वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 831–840
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 831–840
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apur Vem at U my m & all terme m वेदार्थपारिजातः १७२९ त्तमौ1 अयं सार्वत्रिको नियमः । परन्तु वैदिकव्यवहारे जडेऽपि प्रत्यक्षे मध्यमपुरुषप्रयोगा भवन्ति । तत्रेद बोध्यम्—जडाना पदार्थानामुपकारार्थं प्रत्यक्षकरणमात्रमेव प्रयोजनमिति । इमं नियममबुध्वा वेदभाष्यकारे. सायणाचार्यादिभिस्तदनुसारतया स्वदेशभाषयानुवादका रैर्यूरोपदेशनिवासिभिर्वेदेषु जडपदार्थाना पूजास्तीति वेदार्थोऽन्यथैव वर्णित: ' ( पृ० ३ ९ ४ ) इति, तदेतन्मूर्खजनप्रतारणमेव, त्वदुक्तार्थस्य निर्मूलत्वात् । मध्यमपुरुषप्रयोगार्थी द्वौ भेदी इत्यादिप्रयोगाणां शुद्धिस्तु चिन्त्येव । , वस्तुतस्तु सम्बोद्धयत्वविशिष्टचेतनेषु युष्मत्पदप्रयोगो भवति अहङ्कारविशिष्टचेतनेऽस्मत्शब्दप्रयोगो भवति । जडेषु तु चेतनदेवताभिप्रायेणैव युष्मत्पदप्रयोगो भवति । यथा चैतत्तथा -' अभिमानिव्यपदेशस्तु' ( ब्र ० सू० २|| १ | ५ ) इति निर्देशादिभि- रुक्तमेव । 'जनदार्थानामुपकारार्थं प्रत्यक्षण करणमात्रमेव ' इति वाक्यस्य प्रकृते कि प्रयोजनम् । कथं च तावता तत्र मध्यमपुरुषप्रयोगः समर्थ्यंते? इति तु स एव विजानातु । पूर्वोक्तनिरुक्तप्रघट्टकेन तु मनागव्यस्यार्थस्य न सम्वन्धः । अथ निरुक्तवचनं तदर्थश्च प्रस्तूयते -'तास्त्रिविधा ऋचः, परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्च । तत्र नि० ७ १ ), 'अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगा- परोक्षकृता सर्वाभिर्नामविभक्तिभिर्युज्यन्ते प्रथमपुरुषश्चाख्यातस्य ।', (स्त्वमिति चैतेन सर्वनाम्ना अथापि प्रत्यक्षकृता स्तोतारो भवन्ति परोक्षकृतानि स्तोतव्यानि । अथाध्यात्मिक्य उत्तम- पुरुष योगा अहमिति चैतेन सर्वनाम्ना' ( नि० ७७२ ) । अत्र विच्छिद्य वचनान्युद्धृतानि, तदुदाहरणानि च नोद्धृतानि । तत एव स्वाच्छन्द्येन निरुक्तनाम व्यपदिश्यासङ्गतः सिद्धान्त उपस्थापितः । तदर्थास्त्वेवं विभज्य ज्ञातव्याः-ता ऋचस्त्रिविधा के कहने वाले मन्त्रो में उत्तम पुरुष मै, हम आदि शब्द और उनकी अस्मि भवामि, करामि, पचामि इत्यादि क्रियाए आती हैं । तथा जहाँ स्तुति करने के योग्य परोक्ष और स्तुति करने वाले प्रत्यक्ष हो, वहाँ मी मध्यम पुरुष का प्रयोग होता है । यहाँ यह अभिप्राय सम-झना चाहिये कि व्याकरण की रीति से प्रथम, मध्यम जोर उत्तम पुरुष अपनी अपनी जगह होते है । अर्थात् जड पदार्थों में प्रथम हो, चेतन मे मध्यम या उत्तम ही होते है । यह तो वेद और लोक के शब्दो मे साधारण नियम है । परन्तु वेद के प्रयोगो में इतनी विशेषता होती है कि जड पदार्थ भी " प्रत्यक्ष हो, तो वहाँ निरुक्तकार के उक्त नियम से मध्यम पुरुष का प्रयोग होता है और इससे यह भी जानना आवश्यक है कि ईश्वर ने संसारी जड पदार्थों को प्रत्यक्ष करा के केवल उनसे अनेक उपकार लेना जनाया है, दृमरा प्रयोजन नही है । परन्तु इस नियम को न जानकर सायणाचार्य आदि वेदो के भाष्यकारो तथा उन्ही के बताये हुए भाष्यो के अवलम्ब से यूरोप देशवासी विद्वानों ने भी, जो वेदो के अर्थों को अन्यथा कर दिया है, सो यह उनकी भूल है । इसी से वे ऐसा लिखते हैं कि वेदों में जड पदार्थों की पूजा पाई जाती है, जिसका कि कही चिह्न भी नही है' ( पृ० ३ ९ ४- ३ ९ ५ ) । वस्तुतः ये सब बातें ठग-विद्या को है, क्योकि उनका यह सारा कथन बिना प्रमाण का है । ' मध्यमपुरुषप्रयोगार्थी द्वौ भेदौ' इस तरह के वाक्य व्याकरण की दृष्टि से कैसे शुद्ध माने जा सकते है? वास्तविक स्थिति यह है कि जब वेतन पदार्थ को सम्बोधित करना रहता है, तब मध्यम पुरुष का प्रयोग होता है और अहङ्कार से विशिष्ट चेतन में उत्तम पुरुष का । जड पदार्थो में मध्यम पुरुष का प्रयोग चेतनदेवता के अभिप्राय से किया जाता है । इस विषय पर विस्तृत विचार ' अभिमानिव्यपदेशस्तु' इस वेदान्त सूत्र का प्रमाण देकर पहले ही किया जा चुका है । जड पदार्थों का प्रत्यक्ष कराकर उनसे उपकार लेने का यहाँ क्या प्रयोजन हो सकता है और इसके आधार पर मध्यम पुरुष के प्रयोग का समर्थन कैसे किया जा सकता है? इस बात को तो वे ही बता सकते है । प्रस्तुत प्रकरण में उद्धृत निरुक्त के इस प्रघट्टक का तो उनकी इस बात से कोई भी सम्बन्ध नही है । निरुक्त के इस प्रघट्टक का वास्तविक अभिप्राय लिखने से पहले यह बता देना आवश्यक है कि स्वामी दयानन्द ने निश्क्त के पूरे प्रघट्टक को उसी रूप में उद्धृत न करके उसके कुछ वचनों को छोडकर उक्त वाक्यावली बनाई है । साथ ही उदाहरण वाक्यो को पूरी तरह से छोड दिया है । इस तरह से मनमाने तरीके से निरुक्त के वाक्यो का उपयोग कर वे निरुक्त के नाम से अपने गलत सिद्धान्त का प्रतिपादन करते है । इतनी सूचना देने के बाद अब इस निरुक्त के वाक्यों का अलग अलग अर्थ प्रस्तुत करते हैं --मन्त्र तीन प्रकार के होते हैं । इनमें से कुछ परोक्षकृत, कुछ प्रत्यक्षकृत और कुछ आध्यात्मिक अर्थ को बताते हैं । इस वाक्य का यह अभिप्राय किसी भी तरह से नही निकाला जा सकता कि सभी मन्त्रों के तीन प्रकार के अर्थ होते हैं । ऐसा हो भी नही सकता, क्योंकि २१७
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वेदार्थपारिजातः १७३० भवन्ति । तासु काश्चित् परोक्षकृताः काश्चित्प्रत्यक्षकृताः काश्चित्तु आध्यात्मिक्यः । नह्यत्र सर्वा ऋचस्त्रिविधार्थका भवन्ती- त्यर्थः सम्भवति । नहि सर्वासु प्रत्यक्षकृतत्वपरोक्षकृतत्वादिकं सम्भवति, परस्परविरुद्धत्वात् । अत एव तेषां लक्षणानि पृथ- गेवोक्तानि । तत्र परोक्षकृतामृचां लक्षणमुच्यते --- याः सर्वाभिर्नामविभक्तिभिर्युज्यन्ते प्रथम पुरुषश्चाख्यातस्य ताः परोक्षकृताः । तदुदाहरणानि चोच्यन्ते – तत्र प्रथमाविभक्ताबुदाहरणम्–तत्र इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेऽधिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः ' ( ऋ० सं० १०।८९।