनुष्यो देव ईश्वरो वा कोऽपि मन्त्रनिर्माता न भवति, 'वाचा विरूपनित्यया' ( ऋ० सं० ८७५/६ ) इति वेदलक्षणाया वाचो नित्यत्वश्रवणात् । तत्रेश्वरः प्रतिकल्पं नित्यसिद्धानामेव वेदानां सम्प्रदायं प्रवर्तयति । देवाः परमेश्वरानुग्रहादैश्वर्यवशाद् ऋषयश्च तपोबलसहकृतेश्वरानुग्रहाद् वेदान् पश्यन्ति । अन्ये तु शिष्योपाध्यायिकया वृत्त्या वेदानधिगच्छन्तीति । यदप्युक्तम् - ' येन येनर्षिणा यस्य यस्य मन्त्रस्यार्थः प्रकाशितोऽस्ति तस्य तस्य ऋषेरेकैकमन्त्रस्य सम्बन्धे लेने पर मुख्य देवता में ही इसका विनियोग किया जाता है और शुन शेप ऋषि के द्वारा देखे गये इस मन्त्र का विनियोग वारवन्तीय साम द्वारा अग्नि की स्तुति में किया जाता है । मन्त्र का अर्थ यह होगा-हे अग्ने, अश्व के समान आगे ले जाने वाले तुमको हम नमस्कार करते है । इसका अभिप्राय यह है कि- घोड़ा जैसे मनुष्यो को युद्ध आदि के अवसरों पर सबसे आगे ले जाता है, वैसे ही आप भी सभी देवताओ को हवि आदि प्रदान कर आगे ले आने वाले है । इसलिये हम सभी पशुओ में घोडे को सबमे ज्यादा चाहते हैं, उसी तरह ये उन सब से पहले हम आपको ही प्रणाम करते है । आपकी वन्दना हम उस समय करते है, जब कि आप यज्ञीय अनुष्ठानो के अवसरों पर उत्तर वेदि प्रभृति स्थानो मे देदीप्यमान रहते हुए हमारे मनोरथो को पूरा करने में तत्पर रहते है । 'जिन जिन मन्त्रो में जिन जिन पदार्थों की प्रधानता से स्तुति की है, उनके मन्त्रमय देवता जानने चाहिये, अर्थात् जिस जिस मन्त्र का जो जो अर्थ होता है, वही उसका देवता कहलाता है' ( पृ० ३ ९ ० ) यह कथन एकदम गलत है, क्योकि उक्त निरुक्त वाक्य का यह अर्थ हो ही नही सकता । अर्थ की प्रधानता मानने पर जब स्तुति में अर्थ को ही प्रधानता होगी, तो उस स्थिति में वह अर्थ मन्त्रमय कैसे हो सकता है? इसी तरह से 'मन्त्र से भिन्न अर्थ का संकेत बताने के लिये ही निघण्टु मे व्याख्या की जाती है' ( पृ० ३८ ९ ) यह कथन भी इसलिये गलत है कि सभी जगह तो मन्त्र से भिन्न अर्थ का हो प्रकाशन किया जाता है । मन्त्र से कोई संकेत प्रकाशित नहीं होता, किन्तु संकेत का ग्रहण निघण्टु आदि की सहायता से कर लेने पर मन्त्र के पदो से मन्त्र के अर्थ का ज्ञान होता है । यद्यपि मनुष्य, देवता अथवा ईश्वर भी मन्त्र का निर्माता नही है, क्योकि 'वाचा विरूपनित्यया ' इस तरह की श्रुतियों वेद की नित्यता का प्रतिपादन करती है, तथापि मनुष्य प्रभृति में ईश्वर प्रत्येक कल्प के प्रारम्भ मे नित्य सिद्ध वेदो के सम्प्रदाय को पुनः प्रचलित करता है । परमेश्वर ने आग्रह से प्राप्त ऐश्वर्य के कारण अन्य देवतागण और अपने तपोबल से प्राप्त ईश्वर के अनुग्रह से ऋषिगण इन वेदमन्त्रों का साक्षात् दर्शन करते हैं । अन्य मनुष्य शिष्य और उपाध्याय की परम्परा से इनका ज्ञान प्राप्त करते है, यहो वस्तुस्थिति है । 'जिस जिस ऋषि ने जिस जिस मन्त्र के अर्थ को प्रकाशित किया है, उस उस ऋषि का नाम उस मन्त्र के साथ जोड़ दिया गया है' (पृ० ३८ ९ ) यह कथन भी इसलिये सही नही है कि इसकी कोई संगति नही बैठती । प्रकाश पद का अर्थ आप अध्यापन
पृष्ठ 826
