वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 841–850
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 841–850
पृष्ठ 841
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७३ ९ नैरुक्तानां दृष्ट्या सर्वाण्याख्यातजानि नामानि । तस्माद्रूढेऽपि शब्दे यावन्तोऽपि धातवः स्वं स्वं लिङ्ग ढगतं दर्शयन्ति तावतः सङ्गृह्य रूढिशब्दो निर्वाच्यः । यावतामेव धातूनां लिङ्गं रूढिगतं भवेत् । अर्थश्चाप्यभि- स्थस्तावद्भिर्गुणविग्रहः ॥ ' ( बृहद्देवता २ १०४ ) इति प्राचां ग्रन्थेषु विस्तरः । तत्रापि न सर्वोऽप्यध्वानमश्नुवीतेत्यश्वो ति । नहि सर्वोऽपि तक्षन् तक्षा भवति । नापि सर्वः परिव्रज्ञन्नपि परिव्राजको भवति । तस्मादाख्यातजत्वेऽपि तेषु वर्थेषु योगरूढत्वमेषा शब्दाना मन्तव्यम् । यद्यपि सकृदुच्चरितः शब्दः सकृदेवार्थं गमयति, तथापि काव्ये यावन्तोऽर्था-विन्तः शब्दा एकप्रयत्नेनोच्चार्यन्त इति नये युगपन्नानाशब्दोच्चारणेऽपि सहोपलम्भो न भवति । प्रकरणादिनियमाभावे-धियैवानेकार्थाना बोधः । प्रकरणादिनियमे त्वेकस्यामिधयाऽपरेषा व्यञ्जनया । प्रकरणादिभिरभिधयैकार्थबोधे सति णां गौणी वाश्रित्य प्रवर्तमानः श्लेषालङ्कारस्तत्परेषु ( स्वार्थपर्यवसायिषु ) वाक्येषु न प्रवर्तते, 'न विधौ परः शब्दार्थः ' शाबरभाष्यवचनात् । अत एवाविधीयमानाऽणुदित् सवर्णस्य बोधको भवति न विधीयमानः । अविधीयमानत्वादेव ईं संमाष्टि' इत्यत्रैकत्वं न विवक्ष्यते, किन्तु यावन्तो ग्रहाः सन्ति समेषा मार्जनं विधीयते । पशुना यजेतेत्यादी तु गीयमानत्वादेकत्वं पुंस्त्वं च विवक्ष्यते, तेन नानेकेषां न वा स्त्रीपशो रत्र ग्रहणं सम्भवति । अलङ्कारविषयो विचार:- - " ' यदुक्तम् अदितिद्यः इत्यस्मिन् मन्त्रे अदितिशब्दार्था द्यौरित्यादयः सन्ति तेऽपि वेदभाष्येऽदिति- ' ( ), -देन ग्राहिष्यन्ते सू० ४१६ इति तदपि न युक्तम् । अत्र मन्त्रेऽदितिशब्दार्थानुक्तेः । नहयत्र मन्त्रेऽदितिशब्दार्थ रूपणं, किन्त्वदितेर्विभूतिनिरूपणमस्ति । नहि-' अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्' इत्युक्त्या कृष्णशब्दस्यार्थोऽश्वत्थो भवति । न निरुक्त सम्प्रदाय के अनुसार सभी नाम आख्यात से बनते है । इनके मत के अनुसार रूढ शब्द में भी जितने धातु अपने-ने स्वरूप को रूढ अवस्था मे दिखाते हैं, उन सबको संगृहीत कर रूढ शब्द का निर्वचन करना चाहिये । इस विषय का विस्तार से न बृहद्देवता प्रभृति ग्रन्थों में मिलता है । इस मत के अनुसार भी मार्ग को शीघ्रता से व्याप्त कर लेने वाला प्रत्येक पशु अश्व नही जाता, न तक्षण क्रिया का संपादक प्रत्येक मनुष्य तक्षा ( बढई ) कहलाता है, और न सब कुछ छोड़ कर जीने वाला प्रत्येक मनुष्य व्राजक ही कहलाता है । इस लिये नाम को धातु से बना हुआ मानने पर भी सब स्थलों में यौगिक व्युत्पत्ति के साथ रूढ अर्थ ही प्रधानता दी जाती है । यद्यपि एक बार शब्द के उच्चारण से एक ही अर्थ का ज्ञान होता है, तो भी काव्यशास्त्र के इस नियम के सार कि शब्द के जितने अर्थ होते हैं, उन सब अर्थों के बोधक शब्द एक ही प्रयत्न से उच्चरित हो जाते हैं, एक साथ ही अनेक का उच्चारण हो जाने पर भी सब अर्थों का ज्ञान एक साथ नही हो पाता । प्रकरण आदि के नियम को न मानने पर अभिधा के रेही अनेक अर्थों का बोध होता है, और प्रकरण आदि के नियम को मानने पर एक अर्थ का बोध अभिधा के सहारे और बाकी १ का ज्ञान व्यञ्जना वृत्ति की सहायता से होता है । प्रकरण आदि के सहारे अभिधा वृत्ति से एक अर्थ का ज्ञान हो जाने पर णा अथवा गौणी वृत्ति का सहारा लेकर ही श्लेषालंकार प्रवृत्त होता है । तत्पर अर्थात् स्वार्थ में पर्यवसित होने वाले वाक्यों में अलंकार की प्रवृत्ति नही हो सकती, क्योकि शावरभाष्य में बताया गया है कि तत्पर अर्थात् विधिपरक वाक्य में स्वार्थ से भिन्न कोई अर्थ नही रहता । इसीलिये अविधीयमान उदित् स्वर ही सवर्ण का बोधक माना जाता है, विधीयमान नहीं । विहित न ' के कारण ही 'ग्रहं संमाष्टि' इस वाक्य मे एकत्व विवक्षित नही होता, किन्तु जितने भी ग्रह ( पात्र ) यज्ञ में विहित हैं, उन का संमार्जन किया जाता है और 'पशुना यजेत' इस विधि वाक्य में एकत्व और पुंस्त्व की विवक्षा होने से एक पुरुष पशु ही गृहीत होता है, अनेक पशु अथवा स्त्री पशु का यहाँ ग्रहण नही किया जाता । अलंकार विषयक विचार अलंकार विषयक प्रकरण के अन्त में स्वामी दयानन्द ने ' अदितिद्यों० ' इस मन्त्र को उद्धृत कर लिखा है कि- "इस मन्त्र दिति शब्द के बहुत से अर्थ है, उन सबका उल्लेख हम अपने वेदभाष्य में स्थान-स्थान पर करेंगे । ( वे अर्थ ये हैं-द्यौ, अन्तरिक्ष, 1, पिता, पुत्र, विश्वेदेव, पंचजन, जान मौर जनित्व" ( पृ ० ४१६ ) किन्तु यह कथन भी इसलिए ठीक नहीं है कि इस ग्रन्थ मे
पृष्ठ 842