१० ) रेणोर्वैश्वामित्रस्येयमाषं सूर्यस्तुत्येकाहे निष्कैवल्ये विनियुक्ता ' ( आ ० श्री० सू० ९८ ) । इन्द्रो दिव ईशे ईष्टे, इन्द्र एव पृथिव्या ईष्टे, इन्द्र एवापामीष्टे वर्ष कर्मादिना, इन्द्र एव पर्वतानां मेघानामीष्टे, इन्द्र एव वृधाम् अति- प्रवृद्धाना भूतानामपीष्टे, इन्द्र एव मेऽधिराणां यज्ञैस्तद्वतामीष्टे, इन्द्र एव हि योगे अर्थसंयोगे प्राप्तव्ये क्षेमे च परिपालने कर्तव्ये आह्वातव्यः, नान्यः कश्चित् समर्थ एतत्सर्वं कर्तुमित्यर्थः । तदेतत् प्रथमाया उदाहरणम् । इन्द्र इत्येतस्मादुपपदात् ईश इत्येष प्रथमपुरुषो नोत्तमपुरुषः । 'इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः । इन्द्रं वाणीरनूषत ||' ( ऋ० स० १/७/१ ) । 'मधुच्छन्दस आषं महाव्रते महदुक्थे शिरसि शस्यते' ( ऐ० आ ० ५/२/१ ) | गाथिनः सामगा इन्द्रमेव यूयं बृहता साम्नाभिष्टुत । हे होतारो यूयमपि अर्किणः अर्केभिङ्मयैर्मन्त्रैरिन्द्रमेवाभिष्टुत । हे अध्वर्यवः । यूयमपि इन्द्रमेव वाणीभिः वाग्भिर्यजुर्मयीभिः अनूषत अभिष्टुत -इति द्वितीयाया उदाहरणम् । ' इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषाणा आपो न सृष्टा अधवन्त नीचीः । दुर्मित्रासः प्रकलविन्मि- माना जहुर्विश्वानि भोजना सुदासे ॥ ' ( ऋ ० सं० ७ १८ १५ ) इन्द्रेणैते तृत्सवो दारयितव्या मेघा वेविषाणाः पुनः पुनर्व्याप्य- माना आप इव केनचित्सृष्टा नीची: नीचैः अधवन्त अगच्छत् । उच्चैर्गतय एते सन्ति, इन्द्रबलादेषां नीचैर्गतयः सम्पन्नाः । किञ्च, दुर्मित्रासः सुमित्रा अपि सन्तो ये अतिसन्धानपरास्ते दुर्मित्राः के ते प्रकलविदः वणिज इत्यर्थः । ते यत्राऽभिद्रोहवशात् किञ्चिद् द्रव्यमल्पमेव ददत्येवमेते मेघाः पूर्वमल्पोदकदातारो भूत्वा इन्द्रेण विश्वानि सर्वाणि भोजनानि उदकानि सुदासे परोक्षकृत और प्रत्यक्षकृत अर्थ परस्पर विरोधी है, उनकी एक साथ स्थिति कैसे रह सकती है । इसीलिये निरुक्तकार ने इन तीनो के अलग अलग लक्षण बताये हैं । उनमें परोक्षकृत का लक्षण यह किया गया है कि जिनमें सभी नाम और विभक्तियों में साथ प्रथम पुरुष की क्रिया सम्बद्ध हो, वे मन्त्र परोक्षकृत कहलाते हैं । प्रथमा विभक्ति के उदाहरण के रूप में वहीं 'तत्र इन्द्रो वृधा० ' यह मन्त्र दिया गया है । आश्वलायन श्रौतसूत्र के अनुसार इस मन्त्र के ऋषि विश्वामित्र गोत्र के रेणु हैं । सूर्य देवता की स्तुति इसमें की गई है और उसका विनियोग एका निष्कैवल्य सत्र में किया गया है । मन्त्र का अर्थ यह है कि इन्द्र हो आकाश का और पृथिवी का भी स्वामी है । इन्द्र जल का भी स्वामी है, क्योंकि वही वर्षा कराता है । इन्द्र ही पर्वत और बादलो का स्वामी है । यह इन्द्र ही अत्यन्त प्रभावशाली सभी प्राणियों का स्वामी है । इन्द्र ही मेरे जैसे यज्ञ करने वाले सभी प्राणियों का स्वामी है । इस इन्द्र को हो धन-सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये और उसकी रक्षा के लिये पुकारना चाहिये । इन सब कार्यों को करने में इन्द्र के सिवाय दूसरा कोई व्यक्ति समर्थ नही हो सकता । इस मन्त्र में ' ईशे' यह प्रथम पुरुष का प्रयोग है, उत्तम पुरुष का नही । इस प्रकार यह मन्त्र प्रथमा विभक्ति के साथ प्रथम पुरुष का प्रयोग होने से परोक्षकृत श्रुति का उदाहरण है । ' इन्द्रमिद्गाथिनो० ' इस मन्त्र का ऋषि मधुच्छन्दा है और महाव्रत के अवसर पर महदुक्थ के शीर्षभाग में इससे स्तुति की जाती हैं । हे सामगान करने वालों, आप लोग बृहत्साम से इन्द्र की ही स्तुति कीजिये । हे होता गण, आप लोग भी ॠडुमन्त्रों से इन्द्र की ही स्तुति कीजिये । हे अध्वर्युगण, आप लोग भी यजुर्मयी वाणी से इन्द्र की ही स्तुति कीजिये । यह द्वितीया विभक्ति का उदाहरण है । 'इन्द्रेण एते ० ' यह तृतीया विभक्ति का उदाहरण है । इन्द्र इन तुत्सुओं का नाश कर उसी तरह नीचे गिरा देंगे, जैसे कि बार- बार आकाश में व्याप्त होने वाले बादलों का जल इन्द्र के वज्र के प्रहार से नीचे बरस जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि इन्द्र के द्वारा पराजित किये गये तृत्सुगणों की आकाश में विचरण की शक्ति समाप्त हो गई है, अतः अब वे नीचे की ओर चले गये हैं । भले जादमी होते हुए भी अपने मन की मलिनता के कारण गिनती करने में प्रवीण वणिक् जन दुर्मित्र के नाम से जाने जाते हैं । बनिया जैसे कुटिलता के कारण अधिक द्रव्य नही दे पाता, उसी तरह से जब मेघ भी अधिक जल नहीं बरसाते, उस स्थिति में इन्द्र ही इनमें3 -
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वेदार्थपारिजातः १७३१ राजनि यजमाने जहुः । अवयवप्रत्यवयवा हि कलाः प्रकलाशब्देनोच्यन्ते । तेषु वणिगेव कुशलो भवति, गणितकुशलत्वात्- इति तृतीयाया उदाहरणम् । ' इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् । धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे ॥ ' ( ऋ० सं ० ८ ९ ८११ ) नृमेधस आर्षम् । सात्रिष्वहस्सु स्तोत्रियानुरुपवर्गे तृतीयसवने ब्राह्मणाच्छंसिनः शस्त्रे विनियुक्ता ॥ हे उद्गातारः! इन्द्राय बृहत्साम गायत विप्राय मेधाविने बृहते महते धर्मकृते कृतधर्मणे विपश्चिते विदुषे पनस्यवे आत्मनः स्तुतिमिच्छते इति चतुर्थ्या उदाहरणम् । ' नेन्द्रादृते पवते धाम किचन' ( ऋ ० सं० ९ ६९ ६ ) । इन्द्रादृते सोमः प्रातःसवनादीनां किञ्चिदपि न पवते प्रयते—इति पञ्चम्या उदाहरणम् । ' इन्द्रस्य नु वीर्याणि' ( ऋ० सं ० १ | ३२| १ ) इन्द्रस्य वीर्याणि कर्माणि अहं प्रवोचम्- ' ' ( ):, इति षष्ठ्या उदाहरणम् । इन्द्रे कामा अमसत दिव्यासः ऋ० सं ० हे स्तोतार ये दिव्याः कामा ये च पार्थिवास्ते इन्द्रे उपनिबद्धा - इति सप्तम्या उदाहरणम् । अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगाः, मध्यमेन पुरुषेण ये संयुक्तास्ते प्रत्यक्षकृताः । त्वमिति चैतेन सर्वनाम्ना संयुक्तास्ते च प्रत्यक्षकृताः । यत्र त्वमिति श्रूयते तत्राविद्यमानमपि मध्यपुरुषयुक्तमाख्यातमध्याहार्यम् । यत्र मध्यमपुरुषयुक्त- माख्यातं श्रूयते तत्राविद्यमानमपि त्वमित्येतत् सर्वनामाध्याहार्यम्, सम्बन्धितशब्दत्वादुभयोः । त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसस्त्वं वृषेन् वृषेदसि ॥ ' ( ऋ ० सं ० १० १५३२ ) हे इन्द्र" त्वं बलादधिजायसे सहसः अभिभवनसामर्थ्याद् ओजसः तेजसश्च । किञ्च, वृषन् वर्षितः, वृषासि वर्षितासि । इति त्वमिनियुक्त स्योदाहरणम् । 'वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृवन्यतः । यो अस्माँ अभिदासत्यधरं गमया तमः ॥ ' (ऋ० सं ० १०।१५२।४) हे इन्द्र, विजहि न एतान् मृध. मृधकर्तृन् शत्रन् । किञ्च, नीचै. यच्छ तान् योऽस्माभिः सह पृतन्यति पृतनां कर्तुमिच्छति । योऽस्मां अभिदासति अभ्युपक्षयितुमिच्छति तम् अधरं गमय । तमो नाशयेति शेषः । इति मध्यपुरुषयुक्तमन्त्रोदाहरणम् । वर्तमान सारे जल को अपने यजमान राजा के लिये बरसा देता है । कला के अवयव और उन अवयवो के भी प्रत्यवयव प्रकला के नाम से प्रसिद्ध है । इनकी गिनती मे बनिये ही कुशल होते हैं । 'इन्द्राय साम ० ' यह चतुर्थी विभक्ति का उदाहरण है । इस मन्त्र का ऋषि नृमेधा है । इस मन्त्र से स्तोत्रिय तृतीय सवन मे ब्राह्मणाच्छंसी शस्त्र का गान करते है । हे सामगान करने वालो, आप लोग इन्द्र देवता की स्तुति में बृहत्साम का गान कीजिये | यह इन्द्र बडा मेधावी है । महान् धर्म का आचरण करने वाला है, बड़ा विद्वान् है और चाहता है कि मेरी कोई स्तुति करे । ' नेन्द्रादृते ० ' यह पंचमी विभक्ति का उदाहरण है । इन्द्र की सहायता के बिना सोम प्रातः सवन प्रभृति में कभी स्थान नही पा सकता | ' इन्द्रस्य नु वीर्याणि ० ' यह षष्ठी विभक्ति का उदाहरण है । ऋषि कहता है कि मै इन्द्र के बलशाली कार्यों का वर्णन करता हूँ । ' इन्द्रे कामा ० ' यह सप्तमी विभक्ति का उदाहरण है । इसमें बताया गया है कि हे स्तुति करने वालो, इन्द्र में उन सभी कामनाओं को पूरी करने की सामर्थ्य विद्यमान है, जो कि स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में प्राप्त हो सकती हैं । ये सब उन परोक्षकृत श्रुतियों के उदाहरण है, जिनमें कि प्रथम पुरुष की क्रिया आती है । प्रत्यक्षकृत श्रुतियाँ वे कहलाती है, जिनमें कि मध्यम पुरुष की क्रिया आती है । साथ ही जिन श्रुतियो में त्वम् इस सर्वनाम का उल्लेख हो, वे भी प्रत्यक्षकृत कहलाती है । जहाँ 'त्वम्' इस सर्वनाम का उल्लेख हो, वहाँ मध्यम पुरुष की क्रिया के न रहने पर भी उसका अध्याहार कर लिया जाता है । इसी तरह से जहाँ मध्यम पुरुष की क्रिया हो वहीं 'त्वम्' इस सर्वनाम को अविद्य-मानता में भी उसका अध्याहार कर लेना चाहिये, क्योंकि ये दोनों परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध है । 'त्वमिन्द्र० ' यह मन्त्र 'त्वम्' सर्वनाम से युक्त प्रत्यक्षकृत श्रुति का उदाहरण है । हे इन्द्र, तुम बल, ओज और सह इनमें विद्यमान सब को अभिभूत करने वाली सामर्थ्य के साथ पैदा होते हो और तुम ही सबकी कामनाओं को पूरा करने वाले हो । 'वि न इन्द्र० ' यह मन्त्र मध्यम पुरुष की क्रिया से युक्त प्रत्यक्षकृत श्रुति का उदाहरण है । हे इन्द्र, तुम हमारे इन विघ्न उत्पन्न करने वाले शत्रुओं को मार डालो और जो हमारे साथ झगड़ा करना चाहता है, उसको तुम नीचे गिरा दो । जो हमें अभिभूत करना चाहता है, उसको तुम नीच योनि में गिरा दो, उसको अन्धकार में डाल दो ।
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वेदार्थपारिचातः १७३२ अथापि कचित् प्रत्यक्षकृता. स्तोतारो भवन्ति कचिद्युष्मत्प्रयोगेः स्तोतारः सम्बद्धयन्ते । तद्यथा -'मा चिदन्य- द्विशसत सखायो मा रिषण्यत । इन्द्रमित् स्नोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत । (ऋ० स० ८| १ | १ ) प्रगाथस्येयमार्षम्, बृहती तृचाशीतिषु विनियुक्ता । हे स्तोतार. सखायः, मान्यत् किञ्चिदपि देवतान्तरं शंसत विविधाभि: स्तुतिभिः । मा च रिषन्यत चेतसा मा गच्छतान्यद्देवतान्तरम् । किं तर्हि इन्द्रमेव वृषणं वर्षितारं स्तुत सचा सहभूता एतस्मिन् सुते सोमे मुहुर्मुहुश्च - हे होतारः उक्थानि शंनत । एवमाद्यासु युष्मद्गुणप्रयोगे सम्बद्धाः स्तोतारः स्तोतव्यानि यानि देवतान्तराणि तानि तानि परोक्षकृताभिसम्बन्धीनि । अथाध्यात्मित्रयः । उत्तनपुरुषयोगा अहमिति चैतेन सर्वनाम्ना या युक्तास्ताश्चाध्यात्मिक्यः । पूर्ववदत्राप्युत्तम- पुरुषप्रयोगेणाविद्यमानमप्यहमिति सर्वनामाध्याहर्तव्यम् । यत्राहमित्येतत्सर्वनाम श्रूयते । तत्राविद्यमान पप्युत्तमपुरुषसम्बद्धस् आख्यातमध्याहर्तव्यम् ॥ तस्याप्युदाहरणं तत्रैवोक्तम् -- यथैतदिन्द्रो वैकुण्ठो लवसूक्तं वागाम्भृणीयमिति । तत्र ब्राह्मणप्रसिद्ध- माख्यानमुद्दधार दुर्गाचार्य: -' विकुण्ठा नामासुरी बभूव । तस्याः किल तपसः प्रभावेणापत्यत्वमिन्द्र आजगाम वैकुण्ठो नाम बभूव । तस्यात्मस्तुतिप्रयुक्तमेवादिब्रह्म प्रादुरभूत् । 'अहं भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरह धनानि संजयामि शश्वतः । मा हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहं दाशुषे विभजामि भोजनम् ॥ ' ( ऋ० स ० १०२४८/ १ ) अहमेव वसुनो धनस्य पूर्व्यः प्रथमः पति । किञ्च, साम्प्रतमप्यहं पतिः अहमेव च शत्रुभ्यः साकाशात् समस्तानि धनानि जयामि शश्वतो नित्यकालमेव मामेव हवन्ते आह्वयन्ति पितरं न पितरमिव तासु तास्वातिषु जन्तवः । अहमेव दाशुषे हवीषि दत्तवते यजमानाय विभजामि यथायोग्यं भोजनं धनम् । 'इति वा इति मे मनो गामश्वं सनु- कभी कभी श्रुतियो मे स्तुति करने वालो को भी मध्यम पुरुष की क्रिया से सम्बद्ध देखा जाता है । यह भी प्रत्यक्षकृत श्रुति का ही उदाहरण माना जाता है । जैसे कि 'मा चिदन्य० ' इस मन्त्र में है । इस बृहती छन्द के मन्त्र का ऋषि प्रगाथ है, तृषाशीति में यह विनियुक्त है । हे स्तुति करने वाले मित्रों, हम लोग अन्य किसी देवता की स्तुति मत करो और अपने मन को भी किसी दूसरे देवता की ओर मत ले जाओ, किन्तु सभी कामनाओ को पूरा करने वाले मात्र इन्द्र की ही तुम लोग स्तुति करो । तुम लोग सब मिलकर हे होतगण, इस सोम का सेवन करते समय बार बार इन्द्र सम्बन्धी उक्थ का ही स्तवन करो । इस तरह की श्रुतियों मे युष्मत् शब्द के गौण प्रयोग से सम्बद्ध स्तोतृगण उन परोक्षकृत देवताओ को स्तुति करते है, जिनका कि उसमे उल्लेख रहता है । जैसे कि इस मन्त्र में इन्द्र का परोक्षकृत देवता के रूप में उल्लेख है । आध्यात्मिक श्रुतियाँ वे कहलाती हैं, जो कि उत्तम पुरुष की क्रिया और 'अहम्' इस सर्वनाम से सम्बद्ध