वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 901–910

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 901–910

पृष्ठ 901

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वेदार्थ पारिजातः १७९९ नासो धम्र्यो विवाह इत्युक्तेः । किञ्च, येषां रीत्या विवाहमात्रेण कन्यात्वं न निवर्तते, वद्रीत्या तया संयोगे कन्यागमनदोषापत्तिः, तत्सन्तानस्य कानीनत्वापत्तिश्च । सिद्धान्ते तु पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् । तेषां निष्ठा तु विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ॥ ' ( म० ८ २२७ ) इति सप्तपदीसम्पत्तावेव विवाहः पर्यवस्यति । सप्तपदीपश्चादेव कन्यात्वं निवर्तते । अत्रैव भट्टोजिदीक्षिता- - 'कन्याया अनूढाया एवापत्यम्' ( कानीनः) इति । तत्रैव तत्त्वबोधिन्याम्—' ननु कन्या हि अक्षतयोनि', तस्याश्चापत्यसम्भव एव नास्तीति तत्रोत्तरम् 'कन्याया अविवाहिताया:' इति । बालमनोरमाया च - 'ननु कन्याया अप्रादुर्भूतयोवनत्वात् पुंसा योगाभावात् कथमपत्यसम्भव इति चोद्यमुद्भाव्योत्तरमुक्तम् कन्याया अलब्धविवाहाया इति । शब्देन्दुशेखरे तु —'न त्वक्षतयोनित्वं कन्यात्वमिति भावः' इति । तथा च विवाहिताया अकन्यात्वेन } वैदिकमन्त्राणा च कन्याविवाहपरत्वेन न विवाहिताया विधवाया विवाहः सम्भवति । - केषाञ्चिद्रीत्या तु — 'चतुर्थीहोममन्त्रेण त्वङ्मासहृदयेन्द्रियैः । भर्त्रा संयुज्यते नारी तद्गोत्रा तेन सा भवेत् ॥ ' इति बृहस्पतिवचनेन 'विवाहे चैव निर्वृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु । एकत्वं सा गता भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ॥ स्वगोत्राद् भ्रश्यते नारी उद्वाहात्सप्तमे पदे । भर्तृगोत्रेण कर्त्तव्या दानपिण्डोदकक्रिया ॥ ' इति लिखितवचनेन चतुर्थीहोमकर्मणा सप्तपदी- सम्पत्त्या च कन्यात्वं निवर्तते, पतिगोत्रत्व च सम्पद्यते । एतावता सम्भोगेनैव विवाहपूर्तिरित्यपास्तमेव, पूर्वोक्तवचनविरो- धात् । विवाहाच्चतुर्थे दिने चतुर्थीकर्मणैव पैतृकगोत्रनिवृत्तिः । न तत्र मैथुनस्यानिवार्यत्वम्, तथाविधानादर्शनात् । पारस्क- रादिगृह्यसूत्रेषु विवाहानन्तरं सवत्सरादिब्रह्मचर्यं विधानवैयर्थ्यापत्तेः । चतुर्थीकर्मसम्पत्त्यैव भार्यात्वोपपत्तिः । चतुर्थीकर्म तु विवाहाङ्गमेव न गर्भाधानरूपसंयोगाङ्गम्, विवाहगर्भाधानसंस्कारयोर्भेदात् । यदि सम्भोगं विना विवाहो न पूर्येत तर्हि ने ऐसे विवाह को धर्मसंमत नही माना है । जो लोग विवाह मात्र से कन्याभाव को निवृत्ति नही मानते, उनके मत से विवाह के उप- रान्त भी कन्या से ही सपर्क होगा और ऐसा मान लेने पर उस संपर्क से हुई सन्तान को भी कानीन मानना पडेगा, जो कि शायद ऐसा मानने वालों को भी इष्ट न हो । हमारे मत से तो 'पाणिग्रहणिका' प्रभूति मनु वचनके अनुसार सप्तपदी पूर्ण होने के साथ विवाह सम्पन्न हो जाता है । इसके साथ ही कन्याभाव की निवृत्ति हो जाती हैं । अतः उक्त दोष हमारे मत में नही लगता । भट्टोजिदीक्षित ने कहा भी है कि अवि- वाहित कन्या का पुत्र ही कानीन कहलाता है | तत्त्वबोधिनीकार यहाँ प्रश्न उठाते हैं कि कन्या तो अक्षतयोनि होती है, उसके कैसे पुत्र हो सकता है? फिर उसका उत्तर देते है कि कन्या से यहाँ व्यविवाहिता स्त्री का बोध होता है । बालमनोरमाकार इस प्रसग में लिखते हैं कि कन्या को तो अभी यौवन आया नही है, अतः उसका पुरुष से संपर्क न होने से वह शिशु की माता कैसे बन सकती हैं, इस शंका का समाधान करने के लिये कन्या शब्द की व्याख्या अविवाहित स्त्री किया जाता है । शब्देन्दुशेखर में इसको और भी स्पष्ट किया गया है कि कन्या शब्द से यहीं अक्षतयोनि का ग्रहण नही किया जाता । इस तरह से विवाहित स्त्री के कन्या न रह जाने से और वैदिक मंत्रों का उपयोग कन्या के ही विवाह के अवसर पर होने से विवाहित विधवा का विवाह कथमपि शास्त्रसमत नही माना जा सकता । कुछ लोगों का कहना है कि वृहस्पति और लिखित स्मृति के अनुसार विवाह के चौथे दिन वैदिक मंत्रों के द्वारा चतुर्थी होम हो जाने पर नारी अपने पति के साथ शरीर, मन और इन्द्रियों से मिलकर उसी के गोत्र की हो जाती है, उसका पिता का गोत्र विवाह के अवसर पर सप्तपदी के साथ ही समाप्त हो जाता है । इसके उपरान्त उसकी सभी धार्मिक क्रियाएं पति के गोत्र के अनुसार ही की जाती हैं । इससे संभोग होने पर ही विवाह की सम्पूर्णता माननेवालों का पक्ष खंडित हो जाता है, क्योकि विवाह के चौथे दिन चतुर्थी कर्म से पिता के गोत्र की निवृत्ति मानी जाती है, इसके लिये मैथुन अनिवार्य नही माना गया है, क्योंकि इसका वहां विधान नही है । पारस्कर गृह्यसूत्र प्रभृति प्रथों में तो विवाह के उपरान्त भी एक वर्ष के ब्रह्मचर्य का विधान है । चतुर्थी कर्म के साथ ही स्त्री, भार्या हो जाती है । चतुर्थी कर्म विवाह का अंग है, गर्भाधान रूप संयोग का नही । विवाह और गर्भाधान ये दो भिन्न संस्कार है ।