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७४० वेदार्थपारिजातः वा ' सर्वं खल्विदं ब्रह्मे ' त्युक्तया सर्वपदाभिधेयस्य घटपटादिप्रपञ्चस्य ब्रह्मशब्दार्थता सम्भवति । यास्केन चैतत्स्पष्ट मुक्तम् -' इत्यदितेर्विभूतिमाचप्टे' ( नि० ४।२३ ) । मन्त्रो मन्त्रार्थश्चेत्थं अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ ' ( ऋ० सं ० ११८९| १० ) । अदितिरदीना अखंड- नीया वा, 'दोऽवखण्डने ' देवमाता पृथिवी अखण्डब्रह्मात्मिका चितिर्वा । सैव द्यो द्योतनशीलो नाकः, सैवान्तरिक्षम् द्यावापृथिव्योरन्तर्मध्ये ईक्ष्यमाणं व्योम, सैव माता निर्मात्री सैव पितोत्पादकः, ततश्च सः पुत्रः मातापित्रोर्जातः पुत्रोऽपि सैव । विश्वेदेवाः सर्वेऽपि देवा अदितिरेव । अदितिः पञ्चजनाः चत्वारो वर्णा निषादश्च पचमः । यद्वा गन्धर्वाः पितरो देवा असुरा रक्षांसि । गन्धर्वाः पितरो देवा असुरा रक्षांसीत्येके । चत्वारो वर्णा निषादश्च पंचम इत्यौपमन्यवः । ' ( नि० ३।८ ) इति यास्कवचनात् । सर्वेषां वा एतत्पञ्चजनानामुक्थं देवमनुष्याणा गन्धर्वाप्सरसां सर्पाणां पितॄणा च' ( ऐ० ब्रा० ३।३१ ) इति श्रुतेश्व । तत्र गन्धर्वाप्सरसामैक्यात् पञ्चजनत्वम् । एवंविधा पंचजना अप्यदितिरेव । जनित्वं जन्माधिकरणत्वमप्यदितिरेव । एवं सर्वजगद्रूपेण देवमाता पृथिवी च स्तूयतें | सर्वचैतन्यरूपाऽखण्डा चितिस्तु सर्वाधिष्ठान- त्वात्, तथा द्यौरित्यादीना 'सर्वं खल्विदं ब्रह्मेतिवद् बाधसामानाधिकरण्येन सर्वाभेदः । स पिता इत्यत्र तु निर्दिश्यमान- प्रतिनिर्दिश्यमानयोरेकतामापादयन्ति सर्वनामानि पर्यायेण तलिङ्गतामुपाददते इत्युद्देश्यलिङ्गतया पुंलिङ्गत्वम् । ' ' उपमा यत्र सादृश्यलक्ष्मीरुल्लसति द्वयोः कुवलयानन्दे । यत्रोपमानोपमेययोः सहृदयहृदयाह्लादकत्वेन चारुसादृश्यमुद्भूततयोल्लसति व्यंग्यमर्यादां विना स्पष्टं प्रकाशते तत्रोपमालङ्कारो भवति । सा पूर्णा यदि सामान्यधर्मं अदिति शब्द के अर्थों का वर्णन नही किया गया है । इस मन्त्र मे तो अदिति की विभूति का निरूपण किया गया है । '' अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्" गीता की इस उक्ति का अभिप्राय यह नही है कि कृष्ण शब्द का अर्थ अश्वत्थ है । इसी तरह से ' सर्व' खल्विदं ब्रह्म' इस श्रुति में ब्रह्म शब्द का अर्थ भी सर्व पद से बोधित होने वाला घट, पट, आदि प्रपंच नही होता । यास्क ने निरुक्त के इस प्रकरण मे स्पष्ट बता दिया है कि इस मन्त्र में अदिति की विभूति का वर्णन किया गया है । मन्त्र का अर्थ यह है-अदिति शब्द के अदीन अथवा अखण्डनीय इन दो तरह के निर्वचनो के आधार पर देवमाता पृथिवी अथवा अखण्ड ब्रह्मात्मक चिति के तीन अर्थ किये जा सकते है । यह अदिति ही द्योतन ( प्रकाशमान ) स्वभाव के स्वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । और वही स्वर्ग और पृथिवी के बीच में विद्यमान आकाश का भी प्रतिनिधित्व करती है । यही सबका निर्माण करने वाली माता और सबको उत्पन्न करने वाला पिता है । वह अदिति ही माता और पिता से उत्पन्न पुत्र भी है । विश्वेदेव भी इस अदिति का ही स्वरूप है । चार वर्ण और पाचवा निषाद ये पंचजन भी अदिति का ही स्वरूप है । यास्क के द्वारा उद्धृत उपमन्यु के सम्प्रदाय के अनुसार यह अर्थ किया गया है । कुछ अन्य आचार्यों के अनुसार गन्धर्व, पितर, देव, असुर और राक्षस ये पंचजन के नाम से प्रसिद्ध हैं । ऐनरेथ ब्राह्मण के अनुसार देव, मनुष्य, गन्धर्वाप्सरस् सर्प और पितृगण ये पंचजन हैं । ये सब पंचजन भी अदिति का ही स्वरूप है । सबको उत्पन्न करने की सामर्थ्य भी अदिति में ही है । इस तरह से सारे जगत् के रूप में देवमाता अदिति और पृथिवी की स्तुति इस मन्त्र में की गई है । समस्त चैतन्य की आधारभूत अखण्ड चिति तो सबके अधिष्ठान के रूप मे यहाँ स्वीकार की गई है । 'सर्व' खल्विदं ब्रह्म' इस श्रुति से जैसे सारे प्रपंच के बाघ के साथ सारे जगत् को ब्रह्म से अभिन्नता प्रतिष्ठित हो जाती है, उसी तरह से द्यो इत्यादि के बाघ के साथ इन सबको अखण्डात्मिका चिति से अभिन्नता प्रतिपादित होती है । 'स पिता' यहाँ अदिति की पुल्लिंगता उद्देश्य के लिंग को स्वीकार करने पर मानी गई हैं । व्याकरण की यह एक परिभाषा हैं कि सर्वनाम शब्द निर्दिश्यमान और प्रतिनिदिश्यमान में एकता स्थापित कर देते हैं और इस स्थिति में उद्देश्य के अनुसार इनके लिंग में परिवर्तन किया जा सकता है । जैसे कि इस मन्त्र में अदिति शब्द का उद्देश्य के अनुसार स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में परिवर्तन कर दिया गया कुवलयानन्द नामक अलंकार शास्त्र के ग्रन्थ में 'उपमा यत्र ' इत्यादि श्लोक में उपमा का लक्षण दिया गया है । जहाँ उपमान और उपमेय में सहृदय व्यक्तियों के मन को आह्लादित कर देने वाली मनोरम समानता स्पष्ट भासित होती है, अर्थात् व्यंजना आदि वृत्तियों को सहारा लिये बिना अपने आप नजर आने लगती है, वहीं उपमा अलंकार की स्थिति मानी जाती है । इसके अनेक
पृष्ठ 843
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७४१ औपम्यवाचि व । उपमेयं चोपमानं भवेद् वाच्यम् । यथा- हसोवकृष्ण ते कीर्तिः स्वर्गङ्गामवगाहते' । अत्र हंसी, कीर्तिः, स्वर्गङ्गावगाहन,मिव शब्दश्चेत्येतेषामुपमानोपमेयसाधारणधर्मोपमावाचकानां चतुर्णामप्युपादानम् । तथैव त्वं, पिता, सूपायन, इवशब्दश्चेत्येतेषामुपमानोपमेयसाधारणधर्मोपमावाचकाना चतुर्णामुपादानात् पूर्णोपमा भवति । साधा श्रोती आर्थी च । श्रूयते इति श्रुतिः शब्दः, तया साक्षादेवोपलभ्यमानोपमेयसम्बद्धा श्रौती । यथेव,वाशब्दा इवार्थवति — '- वादयो यत्र प्रयुज्यन्ते सा श्रोती । पदार्थानुसन्धानापेक्षया प्रतीयमानोभयसम्बन्धा आर्थी । तदुक्तम् इववद्वायथा शब्दाः समाननिभसन्निभाः । तुल्य संकाशनीकाश प्रकाशप्रतिरूपकाः । प्रतिपक्षप्रतिद्वन्द्वि प्रत्यनीकविरोधिनः । सदृक्सदृश- संवादिसजातीयानुवादिनः । प्रतिबिम्बप्रतिच्छन्दसरूपसमसम्मिता । सलक्षणसदृक्षश्च मपक्षोपमितोपमा । कल्प देशीयदेश्यादि- प्रख्यप्रतिनिधी अपि । सवर्णतुलिता. शब्दा ये चान्यूनार्थवादिनः समासश्च बहुव्रीहि. शशाङ्कवदनादिषु । स्पर्धते जयति द्वेष्टि दुह्यति प्रतिगर्जति ॥ आक्रोश त्यवजानातिकदर्थयति निन्दति 1। विडम्बयति सन्धत्ते हसतीर्ष्यत्यसूयति । तस्य मुष्णाति सौभाग्यं तस्य कान्ति विलुम्पति । तेन सार्धं विगृह्णाति तुला तेनाधिरोहति । तत्पदव्यां पदं धत्ते तस्य कक्षा विगाहते । तमन्वेत्यनुबध्नाति तच्छीलं तं निषेधति । तस्य चानुकरोतीति शब्दाः सादृश्यसूचकाः । तत्रैववादय उपमाया वाचकाः, स्पर्धेत इत्यादयो लक्षका । तस्य मुष्णाति सौभाग्यमित्यादयो व्यञ्जका । एनेन यत्र श्रोत्या आर्थ्या वा उपमाबोधो भवति, तत्रोपमालङ्कार एव । 'रूपकं रूपितारोपाद्विषये निरपह्नवे ' उपमानोपमेययोरभेदा रोपेणैकतां नयतीति रूपकम् । प्रकृतगोपनमपह्नव । ततश्च शून्ये विषये उपमेये रूपितस्योपमानस्यारोपात्तादात्म्याध्यासात् रूपकालङ्कारो भवति । यद्यप्युपमानोपमेययोर्भेदमनु- भेद होते हैं । 'हंसीव कृष्णते कीर्तिः' यहा पूर्णोपमा मानी जाती है, क्योकि यहाँ हंसी, कीर्ति, आकाश गंगा में स्नान और इव शब्द इन सब का उपादान इस श्लोक में है । इस तरह से यहा उपमान, उपमेय, साधारण धर्म और उपमा के बोधक शब्द इन चारो की उपस्थिति रहने से यह पूर्णोपमा का उदाहरण है । इसी तरह से ' स नः पितेव' इस मन्त्र मे भी पूर्णोपमा मानी जाती है, क्योंकि यहां पर भी अग्नि, पिता इन दोनों का साधारण धर्म सरलता से प्राप्त होता है, और चारो की उपस्थिति इस मन्त्र मे है । इस पूर्णोपमा के दो भेद होते है - एक श्रोती पूर्णोपमा और दूसरी आर्थी पूर्णोपमा । श्रुति पद यहाँ शब्द का पर्यायवाची है | श्रुति के द्वारा जो उपमान और उपमेय से साक्षात् संबद्ध होती है, उसे श्रीती पूर्णोपमा कहते है । अर्थात् यथा, इव, वा प्रभृति शब्द जहाँ साक्षात् उपस्थित रहते है, वहाँ श्रोती पूर्णोपमा मानी जाती है । पदार्थ के अनुसन्धान के द्वारा जहाँ उपमान और उपमेय का संबन्ध प्रतीत होता हो, वहाँ आर्थी पूर्णोपमा मानी जाती है । निम्न श्लोको में इसी बात को स्पष्ट किया गया है- " इव, वत्, वा, यथा, समान, निभ, सन्निभ, तुल्य, संकाश, नीकाश, प्रकाश, प्रतिरूप, प्रतिपक्ष, प्रतिद्वन्द्वी, प्रत्यनीक, विरोधी, सदृक् सदृश, संबन्धि, राज-तीव, अनुवादी, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छन्द, सरूप, सम, संमित सलक्षण, सदृक्ष, सपक्ष, उपमित, उपमा, कल्प, देशीय, देश्य, प्रख्य, प्रतिनिधि, सवर्णं, तुलित, ये सब शब्द, अन्यूनता ( संपूर्णता ) के बोधक सभी शब्द, शशाकवदना प्रभृति में बहुब्रीहि समास, स्पर्धते; जयति, वेष्टि, द्रुह्यति, प्रतिगर्जति, आक्रोशति, अवजानाति, कदर्थयति, निन्दति, विडम्बयति, सन्धत्ते, हसति, ईर्ष्यति, असूयति, सुष्णाति विलुम्पति विगृह्नति, तुला नाधिरोहति, पदं घत्ते, विगाहते, अन्वेति अनुबध्नानि निषेधति, अनुकरोति ये सब क्रिया-वाचक शब्द समानता को बताते है ।" इनमें से इव, वा प्रमृति शब्द उपमा के वाचक हैं; और स्पर्धते इत्यादि क्रियावाचक शब्द, उपमा वाचक है, और मुष्णाति प्रभृति क्रिया पद सहित वाक्य, उपमा के व्यंजक हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि श्रोती अथवा आर्थी पूर्णोषमा से जहाँ समानता का ज्ञान होता है, वहीं उपमा अलंकार की स्थिति मानी जाती है । 'रूपकं रूपितारोपा० ' यह रूपक अलंकार का लक्षण है । इसमें उपमान और उपमेय में अभेद को आरोपित कर उनमें एकता स्थापित कर दी जाती है । प्रकृत वस्तु को छिपाने का नाम अपह्नव है । जिस उपमेय वस्तु को छिपाया नही जा सकता, उसको छिपाने के अभिप्राय से उसमे उपमान को बारोपित कर देना, अर्थात् उपमेय में उपमान के तादात्म्य का अभ्यास करा देना ही
पृष्ठ 844
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७४२ भवतां तादात्म्याध्यासो न सम्भवति, तथापि बाधकालीनेच्छाजन्यज्ञानरूपस्य आहार्यस्य तादात्भ्याध्यासस्य नासम्भवः । तच्च परम्परितं साङ्गं निरङ्गमिति त्रिधा भवति । आहवे जगदुद्दण्डराजमण्डलराहवे ॥ श्रीनृसिंह महीपाल स्वस्त्यस्तु तब बाहवे । अत्र राजमण्डलमेव चन्द्र, स एव राजबाही राहुत्वारोपे निमित्तम् । ' पद्मोदयदिनाधीशः सदागतिसमीरणः भूमृदाव-लिदम्भोलिरेक एव भवान् भुवि ॥ ' अत्र पद्माया उदय एव पद्मानामुदयः, सतामागतिरेव सदागमनम्, भूभृतो राजान एव पर्वता इत्याद्यारोपो राज्ञि सूर्यत्वारोपनिमित्तम् । रूपक अलंकार का कार्य होता है । यद्यपि उपमान और उपमेय के भेद से परिचित व्यक्तियो को इनकी एकता का आभास नही हो सकता, तो भी उपमेय का बाचक अपनी इच्छा से उसमें उपमान का आरोप थोडी देर के लिये किया ही जा सकता है । यह रूपक अलंकार परम्परित सांग और निरंग के भेद से तीन तरह का होता है । 'आहवे' प्रभृति श्लोक में राजमण्डल को थोडी देर के लिए चन्द्रमा मान लिया गया है, इसीलिये इस राजमण्डल को ही चन्द्रमा के लिये थोडी देर के लिये राजा के बाहुओ को राहु की संज्ञा दे दी गई है । 'पद्मोदय० ' प्रभृति श्लोक मे पद्मा ( लक्ष्मी ) के उदय को ही कमलो का विकास, सज्जनो के आगमन को ही अच्छा आग-मन और राजाओ को ही थोडी देर के लिये पहाड मानकर स्तुत्य राजा में सूर्य को आरोपित कर दिया गया है । 7 1
पृष्ठ 845