हों । मध्यम पुरुष के समान उत्तम पुरुष की क्रिया वाली श्रुतियो में भी उत्तम पुरुष की क्रिया के प्रयोग के आधार पर अविद्यमान रहने पर भी 'अहम्' इस सर्वनाम का अध्याहार कर लिया जाता है और जहाँ केवल ' अहम्' यह सर्वनाम सुनाई पडे, उस मन्त्र में भी इस सर्वनाम पद के आधार पर उत्तम पुरुष की क्रिया के न रहने पर भी उसका अध्याहार कर लेना चाहिये । निरुक्त में ही इसी स्थल पर वागाम्भृणीय सूक्त के मन्त्रों को उदाहरण के रूप में दिया गया है । इस वागाम्भृणीय सूक्त से सम्बद्ध ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रसिद्ध आख्यान को दुर्गाचार्य ने अपने भाष्य में इस तरह से उद्धृत किया है --कोई विकुण्ठा नाम की राक्षसो हुई थी । उसके तप के प्रभाव से इन्द्र को उसका पुत्र बनना पडा और वह वैकुण्ठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । उसकी अपनी स्तुति के रूप में ही आदि ब्रह्म का, प्रथम वाणी का प्रादुर्भाव हुआ । प्रथम मन्त्र यह है 'अहं भुव:' । इसका अर्थ इस प्रकार है - मैं ही धन का सब से पहला पति हूँ और इस समय भी सारा धन मेरे ही अधीन है । में ही शत्रुओ से सारा धन जोत कर लाता हूँ । अपने ऊपर आपत्ति आने पर सारे प्राणी अपने पिता के समान मेरी ही पुकार करते हैं । मैं ही हवि प्रदान करने वाले यजमान को उसका हिस्सा उचित रूप में बाँट कर देता हूँ । 'इति वा 'इति मे ०' इस मन्त्र में लव कहता है कि मेरा मन इस तरह से सोच रहा है । किस तरह से सोच रहा है, उसी प्रकार को बताता है कि मैं अपने स्तोताओं को गाय, घोडा आदि बहुमूल्य वस्तुएं हैं, क्योंकि मैने इनके द्वारा प्रदत्त सोम का अनेक बार पान किया है ।
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बेदार्थपारिजात. १७३३ यामिति । कुवित्सोमस्यापामिति || ' (ऋ ० सं ० १० ११ ९ ।१ ) लवो ब्रवीति - इति वै खलु इति एवं प्रकारेण मे मदीयं मनः वर्तते तं प्रकारं दर्शयति गामश्वं च सनुयां स्तोतृभ्यः प्रयच्छामि ( षणु दाने ) । इति शब्दो हतो । अस्मात्कुवित् बहुवारं सोमस्य ' सोमम् अपा पीतवानस्मि ॥ क्रियाग्रहणम् । अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिद्राग्नी अहमश्विनोभा ॥ ' ( ऋ० सं० १० १२५1१ ) वागेव ब्रवीति - अहं रुद्रेः वसुभिरादित्यैविश्वेश्च देवैः सहभूता चरामि अहमेव मित्रावरुणी उभावपि इन्द्राग्नी अश्विनी च बिर्भार्म हविषा । मत्पूर्वकहविः सम्प्रदानं सर्वदेताभ्य इत्यभिप्राय । वागाम्भृणी नाम्नी ऋषिका जगत्कारणं यद् ब्रह्म तद्रूपा भवन्ती ब्रवीति । इत्थंभावे तृतीया । अहं रुद्रादितत्त- दात्मना चरामि ब्रह्मीभूता अहमेव मित्रावरुणी अश्विनी बिर्भार्म धारणामि । इन्द्राग्नी उभावपि धारयामि । सर्वं जगच्छतो , रजतमिव मय्यध्यस्तम् जगदाकारेण परिणममानाया मायाया अधिष्ठानात्वेनासङ्गस्यापि ब्रह्मण सर्वोपादानत्व- सम्भवात् । स्वरव्यवस्थाविषयो विचारः यदुक्तम्-'ते स्वरा द्विविधा उदात्तषड्जादिभेदात् सप्त सप्तैव सन्ति । स्वयं राजन्ते इति स्वराः । आयामो दारुण्यम् अणुता खस्येत्युच्चैः कराणि शब्दस्य । आयामो गात्राणा निग्रहः, दारुण्य स्वरस्य दारुणता रूक्षता, अणुता खस्य, कण्ठस्य संवृतना उच्चैःकराणि शब्दस्य । अन्ववसर्गो गात्राणा शिथिलता, मार्दव स्वरस्य मृदुता स्निग्धता, उरुता खस्य महत्ता ,, कण्ठस्येति नीचैःकराणि शब्दस्य । स्वर्येणाधीमहे त्रिप्रकारैरभिरधीमहे कैश्चिदुदात्तगुणैः कैश्चिदनुदात्तगुणैः कैश्चिदुभय- गुणैः । तद्यथा -शुक्लगुणः शुक्लः, कृष्णगुणः कृष्णः, य इदानीमुभयगुणः स तृतीयामाख्यां लभते -कल्माष इति वा सारङ्ग 'अहं रुद्रेभि० ' इस मन्त्र में स्वयं वाणी कहती है कि मै रुद्र, वसु, आदित्य तथा अन्य सभी देवताओ के साथ विचरण करती हूँ । हवि के द्वारा में ही मित्र और वरुण, इन्द्र और अग्नि तथा दोनो अश्विनीकुमारो, इन सब युगल देवताओ का भरण-पोषण करती हूँ । इसका अभिप्राय यह है कि मेरी सहायता से ही सब देवताओ के पास हवि पहुँच पाती है । वागाम्भृणी नाम की मन्त्र का दर्शन करने वाली स्त्री ऋषि ( ऋषिका ) इस सारे जगत् के कारण ब्रह्म को अपना ही स्वरूप मानती हुई कहती है । इस मन्त्र में इत्यंभाव में तृतीया है । वह कहती है कि रुद्र आदि के रूप मे ब्रह्मस्वरूपिणी में ही सर्वत्र विचरण करती हूँ । मित्रावरुण, इन्द्राग्नि, अश्विनीकुमार प्रभृति युगल देवताओ का मैं ही पोषण करती हूँ । मेरे स्वरूप मे यह सारा जगत् उसी तरह से मिथ्या प्रतीत होता है, जैसे कि सीप में रजत का भान होता है । सीप को रजत मानना जैसे गलत है, उसी तरह से ब्रह्म को जगत् मानना भी एक भ्रमपूर्ण धारणा है । चांदी की तरह की चमक को देखकर जैसे सीप को आदमी चांदी मान लेता है, उसी तरह से जगत् के रूप में परिणत हो रही माया के कारण, उसके अधिष्ठान के रूप में विद्यमान असंग ब्रह्म भी सारे जगत् का उपादान कारण बन जाता है । वस्तुतः यही उक्त निरुक्त वाक्यावली का अर्थ है । इतना लिखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस निरुक्त वाक्यावली में से अपने मतलब का अर्थ निकालने के लिये यद्यपि इसमें के बहुत वाक्यों को निकाल दिया है, किन्तु इतना करने के उपरान्त भी वे अपना अभीष्ट सिद्ध करने में समर्थ नही हो सके हैं । स्वरव्यवस्था विषयक विचार इस प्रकरण का आरम्भ करते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं- ' अब वेदार्थ के उपयोग हेतु कुछ स्वरों की व्यवस्था कहते हैं, जो कि उदात्त 1 और षड्ज आदि भेद से चौदह प्रकार के है । अर्थात् सात उदात्त आदि और सात षड्ज आदि । उनमें से उदात्त आदि के लक्षण जो कि महाभाष्यकार पतंजलि महामुनि जी ने दिखलाये हैं, उनको कहते हैं । आप ही अर्थात् जो कि बिना दूसरे की सहायता के स्वयं प्रकाशमान है, वे स्वर कहलाते हैं । अंगों को रोकना, वाणी को रूखा करना, अर्थात् ऊँचे स्वर से बोलना और कण्ठ को भी रोक देना, ये सब यत्न शब्द के उदात्त स्वर का विधान करने वाले होते हैं । अर्थात् उदात्त स्वर इन्हीं नियमो के अनुकूल बोला जाता है । गात्रों का विलापन, स्वर की कोमलता, कण्ठ को फैला देना, ये सब यत्न शब्द के अनुदात्त स्वर के सम्पादक हैं । हम सब लोग तीन प्रकार के स्वरों से बोलते है, अर्थात् कही उदात्त, कही अनुदात्त और उदात्तानुदात्त अर्थात् स्वरित गुण वाले