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७२४ नामोल्लेख कृतोऽस्ति' ( पृ० ३८९ ) इति, तदपि न सङ्गतम्, अनुपपत्तेः । प्रकाशपदेनाध्यापनं व्याख्यानं वा? नाद्यः, प्रमाणाभावात् । समाख्यादिबलेनाध्यापनं निश्चीयते । न च सर्वेषामृषीणां नामभिः समाख्या दृश्यते, नापि व्याख्यानम्, तदनुपलम्भात् । ऋषिर्दर्शनादित्युक्तरीत्या मन्त्रदर्शनादेव षत्वम् । तच्च बृहद्देवतानुक्रमण्यादिग्रन्थं पारम्पर्येण च विज्ञायते नान्यथा । यदपि - ' यस्य यस्य मन्त्रस्य यो योऽर्थोऽस्ति सो सोऽर्थस्तस्य तस्य देवताशब्देनाभिप्रायार्थविज्ञापनार्थ प्रकाश्यते । एतदर्थं देवतोल्लेखनं कृतम्' ( पृ० ३८९ ) इति, तदप्यसगतम्, अर्थानामानन्त्येनानन्तदेवतात्वप्रसङ्गात् । तस्माद्या तेनोच्यते इत्यादिश्रुतिसूत्रबृहद्देवनानुसारेणैव देवता निर्णेतव्या । छन्दोऽपि छन्दःशास्त्रनियमेनैव ज्ञेयम् । उदात्तादिस्वरास्तु सम्प्रदाय-, सिद्धाः ॥ षड्जादिस्वरास्तु सम्प्रदायाननुगतत्वान्निरर्थका एव सामाजिकेष्वपि वादित्रवादनपूर्वक शुद्धस्वरसम्प्रदाया- भावात् । - ' यदपि वेदेष्वग्निवाय्विन्द्राश्विसरस्वत्यादिशब्दाना क्रमेण पाठः किमर्थः कृतोऽस्तीति प्रश्नस्योत्तररूपेण पूर्वापरविद्याविज्ञापनार्थं विद्यासङ्ग्यनुषङ्गिप्रतिविद्यानुषङ्गिबोधार्थं च' ( पृ० ३ ९ १ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, निर्मूलत्वात्, अग्निवायुविद्ययोः किमूलकः क्रम इत्यस्य निरूपयितुमशक्यत्वात् । दयानन्दीये भाष्ये सर्वथा सङ्गत्यभावः । यथोन्मत्तः कदाचित्किञ्चिदन्यदाऽन्यदसङ्गतमेव ब्रवीति, तथैव केनचिन्मन्त्रेण राजोपदेशः क्वचित्सेनापतिमन्त्र्यादिसन्देशो दृश्यते । यदपि - 'तद्यथाऽग्निशब्देनेश्वरभौतिकार्थयोर्ग्रहणं भवति । यथाऽनेनेश्वरस्य ज्ञानव्यापकत्वादयो गुणा विज्ञातव्या भवन्ति । यथेश्वररचितस्य भौतिकस्याग्नेः शिल्पविद्याया मुख्यहेतुत्वात् प्रथमं गृह्यते, तथेस्वरस्य सर्वाधारकत्वानन्त- करते है या व्याख्यान | पहला अर्थ करने में कोई प्रमाण नही है । समाख्या के आधार पर ही अध्यापन परम्परा निश्चित होती है । सभी ऋषियो के नामो के साथ ऐसी परम्परा नही जुड़ी हुई है । व्याख्यान भी इसका अर्थ नही किया जा सकता, क्योकि ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नही है । 'ऋषिदर्शनात्' इस वाक्य के आधार पर मन्त्र का द्रष्टा ही ऋषि माना जाता है, अध्यापक या व्याख्याता नही । किस मन्त्र का द्रष्टा कौन ऋषि है, इसका ज्ञान बृहद्देवता, अनुक्रमणी प्रभृति ग्रन्थो से परम्परा के अनुसार ज्ञात होता है । इसकी जानने का दूसरा कोई उपाय नही है । इसी तरह से 'जिस जिस मन्त्र का जो जो अर्थ है, वह अर्थ ही उस मन्त्र का देवता अभिप्राय को जानने के लिये मान लिया जाता है, इसीलिये देवता का उल्लेख किया जाता है' ( पृ० ३८ ९ ) यह कथन भी असंगत है, क्योंकि इस तरह से तो अर्थ की अनन्तता के आधार पर अनन्त देवता मानने पड जायँगे । इसलिये उस मन्त्र के द्वारा जिसका प्रतिपादन होता हो, वही उस मन्त्र का देवता माना जाना चाहिये और इसको जानने के लिये श्रुति, सूत्र, बृहद्देवता, अनुक्रमणी आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये । छन्द का ज्ञान भी छन्दःशास्त्र के नियम के अनुसार ही किया जाना चाहिये । उदात्त प्रभृति स्वरों का ज्ञान सम्प्रदाय परम्परा से ही जाना जा सकता है । षड्ज प्रभृति संगीत के स्वर सम्प्रदाय परम्परा से प्रचलित नही हैं, अतः वेद-पाठ के लिये वे निरर्थक है । आर्यसमाजियों में भी इन स्वरों की कोई शुद्ध परम्परा नही है, जिसकी कि वाद्य आदि के साथ संगति बैठती हो । ' वेदो में क्रमवार अग्नि, वायु, इन्द्र, सरस्वती आदि शब्दों का प्रयोग किसलिये किया है?" इस प्रश्न के उत्तर में स्वामी दयानन्द ने लिखा है - ' पूर्वापर दिशाओ को जानने के लिये, अर्थात् जिस जिस विद्या में जो जो मुख्य और गोण हेतु हैं, उनके प्रकाश के लिये ईश्वर