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१८०० वेदार्थपारिजात विवहानन्तरं सवत्सरपर्यन्त ब्रह्मचर्यविधानं न स्यात् 1। पारस्करगृह्यसूत्रं तु वादिप्रतिवादिसम्मतमेव । अद्यत्वे तच्छृङ्खलत्व- प्राचुर्याद विवाहदिन एव चतुर्थीकर्मापि सम्पद्यते । अत एव केषाञ्चिद्रीत्या सप्तपदी कर्मानन्तरं केषाचिचतुर्थीकर्मानन्तरमेव कन्यात्वस्य पैतृकगोत्रस्य च निवृत्तिः पतिगोत्रप्राप्तिः, पत्नीत्वं च सम्पद्यते । विवाहस्तु ऋतुकालात्पूर्वमेव युक्तः । देशभेदेन ऋतुकालभेदाद् विवाहकालभेदोऽपि दृश्यते । शास्त्रेष्वष्टमवर्षमारभ्य द्वादशवर्षपर्यन्तं कन्याविवाहकाल उक्तः । यस्तु दोषवती कन्याम्' ( म० ८ २२४ ) इत्यादिवचने मनुना दूषिताया अपि विवाहात्पूर्वं कन्यात्वमेवोक्तम् । यत्तु केनचिदुक्तम् - ' पुरुषा यदि पुनर्विवाहं कर्तुमधिकृता ईश्वरीयन्यायानुसारेण स्त्रियः कुतो न पुनर्विवाह कर्तुमधिकृता' इति, तदपि यत्किञ्चित् यतो हि पुरुषाणां सन्तानार्थं पत्न्या जीवनकालेऽपि पुनर्विवाहो भवति, तथैव ? कि स्त्रिया अपि सन्तानार्थं पतिजीवनकाले विवाहोऽभिप्रेतः वस्तुतस्तत्प्रकृतिभेदादेव व्यवहारभेदोऽप्यङ्गीकर्त्तव्यः । तन एकः पुरुष एकस्मिन्नेव दिनेऽनेकासु स्त्रीषु गर्भाधानं कर्तुं शक्नोति । स्त्रीत्वनेकपुरुषसङ्गमेऽपि वर्षेणैकमेव गर्भं धारयति, किमत्रेश्वरीयन्यायो नावलोक्यते? शास्त्रानुसारेण तु स्त्रीणामेकपतिविधानमेव दृश्यते । पुरुषस्य तु कारण- विशेषाद् विवाहान्तराभ्यनुज्ञापि दृश्यते । यत्तु ' युवतीना विधवानां कामाद्युपद्रवशान्तये दयापरवशाद् विवाहोऽनुमन्तव्यः' इति तदपि तुच्छम्, तथात्वे 'स्थविराणामपि स्त्रीणा बाधते मैथुनज्वरः ॥ ' ( म ० भा० अनुशा० प ० २१/५ ) इति रीत्या वृद्धनामपि तदापत्तेः । वस्तुतस्तु विधवाना रागवर्धक वातावरणाद् दूर एव संन्यासिवदवस्थानं जपध्याननिष्ठैव विहिता । यदुक्तम्-' विधवाश्चेद् गुप्तरीत्या कामवासनापूर्त्यर्थं व्यभिचरन्ति भ्रूणहत्यादिकं च कुर्वन्ति, ततो विवाह एव यदि संभोग के बिना विवाह संस्कार की पूर्ति न मानी जाती, तो उस अवस्था में विवाह के उपरान्त एक वर्ष तक के ब्रह्मचर्य का विधान कैसे किया जा सकता था? पारस्कर गृहसूत्र को आर्यसमाजी भी प्रमाण मानते है । आजकल तो उच्छृंखलता बढ गई है, अतः विवाह के दिन ही चतुर्थी कर्म भी पूरा कर लिया जाता है । इस तरह से कुछ लोगो के मत से सप्तपदी के बाद और अन्य लोगों के मत से चतुर्थी कर्म के बाद कन्याभाव और पिता के गोत्र की निवृत्ति मानी जाती है और स्त्री पत्नी बन जाती है । विवाह संस्कार ऋतुकाल के पहले ही हो जाना चाहिये । देश के भेद से ऋतुकाल का भेद देखा जाता है । तदनुसार ही विवाह का काल भी भिन्न हो सकता है । शास्त्रो मे आठ से लेकर बारह वर्ष पर्यन्त कन्या का विवाहकाल बताया गया है । मनु ने दूषित स्त्री को भी विवाह के पहले कन्या ही माना है । कुछ लोगों का आक्षेप हैं कि पुरुषों का यदि पुनर्विवाह हो सकता है, तो ईश्वरीय न्याय के अनुसार स्त्रियों का पुन-विवाह क्यों नहीं हो सकता? किन्तु उन लोगों को यह कल्पना निःसार है, क्योकि पत्नी के जीवित रहते हुए भी सन्तान के लिये जैसे पुरुष का दूसरा विवाह होता है, वैसे ही क्या आप पति के जीवनकाल में ही सन्तति के लिये पत्नी के द्वितीय विवाह का समर्थन करना चाहते हैं? वास्तव में देखा जाय तो प्रकृति के भेद से व्यवहार का भेद मानना पड़ता है । इसीलिये एक पुरुष एक ही दिन मे अनेक स्त्रियों में गर्भाधान कर सकता है, किन्तु स्त्री अनेक पुरुषों से सहवास भले ही कर ले, वह गर्भधारण वर्ष मे एक ही बार कर सकती है । यहाँ आप ईश्वरीय न्याय की आलोचना क्यो नही करते? शास्त्रो के अनुसार स्त्रियों के लिये एक ही पति का विधान है । पुरुष के लिये विशेष परिस्थिति में दूसरे विवाह की अनुमति दी गई है । युवती विधवाओं के काम प्रभूति उपद्रवों की शान्ति के लिये दया करके विवाह आदि की अनुमति दे देनी चाहिये, यह कथन भी गलत है, क्योकि कहा गया है कि विधवा स्त्रियो को भी कामज्वर सताता है । इस परिस्थिति में वृद्ध स्त्रियों पर भी आपको दया दिखानी पड़ेगी । इस दया का कहाँ अन्त होगा? वास्तव में देखा जाय तो विधवाओ को काम वासना ( कामभाव ) बढाने वाले वातावरण से दूर रखकर उन्हें संन्यासी की तरह जीवन बिताना चाहिये । उनको सदा जप, ध्यान, व्रत -उपवास आदि के अनुष्ठान म लगे रहना चाहिये । है विधवा अपनी बासना की पूर्ति के लिये छिपे -छिपे व्यभिचार करती हैं, गर्भपात करती हैं, इसकी अपेक्षा तो उनका

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वेदार्थपारिजातः १८०१ तासां किं न विधेयः' इति, तदपि न शोभनम् 1 यतो हि येषा रीत्या शास्त्रविरुद्धत्वादपि विधवाविवाहो न दूषणम् तेषा कृते शास्त्रविरुद्धा भ्रूणहत्यापि किमर्थं दूषणं स्यात्? ' ईप्सितो हि गुण स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृता ' ( म ० भा ० आदिपर्व २०४८) इति रीत्या कथं न तासामपि विवाहः कर्त्तव्यतामाप्नुयात् ' वस्तुतस्तु विधवाविवाहाप्रचारेण पातिव्रत्यधर्मपालनमाहात्म्यवर्णनेन धर्मभङ्गकारणान्नरकादिदुर्गतिवर्णनेनैव सात्त्विकभावप्रचारेणानर्थनिवृत्तिः स्यात् । सुधारका अपि विधवानां विवाहापेक्षया ब्रह्मचर्यपालनमुत्तमं कथयन्ति, तर्हि तत्सम्बन्धेऽपि लेखनभाषणादिभि प्रचारः कथं न क्रियते? आर्यसामाजिकाः पञ्चविंशतिवर्षपर्यन्तं युवकाना युवतीना च ब्रह्मचर्यपालनं कर्त्तव्यमुपदिशन्ति तद्बाचे दण्डयन्त्यपि तथैव विधवानां कृते ब्रह्मचर्यपालनोपदेशः कुतो न क्रियते? केचित्तु विधवाविवाहमार्यजातिसंख्यावृद्ध्यर्थं- समर्थयन्ते । तदपि यत्किञ्चित् यतो हि साम्प्रतिकाः सुधारकाः शासकाश्च संख्यावृद्धि हानिकरीमेव वर्णयन्ति । वृद्धिरोधाय वन्ध्याकरणनपुंसकीकरणप्रचाराय च कोटिकोटिरूप्यकाणि व्ययन्ते । कश्चित्तु ' यथा पुरुषस्य पुनर्विवाहोऽप्रशस्तस्तथैव विधवानामपि विवाहो भवत्वप्रशस्तः । ' अविप्लुतब्रह्मचर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत् । अनन्यपूर्विकां कान्तामसपिण्डा यवीयसीम् ॥ ' ( याज्ञवल्क्यस्मृति ३।५२ ) अत्राऽविवाहितपूर्वस्याविप्लुत- ब्रह्मचर्यस्याऽनन्यपूर्विकया कन्यया विवाहो विहित । विवाहितश्च न तादृशो भवतीत्यतोऽप्रशस्त एवेति, तथैव विधवाविवाहो-{ ऽप्यस्तु ' इति, तदपि यत्किञ्चित् याज्ञवल्क्यवचने ब्रह्मचर्यपदेनाविवाहस्यैवाविवक्षितत्वात्, किन्तु ब्रह्मचर्यंकालेऽस्खलित- त्वस्यैवेष्टत्वात् । तथा चापराया टीकायाम् -'ब्रह्मचर्यस्खलने प्रायश्चित्तं कर्त्तव्यं भवति, न विवाहनिषेधः । स्नानात्पूर्वं स्खलने वकीणिप्रायश्चित्तम्, स्नानानन्तर तु स्नातकस्य साधारणं प्रायश्चित्तम् । विवाहानन्तरं तु पुरुषस्य पत्न्या मरणेऽग्नि- होत्रसन्तानाद्यर्थं पुनर्विवाहो विहित एव । 'भार्यायै पूर्वमारिण्ये दत्त्वाग्नीनन्त्यकर्मणि पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च । ” , यह कथन भी उचित नहीं है, क्योकि जिनके मत में शास्त्र विरुद्ध होते हुए भी विधवा- विवाह अनुचितहै विवाह कर देना अच्छा है नही है, उनके मत में गर्भपात में भी दोष क्यो माना जायगा? महाभारत में बताया गया है कि अनेक पुरुषो से संपर्क स्त्रियो के लिये इष्ट है, ऐसी स्थिति में उनके विवाह की ही क्या आवश्यकता है । वास्तव में विधवा विवाह का प्रचार न करने से और पातिव्रत्य धर्म के पालन की महत्ता का वर्णन शास्त्रों में होने से ही धर्म के नाश और नरकपात के भय से सात्त्विक भावो का प्रचार होता है मौर अनर्थ की निवृत्ति होती है । सुधारक लोग भी विधवा विवाह की अपेक्षा ब्रह्मचर्य के पालन को उत्तम मानते है । तब उसके सम्बन्ध में भी लेखन, भाषण आदि के द्वारा प्रचार क्यो नही किया जाता? आर्यसमाजी पचीस वर्ष तक युवक और युवतियो के ब्रह्मचर्य पालन को आवश्यक कर्तव्य मानते है । ऐसा न करने पर उनको दण्डित किया जाता है । इसी तरह विधवाओं के लिये वे ब्रह्मचर्य के पालन का उपदेश क्यो नही करते? कुछ लोग आर्य जाति की जनसंख्या बढाने के लिये विधवा विवाह का समर्थन करते हैं । यह भी उचित नही है, क्योकि आजकल के सुधारक और शासक जनसंख्या की वृद्धि को हानिकारक मानते हैं । इसको रोकने के लिये वन्ध्याकरण, नपुंसकीकरण आदि अनेक उपायों के प्रचार के निमित्त करोड़ो रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है । कुछ लोग विधवा विवाह की तरह ही पुरुष के पुनर्विवाह को भी अच्छा नही मानते । याज्ञवल्क्य स्मृति में बताया गया है कि जिसका पहले विवाह नही हुआ है, जिसका ब्रह्मचर्य लुप्त नही हुआ है, उसी पुरुष का सुलक्षणा कन्या से विवाह होना चाहिये । विवाहित पुरुष ऐसा नही होता, अत: इस विवाह को जैसे प्रशस्त नही माना जाता, तब भी ऐसा विवाह होता है, उसी तरह से विधवा का विवाह भी होना चाहिये, भले ही वह अप्रशस्त माना जाय । किन्तु यह कथन उचित नही है । याज्ञवल्क्य के रक्त वचन मे ब्रह्मचर्य पद अविवाहित पुरुष का द्योतक नहीं है, किन्तु ब्रह्मचर्याश्रम में रहते समय निर्दोषता का परिचायक है । इस श्लोक की टीका में अपरार्क ने कहा है कि ब्रह्मचर्य का स्खलन हो जाने पर प्रायश्चित करना पड़ता है । इससे विवाह का निषेध नहीं होता । स्नातक होने से पूर्व वीर्य का स्खलन होने पर अवकीर्णी नामक प्रायश्चित करना पडता है और स्नातक बन जाने पर साधारण प्रायश्चित विहित है । विवाह के बाद पत्नी के मर जाने पर पुरुष के लिये अग्निहोत्र प्रभृति धार्मिक कृत्यों और सन्तान आदि के लिये पुनर्विवाह २२६