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वेदार्थपारिजातः १७३४ इति वा । एवमिहापि उदात्त उदात्तगुणः, अनुदात्तोऽनुदात्तगुणः, य इदानीमुभयगुणः स तृतीयामाख्या लभते स्वरित इति । ,,, त एते तन्त्रेतरनिर्देशे सप्त स्वरा भवन्ति । उदात्तः उदात्ततर अनुदात्तः अनुदात्ततरः स्वरितः स्वरिते य उदात्तः सोऽन्येन विशिष्टः, एकश्रुतिः सप्तम । ' उच्चैरुदात्तः' इत्यादिसूत्रेषु महाभाष्ये ( भू० ३ ९ ६ ) ॥ तत्र महाभाष्यसम्मतत्वात् विप्रतिपत्तिर्नास्ति । यत्तु — ' षड्जादयः सप्त - षड्जऋषभगान्धारमध्यमपञ्चमधैवत निषादाः' ( पिङ्गलसूत्र ३६४ ) । एषां लक्षण- व्यवस्था गान्धर्ववेदप्रसिद्धा ग्राह्या' ( पृ० ३ ९ ७ ) इत्यादि तत्तु प्रकृते निरुपयोग्येव । पूर्वं तु प्रश्नोत्तरविषये प्रोक्तम् - येन येन स्वरेण वादित्रपूर्वकं गानं कर्तुं योग्यमस्ति तदर्थं षड्जादिस्वरोल्लेखनं कृतमस्तीति, तदपि कषायायितम्, तद्रीत्या षड्-जादीनामपि लक्षणस्य वक्तव्यत्वात् । किञ्च, केन प्रमाणेनैतत् सिद्धयति? मन्त्राणामुदात्तादय स्वरास्तु गुरुपारम्पर्येण स्वर- वैदिकीप्रक्रिययाऽवगन्तुं शक्यन्ते, षड्जादयस्तु कथं केन प्रकारेण ज्ञायन्ते? कस्य मन्त्रस्य को वा स्वर इति? किञ्च, कथञ्चित् स्वरज्ञानेऽपि कथं गान सम्भवति? न ह्येकस्य मन्त्रस्यानेके स्वराः सम्भवन्ति? न ह्येकेन स्वरेण गानं सम्भवति, तत्रारोहावरोह भेदस्यानिवार्यत्वात् । वस्तुतस्तु गायत्र्यादिसप्तच्छन्दसा क्रमेणैव षड्जादयो निर्धार्यन्ते । यथोक्तं पिङ्गलछन्दः सूत्रे – ' स्वराः षड्जा: । षड्जर्षभगान्धारमध्यमपञ्चमधैवतनिषादाः ।' ( पि० छ० सू० ३।६४ ) | स्वरा गायत्र्यादिषु क्रमेण द्रष्टव्या इति हलायुधः । तेन गायत्री षड्जस्वरा, उष्णिक् ऋषभस्वरा, अनुष्टुप् गान्धारस्वरा, बृहती मध्यमस्वरा, पक्तिः पञ्चमस्वरा, त्रिष्टुप् धैवत- स्वरों से यथायोग्य नियमानुसार अक्षरो का उच्चारण करते है । जैसे श्वेत और काला रंग अलग अलग है, परन्तु इन दोनो को मिला कर जो रंग उत्पन्न हो, उसका नाम तीसरा होता है, अर्थात् खाकी या आसमानी, इसी प्रकार यहाँ भी उदात्त और अनुदात्त गुण अलग अलग हैं, परन्तु इन दोनों के मिलाने से जो उत्पन्न हो, उसको स्वरित कहते हैं । विशेष अर्थ के दिखलाने वाले 'तरपू' प्रत्यय के संयोग से वे उदात्त आदि सात स्वर होते है । अर्थात् उदात्त, उदात्ततर, अनुदात्त, अनुदात्ततर, स्वरित, स्वरितोदात्त और एकश्रुति । उत्तम रीति से इन सातो स्वरो को ठोक ठीक समझ लेना चाहिये ' ( पू० ३ ९ ७ ) । यह पूरा विवरण 'उच्चैरुदात्त ' आदि पाणिनीय सूत्र के महाभाष्य के अनुसार है । इसमे हमारा कोई विवाद नही है । इसके आगे स्वामी दयानन्द लिखते है -' अब षड्ज आदि स्वरो को लिखते है, जो कि गानविद्या के भेद है । वे है - षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद । इनके लक्षण व्यवस्था सहित, जो कि गन्धर्ववेद अर्थात् गानविद्या के ग्रन्थो में प्रसिद्ध वही से जान लेना चाहिये' ( पृ० ३ ९ ७ ) । इन गानविद्या के स्वरों का प्रकृत विषय से कोई सम्बन्ध नही है । पहले भी एक जगह स्वामी दयानन्द प्रश्नोत्तर पद्धति मे यह लिख चुके है कि जिन स्वरों की सहायता से वेदमन्त्रो को गीत और वाद्य के साथ जोडा जा सकता है, इसी के लिये षड्ज आदि स्वरों का विधान किया गया है । हम वही उसका उत्तर दे चुके हैं कि यह मात्र बेसुरा प्रलाप है । इसके साथ ही उनको षड्ज आदि स्वरों का लक्षण भी बताना चाहिये था । आपको यह भी बताना चाहिये था कि इस तरह से मन्त्रों को षड्ज आदि स्वरों के माध्यम से गीत और वाद्य से जोड़ने मे क्या प्रमाण है? मन्त्रों के उदात्त प्रभृति स्वरों का ?ज्ञान तो गुरु-परम्परा से और वैदिक प्रक्रिया के सहारे जाना जा सकता है, किन्तु षड्ज प्रभृति स्वरों का ज्ञान किस तरह से होगा किस मन्त्र का क्या स्वर हैं, इस बात का किसी तरह से कुछ ज्ञान हो जाने पर भी उसका गान किस तरह से किया जायगा? एक ही मन्त्र के अनेक स्वर नही हो सकते और न एक स्वर के सहारे किसी मन्त्र का गान ही किया जा सकता है, क्योंकि गान के लिये आरोह और अवरोह स्वरों में भिन्नता अनिवार्य है । वस्तुतः गायत्री प्रभृति सात छन्दों के क्रम से हो षड्ज प्रभृति स्वरों का निर्धारण होता है । जैसा कि पिंगल के छन्दःसूत्र ------ में बताया गया है -षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद ये सात स्वर होते है । टीकाकार हलायुध का कहना. है कि ये स्वर गायत्री प्रभूति छन्दो में क्रमानुसार लगते हैं । तदनुसार गायत्री का षड्ज, उष्णिक का ऋषभ, अनुष्टुप् का गान्धार, बहती का मध्यम, पंति का पंचम, त्रिष्टुप् का चैवत और जगती छन्द का स्वर निषाद होगा । आचार्य भरत भी कहते है -'स्वर
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dmidioa Jadoon Lealt M " वेदार्थपारिजातः १७३५ स्वरा, जगती निषादस्वरा । भरतोऽपि - ' सस्वरो यः श्रुतिस्थाने स्वरन् हृदयरञ्जकः । षड्जर्षभगान्धारा मध्यमः पञ्चम- स्तथा । धैवतश्च निषादश्च स्वराः सप्त प्रकीर्तिताः ॥ ' तल्लक्षणानि च-'षड्जं ति मयूरोऽपि वृषो नर्दति चर्षभम् । अजा विरौति गान्धारं क्रौञ्चो नर्दति मध्यमम् । पुष्पसाधारणे काले कोकिलो रौति पञ्चमम् । अश्वश्च धैवतं रौति निषादं रौति कुञ्जरः ॥ ' इति । प्रत्येकमेषामुदात्तादिभेदेन त्रैविध्यम् । गायत्रमन्त्राणा षड्जस्वरेण पठनात् सन्दिग्धछन्दोनिर्णयः सम्भवति । तदर्थमिदमन्वाख्यानम् । 'तेषा सितसारङ्गपिशङ्गकृष्णनीललोहितगौरा वर्णा ' (पि० छ० सू० ३।६५ ) इति प्रत्येक वर्णा अप्युक्ताः । तथा च गायत्र श्वेतवर्णम् । औष्णिहं सारङ्गवणं शुक्लकृष्णमिश्रवर्णमित्यर्थः । अनुष्टुभं पिशङ्गगोरोचनावर्णम्, बार्हत कृष्णाभगुरु- वर्णम् । पाङ्क्ङ्कं नीलं नीलोत्पलवर्णम् । त्रैष्टुभं लोहितं इन्द्रगोपवर्णम्, जागतं गौरसिद्धार्थवणं हरिदाभं वा । प्रातिशाख्ये देवतब्राह्मणे च — ' सितञ्च सारङ्गमतः पिशङ्गं कृष्णमेव च । नील च लोहित चैव सुवर्णमिव सप्तमम् || अरुण श्यामगौरे च बभ्रु वे नकुलं तथा । ' उव्वट ऋक्प्रातिशाख्यभाष्ये । श्वेतं गायत्रम्, सारङ्गमौष्णिहम्, पिशङ्गमानुष्टुभम्, बार्हत कृष्णमगुरु- वर्णम्, नीलं वैराजम्, लोहितं त्रैष्टुभम्, सुवर्णवर्णं जागतम्, अरुणं प्रातःसन्ध्याभ्रवर्णम् पाक्तम्, कृष्णवर्णमतिच्छन्दः, गौर सिद्धार्थवर्णं विच्छन्दः, बभ्रुकपिलवणं द्वेपद छन्दः, नकुलवर्णमेकपदं छन्द इति । 