वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 911–920

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 911–920

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वेदार्थपारिजात १८० ९ अमोक्षो धर्मविवाहानाम् ( ३।३।२२ ) तेन धर्मविवाहाना विच्छेदो न भवत्येव । 'मृते भर्तरि धर्मकामा तदानीमेव अवस्थाप्य आमरण शुल्कशेषं वा लभते । अपुत्रा पतिशयनं पालयन्ती आयुक्षयात् भुञ्जीत । आपदर्थं हि स्त्रीधनम् । ऊर्ध्वं दायादं गच्छेत ( ३।२ ) पुत्रहीना पतिशयन पालयन्ती गुरुसमीपे स्त्रीधनं यावज्जीव भुञ्जीत मूलमविनाशयन्ती वृद्ध्यादिक सञ्जात- मात्रमुपयुञ्जीतेत्यर्थः 1। कुत: ' आपदर्थं हि स्त्रीधनम्' वृत्तिकृच्छ्र परिहारमात्रविनियोज्यं हि स्त्रीधन नाम, न पुन कामचार- व्यवायार्थम्, तथा तथा रक्षित स्त्रीधन तस्यानुपरताया भर्तृमपिण्ड गच्छेदिति टीकाकृत् । नारदस्मृतावपि नदेवोक्तम् अपुत्रा पतिशयनं पालयन्ती गुरौ स्थिता । भुञ्जीतामरण क्षान्ता दायादा ऊर्ध्वमाप्नुयुः | २| १४४ । यदि तु मृतभर्तृका परपुरुष कामयते तदा स्त्रीधन सकुसीद राज्ञा दाप्येत भर्तृबन्धुभ्यः, लब्ध्वा वा विन्दमानःसवृद्धिकमुभय दाप्येत ( ३।२।२६ ) । विधवाविवाहस्तु सुतरां कौटल्यदृष्ट्यापि सर्वथा निषिद्ध एव । विधवाविवाहाभासास्तु बाधिता एव । निषेध- पर्यवसायिभिर्वाक्यैः पतिदाय विन्दमाना जीवेत । धर्मकामा भुञ्जीत ' ( ३१२ ) अत्र पत्या दत्त वस्त्राभरणादिक विन्दमाना भर्त्रन्तरपरिग्राहिणी जीवेत दाप्येत श्वशुरकुलायेति म० म० गणपतिशास्त्रिव्याख्यानम् । स्त्रिया पुत्राभावे पत्युर्विवाहानन्तर- मुक्तं कौटल्येनापि पूर्वस्यास्तु त्यागो नोक्तः, किन्तु तस्या. सम्पोषणमुक्तम् । ' वर्षाण्यष्टी अप्रजायमानामपुत्रा वन्ध्या च आकाडक्षेत ( प्रतीक्षेत ) दश विन्दु द्वादश कन्या प्रसविनी । तत. पुत्रार्थी द्वितीया विन्देत | ( ३| ४ ४ ४७ - ४९ ) अत्र पुत्रार्थ मधिवेदनमुक्तं न कामार्थम् । ' आधिवेदनिकमनुरूपा च वृत्ति दत्वा बह्वीरपि विन्देत । पुत्रार्था हि स्त्रियः ( ३२५२-५३ ) 1 नात्र विवाहविच्छेद | परिणीताया उपरि अन्यस्याः परिणयनमधिवेदनम् । सानिका अध्पूढा अधिविन्ना ( २२७१७ अमर- कोषे ) । तस्माद् गान्धर्वासु रपैशाचराक्षसादिविवाहेषु शास्त्रनिन्दितेषु व्यवहारेऽद्याप्यप्रचलितेषु परस्परं द्वेषान्मोक्ष इति कौटल्यवचन सार्थक भवति । इनका विच्छेद नही होता । कौटल्य आगे कहते है कि पति के मर जाने पर धर्म की कामना वाली स्त्री मरणपर्यन्त पति के धन से जीवन यापन करे । पुत्र के न रहने पर भी अपने पति की मर्यादा का पालन करती हुई वह गुरुजनो के साथ रहे और पति के मूल धन को बिना खर्च किये सूद के धन से अपना जीवन बितावे | क्योकि स्त्रीधन का उपयोग आपत्ति काल में ही किया जाता है । जीवन यापन में कठिनाई होने पर ही उसका उपयोग होना चाहिये । मनमानी करने के लिये नही । टीकाकारों ने यहाँ व्यवस्था दी है कि उसके मरने के उपरान्त यह स्त्रीधन उसके पति के सपिण्ड सबन्धी को मिलता है । नारद स्मृति के 'अपुत्रा' प्रभृति श्लोक मे भी यहो बात कही गई है । पति के मर जाने पर स्त्री यदि परपुरुष से सम्बन्ध जोड लेती है, तो उस अवस्था में कौटल्य ने कहा है कि ब्याज के साथ मूल स्त्रीधन को भी राजा उसके पति के बन्धुओ को दिलवा दे । विधवा विवाह तो कौटल्य के मत से भी सर्वथा निषिद्ध ही माना गया है । 'निषेध० ' प्रभृति कौटल्य के वाक्य की गण- पति शास्त्री ने व्याख्या की है कि पति के दिये वस्त्र, आभरण आदि की उपभोग करने वाली स्त्री यदि दूसरा पति कर ले तो राजा को चाहिये कि वह धन पति के कुटुम्बी जनो को दिलवा दे । एक स्त्री से पुत्र न होने पर पति के दूसरे विवाह का विधान तो कौटल्य ने भी किया है, किन्तु ऐसा करते समय पहली स्त्री का त्याग नही किया जाता, उसका भी पालन-पोषण पति को करना ही पडता है । 'आठ वर्ष तक इस बात की प्रतीक्षा करनी चाहिये कि पत्नी को पुत्र होता है कि नहीं, दस वर्ष तक मृतवत्सा की और बारह वर्ष तक कन्या अपत्य वाली स्त्री की प्रतीक्षा करनी चाहिये । इसके बाद पुरुष को पुत्र प्राप्ति के लिये दूसरा विवाह कर लेना चाहिये । कौटल्य के इस वचन में भी पुत्र की प्राप्ति के लिये ही दूसरे विवाह का विधान है, कामोपभोग के लिये नही । कौटल्य पुत्र प्राप्ति के लिये अनेक 1 ) विवाहो की भी अनुमति देते हैं । यहाँ पर कही भी विवाह के विच्छेद की चर्चा नही है । विवाहित स्त्री के जीवित रहते पुत्र प्राप्ति के लिये किये गये दूसरे विवाह को अधिवेदन कहते है | अमरकोष में भी अधिविन्ना शब्द का यही अर्थ किया गया है । इस तरह से उक्त चार धार्मिक विवाहों से भिन्न शास्त्रनिन्दित गान्धर्व, असुर, पैशाच, राक्षस नाम के बार विवाहो में, जो कि व्यवहार में जिस किसी तरह से प्रचलित हैं, परस्पर द्वेषभाव के आ जाने पर विवाह के विच्छेद की बात कौटल्य के मत के अनुसार मानी जा सकती है । E २२७

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वेदार्थपारिजातः १८१० नियोगो दयानन्देन वर्णितः । स च शास्त्रेषु सर्वथा प्रतिषिद्धः । आर्यसमाजोऽपि तं स्वगृहे प्रचालयितु जिह्रेति । कलियुगे तु विशेषतो निषिद्ध । आर्यसमाजस्तु तत्समर्थनाय महाभारतमाश्रयते । वस्तुतो महाभारतावलोकनेन विज्ञायते यत् क्षत्रियजातेरेव नियोगो विहित इति । तत्र नियोगेऽपि मैथुनं न भवति स्म । आधुनिकास्तु चित्राङ्गदविचित्रवीर्यपत्नीभ्या व्यासस्य महर्षेनियोग वर्णयन्ति । तच्चाविचारित रमणीयम् । प्रायेण वृद्धेस्तपस्विभिरेव नियोग कार्यते स्म । इतिहास -स्यातीतवेदन एवोपयोगो; न व्यवहारे, व्यवहारस्य विधिशास्त्रगोचरत्वात् । लोकेऽपि विधानस्यैव व्यवहारे प्रामाण्यम्, नेतिहासस्य दौर्भाग्यपूर्णस्यापीतिहासस्य सम्भवात् । ' अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, अन्यश्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणाम् । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमिति-हासपुराणधर्मशास्त्राणाम्, यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषय । यथाविषयमेतानि 1 प्रमाणानि, इन्द्रियादिवत्' ( गो० सू० ४ १/६२ ) इत्यत्रभाष्ये अत एव नलयुधिष्ठरादीनामपि द्यूतक्रीडाया नानुकरण कर्त्तव्यम् । तथा च केषाञ्चित् कदाचिदनुमतत्वेऽपि नियोगोऽन्यैरननुष्ठेय एव । इतिहासश्च स्पष्टं नियोगस्य राज-विषयत्वमाह -' तत्ते धर्मं प्रवक्ष्यामि क्षात्रं राशि सनातनम्' ( म० भा ० आ ० प० १०४ / २६ ) 1। तेन न सर्वजातीयो नियोग., किन्तु क्षात्रत्वात् क्षत्रविषयमेव तत् । कलियुगे तु तदसम्भव एव । 'नियुक्ती यो विधि हित्वा वर्तेयाता तु कामतः । तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगी ॥ ' ( म० ९ ६३ ) इति मनूक्तस्य विधानस्याद्यत्वेऽसम्भवात् । ' तं कामजमरिक्थीय वृथोत्पन्न प्रचक्षते । ' ( म० ९| १४७ ) इति रीत्या कामोत्पन्नस्य नियोगजस्य दायभागानर्हत्वोक्तेः । तद्विधानं तु नारदोक्तं कुल्लूकभट्टेनोद्धृतम्- 'मुखान्मुख परिहरन् गात्रैर्गात्राण्यसस्पृशन् 1 कुलं तदवशेषे च सन्तानार्थं न कामतः ॥ ( म०कु ० ९| १४७) अङ्गरङ्गान्यसस्पृशन् जिस नियोग की दयानन्द ने चर्चा की है, वह शास्त्रो मे सर्वथा निषिद्ध है । आर्यसमाजी मी अपने घर मे उसको प्रचलित करने में लजाते है । कलियुग में तो नियोग पूरी तरह से मना है । आर्यसमाजी इसका समर्थन करने के लिये महाभारत का सहारा लेते है । महाभारत को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ पर क्षत्रिय जाति के लिये ही इसका विधान किया गया है । नियोग में भी मैथुन वर्जित है ।'आजकल के लोग चित्रागद और विचित्र वीर्य की पत्नियो के महर्षि व्यास के साथ हुए नियोग की बात करते है, किन्तु उनकी यह बात ठीक नही है । प्रायः वृद्ध, तपस्वी जनो के द्वारा ही नियोग की क्रिया सम्पन्न की जाती थी । इतिहास का उपयोग अतीत काल की जानकारी में ही माना जाता है, व्यवहार में उसका कोई उपयोग नही है । व्यवहार का ज्ञान तो विधि ( धर्म ) शास्त्र से ही होता है । लोक में भी प्रचलित विधान को ही प्रामाणिक माना जाता है, इतिहास को नही । क्योंकि इतिहास तो बुराइयों से भरा भी हो सकता है । गोतमन्यायसूत्र के वात्स्यायनकृत भाष्य में कहा गया है कि मन्त्र और ब्राह्मण का प्रतिपाद्य विषय भिन्न है और इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र का उससे भिन्न है । मन्त्र ब्राह्मण का प्रतिपाद्य विषय यज्ञ है और इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र का लोकव्यवहार है । चक्षुरादि इन्द्रियों के समान अपने अपने विषय में ये प्रमाण माने जाते हैं । इसीलिये यह माना जाता है कि नल, युधिष्ठिर प्रभृति की द्यूत क्रीडा का हमे अनुकरण नही करना चाहिये । इस तरह से कुछ लोगों के द्वारा अनुष्ठित होने पर भी नियोग को अन्य आचार्यों ने निषिद्ध माना है । महाभारत में स्पष्ट कहा गया है कि नियोग केवल क्षत्रियो का धर्म है । इसलिये सभी जातियो के लिये यह विहित नही है । कलियुग मे तो उसको भी निषिद्ध माना गया है । मनुस्मृति में जिस तरह के नियोग का वर्णन है, वह आजकल चल नहीं सकता । कामभावना से प्रेरित नियोग के द्वारा पैदा हुई सन्तति को मनु ने दायभाग के लिये अयोग्य घोषित किया है । कुल्लुकभट्ट ने अपनी टीका में नारद के वचन को उद्धृत कर नियोग की विधि का वर्णन इस तरह से किया है-' मुख से मुख को दूर रखते हुए, शरीर से शरीर को न छूते हुए, कुल में एकमात्र व्यक्ति के रह जाने पर सन्तान की कामना से, न कि कामभाव की तृप्ति के लिये, जो सहवास किया जाता है, उसी को नियोग कहते हैं । वसिष्ठ ने भी कहा है कि किसी लोभ में पड़ कर नियोग नही किया जाता । 1 1

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वेदार्थपारिजात. १८११ कामभावराहित्येन केबलसन्तानार्थं नियुक्ती वर्तेयाताम् । तत एव वशिष्ठोऽपि -'लोभान्नास्ति नियोग ' ( वशिष्ठ धर्मसूत्र १७।५७ ) । एतावता दयानन्दीयो वासनापूर्णो नियोगः सर्वथाऽशास्त्रीय एव । दयानन्दरीत्या तु - 'पुरुष वा स्त्री से न रहा जाय तो किसा से नियोग करले' ( स ० प्र० पृ० ७४ ), ' जो ब्रह्मचर्यं न रख सके तो नियोग करके सन्तान उत्पन्न करले' ( म० प्र० पृ० ६ ९ ), 'परन्तु जो जितेन्द्रिय नही है, उनका विवाह और आपत्काल मे नियोग अवश्य होना चाहिए | ( स० प्र० ७ ) | मन्वादिभिस्तु कामुकताया नियोगस्य निरर्थकत्वं पापावहत्वं चोक्तम् । अत एव ' कलौ पञ्च विवर्जयेत्' इति बृहन्नारदीयवचनैनियोगो निषिद्धः । काममङ्गसङ्ग विना मैथुनासम्भवाच्च कलियुगे न तत्सम्भव, बृहस्पतिनाप्युक्तम्-' उक्तो नियोगो मनुना निषिद्धः स्वयमेव हि । युगक्रमादशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्विधानतः ॥ तपोज्ञानसमायुक्ताः कृतत्रेतायुगे नरा । द्वापरे च कलौ नृणा शक्तिहानिहि निर्मिता ॥ अनेकधा कृताः पुत्रा ऋषिभिश्च पुरातने । न शक्यन्तेऽधुना कर्तुं शक्तिहीनैरिदन्तनैः ॥ ' ( मन्वर्थमुक्तावल्या ९ ६८ उद्धृतानि ) । 'अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेताया द्वापरेऽपरे । अन्ये कलियुगे नृणा युगह्रासानुरूपतः ॥ ' ( म० १।८५ ) । यत्तु 'महाभारते परशुरामेण क्षत्रियाणा मारितत्वाद् वेदपारगामिभिर्ब्राह्मणैर्नियोगेन क्षत्रियासु बहव पुत्रा उत्पादिता:' ( महाभारते १।१०४ ६ ) इति, तन्न, परशुरामेण सर्वेषा क्षत्रियाणा हननासिद्धेः । तदानीन्तनानां ब्राह्मण- विरोधिना हैहयवंशीयाना तेन मारितत्वात् । दशरथादयस्तु क्षत्रियराजानस्तदानीमप्यासन्नेव । 'दुष्टं क्षत्र भुवो भारम- ब्रह्मण्यमनीनशत्' ( श्रीमद्भागवते ९ ।५।१५ ) इति वचनानुसारेण दुष्टक्षत्रियाणामेव तेन निपातनात् । महाभारतवचनस्य ------- - त्वयमभिप्रायः यद् दूरदर्शिभिर्ब्राह्मणैर्बहव क्षत्रियाः सङ्गोप्य सुरक्षिता । तैरेव तत्पत्नीषु सन्तानोत्पादनं कारयित्वा वर्षिता: । 'अरक्षंश्च सुतान् कश्चित् तदा क्षत्रिययोषितः' ( म मा शान्तियर्व ४ ९ / ६३ ), 'तथानुकम्पमानेन यज्वनाथामितो- जसा । 'पराशरेण दायादः सौदासस्याभिरक्षितः ॥ ' ( म. मा शान्तियवं ४९ / ७७ ), 'दधिवाहनपोत्रस्तु पुत्रो दिविरथस्य च । इन सब वचनो पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि दयानन्दसमर्थित वासना से भरा नियोग भारतीय शास्त्रो के सर्वथा विपरीत है । स्वामी दयानन्द तो कहते है कि ' पुरुष को स्त्री के बिना न रहा जाय तो किसी से नियोग कर लें', 'जो ब्रह्मचर्य न रख सके तो नियोग करके सन्तान उत्पन्न कर ले', परन्तु जो जितेन्द्रिय नही है, उनका विवाह और आपत्काल में नियोग अवश्य होना चाहिये' । इसके विपरीत मनु प्रभृति ने कामुकता प्रयुक्त नियोग को निरर्थक और पाप का कारण माना है । इसीलिये बृहन्नारदीय वचन में कलि- युग में पांच बातो को निषिद्ध माना है, जिनमें से एक नियोग भी है । अगो के संयोग के बिना मैथुन नही हो सकता, अतः कलियुग मे वह निषिद्ध है । बृहस्पति ने भी कहा है कि ' मनु ने नियोग का स्वय ही निषेध कर दिया है । युग के क्रम से विधिपूर्वक इसका निर्वाह अशक्य होता जाता है । कृत और त्रेता युग के लोग तपस्वी और ज्ञानी होते थे, किन्तु द्वापर और कलियुग में उनकी यह शक्ति क्षीण होती जाती हैं । पुरातन ऋषियो ने विविध प्रकार से पुत्रो की उत्पत्ति में सहायता की है । आज के शक्तिहीन लोग वैसा नही कर सकते ' । मनु ने भी स्पष्ट लिखा है कि कृत ( सत्य ) युग के धर्म भिन्न है, त्रेता और द्वापर के भिन्न । इसी तरह से कलियुग के धर्म भी भिन्न है । युगो के ह्रास के अनुसार ही मनुष्य की शक्ति का भी ह्रास होता जाता है । कुछ लोगो का कहना है कि महाभारत में यह बात वर्णित है कि पराशुराम ने जब सब क्षत्रियो को मार डाला, तो वेदो के निष्णात ब्राह्मणो ने नियोग के द्वारा क्षत्राणियों में बहुत से पुत्रों को उत्पन्न किया । किन्तु उनका यह कथन ठीक नही है, परशुराम हैहयवंशीय क्षत्रियो का ही नाश किया था, जो किने सभी क्षत्रियों का नाश कर दिया हो, ऐसा वर्णन कही नही है । उन्होंने केवल ही । 'दुष्टं क्षत्रं' इस भागवत के श्लोक के अनुसार भी ब्राह्मणो के विरोधी थे । दशरथ प्रभृति अन्य क्षत्रिय राजा तो उस समय भी थे दुष्ट क्षत्रियो का ही परशुराम ने वध किया था । महाभारत के वचन का अभिप्राय यह है कि दूरदर्शी ब्राह्मणो ने बहुत से क्षत्रियों को छिपा कर रखा था । उन्ही से उनकी पत्नियों में सन्तान पैदा कराकर क्षत्रियो की सख्या बढ़ाई | महाभारत के शान्तिपर्व में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि क्षत्रिय पुत्रो और उनकी स्त्रियो को ब्राह्मणो ने बचा लिया । महान् प्रभावशाली पराशर ने दया करके सौदास के पुत्र 1

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वेदार्थपारिजातः १८१२ गुप्त. स गोतमेनाथ गङ्गाकूलेऽभिरक्षित. ॥ ' ( म. मा. शा. प ४९ ८१ ), केचित् पृथिव्यादिभिः सुरक्षिता: । 'सन्ति ब्रह्मन् मया गुप्ता: स्त्रीषु क्षत्रियपुङ्गवा:' ( म. भा शा. प ४ ९। ७५ ) । कश्यपेनान्विष्य तेऽभिषिक्ताः । 'तत. पृथिव्या निर्दिष्टान् तान् समानीय कश्यपः | अभ्यषिञ्चन्महीपालान् क्षत्रियान् वीर्यसभ्भृतान् ॥ तेषा पुत्राश्च पौत्राश्च येषा वशा. प्रतिष्ठिताः । ' ( म मा.शा -प ४ ९।८८।८९ ) । काश्चन क्षत्रियाः सगर्भा सुरक्षिताः । ब्राह्मणाना धर्मानुष्ठानेन सुरक्षितास्ता. पुत्रार्थं ब्राह्मणाना सविधे धर्मानुष्ठापनार्थं गता । 'एवं निः क्षत्रिये लोके तेन तेन महर्षिणा । तत्र सम्भूय सर्वाभिः क्षत्रियाभिः समन्ततः ॥ ५ ॥

उत्पादितान्यपत्यानि ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ ६ ॥ धर्मं मनसि सस्थाप्य ब्राह्मणास्ता. समाययुः ॥ ७ ॥ ' ( म मा आदिपर्व- १०४ ) पूर्वोक्तार्थानभ्युपगमे ब्राह्मणैर्वेदपारगै, धर्म मनसि सस्थाप्य इत्यादिवचनानामसङ्गतिरेव स्यात् 1। तस्मान्मन्त्रशक्ति-

भिर्ब्राह्मणैः सगर्भाणा क्षत्रियस्त्रीणा पुत्रा प्रापिता इति सिद्धान्त । सन्तुष्यतु दुर्जनन्यायेन नियोगाभ्युपगमेऽपि वेदपारङ्गमाना ब्राह्मणानामेव तत्राधिकार, तेषा द्विधिज्ञत्वात् । मैथुनमन्तरैव अर्द्धरङ्गान्यसंस्पृश्यैव सन्तानोत्पादस्यान्यथाऽसम्भवात् । अन्यथा वेदाभ्यासपरायणाना दुर्बलाना ब्राह्मणाना तत्र क उपभोगः स्यात्? मैथुनार्थं तु बलिष्ठाः क्षत्रिया एव नियुज्येरन् ॥ ब्राह्मणा वैदिकास्तु तप शक्तिभि काम मैथुन- ( अङ्गसङ्ग ) मन्तरैव सन्तानोत्पादनक्षमा भवन्ति स्म, नान्ये । एतेन नियोगे मैथुनं न भवति स्मेति स्पष्ट भवति । कलियुगे तु नास्ति तादृशी शक्ति:, तस्मान्नियोगाभावोऽपि । ननु मन्वादिभि: -' देवराद्वा सपिण्डाद्वा' ( म० ९१५ ९ ), ' देवराञ्च सुतोत्पत्तिम्' इत्यादिपद्यैनियोगे सपिण्डस्य देवरस्य चाधिकार उक्तः । महाभारते सन्तानार्थं ब्राह्मणाना तपस्विनामेवाह्वानं भवतिस्म' इतिचेन्न, मनुस्मृत्युक्त नियोगस्य पूर्वपक्षरूपेणैवोपस्थापितत्वात् । महाभारते तु क्षत्रियेषु राजकुलेष्वेव सन्तानक्षयोपस्थितो ब्राह्मणानां तपोबलात् सन्तानार्थं-मेवाह्वानं भवति स्मेति दर्शनात् । मनुस्मृतो तु द्विजातीनां कृते नियोगो निषिद्धः सन् शूद्रेष्वेव पर्यवस्यति । यद्वा मनुरीत्या द्विजातीनां निषेधस्य ब्राह्मणस्त्रीणां निषेधे पर्यवसानम्, महाभारतरीत्या क्षत्रियाणा नियोगदर्शनात् । को बचाया । गोतम ऋषि ने गंगा के किनारे दधिवाहन के पौत्र और दिविरथ के पुत्र को बचा कर रखा । कुछ क्षत्रियो की पृथिवी ने भी रक्षा की । कश्यप ने इन सब की खोज की और उनको अपने अपने राज्यो मे प्रतिष्ठित किया । कुछ गर्भिणी क्षत्राणियों को भी बचा लिया गया । धर्मभीरु ब्राह्मणो ने इनसे उत्पन्न सन्तति की रक्षा की और इस तरह से क्षत्रिय जाति को बढाया । यदि हम पूर्वोक्त अर्थ को न मानें, तो वेद के पारंगत विद्वानो ने मन में धर्म की प्रतिष्ठा करके' इत्यादि वचनों की कैसे संगति बैठेगी । अतः यही मानना पडेगा कि मन्त्र शक्ति के प्रभाव से ब्राह्मणों ने सगर्भा क्षत्रिय स्त्रियों के पुत्रों की रक्षा की । 