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वेदार्थपारिजातः १८०२ (म० ५ १६८) इति मनूक्त:। 'गुरवे तु वरं दत्त्वा स्नायीत तदनुज्ञया । वेदव्रतानि वा पारं नीत्वा ह्यभयमेव वा ॥ ( या ० ३।५१ ) इति याज्ञवल्क्यस्मृतौ ब्रह्मचर्यव्रतं पारयित्वा स्नातकत्वं विहितम् । तेनाविवाहितत्वं नार्थः, किन्तु गुरुकुलात् समागतस्यैवेदं वर्णनम् । मनुस्मृतावपि तथैव - 'वेदानधीत्य वेदो वा वेदं वापि यथाक्रमम् | अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् ॥ ' (म० ३ २) यदि विवाहित पुरुषस्य पुनर्विवाहाज्ञाऽनभीष्टा स्यात्तदा 'पुनर्दारक्रिया कुर्यात्पुनराधानमेव च । म०५।१६८ ) इति न वदेत्, ' वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे... ( म० ९।८१ ) इत्यादिना पूर्वपत्न्या वन्ध्याया सन्तानार्थं च विवाहान्तर नाज्ञापयेत् । --- ' अन्योन्यस्याव्यभीचारो ' ( म० ९ १०१ ) इति वचनस्य टीकाया मेधातिथिना पूर्वपक्षमुपक्षिप्य समाहितम् -'स्त्रीवत्पुरुषस्या-नेकभार्यापरिणयनं न स्यात्, तदयुक्तम् अस्ति तत्कृते वचनम् --कामतस्तु प्रवृत्तानाम्' ( म ० ३।१२ ), ' वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे ' ( म० ९ १८१ ) इति न तु स्त्रियाः, तथा च लिङ्गान्तरं स्यात् 'एकस्य बह,व्यो जाया भवन्ति नैकस्या बहव पतयः' इति । अतो याज्ञवल्क्यवचनेऽविप्लुतब्रह्मचर्यस्य पुरुषस्यानन्यपूर्विकया विवाह उक्तेऽपि न पुरुषस्य विवाहान्तरे बाधा भवतीति । स्त्रियास्तु सर्वत्रानन्यपूर्विकाया एव विवाह उक्तः । अविप्लुतब्रह्मचर्यस्य गुरुकुलेऽक्षतवीर्यस्येत्यर्थः । अन्यथा विवाहान्तरविधायकवचनानां विरोधो ध्रुवः । तस्माद्विधवाविवाहो निषिद्ध एव । विवाहविच्छेदोऽपि तथैव निषिद्ध । 'न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते । एवं धर्मं विजानीमः प्राक् प्रजापतिनिर्मितस् । ' ( म० ९ ४६ ) इत्युक्तेः । विधवाविवाहप्रचारका अद्य विवाहविच्छेदप्रचारद्वारा सधवापुनर्विवाहं प्रचारयन्ति । कश्चित् रामेण सीताया विवाहविच्छेदं वदति । तत्तु दुःसाहसमेव, तथात्वेऽश्वमेधादियज्ञेषु सीतायाः स्वर्गप्रति-मया यज्ञनिर्वाहं न कुर्यात् । लोकापवादभीत्यैव तु रामेण सीताया बाह्यव्यवहारेणैव पृथक्कतत्वात् । उत्तररामचरिते तु कुन्दमालादिग्रन्थरीत्या सीतारामयोः संयोगान्तोपसहारस्य वर्णनात् । कौटलीयेऽर्थशास्त्रेऽपि 'अमोक्षो धर्मविवाहानाम्' ( ३।३.२२ ) विवाहविच्छेदस्य निषिद्धत्वात् । ' परस्परं द्वेषान्मोक्षः ' इति पशुप्रायाणा कृते विवाहविच्छेद उक्तः । विवाहमन्त्रोऽपि- शास्त्रो में विहित है 1| मनु ने 'भार्यायै' इत्यादि श्लोक में पुनर्विवाह और पुनरग्न्याधान का पुरुष के लिये स्पष्ट विधान किया है । गुरुवे तु वरं दत्वा' इस याज्ञवल्क्य स्मृति के श्लोक में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर लेने के बाद स्नातक बनने का विधान है । इन सब पर विचार करने से यही निष्कर्ष निकलता है कि यहाँ पर अविवाहित पुरुष की चर्चा न होकर गुरुकुल से आये स्नातक का उल्लेख है । मनुस्मृति में भी याज्ञवल्क्य स्मृति की तरह अलुप्त ब्रह्मचर्य वाले स्नातक के गृहस्थाश्रम में प्रवेश की बात कही गई है । यदि विवाहित पुरुष का पुनर्विवाह मनु को अनभीष्ट होता, तो वहाँ पर पुनः विवाह और पुनः अग्न्याधान की चर्चा न आती । इसी तरह से पूर्व पत्नी के बन्ध्या होने पर वहाँ सन्तान के लिये दूसरा विवाह करने की अनुमति न दी जाती । 'अन्योन्यस्य' इस श्लोक की टीका में पूर्वपक्ष की उत्थापना करके मेघातिथि ने उसका समाधान किया है कि स्त्री के समान ही पुरुष का भी अनेक स्त्रियो से विवाह नही हो सकता, ऐसा कहना सही नही हैं, क्योकि पुरुष के लिये इस तरह के वचन उपलब्ध है, स्त्रियो के लिये नही । इसमे यह वचन भी प्रमाण है कि एक पुरुष की अनेक स्त्रियाँ होती है, किन्तु एक स्त्री के अनेक पति नही होते । इसलिये याज्ञवल्क्य के उक्त वचन में अविप्लुत ब्रह्मचर्य वाले पुरुष का इसी तरह को स्त्री के साथ विवाह विहित होने पर भी पुरुष के दूसरे विवाह में कोई शास्त्रवाघा नही उत्पन्न होती । स्त्री का विवाह तो अनन्यपूर्विका का ही विहित है । ब्रह्मचर्य पद का अर्थ गुरुकुल में अक्षतवीर्य पुरुष है । अन्यथा विवाहान्तर के विधायक वचनो से विरोध उपस्थित हो जायगा । इस तरह से शास्त्र की दृष्टि से विधवा विवाह सर्वथा निषिद्ध है । इसी तरह से विवाह विच्छेद ( तलाक ) भी शास्त्रों में निषिद्ध है । मनु ने कहा है विक्रय या त्याग से स्त्री, पति से अलग नहीं हो सकती । हम प्रजापति के द्वारा पहले बनाए हुए इस धर्म को मानते हैं । विधवा विवाह का प्रचार करने वाले आज तलाक का भी प्रचार करने लगे है और ये सधवा स्त्रियो के भी पुनर्विवाह का समर्थन करने लगे हैं । कुछ लोग इस प्रसंग में राम और सीता के विवाह विच्छेद की भी चर्चा करते हैं, किन्तु यह दुःसाहस मात्र हैं, यदि ऐसा होता तो अश्वमेघ यज्ञ के समय राम सीता की स्वर्णमयी प्रतिमा का निर्माण न कराते । लोकापवाद के डर से ही ऊपरी मन से राम ने सीता का परित्याग किया था । उत्तररामचरित,