'आग्निवेश्य काश्यपगोतमाङ्गिरसभार्गव- कौशिकवासिष्ठानि गोत्राणोति' ( पि० छ० सू० ३।६६ ) एभिः सप्तभिर्ऋषिभिः क्रमेणैतानि छन्दासि लोकहितार्थं प्रकाश्य दर्शितानि तत एव तेषामृषित्वम् । तेन ऋषिज्ञानाच्छन्दसा निर्णयः सम्भवति । ननु विच्छन्दसामतिच्छन्दसां च वर्णाः पिङ्गलेन कुतो नोक्ता इति तत्रोक्तं हलायुधेन कृतीनामतिच्छन्दसाञ्च निचद्भुरिजोर्विराट्छन्दसोश्च प्रवेशाभावात् कश्चिन्नास्ति संशयो यस्य निर्णयनिमित्तं वर्णोपन्यासः क्रियते । अर्थाद् गायत्र्यादि- उसको कहते हैं, जो कि कान के पास आकर गुजन करता हुआ हृदय को मोह लेता है । यह स्वर षड्ज, ऋषभ आदि के भेद के सात प्रकार का होता है' । इन स्वरो के लक्षण इस प्रकार बताये गये है-' मोर षड्ज स्वर मे बोलता है, ऋषभ स्वर साड के नर्दन के समान होता है, बकरी की बोली गान्धार स्वर का, क्रौंची का शब्द मध्यम स्वर का है, वसन्त ऋतु में कोयल का स्वर पंचम स्वर का, अश्व का हिनहिनाना धैवत स्वर का और हाथी की चिंघाड निषाद स्वर का प्रतिनिधित्व कहते है' । इनमें से प्रत्येक स्वर उदात्त, अनुदात्त और स्वरित के भेद से तीन प्रकार का होता है । इसके अनुसार गायत्री छन्द के मन्त्रों का पाठ षड्ज स्वर मे ही करना चाहिये । इस प्रकार षड्ज प्रभृति स्वरों में इन छन्दो का पाठ होने से छन्द के ज्ञान में किसी तरह का सन्देह नही रहने पाता । इस प्रकार सन्देह की निवृत्ति के लिये ही छन्दःशास्त्र में इन सात स्वरो में अलग-अलग छन्दो का पाठ करने के लिये विधान किया गया है । इससे आप की बात को किसी प्रकार का समर्थन नही मिल पाता कि गीत और वाद्य कला के साथ मन्त्रो का गान करने के लिये इन स्वरों का विधान है । छन्दःशास्त्र में षड्ज प्रभृति स्वरो के क्रमशः सित, सारंग, पिशंग, कृष्ण, नील, लौहित और गौर से सात रंग भी बताएं गये हैं । तदनुसार गायत्री छन्द का रंग गोरा, उष्णिक छन्द का रंग सारंग अर्थात् चितकबरा, अनुष्टुप् का गोरोचन के समान भरा, बृहती का अगुरु के समान काला, पंक्ति का नीले कमल के समान नीला, त्रिष्टुप् का इन्द्रवधूटी के समान लाल मौर जगती छन्द का सरसों या हरदी के समान पीला रंग होता है । प्रातिशाख्य " दैवत ब्राह्मण, ऋक्प्रातिशाख्य के उन्वटभाष्य प्रभृति ग्रन्थो में भी छन्दों के वर्णों का वर्णन मिलता है । पिंगल सूत्र में ही यह भी बताया गया है कि अग्निवेश, काश्यप, गौतम, अंगिरा, भार्गव, कौशिक और वसिष्ठ गोत्र के सात ऋषियों ने क्रम से इन सात छन्दो को लोक के कल्याण के लिए प्रकाशित किया है । इन छन्दों का प्रथम दर्शन उन्हीं को हुआ था और उन्होंने ही बाद में लोककल्याण के लिये इनका उपदेश किया, इसीलिये ये इनके ऋषि कहलाते है । इसी तरह से ऋषि का ज्ञान हो जाने से भी छन्द का निर्णय हो जाता है कि यह अमुक छन्द है । पिंगल रचित छन्दःसूत्र के टीकाकार हलायुध ने यहा शंका उठाई है कि विच्छन्दों और अविच्छन्दों के वर्णों का निरूपण आचार्य पिंगल ने क्यों नही किया? इसके बाद उन्होंने इस शंका का समाधान भी वही कर दिया है कि गायत्री प्रभृति छन्दों में अक्षर
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वेदार्थपारिजातः १७३६ छन्दसामक्षरन्यूनाधिक्येन निचृद्भूरिजादिसंज्ञाविधानात् तत्र गायत्री उष्णिग् वेति भवति सशयः । तत्र छन्दोनिर्धा- रणार्थं वर्णनिर्णयः कार्यं । कृत्यादीना तु अक्षरन्यूनाधिक्येन विशेषसंज्ञाविधानाभावात् छन्दसा सन्देहावसरो नास्ति । 'तत आदित सन्दिग्धे ' ( पि० छ० सू० ३।६१ ) इत्यत्रोक्तं यदा पञ्चविंशत्यक्षरं छन्दो भवति तदा किं प्रति- पत्तव्यम्? किं गायत्री स्वराड् उत उष्णिग् विराट् इत्येव छन्दसि आदिभूतात् पादान्निर्णयः कर्तव्य. ॥ यदि प्रथम पादो ' ' (गायत्र्यास्तदा गायत्र्यैवासौ अथौष्णिहस्तदोष्णिगिति । देवतादेश्च पि० छ० सू० ३।६२ देवतादेश्व निर्णयः कर्त्तव्यः । तदर्थमेव कस्य छन्दसः का देवतेत्यप्युक्तम् । अग्निः सविता सोमो बृहस्पतिर्वरुण इन्द्रो विश्वेदेवा देवता ' ( पि० छ ० सू० ३। ६३ ) गायत्र्यादिछन्दसा क्रमेण अग्न्यादयो देवताः । तथा च गायत्री षड्जस्वरा अग्निदेवताका शुक्लवर्णा अग्निवेश्यर्षिका, उष्णिगृषभस्वरा सवितृदेवताका कपिशवर्णा कश्यपर्षिका, अनुष्टुप् गान्धारस्वरा पीतवर्णा गोतमर्षिका, बृहती मध्यमस्वरा कृष्णवर्णा आङ्गिरसषिका, त्रिष्टुप् धैवतस्वरा इन्द्रदेवताका रक्तवर्णा कौशिकर्षिका, जगती निषादस्वरा गौरवर्णा विश्वेदेव-देवताका वशिष्ठर्षिका 1। तेन सर्वेषु मन्त्रेषु गायत्र्यादिछन्दसां निर्देशेनैव सर्वेषा निर्देशो गतार्थ, छन्दसामसन्देहेन ज्ञानार्थमेव तेषामुपयोगात् 1। तथापि नि. श्रेयसार्थ छन्दसामृषिदेवतास्वस्ववर्णाना ज्ञानमपेक्षितम् । तदुक्तं तत्रैव हलायुधेन -'ऋषिस्वर- वर्णानां ज्ञानान्निःश्रेयसमिच्छन्ति छान्दसाः । योगी याज्ञवल्क्योऽपि--- 'यस्तु जानाति तत्त्वेन आषं छन्दश्च दैवतम् । विनियोगं ब्राह्मणं च मन्त्रार्थं ज्ञानकर्म च ॥ देवतायाश्च सायुज्यं गच्छत्येव न संशयः । पूर्वोक्तेन प्रकारेण ऋष्यादीन् वेत्ति यो द्विजः ॥ की न्यूनता या अधिकता के आधार पर उनके निचृद् गायत्री, भूरिक् गायत्री प्रभृति नाम बदल जाते है, उनमें भक्षरों की न्यूनता और अधिकता हो जाने से कभी-कभी ऐसा सशय उठ खडा होना स्वाभाविक है कि इस मन्त्र का छन्द गायत्री है अथवा उष्णिक् मादि । अतः ऐसे स्थानो पर छन्द को निर्धारण करने के लिये उनके वर्ण,} ऋषि आदि का ज्ञान कहना आवश्यक है, जिससे कि छन्द के ज्ञान में किसी प्रकार का संशय न रह जाय । कृति प्रभृति विच्छन्दो और अतिच्छन्दो के प्रसग में तो अक्षर की न्यूनता अथवा अधिकता के आधार पर नाम का भेद होने का कोई विधान छन्दःशास्त्र मे नही किया गया है, अतः ऐसे स्थानो मे सन्देह का कोई अवसर ही नही आता, जिसकी कि निवृत्ति के लिये वर्ण आदि का विधान करना पडे । 