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमं परिशिष्टम् विधवाविवाहनियोगमीमांसा यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि स ॥ इति मनुस्मृत्या, ' वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम् ॥ मन्वर्थविपरीता या सा स्मृतिः नैव शस्यते ॥ ' इति बृहस्पतिवचनेन च मनोः परमवेदज्ञत्वं सिद्धयति । शतपथे च -' यद्वै मनुरवदत्तद्वेषजम्' इति श्रुतो मनूक्तेर्भेषजवत्परमोपादेयत्वं च सिद्धयति । मनुना च स्पष्टमुक्तम् -- ' नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीत्यंते कचित् । न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुन ॥ ' ( म० ९।६५ ) ' न द्वितीयश्च साध्वीनां कचिद् भर्तोपदिश्यते ' ( म० ५। १६२ ), सस्थितं ( मृतक ) च न लङ्घयेत्' ( म० ५।१५१ ) इति मनुना सर्वथा विधवाविवाहो निषिद्धः तस्माद्वेदमन्त्रेण विधवाविवाहसाधनम् अशुद्धमवैदिकं च । तदनुसारेणैव बृहत्पराशरस्मृतावपि -' जीवन् वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम्' ( ४।४८ ) तदेवोक्तम् बौधायनपितृमेधसूत्रेऽपि । कथं पुनर्विवाहेनान्यः पुरुषः प्रभुः सम्भवति' ( १११२।१० ), यावज्जीव प्रेत ( मृतक ) पत्नी ( ब्रह्म- चर्यम्) इति विधवाया यावज्जीवं ब्रह्मचर्यपालनमेवोक्तम् | 'मान्या हि गुरव. सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः' (महाभारते वनपर्वणि २०५।५ ) अत्रैकपतित्वमेव स्त्रिया उक्तम् । ' ममेयमस्तु पोष्या' ( अथवं १४। १५२ ) इति वेदमन्त्रेण स्त्रिया वरपोष्यात्वमे- बोक्तम् । निर्णयसागरप्रकाशिते ऋग्वेदे तु दिधिषोरिति पाठ एव नास्ति, किन्तु दधिषोः इत्येव पाठोऽस्ति । ' उपपत्याः सुतो यस्तु यश्चैव दिधिषूपति । परपूर्वपतेर्जात. सर्वे वर्ज्याः प्रयत्नत ॥ ' बृहत्पराशरस्मृति ( ५/३६७ ), 'पौनर्भवश्च काणश्च यस्य चोपपतिर्गृहे' ( म० ३।१५५ ), ' यश्चाग्रेदिधिषूपतिः' ( म० ३।१६० ), एतान् विगर्हिताचारान् अपाङ्क्तेयान् द्विजाधमान् । ' उभयत्र विवर्जयेत् ॥ ' ( म० ३।१६७ ), परपूर्वा ( पुनर्भू ) पतिस्तथा ।......वर्जनीयाः प्रयत्नतः ॥ ' ( म ० ३।१६६ ), 'पौनर्भवस्तथा वर्ज्य:' ( प्रजापतिस्मृति ८३-८४ ), 'भ्रातुर्नृतस्य भार्यायामनुरज्येत कामतः । धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः ॥ ' ( म० ३ | १७३ ) इत्यादिधर्मशास्त्रवचनेषु विधवाविवोढारस्तत्पुत्राश्च निन्दिता अपाङ्क्तेयाश्चोक्ताः । विधवा विवाह अथवा नियोग की समीक्षा विधवा विवाह और नियोग के सम्बन्ध में नियोग प्रकरण ( पृ० १४२ ९ - १४३८ ) में संक्षिप्त समीक्षा की गई है । यहाँ उस पर विस्तार से विचार किया जा रहा है । मनुस्मृति में बताया गया है कि मनु ने धर्म के सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा है, वह सब वेद का ही अनुसरण करता है । बृहस्पति का कथन है कि वेदार्थ का अनुसरण करने के कारण ही मनुस्मृति को प्रधान स्थान मिला है । इस तरह से मनु वेद के विशिष्ट व्याख्याता के रूप में प्रसिद्ध हैं । शतपथ ब्राह्मण में मनु के वचन को भेषज माना है । भौषध से जैसे सारे रोग दूर होते हैं, उसी तरह से धर्म सम्बन्धी सारी समस्याओं का समाधान मनु के वचनो मे मिलता है । मनु की स्पष्ट उक्ति है कि विवाह सम्बन्धी मन्त्रों में नियोग की चर्चा कही भी नहीं है और न कहो विधवा विवाह का ही विधान है । मनु ने विधवा विवाह का स्पष्ट निषेध किया है । ऐसी स्थिति में वेद मन्त्रों से इसको सिद्ध करने का प्रयत्न निराधार ही माना जायगा । बृहत्पराशरस्मृति और बोधायन पितृमेध सूत्र में पति की मृत्यु के उपरान्त पत्नी को ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का उपदेश देते हैं और कहते हैं कि पत्नी का एक ही पति होता है । महाभारत में भी इसी का पालन मिलता है । अथर्ववेद में पत्नी को बोष्या बताया गया है । निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित ॠग्वेद में ' दिधिषो " इस पाठ के स्थान पर 'दविषोः ' यह पाठ मिलता है । बृहत्पराशरस्मृति और मनुस्मृति के अनेक वचनों में विधवा से विवाह करने वाले दिधिषू और उनकी सन्तति की निन्दा की गई है और उनको अपांय माना है ।
पृष्ठ 846
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७४४ 'सूर्याभिनिभ्रक्तः कुनखिन कुनखी श्यावदति श्यावदन् अग्रेदिधिषी अग्रेदिधिषुः परिवित्ते परिवित्तो वीरहणि वीरहा ब्रह्मणि तद् ब्रह्महणं नात्यच्यवत ( तै ० ब्रा० ३| २| ८| १२ ) इति तैत्तिरीयब्राह्मणे दिधिषू- परिवित्ति ब्रह्मघ्नादयः पातकिन उक्ता: । वादिप्रतिवाद्युभयसम्मता मनुस्मृतिस्तादृशानपाङ्क्तेयान् वदति ' अपायैर्यदन्यैश्च तद्वै रक्षांसि भुञ्जते' ( म० ३।१७० ), अपाङ्क्तदाने यो दातुः' ( म० ३।१६९ ), 'भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ' ( म० ३| १८१ ), 'दिधि-षूपपतिर्यः स्यादग्रेदिधिषुरेव च ।... पूर्वपूर्वस्तु गर्हितः ॥ ' ( महाभारत शा० प० ३४ ४ ) इत्यादिवचनेषु दिधिषूदिधिषुस्त्री-पुसाना निन्दा प्रोक्ता 1। तेनाकर्त्तव्यता अधर्मत्वं च स्पष्टं सिद्धयति । अमरकोषे सुधाव्याख्यायामपि दधाति पापं यद्वा दिधि धैर्यं स्यति नाशयतीति दिधिषुपदस्य व्युत्पत्तिरुक्ता । धृतेर्नाशो धर्मनाश एव । 'धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह. 1 धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ' ( म ० ६ ९२ ) इति मनुना धृत्यादीना धर्मत्वोक्तेः । क्षमादयाक्रोधास्तेयादीनां धृतिमूलकत्वेन तदभावेन क्षमाद्यभावापत्त्याऽधर्मस्यानिवार्यत्वात् । दयानन्देनाप्युणादिकोषे ( १।