ने अग्नि आदि शब्दों का प्रयोग पूर्वापर सम्बन्ध से किया है' ( पृ० ३ ९ १ ), किन्तु यह कथन भी एकदम निराधार है । अग्नि, वायु प्रभृति दिशाओं के क्रम का आधार बतलाना बड़ा कठिन है । दयानन्द के भाष्य में किसी तरह की संगति देखने को नहीं मिलती । जैसे कोई पागल आदमी जो जब मन में आता है, बकता रहता है, उसी तरह से स्वामी दयानन्द भी मन्त्रों का मनमाना अर्थ करते रहते है । किसी मन्त्र से वे राजा के लिये उपदेश निकालते है और कहीं सेनापति, मन्त्री आदि को सन्देश सुनाते दिखाई पडते हैं । ″ आगे वे लिखते हैं--' अग्नि शब्द से ईश्वर और भौतिक आदि कितने ही अर्थों का ग्रहण होता है, इस प्रयोजन से कि उसका अनन्त ज्ञान अर्थात् उसकी व्यापकता आदि गुणों का बोध मनुष्यों के यथावत् हो सके । फिर इसी अग्नि शब्द से
पृष्ठ 827
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात: १७२५ बलवत्त्वादिगुणा वायुशब्देन प्रकाश्यन्ते । यथा शिल्पविद्यायां भौतिकाग्नेः सहायकारित्वान्मूर्तद्रव्याधा रकत्वाच्च तदनुषङ्गि- स्वाच्च भौतिकस्य वायोर्ग्रहणं कृतमस्ति, तथैव वाय्वादीनामाधारकत्वाद् ईश्वरस्यापीति' ( पृ० ३ ९ १ ) तदपि मन्दम्, अग्नेः शिल्पविद्याहेतुत्वस्य मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु सूत्रेषु च परमेश्वरस्य देवताविशेषस्य च संस्कृताहवनीयादीनामिव निर्देशाभावात् । ईश्वरस्य ज्ञानव्यापकत्वादयोऽपि मन्त्राणां भाक्ता एवार्था न शाक्ताः । अग्न्यादिशब्दानां प्रसिद्धेष्वग्न्यादिष्वेव शक्तिग्रहस्य प्राथम्यात् । यदपि 'शिल्पविद्यायामग्नेः सहायकारित्वेन वायोर्ग्रहणमुक्तम्' इति, तदपि न किञ्चित् पार्थिवेङ्गालकाष्ठादीना , ( ) - ततोऽप्यधिकसहायकारित्वेन तेषामेव वर्णनीयत्वापातात् आग्नेयतैला पेट्रोलादि दिवर्णनस्य वेदेऽदर्शनेन न्यूनता दोषापाताच्च । यदपि — ' यथेश्वरस्येन्द्रशब्देन परमेश्वर्यवत्तादिगुणा विदिता भवन्ति, तथा भौतिकेन वायुनाप्युत्तमेश्वर्यप्राप्ति- मनुष्यैः क्रियते, एतदर्थमिन्द्रशब्दस्य ग्रहणात्' ( पृ० ३ ९ १ ) इत्याद्यपि बालभाषितम्, इन्द्रपदेनापि वायुग्रहणेनोभयोः पर्यायतापत्या पौनरुक्त्यापातात् । ऐन्द्रवायवीयमन्त्राणां निरालम्बनतापत्तेश्च । यदपि -' अश्विशब्देन शिल्पविद्याया यान- चालनादिविद्याव्यवहारे जलाग्निपृथ्वीप्रकाशादयो हेतवः प्रतिहेतवश्च सन्ति, तदर्थं वाय्वग्निग्रहणानन्तरमश्विशब्दप्रयोगो वेदेषु कृतोऽस्ति ( पृ० ३ ९ १ ) इति, तदपि वेदविरुद्धमेव, तथात्वेऽश्विशब्दस्य द्विवचनानुपपत्तेः । यत्तु--' सरस्वतीशब्देनेश्वर- स्यानन्तविद्यावत्त्वशब्दार्थंसम्बन्धरूपवेदोपदेष्टृत्वादिगुणा देदेषु प्रकाशिता भवन्ति, वाग्व्यवहाराच' ( पृ० ३ ९ १ ) इति, पृथिवी आदि भूतो के बीच मे जो प्रत्यक्ष अग्नि तत्त्व है, वह शिल्पविद्या का मुख्य हेतु होने से उसका ग्रहण प्रथम ही किया है । तथा ईश्वर के सबको धारण करने और उसके अनन्त बल आदि गुणो का प्रकाश जानने के लिये वायु शब्द का ग्रहण किया है । शिल्पविद्या में अग्नि का राहस्यकारी और मूर्त द्रव्य का धारण करते वाला मुख्य वायु ही हैं, इसलिये प्रथम सूक्त मे अग्नि का और दूसरे सूक्त में वायु का ग्रहण किया गया है' ( पृ० ३ ९१-३९ २ ), किन्तु यह कथन भी इसलिये विचारणीय है कि मन्त्र, ब्राह्मण, सूत्र ग्रन्यो में जैसे संस्कृत आवहनीय अग्नि का वर्णन मिलता है, उस तरह का वर्णन अग्नि के शिल्पविद्या में उपयोग का कही देखने को नही मिलता । इन मन्त्रो से ईश्वर के व्यापक ज्ञान का अर्थ गौण पद्धति से किया जा सकता