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वेदार्थपारिजात १८०३ ' ममेयमस्तु पोष्या मा त्वादादबृहस्पतिः । 'मया पत्या प्रजावती सजीव शरद शतम्' ( अथर्व० १४/१/५२ ) इति स्त्रीणां पैतृक सम्पत्तिसम्बन्ध विवाहविच्छेद च निराकरोत्येव । तत एव मनुना 'भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनास्तथा । यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ' ( म० ८ | ४१६ ) इत्युक्तम् । तदेव च मीमासाया ६| १ | १४ जैमिनिसूत्रस्य व्याख्याने शबरस्वामिनोक्तम् । तस्मात् स्त्रिया निर्धनत्वस्मरणेन तस्या अस्वातन्त्र्यमनेन प्रकारेणोच्यते । शुक्रनीतौ च तदेवोक्तम् । 'मह्य त्वादाद् बृहस्पतिः' इत्यत्र वाक्ये मह्यमित्यत्र सम्प्रदाने चतुर्थी । सम्प्रदानं स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्व- त्वोपपादनमेव भवति । अतस्तदभावादेव रजकस्य वस्त्रं ददातीत्यत्र षष्ठी भवति न चतुर्थी । बृहस्पतिरग्निः पिता च स्त्रस्व- त्वं परित्यज्य कन्याया पतिस्वत्वमुपपादयति । तस्माद्विवाहविच्छेदो निराकृतो भवति । तत एव ' जीवन् वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम्' ( य० ४।४८ ) इति सर्वदेव पतिस्वत्वमेव तत्र भवति । कन्यादानक्रियाया. कर्मैव न कर्त्री । अतो दत्ताया कन्यायां पित्रादीना स्वस्य च स्वत्व न भवति । 'मया पत्या प्रजावती जीव शरदः शतम् ।' इति यावज्जीवनम- खण्ड एव सम्बन्ध उक्तो भवति । तेनैव नियोगादिकमपि परिहृतं भवति । अत एव 'त्वा सह पत्या दधामि' ( ऋ ० स ० १०।८५/ ४१ ), रयि च पुत्राश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम्' ( ऋ० स०| ८५/४१ ), प्रेतो ( कन्या पितृगृहात् ) मुञ्चामि नामुतः न पतिगृहात् । ( ऋ ० स० १० ८५/२५ ), 'मया पत्या जरदष्टि ( वृद्धा ) यथास मह्यत्वादुर्गार्हपत्याय देवा:' ( ऋ ० सं ० १०/८५] ४१ ), साम अहमस्मि ऋक् त्वं द्योरह पृथिवीत्व तावेव विवहावहै सह रेतो दधावहै प्रजा प्रजनयावहै पशून्, ( ) पास्कर गृह्यसूत्रे १/६/३ अत्र पतिपत्न्योर्ऋक्सामत्वादिदृष्टान्तै सम्बन्धस्य दायमुक्तम् । तस्माद्विवाहविच्छेदः सर्वथाऽसंगत एव । ' अश्मेव त्वं स्थिरा भव ' ( पारस्कर गृह्यसूत्रे १७१ ) इति पाषाणवत्स्थैर्यमुक्तम् । ध्रु वा स्त्री पतिकुले भूयासम्' ( गोभिलगृह्यसूत्रे २| ३| ८ ) पत्न्या ध्रुवस्य साक्षित्वे स्थैर्धार्थं स्वयं पत्नी वक्ति । 'सोऽस्मान् देवो अर्थप्रेतो मुञ्चतु मामुष्य- कुन्दमाला प्रभृति ग्रन्थो मे तो सीता- राम का पुनर्मिलन करा कर उपसहार किया है । कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी बताया है कि धार्मिक विवाह कभी विच्छिन्न नही होता । ' ममेयमस्तु' प्रभृति अथर्ववेदीय मन्त्र भी स्त्रियो के पिता की संपत्ति के अधिकार का और विवाह विच्छेद का स्पष्ट निषेध करता है । इसीलिये पत्नी, पुत्र और दास को मनु ने निर्धन बताया है, क्योकि ये जो कुछ भी पैदा करते हैं, उस पर उनके स्वामी का ही अधिकार माना जाता है | ६| १ | १४ संख्या के जैमिनि मूत्र की व्याख्या करते हुए शबर स्वामी ने यही बात कही है । स्त्री को निर्धन मानने से ही उसकी स्वतन्त्रता भी नही रह जाती है । शुक्रनीति में इसी का वर्णन मिलता है | 'मुझे बृहस्पति ने तुमको सौपा है' इस वाक्य मे ' मह्यम्' इस पद मे सम्प्रदान मे चतुर्थी है । अपने अधिकार की निवृत्ति के साथ दूसरे के अधिकार को स्वीकार करना ही संप्रदान कहलाता है । ऐसा न होने के कारण ही धोबी को कपड़ा देता है, इस वाक्य में षष्ठी होती है, चतुर्थी नही । बृहस्पति, अग्नि और कन्या का पिता अपने स्वस्व को छोडकर कन्या पर पति का स्वत्व स्वीकार करते है । इससे विवाह विच्छेद किसी भी तरह से समर्थित नही हो सकता । इसी कारण से जीवित हो या मर गया हो, स्त्री का पति ही सब कुछ है, इस मनुवचन मे स्त्री पर सदा पति का ही अधिकार माना गया है । कन्यादान की क्रिया का कर्म स्त्री है, कर्ता नही । अतः एक बार कन्यादान हो जाने के बाद उस पर पिता प्रभृति का तथा स्वयं उसका भी अधिकार नही रह जाता । 'मया' पत्या' प्रभूति वाक्यो से उसका पति के साथ जीवनपर्यन्त अटूट सम्बन्ध बना रहता है । इसी से तलाक आदि की भी कोई संभावना नही रह जाती । 'त्वा सह पत्या' प्रभृति } ऋग्वेद, पारस्कर गृहसूत्र के वचनो के आधार पर और ऋक्साम आदि दृष्टान्तो से भी पति-पत्नी के सम्बन्ध मे दृढता का ही समर्थन होता है । इसलिये भारतीय शास्त्रों की दृष्टि में विवाह विच्छेद सर्वथा असंगत है । ' अश्मेव त्वम्' इस पारस्कर गृह्यसूत्र के वाक्य में विवाह सम्बन्ध की पाषाण के समान दृढ़ता मानी गई है । गोभिल