'तुष्यतु दुर्जन न्याय' के अनुसार नियोग को मान लेने पर भी वेद के पारंगत ब्राह्मणो का हो उसमें अधिकार माना जायगा, क्योकि वे ही इसकी विधि जानते है | बिना मैथुन किये, अगो को बिना स्पर्श कराये सन्तान की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? वेदाभ्यास में लगे हुए, दुर्बल ब्राह्मणो का मैथुन कर्म में उपयोग ही क्या हो सकता है । इसके लिये तो वलिष्ठ क्षत्रियो का ही उपयोग होना चाहिये था । वैदिक ब्राह्मण अपने तप के प्रभाव से बिना मैथुन किये हो, बिना अग स्पर्श के ही सन्तान की उत्पत्ति करा सकते थे । यह सामर्थ्य अन्य किसी मे नही थी । इससे यह स्पष्ट होता है कि नियोग में मैथुन नही होता था । कलियुग के ब्राह्मणो में यह शक्ति नही है । इसलिये कलियुग में नियोग को निषिद्ध माना गया । इस पर कोई प्रश्न करता है कि मनु प्रभृति ने सपिण्ड देवर को नियोग के लिये अधिकृत किया है । महाभारत में सन्तान के लिये तपस्वी ब्राह्मणों को बुलाया जाता था । किन्तु उनका यह कथन ठीक नही है । मनुस्मृति में नियोग की चर्चा पूर्वपक्ष के रूप मे ही मानी जाती है |यह सिद्धान्त पक्ष नहीं है । महाभारत में क्षत्रिय राजकुलो में सन्तान का अभाव हो जाने पर तपस्वी ब्राह्मणों को सन्तान के लिये बुलाये जाने का वर्णन है । मनुस्मृति में द्विजाति के लिये नियोग निषिद्ध है, फलतः शूद्रो मे इसका विधान मान लिया जाता है । अथवा मनु की पद्धति से द्विजाति के लिये किया गया निषेध केवळ ब्राह्मण स्त्रियो तक ही सीमित मान लिया जायगा, क्योकि महाभारत में क्षत्रिय स्त्रियो का नियोग देखा जाता है ।

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। 1 वेदार्थपारिजात १८१३ केचित्तु यथा दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोतीति ( पारस्करगृह्यसूत्रे १।१७ १ ) पितुरेव नामकरणेऽधिकार., तथा 'न चान्तरेण कृतस्तद्वितो वा शक्यो विज्ञातुम्' ( महाभाष्ये पस्पशाह्निके ) इति महाभाष्यमनुसृत्य क्षत्रियादयः कृदन्ततद्धितान्तपदानभिज्ञा नामकरण कर्तुमशक्ता. पितृस्थानीयब्राह्मणपुरोहितद्वारा नामकरणसस्कार कारयन्ति । तथैव क्षत्रियदेवरादय काम मैथुनमङ्गसङ्ग च विना सन्तान दातुमसमर्था इति ब्राह्मणात् तपस्विनस्तद्विधिज्ञात् कामयन्ते । ब्राह्मण एव पतिनं राजन्यो न वैश्य । 'तत्सूर्य प्रब्रुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्य.' ( अथर्व० ५ १७१९ ) इति रीत्या ब्राह्मणा एव नियुज्यन्त इति देवरस्थानीयोऽपि भवति ब्राह्मण. ( यद्यपि ब्राह्मणो ज्येष्ठस्थानीयो भवति, तथापि क्षत्रियाया पत्यु- क्षत्रियस्य मुख्यत्वेन स सुदेष्णाया इव जीवितत्वे स्वर्गस्थत्वे वा तदपेक्षया ब्राह्मणो द्वितीयस्थानत्वाद् द्वितीयवरत्वाद्देवरो भवति पत्युद्वितीयोऽनुज इति योगिकवृत्तिमाश्रित्य लोके रूटं देवरत्वमपि तत्र कल्पयितुं शक्यते ' देवराच्च सुतोत्पत्ति. ' इति च सङ्गच्छते । कलियुगे सोऽसम्भव इति कृत्वा निषिध्यते । 'न शक्यतेऽधुना कर्तुं शक्तिहीनैरिदन्तने इति बृहस्पतिवचने- नापि निषेधस्य कलिविषयता विज्ञायते । ' अयं च स्वोक्तनियोगनिषेध. कलियुगविषय:' इति / म० ९ ६८ ) कुल्लूकभट्ट । नन्वन्यस्मात्सन्तानोत्पादनाय पाण्डुना कुन्ती प्रेरिता । स तु शापवशात् सन्तानोत्पादनेऽसमर्थं आसीदिति चेन्न, लोभोपहतबुद्धित्वेन तस्यापि निन्दितत्वात् । यथा पौत्रप्रलोभिन्या सत्यवत्या भीष्म प्रेरित आसीत् । 'लालायमाना तामेवं कृपणा पुत्रगृद्धिनीम् । धर्मादपेत ब्रुवती भीष्मो भूयोऽब्रवीदिदम् ॥ ' ( म ० भा० आदिपर्व १०४। २४ ) । पाण्डुरपि तथैवाब्रवीत् 'भर्ता भार्यां राजपुत्रि धर्म्यं वाधर्म्यमेव वा । यद्ब्रूयात्तत्तथा कार्यमिति वेदविदो विदुः ॥ ' ( म० भा० आ ० प० १२२।२८ ), 'आज्ञा गुरूणामविचारणीया' ( रघुवंशे १४।४६ ) ' अमीमास्या गुरव ' ( चाणक्यसूत्रे ४२१ ) इत्यादिवचनैर्गुरुणामाज्ञाया अमीमास्यत्वेप्यधर्म्यत्व तद्ववचनादेव विज्ञायते । अधर्म्याप्याज्ञा पालनीयेत्यन्यदेतत् । कुन्त्या तथैवोक्तम्-' न मामर्हसि धर्मज्ञ पिता का ही पुत्र के नामकरण मे अधिकार है । कुछ लोगो का कहना है कि पारस्कर गृह्यसूत्र के वचन के अनुसार जैसे सकता, अत क्षत्रिय प्रभृति नामकरण के लिये महाभाष्य में बताया गया है कि बिना व्याकरण पढे कृत् और तद्धित का ज्ञान नही हो देवर प्रभृति भी मैथुन और अंग सग के पितृस्थानीय ब्राह्मण पुरोहित के द्वारा नामकरण सस्कार करवाते हैं, उसी तरह से क्षत्रिय अभिज्ञ थे । ब्राह्मण ही सबका स्वामी है. 1 बिना सन्तान देने में असमर्थ होने से तपस्वी ब्राह्मणो के पास जाते थे, जो कि इस विधि के क्षत्रिय अथवा वैश्य नही । अथर्ववेद के अनुसार नियोग के लिये ब्राह्मण ही बुलाये जाते है, अतः ब्राह्मण को देवर स्थानीय मानाहोगयाया है । यद्यपि ब्राह्मण का पद बडा है, तो भी क्षत्राणी का मुख्य पति क्षत्रिय ही होता है, वह भले ही सुदेष्ण के समान जीवित । देवर स्वर्गस्थ | इस मुख्य पति की अपेक्षा ब्राह्मण द्वितीय स्थान पर आता है । इसीलिये इसको द्वितीय वर होने से देवर कहा जाताके लियेहै स्वीकृत शब्द लोक में यद्यपि पति के सगे छोटे भाई के लिये रूढ हैं, किन्तु 'दूसरा वर' इस यौगिक व्युत्पत्ति के आधार पर नियोग बैठ जाती है । के लिये भी प्रयुक्त माना जा सकता है । ऐसा मानने से ' देवराच्च सुतोत्पत्ति:' इस स्मृति वाक्य की भी संगति ब्राह्मण कलियुग में यह असंभव है, अतः नियोग निषिद्ध कर दिया गया है । 'न शक्यते' प्रभृति बृहस्पति वचन से भी कलियुग मे नियोग निषिद्ध घोषित होता है । कुल्लूक भट्ट ने भी ऐसी ही व्याख्या की है । अन्य पुरुष से सन्तान उत्पन्न करने के लिये पाण्डु ने कुन्ती को प्रेरित किया था, क्योंकि शाप के कारण वह स्वयं सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ हो गया था, किन्तु पाण्डु की यह बुद्धि लोभ से भरी हुई थी । शास्त्रो मे इसकी भी निन्दा ही की गई है । जैसे पौत्र का मुख देखने के लोभ में सत्यवती ने भीष्म को पुत्रवधू में सन्तान उत्पन्न करने के लिये प्रेरित किया, किन्तु पत्नीभीष्मकोने इसजो धार्मिक प्रस्ताव को स्वीकार नही किया । पाण्डु ने भी वही कार्य किया । वह कुन्ती से कहता है कि हे राजपुत्रि, पति कुछ भी उचित -अनुचित करने को कहे, पत्नी को उसे स्वीकार करना चाहिये । रघुवंश में कालिदास कहते हैं कि गुरुजनोसभी प्रमाणोंकी आज्ञासे कायह पालन बिना विचारे करना चाहिये । चाणक्य भी कहता है कि गुरु की आज्ञा पर तर्क नही करना चाहिये । इन से ही यह भले ही सिद्ध हो जाय कि गुरु की आज्ञा का पालन बिना विचार किये अवश्य करना चाहिये, किन्तु यहाँ पर पाण्डु के वचन सिद्ध हो जाता है कि कुन्ती को कही गई बात धर्मानुकूल नहीं है । अधार्मिक आज्ञा का भी पालन किया जाय,यह दूसरी बात है । कुन्ती 1