'तत आदित' संदिग्धे' इस सूत्र मे यह शंका उठाई गई है कि जब पचीस अक्षर का छन्द हो, तब क्या समझना चाहिये? इसका छन्द गायत्री स्वराट् माना जायगा कि उष्णिक् विराट्? इस शंका का वहीं यह समाधान किया गया है कि ऐसे संदिग्ध स्थलों पर प्रथम पाद के सहारे छन्द का निर्णय करना चाहिए । यदि पहला पाद गायत्री छन्द का है. तो पूरे मन्त्र का छन्द गायत्री होगा और यदि उष्णिक् छन्द का है तो पूरा मन्त्र उसी छन्द का माना जायगा । अगले सूत्र मे बताया गया है कि देवता, वर्ण आदि से भी छन्द का निर्णय करना चाहिये । इसीलिये किस छन्द का क्या देवता है, इस बात का प्रतिपादन किया गया है कि अग्नि, सविता, सोम, बृहस्पति, वरुण, इन्द्र और विश्वेदेव ये क्रमश: गायत्री प्रभृति छन्दों के देवता है । इस पूरे प्रतिपादन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि गायत्री छन्द का षड्ज स्वर, अग्नि देवता, शुक्ल वर्ण और ऋषि अग्निवेश्य है । उष्णिक छन्द का ऋषभ स्वर, सविता देवता, चितकबरा रंग और ऋषि काश्यप है । अनुष्टुप् छन्द का गान्धार स्वर, पीला वर्ण, सोम देवता और ऋषि गौतम है । बृहती छन्द का मध्यम स्वर, काला वर्ण, बृहस्पति देवता और अंगिरस ऋषि है । पंक्ति छन्द का पंचम स्वर, नीला वर्ण, वरुण देवता और ऋषि भार्गव है । त्रिष्टुप् छन्द का धैवत स्वर, इन्द्र देवता, लाल वर्ण और ऋषि कौशिक है । जगती छन्द का निषाद स्वर, गौर वर्ण, विश्वेदेव देवता और ऋषि वसिष्ठ है । इस तरह से सभी मन्त्रो में गायत्री प्रभृति छन्दों का निर्देश होने से ही स्वर, वर्ण, देवता और ऋषि प्रभृति सबकी गतार्थता हो जाती है, क्योंकि इन सबका उपयोग तो छन्द का संशय रहित ज्ञान करने में ही होता है । तो भी मोक्ष की प्राप्ति के लिये छन्दों के ऋषि आदि का ज्ञान भी उपयोगी है और इसीलिये छन्द शास्त्र में इन सबका वर्णन किया गया है । इस बात को भी हलायुध ने ही अपनी व्याख्या में कहा है । इसी बात का प्रतिपादन योगी याज्ञवल्क्य भी करते है -'जिस व्यक्ति को मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, ब्राह्मण और उसके अर्थ का सही ज्ञान है तथा उससे क्या कार्य लिया जाता है, इस बात को भी जानना है, वह उस मन्त्र के देवता के साथ सायुज्य प्राप्त करता है, इसमे किसी प्रकार का संदेह नहीं है । इस तरह से जो व्यक्ति मन्त्र के ऋषि आदि की सही जानकारी रखता है, उसको सभी धार्मिक रहस्यात्मक कर्मों 1 मेंभी अधिकार प्राप्त हो जाता इसलिये
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वेदार्थपारिजात १७३७ अधिकारो भवेत्तस्य रहस्यादिषु कर्मसु । आषं छन्दश्च देवत्य विनियोगस्तथैव च । वेदितव्यं प्रयत्नेन ब्राह्मणेन प्रयत्नतः ॥ " शौनकादिभिरन्येषामपि छन्दसामुक्तो वर्णविभागः । 'पृष्णिवैराजम्' ( ऋ० प्रा० ३।१ ९ ) उव्वटस्तु त्रिविधाया विराज एकस्य पृष्णिवर्णत्वम्, द्वयोश्च नीलत्वम् । एतास्तिस्रो विराज अनुष्टुबेका पंक्तिरेका द्वाभ्या इतिन्यूना चैका पूर्वयोर्नीलवर्ण अस्याः पृश्निः निचृच्छ्यावम् ( ऋ० प्रा० १७ ३० ) ( पृषत् भूरिक्' ( ऋ० प्रा० १७ ३१ ) ब्रह्मसामजुश्छन्दः कपिलं वर्णत स्मृतम् ( ऋ० प्रा० १ ९।६२ ) नकुलं त्वेकपादानं द्विपदा बभ्रुरुच्यते । सारङ्गशुक्लकृष्णरूपाऋग्यजुःसामब्राह्मयान्विताः । ( दैवत ब्रा० २३ ) । ब्याकरणनियमविषयो विचार: " तत्र' महाभाष्यीयसिद्धान्तस्य वैयाकरणेषु मान्यत्वेऽपि तदभिप्रायवर्णन पारम्पर्येणैव युक्तम् । प्रातिपदिका- नामर्थप्राधान्येऽपि विभक्तिमता प्रातिपदिकाना विभक्त्युपेक्षणेन वक्तुरभिप्रायो बाध्येतैव । ' विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ ( श्री० भ० गी ० ५| १८ ), ' सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिविशिष्यते ॥ ' ( भ० गी ० ६। ९ ) इत्यत्र सप्तम्या उपेक्षणेन विभक्त्यन्तराश्रयणेन कथं वक्तुरभिप्रायो गम्येत । प्रमाणान्तरानुरोधेन विभक्तिलिङ्गादिविपरिणामास्त्विष्यन्त एव । सूत्रवार्तिकभाष्यकृता पाणिनिकात्यायन पतञ्जलीना ब्राह्मण को मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग को जानने के लिये विशेष रूप से प्रयत्नशील रहना चाहिये । शौनक प्रभृति ने भी अपने प्रतिशाख्य में छन्दो के वर्णों का वर्णन किया है । इस अवसर पर उब्वट ने विशेष विचार प्रकट किये है | उनका कहना है कि त्रिविध विराट् छन्द में एक का वर्ण पृश्नि (चितकबरा ) और दो का नीला होता है । ऋक्प्रातिशाख्य, दैवत ब्राह्मण प्रभृति ग्रन्थो मे इस विषय पर विस्तार से विचार किया गया है । कहने का अभिप्राय यह है कि -महाभाष्य प्रतिपादित सात स्वर भी वेदाध्ययन के उपयोगी हैं, धैवत प्रभृति गानविद्या के स्वरों का उपयोग केवल छन्द का निर्णय करने में ही होता है कि किस छन्द के मन्त्र का पाठ किस स्वर में किया जाय । इन मन्त्रों का गानविद्या से और उनके सात स्वरो से किसी का नही सिद्ध हो पाता, जैसा कि सिद्ध करने का प्रयत्न स्वामी दयानन्द ने इस प्रकरण में किया है । वैदिक व्याकरण विषयक विचार पातञ्जल महाभाष्य मे प्रतिपादित सिद्धान्त वैयाकरणो में सर्वमान्य अवश्य किन्तु उनका मनमाना अभिप्राय नही निकाला जा सकता, परम्परा प्राप्त प्रद्धति के अनुसार ही उनका अर्थ करना पडता है और यही उचित भी है । प्रातिपदिक का अर्थ ही यद्यपि प्रधान माना जाता है, किन्तु जब उनमे विभक्ति लग जाती है, तो उसकी उपेक्षा कर देने पर वक्ता का भी अभिप्राय बाधित हो जायगा, अर्थात् वक्ता ने जिस अभिप्राय को प्रकट करने के लिये किसी विशेष विभक्ति का प्रयोग किया है, उसकी उपेक्षा कर देने पर वक्ता का अभिप्राय सही रूप में प्रकट न हो सकेगा । 