९३ ) दिविधैर्यमिन्द्रियदौर्बल्यात् स्यति त्यजतीति दिधिषुरित्युक्तम् । वेदे तु मृतस्य पत्युरेव धारण- पोषण-स्मरणार्थं दिधिषुशब्दः प्रयुक्तः । स्वतन्त्रं जीविते पुरुषे नायं शब्दः प्रयुक्तः । सामाजिकास्तु वेदे रूढोऽर्थो नास्त्येवेति जल्पन्ति । तेन तैर्नास्य रूढोऽर्थो ग्रहीतुं शक्यः । यदि तु स्वमतविरुद्ध-मपि दिधिषुपुनर्भूप्रभृतिशब्दानां स्वार्थसिद्धयर्थं स्मृतिप्रसिद्धस्य रूढस्यार्थस्याभ्युपगमः क्रियते, तदाऽथर्ववेदीय १५ काण्डीय-व्रात्यस्य पूजनमप्यङ्गीकर्त्तव्यम् ( २३ ९ -४० ) मनुरीत्या उपनयनवेदाध्ययनहीनस्य ब्राह्मणस्यैव ब्रात्यनामप्रसिद्धेः । कि वैदिकम्मन्यस्यार्थसमाजस्य तथाभ्युपगमो युक्तः स्यात्? तथात्वे जन्मना वर्णव्यवस्थाभ्युपगमापातः । गुणकर्मानुसारेण तु तस्य शूद्रत्वादपूज्यत्वमेव सिद्धयति । स्मृतिषु वशाया वन्ध्याया गोर्दानं निषिद्धम् । यदि वेदेऽपि वशा वन्ध्येति स्मृतिप्रसि-द्व्यङ्गीक्रियेत, तदा वशासूक्त ( अथर्व० १०/१० ) रीत्या वशादानमपि वैदिकं स्यात् । अथर्व० १११७ उच्छिष्टवर्णन दृश्यते । स्मृतिप्रसिद्धया उच्छिष्टभोजनं निषिद्धम् । तथा चोच्छिष्टभोजनेऽपि वैदिकत्वं न हीयेत । वेदे चोषसः पुनर्भूत्वोक्तिः ( ऋ० तैत्तिरीय ब्राह्मण में दिधिषू, परिवित्ति ब्रह्मन प्रभृति की गणना पातकियों में की गई है । मनुस्मृति को आर्यसमाजी भी मान्यता देते हैं । वहाँ भी दिधिषू प्रभृति को अपातेय ही माना है । महाभारत में भी इनकी निन्दा की गई है । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विधवा विवाह एक अधार्मिक कृत्य है । अमरकोश को सुधा ब्याख्या में दिधिषू पद की निरुक्ति 'पाप का धारण करने वाला, धैर्य को नष्ट करने वाला' की गई है । धैर्य का नाश एक प्रकार से धर्म का ही नाश है । मनुस्मृति वर्णित धर्म के १० लक्षणों मे धैर्य को प्रथम स्थान दिया गया है । धैर्य के बिना क्षमा, दया, क्रोध, अस्तेय आदि की भी स्थिति नही बन सकती । इस प्रकार धैर्य के अभाव में स्पष्ट ही है कि धर्म की कोई स्थिति नही रह जायगी । दयानन्द ने भी उणादि कोश में दिधिषू शब्द का अर्थ 'इन्द्रिय दौर्बल्य से दूर रहने वाला' क्रिया है । बेद में मृत पति के निमित्त ही ' दिधिषू' शब्द का प्रयोग किया है । स्वतन्त्र जीवित परपुरुष के लिये यह शब्द कही भी प्रयुक्त नही हुआ है । आर्यसमाजियों का कहना है कि वेद मे रूढ शब्द है ही नहीं, अतः इस शब्द के रूढ अर्थ को स्वीकार नही कर सकते । किन्तु अपना मतलब निकालने के लिये वे यहाँ पर दिधिषू, पूनर्भू प्रभृति का लोक प्रचलित रूढ अर्थ ही स्वीकार करते हैं । उनको अथर्ववेद के व्रात्यकाण्ड में वर्णित व्रात्य की भी पूजा करनी चाहिये । मनुस्मृति के अनुसार उपनयन और वेदाध्ययन से रहित ब्राह्मण को हो व्रात्य माना गया है । क्या आर्यसमाजी इस बात को स्वीकार करेंगे? ऐसा मानने पर उनको जन्म से वर्णव्यवस्था माननी पड जायगी । गुण और कर्म के अनुसार जो व्रात्य शूद्र हुआ, तब अथर्ववेद विहित व्रात्य की पूजा वे कैसे करेगे? स्मृतियों में वन्ध्या गौ का दान निषिद्ध माना गया है । यदि वेद में भी वशा शब्द का वही अर्थ किया जायगा, तो क्या सूक्त के अनुसार उनके लिये वशा का दान वेदविहित माना जायगा । स्मृतियों में उच्छिष्ट भोजन निषिद्ध है । इसके विपरीत अथर्ववेद में उच्छिष्ट का वर्णन मिलता है । ऋग्वेद
पृष्ठ 847
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात १७४५ सं० १।६२।८-१।१२३।२ ) किमेतावता तस्यापि पुनर्विवाहिताङ्गीक्रियते । यदि तथा नाङ्गोक्रियते तदा दिधिषुशब्दस्य तैरपि स्मृतिप्रसिद्धोऽर्थो नाङ्गीकर्त्तव्यः । किञ्च ' वेदेत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा: प्रत्यक्षद्विष.' ( गोपथब्राह्मणे १/१ ) इत्यादिरीत्या परोक्षेणापि केचनार्था अङ्गीक्रियन्ते । तद्यथा निरुक्ते देवतकाण्डेऽष्टमेऽध्याये विश्यां कण्डिकायाम् ' बलस्पते रशनया निपूय '.. देवत्रा दिधिषोर्हवीषि ' इत्यस्मिन् मन्त्रे ' दिधिषोः ' इत्यस्य दातुरित्येवार्थ । तथैव मातुर्दिधिषुमब्रव स्वसुर्जारः शृणोतु नः ( ऋ० सं० ६/५५/५ ) इत्यस्मिन् मन्त्रे कि मातुरुपपतिम् स्वसुर्जारः उपपतिः इत्येवार्थ: स्वीक्रियते सामाजिकैः? 'आशवो दिधिषवो..... ' ( ऋ० सं० १/७८/५ ) इति मन्त्रे किं परुतो विधवा विवोढारोऽङ्गाक्रियन्ते? 'दिधिष्वो बिभृया:' ( ऋ० सं० १।७१।२ ) प्रजाना सम्बन्धे धारयित्र्य इत्यर्थे दिधिषुशब्दस्य प्रयोगो दृश्यते । तस्मात् प्रकृतेऽपि दिधिषुशब्दो न स्मृति- प्रसिद्ध विधवाविवोर्थे प्रयुक्तः । यदि दयानन्देनामरकोषानुसारेण दिधिषुशब्दस्य द्वितीयः पतिग्य गृह्यते, तदा वेदे रूढशब्दा न भवन्तीति निघण्टुभूमिकालेख उणादिकोष भूमिकालेखश्च ध्रुवं विरुद्धो स्याताम् । सत्यार्थप्रकाशस्य ४२ पृष्ठे दयानन्देनामरकोषस्याप्रामाणिकत्वमेवोक्तम् । कि स्वार्थसिद्ध्यर्थं स्वोक्तिविरुद्धं निघण्टुनिरुक्तमीमांसाव्याकरणविरुद्ध म मरकोषतट्टीकयोरेव प्रामाण्यमङ्गीक्रियते? तथात्वे यद्वान्तं तदेव भुक्तमिति न्यायानु-सरणं दयानन्दस्य स्यात् । न चामरकोषोल्लेखमात्रेण विधवाविवाहस्य कर्त्तव्यता सिद्धयति, अन्यथा विषशब्दस्यापि तत्रो-ल्लेखे विषभक्षणमपि कर्त्तव्यं स्यात् । स्वैरिणीकुलट दिस्त्रीणामपि तत्र वर्णनं दृश्यते । न च तावतापि सर्वाभिस्तथात्वमनु-सर्तव्यमिति 1। तत्रैव गर्मिण्याः कन्याया विवाहे जाते तत्रोत्पन्नस्य पुत्रस्य सहोढ इति नामधेयमुक्तम् । नहि तथात्वेऽपि सहोढोत्पादनाय यत्न आस्थेयो भवति, किन्तु ' अपत्यलोभाद्या तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते । सेह निन्दामवाप्नोति पतिलोकाच्च हीयते ॥ ' ( म० ५।