है, शक्ति वृत्ति से नही । प्रथमतः अग्नि प्रभृति शब्द से मुख्य वृत्ति के आधार पर प्रसिद्ध अग्नि आदि अर्थ ही किया जा सकता । इसी तरह से शिल्पविद्या में अग्नि का प्रधान सहायक वायु है, इसलिये अग्नि के बाद वायु के ग्रहण की बात भी इसलिये गलत हो जायगी कि वायु की अपेक्षा पत्थर का कोयला जैसे पदार्थ अग्नि के अधिक सहायक होगे । इनका तथा पेट्रोल जैसे अग्नि के अत्यन्त सहायक ज्वलनशील पदार्थो का वर्णन वेदों में न मिलने से आपकी दृष्टि के अनुसार तो वेद मे न्यूनता दोष मानना पड जायगा । आगे आप लिखते हैं- 'ईश्वर के अनन्त गुण विदित होने और भौतिक वायु से योगाभ्यास करके विज्ञान और शिल्प- विद्या से उत्तम ऐश्वर्य की प्राप्ति करने के लिये इन्द्र शब्द का ग्रहण तीसरे स्थान पर किया है, क्योकि अग्नि और वायु की विद्या से मनुष्यों को अद्भुत अद्भुत कला-कौशल आदि बनाने की युक्ति ठीक ठीक जान पडती हैं' ( पृ० ३ ९ २ ), किन्तु यह कथन भी इसलिये सही नही है कि ऐसा मानने पर इन्द्र और वायु शब्द पर्यायवाची हो जायेंगे और इस तरह से मन्त्र मे पुनरुक्ति दोष का प्रसंग आयेगा । साथ ही इन्द्र और वायु दोनों देवताओं से सम्बद्ध मन्त्र निराधार हो जायेंगे, यदि इनकी आप स्वतन्त्र सत्ता नही मानते । इसी तरह से 'अश्वि शब्द का ग्रहण तीसरे सूक्त और चौथे स्थान मे इसलिये किया है कि उससे ईश्वर की अनन्त क्रियाशक्ति विदित हो, क्योंकि शिल्पविद्या में विमान आदि यान चलाने के लिये जल, अग्नि, पृथिवी और प्रकाश आदि पदार्थ ही मुख्य होते हैं, अर्थात् जिसने कलायन्त्र, विमान, नौका और रथ आदि यान होते है, वे सब पूर्वोक्त प्रकार से पृथिवी आदि पदार्थों से ही बनते है' ( पृ० ३ ९ २ ) यह कथन भी वेदविरुद्ध है, क्योंकि यदि ऐसा अर्थ अभिप्रेत होता, तो मन्त्रों में अश्वि शब्द के स्थान द्विवचन का प्रयोग अनावश्यक मानना पड़ जायगा । इसी प्रकार 'सरस्वती नाम परमेश्वर की अनन्त वाणी का है, जिससे कि उसकी अनन्त विद्या जानी जाती है, तथा जिससे उसने सब मनुष्यों के हित में अपनी अनन्त विद्या से भरे वेदों का उपदेश किया है । इसलिये तीसरे सूक्त और पाँचवे स्थान में सरस्वती शब्द का पाठ वेदों में किया है' ( पृ० ३ ९ २ ) यह कथन भी वेदों में नास्तिक चार्वाक मत को मान्यता देने के समान है, क्योंकि निराकार ईश्वर शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को बताने में किसी प्रकार समर्थ नही हो सकता । साथ ही यह बात भी
पृष्ठ 828
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात १७२६ तदपि वेदानां लोकायतीकरणमेव, निराकारस्य शब्दार्थ सम्बन्धोपदेष्टृत्वासम्भवात् वेदस्य शब्दार्थमम्बन्धरूपत्वाभावाच्च । वाग्व्यवहारसामान्येषु सरस्वतीपदप्रयोगादर्शनाच्च । अग्नीन्द्रवायुसरस्वत्यादिशब्दानां परमेश्वरमात्रवाचकत्वे पर्याय-तापत्ति, तत्तन्नामभि सूक्तभेदानुपपत्तिश्च । तिद्धान्ते तु ऋषिछन्दोदेवतादीनां निरूपणं कृतमेव । यदपि- वेदानामारम्भेऽग्निवाय्वादिशब्दप्रयोगे. प्रसिद्धिर्जायते ( यत् ) वेदेषु भौतिकपदार्थानामेव तत्तच्छब्दे- ग्रहणं भवति, यत आरम्भे खल्वीश्वरशब्दप्रयोगो नैव कृतोऽस्ति ' ( पृ ० ३ ९ २ ) इति प्रश्नस्य प्रतिवचनत्वेनोक्तम् 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्नहि सन्देहादलक्षणम्' इति महाभाष्यकारेण लण्सूत्रव्याख्यानोक्तन्यायेन सर्वसन्देहनिवृत्ति-भवतीति । कुतः? वेदवेदाङ्गोपाङ्गब्राह्मणग्रन्थेष्वप्यग्निशब्देनेश्वरभौतिकार्थयोर्व्याख्यानस्य विद्यमानत्वात् । तथेश्वरशब्द-प्रयोगेणापि