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वेदार्थपारिजातः १८१४ वक्तुमेव कथञ्चन । धर्मपत्नीमाभिरता त्वयि राजीवलोचन ॥ ' ( म० भा० १।११२/ २) स्मर्यते । न चाश्विभ्या सहैव मैथुन- मेकस्या नार्या कर्तुमपि शक्यते । देवताना सामर्थ्यातिशयादेव पञ्चानामपि पाण्डवानामेकसवत्सरेणेवोत्पत्तिः सञ्जाता । अनु- सवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव ॥ ' ( म भा० १ | १२४/२२ ), मेथुन्यां सृष्टी तु क्रमेणैव वृद्धिर्भवति । अमैथुनोत्पन्नाः सीतारामादयः समकालेनैववृद्धि गता । षड्वर्षाया एव सीताया रामेण सार्धं विवाहः सवृत्तः । महाभारते यत्रापि नियोगाभासो दृश्यते, तत्र देवताः सयमिना वृद्धा ब्राह्मणा वा आहूयन्ते स्म । तद्यथा- 'ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद् धनेनोपनिमन्त्रयताम् । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत्प्रजाः ॥ ' ( म ० भा० १।१०५ २ ) इति भीष्मोक्तिः । पाडुनाप्येका कथा वर्णिता । ' सा वीरपत्नी गुरुणा नियुक्ता पुत्रजन्मनि । वरयित्वा द्विजं सिद्धम् ' ( म० भा० १।१२० ३ ९-४० ) भीष्मोक्तो ' गुणवान्' इति, पाण्डोरुक्तो ' द्विजं सिद्धम्', 'द्विजातेस्तपसाधिकात्' इति विशेषणं महत्त्वपूर्णम् । महाभारते आदिपर्वणि १२२।३० । अत्र कस्यचित् सुन्दरस्य यूनः क्षत्रियकुमारस्योल्लेख. कुतो न दृश्यते? पुनः पुनर्ब्राह्मणस्य तपस्विन इति किमर्थ- मुल्लेख:? ' तपस्वी' १२२ २०, ' अतिजरठ,' १।१०४| ४६ इति विशेषणमपि तादृशमेव । सायणाचार्येण ऋग्वेदसहिताभाष्ये १ मण्डले १२५ सूक्ते १ मन्त्रे ' राजमहिष्या अतिजरठेन महर्षिणा सह रन्तु लज्जमानया' इत्युक्तम् । अत्र महर्षिणातिवृद्धेन दीर्घतमसा कलिङ्गराजमहिष्या नियोगचर्चाप्यस्ति । योगिनि सिद्धे तपस्विनि वृद्धतमे ब्राह्मणे गुणवति तादृशी शक्तिर्भवति, येन देहस्पर्शमन्तरा मैथुन विनापि सन्तानोत्पादन सुशक भवति । स्मर्यते च तप शक्त्या, वचनेन, मनःसङ्कल्पेन, हस्तस्पर्श- मात्रेण सन्तानोत्पत्तिः । 'ऋषिरभ्यागतः कश्चिद् धर्मात्मा वेदपारगः । स मया वरदः कामं याचितो धर्मसंहितम् ॥ नाह- ने इसी बात को पाण्डु के सामने रखा कि हे धर्मज्ञ, आप मुझ धर्मपत्नी को ऐसा अधार्मिक कार्य करने के लिये मत कहिये । इस श्लोक मे धर्मज्ञ और धर्मपत्नी ये दो शब्द अन्य पुरुष से सन्तान की उत्पत्ति को अधार्मिक कार्य घोषित करते है । दूसरे की स्त्री के साथ व्यभिचार वर्णसंकर का कारण बनता है और यह वर्णसंकर नरकपात का कारण बनता है । मनुस्मृति में भी कहा गया है कि अन्य पुरुषो की स्त्रियों के साथ नियोग सनातन धर्म के नाश का कारण बनता है । इससे वर्णसंकर प्रजा होती है । मनुस्मृति के ये वचन परपुरुष से संबन्ध को पाप घोषित करते हैं । इस परिस्थिति में स्वामी दयानन्द के द्वारा समर्पित नियोग सर्वथा अधर्म है । उन्होने यम और यमी को, जो कि परस्पर भाई बहिन थे, पति-पत्नी बनाकर वेद के यम यमी संवाद के द्वारा नियोग को वैदिक घोषित करने का प्रयत्न किया है, और उनके अनु- यायियो ने उनकी लाज बचाने के लिये स्वता पद का अर्थ पत्नी कर दिया है, किन्तु इससे भी कुछ बात बनती नहीं । महाभारत में कुन्ती का स्पष्ट कथन है कि हे महाबाहु, तुम अपने ही वीर्य से मेरे गर्भ मे सन्तान पैदा कर सकते हो । यहाँ पर ' धर्मतः' यह पद ध्यान देने योग्य है । वह आगे कहती है कि मै तुम्हारे सिवाय किसी दूसरे पुरुष को मन से भी नही चाह सकती । इस लोकोत्तर आदर्श को स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी मलिन करना चाहते है । कुन्ती पाण्डु को दिये गये शाप के वृत्तान्त को जानती थी । इसीलिये वह कहती है कि आप अपने तप के प्रभाव से मानसिक सङ्कल्प से भी मुझ से सन्तान पैदा कर सकते है । इससे यह स्पष्ट होता है कि मैथुन के बिना ही, अंगो का स्पर्श हुए बिना ही तपस्वी लोग सन्तान पैदा करने में समर्थ होते थे । इस पर पाण्डु कहते है कि मुझ मे ऐसी सामर्थ्य नही है, इसलिये सन्तान की प्राप्ति के लिये तुम किसी ब्राह्मण को बुला लो । इसके लिये मै तुमको आज्ञा देता हूँ । पाण्डु के ऐसा कहने पर कुन्ती निवेदन करती है कि बचपन में दुर्वासा मुनि ने मुझे मन्त्र का उपदेश किया था । उनके प्रभाव से देवताओ को बुलाया जा सकता है और उनके अनु- ग्रह से सन्तान प्राप्त की जा सकती है । तब पाण्डु ने इसके लिये उसको अनुमति दे दी । तब सबसे पहले कुन्ती ने गर्भ धारण करने के लिये धर्म का आह्वान किया । उसने धर्मराज के लिये बलि का उपहार दिया और दुर्वासा के दिये मन्त्र का विधिवत् जप करने

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वेदार्थपारिजात १८१५ म० भा० ११८३ | ३-४ ) यद्येतदसम्भव मन्यायत काममाचरामि शुचिस्मिते । तस्मादृषेर्मंमापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि? ' ते ॥ ' ( स्यात्तदा शर्मिष्ठया कथमुच्येत । कथं वा देवयान्या विश्वासोऽपि स्यात् न मन्युविद्यते मम । अपत्य यदि ते लब्धं ज्येष्ठात् श्रेष्ठाच्च वै द्विजात् ॥ ' ( म ० भा० ११८३७ ) यदुस्तरं यदुराप यद्दुर्गं यच्च दुर्लभम् । सर्वं तत्तपमा माध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् || ' ( म० ११।२३२ ) सायणेन पूर्वोक्ताख्यायिकाया स्पष्टमुक्त राज्ञा (कलिङ्गेश्वरेण स्वयं वृद्धत्वादपत्योत्पादनाय सामर्थ्यमलभमानेन तदुत्पादनाय याचितो दीर्घतमा ऋषिरपत्योत्पादनाय प्रेषितया राजमहिष्या अतिजरठेन महर्षिणा सह रन्तुं लज्जमानया स्ववस्त्राभरणैरलङ्कृत्य स्वप्रतिनिधित्वेन प्रेषिता मुशिड्नाम्नी योषितं दासीमित्यवगत्य मन्त्रपूतेन वारिणाभिषिच्य ऋषिपुत्री कृत्वा तया सह रेमे । अति वृद्धत्वादेव यथा राजा मैथुनेऽसमर्थं आसीत्तथैव ऋषिरप्यसमर्थ एवासीत् । अतस्तपः शक्त्यैव पुत्र उत्पादित । अत एव रमणमपि न मैथुनम्, किन्तु विनोदमात्रम् ॥ लगी । उस मन्त्र के प्रभाव से धर्मराज वहा उपस्थित हुए । इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि मन्त्र के प्रभाव से बुलाये गये धर्म मनुष्य नही थे, किन्तु मनुष्य योनि से भिन्न वे देवयोनि में उत्पन्न दिव्य पुरुष थे । देवता अपने महात् ऐश्वर्य के प्रभाव से मैथुन और अंगस्पर्श के बिना भी सन्तान देने में समर्थ होते थे । इस तरह से महाभारत की कुन्ती के आख्यान से दयानन्द प्रदर्शित नियोग को समर्थन नही मिल सकता । मनुष्यों को बुलाने के लिये तपस्या करने अथवा मन्त्र जप करने की कोई आवश्यकता नही है । इस कथा में तो न केवल कुन्ती, किन्तु पाण्डु ने भी तपस्या की है । इन्द्र का आह्वान करने के लिये पाण्डु ने एक वर्ष पर्यन्त कठिन तपस्या को और कुन्ती ने भी नियमपूर्वक दुर्वासा के दिये मन्त्र का जप किया । कुन्ती ने माद्री को भी ऐसा ही करने के लिये कहा । मन में ध्यान करने मात्र से देवता अथवा ऋषिगण ही आ सकते हैं । उन्ही मे यह सामर्थ्य है, मनुष्य में नही । इस तरह से पाण्डवो की उत्पत्ति देवताओ के प्रसाद से हुई है, स्वामी दयानन्द प्रदर्शित नियोग विधि से नहीं, क्योकि धर्म, इन्द्र प्रभृति मनुष्य नही थे । यहाँ कही भी मैथुन की चर्चा नही है । अश्विनीकुमार दो हैं । ये दोनो एक ही नारी मे एक साथ मैथुन कर भी नही सकते । देवताओं के विशिष्ट ऐश्वर्य के कारण ही पांचो पाण्डवो की उत्पत्ति इस प्रकार हुई मानो उनकी उत्पत्ति एक ही वर्ष में हुई हो, मैथुन से होने वाली सृष्टि में क्रम से वृद्धि होती है । बिना मैथुन के हुई सृष्टि तो एक साथ बढ जाती है । सीता, राम प्रभृति की वृद्धि एक साथ ही हुई थी । सीता जी जब छ वर्ष की थी, तभी राम के साथ उनका विवाह हो गया था । महाभारत में जहाँ कही भी नियोग का आभास मिलता है, सब जगह कोई न कोई सयमी वृद्ध ब्राह्मण ही इसके लिये बुलाया गया है । जैसा कि भीष्म ने कहा है कि किसी गुणवान् ब्राह्मण को धन देकर बुलाओ, जो कि विचित्रवीर्य की पत्नियो में सन्तान उत्पन्न करे । पाण्डु ने भी एक वीर पत्नी की कथा कही है, जिसने कि पुत्र प्राप्ति के लिये एक तपस्वी ब्राह्मण को चुना था । भीष्म के कथन मे 'गुणवान्' और पाण्डु की उक्ति में 'सिद्ध द्विज, यह विशेषण ध्यान देने योग्य है । महाभारत के आदि पर्व मे ब्राह्मण को अत्यन्त तपस्वी कहा है । इन सब स्थलो मे किसी सुन्दर स्वस्थ क्षत्रिय युवक का उल्लेख क्यों नही किया गया? बार बार तपस्वी वृद्ध ब्राह्मण की ही चर्चा क्यो आती है? ऋग्वेदसहिता ( १/१२५/१ ) के भाग्य मे सायण ने लिखा है कि राजमहिषी अत्यन्त वृद्ध महर्षि के साथ रमण करने में लज्जा का अनुभव करती थी । यहा अत्यन्त बृद्ध महर्षि दीर्घतमा के कलिंगराज की महिषी के साथ हुए नियोग की चर्चा है । सिद्ध योगी तपस्वी अत्यन्त वृद्ध गुणवान् ब्राह्मण में वैसी शक्ति रहती थी, जिसके कारण देह का स्पर्श किये बिना ही, मैथुन के बिना ही वह सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ रहता था । शास्त्रों में यज्ञ की शक्ति के प्रभाव से, वाणीमात्र से, मन के संकल्प मात्र से और हाथ से छूकर भी सन्तान उत्पन्न करने के अनेक उदाहरण मिलते है । यदि ऐसा करना असम्भव होता तो शर्मिष्ठा ऐसा क्यों कहती? और देवयानी उसकी बात पर विश्वास भी कैसे करती । मनु ने स्पष्ट लिखा है कि तप के प्रभाव से सब कुछ प्राप्त किया जाता है, कठिन से कठिन कार्य भी पूरा किया जा सकता है । सायण ने पूर्वोक्त आख्यायिका मे स्पष्ट कहा है कि कलिंग का राजा वृद्ध होने के कारण स्वय सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ हो गया था । उसने सन्तान की प्राप्ति के लिए दीर्घतमा ऋषि से प्रार्थना की । उसने अपनी राजमहिषी को उनके पास भेजा । उस जराजीर्ण महर्षि के साथ रमण करने में राजमहिषी लज्जा का अनुभव कर रही I थी । उसने अलंकार, वस्त्र आदि से सजाकर अपनी दासी को उनके पास भेज दिया । उस दासी को ऋषि ने मन्त्रपूत जल से पवित्र कर ऋषिपुत्री बना दिया और उसके साथ रमण किया । अति वृद्ध होने से जैसे राजा मैथुन करने में असमर्थ है, उसी तरह से ऋषि

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वेदार्थपारिजातः १८१६ योगशक्ते महिात्म्यं शङ्कराचार्योऽप्याह - 'स्मृतिरपि प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणा योगिनामपि युगपदेनकशरीरयोगं दर्शयति किमु वक्तव्यमाजानसिद्धाना देवनाम्' ( ब्र ० सू० १ ३ २७ )11| धर्मदेवेनापि योगशक्त्यैव युधिष्ठिरो जनितः, न मैथुनेन । ( आदिपर्वणि १२१/२ ) अत्र धर्मज्ञ, धर्मपत्नीम् इति शब्दाभ्यां अन्यपुरुषात् सन्तानोत्पादनस्याधर्मत्वमेव बोध्यते । ' पर-दाराभिमर्शेषु जायते वर्णसङ्कर.' ( म ० ८ ३५२-३५३ ), 'सङ्करो नरकायैव ' ( म० गीता १।४२ ), 'अन्यस्मिन् हि नियुञ्जानातेन धर्मं हन्युः सनातनम् ' ( म० ९ ६४ ), 'वर्णानां सङ्करं चक्रे' ( म० ९ ६७ ) इत्यादिवचने परपुरुषसम्बन्धस्याधर्मत्वोक्तेः । दयानन्दोक्तो नियोगः सर्वथाऽधर्म एव । तदर्थमेव यमयम्योर्भ्रातृभगिन्यो. सवादस्य पतिपत्नीसवादत्वेन कल्पना कृत्वा ' अन्य मिच्छस्व सुभगे पतिं मत्' (ऋ० सं ० २०१०।१० ) इति वेदवचनमूलकतया कल्पितस्य नियोगस्य घोषणा कृता तेन । तद-नुयायिभिस्तु तल्लज्जासरक्षणार्थं स्वसृपदस्य पत्न्यर्थतापि कल्पिता । कुन्ती तु 'त्वमेव तु महाबाहो मय्यपत्यानि भारत । वीर वीर्य्योपपन्नानि धर्मंतो जनयिष्यसि ॥ ' ( म० भा० ११ १२ १३ ) अत्र कमंत इत्युक्तम् । 'नह्यहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम् । ' ( म० भा० १।१२१।५ ) एवं लोकोत्तर आदर्शो दयानन्देन तदनुयायिभिश्च मलिनीकृतः । यद्यपि पाण्डुशापवृत्तान्तं कुन्ती जानाति स्म । अत एवमाह सा -' तथा त्वमपि मय्येव मनसा भरतर्षभ । शक्तो जनयितुं पुत्रांस्तपोयोगसमन्वितः ॥ ' ( म ० भा० १।१२१ । ३८ ) तेन मैथुनमन्तरा अङ्गस्पर्शं काम चान्तरापि सन्तानो-त्पादनं सम्भवतीति तपोधनानामेव तत्र सामर्थ्यम् । पाण्डुना तुत्तरितम् -मयि तपसो योगस्य च तादृश सानथ्यं नास्तीति तदर्थं कश्चिद् ब्राह्मण आहूयताम् ' मन्नियोगात् सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसोऽधिकात् । पुत्रान् गुणसमायुक्तानुत्पादयितुमर्हसि ॥ ' (म० भा० १।१।२१।३१ ), 'तथा त्वमपि कल्याणि ब्राह्मणात्तपसोऽधिकात् । मन्नियोगाद्यत. क्षिप्रमपत्योत्पादनं प्रति ॥ ' (म भा० १।१२० | ४२ ) तदा कुन्त्या निवेदितं बाल्यावस्थाया मा मुनिना दुर्वाससा मन्त्रविशेष उपदिष्टः । तेन देवता आहूय तासा- असमर्थ थे । अतः उन्होने अपने तप की शक्ति से पुत्र उत्पन्न किया । इसीलिये रमण शब्द का अर्थ भी यहाँ मैथुन न होकर विनोदमात्र है । योग की शक्ति के महत्व को शंकराचार्य ने भी बताया है—स्मृतियों में अणिमा प्रभृति ऐश्वर्यों को प्राप्त कर लेने वाले योगियो के एक साथ अनेक शरीर धारण कर लेने की बात वर्णित है । जब मनुष्य योगियो में ऐसी सामर्थ्य है, तो फिर आजानसिद्ध देवताओं के विषय में कहना ही क्या है? उनमें तो स्वभावत. ये सब शक्तिया विद्यमान रहती है । धर्मदेव ने भी योग शक्ति के द्वारा ही युधिष्ठिर को उत्पन्न किया, मैथुन करके नहीं । केवल धर्मदेव के लिए ही नही, अन्य देवताओ के सम्बन्ध में भी महाभारत में ऐसा ही वर्णन मिलता है कि अपने यौगिक ऐश्वर्य के प्रभाव से विभिन्न देवताओ ने पाण्डवो को उत्पन्न किया । यदि यह नियोग मनुष्यों के द्वारा किया गया होता तो इसके लिये जप, तप, मन्त्र आदि की सहायता क्यो ली जाती? कुन्ती को वरदान ही ऐसा मिला था कि वह जिस जिस देवता का मन्त्र के द्वारा आह्वान करेगी, उसकी कृपा से उसको पुत्र प्राप्त होगा । प्रसाद शब्द से स्पष्ट होता है कि इसके लिए मैथुन अपेक्षित नही है । वहाँ स्पष्ट बताया गया है कि पाण्डव मैथुन से उत्पन्न न होने के कारण निष्पाप है । कुन्ती ने यौगिक ऐश्वर्य से शरीर धारण कर आये धर्मदेव से पुत्र प्राप्त किया था । यहाँ पर संयुक्त पद से मैथुन का बोष नही होता, ऐसा मानने पर ' योगमूर्तिधर' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा । देवता महान् ऐश्वर्यशाली होते है । ये अपने ऐश्वर्य के प्रभाव से मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाते है । ऐसे भी देवता होते हैं ", जो संकल्प, वाणी, दृष्टि, स्पर्श और संघर्ष इन पाँच विधियो से सन्तान प्रदान करते है । मनुष्य का धर्म देवताओं के कारण दूषित नहीं होता । मनुष्य के साथ विवाह होने से पहले कुमारी का तो, गन्धर्व और अग्नि के साथ संबन्ध होता है । ये सब कुमारियो के प्रति माने जाते हैं । ऐसा माने जाने पर भी वे व्यभिचारिणी नही कही जाती । मनुष्य के पति बन जाने के बाद इन्द्राग्नि" द्यावापृथिवी, मातरिश्वा, मित्रावरुण, भग, अश्विनीकुमार, बृहस्पति, मरुद्गण, ब्रह्मा, सोम ये सब देवता उस नारी की प्रजा ( सन्तान ) की वृद्धि करते हैं । इन सब देवताओं के प्रसाद से स्त्रियो को सन्तान की प्राप्ति होती है । किन्तु इन देवताओं के साथ उनका मनुष्यों के जैसा स्थूल संभोग नही होता । महाभारत के अनुसार यज्ञीय अग्नि से द्रौपदी, घृष्टद्युम्न

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वेदार्थपारिजात १८१७ मनुग्रहेण पुत्रलाभः सम्भवति, तदा पाण्डुना तथैवाज्ञप्तम् । तत. 'आह्वयामास सा कुन्ती गर्भार्थ धर्ममच्युतम् |' ( म भा० १ | १२३ | १ ), 'सा बलिं त्वरिता देवो धर्मायोपजहार ह । जजाप विधिवज्जप्यं दत्त दुर्वाससा पुरा ॥ आजगाम ततो देवो धर्मो मन्त्रबलात्ततः । ' ( म ० भा० ११११४/२) इति वचनैः स्पष्ट प्रतीयते । यन्मन्त्रबलेनाहूतो धर्मो न मनुष्य इति, किन्तु मनुष्ययोनि- मिन्नो देवयोनिविशेष इति । देवतास्तु महाभाग्यात् स्वसामर्थ्यान्मैथुनमज्जस्पर्शमन्तरापि सन्तानदाने समर्था भवन्ति 1। तेन महाभारतस्य कुन्त्याख्याने न दयानन्दोक्तनियोगस्य गन्धोऽपि विद्यते । मनुष्याणामाह्वानाय तपसो मन्त्रजपस्य चोपयोगाना- वश्यकत्वात् । अत्र तु न केवल कुन्त्या, किन्तु पाण्डुनापि तपः कृतम् । 'ततः पाण्डुर्महाराजो व्रत सवत्सरं शुभम् ॥ आत्मना च महाबाहुरेकपादे स्थितोऽभवत् । उग्रं स तप आस्थाय परमेण समाधिना ॥ अरिराधयिषुर्देवं त्रिदशानामधीश्वरम् ।' ( म० भा० १। १२३। २५-२७ ) । इन्द्राह्वानार्थं पाण्डुना तपः कृतं कुन्त्या च नियमेन दुर्वाससा दत्तमन्त्रस्य जपादिकं कृतम् । -- माद्री च तथैव कर्तुमुक्ता – 'एवमुक्त्वाऽब्रवीन्माद्री सकृञ्चिन्तय देवतम् । तस्मात्ते भविताऽपत्यमनुरूपमसशयम् ॥ ततो माद्रो ------ विचार्यैवं जगाम मनसाश्विनौ तावागत्य सुतौ तस्या जनयामासतुर्यमी ॥ ' - ( म० भा० १।१२३ ) मनसा ध्यानमात्रे-णागमनं देवतानामृषीणामेव वा सम्बन्धे घटते । तस्माद्देवताना प्रसादात् पाण्डवानामुत्पत्तिर्न दयानन्दाभिमत- नियोगेन यतो धर्मादयो न मनुष्याः । ना मैथुनं ' येन योगबलाज्जात. कुरुराजो युधिष्ठिरः । धर्मं इत्येव नृपते ' ( ) 'प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥ म० भा० १५ २८ १८ एतदेवान्यत्रापि । ब्रह्मचर्यव्रतस्य तस्य दिव्येन हेतुना साक्षाद् ... ( ) धर्मादय पुत्रस्तत्र जातो युधिष्ठिरः ॥ दिव्येन हेतुना म० भा० इत्यत्रापि योगबलमेव सूचितम् । धर्मादयः सर्वेऽपि पाण्डवोत्पादका देवा एव, ' देवास्त्वस्मानादधोरन् जनन्या धर्मो वायुमंघवानश्विनौ च । ' ( म० भा ० १।११ ९ ।२७ ) 'पाण्डोः कुन्त्यां च माद्रया च पुत्राः पञ्च महारथाः । देवेभ्यः समपद्यन्त सन्तानाय कुलस्य वै ॥ ' ( म० भा० १।११६।२ ) यद्ययं नियोगो मनुष्यात् स्यात् तदा तदर्थं जपतपोमन्त्राणां प्रयोगः किमर्थं स्यात्? कुन्त्या वरदानमपि तादृशस् । ' यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य प्रसादात्ते राज्ञि पुत्रो भविष्यति ॥ ' ( म० भा० ११ १२२/ ३६-३७ ) प्रसादशब्दे- नात्रामैथुनमेव सूचितम् । 'न च मैथुनसम्भूता निष्पापाः पाण्डवा मताः ।' ( भारतसार-उद्योगपर्व ५५/३१ ) संयुक्ता सा हि धर्मेण योगमूर्तिधरेण च । लेभे पुत्रं वरारोहा.. ' ( म० भा० १२३ ५ ) इत्यत्रापि संयुक्ता इत्यनेन न मैथुनं सूच्यते, योगमूर्तिधरेणेतिविशेषणवैयर्थ्यात् । देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराण्याविशन्ति च ।' ( आश्रमवासिकपर्व ३० | २१ ) सन्ति देवनिकायाश्व सङ्कल्पाजनयन्ति ये । वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात् संघर्षेणेति पञ्चधा ॥ ' आश्रयबासिकपर्व ( ३८| २१ ) । मनुष्यधर्मो देवेन धर्मेण हि न दुष्यति ॥ मनुष्येण सह विवाहात्पूर्वं कुमारीणां सोमेन गन्धर्वेणाग्निना च सम्बन्धो भवति । एता देवताः पतयो भवन्ति कुमारीणाम् । नैतावतापि सा व्यभिचारिणी भवति । मनुष्यस्य पतित्वे इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारी प्रजया वर्धयन्तु । ' ( अथर्ववेदसंहिता १४| १ | ५४ ) तासां देवतानां प्रसादात् स्त्रीणां सन्तानोत्पत्तिर्भवति । तथापि नासां देवतानां मनुष्यस्येव स्थूलसम्भोगो भवति ॥ महाभारतानुसारेण यज्ञाद् अग्नेः द्रौपदीधृष्टद्युम्नादीनामुत्पत्तिः श्रूयते, द्रोणाद् द्रोणस्योत्पत्तिः, सत्यवत्या मत्स्या उत्पत्तिः, वृक्षेभ्योऽपि सन्तानोत्पत्तिः स्मर्यते । वार्क्षी प्रसिद्धा । ऋषिमुनिदेवादीनां सङ्कल्पेन दृष्ट्या ------मनसा वा स्त्रीभ्यः सन्तानोत्पत्ती न पातिव्रत्यभङ्गः । तत एव वायुनाञ्जनाप्रोक्ता-'न त्वां हिसामि सुश्रोणि मा 4 भूत्ते प्रभृति को, द्रोण से द्रोणाचार्य की उत्पत्ति हुई है । वृक्षों से भी सन्तान की उत्पत्ति वहाँ वर्णित है इनमें वार्थी प्रसिद्ध है । ऋषि, मुनि, देवता प्रभृति के संकल्प, दृष्टि और मन से भी स्त्रियों के सन्तान उत्पन्न होने पर उनका पतिव्रत्य भंग नही होता । इसीलिये वायु ने अंजना से कहा है-'हे सुश्रोणि, तुम्हारे मन मे किसी प्रकार का भय नही होना चाहिये, मैं तुम्हें किसी भी तरह से हानि २२८

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वेदार्थपारिजात. १८१८ देवतानामालिङ्गनेन नमनसो भयम् । मनसास्मि गतो यत्त्वा परिष्वज्य यशस्विनी ॥ ' ( वा० रा० ४।६६।१७-१८ ) पातिव्रत्यभङ्गः । योनिभोगद्वारैव धर्मभङ्गो भवति । एतावता देवताना न स्थूलसम्भोग । ' म० भा ० कुन्त्याः कौमार्ये सूर्येण सहापि न स्थूलमैथुनसम्पत्ति, किन्तु मानससम्बन्ध एव । 'योगेनाविश्य पर्व ३०| १४ ) योगो दिव्यविधिर्वा३०७/२८ ) दिव्येन विधिना' ( म० भा० ३०२।१३ ) 'तेजसाविश्य' ( आश्रमवासिक | २८ ) मनुष्यधर्मोन मैथुनम् |। वनपर्वकथेयम् । तावता कुन्ती न दूषिता, न चैवैना दूषयामास भानु:' ( म० भाससर्गो० ३ | ३७भवति । यथा कृष्ण-देवेन धर्मेण न दुष्यति ( आश्रमवासिकपर्व ३० | २३ ) । तथैव ऋषिमुन्यादीनां दिव्यविधिना । कृष्णद्वैपायनाच्चापि द्वैपायनस्य कौशल्यया अम्बालिकया च नियोग । तत्रापि न मैथुनसम्बन्धः किन्तु वरप्रदानमेव । दृष्टिसयोगेन प्रसूतिर्वरदानजा ॥ धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानाञ्च सम्भवः || ' ( म ० भा ० १( २/१०१। )तोषयामासअत्र वरेणोत्पत्तिरुक्तागान्धारी व्यासस्तस्यै वरं 'हस्तसंयोगेन वा समुत्पत्तिर्वरदान मूलिकैव । क्षुच्छमाभिपरिग्लानं द्वैपायनमुपस्थितम् बालब्रह्मचारिण ददौ ॥ सावळे सदृश भर्तुः पुत्राणा शतमात्मन ' ।' ( म० भा० १।१०७ ७ ) तथैवाङ्गस्पर्शमैथुनादिकमन्तरेव ऊर्ध्वरेतसो व्यासाद् धृतराष्ट्रादीनामुत्पत्तिः । षष्ठं तादृशा ऊर्ध्वरेतस आयुर्वेददृष्ट्या नपुसकत्वेन गण्यन्ते । ' बलिन. क्षुब्धमनसो निरोधात् ब्रह्मचर्यतः । क्लेव्य मत तत्तु स्थिरशुक्रनिमित्तजम् ॥' ( सुश्रुत चिकित्सास्थाने २६। १२ ) तेषु शुक्राभावात् शुक्रस्थैर्याद्वोत्तेजनाभावात् पुत्रक । ' ( म० ' ' स्त्रीसङ्गयोग्यास्ते न भवन्ति । ऊर्ध्वरेतस्कत्वं मैथुनं च परस्पर विरुद्धमेव । तयोरुत्पादयापत्य समर्थो ह्यसि ॥ भा०१, ९ ७| १० ) इत्यत्र तपोबलेन पुत्रजननसमर्थ इत्येवार्थः । " नियतं म महातपाः । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादयिष्यतिसमान् । ' ( म० भा० १।१०५ | १ ९ ) । स्थिरशुक्रस्य नपुंसकस्य मैथुनासम्भवात् ॥ 'भ्रातुः पुत्रान् प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः । द्वितीयं ( म ० भा० १।१०५।४१ ) अत्र पुत्रदानमपि दिव्यविधानमेव सूचयति । 'ज्ञातिवशस्य गोप्तार पितॄणा वंशवर्धनम् धर्म नही टूटता । नही पहुँचाऊंगा । मैंने तो मानसिक आलिंगन मात्र किया है । देवताओ के इस तरह के मानसिक आलिंगन से पातिव्रत्य। योनि के द्वारा उपभोग करने पर ही ऐसा होताहै । इससे सिद्ध हो जाता है कि देवता स्थूल संभोग नही करते | ही था । योग कुमारावस्था मे हुआ कुन्ती के साथ सूर्य का सम्पर्क भी स्थूल मैथुनरुप न होकर । मानसमहाभारतसंकल्पमयआश्रमवासिक पर्व में अथवा दिव्यविधि मैथुन नही कहा जाता । यह वनपर्व की कथा है । उससे कुन्ती दूषित नही हुई मुनियो का भी संसर्ग दिव्य विधि से कहा गया है कि मनुष्य का धर्म दैवधर्म से दूषित नही होता । देवताओ के समान ही ऋषि। यहाँऔरपर भी इनका मैथुन संबन्ध न होकर, ही होता है । जैसा कि कृष्ण द्वैपायन का कौसल्या और अम्बालिका के साथ नियोग हुआ के वरदान से धृतराष्ट्र पाण्डु और वरप्रदान द्वारा ही सन्तति प्राप्त हुई है ॥ महाभारत में इसका स्पष्ट उल्लेख है कि कृष्ण द्वैपायन ही कारण है । क्षुधा और पाण्डवो की उत्पति हुई । दृष्टि मात्र मे अथवा हाथ से छू देने मात्र से जो सन्तति होती है, उसमें वरदान उसे वर माँगने को कहा । परिश्रम से थके हुए द्वैपायन व्यास के आने पर गान्धारी ने बड़ी सेवा की । इससे प्रसन्न होकर व्यासजीने के बिना ही बालब्रह्मचारी गान्धारी ने अपने पति के सदृश पराक्रम वाले सौ पुत्रों को माँगा । इसी तरह से अंगस्पर्श और मैथुन क्रिया ऊर्ध्वरेता व्यास जी के वरदान से ही धृतराष्ट्र आदि भी उत्पन्न हुए थे । नपुंसक ही माने जाते हैं । सुश्रुत संहिता में बताया गया है कि इस तरह के ऊर्ध्वरेता ऋषिगण आयुर्वेद की दृष्टि से । वीर्य की स्थिरता के कारण अपने ब्रह्मचर्य के प्रभाव से जो बलवान् शुद्धवीर्य को भी रोक लेते है, उनका वीर्य स्थिर हो जाता है ऊर्ध्वरेता महर्षियों में शुक्र का भी मनुष्य में नपुंसकता आ जाती है । यह नपुंसकता का छठवा प्रकार है । इसका अभिप्राय यह है कि । ऊर्ध्वरेता और मैथुन ये अभाव हो जाने से अथवा शुक्र के स्थिर हो जाने से वे स्त्री के साथ सहवास करने में असमर्थ हो जाते हैं पर तप के दोनों परस्पर विरुद्ध कार्य है | सत्यवती जब व्यास को अपनी पुत्रवधुओं में पुत्र उत्पन्न करने की बात कहती है, तो वहीरह ही नहीं प्रभाव से तुम पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ हो, यही उसका अभिप्राय है । शुक्र के स्थिर हो जाने पर मैथुन की सामर्थ्य