१६१ ), नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते कचित् । न विवाहविधावुक्तं विधवावदेनं पुनः ॥ ' ( म० ९ / ६५ ) इत्यादिरीत्या दिधिषुः पापपतिरेव सिद्धयति । में उषा को पुनर्भू कहा है । क्या आप उषा को भी पुनभ्रं मानेगे । यदि वे ऐसा नही मानते, तो उनको इस शब्द का स्मृति प्रसिद्ध अर्थ भी नही मानना चाहिये । गोपथब्राह्मण में बताया गया है कि वेद में कभी-कभी परोक्षरूप से भी अर्थों का प्रतिपादन किया जाता है. क्योंकि देवताओं को ऐसा करना अच्छा लगता है । जैसे कि निरुक्त के दैवतकाण्ड के आठवें अध्याय में दिधिषू शब्द का अर्थ दाता किया गया है । क्या आर्यसमाजी ' मातुर्दिधिषु ' इत्यादि ऋग्वेदीय मन्त्र में क्या माता के उपपति की चर्चा मानेगे? 'आशवोदिधिषवो, इस मन्त्र मे क्या वे मरुद्गणो को विधवा के साथ विवाह करने वाले मानते हैं? अतः इस शब्द का स्मृति प्रसिद्ध अर्थ वेद में कही भी गृहीत नहीं हो सकता । यदि स्वामी दयानन्द अमरकोष के अनुसार इस शब्द का अर्थ कहते है, तो उस स्थिति में उसका यह कहना बाधित हो जाता है कि वेद मे रूढ शब्द नही होते । या यही उणादि पाठ की भूमिका में जो कुछ उन्होंने लिखा है, उससे भी यह बात विपरीत पड़ती है । सत्यार्थप्रकाश में दयानन्द ने अमरकोष को अप्रामाणिक बताया है । अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये क्या आप अपने ही कथन के विपरीत और निघण्टु, निरुक्त, मीमासा तथा व्याकरण व्याख्या के भी विपरीत अमरकोष को यहीं पर प्रमाण मानने ?को प्रस्तुत हैं यह बात तो थूक कर निगलने के समान घृणित है । अमरकोष में उल्लेख होने मात्र से विधवा विवाह कर्तव्य कोटि में नही आ जायगा । वहाँ तो विष, स्वैरिणी, फुलटा शब्द भी वर्णित है । तो क्या इससे विषभक्षण और कुलटावरण कर्तव्य मान लिया जायगा? अमरकोष में कुमारी कन्या से उत्पन्न सन्तान का भी नाम दिया गया है, तो क्या इससे उसको कर्तव्य कोटि में मान लिया जायगा? मनुस्मृति ने पुत्र के लोभ में पति का अतिक्रमण करनेवाली स्त्री की तथा नियोग की भी निन्दा ही की गई है । इस प्रकार दिधिषू को पापपति ही माना जा सकता है, वैध नहीं । २१ ९
पृष्ठ 848
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७४६ ' उदीष्वनारि इति मन्त्रे तु दिधिषुशब्दो मृते श्मशाने समक्षे चितायां स्थिते पत्यावेव वर्तते मन्त्रस्य तत्रैव विनियुक्तत्वात् । विशेषणस्य यौगिकत्वनियमाद् दिधिषुशब्दोऽत्र यौगिक एव । तस्यैव जीवलोकस्य पुत्रादिसंसारस्य पालनार्थं पत्यनुमरणमिह निषिद्धय सा मृतकस्य पत्नी चिताया उत्थापिता, न तस्याः पुनर्विवाहार्थं नियोगार्थं वा । तत एव मनुस्मृती पञ्चमाध्यायस्य १५६ - १६२ श्लोकाः सङ्गच्छन्ते । बौधायन पितृमेध सूत्रेऽपि विधवाया अन्यपतिसम्बन्धं निषिध्य पुनरग्न्याधानं निषिद्धम् । नह्यस्या अपतित्वात् पुनरग्न्याधेयं विद्यते, 'विज्ञायते च तस्मान्नैका द्वौ पती विन्दते इति ( बो० ( पि० सू० २२४१४ ) आर्यसामाजिकैविधवाविवाह उक्तमन्त्रेण साध्यते । स च दयानन्देनापि प्रत्याख्यायते । 'स्त्रीपुरुषी प्रति प्रश्नेन द्विवचनोच्चारणेन च एकस्य पुरुषस्य एकैव स्त्री कर्तुं योग्यास्ति । तथा एकस्या स्त्रिया एक एव पुरुषश्च' ( ऋ ० भा० भू० २२२ पृष्ठे ) । अनेनाप्येकस्याः स्त्रिया एक एव पतिर्भवेत् एकस्य पुरुषस्य एकैव स्त्री च । अर्थाद् अनेकस्त्रीभिः सह विवाहनिषेधो नरस्य । तथाऽनेकैः पुरुषः सह एकस्याः स्त्रियाश्च विवाहो निषिद्धः । सर्वेषु वेदमन्त्रेष्वेकवचनस्यैव निर्देशात्' । ( ऋ० भा० भू० २२० पृ० ) तादृशाः सामाजिका दयानन्दं वेदानभिज्ञं मन्यन्ते । यद्वा तद्दृष्ट्या ते स्वयं वा वेदानभिज्ञाः । कुमारयोः स्त्री- पुरुषयोरेकवारमेव विवाहः स्यात् पुनरेवं नियोगः । नेवं द्विजेषु द्वितीयवारं विवाहो विधीयते । पुनर्विवाहस्तु खलु शूद्रवर्णं एव विधीयते, तस्य विद्याव्यवहाररहि त्वात् ( ऋ ० भा० भू० २२२ पृष्ठे ) । अत्र स्पष्टं द्विजेषु विधवाविवाहो निषिद्धः शूद्रे चानुमतः । 'ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों में क्षतयोनि स्त्री क्षतवीर्य पुरुष का पुनर्विवाह न होना चाहिए ।' ( सत्यार्थप्रकाशे, पृ० ६९ ) । 'पुनर्विवाहे दोष: ( पतिव्रतस्त्रीधर्मयोर्नाशः ) उक्तः । द्विजों मे स्त्री और पुरुष का एक ही बार विवाह होना वेदादिशास्त्रों में लिखा है, द्वितीय वार नही ।' ( सत्यार्थप्रकाशे ४ समु ० पृ० ७१ ) दयानन्दरीत्या नहि काचिद्विधवाऽक्षतयोनिर्भवति । तद्रीत्या गर्भाधानदिवस एव विवाहस्य विधानात् । तथाहि -'जिस दिन ऋतुदान देना योग्य समझें उसी दिन संस्कार विधि के अनुसार मध्यरात्रि या दश बजे अति प्रसन्नता से सबके सामने पाणिग्रहण पूर्वक विवाह की विधि को पूरा करके एकान्त सेवन करें । पुरुष वीर्यस्थापन और स्त्री वीर्या- कर्षण की जो विधि है, उसी के अनुसार दोनों करें ।' ( सत्यार्थ प्र० ४ समु ० ५६ पृ० ) । अत एव दयानन्दरीत्या विधवा नाक्षतयोनिर्भवति, विवाहदिन एव गर्भाधानसम्पत्तेरुक्तत्वात् । नियोगोऽपि निषद्ध एव । ' उदीर्ष्व नारि० ' प्रभृति मन्त्र में दिधिषू शब्द का प्रयोग मृत पति के लिये ही हुआ है । दिधिषू शब्द का अर्थ यौगिक अर्थ ही गृहीत होगा, रूढ़ अर्थ नहीं । मृत पति के पुत्र आदि के तथा परिवार के पालन के लिये ही विधवा को अपने मृत पति के पास से हटाया जाता है, नियोग अथवा विधवा विवाह के लिये नही । मनुस्मृति, बौधयन पितृसूत्र प्रभृति की संगति इसी अर्थ में बैठती है । आर्यसमाजी इसी मन्त्र