व्याख्यानेन विना सर्वथा सन्देहनिवृत्तिनं भवति । ईश्वरशब्देन परमात्मा गृह्यते तथा सामर्थ्यवतो राज्ञः कस्यचिन्मनुष्यस्यापीश्वर इति नामास्ति । तयोर्मध्यात् कस्य ग्रहण कर्तव्यमिति शङ्काया व्याख्यानत एव सन्देहनिवृत्ति- र्भवति । अत्रेश्वरनाम्ना परमात्मनो ग्रहणमत्र राजादिमनुष्यस्येति । एवमत्राप्यग्निनाम्नोभयार्थग्रहणे नैव कश्चिद्दोषो भवति । अन्यथा कोटिशः श्लोकैः सहस्रैर्ग्रन्थैरपि विद्यालेख पूर्ति रत्यन्तासम्भवास्ति । अतोऽग्न्यादिशब्देः पारमार्थिकव्याव-हारिकयोर्विद्ययोर्ग्रहणं स्वल्पाक्षरे: स्वल्पग्रन्थैश्च भवतीति मत्वेश्वरेणाग्न्यादिशब्दप्रयोगाः कृता । यतोऽल्पकालेन पठनपाठन- व्यवहारेणाल्पपरिश्रमेणैव मनुष्याणा सर्वा विद्या विदिता भवेयुरिति । परमकारुणिकः परमेश्वरः सुगमशब्देः सर्वविद्योद्देशानु-पदिष्टवानिति विज्ञेयम् । तथा च येऽग्न्यादय शब्दार्थाः संसारे प्रसिद्धाः सन्त्येतैः सर्वैरीश्वरप्रकाश क्रियते । कुतः? ईश्वरो- ध्यान देने की है कि वेद केवल शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को बता कर ही कृतार्थ नही हो जाता । सामान्य बोलचाल की भाषा के लिये सरस्वती शब्द का प्रयोग होता भी नही । अग्नि, इन्द्र, वायु, सरस्वती प्रभूति शब्द यदि केवल परमेश्वर के हो वाचक माने जायेंगे, तो ये सब परस्पर पर्यायवाची शब्द हो जायेंगे और तब उस उस नाम के आधार पर सूक्तो में परस्पर भेद किस प्रकार किया जा सकेगा । हमारे मत के अनुसार ऋषि, छन्द, देवता प्रभृति का स्वरूप पहले ही बताया जा चुका है । तदनुसार इन सारे दोषो की निवृत्ति हो जाती है और पृथक् पृथक् देवताओ के सूक्तो की व्यवस्था मानी जाती है । इसके आगे स्वामी दयानन्द जी ने 'वेद के आरम्भ में अग्नि, वायु आदि शब्दों के प्रयोग से यह सिद्ध होता है कि-, उन्ही का ग्रहण करना चाहिये और इसीलिये लोगो ने उन शब्दो से संसार केजगत्में जिन पदार्थों का नाम अग्नि आदि प्रसिद्ध है अग्नि आदि पदार्थों को मान भी लिया है । नही तो उचित था कि जो जो शब्द जहां जहा होना चाहिये था, वहा वहा उसी का ग्रहण करते कि जिससे कभी किसी को भ्रम नही होता । अथवा आरंभ में उन शब्दों की जगह ईश्वर परमेश्वर आदि शब्दो का ही ग्रहण करना था?' इस तरह के प्रश्न को उपस्थित कर उसका समाधान इस तरह से प्रस्तुत किया है —'-यो तो ऐसा करन से भी भ्रम हो सकता है, परन्तु जब व्याख्यानों के द्वारा मन्त्रों के पद का अर्थ खोल दिया गया है, तब उनके देखने से सन्देह आपसे आप ही निवृत्त हो जाते है, क्योंकि शिक्षा आदि अंग वेद मन्त्रों के पद पद का अर्थ ऐसी रीति से खोलते है कि जिससे वैदिक शब्दार्थो मे किसी प्रकार का सन्देह शेष नहीं रह सकता । और जो कदाचित् ईश्वर शब्द का प्रयोग करते तो भी बिना व्याख्यान के सन्देह की निवृत्ति नही हो सकती, क्योकि ईश्वर नाम उत्तम सामर्थ्यवाले राजा आदि मनुष्यों का भी हो सकता है और किसी किसी की ईश्वर संज्ञा ही होती है । तथा जो सब ठिकाने एकार्थवाची शब्दो का ही प्रयोग करते, तो भी अनेक कोटि श्लोक और हजारो ग्रन्थ वेदो के बन जाने की संभावना थी । परन्तु विद्या का पारावार फिर भी नहीं आता और न उनको मनुष्य लोग कभी पढ पढ़ा सकते । इस प्रयोजन अर्थात् सुगमता के लिये ईश्वर ने अग्नि आदि शब्दों का प्रयोग करके व्यवहार और परमार्थ इन दोनो बातो को सिद्ध करने वाली विद्याओं का प्रकाश किया है, जिससे कि मनुष्य लोग थोड़े ही काल में मूल विद्याओं को जान लें । इसी मुख्य हेतु से सबके सुखार्थ परम करुणामय परमेश्वर ने अग्नि आदि सुगम शब्दों के अर्थ जो संसार में प्रसिद्ध हैं, उनसे भी ईश्वर का ग्रहण होता है, क्योंकि ये सब दृष्टान्त परमेश्वर के हो जानने और जनाने के लिये हैं ' ( पृ० ३ ९ ३ ), किन्तु यह सारा कथन भी व्यर्थ की बकवास है, किसी प्रमाण से इसका आप समर्थन नही कर सकते 4 वेद, वेदांग, उपांग, ब्राह्मण प्रभृति संपूर्ण ग्रंथों को आप समान रूप से प्रमाण कोटि में नहीं मानते । आपकी बुद्धि कीह