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वेदार्थपारिजात' १८०४ गृहेभ्य:' ( काठकगृह्यसूत्रे २५/३० ) इति पितृगृहान्मुक्तिः पतिगृहाच्च सर्वथाऽमोकः प्रार्थ्यते । 'इहैव स्त मा वियौष्टं विश्वमा- युर्व्यश्नुत मोदमानी स्वे गृहे' (ऋ० सं० १०/८५१५२ ) तथाऽथर्ववेदसहिता १४। १। ३२ ) । 'दु शोलोदुभंगो वृद्धो जडो रोग्यध- नोऽपि वा ॥ पति स्त्रीभिर्न हातव्य:..." ( भा० पु० १० २९/ २५ ), 'सकृत्कन्या प्रदीयते ' ( म० ९ ४७ ), 'न निष्क्रयविसर्गाभ्या भर्तुर्भार्या विमुच्यते । ' ( म० ९ ।४६ ) 'न त्यागोऽस्ति द्विषन्त्याश्च' ( म० ९१७९ ) इतिवचनैविवाहविच्छेद सर्वथा निषिद्धएव । यत्तु -"विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत् कन्यां विगर्हिताम् । व्याधिता विप्रदुष्टा वा छद्मना चोपपादिताम् ॥ ' म० ९।७३ ) इति विवाहिताया अपि त्याग उक्तः' इति, तदपि यत्किञ्चित् 'न निष्क्रयविसर्गाभ्या भर्तुर्भार्या विमुच्यते । ' ( म० ९१४६ ) इति विरोधात् । तस्मात् पूर्वोक्त पद्यं सप्तपदीकर्मण पूर्वमेव दोषादिज्ञाने त्याग बोधयति । तत एव तत्र कुल्लूकभट्टेनोक्तम्- ' अद्भिरेव द्विजाग्याणामित्येवमादिविधिना प्रतिगृह्यापि कन्यां नैरुज्यलक्षणोपेता रोगिणी क्षतयोनित्वा- द्यभिशापवतोमधिकाङ्गादिगोपनछद्मनोपपादितां सप्तपदीकरणात् प्राग् ज्ञाता त्यजेत् । ततश्च तत्त्यागे दोषाभाव इत्येतदर्थम् । विवाहे सम्पन्ने तु भर्त्तव्यैव सा' इति । 'न दत्त्वा कस्यचित्कन्या पुनर्दद्याद्विचक्षणः ' ( म० ९। ७१ ) इत्यत्र सप्तपदी करणात्पूर्वमपि त्यागो निषिद्धः । यथोक्त कुल्लूकभट्टेन -' सप्तपदीकरणस्याजातत्वाद् भार्यात्वा निष्पत्तेः पुनर्दानाशङ्कायामिदं वचनम् । विवाहस्य पूर्णताया त्यागः सर्वथा निषिद्ध एव' इति । यदपि--- ' यस्तु दोषवती कन्यामनाख्याय प्रयच्छति । दोषे तु सति त्यागः स्यादन्योऽन्यं त्यजतोस्तयोः ॥ ' ( १२३३२ ) इति नारदीयमनुसंहिताया विवाहविच्छेद उक्त ' इति, तदपि यत्किञ्चित् भृगुप्रोक्तमनुवचनवन्नारदप्रोक्तमनुवचनस्यापि सप्तपदीकरणात्प्रागेव त्यागविधाने तात्पर्यात् । तथाहि-' यस्तु दोषवती कन्यामनाख्यायोपपादयेत् । तस्य तद्वितथ कुर्यात् कन्यादातुर्दुरात्मनः ॥ ' ( म ० ९ ७३ ) इति वचनमपि सप्तपदीकरणात्प्राग् ज्ञातदोषायास्त्यागे दोषाभावमात्रप्रदर्शनार्थम्, न गृह्यसूत्र और काठक गृह्यसूत्र में भी पिता के घर से मुक्ति और पति के घर से निरन्तर दृढ़ सम्बन्ध की कामना की गई है । ऋग्वेद और अथर्ववेद सहिता में भी ऐसी ही कामना की गई है । भागवत पुराण में बताया गया है कि व्यसनी, कुरूप, वृद्ध, मूर्ख, रोगी, निर्धन पति का भी स्त्रियो को परित्याग नही करना चाहिये । मनुस्मृति के भी अनेक बचन विवाह के विच्छेद को सर्वथा निषिद्ध बताते है । निन्दित, रोगिणी, दुष्ट और छल से दी हुई कन्या को विधि पूर्वक ग्रहण करके भी पुरुष त्याग सकता है । इस मनु वाक्य में विवाहित स्त्री के परित्याग की बात कही गई है, ऐसा कुछ लोगों का विचार है, किन्तु यह उक्ति ठीक नहीं है, क्योकि अभी अभी मनु का वह कथन उद्धृत किया गया है, जिसके अनुसार कि विक्रय या त्याग से स्त्री पति से अलग नहीं हो सकती । आपकी बात मान लेने से इस वचन से स्पष्ट विरोध होगा । इसलिये पूर्वोक्त पद्य की संगति सप्तपदी से पहले कन्या में दोष का ज्ञान हो जाने पर परित्याग ,, में होगी । इसीलिये टीकाकार कुल्लूक भट्ट ने कहा है कि विधिपूर्वक कन्या को स्वीकार करके भी कन्या मे किसी रोग क्षतयोनित्व afar या हीन अंग प्रभृति दोषो के रहते हुए भी छलपूर्वक उनको छिपाया गया है तो सप्तपदी से पहले उनका ज्ञान हो जाने पर उसका परित्याग कर दे । इस स्थिति मे परित्याग कर देने मे कोई दोष नही है । विवाह हो जाने के बाद तो उसका भरण-पोषण करना ही पडता है । 'न दत्त्वा' प्रभृति मनुवचन में सप्तपदी से पहले भी एक बार स्वीकार कर लेने के बाद कन्या का परित्याग निषिद्ध माना गया गया है । कुल्लूक भट्ट ने अपनी व्याख्या में यही अभिप्राय व्यक्त किया है । 'यस्तु दोष ० ' प्रभृति नारदीय मनुसंहिता के वचन में विवाह विच्छेद की बात कही गई है, ऐसा कुछ लोगो का कथन है, किन्तु यह कथन भी ठीक नही है, क्योंकि भृगुप्रोक्त मनुवश्चन के समान ही नारद प्रोक्त मनुवचन का भी तात्पर्य सप्तपदी के पहले ही परित्याग के विधान में है । 'यस्तु दोषवतीम्' प्रभृति मनुवचन का तात्पर्य भी सप्तपदी के पहले कन्या मे किसी दोष का ज्ञान हो जाने पर परित्याग करने में कोई दोष नही होता, इतना मात्र बताने में है । यहाँ परित्याग विहित नही है, इस बात को पहले ही कहा जा चुका है । त्याग में दोष न रहने से नरकपतन आदि का भय नहीं होता, तो ऐसी अवस्था में सदोष कन्या का परित्याग ही उचित है, ऐसा

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वेदार्थपारिजातः १८०५ तु त्यागार्थमिति निर्णीतत्वात् । न च त्यागे दोषाभावे नरकपाताद्यभावात् कुतो न ज्ञातदोषायास्त्याग एव श्रेयानिति वाच्यम्, वाग्दत्ताया भार्यात्वस्य कथञ्चिन्निष्ठितत्वात् ' न निष्क्रयविसर्गाभ्या भर्तुर्भार्या विमुच्यते' ( म० ९१४६ ) इति मनुवाक्येन ' त्यागस्य विरोधात् । यदपि प्रोषितो धर्मकार्मार्थं प्रतीक्ष्योऽ नर समा । विद्यार्थं पड्यशोऽर्थं वा कामार्थं त्रीस्तु वत्सरान् || ' ( म० ९।७६ ) इति पतित्यागो विहित ' इति, तदपि न, 'न निष्क्रयविसर्गाभ्या भर्तुर्भार्या विमुच्यते' ( म० ९ ४६ ) इति विरोधात् । ' कामं तु क्षपयेद्देह पुष्पमूलफले शुभे । न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य च । " ( म० ५११५७ ) इति मरणेऽपि पत्यन्तरनामग्रहणस्यापि निषेधात् । पत्युरपीद कर्त्तव्यमुक्तम्- विधाय वृत्तिं भार्याया. प्रवमेत् कार्यवान्नर । अवृत्तिकर्शिता हि स्त्री प्रदुष्येत् स्थितिमत्यपि ॥ ' ( म० ९।७४ ) इति । तथैव पतिर्तृकवृत्तिविधानाभावेऽप्यगर्हितैः शिल्पैः स्त्रियोऽपि कर्त्तव्यमुक्त मनुना -'विधाय प्रोषिते वृत्ति जीवेन्नियममास्थिता । प्रोषिते त्वविधायैव जीवेत् शिल्पेरगहितैः ॥ ' ( म० ९ ७५ ) इति । धर्मकार्यार्थं बहिर्गतस्य पत्युरष्टवर्षाणि, विद्यार्थं यशोऽथं वा बहिगंतस्य षड्वर्षाणि, कामार्थं गतस्य वर्षंत्रयं यावत् प्रतीक्षा कर्त्तव्या । ततः परं कि कर्त्तव्यमिति विषये मनुना न किञ्चिदुक्तम् । परन्तु दयानन्देन ततः परं नियोगः कर्त्तव्य इत्युक्तम्, तत्तु सर्वथाप्यसङ्गतमेव, नियोगस्याप्रकरणत्वात् । मनुना तदसङ्केताच्च । टीकाकारैस्तु पतिसमीपगमन- मुक्तम् । तथाहि - ' तदूर्ध्वं पत्युः सन्निकर्षमेव गच्छेदिति नारायण: । कुल्लूकभट्टस्तु -'विवाहिताया विधवाया नियोगः ५०