'विद्याविनयसंपन्ते ० ' और ' सुहृन्मित्रा० ' इन गीता के श्लोको मे प्रयुक्त सप्तमी विभक्ति की उपेक्षा कर यदि किसी दूसरी विभक्ति का सहारा लेकर उनका अर्थ किया जाय तो उससे बक्ता का अभिप्राय कैसे प्रकट हो सकता है? आवश्यकता के अनुसार अन्य प्रमाणो से पुष्टि हो जाने पर केवल वेद में ही नहीं, लौकिक वाक्यों में भी विभक्ति का विपरिणाम, ( आव-श्यकता के अनुसार विभक्ति का परिवर्तन ) माना हो जाता है । इस तरह के नियमो का पालन सायण प्रभूति भी इस आधार पर करते हैं कि सूत्र, वार्तिक और भाष्य के रचयिता पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि का प्रामाण्य एक दूसरे की अपेक्षा क्रमशः बढ़ता जाता है । धातुओं के अनेक अर्थ होते हैं, यह बात भी सही है, तो भी शिष्टजनो के प्रयोग को देखकर ही उनका निर्णय किया जाता है कि किस धातु का किस अर्थ में प्रयोग किया जाय । इसमें भी मनमाने अर्थ में उसका प्रयोग करने की या धातु का मनमाना अर्थ करने की धाधली नही चल सकती । मनमाने तरीके से शिष्ट प्रयुक्त अर्थ में परिवर्तन करना अथवा अप्रसिद्ध अर्थ में किसी धातु का प्रयोग करना सही नही माना जायगा । इसके विपरीत थाचरण करने पर शब्दों के प्रयोग में अराजकता उठ खड़ी होगी कि किसी शब्द को कोई किसी अर्थ में और दूसरा उसके विपरीत अर्थ मे प्रयुक्त करने लगेगा । जैसे कि दयानन्द के भाष्य में ही पाणिनि प्रभृति आचायों के नियमों का बिना विचार किये मनमाने तरीके से मन्त्रों का अर्थ किया जाता है । इनके इस आचरण का समर्थन इन नियमों के सहारे नही किया जा सकता । 'छन्दसि लुललिट:' इस सूत्र के अनुसार सभी कालों मे इन लकारों का प्रयोग तभी किया जा सकता है, २१८
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वेदार्थपारिजातः १७३८ यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यमिति नियमे तन्नियमा अभ्युपेयन्त एव सायणादिभिरपि । बह्वर्था धातवो भवन्तीति यद्यपि सत्य तथापि शिष्टप्रयोगानुसारेणैव तेषां निर्णयो युक्तः । न तु स्वेच्छया शिष्टप्रयोगानामन्यथार्थव्यवस्थापन न वा स्वेच्छयाऽप्रसिद्धार्थे धातूनां प्रयोगो युक्तः । अन्यथा शाब्दनयेऽराजकतापत्तिः । यथा दयानन्दीये भाष्येऽविगणय्य पाणिनीयादिनियमात् स्वाच्छन्द्यं दृश्यते, न तत्समर्थनमेतेन कर्तुं शक्यते । 'छन्दसि लुङ्ल लिट.' ( पा० सू० २।४।६ ) इत्यादीनामपि वैदिकप्रयोगेषु यथाश्रुत- कालबाधायामेव सर्वकालार्थताभ्युपेतव्या । यथाह -'व्यत्ययो बहुलम्' ( पा० सू० ३।१।८५ ), इत्यत्र महाभाष्यकारः - 'सुप्तिङपग्रहलिङ्गनराणां कालहलच् स्वरकर्तृयङां च । व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषा सोऽपि च सिद्धयति बाहुलकेन । " इति । ' वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च द्वो चापरी वर्णविकारनोशी । धातोस्तदर्थातिशयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम् ॥ ' ( नि० २1१ ), त्रिविधा हि शब्दव्यवस्था प्रत्यक्षवृत्तयः परोक्षवृत्तयोऽतिपरोक्षवृत्तयश्च । तत्रोत्कटक्रियाः प्रत्यक्षवृत्तयः, अन्तर्लीनक्रिया: परोक्षवृत्तयः, तद्भिन्ना अपरोक्षवृत्तयः । तादृशेष्वेव निर्वचनोपायः । तस्मात्परोक्षवृत्तिता-,, मापाद्य प्रत्यक्षवृत्तिना शब्देन निर्वक्तव्याः । तद्यथा निघण्टव इति अतिपरोक्षवृत्तिः निगन्तव इति परोक्षवृत्तिः निग- मयितार इति प्रत्यक्षवृत्तिः । यस्मान्निगमयितार एते निगन्तव निघण्टव इति तदेतदार्षेषु वैदिकेषु प्रयोगेषु व्याकरणादि- गत्यन्तराभावेन गतिचिन्तनम् ॥ प्रायेण चोणादिषु परोक्षवृत्तयः शब्दाश्विन्त्यन्ते ॥ येषामपि लक्षण नास्ति तेषामप्युत्प्रेक्षि- तव्यम् । अपरिसमाप्ता ह्युणादय इति लक्षणविदः प्रतिजानते । सर्वथापि लक्षणासम्भवे उणादित्वाद्वा पृषोदरादित्वाद्वा साधनीयम् । जबकि वैदिक प्रयोग में जिस काल के लिये उस लकार का प्रयोग किया गया है, उसी काल मे उसका अर्थ करना ठीक न बैठता हो, उसमें किसी प्रकार की बाधा प्रतीत होती हो । बाधा की निवृत्ति के लिये ही लकार के काल का परिवर्तन किया जा सकता है, मनमाने तरीके से नही । जैसे कि ' व्यत्ययो बहुलम्' इस सूत्र का भाष्य करते हुए महाभाष्यकार ' सुप्तिडुपग्रह ० ' प्रभृति कारिका में इस विषय को समझाया है । उसका अभिप्राय यह है कि शास्त्रकार पाणिनि इस सूत्र की रचना कर यह दिखाना चाहते है कि प्रयोगों की बहुलता के आधार पर सुप् तिङ्, उपग्रह, लिंग, पुरुष, काल, हल् ( व्यजन ), अच् ( स्वर ), स्वर ( उदात्त आदि ) कर्ता और यङादि प्रत्ययों के प्रयोगो मे भी परिवर्तन कर लेते है । निरुक्त में भी ' वर्णागमो० ' प्रभृति श्लोक में निरुक्त का निर्वचन करते हुए कुछ ऐसी ही बात लिखी गई है । इसका अभिप्राय यह है कि प्रायः शब्दों की व्यवस्था तीन प्रकार को देखो जाती है । कुछ शब्द प्रत्यक्ष वृत्ति वाले, कुछ परोक्ष वृत्ति वाले और कुछ अत्यन्त परोक्ष वृत्ति वाले होते है । जिनमे क्रिया का स्पष्ट भान होता है, वे वचन प्रत्यक्ष वृत्ति कहलाते हैं । जिनमे क्रिया छिपी रहती है, वे परोक्षवृत्ति और जिनमे क्रिया होती ही नही वे अत्यन्त परोक्षवृत्ति कहलाते हैं । अतिपरोक्षवृत्ति शब्दों का निर्वाचन ही निरुक्त की सहायता से किया जाता है । ऐसे शब्दों को पहले परोक्षवृत्तिवाला बनाकर तब प्रत्यक्षवृत्ति शब्द के सहारे उनके अर्थ का निर्वचन स्पष्ट किया जाता है । जैसे कि 'निघण्टवः' यह अत्यन्त परोक्षवृत्ति शब्द है । उसको पहले 'निगन्तवः' इस तरह से छिपी क्रियावाले परोक्षवृत्ति शब्द मे बदला जाता है और तब 'निगमयितार:' इस प्रत्यक्षवृत्ति शब्द से उसके अर्थ को स्पष्ट किया जाता है कि जिस शास्त्र में शब्दों का निर्वचन किया जाता है, वही पहले निगन्तु और बाद में निघण्टु बन जाता है । 'वर्णागम० ' आदि श्लोक में शब्दों के रूप होने वाले इस परिवर्तन की ही व्याख्या वर्णागम, वर्णविपर्यय, वर्णविकार, वर्णनीय और धातु के अर्थ में अतिशय परिवर्तन इन पाँच कारणों पर आधारित मानी गई है और कहा गया है कि निरुक्त में इन सब बातो का विचार करते हुए निर्वचन किया जाता है | यह इसलिये किया जाता है कि कुछ ऐसे भी आर्ष प्रयोग मिलते हैं, जिनमें कि व्याकरण प्रभृति के कोई भी नियम लागू नहीं हो सकते । इनका सही स्वरूप निर्धारित करने के लिये ही निरुक्त शास्त्र में अत्यन्त परोक्षवृत्ति के आधार पर उनका निर्वाचन किया जाता है । उणादिप्रकरण में प्रायः परोक्षवृत्ति शब्दों पर विचार किया जाता है । जिनकी कोई व्युत्पत्ति नजर न आती हो, उनको भी कल्पना के सहारे कोई न कोई व्युत्पत्ति कर लेनी चाहिये वैयाकरणों का कहना है कि उणादि प्रकरण अधूरा है, अतः जिस शब्द की कोई व्युत्पत्ति न हो सकती हो, उसकी व्युत्पत्ति उणादि प्रकरण के सहारे अथवा पृषोदरादिगण में उसका पाठ मानकर कर लेनी चाहिये ।