से विधवा विवाह को वैध सिद्ध करते हैं, किन्तु स्वामी दयानन्द ने स्वयं ॠग्वेदादिभाष्य भूमिका में इसका खण्डन कर दिया हैं ( द्रष्टव्य, पृ० २२०, २२२ ) । इस तरह के आर्यसमाजी दयानन्द को वेदार्थ का ज्ञाता नही मानते । कुमार और कुमारी का पहले बार विवाह होता हैं और बाद में उसे नियोग कहा जाता है । इस तरह का नियोग दहेजो में नही पाया जाता । नियोग शूद्र वर्ण में ही होता है । ( पृ० २२२ ) यहाँ स्पष्ट ही विधवा विवाह निषिद्ध माना गया है । सत्यार्थ प्रकाश में भी लिखा गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों में क्षत- योनि स्त्री क्षतवीर्य पुरुष का पुनर्विवाह न होना चाहिये । ऐसा करने से स्पष्ट ही पातिव्रत्य धर्म का नाश होगा | दयानन्द के मत से कोई भी विधवा अक्षतयोनि नहीं हो सकती, क्योंकि गर्भाधान का दिन ही उनके यहाँ विवाह का दिन माना गया है । वे कहते हैं— 'जिस दिन अनुदान देना योग्य समझें, उसी दिन संस्कार विधि के अनुसार मध्यरात्रि या दस बजे अति प्रसन्नता से सबके सामने पाणिग्रहण पूर्वक विवाह की विधि को पूरा करके एकान्त सेवन करे । इस प्रकार विवाह के दिन ही गर्भाधान का विधान होने से इनके यहाँ अक्षत योनि विधवा हो ही नहीं सकती । 1
पृष्ठ 849
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७४७ ' इमा त्वमिन्द्रमीढ्वः सुपुत्रा कृणु । दशास्यां पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि ||' ( ऋ० सं० १०/८५१४५ ) अयं मन्त्रो विधवाविवाहे नियोगे च सामाजिके. प्रयुज्यते । अस्यार्थोऽपि तैर्विचित्र. क्रियते । हे मीढ्व इन्द्र 1| वीर्यंसिंचन मे समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष तू इस विवाहिता स्त्री या विधवा को सौभाग्य युक्त कर विवाहिता स्त्री मे दस पुत्र उत्पन्न कर, और यात्री को ग्यारहवी मान । हे स्त्री तू भी विवाहित पुरुष नियुक्त पुरुषो से दस सन्तान उत्पन्न कर और पति को ग्यारहवाँ समझ ।' दयानन्दीयः कश्चन प्रसिद्ध कथयति -' ग्यारह पतियो के नये प्रकार को लिखते है, तदनुसार पहले तीन पादो मे तो पति को आज्ञा दी गयी है कि स्त्री को सुपुत्रा वा सुभगा कर और उसमे दस पुत्र उत्पन्न कर । चौथे पाद मे स्त्री को सम्बोधन किया है कि तूं ग्यारहवा पति कर, अर्थात् ग्यारहवें पति तक कर । यदि इसमे पहले तीन पादो को स्त्री के लिए बदल दिया जाय और चौथे को पुरुष के लिए तो उसका अर्थ यह होगा कि हे स्त्री तू इस पति से दस सन्तान उत्पन्न कर और इसको अच्छे पुत्रवाला और सौभाग्यशाली बना, और हे पति तू ग्यारहवी स्त्री कर' संस्कृतभाषयाऽयं बलात्कार एव । विवाहसूक्तस्यायं मन्त्रः । तथैव दयानन्दोऽपि मनुते । कुमार्या अयं विवाहो न विधवाया । विधवाबोधकः कश्चिदपि शब्दोऽत्र नास्त्येव । ' पतिमेकादश कुधि' इत्यस्य एकादशी स्त्रियमिति कथमर्थ इति सामाजिका एव जानन्तु । हे स्त्री इति मन्त्रगतस्य कस्य शब्दस्यार्थः? अस्यां पुत्रानाधेहीत्यस्य त्वं नियुक्तः पुरुषैर्दशसन्तानानुत्पादयेति कस्य शब्द-स्यार्थः? कस्मात्कोषात् कस्माद्वा व्याकरणादिति विद्वांसो विदाङ्कुर्वन्तु ॥ 'कृषि ' ' आधेहि' इति मध्यमपुरुषस्य क्रियाद्वयं दृश्यते । सम्बोध्यश्चैक एवेन्द्रः, स एव मन्त्रस्यास्य देवता । अत्र वर एव प्रतिपाद्यः कथं स्यात्? किं वरेणैव एकादशः पतिः कर्त्तव्यः? यदि स्त्री प्रतिपाद्या स्यात् तदा कि तयैव पत्यो गर्भाधानं कर्त्तव्यम्? 'दशास्यां पुत्रानाधेहि' इति प्रतिपक्षि दृष्ट्या मीढ्व इन्द्र इत्यनेन वीर्यंसेक्ता वरः प्रतिपाद्यः, तदा चतुर्थपादे कथं स्त्री सम्बोध्या स्यात्? मन्त्रे तस्याः सम्बोधनपदं किमिति वक्तव्यम्? न च ' मीढ्व' इति स्त्रियाः सम्बोधनं सम्भवति । तथात्वे हे वीर्यमेक्त्रीत्यर्थं स्यात् । कि स्त्रिया पत्यो वीयं सेक्तव्यम्? तस्या वीर्यं कुत्रत्यम्? पत्यौ च गर्भाशयः कास्ते? तथात्वे च मोदुषीति स्यात्, सम्बोधनपदं न मीढ्व इति ॥ इह च 'इमाम्' इति तस्यां द्वितीयाप्रयोगोऽस्ति न त्वमिति । तथात्वे पतिमेकादशं कृधीत्यप्यसङ्गतं स्यात् । एकादशमिति पदस्य डट्प्रत्ययान्तस्य एकादशं यावदिति नार्थः सम्भवति । एकादशानां पूरणमेकादशमिति पूरणार्थको डप्रत्ययो भवति । कथञ्चित्तथार्थत्वेऽपि मन्त्रे दशसंख्याबोधकः शब्दः क्वास्ते? मन्त्रे दशसंख्याकाः पुत्रा उक्ता न पतयः । किं पुत्रस्यैव पति-रिति नाम भवति सामाजिकानाम्? संस्कारविधिरीत्यापि विवाहप्रकरणस्थोऽयं मन्त्रः । न च विवाहे एकादशः पतिः ' इमा त्वमिन्द्र० ' इस मन्त्र का विनियोग आर्यसमाजी विधवा विवाह और नियोग के लिए करते है । इस मन्त्र का वे विभिन्न अर्थ करते है - 'हे मीढ्व इन्द्र, वीर्यसेचन मे समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष, तू इस विवाहित स्त्री को या विधवा को सौभाग्य युक्त कर, विवाहित स्त्री में दस पुत्र उत्पन्न कर और इसे ग्यारहवी स्त्री मान । हे स्त्री तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस सन्तान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ' । दयानन्द के किसी अनुयायी ने जो कुछ कहा है, वह सब संस्कृत भाषा के साथ जबर्दस्ती की खीचतान है । यह मन्त्र विवाह सूक्त में वर्णित है । स्वामी दयानन्द भी ऐसा ही मानते है । यहाँ पर कुमारी के विवाह का प्रसंग है । विधवा विवाह का बोधक कोई शब्द यहाँ नही मिलता । 'हे स्त्री' यह अर्थ मन्त्र के किस पद से निकलता है । इसी तरह से नियुक्त पुरुष से तुम दस सन्तान उत्पन्न करो, यह अर्थ भी किन पदों से, किस व्याकरण के अनुसार निकलेगा? यदि वर ही इस मन्त्र का प्रतिपाद्य है, तो क्या उसी को ग्यारहवाँ पति करना है? यदि स्त्री प्रतिपाद्य है तो क्या उसी को पति में गर्भाधान करना है । इन्द्र पद से यदि इस मन्त्र में वीर्य सेचनकर्ता वर प्रतिपाद्य है, तो फिर चतुर्थ पक्ष में स्त्री को कैसे संबोधित किया जा सकता है? मीढ्व पद के कारण स्त्री सबोधित नहीं हो सकती, क्योकि उसमें वीर्यसेचन का सामर्थ्य है ही नहीं । मन्त्र में दस पुत्रों की चर्चा आई है, पतियों की नही । क्या आर्यसमाजियो के यहां पुत्र को ही पति माना जाता है । संस्कार विधि में भी विवाह के प्रकरण में ही यह मन्त्र पठित