श्लोकमारभ्य ६६ श्लोक यावत् समाप्तः । ६४ पद्यमारभ्य ६८ पद्यं यावन्नियोगखण्डन समाप्तम् वाग्दत्ताया विधवायाः

६९-७० पद्याभ्या मनुना विशेषविधानमुक्तम् । ७१ पद्ये त्वेकस्मै दत्त्वा नान्यस्मै दातव्येति तस्या दान निषिद्धमिति नात्र नियोगगन्धोऽपि । ७२ पद्ये तु सप्तपदीकरणात् प्राक् छद्मना दत्ताना व्याधितादीना त्यागेऽदोष उक्त इति तत्रापि नियोग- हम नही मान सकते, क्योकि वाग्दत्ता भी उसकी भार्या हो गई । ऐसी स्थिति मे विक्रय, परित्याग आदि से भी भार्यात्व की अनिवृत्ति बताने वाले मनुवचन के अनुसार उसका परित्याग नहीं किया जा सकता । कुछ लोगो का कहना है कि 'पति धर्म-कार्य के लिये विदेश जाय तो आठ वर्ष तक, विद्या पढने या यश प्राप्त करने के लिये छः वर्ष तक और इन्द्रिय उपभोग के लिये तीन वर्ष तक स्त्री उसकी राह देखे ' इस मनुवचन में पति का त्याग विहित है, किन्तु बात ऐसी है नही, क्योकि विक्रय और परित्याग से भार्यात्व की अनिवृत्ति बताने वाले मनुवचन से इसका विरोध होगा । 'पवित्र पुष्प, मूल, फलो से अर्थात् इनसे उदरपूर्ति कर अपनी देह को चाहे दुर्बल बना ले, परन्तु पति के मरने पर दूसरे का नाम भी न ले ' इस मनुवचन में पति की मृत्यु के उपरान्त दूसरे का नाम लेना भी निषिद्ध माना गया है । पति का कर्तव्य भी वही बनाया गया है 'कार्यवान् पुरुष पत्नी को पोषण के लिये वृत्ति देकर विदेश जाय, क्योकि जीविका ॐ का उपाय न रहने पर मर्यादा मे स्थित स्त्रियाँ भी पथभ्रष्ट हो सकती हैं । इसी तरह से मनु ने स्त्री को भी उपदेश दिया है कि निर्वाह के योग्य वृत्ति लेकर जब तक पति विदेश में रहे, तब तक स्त्री नियमपूर्वक अपना निर्वाह करे और जो पति; जीवन निर्वाह का प्रबन्ध बिना किये परदेश चला जाय, तो स्त्री सीना-पिरोना आदि अनिन्दित शिल्पो से अपना निर्वाह करे । धार्मिक कार्य के निमित्त पति के विदेश जाने पर आठ वर्ष तक विद्या पढने या यश प्राप्त करने के लिये जाने पर छ: | वर्ष तक और इन्द्रिय उपभोग के लिये गये पति की तीन वर्ष तक स्त्री प्रतीक्षा करे । इसके बाद क्या करना चाहिये, इसके सम्बन्ध मे मनु ने कुछ नहीं कहा । परन्तु दयानन्द का कहना है कि इसके बाद स्त्री नियोग कर ले । उनका यह कथन सर्वथा असंगत है, क्योंकि यहाँ पर नियोग का कोई प्रसंग नही है । फिर मनु ने भी इसकी ओर कोई संकेत नही किया है । टीकाकारों ने यहाँ पर कहा है कि स्त्री को पति के पास चला जाना चाहिये । मनु ने नवम अध्याय के ५ ९ -६६ श्लोकों में विवाहित विधवा के नियोग का विधान और ६४-६८ श्लोकों में नियोग का खण्डन किया है । ६ ९-७० श्लोको में वाग्दत्ता विधवा के लिये विशेष विधि बताई गई है और ७१ वें

श्लोक में बताया गया है कि एक व्यक्ति को दी गई कन्या का दूसरे को दान नही करना चाहिये । इस तरह से इस प्रकरण में कही भी I

नियोग की चर्चा नही है । ७२ वें पद्य में कहा गया है कि सप्तपदी के पहले छल से दी गई अथवा रोगिणी आदि सदोष कन्या का त्याग करने में कोई दोष नही है । इस तरह से यहाँ भी नियोग की कोई चर्चा नही है । ७३ वें पद्य में बताया गया है कि कन्या के दोष को

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वेदार्थपारिजात.१८०६ गन्धो नास्ति । ७३ पद्ये दोषमनाख्याय दुष्टकन्याया दातु प्रयत्नवैयर्थ्यायोक्तम् । ७४-७६ पद्येष्वपि नियोगप्रसङ्गो नास्ति । ततो धर्माद्यर्थं प्रोषितस्य पत्युरष्टवर्षादिकालप्रतीक्षानन्तरं नियोगः कथं केन प्रमाणेन विधीयेत? ततो मनुसहिताटीकाकारे वैशिष्ठधर्मसूत्रादिवचनाश्रयेण पत्यु समीपगमनमेवोक्त न नियोग । 'प्रोषितपत्नी पञ्चवर्षाण्युपासीत । ऊर्ध्व पञ्चभ्यो वर्षेभ्यो भर्तृसकाश गच्छेत्' ( वशिष्ठधर्मसूत्रे १७/६७ ) इत्येतद्वचनमाश्रित्यैव टीकाकारैर्व्यवस्था कृता । नियोगकल्पनं तु दयानन्दस्य निरङ्कुशत्वमेव बोधयति । यदि पत्न्या गमनेऽपि पतिर्न लभ्येत पत्नी वा न जिगमिषेत् तत्रापि वशिष्ठ. कर्त्तव्यतां -------निर्दिशति - ' यदि धर्मकामाभ्यां प्रवास प्रति अनुकामा न स्यात् यथा प्रेत इत्येवं वर्तितव्य स्यात् ।' ( वशिष्ठधर्मसूत्रे १७।६८ ) तदा पत्रप्राप्तौ पत्युर्मृत्यो सति यथा वर्तितव्य भवति, तथैव तथा वर्तितव्यमिति, वैधव्यधमं पालयेदित्यर्थ. । तस्मान्नात्र नियोगो न वा विवाहविच्छेद उक्तः । - यत्तु —' वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा । एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ ( म० ९।८१ ) इति वचनमाश्रित्य दयानन्देनोक्तम्-- 'पुरुषार्थमपि नियमा । वन्ध्याया सत्यामष्टमेऽब्दे, मृतप्रजायां दशमे, स्त्रीजनन्यामेका-दशेऽब्दे, अप्रियवादिन्यां सद्यस्ता त्यक्त्वा अन्यया स्त्रिया नियोग कुर्यात्' इति, तत्सर्वमपि शास्त्रविरुद्धमेव, अधिवेद्याशब्दार्थाऽ-ज्ञानात् । अधिवेद्याशब्दस्य सर्वसम्मतोऽयमर्थः - तस्या स्त्रियां सत्यां ( जीवन्त्यामेव पत्नीरूपेण ) अन्यया सह विवाह इति । 'तस्या उपरि अन्यया विवाह इति मेधातिथिः कुल्लूकभट्टश्च । अधिवेदन द्वितीयभार्यासम्बन्ध इति नारायणः । सत्यामपि तस्यां तस्या उपरि स्त्र्यन्तरस्य परिग्रह इति राघवाचार्य: । 'अपरा वोढव्या' इति नन्दनः । 'आसामुपरि अन्या विवाहितु योग्या' इति रामचन्द्रः । ‘ अधि उपरि अन्या वेद्या विवाह्या' इति कश्चित् । नात्र पूर्वस्यास्त्याग उक्तः, किन्तु विवाहान्तरमेव विहितम् । तत्रापि तदनुमतिरपि ग्राह्या । 'या रोगिणी स्यात्तु हिता सम्पन्ना चैव शीलतः । सानुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ॥ ( म० ९।८२ ) इति वचनात् । यदि पूर्वस्यास्त्यागोऽभीष्ट. स्यात्तदा तदनुमतिग्रहणप्रसङ्ग एव कुतः? अप्रिय- बिना बताये कोई व्यक्ति कन्यादान करना चाहे, तो उसका उस दुष्ट प्रयत्न को निष्फल कर देना चाहिये । ७४-७६ श्लोको मे भी नियोग का प्रसंग नही है । इस स्थिति में धर्मार्जन प्रभृति प्रयोजनो के लिये विदेश गये पति के निश्चित अवधि में न लौटने पर नियोग कर लिया जाय, आपकी यह बात किस प्रमाण से इस प्रकरण से सिद्ध होगी? इसीलिये मनुसंहिता के टीकाकारो ने वसिष्ठ धर्मसूत्र प्रभृति ग्रंथो के प्रमाण से स्त्री को पति के पास चले जाने का ही विधान किया है, नियोग का नही । 'प्रोषितपत्नी० ' इत्यादि वसिष्ठ वचनों के सहारे ही टीकाकारों ने यह व्यवस्था दी है । नियोग की बात दयानन्द की निरंकुश कल्पनामात्र है । यदि पत्नी, पति के पास जाने पर वह न मिले अथवा पत्नी ही उसके पास न जाना चाहे, उस परिस्थिति में भी वसिष्ठ ने कर्तव्य का उपदेश किया है कि उस पत्नी को अपनी दिनचर्या इस प्रकार की बना लेनी चाहिये जैसी कि पति की मृत्यु के उपरान्त बना ली जाती है । इस तरह से उस परिस्थिति में विधवा धर्म के पालन का उपदेश है । नियोग अथवा तलाक की यहाँ कोई चर्चा नही है । 'स्त्री के सन्तान न हो तो आठवें वर्ष, सन्तान होकर मर जाती हो तो दसवें वर्ष, अथवा स्त्री के केवल कन्या ही कन्या होती हो तो ११ वें वर्ष दूसरा विवाह कर ले । जो स्त्री अप्रिय वचन बोलने वाली हो तो तुरन्त ही दूसरा विवाह कर ले ' मनु ने इस वचन के आधार पर स्वामी दयानन्द का कहना है कि इसमे नियोग का विधान किया गया है, किन्तु उनका यह कथन शास्त्र- विरुद्ध है | वे अधिवेद्य शब्द का अर्थ भी नही समझ पाये है । अधिवेद्य शब्द का धर्मशास्त्रज्ञ संमत अर्थ है --प्रथम विवाहित पत्नी के जीवित रहते दूसरी स्त्री से विवाह । मेधातिथि और कुल्लूकभट्ट ने यही अर्थ किया है । नारायण, राघवाचार्य, नन्दन, रामचन्द्र प्रभृति टीकाकारों ने भी इसी से मिलता-जुलता अर्थ किया है । किसी भी टीकाकार ने प्रथम पत्नी के त्याग की बात नही कही है, किन्तु प्रथम पत्नी के रहते हुए ही दूसरे विवाह का विधान किया है । इसके लिए प्रथम पत्नी की अनुमति अपेक्षित मानी गई है । जैसा कि मनुस्मृति में ही कहा गया है-'जो रोगिणी स्त्री अपने पति में रत और सुशीला हो तो स्त्री की अनुमति लेकर पति दूसरा विवाह करे और उसकी कभी अवज्ञा न करे । यदि पूर्व पत्नी का त्याग अभीष्ट हो तो उस दशा में उसकी अनुमति का प्रसंग ही कहां आवेगा । अप्रियवादिनी स्त्री का भी परित्याग नही किया जाता, किन्तु उसका भी अपने ही घर मे अथवा उसके पिता के घर में भरण -पोषण