पृष्ठ 829
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात' १७२७ ऽस्तीति सर्वे दृष्टान्ता ज्ञापयन्तीति बोध्यम्' ( पृ० ३९२- ३९ ३ ) इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, अनुपपत्तेः । वेदवेदाङ्गोपाङ्ग- ब्राह्मणादिग्रन्थेषु तु तव प्रामाण्यबुद्धिरेव नास्ति । त्वदीयबुद्धिवैपरीत्येन त्वदभिमतसंहिताचतुष्टयातिरिक्ताना समेषा मन्त्रब्राह्मणात्मकानां वेदानामपि त्वया प्रामाण्यानभ्युपगमात् । किञ्च, मन्त्रब्राह्मणसूत्रादिभिश्चाग्निवाय्वादिशब्दा देवता- विशेषपरा विज्ञायन्ते, तथापि त्वया तन्नोपेयते । लणसूत्रे तु ' अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय.' ( पा० सू० ११ १ / ६९ ) इति सूत्रं विहायान्यत्र पूर्वेणाणग्रहण परेणेणग्रहणं कर्तव्यमिति व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्युक्ता । केनोपनिषदि 'ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये' इत्यादिप्रघट्टके ब्रह्मरूपस्य महद्यक्षस्य समक्षेऽग्निवाविन्द्रादयो हतप्रभा जाता । अग्निस्तृणमपि दग्धु न शशाक, वायुश्च तृणमादातुमसमर्थं आसीत् । तत्राग्निवायुशब्दो नेश्वरपरौ न वा भौतिकाग्निवायुपरौ, अल्पशक्तित्वादव्यवहर्तृत्वाच्च । तस्माद्यथा मृद्विकारा घटादय. परिच्छिन्नत्वादिना मृदो भिन्ना अपि मृत्प्रकृतिकत्वान्मृद्रूपा अपि तथैव विशिष्टैश्वर्थवत्त्वेन चेतनावन्तोऽग्नादयो देवता सीमितैश्वर्यवत्वेनेश्वराद्भिन्ना अपि तत्प्र- कृतिकत्वाद् ईश्वररूपा अपि । तदभिप्रायेणैव -'इन्द्र मित्रं वरुणमग्नि • एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' इत्यादिमन्त्रेरिन्द्रादि- नामभिरपि परमेश्वरस्यैव व्यपदेशोऽङ्गीकृतः । निरुपपदमीश्वरपद तु सङ्कोचकाभावान्निरतिशयैश्वर्यवदीश्वरपरमेव, ' राजा' पदं तु गौण्यैव वृत्त्या । किञ्च, सकृदुच्चरित. शब्द. सकृदेवार्थं गमयतीति रीत्या नैक्स्य शब्दस्यानेकार्थता युक्ता | आवृत्त्यादिना समाधानं तु गोरवपराहतम् । अत एवार्थकत्वादेकवाक्यतेत्यर्थभेदो वाक्यभेदप्रयोजको भवति । वाक्यभेदरच मीमासादृष्ट्या दूषणमेव । अत एव 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' इति तृतीयाश्रुत्या लैङ्गिकविनियोगबाधोऽपि सङ्गच्छते । उभयार्थतायां बलिहारी के कारण ही आपने जिन चार संहिताओ को वेद की कोटि में रक्खा है, उसके अतिरिक्त वेद की सभी अन्य सहिताएँ और ब्राह्मण ग्रन्थ आपकी दृष्टि मे प्रामाणिक नही है । मन्त्र, ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थो में अग्नि, वायु प्रभृति शब्द देवताविशेष के वाचक माने जाते हैं, इस बात को भी आप नही मानते । पाणिनि के लण् सूत्र मे तो यह ठीक ही है कि ' अणुदित्० ' इस सूत्र को छोडकर अन्य सूत्रो मे भाष्यकार के व्याख्यान के आधार पर पहले णकारसे अण् प्रत्याहार का और बाद के णकार से इण् प्रत्याहार का ग्रहण किया जाय, किन्तु प्रस्तुत प्रसंग में यह न्याय नही लागू हो सकता । केनोपनिषद् के ' ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये' इस प्रघट्टक