पृष्ठ 850
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः १७४८ सम्भवति 1। किं विवाहात् पूर्वमेव दश पतयः सम्पन्नाः? किं वा सा कुमारी विधवापदेन सम्बोधनीया स्यात्? इत्याद्यनेका विप्रतिपत्तयः सामाजिकेऽर्थे । तस्मादस्य मन्त्रस्यायमेवार्थ - हे इन्द्र मीढ्वः इमा त्व सुपुत्रा सुभगा कृणु । अत्र इन्द्रदेवता स्त्रियाः सुभगा- त्वाय सुपुत्रात्वाय च प्रार्थ्यते । पुत्राणां सम्बन्धे दशपुत्रानस्यामाधेहीति तृतीयपाद उक्तम् । सुभगात्वाय च चतुर्थपादे पतिमे- कादशं कृषि इत्युक्तम् । हे इन्द्रदेव स्त्रिया दशपुत्रापेक्षया चैकादशं पति कृधि । तेनैव तस्याः सौभाग्यं स्थेयं च प्रार्थ्यते । न च संख्यापूरणं सजातीयेनैव सम्भवति, 'यजमानपञ्चमा ऋत्विज इडा भक्षयन्ति' इत्यत्रानृत्विजापि यजमानेन पञ्चसंख्या- पूरणदर्शनात् । तथैव पुत्रभिन्नेन पत्याप्येकादशसंख्यापूर्तिसम्भवात् कृधीत्यस्य स्थापनमर्थः करोतेः क्रियासामान्यार्थत्वात् । यथा -' कुरु पदानि घनोरु शनैः शनैः' इति सौभाग्यदाता विवाहितः पतिरेव भवति । नियुक्तस्तु दुर्भगायास्तस्याः सौभाग्यदाता नैव भवति । स तु वस्तुतः पतिरपि न भवति, किन्तु दयानन्दरीत्या विधवायां वीर्यं सिक्त्वा स्वगृहं गच्छति । 'गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तम्' ( ऋ० सं० १० ८५/३६ ) अत्र तु वैवाहिकपतिकर्तृकं हस्तग्रहणमुक्तम् । न नियुक्तकर्तृकं हस्तग्रहण क्वचिदपि सम्भवति । तस्मान्नात्र एकादश पतयो विधवायाः सिद्धयन्ति । तथामति 'एकादशपतीन् कृधि' इति पाठः स्यात् । यथा दशास्यां पुत्रानाघेहीत्यत्र डट्प्रत्ययाभावेऽपि बहुवचनान्तदशशब्दः पुत्रानित्यनेन सम्बद्धयते, तथैव एकादशशब्दोऽपि बहुवचनान्तो भवति एकादशमिति डट्प्रत्ययान्तत्वाद् एकवचनान्तः । न च एकवचनान्तेन एकादशशब्देन एकादशसंख्याकाः पतयः सिद्धयन्ति, किन्वेक एव पतिर्दशपुत्रानपेक्ष्य एकादशसंख्यापूरको भवति । नात्र कथमपि हे पते त्वमेकादशी स्त्रियं कृधीत्यर्थः सम्भवति । पूर्वं तु दश पुत्रा उक्ता; न दश स्त्रियः 1। येन तथार्थः स्यात् । वस्तुतस्तु वरोऽत्र इन्द्रदेवतां प्रार्थयते । इन्द्रो वृष्टेर्देवता भवतीति तदभिप्रायेणैव तस्य मीढ्व इति सम्बोधनम् । ( मिह सेचने ) क्वसुप्रत्यये निपातेन मीढ्व इति रूपं सिद्धयति । दाश्वान् साह्वान् मीढ्वांश्च' ( पा० सू० ६।१।१२ ), ' मतुवसोरु सम्बुद्धौ छन्दसि' ( पा० सू० ८| ३| १ ) इत्यादीनि सूत्राणि तत्र प्रमाणानि । तस्माद्वरः प्रार्थयते -हे वृष्टिकर्तः इन्द्र त्वमस्यां स्त्रियां दश पुत्रानाधेहि दश पुत्रान् स्थापय । एकादशं मां पति स्थापय रक्षेत्यर्थः 1। अनेन मन्त्रेण वध्वाः प्रजार्थमिन्द्रः प्राथ्यते । यथा इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी इमां नारी प्रजया वर्धयन्तु' ( अथर्व० १४| १ | ५४| ) | तस्मादत्र वरो वक्ता न है | विवाह के समय पति ग्यारहवां नही हो सकता । क्या आर्यसमाजियों के यहाँ स्त्री के १ विवाह के पहले ही दस पति हो जाते हैं अथवा क्या कुमारी को ही विधवा कहा जाता है? इस तरह की अनेक शंकाए आर्यसमाजी अर्थ के प्रति उत्पन्न होती हैं । मन्त्र का सही अर्थ इस प्रकार से होगा है इन्द्र, इस स्त्री को आप सौभाग्यवती और पुत्रवती बनाइये । तृतीय पाद में पुत्रो के सम्बन्ध में और चतुर्थ पाद में सौभाग्य के सम्बन्ध में कहा गया है कि हे इन्द्र, इसको आप दस पुत्र दीजिये और इन दस पुत्रो के साथ ग्यारहवीं संख्या को पूरा करने वाला इसको विवाह पति दो और वह इन सब के साथ आनन्दपूर्वक रहे । संख्या की पूर्ति सजातीय से हो हो, ऐसा कोई नियम नहीं हैं, क्योकि वेद में ऋत्विजों के साथ यजमान मिलकर पाँच संख्या की पूर्ति करता है । सौभाग्य को देनेवाला विवाहित पति ही होता है, नियुक्त व्यक्ति को पति माना भी नही जाता । दयानन्द के अनुसार वह विधवा मे वीर्यसेचन करने के उपरान्त अपने घर चला जाता है । ऋग्वेद के अनुसार विवाहित पति ही पाणिग्रहण करता है, नियुक्त व्यक्ति नही । इस तरह से यहाँ पर विधवा के ग्यारह पतियों की चर्चा मानना निराधार है । 'एकादश पतीन कृषि' ऐसा पाठ होने पर ही वह अर्थ निकल सकता था । एक वचनान्त एकादश शब्द से ग्यारह पतियों का बोध हो भी नहीं सकता, किन्तु एक ही पति अपने दस पुत्रों के साथ ग्यारहवी माना जाता है । पति के लिये ग्यारह पत्नियो के विधान की बात तो कोरी कल्पना है । मन्त्र में दस पुत्रों की चर्चा की गई है, स्त्रियों की नही । वास्तव में तो वर यहाँ इन्द्र से प्रार्थना करता है । इन्द्र वृष्टि का देवता है, अतः मीढ्व उसी को कहा जाता है । वर इन्द्र से प्रार्थना करता है कि इस स्त्री के द्वारा मुझे दस पुत्र प्राप्त हों और उनके साथ ग्यारहवी संख्या की पूर्ति करने वाला में भी