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वेदार्थपारिजातः १८०७ वादिन्या अपि त्यागो नेष्टः, किन्तु तस्या अपि स्वगृहे रक्षण पितृगृहे प्रेषणं वेष्टम् । ' अधिविन्नातु या नारी निर्गच्छेदुषिता गृहात् । सा सद्यः सन्निरोद्धव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ ।' ( म० ९९ ८३ ) इति मनूक्त: । तस्मात् प्रयोजनवशात् पत्न्यन्तर- विधानेऽपि पूर्वस्या पत्न्यास्त्याग. सर्वथा नेष्ट. । सन्तानाभाव एवाप्रियवादिनी अधिवेत्तव्या, न सन्ताने सति । अप्रियवादिनी सद्य एव ( अधिवेदनीया ) यद्य- पुत्रा भवति, पुत्रवत्या तु तस्या धर्मंप्रजासम्पन्ने नान्या कुर्वीत इत्यापस्तम्नप्रनिषेधात् अधिवेदनं न वार्यम् । तथा च 'ता त्यक्त्वा अन्यया नियोगः कर्त्तव्य ' इति दयानन्दोक्ति' सर्वथैवानादर्ता | दयानन्दरीत्या वन्ध्यादिपतिना अन्यया स्त्रिया नियोग. कर्त्तव्यः । तत्राय प्रश्न -वन्ध्यायाः सन्तानाभावेऽपि कामपूर्तिस्तु भवत्येवेति कुतोऽन्यया नियोगः? तथैव मृतव- त्यामपि त्यक्त्वा कुतो नियोगः, तस्या एव सकाशात् कामपूर्तिसम्भवात् । किञ्च, स्त्रीजननीमपि त्यक्त्वा नियोग उक्त, तदपि निरर्थकमेव, स्त्रिया अपि सन्तानत्वाविशेषात् । किञ्च, अप्रियवादिन्यामपि सन्तानोत्पत्तिरपि सम्भवतीति कुतो नियोगः? सनातनधर्मरीत्या तु पुन्नाम्नो नरकात् त्राणार्थं स्त्रीजननी ह्यधिवेदनीया स्यादिति तदनभ्युपगन्तुरार्यसमाजस्य कुतस्तत्स्यात्? यदपि ' नीचत्वं परदेश वा प्रस्थितो राजकिल्बिषी । प्राणाभिहन्ता पतितस्त्याज्यः क्लीबोऽपि वा पति. ॥ ' ( २२ ), 'परस्परं द्वेषान्मोक्षः' इत्यादि कौटल्यार्थशास्त्रचचनैर्विवाहविच्छेदः सिषाधयिषित:' इति, तदपि मूर्खजनप्रतारण- मात्रम्, पूर्वापराननुसन्धानमलकत्वात् विरुद्धवचनान्तरगोपनमूलकत्वाच्च । कौटल्यार्थशास्त्रं नीतिशास्त्रं; न धर्मशास्त्रम्, लोक- व्यवहारव्यवस्थापन धर्मशास्त्रस्य विषयः ' (गो० सू० ४।१६२) इति तदुक्त: । 'अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थिति: । ' ( याज्ञ० स्मृ० २।२१ ) इति याज्ञवल्क्यवचनविरोधाच्च । राजतन्त्र सञ्चालनार्थं नीतिशास्त्रे क्वचिद् धर्मातिक्रमणमपि को तैयार हो तो ' विहित है । इस प्रसङ्ग में मनु ने ही कहा है- दूसरा ब्याह करने पर यदि स्त्री क्रोध के वश होकर घर से निकलने पत्नी के त्याग तत्काल उसे बाघ रखे अथवा स्वजनों के घर उसे भेज दे' । इसलिये किसी कारणवश दूसरा विवाह करने पर भी प्रथम की बात किसी भी धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ मे नही कही गई है । है सन्तान न होने पर हो अप्रियवादिनी स्त्री के रहते दूसरा विवाह करना चाहिये । अप्रियवादिनी स्त्री यदि पुत्रवतीचाहियेनही । तो तत्काल दूसरा विवाह कर लेना चाहिये । उसको यदि पुत्र हो गया है, तो ऐसी परिस्थिति मे दूसरा कभीविवाहमान्यनहीनहीकरनाहो सकता । आपस्तम्ब के इस स्पष्ट विधान के रहते दयानन्द का इस प्रकरण मे नियोग को सिद्ध करने का प्रयत्न वन्ध्या के दयानन्द के अनुसार प्रथम पत्नी में वन्ध्यात्व आदि दोषो के रहने पर नियोग कर लेना चाहिये । इस पर हम पूछते है कि सन्तान भले ही न हो. कामभाव की पूर्ति तो उससे होती ही है, तब दूसरी से नियोग किसलिये किया जायगा? यही बात मृतवत्सा ( जिसके बच्चे जीवित नही रहते ) और स्त्री जननी ( जिसके कन्या ही कन्या होती है ) के सम्बन्ध में भी है । इनसे भी कामभावकी की पूर्ति हो ही जाती है और कन्या भी तो सन्तान है ही । फिर अप्रियवादिनी से भी सन्तान तो हो ही सकती प्राप्तिहै, तबके लियेनिनोगस्त्री क्या आवश्यकता है? सनातन धर्म की पद्धति से तो वुम् नाम के नरक से त्राण दिलाने के लिये पुरुष सन्तति की मत के अनुसार इस सन्तति वाली पत्नी का अधिवेदन आवश्यक है । आर्यसमाजी तो इस बात को स्वीकार नही करते, तब उसके परिस्थिति मे नियोग कैसे उचित ठहराया जा सकता है? 'जो नीचता पर उतर आया हो, परदेश चला गया हो, राज्य के प्रति अपराधी हो, हत्यारा हो, पतित हो, नपुंसक हो, अर्थशास्त्र के ऐसे पति को छोड़ देना चाहिये', 'परस्पर द्वेषभाव रहने पर विवाह विच्छेद कर लेना चाहिये', इस अभिप्राय के कौटिलीय वचनों के आधार पर कुछ लोग विवाह विच्छेद ( तलाक ) को सिद्ध करना चाहते हैं । किन्तु उनकी यह चेष्टा मूर्खोकी भीको कुचेष्टाही भ्रमकीमें डाल सकती है । ऐसा करते समय उन्होंने पूर्वापर प्रकरण को ठीक से देखा नही है और विपरीत वचनों को छिपाने है । कौटल्य का अर्थशास्त्र नीतिशास्त्र है, धर्मशास्त्र नहीं । गोतमसूत्र की व्याख्या में कौटल्य ने ही कहा है कि लोक व्यवहार की व्यवस्था करना धर्मशास्त्र का कार्य है । याज्ञवल्क्य के वचन के अनुसार अर्थशास्त्र की अपेक्षा धर्मशास्त्र बलवान् माना गया है । राज-