में ब्रह्मरूप महात् यक्ष के सामने अग्नि, वायु, इन्द्र प्रभृति सभी देवगण हतप्रभ होते देखे गये हैं । अग्नि एक तिनका भी न जला सका और न बायु ही उस तिनके को उड़ा सका । यहाँ अग्नि और वायु शब्द ईश्वर के वाचक नही माने जा सकते और न भौतिक अग्नि और वायु के ही ये वाचक हो सकते है, क्योंकि इनकी शक्ति ससीम होती है । इसलिये जैसे मिट्टी से भिन्न होते हुए घट प्रभृति पदार्थ अपनी आकृति आदि के कारण सभी मिट्टी के ही विकार माने जाते हैं । उसी तरह से विशिष्ट ऐश्वर्य के कारण अग्नि प्रभृति चेतन देवता होते हुए भी अपने ऐश्वर्य की सीमित स्थिति के कारण ईश्वर से भिन्न होते हुए भी ईश्वर के ही प्रसाद से उस ऐश्वर्य के अधिकारी होने से ईश्वर के ही स्वरूप माने जाते हैं । इस्रो अभिप्राय से ' इन्द्रं मित्रं वरुणं', 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' प्रभृति मन्त्र इन्द्र आदि नाम से भी परमेश्वर का बोध कराते हैं । केवल ईश्वर शब्द निरतिशय ऐश्वर्य सपन्न परमात्मा के अर्थ मे ही मुख्यतया व्यवहृत होता है, राजा के अर्थ में इसका प्रयोग गौणी वृत्ति के आधार पर किया जाता है । एक बार उच्चारित शब्द एक हो अर्थ का बोध कराता है, इस विषय के अनुसार एक शब्द अनेक अर्थो का एक साथ बोध नहीं करा सकता । शब्द की आवृत्ति करके अनेक अर्थों का बोध कराने में गौरव दोष आयेगा । इसीलिये अर्थ की एकता के आधार पर ही वाक्य की एकता मानी जाती है और अर्थ का भेद होने पर वाक्य भी भिन्न माना जाता है । वाक्य का भेद मीमांसको की दृष्टि से दूषण माना जाता है । इसीलिये 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' इस वाक्य में तृतीया श्रुति लिंग प्रमाण के आधार पर उपस्थित -विनियोग का बाघ कर लेती है, यदि दोनों ही अर्थ वाक्य भेद के आधार पर स्वीकार्य होते, जो ऐसी परिस्थिति में बाध का प्रसंग कहाँ उठ सकता था । पारमार्थिक और व्यावहारिक अर्थभेद की कल्पना भी निराधार है । ईश्वर भी जब सृष्टि प्रभृति का कर्ता है, कर्म उपासना और ज्ञानकाण्ड में बताई गई विधि से उसकी उपासना की जाती है, तब उसमें भी तो समान रूप से व्यावहारिकता विद्यमान है । लौकिक कार्यों को ही व्यवहार शब्द से नहीं जाना जाता, शास्त्रीय व्यवहार भी इसी शब्द से बोधित होते है | अद्वैत वेदान्नी केवल
पृष्ठ 830
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७२८ तु क्व बाधावकाशः स्यात्? किच, पारमार्थिकव्यावहारिकभेदोऽपि निर्मूल एव । ईश्वरस्यापि सृष्ट्यादिकर्तृत्वेन कर्मोपासन- ज्ञानादिसमर्थनीयत्वेन च व्यावहारिकत्वाविशेषात् ॥ नहि लौकिक एव व्यवहारो भवति, शास्त्रीयव्यवहाराणामपि व्यवहार- पदव्यपदेश्यत्वात् । अद्वैतिवेदान्तिभिस्तु -प्रपञ्चातीतस्य ब्रह्मणोऽव्यवहार्यत्वेन पारमार्थिकत्वमुच्यते । न च त्वयापि तदिष्यते, अपसिद्धान्तापातात् । न चाग्न्यादिशब्दाना द्वयर्थत्वेन ग्रन्थाल्पता सम्भवति, स्वातन्त्र्येणेश्वरबोधकशब्दानामपि वेदेषु विद्य- मानत्वात् । न चेश्वराप्रतिपत्तावग्न्यादिशब्दैरीश्वरसिद्धिः सम्भवति तथात्वे विप्रतिपत्त्यनापत्त्या नास्तिक्यानापातात् । ईश्वरप्रतिपत्ती सत्यामेवाग्न्यादयो दृष्टान्तास्तत्र सम्भवन्ति न तदप्रतिपत्ती, हेतुसाध्यव्याप्त्यभावेन दृष्टान्तमात्रस्य नैरर्थक्थात् । ,, न केवलमग्न्यादिशब्देरेवेश्वरो न सिद्ध्यति किन्त्वन्यपर्यवसायिभिरीश्वरवादिभिरपि वेदवाक्यैरीश्वरो न सिद्ध्यति प्रत्यक्षादिविरोधेऽन्यपरवाक्यानां तदसाधकत्वात् । अत एवेश्वरवादिभिरप्यनन्यशेषैस्तात्पर्यवद्भिरेव