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 910 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजात १८०८ सम्भाव्यते । तद्यथा - 'ब्राह्मणमधीयानं दशवर्षाण्यप्रजाता राजपुरुषमायुः क्षयाद् आकाङ्क्षत' ( को० अ० शा० ३।४ ) अत्राधीयानस्य ब्राह्मणस्य दश द्वादश वर्षाणि प्रतीक्षा राजपुरुषस्य तु यावज्जीवनप्रतीक्षोक्ता । तेनात्र बृहतो राजतन्त्रस्य सञ्चालनार्थं किञ्चिद् धर्मातिक्रमणं सम्भाव्यते । बौद्धधर्मप्रचारयुगे कौटल्यस्य स्थितिरासीत् । तेन धर्मश्रद्धाशैथिल्याद् अर्थकामसक्ताना पुरुषाणां कृते सामान्यजनाना च कृते परस्पर द्वेषान्मोक्ष उक्तः । धर्मशास्त्रानुसारिविवाहाना सम्बन्धे तु तेन ' अमोक्षो धर्मविवाहानाम्' इति स्वष्टमेव विवाहविच्छेदो निषिद्धः । स्मृतिषु चाण्डालानामपि वर्णनं दृश्यते । तदुत्पत्तिस्तु शूद्राद् ब्राह्मण्या भवति । तावतापि न तदनुमतिः प्रतिलोमसङ्करस्य, स्मृतिषु सर्वथा तन्निषेधात् ॥ तथैव केषाञ्चिल्लो- किकानां परस्परं द्वेषान्मोक्षवर्णनेऽपि न तदनुमतिः, मन्वादिधर्मशास्त्रविरोधात् । कौटल्यरीत्यापि 'स्वधर्मः स्वर्गाय आनन्त्याय च' ( १ | ३| १४ ) इति चाणक्यसूत्रेषु । तत्र प्रथममिदं सूत्रम्- 'सुखस्य मूल धर्म ( धर्मस्य ) अतिक्रमे लोकः सङ्करादुच्छिद्येत' ( १ | ३ | १५ ) इति । ' सङ्करो नरकायैव' ( भ० गी० ११४२) इति गीतोक्तेश्च । ' व्यवस्थितार्यमर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः । त्रय्या हि रक्षितो लोक न प्रसीदति न सीदति ॥ ' इति वर्णाश्रम- मर्यादापालनस्य परमावश्यकतोक्ता | 'चतुर्वर्णाश्रमस्याय लोकस्याचाररक्षणात् । नश्यतां सर्वधर्माणां राजा धर्मप्रवर्तकः ॥ ' ( ३| १ | ५० ), संस्थया महाजनाचरणेन धर्मशास्त्रेण शास्त्र वा व्यावहारिकम्' ( राजशासनम् ), यस्मिन्नर्थे विरुद्धयेत धर्मेणाथं विनिर्णयेत् ' ( ६।१ ) एवंरीत्या धर्मशास्त्रानुसारेणैव व्यावहारिकं शास्त्रं व्याख्येयमिति कौटल्यदृष्टिः । तद्दृष्ट्या राजशासनमपि धर्मशास्त्रेणैव नियमनीयम् । ' पितृप्रमाणाश्चत्वारः पूर्वे ब्राह्मप्राजापत्यार्षदेवा धर्म्याः' ( ३२| १० ) इति कौटल्यः । पूर्वे विवाहा धर्म्या तन्त्र के सचालन के लिये नीतिशास्त्र के अनुसार कभी कभी धर्म को आख ओझल कर देना पडता है । कौटल्य का अर्थशास्त्र वेदाध्ययन करने वाले ब्राह्मण की १०-१२ वर्ष प्रतीक्षा करने का और राजपुरुष की जीवनपर्यन्त प्रतीक्षा करने का विधान करता है, जो कि धर्म- शास्त्र के विपरीत हैं । इस तरह से महान् राजतन्त्र के संचालन के लिये यहा कभी कभी धर्मशास्त्र की उपेक्षा की जाती है । बोद्ध धर्म के प्रचार काल मे कौटल्य की स्थिति मानी जाती है । इसलिये धर्म में श्रद्धा के शिथिल हो जाने से अर्थ और काम मे लिप्त पुरुषों के लिये और सामान्य जनता के लिये यह कह दिया है कि परस्पर द्वेषभाव बढ़ जाने पर विवाह का विच्छेद कर लिया जाय । धर्मशास्त्र के अनुसार संपन्न होने वाले विवाहों के लिये तो कौटल्य का स्पष्ट वचन है कि धर्म विवाह का विच्छेद नही हो सकता । स्मृतिग्रन्थों में चाण्डालों का भी वर्णन है । चाण्डाल की उत्पत्ति शूद्र वर्ण के पुरुष से ब्राह्मण वर्ण की स्त्री में होती है । किन्तु इससे प्रतिलोम विवाह धर्मशास्त्र संमत नही सिद्ध किये जा सकते, क्योंकि स्मृति ग्रन्थो में ऐसे विवाह सर्वथा निषिद्ध है । इसी तरह से लोकव्यवहार में कुछ लोग परस्पर द्वेष के कारण विवाह विच्छेद भले ही कर लें, किन्तु इसको धर्मशास्त्र संमत कभी नही सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि मनु प्रभृति के ग्रन्थो में इस बात का स्पष्ट निषेध है । चाणक्य सूत्रों में कौटल्य ने स्पष्ट कहा है कि धर्म के पालन से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । उसके पहले सूत्र में बताया गया है कि धर्म से ही सुख की प्राप्ति होती है । धर्म का उल्लंघन करने से सब जगह सांकर्य होने लगता है और इस तरह से लोक में अव्यवस्था फैल जाती है । भगवद्गीता में कहा गया है कि वर्ण साकर्य नरक का कारण बनता है । आर्य मर्यादा के व्यवस्थित रहने से वर्णाश्रम व्यवस्था भली भाँति चलती रहती है । वेदविहित धर्म की रक्षा करने से जनता में खुशहाली बनी रहती है, वह कभी संकट में नही पडती । चारो वर्णो और आश्रमो की तथा लोकाचार की रक्षा करके राजा नष्ट होते हुए धर्म की रक्षा करता है । इसीलिये राजा को धर्म का प्रवर्तक माना जाता है । धार्मिक संस्थाओं की स्थापना करके, महान् पुरुषों के आचरण का अनुसरण कर व्यावहारिक शास्त्र की व्याख्या करना ही कौटल्य को अभिप्रेत है । अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र में विरोध उपस्थित होने पर धर्मशास्त्र के अनुसार ही व्यवहारो की व्याख्या करनी चाहिये । कौटल्य के मत के अनुसार राजशासन नियम भी धर्मशास्त्र के द्वारा ही किया जाना चाहिये । कौटल्य ने ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और देव इन चार प्रकार के विवाहों को धार्मिक विवाह माना है और कह है कि