वेदवाक्यैरीश्वरः साध्यते । तदनन्तरमेव सर्वेषां वेदानामवान्तरेषु तेषु तेषु स्वप्रतिपाद्यविषयेषु सत्स्वपि महातात्पर्यं परमात्मन्येव सिद्ध्यति । तदनवगतौ तु जरन्मीमांसका वेदपरायणा अपि नेश्वरमवगन्तुं प्रभवन्ति । वैदिकप्रयोगविषयविचारः - यदपि – 'तास्त्रिविधा ऋचः ' इत्यादिनिरुक्तवाक्यमुद्धृत्योक्तम्--अय नियमो वेदेषु सर्वत्र सङ्गच्छते । तद्यथा- मन्त्रास्त्रिविधानामर्थानां वाचका भवन्ति । केचित्परोक्षाणां केचित्प्रत्यक्षाणां केचिदध्यात्मं वक्तुमर्हाः । तत्राद्येषु प्रथमपुरुषस्य प्रयोगा भवन्ति, अपरेषु मध्मस्य, तृतीयेषूत्तमस्य । तत्र मध्यमपुरुषप्रयोगार्थो द्वौ भेदौ स्तः । यत्रार्थाः प्रत्यक्षाः सन्ति तत्र मध्यमपुरुषयोगा भवन्ति, यत्र च स्तोतव्या अर्थाः परोक्षाः स्तोतारश्च खलु प्रत्यक्षास्तत्रापि मध्यमपुरुषप्रयोगो भवति । अस्यायमभिप्रायः – व्याकरणरीत्या प्रथममध्यमोत्तमपुरुषाः क्रमेण भवन्ति । जडपदार्थेषु प्रथमपुरुष एव, चेतनेषु मध्यमो- प्रपंचातीत ब्रह्म को ही सभी प्रकार के व्यवहार से अतीत होने से पारमार्थिक सत्ता वाला मानते है । आप तो इस सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करते, क्योकि यह बात आपके सिद्धान्त के विपरीत है । अग्नि शब्द के दो अर्थ होने मात्र से ग्रन्थ के आकार मे लघुता आने की बात भी समझ में नही आती, जब कि स्वतन्त्र रूप से ईश्वर के बोधक अनेक शब्द वेद में विद्यमान है । जो लोग ईश्वर को नही मानते, उनको अग्नि प्रभृति शब्दों की सहायता से ईश्वर का ज्ञान नही हो सकता, क्योकि यदि ऐसा हो जाय तो फिर ईश्वर विषयक सन्देह ही जब निवृत्त हो जायगा तो कोई नास्तिक कैसे रह सकता है । ईश्वर को स्वीकार कर लेने पर ही अग्नि प्रभृति के दृष्टान्त से उसको समझा जा सकता है, इसके अभाव मे नही । जब तक हेतु और साध्य की व्याप्ति का ज्ञान नही होता, तब तक कोरा दृष्टान्त किसी बात को सिद्ध नही कर सकता । केवल अग्नि प्रभृति शब्दों से ही ईश्वर की सिद्धि नही होती, किन्तु अन्य किसी अर्थ मे पर्यवसित होने वाले ईश्वरवादी वेदवाक्य भी ईश्वर को सिद्ध करने में समर्थ नही हो सकते, क्योकि प्रत्यक्ष प्रभृति प्रमाणों का विरोध हो जाने पर अन्य- परक वाक्य इस तरह के अर्थ को सिद्ध करने में समर्थ नही हो पाते । इसीलिये ईश्वरवादी दार्शनिक पहले किसी दूसरे अर्थ को न बोधन करने वाले किसी न किसी तात्पर्य से समन्वित वेद वाक्यों से ही ईश्वर को सिद्ध करते है और उसके बाद सभी वेद वाक्यो का उन उन अवान्तर प्रतिपाद्य विषयो के रहते हुए भी महातात्पर्य ( अन्तिम अभिप्राय ) परमात्मपरक ही मानते है । ऐसा न मानने के कारण ही प्राचीन मीमासक वेदो को प्रमाण मानते हुए भी ईश्वर को स्वीकार नही करते । वैदिक प्रयोग विषयक विचार इस प्रकरण में स्वामी दयानन्द 'तास्त्रिविधा ऋच " इस निरुक्त वचन को उद्धत कर लिखते हैं- 'वेदों के सब मन्त्र तीन प्रकार के अर्थों को कहते हैं? कोई परोक्ष अर्थात् अदृश्य अर्थों को, कोई प्रत्यक्ष अर्थात् दृश्य अर्थों को और कोई अध्यात्म अर्थात् ज्ञानगोचर आत्मा और परमात्मा को । उसमें परोक्ष अर्थ के कहने वाले मन्त्रों में प्रथम पुरुष, अर्थात् अपने और दूसरे के कहने वाले जो - 'सो' और 'वह' आदि शब्द हैं, तथा उनकी क्रियाओं के अस्ति भवति, करोति, पचति इत्यादि का प्रयोग होता है । एवं प्रत्यक्ष अर्थ के कहने वालों में मध्यम पुरुष 'तू' 'तुम' आदि शब्द और उनकी क्रिया के असि भवसि " करोषि पचसि इत्यादि प्रयोग है, तथा अध्यात्म अर्थ